बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के नतीजे सामने आ चुके हैं। चुनाव में जनसुराज प्रत्याशी प्रशांत किशोर ने 19246 वोटों से जीत हासिल की है। उन्हें 63946 वोट मिले हैं। दूसरे नंबर पर भाजपा के नीरज सिन्हा को 44700 वोट मिले हैं, जबकि राजद के उम्मीदवार को 14241 वोट मिले हैं।
लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी के इस मजबूत गढ़ में जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने बाजी मारकर हर किसी को चौंका दिया है। हालाँकि इस चुनावी नतीजे को समझने के लिए राजनीतिक चश्मे से परे जाकर उन बारीकियों को देखना होगा, जिन्होंने इस परिणाम की पटकथा लिखी।
पिछले चुनावों के बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी EVM पर ठीकरा फोड़ने या चुनावी प्रक्रिया पर बेबुनियाद सवाल उठाने की जो राजनीति देखने को मिलती रही है, इस बार प्रशांत किशोर ने उससे पूरी तरह किनारा कर लिया।
जब कोई नेता निराधार आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति को छोड़कर जनता के वास्तविक मुद्दों पर केंद्रित होता है, तो मतदाता उसे गंभीरता से लेते हैं। बांकीपुर में प्रशांत किशोर की यह जीत इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र में चुनाव सहानुभूति, नारों या खोखले आरोपों से नहीं, बल्कि सही रणनीतिक दृष्टिकोण और ठोस धरातलीय मुद्दों के आधार पर ही जीते जाते हैं।
बेबुनियाद बयानबाजी से किनारा और परिपक्व राजनीति का संदेश
अगर हम पिछले चुनावों की बात करें तो कई मौकों पर चुनाव हारने के बाद कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी और आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल में EVM में खराबी, चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाने या प्रशासन पर आरोप लगाने की एक होड़ सी मच जाती है।
प्रशांत किशोर का भी यहीं रवैया था कि वे राहुल गाँधी या अरविंद केजरीवाल की तरह प्रक्रियात्मक खामियों का रोना रोते थे। हालाँकि इस बार बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर के रुख में एक बड़ा रणनीतिक और व्यावहारिक बदलाव देखने को मिला। उन्होंने केंद्र सरकार या चुनाव प्रणाली पर बिना साक्ष्य के आरोप लगाने की राजनीति को पूरी तरह से त्याग दिया।
उन्होंने यह स्वीकार किया और अपनी रणनीति में ढाला कि चुनाव केवल और केवल जनता के बीच जाकर उनके मन की बात समझने और उनके लिए काम करने से ही जीते जा सकते हैं। इस बार उन्होंने किसी भी प्रकार की नकारात्मक बयानबाजी या गैर-जरूरी राजनीतिक प्रपंच में समय गंवाने के बजाय अपना पूरा ध्यान जनता के बीच अपनी पैठ बनाने पर लगाया।
जब एक राजनेता अपनी पुरानी गलतियों से सीखकर जनता के सामने एक परिपक्व और गंभीर विकल्प के रूप में पेश होता है, तो मतदाता भी उस पर भरोसा जताने में संकोच नहीं करते।
जनभावना का मिजाज और स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित अभियान
बांकीपुर में प्रशांत किशोर की जीत का एक प्रमुख पहलू यह भी रहा कि उन्होंने क्षेत्र के स्थानीय असंतोष और जनता के मिजाज को बहुत बारीकी से भाँपा और उसे ही मुद्दा बनाया।
इसके अलावा NEET परीक्षा के पेपर लीक प्रकरण जैसे संवेदनशील विषयों और भोजपुर के चर्चित भरत तिवारी एनकाउंटर मामले जैसे स्थानीय प्रशासनिक व पुलिसिया कार्रवाई के मुद्दों को लेकर युवाओं व सवर्ण समाज के एक वर्ग के मन में एक प्रकार की चिंता और नाराजगी देखने को मिल रही थी।
प्रशांत किशोर ने इन मुद्दों को किसी उग्र राजनीतिक हमले के रूप में इस्तेमाल करने के बजाय एक जिम्मेदार नागरिक मंच के रूप में उठाया। उन्होंने शिक्षा, रोजगार, स्थानीय नागरिक सुविधाओं और प्रशासनिक पारदर्शिता जैसे जमीनी विषयों को अपने अभियान का मुख्य आधार बनाया।
उन्होंने जनता को यह विश्वास दिलाया कि वे केवल सत्ता पाने के लिए राजनीति में नहीं आए हैं, बल्कि इन बुनियादी समस्याओं का समाधान निकालने के लिए प्रतिबद्ध हैं। जनता के दिल को छूने वाले इन मुद्दों ने उनके पक्ष में माहौल बनाने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भाजपा का गढ़ और सामाजिक समीकरणों में बदलाव
बांकीपुर को पारंपरिक रूप से भारतीय जनता पार्टी का एक अत्यंत सुरक्षित और अभेद्य दुर्ग माना जाता रहा है। कई बार से लगातार जीत दर्ज करने के कारण इस सीट पर भाजपा की पकड़ बहुत मजबूत थी। लेकिन इस बार जब उपचुनाव की नौबत आई, तो पार्टी के लिए अपने पारंपरिक मतदाता आधार को पूरी तरह से एकजुट रखना एक चुनौती साबित हुआ।
प्रशांत किशोर ने अपनी विस्तृत रणनीति के तहत हर मोहल्ले और वार्ड स्तर पर जाकर छोटी-छोटी बैठकें कीं और लोगों से सीधा संवाद स्थापित किया। इसके परिणामस्वरूप भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में हल्की बिखराव की स्थिति देखने को मिली, जहाँ कुछ वर्गों ने बदलाव के नाम पर प्रशांत किशोर का रुख किया।
विपक्षी दलों के समर्थक मतदाताओं के एक बड़े हिस्से को भी प्रशांत किशोर में एक मजबूत और प्रभावी विकल्प दिखाई दिया। प्रशांत किशोर ने किसी जातिगत या धार्मिक ध्रुवीकरण का सहारा लिए बिना सभी वर्गों को साधने की कोशिश की, जिससे बांकीपुर का पारंपरिक सामाजिक और राजनीतिक गणित पूरी तरह बदल गया और उनके लिए जीत का मार्ग प्रशस्त हुआ।
यह चुनाव इस बात को साबित करता है कि जनता अब केवल सरकार-विरोधी नारों या चुनावों पर सवाल उठाने वाली राजनीति को पसंद नहीं करती। जब तक कोई दल या नेता धरातल पर उतरकर कड़ी मेहनत नहीं करता और जनता के वास्तविक सरोकारों को अपनी प्राथमिकता नहीं बनाता, तब तक चुनावी सफलता हासिल करना संभव नहीं है।
इस जीत के बाद निश्चित तौर पर प्रशांत किशोर का राजनीतिक कद बढ़ा है, लेकिन उनके सामने असली चुनौती अब इस जनसमर्थन को बनाए रखने और अपने वादों को धरातल पर उतारने की होगी, क्योंकि जनता ने उन्हें आरोपों की राजनीति छोड़कर सकारात्मक काम करने के आधार पर ही यह मौका दिया है।
देश की स्थापित संवैधानिक व्यवस्था, लोकतांत्रिक संस्थाओं, प्रधानमंत्री के साथ-साथ केंद्रीय मंत्रियों और सर्वोच्च न्यायपालिका पर लगातार अमर्यादित और अनर्गल बयानबाजी करने वाले एडवोकेट महमूद प्राचा ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जल्दी ही जेल जाएँगे और उनके चक्की पीसने की लाइव स्ट्रीमिंग होगी।
‘हिंद संवाद विथ ज्योति’ नामक यूट्यूब चैनल को दिए गए अपने इंटरव्यू में महमूद प्राचा ने न केवल देश के शीर्ष नेतृत्व और कार्यपालिका पर निराधार हमले बोले, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के हर एक मजबूत स्तंभ, चाहे वह संसद हो, निर्वाचन आयोग हो, न्यायपालिका हो या फिर मीडिया सबकी निष्पक्षता को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की।
प्राचा का अतीत गंभीर कानूनी विवादों से भरा रहा है। देशद्रोही गतिविधियों में शामिल दंगाइयों व आतंकवादियों की कोर्ट में पैरवी करने, जाली दस्तावेजों के दम पर कोर्ट को गुमराह करने, विभिन्न न्यायिक पीठों से कड़ी फटकार व भारी जुर्माना झेलने और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की जाँच में अड़ंगा डालने की उसकी पुरानी और स्थापित आपराधिक कार्यशैली रही है।
केवल समाज में सनसनी फैलाने, साम्प्रदायिक कार्ड खेलकर लोगों को भड़काने और अपना विशिष्ट राजनीतिक व वैचारिक एजेंडा साधने के लिए प्राचा जिस तरह की उग्र और अमर्यादित बयानबाजी मीडिया के सामने कर रहा है, वह उसके सालों पुराने प्रोपेगंडा, कानूनी पैंतरेबाजी और सोची-समझी रणनीति का ही एक निरंतर विस्तार नजर आती है।
सारी उमर मोदी और शाह जी को जेल में रहना होगा: प्राचा ने दिए विवादित बयान
यूट्यूब वीडियो के अलावा पहले खुद को पत्रकार कहने वाली ज्योति यादव की फेसबुक रील में विपक्षियों द्वारा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की माँग पर प्राचा ने कहा, “इस्तीफा देने के तुंरत बाद तिहाड़ जेल भी जाना पड़ेगा और वहाँ फिर अपनी सारी उमर रहना पड़ेगा।”
उसने कहा कि शाह के पीछे-पीछे फिर मोदी जी भी आएँगे। इस्तीफा हो जाएगा और अगले ही पल वो गिरफ्तार भी हो जाएँगे। इतना ही नहीं प्राचा ने कहा कि फिर वो BJP और RSS के जितने लोग हैं वो उसके खिलाफ ला कर इसे सबूत भी देंगे।
उसने कहा, “सारी उमर अमित शाह जी और मोदी जी को जेल में रहना है और इसीलिए हम इनकी सौ साल की उमर की दुआ माँगते हैं और फिर इन्हें रोज कम से कम 3 से 4 घंटे चक्की पीसनी है, जो कि लाइव स्ट्रीम होगी ताकि आने वाला कोई भी प्रधानमंत्री या गृहमंत्री-संत्री ये याद रखे कि जब मोदी जी डेली चार घंटे चक्की पीस रहे हैं और देखेगी सारी दुनिया तो हमे कोई भी गलत काम नहीं करना है ये बात तय है।”
प्राचा की अनर्गल बातें यहीं नहीं रुकी, उसने आगे कहा, “इनके जेल जाने की मुख्य वजह गिनाउँगा तो एक साल लग जाएगा। एपस्टीन मानसिकता का ऐसा कोई काम नहीं जो मोदी जी ने शाह जी ने नहीं किया हो। देश को लूटा है, देश की बच्चियों को लूटा है, देश को बेच दिया।”
अंबानी, अडानी चीन, पाकिस्तान का नाम लेते बेबुनियाद आरोप लगा रहे प्राचा ने कहा कि इनलोगों ने 2 करोड़ नैकरियाँ छीन ली और भारत की आर्मी को कमजोर कर दिया।
गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ बेबुनियाद बातें
‘हिंद संवाद विथ ज्योति’ को दिए इंटरव्यू में महमूद प्राचा ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें किसी भी कीमत पर संवैधानिक पदों पर बने रहने का कोई नैतिक या कानूनी हक नहीं है और उन्हें तुरंत उनके पदों से हटाकर सीधे जेल की सलाखों के पीछे भेजा जाना चाहिए।
किसी भी निष्पक्ष कानूनी जाँच, पुलिस आरोप-पत्र या अदालत के सजा के आदेश के बिना ही खुद जज की भूमिका में आते हुए प्राचा ने साफ दावा किया कि देश में सत्ता परिवर्तन होते ही गृह मंत्री को उम्रकैद की सजा मिलना बिल्कुल तय और अनिवार्य है।
वीडियो की शुरूआत में एंकर कॉकरोच जनता पार्टी और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की माँग को बताते हुए पूछती है, “प्राचा साहब सबसे पहले तो यही कि अमित शाह के इस्तीफे की माँग की जा रही है, सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दाखिल की गई है। इस पूरी माँग को और इस पिटीशन को आप किस तरीके से देख रहे हैं?”
इस पर प्राचा ने कहा, “अमित शाह साहब का इस्तीफा मुद्दा नहीं है, मुद्दा ये है कि अमित शाह साहब को जेल जाने का रास्ता जो है वो ईमानदारी से जनता के वोटों से सरकार जो चुन के आएगी मोदी जी और अमित शाह जी को जेल भेजेगी और वे फिर कभी वापस नहीं आने वाले तब तो वैसे ही उनकी उम्र कैद की सजा तो पक्की है।”
उसने आगे कहा, “दोनों ही सूरतों में उन्हें जेल जाना वाजिब है लाजमी है 250 लाख करोड़ जो ईमानदारी से मोदी जी के साथ मिलके कमाए उसको सेट करने में किस-किस जगह कौन सा आइलैंड खरीदना है किस कंट्री में कौन सी बैंक खोलना है यह सब में काम करें होम मिनिस्टर के पद के पास भी उन्हें आने नहीं देना चाहिए।”
प्राचा ने कहा, “हालाँकि इस्तीफे से ज्यादा कुछ होता नहीं, बहुत सारे जजेस और जो ये धर्मेंद्र प्रधान जी का भी इस्तीफा हुआ है। इनको एक प्रकार से अपने अपराधों से निकल भागने का मौका मिलता है। लेकिन अमित शाह साहब का इस्तीफा बहुत महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि अगर उनका इस्तीफा होता है तो वो समझिए आप पूरी सरकार का इस्तीफा हो गया।”
PM मोदी की दिनचर्या पर अमर्यादित टिप्पणी
गृह मंत्री पर अनर्गल वित्तीय आरोप लगाने के साथ-साथ, प्राचा ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दैनिक प्रशासनिक कार्यकलापों, सुरक्षा व्यवस्था और दिनचर्या पर भी बकवास की।
प्राचा ने कहा, “मोदी जी तो 18 घंटे आप लोगों को पता ही है काम करते हैं। काम मतलब, दो-ती घंटे मेकअप, दो-ती घंटे इधर-उधर घूमना, कपड़े दो-ती घंटे, फिर कैमरा फिट करना, फिर किस-किस से मिलके इधर-उधर की बातें करना दुनिया भर की और म्यूजिक सुनना वगैरह-वगैरह 6 घंटे वो सोते हैं। तो 18 और छह मतलब पूरे हो गए।”
अपनी बकवास आगे बढ़ाते हुए प्राचा ने कहा, “उसमें कोई भी प्रधानमंत्री के कार्यालय का या किसी भी मंत्रालय का कार्य नहीं होता। उनका काम तो यही काम है जो मैंने आपको बताया अभी। हम और एसपीजी वाले परेशान रहते हैं उनसे।”
एक अधिवक्ता होने के नाते कानून, साक्ष्यों और अदालती मर्यादा से भली-भाँति परिचित होने के बावजूद, बिना किसी प्रमाण के इस तरह के मनगढ़ंत वित्तीय आँकड़े (250 लाख करोड़ रुपए) गढ़ना, काल्पनिक आइलैंड खरीदने और विदेशी बैंकों में बेनामी खाते खोलने की फर्जी कहानियाँ बुनना महमूद प्राचा की उसी पुरानी रणनीति का हिस्सा है।
वह अक्सर ऐसे भ्रामक बयान देकर अपने ऊपर चल रहे गंभीर मुकदमों और अदालती कार्रवाइयों से आम जनता और मीडिया का ध्यान भटकाने का निष्फल प्रयास करता है।
मोदी जी और इस सरकार के सभी मंत्रियों के खिलाफ इतने सबूत देंगे, सबका इस्तीफा वैसे ही हो जाएगा
इंटरव्यू में प्राचा ने आगे कहा, “मैं बार-बार बोलता हूँ अमित शाह जी और मोदी जी का जो क्रिमिनल गैंग है एपस्टीन मानसिकता का क्रिमिनल गैंग है उसके फलक्रम यानी कि केंद्र बिंदु यानी कि उसकी सारी गतिविधियाँ चलाने वाले मिस्टर अमित शाह साहब हैं। तो अगर अमित शाह साहब का इस्तीफा माँगा भी जाएगा तो यह सरकार जो है डगमगाने लगेगी।”
प्राचा ने आगे कहा, “यह सबसे महत्वपूर्ण बात है और अगर कहीं इस्तीफा हो गया तो अमित शाह साहब घंटों के अंदर दिनों के अंदर नहीं हम जैसे लोगों को मोदी जी के खिलाफ और इस सरकार के सभी मंत्री, संत्री और चीफ मिनिस्टर जितने बड़े-बड़े हैं सबके खिलाफ इतने सबूत लाके हम जैसे लोगों के हाथ में दे देंगे कि बाकी सबका इस्तीफा तो वैसे ही हो जाएगा। बाकी सब भी जेल चले जाएँगे।”
उसने कहा, “अमित शाह साहब का इस्तीफा माँगा जाएगा तो यह सरकार हिलेगी तब हिलेगी और यह अच्छी डिमांड है। जो लोगों ने भी प्रोटेस्ट आज किया उनको बहुत-बहुत मुबारकबाद पेश करता हूँ और वही गारंटी जो उनके लिए थी वो जनता के लिए है। पुलिस का कोई भी अधिकारी भ्रष्टाचार भ्रष्टाचारी पुलिस का अधिकारी आपको तंग करेगा पीसफुल प्रोटेस्ट में तो हम लोग पूरी ताकत से आपके साथ हैं। बिल्कुल नहीं घबराना है। यह जिम्मेदारी हमारी है।”
उसने कहा, “अगर कोई भ्रष्ट पुलिस का अधिकारी जो कि अपराधी होता है अमित शाह जी के डायरेक्ट कहने पर उनके अलावा कोई कुछ नहीं कर सकता है तो हम आप लोगों की हिफाजत के लिए आएँगे भी और अमित शाह साहब के खिलाफ FIR तो हमने करानी है वो तो सब आपको पता ही है।”
सुप्रीम कोर्ट, वकीलों और RSS की मिलीभगत का आरोप
इंटरव्यू के दौरान जब एंकर ने सुरक्षा बलों द्वारा पैलेट गन के इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल पूछा, तो प्राचा ने सुप्रीम कोर्ट जाने वाले वकीलों और खुद न्यायपालिका पर ही सवाल उठा दिए। उसने दावा किया कि ये याचिकाएँ जानबूझकर सुप्रीम कोर्ट से ऐसा फैसला लेने के लिए डाली जाती हैं और इसमें वकीलों और RSS की मिलीभगत होती है।
प्राचा ने कहा, “फिर एक बार वही हुआ है जो मैं हमेशा बोलता हूँ पहली बात सुप्रीम कोर्ट नहीं जाना चाहिए। RSS के जितने भी स्पीकर्स हैं वो बोल रहे होंगे सुप्रीम कोर्ट ने ठप्पा लगा दिया पैलेट गन के इस्तेमाल पे। अब यह मौका देने के लिए ही यह पिटीशंस डाली जाती हैं ये लोग सब मिले हुए लोग हैं।”
उसने यह बेतुका तर्क भी दिया कि यदि कोई सच्चा वकील बहस करता तो सुप्रीम कोर्ट को याचिका खारिज करने के बजाय गृह मंत्री के खिलाफ तत्काल FIR दर्ज कर दुनिया भर में लाइव स्ट्रीमिंग करानी चाहिए थी। जब भी अदालतें प्राचा के मनमुताबिक आदेश नहीं देतीं, वह पूरी न्यायप्रणाली को ही पक्षपाती बताने लगता है।
मोदी को चाय बनाने भी नहीं आती वो तो किसी लायक नहीं: प्राचा
इंटरव्यू के दौरान प्राचा ने कहा, “RSS और BJP ने जो एग्जांपल सेट किया है ना मोदी जी के रूप में कि मैं नॉन बायोलॉजिकल हूँ। मतलब इस पोस्ट पे आ गया हूँ। वैसे तो उनको चाय बनानी भी नहीं आती होगी। ये मेरी गारंटी है। वो किसी लायक नहीं है। दुनिया में किसी लायक नहीं है। झूठ बोलने के अलावा वो और कपड़े अब तो बहुत सारे लोग उनके सलाहकार हैं।”
उसने कहा, “कपड़े भी कब से अच्छे हुए हैं जब से वो प्रधानमंत्री बने हैं। मेकअप भी कब से अच्छा हुआ है जब से वो प्रधानमंत्री बने। तो ये सब चीजें तो उन्हें इस चेयर पे बैठ के मिली है ना। लेकिन वो अपने आप को बड़ा आदमी दिखाने लगे। मतलब झूठी-झूठी तारीफें, बड़े-बड़े जो एक्टर्स हैं उनको प्यार मोहब्बत से बिना कुछ मारे पीटे, हम उनके मन के मुँह मुताबिक आम वाले सवाल पूछवा लिए। वाह मोदी जी करवा लिया।”
प्राचा ने देश की मुख्यधारा की मीडिया, पत्रकारों, न्यूज एंकरों और संपादकों को ‘क्रिमिनल जर्नलिस्ट’ करार देते हुए यह गंभीर आरोप लगाया कि वे केवल सरकार की झूठी तारीफें करते हैं और प्रधानमंत्री से उनके मनमुताबिक चाटुकारिता भरे सवाल पूछते हैं।
मीडिया पर सवाल उठाते हुए प्राचा ने कहा, “जितने ये क्रिमिनल जो जर्नलिस्ट अपने आप को प्रोजेक्ट करते हैं उन सब ने वाह वाह क्या गाने सुनाए, किसी ने कुछ सुनाए तो ये हर देश के नागरिकों के नौकर का दिमाग में कुछ वो ट्रेंड सा बन गया। तो हर एक कांस्टेबल भी ऐसे बिहेव कर रहा है। अब तो आप देखो किस तरीके से बच्चों को मारपीट कर रहे थे। तो एक वो माहौल सा बन गया।”
उसने कहा, उस माहौल की रॉ में बहुत सारे लोगों ने बहुत सारी बातें ऐसी कही है जो नॉर्मल हालात होते अगर मोदी जी प्रधानमंत्री ना होते, अमित शाह साहब यह होम मिनिस्टर ना होते तो किसी के मन में ऐसे विचार ही नहीं आते थे। अब तो एक माहौल सा बना हुआ है तो किसी के मुंह से भी बहुत सारी ऐसी बातें निकल जाती हैं जो कि वो आमतौर पे नहीं बोलता। लेकिन वो नफरत और गुस्सा था ना वो तो एक एक सुराग ढूँढ रहा था। वो सुराग फूटा है कॉकरोच जनता पार्टी के रूप में जो उसे मिल गया, लेकिन गलती RSS और BJP की, मोदी जी और अमित शाह साहब की है।”
चुनावी प्रणाली और EVM पर सवाल उठाकर लोकतंत्र का अपमान
देश की विभिन्न कोर्ट में लगातार कानूनी झटके खाने, अपनी जनहित याचिकाओं को खारिज होते देखने और कानूनी दलीलों के ध्वस्त होने के बाद, महमूद प्राचा का मुख्य निशाना भारत की स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय चुनावी प्रक्रिया पर भी रहा है।
इंटरव्यू के दौरान उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक्स वोटिंग मशीन (EVM) को पूरी तरह हटाने और पुरानी पेपर बैलेट (कागजी मतपत्र) व्यवस्था को वापस लाने का अपना पुराना और घिसा-पिटा राग अलापते हुए चुनावी सुधारों के नाम पर जनता के बीच भारी भ्रम और अविश्वास फैलाने की पूरी कोशिश की।
प्राचा ने कहा, “पार्लियामेंट में जो असली मुद्दा है ना EVM हटाओ बैलेट पेपर वापस लाओ तो EVM का आंदोलन जब तक नहीं होगा पेपर बैलेट वापस आएँगे नहीं तो वो इलेक्ट्रोरल रिफॉर्म्स की शुरुआत ही नहीं होगी।”
भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा बार-बार EVM की तकनीकी निष्पक्षता और हैक-प्रूफ होने को सिद्ध किए जाने, सर्वदलीय हैकाथॉन में किसी भी राजनीतिक दल द्वारा EVM में कोई भी गड़बड़ी साबित न कर पाने और देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा VVPAT तथा EVM की विश्वसनीयता पर बार-बार ऐतिहासिक मुहर लगाए जाने के बावजूद, प्राचा जैसे लोग लगातार भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख पर हमला करने और देश के जनमत को नीचा दिखाने की अपनी सनक का ही प्रदर्शन करते रहते हैं।
कौन है महमूद प्राचा: दंगाइयों और आतंकियों के मुकदमों का इतिहास
महमूद प्राचा का अतीत हमेशा से ही असामाजिक तत्वों, देशविरोधी गतिविधियों के आरोपितों, खूंखार आतंकवादियों और दंगाइयों को कानूनी ढाल और वैचारिक कवर प्रदान करने का रहा है। प्राचा वही व्यक्ति है जिसने साल 2012 में नई दिल्ली स्थित इजरायली दूतावास की कार में हुए भयंकर बम विस्फोट मामले के मुख्य आरोपित सैयद मोहम्मद अहमद काजमी का अदालत में कानूनी बचाव किया था।
इसके अलावा प्राचा ने पाकिस्तान समर्थित कुख्यात आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के खूंखार आतंकी अब्दुल करीम टुंडा का मुकदमा भी अदालत में वकील के रूप में संभाला था। नागरिकता संशोधन कानून (CAA) विरोधी हिंसक प्रदर्शनों और फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए सुनियोजित हिंदू विरोधी दंगों के दौरान भी प्राचा की भूमिका बेहद संदिग्ध और विवादित रही थी।
उसने दंगों के मुख्य साजिशकर्ताओं, उपद्रवियों और हिंसा के आरोपितों को जेल जाने और कानूनी सजा से बचाने के लिए अदालती दाँव-पेच का जमकर इस्तेमाल किया।
प्राचा का मुख्य काम केवल अदालत के भीतर तकनीकी अड़ंगे पैदा करना ही नहीं था, बल्कि सोशल मीडिया और प्रेस बाइट्स के माध्यम से इस्लामी प्रोपेगंडा को हवा देना और दंगों के मुख्य मास्टरमाइंड्स के बचाव में पूरी तरह से काल्पनिक, झूठी और विक्टिम-कार्ड वाली कहानियाँ गढ़ना रहा है।
जाली दस्तावेजों और मृत वकील के फर्जी दस्तखत का गंभीर आपराधिक आरोप
महमूद प्राचा पर केवल विवादित तत्वों या दंगाइयों का केस लड़ने का ही नैतिक आरोप नहीं है, बल्कि दिल्ली दंगों के मुकदमों में फर्जी सबूत गढ़ने और जाली हलफनामे (Affidavits) तैयार कराने का बेहद गंभीर आपराधिक आरोप भी दर्ज है।
दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट के सख्त आदेश पर जब दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने इन संगीन आरोपों की जाँच शुरू की, तो एक बेहद सनसनीखेज और चौंकाने वाला सच सामने आया। प्राचा ने कोर्ट में एक ऐसा कानूनी शपथ पत्र दाखिल किया था, जिस पर एक ऐसे अधिवक्ता के साइन किए गए थे जिनकी मृत्यु उस घटना से करीब तीन साल पहले ही हो चुकी थी।
एक मृत व्यक्ति के नाम पर जाली दस्तखत बनाकर कोर्ट की आँखों में धूल झोंकने, झूठे साक्ष्य गढ़ने और पूरी कानूनी व न्यायिक प्रक्रिया के साथ धोखाधड़ी करने के इसी गंभीर आपराधिक मामले में दिल्ली पुलिस की टीम ने प्राचा के निजामुद्दीन स्थित कार्यालय पर अदालत द्वारा जारी सर्च वारंट के तहत छापेमारी की कार्रवाई की थी।
विक्टिम कार्ड खेलकर जाँच भटकाने की सुनियोजित रणनीति
कार्यालय पर छापेमारी के दौरान जब पुलिस टीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशानुसार फोरेंसिक साक्ष्य, कंप्यूटर की हार्ड डिस्क और संबंधित दस्तावेज जब्त करने पहुँची, तो प्राचा ने कानून का पालन करने वाले अधिवक्ता की तरह जाँच में सहयोग करने के बजाय तुरंत ‘विक्टिम कार्ड’ खेलना शुरू कर दिया।
उसने इस गंभीर आपराधिक जाँच को पूरे वकील समुदाय, न्यायशास्त्र और बार एसोसिएशन पर हमला बताकर इसे राजनीतिक रंग देने की भरसक कोशिश की। उसने प्रशांत भूषण जैसे अन्य विवादित वकीलों को अपने साथ जोड़कर आनन-फानन में प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की और खुद को राज्यसत्ता द्वारा संस्थागत उत्पीड़न का शिकार दिखाने का पूरा ड्रामा रचा।
हालाँकि पुलिस ने यह पूरी तरह साफ कर दिया कि यह कार्रवाई किसी वकील के स्वतंत्र पेशे, स्वायत्तता या अधिकारों पर हमला नहीं थी, बल्कि जाली दस्तावेज तैयार करने और मृत व्यक्ति के फर्जी दस्तखत बनाने जैसे संगीन अपराधों में अदालत के वैधानिक आदेश पर की गई एक निष्पक्ष फोरेंसिक जाँच थी।
मस्जिदों में बंदूकें चलाने और हथियार ट्रेनिंग की विवादित पैरवी
महमूद प्राचा का सबसे खतरनाक, उग्र और समाज में साम्प्रदायिक वैमनस्य फैलाने वाला रुख तब सामने आया था जब उसने अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (SC/ST) और मुस्लिम समुदाय के लोगों को बड़े पैमाने पर लाइसेंसी हथियार (बंदूकें) बाँटने और उन्हें चलाने की ट्रेनिंग देने का सार्वजनिक ऐलान किया था।
प्राचा ने खुलेआम मीडिया के सामने यह विवादित पैरवी की थी कि इस तरह के हथियार प्रशिक्षण शिविर आयोजित करने और बंदूक के लाइसेंस के आवेदन पत्र भरने के लिए मस्जिदों और मदरसों के परिसरों का आधिकारिक रूप से इस्तेमाल किया जाएगा।
उसने मुस्लिमों को यहाँ तक सलाह दी थी कि भले ही उनकी संपत्ति बिक जाए, वो बन्दूक जरूर रखें। उसने विभिन्न मस्जिदों में मुस्लिमों को बंदूक चलाने की ट्रेनिंग देने के लिए कैंप लगाने की भी वकालत की थी। मस्जिदों में मार्शल आर्ट्स से लेकर हर फिजिकल ट्रेनिंग की बात करते हुए कहा था कि आज देश के SC/ST और मुस्लिमों के पास यही एकमात्र विकल्प बचा है।
अदालतों की भारी फटकार और ₹1 लाख का जुर्माना
अपनी आदतन और निरर्थक याचिकाओं (Frivolous Petitions) के माध्यम से देश की न्यायप्रणाली का कीमती समय बर्बाद करने के कारण महमूद प्राचा को कोर्ट से कई बार भारी अपमान और फटकार झेलनी पड़ी है।
दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों की सुनवाई के दौरान कड़कड़डूमा कोर्ट समेत विभिन्न निचली व उच्च अदालतों ने प्राचा की कार्यशैली पर कड़े सवाल उठाए थे और दंगों के आरोपितों को बचाने के लिए अदालत का समय नष्ट करने पर उसे सख्त चेतावनी दी थी।
इसके अलावा इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी महमूद प्राचा की याचिकाओं के पीछे की मंशा पर बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए उस पर ₹1 लाख का भारी जुर्माना ठोका था। प्राचा ने एक ही विषय और समान तथ्यों पर बार-बार बेतुकी और निरर्थक जनहित याचिकाएँ दाखिल कर अदालत का वक्त खराब करने का प्रयास किया था।
इलाहाबाद हाई कोर्ट की पीठ ने सख्त लहजे में सवाल उठाया था कि जब याचिका के मुख्य विषय का समाधान पहले ही हो चुका है, तो बार-बार एक ही तरह की याचिकाएँ लाकर अदालत को गुमराह करने और सुर्खियाँ बटोड़ने की कोशिश क्यों की जा रही है?
हालाँकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस ₹1 लाख के जुर्माने के भुगतान पर अंतरिम रोक लगा दी थी, लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट की यह तल्ख टिप्पणी प्राचा की कानूनी पैंतरेबाजी, अदालती प्रक्रिया के दुरुपयोग और न्यायिक व्यवस्था को अटकाने की उनकी नीयत को पूरी तरह उजागर करती है।
कानूनी पेशे का राजनीतिक व वैचारिक इस्तेमाल
एक अधिवक्ता का प्राथमिक कर्तव्य अपने मुवक्किल को निष्पक्ष कानूनी सहायता प्रदान करना और संविधान की मर्यादा का पालन करना होता है। लेकिन महमूद प्राचा के पूरे करियर का अवलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि उसने वकालत के पेशे को अपने निजी, वैचारिक और राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने का एक माध्यम बना लिया है।
दालतों के भीतर प्रक्रियात्मक अड़ंगे लगाना और अदालतों के बाहर मीडिया व सोशल मीडिया पर आकर संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के खिलाफ नफरती बयान देना प्राचा की कार्यशैली का मुख्य हिस्सा बन चुका है।
जब भी पुलिस या जाँच एजेंसियाँ उनके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई करती हैं, तो वह तुरंत इसे ‘लोकतंत्र की हत्या’ और वकीलों की आजादी पर हमला बताकर शोर मचाने लगता है। उसका यह दोहरा मापदंड न केवल वकालत के पेशे की गरिमा को गिराता है, बल्कि समाज में कानून के शासन (Rule of Law) के प्रति अविश्वास भी पैदा करता है।
महमूद प्राचा का पूरा राजनीतिक व कानूनी घटनाक्रम और साक्षात्कारों में उसके लगातार आक्रामक होते बयान यह स्पष्ट करते हैं कि वह कानून के दायरे में रहकर अपने मुवक्किलों को न्याय दिलाने के बजाय, कानूनी व्यवस्था की आड़ लेकर अपने राजनीतिक, साम्प्रदायिक और वैचारिक एजेंडे को साधने का प्रयास करता रहा है।
एक तरफ जहाँ वह यूट्यूब साक्षात्कारों में देश के संवैधानिक प्रमुखों, चुनाव प्रणाली, मीडिया और सुप्रीम कोर्ट पर बिना किसी साक्ष्य के संगीन और नफरती आरोप लगाता है, वहीं दूसरी तरफ उसका अपना रिकॉर्ड जाली दस्तावेजों, मृत व्यक्ति के फर्जी दस्तखत, अदालतों की भारी फटकार और समाज में साम्प्रदायिक तनाव भड़काने वाले बयानों से भरा हुआ है।
अधिकारों और संविधान की आड़ लेने वाला यह चेहरा खुद देश के कानून, न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थाओं की धज्जियाँ उड़ाने में सबसे आगे रहा है।
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में विरोध प्रदर्शनों और चुनाव संबंधी हिंसा के बीच पाकिस्तानी अधिकारियों ने कथित तौर पर मुजफ्फरबाद में चुनाव बहिष्कार और पाकिस्तान के एक्शन के कवरेज को देखते हुए अल जजीरा पर पूरे पाकिस्तान में प्रतिबंध लगा दिया है।
पीओके में पाकिस्तानी सेना और उसके नियंत्रित वाली सरकार के खिलाफ स्थानीय लोगों का विरोध प्रदर्शन जोरों से जारी है। इसकी वजह से इलाके में अशांति फैली हुई है। एक ओर पाकिस्तान आंदोलन को कुचलने के लिए पीओके में प्रदर्शनकारियों की हत्या कर रहा है। वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत को कवर करने वाले मीडिया संस्थानों को डिजिटल सेंसरशिप का सामना करना पड़ रहा है।
इसी कड़ी में पाकिस्तान के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने मुजफ्फरबाद चुनाव बहिष्कार और पीओके में राज्य की कार्रवाई को दिखाने पर कतर के न्यूज चैनल अल जजीरा इंग्लिश पर प्रतिबंध लगा दिया है।
पाकिस्तानी सरकार ने अल जजीरा पर ‘पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता’ करने का आरोप लगाया है, क्योंकि उसने पीओके के मुजफ्फराबाद डिवीजन में और पाकिस्तान में बसे ‘शरणार्थियों’ के लिए आवंटित 12 सीटों के चुनावों के सार्वजनिक बहिष्कार को उजागर किया था।
5 जून 2026 को PoK में विरोध प्रदर्शन शुरू होने के बाद से अल जजीरा ने इन प्रदर्शनों को कवर किया है और पुलिस की कार्रवाई में भारी संख्या में आम जनता के मारे जाने को उजागर किया है, जबकि पाकिस्तानी अधिकारी रावलकोट और PoK के अन्य क्षेत्रों में अपनी क्रूर कार्रवाइयों को कम करके आँकते रहे हैं।
हाल ही में अल जजीरा ने मुजफ्फराबाद के उन लोगों को दिखाया और चुनाव बहिष्कार के बाद के हालात की जानकारी दी थी। इससे पाकिस्तानी हुक्मरान नाराज हो गए। उन्होने इसे चुनिंदा और पक्षपातपूर्ण बताते हुए इस पर रोक लगाने की घोषणा की। दरअसल वहाँ की स्थितियों से पाकिस्तानी अधिकारी काफी क्षुब्ध थे, क्योंकि उनके लिए स्थिति को संभालना आसान नहीं था।
पाकिस्तान के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने X पर कहा, “हमने आज मुजफ्फराबाद के चुनिंदा मतदान केंद्रों से अल जजीरा की चुनिंदा रिपोर्टिंग पर ध्यान दिया है। चुनिंदा समय और चुनिंदा व्यक्तियों के सुनियोजित बयानों के आधार पर चैनल ने चुनाव और मतदान प्रक्रिया को गलत तरीके से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इस तरह की पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता केवल निहित स्वार्थों वाले बाहरी तत्वों के एजेंडे की पुष्टि करती है जो इस चुनावी प्रक्रिया को अवैध ठहराने और मुजफ्फराबाद और पीओके के लोगों की इच्छा को कमजोर करने का प्रयास कर रहे हैं, जैसा कि अराजकता और जबरदस्ती के उनके विरोध से साफ दिख रहा है। ”
पाकिस्तानी सरकार ने अल जजीरा पर ‘पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता’ करने का आरोप लगाया है, क्योंकि उसने पीओके के मुजफ्फराबाद डिवीजन में और पाकिस्तान में बसे ‘शरणार्थियों’ के लिए आवंटित 12 सीटों के चुनावों के सार्वजनिक बहिष्कार को उजागर किया था।
5 जून 2026 से शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद अल जज़ीरा लगातार वहां की घटनाओं की रिपोर्टिंग कर रहा था। चैनल ने स्थानीय लोगों के हवाले से पुलिस कार्रवाई में बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने के दावे भी प्रकाशित किए, जबकि पाकिस्तानी प्रशासन इन दावों को कम करके दिखाता रहा।
हाल ही में अल जज़ीरा ने यह भी रिपोर्ट किया कि मुजफ्फराबाद के लोगों ने चुनाव का बहिष्कार किया। इस पर पाकिस्तान सरकार ने आरोप लगाया कि चैनल ने चुनिंदा मतदान केंद्रों की रिपोर्टिंग कर चुनाव प्रक्रिया को गलत तरीके से पेश किया। दरअसल पीओके की स्थितियों से पाकिस्तानी अधिकारी काफी क्षुब्ध थे, क्योंकि उनके लिए स्थिति को संभालना आसान नहीं था।
पाकिस्तान के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने X पर कहा, “हमने आज मुजफ्फराबाद के चुनिंदा मतदान केंद्रों से अल जजीरा की चुनिंदा रिपोर्टिंग पर ध्यान दिया है। चुनिंदा समय और चुनिंदा व्यक्तियों के सुनियोजित बयानों के आधार पर चैनल ने चुनाव और मतदान प्रक्रिया को गलत तरीके से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इस तरह की पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता केवल निहित स्वार्थों वाले बाहरी तत्वों के एजेंडे की पुष्टि करती है जो इस चुनावी प्रक्रिया को अवैध ठहराने और मुजफ्फराबाद और पीओके के लोगों की इच्छा को कमजोर करने का प्रयास कर रहे हैं, जैसा कि अराजकता और जबरदस्ती के उनके विरोध से साफ दिख रहा है। ”
सिर्फ अल जज़ीरा ही नहीं, कई मीडिया संस्थान भी निशाने पर
रिपोर्टों के अनुसार, अल जजीरा अकेला मीडिया संस्थान नहीं है, जिस पर कार्रवाई हुई है। पाकिस्तान ने कई स्थानीय और क्षेत्रीय डिजिटल समाचार वेबसाइटों और प्लेटफॉर्मों की पहुँच भी सीमित कर दी गई है।
इनमें पाकिस्तान की प्रमुख विपक्षी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI), उसके संस्थापक और पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान से जुड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों के चैनल भी शामिल बताए जा रहे हैं।
इससे पहले इस्लामाबाद की एक अदालत में राष्ट्रीय साइबर अपराध जांच एजेंसी (NCCIA) की रिपोर्ट के आधार पर कई यूट्यूब चैनलों पर प्रतिबंध लगाने की माँग की गई थी। एजेंसी का आरोप था कि ये चैनल पाकिस्तान की सरकारी संस्थाओं और अधिकारियों के खिलाफ भड़काऊ और अपमानजनक सामग्री प्रसारित कर रहे हैं। इसके तुरंत बाद, क्षेत्र के कुछ हिस्सों में इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं भी निलंबित कर दी गईं।
जम्मू और कश्मीर में अशांति की शुरुआत 45 सीटों वाली पीओके विधानसभा की 12 सीटों को लेकर हुए विवाद से हुई, जो भारतीय जम्मू और कश्मीर से आए शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं। स्थानीय ग्रुप का आरोप है कि इस्लामाबाद इन सीटों का इस्तेमाल चुनावों को प्रभावित करने और अपनी पसंद की सरकारें स्थापित करने के लिए करता है, जिससे स्थानीय प्रतिनिधित्व कमजोर हो जाता है।
8 जून को पुंछ जिले के रावलाकोट में प्रदर्शनकारियों और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के बीच हिंसक झड़प हुई, जिसमें कई स्थानीय लोगों के मारे जाने की खबर आई।
9 जून को जम्मू-कश्मीर अवामी एक्शन कमेटी ने पूरे क्षेत्र में बंद का आह्वान किया। इसके बाद मुजफ्फराबाद समेत कई शहरों में बाजार, परिवहन और सरकारी संस्थान बंद रहे।
रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि बाद में पाकिस्तान ने इलाके में खाद्य सामग्री, ईंधन और स्वास्थ्य सेवाओं की आपूर्ति भी प्रभावित की।
चुनाव के दौरान भी हिंसा
करीब दो महीने तक चले विरोध प्रदर्शनों के बीच हुए चुनाव भी हिंसक रहे। रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तानी सेना की गोलीबारी में कम से कम 19 लोगों की मौत हुई और 30 से अधिक लोग घायल हुए।
मारे गए लोगों में जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी के नेता सरदार उमर नजीर के भाई उस्मान नजीर भी शामिल बताए गए।
स्थानीय संगठनों का दावा है कि अब तक सुरक्षा बलों की कार्रवाई में कम से कम 80 प्रदर्शनकारियों की मौत हो चुकी है। हालांकि इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
इन घटनाओं के विरोध में मुजफ्फराबाद के कई लोगों ने चुनाव का बहिष्कार किया। उनका कहना था कि जब इतने लोगों की मौत हो चुकी है, तब सामान्य चुनाव कैसे कराए जा सकते हैं।
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री का बयान
जुलाई 2026 के अंत में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने प्रदर्शनकारियों को भारत जैसा दुश्मन बताया। उन्होंने कहा, “मैं इन प्रदर्शनकारियों को भी भारत की तरह पाकिस्तान का दुश्मन मानता हूँ।”
इससे पहले भी ख्वाजा आसिफ ने रावलाकोट और मीरपुर के लोगों को ‘असल कश्मीरी नहीं’ बताया था, क्योंकि वे अपने अधिकारों की माँग कर रहे थे।
पाकिस्तान लंबे समय से पीओके में मीडिया की स्वतंत्र रिपोर्टिंग पर कड़ी निगरानी रखता है। समय-समय पर इंटरनेट बंद करना, संचार सेवाएं रोकना और पत्रकारों की आवाजाही सीमित करना इसी नीति का हिस्सा बताया जाता है।
पहले JAAC को प्रतिबंधित संगठन घोषित किया गया और अब स्थानीय तथा विदेशी मीडिया संस्थानों पर भी कार्रवाई की जा रही है। कई पत्रकारों पर इलेक्ट्रॉनिक अपराध रोकथाम कानून (PECA) और अन्य स्थानीय कानूनों के तहत मामले दर्ज होने की भी खबरें हैं।
इसी वजह से कई स्थानीय मीडिया संस्थानों पर सरकारी लाइन का समर्थन करने या स्वयं सेंसरशिप अपनाने के आरोप लगते रहे हैं।
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में ‘आज़ाद’ जैसा कुछ भी नहीं है। पाकिस्तान न केवल कश्मीरी लोगों और संस्थानों पर, बल्कि कब्जे वाले क्षेत्र के बारे में प्रचलित धारणाओं पर भी कड़ा नियंत्रण रखता है।
पाकिस्तानी अधिकारियों ने कई मौकों पर पाकिस्तान समर्थक स्थानीय पत्रकारों के साथ-साथ विदेशी पत्रकारों के लिए पीओके में चुनिंदा स्थलों पर जाने की अनुमति दी, ताकि भारत के आरोपों को झूठा साबित किया जा सके।
जबकि हालात ऐसे हैं कि वहाँ आए दिन हिंसक घटनाएँ हो रही हैं। पाकिस्तान इलाके में सबकुछ सही है यह दिखाने और तथाकथित विकास को दिखाने के लिए तथ्यात्मक झूठ को बढ़ावा देता रहा है। वह उन पर नियंत्रण रखना चाहता है। उसकी पूरी कोशिश होती है कि वह किसी तरह पीओके के कश्मीरी लोग और जम्मू और कश्मीर के भारतीय हिस्से में रहने वालों की तुलना कर ये बताएँ कि ‘आजाद कश्मीर’ में अधिक स्वतंत्र और गरिमापूर्ण तरीके से लोग जीवन जी रहे हैं।
पाकिस्तान सकारात्मक प्रचार के लिए कश्मीर के पीओके में चुनिंदा मीडिया भेजता है, ताकि उसका प्रोपेगेंडा साबित हो सके। साथ ही उन मीडिया संस्थानों को प्रतिबंधित करता है, जो उसके दमनकारी चेहरे को दुनिया के सामने लाते हैं।
पिछले साल मई में जब भारत ने पाकिस्तान-नियंत्रित क्षेत्रों में इस्लामी आतंकी ढाँचे पर हमला किया, तो इस्लामाबाद ने तुरंत विदेशी पत्रकारों के सामने खुद को ‘पीड़ित’ दिखाने की कोशिश की, लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय मीडिया पीओके में बेहाल कानून-व्यवस्था और कश्मीरियों पर की जा रही हिंसक कार्रवाई को कवर करता है, तो उसी मीडिया को परेशान किया जाता है, प्रतिबंधित किया जाता है और उनकी कवरेज पर सवाल उठाए जाते हैं।
(यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
महाराष्ट्र में अवैध धर्मांतरण को रोकने के लिए ‘महाराष्ट्र धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम 2026’ आधिकारिक रूप से लागू हो गया है। राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों से बजट सत्र के दौरान पारित होने और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हस्ताक्षर के बाद इसे आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित कर दिया गया।
विधानसभा में इस बिल पर बहस के दौरान उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने समर्थन किया था, जबकि कॉन्ग्रेस, एनसीपी और समाजवादी पार्टी सहित कई विपक्षी दलों ने इसका विरोध किया था।
यह कानून संगठित तरीके से ब्रेनवाशिंग, प्रलोभन या दबाव के जरिए भोले-भाले और कमजोर वर्ग के लोगों के धर्मांतरण को रोकने, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और सामाजिक सद्भाव को संरक्षित करने के उद्देश्य से लाया गया है।
कौन से तरीके माने जाएँगे अवैध धर्मांतरण के लिए प्रलोभन
इस कानून में गैर-कानूनी धर्मांतरण, प्रलोभन और दबाव की सीमाओं को काफी विस्तार से बताया गया है। इसमें उपहार, नकद राशि, रोजगार, विवाह का वादा, मुफ्त शिक्षा, बेहतर जीवनशैली देने के वादे को प्रलोभन माना गया है।
इसके अलावा किसी एक धर्म को श्रेष्ठ बताना या दूसरे धर्म की बुराई करना भी इसी श्रेणी में आएगा। शारीरिक हिंसा, डराना-धमकाना, संपत्ति को नुकसान पहुँचाना, ‘ईश्वर के नाखुश होने’ का डर दिखाना या ‘सामाजिक बहिष्कार’ की चेतावनी देते हुए दबाव डालना भी इसी श्रेणी में शामिल है।
साथ ही, शैक्षणिक संस्थानों के जरिए ब्रेनवाशिंग और किसी प्रकार के ‘सामूहिक धर्मांतरण’ को भी गैर-कानूनी माना गया है। इतना ही नहीं यदि कोई विवाह केवल धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से किया गया है, तो अदालत उसे अमान्य घोषित कर सकती है।
क्या होगी सजा
इस कानून के तहत दर्ज अपराध गैर-जमानती होंगे और पुलिस को बिना औपचारिक शिकायत के स्वतः संज्ञान लेकर सीधे FIR दर्ज करने व जाँच करने का अधिकार होगा।
सामान्य मामलों में अवैध धर्मांतरण पर अधिकतम 7 साल की जेल और 1 लाख रुपए तक का जुर्माना होगा, जबकि नाबालिगों, महिलाओं, मानसिक अस्वस्थ व्यक्तियों या SC/ST समुदाय के लोगों और सामूहिक धर्मांतरण के मामलों में यह सजा 7 साल की जेल व 5 लाख रुपए तक का जुर्माना तय की गई है।
दोबारा अपराध करने पर सजा बढ़ाकर 10 साल और जुर्माना 7 लाख रुपए तक हो सकता है।
दोषी संस्थाओं का पंजीकरण रद्द करने, अनुदान रोकने और अवैध दस्तावेजों को प्रमाणित या समर्थित करने वाले सहयोगियों को भी दंडित करने का प्रावधान है।
अगर कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से धर्म परिवर्तन करना चाहता है, तो उसे 60 दिन पहले प्रशासन को सूचना देनी होगी। इसके अलावा धर्म परिवर्तन होने के बाद 25 दिनों के भीतर उसे अधिकारियों के पास पंजीकरण कराना होगा। अगर ऐसा नहीं किया गया तो उस धर्म परिवर्तन को अमान्य माना जाएगा।
कैसे फँसाए जाते हैं भोले-भाले लोग
बता दें कि धर्मांतरण के खिलाफ लाए फडणवीस सरकार के इस कानून में साफ है कि कुछ मामलों में कन्वर्जन, संगठित तरीके से लोगों का ब्रेनवॉश करके या कमजोर लोगों को टारगेट में लेकर किया जाता है। ऐसे धर्मांतरण कभी-कभी ‘बलपूर्वक, अनैच्छिक या नागरिकों को लालच देकर या दूसरे तरह से प्रभावित करके’ किए जाते हैं। इन गतिविधियों के दौरान टारगेट पर ‘भोले-भाले लोग’ होते हैं। उन्हें उपहार, धन, लाभ, रोजगार के अवसर या धार्मिक संगठनों के जो संस्थान संचालित हो रहे हैं, उनमें मुफ्त शिक्षा की पेशकश शामिल दी जाती है या फिर विवाह, बेहतर जीवनशैली या दैवीय उपचार के वादे किए जाते हैं।
महाराष्ट्र के इस कानून में प्रलोभन के दायरे को अन्य राज्यों की तुलना में कहीं अधिक विस्तार से बताया गया है। इसमें कहा गया है कि किसी एक धर्म को दूसरे धर्म से श्रेष्ठ बताकर या किसी अन्य धर्म के रीति-रिवाजों, परंपराओं या प्रथाओं की बुराई करना या उसे गलत तरीके से बताने का प्रयास भी प्रलोभन की श्रेणी में आ सकते हैं।
इस कानून में ‘दबाव’ को भी विस्तार से बताया गया है। इसमें किसी व्यक्ति, परिवार या समूह को डरा-धमका कर या मनोवैज्ञानिक दबाव के माध्यम से उनकी इच्छा के विरुद्ध कार्य करने के लिए बाध्य गैरकानूनी होगा। इसमें मारना-पीटना या धमकियाँ देना, संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की धमकियाँ या यहाँ तक कि ‘ईश्वर के नाखुश होने’ और ‘सामाजिक बहिष्कार’ या बहिष्कार की चेतावनी भी शामिल है।
इसमें कहा गया है कि यदि कोई विवाह केवल धर्मांतरण के उद्देश्य से किया गया है, तो कोर्ट उस विवाह को अमान्य घोषित कर सकता है। विवाह के दोनों पक्षों में से किसी को भी अदालत में जाकर यह दावा करने का अधिकार होगा कि धर्म परिवर्तन अवैध रूप से किया गया था।
कैसे बदल सकते हैं धर्म
धर्मांतरण विरोधी कानून में उस प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है, जिसका पालन किसी व्यक्ति को कानूनी रूप से अपना धर्म बदलने के वक्त करना जरूरी है।
कानून में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे धर्म को अपनाना चाहता है, तो उसे कम से कम 60 दिन पहले जिला मजिस्ट्रेट या सरकार द्वारा नियुक्त किसी दूसरे प्राधिकारी को इसकी जानकारी देनी होगी।
इसी प्रकार, यदि कोई संस्था या धार्मिक निकाय धर्मांतरण समारोह आयोजित करना चाहता है, तो उसे कम से कम 60 दिन पहले संबंधित अधिकारी को पूर्व सूचना देनी होगी।
सरकारी प्राधिकारी पूरी जानकारी अपने नोटिस बोर्ड के साथ-साथ स्थानीय प्राधिकरण के नोटिस बोर्ड पर भी चिपकाएगा, ताकि अगर जनता को कोई आपत्ति है तो वे बताएँ। आम लोगों को इसके लिए 30 दिन का समय दिया गया है।
यदि कोई आपत्ति आती है, तो प्राधिकरण पुलिस को जाँच का आदेश दे सकता है। यदि जाँच में यह पाया जाता है कि धर्मांतरण कानून का उल्लंघन है, तो पुलिस आपराधिक कार्रवाई कर सकती है।
कानून में यह भी अनिवार्य है कि धर्मांतरण हो जाने के बाद, धर्मांतरित व्यक्ति या समारोह संपन्न करने वाले व्यक्ति को 21 दिनों के भीतर घोषणा करनी होगी। यदि व्यक्ति जानकारी नहीं देता है, तो कानून यह मान लेगा कि धर्मांतरण हुआ ही नहीं है।
पुलिस खुद ले सकती है अवैध धर्मांतरण मामलों पर संज्ञान
इस कानून की एक और खासियत यह है कि पुलिस अधिकारियों को औपचारिक शिकायत के बिना भी कार्रवाई करने की अनुमति होगी । पुलिस को स्वतः संज्ञान लेने का अधिकार भी दिया गया है। वह जाँच कर सकता है कि कानून का उल्लंघन करते हुए कोई संपत्ति का हस्तांतरण हुआ है या नहीं।
यह कानून आपराधिक दायित्व का दायरा भी बढ़ाता है। धारा 12 के अनुसार, गैरकानूनी धर्मांतरण से जुड़े दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने, उनका समर्थन करने या उन्हें प्रमाणित करने वाले व्यक्तियों को भी अपराध में सहायता करने या उकसाने का दोषी माना जा सकता है और उन्हें दंडित किया जा सकता है।
अन्य राज्यों में धर्मांतरण कानून
धर्मांतरण के विरोध में मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, गुजरात,उत्तराखंड, हरियाणा, राजस्थान समेत कई राज्यों में कानून बनाया गया है। दरअसल संविधान ने देश की जनता को धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को मूल अधिकार के तौर पर दिया है। ऐसे में किसी भी तरह से इसका उल्लंघन किया जाता है, तो ये संविधान की मूल भावना के भी खिलाफ है।
कुछ दिनों पहले की ही बात है जब जंतर-मंतर पर प्रदर्शन हुआ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा सरकार की खूब तीखी आलोचना हुई। सरकार ने भी अपने स्तर से इसका जवाब दिया, यही एक स्वस्थ लोकतंत्र में होता है।
पर, जब राजनीतिक विरोध का स्तर भगवान राम और माता सीता तक पहुँच जाए, जब संसद परिसर में राम और सनातन को लेकर नौटंकी की जाए और कॉन्ग्रेस के नेता पूछने लगें कि ‘मोदी की सीता कौन हैं?’ तो सवाल इससे आगे का हो जाता है। सवाल यह हो जाता है कि आखिर करोड़ों हिंदुओं की आस्था को इतना आसान निशाना क्यों समझ लिया गया है?
कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी का हालिया बयान पढ़िए। राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का संदर्भ लेते हुए उन्होंने कहा कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंदिर में पूजा कर रहे थे, तब उन्हें ‘मोदी की सीता’ दिखाई नहीं दीं और फिर सवाल किया कि ‘राम की सीता कौन थीं और मोदी की सीता कौन हैं’।
Delhi: On Ram Temple donation row, Congress MP Pramod Tiwari says, Now, many things are auspicious… Even when Lord Ram performed the Ashwamedha Yajna, he had a stone idol of Goddess Sita made and placed beside him before performing it. Now, I kept looking when PM Modi was… pic.twitter.com/Ll7bSEyna4
31 जुलाई 2026 को संसद परिसर में राहुल गाँधी, पप्पू यादव और समाजवादी पार्टी के सांसद अवधेश प्रसाद समेत विपक्षी नेताओं ने राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी के मुद्दे को लेकर एक नौटंकी। इसमें साधुओं को चोर दिखाया गया, सनातन का जमकर अपमान किया गया। इसके बाद राहुल गाँधी, पप्पू यादव तथा अवधेश प्रसाद के खिलाफ FIR तक की गई है।
सवाल मंदिर के चंदे को चुराने वालों को बचाने का कतई नहीं है, उन पर कार्रवाई हो रही है और कठोर होनी चाहिए। लेकिन भ्रष्टाचार के आरोप की जाँच और भगवान राम से जुड़े प्रतीकों को राजनीतिक तमाशे में बदल देने एक बात नहीं हो सकती है।
और इसी के ठीक बाद प्रमोद तिवारी का यह बयान सामने आता है। इसलिए यह सवाल उठता है कि क्यों प्रधानमंत्री पर राजनीतिक हमला करने के लिए कॉन्ग्रेस के नेताओं को भगवान राम और माता सीता से जुड़े प्रतीकों का इस्तेमाल करना जरूरी लगता है? क्या हिंदुओं की सहिष्णुता को हर बार उनकी कमजोरी मानकर, उनके प्रतीकों पर वोटों के लिए हमले किए जाते रहेंगे?
राम मंदिर पर कॉन्ग्रेस का 2024 वाला रुख भी याद रखिए
यह इतिहास भी ज्यादा पुराना नहीं है। 2024 में अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा होने वाली थी। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और सोनिया गाँधी को भी निमंत्रण मिला था। कॉन्ग्रेस ने समारोह में शामिल न होने का निर्णय लिया और अपने आधिकारिक बयान में प्राण प्रतिष्ठा समारोह को भाजपा और आरएसएस का ‘राजनीतिक प्रोजेक्ट’ तक बता दिया था।
राहुल गाँधी ने भी जनवरी 2024 में कहा था कि 22 जनवरी का कार्यक्रम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और RSS के इर्द-गिर्द बनाया गया ‘राजनीतिक कार्यक्रम’ बन गया है और इसलिए कॉन्ग्रेस का उसमें जाना ठीक नहीं है। अब यह खुद से पूछिए, क्या राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा को सिर्फ इसलिए राजनीतिक कार्यक्रम कहा जा सकता है क्योंकि प्रधानमंत्री उसमें मौजूद थे?
राम मंदिर किसी एक प्रधानमंत्री की निजी संपत्ति नहीं था। यह करोड़ों हिंदुओं की आस्था से जुड़ा विषय था। लेकिन कॉन्ग्रेस को हिंदुओं की चिंता क्यों ही होनी लगी। हम कैसे भूल सकते है, यह वही कॉन्ग्रेस है जिसने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर भगवान राम को काल्पनिक तक बता दिया था। अब जब लगता है कि चंदा चोरी के नाम पर बीजेपी को घेर लेंगे तो राम भक्त बन गए लेकिन उसमें भी भगवान का अपमान ही किया।
आप खुद से एक सवाल करके देखिए, यदि किसी नेता को किसी अन्य मजहब के प्रतीक को लेकर इसी तरह का व्यंग्य करना हो, तो क्या वही राजनीतिक दल और वही नेता कर सकते हैं? इसका सीधा जवाब है, नहीं। फिर हिंदू धर्म के साथ यह सुविधा क्यों है?
भारत का हिंदू समाज हजारों वर्षों से अपनी आस्था, परंपरा और संस्कृति को लेकर जीता आया है। उसने बहुत कुछ सहा है, बहुत कुछ देखा है और फिर भी अपने देवताओं को लेकर उसके भीतर श्रद्धा बनी रही है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसकी भावनाओं की कोई कीमत नहीं।
भगवान राम किसी एक पार्टी की संपत्ति नहीं हैं। माता सीता किसी चुनावी पोस्टर की पात्र नहीं हैं। इसीलिए भाजपा समर्थक से लेकर कॉन्ग्रेस समर्थक तक, हर हिंदू को यह अधिकार है कि वह अपने आराध्य के बार-बार ऐसे अपमान पर सवाल करे।
यदि कॉन्ग्रेस को नरेंद्र मोदी से समस्या है तो PM मोदी पर राजनीतिक हमला करें। यदि भाजपा की नीतियों से समस्या है तो नीतियों पर हमला करे। लेकिन भगवान राम को PM मोदी से जोड़कर, माता सीता को राजनीतिक तंज बनाकर और सनातन को राजनीतिक गाली की तरह इस्तेमाल करके आखिर कॉन्ग्रेस हासिल क्या करना चाहती है?
भगवान राम की सबसे बड़ी पहचान ही मर्यादा है। और विडंबना देखिए कि उन्हीं भगवान राम का नाम लेकर राजनीति करने वाले ये कॉन्ग्रेसी और विपक्षी हर दिन मर्यादा की सीमा पार करने लगते हैं।
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत ने शानदार प्रदर्शन के साथ अपना अभियान समाप्त किया। स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित इन खेलों में भारतीय खिलाड़ियों ने कई प्रतियोगिताओं में बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए कुल 39 पदक अपने नाम किए।
एथलेटिक्स, मुक्केबाजी, पैरा स्पोर्ट्स और जूडो समेत कई खेलों में भारत के प्रदर्शन ने यह साबित किया कि देश विभिन्न खेलों में धीरे-धीरे लेकिन लगातार प्रगति कर रहा है।
मेडल टैली में भारत चौथे स्थान पर रहा। भारतीय दल ने कुल 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य पदक जीते। प्रतियोगिता के नौवें दिन भारत के खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए अकेले 16 पदक जीते, जिनमें 8 स्वर्ण पदक शामिल थे। इसी दमदार प्रदर्शन की बदौलत भारत ने पदक तालिका में 10वें स्थान से छलांग लगाकर चौथा स्थान हासिल किया।
(फोटो साभार: Chatgpt)
वेटलिफ्टिंग
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत का पहला स्वर्ण पदक वेटलिफ्टिंग से आया। मीराबाई चानू ने महिलाओं के 48 किलोग्राम वर्ग में लगातार तीसरी बार कॉमनवेल्थ गेम्स का स्वर्ण पदक जीता। उन्होंने कुल 190 किलोग्राम (85 किलोग्राम स्नैच और 105 किलोग्राम क्लीन एंड जर्क) वजन उठाकर गेम्स रिकॉर्ड भी बनाया।
पुरुषों के 60 किलोग्राम वर्ग में ऋषिकांता सिंह ने रजत पदक जीता, जबकि पुरुषों के +110 किलोग्राम वर्ग में लवप्रीत सिंह ने भी रजत पदक हासिल किया।
इसके अलावा वल्लूरी अजय बाबू ने पुरुषों के 79 किलोग्राम वर्ग में रजत पदक जीता। महिलाओं के 53 किलोग्राम वर्ग में ज्ञानेश्वरी यादव ने रजत पदक और महिलाओं के 58 किलोग्राम वर्ग में बिंद्यारानी देवी ने कांस्य पदक अपने नाम किया। इस तरह भारतीय वेटलिफ्टिंग दल ने कुल 8 पदक जीते।
मुक्केबाजी
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय मुक्केबाजों ने सभी वर्गों में सबसे ज्यादा स्वर्ण पदक जीतकर शानदार प्रदर्शन किया। भारत ने मुक्केबाजी में कुल 10 पदक जीते, जिनमें 7 स्वर्ण और 3 रजत पदक शामिल रहे। यह कॉमनवेल्थ गेम्स के एक ही संस्करण में किसी भी देश का सबसे सफल मुक्केबाजी प्रदर्शन रहा।
साक्षी चौधरी (महिला 51 Kg), प्रीति (महिला 54 Kg), जैस्मीन लांबोरिया (महिला 57 Kg), प्रिया (महिला 60 Kg), अरुंधति चौधरी (महिला 70 Kg), सचिन सिवाच (पुरुष 60 Kg) और अंकुश पंघाल (पुरुष 80 Kg) ने अपने-अपने वर्ग में स्वर्ण पदक जीते। वहीं जादूमणि सिंह (पुरुष 55 Kg), लवलीना बोरगोहेन (महिला 75 Kg) और नरेंद्र बड़वाल (पुरुष 90+ Kg) ने रजत पदक हासिल किए।
पैरा स्पोर्ट्स
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के लिए भारत ने 28 सदस्यीय पैरा स्पोर्ट्स दल भेजा था। इस दल ने 3 स्वर्ण, 2 रजत और 2 कांस्य सहित कुल 7 पदक जीतकर अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। वर्ष 2022 में कॉमनवेल्थ गेम्स में पैरा स्पोर्ट्स की शुरुआत के बाद यह इस स्पर्धा में भारत का सबसे सफल प्रदर्शन रहा।
खास बात यह है कि पिछले सभी कॉमनवेल्थ गेम्स संस्करणों में भारत ने कुल मिलाकर जितने 7 पदक जीते थे, उतने ही पदक उसने इस बार अकेले जीत लिए।
पैरा खिलाड़ियों का यह प्रदर्शन भारत के पैरा स्पोर्ट्स के लिए एक महत्वपूर्ण और अभूतपूर्व क्षण रहा। दिलीप गावित (पुरुष 100 मीटर T47), शर्मिला धनखड़ (महिला शॉट पुट F57) और सोमन राणा (पुरुष शॉट पुट F57) ने स्वर्ण पदक जीते। वहीं शुभम जुयाल (पुरुष शॉट पुट F57) और मोहम्मद बासिल (पुरुष 100 मीटर T47) ने रजत पदक अपने नाम किए।
इसके अलावा शिल्पा के शायला (महिला शॉट पुट F57) और झंडू कुमार (पैरा पावरलिफ्टिंग) ने एक-एक कांस्य पदक जीता।
जूडो
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय जूडो खिलाड़ियों ने इतिहास रचते हुए 2 स्वर्ण पदक जीते। अस्मिता डे ने महिलाओं के 48 किलोग्राम वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय जूडोका बनने का गौरव हासिल किया। इसके बाद हर्ष सिंह ने पुरुषों के 60 किलोग्राम वर्ग में स्वर्ण पदक जीता।
इसके अलावा यामिनी मौर्य ने महिलाओं के 57 किलोग्राम वर्ग में रजत पदक जीता, जबकि उन्नति शर्मा ने महिलाओं के 63 किलोग्राम वर्ग में कांस्य पदक हासिल किया।
एथलेटिक्स और अन्य स्पर्धाएँ
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के लिए भारत ने 32 सदस्यीय एथलेटिक्स टीम भेजी थी, जिसमें 22 पुरुष और 10 महिला खिलाड़ी शामिल थे। इसके अलावा 11 सदस्यीय पैरा एथलेटिक्स दल ने भी प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। भारतीय एथलीटों ने कई शानदार प्रदर्शन किए, जिसने खेलों में भारत की लगातार बढ़ती प्रगति को दर्शाया।
ओलंपिक और विश्व चैंपियन नीरज चोपड़ा ने पुरुषों की भाला फेंक स्पर्धा में रजत पदक जीता, जबकि पदार्पण कर रहे यशवीर सिंह ने कांस्य पदक अपने नाम किया। सर्वेश कुशारे ने 2.25 मीटर की छलांग लगाकर पुरुषों की हाई जंप स्पर्धा में रजत पदक जीता और इस स्पर्धा में भारत का पहला कॉमनवेल्थ गेम्स रजत पदक दिलाया।
ट्रैक एंड फील्ड में लंबी दूरी के धावक और एशियाई चैंपियन गुलवीर सिंह ने 10,000 मीटर में रजत पदक जीतने के बाद 5,000 मीटर दौड़ में कांस्य पदक भी हासिल किया। इसके साथ ही वह कॉमनवेल्थ गेम्स के एक ही संस्करण में ट्रैक एंड फील्ड में दो पदक जीतने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बने।
साथ ही 5,000 मीटर स्पर्धा में पदक जीतने वाले पहले भारतीय भी बने। इसके अलावा मुरली श्रीशंकर (पुरुष लंबी कूद) ने रजत, प्रवीण चित्रावेल (पुरुष ट्रिपल जंप) ने रजत, सेल्वा प्रभु थिरुमारन (पुरुष ट्रिपल जंप) ने कांस्य, सीमा कालीरमना (महिला डिस्कस थ्रो) ने कांस्य और तेजस्विन शंकर (डेकाथलॉन) ने कांस्य पदक जीता।
कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत का सफर
साल 1930 में कॉमनवेल्थ गेम्स की शुरुआत के बाद से भारत ने 1930, 1950, 1962 और 1986 को छोड़कर सभी संस्करणों में हिस्सा लिया है। दिलचस्प बात यह है कि कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत का पहला स्वर्ण पदक महान धावक स्वर्गीय मिल्खा सिंह ने 1958 में कार्डिफ में आयोजित खेलों की 440 गज दौड़ में जीता था।
भारत ने वर्ष 2010 में कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी की थी। इसी संस्करण में भारत पहली और अब तक की एकमात्र बार 100 पदकों का आँकड़ा पार करने में सफल रहा था।
2010 के खेलों में भारत ने कुल 101 पदक जीते थे। हालाँकि इसके बाद भारत उस प्रदर्शन को दोहरा नहीं सका, लेकिन 2002 में मैनचेस्टर में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स में 69 पदकों के साथ अपना दूसरा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया था।
ग्लासगो में कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत का मौजूदा प्रदर्शन वर्ष 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए एक मजबूत खिलाड़ी दल तैयार करने की ठोस नींव बन गया है। वर्ष 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी भारत करेगा।
(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
अगर राजधानी ही संकट में हो तो सरकार कहाँ से चलेगी? जापान में यह सवाल अब सिर्फ एक काल्पनिक आपदा की चर्चा नहीं रह गया है। भूकंप और सुनामी के लगातार खतरे को देखते हुए नीति-निर्माता इस संभावना पर मंथन कर रहे हैं कि किसी बड़े संकट में टोक्यो के काम करने की स्थिति में न रहने पर देश का प्रशासन कैसे संभाला जाएगा।
प्रधानमंत्री कार्यालय, संसद और प्रमुख मंत्रालयों के साथ आर्थिक गतिविधियों का बड़ा हिस्सा टोक्यो में केंद्रित होने के कारण यह चिंता और गंभीर हो जाती है। इसी के जवाब के तौर पर जापान ने ‘दूसरी राजधानी’ की व्यवस्था की दिशा में बड़ा कदम उठाया है।
जापानी संसद ने हाल ही में एक ऐसा कानून पारित किया है, जिसने देश में ‘दूसरी राजधानी‘ (Secondary Capital) बनाने का रास्ता खोल दिया है।
हालाँकि, इस कानून का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि टोक्यो से राजधानी हटाई जा रही है। सरकार का उद्देश्य केवल इतना है कि यदि भविष्य में कोई ऐसी आपदा आती है, जिससे टोक्यो का प्रशासन ठप पड़ जाए, तो देश की शासन व्यवस्था तुरंत किसी दूसरे शहर से संचालित की जा सके।
सरकार इसे राष्ट्रीय सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और प्रशासनिक निरंतरता से जुड़ा एक बड़ा सुधार बता रही है। वहीं विपक्ष का आरोप है कि इस कानून के पीछे राष्ट्रीय हित से ज्यादा राजनीतिक समीकरण काम कर रहे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर जापान को दूसरी राजधानी की जरूरत क्यों महसूस हुई? यह नया कानून क्या कहता है? कौन-कौन से शहर इसकी दौड़ में शामिल हैं? क्या वास्तव में इससे जापान को फायदा होगा या फिर यह केवल राजनीतिक प्रयोग है? और क्या भारत में भी कभी ऐसी माँग उठी है? इन सभी सवालों के जवाब इस पूरे मामले को समझने के लिए बेहद जरूरी हैं।
आखिर जापान को दूसरी राजधानी की जरूरत क्यों पड़ी और नया कानून क्या कहता है?
जापान भौगोलिक रूप से दुनिया के सबसे संवेदनशील देशों में गिना जाता है। यह चार प्रमुख टेक्टोनिक प्लेटों के मिलन क्षेत्र में स्थित है, जिसकी वजह से यहाँ लगातार भूकंप आते रहते हैं। देश में हर साल करीब 1500 भूकंप दर्ज किए जाते हैं और औसतन हर दिन दो से तीन बार धरती हिलती है।
वैज्ञानिक कई वर्षों से चेतावनी देते रहे हैं कि टोक्यो महानगरीय क्षेत्र या ननकाई ट्रफ में भविष्य में एक बेहद शक्तिशाली भूकंप आने की आशंका बनी हुई है। जापानी सरकार का अनुमान है कि अगले 30 वर्षों में टोक्यो क्षेत्र में 7 या उससे अधिक तीव्रता का भूकंप आने की लगभग 70 प्रतिशत संभावना है।
यदि ऐसा होता है तो केवल इमारतों को नुकसान नहीं पहुँचेगा बल्कि प्रधानमंत्री कार्यालय, संसद, मंत्रालय, वित्तीय संस्थान, संचार नेटवर्क और राष्ट्रीय प्रशासन भी प्रभावित हो सकता है। ऐसी स्थिति में पूरे देश की शासन व्यवस्था बाधित होने का खतरा पैदा हो जाएगा। इसी जोखिम को कम करने के लिए सरकार ने बैकअप राजधानी की अवधारणा पर काम शुरू किया।
इसी दिशा में जापानी संसद के उच्च सदन ने जुलाई 2026 में ‘एक्ट ऑन द प्रमोशन ऑफ मेजर्स टू एंश्योर द कंटिन्यूटी ऑफ नेशनल एंड सोशल फंक्शंस एंड द डेवलपमेंट ऑफ ए सेकेंडरी कैपिटल’ को मंजूरी दी।
यह कानून किसी शहर को तुरंत दूसरी राजधानी घोषित नहीं करता बल्कि एक कानूनी ढाँचा तैयार करता है। इसके तहत जापान के विभिन्न प्रीफेक्चर (राज्य) आवेदन कर सकेंगे और सरकार तय मानकों के आधार पर यह फैसला करेगी कि कौन सी जगह आपातकालीन प्रशासनिक केंद्र बनने के लिए सबसे उपयुक्त है।
यहाँ एक बात समझना भी जरूरी है कि टोक्यो अपनी जगह राजधानी बना रहेगा। दूसरी राजधानी केवल आपातकालीन स्थिति में सरकार के कामकाज को जारी रखने के लिए होगी। यानी किसी बड़े संकट की स्थिति में प्रधानमंत्री कार्यालय, मंत्रालय और अन्य आवश्यक प्रशासनिक संस्थान अस्थायी रूप से वहीं से काम कर सकेंगे।
कौन-सी शर्तें पूरी करनी होंगी और सरकार किस तरह मदद करेगी?
दूसरी राजधानी बनने की इच्छा रखने वाले किसी भी राज्य को केवल आवेदन भर देने से यह दर्जा नहीं मिल जाएगा। इसके लिए सरकार ने कई महत्वपूर्ण मानक तय किए हैं। सबसे पहले उस क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा अपेक्षाकृत कम होना चाहिए।
साथ ही वहाँ पर्याप्त जनसंख्या, मजबूत अर्थव्यवस्था, विकसित प्रशासनिक ढाँचा और राष्ट्रीय स्तर के सरकारी कामकाज को संभालने की क्षमता भी होनी चाहिए। बेहतर सड़क, रेल और हवाई संपर्क के अलावा आधुनिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर भी इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा। आवेदन करने से पहले संबंधित राज्य की स्थानीय विधानसभा से अपनी मंजूरी भी लेनी होगी।
यदि किसी क्षेत्र का चयन दूसरी राजधानी के रूप में होता है तो उसके विकास में केंद्र सरकार महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। सरकार वहाँ नए सरकारी कार्यालयों और प्रशासनिक भवनों का निर्माण कराएगी, परिवहन नेटवर्क को मजबूत बनाएगी, डिजिटल सुविधाओं का विस्तार करेगी और निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए टैक्स में रियायत तथा अन्य आर्थिक प्रोत्साहन भी देगी।
इसका उद्देश्य केवल एक बैकअप प्रशासनिक केंद्र बनाना नहीं है, बल्कि ऐसे शहर को आर्थिक और औद्योगिक रूप से भी इतना सक्षम बनाना है कि जरूरत पड़ने पर वह देश के प्रमुख प्रशासनिक कार्यों को बिना किसी बाधा के संभाल सके।
दूसरी राजधानी की दौड़ में कौन-कौन से शहर हैं और ओसाका सबसे आगे क्यों माना जा रहा है?
हालाँकि कानून में किसी भी शहर का नाम तय नहीं किया गया है, लेकिन कई प्रीफेक्चर खुलकर अपनी दावेदारी पेश कर चुके हैं। इनमें सबसे अधिक चर्चा ओसाका की हो रही है।
जापान का दूसरा सबसे बड़ा महानगरीय क्षेत्र होने के साथ-साथ ओसाका लंबे समय से देश की आर्थिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ का विकसित बुनियादी ढाँचा, मजबूत परिवहन व्यवस्था और प्रशासनिक क्षमता इसे सबसे मजबूत दावेदारों में शामिल करती है।
ओसाका के अलावा आइची राज्य ने भी दूसरी राजधानी बनने की इच्छा जताई है। वहाँ के गवर्नर हिदेआकी ओमुरा का कहना है कि उनका क्षेत्र राष्ट्रीय स्तर की प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ संभालने के लिए पूरी तरह तैयार है। ऑटोमोबाइल कंपनी टोयोटा समेत कई वैश्विक उद्योगों की मौजूदगी आइची की आर्थिक ताकत को और मजबूत बनाती है।
फुकुओका भी इस दौड़ में पीछे नहीं है। स्थानीय प्रशासन का कहना है कि पूरा क्षेत्र मिलकर दूसरी राजधानी की जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार है और इस दिशा में आवश्यक प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
होक्काइडो भी खुद को मजबूत दावेदार मानता है। वहाँ के गवर्नर का तर्क है कि साप्पोरो टोक्यो से काफी दूर स्थित है, इसलिए यदि राजधानी क्षेत्र किसी बड़े भूकंप या सुनामी से प्रभावित होता है तो यहाँ उसका असर अपेक्षाकृत कम होगा।
इसके अलावा साप्पोरो में पहले से कई केंद्रीय सरकारी कार्यालय मौजूद हैं, जिससे आपातकालीन स्थिति में प्रशासनिक कामकाज शुरू करना आसान हो सकता है।
हालाँकि राजनीतिक और प्रशासनिक विश्लेषकों का मानना है कि फिलहाल ओसाका सबसे आगे दिखाई देता है। लेकिन इसकी राह पूरी तरह आसान भी नहीं है। कई विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भविष्य में ननकाई ट्रफ में बड़ा भूकंप आता है तो ओसाका का कुछ हिस्सा भी प्रभावित हो सकता है।
ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या जिस शहर पर खुद प्राकृतिक आपदा का जोखिम बना हुआ है, वह पूरे देश के लिए सबसे सुरक्षित बैकअप राजधानी साबित हो पाएगा।
कानून को लेकर क्यों हो रहा है विवाद और संसद में अब तक क्या-क्या हुआ?
सरकार इस कानून को राष्ट्रीय सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के लिहाज से एक ऐतिहासिक कदम बता रही है, लेकिन विपक्ष और कई राजनीतिक विश्लेषक इससे पूरी तरह सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि दूसरी राजधानी की अवधारणा जितनी प्रशासनिक दिखाई देती है, उसके पीछे उतनी ही राजनीतिक रणनीति भी छिपी हुई है।
सबसे बड़ा विवाद ओसाका को लेकर है। आलोचकों का आरोप है कि यह कानून कहीं न कहीं ओसाका को बढ़त दिलाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है, क्योंकि यह शहर जापान इनोवेशन पार्टी (JIP) का सबसे मजबूत राजनीतिक गढ़ है।
दरअसल अक्टूबर 2025 में लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (LDP) और जापान इनोवेशन पार्टी के बीच हुए गठबंधन समझौते में दूसरी राजधानी बनाने का वादा भी शामिल था। इसी वजह से विपक्ष का कहना है कि यह केवल राष्ट्रीय आवश्यकता नहीं, बल्कि गठबंधन की राजनीति का भी हिस्सा है।
उनका यह भी आरोप है कि सरकार ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि इस पूरी योजना पर कितना खर्च आएगा, किन सरकारी विभागों को भविष्य में दूसरी राजधानी में स्थानांतरित किया जाएगा और इसका आर्थिक लाभ क्या होगा।
यही कारण रहा कि संसद में यह विधेयक बिना विवाद के पारित नहीं हो सका। निचले सदन में जहाँ सत्तारूढ़ गठबंधन के पास बहुमत था, वहीं ऊपरी सदन में सरकार को कड़ा विरोध झेलना पड़ा।
विपक्षी दलों ने कई दिनों तक विधेयक का विरोध किया और मतदान टालने की कोशिश की। विवाद का एक बड़ा कारण स्थानीय जनमत संग्रह (रेफरेंडम) भी था। विपक्ष चाहता था कि यदि किसी राज्य में दूसरी राजधानी के लिए जनमत संग्रह कराया जाए तो उसे स्थानीय चुनावों के साथ एक ही दिन आयोजित न किया जाए, ताकि चुनावी माहौल जनमत संग्रह के नतीजों को प्रभावित न करे।
लंबी चर्चा और कई दौर की बातचीत के बाद सरकार ने सप्लीमेंट्री रेजोल्यूशन स्वीकार किया, जिसमें कहा गया कि स्थानीय चुनाव और जनमत संग्रह की समय-सीमा को यथासंभव अलग रखा जाएगा।
इसके बाद कुछ विपक्षी दल मतदान के लिए तैयार हुए और आखिरकार यह विधेयक बेहद कम अंतर से पारित हो गया। यही वजह है कि कानून बनने के बावजूद इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस अभी भी खत्म नहीं हुई है।
डिजिटल गवर्नेंस से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा तक, जापान को क्या मिलेगा?
इस कानून का मकसद केवल किसी दूसरे शहर में सरकारी दफ्तर बनाना नहीं है। जापान की सोच इससे कहीं आगे की है। संसद में चर्चा के दौरान यह बात सामने आई कि यदि भविष्य में कोई बड़ा भूकंप, सुनामी या अन्य राष्ट्रीय आपदा आती है तो केवल इमारतों का सुरक्षित होना काफी नहीं होगा।
आज सरकार का अधिकांश काम डिजिटल नेटवर्क, डेटा सेंटर और ऑनलाइन सेवाओं पर निर्भर है। यदि डिजिटल व्यवस्था ठप हो गई तो प्रशासन चलाना बेहद मुश्किल हो जाएगा।
इसी वजह से इस कानून में डिजिटल बिजनेस कंटीन्यूटी प्लानिंग (BCP) को भी अहम स्थान दिया गया है। सरकार को ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिससे राष्ट्रीय स्तर की सभी जरूरी सरकारी सेवाएँ ऑनलाइन माध्यम से भी निर्बाध रूप से संचालित की जा सकें। साथ ही इन व्यवस्थाओं की नियमित समीक्षा कर संसद को प्रगति रिपोर्ट भी देनी होगी।
यदि यह योजना सफल होती है तो इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि किसी भी बड़े संकट की स्थिति में जापान की शासन व्यवस्था पूरी तरह ठप नहीं होगी। प्रधानमंत्री कार्यालय, महत्वपूर्ण मंत्रालय और अन्य आवश्यक संस्थान जरूरत पड़ने पर दूसरी राजधानी से अपना काम जारी रख सकेंगे।
इसके साथ ही सरकार का मानना है कि इससे टोक्यो पर वर्षों से बढ़ रहा आर्थिक और प्रशासनिक दबाव भी कम होगा। आज जापान की बड़ी आबादी, प्रमुख उद्योग, वित्तीय संस्थान और सरकारी कार्यालय टोक्यो में केंद्रित हैं। दूसरी राजधानी विकसित होने से निवेश, उद्योग और रोजगार दूसरे क्षेत्रों तक भी पहुँचेंगे, जिससे क्षेत्रीय विकास को गति मिलने की उम्मीद है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी यह योजना काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यदि भविष्य में किसी प्राकृतिक आपदा, साइबर हमले या अन्य सुरक्षा संकट के कारण टोक्यो प्रभावित होता है तो देश के पास पहले से तैयार एक वैकल्पिक प्रशासनिक केंद्र मौजूद होगा, जहाँ से सरकार बिना किसी रुकावट के काम करती रहेगी।
क्या भारत में भी दूसरी राजधानी की बहस हुई है?
दूसरी राजधानी का विचार केवल जापान तक सीमित नहीं है। भारत में भी इस विषय पर समय-समय पर चर्चा होती रही है। संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर ने 1955 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘थॉट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट्स‘ में हैदराबाद को भारत की दूसरी राजधानी बनाने का सुझाव दिया था।
उनका मानना था कि दिल्ली देश के दक्षिणी हिस्से के लोगों के लिए काफी दूर है, जिससे प्रशासनिक पहुँच प्रभावित होती है। उन्होंने यह भी तर्क दिया था कि दिल्ली भौगोलिक रूप से सीमाओं के अपेक्षाकृत करीब है, जबकि हैदराबाद देश के मध्य में स्थित होने के कारण अधिक संतुलित और सुरक्षित विकल्प हो सकता है।
यह बहस बाद के वर्षों में भी समय-समय पर सामने आती रही। वर्ष 2018 में कर्नाटक के तत्कालीन आवास मंत्री एम कृष्णप्पा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर बेंगलुरु को भारत की दूसरी राजधानी बनाने की माँग की थी।
उनका कहना था कि इससे दक्षिण भारत और राष्ट्रीय प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित होगा। हालाँकि केंद्र सरकार की ओर से इस दिशा में कोई औपचारिक कदम नहीं उठाया गया और नई दिल्ली आज भी देश की एकमात्र राजधानी है।
हालाँकि भारत में कुछ विशेषज्ञ यह भी सुझाव देते रहे हैं कि राजधानी बदलने के बजाय संसद के कुछ सत्र दक्षिण भारत में आयोजित किए जा सकते हैं या फिर सुप्रीम कोर्ट की स्थायी क्षेत्रीय पीठें स्थापित की जा सकती हैं, जिससे लोगों की प्रशासन और न्याय तक पहुँच आसान हो सके।
अब आगे क्या होगा?
जापान का यह फैसला पूरी दुनिया में इसलिए चर्चा का विषय बना हुआ है क्योंकि यह केवल राजधानी बदलने की योजना नहीं है, बल्कि भविष्य की आपदाओं के लिए शासन व्यवस्था को तैयार करने की कोशिश है। दुनिया के कई देशों ने पहले से ही प्रशासनिक शक्तियों का बंटवारा अलग-अलग शहरों में किया हुआ है।
दक्षिण अफ्रीका, मलेशिया, श्रीलंका, बोलीविया और नीदरलैंड जैसे देशों में अलग-अलग शहर प्रशासनिक, विधायी और न्यायिक जिम्मेदारियाँ निभाते हैं। जापान भी उसी दिशा में एक नया मॉडल विकसित करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसकी प्राथमिकता प्राकृतिक आपदाओं के दौरान सरकार की निरंतरता बनाए रखना है।
फिलहाल जापान ने केवल कानूनी ढाँचा तैयार किया है। अभी किसी भी शहर को दूसरी राजधानी घोषित नहीं किया गया है। आने वाले महीनों में इच्छुक राज्य अपने प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास भेजेंगे, जिसके बाद तय मानकों के आधार पर उनका मूल्यांकन किया जाएगा। जिसके बाद अंतिम निर्णय प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार के हाथ में होगा।
31 जुलाई 2026 की शाम दिल्ली में कैबिनेट की एक मीटिंग खत्म हुई और उसके बाद जो ऐलान हुआ, उसने भारत की पूरी ऊर्जा कहानी को नई दिशा दे दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने ‘समुद्र मंथन’ नाम की एक बड़ी योजना को मंजूरी दे दी। पूरा नाम है- नेशनल ऑफशोर एक्सप्लोरेशन स्कीम। इसके लिए सरकार ने ₹84,084 करोड़ का बजट रखा है, जो 2030-31 तक खर्च होगा। पेट्रोलियम मंत्रालय ने इसे भारत का अब तक का सबसे बड़ा और सबसे महत्वाकांक्षी समुद्री तेल गैस खोज मिशन बताया है।
कहानी यहीं से शुरू नहीं होती। इसकी नींव करीब साल भर पहले पड़ी थी, जब प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त 2025 को लाल किले से इसी तरह के एक आधुनिक समुद्र मंथन का जिक्र किया था। तब से लेकर अब तक सरकार लगातार नीतियों में बदलाव करती रही, ताकि जब असली योजना आए तो जमीन पहले से तैयार मिले।
भारत को इतनी बड़ी योजना की जरूरत क्यों पड़ी?
भारत आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल खरीदने वाला देश बन चुका है। हर साल भारत करीब 144 अरब डॉलर यानी लगभग ₹13 लाख करोड़ सिर्फ तेल के आयात पर खर्च करता है। यह पैसा हर साल बाहर चला जाता है, जबकि अगर देश के भीतर ही तेल और गैस निकल आए तो यही पैसा देश के विकास में लग सकता है।
पेट्रोलियम मंत्रालय की प्रेस विज्ञप्ति में साफ लिखा है कि हाल के भू राजनीतिक घटनाक्रम ने यह दिखा दिया है कि अपनी ऊर्जा की व्यवस्था खुद अपने हाथ में रखना कितना जरूरी है। समुद्र से जुड़ी जो तेल गैस खोजें होती हैं, उनमें एक अड़चन आती है, वह है समय। किसी भी समुद्री ब्लॉक को खोजने से लेकर वहाँ से तेल गैस निकलना शुरू होने तक 5 से 10 साल तक का वक्त लग जाता है।
इसके अलावा जो पुराने तेल गैस के कुएँ पहले से चल रहे हैं, उनका उत्पादन भी हर साल करीब 6 से 7 प्रतिशत घटता जाता है। यानी अगर नई खोज न हो तो देश का उत्पादन धीरे-धीरे कम ही होता जाएगा। इसी वजह से सरकार ने अब खोज को अपनी सबसे बड़ी प्राथमिकता बना दिया है।
पिछले 10 साल में जमीन कैसे तैयार हुई?
2014 के बाद से मोदी सरकार ने कई ऐसे बदलाव किए जिन्होंने आज की इस बड़ी योजना का रास्ता खोला। सबसे पहला बदलाव था नो गो एरिया को हटाना। पहले भारत के समुद्री क्षेत्र यानी एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन का बड़ा हिस्सा खोज के लिए बंद था। अब उसमें से 99 प्रतिशत से ज्यादा इलाका खोल दिया गया है, जिससे 10 लाख वर्ग किलोमीटर से ज्यादा समुद्री क्षेत्र पहली बार खोज के लिए उपलब्ध हुआ।
दूसरा बड़ा कदम था कॉन्ट्रैक्ट के तरीके को बदलना। पहले प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट का सिस्टम था, जिसमें कंपनियों को उलझन ज्यादा होती थी। अब उसकी जगह रेवेन्यू शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट लाया गया, जो पहले से आसान और साफ सुथरा है। इसके अलावा 2025 में ऑयलफील्ड्स रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट संशोधन कानून पास हुआ, जिसने पूरे सेक्टर के कानूनी ढाँचे को आधुनिक बनाया। साथ ही पेट्रोलियम एंड नेचुरल गैस रूल्स 2025 भी लागू हुए, जिससे कारोबार करना आसान हुआ।
योजना के 4 बड़े हिस्से
समुद्र मंथन योजना को चार मुख्य भागों में बाँटा गया है। पहला मुख्य समुद्र के भीतर का डेटा जुटाना, जिस पर ₹28,534 करोड़ खर्च होंगे। इसमें ₹12,000 करोड़ 2D सिस्मिक डेटा जुटाने पर लगेंगे, ₹12,534 करोड़ 3D सिस्मिट डेटा और अन्य तकनीकों पर खर्च होंगे और ₹4000 करोड़ पुराने डेटा को दोबारा प्रोसेस करने और उसमें AI टूल लगाने पर खर्च होंगे।
दूसरा सबसे बड़ा हिस्सा है- समुद्र में खुदाई और वहाँ से जुड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर, जिस पर ₹55,200 करोड़ खर्च होंगे। इसमें ₹43,200 करोड़ गहरे पानी के 60 खोजी कुएँ खोदने पर लगेंगे। सरकार हर कुएँ की खुदाई की लागत का 50 प्रतिशत तक या फिर ₹675 करोड़, जो भी कम हो, वहन करेगी। ₹10 हजार करोड़ साझा समुद्री इंफ्रास्ट्रक्चर हब बनाने पर खर्च होंगे, ताकि खोजी गई गैस और तेल को जल्दी बाजार तक पहुँचाया जा सके। बाकी ₹2000 करोड़ ऑयल एंड गैस मैन्युफैक्चरिंग एंड सर्विसेज जोन बनाने पर लगेंगे, ताकि इससे जुड़े उपकरण और सेवाएँ देश में ही बनें।
तीसरा हिस्सा है मॉनिटरिंग और सपोर्ट का काम, जिसके लिए ₹300 करोड़ रखे गए हैं। यह पैसा डिजिटल निगरानी, ट्रेनिंग, जागरूकता कार्यक्रम और मीडिया आउटरीच में खर्च होगा।
एक गहरे पानी के खोजी कुएँ की लागत औसतन ₹1,192 से ₹1,430 करोड़ के बीच बैठती है, यानी यह बहुत जोखिम भरा और महँगा काम है। इसीलिए सरकार ने इसमें आधे खर्च की जिम्मेदारी खुद उठाने का फैसला किया, ताकि निजी कंपनियाँ भी इसमें उतरने से न घबराएँ।
किन-किन इलाकों में होगी खुदाई, पूरा भूगोल समझिए
समुद्र मंथन का पैसा हवा में खर्च नहीं होगा। यह पैसा भारत के पूर्वी और पश्चिमी दोनों समुद्री तटों पर मौजूद कुछ खास नदी बेसिनों में खुदाई पर लगेगा। ये वो जगहें हैं जहाँ बड़ी-बड़ी नदियाँ सदियों से समुद्र में मिट्टी और तलछट बहाकर लाती रही हैं और उसी तलछट की मोटी परतों के नीचे तेल और गैस दबा हुआ माना जाता है। इसीलिए सरकार का पूरा फोकस इन चार बड़े इलाकों पर है।
कृष्णा गोदावरी बेसिन सबसे आगे है। यह इलाका आंध्र प्रदेश के तट पर है, जहाँ कृष्णा नदी और गोदावरी नदी दोनों बंगाल की खाड़ी में मिलती हैं। इन्हीं दोनों नदियों के नाम पर इसे केजी बेसिन कहा जाता है। यह इलाका पहले से ही भारत का सबसे बड़ा गैस उत्पादन केंद्र है और यहीं रिलायंस व ONGC के मशहूर गहरे पानी के गैस फील्ड भी मौजूद हैं। अब नई सिस्मिक तकनीक से इसी बेसिन के और गहरे हिस्सों में छिपे भंडारों की तलाश की जाएगी, जहाँ अभी तक पुरानी तकनीक की सीमाओं के कारण खुदाई नहीं हो पाई थी।
महानदी बेसिन दूसरा बड़ा इलाका है, जो ओडिशा के तट के पास स्थित है। यहाँ महानदी अपने साथ लाई मिट्टी बंगाल की खाड़ी में गिरती है। इस बेसिन में समुद्र के भीतर करीब 8 किलोमीटर की गहराई तक तेल और गैस के मजबूत भूगर्भीय संकेत मिले हैं, लेकिन अभी तक यहाँ बड़े पैमाने पर खोज नहीं हुई है। सरकार इसे भारत के सबसे संभावित लेकिन अभी तक अनछुए डीप वॉटर इलाकों में गिनती है।
बंगाल पूर्णिया बेसिन तीसरा इलाका है, जो पश्चिम बंगाल के तट और उससे सटे समुद्री हिस्से में फैला है। यहाँ समुद्र के नीचे तलछट की परत करीब 10 किलोमीटर तक मोटी है, जो अपने आप में एक बड़ी बात है, क्योंकि जितनी मोटी तलछट परत होगी, उतनी ही ज्यादा संभावना है कि उसके नीचे प्राचीन हाइड्रोकार्बन भंडार दबे हों।
कावेरी बेसिन चौथा इलाका है, जो तमिलनाडु के तट से शुरू होकर बंगाल की खाड़ी की तरफ फैलता है। यहाँ कावेरी नदी का मुहाना है और समुद्र के भीतर करीब 8 किलोमीटर गहराई तक कार्बोनेट चट्टानों की परतें मिली हैं, जिनमें जुरासिक युग के पुराने भंडार होने की उम्मीद जताई जा रही है।
इन चार नदी बेसिनों के अलावा अंडमान सागर का इलाका भी अब इस मिशन का अहम हिस्सा बन चुका है। यह क्षेत्र बाकी चारों बेसिनों से अलग है क्योंकि यह किसी बड़ी नदी के मुहाने पर नहीं, बल्कि अंडमान द्वीप समूह के आसपास के गहरे समुद्र में स्थित है, जहाँ की भूगर्भीय बनावट म्यांमार और इंडोनेशिया के तेल गैस क्षेत्रों जैसी मानी जाती है।
इसके अलावा योजना में पश्चिमी तट की मुंबई हाई और गुजरात के तटीय इलाकों को भी नजरअंदाज नहीं किया गया है, जहाँ पहले से चल रहे पुराने कुओं के आसपास भी नई सिस्मिक स्टडी और गहराई की खोज होगी, ताकि पुराने फील्ड के इर्द गिर्द छिपे छोटे भंडारों का भी पता लगाया जा सके।
साथ ही अंडमान का समुद्री क्षेत्र भी अब सुर्खियों में है। यहाँ ऑयल इंडिया लिमिटेड को हाल ही में एक बड़ी सफलता मिली है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने खुद 5 जून 2026 को इस खोज की घोषणा की कि श्री विजयपुरम-3 नाम के एक खोजी कुएँ में नैचुरल गैस मिली है।
An ocean of energy opportunities reinforced in the Andaman Sea! Very happy to report the presence of natural gas in Sri Vijayapuram-3 an exploratory well drilled by Oil India Ltd. 15 km off the east coast of the Andaman Islands at a water… pic.twitter.com/j6QvWqZkFx
यह कुआँ अंडमान द्वीप समूह के पूर्वी तट से लगभग 15 किलोमीटर दूर और 355 मीटर गहरे समुद्र में खोदा गया था। समुद्र के तल से करीब 1900 मीटर से ज्यादा गहराई पर इओसीन नाम की भूगर्भीय परत में लगातार गैस फ्लेयरिंग दर्ज हुई, जो बताती है कि वहाँ गैस काफी दबाव के साथ मौजूद है।
यह अंडमान क्षेत्र में मिली दूसरी सफलता है। इससे पहले 2025 में श्री विजयपुरम-2 कुएँ में भी गैस मिलने की पुष्टि हो चुकी थी, जिसमें लगभग 87 प्रतिशत शुद्ध मीथेन पाई गई थी। भूवैज्ञानिकों का मानना है कि अंडमान की समुद्री संरचना म्यांमार और इंडोनेशिया के उन इलाकों जैसी ही है, जहाँ पहले से बड़े पैमाने पर तेल गैस निकाला जा रहा है। अगर सब कुछ योजना के अनुसार चला तो इस इलाके से 2030 तक व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो सकता है।
राजस्थान में नई खोज
सिर्फ पूर्वी तट ही नहीं, राजस्थान से भी अच्छी खबर आई है। ऑयल इंडिया लिमिटेड को जैसलमेर के डांडेवाला फील्ड में एक नया गैस कुआँ मिला है, जहाँ पहली बार बेहद कम गहराई पर स्थित सानू फॉर्मेशन से गैस निकलनी शुरू हुई है। यह कुआँ सिर्फ 950 मीटर तक ड्रिल किया गया था और शुरुआती परीक्षण में हर दिन करीब 25 हजार स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर गैस निकलती पाई गई। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यहाँ कुल 75 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर गैस का भंडार मौजूद हो सकता है।
ONGC का सबसे बड़ा दाँव
अंडमान की इस सफलता के बाद ONGC ने भी अपना अब तक का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट शुरू कर दिया है। कंपनी गहरे और अति गहरे पानी में ड्रिलिंग के लिए करीब ₹1.5 लाख करोड़ का निवेश करने जा रही है। इसके लिए वैश्विक टेंडर निकाले जा चुके हैं और मुंबई में हुई प्री बिड मीटिंग में दुनिया की एक दर्जन बड़ी ड्रिलिंग कंपनियों ने हिस्सा लिया। इस काम में ONGC ने ब्राजील की पेट्रोब्रास, फ्रांस की टोटल एनर्जी और अमेरिका की एक्सोनमोबिल (Exxonmobil) जैसी दिग्गज कंपनियों के साथ भी तकनीकी सहयोग किया है।
इस पूरे मिशन में एडवांस्ड सिस्मिक इमेजिंग तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है। सर्वे जहाज समुद्र में कई किलोमीटर लंबी केबल छोड़ते हैं, जो नीचे की ओर ध्वनि तरंगें भेजती हैं। ये तरंगें समुद्र तल और उसके नीचे की चट्टानों से टकराकर वापस लौटती हैं और जहाज पर लगे सेंसर उन्हें रिकॉर्ड करते हैं। इसके बाद सुपरकंप्यूटर की मदद से समुद्र के नीचे की एक साफ तस्वीर तैयार की जाती है, जिससे पता चलता है कि किस जगह तेल गैस फँसा हो सकता है।
सरकार ने इसमें खर्च कम करने के लिए मल्टी क्लाइंट मॉडल भी अपनाया है। इसमें विदेशी जियोफिजिकल कंपनियाँ अपने खर्च और अपने जोखिम पर डेटा जुटाती हैं और बाद में उसे बाकी तेल कंपनियों को बेच देती हैं। इससे सरकार पर शुरुआती बोझ नहीं पड़ता और निजी निवेश भी आसानी से आता है।
लक्ष्य कितना बड़ा है?
पेट्रोलियम मंत्रालय के मुताबिक अगर खोज में सफलता मिलती रही तो भारत का सालाना तेल गैस उत्पादन मौजूदा 62 मिलियन मीट्रिक टन ऑयल इक्विवेलेंट से बढ़कर 80 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुँच सकता है। देश का कुल हाइड्रोकार्बन भंडार भी 1.6 अरब टन से बढ़कर 2.2 अरब टन हो सकता है। इससे हर साल करीब ₹1 लाख करोड़ के तेल आयात में कमी आने की उम्मीद है।
सरकार ने यह भी बताया कि इस योजना से 600 मिलियन मीट्रिक टन ऑयल इक्विवेलेंट से ज्यादा नए भंडार जुड़ सकते हैं और बड़े पैमाने पर रोजगार भी पैदा होगा।
आगे का रास्ता
समुद्र मंथन अब सिर्फ एक नीति नहीं, बल्कि जमीन पर काम करता हुआ मिशन बन चुका है। अंडमान में मिली गैस, राजस्थान में मिला नया भंडार और ONGC का ₹1.5 लाख करोड़ का निवेश यह दिखाते हैं कि सरकार इस बार सिर्फ बात नहीं, ठोस काम कर रही है। अगर अगले पाँच साल में तय की गई 60 खोजी कुओं की खुदाई और बड़े पैमाने पर सिस्मिक सर्वे का काम पूरा होता है, तो भारत आने वाले दशक में अपनी तेल गैस जरूरतों के लिए दूसरे देशों पर उतना निर्भर नहीं रहेगा जितना आज है। यही वह लक्ष्य है, जिसे हासिल करने के लिए ₹84,084 करोड़ की यह पूरी योजना बनाई गई है।
भारत और चीन के बीच ऐतिहासिक ‘शिपकी ला’ (Shipki La) दर्रे के जरिए सीमा व्यापार छह साल के लंबे अंतराल के बाद एक बार फिर शुरू हो गया है। इस प्राचीन मार्ग के फिर से खुलने से सदियों पुराने ‘सिल्क रूट’ पर एक बार फिर से व्यापारिक गतिविधियाँ और हलचल लौट आई हैं।
साल 2019 में फैली कोविड-19 महामारी और उसके बाद 2020 में गलवान घाटी में हुए गंभीर सैन्य तनाव के कारण यह व्यापारिक मार्ग पूरी तरह ठप पड़ा हुआ था। अब छह वर्षों बाद द्विपक्षीय सीमा व्यापार की बहाली से हिमाचल प्रदेश के सीमावर्ती जनजातीय क्षेत्रों में स्थानीय अर्थव्यवस्था और आजीविका के नए रास्ते भी खुलते दिख रहे हैं।
हिमालय की दुर्गम ऊँचाइयों पर स्थित यह मार्ग केवल आर्थिक लेन-देन का जरिया नहीं है, बल्कि यह दोनों देशों के बीच सीमावर्ती सुरक्षा, जनसांख्यिकीय महत्व और ऐतिहासिक कूटनीति का भी एक अहम केंद्र बिंदु रहा है।
#WATCH | The historic India-China border trade through Shipki-La in Himachal Pradesh's Kinnaur district resumed on Saturday after a gap of nearly six to seven years, marking a significant milestone for the border region.
भारत और चीन के बीच सीमा व्यापार का इतिहास कई शताब्दियों पुराना है और यह प्राचीन ‘सिल्क रूट’ के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक माना जाता रहा है। ऐतिहासिक रूप से, भारत के उत्तरी सीमावर्ती राज्यों जैसे कि हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम के स्थानीय व्यापारी तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के साथ स्वतंत्र और निर्बाध रूप से व्यापार करते आ रहे थे।
स्वतंत्रता के बाद आधुनिक भारत में इस व्यापार को एक औपचारिक और कानूनी स्वरूप देने के लिए वर्ष 1954 में ‘पंचशील समझौता’ किया गया। इस समझौते के तहत तीन प्रमुख सीमावर्ती बिंदुओं- हिमाचल प्रदेश में शिपकी ला, उत्तराखंड में लिपुलेख और सिक्किम में नाथू ला को आधिकारिक सीमा व्यापार केंद्र के रूप में मान्यता दी गई।
इस औपचारिक व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले जनजातीय समुदायों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करना और उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत करना था। हालाँकि यह शुरुआती औपचारिक व्यापार बहुत लंबे समय तक नहीं चल सका।
वर्ष 1962 में भारत और चीन के बीच हुए युद्ध के बाद यह पूरा व्यापारिक ढाँचा अचानक ध्वस्त हो गया। सुरक्षा कारणों से भारत ने अपनी उत्तरी सीमाओं को सील कर दिया और यह व्यापारिक मार्ग अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिया गया।
इसके बाद दोनों देशों के बीच कूटनीतिक वार्ताओं की प्रक्रिया दोबारा शुरू हुई। 13 दिसंबर 1991 को सीमा व्यापार दोबारा शुरू करने पर समझौता हुआ। लंबे प्रयासों के बाद 1992 में उत्तराखंड के लिपुलेख, 1994 में हिमाचल के शिपकी ला और अंततः 2006 में सिक्किम के नाथू ला दर्रे को फिर से व्यापार के लिए खोल दिया गया।
व्यापार रुकने के मुख्य कारण
वर्ष 2000 के दशक में पुनः शुरू हुआ यह सीमा व्यापार लगभग डेढ़ दशक तक बिना किसी बड़ी रुकावट के मौसमी आधार पर संचालित होता रहा, लेकिन हाल के वर्षों में आई दो बड़ी अंतरराष्ट्रीय घटनाओं ने इस पर एक बार फिर से लंबा ब्रेक लगा दिया।
पहला निलंबन वर्ष 2019 के अंत और 2020 के शुरुआत में आया, जब वैश्विक स्तर पर फैले कोविड-19 संक्रमण को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को कड़ाई से सील कर दिया गया। सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा प्रोटोकॉल के कारण व्यापारिक गतिविधियों को अस्थायी रूप से रोक दिया गया था।
अभी महामारी का प्रभाव कम भी नहीं हुआ था कि मई-जून 2020 में पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में दोनों देशों की सेनाओं के बीच एक भीषण हिंसक सैन्य गतिरोध पैदा हो गया। सीमा पर बढ़ते सैन्य तनाव और गंभीर सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए भारत सरकार और सुरक्षा एजेंसियों ने सीमा व्यापार से जुड़ी सभी गतिविधियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया।
इसके बाद के वर्षों में सीमा पर दोनों ओर से बड़े पैमाने पर सैन्य तैनाती रही, जिसके कारण शिपकी ला सहित अन्य सभी व्यापारिक दर्रों पर ताले लटके रहे। लगभग छह वर्षों के लंबे अंतराल, कूटनीतिक वार्ताओं, प्रशासनिक बैठकों और सीमा सुरक्षा प्रोटोकॉल के पुनर्मूल्यांकन के बाद अब इस व्यापार को पुनः संचालित करने का निर्णय लिया गया है।
आम लोगों के लिए प्रतिबंध का कारण
बहुत से लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि जब यह अंतरराष्ट्रीय सीमा व्यापार मार्ग खोला जाता है, तब भी इस पर आम नागरिकों, बाहरी व्यापारियों या पर्यटकों को आवाजाही और व्यापार की छूट क्यों नहीं दी जाती। दरअसल भारत-चीन सीमा व्यापार का यह मॉडल कोई सामान्य व्यावसायिक या खुला ई-कॉमर्स बाजार नहीं है।
यह एक अत्यधिक संवेदनशील, नियंत्रित और विशेष बार्टर एवं लोकल ट्रेड सिस्टम है। इसके आम लोगों के लिए प्रतिबंधित रहने का सबसे प्राथमिक कारण राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता का मुद्दा है। जिन भौगोलिक स्थानों से यह व्यापार होता है, वे सभी अत्यधिक संवेदनशील और उच्च सुरक्षा वाले सैन्य क्षेत्रों (High Security Military Zones) में स्थित हैं।
यदि इन मार्गों को आम जनता या बाहरी व्यापारियों के लिए अनियंत्रित रूप से खोल दिया जाए, तो इससे सीमावर्ती क्षेत्रों में घुसपैठ, अवैध नेटवर्क, तस्करी और संवेदनशील सैन्य प्रतिष्ठानों की जासूसी जैसे गंभीर सुरक्षा खतरे पैदा हो सकते हैं। इसी वजह से द्विपक्षीय समझौतों के अनुसार यह अधिकार केवल और केवल संबंधित सीमावर्ती जिलों (जैसे हिमाचल का किन्नौर या उत्तराखंड का पिथौरागढ़) के पंजीकृत स्थानीय निवासियों तक ही सीमित रखा जाता है।
इसके लिए स्थानीय प्रशासन, गृह विभाग और पुलिस एजेंसियां व्यापारियों का गहन पृष्ठभूमि और सुरक्षा सत्यापन (Security Verification) करती हैं। इस सत्यापन के बाद ही व्यापारियों को सीमित समय और कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत व्यापारिक पास जारी किए जाते हैं। आम जनता के लिए इन संवेदनशील दर्रों से आवाजाही पूरी तरह से प्रतिबंधित रहती है।
आयात और निर्यात होने वाले सामान
भारत-चीन सीमा व्यापार की एक अन्य बड़ी विशेषता यह है कि इसमें आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, भारी मशीनरी, ऑटोमोबाइल या बड़े औद्योगिक सामानों का आयात-निर्यात नहीं किया जा सकता। विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT), भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय और चीन के समकक्ष प्राधिकरणों द्वारा आपसी सहमति से पूर्व-निर्धारित और अधिसूचित वस्तुओं की एक स्पष्ट सूची तैयार की जाती है, जिसके बाहर किसी भी सामान का लेन-देन कानूनन अपराध माना जाता है।
भारत की ओर से मुख्य रूप से स्थानीय हस्तशिल्प उत्पाद, हथकरघा वस्त्र, पारंपरिक मसाले, गुड़, मेवे, चावल, वनस्पति तेल, चाय, कॉफी, कांसे व तांबे के बर्तन, रेडीमेड कपड़े और स्थानीय पहाड़ी क्षेत्रों में उगने वाली जड़ी-बूटियों का निर्यात तिब्बती स्वायत्त क्षेत्र के बाजारों में किया जाता है।
दूसरी ओर से चीन और तिब्बत के बाजारों से भारत में आने वाले सामानों में मुख्य रूप से पारंपरिक कच्चे माल और स्थानीय तिब्बती उत्पाद ही शामिल होते हैं।
सीमा व्यापार का महत्व
भारत और चीन के बीच इस सीमा व्यापार का दायरा भले ही दोनों देशों के बीच होने वाले अरबों डॉलर के कुल राष्ट्रीय आयात-निर्यात की तुलना में बहुत छोटा दिखता हो, लेकिन इसका सामाजिक, आर्थिक और रणनीतिक मूल्य अत्यधिक महत्वपूर्ण है।
सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह व्यापार हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम के अत्यधिक दुर्गम और दूरदराज के जनजातीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की आजीविका का एक मुख्य मौसमी साधन है। कठोर भौगोलिक परिस्थितियों और सीमित संसाधनों के कारण इन क्षेत्रों में रोजगार के विकल्प बेहद सीमित होते हैं, ऐसे में कुछ महीनों के लिए खुलने वाला यह व्यापार स्थानीय परिवारों को अच्छी आय और संबल प्रदान करता है।
रणनीतिक और सामरिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो भारतीय सीमाओं पर स्थानीय आबादी का बसाव और उनका आर्थिक रूप से मजबूत होना राष्ट्रीय सुरक्षा का एक बेहद मजबूत आधार माना जाता है। भारत सरकार द्वारा सीमावर्ती बुनियादी ढाँचे (Border Infrastructure) को मजबूत करने के साथ-साथ इन पारंपरिक व्यापारिक मार्गों को नियंत्रित तरीके से संचालित करना यह दर्शाता है कि भारत अपनी संप्रभुता और सुरक्षा से समझौता किए बिना स्थानीय निवासियों के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है।
तकनीक की दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर मची होड़ के बीच दिग्गज टेक कंपनी गूगल को एक बड़ा झटका लगा है। गूगल ने अपने बेहद लोकप्रिय प्लेटफॉर्म गूगल अर्थ पर लॉन्च किए गए एक ‘क्रांतिकारी’ AI इमेज-जेनरेटर फीचर को महज 24 घंटे के भीतर ही पूरी तरह से रोलबैक यानी बंद कर दिया है।
कंपनी को यह कदम तब उठाना पड़ा जब इस टूल का इस्तेमाल कर लोगों ने ऐसी फर्जी और भ्रामक तस्वीरें सोशल मीडिया पर शेयर करनी शुरू कर दीं, जो गूगल की नीतियों का खुला उल्लंघन कर रही थीं।
शोधकर्ताओं और पत्रकारों ने चेतावनी दी कि इस टूल के जरिए दुनिया के किसी भी कोने की हूबहू नकली सैटेलाइट तस्वीरें बनाई जा सकती हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी भ्रम और गलत जानकारी फैलने का खतरा पैदा हो गया है।
क्या था यह नया AI फीचर और कैसे काम करता था?
गूगल ने गुरुवार (30 जुलाई 2026) को गूगल अर्थ के वेब वर्जन पर एक नया फीचर पेश किया था, जिसका नाम था- ‘क्रिएट इमेज’। इस टूल को गूगल के सबसे एडवांस इमेज-जेनरेशन मॉडल ‘नैनो बनाना 2’ की ताकत दी गई थी।
यह टूल यूजर को यह सुविधा देता था कि वे गूगल अर्थ पर दुनिया की किसी भी जगह या ऐतिहासिक इमारत पर जूम-इन करें और एक साधारण टेक्स्ट प्रॉम्ट टाइप करें। यह AI मॉडल गूगल अर्थ के असली सैटेलाइट,एरियल और 3D मैपिंग डेटा का इस्तेमाल करके पलक झपकते ही बिल्कुल असली दिखने वाली काल्पनिक तस्वीरें उसके ऊपर फिट कर देता था।
गूगल के प्रोडक्ट मैनेजर ब्रायन होरोविट्ज ने इसे लॉन्च करते समय कहा था, “यह फीचर लोगों की कल्पनाओं को सच करने के लिए बनाया गया है बस गूगल अर्थ पर किसी जगह पर जाएँ, क्रिएट इमेज पर टैप करें और जो देखना चाहते हैं उसे टाइप करें।”
लॉन्च के तुरंत बाद क्यों खड़ा हुआ विवाद?
जैसे ही यह टूल आम जनता के हाथ लगा, वैसे ही ओपन-सोर्स इंटेलिजेंस (OSINT) एक्सपर्ट्स, शोधकर्ताओं और खोजी पत्रकारों ने इसकी कमियों और खतरनाक पहलुओं को खोजना शुरू कर दिया। इस टूल की सबसे बड़ी आलोचना यह थी कि इससे ऐतिहासिक इमारतों और संवेदनशील जगहों को लेकर बिल्कुल असली जैसे नकली दृश्य बनाए जा सकते थे।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि सैटेलाइट इमेजरी को अब तक दुनिया में सबसे भरोसेमंद डेटा माना जाता रहा है, क्योंकि इसे सैकड़ों मील ऊपर अंतरिक्ष में मौजूद कैमरों से लिया जाता है और इसे बदलना या फेक बनाना आसान नहीं होता लेकिन गूगल के इस टूल ने एक क्लिक में फर्जी सैटेलाइट तस्वीरें बनाना इतना आसान कर दिया कि कोई भी आम इंसान धोखा खा जाए।
एक्सपर्ट्स ने क्या-क्या फर्जी तस्वीरें बनाकर दिखाईं?
BBC वेरीफाई और प्रमुख ओपन-सोर्स रिसर्चर हेंक वैन एस्स ने इस टूल की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलने के लिए कई टेस्ट किए। उन्होंने ऐसे प्रॉम्ट्स डाले जो बेहद संवेदनशील और खतरनाक थे लेकिन गूगल के AI ने उन्हें बिना किसी रोक-टोक के बना दिया।
अगर हेंक वैन एस्स के टेस्ट की बात करें तो उन्होंने ईरान में एक काल्पनिक न्यूक्लियर प्लांट, अमेरिका-मेक्सिको सीमा पर शरणार्थियों का जमावड़ा, एम्स्टर्डम में एक बड़ा हादसा और गाजा में एक अस्पताल के ठीक बगल में बम गिरने से बना गड्ढा जैसी तस्वीरें आसानी से बना लीं।
वहीं, BBC वेरीफाई की टीम ने अपनी टेस्टिंग में फ्रांस के एफिल टॉवर को ढहते हुए, मिस्र के गीजा पिरामिड को एक बड़े गड्ढे में समाते हुए और यूक्रेन की राजधानी कीव की सड़कों पर रूसी टैंकों को घूमते हुए दिखा दिया।
इसके अलावा अन्य मीडिया टेस्ट के दौरान कुछ पत्रकारों ने ईरान के खार्ग द्वीप पर भीषण आग लगने और अमेरिकी संसद में भयानक बाढ़ आने जैसी तस्वीरें भी जनरेट कर लीं, जो अगर सच होतीं तो दुनिया भर की मीडिया के लिए बहुत बड़ी और संवेदनशील खबर बन जातीं।
एक्सपर्ट हेंक वैन एस्स ने चिंता जताते हुए कहा, “इस टूल में सबसे खतरनाक बात यह थी कि एक मनगढ़ंत और फर्जी तस्वीर को बिल्कुल असली कोऑर्डिनेट्स और असली मैप के ऊपर जोड़ दिया जाता था। जालसाजी को खुद में बहुत ज्यादा असली दिखने की जरूरत नहीं थी क्योंकि उसे उस नक्शे से विश्वसनीयता मिल जा रही थी जिस पर उसे बनाया गया था।”
गूगल ने अपने बचाव में क्या दलील दी और पॉलिसी क्या थी?
विवाद बढ़ने के बाद गूगल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स और मीडिया आउटलेट्स को दिए बयानों में अपनी सफाई पेश की। गूगल ने कहा कि वह मिसइन्फॉर्मेशन को लेकर बेहद गंभीर है।
कंपनी ने बताया कि इस टूल से बनने वाली हर तस्वीर में ‘सिंथआईडी’ डिजिटल वॉटरमार्क लगाया गया था। यह एक अदृश्य मार्कर होता है जो AI द्वारा बनाई गई तस्वीरों में छिप जाता है। अगर किसी यूजर को किसी तस्वीर पर शक हो, तो वह गूगल के जेमिनी चैटबॉट से पूछ सकता है या गूगल लेंस का इस्तेमाल करके यह पता लगा सकता है कि इमेज असली है या AI से बनी है।
साथ ही गूगल ने दावा किया कि उनकी पॉलिसी के तहत हानिकारक विषयों पर इमेज बनाने की मनाही है और वे अपनी सुरक्षा प्रणालियों को लगातार अपडेट कर रहे हैं। इसके अलावा यह तस्वीरें मुख्य गूगल अर्थ एक्सपीरियंस में आम जनता को सीधे नहीं दिखती थीं बल्कि केवल वही यूजर इन्हें देख और डाउनलोड कर सकता था जो इन्हें बना रहा था।
सुरक्षा कवच में चूक, कैसे फेल हो गए गूगल के दावे?
गूगल ने जो सुरक्षा दावे किए थे, जमीनी हकीकत में वे पूरी तरह नाकाम साबित हुए। BBC वेरीफाई की पड़ताल में सामने आया कि गूगल के सुरक्षा नियमों को बहुत आसानी से चकमा दिया जा सकता था।
यूजर द्वारा प्रॉम्ट बदलकर सेफ्टी फीचर्स को बाईपास करना काफी आसान था, जैसे जब टूल से ब्रिटेन की संसद के पास देशद्रोहियों को फांसी देने के लिए मंच बनाने को कहा गया, तो सिस्टम ने इसे रिजेक्ट कर दिया था लेकिन जैसे ही थोड़े घुमावदार और कम स्पष्ट शब्दों का इस्तेमाल किया गया, AI ने तुरंत वैसी ही तस्वीर बनाकर दे दी।
इसी तरह व्हाइट हाउस के लॉन पर ट्रंप लिखने से मना करने वाले टूल ने उसी जगह पर एक कम्युनिटी गार्डन बनाने की इजाजत दे दी। इसके साथ ही वॉटरमार्क और डिटेक्शन की नाकामी भी देखने को मिली।
हालाँकि, गूगल के टूल्स शुरुआती तौर पर वॉटरमार्क पहचान पा रहे थे लेकिन BBC ने पाया कि कुछ तरीकों से इन चेक्स को भी बाईपास किया जा सकता था और जेमिनी को यह झूठ बोलने के लिए मजबूर किया जा सकता था कि ये फर्जी तस्वीरें असली हैं। इसके अलावा बाजार में मौजूद अन्य बाहरी AI डिटेक्टर टूल्स भी इन तस्वीरों को पहचानने में पूरी तरह फेल हो गए।
सैटेलाइट इमेजरी के भरोसे पर क्या असर पड़ेगा?
इस मामले ने पूरी दुनिया के पत्रकारों, फैक्ट-चेकर्स और जियोपॉलिटिकल विश्लेषकों को डरा दिया है। अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के सैटेलाइट इमेजरी विश्लेषक ब्रैडी एफ्रिक ने बताया कि इस अपडेट ने बहुत ही ठोस दिखने वाली फर्जी सैटेलाइट तस्वीरें बनाना बच्चों का खेल बना दिया, जिससे ये तस्वीरें इंटरनेट पर आग की तरह फैल सकती हैं और जनता को आसानी से गुमराह कर सकती हैं।
बैलिंगकैट के सीनियर रिसर्चर जेक गोडिन ने कहा कि पहले भी युद्ध के दौरान ऐसी फर्जी तस्वीरें सामने आई हैं, जैसे इजरायल-इरान तनाव के समय बहरीन में एक अमेरिकी बेस के तबाह होने की फर्जी तस्वीर ईरानी मीडिया में चलाई गई थी। लेकिन गूगल जैसे बड़े प्लेटफॉर्म द्वारा यह टूल सीधे यूजर्स को दे देने से फर्जी इमेजरी बनाने की प्रक्रिया बहुत तेज हो गई।
इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होगा कि आने वाले समय में जब वास्तविक युद्ध क्षेत्रों या मानवाधिकार उल्लंघनों की असली सैटेलाइट तस्वीरें सामने आएँगी, तो दोषी सरकारें और प्रॉपगैंडा चलाने वाले लोग बड़ी आसानी से यह कहकर पल्ला झाड़ लेंगे कि “यह तो AI से बनी नकली तस्वीर है।” इससे भविष्य में सच और झूठ की पहचान करना और भी मुश्किल हो जाएगा।
टेक इंडस्ट्री में मची हड़बड़ी का एक और उदाहरण
गूगल अर्थ का यह मामला कोई अकेला उदाहरण नहीं है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को अपने प्रोडक्ट्स में शामिल करने की अंधी दौड़ में बड़ी-बड़ी टेक कंपनियां लगातार गलतियाँ कर रही हैं और फिर आलोचना होने पर फीचर्स को बंद कर रही हैं।
हाल ही में मेटा कंपनी ने भी अपने एक AI फीचर ‘म्यूज इमेज’ को बंद कर दिया था। इस फीचर के जरिए लोग इंस्टाग्राम के पब्लिक अकाउंट्स की तस्वीरों का इस्तेमाल करके नई AI तस्वीरें बना पा रहे थे, जिसका हॉलीवुड यूनियनों और प्राइवेसी एक्टिविस्ट्स ने कड़ा विरोध किया था।
गूगल ने आखिरकार अपनी गलती मानते हुए एक्स पर लिखा हम जानते हैं कि लोग दुनिया के एक विश्वसनीय नजारे के लिए गूगल अर्थ पर अनोखा भरोसा करते हैं।
हमने देखा कि जियोस्पेशियल प्रोफेशनल्स ने इस फीचर का कई अच्छे कामों के लिए इस्तेमाल किया लेकिन कुछ लोगों ने ऐसी तस्वीरें भी शेयर कीं जो हमारी नीतियों के खिलाफ हैं। इसलिए हम गूगल अर्थ से इस फीचर को फिलहाल हटा रहे हैं। जब तक कि हम इस पर और मजबूत सुरक्षा घेरा लागू नहीं कर देते।