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तमिलनाडु में TVK सरकार बने हुए मात्र 16 दिन, फिर भी जनता CM विजय से पूछने को मजबूर- पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है

भारतीय राजनीति में पिछले कुछ सालों में एक नया बदलाव तेजी से देखने को मिला है। अब राजनीति सिर्फ पुराने नेताओं या पारंपरिक पार्टियों तक सीमित नहीं रही। आंदोलन से निकले चेहरे और फिल्मी सितारे सीधे सत्ता तक पहुँचने लगे हैं। जनता भी ऐसे चेहरों को जल्दी अपनाती है क्योंकि उन्हें लगता है कि शायद ये लोग पुराने सिस्टम से अलग कुछ नया करेंगे।

लेकिन यहीं से सबसे बड़ा सवाल भी शुरू होता है। क्या सिर्फ लोकप्रियता और जनता से जुड़ाव के दम पर सरकार चलाई जा सकती है? क्योंकि आंदोलन करना, भाषण देना और लोगों की उम्मीद बन जाना एक अलग बात है लेकिन सत्ता संभालना बिल्कुल अलग खेल होता है। वहाँ सिर्फ नारे नहीं, आपके फैसले काम आते हैं।

तमिलनाडु की राजनीति इस समय कुछ ऐसे ही मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। राज्य को एक नया और बेहद लोकप्रिय चेहरा मिल चुका है। फिल्म स्टार जोसेफ विजय 10 मई 2026 को मुख्यमंत्री बने। जनता ने उन्हें उम्मीदों के साथ सत्ता तक पहुँचाया लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर विजय सरकार की असली दिशा क्या है? क्योंकि अब तक जो तस्वीर सामने आई है, उसमें एक साफ विचारधारा से ज्यादा प्रयोग, विरोधाभास और असमंजस दिखाई देता है।

विजय की लोकप्रियता और सरकार चलाने की चुनौती

इसमें कोई शक नहीं, विजय की सबसे बड़ी ताकत उनकी लोकप्रियता है। उन्होंने फिल्मों के जरिए खुद को हमेशा आम लोगों से जुड़ा हुआ चेहरा दिखाया। वैसे भी तमिलनाडु की राजनीति में फिल्म स्टार्स का असर कोई नई बात नहीं है। एमजीआर से लेकर जयललिता तक जनता पहले भी सिनेमा के चेहरों को सत्ता तक पहुँचाती रही है। इसलिए विजय का मुख्यमंत्री बनना पूरी तरह हैरान करने वाला नहीं था।

लेकिन चुनाव जीतना और सरकार चलाना, दोनों अलग चीजें हैं। यही असली परीक्षा होती है। और फिलहाल ऐसा लग रहा है कि विजय सरकार अभी उसी परीक्षा में उलझी हुई है।

अब जैसे सरकार बनने के तुरंत बाद मंत्रालयों का बंटवारा शुरू हुआ और उसी समय से सवाल भी उठने लगे। उदाहरण के लिए राजमोहन अरुमुगम को फिल्म टेक्नोलॉजी और सिनेमाटोग्राफी मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई। इसके बाद खुद फिल्म इंडस्ट्री के भीतर से विरोध शुरू हो गया।

मशहूर तमिल अभिनेता विशाल ने खुलेआम सवाल उठाया कि जिस व्यक्ति को फिल्म इंडस्ट्री की समस्याओं और काम करने के तरीके की समझ ही नहीं है, उसके सामने इंडस्ट्री अपनी परेशानियाँ कैसे रखे?

इस सवाल को आप अगर ऐसे देखें कि ये केवल फिल्म इंडस्ट्री की बात नहीं है। ये सवाल सरकार के फैसले लेने की क्षमता पर था क्योंकि लोगों को लगा कि अगर विजय खुद इसी इंडस्ट्री से आते हैं, तो शायद इसे वो ज्यादा बेहतर तरीके से संभाल सकते थे।

ओएसडी विवाद और फैसलों में असमंजस

खैर इसके पहले ओएसडी वाला विवाद भी सामने आया था जिसने सरकार की छवि को और उलझा दिया। विजय के करीबी ज्योतिषी राधन पंडित को ओएसडी बनाया गया। शुरुआत में सरकार ने इस फैसले को सामान्य नियुक्ति की तरह पेश किया, लेकिन जब विधानसभा में इसका जमकर विरोध हुआ और विपक्ष कहने लगा कि अगर वो आपके निजी ज्योतिषी हैं तो उन्हें निजी दायरे में रखिए, शासन-प्रशासन में क्यों ला रहे हैं? इसके बाद उनके ज्योतिषी को ओएसडी नहीं बनाया गया।

अब यहाँ फिर सवाल सीधा खड़ा होता है कि क्या सरकार, फैसले किसी साफ प्रशासनिक प्रक्रिया से ले रही है या फिर निजी घेरे और निजी आस्थाओं का असर ज्यादा दिखाई दे रहा है? क्योंकि अगर फैसला सही था तो वापस क्यों लिया गया? और अगर गलत था तो शुरुआत में किया ही क्यों गया?

यही चीज सरकार की छवि को कमजोर करती है। ऐसा लगता है जैसे सरकार कई बार योजना बनाकर नहीं, बल्कि प्रतिक्रिया देने के ढर्रे पर काम कर रही है।

TVK और खुद विजय की विचारधारा को लेकर विरोधाभास

सबसे बड़ा असमंजस सिर्फ फैसलों में नहीं है बल्कि असमंजस विजय की विचारधारा को लेकर भी है। एक तरफ वो खुद को उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष राजनीति का चेहरा दिखाना चाहते हैं, वो हाथ में कड़ा, कलावा पहनते हैं, ज्योतिष में भरोसा करते हैं, वहीं दूसरी तरफ डीएमके की राजनीति से पूरी दूरी भी नहीं बनाते। तमिलनाडु में डीएमके लंबे समय से द्रविड़ राजनीति और सनातन विरोध जैसे मुद्दों पर अपनी पहचान बनाती रही है।

पिछले कुछ वर्षों में डीएमके नेताओं के कई बयान विवादों में रहे हैं। हाल ही में विधानसभा में उदयनिधि स्टालिन ने तो सनातन को मिटाने का अपना बयान फिर से दोहराया। “सनातन कब मिटेगा जब सनातनी यानी हिन्दू ख़तम होगा…” उदयनिधि ने जब ये बयान दिया तब विजय भी सदन में मौजूद थे लेकिन उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।

यहीं से लोगों के मन में सवाल उठने लगे कि आखिर विजय की अपनी राजनीतिक लाइन क्या है? इसी बीच उनकी कैबिनेट के एक आईयूएमएल मंत्री सचिवालय में इस्लामी रस्म-रिवाज करते भी दिखाई दिए। इसके बाद फिर सरकार की धर्मनिरपेक्ष छवि पर बहस शुरू हो गई।

अब जनता के मन में असमंजस होना स्वाभाविक है। क्या सरकार डीएमके की वैचारिक लाइन पर चल रही है? क्या हर वर्ग को खुश रखने की कोशिश हो रही है? या फिर खुद विजय अभी तय नहीं कर पा रहे कि उन्हें किस तरह की राजनीति करनी है?

देखिए, सबको साथ लेकर चलने की बात सुनने में हमेशा अच्छी लगती है। लोकतंत्र में समावेशी राजनीति जरूरी भी है। लेकिन सिर्फ संतुलन बनाने के खेल से सरकारें नहीं चलतीं।

सरकार को आखिरकार एक साफ दिशा चाहिए। क्योंकि अगर हर तरफ थोड़ा-थोड़ा खुश करने की कोशिश होगी, तो धीरे-धीरे सरकार की अपनी अलग पहचान ही खो जाती है।

आर्थिक मोर्चा और मुफ्त योजनाओं का मॉडल

यहाँ आर्थिक मोर्चे पर भी तस्वीर बहुत साफ नहीं है। तमिलनाडु पहले से ही भारी कर्ज के दबाव में है। विजय सरकार लगातार पिछली डीएमके सरकार पर आर्थिक हालत खराब करने के आरोप लगा रही है। लेकिन दूसरी तरफ उनकी खुद की राजनीति भी कल्याणकारी योजनाओं और मुफ्त की रेवड़ियों के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है।

अब सवाल है कि अगर राज्य पहले से कर्ज में दबा हुआ है, तो लगातार मुफ्त योजनाओं के सहारे यह मॉडल कितने समय तक चलेगा?

जनता को मुफ्त सुविधाएँ देना राजनीतिक तौर पर हमेशा लोकप्रिय रहता है। हर सरकार चाहती है कि लोग खुश रहें। लेकिन लंबे समय में किसी भी राज्य को सिर्फ मुफ्त की योजनाओं से नहीं चलाया जा सकता।

उसे निवेश चाहिए। उद्योग चाहिए। नौकरियाँ चाहिए। वित्तीय अनुशासन चाहिए और फिलहाल विजय सरकार की तरफ से ऐसा कोई बड़ा आर्थिक रोडमैप साफ नजर नहीं आता जिससे लगे कि वो सिर्फ चुनावी राजनीति नहीं, बल्कि लंबे समय के शासन पर भी ध्यान दे रही है।

दिल्ली का उदाहरण और शासन का सच

यहाँ दिल्ली का उदाहरण भी याद आता है। कट्टर ईमानदारी की कसमे खाकर अरविंद केजरीवाल ने भी सत्ता हासिल की थी। अन्ना हजारे आंदोलन के दौरान उन्होंने खुद को सिस्टम बदलने वाले नेता के रूप में पेश किया था। संयोग की बात ये है कि उस समय विजय भी उस आंदोलन के समर्थन में दिखाई दिए थे। जनता को लगा था कि नई राजनीति आएगी, पुरानी व्यवस्था बदलेगी और राजनीति का स्तर ऊपर जाएगा। लेकिन समय के साथ दिल्ली में भी लोगों ने देखा कि आंदोलन की राजनीति और शासन की राजनीति में बहुत फर्क होता है।

विरोध करना जितना आसान होता है उतना ही मुश्किल होता है प्रशासन चलाना। जब तक आप विपक्ष में होते हैं, तब तक हर समस्या का जवाब आपके पास होता है। लेकिन सत्ता में आने के बाद वही समस्याएँ आपकी जिम्मेदारी बन जाती हैं।

अब तमिलनाडु में भी यही परीक्षा विजय के सामने है। क्या उनकी राजनीति सिर्फ लोकप्रियता और जन-छवि तक सीमित रह जाएगी? या वो वास्तव में एक मजबूत प्रशासक बन पाएँगे?

शुरुआत में जनता छवि से प्रभावित होती है लेकिन कुछ समय बाद लोग सिर्फ भाषण नहीं देखते, वो नतीजे देखते हैं, जिसमें…

  • कौन मंत्री है?
  • कैसे फैसले लिए जा रहे हैं?
  • कानून-व्यवस्था कैसी है?
  • निवेश आ रहा है या नहीं?
  • सरकार विवादों को कैसे संभाल रही है?

ये सारी चीजें धीरे-धीरे छवि से ज्यादा बड़ी हो जाती हैं और फिलहाल इन सवालों पर विजय सरकार पूरी स्पष्टता देती नजर नहीं आ रही।

सरकार चलाने के लिए राजनीतिक समझ और प्रशासनिक परिपक्वता जरूरी

तमिलनाडु की राजनीति वैसे भी बेहद उलझी हुई रही है। यहाँ पहचान की राजनीति है, भाषा की राजनीति है, क्षेत्रीय गौरव है, कल्याणकारी मॉडल है और सिनेमा संस्कृति भी है। ऐसे राज्य में सिर्फ एक लोकप्रिय चेहरा होना काफी नहीं होता। वहाँ राजनीतिक समझ और प्रशासनिक परिपक्वता दोनों चाहिए।

फिलहाल तस्वीर यही कहती है कि विजय मुख्यमंत्री तो बन गए हैं, लेकिन उनकी सरकार की असली दिशा अभी भी पूरी तरह साफ नहीं है।

एक तरफ उदारवादी छवि बनाने की कोशिश है, दूसरी तरफ गठबंधन की राजनीति का दबाव है। एक तरफ कल्याणकारी राजनीति है, दूसरी तरफ बढ़ता कर्ज है। एक तरफ नई राजनीति का दावा है, दूसरी तरफ पुराने सत्ता के प्रयोग दिखाई दे रहे हैं।

अब आने वाला समय ही तय करेगा कि जोसेफ विजय सिर्फ भीड़ खींचने वाले मुख्यमंत्री बनकर रह जाएँगे या सच में तमिलनाडु की राजनीति को कोई नई और स्पष्ट दिशा दे पाएँगे।

‘कन्या केलवणी’ से ‘लाडली लक्ष्मी’ तक: PM मोदी के विजन को MP का मुख्यमंत्री रहते शिवराज सिंह चौहान ने कैसे बनाया जन-आंदोलन

आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘अपनापन’ पुस्तक का लोकार्पण करने जा रहे हैं, किताब में मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं वर्तमान में केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक किस्सा लिखा है कि कैसे गुजरात के मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले महिला सशक्तिकरण के उस विजन को मध्य प्रदेश में उतारा था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज केंद्रीय कृषि मंत्री और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पुस्तक ‘अपनापन: नरेंद्र मोदी के साथ मेरे अनुभव’ का लोकार्पण करेंगे। यह पुस्तक पीएम मोदी के साथ शिवराज सिंह चौहान के तीन दशक से अधिक लंबे सार्वजनिक और राजनीतिक अनुभवों का दस्तावेज है, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के व्यक्तित्व, नेतृत्व,
संगठन क्षमता, सुशासन और राष्ट्र-समर्पण से जुड़ी अनेक घटनाओं को साझा किया है।

पुस्तक के एक बेहद दिलचस्प अध्याय में शिवराज सिंह चौहान बताते हैं कि आज जिस प्रधानमंत्री मोदी को देश ‘नारी शक्ति’ के सबसे बड़े समर्थकों में गिनता है, महिलाओं और बेटियों के कल्याण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता कोई नई बात नहीं है। यह सोच उस दौर से चली आ रही है जब पीएम मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे और ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसी सोच को सामाजिक आंदोलन का रूप देने में जुटे थे।

शिवराज लिखते हैं कि गुजरात में मोदी के नेतृत्व में चल रहे अभियानों को करीब से देखने का अवसर उन्हें तब मिला, जब मोदी मुख्यमंत्री थे। उस समय गुजरात में ‘कन्या केलवणी अभियान’ और बेटियों की शिक्षा को लेकर चल रहे जन-जागरण कार्यक्रमों ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने देखा कि मोदी इस विषय को केवल सरकारी योजना नहीं मानते थे, बल्कि समाज के हर वर्ग, धार्मिक नेताओं, शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों को इसमें भागीदार बनाते थे।

शिवराज के अनुसार, मोदी का संदेश सीधा लेकिन प्रभावशाली था- “अपनी बेटियों की रक्षा करो, उन्हें शिक्षित करो और सम्मान के साथ आगे बढ़ने का अवसर दो।” यही वह विचार था जिसने धीरे-धीरे सरकारी कार्यक्रम का रूप छोड़कर सामाजिक चेतना का स्वरूप ग्रहण कर लिया।

शिवराज बताते हैं कि उन्होंने गुजरात में स्वयं देखा कि किस तरह गाँव-गाँव जाकर बेटियों के स्कूल में दाखिले को उत्सव बनाया जाता था। सरकारी अधिकारी, मंत्री और जनप्रतिनिधि भीषण गर्मी में दूर-दराज़ के गाँवों तक पहुँचते थे और अभिभावकों को अपनी बेटियों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करते थे। मोदी स्वयं भी इन अभियानों में भाग लेते थे। यही मॉडल बाद में शिवराज सिंह चौहान ने मध्य प्रदेश में अपनाने का निर्णय लिया।

मुख्यमंत्री बनने के बाद शिवराज सिंह चौहान ने मध्य प्रदेश में ‘बेटी बचाओ अभियान’ शुरू किया। इसके तहत राज्यभर में यात्राएँ निकाली गईं। सामाजिक कार्यकर्ताओं, संतों, स्थानीय नेताओं और प्रशासनिक अधिकारियों को साथ लेकर गाँव-गाँव जागरूकता अभियान चलाया गया। रास्ते में बेटियों का सम्मान किया जाता, उनके माथे पर तिलक लगाया जाता और लोगों को समझाया जाता कि बेटी बोझ नहीं, परिवार और समाज की शक्ति है।

शिवराज लिखते हैं कि महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल बेटियों को स्कूल भेजना नहीं था। असली चुनौती यह सुनिश्चित करना था कि वे शिक्षा पूरी करें, आत्मनिर्भर बनें और सम्मानजनक जीवन जी सकें। इसी सोच से प्रेरित होकर मध्य प्रदेश में ‘लाडली लक्ष्मी योजना’ शुरू की गई। इस योजना के तहत बेटियों के नाम से निवेश किया जाता था, शिक्षा के विभिन्न चरणों में आर्थिक सहायता दी जाती थी और बाल विवाह को हतोत्साहित किया जाता था।

पुस्तक में शिवराज सिंह चौहान एक भावुक प्रसंग का भी उल्लेख करते हैं। एक सामूहिक विवाह समारोह में एक बुज़ुर्ग महिला ने उनसे कहा था कि समाज में लोग अक्सर कहते हैं, “बेटी को आने दो, फिर उसकी शादी के लिए पैसे कहाँ से आएँगे?” यह बात शिवराज को भीतर तक छू गई। तभी उन्होंने तय किया कि बेटियों के जन्म को आर्थिक चिंता नहीं, उत्सव का विषय बनाया जाना चाहिए।

यही सोच आगे चलकर ‘स्वागतम लक्ष्मी’, ‘मुख्यमंत्री कन्यादान योजना’, छात्रवृत्ति योजनाओं, साइकिल वितरण कार्यक्रम और बाद में मातृ स्वास्थ्य से जुड़ी पहलों तक पहुँची। पुस्तक में दावा किया गया है कि इन प्रयासों का असर केवल सरकारी आँकड़ों में नहीं दिखा, बल्कि समाज की मानसिकता में भी दिखाई दिया। मध्य प्रदेश का लिंगानुपात 2001 में 919 से बढ़कर 2021 में 970 तक पहुँच गया और बेटियों के जन्म को लेकर सामाजिक स्वीकार्यता में उल्लेखनीय सुधार आया।

शिवराज सिंह चौहान का निष्कर्ष स्पष्ट है कि पीएम नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने महिला और बालिका कल्याण को सिर्फ सरकारी योजनाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे सामाजिक आंदोलन का रूप दिया। गुजरात में जिस विचार का बीजारोपण हुआ, उसी को मध्य प्रदेश में अपने तरीके से आगे बढ़ाकर उन्होंने जन-अभियान बनाया। और आज जब देश ‘नारी शक्ति’ को विकास के केंद्र में रखकर आगे बढ़ रहा है, तो उसकी जड़ें उस दौर तक जाती हैं जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और शिवराज उनके उस विजन को करीब से देख रहे थे।

बकरीद से पहले चर्चा में पश्चिम बंगाल और केरल, छुट्टियाँ असली मुद्दा या तुष्टिकरण?: जानें ये कॉन्ग्रेस का मुस्लिमों से प्रेम है या राजनीतिक मजबूरी

भारत में त्योहारों का मौसम आते ही राजनीतिक सरगर्मियाँ और तीखी बहसें तेज हो जाना कोई नई बात नहीं है, लेकिन बकरीद (ईद-उल-अजहा) से ठीक पहले पश्चिम बंगाल और केरल दोनों ही राज्य देश के राजनीतिक पटल पर अचानक सबसे बड़ी चर्चा का केंद्र बन गए हैं।

एक तरफ जहाँ पूर्वी भारत के राज्य पश्चिम बंगाल में त्योहार की सरकारी छुट्टियों को लेकर प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर बड़ा बदलाव देखने को मिला है, वहीं दूसरी तरफ दक्षिण भारत के केरल में विपक्षी दल कॉन्ग्रेस पर मुस्लिम तुष्टिकरण और बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को नजरअंदाज करने के गंभीर आरोप लग रहे हैं।

इन दोनों राज्यों की वर्तमान परिस्थितियाँ, प्रशासनिक फैसले और राजनीतिक बयानबाजी देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने और क्षेत्रीय राजनीति के बदलते स्वरूप की एक नई कहानी बयाँ कर रही हैं। आइए दोनों राज्यों के इन अलग-अलग विवादों और उनके पीछे की पूरी राजनीतिक कड़ियों, जनसांख्यिकीय आँकड़ों और सियासी रसूख को विस्तार से समझते हैं।

पश्चिम बंगाल में बकरीद की छुट्टियों पर छिड़ा घमासान

पश्चिम बंगाल की राजनीति में त्योहारों और उनके लिए मिलने वाले सरकारी अवकाशों का हमेशा से एक विशेष महत्व रहा है, लेकिन इस बार बकरीद से ठीक पहले राज्य के वित्त विभाग द्वारा जारी किए गए एक नए नोटिफिकेशन ने पूरे प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारे में हलचल पैदा कर दी है।

दरअसल, राज्य की नवनिर्वाचित शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली सरकार ने पिछले प्रशासन द्वारा घोषित की गई दो दिनों की सरकारी छुट्टी के फैसले को पलट दिया है। पहले के आधिकारिक कैलेंडर के अनुसार, राज्य में 26 और 27 मई को बकरीद के उपलक्ष्य में दो दिनों के सार्वजनिक अवकाश की घोषणा की गई थी, जिसमें ईद से एक दिन पहले का अवकाश भी शामिल था।

राज्य सरकार के नए आदेश के तहत पहले से घोषित 26 और 27 मई की इन दोनों छुट्टियों को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया गया है और उनकी जगह केवल 28 मई को बकरीद की एकमात्र सार्वजनिक छुट्टी घोषित की गई है। सरकार ने अपने इस फैसले के पीछे केंद्रीय कैलेंडर के साथ तालमेल बिठाने और चाँद दिखने की संशोधित तारीखों का हवाला दिया है।

वित्त विभाग के आधिकारिक आदेश में स्पष्ट किया गया है कि देश के विभिन्न हिस्सों में इस्लामी कैलेंडर और चांद के दीदार की समीक्षा के बाद अब राज्य में 28 मई को ही मुख्य त्योहार मनाया जाएगा, इसलिए केवल इसी दिन पर निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट के तहत सार्वजनिक अवकाश रहेगा।

तुष्टिकरण बनाम प्रशासनिक कार्य संस्कृति की बहस

इस प्रशासनिक बदलाव ने राज्य में एक नई राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया है। सत्ता पक्ष के करीबियों और प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि यह निर्णय राज्य में ‘वर्क कल्चर’ (कार्य संस्कृति) को मजबूत करने और सरकारी कार्यालयों में उत्पादकता बढ़ाने के उद्देश्य से लिया गया है।

सरकार का तर्क है कि त्योहारों के नाम पर अत्यधिक और बेवजह की लंबी छुट्टियाँ देने से आम जनता से जुड़े प्रशासनिक कार्य और जरूरी जनसेवाएँ प्रभावित होती हैं। इस फैसले के जरिए संदेश देने की कोशिश की गई है कि प्रशासनिक जवाबदेही और कार्यकुशलता को किसी भी अन्य एजेंडे से ऊपर रखा जाएगा।

दूसरी ओर विपक्ष ने इस कदम को सीधे तौर पर अल्पसंख्यक समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने और एक खास राजनीतिक एजेंडे को लागू करने का प्रयास बताया है। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि जानबूझकर त्योहार से ठीक पहले छुट्टियों में कटौती करके राज्य के सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है।

इसके साथ ही कलकत्ता उच्च न्यायालय ने भी बकरीद के दौरान पशु वध को लेकर जारी सरकारी नियमों और दिशा-निर्देशों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है, जिससे इस बार बंगाल में त्योहार से जुड़े प्रशासनिक नियम पहले की तुलना में काफी सख्त नजर आ रहे हैं।

बंगाल की राजनीति में मुस्लिम आबादी और सीटों का समीकरण

पश्चिम बंगाल में छुट्टियों और त्योहारों पर होने वाली इस सियासत को समझने के लिए वहाँ के जनसांख्यिकीय (demographic) फैक्ट्स को देखना जरूरी है। 2011 की जनगणना के अनुसार, पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी लगभग 27% है, जो मौजूदा समय में बढ़कर करीब 30% के आसपास आंकी जाती है।

राज्य की कुल 294 विधानसभा सीटों में से लगभग 100 से 110 सीटें ऐसी हैं, जहाँ मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। इनमें मुर्शिदाबाद (करीब 66% मुस्लिम आबादी), मालदा (करीब 51%), उत्तर दिनाजपुर (करीब 49%) और दक्षिण 24 परगना जैसे जिले शामिल हैं।

पिछली सरकारों पर हमेशा यह आरोप लगता रहा कि वे इस विशाल वोटबैंक को सहेजने के लिए इफ्तार पार्टियों से लेकर त्योहारों की लंबी छुट्टियों और मानदेय जैसी घोषणाओं का सहारा लेती थीं। यही कारण है कि नई सरकार आते ही सबसे पहला प्रशासनिक प्रहार इन छुट्टियों के सरलीकरण और केंद्रीय नियमों के एकीकरण पर किया गया है, जिसे सत्तापक्ष ‘तुष्टिकरण का अंत’ और विपक्ष ‘अल्पसंख्यक विरोधी’ कदम बता रहा है।

केरल में कॉन्ग्रेस और मुस्लिम लीग का सियासी गठबंधन

बंगाल से हजारों किलोमीटर दूर दक्षिण के राज्य केरल में बकरीद के आते ही तुष्टिकरण की राजनीति का एक अलग ही रूप देखने को मिल रहा है। केरल की राजनीति में मुस्लिम मतदाताओं और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) का प्रभाव किसी से छुपा नहीं है।

राज्य में इस बार बकरीद से पहले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) के मुख्य घटक दल कॉन्ग्रेस पर यह आरोप लग रहे हैं कि वह मुस्लिम लीग और अपने खास वोटबैंक को रिझाने के लिए बहुसंख्यक समाज के हितों और राज्य की साझा संस्कृति की अनदेखी कर रही है।

केरल में त्योहारों के अवसर पर दो दिनों की व्यापक छुट्टियों और विशेष रियायतों की घोषणा को लेकर राजनीतिक विवाद गहरा गया है। आलोचकों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केरल कॉन्ग्रेस पूरी तरह से मुस्लिम लीग के दबाव में काम कर रही है।

चुनाव और त्योहारों के इस नाजुक दौर में कॉन्ग्रेस के नेताओं द्वारा दिए जा रहे बयानों और पार्टी की नीतियों को लेकर यह आरोप लगाया जा रहा है कि पार्टी केवल एक विशेष वर्ग के तुष्टिकरण में जुटी है ताकि उत्तरी केरल के कासरगोड, मल्लपुरम और कन्नूर जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में अपनी पकड़ को और मजबूत किया जा सके।

केरल की सत्ता और सियासत में मुस्लिमों की ताकत

केरल की जनसांख्यिकी देश के अन्य राज्यों से काफी अलग है। यहाँ मुस्लिम आबादी लगभग 26.56% है, जबकि ईसाई आबादी करीब 18% और हिंदू आबादी लगभग 54.73% है। केरल की 140 सदस्यीय विधानसभा में मुस्लिम समुदाय का राजनीतिक प्रतिनिधित्व बेहद मजबूत और प्रभावशाली रहा है। मौजूदा विधानसभा में मुस्लिम विधायकों की संख्या कुल क्षमता का एक बड़ा हिस्सा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि केरल में ‘इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग’ (IUML) राज्य की दूसरी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी है और कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ (UDF) गठबंधन की रीढ़ मानी जाती है।

मुस्लिम लीग की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि राज्य की 140 सीटों में से वह अकेले 15 से 20 सीटें जीतने का माद्दा रखती है, विशेषकर मल्लपुरम जिले में, जहाँ की आबादी में 70% से अधिक मुस्लिम हैं। कॉन्ग्रेस के लिए केरल में बिना मुस्लिम लीग के समर्थन के सत्ता में आना या मजबूत विपक्ष बने रहना असंभव है।

लोकसभा चुनाव में भी वायनाड जैसी हाई-प्रोफाइल सीट पर कॉन्ग्रेस को मिलने वाली जीत में मुस्लिम लीग के कैडर और वोटबैंक की सबसे बड़ी भूमिका होती है। इसी राजनीतिक लाचारी के कारण कॉन्ग्रेस पर आरोप लगते हैं कि वह राज्य की नीतियों, स्कूल-कॉलेजों के समय और त्योहारों की छुट्टियों को तय करने में मुस्लिम लीग के एजेंडे के सामने पूरी तरह सरेंडर कर देती है।

तुष्टिकरण के आरोपों के बीच क्षेत्रीय संतुलन का संकट

केरल में कॉन्ग्रेस पर लग रहे तुष्टिकरण के आरोपों का असर वहाँ के सामाजिक संतुलन पर भी देखने को मिल रहा है। राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों, विशेषकर सत्तारूढ़ वामपंथी गठबंधन और भाजपा का आरोप है कि कॉन्ग्रेस का यह रवैया राज्य के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के खिलाफ है। आलोचकों के अनुसार, जब बात बहुसंख्यक समाज के त्योहारों या सामान्य प्रशासनिक सुधारों की आती है, तो नियम बेहद कड़े कर दिए जाते हैं, लेकिन बकरीद जैसे अवसरों पर वोटबैंक को ध्यान में रखकर विशेष ढील दी जाती है।

केरल की इस राजनीति ने ईसाई और हिंदू समुदायों के बीच भी एक छिपी हुई नाराजगी को जन्म दिया है, जो यह महसूस कर रहे हैं कि पारंपरिक राजनीतिक दल केवल जनसांख्यिकीय लाभ उठाने के लिए एक विशेष वर्ग को प्राथमिकता दे रहे हैं। कॉन्ग्रेस के स्थानीय नेतृत्व पर यह भी आरोप है कि वे विकास और स्वास्थ्य व्यवस्था जैसे बुनियादी मुद्दों (जैसे कासरगोड में एम्स स्तर के अस्पताल की माँग) से जनता का ध्यान भटकाने के लिए इस प्रकार की भावनात्मक और तुष्टिकरण की राजनीति का सहारा ले रहे हैं।

इसके अलावा राज्य के सरकारी स्कूलों में शुक्रवार की नमाज के लिए समय देने या रमजान और बकरीद पर लंबी छुट्टियों को लेकर समय-समय पर गैर-मुस्लिम संगठनों द्वारा आपत्ति जताई जाती रही है, जिसे कॉन्ग्रेस मुस्लिम लीग की नाराजगी के डर से हमेशा दबाने का प्रयास करती है।

दोनों राज्यों की स्थिति अलग क्यों है?

पश्चिम बंगाल और केरल दोनों राज्यों में बकरीद से पहले उपजा यह विवाद भारत की क्षेत्रीय राजनीति के दो अलग-अलग छोरों को प्रदर्शित करता है। जहाँ पश्चिम बंगाल में नई सरकार पुरानी व्यवस्था को बदलते हुए छुट्टियों में कटौती कर प्रशासनिक कड़ाई और एक समान नीति लागू करने का प्रयास कर रही है, वहीं केरल में पारंपरिक दल अपने पुराने वोटबैंक को बचाए रखने के लिए तुष्टिकरण के उसी पुराने ढर्रे पर चलते दिखाई दे रहे हैं।

बंगाल जहाँ 30% मुस्लिम आबादी के ध्रुवीकरण और प्रशासनिक नियंत्रण की नई प्रयोगशाला बना हुआ है, वहीं केरल में 26.56% मुस्लिम आबादी और मुस्लिम लीग के 20 विधायकों की संगठित ताकत के आगे कॉन्ग्रेस पूरी तरह नतमस्तक नजर आती है। इन दोनों ही मामलों से यह स्पष्ट होता है कि त्योहारों का सामाजिक महत्व अपनी जगह है, लेकिन उनके इर्द-गिर्द बुनी जाने वाली राजनीति देश के प्रशासनिक, राजनीतिक और सामाजिक वातावरण को गहराई से प्रभावित करती है।

केरल HC ने मधु मॉब लिंचिंग के मुख्य आरोपित हुसैन को किया बरी, 12 की सजा बरकरार: समझिए- कैसे इस केस ने ‘दलित-मुस्लिम एकता’ के नरेटिव को किया ध्वस्त

देशभर में भारी आक्रोश पैदा करने वाले 2018 के अट्टापडी मॉब लिंचिंग मामले में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। केरल हाई कोर्ट ने सोमवार को इस मामले के आरोपित नंबर 1 हुसैन को ही बरी कर दिया है। यह मामला मधु नाम के एक मानसिक रूप से कमजोर जनजातीय युवक (ST Youth) की हत्या से जुड़ा है, जिस पर खाने-पीने का सामान चुराने के संदेह में भीड़ ने बेरहमी से हमला किया था।

यह फैसला जस्टिस राजा विजयराघवन वी. और जस्टिस के.वी. जयकुमार की खंडपीठ ने दोषियों, राज्य सरकार और मधु की माँ मल्ली द्वारा दायर अपीलों पर सुनवाई करते हुए सुनाया।

हाई कोर्ट ने आरोपित नंबर 4 अनीश और आरोपी नंबर 11 अब्दुल करीम को बरी किए जाने के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। हालाँकि अदालत ने मरक्कर, शम्सुद्दीन, राधाकृष्णन, अबू बकर, सिद्दीक, उबैद, नजीब, जयजुमोन, सजीव, सतीश, हरीश और बीजू की सजा को बरकरार रखा है।

अदालत ने आपराधिक दायित्व के दायरे को बढ़ाते हुए दोषियों को आईपीसी की धाराओं (जिसमें 304 पार्ट II, 326, 367, 323, 324, 342, 143, 147 और 149 शामिल हैं) के अलावा, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(2)(v) और 3(2)(va) के तहत भी दोषी ठहराया। आरोपित नंबर 16 मुनीर जिसे पहले केवल आईपीसी की धारा 352 के तहत दोषी ठहराया गया था, उसे भी एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(2)(va) के साथ पठित आईपीसी की धारा 323 के तहत दोषी पाया गया।

इस मामले का विस्तृत फैसला आना अभी बाकी है। इस मामले को बाद में बदली हुई सजा पर सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया था।

केरल हाई कोर्ट के सामने हुसैन के पक्ष की दलील

हुसैन ने अपनी सजा को इस आधार पर चुनौती दी थी कि वह उस समूह का हिस्सा नहीं था जो शुरू में जंगल के इलाके में गया था और मधु को मुक्कली लेकर आया था, जहाँ उसके साथ मारपीट की गई थी।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, हुसैन बाद में भीड़ में शामिल हो गया था और उसने मधु की छाती पर लात मारी थी, जिससे उसका सिर दीवार से टकरा गया था। मेडिकल साक्ष्यों से संकेत मिला था कि इन चोटों के कारण पीड़ित की मौत हुई थी।

हालाँकि उसकी कानूनी टीम ने दलील दी कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जो मधु के प्रति किसी पुरानी दुश्मनी को दिखाता हो या उसके गैरकानूनी रूप से इकट्ठा हुई भीड़ से जुड़े होने का कोई कारण बताता हो। बचाव पक्ष ने इस बात पर भी जोर दिया था कि निचली अदालत ने उसे एससी/एसटी एक्ट के प्रावधानों के तहत दोषी नहीं पाया था।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला 22 फरवरी 2018 का है, जब केरल के पलक्कड़ जिले के अट्टापडी के रहने वाले 27 वर्षीय ST युवक मधु की एक इस्लामी भीड़ ने स्थानीय दुकान से चावल सहित खाने-पीने का सामान चुराने के संदेह में पीट-पीटकर हत्या कर दी थी।

मानसिक रूप से कमजोर मधु अपने परिवार से बहुत कम संपर्क रखता था, अट्टापडी में जंगल के इलाकों और उसके आसपास रहता था। जाँचकर्ताओं के अनुसार, वह जंगल के इलाके के पास छुपा हुआ मिला था, जहाँ स्थानीय लोगों के एक समूह ने उसे पकड़ लिया, उसके साथ गंभीर मारपीट की और फिर उसे पुलिस के हवाले कर दिया।

अभियोजन पक्ष ने बताया कि मधु को सिर पर चोट, पसलियों में फ्रैक्चर और आंतरिक रक्तस्राव सहित गंभीर चोटें आई थीं। बाद में अस्पताल ले जाते समय वह गिर गया और उसने दम तोड़ दिया।

इस घटना के बाद घटनास्थल की तस्वीरें ऑनलाइन सामने आने पर देश भर में भारी गुस्सा देखा गया था। जनता की तीखी आलोचना का कारण बनने वाली तस्वीरों में एक ऐसी तस्वीर भी थी, जिसमें मधु साफ तौर पर घायल और परेशान दिख रहा था, जबकि उबैद नाम का एक व्यक्ति उसके पास खड़ा होकर सेल्फी ले रहा था।

पुलिस ने बाद में मुक्कली थोडियिल उबैद उम्मर को गिरफ्तार कर लिया और मामले में उसे आरोपितों में नामजद किया। उस पर आईपीसी, एससी/एसटी एक्ट और घटना की तस्वीरें व वीडियो प्रसारित करने से जुड़े सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) कानूनों के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया था।

उस समय की रिपोर्टों में कुछ आरोपितों के कथित राजनीतिक संबंधों पर भी सवाल उठाए गए थे। ऐसे आरोप सामने आए थे कि उबैद के संबंध इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग से थे। हालाँकि तत्कालीन विधायक एन. शम्सुद्दीन ने किसी भी औपचारिक संबंध से इनकार किया था और कहा था कि उबैद ने केवल चुनाव से जुड़ी गतिविधियों में भाग लिया था।

मुकदमे में देरी और अभियोजन पक्ष को लेकर आरोप

इसके बाद मुकदमे की कार्यवाही के दौरान बार-बार देरी देखी गई, जिससे पीड़ित के परिवार और कार्यकर्ताओं ने इसकी आलोचना की।

जनवरी 2022 में, एससी/एसटी एक्ट के तहत मन्नारकाड की विशेष अदालत ने कथित तौर पर मधु का प्रतिनिधित्व करने के लिए नियुक्त विशेष लोक अभियोजक (स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर) के बार-बार अनुपस्थित रहने पर सवाल उठाए थे। अभियोजक के कई मौकों पर पेश न होने के बाद अदालत ने पहले भी सुनवाई टाल दी थी।

अगस्त 2019 में विशेष अभियोजक नियुक्त किए गए एडवोकेट वी.टी. रघुनाथ कथित तौर पर कार्यवाही के दौरान अदालत के सामने पेश नहीं हुए और बाद में चिकित्सा कारणों का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया।

अभियोजकों की बार-बार अनुपस्थिति के कारण मुकदमे की कार्यवाही में देरी हुई। मधु के परिवार ने आरोप लगाया कि न्याय की प्रक्रिया को जानबूझकर धीमा किया जा रहा था। मधु की माँ मल्ली ने इस देरी पर सार्वजनिक रूप से अपनी निराशा व्यक्त करते हुए कहा था कि उनके बेटे की मौत को कई साल बीत चुके हैं, जबकि मुकदमा आगे बढ़ने के लिए संघर्ष कर रहा है।

घटना के बाद गठित विशेष जाँच दल (एसआईटी) ने मई 2018 में लगभग 3,500 पन्नों की चार्जशीट तैयार की थी, जिसमें 16 आरोपितों के नाम थे। हत्या के प्रावधानों और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत आरोपों का सामना करने के बावजूद कार्यवाही के दौरान सभी आरोपितों को जमानत मिल गई थी।

मामले में स्थायी अभियोजक की नियुक्ति में देरी को लेकर भी आलोचकों द्वारा सवाल उठाए गए थे। इस रिपोर्ट के बाद राजनीतिक विवाद सामने आया कि आरोपियों में से एक शम्सुद्दीन को सितंबर 2021 में सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) का शाखा सचिव चुना गया था, हालाँकि विरोध के बाद कथित तौर पर यह फैसला वापस ले लिया गया था।

आरोपितों पर लगाई गई थी कौन सी धाराएँ?

मधु के हत्यारों पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के कई प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया गया था, जो गैरकानूनी रूप से इकट्ठा होने से लेकर हत्या तक के अपराधों से जुड़े थे। इनमें धारा 143 (गैरकानूनी जनसमूह), धारा 147 (बलवा), धारा 148 (घातक हथियार से लैस होकर बलवा करना), धारा 323 (स्वेच्छा से चोट पहुँचाना), धारा 324 (खतरनाक हथियारों से चोट पहुँचाना), धारा 326 (गंभीर चोट पहुँचाना), धारा 342 (गलत तरीके से बंधक बनाना), धारा 352 (हमला), धारा 364 (हत्या के इरादे से अपहरण या अगवा करना), धारा 367 (गंभीर चोट पहुँचाने के लिए अपहरण करना), धारा 368 (अपहृत व्यक्ति को गलत तरीके से छिपाकर रखना) और धारा 302 के साथ पठित धारा 149 शामिल थी, जो एक सामान्य उद्देश्य के साथ गैरकानूनी जनसमूह द्वारा की गई हत्या से संबंधित है।

आरोपितों पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के प्रावधानों के तहत भी मामला दर्ज किया गया था, जिसमें धारा 3(1)(d), 3(1)(r), 3(1)(s), 3(2)(v) और 3(2)(va) शामिल हैं, जो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के खिलाफ किए गए अपराधों से संबंधित हैं, जिसमें सामाजिक पहचान के आधार पर किए गए अपराधों के लिए अपमान, भेदभाव और सख्त सजा का प्रावधान है।

‘दलित-मुस्लिम एकता’ का नरेटिव हुआ ध्वस्त

मधु मॉब लिंचिंग मामले ने एक बार फिर उस बहुप्रचारित ‘जय भीम-जय मीम‘ के ढाँचे की कमजोरी को भी उजागर कर दिया है, जिसे वाम-उदारवादी इकोसिस्टम के कुछ हिस्सों द्वारा एक स्वाभाविक सामाजिक और राजनीतिक गठबंधन के रूप में पेश किया जाता रहा है।

सालों से इस फर्जी नरेटिव का इस्तेमाल दलितों और मुसलमानों के बीच एक स्वाभाविक साझेदारी के रूप में प्रचारित किया गया है, जिसका बड़ा राजनीतिक उद्देश्य अक्सर हिंदू चुनावी एकजुटता के खिलाफ एक मजबूत विकल्प तैयार करना होता है। हालाँकि जमीन पर होने वाली घटनाएँ अक्सर टेलीविजन स्टूडियो और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर तैयार किए गए आदर्श नैरेटिव की तुलना में अधिक जटिल दिखाई देती हैं।

महज खाने-पीने का सामान चुराने के आरोपित एक कमजोर ST युवक मधु की बेरहमी से की गई हत्या उन लोगों के लिए असहज करने वाले सवाल खड़े करती है जो इस तरह के गठबंधनों की वकालत करते रहे हैं। यदि इस एकजुटता को एक राजनीतिक रणनीति के बजाय एक जीवंत सामाजिक वास्तविकता के रूप में पेश किया जाता है, तो इस तरह की घटनाओं को समझाना मुश्किल हो जाता है। मुद्दा केवल आरोपित व्यक्तियों की पहचान का नहीं है; बल्कि यह है कि क्या राजनीतिक नारे वास्तव में जमीनी सामाजिक सच्चाइयों और स्थानीय तनावों पर काबू पा सकते हैं।

यह आलोचना इसलिए भी अधिक तीखी हो जाती है क्योंकि मधु का मामला कोई अकेला मामला नहीं है। अतीत में दलित पीड़ितों और इस्लामी अपराधियों से जुड़ी कई घटनाएँ इस धारणा को उजागर करती हैं कि ‘दलित-मुस्लिम एकता’ जमीनी सामाजिक वास्तविकताओं के प्रतिबिंब के बजाय वामपंथी हलकों में गूँजने वाले एक राजनीतिक नारे के रूप में अधिक काम करती है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

असम विधानसभा में UCC विधेयक, बहुविवाह पर रोक, लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य: जानिए हिमंता सरकार के नए कानून के बारे में सबकुछ

असम की हिमंता बिस्वा सरमा सरकार ने राज्य की राजनीति और सामाजिक व्यवस्था से जुड़े एक बड़े मुद्दे पर ऐतिहासिक कदम उठाते हुए विधानसभा में समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) विधेयक पेश कर दिया है।

सोमवार (25 मई 2026) को विधानसभा में पेश किए गए ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड, असम 2026’ बिल के जरिए सरकार विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, बहुविवाह और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे मामलों को एक समान कानूनी ढाँचे में लाना चाहती है।

हालाँकि राज्य की जनजातीय आबादी और पारंपरिक धार्मिक रीति-रिवाजों को इस कानून से बाहर रखा गया है। अगर यह विधेयक पारित हो जाता है, तो असम उत्तराखंड और गुजरात के बाद UCC लागू करने वाला देश का तीसरा राज्य बन जाएगा।

सरकार का दावा है कि यह कानून महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को मजबूत करेगा। खास बात यह है कि बिल में पहली बार लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी रूप से परिभाषित करते हुए उसका रजिस्ट्रेशन अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव रखा गया है।

साथ ही बहुविवाह पर पूरी तरह रोक लगाने और सभी विवाह तथा तलाक का पंजीकरण जरूरी करने की बात कही गई है।

क्या है यूनिफॉर्म सिविल कोड और क्यों है इसकी चर्चा?

यूनिफॉर्म सिविल कोड का मतलब ऐसा कानून है जो सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू हो, चाहे उनका धर्म कोई भी हो। अभी भारत में विवाह, तलाक, गोद लेना, उत्तराधिकार और पारिवारिक मामलों में अलग-अलग धार्मिक समुदायों के अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू होते हैं। उदाहरण के लिए हिंदू मैरिज एक्ट, मुस्लिम पर्सनल लॉ, क्रिश्चियन मैरिज एक्ट आदि।

भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 44 के तहत राज्य को नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में काम करने की बात कही गई है। हालाँकि स्वतंत्रता के बाद से अब तक केंद्र स्तर पर पूरे देश में UCC लागू नहीं हो सका। असम विधानसभा चुनाव 2026 से पहले BJP ने अपने घोषणा पत्र में UCC लागू करने का वादा किया था।

असम UCC बिल में क्या-क्या बड़े प्रावधान हैं?

असम सरकार द्वारा पेश किए गए विधेयक में कई अहम बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं। इनमें सबसे बड़ा प्रावधान बहुविवाह पर प्रतिबंध है। यानी अब किसी भी समुदाय में एक से अधिक शादी की अनुमति नहीं होगी। सरकार इसे महिलाओं के अधिकारों की दिशा में बड़ा कदम बता रही है।

विधेयक में पुरुषों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं के लिए 18 वर्ष तय की गई है। यह प्रावधान मौजूदा कानूनी व्यवस्था के अनुरूप है, लेकिन अब इसे सभी समुदायों पर समान रूप से लागू करने की कोशिश की जा रही है। बिल के अनुसार, सभी विवाहों और तलाक का पंजीकरण अनिवार्य होगा।

यानी केवल धार्मिक रीति-रिवाजों से शादी करने के अलावा उसका कानूनी रजिस्ट्रेशन भी जरूरी होगा। सरकार का मानना है कि इससे महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को कानूनी सुरक्षा मिलेगी और विवादों की स्थिति में प्रमाण उपलब्ध रहेगा। विधेयक उत्तराधिकार यानी संपत्ति के बंटवारे के लिए भी समान नियम लागू करने की बात करता है।

सरकार का दावा है कि इससे संपत्ति के हस्तांतरण में पारदर्शिता आएगी और महिलाओं को परिवार की संपत्ति में अधिक सुरक्षा मिलेगी। सबसे चर्चित प्रावधान लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर है। पहली बार किसी कानून में लिव-इन संबंधों के लिए अलग कानूनी ढाँचा तैयार किया गया है।

इसके तहत शादी किए बिना साथ रहने वाले जोड़ों को अपने संबंध का रजिस्ट्रेशन कराना होगा। सरकार का कहना है कि इससे ऐसे संबंधों में रहने वाली महिलाओं और उनसे जन्म लेने वाले बच्चों को कानूनी पहचान और सुरक्षा मिलेगी।

लिव-इन रिलेशनशिप पर कानून क्यों बना रही है सरकार?

असम UCC बिल का सबसे नया और बहस वाला हिस्सा लिव-इन रिलेशनशिप का कानूनी नियमन है। सरकार का तर्क है कि समाज में ऐसे संबंधों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन इनके लिए स्पष्ट कानूनी सुरक्षा नहीं होने के कारण कई बार महिलाएँ और बच्चे असुरक्षित रह जाते हैं।

यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक किसी साथी के साथ रहकर बाद में उसे छोड़ देता है, तो मौजूदा व्यवस्था में पीड़ित पक्ष के लिए कानूनी लड़ाई जटिल हो जाती है। सरकार का कहना है कि अनिवार्य रजिस्ट्रेशन से ऐसे संबंधों का रिकॉर्ड रहेगा और जरूरत पड़ने पर महिला अपने अधिकारों की रक्षा कर सकेगी।

बिल में यह भी कहा गया है कि लिव-इन रिलेशनशिप से जन्म लेने वाले बच्चों को वैध संतान माना जाएगा। इससे उत्तराधिकार और सामाजिक पहचान से जुड़े विवादों को कम करने की कोशिश होगी। हालाँकि अभी तक विधेयक के विस्तृत नियम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।

इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि रजिस्ट्रेशन कितने दिनों के भीतर कराना होगा, रजिस्ट्रेशन न कराने पर क्या सजा होगी, किन दस्तावेजों की जरूरत पड़ेगी और सत्यापन की प्रक्रिया क्या होगी। इन बिंदुओं पर विधानसभा में चर्चा और अंतिम अधिसूचना के बाद स्थिति साफ हो सकती है।

विधेयक यह भी स्पष्ट करता है कि यदि किसी लिव-इन रिलेशनशिप में कोई साथी पहले से विवाहित है या नाबालिग है, तो ऐसे संबंध का पंजीकरण नहीं किया जाएगा।

किन लोगों को UCC से रखा गया है बाहर?

असम की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए सरकार ने इस बिल में कुछ महत्वपूर्ण छूट भी दी है। विधेयक के अनुसार राज्य की अनुसूचित जनजातियों यानी शेड्युल्ड ट्राइब्स (Scheduled Tribes) पर यह कानून लागू नहीं होगा। इसमें पहाड़ी और मैदानी दोनों क्षेत्रों की जनजातियाँ शामिल हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार, असम की लगभग 12.45 प्रतिशत आबादी जनजातीय समुदायों से आती है। सरकार का कहना है कि इन समुदायों की पारंपरिक सामाजिक संरचना और रीति-रिवाजों की रक्षा के लिए उन्हें UCC से बाहर रखा गया है।

इसके अलावा बिल में कहा गया है कि धार्मिक और पारंपरिक रस्मों के अनुसार विवाह करने की स्वतंत्रता बनी रहेगी। यानी लोग अपने धर्म और समुदाय की परंपराओं के अनुसार शादी कर सकेंगे, लेकिन उसका कानूनी पंजीकरण जरूरी होगा।

BJP ने अपने चुनावी वादे में भी स्पष्ट किया था कि छठी अनुसूची वाले क्षेत्रों और जनजातीय समुदायों को UCC से छूट दी जाएगी। इससे सरकार जनजातीय संगठनों की आशंकाओं को कम करना चाहती है।

उत्तराखंड और गुजरात के UCC से कितना अलग है असम मॉडल?

उत्तराखंड देश का पहला राज्य था जिसने 2024 में UCC कानून पारित किया और जनवरी 2025 से उसे लागू भी कर दिया। उत्तराखंड UCC में भी लिव-इन रिलेशनशिप के रजिस्ट्रेशन को अनिवार्य बनाया गया था। वहाँ किसी जोड़े को साथ रहने के एक महीने के भीतर अपना संबंध पंजीकृत कराना होता है।

यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो तीन महीने तक की जेल, 10 हजार रुपए तक जुर्माना या दोनों सजा का प्रावधान रखा गया है। उत्तराखंड कानून में रजिस्ट्रार को यह अधिकार भी दिया गया कि यदि कोई साथी 21 वर्ष से कम उम्र का है, तो उसके माता-पिता को जानकारी दी जाए। इसके अलावा संबंध समाप्त होने की सूचना पुलिस को देने का प्रावधान भी था।

इनमें से कुछ प्रावधानों को लेकर निजता के अधिकार पर सवाल उठे थे। बाद में उत्तराखंड सरकार ने हाई कोर्ट में हलफनामा देकर कुछ नियमों में बदलाव की जानकारी दी। उदाहरण के लिए आधार कार्ड और सामुदायिक प्रमाणपत्र की अनिवार्यता हटाई गई तथा गर्भावस्था की सूचना देने वाला नियम भी समाप्त किया गया।

गुजरात ने मार्च 2026 में अपना UCC बिल पारित किया। वहाँ भी लिव-इन रिलेशनशिप को ‘विवाह जैसी प्रकृति वाला संबंध’ बताया गया और लगभग उत्तराखंड जैसे प्रावधान रखे गए।

असम का मॉडल कई मामलों में उत्तराखंड और गुजरात से प्रेरित माना जा रहा है, लेकिन इसमें जनजातीय समुदायों को स्पष्ट छूट देकर स्थानीय सामाजिक संरचना को ध्यान में रखने की कोशिश की गई है।

असम में UCC लागू होने से क्या बदल सकता है?

यदि यह विधेयक कानून का रूप लेता है, तो असम में पारिवारिक और व्यक्तिगत कानूनों की व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। विवाह, तलाक और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में एक समान कानूनी ढाँचा बनने से प्रशासनिक प्रक्रियाएँ अधिक स्पष्ट हो सकती हैं।

सरकार का मानना है कि इससे महिलाओं को संपत्ति और वैवाहिक अधिकारों के मामलों में अधिक कानूनी सुरक्षा मिलेगी। बहुविवाह पर रोक लगने से एकल विवाह व्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा और महिलाओं के अधिकारों को मजबूती मिलेगी।

लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीकरण से ऐसे संबंधों में रहने वाले लोगों, खासकर महिलाओं और बच्चों, को कानूनी पहचान मिल सकती है। इससे भविष्य में उत्तराधिकार, भरण-पोषण और सामाजिक पहचान से जुड़े विवादों को कम करने में मदद मिल सकती है।

इसके अलावा विवाह और तलाक के अनिवार्य रजिस्ट्रेशन से सरकारी रिकॉर्ड अधिक व्यवस्थित होंगे और कानूनी मामलों में प्रमाण जुटाना आसान हो सकता है। असम सरकार इसे सामाजिक सुधार और कानूनी समानता की दिशा में बड़ा कदम मान रही है।

अब विधानसभा में इस विधेयक पर विस्तृत चर्चा और मतदान होना है। यदि बिल पारित होता है, तो असम देश के उन चुनिंदा राज्यों में शामिल हो जाएगा जहाँ समान नागरिक संहिता को जमीन पर लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए हैं।

क्या है CBSE की री-इवैल्यूएशन प्रक्रिया, क्यों 12वीं के छात्र वेदांत के पोस्ट से उठ रहे सवाल; अंग्रेजी-कंप्यूटर साइंस का प्रोसेस चंगा तो फिजिक्स में क्यों पंगा: जानिए सब कुछ

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर वेदांत नाम के एक छात्र ने एक पोस्ट किया है। अपने ‘एक्स’ हैंडल @VEDANTSHRIV17 पर उन्होंने बताया कि वह कक्षा 12वीं के छात्र हैं और दावा किया कि उनकी फिजिक्स (Physics) विषय की आंसर शीट असल में उनकी नहीं है। हालाँकि, वेदांत के इस दावे पर कई यूजर्स ने आशंका जताई है।

पोस्ट में वेदांत ने बताया कि 12वीं बोर्ड परीक्षाओं के नतीजों में उन्हें फिजिक्स में काफी कम नंबर मिले, जिसके बाद उन्होंने CBSE की री-इवैल्यूएशन (पुनर्मूल्यांकन) प्रक्रिया के तहत आंसर शीट की फोटोकॉपी के लिए आवेदन किया था। 23 मई 2026 को आंसर शीट की फोटोकॉपी मिलने के बाद वेदांत ने दावा किया कि जो आंसर शीट उन्हें CBSE ने दी है, वह उनकी है ही नहीं।

(स्क्रीनशॉट साभार: X-@VEDANTSHRIV17)

वेदांत ने फिजिक्स की आंसर शीट की फोटोकॉपी की शेयर

वेदांत ने अपनी शिकायत को लेकर ‘एक्स’ पर पूरा एक थ्रेड पोस्ट किया। इस थ्रेड में वेदांत ने अपनी शिकायतों के साथ-साथ कई विषयों की आंसर शीट की फोटोकॉपी शेयर करते हुए CBSE से सवाल किए। वेदांत ने कहा कि उन्हें पूरा भरोसा है कि आंसर शीट की फोटोकॉपी में जो हैंडराइटिंग है, वो उनकी नहीं है। यहाँ तक उन्होंने दावा किया कि कॉपी में वो सवाल भी नहीं थे, जिन्हें उन्होंने परीक्षा में हल किया था।

वेदांत के मुताबिक, सिर्फ उन्होंने ही नहीं, बल्कि उनके परिवार, शिक्षकों और उनकी लिखावट को पहचानने वाले हर व्यक्ति ने तुरंत यह फर्क समझ लिया। उन्होंने बताया कि उन्होंने फिजिक्स की कॉपी की तुलना अपनी इंग्लिश और कंप्यूटर साइंस की आंसर शीट्स के साथ-साथ अपने हाथ से लिखे नोट्स से भी की, इन्हें वेदांत ने एक्स पर पोस्ट भी किया।

वेदांत का कहना है कि इंग्लिश और कंप्यूटर साइंस की कॉपियाँ एक-दूसरे से साफ मेल खाती हैं, लेकिन फिजिक्स की कॉपी पूरी तरह किसी दूसरे छात्र की लगती है। उन्होंने दावा किया कि कोई भी व्यक्ति खुद इन आंसर शीट्स की तुलना करके फर्क आसानी से देख सकता है।

(स्क्रीनशॉट साभार: X-@VEDANTSHRIV17)

उन्होंने सवाल उठाया कि अगर यह सच है, तो फिर आखिर उनके रोल नंबर पर किस कॉपी का मूल्यांकन किया गया- उनकी असली कॉपी का या किसी दूसरे छात्र की कॉपी का। वेदांत का कहना है कि अब यह मामला सिर्फ ‘री-चेकिंग’ तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह CBSE के OSM सिस्टम में आंसर शीट एक्सचेंज या टैगिंग में हुई किसी गंभीर गलती का मामला हो सकता है।

वेदांत ने CBSE से माँग की कि मामले की तुरंत जाँच की जाए, उनकी असली फिजिक्स आंसर शीट को सत्यापित किया जाए, OSM टैगिंग और स्कैनिंग प्रक्रिया का ऑडिट किया जाए, यह जाँच हो कि कहीं आंसर शीट्स की अदला-बदली तो नहीं हुई, और यह सुनिश्चित किया जाए कि सही कॉपी का ही मूल्यांकन हो।

तीन विषयों का री-इवैल्यूएशन करवाया, फिजिक्स में ही मिली शिकायत

मामला सामने आने के बाद ABP न्यूज ने छात्र से बातचीत की, जिसमें उन्होंने पूरी बात विस्तार से बताई। छात्र वेदांत ने दावा किया कि फिजिक्स की आंसर शीट के पहले पेज पर, जहाँ रोल नंबर और बाकी डिटेल्स लिखी हुई हैं, वहाँ उसकी हैंडराइटिंग दिखाई देती है। लेकिन जिस पेज से प्रश्नों के उत्तर लिखने शुरू होते हैं, वहाँ की लिखावट पूरी तरह अलग नजर आती है। अपने इस दावे को साबित करने के लिए वेदांत ने कई तर्क भी दिए।

वेदांत का कहना है कि उन्होंने इंग्लिश, कंप्यूटर साइंस और फिजिक्स समेत तीन विषयों का री-इवैल्यूएशन के लिए आवेदन किया था। छात्र ने कहा कि इंग्लिश और बाकी विषयों की आंसर शीट में उसकी असली हैंडराइटिंग साफ दिखाई देती है, जबकि फिजिक्स की कॉपी में लिखावट उससे बिल्कुल मेल नहीं खाती। उसने कहा कि फिजिक्स की आंसर शीट में मोटी और चौड़ी हैंडराइटिंग है, जबकि वह हमेशा पतला और छोटा लिखता है। छात्र वेदांत ने यह भी बताया कि फिजिक्स की कॉपी में सबसे पहले MCQ हल किए गए हैं, जबकि वह कभी भी परीक्षा की शुरुआत MCQ से नहीं करते।

वेदांत के मुताबिक, बाकी विषयों में उसके अच्छे नंबर आए हैं और उसे फिजिक्स में भी 90 से ज्यादा अंक मिलने की उम्मीद थी, लेकिन रिजल्ट में उसे सिर्फ 65 नंबर मिले। वहीं परिवार का कहना है कि अगर यह कॉपी उनके बच्चे की है ही नहीं, तो री-इवैल्यूएशन करवाने का क्या मतलब रह जाता है। परिवार ने आरोप लगाया कि इस पूरे मामले की वजह से उनके बच्चे का ओवरऑल स्कोर खराब हो गया, जिससे उसके भविष्य पर भी खतरा खड़ा हो गया है।

सोशल मीडिया पर वेदांत के दावे पर जताई गई आशंका

सारे सबूत दिखाने के बावजूद सोशल मीडिया पर यूजर्स वेदांत के दावे पर आशंका जता रहे हैं। इस मामले को लेकर एक्टिव एडवोकेट विनीत जिंदल ने ‘एक्स’ पर पोस्ट कर बताया कि लोग वेदांत को ‘पाकिस्तानी’ बता रहे हैं, लेकिन यह मामला असली है। विनीत जिंदल ने बताया कि उन्होंने वेदांत के भाई से बात की और सोशल मीडिया पर ऐसे कमेंट्स से परिवार दुखी है।

साथ ही उन्होंने बताया कि वेदांत और उनके परिवार लगातार CBSE के साथ संपर्क में है और अगर वह बोर्ड की कार्रवाई से संतुष्ट नही होते हैं तो वे कानूनी कार्रवाई करेंगे। ऐसे में एडवोकेट विनीत जिंदल ने वेदांत और उनके परिवार की सहायता के लिए निशुल्क उनका केस लड़ने का भी आश्वासन दिया है।

CBSE की री-इवैल्यूशन प्रक्रिया क्या है और कैसे होता है आवेदन?

CBSE बोर्ड परीक्षा के रिजल्ट जारी होने के बाद अगर किसी छात्र को अपने अंकों को लेकर संदेह होता है, तो बोर्ड उसे री-इवैल्यूशन यानी पुनर्मूल्यांकन का मौका देता है। यह प्रक्रिया खासतौर पर उन छात्रों के लिए होती है जिन्हें लगता है कि उनकी कॉपी सही तरीके से जाँची नहीं गई, किसी उत्तर के अंक छूट गए हैं या कुल नंबर जोड़ने में गलती हुई है। CBSE हर साल रिजल्ट जारी होने के बाद इसके लिए तय समय सीमा के भीतर ऑनलाइन आवेदन की सुविधा देता है।

री-इवैल्यूएशन की प्रक्रिया तीन चरणों में होती है। सबसे पहले छात्र ‘वेरिफिकेशन ऑफ मार्क्स’ के लिए आवेदन कर सकता है। इस चरण में बोर्ड यह जाँच करता है कि कहीं नंबर जोड़ने में गलती तो नहीं हुई, कोई उत्तर बिना जाँचे तो नहीं छूट गया या अंक अपलोड करने में कोई त्रुटि तो नहीं हुई। अगर छात्र इस प्रक्रिया के बाद भी संतुष्ट नहीं होता, तो वह अपनी आंसर शीट की फोटोकॉपी माँग सकता है। कॉपी मिलने के बाद छात्र यह देख सकता है कि उसकी आंसर शीट में किस तरह जाँच की गई है और किन सवालों में कितने अंक दिए गए हैं।

इसके बाद तीसरा और सबसे अहम चरण री-इवैल्यूएशन का होता है। इसमें छात्र उन सवालों को चुन सकता है जिनके मूल्यांकन पर उसे आपत्ति है। CBSE उन्हीं उत्तरों की दोबारा जाँच करवाता है। हालाँकि, बोर्ड पूरे पेपर की दोबारा जाँच नहीं करता, बल्कि केवल उन्हीं सवालों को री-इवैल्यूएट किया जाता है जिन्हें छात्र चुनकर आवेदन में शामिल करता है। इस प्रक्रिया के बाद अगर नंबर बढ़ते हैं, घटते हैं या पहले जैसे ही रहते हैं, तो वही अंतिम माने जाते हैं और उसके बाद किसी तरह की चुनौती स्वीकार नहीं की जाती।

कौन कर सकता है आवेदन?

री-इवैल्यूशन के लिए आवेदन केवल वही छात्र कर सकते हैं जिन्होंने संबंधित परीक्षा दी हो और तय समय सीमा के भीतर फीस जमा की हो। पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन होती है और छात्र CBSE की आधिकारिक वेबसाइट cbse.nic.in पर जाकर आवेदन कर सकते हैं। हर चरण के लिए अलग-अलग फीस निर्धारित होती है, जो हर विषय या हर प्रश्न के हिसाब से ली जाती है। बोर्ड आमतौर पर रिजल्ट घोषित होने के कुछ दिनों बाद आवेदन की तारीखें जारी करता है, इसलिए छात्रों को नियमित रूप से CBSE की वेबसाइट पर नजर बनाए रखने की सलाह दी जाती है।

महर्षि कपिल का श्राप, भगवान विष्णु के चरण और महादेव की जटाएँ: गंगा दशहरा पर जानिए धरती पर कैसे हुआ ‘मैया’ का अवतरण, पवित्र धाराओं के क्या हैं 7 प्रमुख नाम

सनातन धर्म में गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि आस्था, जीवन, मोक्ष और आध्यात्मिक चेतना की प्रतीक मानी जाती हैं। भारतीय संस्कृति में माँ गंगा को ‘मोक्षदायिनी’, ‘पापहारिणी’ और ‘पतित पावनी’ कहा गया है। हर वर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला गंगा दशहरा इसी दिव्य आस्था और पौराणिक परंपरा का महापर्व है।

मान्यता है कि इसी दिन माँ गंगा स्वर्ग लोक से पृथ्वी पर अवतरित हुई थीं। गंगा दशहरा भारतीय संस्कृति, आस्था, तपस्या, त्याग और मोक्ष की भावना का जीवंत प्रतीक है। यह पर्व हमें प्रकृति, नदियों और आध्यात्मिक मूल्यों के प्रति सम्मान करना भी सिखाता है।

क्यों मनाया जाता है गंगा दशहरा?

गंगा दशहरा माँ गंगा के स्वर्ग लोक से पृथ्वी पर अवतरण की स्मृति में मनाया जाता है। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, इसी दिन माँ गंगा राजा भगीरथ की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर धरती पर आई थीं। गंगा का अवतरण केवल पृथ्वी को पवित्र करने के लिए नहीं था, बल्कि राजा सगर के पुत्रों की आत्मा को मोक्ष दिलाने और समस्त मानव जाति के कल्याण के लिए हुआ था।

‘दशहरा’ शब्द संस्कृत के दो शब्दों से बना है, ‘दश’ यानी दस और ‘हरा’ यानी नाश करने वाला। वराह पुराण के अनुसार, इस दिन गंगा स्नान और पूजा करने से मनुष्य के दस प्रकार के पापों का नाश होता है। इसलिए इसे गंगा दशहरा कहा जाता है।

मान्यता है कि गंगा दशहरा के दिन माँ गंगा में स्नान करने, गंगा जल का प्रयोग करने, मंत्र जाप, पूजा-पाठ और दान करने से व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक शुद्धि आती है। इस दिन किए गए दान-पुण्य का फल कई गुना बढ़ जाता है।

गंगा अवतरण की पौराणिक कथा

गंगा दशहरा का सबसे प्रमुख आधार राजा भगीरथ और माँ गंगा की पौराणिक कथा है, जिसका उल्लेख कई पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। कथा के अनुसार, सूर्यवंशी राजा सगर ने अपनी शक्ति और साम्राज्य की प्रतिष्ठा स्थापित करने के लिए अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया था।

यज्ञ का घोड़ा पूरे राज्य में घूम रहा था, लेकिन देवराज इंद्र ने भय और ईर्ष्या के कारण उस घोड़े को चुराकर महर्षि कपिल के आश्रम में बाँध दिया। राजा सगर के साठ हजार पुत्र घोड़े की खोज करते-करते कपिल मुनि के आश्रम तक पहुँच गए। वहाँ घोड़ा देखकर उन्होंने महर्षि कपिल पर चोरी का आरोप लगाना शुरू कर दिया।

प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार: AI)

उनके शोर और अपमान से महर्षि कपिल की तपस्या भंग हो गई। क्रोधित होकर उन्होंने अपने तेज से सभी पुत्रों को भस्म कर दिया। बाद में बताया गया कि इन आत्माओं को तभी मुक्ति मिल सकती है जब स्वर्ग की पवित्र गंगा पृथ्वी पर उतरकर उनकी अस्थियों को स्पर्श करे। कई पीढ़ियों तक प्रयास चलता रहा, लेकिन सफलता नहीं मिली।

आखिरकार राजा सगर के वंशज महाराज भगीरथ ने कठोर तपस्या की। वर्षों तक तप करने के बाद ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए और उन्होंने गंगा को पृथ्वी पर भेजने का वरदान दिया। लेकिन एक समस्या थी वो ये कि गंगा का वेग इतना प्रचंड था कि पृथ्वी उसे सहन नहीं कर सकती थी।

तब भगीरथ ने भगवान शिव की आराधना की। शिव जी ने प्रसन्न होकर गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया। गंगा का तेज और वेग शिव की जटाओं में बंध गया। बाद में शिव जी ने धीरे-धीरे अपनी जटाओं से गंगा की धाराओं को पृथ्वी पर प्रवाहित किया। यही दिव्य घटना ‘गंगावतरण’ कहलाती है।

गंगा भगीरथ के पीछे-पीछे चलती हुई उस स्थान तक पहुँचीं जहाँ राजा सगर के पुत्रों की अस्थियाँ थीं। गंगा के जल के स्पर्श से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। इसी कारण गंगा को ‘भागीरथी’ भी कहा जाता है।

माँ गंगा से जुड़ी धार्मिक मान्यताएँ और आध्यात्मिक महत्व

हिंदू धर्म में माँ गंगा को सबसे पवित्र नदी माना गया है। पुराणों के अनुसार, गंगा का उद्भव भगवान विष्णु के चरणों से हुआ था और वे भगवान शिव की जटाओं में निवास करती हैं। यही कारण है कि गंगा को देवत्व प्राप्त है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गंगा स्नान से व्यक्ति के पाप नष्ट होते हैं और आत्मा शुद्ध होती है।

माना जाता है कि गंगा जल कभी अशुद्ध नहीं होता और उसमें दिव्य ऊर्जा विद्यमान रहती है। शास्त्रों के अनुसार, भगवान शिव ने गंगा को सात धाराओं में विभाजित किया था। ये धाराएँ थीं, नलिनी, हृदिनी, पावनी, सीता, चक्षुष, सिंधु और भागीरथी। इनमें भागीरथी धारा ही आगे चलकर गंगा कहलायी।

एक अन्य कथा के अनुसार, एक बार ऋषि जह्नु की तपस्या में गंगा के वेग से बाधा उत्पन्न हुई तो उन्होंने क्रोधित होकर गंगा को पी लिया। बाद में देवताओं की प्रार्थना पर उन्होंने गंगा को अपनी जांघ से बाहर निकाला। तभी से गंगा ‘जान्हवी’ नाम से भी प्रसिद्ध हुईं।

स्कंद पुराण और वराह पुराण में गंगा दशहरा के महत्व का विस्तार से वर्णन मिलता है। इन ग्रंथों के अनुसार, गंगा केवल शरीर की नहीं, बल्कि मन और आत्मा की भी शुद्धि करती हैं।

गंगा दशहरा पर क्या-क्या किया जाता है?

गंगा दशहरा के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करने का विशेष महत्व माना जाता है। यदि संभव हो तो गंगा नदी या किसी पवित्र नदी में स्नान किया जाता है। जो लोग गंगा तट तक नहीं पहुँच पाते, वे घर में स्नान के जल में गंगा जल मिलाकर स्नान करते हैं।

इस दिन श्रद्धालु माँ गंगा की विशेष पूजा करते हैं। पूजा में दस प्रकार के पुष्प, दस दीपक, दस फल या दस प्रकार की पूजन सामग्री रखने की परंपरा है। यह दस पापों के नाश का प्रतीक माना जाता है। गंगा स्तोत्र, गंगा चालीसा और ॐ नमः शिवाय जैसे मंत्रों का जाप किया जाता है। कई लोग पूरे दिन उपवास रखते हैं और शाम को गंगा आरती में भाग लेते हैं।

दान-पुण्य का भी इस दिन विशेष महत्व है। कई लोग ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं और पितरों की शांति के लिए तर्पण भी करते हैं।

हरिद्वार, प्रयागराज और काशी में गंगा दशहरा की भव्यता

गंगा दशहरा के अवसर पर देशभर के प्रमुख गंगा घाटों पर विशेष रौनक दिखाई देती है। हरिद्वार की हर की पौड़ी पर लाखों श्रद्धालु एकत्र होकर गंगा स्नान करते हैं। मान्यता है कि यहाँ अमृत की बूंदें गिरी थीं और भगवान विष्णु के चरण चिह्न आज भी मौजूद हैं।

हरिद्वार में गंगा दशहरा के अवसर पर श्रद्धालुओं की भीड़ (फोटो साभार:NDTV)

प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर श्रद्धालु गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम में डुबकी लगाकर मोक्ष की कामना करते हैं। यहाँ लोग पितृ तर्पण और विशेष पूजा भी करते हैं।

काशी यानी वाराणसी में गंगा दशहरा का अलग ही आध्यात्मिक वातावरण देखने को मिलता है। बाबा विश्वनाथ के दर्शन और गंगा स्नान को अत्यंत शुभ माना जाता है। शाम के समय दशाश्वमेध घाट की भव्य गंगा आरती श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर देती है।

काशी में गंगा आरती का अलौकिक दृश्य (फोटो साभार: Tripadvisor)

गंगा दशहरा का आध्यात्मिक संदेश

गंगा दशहरा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मानव जीवन को शुद्धता, सेवा, तपस्या और मोक्ष का संदेश देने वाला उत्सव है। राजा भगीरथ की तपस्या यह सिखाती है कि संकल्प और श्रद्धा से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं। माँ गंगा का अवतरण यह दर्शाता है कि ईश्वर की कृपा केवल व्यक्ति विशेष के लिए नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के कल्याण के लिए होती है।

आज जब नदियों को बचाने और प्रकृति संरक्षण की आवश्यकता पहले से अधिक महसूस की जा रही है, तब गंगा दशहरा हमें यह भी याद दिलाता है कि गंगा केवल पूजा की नहीं, संरक्षण की भी अधिकारी हैं। आस्था तभी पूर्ण होगी जब हम माँ गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाए रखने का संकल्प भी लें।

गंगा दशहरा भारतीय संस्कृति, श्रद्धा और अध्यात्म का ऐसा पर्व है जो केवल धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने की दिशा भी देता है। माँ गंगा की पावन धारा सदियों से मानवता को जीवन, शांति और मुक्ति का संदेश देती आई है और आगे भी देती रहेगी। यह पर्व हमें अपने धर्म, संस्कृति और प्रकृति के प्रति सम्मान करना सिखाता है।

गंगा की धारा केवल जल नहीं बहाती, बल्कि युगों-युगों से श्रद्धा, विश्वास और मुक्ति की भावना भी प्रवाहित करती आ रही है। इसलिए गंगा दशहरा का पर्व भारतीय संस्कृति में सदैव विशेष महत्व रखेगा और आने वाली पीढ़ियों को भी आध्यात्मिकता और मानवता का मार्ग दिखाता रहेगा।

यूक्रेन में रूस की जिस Oreshnik मिसाइल ने मचाई तबाही, क्या भारत के पास भी है वैसा हथियार?: जानें अग्नि-V के बारे में, जिसकी MIRV तकनीक है बेहद खास

रूस ने यूक्रेन पर ओरेश्निक (Oreshnik) हाइपरसोनिक मिसाइल और ड्रोन से कीव समेत कई शहरों पर भीषण हमले किए हैं। रविवार रात हुए इन भीषण हमलों में रिहायशी इलाकों और नागरिक बुनियादी ढाँचे को निशाना बनाया गया। इस हमले से भारी तबाही मची है और कई लोगों की मौत हो गई है। ओरेश्विक मिसाइल परमाणु हथियारों को ले जाने में सक्षम है जो IRBM (Intermediate-Range Ballistic Missile) यानी मध्यम दूरी की बैलेस्टिक मिसाइल है।

भारत की बात करें तो यहाँ अग्नि 4 इस तरह की मिसाइल है, वहीं अग्नि-5 ICBM (Intercontinental Ballistic Missile) यानी अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल है, जो लंबी दूरी की हाइपरसोनिक मिसाइल है।

रूसी ओरेश्रिक मिसाइल की खासियत

रूस का ओरेश्निक (Oreshnik) हाइपरसोनिक क्षमता वाली मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल है, जिसे रूस ने 2024 में पहली बार सार्वजनिक रूप से इस्तेमाल करने का दावा किया था। यह अपनी तेज गति, कई वारहेड ले जाने की क्षमता यानी एक साथ कई लक्ष्यों को साधना और आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा देने में माहिर है। रूसी भाषा में ओरेश्निक शब्द का मतलब होता है- हेजल ट्री यानी जब मिसाइल के कई वॉरहेड रोशनी की लकीरों की तरह गिरते हैं, जो ये पेड़ की तरह दिखते हैं।

रूस का कहना है कि यह मिसाइल ध्वनि की गति से 10 गुणा तेज चल सकती है। लंबी दूरी तक हमला कर सकती है और बीच में जरूरत के मुताबिक रास्ता बदल सकती है, जिससे इसे ट्रैक करना और रोकना काफी मुश्किल होता है। यह दोनों तरह के हथियारों यानी परमाणु हथियारों के साथ-साथ पारंपरिक हथियारों को ले जाने में सक्षम है।

ओरेश्निक एक न्यूक्लियर हथियार भी है। इसका मतलब है कि इसे न्यूक्लियर वॉरहेड ले जाने के लिए डिजाइन किया गया है, इसलिए इसकी मारक क्षमता एक न्यूक्लियर हथियार के बराबर है, भले ही उसमें पारंपरिक वॉरहेड लगा हो।

इसकी रफ्तार करीब 1000–16000 किमी प्रति घंटा (620 से 990 मील) है यानी इतनी तेज रफ्तार की वजह से सामान्य एयर डिफेंस सिस्टम को प्रतिक्रिया का बहुत कम समय मिलता है, इसलिए इसे इंटरसेप्ट करना काफी मुश्किल है।

रूस ने अब तक तीन बार यूक्रेन युद्ध के दौरान इसका इस्तेमाल किया है। पहली बार नवंबर 2024 में निप्रो शहर पर हमला किया गया। दूसरी बार जनवरी 2026 में पॉलेंड के बॉर्डर के नजदीक के पश्चिमी लवीव क्षेत्र में किया गया। तीसरी बार 24 मई 2026 को इसका इस्तेमाल राजधानी कीव में किया गया है।

अमेरिका का मानना है कि ओरेश्निक मिसाइल 2008 में पहली बार डेवलप की गई ‘RS-26 रुबेज’ इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) पर आधारित है। यह शक्तिशाली हथियार जमीन के नीचे तीन, चार या उससे भी ज्यादा मंजिल नीचे बने बंकरों को तबाह करने में सक्षम है। 30 दिसंबर, 2025 को रूस ने बेलारूस में ओरेश्निक सिस्टम तैनात किया था, जिससे यूरोप के किसी भी देश को टारगेट किया जा सकता है।

यूक्रेन पर तीन ओरेश्निक हमले के तीन संदेश

रूस ने इसका इस्तेमाल यूरोप और दुनिया को मैसेज देने के लिए किया है। एक तरह से हाइपरसोनिक मिसाइल से हमला शक्ति प्रदर्शन भी है। पहली बार इस मिसाइल से हमला कर रूस ने अमेरिका को संदेश दिया था, क्योंकि कुछ दिनों पहले ही पूर्व डेमोक्रेटिक राष्ट्रपति जो बाइडेन के नेतृत्व वाली अमेरिकी सरकार ने यूक्रेन को रूस में टारगेट पर हमला करने के लिए आर्मी टैक्टिकल मिसाइल सिस्टम (ATACMS) का इस्तेमाल करने की अनुमति दी। ये अमेरिका ने ही यूक्रेन को दिए थे और इसके इसके इस्तेमाल से पहले अमेरिका की मंजूरी जरूरी है।

दूसरी बार रूस ने यूरोप और नाटो को संदेश देने के लिए हमला किया। यही वजह है कि हमला नाटो के सदस्य पॉलेंड के बॉर्डर के नजदीक के पश्चिमी लवीव क्षेत्र में किया गया। दरअसल नाटो ने यूक्रेन को मदद देने का ऐलान किया था। दरअसल इस युद्ध की शुरुआत ही यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की की नाटो में शामिल होने की जिद की वजह से शुरू हुई थी। रूस किसी भी हाल में अपने पड़ोसी यूक्रेन को नाटो में शामिल होने की अनुमति देने को तैयार नहीं था।

तीसरा हमला दरअसल यूक्रेन की राजधानी पर करके रूस ने साफ कर दिया है कि उसे कोई नहीं रोक सकता। यूक्रेन और पश्चिमी देशों को संदेश भी दिया है कि रूस के पास उन्नत मिसाइल तकनीक अभी भी मौजूद हैं।

भारत के पास है अग्नि-V

रूस के इस कदम के बाद भारत की मारक क्षमता पर भी दुनिया की नजरें टिक गई हैं। भारत ने हाल ही में ओडिशा के डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से MIRV तकनीक से लैस एडवांस्ड अग्नि मिसाइल का सफल परीक्षण किया है। भारत के रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) द्वारा विकसित अग्नि-V एक इंटरकॉन्टिनेंटली बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) है, जिसकी मारक क्षमता 5,000 किलोमीटर से भी ज्यादा है। यानी पूरा एशिया, चीन और यूरोप का एक बड़ा हिस्सा इसकी जद में आता है।

भारत ने पिछले कुछ समय में ‘मिशन दिव्यास्त्र’ के तहत इसके जो परीक्षण किए हैं, उसने भारत को दुनिया के उन चुनिंदा 6-7 देशों की लीग में खड़ा कर दिया है जिनके पास इतनी लंबी दूरी की मारक क्षमता और MIRV तकनीक है।

अग्नि-5 भारत की सतह से सतह पर मार करने वाली लंबी दूरी की सबसे उन्नत मिसाइलों में शुमार होता है। इसे भारत के एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम यानी आईजीएमडीपी के तहत विकसित किया गया है। ये एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक आसानी से वार कर सकते हैं। इन्हें दुनिया की सबसे शक्तिशाली और खतरनाक हथियारों में गिना जाता है। ये हवा से 10 गुणा से ज्यादा तेज गति से पृथ्वी के सब-ऑर्बिटल (sub-orbital) मार्ग से आगे बढ़ता है, जिससे दुश्मन देश तुरंत में भाप नहीं पाते। भारत की अग्नि-5 ऐसी ही मिसाइल है।

क्या अग्नि-V भी हाइपरसोनिक है?

रक्षा क्षेत्र से जुड़े सूत्रों और विशेषज्ञों का कहना है कि अग्नि-V की रफ्तार भी मैक 24 (लगभग 29,400 किमी/घंटा) तक पहुँच सकती है, जो इसे हाइपरसोनिक श्रेणी की मिसाइलों से भी तेज बनाती है। हालाँकि भारत सरकार ने इसकी सटीक टॉप स्पीड और इसकी कुछ अन्य घातक क्षमताओं को लेकर हमेशा चुप्पी साधे रखी है। भारत का यह ‘साइलेंट’ रवैया ही इसे चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों के लिए सबसे रहस्यमयी और घातक हथियार बनाता है।

अग्नि-5 भारत को अमेरिका, रूस, चीन, फ्राँस जैसे चुनिंदा देशों की श्रेणी में शामिल में करता है, जिनके पास IRBM तकनीक वाली आधुनिकतम मिसाइल है। इसे किसी भी जगह से यानी जहाजों या पनडुब्बियों से किसी भी लक्ष्य पर हमला करने के लिए भेजा जा सकता है। लक्ष्य जमीन पर हो या समुद्र में। यह जमीन के अंदर तीन या चार मंजिला मकान के अंदर बने बंकर को भी नष्ट कर सकता है।

ओरेश्निक बनाम अग्नि-V, दो सबसे बड़े ब्रह्मास्त्र

यदि हम रूस की ओरेश्निक और भारत की अग्नि-V मिसाइल की आमने-सामने तुलना करें, तो दोनों ही मिसाइलें अपनी-अपनी जगह पर दुनिया को तबाह करने की ताकत रखती हैं, लेकिन दोनों का उद्देश्य और उनकी खूबियाँ अलग हैं। रूस की ओरेश्निक एक इंटरमीडिएट-रेंज (मध्यम दूरी) की बैलिस्टिक मिसाइल है, जिसकी अनुमानित रेंज 3,500 से 5,500 किलोमीटर के बीच है।

वहीं दूसरी ओर भारत की अग्नि-V एक शुद्ध इंटरकॉन्टिनेंटल (अंतरमहाद्वीपीय) बैलिस्टिक मिसाइल है, जो आसानी से 5,000 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी तय कर सकती है। रक्षा विशेषज्ञों का तो यह भी मानना है कि अग्नि-V की वास्तविक क्षमता 8,000 किलोमीटर तक की हो सकती है, जिसे भारत ने आधिकारिक तौर पर उजागर नहीं किया है।

रफ्तार और मारक क्षमता के मामले में दोनों ही मिसाइलें दुश्मन के पसीने छुड़ाने के लिए काफी हैं। ओरेश्निक जहां मैक 10 की रफ्तार से हमला करती है, वहीं अग्नि-V अपनी उड़ान के आखिरी चरण में मैक 20 से मैक 24 की अविश्वसनीय गति हासिल कर सकती है। हालाँकि, ओरेश्निक को पूरी तरह हाइपरसोनिक क्रूज या ग्लाइड व्हीकल के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, लेकिन अग्नि-V भी अपनी री-एंट्री (अंतरिक्ष से वापस धरती के वायुमंडल में आते समय) के दौरान इतनी तेज होती है कि दुनिया का कोई भी मिसाइल डिफेंस सिस्टम, चाहे वह अमेरिका का थाड (THAAD) हो या चीन का HQ-19, इसे बीच में नहीं गिरा सकता।

इन दोनों मिसाइलों की सबसे बड़ी समानता इनकी ‘MIRV’ तकनीक है, लेकिन यहाँ भी इनका इस्तेमाल अलग तरीके से देखा गया है। यूक्रेन युद्ध में ओरेश्निक ने एक ही मिसाइल से कई सब-म्यूनिशन्स (छोटे बमों) को एक साथ छोड़कर पूरी दुनिया को हैरान कर दिया था। भारत की अग्नि-V भी इसी तकनीक से लैस है, जो एक ही लॉन्च में अलग-अलग शहरों या सैन्य ठिकानों को एक साथ निशाना बना सकती है।

सबसे बड़ा अंतर यह है कि रूस जहाँ युद्ध के मैदान में अपनी मिसाइल का लाइव टेस्ट करके दुनिया को डरा रहा है, वहीं भारत ने अपनी तकनीक को बेहद गोपनीय और शांत रखा है, ताकि जरूरत पड़ने पर यह दुश्मन के लिए एक ऐसा अप्रत्याशित झटका साबित हो जिसका कोई तोड़ न हो।

बच्ची के यौन उत्पीड़न-हत्या केस पर PC करते हुए ठहाके मारकर हँसने लगी तमिलनाडु पुलिस: Video देख भड़के नेटिजन्स, कहा- और बनाओ एक्टर को CM!

सोशल मीडिया पर तमिलनाडु पुलिस का एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें महिला अधिकारी समेत पुलिस अफसर कोयंबटूर के सुलूर क्षेत्र में 10 साल की बच्ची के साथ यौन उत्पीड़न और हत्या के मामले की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बीच हँसते-मुस्कुराते दिखाई दे रहे हैं। नेटिजन्स इस वीडियो की खूब आलोचना कर रहे हैं।

एक यूजर ने कहा कि राज्य में एक्टर की सरकार बनने के बाद से उन्हें यहीं उम्मीद थी कि पुलिस गंभीर मामलों में लापरवाही बरतेगी। अन्य यूजर ने कहा ऐसे लापरवाह पुलिस के ऐसे रवैये की वजह से ही आम आदमी न्याय की उम्मीद खो देता है। नेटिजन्स ने वीडियो में दिख रहे पुलिस अफसरों को तत्काल सस्पेंड करने की माँग की है। हालाँकि, अब तक इस विवादित वीडियो पर तमिलनाडु पुलिस की कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

नेटिजन्स की प्रतिक्रिया

सोशल मीडिया यूजर्स ने तमिलनाडु पुलिस की इस तरह के गंभीर मामले में हँसने पर खूब आलोचना की है। रमेश तिवारी नाम के एक्स यूजर ने कहा, “जब सिस्टम में बैठे लोग ही इतनी बड़ी हैवानियत पर दुख और गंभीरता नहीं दिखाते, तो जनता और पीड़ित परिवार को क्या संदेश जाता है? यह प्रोफेशनलिज्म नहीं, बल्कि बेहद शर्मनाक असंवेदनशीलता है।”

सोशल मीडिया पर तमिलनाडु की नई विजय सरकार को भी घेरा गया। अमिताभ चौधरी नाम के यूजर ने कहा, “सोचिए, ये अधिकारी, जिनमें एक महिला आईजी भी शामिल हैं, ऐसे मामलों को कितनी गंभीरता से संभाल रहे हैं… और उस राज्य से आखिर क्या उम्मीद की जाए, जहाँ एक्टर्स को नेता चुनकर सत्ता में बैठाया जाता है?”

पुलिस की इस हरकत को यूजर्स ने निंदनीय बताते हुए संबंधित पुलिस अफसरों को निलंबित करने की माँग की। अंशुल नाम के एक्स यूजर ने कहा, “घिनौना और शर्मनाक… क्या इतने भयानक अपराध पर प्रेस कॉन्फ्रेंस ऐसे की जाती है? अगर बेशर्मी का कोई चेहरा होता, तो वो आज इन तीनों का होता 😡”

वे आगे कहते हैं, “अगर यही दर्द उनकी अपनी बेटी या किसी 10 साल की बच्ची रिश्तेदार के साथ हुआ होता, तब भी क्या ये ऐसे ही हँसते और मजाक करते? ऐसे संवेदनहीन लोगों को तुरंत सस्पेंड किया जाना चाहिए।”

एक यूजर ने तमिलनाडु के नए मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय को टैग कर मामला में संज्ञान लेने की माँग की। उन्होंने लिखा, “माननीय @CMOTamilnadu कृपया सुलूर घटना में युवती की मौत को लेकर प्रेस मीट के दौरान पुलिस अधिकारियों द्वारा दिखाए गए असंवेदनशील व्यवहार पर ध्यान दें। ऐसे दुखद मामलों में गंभीरता, संवेदनशीलता और सम्मान दिखना बेहद जरूरी है।”

रक्षा मामलों से जुड़े एक एक्स पेज ने लिखा, “इन लोगों का काम आम नागरिकों के प्रति संवेदनशील और सहानुभूतिपूर्ण होना चाहिए, लेकिन लगता है कि सालों तक राजनीतिक आकाओं को खुश करने वाली नौकरी करते-करते इनके अंदर बची हुई इंसानियत भी खत्म हो चुकी है। इन तीनों के खिलाफ कुछ नहीं होगा… ज्यादा से ज्यादा क्या होगा? ट्रांसफर।”

विनायक त्रिपाठी नाम के यूजर लिखते हैं, “पूरे राज्य के सदमे में होने के समय पुलिस का ऐसा असंवेदनशील व्यवहार पूरी तरह अस्वीकार्य है। हम इस गलत आचरण में शामिल अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और मामले की निष्पक्ष व पारदर्शी जाँच की माँग करते हैं।”

एक और यूजर महालक्ष्मी रामानाथम ने इसे तमिलनाडु पुलिस के लिए शर्म की बात बताया।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला तमिलनाडु के कोयंबटूर जिले के सुलूर इलाके में 10 साल की बच्चे के साथ यौन उत्पीड़न और हत्या का है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बच्चे घर के पास की दुकान पर गई थी, लेकिन काफी देर तक वापस नहीं लौटी। इसके बाद परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।

जाँच के दौरान पुलिस को CCTV फुटेज मिले, जिनमें एक संदिग्ध व्यक्ति बच्ची को अपने साथ ले जाता दिखाई दिया। बाद में बच्ची का शव इलाके के एक तालाब के पास बरामद किया गया। पुलिस ने मामले में दो लोगों को गिरफ्तार किया है। शुरुआती जाँच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यौन उत्पीड़न की आशंका जताई गई है। घटना के बाद पूरे इलाके में गुस्सा फैल गया और लोगों ने आरोपितों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की माँग करते हुए प्रदर्शन किया।

इस बीच सोशल मीडिया पर पुलिस अधिकारियों की मामले को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें महिला समेत 3 पुलिस अधिकारी हँसते और मुस्कुराते नजर आए। ऐसे गंभीर मामले में पुलिस के व्यवहार पर लोगों ने नाराजगी जताई।

मुख्यमंत्री विजय ने जताई संवेदना

इस घटना पर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय ने गहरा दुख और सदमा जताया। उन्होंने कहा कि इस तरह के अमानवीय और अक्षम्य अपराधों को समाज में किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। मुख्यमंत्री ने पीड़ित बच्ची के परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि वह इस दुख की घड़ी में परिवार के साथ खड़े हैं।

उन्होंने बताया कि मामले में दो आरोपितों को गिरफ्तार किया जा चुका है। साथ ही पुलिस को निर्देश दिए गए हैं कि मामले की तेजी और पूरी गंभीरता से जाँच की जाए तथा जल्द से जल्द चार्जशीट दाखिल की जाए।

मुख्यमंत्री विजय ने कहा कि महिलाओं और बच्चों के खिलाफ ऐसे जघन्य अपराध करने वालों को कानून के तहत कड़ी से कड़ी सजा दिलाने के लिए तमिलनाडु सरकार पूरी मजबूती से कार्रवाई करेगी। इसके लिए सभी जरूरी और तत्काल कदम उठाए जाएंगे।

आतंकी भिंडरावाले की तारीफ से लेकर खालिस्तान के समर्थन तक: भारत विरोधी गुनिशा कौर से मिलिए, जो बनाई गई अमेरिका के USCIRF की कमिश्नर

अमेरिकी सीनेटर चक शूमर ने गुनीशा कौर नाम की एक खालिस्तान समर्थक महिला को अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अमेरिकी आयोग (USCIRF) में नियुक्त करने का एलान किया है। बता दें कि USCIRF का भारत और उसके आंतरिक मामलों के खिलाफ फर्जी खबरें फैलाने का पुराना इतिहास रहा है।

पेशे से डॉक्टर और मानवाधिकार रिसर्च की कथित विशेषज्ञ गुनीशा कौर को आयोग में शामिल होने वाली ‘पहली सिख’ के रूप में पेश किया जा रहा है, जबकि उनके भारत-विरोधी और खालिस्तान समर्थक रुख को छुपाया जा रहा है। वह अगले 2 साल तक USCIRF के 9 कमिश्नरों में से एक के रूप में काम करेंगी।

अमेरिकी सीनेटर चक शूमर ने अपने बयान में कहा, “मुझे पूरा भरोसा है कि वह आयोग में अपनी सेवा के दौरान अपने गहरे मेडिकल, एकेडमिक, रिसर्च, धार्मिक और लीडरशिप के अनुभवों का फायदा पहुँचाएँगी।”

खालिस्तान समर्थक प्रोपेगैंडा का इतिहास

गुनीशा कौर साल 2009 से ही 1984 के दंगों के दौरान सिखों पर हुए अत्याचारों को उजागर करने के बहाने खालिस्तान समर्थक प्रोपेगैंडा फैलाने में जुटी हुई हैं। इस सिलसिले में उन्होंने ‘लॉस्ट इन हिस्ट्री: 1984 रिकंस्ट्रक्टेड’ नाम की एक किताब भी लिखी है।

अपनी किताब में कौर ने आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले को “1970 और 1980 के दशक की शुरुआत में सिखों का एक करिश्माई और प्रभावशाली नेता” बताया था। उन्होंने उसे एक ‘धार्मिक नेता’ भी कहा और दावा किया कि भारत सरकार ने उसे जानबूझकर एक चरमपंथी और अलगाववादी के रूप में पेश किया।

किताब में USCIRF की इस नई कमिश्नर ने भिंडरावाले की देखरेख में खालिस्तानियों द्वारा हिंदुओं पर किए गए हमलों का दोष भी भारत सरकार पर मढ़ दिया। गुनीशा कौर ने दावा किया, “इस दौरान हिंदुओं के खिलाफ जो भी हिंसा की घटनाएं हुईं, चाहे वे सरकार द्वारा प्रायोजित थीं या किसी स्वतंत्र गुट द्वारा की गईं, उनका आरोप आमतौर पर जरनैल सिंह पर ही लगा दिया गया।”

‘लॉस्ट इन हिस्ट्री: 1984 रिकंस्ट्रक्टेड’ के पेज का स्क्रीनशॉट

किताब में आगे उन्होंने आरोप लगाया कि भारत सरकार ने उत्तरी भारत की हिंदू आबादी का राजनीतिक समर्थन हासिल करने के लिए जरनैल सिंह भिंडरावाले की छवि को खराब किया।

आतंकवादी का बचाव करते हुए कौर ने लिखा, “जरनैल सिंह पर जो आरोप थे वे मामूली थे, जिनमें सबसे गंभीर आरोप उन पर भड़काऊ भाषण देने का था।”

यह उनकी उस कट्टरपंथी सोच को दिखाता है जो एक आतंकवादी को हर तरह से सही ठहराने की कोशिश करती है।

जून 2013 में गुनीशा कौर ने ‘हफिंगटन पोस्ट’ के कंट्रीब्यूटर प्लेटफॉर्म पर इसी तरह का एक लेख लिखा था। इस वेबसाइट पर लिखा होता है कि लिखने वाले अपने काम के खुद जिम्मेदार हैं और आजादी से पोस्ट कर सकते हैं।

इस लेख की मुख्य तस्वीर के कैप्शन में आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले को ‘संत’ और ‘सिख नेता’ बताया गया था, जबकि खालिस्तान को ‘एक स्वतंत्र सिख राज्य की कल्पना को दिया गया नाम’ लिखा गया था।

भारत विरोधी बयानबाजी का अतीत

इसके बाद दिसंबर 2020 में USCIRF की यह नई कमिश्नर सीएनएन (CNN) जैसे विदेशी वामपंथी प्रकाशनों में भारत विरोधी नैरेटिव फैलाने में व्यस्त थीं। गुनीशा कौर ने एक साझा लेख लिखा, जिसमें झूठा आरोप लगाया गया कि मोदी सरकार द्वारा लाए गए 3 कृषि कानून किसी तरह ‘छोटे किसानों को नुकसान पहुँचा रहे हैं और बड़े कॉरपोरेट्स को फायदा दे रहे हैं’।

इस लेख में ‘पुलिस की बर्बरता’ को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के साथ-साथ खालिस्तान के एजेंडे को यह कहकर सही ठहराने की कोशिश की गई कि ‘पंजाब में सिखों का एक हिस्सा आत्मनिर्णय के लिए सालों से सशस्त्र विद्रोह में शामिल था।’ किसानों की परेशानी उठाने के बहाने प्रोपेगैंडा फैलाने वाली गुनीशा कौर ने इसमें भी खालिस्तानी एजेंडा घुसा दिया।

बता दें कि अलग-अलग राज्यों के मौजूदा कृषि उपज मंडी समिति (APMC) कानूनों में कमियों को देखते हुए, नरेंद्र मोदी सरकार ने 2014 में एक एकीकृत राष्ट्रीय कृषि बाजार (NAM) की घोषणा की थी। ई-नाम (e-NAM) पूरे भारत का एक इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पोर्टल है जो मौजूदा मंडियों को जोड़कर कृषि उपजों के लिए एक साझा राष्ट्रीय बाजार बनाता है। सुधारों को आगे बढ़ाते हुए मोदी सरकार ने तीन कृषि कानून पेश किए ताकि फसलों का व्यापार आसान हो सके और किसानों को मंडियों के बाहर भी एक प्रतिस्पर्धी बाजार मिल सके।

सीएनएन के आर्टिकल का स्क्रीनशॉट

मोदी सरकार द्वारा लाए गए ये तीन कानून थे- कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक 2020, कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक 2020। हालांकि, देश की आंतरिक स्थिरता बनाए रखने के लिए बाद में इन्हें वापस ले लिया गया था।

इसके 3 साल बाद दिसंबर 2023 में गुनीशा कौर ने वैश्विक स्तर पर भारत की छवि को खराब करने के लिए ‘टाइम’ (Time) मैगजीन में एक और लेख लिखा। इस लेख का शीर्षक था, ‘व्हाई इंडिया इज टारगेटिंग सिखों एट होम एंड अराउंड द वर्ल्ड’ (भारत देश और दुनिया भर में सिखों को निशाना क्यों बना रहा है)।

इसमें उन्होंने खालिस्तानी दावों को बढ़ावा देने के लिए झूठ फैलाया कि भारत सरकार विदेशों में रहने वाले सिखों पर कथित अत्याचार कर रही है। कौर ने आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारत का हाथ होने के बेबुनियाद दावों को फिर से दोहराया।

टाइम मैगजीन के आर्टिकल का स्क्रीनशॉट

दिलचस्प बात यह है कि कनाडा के अखबार ‘द ग्लोब एंड मेल’ के मुताबिक आतंकवादी कैंप चलाने वाले निज्जर को USCIRF की नई कमिश्नर ने सिर्फ ‘एक कनाडाई नागरिक’ बताया। वहीं भारत में प्रतिबंधित संगठन ‘सिख्स फॉर जस्टिस’ चलाने वाले वांटेड आतंकवादी गुरपतवंत सिंह पन्नू को भी उन्होंने ‘एक सिख कार्यकर्ता और अमेरिकी नागरिक’ के रूप में पेश किया।

खालिस्तान की वकालत करते हुए गुनीशा कौर ने लिखा, “मोदी सरकार सिखों के आत्मनिर्णय की माँगों से इतनी असुरक्षित क्यों महसूस करती है कि वे अमेरिका और कनाडा जैसे वैश्विक महाशक्तियों के साथ अपने संबंधों को भी दांव पर लगाने के लिए तैयार हैं?”

वह यहाँ भी आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले की तारीफ करना नहीं भूलीं और उसे फिर से ‘एक मजहबी सैक्ट का करिश्माई सिख नेता’ बताया।

अब जब USCIRF में एक जानी-मानी खालिस्तान समर्थक को नियुक्त कर दिया गया है, तो भारत के खिलाफ और अधिक बयानबाजी, उसके आंतरिक मामलों में दखलअंदाजी और दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक के रूप में भारत की छवि को खराब करने की कोशिशों की आशंका बढ़ गई है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)