तमिलनाडु की राजनीति में विरोधी दलों से जुड़ी महिलाओं पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ करने के कई मामले सामने आ चुके हैं। इसी सिलसिले में DMK के नेता और राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने 3 अगस्त 2026 को मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय की आलोचना करते हुए अभिनेत्री तृषा कृष्णन को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की।
तृषा कृष्णन को निशाना बनाकर की गई इस मानहानिकारक टिप्पणी के मामले में मंगलवार (4 अगस्त 2026) को पुलिस ने उदयनिधि स्टालिन को उनके घर से गिरफ्तार कर लिया।
WATCH | 'Trisha' Comment Row: Udhayanidhi Stalin Arrested by Tamil Nadu Police pic.twitter.com/CuZFvHm5nV
3 अगस्त को कर्नाटक के साथ कावेरी जल बंटवारे के मुद्दे पर तंजावुर में आयोजित एक विरोध रैली को संबोधित करते हुए उदयनिधि स्टालिन ने आरोप लगाया कि सीएम विजय के नेतृत्व वाली तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) सरकार कावेरी का पानी नहीं मिलने के मुद्दे पर चुप है और उसका पूरा ध्यान DMK नेताओं के खिलाफ कथित तौर पर झूठे मामले दर्ज कराने पर है।
इसी दौरान रैली में मौजूद DMK कार्यकर्ताओं ने ‘तृषा, तृषा’ के नारे लगाने शुरू कर दिए। इस पर उदयनिधि स्टालिन कुछ पल रुके, मुस्कुराए और एक ऐसी टिप्पणी की, जिसे कई लोगों ने आपत्तिजनक और दोहरे अर्थ वाली टिप्पणी के तौर पर देखा।
तृषा कृष्णन का नाम लिए बिना उदयनिधि स्टालिन ने कहा, “हमारे यहाँ पानी आए या न आए, वहाँ पानी जरूर पहुँचना चाहिए। उन्हें बस इसी की चिंता है।” इसके बाद उन्होंने सफाई देते हुए कहा, “मेरा मतलब कावेरी के पानी से था।”
At what was projected as a farmers protest, Udhayanidhi Stalin made an unnecessary, vulgar and double meaning comment about actress Trisha in front of thousands of men. pic.twitter.com/EvqkGrHKie
सोशल मीडिया पर यह वीडियो तेजी से वायरल हो गया है, जिस पर अलग-अलग राजनीतिक दलों और वैचारिक पृष्ठभूमि के लोगों ने प्रतिक्रिया दी है। कई लोगों ने अभिनेत्री त्रिशा कृष्णन को लेकर उदयनिधि स्टालिन की कथित दोहरे अर्थ वाली टिप्पणी की आलोचना की है।
तृषा इन दिनों अभिनेता से राजनेता बने और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री जोसेफ विजय के साथ अपने कथित निजी संबंधों को लेकर भी चर्चा में हैं। उदयनिधि स्टालिन की टिप्पणी को लेकर तमिलनाडु की राजनीति भी गरमा गई है।
TVK विधायक रेवन्थ चरण ने इसे ‘घृणित और अस्वीकार्य’ बताते हुए कहा, “इसी वजह से तमिलनाडु की जनता ने आपको नकार दिया और आज आप जिस स्थिति में हैं, वहीं सीमित कर दिया। अरिवालयम के पहले से ही बेहद निम्न स्तर के बावजूद यह उससे भी नीचे की बात है।”
तमिलनाडु भाजपा ने भी विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन की कथित टिप्पणी की कड़ी निंदा की। पार्टी ने इसे ‘घृणित, अश्लील, अभद्र और शर्मनाक’ करार देते हुए उनके बयान पर सवाल उठाए।
तमिलनाडु भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता नारायणन तिरुपति ने पूर्व मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए पूछा कि वह अपने बेटे उदयनिधि स्टालिन की एक महिला के खिलाफ अभद्र टिप्पणी पर मौन क्यों हैं। उन्होंने उदयनिधि स्टालिन की गिरफ्तारी की भी माँग की थाी।
इधर सत्तारूढ़ TVK ने इस मामले में राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) को पत्र लिखकर उदयनिधि स्टालिन के खिलाफ कार्रवाई की माँग की है। पार्टी का कहना है कि उनकी भाषा सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं को वस्तु समझने और मौखिक उत्पीड़न (Verbal harassment) को सामान्य बनाती है तथा सार्वजनिक पद पर बैठे लोगों से अपेक्षित मर्यादा को गंभीर रूप से ठेस पहुँचाती है।
TVK ने यह भी कहा कि इस तरह का आचरण सार्वजनिक जीवन में महिलाओं के प्रति व्यवहार को लेकर एक ‘खतरनाक मिसाल’ कायम करता है। TVK ने राष्ट्रीय महिला आयोग से आग्रह किया है कि वह उदयनिधि स्टालिन से इस मामले में स्पष्टीकरण माँगे और उन्हें बिना शर्त सार्वजनिक माफी जारी करने का निर्देश दे।
साथ ही पार्टी ने माँग की है कि उनके खिलाफ सार्वजनिक अश्लीलता फैलाने और महिला की मर्यादा का कथित रूप से अपमान करने से संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया जाए।
राजनीतिक विरोधियों पर निशाना साधने के लिए महिलाओं को घसीटने के आरोपों को लेकर पहले भी विवादों में रहे हैं उदयनिधि स्टालिन
अभिनेत्री तृषा कृष्णन पर कथित तौर पर निशाना साधते हुए की गई दोहरे अर्थ वाली टिप्पणी को लेकर उदयनिधि स्टालिन को भारी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। हालाँकि, राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों से जुड़ी महिलाओं को निशाना बनाते हुए लैंगिक (सेक्सिस्ट) टिप्पणियाँ करने के आरोप पहले भी उन पर लग चुके हैं।
2021 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों से पहले, प्रचार के दौरान उदयनिधि स्टालिन ने कहा था, “जब भी मैं अपने चुनावी भाषण में एडप्पडी सरकार का जिक्र करता हूँ, लोग मुझसे एडप्पडी नहीं, बल्कि ‘एडुपुडी’ (किसी के इशारों पर चलने वाला) कहने को कहते हैं। मैं पूछता हूँ कि एडुपुडी कौन है, तो लोग कहते हैं, मोदी का एडुपुडी। मेरी हाल की एक रैली में भीड़ से किसी ने कहा कि वह एडुपुडी नहीं, बल्कि ‘डेड बॉडी’ है, क्योंकि वह शशिकला के पैरों में गिर चुका है।”
इसी वर्ष जब TVK ने सरकार बनाई, तब उदयनिधि स्टालिन ने TVK प्रमुख जोसेफ विजय पर अपने राजनीतिक हमलों में उनकी पत्नी संगीता सोर्नालिंगम को भी घसीटा था। उन्होंने कहा था, “उनका (विजय का) ‘कुट्टी स्टोरी’ सुनाने वाला भाषण विधानसभा की गरिमा के पूरी तरह खिलाफ है। चेंगलपट्टू कोर्ट में अपने पति को तलाशती पत्नी की कहानी पूरे तमिलनाडु को पता है।”
मुख्यमंत्री विजय और उनकी पत्नी के बीच निजी विवाद को अपने राजनीतिक हमलों में घसीटने को लेकर उदयनिधि स्टालिन की उस समय कड़ी आलोचना हुई थी। और अब एक बार फिर उदयनिधि स्टालिन ने छोटे राजनीतिक लाभ के लिए तृषा कृष्णन और सीएम विजय के कथित निजी संबंधों को अपने राजनीतिक हमले का हिस्सा बनाया है।
उदयनिधि स्टालिन पिछले कई वर्षों में अलग-अलग कारणों से विवादों में रहे हैं। वर्ष 2023 में उन्होंने सनातन धर्म की तुलना ‘डेंगू, मलेरिया’ से करते हुए इसके ‘उन्मूलन’ का आह्वान किया था। उस समय देशभर में उनके खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए थे और इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी डीएमके नेता को फटकार लगाई थी।
झारखंड पेपर लीक मामले में हेमंत सोरेन सरकार का बचाव करने की कोशिश कर रहे न्यूज पिंच के संस्थापक अभिनव पांडे इन दिनों चर्चा में हैं। दरअसल राँची में हजारों छात्र JPSC सिविल सर्विसेज और JSSC-CGL परीक्षाओं के दौरान धांधली, पेपर लीक और प्रश्नपत्रों के छेड़छाड़ के साथ-साथ OMR शीट के खिलाफ जवाबदेही की माँग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं।
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के पूरे समय कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के कार्यकर्ताओं की भाषा बोलने वाले अभिनव, झारखंड के छात्र प्रदर्शन के मामले में आक्रमक नहीं दिखे। पेपर लीक जैसे मुद्दे यहाँ भी हैं और विरोध करने वाले छात्र ही हैं। लेकिन हेमंत सरकार से सवाल पूछने के बजाए अभिनव पांडे परीक्षा में हुई गड़बड़ियों पर सोरेन सरकार के रुख और उसकी कार्रवाइयों की जानकारी देने लगे।
CJP के प्रदर्शनों के दौरान NEET पेपर लीक को हथियार बनाया गया, भले ही मोदी सरकार ने तुरंत कार्रवाई करते हुए दोषियों को गिरफ्तार किया, एनटीए के पदाधिकारियों को निलंबित किया और शिक्षा मंत्री ने भी इस्तीफा दिया। इतना ही नहीं दोबारा परीक्षा आयोजित किया गया। उसके रिजल्ट आए यानी NEET यूजी 2026 को फिर से आयोजित कराने और समय पर परिणाम सुनिश्चित करने तक, सरकार ने छात्रों के भविष्य को जोखिम में न डालने के लिए हर संभव प्रयास किया।
एक रील के कैप्शन में लिखा था, “जनता सरकार के नाक तक पहुँची…लाठीचार्ज के बाद से ही Dharmendra Pradhan के इस्तीफे की उल्टी गिनती शुरू हो गई थी…”
मोदी सरकार ने जो त्वरित कदम उठाए और दोबारा सफलतापूर्व परीक्षा करवाए, उसकी जानकारी देना तो दूर अभिनव पांडे ने ‘पत्रकार’ होने का ढोंग भी छोड़ दिया। वह जंतर-मंतर पर पूर्णकालिक ‘कार्यकर्ता’ बन गए (बेशक, छात्रों की भलाई के नाम पर) और उतने ही उकसाने वाले कैप्शन के साथ भड़काऊ वीडियो पोस्ट करने लगे। एक समय पर, वह विपक्षी दलों के प्रवक्ता की तरह बोलने लगे थे।
अपने सोशल मीडिया प्रभाव का उपयोग करते हुए अभिनव पांडे ने कॉकरोच जनता पार्टी के एजेंडे को अंजाम तक पहुँचाने में मदद की। एक अन्य रील का कैप्शन था, “Gen-G छात्र जीत गए, हमने कहा था Modi सरकार को झुकना पड़ेगा।”
यह ‘पत्रकारिता’ नहीं, बल्कि सीधी राजनीतिक तरफदारी है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि CJP समर्थकों ने सच के उनके संस्करण को रिपोर्ट करने के लिए उनकी सराहना की।
एक अन्य रील के कैप्शन में कहा गया, “इस्तीफा दिया नहीं, छात्रों ने कलेजे पर चढ़कर लिया…Dharmendra Pradhan के इस्तीफे के बाद Jantar Mantar पर क्या माहौल?।”
अपने नैरेटिव को और आगे बढ़ाने के लिए, न्यूज़ पिंच द्वारा एक प्रदर्शनकारी को मंच दिया गया, जिसने दावा किया, “‘इस्तीफा छीना गया, वो लड़ाई हारे हैं'”
लेकिन अभिनव पांडे की यह नौटंकी यहीं खत्म नहीं हुई। उन्होंने वामपंथी-इस्लामवादी बयानबाज़ी को भुनाया कि किसी न किसी तरह भारत के विचार में सभी का योगदान है और यह किसी के बाप का नहीं है। एक और रील का कैप्शन था, “CJP Protest में Gen Z ने तय कर दिया है कि देश किसी पार्टी की जागीर नहीं, सरकार युवाओं की है।”
न्यूज पिंच को कॉकरोच जनता पार्टी से अलग करना व्यावहारिक रूप से असंभव हो गया। दोनों ने मिलकर एक दुर्भावनापूर्ण नैरेटिव फैलाने और युवाओं को गुमराह करने का काम किया। इस ‘न्यूज आउटलेट’ ने पार्टी के प्रचार अंग के रूप में काम किया।
लेकिन स्थिति की विडंबना यहीं खत्म नहीं हुई। रविवार (2 अगस्त) को, अभिनव पांडे ने एक ट्वीट किया जिसमें बताया गया कि झारखंड सरकार चल रहे पेपर लीक संकट से निपटने के लिए किस तरह सक्रिय रूप से कदम उठा रही है।
वर्तमान मुख्यमंत्री की तारीफ के पुल बाँधते हुए उन्होंने कहा, “जंतर मंतर से सबक ले रही हेमंत सोरेन सरकार। अब तक किसी तरह के बल प्रयोग को मना किया है। छात्रों के धरने के बीच कई एक्शन हुए हैं।”
अभिनव ने आगे दावा किया, “भर्ती गड़बड़ी में शामिल 11 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। JPSC अध्यक्ष का इस्तीफा हो चुका है। JPSC अध्यक्ष से लगातार 3 दिन से 8-8 घंटे की पूछताछ। 14वीं JPSC की परीक्षा टल गई है। मेंस रद्द…JPSC अध्यक्ष और पूर्व चीफ सेक्रेटरी ख्यांगते की गिरफ्तारी संभव…”
जब इस ‘निष्पक्ष पत्रकार’ का हेमंत सोरेन सरकार का पीआर (PR) काम पूरा हो गया, तो उसने दावा किया, “जिस छात्र का ORM लीक हुआ, उसकी गिरफ़्तारी हुई। वो आजसू नेता का बेटा है। NDA का घटक दल है आजसू”।”
संतुलन बनाने की कोशिश करते हुए अभिनव पांडे ने लिखा, “अब छात्रों की माँग है कि पूरे मसले की CBI जाँच हो, फिलहाल CID जाँच कर रही है। ध्वस्त भर्ती प्रणाली में विश्वास की बहाली के लिए @HemantSorenJMM जी जाँच क्यों अनुशंसित नहीं कर रहे हैं? और सवाल ये भी कोई भी भर्ती आपके राज्य में बिना विवाद के पूरी क्यों नहीं हो पाती?”
जब नेटिज़न्स ने ध्यान दिलाया कि अभिनव पांडे का ‘एक्टिविस्ट मोड’ नदारद है, तो वह जल्द ही अपने सह-संस्थापक सौरभ त्रिपाठी के साथ स्थिति को संभालने (फायरफाइटिंग) के मोड में आ गए।
अखिलेश जी, आप बच्चों के बड़े शुभचिंतक नज़र आ रहे हैं. पर ये क्या, आपका ही अख़बार बच्चों को आवाज़ नहीं दे पा रहा. फ्रंट पेज में एक भी लाइन नहीं है. थोड़ा ट्वीट अपने अख़बार और अपने संपादकों को टैग करके भी करिए. चलिए ये काम मैं कर देता हूँ.@shekharkahin जी आपको अपने रिपोर्टर की… https://t.co/uGhcblwgS1
लेकिन यह अंतर साफ और बेशर्म करने वाला था। हालाँकि न्यूज पिंच के संस्थापकों ने झारखंड छात्र विरोध प्रदर्शन के बारे में बात जरूर की (गैर-भाजपा शासित राज्य में छात्रों की दुर्दशा के प्रति उदासीन होने के आरोप से बचने के लिए), लेकिन उनके तेवर और तीव्रता में भारी बदलाव आया था।
हेमंत सोरेन सरकार पर अपने शिक्षा मंत्री को हटाने के लिए दबाव बनाने या इस्तीफे की माँग करने वाला कोई अभियान नहीं चलाया गया। यह कवरेज और जवाबदेही की माँग न केवल ढीली थी, बल्कि नाममात्र के बराबर थी।
दरअसल ‘जंतर-मंतर का एक्टिविस्ट’ न केवल राँची में शारीरिक रूप से अनुपस्थित था, बल्कि सोशल मीडिया पर भी थोड़ा नरम रुख अख्तियार किए हुए था।
यह एजेंडा-संचालित पत्रकारिता का एक सटीक उदाहरण है जहाँ सहूलियत के हिसाब से चुनिंदा गुस्सा, अपनी पसंद की चीजें चुनना (cherry-picking) और अतिशयोक्ति का इस्तेमाल किया जाता है।
दूसरी तरफ ‘निष्पक्ष’ दिखने और पार्टी या विचारधारा के समर्थकों को नाराज न करने की उम्मीद में इस मुद्दे पर चालाकी भरी चुप्पी, दूरी और ठंडा रवैया अपनाया जाता है।
मुझे स्वीकार करना होगा कि न्यूज पिंच के अभिनव पांडे ने वास्तव में इस कला में महारत हासिल कर ली है। वैसे भी वे अपनी अहसानफरामोशी और दिमागी कसरत (mental gymnastics) के लिए जाने जाते हैं।
सावन के महीने में वामपंथियों की आँखों में काँवड़िए सबसे ज़्यादा खटकते हैं, इसलिए इस दौरान वे हर संभव तरीके से काँवड़ियों की छवि धूमिल करने का प्रयास करते हैं। हाल ही में ऐसी ही एक कोशिश मेरठ की एक घटना को लेकर की गई, जहाँ सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल करके यह अफवाह फैलाई गई कि काँवड़ियों ने पुलिस के साथ मारपीट की है। हालाँकि, जब इस मामले पर पुलिस का आधिकारिक बयान आया, तो सच्चाई कुछ और ही निकली।
वीडियो में था क्या?
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में एक जीप के बाहर कुछ काँवड़िए खड़े दिखते हैं और वह जीप में बैठे लोगों को- इसे बाहर निकालो, बाहर निकल जैसी बातें कह रहे हैं। उन्होंने पुलिस जीप को घेरा हुआ है और लगातार किसी को बाहर निकालने की कोशिश हो रही है। अब इसी वीडियो को कई वामपंथी और कट्टरपंथियो ने अपने हैंडल पर साझा किया है।
काँवड़ियों पर लगाया गया पुलिस को पीटने का इल्जाम
मुस्लिम वॉयस सेल का ट्वीट देखिए। इस ट्वीट में उन्होंने काँवड़ियों को निशाना बनाते हुए कहा यूपी में कानून व्यवस्था का हाल देखिए। मेरठ के दौराना में बाइक सवार की टक्कर के बाद पहुँचे सादा कपड़ों में मौजूद पुलिसकर्मियों को काँवड़ियों ने जीप से बाहर निकालकर पीटा।
पीयूष राय ने भी इस वीडियो को साझा करते हुए ऐसा ही दावा किया, जिसे बकायदा फैक्टचेकर मोहम्मद जुबैर ने तक ने रिपोस्ट किया।
सचिन गुप्ता ने भी अपने ट्वीट में कहा चूँकि एक बाइक सवर ने काँवड़ियों को टक्कर मार दी थी। जब पुलिस वहाँ पहुँची तो काँवड़िए पुलिस को ही पीटने लगे जबकि टक्कर मारने वाला भाग गया।
जाकिर त्यागी ने भी इस खबर को इसी प्रकार फैलाया जैसे काँवड़ियों ने पुलिस को इतनी बेरहमी से पीट दिया है कि उन्हें जान बचाकर भागना पड़ा।
पुलिस का बयान
अब मेरठ पुलिस का इस पर बयान आया है, जिनका कहना है कि सोशल मीडिया पर जो वीडियो इस दावे के साथ वायरल हो रही है कि काँवड़ियों ने पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट की है। उनकी वर्दी को फाड़ा है, वो एकदम गलत है।
पुलिस के अनुसार जाँच के बाद यह सामने आया है कि 3 अगस्त की रात जब दो काँवड़ियों का ग्रुप आमने सामने आए तो, गाड़ी में बैठे व्यक्ति जिनका नाम सोनू है। जब ये अपने साथी गुड्डू के साथ हरिद्वार जा रहे थे तभी दूसरी ओर से आने वाले अन्य काँवड़ियों के साथ इनका टकराव हुआ और मारपीट हुई।
कल रात्रि मोटरसाइकिल से हरिद्वार जल लेने जा रहे एक कांवड़िये की हरिद्वार से जल लेकर आ रहे एक कावड़िया की टक्कर हो गई थी इसके बाद दोनों पक्षों में कहासुनी एवं हाथापाई हुई थी, दौराला पुलिस ने तत्काल मौके पर पहुंचकर स्थिति को नियंत्रण में किया तथा दोनों पक्षों को थाना लाकर…
ऐसी स्थिति में थाना दौराला पुलिस ने मौके पर पहुँचकर सूझबूझ से दोनों पक्षों को रोकने का प्रयास किया। इस दौरान सोनू और गुड्डू को गाड़ी में बिठाया गया। तभी दूसरा पक्ष उग्र होकर इन्हीं दो लोगों को गाड़ी से निकालते हुए दिखाई दे रहा है। पुलिस अधिकारी ने बताया कि इस घटना के बाद वो दोनों पक्षों को लेकर जाकर उनका मेडिकल करवाया था और अब आगे की कार्रवाई की जा रही है।
बता दें कि केवल सोशल मीडिया पर ही नहीं मेनस्ट्रीम मीडिया में भी इस पूरी घटना को गलत तरीके से पेश करने का काम हुआ है। बिना पुलिस के पक्ष को जाने शुरू में यही फैलाया गया कि काँवड़ियों ने पुलिस को पीटा है। हालाँकि बाद में पुलिस के बयान के साथ खबरों को अपडेट किया गया। ऊपर टीवी9 भारतवर्ष पर चली खबर में देख सकते हैं- साफ-साफ ये लिखा गया कि ‘2 पुलिसकर्मियों की पिटाई की गई’ लाइन से पूरी खबर को दिखाया गया था।
बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के नतीजे सामने आ चुके हैं। चुनाव में जनसुराज प्रत्याशी प्रशांत किशोर ने 19246 वोटों से जीत हासिल की है। उन्हें 63946 वोट मिले हैं। दूसरे नंबर पर भाजपा के नीरज सिन्हा को 44700 वोट मिले हैं, जबकि राजद के उम्मीदवार को 14241 वोट मिले हैं।
लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी के इस मजबूत गढ़ में जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने बाजी मारकर हर किसी को चौंका दिया है। हालाँकि इस चुनावी नतीजे को समझने के लिए राजनीतिक चश्मे से परे जाकर उन बारीकियों को देखना होगा, जिन्होंने इस परिणाम की पटकथा लिखी।
पिछले चुनावों के बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी EVM पर ठीकरा फोड़ने या चुनावी प्रक्रिया पर बेबुनियाद सवाल उठाने की जो राजनीति देखने को मिलती रही है, इस बार प्रशांत किशोर ने उससे पूरी तरह किनारा कर लिया।
जब कोई नेता निराधार आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति को छोड़कर जनता के वास्तविक मुद्दों पर केंद्रित होता है, तो मतदाता उसे गंभीरता से लेते हैं। बांकीपुर में प्रशांत किशोर की यह जीत इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र में चुनाव सहानुभूति, नारों या खोखले आरोपों से नहीं, बल्कि सही रणनीतिक दृष्टिकोण और ठोस धरातलीय मुद्दों के आधार पर ही जीते जाते हैं।
बेबुनियाद बयानबाजी से किनारा और परिपक्व राजनीति का संदेश
अगर हम पिछले चुनावों की बात करें तो कई मौकों पर चुनाव हारने के बाद कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी और आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल में EVM में खराबी, चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाने या प्रशासन पर आरोप लगाने की एक होड़ सी मच जाती है।
प्रशांत किशोर का भी यहीं रवैया था कि वे राहुल गाँधी या अरविंद केजरीवाल की तरह प्रक्रियात्मक खामियों का रोना रोते थे। हालाँकि इस बार बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर के रुख में एक बड़ा रणनीतिक और व्यावहारिक बदलाव देखने को मिला। उन्होंने केंद्र सरकार या चुनाव प्रणाली पर बिना साक्ष्य के आरोप लगाने की राजनीति को पूरी तरह से त्याग दिया।
उन्होंने यह स्वीकार किया और अपनी रणनीति में ढाला कि चुनाव केवल और केवल जनता के बीच जाकर उनके मन की बात समझने और उनके लिए काम करने से ही जीते जा सकते हैं। इस बार उन्होंने किसी भी प्रकार की नकारात्मक बयानबाजी या गैर-जरूरी राजनीतिक प्रपंच में समय गंवाने के बजाय अपना पूरा ध्यान जनता के बीच अपनी पैठ बनाने पर लगाया।
जब एक राजनेता अपनी पुरानी गलतियों से सीखकर जनता के सामने एक परिपक्व और गंभीर विकल्प के रूप में पेश होता है, तो मतदाता भी उस पर भरोसा जताने में संकोच नहीं करते।
जनभावना का मिजाज और स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित अभियान
बांकीपुर में प्रशांत किशोर की जीत का एक प्रमुख पहलू यह भी रहा कि उन्होंने क्षेत्र के स्थानीय असंतोष और जनता के मिजाज को बहुत बारीकी से भाँपा और उसे ही मुद्दा बनाया।
इसके अलावा NEET परीक्षा के पेपर लीक प्रकरण जैसे संवेदनशील विषयों और भोजपुर के चर्चित भरत तिवारी एनकाउंटर मामले जैसे स्थानीय प्रशासनिक व पुलिसिया कार्रवाई के मुद्दों को लेकर युवाओं व सवर्ण समाज के एक वर्ग के मन में एक प्रकार की चिंता और नाराजगी देखने को मिल रही थी।
प्रशांत किशोर ने इन मुद्दों को किसी उग्र राजनीतिक हमले के रूप में इस्तेमाल करने के बजाय एक जिम्मेदार नागरिक मंच के रूप में उठाया। उन्होंने शिक्षा, रोजगार, स्थानीय नागरिक सुविधाओं और प्रशासनिक पारदर्शिता जैसे जमीनी विषयों को अपने अभियान का मुख्य आधार बनाया।
उन्होंने जनता को यह विश्वास दिलाया कि वे केवल सत्ता पाने के लिए राजनीति में नहीं आए हैं, बल्कि इन बुनियादी समस्याओं का समाधान निकालने के लिए प्रतिबद्ध हैं। जनता के दिल को छूने वाले इन मुद्दों ने उनके पक्ष में माहौल बनाने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भाजपा का गढ़ और सामाजिक समीकरणों में बदलाव
बांकीपुर को पारंपरिक रूप से भारतीय जनता पार्टी का एक अत्यंत सुरक्षित और अभेद्य दुर्ग माना जाता रहा है। कई बार से लगातार जीत दर्ज करने के कारण इस सीट पर भाजपा की पकड़ बहुत मजबूत थी। लेकिन इस बार जब उपचुनाव की नौबत आई, तो पार्टी के लिए अपने पारंपरिक मतदाता आधार को पूरी तरह से एकजुट रखना एक चुनौती साबित हुआ।
प्रशांत किशोर ने अपनी विस्तृत रणनीति के तहत हर मोहल्ले और वार्ड स्तर पर जाकर छोटी-छोटी बैठकें कीं और लोगों से सीधा संवाद स्थापित किया। इसके परिणामस्वरूप भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में हल्की बिखराव की स्थिति देखने को मिली, जहाँ कुछ वर्गों ने बदलाव के नाम पर प्रशांत किशोर का रुख किया।
विपक्षी दलों के समर्थक मतदाताओं के एक बड़े हिस्से को भी प्रशांत किशोर में एक मजबूत और प्रभावी विकल्प दिखाई दिया। प्रशांत किशोर ने किसी जातिगत या धार्मिक ध्रुवीकरण का सहारा लिए बिना सभी वर्गों को साधने की कोशिश की, जिससे बांकीपुर का पारंपरिक सामाजिक और राजनीतिक गणित पूरी तरह बदल गया और उनके लिए जीत का मार्ग प्रशस्त हुआ।
यह चुनाव इस बात को साबित करता है कि जनता अब केवल सरकार-विरोधी नारों या चुनावों पर सवाल उठाने वाली राजनीति को पसंद नहीं करती। जब तक कोई दल या नेता धरातल पर उतरकर कड़ी मेहनत नहीं करता और जनता के वास्तविक सरोकारों को अपनी प्राथमिकता नहीं बनाता, तब तक चुनावी सफलता हासिल करना संभव नहीं है।
इस जीत के बाद निश्चित तौर पर प्रशांत किशोर का राजनीतिक कद बढ़ा है, लेकिन उनके सामने असली चुनौती अब इस जनसमर्थन को बनाए रखने और अपने वादों को धरातल पर उतारने की होगी, क्योंकि जनता ने उन्हें आरोपों की राजनीति छोड़कर सकारात्मक काम करने के आधार पर ही यह मौका दिया है।
देश की स्थापित संवैधानिक व्यवस्था, लोकतांत्रिक संस्थाओं, प्रधानमंत्री के साथ-साथ केंद्रीय मंत्रियों और सर्वोच्च न्यायपालिका पर लगातार अमर्यादित और अनर्गल बयानबाजी करने वाले एडवोकेट महमूद प्राचा ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जल्दी ही जेल जाएँगे और उनके चक्की पीसने की लाइव स्ट्रीमिंग होगी।
‘हिंद संवाद विथ ज्योति’ नामक यूट्यूब चैनल को दिए गए अपने इंटरव्यू में महमूद प्राचा ने न केवल देश के शीर्ष नेतृत्व और कार्यपालिका पर निराधार हमले बोले, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के हर एक मजबूत स्तंभ, चाहे वह संसद हो, निर्वाचन आयोग हो, न्यायपालिका हो या फिर मीडिया सबकी निष्पक्षता को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की।
प्राचा का अतीत गंभीर कानूनी विवादों से भरा रहा है। देशद्रोही गतिविधियों में शामिल दंगाइयों व आतंकवादियों की कोर्ट में पैरवी करने, जाली दस्तावेजों के दम पर कोर्ट को गुमराह करने, विभिन्न न्यायिक पीठों से कड़ी फटकार व भारी जुर्माना झेलने और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की जाँच में अड़ंगा डालने की उसकी पुरानी और स्थापित आपराधिक कार्यशैली रही है।
केवल समाज में सनसनी फैलाने, साम्प्रदायिक कार्ड खेलकर लोगों को भड़काने और अपना विशिष्ट राजनीतिक व वैचारिक एजेंडा साधने के लिए प्राचा जिस तरह की उग्र और अमर्यादित बयानबाजी मीडिया के सामने कर रहा है, वह उसके सालों पुराने प्रोपेगंडा, कानूनी पैंतरेबाजी और सोची-समझी रणनीति का ही एक निरंतर विस्तार नजर आती है।
सारी उमर मोदी और शाह जी को जेल में रहना होगा: प्राचा ने दिए विवादित बयान
यूट्यूब वीडियो के अलावा पहले खुद को पत्रकार कहने वाली ज्योति यादव की फेसबुक रील में विपक्षियों द्वारा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की माँग पर प्राचा ने कहा, “इस्तीफा देने के तुंरत बाद तिहाड़ जेल भी जाना पड़ेगा और वहाँ फिर अपनी सारी उमर रहना पड़ेगा।”
उसने कहा कि शाह के पीछे-पीछे फिर मोदी जी भी आएँगे। इस्तीफा हो जाएगा और अगले ही पल वो गिरफ्तार भी हो जाएँगे। इतना ही नहीं प्राचा ने कहा कि फिर वो BJP और RSS के जितने लोग हैं वो उसके खिलाफ ला कर इसे सबूत भी देंगे।
उसने कहा, “सारी उमर अमित शाह जी और मोदी जी को जेल में रहना है और इसीलिए हम इनकी सौ साल की उमर की दुआ माँगते हैं और फिर इन्हें रोज कम से कम 3 से 4 घंटे चक्की पीसनी है, जो कि लाइव स्ट्रीम होगी ताकि आने वाला कोई भी प्रधानमंत्री या गृहमंत्री-संत्री ये याद रखे कि जब मोदी जी डेली चार घंटे चक्की पीस रहे हैं और देखेगी सारी दुनिया तो हमे कोई भी गलत काम नहीं करना है ये बात तय है।”
प्राचा की अनर्गल बातें यहीं नहीं रुकी, उसने आगे कहा, “इनके जेल जाने की मुख्य वजह गिनाउँगा तो एक साल लग जाएगा। एपस्टीन मानसिकता का ऐसा कोई काम नहीं जो मोदी जी ने शाह जी ने नहीं किया हो। देश को लूटा है, देश की बच्चियों को लूटा है, देश को बेच दिया।”
अंबानी, अडानी चीन, पाकिस्तान का नाम लेते बेबुनियाद आरोप लगा रहे प्राचा ने कहा कि इनलोगों ने 2 करोड़ नैकरियाँ छीन ली और भारत की आर्मी को कमजोर कर दिया।
गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ बेबुनियाद बातें
‘हिंद संवाद विथ ज्योति’ को दिए इंटरव्यू में महमूद प्राचा ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें किसी भी कीमत पर संवैधानिक पदों पर बने रहने का कोई नैतिक या कानूनी हक नहीं है और उन्हें तुरंत उनके पदों से हटाकर सीधे जेल की सलाखों के पीछे भेजा जाना चाहिए।
किसी भी निष्पक्ष कानूनी जाँच, पुलिस आरोप-पत्र या अदालत के सजा के आदेश के बिना ही खुद जज की भूमिका में आते हुए प्राचा ने साफ दावा किया कि देश में सत्ता परिवर्तन होते ही गृह मंत्री को उम्रकैद की सजा मिलना बिल्कुल तय और अनिवार्य है।
वीडियो की शुरूआत में एंकर कॉकरोच जनता पार्टी और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की माँग को बताते हुए पूछती है, “प्राचा साहब सबसे पहले तो यही कि अमित शाह के इस्तीफे की माँग की जा रही है, सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दाखिल की गई है। इस पूरी माँग को और इस पिटीशन को आप किस तरीके से देख रहे हैं?”
इस पर प्राचा ने कहा, “अमित शाह साहब का इस्तीफा मुद्दा नहीं है, मुद्दा ये है कि अमित शाह साहब को जेल जाने का रास्ता जो है वो ईमानदारी से जनता के वोटों से सरकार जो चुन के आएगी मोदी जी और अमित शाह जी को जेल भेजेगी और वे फिर कभी वापस नहीं आने वाले तब तो वैसे ही उनकी उम्र कैद की सजा तो पक्की है।”
उसने आगे कहा, “दोनों ही सूरतों में उन्हें जेल जाना वाजिब है लाजमी है 250 लाख करोड़ जो ईमानदारी से मोदी जी के साथ मिलके कमाए उसको सेट करने में किस-किस जगह कौन सा आइलैंड खरीदना है किस कंट्री में कौन सी बैंक खोलना है यह सब में काम करें होम मिनिस्टर के पद के पास भी उन्हें आने नहीं देना चाहिए।”
प्राचा ने कहा, “हालाँकि इस्तीफे से ज्यादा कुछ होता नहीं, बहुत सारे जजेस और जो ये धर्मेंद्र प्रधान जी का भी इस्तीफा हुआ है। इनको एक प्रकार से अपने अपराधों से निकल भागने का मौका मिलता है। लेकिन अमित शाह साहब का इस्तीफा बहुत महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि अगर उनका इस्तीफा होता है तो वो समझिए आप पूरी सरकार का इस्तीफा हो गया।”
PM मोदी की दिनचर्या पर अमर्यादित टिप्पणी
गृह मंत्री पर अनर्गल वित्तीय आरोप लगाने के साथ-साथ, प्राचा ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दैनिक प्रशासनिक कार्यकलापों, सुरक्षा व्यवस्था और दिनचर्या पर भी बकवास की।
प्राचा ने कहा, “मोदी जी तो 18 घंटे आप लोगों को पता ही है काम करते हैं। काम मतलब, दो-ती घंटे मेकअप, दो-ती घंटे इधर-उधर घूमना, कपड़े दो-ती घंटे, फिर कैमरा फिट करना, फिर किस-किस से मिलके इधर-उधर की बातें करना दुनिया भर की और म्यूजिक सुनना वगैरह-वगैरह 6 घंटे वो सोते हैं। तो 18 और छह मतलब पूरे हो गए।”
अपनी बकवास आगे बढ़ाते हुए प्राचा ने कहा, “उसमें कोई भी प्रधानमंत्री के कार्यालय का या किसी भी मंत्रालय का कार्य नहीं होता। उनका काम तो यही काम है जो मैंने आपको बताया अभी। हम और एसपीजी वाले परेशान रहते हैं उनसे।”
एक अधिवक्ता होने के नाते कानून, साक्ष्यों और अदालती मर्यादा से भली-भाँति परिचित होने के बावजूद, बिना किसी प्रमाण के इस तरह के मनगढ़ंत वित्तीय आँकड़े (250 लाख करोड़ रुपए) गढ़ना, काल्पनिक आइलैंड खरीदने और विदेशी बैंकों में बेनामी खाते खोलने की फर्जी कहानियाँ बुनना महमूद प्राचा की उसी पुरानी रणनीति का हिस्सा है।
वह अक्सर ऐसे भ्रामक बयान देकर अपने ऊपर चल रहे गंभीर मुकदमों और अदालती कार्रवाइयों से आम जनता और मीडिया का ध्यान भटकाने का निष्फल प्रयास करता है।
मोदी जी और इस सरकार के सभी मंत्रियों के खिलाफ इतने सबूत देंगे, सबका इस्तीफा वैसे ही हो जाएगा
इंटरव्यू में प्राचा ने आगे कहा, “मैं बार-बार बोलता हूँ अमित शाह जी और मोदी जी का जो क्रिमिनल गैंग है एपस्टीन मानसिकता का क्रिमिनल गैंग है उसके फलक्रम यानी कि केंद्र बिंदु यानी कि उसकी सारी गतिविधियाँ चलाने वाले मिस्टर अमित शाह साहब हैं। तो अगर अमित शाह साहब का इस्तीफा माँगा भी जाएगा तो यह सरकार जो है डगमगाने लगेगी।”
प्राचा ने आगे कहा, “यह सबसे महत्वपूर्ण बात है और अगर कहीं इस्तीफा हो गया तो अमित शाह साहब घंटों के अंदर दिनों के अंदर नहीं हम जैसे लोगों को मोदी जी के खिलाफ और इस सरकार के सभी मंत्री, संत्री और चीफ मिनिस्टर जितने बड़े-बड़े हैं सबके खिलाफ इतने सबूत लाके हम जैसे लोगों के हाथ में दे देंगे कि बाकी सबका इस्तीफा तो वैसे ही हो जाएगा। बाकी सब भी जेल चले जाएँगे।”
उसने कहा, “अमित शाह साहब का इस्तीफा माँगा जाएगा तो यह सरकार हिलेगी तब हिलेगी और यह अच्छी डिमांड है। जो लोगों ने भी प्रोटेस्ट आज किया उनको बहुत-बहुत मुबारकबाद पेश करता हूँ और वही गारंटी जो उनके लिए थी वो जनता के लिए है। पुलिस का कोई भी अधिकारी भ्रष्टाचार भ्रष्टाचारी पुलिस का अधिकारी आपको तंग करेगा पीसफुल प्रोटेस्ट में तो हम लोग पूरी ताकत से आपके साथ हैं। बिल्कुल नहीं घबराना है। यह जिम्मेदारी हमारी है।”
उसने कहा, “अगर कोई भ्रष्ट पुलिस का अधिकारी जो कि अपराधी होता है अमित शाह जी के डायरेक्ट कहने पर उनके अलावा कोई कुछ नहीं कर सकता है तो हम आप लोगों की हिफाजत के लिए आएँगे भी और अमित शाह साहब के खिलाफ FIR तो हमने करानी है वो तो सब आपको पता ही है।”
सुप्रीम कोर्ट, वकीलों और RSS की मिलीभगत का आरोप
इंटरव्यू के दौरान जब एंकर ने सुरक्षा बलों द्वारा पैलेट गन के इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल पूछा, तो प्राचा ने सुप्रीम कोर्ट जाने वाले वकीलों और खुद न्यायपालिका पर ही सवाल उठा दिए। उसने दावा किया कि ये याचिकाएँ जानबूझकर सुप्रीम कोर्ट से ऐसा फैसला लेने के लिए डाली जाती हैं और इसमें वकीलों और RSS की मिलीभगत होती है।
प्राचा ने कहा, “फिर एक बार वही हुआ है जो मैं हमेशा बोलता हूँ पहली बात सुप्रीम कोर्ट नहीं जाना चाहिए। RSS के जितने भी स्पीकर्स हैं वो बोल रहे होंगे सुप्रीम कोर्ट ने ठप्पा लगा दिया पैलेट गन के इस्तेमाल पे। अब यह मौका देने के लिए ही यह पिटीशंस डाली जाती हैं ये लोग सब मिले हुए लोग हैं।”
उसने यह बेतुका तर्क भी दिया कि यदि कोई सच्चा वकील बहस करता तो सुप्रीम कोर्ट को याचिका खारिज करने के बजाय गृह मंत्री के खिलाफ तत्काल FIR दर्ज कर दुनिया भर में लाइव स्ट्रीमिंग करानी चाहिए थी। जब भी अदालतें प्राचा के मनमुताबिक आदेश नहीं देतीं, वह पूरी न्यायप्रणाली को ही पक्षपाती बताने लगता है।
मोदी को चाय बनाने भी नहीं आती वो तो किसी लायक नहीं: प्राचा
इंटरव्यू के दौरान प्राचा ने कहा, “RSS और BJP ने जो एग्जांपल सेट किया है ना मोदी जी के रूप में कि मैं नॉन बायोलॉजिकल हूँ। मतलब इस पोस्ट पे आ गया हूँ। वैसे तो उनको चाय बनानी भी नहीं आती होगी। ये मेरी गारंटी है। वो किसी लायक नहीं है। दुनिया में किसी लायक नहीं है। झूठ बोलने के अलावा वो और कपड़े अब तो बहुत सारे लोग उनके सलाहकार हैं।”
उसने कहा, “कपड़े भी कब से अच्छे हुए हैं जब से वो प्रधानमंत्री बने हैं। मेकअप भी कब से अच्छा हुआ है जब से वो प्रधानमंत्री बने। तो ये सब चीजें तो उन्हें इस चेयर पे बैठ के मिली है ना। लेकिन वो अपने आप को बड़ा आदमी दिखाने लगे। मतलब झूठी-झूठी तारीफें, बड़े-बड़े जो एक्टर्स हैं उनको प्यार मोहब्बत से बिना कुछ मारे पीटे, हम उनके मन के मुँह मुताबिक आम वाले सवाल पूछवा लिए। वाह मोदी जी करवा लिया।”
प्राचा ने देश की मुख्यधारा की मीडिया, पत्रकारों, न्यूज एंकरों और संपादकों को ‘क्रिमिनल जर्नलिस्ट’ करार देते हुए यह गंभीर आरोप लगाया कि वे केवल सरकार की झूठी तारीफें करते हैं और प्रधानमंत्री से उनके मनमुताबिक चाटुकारिता भरे सवाल पूछते हैं।
मीडिया पर सवाल उठाते हुए प्राचा ने कहा, “जितने ये क्रिमिनल जो जर्नलिस्ट अपने आप को प्रोजेक्ट करते हैं उन सब ने वाह वाह क्या गाने सुनाए, किसी ने कुछ सुनाए तो ये हर देश के नागरिकों के नौकर का दिमाग में कुछ वो ट्रेंड सा बन गया। तो हर एक कांस्टेबल भी ऐसे बिहेव कर रहा है। अब तो आप देखो किस तरीके से बच्चों को मारपीट कर रहे थे। तो एक वो माहौल सा बन गया।”
उसने कहा, उस माहौल की रॉ में बहुत सारे लोगों ने बहुत सारी बातें ऐसी कही है जो नॉर्मल हालात होते अगर मोदी जी प्रधानमंत्री ना होते, अमित शाह साहब यह होम मिनिस्टर ना होते तो किसी के मन में ऐसे विचार ही नहीं आते थे। अब तो एक माहौल सा बना हुआ है तो किसी के मुंह से भी बहुत सारी ऐसी बातें निकल जाती हैं जो कि वो आमतौर पे नहीं बोलता। लेकिन वो नफरत और गुस्सा था ना वो तो एक एक सुराग ढूँढ रहा था। वो सुराग फूटा है कॉकरोच जनता पार्टी के रूप में जो उसे मिल गया, लेकिन गलती RSS और BJP की, मोदी जी और अमित शाह साहब की है।”
चुनावी प्रणाली और EVM पर सवाल उठाकर लोकतंत्र का अपमान
देश की विभिन्न कोर्ट में लगातार कानूनी झटके खाने, अपनी जनहित याचिकाओं को खारिज होते देखने और कानूनी दलीलों के ध्वस्त होने के बाद, महमूद प्राचा का मुख्य निशाना भारत की स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय चुनावी प्रक्रिया पर भी रहा है।
इंटरव्यू के दौरान उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक्स वोटिंग मशीन (EVM) को पूरी तरह हटाने और पुरानी पेपर बैलेट (कागजी मतपत्र) व्यवस्था को वापस लाने का अपना पुराना और घिसा-पिटा राग अलापते हुए चुनावी सुधारों के नाम पर जनता के बीच भारी भ्रम और अविश्वास फैलाने की पूरी कोशिश की।
प्राचा ने कहा, “पार्लियामेंट में जो असली मुद्दा है ना EVM हटाओ बैलेट पेपर वापस लाओ तो EVM का आंदोलन जब तक नहीं होगा पेपर बैलेट वापस आएँगे नहीं तो वो इलेक्ट्रोरल रिफॉर्म्स की शुरुआत ही नहीं होगी।”
भारत के निर्वाचन आयोग द्वारा बार-बार EVM की तकनीकी निष्पक्षता और हैक-प्रूफ होने को सिद्ध किए जाने, सर्वदलीय हैकाथॉन में किसी भी राजनीतिक दल द्वारा EVM में कोई भी गड़बड़ी साबित न कर पाने और देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा VVPAT तथा EVM की विश्वसनीयता पर बार-बार ऐतिहासिक मुहर लगाए जाने के बावजूद, प्राचा जैसे लोग लगातार भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख पर हमला करने और देश के जनमत को नीचा दिखाने की अपनी सनक का ही प्रदर्शन करते रहते हैं।
कौन है महमूद प्राचा: दंगाइयों और आतंकियों के मुकदमों का इतिहास
महमूद प्राचा का अतीत हमेशा से ही असामाजिक तत्वों, देशविरोधी गतिविधियों के आरोपितों, खूंखार आतंकवादियों और दंगाइयों को कानूनी ढाल और वैचारिक कवर प्रदान करने का रहा है। प्राचा वही व्यक्ति है जिसने साल 2012 में नई दिल्ली स्थित इजरायली दूतावास की कार में हुए भयंकर बम विस्फोट मामले के मुख्य आरोपित सैयद मोहम्मद अहमद काजमी का अदालत में कानूनी बचाव किया था।
इसके अलावा प्राचा ने पाकिस्तान समर्थित कुख्यात आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के खूंखार आतंकी अब्दुल करीम टुंडा का मुकदमा भी अदालत में वकील के रूप में संभाला था। नागरिकता संशोधन कानून (CAA) विरोधी हिंसक प्रदर्शनों और फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए सुनियोजित हिंदू विरोधी दंगों के दौरान भी प्राचा की भूमिका बेहद संदिग्ध और विवादित रही थी।
उसने दंगों के मुख्य साजिशकर्ताओं, उपद्रवियों और हिंसा के आरोपितों को जेल जाने और कानूनी सजा से बचाने के लिए अदालती दाँव-पेच का जमकर इस्तेमाल किया।
प्राचा का मुख्य काम केवल अदालत के भीतर तकनीकी अड़ंगे पैदा करना ही नहीं था, बल्कि सोशल मीडिया और प्रेस बाइट्स के माध्यम से इस्लामी प्रोपेगंडा को हवा देना और दंगों के मुख्य मास्टरमाइंड्स के बचाव में पूरी तरह से काल्पनिक, झूठी और विक्टिम-कार्ड वाली कहानियाँ गढ़ना रहा है।
जाली दस्तावेजों और मृत वकील के फर्जी दस्तखत का गंभीर आपराधिक आरोप
महमूद प्राचा पर केवल विवादित तत्वों या दंगाइयों का केस लड़ने का ही नैतिक आरोप नहीं है, बल्कि दिल्ली दंगों के मुकदमों में फर्जी सबूत गढ़ने और जाली हलफनामे (Affidavits) तैयार कराने का बेहद गंभीर आपराधिक आरोप भी दर्ज है।
दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट के सख्त आदेश पर जब दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने इन संगीन आरोपों की जाँच शुरू की, तो एक बेहद सनसनीखेज और चौंकाने वाला सच सामने आया। प्राचा ने कोर्ट में एक ऐसा कानूनी शपथ पत्र दाखिल किया था, जिस पर एक ऐसे अधिवक्ता के साइन किए गए थे जिनकी मृत्यु उस घटना से करीब तीन साल पहले ही हो चुकी थी।
एक मृत व्यक्ति के नाम पर जाली दस्तखत बनाकर कोर्ट की आँखों में धूल झोंकने, झूठे साक्ष्य गढ़ने और पूरी कानूनी व न्यायिक प्रक्रिया के साथ धोखाधड़ी करने के इसी गंभीर आपराधिक मामले में दिल्ली पुलिस की टीम ने प्राचा के निजामुद्दीन स्थित कार्यालय पर अदालत द्वारा जारी सर्च वारंट के तहत छापेमारी की कार्रवाई की थी।
विक्टिम कार्ड खेलकर जाँच भटकाने की सुनियोजित रणनीति
कार्यालय पर छापेमारी के दौरान जब पुलिस टीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशानुसार फोरेंसिक साक्ष्य, कंप्यूटर की हार्ड डिस्क और संबंधित दस्तावेज जब्त करने पहुँची, तो प्राचा ने कानून का पालन करने वाले अधिवक्ता की तरह जाँच में सहयोग करने के बजाय तुरंत ‘विक्टिम कार्ड’ खेलना शुरू कर दिया।
उसने इस गंभीर आपराधिक जाँच को पूरे वकील समुदाय, न्यायशास्त्र और बार एसोसिएशन पर हमला बताकर इसे राजनीतिक रंग देने की भरसक कोशिश की। उसने प्रशांत भूषण जैसे अन्य विवादित वकीलों को अपने साथ जोड़कर आनन-फानन में प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की और खुद को राज्यसत्ता द्वारा संस्थागत उत्पीड़न का शिकार दिखाने का पूरा ड्रामा रचा।
हालाँकि पुलिस ने यह पूरी तरह साफ कर दिया कि यह कार्रवाई किसी वकील के स्वतंत्र पेशे, स्वायत्तता या अधिकारों पर हमला नहीं थी, बल्कि जाली दस्तावेज तैयार करने और मृत व्यक्ति के फर्जी दस्तखत बनाने जैसे संगीन अपराधों में अदालत के वैधानिक आदेश पर की गई एक निष्पक्ष फोरेंसिक जाँच थी।
मस्जिदों में बंदूकें चलाने और हथियार ट्रेनिंग की विवादित पैरवी
महमूद प्राचा का सबसे खतरनाक, उग्र और समाज में साम्प्रदायिक वैमनस्य फैलाने वाला रुख तब सामने आया था जब उसने अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (SC/ST) और मुस्लिम समुदाय के लोगों को बड़े पैमाने पर लाइसेंसी हथियार (बंदूकें) बाँटने और उन्हें चलाने की ट्रेनिंग देने का सार्वजनिक ऐलान किया था।
प्राचा ने खुलेआम मीडिया के सामने यह विवादित पैरवी की थी कि इस तरह के हथियार प्रशिक्षण शिविर आयोजित करने और बंदूक के लाइसेंस के आवेदन पत्र भरने के लिए मस्जिदों और मदरसों के परिसरों का आधिकारिक रूप से इस्तेमाल किया जाएगा।
उसने मुस्लिमों को यहाँ तक सलाह दी थी कि भले ही उनकी संपत्ति बिक जाए, वो बन्दूक जरूर रखें। उसने विभिन्न मस्जिदों में मुस्लिमों को बंदूक चलाने की ट्रेनिंग देने के लिए कैंप लगाने की भी वकालत की थी। मस्जिदों में मार्शल आर्ट्स से लेकर हर फिजिकल ट्रेनिंग की बात करते हुए कहा था कि आज देश के SC/ST और मुस्लिमों के पास यही एकमात्र विकल्प बचा है।
अदालतों की भारी फटकार और ₹1 लाख का जुर्माना
अपनी आदतन और निरर्थक याचिकाओं (Frivolous Petitions) के माध्यम से देश की न्यायप्रणाली का कीमती समय बर्बाद करने के कारण महमूद प्राचा को कोर्ट से कई बार भारी अपमान और फटकार झेलनी पड़ी है।
दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों की सुनवाई के दौरान कड़कड़डूमा कोर्ट समेत विभिन्न निचली व उच्च अदालतों ने प्राचा की कार्यशैली पर कड़े सवाल उठाए थे और दंगों के आरोपितों को बचाने के लिए अदालत का समय नष्ट करने पर उसे सख्त चेतावनी दी थी।
इसके अलावा इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी महमूद प्राचा की याचिकाओं के पीछे की मंशा पर बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए उस पर ₹1 लाख का भारी जुर्माना ठोका था। प्राचा ने एक ही विषय और समान तथ्यों पर बार-बार बेतुकी और निरर्थक जनहित याचिकाएँ दाखिल कर अदालत का वक्त खराब करने का प्रयास किया था।
इलाहाबाद हाई कोर्ट की पीठ ने सख्त लहजे में सवाल उठाया था कि जब याचिका के मुख्य विषय का समाधान पहले ही हो चुका है, तो बार-बार एक ही तरह की याचिकाएँ लाकर अदालत को गुमराह करने और सुर्खियाँ बटोड़ने की कोशिश क्यों की जा रही है?
हालाँकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस ₹1 लाख के जुर्माने के भुगतान पर अंतरिम रोक लगा दी थी, लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट की यह तल्ख टिप्पणी प्राचा की कानूनी पैंतरेबाजी, अदालती प्रक्रिया के दुरुपयोग और न्यायिक व्यवस्था को अटकाने की उनकी नीयत को पूरी तरह उजागर करती है।
कानूनी पेशे का राजनीतिक व वैचारिक इस्तेमाल
एक अधिवक्ता का प्राथमिक कर्तव्य अपने मुवक्किल को निष्पक्ष कानूनी सहायता प्रदान करना और संविधान की मर्यादा का पालन करना होता है। लेकिन महमूद प्राचा के पूरे करियर का अवलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि उसने वकालत के पेशे को अपने निजी, वैचारिक और राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने का एक माध्यम बना लिया है।
दालतों के भीतर प्रक्रियात्मक अड़ंगे लगाना और अदालतों के बाहर मीडिया व सोशल मीडिया पर आकर संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के खिलाफ नफरती बयान देना प्राचा की कार्यशैली का मुख्य हिस्सा बन चुका है।
जब भी पुलिस या जाँच एजेंसियाँ उनके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई करती हैं, तो वह तुरंत इसे ‘लोकतंत्र की हत्या’ और वकीलों की आजादी पर हमला बताकर शोर मचाने लगता है। उसका यह दोहरा मापदंड न केवल वकालत के पेशे की गरिमा को गिराता है, बल्कि समाज में कानून के शासन (Rule of Law) के प्रति अविश्वास भी पैदा करता है।
महमूद प्राचा का पूरा राजनीतिक व कानूनी घटनाक्रम और साक्षात्कारों में उसके लगातार आक्रामक होते बयान यह स्पष्ट करते हैं कि वह कानून के दायरे में रहकर अपने मुवक्किलों को न्याय दिलाने के बजाय, कानूनी व्यवस्था की आड़ लेकर अपने राजनीतिक, साम्प्रदायिक और वैचारिक एजेंडे को साधने का प्रयास करता रहा है।
एक तरफ जहाँ वह यूट्यूब साक्षात्कारों में देश के संवैधानिक प्रमुखों, चुनाव प्रणाली, मीडिया और सुप्रीम कोर्ट पर बिना किसी साक्ष्य के संगीन और नफरती आरोप लगाता है, वहीं दूसरी तरफ उसका अपना रिकॉर्ड जाली दस्तावेजों, मृत व्यक्ति के फर्जी दस्तखत, अदालतों की भारी फटकार और समाज में साम्प्रदायिक तनाव भड़काने वाले बयानों से भरा हुआ है।
अधिकारों और संविधान की आड़ लेने वाला यह चेहरा खुद देश के कानून, न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थाओं की धज्जियाँ उड़ाने में सबसे आगे रहा है।
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में विरोध प्रदर्शनों और चुनाव संबंधी हिंसा के बीच पाकिस्तानी अधिकारियों ने कथित तौर पर मुजफ्फरबाद में चुनाव बहिष्कार और पाकिस्तान के एक्शन के कवरेज को देखते हुए अल जजीरा पर पूरे पाकिस्तान में प्रतिबंध लगा दिया है।
पीओके में पाकिस्तानी सेना और उसके नियंत्रित वाली सरकार के खिलाफ स्थानीय लोगों का विरोध प्रदर्शन जोरों से जारी है। इसकी वजह से इलाके में अशांति फैली हुई है। एक ओर पाकिस्तान आंदोलन को कुचलने के लिए पीओके में प्रदर्शनकारियों की हत्या कर रहा है। वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत को कवर करने वाले मीडिया संस्थानों को डिजिटल सेंसरशिप का सामना करना पड़ रहा है।
इसी कड़ी में पाकिस्तान के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने मुजफ्फरबाद चुनाव बहिष्कार और पीओके में राज्य की कार्रवाई को दिखाने पर कतर के न्यूज चैनल अल जजीरा इंग्लिश पर प्रतिबंध लगा दिया है।
पाकिस्तानी सरकार ने अल जजीरा पर ‘पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता’ करने का आरोप लगाया है, क्योंकि उसने पीओके के मुजफ्फराबाद डिवीजन में और पाकिस्तान में बसे ‘शरणार्थियों’ के लिए आवंटित 12 सीटों के चुनावों के सार्वजनिक बहिष्कार को उजागर किया था।
5 जून 2026 को PoK में विरोध प्रदर्शन शुरू होने के बाद से अल जजीरा ने इन प्रदर्शनों को कवर किया है और पुलिस की कार्रवाई में भारी संख्या में आम जनता के मारे जाने को उजागर किया है, जबकि पाकिस्तानी अधिकारी रावलकोट और PoK के अन्य क्षेत्रों में अपनी क्रूर कार्रवाइयों को कम करके आँकते रहे हैं।
हाल ही में अल जजीरा ने मुजफ्फराबाद के उन लोगों को दिखाया और चुनाव बहिष्कार के बाद के हालात की जानकारी दी थी। इससे पाकिस्तानी हुक्मरान नाराज हो गए। उन्होने इसे चुनिंदा और पक्षपातपूर्ण बताते हुए इस पर रोक लगाने की घोषणा की। दरअसल वहाँ की स्थितियों से पाकिस्तानी अधिकारी काफी क्षुब्ध थे, क्योंकि उनके लिए स्थिति को संभालना आसान नहीं था।
पाकिस्तान के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने X पर कहा, “हमने आज मुजफ्फराबाद के चुनिंदा मतदान केंद्रों से अल जजीरा की चुनिंदा रिपोर्टिंग पर ध्यान दिया है। चुनिंदा समय और चुनिंदा व्यक्तियों के सुनियोजित बयानों के आधार पर चैनल ने चुनाव और मतदान प्रक्रिया को गलत तरीके से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इस तरह की पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता केवल निहित स्वार्थों वाले बाहरी तत्वों के एजेंडे की पुष्टि करती है जो इस चुनावी प्रक्रिया को अवैध ठहराने और मुजफ्फराबाद और पीओके के लोगों की इच्छा को कमजोर करने का प्रयास कर रहे हैं, जैसा कि अराजकता और जबरदस्ती के उनके विरोध से साफ दिख रहा है। ”
पाकिस्तानी सरकार ने अल जजीरा पर ‘पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता’ करने का आरोप लगाया है, क्योंकि उसने पीओके के मुजफ्फराबाद डिवीजन में और पाकिस्तान में बसे ‘शरणार्थियों’ के लिए आवंटित 12 सीटों के चुनावों के सार्वजनिक बहिष्कार को उजागर किया था।
5 जून 2026 से शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद अल जज़ीरा लगातार वहां की घटनाओं की रिपोर्टिंग कर रहा था। चैनल ने स्थानीय लोगों के हवाले से पुलिस कार्रवाई में बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने के दावे भी प्रकाशित किए, जबकि पाकिस्तानी प्रशासन इन दावों को कम करके दिखाता रहा।
हाल ही में अल जज़ीरा ने यह भी रिपोर्ट किया कि मुजफ्फराबाद के लोगों ने चुनाव का बहिष्कार किया। इस पर पाकिस्तान सरकार ने आरोप लगाया कि चैनल ने चुनिंदा मतदान केंद्रों की रिपोर्टिंग कर चुनाव प्रक्रिया को गलत तरीके से पेश किया। दरअसल पीओके की स्थितियों से पाकिस्तानी अधिकारी काफी क्षुब्ध थे, क्योंकि उनके लिए स्थिति को संभालना आसान नहीं था।
पाकिस्तान के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने X पर कहा, “हमने आज मुजफ्फराबाद के चुनिंदा मतदान केंद्रों से अल जजीरा की चुनिंदा रिपोर्टिंग पर ध्यान दिया है। चुनिंदा समय और चुनिंदा व्यक्तियों के सुनियोजित बयानों के आधार पर चैनल ने चुनाव और मतदान प्रक्रिया को गलत तरीके से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इस तरह की पक्षपातपूर्ण पत्रकारिता केवल निहित स्वार्थों वाले बाहरी तत्वों के एजेंडे की पुष्टि करती है जो इस चुनावी प्रक्रिया को अवैध ठहराने और मुजफ्फराबाद और पीओके के लोगों की इच्छा को कमजोर करने का प्रयास कर रहे हैं, जैसा कि अराजकता और जबरदस्ती के उनके विरोध से साफ दिख रहा है। ”
सिर्फ अल जज़ीरा ही नहीं, कई मीडिया संस्थान भी निशाने पर
रिपोर्टों के अनुसार, अल जजीरा अकेला मीडिया संस्थान नहीं है, जिस पर कार्रवाई हुई है। पाकिस्तान ने कई स्थानीय और क्षेत्रीय डिजिटल समाचार वेबसाइटों और प्लेटफॉर्मों की पहुँच भी सीमित कर दी गई है।
इनमें पाकिस्तान की प्रमुख विपक्षी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI), उसके संस्थापक और पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान से जुड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों के चैनल भी शामिल बताए जा रहे हैं।
इससे पहले इस्लामाबाद की एक अदालत में राष्ट्रीय साइबर अपराध जांच एजेंसी (NCCIA) की रिपोर्ट के आधार पर कई यूट्यूब चैनलों पर प्रतिबंध लगाने की माँग की गई थी। एजेंसी का आरोप था कि ये चैनल पाकिस्तान की सरकारी संस्थाओं और अधिकारियों के खिलाफ भड़काऊ और अपमानजनक सामग्री प्रसारित कर रहे हैं। इसके तुरंत बाद, क्षेत्र के कुछ हिस्सों में इंटरनेट और मोबाइल सेवाएं भी निलंबित कर दी गईं।
जम्मू और कश्मीर में अशांति की शुरुआत 45 सीटों वाली पीओके विधानसभा की 12 सीटों को लेकर हुए विवाद से हुई, जो भारतीय जम्मू और कश्मीर से आए शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं। स्थानीय ग्रुप का आरोप है कि इस्लामाबाद इन सीटों का इस्तेमाल चुनावों को प्रभावित करने और अपनी पसंद की सरकारें स्थापित करने के लिए करता है, जिससे स्थानीय प्रतिनिधित्व कमजोर हो जाता है।
8 जून को पुंछ जिले के रावलाकोट में प्रदर्शनकारियों और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के बीच हिंसक झड़प हुई, जिसमें कई स्थानीय लोगों के मारे जाने की खबर आई।
9 जून को जम्मू-कश्मीर अवामी एक्शन कमेटी ने पूरे क्षेत्र में बंद का आह्वान किया। इसके बाद मुजफ्फराबाद समेत कई शहरों में बाजार, परिवहन और सरकारी संस्थान बंद रहे।
रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि बाद में पाकिस्तान ने इलाके में खाद्य सामग्री, ईंधन और स्वास्थ्य सेवाओं की आपूर्ति भी प्रभावित की।
चुनाव के दौरान भी हिंसा
करीब दो महीने तक चले विरोध प्रदर्शनों के बीच हुए चुनाव भी हिंसक रहे। रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तानी सेना की गोलीबारी में कम से कम 19 लोगों की मौत हुई और 30 से अधिक लोग घायल हुए।
मारे गए लोगों में जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी के नेता सरदार उमर नजीर के भाई उस्मान नजीर भी शामिल बताए गए।
स्थानीय संगठनों का दावा है कि अब तक सुरक्षा बलों की कार्रवाई में कम से कम 80 प्रदर्शनकारियों की मौत हो चुकी है। हालांकि इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
इन घटनाओं के विरोध में मुजफ्फराबाद के कई लोगों ने चुनाव का बहिष्कार किया। उनका कहना था कि जब इतने लोगों की मौत हो चुकी है, तब सामान्य चुनाव कैसे कराए जा सकते हैं।
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री का बयान
जुलाई 2026 के अंत में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने प्रदर्शनकारियों को भारत जैसा दुश्मन बताया। उन्होंने कहा, “मैं इन प्रदर्शनकारियों को भी भारत की तरह पाकिस्तान का दुश्मन मानता हूँ।”
इससे पहले भी ख्वाजा आसिफ ने रावलाकोट और मीरपुर के लोगों को ‘असल कश्मीरी नहीं’ बताया था, क्योंकि वे अपने अधिकारों की माँग कर रहे थे।
पाकिस्तान लंबे समय से पीओके में मीडिया की स्वतंत्र रिपोर्टिंग पर कड़ी निगरानी रखता है। समय-समय पर इंटरनेट बंद करना, संचार सेवाएं रोकना और पत्रकारों की आवाजाही सीमित करना इसी नीति का हिस्सा बताया जाता है।
पहले JAAC को प्रतिबंधित संगठन घोषित किया गया और अब स्थानीय तथा विदेशी मीडिया संस्थानों पर भी कार्रवाई की जा रही है। कई पत्रकारों पर इलेक्ट्रॉनिक अपराध रोकथाम कानून (PECA) और अन्य स्थानीय कानूनों के तहत मामले दर्ज होने की भी खबरें हैं।
इसी वजह से कई स्थानीय मीडिया संस्थानों पर सरकारी लाइन का समर्थन करने या स्वयं सेंसरशिप अपनाने के आरोप लगते रहे हैं।
पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में ‘आज़ाद’ जैसा कुछ भी नहीं है। पाकिस्तान न केवल कश्मीरी लोगों और संस्थानों पर, बल्कि कब्जे वाले क्षेत्र के बारे में प्रचलित धारणाओं पर भी कड़ा नियंत्रण रखता है।
पाकिस्तानी अधिकारियों ने कई मौकों पर पाकिस्तान समर्थक स्थानीय पत्रकारों के साथ-साथ विदेशी पत्रकारों के लिए पीओके में चुनिंदा स्थलों पर जाने की अनुमति दी, ताकि भारत के आरोपों को झूठा साबित किया जा सके।
जबकि हालात ऐसे हैं कि वहाँ आए दिन हिंसक घटनाएँ हो रही हैं। पाकिस्तान इलाके में सबकुछ सही है यह दिखाने और तथाकथित विकास को दिखाने के लिए तथ्यात्मक झूठ को बढ़ावा देता रहा है। वह उन पर नियंत्रण रखना चाहता है। उसकी पूरी कोशिश होती है कि वह किसी तरह पीओके के कश्मीरी लोग और जम्मू और कश्मीर के भारतीय हिस्से में रहने वालों की तुलना कर ये बताएँ कि ‘आजाद कश्मीर’ में अधिक स्वतंत्र और गरिमापूर्ण तरीके से लोग जीवन जी रहे हैं।
पाकिस्तान सकारात्मक प्रचार के लिए कश्मीर के पीओके में चुनिंदा मीडिया भेजता है, ताकि उसका प्रोपेगेंडा साबित हो सके। साथ ही उन मीडिया संस्थानों को प्रतिबंधित करता है, जो उसके दमनकारी चेहरे को दुनिया के सामने लाते हैं।
पिछले साल मई में जब भारत ने पाकिस्तान-नियंत्रित क्षेत्रों में इस्लामी आतंकी ढाँचे पर हमला किया, तो इस्लामाबाद ने तुरंत विदेशी पत्रकारों के सामने खुद को ‘पीड़ित’ दिखाने की कोशिश की, लेकिन जब अंतरराष्ट्रीय मीडिया पीओके में बेहाल कानून-व्यवस्था और कश्मीरियों पर की जा रही हिंसक कार्रवाई को कवर करता है, तो उसी मीडिया को परेशान किया जाता है, प्रतिबंधित किया जाता है और उनकी कवरेज पर सवाल उठाए जाते हैं।
(यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
महाराष्ट्र में अवैध धर्मांतरण को रोकने के लिए ‘महाराष्ट्र धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम 2026’ आधिकारिक रूप से लागू हो गया है। राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों से बजट सत्र के दौरान पारित होने और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हस्ताक्षर के बाद इसे आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित कर दिया गया।
विधानसभा में इस बिल पर बहस के दौरान उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने समर्थन किया था, जबकि कॉन्ग्रेस, एनसीपी और समाजवादी पार्टी सहित कई विपक्षी दलों ने इसका विरोध किया था।
यह कानून संगठित तरीके से ब्रेनवाशिंग, प्रलोभन या दबाव के जरिए भोले-भाले और कमजोर वर्ग के लोगों के धर्मांतरण को रोकने, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और सामाजिक सद्भाव को संरक्षित करने के उद्देश्य से लाया गया है।
कौन से तरीके माने जाएँगे अवैध धर्मांतरण के लिए प्रलोभन
इस कानून में गैर-कानूनी धर्मांतरण, प्रलोभन और दबाव की सीमाओं को काफी विस्तार से बताया गया है। इसमें उपहार, नकद राशि, रोजगार, विवाह का वादा, मुफ्त शिक्षा, बेहतर जीवनशैली देने के वादे को प्रलोभन माना गया है।
इसके अलावा किसी एक धर्म को श्रेष्ठ बताना या दूसरे धर्म की बुराई करना भी इसी श्रेणी में आएगा। शारीरिक हिंसा, डराना-धमकाना, संपत्ति को नुकसान पहुँचाना, ‘ईश्वर के नाखुश होने’ का डर दिखाना या ‘सामाजिक बहिष्कार’ की चेतावनी देते हुए दबाव डालना भी इसी श्रेणी में शामिल है।
साथ ही, शैक्षणिक संस्थानों के जरिए ब्रेनवाशिंग और किसी प्रकार के ‘सामूहिक धर्मांतरण’ को भी गैर-कानूनी माना गया है। इतना ही नहीं यदि कोई विवाह केवल धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से किया गया है, तो अदालत उसे अमान्य घोषित कर सकती है।
क्या होगी सजा
इस कानून के तहत दर्ज अपराध गैर-जमानती होंगे और पुलिस को बिना औपचारिक शिकायत के स्वतः संज्ञान लेकर सीधे FIR दर्ज करने व जाँच करने का अधिकार होगा।
सामान्य मामलों में अवैध धर्मांतरण पर अधिकतम 7 साल की जेल और 1 लाख रुपए तक का जुर्माना होगा, जबकि नाबालिगों, महिलाओं, मानसिक अस्वस्थ व्यक्तियों या SC/ST समुदाय के लोगों और सामूहिक धर्मांतरण के मामलों में यह सजा 7 साल की जेल व 5 लाख रुपए तक का जुर्माना तय की गई है।
दोबारा अपराध करने पर सजा बढ़ाकर 10 साल और जुर्माना 7 लाख रुपए तक हो सकता है।
दोषी संस्थाओं का पंजीकरण रद्द करने, अनुदान रोकने और अवैध दस्तावेजों को प्रमाणित या समर्थित करने वाले सहयोगियों को भी दंडित करने का प्रावधान है।
अगर कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से धर्म परिवर्तन करना चाहता है, तो उसे 60 दिन पहले प्रशासन को सूचना देनी होगी। इसके अलावा धर्म परिवर्तन होने के बाद 25 दिनों के भीतर उसे अधिकारियों के पास पंजीकरण कराना होगा। अगर ऐसा नहीं किया गया तो उस धर्म परिवर्तन को अमान्य माना जाएगा।
कैसे फँसाए जाते हैं भोले-भाले लोग
बता दें कि धर्मांतरण के खिलाफ लाए फडणवीस सरकार के इस कानून में साफ है कि कुछ मामलों में कन्वर्जन, संगठित तरीके से लोगों का ब्रेनवॉश करके या कमजोर लोगों को टारगेट में लेकर किया जाता है। ऐसे धर्मांतरण कभी-कभी ‘बलपूर्वक, अनैच्छिक या नागरिकों को लालच देकर या दूसरे तरह से प्रभावित करके’ किए जाते हैं। इन गतिविधियों के दौरान टारगेट पर ‘भोले-भाले लोग’ होते हैं। उन्हें उपहार, धन, लाभ, रोजगार के अवसर या धार्मिक संगठनों के जो संस्थान संचालित हो रहे हैं, उनमें मुफ्त शिक्षा की पेशकश शामिल दी जाती है या फिर विवाह, बेहतर जीवनशैली या दैवीय उपचार के वादे किए जाते हैं।
महाराष्ट्र के इस कानून में प्रलोभन के दायरे को अन्य राज्यों की तुलना में कहीं अधिक विस्तार से बताया गया है। इसमें कहा गया है कि किसी एक धर्म को दूसरे धर्म से श्रेष्ठ बताकर या किसी अन्य धर्म के रीति-रिवाजों, परंपराओं या प्रथाओं की बुराई करना या उसे गलत तरीके से बताने का प्रयास भी प्रलोभन की श्रेणी में आ सकते हैं।
इस कानून में ‘दबाव’ को भी विस्तार से बताया गया है। इसमें किसी व्यक्ति, परिवार या समूह को डरा-धमका कर या मनोवैज्ञानिक दबाव के माध्यम से उनकी इच्छा के विरुद्ध कार्य करने के लिए बाध्य गैरकानूनी होगा। इसमें मारना-पीटना या धमकियाँ देना, संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की धमकियाँ या यहाँ तक कि ‘ईश्वर के नाखुश होने’ और ‘सामाजिक बहिष्कार’ या बहिष्कार की चेतावनी भी शामिल है।
इसमें कहा गया है कि यदि कोई विवाह केवल धर्मांतरण के उद्देश्य से किया गया है, तो कोर्ट उस विवाह को अमान्य घोषित कर सकता है। विवाह के दोनों पक्षों में से किसी को भी अदालत में जाकर यह दावा करने का अधिकार होगा कि धर्म परिवर्तन अवैध रूप से किया गया था।
कैसे बदल सकते हैं धर्म
धर्मांतरण विरोधी कानून में उस प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है, जिसका पालन किसी व्यक्ति को कानूनी रूप से अपना धर्म बदलने के वक्त करना जरूरी है।
कानून में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे धर्म को अपनाना चाहता है, तो उसे कम से कम 60 दिन पहले जिला मजिस्ट्रेट या सरकार द्वारा नियुक्त किसी दूसरे प्राधिकारी को इसकी जानकारी देनी होगी।
इसी प्रकार, यदि कोई संस्था या धार्मिक निकाय धर्मांतरण समारोह आयोजित करना चाहता है, तो उसे कम से कम 60 दिन पहले संबंधित अधिकारी को पूर्व सूचना देनी होगी।
सरकारी प्राधिकारी पूरी जानकारी अपने नोटिस बोर्ड के साथ-साथ स्थानीय प्राधिकरण के नोटिस बोर्ड पर भी चिपकाएगा, ताकि अगर जनता को कोई आपत्ति है तो वे बताएँ। आम लोगों को इसके लिए 30 दिन का समय दिया गया है।
यदि कोई आपत्ति आती है, तो प्राधिकरण पुलिस को जाँच का आदेश दे सकता है। यदि जाँच में यह पाया जाता है कि धर्मांतरण कानून का उल्लंघन है, तो पुलिस आपराधिक कार्रवाई कर सकती है।
कानून में यह भी अनिवार्य है कि धर्मांतरण हो जाने के बाद, धर्मांतरित व्यक्ति या समारोह संपन्न करने वाले व्यक्ति को 21 दिनों के भीतर घोषणा करनी होगी। यदि व्यक्ति जानकारी नहीं देता है, तो कानून यह मान लेगा कि धर्मांतरण हुआ ही नहीं है।
पुलिस खुद ले सकती है अवैध धर्मांतरण मामलों पर संज्ञान
इस कानून की एक और खासियत यह है कि पुलिस अधिकारियों को औपचारिक शिकायत के बिना भी कार्रवाई करने की अनुमति होगी । पुलिस को स्वतः संज्ञान लेने का अधिकार भी दिया गया है। वह जाँच कर सकता है कि कानून का उल्लंघन करते हुए कोई संपत्ति का हस्तांतरण हुआ है या नहीं।
यह कानून आपराधिक दायित्व का दायरा भी बढ़ाता है। धारा 12 के अनुसार, गैरकानूनी धर्मांतरण से जुड़े दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने, उनका समर्थन करने या उन्हें प्रमाणित करने वाले व्यक्तियों को भी अपराध में सहायता करने या उकसाने का दोषी माना जा सकता है और उन्हें दंडित किया जा सकता है।
अन्य राज्यों में धर्मांतरण कानून
धर्मांतरण के विरोध में मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, गुजरात,उत्तराखंड, हरियाणा, राजस्थान समेत कई राज्यों में कानून बनाया गया है। दरअसल संविधान ने देश की जनता को धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार को मूल अधिकार के तौर पर दिया है। ऐसे में किसी भी तरह से इसका उल्लंघन किया जाता है, तो ये संविधान की मूल भावना के भी खिलाफ है।
कुछ दिनों पहले की ही बात है जब जंतर-मंतर पर प्रदर्शन हुआ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा सरकार की खूब तीखी आलोचना हुई। सरकार ने भी अपने स्तर से इसका जवाब दिया, यही एक स्वस्थ लोकतंत्र में होता है।
पर, जब राजनीतिक विरोध का स्तर भगवान राम और माता सीता तक पहुँच जाए, जब संसद परिसर में राम और सनातन को लेकर नौटंकी की जाए और कॉन्ग्रेस के नेता पूछने लगें कि ‘मोदी की सीता कौन हैं?’ तो सवाल इससे आगे का हो जाता है। सवाल यह हो जाता है कि आखिर करोड़ों हिंदुओं की आस्था को इतना आसान निशाना क्यों समझ लिया गया है?
कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी का हालिया बयान पढ़िए। राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा का संदर्भ लेते हुए उन्होंने कहा कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंदिर में पूजा कर रहे थे, तब उन्हें ‘मोदी की सीता’ दिखाई नहीं दीं और फिर सवाल किया कि ‘राम की सीता कौन थीं और मोदी की सीता कौन हैं’।
Delhi: On Ram Temple donation row, Congress MP Pramod Tiwari says, Now, many things are auspicious… Even when Lord Ram performed the Ashwamedha Yajna, he had a stone idol of Goddess Sita made and placed beside him before performing it. Now, I kept looking when PM Modi was… pic.twitter.com/Ll7bSEyna4
31 जुलाई 2026 को संसद परिसर में राहुल गाँधी, पप्पू यादव और समाजवादी पार्टी के सांसद अवधेश प्रसाद समेत विपक्षी नेताओं ने राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी के मुद्दे को लेकर एक नौटंकी। इसमें साधुओं को चोर दिखाया गया, सनातन का जमकर अपमान किया गया। इसके बाद राहुल गाँधी, पप्पू यादव तथा अवधेश प्रसाद के खिलाफ FIR तक की गई है।
सवाल मंदिर के चंदे को चुराने वालों को बचाने का कतई नहीं है, उन पर कार्रवाई हो रही है और कठोर होनी चाहिए। लेकिन भ्रष्टाचार के आरोप की जाँच और भगवान राम से जुड़े प्रतीकों को राजनीतिक तमाशे में बदल देने एक बात नहीं हो सकती है।
और इसी के ठीक बाद प्रमोद तिवारी का यह बयान सामने आता है। इसलिए यह सवाल उठता है कि क्यों प्रधानमंत्री पर राजनीतिक हमला करने के लिए कॉन्ग्रेस के नेताओं को भगवान राम और माता सीता से जुड़े प्रतीकों का इस्तेमाल करना जरूरी लगता है? क्या हिंदुओं की सहिष्णुता को हर बार उनकी कमजोरी मानकर, उनके प्रतीकों पर वोटों के लिए हमले किए जाते रहेंगे?
राम मंदिर पर कॉन्ग्रेस का 2024 वाला रुख भी याद रखिए
यह इतिहास भी ज्यादा पुराना नहीं है। 2024 में अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा होने वाली थी। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और सोनिया गाँधी को भी निमंत्रण मिला था। कॉन्ग्रेस ने समारोह में शामिल न होने का निर्णय लिया और अपने आधिकारिक बयान में प्राण प्रतिष्ठा समारोह को भाजपा और आरएसएस का ‘राजनीतिक प्रोजेक्ट’ तक बता दिया था।
राहुल गाँधी ने भी जनवरी 2024 में कहा था कि 22 जनवरी का कार्यक्रम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और RSS के इर्द-गिर्द बनाया गया ‘राजनीतिक कार्यक्रम’ बन गया है और इसलिए कॉन्ग्रेस का उसमें जाना ठीक नहीं है। अब यह खुद से पूछिए, क्या राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा को सिर्फ इसलिए राजनीतिक कार्यक्रम कहा जा सकता है क्योंकि प्रधानमंत्री उसमें मौजूद थे?
राम मंदिर किसी एक प्रधानमंत्री की निजी संपत्ति नहीं था। यह करोड़ों हिंदुओं की आस्था से जुड़ा विषय था। लेकिन कॉन्ग्रेस को हिंदुओं की चिंता क्यों ही होनी लगी। हम कैसे भूल सकते है, यह वही कॉन्ग्रेस है जिसने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर भगवान राम को काल्पनिक तक बता दिया था। अब जब लगता है कि चंदा चोरी के नाम पर बीजेपी को घेर लेंगे तो राम भक्त बन गए लेकिन उसमें भी भगवान का अपमान ही किया।
आप खुद से एक सवाल करके देखिए, यदि किसी नेता को किसी अन्य मजहब के प्रतीक को लेकर इसी तरह का व्यंग्य करना हो, तो क्या वही राजनीतिक दल और वही नेता कर सकते हैं? इसका सीधा जवाब है, नहीं। फिर हिंदू धर्म के साथ यह सुविधा क्यों है?
भारत का हिंदू समाज हजारों वर्षों से अपनी आस्था, परंपरा और संस्कृति को लेकर जीता आया है। उसने बहुत कुछ सहा है, बहुत कुछ देखा है और फिर भी अपने देवताओं को लेकर उसके भीतर श्रद्धा बनी रही है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसकी भावनाओं की कोई कीमत नहीं।
भगवान राम किसी एक पार्टी की संपत्ति नहीं हैं। माता सीता किसी चुनावी पोस्टर की पात्र नहीं हैं। इसीलिए भाजपा समर्थक से लेकर कॉन्ग्रेस समर्थक तक, हर हिंदू को यह अधिकार है कि वह अपने आराध्य के बार-बार ऐसे अपमान पर सवाल करे।
यदि कॉन्ग्रेस को नरेंद्र मोदी से समस्या है तो PM मोदी पर राजनीतिक हमला करें। यदि भाजपा की नीतियों से समस्या है तो नीतियों पर हमला करे। लेकिन भगवान राम को PM मोदी से जोड़कर, माता सीता को राजनीतिक तंज बनाकर और सनातन को राजनीतिक गाली की तरह इस्तेमाल करके आखिर कॉन्ग्रेस हासिल क्या करना चाहती है?
भगवान राम की सबसे बड़ी पहचान ही मर्यादा है। और विडंबना देखिए कि उन्हीं भगवान राम का नाम लेकर राजनीति करने वाले ये कॉन्ग्रेसी और विपक्षी हर दिन मर्यादा की सीमा पार करने लगते हैं।
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत ने शानदार प्रदर्शन के साथ अपना अभियान समाप्त किया। स्कॉटलैंड के ग्लासगो में आयोजित इन खेलों में भारतीय खिलाड़ियों ने कई प्रतियोगिताओं में बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए कुल 39 पदक अपने नाम किए।
एथलेटिक्स, मुक्केबाजी, पैरा स्पोर्ट्स और जूडो समेत कई खेलों में भारत के प्रदर्शन ने यह साबित किया कि देश विभिन्न खेलों में धीरे-धीरे लेकिन लगातार प्रगति कर रहा है।
मेडल टैली में भारत चौथे स्थान पर रहा। भारतीय दल ने कुल 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य पदक जीते। प्रतियोगिता के नौवें दिन भारत के खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन करते हुए अकेले 16 पदक जीते, जिनमें 8 स्वर्ण पदक शामिल थे। इसी दमदार प्रदर्शन की बदौलत भारत ने पदक तालिका में 10वें स्थान से छलांग लगाकर चौथा स्थान हासिल किया।
(फोटो साभार: Chatgpt)
वेटलिफ्टिंग
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत का पहला स्वर्ण पदक वेटलिफ्टिंग से आया। मीराबाई चानू ने महिलाओं के 48 किलोग्राम वर्ग में लगातार तीसरी बार कॉमनवेल्थ गेम्स का स्वर्ण पदक जीता। उन्होंने कुल 190 किलोग्राम (85 किलोग्राम स्नैच और 105 किलोग्राम क्लीन एंड जर्क) वजन उठाकर गेम्स रिकॉर्ड भी बनाया।
पुरुषों के 60 किलोग्राम वर्ग में ऋषिकांता सिंह ने रजत पदक जीता, जबकि पुरुषों के +110 किलोग्राम वर्ग में लवप्रीत सिंह ने भी रजत पदक हासिल किया।
इसके अलावा वल्लूरी अजय बाबू ने पुरुषों के 79 किलोग्राम वर्ग में रजत पदक जीता। महिलाओं के 53 किलोग्राम वर्ग में ज्ञानेश्वरी यादव ने रजत पदक और महिलाओं के 58 किलोग्राम वर्ग में बिंद्यारानी देवी ने कांस्य पदक अपने नाम किया। इस तरह भारतीय वेटलिफ्टिंग दल ने कुल 8 पदक जीते।
मुक्केबाजी
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय मुक्केबाजों ने सभी वर्गों में सबसे ज्यादा स्वर्ण पदक जीतकर शानदार प्रदर्शन किया। भारत ने मुक्केबाजी में कुल 10 पदक जीते, जिनमें 7 स्वर्ण और 3 रजत पदक शामिल रहे। यह कॉमनवेल्थ गेम्स के एक ही संस्करण में किसी भी देश का सबसे सफल मुक्केबाजी प्रदर्शन रहा।
साक्षी चौधरी (महिला 51 Kg), प्रीति (महिला 54 Kg), जैस्मीन लांबोरिया (महिला 57 Kg), प्रिया (महिला 60 Kg), अरुंधति चौधरी (महिला 70 Kg), सचिन सिवाच (पुरुष 60 Kg) और अंकुश पंघाल (पुरुष 80 Kg) ने अपने-अपने वर्ग में स्वर्ण पदक जीते। वहीं जादूमणि सिंह (पुरुष 55 Kg), लवलीना बोरगोहेन (महिला 75 Kg) और नरेंद्र बड़वाल (पुरुष 90+ Kg) ने रजत पदक हासिल किए।
पैरा स्पोर्ट्स
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के लिए भारत ने 28 सदस्यीय पैरा स्पोर्ट्स दल भेजा था। इस दल ने 3 स्वर्ण, 2 रजत और 2 कांस्य सहित कुल 7 पदक जीतकर अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। वर्ष 2022 में कॉमनवेल्थ गेम्स में पैरा स्पोर्ट्स की शुरुआत के बाद यह इस स्पर्धा में भारत का सबसे सफल प्रदर्शन रहा।
खास बात यह है कि पिछले सभी कॉमनवेल्थ गेम्स संस्करणों में भारत ने कुल मिलाकर जितने 7 पदक जीते थे, उतने ही पदक उसने इस बार अकेले जीत लिए।
पैरा खिलाड़ियों का यह प्रदर्शन भारत के पैरा स्पोर्ट्स के लिए एक महत्वपूर्ण और अभूतपूर्व क्षण रहा। दिलीप गावित (पुरुष 100 मीटर T47), शर्मिला धनखड़ (महिला शॉट पुट F57) और सोमन राणा (पुरुष शॉट पुट F57) ने स्वर्ण पदक जीते। वहीं शुभम जुयाल (पुरुष शॉट पुट F57) और मोहम्मद बासिल (पुरुष 100 मीटर T47) ने रजत पदक अपने नाम किए।
इसके अलावा शिल्पा के शायला (महिला शॉट पुट F57) और झंडू कुमार (पैरा पावरलिफ्टिंग) ने एक-एक कांस्य पदक जीता।
जूडो
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारतीय जूडो खिलाड़ियों ने इतिहास रचते हुए 2 स्वर्ण पदक जीते। अस्मिता डे ने महिलाओं के 48 किलोग्राम वर्ग में स्वर्ण पदक जीतकर कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय जूडोका बनने का गौरव हासिल किया। इसके बाद हर्ष सिंह ने पुरुषों के 60 किलोग्राम वर्ग में स्वर्ण पदक जीता।
इसके अलावा यामिनी मौर्य ने महिलाओं के 57 किलोग्राम वर्ग में रजत पदक जीता, जबकि उन्नति शर्मा ने महिलाओं के 63 किलोग्राम वर्ग में कांस्य पदक हासिल किया।
एथलेटिक्स और अन्य स्पर्धाएँ
कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के लिए भारत ने 32 सदस्यीय एथलेटिक्स टीम भेजी थी, जिसमें 22 पुरुष और 10 महिला खिलाड़ी शामिल थे। इसके अलावा 11 सदस्यीय पैरा एथलेटिक्स दल ने भी प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। भारतीय एथलीटों ने कई शानदार प्रदर्शन किए, जिसने खेलों में भारत की लगातार बढ़ती प्रगति को दर्शाया।
ओलंपिक और विश्व चैंपियन नीरज चोपड़ा ने पुरुषों की भाला फेंक स्पर्धा में रजत पदक जीता, जबकि पदार्पण कर रहे यशवीर सिंह ने कांस्य पदक अपने नाम किया। सर्वेश कुशारे ने 2.25 मीटर की छलांग लगाकर पुरुषों की हाई जंप स्पर्धा में रजत पदक जीता और इस स्पर्धा में भारत का पहला कॉमनवेल्थ गेम्स रजत पदक दिलाया।
ट्रैक एंड फील्ड में लंबी दूरी के धावक और एशियाई चैंपियन गुलवीर सिंह ने 10,000 मीटर में रजत पदक जीतने के बाद 5,000 मीटर दौड़ में कांस्य पदक भी हासिल किया। इसके साथ ही वह कॉमनवेल्थ गेम्स के एक ही संस्करण में ट्रैक एंड फील्ड में दो पदक जीतने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बने।
साथ ही 5,000 मीटर स्पर्धा में पदक जीतने वाले पहले भारतीय भी बने। इसके अलावा मुरली श्रीशंकर (पुरुष लंबी कूद) ने रजत, प्रवीण चित्रावेल (पुरुष ट्रिपल जंप) ने रजत, सेल्वा प्रभु थिरुमारन (पुरुष ट्रिपल जंप) ने कांस्य, सीमा कालीरमना (महिला डिस्कस थ्रो) ने कांस्य और तेजस्विन शंकर (डेकाथलॉन) ने कांस्य पदक जीता।
कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत का सफर
साल 1930 में कॉमनवेल्थ गेम्स की शुरुआत के बाद से भारत ने 1930, 1950, 1962 और 1986 को छोड़कर सभी संस्करणों में हिस्सा लिया है। दिलचस्प बात यह है कि कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत का पहला स्वर्ण पदक महान धावक स्वर्गीय मिल्खा सिंह ने 1958 में कार्डिफ में आयोजित खेलों की 440 गज दौड़ में जीता था।
भारत ने वर्ष 2010 में कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी की थी। इसी संस्करण में भारत पहली और अब तक की एकमात्र बार 100 पदकों का आँकड़ा पार करने में सफल रहा था।
2010 के खेलों में भारत ने कुल 101 पदक जीते थे। हालाँकि इसके बाद भारत उस प्रदर्शन को दोहरा नहीं सका, लेकिन 2002 में मैनचेस्टर में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स में 69 पदकों के साथ अपना दूसरा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया था।
ग्लासगो में कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत का मौजूदा प्रदर्शन वर्ष 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए एक मजबूत खिलाड़ी दल तैयार करने की ठोस नींव बन गया है। वर्ष 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी भारत करेगा।
(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
अगर राजधानी ही संकट में हो तो सरकार कहाँ से चलेगी? जापान में यह सवाल अब सिर्फ एक काल्पनिक आपदा की चर्चा नहीं रह गया है। भूकंप और सुनामी के लगातार खतरे को देखते हुए नीति-निर्माता इस संभावना पर मंथन कर रहे हैं कि किसी बड़े संकट में टोक्यो के काम करने की स्थिति में न रहने पर देश का प्रशासन कैसे संभाला जाएगा।
प्रधानमंत्री कार्यालय, संसद और प्रमुख मंत्रालयों के साथ आर्थिक गतिविधियों का बड़ा हिस्सा टोक्यो में केंद्रित होने के कारण यह चिंता और गंभीर हो जाती है। इसी के जवाब के तौर पर जापान ने ‘दूसरी राजधानी’ की व्यवस्था की दिशा में बड़ा कदम उठाया है।
जापानी संसद ने हाल ही में एक ऐसा कानून पारित किया है, जिसने देश में ‘दूसरी राजधानी‘ (Secondary Capital) बनाने का रास्ता खोल दिया है।
हालाँकि, इस कानून का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि टोक्यो से राजधानी हटाई जा रही है। सरकार का उद्देश्य केवल इतना है कि यदि भविष्य में कोई ऐसी आपदा आती है, जिससे टोक्यो का प्रशासन ठप पड़ जाए, तो देश की शासन व्यवस्था तुरंत किसी दूसरे शहर से संचालित की जा सके।
सरकार इसे राष्ट्रीय सुरक्षा, आपदा प्रबंधन और प्रशासनिक निरंतरता से जुड़ा एक बड़ा सुधार बता रही है। वहीं विपक्ष का आरोप है कि इस कानून के पीछे राष्ट्रीय हित से ज्यादा राजनीतिक समीकरण काम कर रहे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर जापान को दूसरी राजधानी की जरूरत क्यों महसूस हुई? यह नया कानून क्या कहता है? कौन-कौन से शहर इसकी दौड़ में शामिल हैं? क्या वास्तव में इससे जापान को फायदा होगा या फिर यह केवल राजनीतिक प्रयोग है? और क्या भारत में भी कभी ऐसी माँग उठी है? इन सभी सवालों के जवाब इस पूरे मामले को समझने के लिए बेहद जरूरी हैं।
आखिर जापान को दूसरी राजधानी की जरूरत क्यों पड़ी और नया कानून क्या कहता है?
जापान भौगोलिक रूप से दुनिया के सबसे संवेदनशील देशों में गिना जाता है। यह चार प्रमुख टेक्टोनिक प्लेटों के मिलन क्षेत्र में स्थित है, जिसकी वजह से यहाँ लगातार भूकंप आते रहते हैं। देश में हर साल करीब 1500 भूकंप दर्ज किए जाते हैं और औसतन हर दिन दो से तीन बार धरती हिलती है।
वैज्ञानिक कई वर्षों से चेतावनी देते रहे हैं कि टोक्यो महानगरीय क्षेत्र या ननकाई ट्रफ में भविष्य में एक बेहद शक्तिशाली भूकंप आने की आशंका बनी हुई है। जापानी सरकार का अनुमान है कि अगले 30 वर्षों में टोक्यो क्षेत्र में 7 या उससे अधिक तीव्रता का भूकंप आने की लगभग 70 प्रतिशत संभावना है।
यदि ऐसा होता है तो केवल इमारतों को नुकसान नहीं पहुँचेगा बल्कि प्रधानमंत्री कार्यालय, संसद, मंत्रालय, वित्तीय संस्थान, संचार नेटवर्क और राष्ट्रीय प्रशासन भी प्रभावित हो सकता है। ऐसी स्थिति में पूरे देश की शासन व्यवस्था बाधित होने का खतरा पैदा हो जाएगा। इसी जोखिम को कम करने के लिए सरकार ने बैकअप राजधानी की अवधारणा पर काम शुरू किया।
इसी दिशा में जापानी संसद के उच्च सदन ने जुलाई 2026 में ‘एक्ट ऑन द प्रमोशन ऑफ मेजर्स टू एंश्योर द कंटिन्यूटी ऑफ नेशनल एंड सोशल फंक्शंस एंड द डेवलपमेंट ऑफ ए सेकेंडरी कैपिटल’ को मंजूरी दी।
यह कानून किसी शहर को तुरंत दूसरी राजधानी घोषित नहीं करता बल्कि एक कानूनी ढाँचा तैयार करता है। इसके तहत जापान के विभिन्न प्रीफेक्चर (राज्य) आवेदन कर सकेंगे और सरकार तय मानकों के आधार पर यह फैसला करेगी कि कौन सी जगह आपातकालीन प्रशासनिक केंद्र बनने के लिए सबसे उपयुक्त है।
यहाँ एक बात समझना भी जरूरी है कि टोक्यो अपनी जगह राजधानी बना रहेगा। दूसरी राजधानी केवल आपातकालीन स्थिति में सरकार के कामकाज को जारी रखने के लिए होगी। यानी किसी बड़े संकट की स्थिति में प्रधानमंत्री कार्यालय, मंत्रालय और अन्य आवश्यक प्रशासनिक संस्थान अस्थायी रूप से वहीं से काम कर सकेंगे।
कौन-सी शर्तें पूरी करनी होंगी और सरकार किस तरह मदद करेगी?
दूसरी राजधानी बनने की इच्छा रखने वाले किसी भी राज्य को केवल आवेदन भर देने से यह दर्जा नहीं मिल जाएगा। इसके लिए सरकार ने कई महत्वपूर्ण मानक तय किए हैं। सबसे पहले उस क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं का खतरा अपेक्षाकृत कम होना चाहिए।
साथ ही वहाँ पर्याप्त जनसंख्या, मजबूत अर्थव्यवस्था, विकसित प्रशासनिक ढाँचा और राष्ट्रीय स्तर के सरकारी कामकाज को संभालने की क्षमता भी होनी चाहिए। बेहतर सड़क, रेल और हवाई संपर्क के अलावा आधुनिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर भी इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा। आवेदन करने से पहले संबंधित राज्य की स्थानीय विधानसभा से अपनी मंजूरी भी लेनी होगी।
यदि किसी क्षेत्र का चयन दूसरी राजधानी के रूप में होता है तो उसके विकास में केंद्र सरकार महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। सरकार वहाँ नए सरकारी कार्यालयों और प्रशासनिक भवनों का निर्माण कराएगी, परिवहन नेटवर्क को मजबूत बनाएगी, डिजिटल सुविधाओं का विस्तार करेगी और निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए टैक्स में रियायत तथा अन्य आर्थिक प्रोत्साहन भी देगी।
इसका उद्देश्य केवल एक बैकअप प्रशासनिक केंद्र बनाना नहीं है, बल्कि ऐसे शहर को आर्थिक और औद्योगिक रूप से भी इतना सक्षम बनाना है कि जरूरत पड़ने पर वह देश के प्रमुख प्रशासनिक कार्यों को बिना किसी बाधा के संभाल सके।
दूसरी राजधानी की दौड़ में कौन-कौन से शहर हैं और ओसाका सबसे आगे क्यों माना जा रहा है?
हालाँकि कानून में किसी भी शहर का नाम तय नहीं किया गया है, लेकिन कई प्रीफेक्चर खुलकर अपनी दावेदारी पेश कर चुके हैं। इनमें सबसे अधिक चर्चा ओसाका की हो रही है।
जापान का दूसरा सबसे बड़ा महानगरीय क्षेत्र होने के साथ-साथ ओसाका लंबे समय से देश की आर्थिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ का विकसित बुनियादी ढाँचा, मजबूत परिवहन व्यवस्था और प्रशासनिक क्षमता इसे सबसे मजबूत दावेदारों में शामिल करती है।
ओसाका के अलावा आइची राज्य ने भी दूसरी राजधानी बनने की इच्छा जताई है। वहाँ के गवर्नर हिदेआकी ओमुरा का कहना है कि उनका क्षेत्र राष्ट्रीय स्तर की प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ संभालने के लिए पूरी तरह तैयार है। ऑटोमोबाइल कंपनी टोयोटा समेत कई वैश्विक उद्योगों की मौजूदगी आइची की आर्थिक ताकत को और मजबूत बनाती है।
फुकुओका भी इस दौड़ में पीछे नहीं है। स्थानीय प्रशासन का कहना है कि पूरा क्षेत्र मिलकर दूसरी राजधानी की जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार है और इस दिशा में आवश्यक प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
होक्काइडो भी खुद को मजबूत दावेदार मानता है। वहाँ के गवर्नर का तर्क है कि साप्पोरो टोक्यो से काफी दूर स्थित है, इसलिए यदि राजधानी क्षेत्र किसी बड़े भूकंप या सुनामी से प्रभावित होता है तो यहाँ उसका असर अपेक्षाकृत कम होगा।
इसके अलावा साप्पोरो में पहले से कई केंद्रीय सरकारी कार्यालय मौजूद हैं, जिससे आपातकालीन स्थिति में प्रशासनिक कामकाज शुरू करना आसान हो सकता है।
हालाँकि राजनीतिक और प्रशासनिक विश्लेषकों का मानना है कि फिलहाल ओसाका सबसे आगे दिखाई देता है। लेकिन इसकी राह पूरी तरह आसान भी नहीं है। कई विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भविष्य में ननकाई ट्रफ में बड़ा भूकंप आता है तो ओसाका का कुछ हिस्सा भी प्रभावित हो सकता है।
ऐसे में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या जिस शहर पर खुद प्राकृतिक आपदा का जोखिम बना हुआ है, वह पूरे देश के लिए सबसे सुरक्षित बैकअप राजधानी साबित हो पाएगा।
कानून को लेकर क्यों हो रहा है विवाद और संसद में अब तक क्या-क्या हुआ?
सरकार इस कानून को राष्ट्रीय सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के लिहाज से एक ऐतिहासिक कदम बता रही है, लेकिन विपक्ष और कई राजनीतिक विश्लेषक इससे पूरी तरह सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि दूसरी राजधानी की अवधारणा जितनी प्रशासनिक दिखाई देती है, उसके पीछे उतनी ही राजनीतिक रणनीति भी छिपी हुई है।
सबसे बड़ा विवाद ओसाका को लेकर है। आलोचकों का आरोप है कि यह कानून कहीं न कहीं ओसाका को बढ़त दिलाने के उद्देश्य से तैयार किया गया है, क्योंकि यह शहर जापान इनोवेशन पार्टी (JIP) का सबसे मजबूत राजनीतिक गढ़ है।
दरअसल अक्टूबर 2025 में लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (LDP) और जापान इनोवेशन पार्टी के बीच हुए गठबंधन समझौते में दूसरी राजधानी बनाने का वादा भी शामिल था। इसी वजह से विपक्ष का कहना है कि यह केवल राष्ट्रीय आवश्यकता नहीं, बल्कि गठबंधन की राजनीति का भी हिस्सा है।
उनका यह भी आरोप है कि सरकार ने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि इस पूरी योजना पर कितना खर्च आएगा, किन सरकारी विभागों को भविष्य में दूसरी राजधानी में स्थानांतरित किया जाएगा और इसका आर्थिक लाभ क्या होगा।
यही कारण रहा कि संसद में यह विधेयक बिना विवाद के पारित नहीं हो सका। निचले सदन में जहाँ सत्तारूढ़ गठबंधन के पास बहुमत था, वहीं ऊपरी सदन में सरकार को कड़ा विरोध झेलना पड़ा।
विपक्षी दलों ने कई दिनों तक विधेयक का विरोध किया और मतदान टालने की कोशिश की। विवाद का एक बड़ा कारण स्थानीय जनमत संग्रह (रेफरेंडम) भी था। विपक्ष चाहता था कि यदि किसी राज्य में दूसरी राजधानी के लिए जनमत संग्रह कराया जाए तो उसे स्थानीय चुनावों के साथ एक ही दिन आयोजित न किया जाए, ताकि चुनावी माहौल जनमत संग्रह के नतीजों को प्रभावित न करे।
लंबी चर्चा और कई दौर की बातचीत के बाद सरकार ने सप्लीमेंट्री रेजोल्यूशन स्वीकार किया, जिसमें कहा गया कि स्थानीय चुनाव और जनमत संग्रह की समय-सीमा को यथासंभव अलग रखा जाएगा।
इसके बाद कुछ विपक्षी दल मतदान के लिए तैयार हुए और आखिरकार यह विधेयक बेहद कम अंतर से पारित हो गया। यही वजह है कि कानून बनने के बावजूद इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस अभी भी खत्म नहीं हुई है।
डिजिटल गवर्नेंस से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा तक, जापान को क्या मिलेगा?
इस कानून का मकसद केवल किसी दूसरे शहर में सरकारी दफ्तर बनाना नहीं है। जापान की सोच इससे कहीं आगे की है। संसद में चर्चा के दौरान यह बात सामने आई कि यदि भविष्य में कोई बड़ा भूकंप, सुनामी या अन्य राष्ट्रीय आपदा आती है तो केवल इमारतों का सुरक्षित होना काफी नहीं होगा।
आज सरकार का अधिकांश काम डिजिटल नेटवर्क, डेटा सेंटर और ऑनलाइन सेवाओं पर निर्भर है। यदि डिजिटल व्यवस्था ठप हो गई तो प्रशासन चलाना बेहद मुश्किल हो जाएगा।
इसी वजह से इस कानून में डिजिटल बिजनेस कंटीन्यूटी प्लानिंग (BCP) को भी अहम स्थान दिया गया है। सरकार को ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी, जिससे राष्ट्रीय स्तर की सभी जरूरी सरकारी सेवाएँ ऑनलाइन माध्यम से भी निर्बाध रूप से संचालित की जा सकें। साथ ही इन व्यवस्थाओं की नियमित समीक्षा कर संसद को प्रगति रिपोर्ट भी देनी होगी।
यदि यह योजना सफल होती है तो इसका सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि किसी भी बड़े संकट की स्थिति में जापान की शासन व्यवस्था पूरी तरह ठप नहीं होगी। प्रधानमंत्री कार्यालय, महत्वपूर्ण मंत्रालय और अन्य आवश्यक संस्थान जरूरत पड़ने पर दूसरी राजधानी से अपना काम जारी रख सकेंगे।
इसके साथ ही सरकार का मानना है कि इससे टोक्यो पर वर्षों से बढ़ रहा आर्थिक और प्रशासनिक दबाव भी कम होगा। आज जापान की बड़ी आबादी, प्रमुख उद्योग, वित्तीय संस्थान और सरकारी कार्यालय टोक्यो में केंद्रित हैं। दूसरी राजधानी विकसित होने से निवेश, उद्योग और रोजगार दूसरे क्षेत्रों तक भी पहुँचेंगे, जिससे क्षेत्रीय विकास को गति मिलने की उम्मीद है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी यह योजना काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यदि भविष्य में किसी प्राकृतिक आपदा, साइबर हमले या अन्य सुरक्षा संकट के कारण टोक्यो प्रभावित होता है तो देश के पास पहले से तैयार एक वैकल्पिक प्रशासनिक केंद्र मौजूद होगा, जहाँ से सरकार बिना किसी रुकावट के काम करती रहेगी।
क्या भारत में भी दूसरी राजधानी की बहस हुई है?
दूसरी राजधानी का विचार केवल जापान तक सीमित नहीं है। भारत में भी इस विषय पर समय-समय पर चर्चा होती रही है। संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर ने 1955 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘थॉट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट्स‘ में हैदराबाद को भारत की दूसरी राजधानी बनाने का सुझाव दिया था।
उनका मानना था कि दिल्ली देश के दक्षिणी हिस्से के लोगों के लिए काफी दूर है, जिससे प्रशासनिक पहुँच प्रभावित होती है। उन्होंने यह भी तर्क दिया था कि दिल्ली भौगोलिक रूप से सीमाओं के अपेक्षाकृत करीब है, जबकि हैदराबाद देश के मध्य में स्थित होने के कारण अधिक संतुलित और सुरक्षित विकल्प हो सकता है।
यह बहस बाद के वर्षों में भी समय-समय पर सामने आती रही। वर्ष 2018 में कर्नाटक के तत्कालीन आवास मंत्री एम कृष्णप्पा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर बेंगलुरु को भारत की दूसरी राजधानी बनाने की माँग की थी।
उनका कहना था कि इससे दक्षिण भारत और राष्ट्रीय प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय स्थापित होगा। हालाँकि केंद्र सरकार की ओर से इस दिशा में कोई औपचारिक कदम नहीं उठाया गया और नई दिल्ली आज भी देश की एकमात्र राजधानी है।
हालाँकि भारत में कुछ विशेषज्ञ यह भी सुझाव देते रहे हैं कि राजधानी बदलने के बजाय संसद के कुछ सत्र दक्षिण भारत में आयोजित किए जा सकते हैं या फिर सुप्रीम कोर्ट की स्थायी क्षेत्रीय पीठें स्थापित की जा सकती हैं, जिससे लोगों की प्रशासन और न्याय तक पहुँच आसान हो सके।
अब आगे क्या होगा?
जापान का यह फैसला पूरी दुनिया में इसलिए चर्चा का विषय बना हुआ है क्योंकि यह केवल राजधानी बदलने की योजना नहीं है, बल्कि भविष्य की आपदाओं के लिए शासन व्यवस्था को तैयार करने की कोशिश है। दुनिया के कई देशों ने पहले से ही प्रशासनिक शक्तियों का बंटवारा अलग-अलग शहरों में किया हुआ है।
दक्षिण अफ्रीका, मलेशिया, श्रीलंका, बोलीविया और नीदरलैंड जैसे देशों में अलग-अलग शहर प्रशासनिक, विधायी और न्यायिक जिम्मेदारियाँ निभाते हैं। जापान भी उसी दिशा में एक नया मॉडल विकसित करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसकी प्राथमिकता प्राकृतिक आपदाओं के दौरान सरकार की निरंतरता बनाए रखना है।
फिलहाल जापान ने केवल कानूनी ढाँचा तैयार किया है। अभी किसी भी शहर को दूसरी राजधानी घोषित नहीं किया गया है। आने वाले महीनों में इच्छुक राज्य अपने प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास भेजेंगे, जिसके बाद तय मानकों के आधार पर उनका मूल्यांकन किया जाएगा। जिसके बाद अंतिम निर्णय प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार के हाथ में होगा।