Home Blog Page 9

कर्नाटक की मस्जिदों से भराए गए SIR के फॉर्म, घुसपैठियों की मदद करने में जुटा कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम: BJP ने उठाए DK शिवकुमार की सरकार पर सवाल, EC से शिकायत भी की; जानें पूरा मामला

कर्नाटक में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी एसआईआर अभियान को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। दरअसल कई जगह पर बूथ लेवल ऑफिसर चुनाव आयोग के निर्धारित घर-घर जाकर सत्यापन की प्रक्रिया का पालन नहीं कर रहे हैं, बल्कि लोगों को सामूहिक कैंपों में बुलाकर फॉर्म भरवा रहे हैं। कुछ स्थानों पर लोगों को कहा गया कि वे स्वयं कैंप में आकर फॉर्म भरें और जमा करें।

यह चुनाव आयोग के निर्देशों का सीधा उल्लंघन है। आयोग ने अपने निर्देश में साफ कहा है कि एसआईआर के लिए बीएलओ घर-घर जाएँगे और वोटर वेरिफिकेशन करेंगे, लेकिन कर्नाटक में कई जगहों पर बीएलओ घर-घर जाने के बजाय मैरिज हॉल, कम्युनिटी हॉल, स्कूल, मस्जिद जैसे स्थानों पर कैंप लगाकर लोगों को वहीं बुला रहे हैं।

मैरिज हॉल और मस्जिदों में भरे जा रहे SIR फॉर्म

विजयपुरा में कथित तौर पर स्टार वेडिंग हॉल में SIR कैंप लगाया गया। लोगों का घर-घर जाकर सत्यापन नहीं हुआ। बेंगलुरु में एक मस्जिद के बाहर और एक निजी कार्यालय के पास BLO ने कैंप लगाकर लोगों को बुलाया। इस पर जब सवाल उठाए गए तो प्रक्रिया रोक दी गई। इतना ही नहीं रामनगर, मंड्या और बेंगलुरु के अन्य इलाकों में भी इसी तरह की शिकायतें मिलीं हैं।

जेडीयू ने कर्नाटक में एसआईआर रोकने और पूरी प्रक्रिया फिर से शुरू करने की माँग की है। इसका कहना है कि फॉर्म मस्जिदों में भरवाए गए हैं। पार्टी के नेता कृष्णप्पा ने आरोप लगाया कि SIR फॉर्म सीधे घरों में बांटने के बजाय मस्जिदों, शादी हॉल और चौराहों में भरे जा रहे थे। केंद्रीय मंत्री एचडी कुमारस्वामी पहले ही एक वीडियो दिखा चुके हैं जिसमें कथित तौर पर ऐसी जगहों पर SIR फॉर्म भरे जाते हुए दिखाए गए।

कृष्णप्पा ने कहा, “वे नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं। हर BLO को हर घर जाना चाहिए और ग्राम पंचायत के जरिए हर घर को कवर किया जाना चाहिए। इसलिए हाल ही में बांटे गए सभी SIR फॉर्म तुरंत रोके जाने चाहिए। हर BLO को घर-घर जाना चाहिए और पूरी प्रक्रिया नए सिरे से शुरू करनी चाहिए।”

वहीं पूर्व सीएम और केन्द्रीय मंत्री कुमारस्वामी ने चुनाव आयोग से कर्नाटक में अब तक किए गए इलेक्टोरल रोल के पूरे SIR को रद्द करने और नए SIR काम की निगरानी के लिए राज्य के बाहर से एक काबिल अधिकारी नियुक्त करने की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया, “कर्नाटक में इलेक्टोरल रोल में बदलाव में बहुत ज्यादा गड़बड़ियाँ हो रही हैं। राज्य सरकार इसे आसान बनाने के लिए पूरे प्रशासनिक तंत्र का गलत इस्तेमाल कर रही है।

उन्होंने आगे आरोप लगाया कि मौजूदा एसआईआर पर भरोसा नहीं बचा है। राज्य चुनाव आयोग में शिकायत दर्ज करा दी है और भारत के चुनाव आयोग को भी शिकायत भेजी है। राज्य चुनाव अधिकारियों ने कहा है कि वे आयोग से मिले निर्देशों के अनुसार काम करेंगे। हमारी पार्टी की साफ माँग है कि अब तक किए गए एसआईआर को रद्द किया जाना चाहिए।

नेताओं ने चुनाव आयोग से शिकायत की

एनडीए का एक प्रतिनिधिमंडल कर्नाटक के मुख्य चुनाव आयुक्त से मिला और अनियमितताओं के लिए जिम्मेदार पाए गए सभी अधिकारियों और राजनीतिक पदाधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की माँग की।

इस प्रतिनिधिमंडल में केंद्रीय मंत्री एच.डी. कुमारस्वामी, BJP के केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी और शोभा करंदलाजे, कर्नाटक विधानसभा और परिषद में विपक्ष के नेता आर. अशोक और चलावदी नारायणस्वामी शामिल थे। इनलोगों राज्य के मुख्य चुनाव आयुक्त अंबुकुमार से मुलाकात की और शिकायत सौंपी।

पत्र में नेताओं ने कर्नाटक में वोटर लिस्ट के वेरिफिकेशन यानी एसआईआर में भारी गड़बड़ियों पर चिंता जताई। इसमें कहा गया है कि SIR के लिए जाने वाले अधिकारी तय प्रक्रिया का बिल्कुल भी पालन नहीं कर रहे हैं, जिससे लोकतंत्र की मूल भावनाओं को नुकसान पहुँच रहा है।

नेताओं ने कहा कि SIR गाइडलाइंस के मुताबिक, डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन ऑफिसर (DEO/DC) के निर्देशों पर बूथ लेवल ऑफिसर्स को घर-घर जाकर जरूरी वेरिफिकेशन करना होता है और हर घर के सदस्यों की पहचान की व्यक्तिगत रूप से पुष्टि करनी होती है। लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसा नहीं हो रहा है। इसके सबूत सोशल मीडिया पर शेयर किए गए हैं और न्यूज चैनल्स ने भी इसे दिखाया है।

व्हाट्सएप ग्रुप के जरिए भेज रहे मस्जिदों पर भीड़

NDA नेताओं ने आरोप लगाया कि कम्युनिटी हॉल, मस्जिदों और BLOs के घरों में बैठकर एन्यूमरेशन फॉर्म भरे जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि इसके लिए WhatsApp ग्रुप भी बनाए गए हैं और लोगों को SIR प्रक्रिया के लिए इन कम्युनिटी हॉल और मस्जिदों में जाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।

बीजेपी का कहना है कि कॉन्ग्रेस अधिकारियों पर दबाव बना रही है और वोट शेयर बढ़ाने के लिए घुसपैठियों और अयोग्य लोगों को वोटर लिस्ट में शामिल करने की कोशिश में जुटी हुई है। ये लोग एक बार देश के वोटर बन गए, तो कॉन्ग्रेस का वोट बैंक भी बड़ा हो जाएगा। स्थानीय बीएलओ को ‘एक साथ काम खत्म’ करने का दबाव है। ये लोग मुस्लिमों का वोट शेयर बढ़ाना चाहते हैं, इसलिए मस्जिदों और दूसरी जगहों पर एक साथ नाम डाले जा रहे हैं। इससे एसआईआर का असली मकसद काफी पीछे रह गया है। लोगों को खास जगहों पर जमावड़ा किया जा रहा है।

इसको लेकर बीजेपी विधायक कृष्णाप्पा ने कहा, “कई जगहों पर शिकायतें आई हैं कि कुछ BLO और सरकारी अधिकारी मस्जिदों और खुली जगहों पर बहुत भीड़ जमा कर रहे हैं, खासकर माइनॉरिटी की भीड़… मुझे लगता है कि वे कॉन्ग्रेस पार्टी के कहने पर ऐसा कर रहे हैं। वे इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया के दिए गए निर्देशों के अनुसार काम नहीं कर रहे हैं… हर भारतीय नागरिक को वोट देने का हक होना चाहिए।”

BJP नेता के मुताबिक, बूथ लेवल ऑफिसर को हर बूथ में घर-घर जाकर घर के दरवाजे पर एक स्टिकर चिपकाना था, ताकि यह पक्का हो सके कि उन्होंने फॉर्म भर दिया है। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। गैर कानूनी तरह से देश में घुस आए घुसपैठियों को देश से बाहर निकालने के बजाए उन्हें वोटिंग का अधिकार दिया जा रहा है। कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार इसके लिए बीएलओ पर दबाव बना रही है।

उन्होंने कहा, “हम नहीं चाहते कि एंटी-नेशनल, देश के बाहर के लोगों और गैर-कानूनी इमिग्रेंट्स को वोटिंग का अधिकार दिया जाए… मुझे लगता है कि कर्नाटक में कांग्रेस सरकार इन BLOs को उकसा रही है और उन पर दबाव डाल रही है कि वे अपना वोट शेयर बढ़ाने के लिए गैर-कानूनी इमिग्रेंट्स का एनरोलमेंट करें।”

एक अनुमान के मुताबिक, राज्य में कुल जनसंख्या का करीब 12-18 फीसदी मुस्लिम आबादी है। हाल ही सरकार ने जो सर्वे करवाई थी वह लीक हो गई। इसमें मुस्लिम आबादी करीब 12.87 फीसदी से लेकर 18 फीसदी तक होने का अनुमान है। लगातार तटीय क्षेत्रों और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों की संख्या बढ़ रही है। इससे इन इलाकों में डेमोग्राफी बदलाव की आशंका जताई जा रही है। ये मुद्दा राज्य की सुरक्षा व्यवस्था से भी जुड़ा हुआ है।

बेंगलुरु पुलिस की केंद्रीय अपराध शाखा और राष्ट्रीय जाँच एजेंसी समय-समय पर अवैध बस्तियों, कचरा बीनने वाले क्षेत्रों और निर्माण स्थलों पर छापेमारी करती है। जाँच में सामने आया है कि कई घुसपैठियों ने स्थानीय दलालों की मदद से फर्जी आधार कार्ड, वोटर आईडी और राशन कार्ड बनवा लिए हैं। इसी वजह से चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि SIR के दौरान केवल आधार कार्ड देना पर्याप्त नहीं होगा, मतदाताओं को नागरिकता या निवास स्थापित करने के लिए अन्य 11 वैकल्पिक वैध दस्तावेजों में से साक्ष्य देने होंगे।

कर्नाटक सरकार ने बेंगलुरु के पास ‘नेलमंगला’ में एक डिटेंशन सेंटर स्थापित किया है। यहाँ अवैध रूप से रह रहे उन विदेशियों को रखा जाता है जिनकी पहचान हो चुकी है और जिनके निर्वासन की कानूनी प्रक्रिया संबंधित दूतावासों के साथ चल रही है। लेकिन इसमें काफी वक्त लगता है। बांग्लादेश अपने नागरिकों को ‘अपना’ कहने से इनकार करता है। रोहिंग्याओं को तो न ही बांग्लादेश और न ही म्यांमार ‘अपना’ मानता है। स्थिति यह है कि भारत के टुकड़ों पर पल रहे ये रोहिंग्या देश की सुरक्षा व्यवस्था के लिए काफी बड़ा खतरा बनते जा रहा है।

यही वजह है कि एनडीए नेता कर्नाटक कॉन्ग्रेस नेता और सरकार पर एसआईआर में गड़बड़ी को लेकर चुप्पी साधने पर सवाल खड़ी कर रही है। पूर्व सीएम कुमारस्वामी ने तो वीडियो सबूत देते हुए एसआईआर प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए थे। उन्होंने राज्य प्रशासन पर वोटर लिस्ट में हेरफेर करने के लिए मशीनरी का ‘इस्तेमाल’ करने का आरोप लगाया और मौजूदा एसआईआर प्रक्रिया तुरंत खत्म करने की माँग की। उन्होंने यशवंतपुर और रामनगर समेत कई चुनाव क्षेत्रों में SIR की गाइडलाइंस का उल्लंघन करने पर हमला किया और कहा कि सीधे राजनीतिक असर में किया जा रहा है।

कुमारस्वामी ने इस मुद्दे पर चुप्पी को लेकर KPCC प्रेसिडेंट बीके हरिप्रसाद और होम मिनिस्टर प्रियांक खड़गे पर तीखा हमला किया। अपने घर पर मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, “बेचारे। मुझे नहीं पता कि KPCC प्रेसिडेंट कहाँ गायब हो गए हैं। इतनी सारी अफरा-तफरी के बावजूद, वह कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं। वह लगभग हर मुद्दे पर, हर दिन कमेंट करते हैं। राज्य के होम मिनिस्टर भी लगभग हर चीज पर बयान देते हैं। क्या उन्हें SIR प्रोसेस में गड़बड़ियों के बारे में नहीं बोलना चाहिए? जो लोग सबको डिसिप्लिन और कंट्रोल के बारे में लेक्चर देते हैं, उन्हें इस बारे में भी जरूर कुछ कहना चाहिए।”

दरअसल चुनाव आयोग से एनडीए नेताओं की मुलाकात और एसआईआर पर सवाल के बाद पूरी प्रक्रिया को नए सिरे से काम करने की जरूरत है। इसकी निगरानी केंद्र करे, क्योंकि एसआईआर कराना लोकतंत्र के लिए काफी अहम है। क्योंकि गायब, मृत और स्थायी रूप से राज्य से बाहर जा चुके लोगों के नाम हटने ही चाहिए, लेकिन किसी भी हाल में घुसपैठियों और अयोग्य लोगों के हाथों में वोटर आईकार्ड न पहुँचे इसकी निगरानी भी उतनी ही जरूरी है।

छत्तीसगढ़ में ‘लव जिहाद’ पर लगेगी लगाम, गैर-मुस्लिम से निकाह से पहले वक्फ बोर्ड से लेनी होगी परमिशन: मौलानाओं पर भी सख्ती, जानें- ऐसे नियम दूसरे राज्यों में क्यों जरूरी

छत्तीसगढ़ में निकाह की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित, पारदर्शी और रिकॉर्ड आधारित बनाने की दिशा में बड़ा बदलाव किया जा रहा है। छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड ने अंतरधार्मिक निकाह (Inter-religion) को लेकर नए नियम लागू करने की तैयारी की है, जिन्हें अगस्त 2026 से पूरे प्रदेश में लागू करने का प्रस्ताव है।

नई व्यवस्था के तहत यदि कोई मुस्लिम युवक या युवती किसी गैर-मुस्लिम से निकाह करना चाहता है, तो पहले वक्फ बोर्ड से अनुमति लेना अनिवार्य होगा। इसके साथ ही निकाह कराने वाले सभी मौलानाओं का पंजीयन किया जाएगा और हर निकाह का रिकॉर्ड भी वक्फ बोर्ड के पास सुरक्षित रखा जाएगा।

बोर्ड का कहना है कि इन नियमों का उद्देश्य निकाह प्रक्रिया को कानूनी रूप से अधिक पारदर्शी बनाना, फर्जी दस्तावेजों और लव जिहाद जैसे मामलों की निगरानी को प्रभावी बनाना है। बोर्ड ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह व्यवस्था किसी मजहब विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि निकाह प्रक्रिया को एक समान और कानून के अनुरूप संचालित करने के लिए तैयार की गई है।

छत्तीसगढ़ की नई पहल क्या है, कैसे बदलेगी निकाह की पूरी प्रक्रिया?

छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड पहली बार निकाह की व्यवस्था को एक केंद्रीकृत और निर्धारित प्रक्रिया के तहत लाने जा रहा है। अभी तक कई स्थानों पर अलग-अलग तरीके से निकाह कराए जाते रहे हैं और उनका कोई साझा रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होता था। नई व्यवस्था लागू होने के बाद अंतरधार्मिक निकाह के लिए वक्फ बोर्ड की पूर्व अनुमति अनिवार्य होगी।

यानी यदि कोई मुस्लिम युवक या युवती किसी गैर-मुस्लिम से निकाह करना चाहता है, तो पहले बोर्ड के सामने आवेदन देना होगा, इतना ही नहीं यदि निकाह दूसरे धर्म की लड़की से किया जाना है, तो उसके परिजनों की सहमति भी जरूरी होगी और आवश्यक दस्तावेज और कानून के तहत जरूरी औपचारिकताएँ पूरी करनी होंगी।

सभी दस्तावेजों और प्रक्रिया की जाँच के बाद ही अनुमति दी जाएगी। इसके बाद ही निकाह कराया जा सकेगा। बोर्ड का मानना है कि इससे पूरी प्रक्रिया रिकॉर्ड में रहेगी और भविष्य में किसी भी प्रकार का विवाद होने पर संबंधित जानकारी उपलब्ध रहेगी।

नई व्यवस्था में निकाह के बाद जारी होने वाला प्रमाणपत्र भी वक्फ बोर्ड के माध्यम से जारी किया जाएगा। साथ ही अभी अलग-अलग प्रारूप में तैयार होने वाले निकाहनामों की जगह पूरे प्रदेश में एक समान प्रारूप लागू किया जाएगा। इससे सभी निकाह एक ही व्यवस्था के तहत दर्ज होंगे और दस्तावेजों में एकरूपता आएगी।

क्या होंगे नए नियम और ‘लव जिहाद’ जैसे मामलों में कैसे काम करेगी यह व्यवस्था?

वक्फ बोर्ड ने अंतरधार्मिक निकाह के लिए अलग प्रक्रिया तय करने का फैसला किया है। यदि मुस्लिम युवक या युवती किसी गैर-मुस्लिम से निकाह करना चाहते हैं, तो केवल आवेदन देना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि दोनों पक्षों की पहचान, प्रस्तुत किए गए दस्तावेज और सभी कानूनी औपचारिकताओं की विस्तार से जाँच भी की जाएगी।

यदि किसी मामले में धर्म परिवर्तन का प्रस्ताव रखा गया, तो उससे संबंधित कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही आगे की कार्रवाई की जाएगी। बोर्ड की ओर से सभी औपचारिकताओं की पुष्टि होने और आवश्यक अनुमति मिलने के बाद ही निकाह संपन्न कराया जा सकेगा।

बोर्ड का कहना है कि इस व्यवस्था का उद्देश्य लव जिहाद, फर्जी निकाह, धर्म और पहचान छिपाकर निकाह करने और दस्तावेजों में गड़बड़ी जैसे मामलों पर रोक लगाने में मदद करना है। जब प्रत्येक अंतरधार्मिक निकाह निर्धारित प्रक्रिया के तहत होगा और उसका पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध रहेगा, तब ऐसे मामलों की निगरानी और जाँच पहले की तुलना में अधिक व्यवस्थित तरीके से की जा सकेगी।

मौलानाओं के लिए होंगे नए नियम, बिना अनुमति निकाह कराने पर होगी कार्रवाई

नई व्यवस्था केवल निकाह करने वाले जोड़ों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि निकाह पढ़ाने वाले मौलानाओं के लिए भी नए नियम लागू किए जाएँगे। प्रदेश में निकाह कराने वाले सभी मौलानाओं का वक्फ बोर्ड में पंजीयन कराया जाएगा। पंजीयन के बाद केवल वही मौलाना निकाह संपन्न करा सकेंगे जिनका नाम बोर्ड के रिकॉर्ड में दर्ज होगा।

यदि कोई मौलाना निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना या आवश्यक अनुमति के बिना अंतरधार्मिक निकाह कराता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। बोर्ड का मानना है कि इससे निकाह कराने वालों की जवाबदेही तय होगी और बिना रिकॉर्ड या नियमों के निकाह कराने की प्रवृत्ति पर रोक लगेगी।

बोर्ड का यह भी कहना है कि पंजीकृत मौलानाओं की व्यवस्था लागू होने के बाद फर्जी पहचान या दस्तावेज छिपाकर कराए जाने वाले निकाह के मामलों पर प्रभावी निगरानी रखी जा सकेगी। इससे पूरी प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और व्यवस्थित बनेगी।

हर निकाह का रिकॉर्ड रहेगा सुरक्षित, जनजातीय इलाकों पर रहेगा विशेष फोकस

छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष सलीम राज के अनुसार, वर्तमान में कई स्थानों पर बिना किसी केंद्रीय रिकॉर्ड के निकाह कराए जाते हैं। इसके कारण बाद में पहचान, वैवाहिक स्थिति और अन्य सरकारी दस्तावेजों से जुड़े विवाद सामने आते हैं।

नई व्यवस्था में प्रत्येक निकाह का पूरा रिकॉर्ड वक्फ बोर्ड के पास सुरक्षित रखा जाएगा, ताकि भविष्य में आवश्यकता पड़ने पर उसकी जाँच की जा सके और प्रमाणित जानकारी उपलब्ध रहे। बोर्ड ने यह भी बताया है कि जनजातीय क्षेत्रों से महिलाओं को बहला-फुसलाकर विवाह करने तथा बाद में संपत्ति हड़पने से जुड़े कुछ मामलों की शिकायतें मिली हैं।

इन्हीं शिकायतों को ध्यान में रखते हुए ऐसे मामलों की निगरानी बढ़ाने का निर्णय लिया गया है। सभी निकाह का रिकॉर्ड सुरक्षित रखने से भविष्य में किसी भी विवाद की स्थिति में जाँच करना आसान होगा और संबंधित जानकारी तत्काल उपलब्ध कराई जा सकेगी।

वक्फ बोर्ड का कहना है कि अंतरधार्मिक निकाह करने वाले जोड़ों को संबंधित कानूनों का पालन करते हुए आवश्यक अनुमति और निर्धारित प्रक्रिया पूरी करनी होगी।

बोर्ड का मानना है कि एक समान नियम, प्रमाणित रिकॉर्ड, दस्तावेजों की जाँच और पंजीकृत मौलानाओं की व्यवस्था से निकाह प्रक्रिया अधिक पारदर्शी, व्यवस्थित और कानूनी रूप से मजबूत बन सकेगी और लव जिहाद के मामलों को रोकने में भी मदद मिलेगी।

भारत के प्रणेता, प्रखर राष्ट्रवादी और महान शिक्षाविद्… डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जयंती पर पढ़ें PM मोदी का खास लेख, कहा- उनके बलिदान से प्रेरित होती है हर पीढ़ी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जयंती पर राष्ट्रनिर्माण में उनके योगदान को याद करते हुए एक आलेख लिखा है। आज, 6 जुलाई का दिन राष्ट्रवाद और निस्वार्थ सेवा के आदर्शों में विश्वास रखने वाले करोड़ों देशवासियों के लिए बहुत ही विशेष है। आज हम डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जन्म-जयंती मना रहे हैं। उनका जीवन साहस और माँ भारती के प्रति अटूट समर्पण का प्रेरणादायक उदाहरण है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के व्यक्तित्व में विद्वता, जनसेवा और उच्च नैतिक मूल्यों का अद्भुत संगम था। आधुनिक भारत के कुछ ही नेताओं में इतने सारे गुण एक साथ देखने को मिलते हैं।

श्यामा प्रसाद जी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था, जहाँ उन्हें सुख-सुविधाओं से भरपूर जीवन आसानी से मिल सकता था। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी की गिनती अपने समय के महान शिक्षाविदों में होती थी। लेकिन तमाम सुविधाओं के बावजूद श्यामा प्रसाद जी ने त्याग और राष्ट्रसेवा का मार्ग चुना।

उनका दृढ़ विश्वास था कि चाहे अंग्रेजी शासन का विरोध हो, सांप्रदायिकता से लड़ाई हो या मानवीय संकटों का सामना, वे अपने समय की इन चुनौतियों के सामने मूकदर्शक बनकर नहीं रह सकते। इस सफर में उन्हें कई गहरे व्यक्तिगत दुख भी झेलने पड़े। पहले उन्होंने अपने छोटे बच्चे को खोया और बाद में पत्नी का भी निधन हो गया। लेकिन इन दुखद परिस्थितियों में भी उन्होंने अपने हौसले को कमजोर नहीं पड़ने दिया। उनका संकल्प और सशक्त हुआ, राष्ट्रसेवा के प्रति समर्पण और गहरा होता गया।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य भारत की एकता और अखंडता की रक्षा करना था। देश के विभाजन के समय उन्होंने पश्चिम बंगाल को भारत का अभिन्न अंग बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुछ वर्षों बाद इसी उद्देश्य से उन्होंने जम्मू-कश्मीर के मुद्दे पर भी संघर्ष किया। जेल और नजरबंदी भी उन्हें रास्ते से डिगा नहीं सकी। जब नजरबंदी के दौरान उनका निधन हुआ, तब वे उन अनगिनत लोगों से बहुत दूर थे, जिनके लिए वे जीवनभर संघर्ष करते रहे।

इतिहास में कुछ ऐसे पल आते हैं, जब किसी व्यक्ति का सर्वोच्च बलिदान राजनीति से ऊपर उठकर देश की स्मृति का हिस्सा बन जाता है। डॉ. मुखर्जी का बलिदान भी ऐसा ही था। आचार्य विनोबा भावे ने कहा था कि डॉ. मुखर्जी ने उस उद्देश्य के लिए अपना बलिदान दिया, जिस पर उन्हें पूरा विश्वास था। दशकों बाद, साल 2019 में आर्टिकल 370 और 35(A) को हटाया जाना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि थी।

डॉ. मुखर्जी ने हमेशा राष्ट्रहित और भारतीय मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। इसके लिए उन्होंने मजबूत संस्थानों का निर्माण किया और ऐसी व्यवस्थाएं बनाईं, जो उस समय की सोच से काफी आगे थीं। वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति बने। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में ऐसे बदलाव किए, जो राष्ट्रहित और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप थे।

शिक्षाविदों के एक सम्मेलन में डॉ. मुखर्जी ने कहा था, “शिक्षण संस्थानों को केवल बाबू या कम वेतन वाले कर्मचारी तैयार करने की फैक्ट्री समझना गलत है। हमें विद्यार्थियों को ऐसे तैयार करना होगा ताकि वे नेतृत्व की भूमिका निभा सकें। हमारी स्वशासी संस्थाओं जैसे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन्स, प्रांतीय और केंद्रीय विधायिकाओं में बड़ी जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार हो सकें। इसके साथ ही वे वित्त, व्यापार और उद्योग जैसे क्षेत्रों में भी अपनी प्रतिभा दिखा सकें।’’

कलकत्ता विश्वविद्यालय में अपने नेतृत्व में उन्होंने कई महत्वपूर्ण कार्य किए। इनमें लाइब्रेरी की सुविधाओं में सुधार, विज्ञान में रिसर्च को बढ़ावा देना, ऐतिहासिक वस्तुओं के अध्ययन को प्रोत्साहित करना और कृषि से जुड़े पाठ्यक्रम शुरू करना शामिल था। उन्होंने खेलकूद, टीचर्स ट्रेनिंग और स्टूडेंट वेलफेयर जैसे क्षेत्रों पर भी विशेष ध्यान दिया। विद्यार्थियों में अपनी यूनिवर्सिटी के प्रति गर्व की भावना विकसित हो, इसके लिए उन्होंने 24 जनवरी को विश्वविद्यालय का स्थापना दिवस मनाने की परंपरा शुरू की। उन्होंने गुरुदेव टैगोर से विश्वविद्यालय के लिए एक गीत लिखने का अनुरोध भी किया था।

उनके जीवन के बाद के वर्षों में इस भावना का एक और उदाहरण तब देखने को मिला, जब उन्होंने भारतीय जनसंघ बनाने का निर्णय लिया। उस समय देश में हर तरफ कॉन्ग्रेस पार्टी का ही बोलबाला था। ऐसे में उन्होंने महसूस किया कि देश को एक ऐसे नए विकल्प की बहुत जरूरत है, जो भारत की प्रगति की बात भी करे और हमारी सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़ा रहे। शायद इसी को ध्यान में रखते हुए पार्टी का चुनाव चिह्न ‘दीपक’ यानि मिट्टी का दीया रखा गया। एक अकेला दीया देखने में भले ही छोटा लगे, लेकिन उसमें अपने आस-पास के गहरे से गहरे अंधकार को मिटाने की अद्भुत शक्ति होती है। जनसंघ ने अपने सक्रिय काल में और उसके बाद भी बिल्कुल यही किया।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का भारत के पहले उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में कार्यकाल बेहद अहम रहा। उन्हें एक ऐसे राजनेता के रूप में याद किया जाता है, जिनका विजन बहुत विराट था। वे उद्योग को नए-नए आजाद हुए भारत के लोगों में सम्मान, अवसर और आत्मविश्वास का संचार करने का सशक्त माध्यम मानते थे। वे वेल्थ और वैल्यू क्रिएशन के महत्व को भली-भांति समझते थे।

उन्होंने दामोदर वैली कॉरपोरेशन, सिंदरी उर्वरक संयंत्र और मजबूत औद्योगिक नीति जैसी ऐतिहासिक पहल की। इसके माध्यम से आधुनिक औद्योगिक भारत की नींव रखी। इसके साथ ही उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि भारत के पारंपरिक सामर्थ्य की कभी उपेक्षा न हो। वे हथकरघा, कुटीर उद्योग, कारीगरों और कपड़ा उद्योग से जुड़े श्रमिकों के हितों के भी प्रबल समर्थक थे।

यहाँ मैं अपना एक निजी अनुभव भी साझा करना चाहता हूँ। आत्मनिर्भर भारत के स्पष्ट विजन के साथ जिस सिंदरी संयंत्र की स्थापना के लिए डॉ. मुखर्जी ने अथक प्रयास किए थे, उसकी कई दशकों तक सत्ता में रहने वाले लोगों ने घोर उपेक्षा की। मुझे इस बात का संतोष है कि हमारी सरकार को उसके पुनरुद्धार का सौभाग्य मिला। उस कार्यक्रम में उपस्थित होना मेरे सार्वजनिक जीवन के सबसे विशेष और अविस्मरणीय क्षणों में से एक बन गया।

भारत की प्राचीन परंपरा सदियों से संवाद और विचार-विमर्श का सम्मान करती आई है। डॉ. मुखर्जी इस लोकतांत्रिक भावना के सशक्त प्रतीक थे। उन्होंने पंडित नेहरू के मंत्रिमंडल में शामिल होना इसलिए स्वीकार किया, क्योंकि वे मानते थे कि देश की आजादी के शुरुआती वर्षों में राष्ट्र निर्माण का दायित्व राजनीतिक मतभेदों से कहीं ऊपर है।

उन्होंने पूरी निष्ठा और रचनात्मक दृष्टिकोण के साथ अपनी जिम्मेदारियों को निभाया। लेकिन जब उन्हें लगा कि राष्ट्रीय महत्व के कुछ प्रश्नों पर देशहित में अलग मार्ग अपनाना आवश्यक है, तो उन्होंने पूरी गरिमा के साथ अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन उस राजनीतिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए समर्पित कर दिया, जिसे वे राष्ट्र के लिए आवश्यक मानते थे।

75 वर्ष पहले पंडित नेहरू पहला संविधान संशोधन लेकर आए। इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर सीधा प्रहार माना गया। तब डॉ. मुखर्जी इसके सबसे मुखर आलोचक रहे थे। वे भली-भांति समझ चुके थे कि कॉन्ग्रेस किस हद तक जा सकती है। समय के साथ उनकी यह आशंका सही साबित हुई। जो पार्टी 75 वर्ष पहले पहला संविधान संशोधन लेकर आई थी, उसी ने 1975 में देश पर आपातकाल थोपा। इतना ही नहीं, 50 वर्ष पहले 42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम लाकर एक बार फिर लोकतांत्रिक मूल्यों की बुनियाद पर कुठाराघात किया।

डॉ. मुखर्जी अपनी मानवीय संवेदनाओं और सेवाभाव के लिए भी विशेष रूप से जाने जाते हैं। वर्ष 1943 में जब बंगाल भीषण अकाल की त्रासदी से जूझ रहा था, तब उन्होंने पीड़ितों की सेवा में स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर दिया था। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि लोगों को भोजन मिल सके, जिसके लिए कई कैंटीन और रिलीफ सेंटर शुरू किए गए।

एक ओर वे लोगों की पीड़ा से बहुत व्यथित थे, वहीं दूसरी ओर ब्रिटिश हुकूमत की असंवेदनशीलता से अत्यंत आक्रोशित भी थे। उन्होंने अपनी पीड़ा को व्यक्त करने के लिए पंचाशेर मन्वंतर नाम की एक किताब भी लिखी। 1942 में जब मेदिनीपुर में भीषण चक्रवात आया, तब उन्होंने प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्यों का नेतृत्व किया।

कोलकाता के एक कॉलेज में युवाओं को संबोधित करते हुए डॉ. मुखर्जी ने उनसे आग्रह किया था, ‘’आप जो भी कार्य करें, उसे पूरी गंभीरता, लगन और ईमानदारी से करें। किसी भी काम को कभी अधूरा न छोड़ें। तब तक स्वयं को संतुष्ट न मानें, जब तक आपने उसमें अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान न दे दिया हो।’’

आज हमारा देश विकसित भारत के लक्ष्य की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे में उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम प्रतिदिन उसभारत के निर्माण की दिशा में निरंतर प्रयास करें, जिसकी उन्होंने परिकल्पना की थी। एक ऐसा भारत जो सशक्त हो, एकजुट हो, आत्मविश्वास से भरपूर और संवेदनशील हो। देश के युवाओं पर मुझे पूरा विश्वास है कि वे इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए बढ़-चढ़कर भागीदारी करेंगे और इस संकल्प को साकार करने के लिए पूरी ऊर्जा के साथ जुट जाएँगे।

क्या है आइसोब्यूटेनॉल जो 15% डीजल में मिलाने की तैयारी, E20 पर चल रहे विवाद के बीच शुरू हुई चर्चा: जानिए सबकुछ

पेट्रोल के अंदर E20 यानी 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने का काम तो पूरे देश में लागू हो चुका है और अब लोग धीरे-धीरे इस बदलाव के आदी भी हो रहे हैं। लेकिन अभी लोगों के मन से एथेनॉल को लेकर सवाल पूरी तरह निकले भी नहीं थे कि सरकार ने डीजल को लेकर भी एक बड़ा प्लान तैयार कर लिया है। इस बार सीधे एथेनॉल नहीं, बल्कि एक बिल्कुल नया केमिकल आइसोब्यूटेनॉल (Isobutanol) इस्तेमाल होने जा रहा है।

केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने 04 जुलाई 2026 में भारत की पहली फ्लेक्स-फ्यूल पैसेंजर कार के लॉन्च के मौके पर यह बड़ा ऐलान किया। इस कार्यक्रम में केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी भी मौजूद थे। गडकरी ने बताया कि एथेनॉल को सीधे डीजल के साथ नहीं मिलाया जा सकता इसीलिए सरकार अब एथेनॉल से आइसोब्यूटेनॉल बनाने की तकनीक पर काम कर रही है, ताकि इसे डीजल में मिलाकर इस्तेमाल किया जा सके। उनके मुताबिक डीजल में 15 प्रतिशत तक आइसोब्यूटेनॉल मिलाने की योजना पर काम चल रहा है।

नितिन गडकरी ने बताया कि किर्लोस्कर ऑयल इंजिन्स लिमिटेड (KOEL) के साथ मिलकर 100 प्रतिशत आइसोब्यूटेनॉल और एथेनॉल पर चलने वाले जनरेटर सेट का सफल परीक्षण किया जा चुका है।

दरअसल गडकरी ने पुणे में KOEL द्वारा विकसित इस अत्याधुनिक इंजन तकनीक का खुद अनावरण किया और कंपनी के मुताबिक यह जेनसेट यानी जनरेटर के लिए दुनिया की अपनी तरह की पहली तकनीक है, जिसका मूल्यांकन ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया यानी ARAI ने किया है। यानी यह टेस्ट किसी निजी दावे पर नहीं, बल्कि सरकार की अपनी मान्यता प्राप्त संस्था की जाँच पर आधारित है। हालाँकि गडकरी ने यह भी साफ किया कि इसे व्यावसायिक रूप से बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए अभी सरकार की अंतिम मंजूरी मिलनी बाकी है।

सरकार की इस घोषणा के बाद फिर एक बार आम जनता के मन में सवाल खड़े हो गए हैं। जो जनता अभी एथेनॉल को लेकर पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाई थी, उसके सामने अब एक नया शब्द आ गया है- आइसोब्यूटेनॉल। तो आइए आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर आइसोब्यूटेनॉल होता क्या है, क्या यह आपके वाहन के लिए सुरक्षित है और सबसे बड़ा सवाल- जब देश में पहले से इतनी सारी फैक्ट्रियों में एथेनॉल तैयार किया जा रहा है तो डीजल के लिए सरकार एक अलग विकल्प क्यों लेकर आई है?

क्या है आइसोब्यूटेनॉल?

तो चलिए सबसे पहले समझते हैं कि आइसोब्यूटेनॉल है क्या? आइसोब्यूटेनॉल भी एथेनॉल की तरह ही एक एल्कोहॉल बेस्ड बायोफ्यूल (Alcohol Based Biofuel) है और इसे भी उन्हीं फसलों से बनाया जाता है जिनसे एथेनॉल बनता है, जैसे गन्ना, मक्का और चावल की पराली। दोनों में फर्क सिर्फ इतना है कि एथेनॉल को एक और स्टेप से गुजार कर आइसोब्यूटेनॉल में बदला जाता है, ताकि इसकी केमिकल बनावट डीजल के साथ मिलने लायक बन सके।

यानी सीधे शब्दों में कहें तो आइसोब्यूटेनॉल, एथेनॉल का ही एक अपग्रेडेड वर्जन है, जो डीजल के लिए ज़्यादा माफिक बैठता है। इसका केमिकल नाम C4H10O यानी 2-methyl-1 propanol है। यह बिना रंग का एक लिक्विड है जिसमें हल्की एल्कोहॉल जैसी गंध होती है और यह ब्यूटेनॉल के चार स्ट्रक्चरल रूपों में से एक है।

एथेनॉल से बेहतर क्यों है आइसोब्यूटेनॉल?

अब बात करते हैं कि यह एथेनॉल से बेहतर क्यों माना जा रहा है। सबसे पहली वजह है इसकी एनर्जी डेंसिटी, यानी यह प्रति किलोग्राम कितनी ऊर्जा देता है। आइसोब्यूटेनॉल की एनर्जी डेंसिटी करीब 36 मेगाजूल (MJ) प्रति किलोग्राम होती है, जबकि एथेनॉल की सिर्फ 26.8 MJ प्रति किलोग्राम। यानी बराबर मात्रा में इस्तेमाल करने पर यह एथेनॉल से कहीं ज्यादा ताकत देता है, जिससे गाड़ी की माइलेज पर भी असर कम पड़ता है।

दूसरी बड़ी वजह है इसकी वॉटर सॉल्युबिलिटी यानी पानी सोखेन की क्षमता का कम होना। एथेनॉल हवा में मौजूद नमी को आसानी से खींच लेता है और पानी के साथ पूरी तरह घुल जाता है, जिससे फ्यूल टैंक और पाइपलाइन में जंग लगने का खतरा रहता है। आइसोब्यूटेनॉल में यह खतरा काफी कम होता है, इसलिए इसे मौजूदा फ्यूल इंफ्रास्ट्रक्चर में बिना किसी बदलाव के इस्तेमाल किया जा सकता है।

एक दिलचस्प बात यह भी है कि यह टेक्नोलॉजी भारत के लिए बिल्कुल नई नहीं है। अमेरिका में तो साल 2010 में ही वहाँ की एनवायरमेंट एजेंसी EPA ने आइसोब्यूटेनॉल को पेट्रोल में 16 प्रतिशत तक मिलाने की मंजूरी दे दी थी, वो भी बिना गाड़ियों के इंजन में कोई मॉडिफिकेशन किए। वहाँ की कई बड़ी कंपनियाँ जैसे Gevo, BP और DuPont की साझा कंपनी Butamax सालों से इस ईंधन पर काम कर रही हैं। यानी दुनिया के कई देशों में यह प्रयोग पहले ही हो चुका है और कामयाब भी रहा है और अब भारत इसे डीजल के लिए अपनाने की तैयारी में है।

एक और अहम बात यह है कि आइसोब्यूटेनॉल सिर्फ गाड़ियों के लिए ही नहीं, बल्कि यह पहले से एक इंडस्ट्रियल सॉल्वेंट के तौर पर पेंट और स्याही जैसी चीजों को बनाने में भी इस्तेमाल होता आया है। आगे चलकर इसका इस्तेमाल जेट फ्यूल और क्लीन गैसोलीन यानी साफ-सुथरे पेट्रोल में भी किया जा सकता है। यही खूबियाँ हैं जिनकी वजह से इसे सेकेंड जेनरेशन बायोफ्यूल माना जा रहा है।

डीजल में एथेनॉल क्यों नहीं मिलाया जा सकता?

अब सबसे जरूरी सवाल पर आते हैं। जब पेट्रोल में एथेनॉल इतनी आसानी से मिल गया, तो आखिर डीजल में एथेनॉल क्यों नहीं मिलाया जा रहा? दरअसल इसकी शुरुआत एक असफल कोशिश से हुई थी। साल 2025 में खुद नितिन गडकरी ने बताया था कि डीजल में 10 प्रतिशत तक एथेनॉल मिलाने के प्रयास किए गए थे, लेकिन इसके नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं आए, जिसके बाद सरकार को दूसरे विकल्प तलाशने पड़े।

इसकी सबसे बड़ी वजह है दोनों ईंधन की केमिकल बनावट का अलग होना। एथेनॉल पानी के साथ पूरी तरह घुल जाता है, जबकि डीजल में यह गुण नहीं होता। इसी वजह से जब एथेनॉल को डीजल में मिलाया गया, तो दोनों अलग-अलग तापमान पर आपस में अलग होने लगे, जिसे फेज सेपरेशन कहा जाता है। यानी टंकी में डीजल और एथेनॉल एक साथ मिलकर टिक ही नहीं पाते, बल्कि कुछ समय बाद अलग परतों में बँट जाते हैं।

दूसरी बड़ी दिक्कत है सीटेन नंबर की। डीजल इंजन को ठीक तरह से चलने के लिए 45 से 55 के बीच सीटेन नंबर वाला ईंधन चाहिए होता है। सीटेन नंबर जितना ज्यादा होगा, ईंधन उतनी ही जल्दी और अच्छे से जलेगा। जब डीजल में एथेनॉल मिलाया गया, तो इससे सीटेन नंबर तेजी से नीचे गिर गया। इसका सीधा असर यह हुआ कि इंजन में इग्निशन यानी ईंधन जलने की प्रक्रिया देर से शुरू हुई, दहन अधूरा रहा, गाड़ी की पावर कम हो गई और इंजन में तेज आवाज यानी नॉकिंग की समस्या भी सामने आई।

तीसरी बड़ी वजह सुरक्षा से जुड़ी है। एथेनॉल का फ्लैश पॉइंट यानी वह तापमान जिस पर कोई तरल पदार्थ आग पकड़ सकता है, बहुत कम होता है। इसका मतलब है कि एथेनॉल डीजल के मुकाबले कहीं ज़्यादा जल्दी आग पकड़ सकता है, यानी यह ज़्यादा ज्वलनशील होता है। इस वजह से इसे स्टोर करना और डीजल के साथ ब्लेंड करना असुरक्षित और अस्थिर माना गया।

इन सभी तकनीकी दिक्कतों को देखते हुए, आखिरकार ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया यानी ARAI को डीजल में 5 प्रतिशत से ज़्यादा एथेनॉल मिलाने का प्रयोग बीच में ही रोकना पड़ा। यही वह मोड़ था जहाँ से सरकार ने एथेनॉल की जगह उसी से बनने वाले आइसोब्यूटेनॉल की तरफ रुख किया, क्योंकि इसकी मॉलिक्यूलर बनावट डीजल के साथ इन सभी दिक्कतों को दूर करती है।

डीजल में आइसोब्यूटेनॉल मिलाने के फायदे?

इतना ही नहीं डीजल में आइसोब्यूटेनॉल मिलाने के फायदे भी बहुत हैं। सबसे पहला और सबसे बड़ा फायदा है क्रूड ऑयल यानी कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होगी। वैसे भी भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा ते बाहर से मँगाता है और डीजल की खपत पेट्रोल के मुकाबले लगभग दोगुनी है। ऐसे में अगर डीजल में 15 प्रतिशत आइसोब्यूटेनॉल मिल जाए, तो इसका असर पेट्रोल में हुई E20 ब्लेंडिंग से भी कहीं बड़ा हो सकता है, क्योंकि यह विदेशी मुद्रा की भारी बचत करेगा और देश को ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाएगा।

दूसरा फायदा सीधे किसानों को होगा। चूँकि आइसोब्यूटेनॉल भी उन्हीं फसलों जैसे गन्ना और मक्का से बनता है जिनसे एथेनॉल बनता है, इसलिए इन फसलों की माँग बढ़ेगी, जिससे किसानों को उनकी उपज की बेहतर कीमत मिल सकेगी। यही वजह है कि सरकार किसानों को अन्नदाता से ऊर्जादाता बनाने की बात कहती रही है। तीसरा फायदा पर्यावरण से जुड़ा है, क्योंकि आइसोब्यूटेनॉल पारंपरिक डीजल के मुकाबले कम प्रदूषण फैलाता है, जिससे उत्सर्जन यानी एमिशन में कमी आएगी।

‘डिटेंशन कैंप में एक भी बंगाली हिंदू नहीं’: CM हिमंता बोले- CAA से मिला संरक्षण, समझें- इस नेता ने कैसे पाट दी असमिया-गैर असमिया हिंदुओं के बीच की खाईं

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने वह कर दिखाया है, जिसे असंभव माना जाता था। उन्होंने राज्य में रहने वाले असमिया हिंदू और बंगाली हिंदू समुदाय के बीच मौजूद मतभेदों और तनाव को खत्म कर दिया है।

दशकों तक असम असमिया और बंगाली आबादी के बीच जातीय तनाव की आग में सुलगता रहा। बड़े पैमाने पर पलायन, धार्मिक उत्पीड़न, जनसंख्या में बदलाव और आर्थिक अवसर जैसे मुद्दों ने दोनों समुदायों के बीच एकता और सौहार्द को काफी हद तक बनने नहीं दिया।

हिमंता बिस्वा सरमा ने एक निष्पक्ष दृष्टिकोण अपनाते हुए बंगाली हिंदू शरणार्थियों, जो उत्पीड़न से बचने के लिए भारत आए और बंगाली मुस्लिम घुसपैठियों, जो आर्थिक अवसरों के लिए असम आए, के बीच जरूरी अंतर स्पष्ट किया।

जो व्यक्ति अपनी धार्मिक पहचान की रक्षा के लिए असम आया हो, उसकी तुलना उस व्यक्ति से कैसे की जा सकती है, जिसने पहले एक इस्लामी राष्ट्र बनाया और फिर अवसरवाद के तहत आर्थिक लाभ के लिए भारत आ गया? हालाँकि ऐसी तुलना किसी भी तरह से उचित नहीं है, लेकिन लंबे समय तक यही असम की राजनीति का आधार बनी रही।

जनता को बाँटकर शासन करने के उद्देश्य से वर्षों तक चलाए गए राजनीतिक प्रचार को हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में ध्वस्त कर दिया गया। लक्षित संदेशों और जागरूकता अभियान के माध्यम से इन दोनों वर्गों के बीच के बड़े अंतर और जनसंख्या में बदलाव में उनके अलग-अलग योगदान को लोगों के सामने पूरी तरह स्पष्ट किया गया।

असमिया हिंदू समुदाय, जिसे कभी कुछ स्वार्थी राजनीतिक समूहों ने यह विश्वास दिलाया था कि बंगाली हिंदू ही उनका दुश्मन है, अब इस बात को लेकर आश्वस्त है कि उनका असली दुश्मन केवल एक है। वह बंगाली हिंदू शरणार्थी नहीं, बल्कि वह अवैध प्रवासी है, जो असम समझौता में तय 24 मार्च 1971 की कट-ऑफ तारीख के बाद आर्थिक लाभ लेने और राज्य की संस्कृति में बदलाव लाने के उद्देश्य से पूर्वोत्तर राज्य असम में आए।

असम में डिटेंशन सेंटर में एक भी बंगाली हिंदू नहीं: हिमंता बिस्वा सरमा

शुक्रवार (3 जुलाई 2026) को हिमंता बिस्वा सरमा ने इंडियन एक्सप्रेस आइडिया एक्सचेंज कार्यक्रम में जो बयान दिया, उससे उनका रुख पूरी तरह स्पष्ट हो गया।

असम में डी-वोटर्स (D Voters) यानी ऐसे लोगों के बारे में पूछे जाने पर, जो अपनी भारतीय नागरिकता साबित नहीं कर पाए हैं और जिनके मामले विदेशी न्यायाधिकरण (Foreigners Tribunal) में लंबित हैं, उन्होंने कहा, “अब बंगाली हिंदुओं की संख्या 1 लाख से भी कम रह गई है। एक समय यह लगभग 4.5 लाख थी। ट्रिब्यूनल अपना काम कर रहे हैं और मुझे लगता है कि यह मामला सुलझ जाएगा, क्योंकि अब यह संख्या बहुत कम रह गई है।”

सीएम ने आगे कहा, “हमारे डिटेंशन कैंप में एक भी बंगाली हिंदू नहीं है। यह अच्छी खबर है, क्योंकि लगभग सभी समस्याओं का समाधान हो चुका है। पहले उनके पास आधार कार्ड नहीं था, लेकिन अब सभी को आधार कार्ड मिल चुका है। अब 4.5 लाख से यह संख्या घटकर 1 लाख से भी कम रह गई है। इसलिए यह समस्या लगभग सुलझ चुकी है। मेरा मानना है कि अगले 1-2 वर्षों में यह मुद्दा पूरी तरह हल हो जाएगा, क्योंकि हर मामला ट्रिब्यूनल में जाता है और वहाँ विवाद होते हैं। हम कानूनी प्रक्रिया के जरिए इन विवादों का समाधान कर रहे हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “एक समय दोनों समुदायों (हिंदू और मुस्लिम) को मिलाकर यह संख्या लगभग 12 से 14 लाख थी। आज यह घटकर 3.54 लाख रह गई है और इनमें भी बंगाली हिंदुओं की संख्या 1 लाख से कम है। यानी यह संख्या लगातार काफी कम हो रही है।”

हिमंता बिस्वा सरमा ने अंत में कहा, “लेकिन जब NRC प्रकाशित होगी, तो मुझे आशंका है कि उसके प्रकाशित होने के बाद शुरुआत में यह संख्या फिर बढ़ सकती है, क्योंकि कई लोगों के नाम उसमें नहीं होंगे। उस समय बंगाली हिंदुओं को CAA के तहत आवेदन करना होगा। इसलिए यह मुद्दा थोड़ा जटिल है, लेकिन हम इसका समाधान कर रहे हैं।”

लोगों के नजरिए में बदलाव और हिमंता बिस्वा सरमा की भूमिका

जब वर्ष 2019 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) लागू किया गया, तब असम में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। बिना दस्तावेज वाले बंगाली हिंदू शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता दिए जाने की संभावना को लेकर भारी विवाद खड़ा हो गया।

राज्य के कई राजनीतिक दलों ने यह भी दावा किया कि इससे असम समझौता का उद्देश्य खत्म हो जाएगा, जिसके तहत 24 मार्च 1971 के बाद असम आने वाले हर अवैध प्रवासी को निर्वासन के योग्य माना गया था।

CAA के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न के कारण 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत आए छह धार्मिक समुदायों (हिंदू, ईसाई, सिख, पारसी, जैन और बौद्ध) के लोगों को भारतीय नागरिकता पाने के लिए एक तेज प्रक्रिया (फास्ट-ट्रैक) का रास्ता दिया गया।

सात साल बाद इस कट-ऑफ तारीख को बढ़ाकर 31 दिसंबर 2024 कर दिया गया। हिमंता बिस्वा सरमा यह संदेश लोगों तक पहुँचाने में सफल रहे कि पूर्वी पाकिस्तान/बांग्लादेश से मजबूरी में असम आए बंगाली हिंदू और आर्थिक लाभ के लिए सीमा पार कर भारत आए बंगाली मुस्लिम एक जैसे नहीं हैं। भले ही दोनों के पास दस्तावेज न हों, लेकिन एक शरणार्थी है, जबकि दूसरा घुसपैठिया।

इसके परिणामस्वरूप असम समझौता अब बंगाली हिंदू शरणार्थियों पर लागू नहीं होता और उन्हें नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के तहत संरक्षण प्राप्त है। हिमंता बिस्वा सरमा ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) लागू किया जाएगा और केवल ‘घुसपैठियों’ को ही बांग्लादेश भेजे जाने तक डिटेंशन कैंपों में रखा जाएगा।

किसी भी बंगाली हिंदू शरणार्थी को न तो निर्वासित किया जाएगा और न ही डिटेंशन सेंटर में भेजा जाएगा। जिस तरह इजरायल दुनिया भर के यहूदियों की मातृभूमि माना जाता है, उसी तरह भारत सभी हिंदुओं की मातृभूमि था, है और रहेगा। लेकिन असम में लोगों को इस बात के लिए आश्वस्त करने के लिए अलग स्तर की राजनीतिक इच्छाशक्ति, संदेश और नीतिगत फैसलों की जरूरत थी। हिमंता बिस्वा सरमा लगातार घुसपैठियों और शरणार्थियों के बीच अंतर को लेकर मुखर रहे हैं।

उन्होंने लोगों के नजरिए में ऐसा बदलाव लाने का दावा किया, जिसकी 30 साल पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। यही कारण है कि अगस्त 2025 में जब वे सिलचर गए तो उनका भव्य स्वागत हुआ। लाखों बंगाली हिमंता बिस्वा सरमा की एक झलक पाने के लिए उमड़ पड़े।

उस दिन असमिया भाषी मुख्यमंत्री को जनता से जो जबरदस्त स्वागत, स्नेह और प्रशंसा मिली, वह राज्य के इतिहास में अभूतपूर्व है। 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले, पश्चिम बंगाल में उनका भव्य स्वागत हुआ। उनके भाषणों में हजारों बंगाली मतदाता शामिल हुए।

हिमंता बिस्वा सरमा ने अपनी हिंदू पहचान को लेकर कोई संकोच नहीं दिखाया है और असम में भाषाई और जातीय सीमाओं को पार करते हुए हिंदू समुदाय को एकजुट करने के लिए अथक प्रयास किए हैं। असमिया हिंदुओं और बंगाली हिंदुओं के बीच ऐतिहासिक मतभेद दूर हो चुके हैं और राज्य स्थायी सुलह की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

स्वार्थी समूह, जो सामाजिक दरारों का फायदा उठाकर फल-फूल रहे थे, अब किनारे खड़े होकर घटनाक्रम देख रहे हैं। वे हताश और शक्तिहीन रह गए हैं। हिमंता बिस्वा सरमा को इसका पूरा श्रेय जाता है।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

क्या मोरक्को के ‘एटलस लायंस’ रोक पाएँगे फ्रांस का विजय रथ? विश्व कप 2026

फुटबॉल का सुरूर सब के सिर चढ़कर बोल रहा है। हाल ही की हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि विम्बल्डन को भारी नुक़सान झेलना पड़ रहा है क्योंकि फिलहाल तमाम लोगों को फुटबॉल का बुखार चढ़ा हुआ है। चलते मैचों के दौरान लोग अपने अपने मोबाइल फोनों में फुटबॉल मैचों में व्यस्त हैं। हाल ही में जैसे ही फीफा विश्व कप के मैच के अंतिम पन्द्रह मिनट में कप्तान हैरी केन ने DR Congo के विरुद्ध जरूरी गोल दाग कर स्कोर बराबर किया, विम्बल्डन के सेंटर कोर्ट व कोर्ट नम्बर एक की दर्शक-दीर्घा में मौजूद दर्शकों ने खुशी में जोर से शोर मचाया, वहां चल रहे खेल के खिलाड़ियों को लगा वह उनके खेल पर उनकी हौसला-अफजाई कर रहे हैं, परन्तु, ऐसा था नहीं। फीफा विश्व कप सब को अपने आगोश में ले चुका है। हर ओर बस उसके ही चर्चे हैं।

बीती रात राउंड ऑफ 16 के दो मैच खेले गए। पहला मैच था यूएस के टेक्सास प्रांत के सबसे घनी आबादी वाले शहर ह्यूस्टन के स्टेडियम में जहां कनाडा का सामना होने जा रहा था टूर्नामेंट की मजबूत टीमों में शुमार मोरक्को से। गौरतलब है कि पिछले विश्व कप के ग्रुप चरण में भी यह दोनों आपस में भिड़ती नजर आई थीं।

मैच शुरू होता है। शुरुआती क्षणों से ही कोच जेस्से मार्श्च की कनाडा लगातार मोरक्को पर दबाव बनाए हुई थी। यह देखना वाकई आश्चर्यजनक था कि कैसे कनाडा मोरक्को को, जो पिछले कुछ सालों में एक सशक्त टीम बन कर उभरे हैं, यूं पछाड़ रही थी। कनाडाई टीम निरंतर मोरक्को के खिलाड़ियों को प्रेस किए जा रही थी व मैदान में उनकी एक भी न चलने दे रही थी। वह शुरुआती पलों में मोरक्को के गोलपोस्ट पर कुछ वाकई बेहद घातक हमले भी करते नजर आते हैं, परन्तु गोलपोस्ट पर खड़े अनुभवी गोलकीपर यासीन बोनू लगातार बेहतरीन बचाव किए जा रहे थे। इससे एटलस लायंस को कनाडा द्वारा दिए जा रहे शुरुआती झटकों से उबरने में मदद मिलती है। पहले हाफ में कनाडा शुरू से अंत तक मोरक्को पर भीषण दबाव बनाए रखती है। परन्तु वह गोल स्कोर करने में नाकाम रहते हैं। सो, पहले हाफ की समाप्ति पर स्कोर 0-0 ही रहता है।

दूसरे हाफ की शुरुआत होती है। एटलस लायंस के कोच बदली रणनीति के साथ अपनी टीम को मैदान पर उतारते हैं। और, अब तो खेल पूरी तरह बदल जाता है। अनुभवी मोरक्को कनाडा को अपने शिकंजे में कस लेती है। मैच के पचासवें मिनट में कनाडाई गोलपोस्ट की दाईं ओर मोरक्को को एक फ्री किक मिलती है, जिसे अचरफ हाकिमी और अज़्ज़ेदीन ऊनाही ने मिलकर एक सेट-पीस मूव के जरिए अंजाम दिया, जहाँ मौका पाते ही ऊनाही ने कनाडाई बॉक्स के बाहर से गोलपोस्ट के बॉटम राइट कॉर्नर की ओर एक ताकतवर राइट फुटर किक दाग गोल स्कोर कर लिया। मोरक्को अंततः मैच में बढ़त बना लेती है। फिर, बयासिवें मिनट में ब्राहीम डियाज़ के पास पर दुबारा अज़्ज़ेदीन ऊनाही एक गोल दाग स्कोर 2-0 कर देते हैं। फिर 90+8 मिनट में मोरक्को एक गोल और दागते हुए मैच 3-0 से जीत जाती है।

पिछले विश्व कप में सेमीफाइनल तक का सफर तय करने वाले एटलस लायंस इस जीत के संग क्वार्टर फाइनल में जगह बना लेते हैं। कनाडाई टीम, विश्व कप के इतिहास में इस बार पहली दफा नॉकआउट चरण में कोई मुकाबला जीतने के पश्चात, अच्छा खेल दिखाते हुए टूर्नामेंट को अलविदा कहने के लिए मजबूर थे।

देर रात अगला मैच फ्रांस और पेराग्वे के मध्य फिलाडेल्फिया में खेला गया। यहां भीषण गर्मी तो थी ही, परन्तु मैदान के भीतर भी गरमा-गरमी देखने को मिली। पेराग्वे 5-4-1 की फॉर्मेशन के साथ एक अति-रक्षात्मक खेल खेलने मैदान में उतरा था। मैच में लगभग छिहत्तर प्रतिशत वक्त गेंद फ्रेंच टीम के कब्जे में थी। मगर बेहद सजग तरीके से डिफेंसिव फुटबॉल खेल रही पेराग्वे फ्रेंच टीम को अटैक करने के मौके ही नहीं दे रही थी। गुजरे दिन हमने अर्जेंटीना को काबो वर्दे के खिलाफ संघर्ष करते देखा था। फ्रांस भी आज बाकी मैच-डेज़ की भांति विपक्षी बॉक्स में खतरा पैदा करती नजर नहीं आ रही थी।

मगर, मैच के सतत्तरवें मिनट में फ्रांस को एक पेनाल्टी मिल जाती है जिसे उनके स्टार खिलाड़ी कीलिएन एमबाप्पे सफलतापूर्वक गोल में तब्दील कर देते हैं।

एक नॉकआउट चरण के मुकाबले में कौन अच्छा खेला इससे ज्यादा यह मायने रखता है कि मैच समाप्ति पर किसने ज्यादा गोल मार कर बढ़त हासिल की हुई थी। इस एक गोल की बढ़त के दम पर लेस ब्ल्यूज़ क्वार्टर फाइनल में जगह बना लेती है जहां अब उनका सामना होगा एटलस लायंस से। यह दोनों ही टीमें बहुत अच्छे खेल का प्रदर्शन कर रही हैं। फीफा की वैश्विक रैंकिंग में शीर्ष-10 में शामिल मोरक्को अंततः तक हार नहीं मानती और लड़ती रहती है, जूझती रहती है। उसका हर खिलाड़ी मैदान में अपना सबकुछ झोंक देता है। वहीं, फ्रांस एक बेहद ही घातक अटैकिंग फोर्स बनकर उभरी है, जो अपने घातक अटैक जितनी ही मजबूत रक्षापंक्ति लेकर इस टूर्नामेंट में उतरे हैं। निश्चित रूप से यह एक बड़ा मुकाबला होने जा रहा है।

खैर, अब, आज रात डेढ़ बजे न्यूयॉर्क के न्यूजर्सी स्टेडियम में खेला जाएगा एक महामुकाबला। आज ब्राजील अपने राउंड ऑफ 16 मुकाबले में नॉर्वे के खिलाफ मैदान में उतरेगी। ब्राजील की टीम, कुछ अहम खिलाड़ियों के चोटिल होने के बावजूद, अच्छी फॉर्म में नजर आई है। वहीं, नॉर्वे के पास एक तुरुप का पत्ता है – अर्लिंग हालांड। नॉर्वे हालांड के साथ साथ एंटोनियो नूसा व एलेक्सैन्डर सोरलोथ से गोल स्कोर करने की उम्मीदें लगाए होगी। मिडफील्ड में एक दफा फिर कप्तान ओद्देगार्द मौजूद होंगे जो अंत तक मैदान में अपना सर्वस्व झोंक देंगे। तमाम पंडितों का कहना है कि ब्राजील यह मैच 2-1/3-0 से जीत जाएगी, मगर क्योंकि यह एक नॉकआउट मुकाबला है, कोई भी टीम यहां कुछ भी कर सकती है।

फिर, कल सुबह साढ़े पांच बजे अपने गढ़ ऐज़्टेका स्टेडियम में मेक्सिको इंग्लैंड से दो-दो हाथ करती नजर आएगी। मेक्सिको अबतक इस विश्व कप में अविजित रही है। काबो वर्दे से प्रेरणा लेकर वह जरूर एक बड़ा उलटफेर करना चाहेंगे। सबकी नजरें एक बार फिर युवा गिल्बर्टो मोरा पर टिकी होंगी। वहीं इंग्लैंड एक बार फिर अपने कप्तान हैरी केन के नेतृत्व में वापस एकजुट होकर एक शानदार जीत दर्ज कर क्वार्टर फाइनल के लिए क्वालीफाई करना चाहेंगे।

यह विश्व कप हमें नित नई कहानियां परोस रहा है। हर रोज़ एक सांसें थाम देने वाला रोमांचक मैच होता है। और जब लगता है कि इससे बेहतरीन क्या ही हो सकेगा, अगले ही पल एक और ज्यादा रोमांचक मैच हो जाता है। हर दिन कोई खिलाड़ी अपने शानदार खेल के दम पर पूरे विश्व के खेलप्रेमियों का दिल जीत रहा है। कभी अयुब बउदादी, तो कभी वोजिन्हा। कभी, गिल्बर्टो मोरा तो कभी सिडनी लोपेज़ काबराल। हमें नित नए सितारे जगमगाते हुए दिख रहे हैं। इन खिलाड़ियों को खेलते देखना बेहद सुखद अहसास देता है। कल का दिन रहा अज़्ज़ेदीन ऊनाही के नाम‌। ऊनाही ने कल दो बेहद शानदार गोल जड़ते हुए, कनाडाई कोच जेस्से मार्श्च का ख्वाब तोड़ कर, अपनी टीम को क्वार्टर फाइनल में पहुंचाया। उनके दोनों ही गोल ऐसे हैं जिन्हें आप यूट्यूब पर जाकर कई बार देख सकते हैं।

गौरतलब है कि जब 2022 विश्व कप के राउंड ऑफ 16 के अपने मुकाबले में मोरक्को ने पेनाल्टी शूटआउट में यूरोपीय जाएंट्स स्पेन को 3-0 से हरा कर बाहर किया था तो एक पत्रकार ने मैच पश्चात होने वाली प्रेस-वार्ता में जब स्पेन के कोच लुई एनरिके को पूछा कि उन्हें मोरक्को के किस खिलाड़ी ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया तो सभी को लगा था कि वह पेनाल्टी शूटआउट में शानदार प्रदर्शन करने वाले गोलकीपर यासीन बोनू का नाम लेंगे, मगर उन्होंने जो नाम लिया था वह नाम था अज़्ज़ेदीन ऊनाही का। उन्होंने कहा था कि मुझे यकीन ही नहीं हुआ वह कितना बेहतरीन खेला। मुझे माफ़ करिए मुझे उनका नाम नहीं पता, मगर, मोरक्को के लिए आठ नम्बर की जर्सी पहना खिलाड़ी पूरे मैच के दौरान बिन रुके दौड़ता रहा। वह एक पल के लिए भी रुकता नहीं था। उसने अकेले स्पेन के मिडफील्ड के नाक में दम कर के रख दिया।

उस रोज़ स्पेनिश कोच लुई एनरिके उस आठ नम्बर की जर्सी पहने खिलाड़ी का नाम नहीं जानते थे। आज उस खिलाड़ी का नाम सारी दुनिया जान गई। वह खिलाड़ी हैं अज़्ज़ेदीन ऊनाही। सिग्मंड फ्रॉएड ने सच ही तो कहा था कि एक दिन वर्षों का संघर्ष बहुत खूबसूरत तरीके से तुमसे टकराएगा।

हर छोटा कदम, तुम्हें एक बड़ी मंजिल की ओर पहुंचा रहा होता है। कौन जाने, क्या पता रातें पिघला कर ऑपइंडिया के लिए विश्व कप की यह मैच-रिपोर्ट्स लिखना भी शायद कोई ऐसा ही कदम हो।

बने रहिएगा साथ। फुटबॉल के किस्से जारी रहेंगे।

ग्लोबल टाइम्स के ‘टैप वॉटर’ से आगे की कहानी: भारत-जापान कैसे बदल रहे हैं एशिया का भविष्य

हैदराबाद हाउस की सीढ़ियों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान की प्रधानमंत्री सनाए तकाइची (Sanae Takaichi) की मुलाकात सिर्फ एक औपचारिक कूटनीतिक तस्वीर नहीं थी। जब प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें अपनी ‘छोटी बहन’ कहा, तो यह दोनों देशों के बीच बढ़ते भरोसे और रिश्ते का प्रतीक बन गया। आज भारत और जापान की ‘स्पेशल स्ट्रैटेजिक एंड ग्लोबल पार्टनरशिप’ सिर्फ कागजों तक सीमित ना होकर एशिया की बदलती राजनीति में एक मजबूत साझेदारी के रूप में सामने आ रही है। मगर इस मुलाकात ने बीजिंग के गलियारों में ब्लड प्रेशर की समस्या को और गंभीर कर दिया।

इस मुलाकात ने सबसे ज्यादा बेचैनी चीन में पैदा की। इसकी झलक चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के सरकारी मुखपत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ की रिपोर्टिंग में साफ दिखाई दी। जापान के प्रधानमंत्री के भारत दौरे को ‘नल के पानी’ (Tap Water) जैसे मामूली, हास्यास्पद और बेबुनियाद विवाद से जोड़ने की कोशिश यह बताती है कि चीन का सरकारी मीडिया अब गंभीर पत्रकारिता से ज्यादा सोशल मीडिया ट्रोल की तरह व्यवहार करने लगा है।

ग्लोबल टाइम्स का प्रोपेगैंडा, चीनी पत्रकारिता का ‘डाउनफॉल’

ग्लोबल टाइम्स ने दावा किया कि जापानी प्रतिनिधिमंडल ने भारत में नल का पानी नहीं पिया और कुल्ला करने के लिए भी बोतलबंद पानी का इस्तेमाल किया। लेकिन यह रिपोर्ट एक तथ्य से ज्यादा प्रोपेगैंडा और नैरेटिव बनाने की कोशिश लगती है। ऐसे हिट जॉब का इस्तेमाल चीन का सरकारी मीडिया पहले भी कई बार करता रहा है।

असलियत यह है कि किसी विदेशी प्रतिनिधिमंडल का अपना पानी या विशेष भोजन साथ रखना कोई असामान्य बात नहीं है। यह अक्सर सुरक्षा, स्वास्थ्य और तय प्रोटोकॉल का हिस्सा होता है। इसे किसी देश का अपमान मानना सही नहीं है।

इतिहास भी इसका उदाहरण देता है। साल 1902 में महाराजा सवाई माधो सिंह द्वितीय जब लंदन गए थे, तब वे दो विशाल चाँदी के कलशों में करीब 4,000-4,000 लीटर गंगाजल साथ लेकर गए थे। उन्होंने ऐसा अपनी धार्मिक आस्था के कारण किया था, न कि ब्रिटेन का अपमान करने के लिए। इसे दुनिया ने उनकी सांस्कृतिक निष्ठा के रूप में देखा था।

ऐसे में जापानी प्रतिनिधिमंडल के पानी को लेकर विवाद खड़ा करना एक कमजोर तर्क है। इससे भारत की छवि पर कोई सवाल नहीं उठता, बल्कि यह जरूर दिखता है कि ग्लोबल टाइम्स ने एक सामान्य प्रोटोकॉल को राजनीतिक विवाद में बदलने की कोशिश की।

ग्लोबल टाइम्स ने यह नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की कि जापानी प्रधानमंत्री ने नल का पानी नहीं पीकर भारत का अपमान किया। लेकिन यह दावा न तो पत्रकारिता की कसौटी पर खरा उतरता है और न ही सामान्य समझ पर।

असल में किसी विदेशी प्रतिनिधिमंडल का अपनी सुरक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े तय प्रोटोकॉल का पालन करना दुनिया भर में एक सामान्य बात है। इसे किसी देश के सम्मान या अपमान से जोड़ना तथ्यों से ज्यादा राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने की कोशिश लगता है।

यही वजह है कि ग्लोबल टाइम्स की यह रिपोर्ट पत्रकारिता से अधिक प्रोपेगैंडा प्रतीत होती है। यह चीन की उस साम्यवादी सोच को भी दिखाती है, जिसमें किसी व्यक्ति की पसंद, संस्थागत प्रोटोकॉल या सुरक्षा संबंधी फैसले को भी राजनीतिक संदेश के रूप में पेश करने की कोशिश की जाती है। ऐसी रिपोर्टिंग का उद्देश्य सूचना देना कम और एक खास धारणा बनाना अधिक दिखाई देता है।

चीन की बेचैनी की असली वजह क्या है?

चीन की नाराजगी सिर्फ एक कूटनीतिक मुलाकात की वजह से नहीं है। असली कारण यह है कि भारत और जापान के रिश्ते अब केवल दोस्ती तक सीमित नहीं रहे। दोनों देश रक्षा, तकनीक, अर्थव्यवस्था और इंडो-पैसिफिक की रणनीति में तेजी से साथ काम कर रहे हैं। यही साझेदारी चीन के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है।

रक्षा और रणनीति: चीन की चुनौती बढ़ रही है

भारत और जापान समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में पहले से कहीं ज्यादा करीब आ रहे हैं। दोनों देशों ने भारतीय नौसेना के लिए ‘यूनिकॉर्न’ (UNICORN – Unified Complex Radio Antenna) नेवल रेडियो एंटीना सिस्टम विकसित करने का फैसला किया है। माना जा रहा है कि इससे भारतीय नौसेना की क्षमताएँ और मजबूत होंगी, खासकर स्टील्थ (Stealth) ऑपरेशन में।

इसके साथ ही भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ (Act East) नीति और जापान का ‘फ्री एंड ओपन इंडो-पैसिफिक’ (FOIP) विजन एक-दूसरे के पूरक बन रहे हैं। इस नीति का उद्देश्य केवल दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों से बेहतर रिश्ते बनाना नहीं, बल्कि भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को एशिया की आर्थिक और रणनीतिक गतिविधियों से जोड़ना भी है। इसी लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए एक्ट ईस्ट फोरम (Act East Forum – AEF) बनाया गया, जिसके माध्यम से जापान असम, मेघालय और मिजोरम जैसे राज्यों में सड़क, पुल और अन्य कनेक्टिविटी परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण ब्रह्मपुत्र नदी पर बन रहा धुबरी-फुलबारी पुल है। यह इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना पूर्वोत्तर भारत की आर्थिक तस्वीर बदलने वाली पहल मानी जा रही है। इससे लोगों और सामान की आवाजाही तेज होगी, व्यापार बढ़ेगा और पूरे क्षेत्र में निवेश के नए अवसर पैदा होंगे।

लेकिन इसकी अहमियत केवल आर्थिक नहीं है। बेहतर सड़क और कनेक्टिविटी नेटवर्क के जरिए भारत का पूर्वोत्तर सीधे दक्षिण-पूर्व एशिया से जुड़ सकेगा। इससे भारत की एक्ट ईस्ट नीति को नई गति मिलेगी और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी रणनीतिक मौजूदगी भी पहले से अधिक मजबूत होगी।

दोनों देशों का साझा उद्देश्य हिंद-प्रशांत क्षेत्र में नियम-आधारित व्यवस्था को मजबूत करना है। ऐसे माहौल में चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों पर स्वाभाविक रूप से दबाव बढ़ता है।

भारत और जापान की सुरक्षा चिंताएँ अलग-अलग जरूर हैं, लेकिन उनका स्रोत काफी हद तक एक ही है; चीन का लगातार आक्रामक होता रवैया।

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन की सैन्य गतिविधियाँ और सीमा पर बढ़ता दबाव है। वहीं जापान के लिए पूर्वी चीन सागर में स्थित सेनकाकू द्वीप (Senkaku Islands) की सुरक्षा एक बड़ा रणनीतिक मुद्दा है, जहाँ चीन लगातार अपना दावा और मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश करता रहा है।

यही कारण है कि दोनों देशों के सुरक्षा हित अब एक-दूसरे के पूरक बन गए हैं। भारत और जापान समझते हैं कि हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) क्षेत्र में शांति और नियम-आधारित व्यवस्था तभी कायम रह सकती है, जब क्षेत्रीय देशों के बीच मजबूत रणनीतिक सहयोग हो।

इसी सोच के तहत क्वॉड (QUAD) में भारत और जापान की भूमिका लगातार मजबूत हुई है। अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर यह समूह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मुक्त, सुरक्षित और नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था का समर्थन करता है। चीन इसे अपने बढ़ते समुद्री प्रभाव और क्षेत्रीय दावों के लिए एक बड़ी रणनीतिक चुनौती के रूप में देखता है। इसलिए क्वॉड आज केवल एक कूटनीतिक मंच नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत में शक्ति संतुलन बनाए रखने का महत्वपूर्ण सुरक्षा ढाँचा भी बन चुका है।

सेमीकंडक्टर और सप्लाई चेन: चीन की पकड़ कमजोर करने की कोशिश

तकनीक के क्षेत्र में भी भारत और जापान तेजी से सहयोग बढ़ा रहे हैं। दोनों देश सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और क्रिटिकल मिनरल्स जैसे अहम क्षेत्रों में साथ काम कर रहे हैं ताकि सप्लाई चेन सिर्फ चीन पर निर्भर न रहे

गुजरात के साणंद में रेनेसास इलेक्ट्रॉनिक्स का करीब ₹7,600 करोड़ का सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट और भारत के उत्तर-पूर्व में जापानी निवेश इसी बड़ी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। अगर यह सहयोग सफल होता है, तो वैश्विक कंपनियों के पास चीन के अलावा एक मजबूत विकल्प तैयार हो सकता है।

अर्थव्यवस्था: एशिया का नया शक्ति केंद्र बनने की संभावना

भारत और जापान रुपए (INR) और येन (JPY) में व्यापार बढ़ाने जैसे विकल्पों पर भी चर्चा कर रहे हैं। इसका उद्देश्य आपसी कारोबार को आसान बनाना और आर्थिक सहयोग को मजबूत करना है।

डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए भारत और जापान के बीच रुपया-येन (INR-JPY) में सीधे व्यापार की संभावनाओं पर भी काम किया जा रहा है। यदि यह व्यवस्था मजबूत होती है, तो दोनों देशों को हर लेन-देन के लिए अमेरिकी डॉलर पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

यह कदम सिर्फ व्यापार को आसान बनाने तक सीमित नहीं है। इसका बड़ा रणनीतिक महत्व भी है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ने से दोनों देशों को विनिमय दर (Exchange Rate) के जोखिम कम करने, लेन-देन की लागत घटाने और अपनी आर्थिक संप्रभुता (Economic Sovereignty) को मजबूत करने में मदद मिल सकती है।

यही कारण है कि रुपया-येन डायरेक्ट ट्रेड को भारत की बढ़ती वैश्विक आर्थिक भूमिका और बदलती अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में उसकी मजबूत होती स्थिति के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है।

चीन के लिए चिंता की बात यह है कि एक तरफ भारत दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक है, तो दूसरी तरफ जापान उन्नत तकनीक और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग में अग्रणी है। अगर दोनों देशों की ताकत एक साथ आती है, तो एशिया की आर्थिक और रणनीतिक तस्वीर में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

भारत-जापान साझेदारी किन मजबूत स्तंभों पर खड़ी है?

भारत और जापान का रिश्ता अब सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं है। यह निवेश, तकनीक, ऊर्जा और भविष्य की अर्थव्यवस्था जैसे कई क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ रहा है। यही वजह है कि इसे दोनों देशों की सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदारियों में गिना जाता है।

  • निवेश और अर्थव्यवस्था: दोनों देशों ने आने वाले वर्षों में आर्थिक सहयोग को नई ऊँचाई पर ले जाने का लक्ष्य रखा है। पहले जहाँ 5 ट्रिलियन जापानी येन के निवेश का लक्ष्य था, वहीं अब अगले दशक के लिए इसे बढ़ाकर 10 ट्रिलियन जापानी येन (करीब 68 अरब डॉलर) तक ले जाने की बात हो रही है। भारत में पहले से 11 जापानी इंडस्ट्रियल टाउनशिप (JIT) काम कर रही हैं। इससे साफ है कि जापानी कंपनियाँ भारत को सिर्फ एक बाजार नहीं, बल्कि लंबे समय के मैन्युफैक्चरिंग और निवेश केंद्र के रूप में देख रही हैं।
  • स्वच्छ ऊर्जा में साझेदारी: ऊर्जा के क्षेत्र में भी दोनों देश मिलकर काम कर रहे हैं। जापान ग्रीन हाइड्रोजन जैसी उन्नत तकनीकों में आगे है, जबकि भारत इस क्षेत्र में अपना राष्ट्रीय मिशन चला रहा है। अगर दोनों देशों का सहयोग इसी तरह बढ़ता रहा, तो स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में एक ऐसा मॉडल तैयार हो सकता है, जो भविष्य में दुनिया के लिए भी अहम साबित हो।
  • तकनीक और डिजिटल भविष्य: समय के साथ तकनीकी और आर्थिक मोर्चे पर भी चीन की एकाधिकारवादी पकड़ कमजोर हो रही है। ऐसे में भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका सॉफ्टवेयर इकोसिस्टम, इंजीनियरिंग प्रतिभा और डिजिटल क्षमता है। वहीं जापान हार्डवेयर, इलेक्ट्रॉनिक्स और हाई-प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग में दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है। इन दोनों की ताकत एक साथ आने से एक ‘सॉवरेन एआई नेटवर्क’ (Sovereign AI Network) विकसित करने की संभावना बनती है। इसका मतलब है ऐसा एआई इकोसिस्टम, जो किसी एक विदेशी कंपनी या देश पर निर्भर न हो, बल्कि दोनों देशों की अपनी तकनीक, डेटा और कंप्यूटिंग क्षमता पर आधारित हो।

इसी सहयोग के जरिए भविष्य में ऐसे लार्ज लैंग्वेज मॉडल (Large Language Models – LLMs) विकसित किए जा सकते हैं, जो सिर्फ पश्चिमी डेटा पर निर्भर न हों, बल्कि एशियाई भाषाओं, संस्कृतियों, समाज और स्थानीय जरूरतों को बेहतर ढंग से समझ सकें। इससे भारत और जापान तकनीक के उपभोक्ता भर नहीं रहेंगे, बल्कि AI के वैश्विक विकास में अपनी अलग पहचान भी बना सकेंगे।

इन दोनों क्षमताओं के साथ आने से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), क्वांटम कंप्यूटिंग, 6G और एडवांस टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में बड़े अवसर पैदा हो सकते हैं। यही वजह है कि दोनों देश डिजिटल पार्टनरशिप को भी लगातार मजबूत कर रहे हैं।

हर बड़ी साझेदारी की तरह भारत और जापान के रिश्ते में भी कुछ चुनौतियाँ हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार संतुलन, रूस को लेकर अलग-अलग विदेश नीति के नजरिए और रक्षा तकनीक के ट्रांसफर जैसे मुद्दों पर अभी भी काम होना बाकी है।

इसके बावजूद दोनों देश लगातार ऐसे तंत्र विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं, जिनसे निवेश बढ़े, नई तकनीक साझा हो और उद्योगों के बीच सहयोग आसान बने। यही वजह है कि विशेषज्ञ मानते हैं कि यह साझेदारी आने वाले वर्षों में और मजबूत होगी।

चीन के लिए कड़वी हकीकत

चीन शायद यह समझ नहीं पा रहा कि दुनिया अब एकध्रुवीय (Unipolar) नहीं रही। उसे यह समझ लेना चाहिए कि दुनिया अब मल्टीपोलर (Multipolar) है। भारत अब केवल एक बाजार नहीं रहा गया है; ये एक उभरती हुई बड़ी शक्ति है। ग्लोबल टाइम्स का यह ‘पानी विवाद’ उस छटपटाहट का संकेत है, जिसे चीन अपने गिरते प्रभाव को रोकने के लिए कर रहा है। भारत और जापान आज फ्रेंड-शोरिंग की रणनीति पर तेजी से काम कर रहे हैं। इसका मतलब है कि महत्वपूर्ण उद्योगों, सप्लाई चेन और निवेश को ऐसे भरोसेमंद देशों के बीच विकसित किया जाए, जिनके साथ राजनीतिक स्थिरता, पारदर्शिता और रणनीतिक विश्वास मौजूद हो।

कोविड-19 महामारी और वैश्विक तनावों ने दुनिया को यह सिखाया कि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता कितना बड़ा जोखिम बन सकती है। इसी अनुभव के बाद भारत और जापान मिलकर ऐसी सप्लाई चेन तैयार कर रहे हैं, जो अधिक सुरक्षित, विविध और संकट के समय भी भरोसेमंद बनी रहे।

जापान की बुलेट ट्रेन की रफ्तार और भारत के बढ़ते आर्थिक कद के सामने चीन का ब्लड प्रेशर स्वाभाविक है। भारत और जापान की यह जोड़ी न केवल चीन के विस्तारवाद एवँ उसकी एकध्रुवीय रणनीतियों को संतुलित करने की क्षमता रखती है, बल्कि भविष्य के वैश्विक एजेंडे को भी निर्धारित करेगी। यह व्यापारिक समझौता तो है ही, साथ ही साथ एशिया की सुरक्षा का नया ‘सुरक्षा कवच’ भी है।

चीन का सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स शायद यह समझ नहीं पा रहा कि एशिया की रणनीतिक तस्वीर तेजी से बदल रही है। भारत आज दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है और इसी के साथ उसकी वैश्विक भूमिका भी लगातार मजबूत हो रही है।

ऐसे समय में जब भारत और जापान रक्षा, अंतरिक्ष और उन्नत तकनीक जैसे क्षेत्रों में अपने सहयोग का दायरा बढ़ा रहे हैं, तो इसका असर पूरे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर पड़ना स्वाभाविक है। उदाहरण के लिए, दोनों देश LUPEX (Lunar Polar Exploration Mission) के तहत चंद्रमा के ध्रुवीय क्षेत्रों की संयुक्त खोज के लिए काम कर रहे हैं। वहीं सेमीकंडक्टर, एआई और सप्लाई चेन जैसे क्षेत्रों में भी उनका सहयोग लगातार गहरा हो रहा है।

यही वह बदलाव है जो चीन के लिए चिंता का कारण बनता है। यदि भारत और जापान मिलकर रक्षा, अंतरिक्ष, हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग और सेमीकंडक्टर जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में मजबूत विकल्प खड़े करते हैं, तो कई ऐसे क्षेत्रों में चीन की वर्षों पुरानी बढ़त और प्रभुत्व को चुनौती मिल सकती है।

ऐसे में ‘पानी विवाद’ जैसे मुद्दों को उछालना कई विश्लेषकों को इस बात का संकेत लगता है कि चीन वास्तविक रणनीतिक और आर्थिक बदलावों पर चर्चा करने के बजाय ध्यान भटकाने वाले विवादों को अधिक महत्व दे रहा है।

साथ ही चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) को भी पिछले कुछ वर्षों में कई देशों में कर्ज, परियोजनाओं की व्यवहार्यता और भू-राजनीतिक प्रभाव को लेकर आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है। ऐसे माहौल में भारत-जापान की पारदर्शी, नियम-आधारित और तकनीक-केंद्रित साझेदारी एशिया में एक अलग विकास मॉडल के रूप में उभरती दिखाई दे रही है।

चुनौतियाँ: यथार्थवाद के आईने में

इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत और जापान के रिश्ते दूध-शहद की तरह नहीं हैं। यहाँ पर कुछ व्यावहारिक चुनौतियाँ भी हैं; जैसे कि चीन का बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव आज भी दुनिया के सबसे बड़े वैश्विक इंफ्रास्ट्रक्चर और वित्तीय कार्यक्रमों में से एक है। पूँजी, निवेश और परियोजनाओं की संख्या के मामले में भारत और जापान अभी उसके बराबर नहीं हैं। रक्षा तकनीक के हस्तांतरण में कानूनी पेच हैं, व्यापार घाटा एक चुनौती है, लेकिन दोनों देशों की रणनीति भी BRI की नकल करना नहीं है। भारत और जापान का जोर ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर मॉडल पर है, जो पारदर्शी हो, स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए टिकाऊ हो और देशों को कर्ज के जाल में न फँसाए।

पिछले कुछ वर्षों में BRI की कई परियोजनाओं को अत्यधिक कर्ज, लागत बढ़ने, राजनीतिक विरोध और सीमित आर्थिक लाभ जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। ऐसे में कई विकासशील देश अब सिर्फ बड़ी पूँजी नहीं, बल्कि भरोसेमंद, पारदर्शी और दीर्घकालिक साझेदार भी तलाश रहे हैं।

समय बदल चुका है और चीन को अपनी पुरानी रिवीजनिस्ट (Revisionist) नीतियों को त्यागकर भविष्य के इस नए तालमेल को स्वीकार करना ही होगा। यह सही है कि भारत और जापान की विदेश नीतियाँ पूरी तरह एक जैसी नहीं हैं। जापान की सुरक्षा व्यवस्था लंबे समय से अमेरिका के साथ उसके गठबंधन पर आधारित रही है, जबकि भारत ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) की नीति अपनाता है और किसी एक शक्ति-गुट का हिस्सा बनने से बचता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भी दोनों देशों के दृष्टिकोण में अंतर देखने को मिला।

लेकिन किसी रणनीतिक साझेदारी की सफलता का पैमाना यह नहीं होता कि दोनों देश हर वैश्विक मुद्दे पर एक जैसी राय रखें। असली कसौटी यह है कि क्या वे अपने साझा हितों पर लगातार साथ काम कर पा रहे हैं। भारत और जापान के मामले में यही तस्वीर दिखाई देती है। चीन की बढ़ती आक्रामकता, हिंद-प्रशांत में मुक्त और नियम-आधारित व्यवस्था, सुरक्षित सप्लाई चेन, सेमीकंडक्टर, उभरती तकनीक और विश्वसनीय आर्थिक साझेदारी जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के हित स्पष्ट रूप से एक-दूसरे से मेल खाते हैं।

यही कारण है कि रूस जैसे कुछ मुद्दों पर मतभेद होने के बावजूद रक्षा सहयोग, क्वाड, सेमीकंडक्टर, एक्ट ईस्ट फोरम, डिजिटल पार्टनरशिप और बुनियादी ढाँचे में दोनों देशों का सहयोग लगातार बढ़ा है। इसलिए यह साझेदारी किसी एक अंतरराष्ट्रीय संकट पर आधारित नहीं है, बल्कि साझा रणनीतिक हितों के कई मजबूत स्तंभों पर खड़ी है। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।

आतंकी को बताया ‘शहीद-ए-आजम’, कश्मीर पर बताया- ‘दमनकारी भारत’ का कब्जा… J&K की ‘सरकारी किताब’ में आतंकवाद का महिमामंडन: अब हो रही कार्रवाई

जम्मू-कश्मीर में एक सरकारी किताब में आतंकियों के महिमामंडन और भारत को लेकर उल्टा सीधा लिखने पर बवाल मचा हुआ है। इस किताब में जहाँ एक और मकबूल भट्ट जैसे आतंकी को शहीद बताया गया है तो वहीं अलगाववादियों की तारीफ की गई है। साथ ही, ‘भारत के कब्जे वाला कश्मीर’ जैसे शब्दों का भी इस्तेमाल किया गया है। जम्मू और कश्मीर (J&K) प्रशासन ने ‘अलगाववाद’ को बढ़ावा देने वाली यह सामग्री मिलने के बाद शनिवार (4 जुलाई 2026) को 8 शिक्षा अधिकारियों को निलंबित और लेखकों-पब्लिशर्स को ब्लैकलिस्ट कर दिया है।

विवादित किताब में क्या लिखा गया है?

यह विवाद जम्मू-कश्मीर में सरकार द्वारा सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी के लिए खरीदी गई किताब को लेकर है। एक किताब Personalities and Legends of J&K (जम्मू-कश्मीर की हस्तियाँ और दिग्गज) है जिसे हिलाल अहमद और संतोष मीणा ने लिखा है। यह किताब समग्र शिक्षा, जम्मू-कश्मीर 2025-26 योजना के तहत स्कूलों के पुस्तकालयों के लिए चुनी गई थी।

(फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

इस पुस्तक में पेज 23 पर आतंकी मकबूल भट्ट का जिक्र शुरू होता है जिसमें उसे महिमामंडन करते हुए ‘शहीद’ बताया गया है। इसमें लिखा गया है, “मकबूल भट्ट के लिए ‘महान बलिदान’ की उस राह की शुरुआत तब हुई, जब वह सेंट जोसेफ कॉलेज में छात्र थे।”

(फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

मकबूल भट्ट से जुड़े हिस्से में की कश्मीर को लेकर भी आपत्तिजनक बातें कही गई हैं। इसमें कश्मीर को IHK (Indian-Held Kashmir) और IOK (Indian-occupied Kashmir) यानी भारत के कब्जे वाला कश्मीर कहा गया है। जम्मू-कश्मीर हमेशा से भारत का अभिन्न अंग रहा है लेकिन इस किताब में वही भाषा बोली गई है जो पाकिस्तान बोलता है।

इसमें लिखा गया है, “पहली बार वापस IHK में प्रवेश…10 जून 1966 को NLF सदस्यों का पहला समूह गुप्त रूप से भारतीय कब्जे वाले कश्मीर में पार गया। मकबूल बट ने अपने समूह के तीन सदस्यों के साथ तीन महीने तक भूमिगत काम किया और IOK में कई गुरिल्ला सेल स्थापित किए।”

(फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

किताब में मकबूल को शहीद बताते हुए लिखा गया है, “इस तरह आधुनिक कश्मीरी इतिहास के सबसे महान क्रांतिकारियों में से एक का जीवन समाप्त हो गया और वह जन्मा, जिसे कश्मीरी शहीद-ए-आजम यानी सबसे महान शहीद के रूप में याद करते हैं।”

(फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

इस पुस्तक मकबूल के महिमामंडन के साथ भारत को कब्जा करने वाला और दमनकारी राज्य बताया गया है। पुस्तक में लिखा गया है, “भारत को लोकतांत्रिक दुनिया में पृथ्वी का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है।”

आगे लिखा गया है, “इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत में लोकतांत्रिक परंपराएँ और संस्थाएँ कहीं अधिक स्थापित हैं लेकिन जब बात कश्मीर की आती है तो भारत एक कब्जा करने वाले और दमनकारी राज्य से अधिक कुछ नहीं है, जो कश्मीर पर औपनिवेशिक ढाँचों और तानाशाही तरीकों से शासन करता है तथा लोकतांत्रिक मूल्यों, मानवाधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं की बहुत कम परवाह करता है। कश्मीर में भारतीय शासन का यह नव-औपनिवेशिक चेहरा अपने सबसे बुरे रूप में उस तरीके से सामने आया, जिस तरह मकबूल बट को फाँसी दी गई।” पुस्तक में मकबूल को रोमांटिक बताया गया है।

(फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

मकबूल भट्ट: अलगाववाद का खूनी चेहरा

कश्मीर के अलगाववादी इतिहास में मकबूल भट्ट को उसके समर्थक चाहे जितना ‘रोमांटिक क्रांतिकारी’ बताने की कोशिश करें, दस्तावेजों और घटनाओं की जमीन पर उसका चेहरा एक सजायाफ्ता आतंकी, हत्यारे और भारत-विरोधी सशस्त्र नेटवर्क के अगुवा का ही है।

मकबूल भट्ट पढ़ाई के बाद वह पाकिस्तान चला गया और वहीं से कश्मीर को भारत से अलग करने की हिंसक राजनीति में उतर गया। उसने नेशनल लिबरेशन फ्रंट यानी NLF से अपना रिश्ता बनाया, जिसे आगे चलकर JKLF की वैचारिक और संगठनात्मक जड़ माना गया। यही JKLF बाद में भारत-विरोधी हिंसा, अलगाववादी अभियान और कश्मीर में आतंकी गतिविधियों का अगुआ बना।

मकबूल भट्ट की असली खूनी फाइल 1966 से खुलती है। वह पाकिस्तान अधिकृत क्षेत्र से जम्मू-कश्मीर में घुसा और अपने साथियों के साथ गुप्त आतंकी सेल बनाने की कोशिश में लगा था। इसी दौरान CID/पुलिस इंस्पेक्टर अमर चंद को अगवा किया गया और उनकी हत्या कर दी गई।

यही वह अपराध था जिसने मकबूल भट्ट की ‘क्रांतिकारी’ छवि का नकाब उतार दिया। कोई आंदोलनकारी पुलिस अधिकारी को अगवा कर गोली नहीं मारता, यह काम आतंकी करते हैं। इसी हत्या केस में सेशन जज नीलकंठ गंजू ने अगस्त 1968 में मकबूल भट्ट को मौत की सजा सुनाई।

1984 में इस खूनी अध्याय का अंतरराष्ट्रीय चेहरा सामने आया। ब्रिटेन के बर्मिंघम में भारतीय राजनयिक रविंद्र हरेश्वर म्हात्रे का अपहरण किया गया। अपहरणकर्ताओं की माँग थी कि भारत मकबूल भट्ट को छोड़े। यानी एक सजायाफ्ता हत्यारे को बचाने के लिए भारतीय राजनयिक को निशाना बनाया गया। जब भारत झुका नहीं तो म्हात्रे की हत्या कर दी गई।

11 फरवरी 1984 को मकबूल भट्ट को दिल्ली की तिहाड़ जेल में फाँसी दे दी गई। मकबूल भट्ट को रविंद्र म्हात्रे हत्या केस में फाँसी नहीं हुई थी। उसकी फाँसी 1966 के इंस्पेक्टर अमर चंद हत्या केस में मिली सजा के आधार पर हुई थी। ऐसे आतंकी को हीरो बनाकर बच्चों को पढ़ाया जा रहा है।

देश विरोधी अलगाववादी हीरो बना दिए गए हीरो

यह कहानी सिर्फ मकबूल भट्ट पर खत्म नहीं होती है। जम्मू-कश्मीर पीपल्स फोरम (JKPF) की ‘भारत का पैसा भारत के खिलाफ’ रिपोर्ट में बताया गया है कि इस किताब कथित अलगाववादियों का भी महिमामंडन किया गया है।

JKPF की रिपोर्ट कहती है कि किताब में कई अलगाववादी नेताओं का परिचय भी सहानुभूति भरे अंदाज में दिया गया है और कई जगह उनकी बातों को उन्हीं के शब्दों में रखा गया है। ये वे नेता हैं जिन्होंने कश्मीर पर भारत की संप्रभुता को खारिज किया, कश्मीर के पाकिस्तान में विलय की बात की और एक मामले में 2008 के मुंबई आतंकी हमले के मास्टरमाइंड तथा संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित अंतरराष्ट्रीय आतंकी हाफिज सईद की तारीफ भी की।

रिपोर्ट बताती है कि पुस्तक में आतंकवादी मकबूल भट्ट के साथ-साथ मसरत आलम भट्ट, सैयद अली शाह गिलानी, मीरवाइज उमर फारूक और शब्बीर शाह शामिल हैं। ये सभी खुले तौर पर पाकिस्तान का समर्थन करते हैं। मसरत आलम भट्ट, शब्बीर शाह, मीरवाइज उमर फारूक, मीरवाइज मौलवी मोहम्मद फारूक और सैयद अली शाह गिलानी अलगाववादी नेता हैं जिनका नाम गैरकानूनी गतिविधियाँ रोकथाम अधिनियम के मामलों, संगठनों पर प्रतिबंध, उकसावे, हिरासत और प्रवर्तन एजेंसियों की कार्रवाइयों से जुड़ा रहा है।

मसरत आलम

मसरत आलम को लेकर JKPF की रिपोर्ट में लिखा है, “किताब एक अलगाववादी के पाकिस्तान-समर्थक रिकॉर्ड को स्वीकृति-भाव से और बिना किसी खंडन के दोहराती है। उसके अपने शब्दों में ‘मैं बचपन से पत्थर फेंकने वाला हूँ’ और ‘यह हमारी जमीन है…हम इसी मिट्टी के बेटे हैं’।”

वहीं, इसी किताब में यह लिखा है कि आलम ने 2008 मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड हाफिज सईद का समर्थन किया और हिजबुल मुजाहिदीन प्रमुख सैयद सलाहुद्दीन का पक्ष लिया ‘हाफिज सईद का क्या पैगाम…कश्मीर बनेगा पाकिस्तान’ के नारे लगाए थे। 15 अप्रैल 2015 को उसने अलगाववादी सैयद अली शाह गिलानी का स्वागत करने के लिए श्रीनगर की एक रैली में पाकिस्तानी झंडा फहराया था।

मसरत आलम के खिलाफ 8 जिलों में 47 मामले दर्ज है। मसरत एक खुले तौर पर आतंकी रहा है। 1990 में जब जम्मू-कश्मीर के कश्मीर क्षेत्र में आतंकवाद शुरू हुआ, वह आतंकी संगठन हिज्बुल्ला में शामिल हुआ था। उसे 2 अक्टूबर 1990 को बटमालू में गिरफ्तार किया गया, 11 महीने तक हिरासत में रखा गया और फिर रिहा कर दिया गया। अप्रैल 2015 में वह श्रीनगर में पाकिस्तानी झंडा फहराते और पाकिस्तान-समर्थक नारे लगाते पकड़ा गया और 16 अप्रैल 2015 को बडगाम में फिर गिरफ्तार किया गया। वह अब राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) के आतंकी मामले में तिहाड़ जेल में बंद है।

मीरवाइज उमर फारूक

किताब में मीरवाइज उमर फारूक का भी जिक्र है। मीरवाइज उमर फारूक ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉन्फ्रेंस (M) के मुखिया हैं और यह वह साझा संगठन है जिसके संविधान में (गिलानी प्रविष्टि में उद्धृत) कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के ‘जबरन और धोखाधड़ीपूर्ण कब्जे’ के रूप में पेश करने के लिए प्रतिबद्धता जताई गई है।

किताब में लिखा गया है, “उमर फारूक ने कश्मीर के 23 उग्रवादी संगठनों को ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस (एपीएचसी) में एकजुट किया। यह 23 कश्मीरी अलगाववादी पार्टियों का एक ढीला-ढाला समूह था, जो खुद को क्षेत्र में कश्मीरियों की वैध आवाज बताता था और कश्मीर पर होने वाली किसी भी बातचीत में शामिल किए जाने की माँग करता था।”

इसमें आगे लिखा है, “वह यह मानते हैं कि भारत और पाकिस्तान के साथ बातचीत होनी चाहिए, बशर्ते कश्मीरियों की आकांक्षाओं को भी सुना जाए। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस कश्मीर में दक्षिणपंथी ताकतों का प्रतिनिधित्व करती है। युवा, आधुनिक और व्यावहारिक इस्लामी नेता उमर को कई लोग कश्मीर की आखिरी और सबसे बड़ी उम्मीद मानते हैं।”

(फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

कैसे बच्चों तक पहुँची किताबें?

JKPF ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि समग्र शिक्षा निदेशालय के एक आधिकारिक पत्र में दर्ज है कि इस किताब को एक निजी प्रकाशक से खरीदा गया था। इसे ‘विशेषज्ञ समिति द्वारा अनुशंसित’ बताया गया और शिक्षा मंत्रालय की नीति के तहत ‘बच्चों की उम्र के हिसाब से उपयुक्त’ प्रमाणित किया गया।

यानी जिस किताब में भारत को कब्जा करने वाला बताया गया, एक दोषसिद्ध आतंकवादी को शहीद की तरह पेश किया गया और अलगाववादी नेताओं को सम्मानजनक जगह दी गई, उसी किताब को बच्चों के लिए उपयोगी, प्रेरक और उम्र के हिसाब से सही पढ़ाई की श्रेणी में रख दिया गया।

जम्मू-कश्मीर के समग्र शिक्षा निदेशालय ने इन किताबों के लिए 24 फरवरी 2026 को जम्मू के मैसर्स ओबेरॉय बुक सर्विस को आर्डर दिया था। इसमें 550 रुपए मूल्य की इन 123 किताबों को खरीदे जाने का जिक्र है।

किताबें जिला स्तर पर संबंधित मुख्य शिक्षा अधिकारी के कार्यालय में 9 अप्रैल 2026 तक या उससे पहले सप्लाई करने को कहा गया था। यह पत्र समग्र शिक्षा जम्मू-कश्मीर के कोऑर्डिनेटर फाजिल इमरान सिद्दीकी के नाम से है। इनमें से 72 किताबें जम्मू, 15 किताबें रामबन और 36 किताबें उधमपुर भेजी गई थीं।

समग्र शिक्षा निदेशालय का पत्र

प्रशासन ने की क्या कार्रवाई?

सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी में अलगाववाद से जुड़ी विवादित सामग्री वाली किताबें पहुँचने के मामले में सरकार ने बड़ी कार्रवाई की है। स्कूल शिक्षा विभाग ने पहले दोनों किताबों को तत्काल वापस लेने का आदेश दिया और फिर 4 जुलाई 2026 को 8 अधिकारियों-कर्मचारियों को निलंबित कर दिया। यह किताबें समग्र शिक्षा योजना के तहत सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी के लिए खरीदी गई थीं।

जिन लोगों को निलंबित किया गया है उनमें फाजिल इमरान सिद्दीकी, कोऑर्डिनेटर लाइब्रेरी, समग्र शिक्षा; गुरजीत सिंह, असिस्टेंट कोऑर्डिनेटर, समग्र शिक्षा; संजीव शर्मा, प्रिंसिपल, जीएचएसएस कोरे पन्नू, कठुआ; शाजिया कौसर, एकेडमिक ऑफिसर, एससीईआरटी जम्मू; इम्तियाज अहमद मीर, लेक्चरर, बीएचएसएस वाथूरा, बडगाम; निरंजन शर्मा, लेक्चरर, जीएचएसएस बधात, किश्तवाड़; रेणु मेंगी, लेक्चरर, डीआईईटी जम्मू; और राजमोहिनी, लेक्चरर, जीजीएचएसएस पुंछ शामिल हैं।

इन 8 लोगों को किया गया निलंबित

निलंबन की अवधि में ये सभी स्कूल शिक्षा विभाग के प्रशासनिक विभाग से अटैच रहेंगे। इसके अलावा कोऑर्डिनेटर लाइब्रेरी, समग्र शिक्षा की सहायता कर रहे संविदा कंप्यूटर असिस्टेंट शेख सुहेल अहमद को भी तत्काल प्रभाव से हटा दिया गया है।

पहली किताब का नाम ‘पर्सनैलिटीज एंड लीजेंड्स ऑफ जम्मू-कश्मीर’ है जिसे हिलाल अहमद और संतोष मीणा ने लिखा है। इसे जम्मू के ओबेरॉय बुक सर्विस ने प्रकाशित किया था। दूसरी किताब ‘ग्रेट पर्सनैलिटीज ऑफ जम्मू एंड कश्मीर’ है जिसे डॉ. सुशांत गिरि ने लिखा है और दिल्ली के अनुराग प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।

सरकार ने दोनों किताबों को स्कूलों से वापस मँगाने के साथ-साथ इनके लेखकों और प्रकाशकों को जम्मू-कश्मीर में बैन और ब्लैकलिस्ट कर दिया है। आदेश में यह भी कहा गया है कि इन लेखकों या प्रकाशकों की कोई भी प्रकाशित सामग्री जम्मू-कश्मीर से वापस ली जाएगी।

मामले की जाँच के लिए आईएएस अधिकारी अश्विनी कुमार, वित्त आयुक्त/अतिरिक्त मुख्य सचिव, बिजली विकास विभाग को जाँच अधिकारी बनाया गया है। रोहित शर्मा, जेकेएएस, अतिरिक्त सचिव, सामान्य प्रशासन विभाग को इस मामले में प्रेजेंटिंग ऑफिसर नियुक्त किया गया है। जाँच अधिकारी को 30 दिन के भीतर रिपोर्ट सौंपनी होगी।

पंजाब में सत्ता के पीछे भाग रहे कॉन्ग्रेस के कई गुट, चन्नी से लेकर बाजवा-रंधावा सब नाराज: जानिए अमरिंदर राजा वडिंग के खिलाफ बगावत कैसे बनी राहुल गाँधी के लिए सबसे बड़ी चुनौती

हाल के दिनों में पंजाब कॉन्ग्रेस की अंदरूनी कलह खुलकर सामने आ गई है। इसकी सबसे बड़ी वजह पार्टी हाईकमान ने 2027 विधानसभा चुनाव से पहले संगठनात्मक जिम्मेदारियों का बंटवारा किया है, उसे माना जा रहा है। हाईकमान ने प्रदेश अध्यक्ष नहीं बदला। कई नेताओं को उम्मीद थी कि चुनाव से पहले नया चेहरा लाया जाएगा, लेकिन हाईकमान ने अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग पर भरोसा कायम रखा। इससे अलग-अलग गुटों में असंतोष बढ़ गया।

हालाँकि पंजाब कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष वडिंग ने शनिवार (4 जुलाई 2026) को गुटबाजी की बात को पूरी तरह से खारिज करते हुए कहा कि पार्टी की राज्य इकाई में कोई बगावत नहीं हुई है और जल्द ही वरिष्ठ नेता पूरे पंजाब में एक साथ प्रचार करते दिखेंगे। लेकिन ये बयान ही ‘दाल में कुछ काला’ होने के संकेत दे रही है। पार्टी के नेताओं में काफी बेचैनी महसूस की जा रही है, खास कर संगठनात्मक नियुक्तियों और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के समर्थकों की प्रतिक्रिया ने सारी बातें आम कर दी हैं।

अब पार्टी के सामने सवाल यह है कि क्या यह मामला कुछ समय के लिए उठा विवाद है या इसके पीछे कोई गहरी बात है। कहीं पिछले विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी में मची उथल-पुथल की तरह इस बार भी पार्टी बिखर न जाए। पिछली बार तो सत्ता गंवाई थी, इस बार सपने गंवाने पड़ेंगे।

पंजाब में नेताओं की नियुक्ति और प्रतिक्रिया

1 जुलाई 2026 को कॉन्ग्रेस पार्टी हाई कमान ने 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए वडिंग को पंजाब अध्यक्ष और प्रताप सिंह बाजवा को विपक्ष का नेता बनाए रखा। इस दौरान पूर्व सीएम चरणजीत सिंह चन्नी को प्रदेश अध्यक्ष या दूसरी बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी गई, बल्कि उन्हें चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बना दिया गया।

इससे उनके समर्थकों ने चन्नी को दरकिनार किए जाने का संदेश गया। चन्नी एक दलित नेता हैं और राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उन्होंने नियुक्ति किए जाने पर आलाकमान को कोई ‘धन्यवाद’ भी नहीं किया, जो आमतौर पर नेतागण सोशल मीडिया के माध्यम से करते हैं और जनता को मैसेज देते हैं। इससे अटकलें लगने लगीं कि वह नाराज हैं। सुखजिंदर सिंह रंधावा को कोर कमेटी का प्रमुख बनाया गया, लेकिन बताया जा रहा है कि वह भी ‘खुश’ नहीं हैं। प्रताप सिंह बाजवा स्वयं नेता प्रतिपक्ष बने हुए हैं, इसलिए उन्होंने खुलकर विद्रोह नहीं किया। उनका रुख यह है कि संगठन में सभी वरिष्ठ नेताओं को साथ लेकर चलना चाहिए।

हालाँकि बाजवा समर्थकों का मानना है कि चुनावी रणनीति और टिकट वितरण में उनकी भूमिका निर्णायक होनी चाहिए और पार्टी को गुटबाजी से बचना चाहिए। बाजवा फिलहाल सार्वजनिक टकराव से बचते दिख रहे हैं।

चन्नी की नाराजगी पार्टी को पड़ सकती है भारी

पूर्व सीएम चन्नी की नाराजगी से पंजाब कॉन्ग्रेस में टूट का खतरा पैदा हो गया है। बताया जा रहा है कि चन्नी पूर्व सांसद विजयइंदर सिंगला को प्रधान बनाने पर सहमत थे और उस वक्त वह कैंपेन कमेटी का प्रमुख बनने के लिए तैयार थे। लेकिन जब पार्टी आलाकमान सिंगला के नाम पर सहमत नहीं हुई, क्योंकि सिंगला हिन्दू नेता हैं।

इससे पहले भी सुनील जाखड़ को इसलिए कॉन्ग्रेस ने सीएम बनाने से इनकार किया था, क्योंकि वह हिन्दू नेता थे। ऐसी हालत में चन्नी ही एकमात्र दावेदार थे प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी के लिए, लेकिन आलाकमान ने वडिंग बनाए रखा, इससे चन्नी काफी खफा हैं। दरअसल 2027 में अगर कॉन्ग्रेस चुनाव जीतती है तो वड़िंग को मुख्यमंत्री की कुर्सी का अहम दावेदार माना जाएगा। इसके अलावा टिकट बंटवारे में भी प्रदेश अध्यक्ष की ज्यादा चलेगी। चुनाव में जीतने वाले विधायक भी वड़िंग के समर्थक ही ज्यादा होंगे, तो जाहिर है सीएम की कुर्सी के प्रबल दावेदार होंगे।

चन्नी गुट की मोरिंडा स्थित घर पर अहम बैठक हुई

रूपनगर में चन्नी के मोरिंडा स्थित आवास पर शुक्रवार (3 जुलाई 2026) को करीब 50 मौजूदा और पूर्व विधायक और दूसरे नेता जमा हुए। इनमें पूर्व डिप्टी सीएम ओपी सोनी, पूर्व मंत्री भारत भूषण आशु और गुरप्रीत कांगड़, पूर्व सांसद मोहम्मद सादिक और विधायक गुरकीरत सिंह कोटली शामिल थे। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, बैठक में चन्नी ने साफ कहा है कि हम राजा वेड़िंग के अध्यक्ष रहते हुए काम नहीं कर सकते। इस दौरान वहाँ मौजूद नेताओं ने हाथ उठा कर उनका समर्थन किया।

रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के सर्वे रिपोर्ट में चन्नी सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरे। सर्वे में यह भी दावा किया गया कि चन्नी 13 में से 7 लोकसभा सीटों में आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री भगवंत मान से ज्यादा लोकप्रिय हैं। इसको देखते हुए चन्नी को सीएम चेहरा घोषित करने की सिफारिश भी की गई, लेकिन पार्टी आलाकमान ने नहीं माना।

दरअसल आलाकमान को लगा कि इससे सारा पावर चन्नी के हाथों में चला जाएगा, इसलिए हाईकमान ने उन्हें कैंपेन कमेटी का चेयरमैन बनाया। दरअसल पंजाब में हर जिले और कस्बे में पार्टी का गठन किया गया है। इसमें गठन राजा वेड़िंग के नेतृ्त्व में हुई है। ऐसे में ज्यादातर लोग उनके गुट के ही हैं। ऐसे में अगर प्रदेश नेतृत्व में बदलाव होता, तो स्थानीय स्तर पर नाराजगी हो सकती थी।

वड़िंग ने बगावत की बात का खंडन किया

प्रदेश अध्यक्ष वड़िंग ने चन्नी के घर पर हुई बैठक को बगावत मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने पीटीआई से कहा, “कोई बगावत नहीं है।” उन्होंने कहा कि किसी साथी के घर पर नेताओं का मिलना एक आम बात है। उन्होंने कहा कि कुछ लोग मेरे घर पर जमा होंगे, कुछ रंधावा के घर, तो कुछ चन्नी के घर। उन्होंने चन्नी को एक सम्मानित सीनियर नेता और ‘हमारे भाई’ बताया और कहा कि न तो चन्नी और न ही वहाँ मौजूद सीनियर नेताओं ने पार्टी के खिलाफ कुछ कहा।

उन्होंने कहा कि अगर एक-दो लोगों ने ऐसा किया भी, तो उसकी कोई खास अहमियत नहीं है। उन्होंने मतभेद को ‘मनगढ़ंत’ बताते हुए विरोधियों पर आरोप लगाया कि वे एक सामान्य मीटिंग को हाईकमान के लिए चुनौती के तौर पर पेश कर रहे हैं।

इस दौरान वड़िंग ने खुद को CM की रेस से बाहर बताया। उन्होंने कहा, “मैं सिर्फ एक ही दौड़ में शामिल हूँ और वह है कॉन्ग्रेस को सत्ता में लाना।” उन्होंने कहा कि अगर पार्टी चन्नी या किसी और को CM पद का उम्मीदवार या राज्य प्रमुख चुनती है, तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह फैसला राहुल गाँधी और अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को करना है और वह ‘कॉन्ग्रेस के एक अनुशासित सिपाही’ के तौर पर उनके फैसले का समर्थन करेंगे।

अमित शाह से मिले रंधावा

चाहे वड़िंग कुछ भी कहें, लेकिन पार्टी के अंदर बेचैनी साफ दिख रही है और ये बेचैनी सिर्फ चन्नी के खेमे तक ही सीमित नहीं है। गुरदासपुर के सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा और उनके समर्थक नाराज चल रहे हैं। शुक्रवार (3 जुलाई 2026) को दिल्ली में गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की। हालाँकि उन्होंने कहा कि यह बैठक पंजाब में कानून-व्यवस्था के बारे में थी, लेकिन नियुक्तियों को लेकर अपनी नाराजगी का इजहार भी कर दिया।

कॉन्ग्रेस सांसद मनीष तिवारी काफी वक्त से हाशिए पर हैं। उन्हें आगामी विधानसभा चुनाव में कोई भूमिका भी नहीं दी गई है। ऐसे हालात में कॉन्ग्रेस के अंदर घमासान साफ दिख रही है। अब सबका ध्यान इस ओर है कि चुनाव में कॉन्ग्रेस कोई सीएम चेहरा पेश करती है या नहीं। अगर पेश करती है तो कौन होगा कॉन्ग्रेस का सीएम चेहरा?

पार्टी में 2021 जैसी उथल-पुथल मची हुई है। इसका असर यह हुआ कि विधानसभा चुनाव 2022 में पार्टी को सत्ता गँवानी पड़ी। पार्टी मात्र 18 सीटों पर सिमट कर रह गई और आम आदमी पार्टी ने भगवंत मान के नेतृत्व में सत्ता पर काबिज हो गई। अगर कॉन्ग्रेस ने फिर से पार्टी के अंदरुनी कलह रोकने में सफल नहीं हुई, तो कॉन्ग्रेस के लिए पंजाब की सत्ता दूर की कौड़ी साबित होगी।

पार्टी अध्यक्ष वड़िंग भले ही एकजुट होने की बात कह रहे हों, लेकिन चन्नी, रंधावा, बाजवा का गुट आने वाले दिनों में क्या स्टेंड लेते हैं और गाँव-गाँव, शहर-शहर एकसाथ ‘लड़ाई लड़ते’ दिखाई देते हैं या नहीं, इस पर ही पार्टी का सपना टिका हुआ है।

विश्व विजेता अर्जेंटीना को आख़िरी मिनट तक किसने रुलाया?

“अपने हथियार डाल दो, लियोनिडास।” फ़ारस का सम्राट ज़र्क्सीस अपने सामने खड़े स्पार्टा के राजा से कहता है।

लियोनिडास बिना विचलित हुए उसकी ओर देखते हैं। उनके चेहरे पर न भय है, न संशय। फिर वह केवल चार शब्द कहते हैं- “आओ… और उन्हें ले जाओ।”

480 ईसा पूर्व।

पश्चिम की सभ्यता अपने सबसे कठिन इम्तिहान के सामने खड़ी थी।

फ़ारसी साम्राज्य अपने उत्कर्ष पर था। सम्राट ज़र्क्सीस लगभग दो से तीन लाख सैनिकों की विराट सेना लेकर संपूर्ण यूनान को अपने अधीन करने निकल पड़ा था। उसके सामने छोटे-छोटे यूनानी नगर-राज्यों के पास न उतनी सेना थी, न उतने संसाधन और न ही इतना समय कि वे उस महायुद्ध की तैयारी कर सकें, जो उनके अस्तित्व का निर्णय करने वाला था।

ऐसे समय में स्पार्टा का राजा लियोनिडास आगे बढ़ता है।

विजय की आशा लेकर नहीं, बल्कि अपने राष्ट्र के लिए समय खरीदने के संकल्प के साथ।

वह अपने मात्र तीन सौ स्पार्टन योद्धाओं और लगभग सात हजार यूनानी सैनिकों के साथ थर्मोपाइले के उस दुर्गम पहाड़ी दर्रे पर मोर्चा संभाल लेता है, जहाँ संख्या का अहंकार पहली बार भूगोल से टकराने वाला था।

दो दिनों तक यूनानी योद्धा फ़ारसी सेना को वहीं रोके रखते हैं। हर बीतता हुआ क्षण यूनान के लिए अमूल्य था। हर गिरता हुआ योद्धा अपने पीछे अपने राष्ट्र के लिए कुछ और समय छोड़ जाता था।

लेकिन इतिहास केवल वीरों से नहीं, विश्वासघात से भी लिखा जाता है।

एक देशद्रोही फ़ारसी सेना को वह गुप्त पहाड़ी मार्ग बता देता है, जिससे स्पार्टनों को पीछे से घेरा जा सकता था। उसी क्षण लियोनिडास समझ जाते हैं कि अब यह युद्ध जीता नहीं जा सकता।

मगर अभी भी एक विजय शेष थी- कर्तव्य की विजय।

वह अधिकांश यूनानी सैनिकों को तत्काल अपने-अपने नगर लौट जाने का आदेश देते हैं, ताकि आने वाले निर्णायक युद्ध के लिए यूनान जीवित रह सके। स्वयं पीछे हटने से इंकार कर देते हैं।

अपने तीन सौ स्पार्टन योद्धाओं के साथ वे अंतिम सांस तक रणभूमि में डटे रहते हैं। वे जानते थे कि सूर्य का अगला उदय शायद उनके लिए नहीं होगा। फिर भी किसी ने अपने कदम पीछे नहीं खींचे।

उस दिन थर्मोपाइले में तीन सौ मनुष्य मरे थे…

लेकिन अमर हो गया था उनका साहस।

लियोनिडास और उनके तीन सौ स्पार्टन योद्धाओं ने संसार को यह सिखा दिया कि इतिहास केवल विजेताओं का नहीं होता; कभी-कभी इतिहास उन लोगों का भी होता है, जो पराजय निश्चित जानकर भी रणभूमि छोड़ने से इनकार कर देते हैं।

कुछ ऐसा ही दृश्य आज मियामी के हार्ड रॉक स्टेडियम में भी देखने को मिला।

सामने थी विश्व विजेता अर्जेंटीना। दूसरी ओर था छोटा-सा द्वीपीय देश; काबो वर्दे।

परिणाम अंततः अर्जेंटीना के पक्ष में गया, लेकिन उस रात दुनिया ने केवल एक विजेता नहीं देखा। उसने एक ऐसी टीम भी देखी, जिसने अपनी सीमित ताकत के बावजूद विश्व चैंपियन को आख़िरी क्षण तक संघर्ष करने पर मजबूर कर दिया और अपने साहस से इतिहास में अपनी जगह हमेशा के लिए सुरक्षित कर ली।

मियामी में बीती रात सबकी चहेती अंडरडॉग टीम काबो वर्दे का सामना विश्व चैंपियन अर्जेंटीना से था। यह मुकाबला केवल दो टीमों का नहीं था; एक ओर फुटबॉल के महानायक लियोनेल आंद्रेस मेस्सी थे, तो दूसरी ओर काबो वर्दे के अनुभवी गोलकीपर वोजिन्हा, जिन पर आज पूरी दुनिया की निगाहें टिकी थीं।

निर्धारित समय पर रेफरी ड्रू फिशर की सीटी के साथ मुकाबला शुरू होता है। अर्जेंटीना अपनी पारंपरिक अल्बीसेलेस्ते, हल्की नीली और सफेद धारियों वाली जर्सी, पहने मैदान में उतरती है। दूसरी ओर काबो वर्दे की टीम थी, जिसके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं था और पाने के लिए पूरा इतिहास।

सातवें मिनट में मैच का पहला अटैकिंग मूव काबो वर्दे की ओर से आता है। पंद्रहवें मिनट में लियोनेल मेस्सी पहली बार गोल पर निशाना साधते हैं, लेकिन उनका प्रयास लक्ष्य से दूर निकल जाता है।

पहले हाफ के हाइड्रेशन ब्रेक के बाद जैसे ही दोनों टीमें मैदान में लौटती हैं, लियोनेल मेस्सी अपना जादू बिखेर देते हैं। मैदान की हाफ लाइन के पास से डिफेंडर लिसांद्रो मार्टिनेज़ एक लंबा और बेहद सटीक पास डालते हैं। गेंद काबो वर्दे की डिफेंसिव लाइन और गोलकीपर के बीच आकर गिरती है। मेस्सी बिजली जैसी तेजी से गेंद तक पहुंचते हैं, शानदार फर्स्ट टच से उसे अपने नियंत्रण में लेते हैं और गोलकीपर संभल पाते, उससे पहले ही गेंद को नज़दीकी पोस्ट के पास से नेट में भेज देते हैं। अर्जेंटीना मुकाबले में 1-0 की बढ़त बना चुका था। यह ऐसा गोल था जिसे बार-बार देखा जा सकता था।

अधिकांश लोगों को उम्मीद थी कि काबो वर्दे की टीम आज केवल अनुशासित रक्षात्मक फुटबॉल खेलती दिखाई देगी। लेकिन हकीकत बिल्कुल अलग थी। सभी को चौंकाते हुए काबो वर्दे मौका मिलते ही अर्जेंटीना के बॉक्स की ओर तेजी से बढ़ने की कोशिश कर रही थी। अड़तीसवें मिनट में स्टीवन मोरेरा अर्जेंटीना के गोल पर हमला करते हैं, लेकिन उनका शॉट निशाने पर नहीं रहता। पैंतालीसवें मिनट में एंज़ो फर्नांदेज़ एक जोरदार शॉट लगाते हैं, मगर वोजिन्हा शानदार बचाव करते हुए गेंद को गोल में जाने से रोक देते हैं।

कुछ ही क्षण बाद पहले हाफ की समाप्ति की सीटी बजती है। अर्जेंटीना 1-0 की बढ़त के साथ ड्रेसिंग रूम की ओर लौटता है। हालांकि स्कोरबोर्ड अर्जेंटीना के पक्ष में था, लेकिन काबो वर्दे ने यह साफ कर दिया था कि वह केवल मुकाबला खेलने नहीं, बल्कि विश्व चैंपियन को हर गेंद के लिए संघर्ष करने पर मजबूर करने आई है।

दूसरे हाफ की शुरुआत होती है। काबो वर्दे पूरे आत्मविश्वास और अदम्य साहस के साथ मैदान में उतरती है। वह लगातार कभी कॉर्नर तो कभी तेज़ अटैकिंग मूव्स के ज़रिए अर्जेंटीना की रक्षापंक्ति पर दबाव बनाने की कोशिश कर रही थी। चौवनवें मिनट में डिरोए दुआर्ते गोल पर निशाना साधते हैं, लेकिन उनका प्रयास सफल नहीं हो पाता।

मगर केवल पाँच मिनट बाद ही पूरा स्टेडियम स्तब्ध रह जाता है।

मैदान की बाईं ओर से काबो वर्दे के खिलाड़ी रयान मेंडेज़ अर्जेंटीना के बॉक्स में एक शानदार क्रॉस डालते हैं। डिरोए दुआर्ते अपने मार्कर को चकमा देते हुए गेंद तक पहुँचते हैं और बड़ी चपलता से उसे एमिलियानो मार्टिनेज़ के गोल में पहुंचा देते हैं। काबो वर्दे ने मुकाबला 1-1 से बराबर कर दिया था।

यह केवल एक गोल नहीं था। यह उस छोटे से द्वीपीय देश का एलान था कि वह विश्व विजेता के सामने झुकने नहीं आया है।

इस गोल के तुरंत बाद अर्जेंटीना के कोच लियोनेल स्कालोनी सक्रिय हो जाते हैं। वे अब तक अपेक्षाकृत शांत रहे अपने दो अटैकर्स, लाउतारो मार्टिनेज़ और थियागो अल्माडा, को बाहर बुलाकर उनकी जगह हूलियन अल्वारेज़ और नीको गोंज़ालेज़ को मैदान में भेजते हैं।

कुछ ही देर बाद एंज़ो फर्नांदेज़ एक बार फिर दूर से गोल पर निशाना साधते हैं, लेकिन गेंद पोस्ट से काफी दूर निकल जाती है। दूसरी ओर काबो वर्दे के कोच बूबिस्ता भी तुरंत जवाबी रणनीति अपनाते हुए दो नए खिलाड़ियों को मैदान में उतारते हैं।

तिहत्तरवें मिनट में मेस्सी एक शानदार शॉट लगाते हैं, लेकिन वोजिन्हा एक बार फिर दीवार बनकर सामने खड़े हो जाते हैं और गेंद को गोल में जाने से रोक देते हैं।

समय लगातार बीत रहा था।

अस्सी मिनट तक स्कोर 1-1 से बराबर था। अब यह पूरी तरह संभव दिखाई देने लगा था कि मुकाबला अतिरिक्त समय तक जाएगा। अपनी टीम में नई ऊर्जा भरने के लिए बूबिस्ता फिर दो और बदलाव करते हैं। दूसरी ओर छियासीवें मिनट में स्कालोनी भी दो नए खिलाड़ियों को मैदान में उतारते हैं।

अठ्ठासी मिनट का खेल पूरा हो चुका था।

स्कोर अब भी बराबरी पर था।

काबो वर्दे के खिलाड़ी पूरे साहस के साथ डटे हुए थे। अर्जेंटीना के खिलाड़ियों की बेचैनी अब साफ़ दिखाई देने लगी थी। विश्व चैंपियन की हर कोशिश का जवाब काबो वर्दे के खिलाड़ी पूरी ताकत से दे रहे थे। आज इस छोटी-सी टीम ने टूर्नामेंट के सबसे बड़े दावेदारों को खुलकर चुनौती दी थी।

90+5वें मिनट में मेस्सी एक शानदार हेडर लगाते हैं, लेकिन वोजिन्हा फिर एक असाधारण बचाव कर लेते हैं।

90+8 मिनट।

रेफरी ड्रू फिशर अंतिम सीटी बजाते हैं। निर्धारित नब्बे मिनट का खेल समाप्त हो चुका था। स्कोर 1-1 से बराबर था और अब मुकाबला अतिरिक्त समय में प्रवेश कर चुका था।

एक्स्ट्रा टाइम का पहला हाफ शुरू होता है।

दो मिनट के भीतर ही अर्जेंटीना को एक कॉर्नर मिलता है। लियोनेल मेस्सी गेंद लेने आगे आते हैं। उनका कॉर्नर सीधे बॉक्स के भीतर पहुँचता है। एलेक्सिस मैकएलिस्टर गेंद को हेडर से आगे बढ़ाते हैं और लिसांद्रो मार्टिनेज़ उसे बेहद करीब से गोल में पहुंचा देते हैं।

अर्जेंटीना एक बार फिर मुकाबले में बढ़त बना चुका था।

हार्ड रॉक स्टेडियम नीली और सफेद जर्सियों से गूंज उठता है। हजारों अर्जेंटीनी समर्थक राहत की सांस लेते हैं। पूरे स्टेडियम में जश्न का माहौल बन जाता है।

लेकिन काबो वर्दे अब भी हार मानने को तैयार नहीं था।

खेल दोबारा शुरू होता है। काबो वर्दे को भी एक कॉर्नर मिलता है, मगर वे उसका फायदा नहीं उठा पाते। इसके तुरंत बाद स्टीवन मोरेरा गोल की दिशा में एक और शॉट लगाते हैं, लेकिन गेंद लक्ष्य से बाहर निकल जाती है। दूसरी ओर मेस्सी भी तेज़ अटैक के बाद गोल पर निशाना साधते हैं, पर उनका प्रयास भी सफल नहीं होता।

कुछ ही देर बाद हूलियन अल्वारेज़ तेज़ रफ्तार से गेंद लेकर आगे बढ़ते हैं और गोल पर शॉट लगाते हैं, मगर गेंद फिर पोस्ट के बाहर चली जाती है।

इसके बाद अर्जेंटीना लगातार दबाव बनाए रखती है। एक के बाद एक उसे कॉर्नर मिलते रहते हैं और काबो वर्दे की रक्षापंक्ति लगातार परीक्षा देती रहती है।

मगर मैच ने अभी अपना सबसे बड़ा रोमांच दिखाना बाकी रखा था।

102वाँ मिनट।

काबो वर्दे गेंद लेकर अर्जेंटीना के बॉक्स की ओर बढ़ती है। हाफ लाइन से कुछ आगे मैदान के मध्य में मौजूद यानिक सेमेडो एक लंबा पास मैदान की बाईं ओर दौड़ रहे अपने साथी खिलाड़ी सिडनी लोपेज़ काबराल की दिशा में भेजते हैं।

काबराल अपने सामने मौजूद अर्जेंटीनी डिफेंडर को शानदार तरीके से छकाते हैं और बॉक्स की सीमा से ही दाएं पैर से एक जोरदार शॉट लगाते हैं।

एमिलियानो मार्टिनेज़ पूरी ताकत से हवा में छलांग लगाते हैं, लेकिन गेंद उनकी पहुँच से बहुत दूर निकल चुकी थी।

गेंद सीधी नेट में समा जाती है।

काबो वर्दे ने एक बार फिर मुकाबला बराबरी पर ला दिया था।

पूरा स्टेडियम कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध रह जाता है। अर्जेंटीना के खिलाड़ियों के चेहरों पर तनाव साफ़ दिखाई देता है, जबकि काबो वर्दे के खिलाड़ी पूरे जोश के साथ अपने समर्थकों की ओर दौड़ पड़ते हैं। उस क्षण उन्होंने पूरी दुनिया को बता दिया था कि वे अंतिम सांस तक लड़ने वाले हैं।

कोच लियोनेल स्कालोनी तुरंत एक और दांव चलते हैं। वे पेनाल्टी विशेषज्ञ गोंज़ालो मोंटिएल को मैदान में उतारते हैं। मैदान में आते ही मोंटिएल विरोधी गोल की दिशा में तेज़ शॉट लगाते हैं, लेकिन उनका प्रयास भी निशाने से चूक जाता है।

इसके कुछ ही क्षण बाद एक्स्ट्रा टाइम का पहला हाफ समाप्त हो जाता है।

अब केवल पंद्रह मिनट शेष थे।

दूसरे अतिरिक्त हाफ की शुरुआत होती है।

गेंद का अधिकांश समय काबो वर्दे के हाफ में बीत रहा था। अर्जेंटीना लगातार हमले कर रही थी, जबकि काबो वर्दे हर अवसर पर जवाबी हमला करने की कोशिश कर रहा था।

111वाँ मिनट।

अर्जेंटीना को एक और कॉर्नर मिलता है।

मेस्सी गेंद को बॉक्स के भीतर भेजते हैं। क्रिस्टियन रोमेरो ऊँची छलांग लगाकर शानदार हेडर लगाते हैं। गेंद काबो वर्दे के डिफेंडर डाइनी बोर्जेस (Diney Borges) से डिफ्लेक्ट होकर दिशा बदल देती है और गोल में चली जाती है।

आधिकारिक रिकॉर्ड में यह गोल अर्जेंटीना के पक्ष में डाइनी बोर्जेस के ओन गोल के रूप में दर्ज किया गया।

अर्जेंटीना एक बार फिर 3-2 से आगे था।

इसके बाद काबो वर्दे ने हार नहीं मानी। उसने लगातार अर्जेंटीना के गोल पर हमले किए। कुछ क्षणों के लिए विश्व चैंपियन की टीम बैकफुट पर भी दिखाई दी। अंतिम मिनटों तक काबो वर्दे बराबरी की तलाश में पूरी ताकत से लड़ता रहा।

लेकिन 120+4 मिनट पर रेफरी ड्रू फिशर अंतिम सीटी बजा देते हैं।

अर्जेंटीना ने बेहद कठिन संघर्ष के बाद यह मुकाबला 3-2 से अपने नाम कर लिया था।

मैदान में कुल 64,478 दर्शक मौजूद थे, जिन्होंने आज कुछ ऐतिहासिक घटित होते देखा था। छोटे-से द्वीपीय देश काबो वर्दे ने विश्व विजेता अर्जेंटीना को ऐसी टक्कर दी कि एक समय के लिए स्वयं अर्जेंटीनी खिलाड़ियों को भी समझ नहीं आ रहा था कि आखिर मैदान पर हो क्या रहा है। उन्होंने पूरे साहस, अनुशासन और आत्मविश्वास के साथ मुकाबला खेला।

अर्जेंटीना ने पूरे मैच में 62 प्रतिशत समय गेंद पर अपना नियंत्रण बनाए रखा। उसके खिलाड़ियों ने कुल 822 पास पूरे किए और विरोधी गोलपोस्ट की ओर 22 शॉट लगाए, जिनमें से 10 निशाने पर रहे। इतने आक्रामक खेल के बावजूद अर्जेंटीना केवल तीन गोल ही कर सकी। दूसरी ओर मजबूत इरादों के साथ मैदान में उतरी काबो वर्दे ने अर्जेंटीना के गोल पर कुल 15 शॉट लगाए, जिनमें से 5 निशाने पर रहे। यही नहीं, पिछले विश्व कप के गोल्डन ग्लव विजेता गोलकीपर एमिलियानो मार्टिनेज़ के खिलाफ वह दो गोल दागने में भी सफल रही। यह आँकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि काबो वर्दे ने विश्व चैंपियन को आख़िरी क्षण तक संघर्ष करने पर मजबूर कर दिया था।

मैच समाप्त होने के बाद लियोनेल मेसी आगे बढ़कर वोजिन्हा को गले लगाते हैं और उनके शानदार प्रदर्शन की सराहना करते हैं। इसके बाद काबो वर्दे के खिलाड़ियों के आग्रह पर वह एक-एक कर सभी के साथ तस्वीरें भी खिंचवाते हैं। यह दृश्य अपने आप में बेहद भावुक था। जीत अर्जेंटीना की हुई थी, लेकिन सम्मान दोनों टीमों के हिस्से आया।

वोजिन्हा ने आज पूरे मैच में कुल आठ शानदार सेव किए, जिनमें से चार सीधे लियोनेल मेसी के प्रयासों पर थे। उन्होंने इससे पहले स्पेन और उरुग्वे जैसी मजबूत टीमों के खिलाफ भी अपने बेहतरीन प्रदर्शन से सबका ध्यान खींचा था, लेकिन आज उन्हें फुटबॉल के महानतम खिलाड़ियों में से एक के सामने झुकना पड़ा। हार के बावजूद स्टेडियम में मौजूद 64,478 दर्शकों, विशेषकर अर्जेंटीनी समर्थकों, ने काबो वर्दे के खिलाड़ियों के लिए तालियाँ बजाईं। यह पल खेल भावना का एक सुंदर उदाहरण बन गया।

हमने पिछली मैच रिपोर्ट में घाना के स्वयंभू काले जादू के तांत्रिक नाना क्वाकू बोनसाम का जिक्र किया था। उन्होंने दावा किया था कि अर्जेंटीना काबो वर्दे के खिलाफ अपना मुकाबला हार जाएगी। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी कहा था कि लियोनेल मेसी अब इस विश्व कप में कोई और गोल नहीं कर पाएंगे।

लेकिन मैदान पर कहानी बिल्कुल अलग लिखी गई।

मेसी ने न केवल शानदार गोल किया, बल्कि पूरे मुकाबले में अर्जेंटीना के आक्रमण का नेतृत्व किया, कई बेहतरीन मौके बनाए और अपनी टीम को लगातार आगे बढ़ाते रहे। उनके कॉर्नर से दूसरा गोल बना और पूरे मैच के दौरान उन्होंने अर्जेंटीना के हमलों की धुरी की भूमिका निभाई। नाना क्वाकू बोनसाम का दावा मैदान की वास्तविकता के सामने पूरी तरह ध्वस्त हो गया।

इस गोल के साथ लियोनेल मेसी अब विश्व कप के विभिन्न संस्करणों में कुल 20 गोल कर चुके हैं। इसके साथ ही वह विश्व कप इतिहास में लगातार आठ मैचों में गोल करने वाले पहले खिलाड़ी भी बन गए हैं। फुटबॉल के सबसे बड़े मंच पर उन्होंने एक और ऐतिहासिक उपलब्धि अपने नाम दर्ज कर ली।

उधर, राउंड ऑफ 32 के दो अन्य मुकाबले भी खेले गए।

एक ओर मिस्र का सामना ऑस्ट्रेलिया से था। इमाम अशूर के गोल की बदौलत मिस्र ने मैच के तेरहवें मिनट में ही बढ़त बना ली थी। लेकिन दूसरे हाफ में एक आत्मघाती गोल के कारण उसकी बढ़त समाप्त हो गई और मुकाबला 1-1 की बराबरी पर पहुंच गया। निर्धारित समय के बाद भी कोई टीम बढ़त हासिल नहीं कर सकी, जिसके चलते मैच अतिरिक्त समय तक खिंच गया। एक्स्ट्रा टाइम की समाप्ति के बाद भी स्कोर 1-1 ही रहा और आखिरकार मुकाबले का फैसला पेनाल्टी शूटआउट से हुआ। वहां मिस्र ने शानदार प्रदर्शन करते हुए जीत हासिल की और राउंड ऑफ 16 में अपनी जगह पक्की कर ली। दूसरी ओर ऑस्ट्रेलिया भले ही टूर्नामेंट से बाहर हो गया, लेकिन पूरे अभियान के दौरान उसने जिस जुझारू फुटबॉल का प्रदर्शन किया, उसने निश्चित रूप से अपने देशवासियों का दिल जीत लिया। कंगारू टीम सिर ऊँचा करके अपने वतन लौटेगी।

दूसरे मुकाबले में कन्सास सिटी स्टेडियम में कोलंबिया का सामना घाना से हुआ। झॉन आरियास के गोल की बदौलत कोलंबिया ने यह मुकाबला 1-0 से अपने नाम कर लिया और राउंड ऑफ 16 में प्रवेश कर गया। अब सात जुलाई को उसका सामना स्विट्जरलैंड से होगा।

अब आज से विश्व कप के राउंड ऑफ 16 चरण के मुकाबलों का रोमांच शुरू होने जा रहा है।

आज रात भारतीय समयानुसार साढ़े दस बजे कनाडा अपने घरेलू समर्थकों के बीच एटलस लायंस यानी मोरक्को का सामना करेगी। कागज़ों पर मोरक्को इस मुकाबले की प्रबल दावेदार जरूर है, लेकिन कनाडा ने भी अब तक अपने प्रदर्शन से सभी को प्रभावित किया है। आज उसकी अब तक की सबसे कठिन परीक्षा होगी।

इसके बाद रात ढाई बजे लेस ब्ल्यूज़ यानी फ्रांस का सामना पराग्वे से होगा। आज के मुकाबले में गोल करने के बाद लियोनेल मेसी टूर्नामेंट में अपने गोलों की संख्या सात तक पहुंचा चुके हैं। ऐसे में कीलिएन एमबाप्पे निश्चित ही गोल्डन बूट की दौड़ में उनसे पीछे नहीं रहना चाहेंगे। एक ओर फ्रांस का विस्फोटक आक्रमण होगा, तो दूसरी ओर पराग्वे की दृढ़ रक्षापंक्ति। यह मुकाबला भी बेहद दिलचस्प रहने की पूरी उम्मीद है।

तो फिलहाल अगली मैच रिपोर्ट तक के लिए अनुमति दीजिए। फुटबॉल का महासमर पूरे रोमांच पर है। साथ बने रहिएगा।