भारतीय राजनीति में पिछले कुछ सालों में एक नया बदलाव तेजी से देखने को मिला है। अब राजनीति सिर्फ पुराने नेताओं या पारंपरिक पार्टियों तक सीमित नहीं रही। आंदोलन से निकले चेहरे और फिल्मी सितारे सीधे सत्ता तक पहुँचने लगे हैं। जनता भी ऐसे चेहरों को जल्दी अपनाती है क्योंकि उन्हें लगता है कि शायद ये लोग पुराने सिस्टम से अलग कुछ नया करेंगे।
लेकिन यहीं से सबसे बड़ा सवाल भी शुरू होता है। क्या सिर्फ लोकप्रियता और जनता से जुड़ाव के दम पर सरकार चलाई जा सकती है? क्योंकि आंदोलन करना, भाषण देना और लोगों की उम्मीद बन जाना एक अलग बात है लेकिन सत्ता संभालना बिल्कुल अलग खेल होता है। वहाँ सिर्फ नारे नहीं, आपके फैसले काम आते हैं।
तमिलनाडु की राजनीति इस समय कुछ ऐसे ही मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। राज्य को एक नया और बेहद लोकप्रिय चेहरा मिल चुका है। फिल्म स्टार जोसेफ विजय 10 मई 2026 को मुख्यमंत्री बने। जनता ने उन्हें उम्मीदों के साथ सत्ता तक पहुँचाया लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर विजय सरकार की असली दिशा क्या है? क्योंकि अब तक जो तस्वीर सामने आई है, उसमें एक साफ विचारधारा से ज्यादा प्रयोग, विरोधाभास और असमंजस दिखाई देता है।
विजय की लोकप्रियता और सरकार चलाने की चुनौती
इसमें कोई शक नहीं, विजय की सबसे बड़ी ताकत उनकी लोकप्रियता है। उन्होंने फिल्मों के जरिए खुद को हमेशा आम लोगों से जुड़ा हुआ चेहरा दिखाया। वैसे भी तमिलनाडु की राजनीति में फिल्म स्टार्स का असर कोई नई बात नहीं है। एमजीआर से लेकर जयललिता तक जनता पहले भी सिनेमा के चेहरों को सत्ता तक पहुँचाती रही है। इसलिए विजय का मुख्यमंत्री बनना पूरी तरह हैरान करने वाला नहीं था।
लेकिन चुनाव जीतना और सरकार चलाना, दोनों अलग चीजें हैं। यही असली परीक्षा होती है। और फिलहाल ऐसा लग रहा है कि विजय सरकार अभी उसी परीक्षा में उलझी हुई है।
अब जैसे सरकार बनने के तुरंत बाद मंत्रालयों का बंटवारा शुरू हुआ और उसी समय से सवाल भी उठने लगे। उदाहरण के लिए राजमोहन अरुमुगम को फिल्म टेक्नोलॉजी और सिनेमाटोग्राफी मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई। इसके बाद खुद फिल्म इंडस्ट्री के भीतर से विरोध शुरू हो गया।
मशहूर तमिल अभिनेता विशाल ने खुलेआम सवाल उठाया कि जिस व्यक्ति को फिल्म इंडस्ट्री की समस्याओं और काम करने के तरीके की समझ ही नहीं है, उसके सामने इंडस्ट्री अपनी परेशानियाँ कैसे रखे?
इस सवाल को आप अगर ऐसे देखें कि ये केवल फिल्म इंडस्ट्री की बात नहीं है। ये सवाल सरकार के फैसले लेने की क्षमता पर था क्योंकि लोगों को लगा कि अगर विजय खुद इसी इंडस्ट्री से आते हैं, तो शायद इसे वो ज्यादा बेहतर तरीके से संभाल सकते थे।
ओएसडी विवाद और फैसलों में असमंजस
खैर इसके पहले ओएसडी वाला विवाद भी सामने आया था जिसने सरकार की छवि को और उलझा दिया। विजय के करीबी ज्योतिषी राधन पंडित को ओएसडी बनाया गया। शुरुआत में सरकार ने इस फैसले को सामान्य नियुक्ति की तरह पेश किया, लेकिन जब विधानसभा में इसका जमकर विरोध हुआ और विपक्ष कहने लगा कि अगर वो आपके निजी ज्योतिषी हैं तो उन्हें निजी दायरे में रखिए, शासन-प्रशासन में क्यों ला रहे हैं? इसके बाद उनके ज्योतिषी को ओएसडी नहीं बनाया गया।
अब यहाँ फिर सवाल सीधा खड़ा होता है कि क्या सरकार, फैसले किसी साफ प्रशासनिक प्रक्रिया से ले रही है या फिर निजी घेरे और निजी आस्थाओं का असर ज्यादा दिखाई दे रहा है? क्योंकि अगर फैसला सही था तो वापस क्यों लिया गया? और अगर गलत था तो शुरुआत में किया ही क्यों गया?
यही चीज सरकार की छवि को कमजोर करती है। ऐसा लगता है जैसे सरकार कई बार योजना बनाकर नहीं, बल्कि प्रतिक्रिया देने के ढर्रे पर काम कर रही है।
TVK और खुद विजय की विचारधारा को लेकर विरोधाभास
सबसे बड़ा असमंजस सिर्फ फैसलों में नहीं है बल्कि असमंजस विजय की विचारधारा को लेकर भी है। एक तरफ वो खुद को उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष राजनीति का चेहरा दिखाना चाहते हैं, वो हाथ में कड़ा, कलावा पहनते हैं, ज्योतिष में भरोसा करते हैं, वहीं दूसरी तरफ डीएमके की राजनीति से पूरी दूरी भी नहीं बनाते। तमिलनाडु में डीएमके लंबे समय से द्रविड़ राजनीति और सनातन विरोध जैसे मुद्दों पर अपनी पहचान बनाती रही है।
पिछले कुछ वर्षों में डीएमके नेताओं के कई बयान विवादों में रहे हैं। हाल ही में विधानसभा में उदयनिधि स्टालिन ने तो सनातन को मिटाने का अपना बयान फिर से दोहराया। “सनातन कब मिटेगा जब सनातनी यानी हिन्दू ख़तम होगा…” उदयनिधि ने जब ये बयान दिया तब विजय भी सदन में मौजूद थे लेकिन उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।
यहीं से लोगों के मन में सवाल उठने लगे कि आखिर विजय की अपनी राजनीतिक लाइन क्या है? इसी बीच उनकी कैबिनेट के एक आईयूएमएल मंत्री सचिवालय में इस्लामी रस्म-रिवाज करते भी दिखाई दिए। इसके बाद फिर सरकार की धर्मनिरपेक्ष छवि पर बहस शुरू हो गई।
अब जनता के मन में असमंजस होना स्वाभाविक है। क्या सरकार डीएमके की वैचारिक लाइन पर चल रही है? क्या हर वर्ग को खुश रखने की कोशिश हो रही है? या फिर खुद विजय अभी तय नहीं कर पा रहे कि उन्हें किस तरह की राजनीति करनी है?
देखिए, सबको साथ लेकर चलने की बात सुनने में हमेशा अच्छी लगती है। लोकतंत्र में समावेशी राजनीति जरूरी भी है। लेकिन सिर्फ संतुलन बनाने के खेल से सरकारें नहीं चलतीं।
सरकार को आखिरकार एक साफ दिशा चाहिए। क्योंकि अगर हर तरफ थोड़ा-थोड़ा खुश करने की कोशिश होगी, तो धीरे-धीरे सरकार की अपनी अलग पहचान ही खो जाती है।
आर्थिक मोर्चा और मुफ्त योजनाओं का मॉडल
यहाँ आर्थिक मोर्चे पर भी तस्वीर बहुत साफ नहीं है। तमिलनाडु पहले से ही भारी कर्ज के दबाव में है। विजय सरकार लगातार पिछली डीएमके सरकार पर आर्थिक हालत खराब करने के आरोप लगा रही है। लेकिन दूसरी तरफ उनकी खुद की राजनीति भी कल्याणकारी योजनाओं और मुफ्त की रेवड़ियों के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है।
अब सवाल है कि अगर राज्य पहले से कर्ज में दबा हुआ है, तो लगातार मुफ्त योजनाओं के सहारे यह मॉडल कितने समय तक चलेगा?
जनता को मुफ्त सुविधाएँ देना राजनीतिक तौर पर हमेशा लोकप्रिय रहता है। हर सरकार चाहती है कि लोग खुश रहें। लेकिन लंबे समय में किसी भी राज्य को सिर्फ मुफ्त की योजनाओं से नहीं चलाया जा सकता।
उसे निवेश चाहिए। उद्योग चाहिए। नौकरियाँ चाहिए। वित्तीय अनुशासन चाहिए और फिलहाल विजय सरकार की तरफ से ऐसा कोई बड़ा आर्थिक रोडमैप साफ नजर नहीं आता जिससे लगे कि वो सिर्फ चुनावी राजनीति नहीं, बल्कि लंबे समय के शासन पर भी ध्यान दे रही है।
दिल्ली का उदाहरण और शासन का सच
यहाँ दिल्ली का उदाहरण भी याद आता है। कट्टर ईमानदारी की कसमे खाकर अरविंद केजरीवाल ने भी सत्ता हासिल की थी। अन्ना हजारे आंदोलन के दौरान उन्होंने खुद को सिस्टम बदलने वाले नेता के रूप में पेश किया था। संयोग की बात ये है कि उस समय विजय भी उस आंदोलन के समर्थन में दिखाई दिए थे। जनता को लगा था कि नई राजनीति आएगी, पुरानी व्यवस्था बदलेगी और राजनीति का स्तर ऊपर जाएगा। लेकिन समय के साथ दिल्ली में भी लोगों ने देखा कि आंदोलन की राजनीति और शासन की राजनीति में बहुत फर्क होता है।
विरोध करना जितना आसान होता है उतना ही मुश्किल होता है प्रशासन चलाना। जब तक आप विपक्ष में होते हैं, तब तक हर समस्या का जवाब आपके पास होता है। लेकिन सत्ता में आने के बाद वही समस्याएँ आपकी जिम्मेदारी बन जाती हैं।
अब तमिलनाडु में भी यही परीक्षा विजय के सामने है। क्या उनकी राजनीति सिर्फ लोकप्रियता और जन-छवि तक सीमित रह जाएगी? या वो वास्तव में एक मजबूत प्रशासक बन पाएँगे?
शुरुआत में जनता छवि से प्रभावित होती है लेकिन कुछ समय बाद लोग सिर्फ भाषण नहीं देखते, वो नतीजे देखते हैं, जिसमें…
- कौन मंत्री है?
- कैसे फैसले लिए जा रहे हैं?
- कानून-व्यवस्था कैसी है?
- निवेश आ रहा है या नहीं?
- सरकार विवादों को कैसे संभाल रही है?
ये सारी चीजें धीरे-धीरे छवि से ज्यादा बड़ी हो जाती हैं और फिलहाल इन सवालों पर विजय सरकार पूरी स्पष्टता देती नजर नहीं आ रही।
सरकार चलाने के लिए राजनीतिक समझ और प्रशासनिक परिपक्वता जरूरी
तमिलनाडु की राजनीति वैसे भी बेहद उलझी हुई रही है। यहाँ पहचान की राजनीति है, भाषा की राजनीति है, क्षेत्रीय गौरव है, कल्याणकारी मॉडल है और सिनेमा संस्कृति भी है। ऐसे राज्य में सिर्फ एक लोकप्रिय चेहरा होना काफी नहीं होता। वहाँ राजनीतिक समझ और प्रशासनिक परिपक्वता दोनों चाहिए।
फिलहाल तस्वीर यही कहती है कि विजय मुख्यमंत्री तो बन गए हैं, लेकिन उनकी सरकार की असली दिशा अभी भी पूरी तरह साफ नहीं है।
एक तरफ उदारवादी छवि बनाने की कोशिश है, दूसरी तरफ गठबंधन की राजनीति का दबाव है। एक तरफ कल्याणकारी राजनीति है, दूसरी तरफ बढ़ता कर्ज है। एक तरफ नई राजनीति का दावा है, दूसरी तरफ पुराने सत्ता के प्रयोग दिखाई दे रहे हैं।
अब आने वाला समय ही तय करेगा कि जोसेफ विजय सिर्फ भीड़ खींचने वाले मुख्यमंत्री बनकर रह जाएँगे या सच में तमिलनाडु की राजनीति को कोई नई और स्पष्ट दिशा दे पाएँगे।











