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बार-बार इस्लामी आक्रमण, बार-बार प्रतिरोध और पुनर्निर्माण की गाथा: सनातन सभ्यता की पहचान सोमनाथ मंदिर को जीवित रखने के लिए हर युग में खड़े हुए हिंदू शासक

सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं है, बल्कि यह भारत की उस ऐतिहासिक स्मृति का प्रतीक है जहाँ मजहबी कट्टरता के हमलों के सामने भी आस्था, शौर्य और सांस्कृतिक स्वाभिमान बार-बार उठ खड़ा हुआ है। सदियों के अंतराल में जब-जब सोमनाथ पर प्रहार हुआ, तब-तब हिंदू शासकों और योद्धाओं ने कभी तलवार उठाकर रास्ता रोका, तो कभी ईंट-पत्थर जोड़कर मंदिर को फिर से भव्य रूप दिया।

अरब से लेकर तुर्क आक्रमणों तक, मजहबी उन्माद ने बार-बार सोमनाथ को निशाना बनाया। कभी समुद्री रास्ते से तो कभी उत्तर-पश्चिमी जमीनी रास्तों से। लेकिन हर विनाश के बाद इतिहास ने यह भी देखा है कि हिंदू शासक न केवल अडिग रहे, बल्कि उन्होंने मंदिर और संस्कृति दोनों को पूरी गरिमा के साथ फिर से स्थापित किया। यह लेख उसी अटूट प्रतिरोध और संघर्ष की परंपरा को रेखांकित करता है।

यह लेख सोमनाथ की रक्षा करने वाले, संघर्ष और युद्ध लड़ने वाले और इस मंदिर को जीवंत रखने वाले महान शासकों और योद्धाओं की स्मृति को समर्पित है। इसके अलावा, यह लेख आधुनिक भारत तक की उस यात्रा को भी रेखांकित करता है, जहाँ मंदिर का पुनर्निर्माण केवल एक ढाँचा खड़ा करना नहीं, बल्कि हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान की बुलंद पुकार बन गया है।

इस्लामी हमलों की पृष्ठभूमि और प्रतिरोध

11वीं से 14वीं शताब्दी के बीच पश्चिमी भारत में सोमनाथ पर कई बार हमले हुए। इन हमलों का एकमात्र उद्देश्य केवल मंदिर को तोड़ना या धन लूटना नहीं था, बल्कि एक पूरी संस्कृति के केंद्र को अपमानित करना था। इसके बावजूद, सोमनाथ की परंपरा कभी टूटी नहीं। समय के साथ राजसत्ताएँ बदलीं, लेकिन प्रतिरोध की चेतना हमेशा कायम रही। कभी युद्ध के मैदान में संघर्ष के रूप में, तो कभी मंदिर की पुनर्स्थापना के संकल्प के रूप में।

मूलराज सोलंकी: सौराष्ट्र की रक्षा की राजनीतिक नींव

10वीं शताब्दी में मूलराज सोलंकी (प्रथम) ने सोलंकी (चालुक्य) वंश की स्थापना की और अणहिलवाड़ पाटन को अपनी राजधानी बनाया। यह वह दौर था जब पश्चिमी तटों पर अरबों के समुद्री हमले जारी थे और उत्तर-पश्चिम से इस्लामी शक्तियाँ धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थीं। हालाँकि, मूलराज ने सोमनाथ को लेकर कोई सीधी लड़ाई लड़ी हो, इसका कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है, लेकिन ऐतिहासिक तथ्य यह है कि उन्होंने गुजरात-सौराष्ट्र में एक संगठित हिंदू सत्ता की स्थापना की। यही सत्ता आगे चलकर सोमनाथ की रक्षा के लिए एक ढाल बनी। मूलराज का योगदान केवल तलवार चलाने तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने वह राजनीतिक स्थिरता प्रदान की, जिसके बिना किसी भी मंदिर की रक्षा कर पाना संभव नहीं था।

भीमदेव प्रथम: गजनी के हमले के बाद का संघर्ष

सन 1026 में महमूद गजनी ने सोमनाथ पर आक्रमण किया था। यह हमला न केवल लूटपाट के उद्देश्य से किया गया था, बल्कि इसका मुख्य लक्ष्य एक महान धार्मिक प्रतीक को नष्ट करना था। इस आक्रमण के बाद पूरे गुजरात में भय और अस्थिरता का माहौल बन गया था। ऐसे कठिन समय में भीमदेव प्रथम ने सत्ता संभाली। उन्होंने सौराष्ट्र में प्रशासनिक नियंत्रण को फिर से मजबूत किया और हिंदू अधिकारों की पुनर्स्थापना की। भीमदेव का ऐतिहासिक महत्व इसलिए है क्योंकि उन्होंने दुनिया को यह संदेश दिया कि केवल एक आक्रमण से राज्य समाप्त नहीं होता। उनके शासनकाल में सोमनाथ का पूरा क्षेत्र फिर से हिंदू नियंत्रण में आ गया और मंदिर का भव्य पुनर्निर्माण भी हुआ।

1026 ईस्वी के विनाश के बाद भीमदेव प्रथम द्वारा करवाया गया यह पुनर्निर्माण सोमनाथ के इतिहास में पहला बड़ा राजनैतिक पुनरुद्धार माना जाता है। उनका यह कार्य इस बात का जीवंत प्रमाण है कि कैसे एक बड़े राजनैतिक आघात के बावजूद सांस्कृतिक संकल्प को फिर से जीवित किया जा सकता है।

सिद्धराज जयसिंह: सैन्य शक्ति से सांस्कृतिक सुरक्षा

सोलंकी वंश के सबसे शक्तिशाली शासकों में जयसिंह सिद्धराज का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। उनका शासनकाल वह समय था जब उत्तर भारत में तुर्की शक्तियों का प्रभाव बढ़ रहा था। जयसिंह सिद्धराज ने न केवल सीमाओं की रक्षा की, बल्कि सौराष्ट्र और सोमनाथ क्षेत्र में राजनैतिक संरक्षण की एक मजबूत व्यवस्था खड़ी की। उनके दौर में मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं थे, बल्कि राज्य की प्रतिष्ठा का केंद्र थे। सोमनाथ जैसे तीर्थ पर हमला पूरे राज्य पर हमला माना जाता था और इसी विचारधारा ने आगे चलकर गुजरात को लंबे समय तक सुरक्षित रखा।

सोलंकी वंश के महान शासक जयसिंह सिद्धराज ने गुजरात और सौराष्ट्र को सैन्य दृष्टि से बेहद सशक्त बनाया था। उनके शासनकाल में मंदिरों और तीर्थस्थानों को राज्य का पूर्ण संरक्षण प्राप्त हुआ। सोमनाथ जैसे पवित्र स्थान उनके समय में राजनैतिक सुरक्षा और सांस्कृतिक सम्मान के प्रतीक बने रहे। उन्होंने सोमनाथ में समय-समय पर निर्माण और जीर्णोद्धार के कार्य भी करवाए थे।

रानी नायकी देवी: कयादरा के मैदान में थाम ली आक्रांता की सेना

12वीं सदी में गुजरात की धरती पर एक निर्णायक मोड़ तब आया, जब रानी नायकी देवी ने 1178 ईस्वी में ‘कयादरा के युद्ध’ में मोहम्मद गोरी को करारी शिकस्त दी। यह केवल एक सैन्य जीत नहीं थी, बल्कि इस विजय ने पश्चिमी भारत और प्रभास-सोमनाथ क्षेत्र को एक बहुत बड़े विनाश से बचा लिया था। उस समय के और बाद के इतिहासकार इस जीत को सोमनाथ की रक्षा के लिए एक निर्णायक मोड़ मानते हैं।

यह महज एक युद्ध नहीं था, बल्कि सोमनाथ और गुजरात की अस्मिता की रक्षा थी। एक महिला शासक का इस तरह कट्टर आक्रमण के सामने डटकर खड़े होना भारतीय इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय है। रानी नायकी देवी की यह वीरता इस बात का प्रमाण है कि आस्था और स्वाभिमान की लड़ाई में लिंग या पद की कोई सीमा नहीं होती। जब धर्म और संस्कृति पर संकट आता है, तो हर व्यक्ति योद्धा बन सकता है। यह घटना आज भी गुजरात और भारत की ऐतिहासिक गौरवगाथा के एक अटूट हिस्से के रूप में जीवित है।

राजा कान्हड़ देव: स्थानीय वीरता की ढाल

बड़े साम्राज्यों के बीच सोमनाथ की रक्षा में स्थानीय शासकों की भूमिका भी बेहद निर्णायक रही है। जन-इतिहास और लोक कथाओं के अनुसार, राजा कान्हड़ देव ने सौराष्ट्र में स्थानीय सैन्य शक्ति को संगठित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया था। समुद्री तटों और जमीनी रास्तों से होने वाले अचानक हमलों के खिलाफ ये स्थानीय सेनाएँ ही पहली ढाल बनकर खड़ी होती थीं। हालांकि इतिहास की किताबों में उनका वर्णन कम मिलता है, लेकिन सोमनाथ जैसे पवित्र स्थान इन स्थानीय योद्धाओं के बिना कभी सुरक्षित नहीं रह पाते।

इसी कालखंड के दौरान राजस्थान और गुजरात के सीमावर्ती इलाकों में उनका संघर्ष विशेष रूप से उल्लेखनीय है। तुर्की आक्रमणों और गोरी समर्थक इस्लामी हमलावरों के विरुद्ध उनके सैन्य अभियानों ने सोमनाथ की ओर जाने वाले रास्तों और मंदिर परिसर की सुरक्षा में बहुत बड़ा योगदान दिया था।

राजा कान्हड़ देव की स्थानीय शौर्य और संगठित प्रतिरोध की यह भूमिका दर्शाती है कि बड़े साम्राज्यों के बीच भी स्थानीय शासकों की तलवार और उनकी अटूट आस्था ही मंदिर और संस्कृति को जीवित रख सकती है। उनके प्रयासों ने सोमनाथ की निरंतर चली आ रही परंपरा को मजबूती प्रदान की और भविष्य के पुनर्निर्माण के लिए एक ठोस आधार तैयार किया।

राजा भोज परमार: सांस्कृतिक पुनरुत्थान के महानायक

मालवा के परमार शासक राजा भोज का योगदान केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने सभ्यता को फिर से जीवित करने में बड़ी भूमिका निभाई। गजनी के आक्रमणों के बाद जब हिंदू समाज गहरे मानसिक आघात में था, तब राजा भोज ने शैव-परंपरा, मंदिर संस्कृति और शास्त्रीय ज्ञान को राजनैतिक संरक्षण दिया। उनका यह कदम केवल धार्मिक नहीं, बल्कि एक कड़ा राजनैतिक संदेश था कि सनातन सभ्यता को कभी मिटाया नहीं जा सकता। सोमनाथ जैसे पवित्र स्थलों का पुनरुद्धार इसी वैचारिक और मानसिक शक्ति के कारण संभव हो पाया।

इतिहास और साहित्य के विभिन्न स्रोतों में राजा भोज परमार और महाराजा विक्रमादित्य का नाम सोमनाथ के जीर्णोद्धार के साथ सम्मान से जोड़ा जाता है। शैव परंपरा और लोक-स्मृति में उनका स्थान बेहद ऊँचा है। सोमनाथ मंदिर की रक्षा और पुनर्स्थापना केवल सेना के बल पर नहीं हुई, बल्कि इसके पीछे राजनैतिक दूरदर्शिता, सांस्कृतिक सुरक्षा और ज्ञान का प्रसार भी शामिल था। इस महान शासक का योगदान आज भी लोककथाओं में जीवित है, जो सोमनाथ की अटूट परंपरा को और भी सशक्त बनाता है।

राजा महिपाल देव: सोमनाथ के रक्षक और कुशल प्रशासक

परमार वंश के राजा महिपाल देव उन शासकों की श्रेणी में आते हैं, जिनका कार्य केवल युद्ध लड़ने तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने सुरक्षा और प्रशासन को भी नई मजबूती दी। पश्चिमी भारत के धार्मिक केंद्रों की सुरक्षा करना, तीर्थस्थानों के लिए संसाधन जुटाना और अस्थिरता के दौर में शांति बनाए रखना। ये वो कार्य थे जिन्होंने लगातार होने वाले आक्रमणों के बीच भी भारतीय सभ्यता को जीवित रखा। राजा महिपाल देव इसी अटूट निरंतरता के प्रतीक हैं।

14वीं-15वीं शताब्दी के दौरान राजा महिपाल प्रभास क्षेत्र (सोमनाथ) की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध रहे। कहा जाता है कि उन्होंने गुजरात के इस्लामी सूबेदार जफर खान की सेना को कई बार धूल चटाई और सोमनाथ की सुरक्षा सुनिश्चित की। उन्होंने सोमनाथ क्षेत्र में बड़े सैन्य अभियान चलाए। लोक परंपराओं के अनुसार, राजा महिपाल ने सोमनाथ और उसके आसपास के स्थानीय लोगों को युद्धकला में प्रशिक्षित किया था, ताकि मंदिर की रक्षा हर हाल में की जा सके।

कुमारपाल: सभ्यता की रक्षा का साझा संकल्प

राजा कुमारपाल हालाँकि जैन परंपरा के अनुयायी थे, फिर भी उन्होंने सोमनाथ सहित तमाम हिंदू तीर्थों की रक्षा के लिए भरपूर प्रशासनिक सहयोग दिया। यह इस बात का जीता-जागता सबूत है कि सोमनाथ की रक्षा करना केवल किसी एक संप्रदाय का विषय नहीं, बल्कि पूरी भारतीय सभ्यता का प्रश्न था। आक्रमणकारी भले ही किसी खास मजहब के जुनून से भरे थे, लेकिन उनका प्रतिरोध करने वाला स्वर संपूर्ण भारतीय सभ्यता का था। 12वीं सदी में कुमारपाल ने मंदिर के संरक्षण और धार्मिक व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी स्वीकार की थी। उनके शासनकाल में सोमनाथ की तीर्थ-परंपरा को एक बार फिर स्थिरता मिली। कुमारपाल ने न केवल सोमनाथ को सुरक्षा प्रदान की, बल्कि इसके निर्माण कार्य में भी महत्वपूर्ण मदद दी थी।

मराठा साम्राज्य: स्वतंत्रता की नई लहर

18वीं शताब्दी में मराठा साम्राज्य ने सौराष्ट्र से विदेशी इस्लामी सत्ता को उखाड़ फेंका। हालाँकि यह सीधे तौर पर केवल मंदिर के लिए युद्ध नहीं था, बल्कि यह एक राजनैतिक मुक्ति का संघर्ष था, जिसके बिना मंदिर का पुनरुद्धार संभव ही नहीं था। मराठों ने गुजरात में ऐसा सुरक्षित वातावरण तैयार किया जिससे सोमनाथ फिर से अपनी पहचान पा सके। सौराष्ट्र-गुजरात को अराजकता के दौर से बाहर निकालने और धार्मिक स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में मराठा सैन्य अभियानों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही।

रानी अहिल्याबाई होलकर: आस्था का पुनरुद्धार

सन 1783 में रानी अहिल्याबाई होलकर ने सोमनाथ का पुनर्निर्माण करवाया। उनका यह कार्य केवल एक भवन का निर्माण नहीं था, बल्कि सदियों से हुए अपमान का एक गौरवशाली जवाब था। उन्होंने दुनिया को दिखाया कि मंदिर के ढाँचे को तोड़ा जा सकता है, लेकिन लोगों की आस्था को नहीं। तत्कालीन राजनैतिक परिस्थितियों को देखते हुए, रानी अहिल्याबाई ने मूल स्थान से थोड़ी दूर पर एक नया मंदिर बनवाया, वहाँ शिवलिंग की प्राण-प्रतिष्ठा की और पूजा की परंपरा को फिर से जीवित किया। आधुनिक सोमनाथ मंदिर के निर्माण से पहले, आस्था की ज्योति को जलाए रखने में यह सबसे महत्वपूर्ण अध्याय था। माना जाता है कि भगवान सोमनाथ ने स्वयं रानी अहिल्याबाई को स्वप्न में दर्शन दिए थे और उन्हें प्रभास क्षेत्र में मंदिर के पुनर्निर्माण की प्रेरणा दी थी।

आधुनिक भारत में राष्ट्रीय पुनर्जागरण: सरदार पटेल से पीएम मोदी तक

आजादी के बाद सोमनाथ का पुनर्निर्माण केवल एक धार्मिक विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रश्न बन गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू की आपत्तियों के बावजूद, सरदार वल्लभभाई पटेल के दृढ़ संकल्प और उनकी पहल से भव्य सोमनाथ मंदिर का निर्माण हुआ। स्वतंत्र भारत के किसी नेता का यह पहला ऐसा बड़ा निर्णय था, जिसने यह दिखाया कि आजाद भारत अपनी सांस्कृतिक स्मृतियों को संकोच के साथ नहीं, बल्कि संकल्प के साथ देखता है।

इस प्रयास को वैचारिक और प्रशासनिक नेतृत्व कन्हैयालाल माणिकलाल (केएम) मुंशी ने दिया और साल 1951 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर का उद्घाटन किया। आज के भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सोमनाथ केवल अतीत की एक याद नहीं है, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक विरासत के रूप में चमक रहा है। मंदिर के इतिहास, संरक्षण और गौरव पर यह गर्व संकेत देता है कि सोमनाथ की गाथा आज भी राष्ट्र की चेतना में धड़क रही है।

सोमनाथ का यह इतिहास गवाह है कि मजहबी कट्टरता ने बार-बार हमला किया, लेकिन हिंदू शासक और योद्धा हर बार डटकर खड़े रहे, कभी युद्ध के मैदान में तो कभी मंदिर के पुनर्निर्माण में। यही कारण है कि सोमनाथ आज भी अडिग खड़ा है, केवल एक मंदिर के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की कभी न हार मानने वाली जिजीविषा (जीने की इच्छा) के प्रतीक के रूप में। यह लेख उन सभी वीरों के स्मरण का एक प्रयास है, जिन्होंने अपनी तलवार, संकल्प और परिश्रम से इस महान परंपरा को जीवित रखा है।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती के लेखक भार्गव राज्यगुरु ने लिखी है। गुजराती का लेख पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

बांग्लादेश-चीन पर एकसाथ नजर, FIC-NWJFAC की तैनाती और समुद्री घुसपैठ पर रोक: क्यों भारत के लिए अहम है हल्दिया में बनने वाला नौसेना का नया ‘बेस’

भारतीय नौसेना पूर्वी समुद्री मोर्चे पर अपनी मौजूदगी को और मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम उठाने जा रही है। पश्चिम बंगाल के हल्दिया में एक नया नौसैनिक अड्डा बनाया जाएगा। इसका मकदस उत्तरी बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में भारत की समुद्री निगरानी और सुरक्षा क्षमता को बढ़ाना है। यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब इस इलाके में चीन की नौसैनिक गतिविधियाँ लगातार बढ़ रही हैं और बांग्लादेश व पाकिस्तान से जुड़े समीकरण भी तेजी से बदल रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हल्दिया में बनने वाला यह ठिकाना पूर्ण विकसित नौसैनिक बेस नहीं होगा बल्कि इसे नौसेना की एक ‘डिटैचमेंट’ के रूप में विकसित किया जाएगा। यहाँ मुख्य रूप से छोटे युद्धपोतों की तैनाती की जाएगी। ये युद्धपोत तटीय निगरानी, गश्ती और तुरंत प्रतिक्रिया जैसे अभियानों में अहम भूमिका निभाएँगे। ऐसे जहाज उथले पानी में भी प्रभावी ढंग से काम कर सकते हैं और इससे बंगाल की खाड़ी के उत्तरी हिस्से में भारत की ऑपरेशनल पकड़ मजबूत होगी।

क्यों अहम है हल्दिया में नौसेना का अड्डा?

हल्दिया में प्रस्तावित नौसैनिक बेस को अगर रणनीतिक नजरिए से देखा जाए, तो यह सिर्फ एक नया सैन्य ठिकाना नहीं बल्कि भारत की पूर्वी समुद्री सुरक्षा को तेज, चुस्त और ज्यादा प्रभावी बनाने की योजना का अहम हिस्सा है।

सबसे पहले स्थान को समझना जरूरी है। हल्दिया, कोलकाता से लगभग 100 किलोमीटर दूर हुगली नदी के किनारे स्थित है और यहाँ से बंगाल की खाड़ी तक सीधी पहुँच मिलती है। अभी तक भारतीय नौसेना के जहाजों को कोलकाता से निकलकर हुगली नदी के लंबे और समय लेने वाले रास्ते से गुजरना पड़ता है। नया बेस बनने के बाद यह लंबा सफर काफी हद तक बच जाएगा और जहाज बहुत तेजी से खुले समुद्र यानी बंगाल की खाड़ी तक पहुँच सकेंगे। यह समय की बचत युद्ध या किसी आपात स्थिति में बेहद अहम होती है।

रणनीतिक दृष्टि से भी हल्दिया का स्थान बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह क्षेत्र न केवल भारत के लिए व्यापारिक और औद्योगिक रूप से अहम है बल्कि समुद्री मार्गों की सुरक्षा के लिहाज से भी इसकी भूमिका बढ़ जाती है। बंगाल की खाड़ी में चीन की बढ़ती मौजूदगी और उसकी तथाकथित ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति के बीच भारत अपनी समुद्री सीमाओं और हितों की रक्षा के लिए सक्रिय कदम उठा रहा है। हल्दिया में नौसेना की मौजूदगी से इस पूरे क्षेत्र पर निगरानी और नियंत्रण करना भारत के लिए आसान हो जाएगा।

चीन और बांग्लादेश के रिश्ते पहले से ही काफी मजबूत रहे हैं और यह सिलसिला पिछले दस साल से ज्यादा समय से चल रहा है। चीन ने बांग्लादेश नौसेना को दो पनडुब्बियाँ सौंपी हैं और चटगाँव के पास पनडुब्बियों के लिए एक नौसैनिक अड्डा भी बना रहा है। पहले इस अड्डे का नाम बीएनएस शेख हसीना रखा गया था लेकिन अब उसका नाम बदल दिया गया है।

बांग्लादेश में शेख हसीना के सत्ता से जाने के बाद हालात लगातार बिगड़ते चले गए हैं। मोहम्मद युनूस के नेतृत्व में सत्ता चल तो रही है लेकिन उसकी असल लगाम कट्टरपंथियों के हाथ में आ गई है। भारत के साथ संबंध लगातार खराब होते जा रहे हैं और पाकिस्तान के सैन्य से लेकर राजनीतिक नेतृत्व तक की नजदीकियाँ बांग्लादेश से बढ़ रही हैं। ऐसे में बांग्लादेश पर नजर रखना भारत के लिहाज के लिए अहम होता जा रहा है।

रक्षा सूत्रों के मुताबिक, इस नौसैनिक अड्डे के बनने के बाद इलाके में जो भी समुद्री हलचल होगी उस पर भारतीय नौसेना की सीधी निगाह रहेगी। पिछले साल नवंबर में पाकिस्तान की नौसेना ने अपना युद्धपोत पीएनएस सैफ बांग्लादेश भेजा था। यह चीन में बना गाइडेड मिसाइल फ्रिगेट है। इस दौरे को काफी अहम माना गया। नवंबर में दोनों देशों की नौसेनाओं के बीच दो-स्टार स्तर की स्टाफ बातचीत भी हुई जो अपने आप में पहली बार था। भारत को आशंका है कि आने वाले समय में पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच रक्षा सहयोग और बढ़ सकता है।

क्या होगी इस नेवल बेस की क्षमता?

इस बेस के लिए हल्दिया डॉक कॉम्प्लेक्स का इस्तेमाल किया जाएगा, जो साल 1970 से काम कर रहा है। इसका मतलब यह है कि नौसेना को बिल्कुल नए सिरे से पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। शुरुआत में एक विशेष जेट्टी बनाई जाएगी, जहाँ नौसैनिक जहाजों को बाँधा जा सकेगा और साथ में शोर सपोर्ट सुविधाएँ विकसित की जाएँगी यानी जहाजों के रखरखाव, ईंधन, स्टाफ और ऑपरेशंस से जुड़ी जरूरी व्यवस्थाएँ। मौजूदा बंदरगाह ढाँचे का फायदा उठाने से बेस जल्दी तैयार हो सकेगा और लागत भी कम रहेगी।

यह भी साफ किया गया है कि हल्दिया कोई बड़ा नेवल कमांड नहीं होगा। इसे एक छोटे लेकिन बेहद अहम नौसैनिक डिटैचमेंट यानी चौकी के रूप में विकसित किया जा रहा है। यहाँ करीब 100 अधिकारी और नाविक तैनात रहेंगे। संख्या भले ही कम लगे लेकिन इस तरह के बेस का मकसद भारी-भरकम तैनाती नहीं बल्कि तेजी से प्रतिक्रिया देने की क्षमता होता है।

अब बात करते हैं उन जहाजों की, जिनके लिए यह बेस खास तौर पर तैयार किया जा रहा है। हल्दिया बेस मुख्य रूप से छोटे, तेज और अत्यधिक फुर्तीले युद्धपोतों का अड्डा होगा।

पहली श्रेणी है फास्ट इंटरसेप्टर क्राफ्ट्स यानी FICs। ये छोटे आकार के लेकिन बहुत तेज जहाज होते हैं, जिनकी रफ्तार 45 नॉट्स तक हो सकती है। वजन करीब 100 टन के आसपास होता है और इन्हें चलाने के लिए 10 से 12 लोगों का क्रू काफी होता है। ये जहाज मशीन गन से लैस रहते हैं और इनका मुख्य काम तटीय इलाकों में गश्त, संदिग्ध गतिविधियों पर तुरंत कार्रवाई, घुसपैठ रोकना और बंदरगाहों की सुरक्षा करना होता है। समुद्र में किसी छोटे खतरे या तेज मूवमेंट के खिलाफ ये सबसे पहले प्रतिक्रिया देने वाले प्लेटफॉर्म होते हैं।

दूसरी और ज्यादा उन्नत श्रेणी है न्यू वॉटर जेट फास्ट अटैक क्राफ्ट्स यानी NWJFACs। ये जहाज आकार में FICs से बड़े होते हैं, लगभग 300 टन के और इनकी स्पीड भी 40 से 45 नॉट्स के बीच होती है। इनकी सबसे बड़ी खासियत इनका हथियार सिस्टम है। इन्हें CRN-91 गन से लैस किया जाएगा और भविष्य में इनमें नागास्त्र जैसे लूटरिंग मुनिशन भी तैनात किए जा सकते हैं। लूटरिंग मुनिशन को आम भाषा में ड्रोन जैसी स्मार्ट मिसाइलें कहा जा सकता है, जो लक्ष्य की पहचान करती हैं और फिर सटीक हमला करती हैं। इस वजह से NWJFACs सिर्फ निगरानी के लिए नहीं बल्कि सटीक स्ट्राइक और विशेष सैन्य अभियानों के लिए भी बेहद उपयोगी होंगे।

इन जहाजों की अहमियत इस बात से भी समझी जा सकती है कि 2024 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में डिफेंस एक्विजिशन काउंसिल ने 120 फास्ट इंटरसेप्टर क्राफ्ट्स और 31 न्यू वॉटर जेट फास्ट अटैक क्राफ्ट्स की खरीद को मंजूरी दी थी। यह फैसला साफ संकेत देता है कि भारत अपनी तटीय सुरक्षा और शॉर्ट-रेंज मैरीटाइम ऑपरेशंस को प्राथमिकता दे रहा है।

इन सभी जहाजों का इस्तेमाल तटीय सुरक्षा, समुद्री घुसपैठ रोकने, बंदरगाहों की रक्षा और विशेष सैन्य अभियानों में किया जाएगा। हल्दिया जैसे बेस से इनकी तैनाती का मतलब यह है कि बंगाल की खाड़ी में किसी भी संदिग्ध गतिविधि, चाहे वह तस्करी हो, आतंकवादी घुसपैठ हो या किसी विदेशी नौसैनिक मूवमेंट की निगरानी, उस पर भारतीय नौसेना बेहद कम समय में प्रतिक्रिया दे सकेगी।

कुल मिलाकर हल्दिया का यह प्रस्तावित नौसैनिक बेस आकार में छोटा जरूर होगा लेकिन इसकी रणनीतिक भूमिका बड़ी है। यह भारत की पूर्वी समुद्री सीमा पर निगरानी को मजबूत करेगा, प्रतिक्रिया समय घटाएगा और बंगाल की खाड़ी में बदलते सुरक्षा समीकरणों के बीच भारत की पकड़ को और मजबूत बनाएगा।

याकूब मेमन से उमर खालिद तक: जब ‘न्याय’ इस्लामी-वाम गठजोड़ के मजहबी नैरेटिव को चुभने लगता है

धर्मेण राज्यं धार्यते- अर्थात धर्म (न्याय) से ही राज्य/शासन संचालित होता है। म​हाभारत में विशेषकर शांति पर्व और अनुशासन पर्व में यह भाव बार-बार आता है। मनुस्मृति के राजधर्म में भी यही भाव है। कौटिल्य ने राज्य के संचालन और न्याय के संदर्भ में जो सिद्धांत दिए हैं, वहाँ भी यही भाव प्रबल है।

पितामह भीष्म शांतिपर्व में युधिष्ठिर से कहते भी हैं कि राजा का पहला कर्तव्य न्याय है और न्याय का मूल आधार धर्म है, न कि लोकभावना। कुल मिलाकर भारतीय परंपरा में यह भाव सर्वदा से रहा है कि राज्य भावना से नहीं, धर्म से चलता है, और धर्म का अर्थ है- न्याय, नियम, मर्यादा।

आधुनिक व्यवस्था में भी यही भाव न्याय व्यवस्था का आधार है। भारतीय न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वह न तो किसी व्यक्ति से संचालित है और न भीड़ से निर्देशित। किंतु एक संगठित वैचारिक गिरोह ने बार-बार न्याय व्यवस्था को उस भीड़तंत्र में खींच लाने का प्रयास किया है, जिसमें कानून के बदले संवेदना, साक्ष्य के बदले मजहबी पहचान और न्याय के बदले नैरेटिव निर्णायक बन जाए।

जब-जब किसी इस्लामी आतंकी, वामपंथी विचारक या तथाकथित ‘अल्पसंख्यक प्रतीक’ को मनचाहा निर्णय नहीं मिलता है, तब-तब न्याय व्यवस्था पर दबाव बनाने के लिए इस्लामी-वाम गठजोड़ की यह साजिश प्रबल हो जाती है। संविधान खतरे में है, मानवाधिकार, लोकतंत्र मर रहा है, न्यायपालिका फासीवाद के आगे झुक गई- जैसे शोर सुनाई पड़ने लगते हैं।

यह ऐसा पैटर्न है जो पिछले कुछ वर्षों में याकूब मेमन से लेकर उमर खालिद तक बार-बार दोहराया गया है। मेनस्ट्रीम मीडिया से लेकर लेफ्ट-लिबरल विचारकों और तुष्टिकरण की राजनीति करने वालों तक, सब एक सुर में न्यायपालिका को कठघरे में खड़ा करने लगते हैं। सवाल यह नहीं होता कि कानून क्या कहता है, सवाल यह बना दिया जाता है कि ‘मजहबी पहचान वाली भीड़ की भावना’ क्या चाहती है।

उमर खालिद-शरजील इमाम: मजहबी पहचान ही सब कुछ

उमर खालिद और शरजील इमाम, दोनों पर देश को तोड़ने वाले भाषणों, हिंसा भड़काने और राष्ट्रविरोधी साजिशों के गंभीर आरोप हैं। अदालतें साक्ष्य देख रही हैं, प्रक्रिया का पालन कर रही हैं।

लेकिन वाम-लिबरल जमात के लिए यह अस्वीकार्य है। उनके लिए जमानत कानूनी राहत नहीं, वैचारिक हक है। जब जमानत नहीं मिलती तो कोर्ट ‘असंवेदनशील’ हो जाती है।

इस पूरे विमर्श में इस बुनियादी सत्य को परे रख दिया जाता है कि कानून भावनाओं से नहीं चलता। जमानत का प्रश्न आरोपों की गंभीरता, साक्ष्यों, आरोपित की भूमिका और जाँच की स्थिति से तय होता है। फिर भी, हर बार जब ऐसे मामलों में अदालतें कानून के अनुरूप निर्णय देती हैं, तो न्याय ‘असंवेदनशील’ है का एक संगठित नैरेटिव शुरू हो जाता है।

यह वही ‘संवेदनशीलता’ है जो 2020 के दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों के पीड़ितों के लिए नहीं दिखती। वही मीडिया जो आज जमानत न मिलने पर करुणा बरसा रहा है, उसने तब हिंसा, आगजनी और हत्या के पीड़ितों के लिए उतनी ही आक्रामक आवाज नहीं उठाई।

क्या संवेदनशीलता की परिभाषा मजहबी पहचान के आधार पर तय होगी?

कुलदीप सेंगर की जमानत पर हायतौबा

दिलचस्प यह है कि उमर खालिद और शरजील इमाम को कानूनी राहत नहीं मिलने पर कंद्रन करने वाले इसी गैंग ने कुलदीप सेंगर को दिल्ली हाई कोर्ट से जमानत मिलने पर हायतौबा मचा दी थी। तब भी समस्या जमानत की कानूनी शर्तें नहीं थीं। समस्या यह थी कि अदालत ने भीड़ की माँग के अनुरूप निर्णय नहीं दिया। संदेश साफ था- या तो हमारी नैतिकता के अनुसार फैसला करो या ‘संवेदनहीन’ कहलाओ।

यह दोहरा मानदंड संयोग नहीं है। एक ओर, यदि आरोपित किसी खास विचार या मजहबी पहचान से जुड़ा हो, तो जमानत ‘मानवाधिकार’ बन जाती है। दूसरी ओर, यदि आरोपित उस पहचान के बाहर हो, तो वही जमानत ‘न्याय का अपमान’ घोषित कर दी जाती है। यह न्याय नहीं, पहचान आधारित नैतिकता है। आरोपित की पहचान (हिंदू) के कारण न्याय (जमानत के कानूनी अधिकार) को संदिग्ध रूप में प्रचारित किया गया।

याकूब मेमन: आतंक नहीं मजहबी पहचान महत्वपूर्ण

30 जुलाई 2015 की वह रात भारतीय न्यायिक इतिहास में दर्ज है। मुंबई बम धमाकों का दोषी आतंकी याकूब मेमन। वर्षों की सुनवाई, अपीलें, पुनर्विचार- सब कुछ हो चुका था। फिर भी सुबह-सुबह सुप्रीम कोर्ट को खोलने की हड़बड़ी, मानो देश किसी ‘न्यायिक आपातकाल’ से गुजर रहा हो।

कौन पहुँचा था? वही गिरोह- वही वकील, वही एक्टिविस्ट, वही टीवी चेहरे। भाव वही- आतंकी (मजहबी पहचान) के लिए दया, पीड़ितों के लिए मौन।

यहाँ सवाल फाँसी का नहीं था। सवाल यह था कि क्या आतंक की सजा भी पहचान देखकर तय होगी?

क्या ‘मुस्लिम होना’ कानून से ऊपर होने का प्रमाण-पत्र है?

कार्तिगई दीपम: हिंदू आस्था को वैध ठहराना अपराध

तमिलनाडु के कार्तिगई दीपम उत्सव पर निर्णय देने वाले जस्टिस स्वामीनाथन के विरुद्ध महाभियोग तक की बात चली। कारण? फैसला हिंदू परंपरा के पक्ष में था।

संदेश स्पष्ट था- यदि आप अदालत में बैठकर हिंदू आस्था को वैध ठहराएँगे तो आपकी कुर्सी भी अस्थिर की जाएगी।

राम मंदिर, जस्टिस गोगोई और जस्टिस चंद्रचूड़

राम मंदिर पर ऐतिहासिक निर्णय देने के बाद जस्टिस रंजन गोगोई को निशाने पर रखा गया। हर निर्णय, हर नियुक्ति को उसी फैसले से जोड़कर देखा गया।

इतना ही नहीं, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ गणेश पूजा की एक तस्वीर सामने आने के बाद यह माहौल बनाया गया कि न्यायाधीश का आस्था से जुड़ना भी अपराध है। न्यायपालिका ने सरकार के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है।

क्या न्यायाधीश केवल वही होंगे जो ईश्वरविहीन, परंपराविहीन और जड़ों से कटे होंगे?

मुस्लिम आरोपित और ‘संवेदनशीलता’ का कवच

भारतीय न्यायपालिका पर दबाव बनाने का यह इतिहास नया नहीं है। इस्लामी आतंकवाद से जुड़े अनेक मामलों में, चाहे वे प्रतिबंधित संगठनों से जुड़े आरोपित हों या दंगों और हिंसा के प्रकरण- हर बार एक तयशुदा स्क्रिप्ट सक्रिय हो जाती है। गिरफ्तारी ‘उत्पीड़न’ कहलाती है, चार्जशीट ‘राजनीतिक बदला’ और सुनवाई ‘इस्लामोफोबिया’।

ये वही लोग हैं जिन्होंने वर्षों तक यह स्थापित करने की कोशिश की कि यदि आरोपित मुस्लिम है, तो कानून को अतिरिक्त ‘संवेदनशील’ होना चाहिए। मानो कानून की आँखों पर भी मजहबी चश्मा चढ़ा दिया जाए। यह दबाव केवल मीडिया तक सीमित नहीं रहता। यह अदालतों के वातावरण, सार्वजनिक बहस और प्रशासनिक निर्णयों तक पहुँचता है।

‘अल्पसंख्यक’ राजनीति का दबाव

यह छिपा तथ्य नहीं है कि कुछ वैचारिक समूह न्यायपालिका और प्रशासन पर नैरेटिव प्रेशर बनाते रहे हैं। ‘अल्पसंख्यक’ शब्द को एक ढाल की तरह इस्तेमाल कर हर कानूनी प्रक्रिया को संदिग्ध ठहराने की कोशिश होती है। जब आरोपित एक खास वैचारिक-मजहबी पहचान से आता है, तो अपराध ‘राजनीतिक असहमति’ में बदल दिया जाता है।

यही संस्थागत दबाव है। अदालत से अपेक्षा की जाती है कि वह कानून नहीं, भीड़ की मजहबी भावना देखे। साक्ष्य नहीं, सोशल मीडिया ट्रेंड गिने। निर्णय नहीं दे, भावनाओं को साधे।

यह न्याय नहीं, तुष्टिकरण है।

पीड़ितों पर मौन, आरोपित की ‘भावना’ पर प्राइम टाइम

इस तुष्टिकरण को मेनस्ट्रीम मीडिया भी खाद-पानी देने का काम करता है। उसका एक बड़ा हिस्सा प्रश्न पूछने की जगह निर्णय देता है। अदालत के आदेशों को संदर्भ से काटकर पेश करता है। न्यायाधीशों पर नैतिक दबाव बनाता है। यह पत्रकारिता नहीं, वैचारिक सक्रियता है। यह वही मीडिया है जो पीड़ितों की पीड़ा पर अक्सर मौन रहता है, लेकिन आरोपित की ‘भावना’ पर घंटों प्राइम टाइम चलाता है।

भीड़ का नैरेटिव बनाम न्याय की प्रक्रिया

भीड़ को त्वरित परिणाम चाहिए। कानून समय लेता है। भीड़ नारे चाहती है। कानून दस्तावेज। भीड़ भावनात्मक संतुष्टि खोजती है। कानून सत्य। यही कारण है कि जब अदालतें भीड़ के अनुरूप नहीं चलतीं, तो उन्हें ‘लोकतंत्र विरोधी’ ठहराया जाता है।

उमर खालिद और शरजील इमाम के मामलों में अदालतों ने यही किया। भावना के शोर से अलग रहकर कानून का पालन। यही बात इस्लामी-वाम गठजोड़ को असहज करती है।

वैदिक दृष्टि: ‘भावना’ से नहीं न्याय

भारतीय वैदिक परंपरा में न्याय को कभी भावना के अधीन नहीं रखा गया। न धर्मात् परो धर्मः, अर्थात धर्म (न्याय) से ऊपर कुछ नहीं है। मनुस्मृति कहती है- जब न्याय नष्ट होता है, तब प्रजा नष्ट होती है। न राजा, न शत्रु, कोई नहीं बचता।

यही कारण है कि भारतीय परंपरा में न्यायाधीश को दबाव से मुक्त, भय से परे और आस्था विहीन नहीं, बल्कि धर्म (न्याय) निष्ठ माना गया है। न्याय का अर्थ करुणा नहीं, धर्म (न्याय) सम्मत निर्णय है। करुणा व्यक्ति के लिए हो सकती है, न्याय व्यवस्था के लिए नहीं। यही मूल अंतर है, जिसे आज के विमर्श में जानबूझकर मिटाया जा रहा है।

जो समाज न्याय को भावनात्मक ब्लैकमेल के हवाले कर देता है, वह अंततः पीड़ितों के साथ विश्वासघात करता है। वैदिक परंपरा ने हमें सिखाया है कि न्याय का धर्म दबाव/पहचान से ऊपर होता है।

न्याय को बचाने के लिए, न्याय को भावना से मुक्त रखना ही होगा। जब अदालतें भीड़ से डरने लगेंगी, तो लोकतंत्र नहीं, अराजकता जन्म लेगी।

‘सर तन से जुदा’ वाली वही अराजकता जो हम आज सड़कों पर देखते हैं।

भारत-जर्मनी में ऐतिहासिक सबमरीन डील, ₹72000 करोड़ में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के साथ हिंदुस्तान में ही बनेंगी 6 पनडुब्बियाँ: नेवी को मिलेगी Make In India की पॉवर

भारतीय नौसेना की ताकत में बड़ा इजाफा होने वाला है। भारत और जर्मनी के बीच करीब 8 अरब डॉलर (लगभग 72,000 करोड़ रुपए) की विशाल रक्षा डील अंतिम चरण में है। इस डील के तहत भारत में 6 अत्याधुनिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियाँ बनाई जाएँगी, जिनमें एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) सिस्टम लगा होगा।

यह डील भारत का अब तक का सबसे बड़ा रक्षा समझौता बन सकती है। सूत्रों के अनुसार, जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की 12-13 जनवरी 2026 की भारत यात्रा के दौरान इस पर मुहर लग सकती है।

यह डील प्रोजेक्ट-75I का हिस्सा है, जिसमें जर्मन कंपनी थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS) और भारतीय मझगाँव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) मिलकर काम करेंगी।

सबसे खास बात यह है कि इसमें पूर्ण टेक्नोलॉजी ट्रांसफर होगा, यानी भारत को सबमरीन बनाने की पूरी तकनीक मिलेगी। इससे भारत आत्मनिर्भर बनेगा और भविष्य में खुद ऐसी पनडुब्बियाँ बना सकेगा। कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि शुरुआती 6 के बाद और 3 सबमरीन्स बनाई जा सकती हैं, यानी कुल 9 तक जा सकता है।

यह डील हिंद महासागर में भारत की स्थिति मजबूत करेगी, खासकर चीन की बढ़ती नौसैनिक गतिविधियों के खिलाफ। चीन अपनी पनडुब्बियाँ हिंद महासागर में ला रहा है, जबकि पाकिस्तान भी चीन की मदद से अपना सबमरीन बेड़ा बढ़ा रहा है। ऐसे में ये नई पनडुब्बियाँ भारत को बड़ा रणनीतिक फायदा देंगी।

नई सबमरीन्स की पावर और विशेषताएँ: AIP सिस्टम क्या है और इसके फायदे

इस डील में बनने वाली सबमरीन्स जर्मनी की टाइप-214 या नेक्स्ट जेनरेशन (Type 214NG) क्लास की होंगी। ये करीब 2500 टन वजनी होंगी और आधुनिक हथियारों से लैस होंगी। इनमें टॉरपीडो, मिसाइलें, अत्याधुनिक सेंसर और काउंटरमेजर सिस्टम लगे होंगे। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है AIP सिस्टम।

AIP यानी एयर-इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन एक ऐसी तकनीक है जो सबमरीन को बिना हवा के लंबे समय तक पानी के नीचे चलने देती है। सामान्य डीजल-इलेक्ट्रिक सबमरीन्स को बैटरी चार्ज करने के लिए समय-समय पर पानी की सतह पर आना पड़ता है, जहाँ स्नॉर्कल से हवा लेकर इंजन चलाते हैं। इससे दुश्मन को पता लगने का खतरा रहता है। लेकिन AIP में फ्यूल सेल तकनीक (हाइड्रोजन आधारित) इस्तेमाल होती है, जो बिना हवा के बिजली बनाती है। इससे सबमरीन कई हफ्तों तक पानी के नीचे रह सकती है।

फायदे गिनाएँ तो…

  • स्टेल्थ क्षमता बढ़ती है: कम शोर करती है, दुश्मन के सोनार से बचना आसान।
  • लंबी गश्त: हफ्तों तक छिपकर दुश्मन की निगरानी या हमला कर सकती है।
  • रणनीतिक ताकत: हिंद महासागर जैसे बड़े क्षेत्र में लंबे मिशन संभव।
  • स्वदेशीकरण: शुरुआती सबमरीन्स में 45% और आखिरी में 60% भारतीय पार्ट्स, जो मेक इन इंडिया को बढ़ावा देगा।

ये सबमरीन्स ब्रह्मोस या अग्नि जैसी मिसाइलों से भी लैस हो सकती हैं, जिससे इनकी मारक क्षमता और बढ़ जाएगी। विशेषज्ञों का कहना है कि ये सबमरीन्स भारतीय नौसेना को ‘अजेय चक्रव्यूह’ जैसी ताकत देंगी।

प्रोजेक्ट-75 की लंबी कहानी, 1997 से लटकी है डील

भारतीय नौसेना को नई सबमरीन्स की जरूरत बहुत पुरानी है। 1997 में कैबिनेट कमिटी ऑन सिक्योरिटी ने प्रोजेक्ट-75 को मंजूरी दी थी। उस समय योजना थी कि 24 सबमरीन्स बनाई जाएँगी। लेकिन देरी और तकनीकी मुद्दों से यह प्रोजेक्ट लंबा खिंचता गया।

पहले चरण में फ्रांस की कंपनी DCNS (अब नवाल ग्रुप) से 6 स्कॉर्पीन क्लास सबमरीन्स की डील हुई। ये मझगांव डॉक में बन रही हैं और अब तक कुछ कमीशन हो चुकी हैं। लेकिन इनमें AIP सिस्टम नहीं था (बाद में जोड़ा जा रहा है)। प्रोजेक्ट-75I दूसरा चरण था, जिसमें AIP वाली 6 सबमरीन्स बननी थीं।

यह प्रोजेक्ट कई साल लटका रहा। रूस, फ्रांस, स्पेन, जर्मनी और दक्षिण कोरिया ने बोली लगाई। कई बार टेंडर रद्द हुए, भ्रष्टाचार के आरोप लगे और तकनीकी जरूरतें पूरी नहीं हुईं।

साल 2020 में आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत मोदी सरकार ने विदेशी कंपनियों को भारत में निर्माण और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के लिए मजबूर किया। इसके बाद अब जर्मनी का TKMS चुना गया है, क्योंकि उनका AIP सिस्टम आजमाया हुआ और भरोसेमंद है। स्पेन की S-80 भी दौड़ में थी, लेकिन जर्मनी आगे निकला।

इस डील से फ्रांस को झटका लग सकता है, क्योंकि भारत फ्रांस से 3 और स्कॉर्पीन खरीदने की योजना रद्द कर सकता है। ये डील रूस पर से भी निर्भरता कम करेगी।

भारतीय नौसेना की वर्तमान स्थिति और भविष्य के प्रोजेक्ट्स

फिलहाल भारतीय नौसेना के पास करीब 16-18 सबमरीन्स हैं। इनमें ज्यादातर पुरानी रूसी किलो क्लास और कुछ नई फ्रांसीसी स्कॉर्पीन हैं। लेकिन कई पुरानी हो चुकी हैं और रिटायर हो रही हैं। चीन के पास 60 से ज्यादा सबमरीन्स हैं, जिनमें न्यूक्लियर भी शामिल हैं। इसलिए भारत को जल्दी नई सबमरीन्स चाहिए।

भविष्य के प्रोजेक्ट्स

  • प्रोजेक्ट-75I: यही मुख्य, 6 (संभावित 9) AIP वाली सबमरीन्स।
  • न्यूक्लियर सबमरीन्स: अरिहंत क्लास के तहत S4, S5 जैसे प्रोजेक्ट। S4 2026 तक शामिल हो सकती है। ये बैलिस्टिक मिसाइलें ले जा सकती हैं, जो भारत की न्यूक्लियर डिटरेंस मजबूत करेंगी।
  • स्वदेशी कन्वेंशनल सबमरीन्स: L&T और MDL मिलकर डिजाइन कर रहे हैं, 2026-27 तक डिजाइन पूरा हो सकता है।
  • अतिरिक्त स्कॉर्पीन: DRDO का AIP सिस्टम जोड़कर और बनाई जा सकती हैं।

भारतीय नौसेना के लिए 2026 बड़ा साल होगा। नेवी कई नए जहाज और सबमरीन्स शामिल करेगी। प्रोजेक्ट 17A फ्रिगेट्स, विशाखापत्तनम क्लास डिस्ट्रॉयर भी आ रहे हैं। कुल मिलाकर नौसेना 2030 तक 170-200 जहाजों का लक्ष्य रख रही है।

चीन और पाकिस्तान के खिलाफ मजबूती का रणनीतिक महत्व

हिंद महासागर भारत के लिए जीवनरेखा है। यहाँ से तेल और व्यापार आता है। चीन अपनी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत श्रीलंका, पाकिस्तान और अफ्रीका में पोर्ट बना रहा है। उसकी पनडुब्बियाँ भारतीय जल में घुसपैठ कर रही हैं। पाकिस्तान को चीन 8 नई सबमरीन्स दे रहा है।

ये नई जर्मन सबमरीन्स भारत को छिपकर निगरानी और हमले की क्षमता देंगी। AIP से दुश्मन को पता नहीं चलेगा। साथ ही टेक्नोलॉजी ट्रांसफर से भारत का डिफेंस इंडस्ट्री मजबूत होगा, साथ ही हजारों नौकरियाँ पैदा होंगी।

आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम

यह डील सिर्फ सबमरीन्स नहीं, भारत-जर्मनी संबंधों की नई शुरुआत है। जर्मनी रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अपनी डिफेंस इंडस्ट्री बढ़ा रहा है और भारत बड़ा बाजार है। प्रधानमंत्री मोदी और चांसलर मर्ज की मुलाकात में यह डील हाइलाइट होगी।

भारतीय नौसेना अब पुरानी निर्भरता से निकलकर आधुनिक, स्वदेशी ताकत की ओर बढ़ रही है। ये सबमरीन्स हिंद महासागर को भारत का बनाए रखेंगी। आने वाले सालों में भारत समुद्री महाशक्ति बनेगा।

सिलिकॉन वैली से आकर भारत में Zoho कंपनी खड़ी करने वाले श्रीधर वेम्बू के पीछे पड़ा लेफ्ट-लिबरल गिरोह, धन्या राजेंद्रन का ‘The News Minute’ बना रहा खास तौर पर निशाना: जानें- क्यों उनसे कुढ़ता है वामपंथी खेमा

धर्मस्थला में बड़ी संख्या में शव दफन होने के नाम पर एक हिंदू धार्मिक संस्था को बदनाम करने के लिए मीडिया कैंपने चलाने के बाद धन्या राजेंद्रन का ‘द न्यूज मिनट’ अब एक नए विवाद के केंद्र में आ गया है। इस बार आरोप है कि पोर्टल ने किसी व्यक्ति की निजी पीड़ा को भुनाकर उससे व्यावसायिक और नैरेटिव लाभ लेने की कोशिश की है।

हाल ही में प्रकाशित एक तथाकथित ‘एक्सक्लूसिव’ रिपोर्ट में ‘द न्यूज मिनट’ पर जोहो के संस्थापक श्रीधर वेम्बू के खिलाफ टारगेटेड मीडिया अटैक करने का आरोप लगाया गया है। रिपोर्ट में उनके तलाक मामले से जुड़े कैलिफोर्निया की अदालत के आदेश को कथित तौर पर तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है।

इस लेख में ‘द न्यूज मिनट’ ने श्रीधर वेम्बू के तलाक मामले से जुड़े एक साल पुराने अदालती आदेश का सहारा लेते हुए उनकी सार्वजनिक छवि को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की। लेख में दावा किया गया कि स्वयं को आदर्श व्यक्तित्व और ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ का प्रतीक बताने वाली वेम्बू की छवि, कैलिफोर्निया के अलामेडा काउंटी स्थित सुपीरियर कोर्ट की प्रारंभिक टिप्पणियों से मेल नहीं खाती।

रिपोर्ट के अनुसार, तलाक मामले की सुनवाई कर रही अदालत ने वेम्बू को 1.7 अरब डॉलर का बॉन्ड जमा करने का निर्देश दिया था। इसके साथ ही अदालत ने अमेरिका में स्थित जोहो से जुड़ी कई संस्थाओं और वेम्बू की व्यक्तिगत संपत्तियों पर एक रिसीवर नियुक्त करने का आदेश दिया ताकि उनकी पूर्व पत्नी प्रमिला श्रीनिवासन के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

रिपोर्ट में कोर्ट के आदेश का एक अंश भी प्रकाशित किया गया, जिसमें कहा गया कि रिकॉर्ड दर्शाता है कि याचिकाकर्ता (श्रीधर वेम्बू) ने सामुदायिक संपत्तियों में प्रतिवादी (प्रमिला) के हितों और कानून की कथित अनदेखी की तथा जोहो कॉरपोरेशन, टी एंड वी होल्डिंग्स, टोनी थॉमस, ZCPL और अन्य संबंधित संस्थाएँ उनके निर्देश पर कार्य कर सकती हैं, जिससे प्रतिवादी के हितों को नुकसान हो।

आलोचकों का आरोप है कि ‘द न्यूज मिनट’ ने प्रमिला श्रीनिवासन द्वारा लगाए गए आरोपों को तथ्यों की तरह पेश करते हुए यह संकेत देने की कोशिश की कि वेम्बू अपनी पत्नी को साझा संपत्तियों में उसका अधिकार नहीं देना चाहते। इसके अलावा, लेख में यह भी दावा किया गया कि ‘द न्यूज मिनट’ जल्द ही टेक अरबपति श्रीधर वेम्बू पर एक विस्तृत प्रोफाइल प्रकाशित करने जा रहा है।

वेम्बू के वकील ने ‘द न्यूज मिनट’ के प्रोपेगैंडा का जवाब दिया

राष्ट्रवादी विचारों के समर्थक श्रीधर वेम्बू की छवि को नुकसान पहुँचाने की ऑनलाइन मीडिया पोर्टल की कोशिश का जवाब उनके वकील ने सार्वजनिक रूप से दिया है। वेम्बू के वकील क्रिस्टोफर सी मेल्चर ने एक ऑनलाइन पोस्ट के जरिए ‘द न्यूज मिनट’ को आड़े हाथों लिया और उसकी रिपोर्टिंग पर गंभीर सवाल उठाए।

मेल्चर ने कहा कि ‘द न्यूज मिनट’ ने जनवरी 2025 के एक कोर्ट के आदेश का हवाला दिया जबकि वह आदेश अपील के तहत है और लेख में कई अहम तथ्यों को जानबूझकर छोड़ दिया गया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि वेम्बू की पत्नी द्वारा लगाए गए आरोप पूरी तरह झूठे और निराधार हैं।

मेल्चर के अनुसार, वेम्बू की पत्नी के वकील ने जज को गुमराह किया और हैरानी की बात यह है कि वह वकील कैलिफोर्निया में कानून की प्रैक्टिस करने के लिए लाइसेंस प्राप्त भी नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कैलिफोर्निया कोर्ट के जिस आदेश में जोहो से जुड़ी कई कंपनियों पर रिसीवर नियुक्त करने की बात कही गई थी, उस हिस्से पर अपील के दौरान रोक (स्टे) लगा दी गई है।

इसके अलावा, 1.7 अरब डॉलर का बॉन्ड जमा करने से जुड़ा आदेश भी अभी अपील में लंबित है। मेल्चर ने आरोप लगाया कि इन महत्वपूर्ण तथ्यों को छुपाकर ‘द न्यूज मिनट’ ने एकतरफा और भ्रामक कहानी पेश की जिससे श्रीधर वेम्बू की छवि को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की गई।

न्यूज आर्टिकल में पुराने ऑर्डर का जिक्र है जिस पर अपील पर आंशिक रूप से रोक लगी है: वेम्बू के वकील

वेम्बू के वकील क्रिस्टोफर सी मेल्चर ने गुरुवार (8 जनवरी 2026) को X पर एक पोस्ट में लिखा कि श्रीधर वेम्बू ने अपनी पत्नी को ZCPL में अपनी हिस्सेदारी का 50% देने की पेशकश की थी लेकिन पत्नी ने उसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इसके बावजूद उन्होंने यह आरोप लगाया कि वेम्बू तलाक मामले में उनके साथ धोखाधड़ी करने की कोशिश कर रहे हैं। मेल्चर ने यह भी बताया कि वेम्बू पहले ही पारिवारिक घर में अपनी पूरी हिस्सेदारी पत्नी के नाम ट्रांसफर कर चुके हैं।

1.7 अरब डॉलर के बॉन्ड को लेकर मेल्चर ने कहा कि इस आदेश का कोई कानूनी आधार नहीं है। उन्होंने कहा कि वेम्बू ने पूरी प्रक्रिया में ईमानदारी और सम्मानजनक तरीके से व्यवहार किया, फिर भी जज को गुमराह कर यह आदेश पारित कराया गया कि वेम्बू पत्नी की सुरक्षा के लिए 1.7 अरब डॉलर का बॉन्ड जमा करें। बाद में एक अन्य जज ने भी माना कि इतनी बड़ी रकम अतार्किक और अव्यावहारिक लगती है।

मेल्चर के अनुसार, वेम्बू अपनी शेयरहोल्डिंग के बदले अधिकतम 150 मिलियन डॉलर तक ही राशि उधार ले पाने की स्थिति में थे और उन्होंने उतनी राशि जुटाने की कोशिश भी की लेकिन उनकी पत्नी ने वह पैसा लेने से भी इनकार कर दिया।

वेम्बू के वकील ने आगे कहा कि पत्नी ने भरण-पोषण (एलिमनी) की माँग तक नहीं की है और पूरा मामला केवल वेम्बू का समय बर्बाद करने और उनकी छवि खराब करने की कोशिश है। उन्होंने आरोप लगाया कि पत्नी के वकील ने कोर्ट को गुमराह किया और संभव है कि वह अपनी मुवक्किल को भी वास्तविक स्थिति से भ्रमित कर रहा हो जबकि वह इस दौरान मिलियन डॉलर की कानूनी फीस वसूल चुका है।

मेल्चर ने यह भी साफ किया कि इस मामले का एलिमनी से कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि पत्नी ने अब तक किसी भी तरह की आर्थिक सहायता का आदेश तक नहीं माँगा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि श्रीधर वेम्बू कैलिफोर्निया की कोर्ट के सभी वैध और कानूनी आदेशों का पूरी तरह पालन कर रहे हैं।

‘द न्यूज मिनट’ ने कोर्ट की टिप्पणियों को अंतिम फैसले के तौर पर पेश करने की कोशिश की

‘द न्यूज मिनट’ द्वारा प्रकाशित यह लेख गलत और भ्रामक पत्रकारिता का उदाहरण है। चूँकि, वेम्बू की सोच और विचारधारा इस मीडिया संस्थान से मेल नहीं खाती इसलिए उनके निजी जीवन को निशाना बनाया गया। लेख में अदालत की उन बातों को उठाया गया है जो मामले की शुरुआती सुनवाई के दौरान कही गई थीं। इस चरण में अदालत के पास सभी सबूत मौजूद नहीं होते। इसके बावजूद ‘द न्यूज मिनट’ ने इन शुरुआती टिप्पणियों को ऐसे पेश किया, जैसे वही इस मामले का अंतिम फैसला हों।

आरोप यह भी है कि लेख में जरूरी जानकारी छिपाई गई। रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया कि जिस अदालती आदेश का हवाला दिया गया है, उसके खिलाफ अपील दायर की जा चुकी है और आदेश के कुछ हिस्सों पर रोक भी लग चुकी है।

भारत विरोधी ताकतों की पसंद है यह मीडिया आउटलेट

यह पूरा मामला दिखाता है कि कैसे ‘द न्यूज मिनट’ पत्रकारिता का इस्तेमाल एक हथियार की तरह करता है और उन लोगों को निशाना बनाता है जो उसकी वैचारिक लाइन में फिट नहीं बैठते। आरोप है कि यह पोर्टल निष्पक्ष रिपोर्टिंग के बजाय अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए व्यक्तियों को चुनकर बदनाम करता है।

यहाँ यह बताना करना भी जरूरी है कि अक्टूबर 2025 में ‘द न्यूज मिनट’ की एडिटर-इन-चीफ धन्या राजेंद्रन को रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) द्वारा  इम्पैक्ट प्राइज ऑफ द ईयर 2025 के लिए नामाँकित किया गया था। यह उसी समय हुआ था जब धर्मस्थला विवाद के जरिए हिंदुओं को निशाना बनाने की कोशिश की गई थी।

गौर करने वाली बात यह है कि पेरिस स्थित NGO RSF को फंड देने वालों में फ्रांस का विदेश मंत्रालय, यूरोपीय आयोग, स्वीडन की SIDA, फोर्ड फाउंडेशन, नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (NED) और जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी फाउंडेशंस (OSF) शामिल हैं। NED को अमेरिका सरकार द्वारा फंड किया जाता है और इसे अक्सर CIA का सॉफ्ट आर्म कहा जाता है, जिसका इस्तेमाल कई देशों में शासन परिवर्तन (रेजिम चेंज) के लिए किया जाता रहा है।

वहीं, OSF नेटवर्क पर आरोप है कि वह भारत में कई एनजीओ, मीडिया पोर्टल्स और तथाकथित सिविल सोसायटी समूहों को फंड करता है, जो लगातार भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा देते हैं। आलोचकों के मुताबिक, इन्हीं अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क्स के सहारे कुछ मीडिया संस्थान अपने एजेंडे को पत्रकारिता के नाम पर आगे बढ़ा रहे हैं।

श्रीधर वेम्बू को लेफ्ट क्यों टारगेट कर रहा है?

यह पहली बार नहीं है जब सिलिकॉन वैली से आकर भारत में zoho कंपनी खड़ी करने वाले श्रीधर वेम्बू और जोहो को कथित तौर पर लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम के निशाने पर लिया गया हो। इससे पहले जनवरी 2020 में भी वेम्बू और जोहो के खिलाफ बहिष्कार अभियान चलाया गया था। यह अभियान तब शुरू हुआ था, जब श्रीधर वेम्बू को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था।

हालाँकि, वेम्बू ने इस वामपंथी दबाव और ट्रोलिंग के आगे झुकने से इनकार कर दिया था। उन्होंने साफ कहा था कि ट्विटर पर होने वाले हमलों से उनके विचार और सोच प्रभावित नहीं होंगे। वेम्बू ने उस समय भी अपनी बात मजबूती से रखी और किसी तरह की माफी या सफाई देने से इंकार किया।

आलोचकों के अनुसार, श्रीधर वेम्बू का खुला राष्ट्रवाद और भारत समर्थक विचारधारा ही उन्हें लेफ्ट-लिबरल मीडिया के निशाने पर ले आई है। आरोप है कि विदेशी हितों से जुड़े इस मीडिया इकोसिस्टम को वेम्बू की प्रो-इंडिया सोच रास नहीं आती, इसलिए उन्हें बार-बार टारगेट किया जाता रहा है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में अदिति ने लिखी है जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)

प्रतीक जैन पर ED की स्ट्राइक और ममता बनर्जी की छटपटाहट: जानें कोयला घोटाले से लेकर शेल कंपनियों तक, कैसे भ्रष्टाचार के दलदल में धंसी है I-PAC

भारतीय राजनीतिक सलाहकार फर्म I-PAC के सह-संस्थापक प्रतीक जैन अब कोयला खनन घोटाले से जुड़े कथित संबंधों के कारण जाँच के घेरे में आ गए हैं। इसी सिलसिले में 8 जनवरी 2026 को प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने कोलकाता और बिधाननगर में कई ठिकानों पर छापेमारी की।

ED की टीम ने साल्ट लेक स्थित एक इमारत की 11वीं मंजिल पर मौजूद I-PAC के दफ्तर की तलाशी ली। इसके साथ ही I-PAC के प्रमुख प्रतीक जैन के लाउडन स्ट्रीट स्थित आवास और कोलकाता के बड़ाबाजार (पोस्ता इलाके) में एक व्यापारी के कार्यालय पर भी छापेमारी की गई।

प्रतीक जैन तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के IT सेल के प्रमुख भी हैं। यही वजह है कि प्रतीक जैन के खिलाफ ED की इस कार्रवाई से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बुरी तरह भड़क गईं और छापेमारी के दौरान काफी हंगामा देखने को मिला।

जब ED की तलाशी चल रही थी, तब ममता बनर्जी अचानक प्रतीक जैन के घर पहुँच गईं। उन्होंने इस कार्रवाई पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा, “यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। ED ने हमारे आईटी विंग और उसके प्रमुख के घर और दफ्तर पर छापा मारा है। वे हर तरह की जानकारी इकट्ठा करने की कोशिश कर रहे हैं।” ममता बनर्जी ने आगे बताया कि उन्होंने प्रतीक जैन से बात की है और वे उनकी पार्टी के काम के इंचार्ज हैं।

I-PAC, कोयला घोटाला और TMC के गोवा चुनाव अभियान का कनेक्शन

I-PAC की स्थापना 2013 में चुनावी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर ने की थी, जो ‘सिटिजन्स फॉर एकाउंटेबल गवर्नेंस’ (CAG) की उत्तराधिकारी संस्था है। I-PAC एक राजनीतिक कंसल्टेंसी फर्म है जो भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों को चुनावी रणनीति, डेटा विश्लेषण और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को एकजुट करने जैसी सेवाएँ देती है। साल 2019 से ही I-PAC के तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के साथ बेहद करीबी रिश्ते रहे हैं और इसी फर्म ने 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में पार्टी को एक निर्णायक जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी।

हालाँकि, 2021 में प्रशांत किशोर के बाहर होने और ऋषि राज सिंह, प्रतीक जैन व विनेश चंदेल द्वारा निदेशक के रूप में कमान संभालने के बाद, I-PAC को चुनावी झटके झेलने पड़े हैं। साल 2025 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में I-PAC की क्लाइंट ‘आम आदमी पार्टी’ को भारतीय जनता पार्टी (BJP) के हाथों हार का सामना करना पड़ा। इससे पहले, 2024 में आंध्र प्रदेश में भी I-PAC अपनी क्लाइंट ‘YSRCP’ के पक्ष में माहौल बनाने में नाकाम रही, जहाँ भाजपा-तेलुगु देशम पार्टी (TDP) गठबंधन ने शानदार जीत दर्ज की थी।

(फोटो साभार: I-PAC website)

इसके अलावा, I-PAC वित्तीय अनियमितताओं, संदिग्ध फंडिंग और राजनीतिक भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों के कारण जाँच के घेरे में आ गई है। ED की मौजूदा कार्रवाई उन सबूतों पर आधारित है, जो पश्चिम बंगाल के कोयला खनन घोटाले से जुड़े हवाला लेन-देन में प्रतीक जैन की संलिप्तता की ओर इशारा करते हैं।

जाँच एजेंसी का कहना है कि कोयला तस्करी से हुई अवैध कमाई को ठिकाने लगाने वाले एक हवाला ऑपरेटर ने ‘इंडियन पैक कंसल्टिंग प्राइवेट लिमिटेड’ (I-PAC) को कई करोड़ रुपए पहुँचाने में मदद की थी। ED ने स्पष्ट किया कि ये छापेमारी मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (PMLA) के तहत चल रही जाँच का हिस्सा है।

साल 2020 में अवैध कोयला खनन घोटाले के मामले में एक FIR दर्ज की गई थी। जाँच में खुलासा हुआ कि पश्चिम बंगाल के पश्चिम बर्धमान जिले और उसके आसपास ‘ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड’ (ECL) के लीज क्षेत्र से बड़े पैमाने पर कोयला निकाला और चुराया जा रहा था। यह पूरा खेल रेलवे, CISF के अधिकारियों और अन्य संबंधित विभागों की मिलीभगत से चल रहा था। आगे की जाँच में इस मामले में हवाला ऑपरेटरों की मौजूदगी के सबूत भी मिले।

जाँच में यह बात सामने आई कि अवैध रूप से निकाले गए और चोरी किए गए इस कोयले को बर्धमान, पुरुलिया, बांकुरा और पश्चिम बंगाल के अन्य जिलों के प्लांटों में बेचा जा रहा था। जाँचकर्ताओं के अनुसार, इस कोयले का बड़ा हिस्सा ‘शाकंभरी ग्रुप ऑफ कंपनीज’ को बेचा गया था। जाँच में पाया गया कि दिसंबर 2017 से अक्टूबर 2020 के बीच ECL के लीज क्षेत्र में अवैध खनन के जरिए टैक्स और रॉयल्टी सहित लगभग ₹2,742.32 करोड़ का गबन किया गया था।

ED की जाँच में यह बात सामने आई है कि इस अवैध खनन सिंडिकेट ने करीब 25.51 लाख मीट्रिक टन (MT) कोयला गैर-कानूनी तरीके से निकाला था, जिसकी कुल कीमत लगभग ₹1,114.35 करोड़ आँकी गई है।

इस पूरे कोयला खनन घोटाले का मास्टरमाइंड अनूप माजी नाम का व्यक्ति बताया जा रहा है। अनूप माजी के आपराधिक रिकॉर्ड से पता चलता है कि साल 2000 से 2015 के बीच ही उसके खिलाफ करीब 16 FIR दर्ज की जा चुकी थीं।

साल 2020 में CBI ने कोयला चोरी और तस्करी का एक नया मामला दर्ज किया था। जाँच में सामने आया कि मास्टरमाइंड अनूप माजी ने चोरी के कोयले और विभिन्न कंपनियों को की गई उसकी बिक्री का पूरा हिसाब-किताब रखने के लिए कई कर्मचारी तैनात कर रखे थे। जाँच में आगे यह भी खुलासा हुआ कि अनूप माजी के करीबियों के जरिए ‘गुनापद माजी’ नाम के एक व्यक्ति ने 2017 से 2020 के बीच अपराध की कमाई के ₹89 करोड़ ट्रांसफर किए थे। वहीं, एक अन्य आरोपित ‘जयदेव मंडल’ ने भी इसी तरह अवैध कमाई के ₹58 करोड़ इधर-उधर पहुँचाए थे।

जनवरी और अप्रैल 2021 के बीच, ED ने मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (PMLA) की धारा 17 के तहत आरोपितों से जुड़े 46 ठिकानों पर तलाशी और जब्ती की कार्रवाई की थी। इस पूरे मामले में I-PAC का नाम तब सामने आया, जब ED की जाँच में यह खुलासा हुआ कि कोयला खनन घोटाले से जुड़े एक हवाला ऑपरेटर ने I-PAC को करोड़ों रुपए ट्रांसफर करने में मदद की थी। इस बड़े खुलासे के बाद ही, ED ने I-PAC के प्रमुख प्रतीक जैन से जुड़े ठिकानों पर छापेमारी शुरू की।

यह आरोप लगाया गया है कि अनूप माजी से मिली कोयला घोटाले की रकम को हवाला के जरिए I-PAC तक पहुँचाया गया था, जिसका इस्तेमाल तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के गोवा चुनाव अभियान के लिए किया गया। इस तरह, कोयला घोटाले के पैसों और TMC के गोवा चुनाव की फंडिंग के बीच एक कथित सीधा संबंध सामने आया है। ED का दावा है कि TMC ने 2021 और 2022 के बीच गोवा में ‘20 करोड़ रुपए की अपराध की कमाई‘ का इस्तेमाल किया। जाँच एजेंसी ने इस बात का जिक्र 9 जनवरी 2026 को कलकत्ता हाई कोर्ट में दायर एक रिट याचिका में किया है।

कोयला खनन घोटाले से हुई काली कमाई को I-PAC और इसके निदेशक प्रतीक जैन तक पहुँचाने के लिए कोलकाता की एक फर्म ‘आर कांति लाल’ और कुछ अन्य हवाला ऑपरेटरों का सहारा लिया गया था। ED का आरोप है कि एक बार जब यह पैसा I-PAC तक पहुँच गया, तो इसका इस्तेमाल 2022 में गोवा में TMC की चुनावी रणनीति और अभियान के लिए किया गया। खास बात यह है कि गुरुवार (8 जनवरी 2026) को हुई छापेमारी के दौरान, ED की टीम ने कोलकाता स्थित ‘आर कांति लाल’ फर्म के दफ्तर पर भी धावा बोला और वहाँ गहन तलाशी ली।

ED के अनुसार, मास्टरमाइंड अनूप माजी के अकाउंटेंट नीरज सिंह और बांकुरा पुलिस के पूर्व प्रभारी अशोक कुमार मिश्रा के बीच 26 अगस्त 2020 को हुई व्हाट्सएप बातचीत से एक बड़ा सुराग मिला है। इस चैट से पता चलता है कि ‘आर कांति लाल’ नाम की फर्म का इस्तेमाल अवैध रास्तों से करोड़ों रुपए की काली कमाई ट्रांसफर करने के लिए किया गया था। गौरतलब है कि बांकुरा के तत्कालीन पुलिस प्रभारी अशोक कुमार मिश्रा को ED ने 2021 में ही गिरफ्तार कर लिया था। फिलहाल मिश्रा जमानत पर बाहर हैं।

ED ने अपनी याचिका में खुलासा किया है कि, “ऐसी खुफिया जानकारी मिली थी कि कोलकाता से गोवा के लिए करीब ₹20 करोड़ की अवैध कमाई ‘आर कांति लाल’ फर्म के जरिए ट्रांसफर की गई थी। गोवा में इन हवाला ट्रांजेक्शन को संभालने वाला कर्मचारी सागर कुमार पटेल है।”

जाँच एजेंसी ने आगे बताया कि पूछताछ के दौरान पटेल ने ‘अक्षय कुमार’ नाम के एक व्यक्ति का जिक्र किया। अक्षय ने खुद यह कबूल किया है कि उसने ‘एएसएम इवेंट टेक्नोलॉजी’ (ASM Event Technology) के मालिक पंकज मलिक द्वारा व्यवस्थित किए गए हवाला चैनल के जरिए गोवा में नकद रकम हासिल की थी। ED के अनुसार, अक्षय कुमार ‘एएसएम इवेंट टेक्नोलॉजी’ के साथ-साथ ‘हर्ट्ज’ और ‘पिक्सेल्स’ जैसी इवेंट मैनेजमेंट कंपनियों का कर्मचारी है।

इसके अलावा, ED ने खुलासा किया कि अक्षय कुमार से 26 अक्टूबर 2023 और 10 जनवरी 2024 को दो बार पूछताछ की गई थी। इस दौरान अक्षय कुमार ने बताया कि दो इवेंट मैनेजमेंट कंपनियाँ- ‘एएसएम इवेंट टेक्नोलॉजी’ और ‘हर्ट्ज एंड पिक्सेल्स’ I-PAC के लिए काम करती थीं। इन्हीं कंपनियों ने साल 2021 और 2022 के दौरान I-PAC के सभी आयोजनों का प्रबंधन संभाला था।

पूछताछ के दौरान ‘आर कांति लाल’ फर्म के कर्मचारी अल्पेश पटेल ने भी यह कबूल किया कि उसने कोलकाता से गोवा में ₹20 करोड़ नकद की व्यवस्था की थी और यह रकम अक्षय कुमार को दी गई थी। जाँच में यह भी सामने आया कि यह सारा फंड ‘राजेश मगनलाल’ फर्म के मालिक मुकेश पटेल के कहने पर व्यवस्थित किया गया था।

मुकेश पटेल से हुई पूछताछ ने ED के जाँचकर्ताओं को मुकेश ठक्कर उर्फ मुन्ना तक पहुँचा दिया। ED के मुताबिक, मुकेश पटेल ने मुकेश ठक्कर के कहने पर ही इन अवैध फंड्स का इंतजाम किया था। ठक्कर ने खुलासा किया कि कोलकाता में एक नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC) चलाने वाले जितेंद्र मेहता ने कोयला खनन घोटाले से जुड़ी इस काली कमाई को ट्रांसफर करने में मदद की थी।

ED ने अदालत में दायर अपनी याचिका में कहा है, “जितेंद्र मेहता ने हवाला के जरिए कोलकाता से गोवा तक अपराध की कमाई को पहुँचाने में सहायता की है। उन्होंने गोवा में I-PAC द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले ₹20 करोड़ को ट्रांसफर करने में मदद की। जानकारी के अनुसार, I-PAC के को-फाउंडर और डायरेक्टर प्रतीक जैन ने ही गोवा में I-PAC के ऑपरेशन्स संभाले थे। यह फंड अक्षय कुमार को सौंपा गया था, जो हर्ट्ज एंड पिक्सेल और ASM इवेंट टेक्नोलॉजी का कर्मचारी है- इन कंपनियों ने खुद यह स्वीकार किया है कि उन्होंने गोवा में I-PAC के लिए काम किया था।”

कौन हैं प्रतीक जैन?

प्रतीक जैन एक इंजीनियर हैं, जो बाद में राजनीतिक सलाहकार बन गए। वे I-PAC के सह-संस्थापक हैं। जैन ने साल 2012 में IIT बॉम्बे से अपनी B.Tech की डिग्री पूरी की थी। राजनीति में आने से पहले उन्होंने ‘एक्सिस म्यूचुअल फंड’ (Axis Mutual Fund) में इंटर्नशिप की और कुछ समय तक प्रसिद्ध फर्म ‘डेलॉयट’ (Deloitte) में भी काम किया। इसके बाद वे ‘सिटिजन्स फॉर एकाउंटेबल गवर्नेंस’ (CAG) नामक NGO के संस्थापक सदस्य बने।

महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रतीक जैन पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी TMC के आईटी सेल के प्रमुख भी हैं। साल 2021 के विधानसभा चुनावों में ममता बनर्जी की पार्टी की बड़ी जीत के पीछे प्रतीक जैन की संस्था I-PAC की बहुत अहम भूमिका मानी जाती है।

गुरुवार (8 जनवरी 2026) को हुई ED की छापेमारी के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का नाटकीय ढंग से वहाँ पहुँचना और अपने साथ कुछ फाइलें और एक हार्ड डिस्क ले जाना चर्चा का विषय बन गया है। इस घटना ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। लोग पूछ रहे हैं कि क्या मुख्यमंत्री ने यह कदम किसी डर या घबराहट में उठाया था? क्या यह उस घोटाले पर पर्दा डालने की एक हताश कोशिश थी, जिसकी पूरी सच्चाई अभी सामने आना बाकी है?

9 जनवरी 2026 को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और महुआ मोइत्रा जैसे मुखर TMC नेताओं ने प्रतीक जैन के आवास पर हुई ED की छापेमारी के खिलाफ केंद्र सरकार के विरोध में धरना दिया और रैली निकाली। हद तो तब हो गई जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुद कोलकाता के शेक्सपियर सारणी थाने में ED के खिलाफ पुलिस शिकायत दर्ज कराई। अब सवाल यह उठ रहे हैं कि आखिर एक निजी कंसल्टेंसी फर्म के खिलाफ जाँच एजेंसी की कार्रवाई से टीएमसी इतनी बेचैन और डरी हुई क्यों है?

YSRCP सरकार ने जनता के ₹274 करोड़ I-PAC को गैर-कानूनी तरीके से दिए: TDP आरोप

साल 2023 में तेलुगु देशम पार्टी (TDP) ने तत्कालीन मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी की सरकार पर जनता के ₹274 करोड़ अवैध रूप से प्रतीक जैन की संस्था I-PAC को देने का आरोप लगाया था। आरोप था कि विलेज और वार्ड वॉलंटियर्स की निगरानी के बहाने जगन सरकार ने सरकारी खजाने से यह बड़ी रकम I-PAC की तरफ मोड़ दी थी।

TDP प्रवक्ता नीलायपलेम विजय कुमार ने दावा किया था कि जुलाई 2021 में आंध्र प्रदेश सरकार ने एक सरकारी आदेश (GO) जारी कर ‘राम इंफो’, ‘वुपाधि इंफोटेक’ और ‘मैक्स सिक्योरिटी डिटेक्टिव एजेंसी’ के समूह को राज्यभर के वॉलंटियर्स की निगरानी का काम सौंपा था। TDP का आरोप था कि ‘राम इंफो’ में काम करने वाले कर्मचारी असल में I-PAC के ही लोग थे।

इतना ही नहीं, यह भी आरोप लगाया गया कि YSRCP सरकार ने जून 2020 से ‘फील्ड ऑपरेशन एजेंसी’ (FPO) नाम के एक समूह को सालाना ₹68.02 करोड़ का भुगतान करने के लिए एक पिछला आदेश (Post-facto GO) जारी किया था, ताकि इस पूरे लेन-देन को कानूनी जामा पहनाया जा सके।

TDP ने आरोप लगाया कि वॉलंटियर्स की निगरानी के लिए किसी निजी एजेंसी को नियुक्त करना पूरी तरह से अवैध था, क्योंकि ये वॉलंटियर्स सरकारी तंत्र का हिस्सा थे। इसके अलावा, बिना कोई टेंडर बुलाए सीधे सरकारी आदेश (GO) जारी करना YSRCP सरकार द्वारा कानून का एक और बड़ा उल्लंघन था।

TDP के अनुसार, यह तो एक बहुत बड़े घोटाले का महज एक हिस्सा भर था। साल 2023 में TDP नेता ने आरोप लगाया था, “इस पूरे खेल का असली मकसद I-PAC को फायदा पहुँचाना था, जो YSRCP के लिए राजनीतिक सलाहकार के रूप में काम करती है। ‘राम इंफो’ में काम करने वाले लोग असल में I-PAC के कर्मचारी हैं। यह पूरी साजिश इसलिए रची गई ताकि शेल कंपनियाँ बनाकर I-PAC की चुनावी सेवाओं का बिल जनता के पैसे (सरकारी खजाने) से भरा जा सके।”

(यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में श्रद्धा पांडेय ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

लोकल बिजनेस का ग्लोबल दम: क्या है वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस, जो ट्रंप के टैरिफ प्लान को देगा मात

आज दुनिया भर के व्यापार में अनिश्चितता का माहौल है। डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने कई देशों को टैरिफ (आयात शुल्क) की धमकी देकर एक तरह से ‘टैरिफ वॉर’ शुरू कर दिया है। रूस से कच्चा तेल खरीदने के कारण भारत पर पहले ही 50% टैरिफ लगाया जा चुका है और अब उन्होंने इसे बढ़ाकर 500% करने की धमकी भी दे दी है।

इन वैश्विक चुनौतियों के बीच, गुजरात एक दूरदर्शी और जमीनी स्तर की रणनीति पर काम कर रहा है। ‘वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट’ की सफलता के बाद, अब राज्य सरकार ने साल 2025-2026 के दौरान चार ‘क्षेत्रीय गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस’ (VGRC) के आयोजन का फैसला किया है। इसमें से पहली कॉन्फ्रेंस अक्टूबर 2025 में उत्तर गुजरात के मेहसाणा में आयोजित की गई थी। अब अगली कॉन्फ्रेंस 11-12 जनवरी 2026 को राजकोट में होने जा रही है।

वाइब्रेंट गुजरात की ऐतिहासिक यात्रा और क्षेत्रीय विस्तार का महत्व

वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट (VGGS) राज्य के आर्थिक विकास का एक अनोखा और प्रेरणा देने वाला प्रतीक है। इसकी शुरुआत साल 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी। उस समय 2001 के भुज भूकंप के बाद गुजरात पुनर्निर्माण के दौर से गुजर रहा था और दुनिया भर के निवेशकों का भरोसा फिर से जीतना बहुत जरूरी था।

इस समिट ने न केवल गुजरात को ग्लोबल इन्वेस्टमेंट का केंद्र बनाया, बल्कि भारत में राज्य स्तर पर ‘इकोनॉमिक डिप्लोमेसी’ और ब्रांडिंग का एक सफल मॉडल भी पेश किया। साल 2024 में इसके 10वें संस्करण की सफलता के बाद, अब अगली ग्लोबल समिट 2027 में होने वाली है। इस बीच, विकास को क्षेत्रीय स्तर (रीजनल लेवल) पर ले जाना गुजरात की रणनीति का एक नया और समावेशी चरण है, जो ‘विकसित भारत 2047’ के विजन से सीधा जुड़ा है।

संक्षेप में कहें तो, जो ग्लोबल समिट पहले दुनिया के लिए होती थी, अब वैसी ही समिट गुजरात के अलग-अलग क्षेत्रों के विकास के लिए आयोजित की जा रही है। इसीलिए इस अभियान को ‘ग्लोबल रीजनल समिट’ या ‘कॉन्फ्रेंस’ के नाम से जाना जाता है।

वाइब्रेंट गुजरात का पहला संस्करण

वाइब्रेंट गुजरात का पहला आयोजन 28-30 सितंबर 2003 को अहमदाबाद और सूरत में हुआ था। इसका उद्घाटन तत्कालीन उप प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने किया था। इस समिट का मुख्य उद्देश्य गुजरात को निवेश के लिए एक प्रमुख स्थान (Investment Destination) के रूप में फिर से स्थापित करना था। पहले संस्करण में केवल 76 समझौते (MoUs) हुए थे, जिसके तहत 14 बिलियन डॉलर यानी करीब ₹66,000 करोड़ के निवेश की घोषणा हुई थी। उस समय लगभग 125 विदेशी प्रतिनिधियों, 200 अनिवासी भारतीयों (NRIs) और 200 प्रमुख हस्तियों ने इसमें हिस्सा लिया था।

इसके बाद हर 2 साल में इस समिट का सिलसिला जारी रहा। साल 2005 में करीब 20 देशों के प्रतिनिधि आए और निवेश का आँकड़ा ₹1 लाख करोड़ को पार कर गया। साल 2007 में ₹4.65 लाख करोड़, 2009 में ₹12 लाख करोड़ और 2011 में निवेश का यह आंकड़ा ₹20.83 लाख करोड़ तक पहुँच गया। साल 2013 में विधानसभा चुनाव और 2014 में लोकसभा चुनाव के बाद, 2015 की समिट ‘मेक इन इंडिया’ के तहत आयोजित हुई, जिसमें करीब 110 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया और ₹25 लाख करोड़ का निवेश आया।

टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) की एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2017 में राज्य सरकार ने जानकारी दी थी कि वाइब्रेंट गुजरात समिट के तहत 2003 से 2017 तक कुल 51,738 समझौते (MoUs) या निवेश के प्रस्ताव आए थे। इनमें से 66% यानी 34,234 प्रोजेक्ट्स या तो शुरू हो चुके हैं या फिर उन्हें लागू करने की प्रक्रिया चल रही है। इसके बाद, 2019 में हुए 9वें संस्करण के दौरान भी हजारों समझौते हुए थे, जिसमें अकेले रिन्यूएबल एनर्जी (अक्षय ऊर्जा) क्षेत्र में ही ₹50,000 करोड़ के निवेश की उम्मीद जताई गई थी।

2023 में 20 साल पूरे होने पर उत्सव

साल 2023 में इस समिट के 20 साल पूरे होने के अवसर पर विशेष उत्सव मनाया गया था। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि यह समिट अब सिर्फ एक समय का ‘इवेंट’ नहीं रह गई है, बल्कि यह एक ‘संस्था’ (Institution) बन चुकी है। जहाँ साल 2003 में इसमें केवल 100 के करीब प्रतिनिधि शामिल हुए थे, वहीं आज इसमें 40,000 से भी ज्यादा प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं। इसके बाद, साल 2024 में वाइब्रेंट गुजरात समिट के 10वें संस्करण का शानदार आयोजन किया गया।

2024 में लाखों-करोड़ों के निवेश समझौते (MoUs)

साल 2024 में आयोजित समिट के दौरान 41,299 प्रोजेक्ट्स के लिए ₹26.33 लाख करोड़ के MoUs साइन किए गए। अगर प्री-समिट और मुख्य समिट दोनों को मिला लें, तो कुल 98,540 प्रोजेक्ट्स के लिए ₹45.2 लाख करोड़ से भी ज्यादा का निवेश आया है। इससे करीब 81 लाख रोजगार के अवसर पैदा होने की संभावना है। इस बार खास तौर पर सेमिकंडक्टर्स, ग्रीन हाइड्रोजन और रिन्यूएबल एनर्जी जैसे आधुनिक क्षेत्रों पर फोकस किया गया।

चूंकि 2027 में गुजरात विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, इसलिए फिलहाल सरकार का पूरा ध्यान संतुलित और सबको साथ लेकर चलने वाले विकास (Inclusive Growth) पर है। इसी कड़ी में चार ‘वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस’ (VGRC) आयोजित की जा रही हैं। यह पहल असल में ग्लोबल समिट के मॉडल को ही क्षेत्रीय स्तर पर लागू करने की एक कोशिश है।

VGRC (वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस) के उद्देश्य

इन क्षेत्रीय सम्मेलनों का मुख्य उद्देश्य हर क्षेत्र की अपनी खासियतों और उत्पादों (ODOP – वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट) को बढ़ावा देना है। इसके साथ ही, MSME, स्टार्टअप्स और स्थानीय उद्योगों को मजबूत करना और विकास का लाभ गाँव, तहसील और जिला स्तर तक पहुँचाना इसका लक्ष्य है। सरकार चाहती है कि वैश्विक निवेश का आकर्षण केवल बड़े शहरों तक सीमित न रहकर सीधे क्षेत्रीय स्तर तक पहुँचे।

इसके अलावा, साल 2025 में वैश्विक हालात भी काफी बदल चुके हैं। डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत पर लगे 50% टैरिफ के कारण निर्यात (एक्सपोर्ट) में गिरावट देखी गई है। इसका सीधा असर गुजरात के प्रमुख उद्योगों जैसे केमिकल्स, टेक्सटाइल्स, जेम्स एंड ज्वेलरी, फार्मा और एग्रो प्रोडक्ट्स पर पड़ रहा है। ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में ग्लोबल समिट के साथ-साथ क्षेत्रीय सम्मेलनों (Regional Summits) पर ध्यान देना एक सही और समय की माँग के अनुसार उठाया गया कदम है। यह पूरी पहल ‘विकसित गुजरात 2047’ के लक्ष्य के साथ जुड़ी हुई है।

चार चरणों में VGRC (वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस)

इस योजना के तहत पहली क्षेत्रीय समिट अक्टूबर 2025 में गुजरात के मेहसाणा में आयोजित की जा चुकी है। अब इसी कड़ी में 11-12 जनवरी को राजकोट में यह कॉन्फ्रेंस होने जा रही है। इसके बाद, 9-10 अप्रैल को सूरत में और 10-11 जून को वडोदरा में भी इस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया जाएगा।

खास बात यह है कि हर मुख्य समिट से पहले जिला स्तर पर विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन कार्यक्रमों में स्थानीय उद्योगपतियों, MSME और कलाकारों (आर्टिसन्स) की समस्याओं पर विस्तार से चर्चा की जाती है। इस पूरी प्रक्रिया का मकसद विकास के फायदों को सीधे गाँवों और तहसीलों तक पहुँचाना है।

उत्तर गुजरात VGRC की सफलता और परिणाम

‘वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस’ (VGRC) का पहला सफल आयोजन 9-10 अक्टूबर 2025 को मेहसाणा की गणपत यूनिवर्सिटी में हुआ। इस आयोजन को जबरदस्त सफलता मिली। इस कॉन्फ्रेंस ने संकेत दिया कि उत्तर गुजरात आने वाले समय में ‘गुजरात का एनर्जी पॉइंट’ बनने जा रहा है। इसमें स्थानीय व्यापारियों, किसानों, युवाओं और महिला उद्यमियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

पहले VGRC के शानदार आँकड़े

MoUs और निवेश: कुल 21 क्षेत्रों में 1,212 समझौते (MoUs) हुए, जिसके जरिए ₹3.24 लाख करोड़ का निवेश आया। इसमें रिन्यूएबल एनर्जी, एग्री-टेक और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे आधुनिक क्षेत्रों पर खास जोर दिया गया।

भागीदारी: 29,000 से ज्यादा लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया। इसमें 80 से अधिक देशों की भागीदारी रही और 440 अंतरराष्ट्रीय डेलीगेट्स शामिल हुए।

नेटवर्किंग: समिट के दौरान 160 से ज्यादा B2B (बिजनेस टू बिजनेस) और 100 से ज्यादा B2G (बिजनेस टू गवर्नमेंट) मीटिंग्स हुईं। गुजरात को इसमें कई देशों का पार्टनर के तौर पर साथ मिला।

जिला स्तर पर असर: इस समिट का फायदा छोटे जिलों तक भी पहुँचा है। उदाहरण के लिए, वेरावल में ₹271 करोड़ के समझौते हुए, जिसका मुख्य फोकस ‘एग्रो-मरीन वैल्यू चेन’ पर है। इससे गिर सोमनाथ जिले में रोजगार बढ़ेगा और वहाँ के ‘केसर आम’ जैसे स्थानीय उत्पादों की वैल्यू भी बढ़ेगी।

कच्छ-सौराष्ट्र VGRC: राजकोट में आगामी महासमिट

वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस (VGRC) की दूसरी समिट कच्छ-सौराष्ट्र क्षेत्र के लिए राजकोट की मारवाड़ी यूनिवर्सिटी में 11-12 जनवरी 2026 को आयोजित होने जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसका भव्य उद्घाटन करेंगे। इस महासमिट में 22 देशों के 350 से ज्यादा विदेशी प्रतिनिधियों और 5000 से अधिक उद्योगपतियों के शामिल होने की उम्मीद है, जहाँ अरबों रुपए के निवेश समझौतों (MoUs) पर हस्ताक्षर होंगे।

इस दौरान होने वाले सेमिनार्स में ब्लू इकोनॉमी, ग्रीन स्टार्टअप, शिप-बिल्डिंग (जहाज निर्माण), सिरामिक्स और टूरिज्म जैसे प्रमुख विषयों पर ध्यान दिया जाएगा। राजकोट, जो पहले से ही इंजीनियरिंग और ऑटो पार्ट्स का बड़ा केंद्र है, इस समिट के जरिए सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजार से जुड़ सकेगा।

प्रधानमंत्री का कार्यक्रम और प्रमुख घोषणाएँ: यह महासमिट कच्छ और सौराष्ट्र के 12 जिलों को कवर करेगी। इसका मुख्य लक्ष्य क्षेत्रीय औद्योगिक विकास को रफ्तार देना और ‘वोकल फॉर लोकल’ के साथ-साथ ‘ग्लोबल फ्रॉम लोकल’ के विजन को सच करना है।

तैयारियों की बात करें तो राजकोट-मोरबी हाईवे पर स्थित मारवाड़ी यूनिवर्सिटी के 55 एकड़ परिसर में 6 बड़े एग्जीबिशन डोम और एक मुख्य इनोवेशन हॉल तैयार किया गया है। प्रदर्शनी का क्षेत्र करीब 20,000 से 26,000 वर्ग मीटर में फैला है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 11 जनवरी को सोमनाथ मंदिर के दर्शन के बाद राजकोट पहुँचेंगे। वहाँ वे ट्रेड शो का उद्घाटन करेंगे और कॉन्फ्रेंस को संबोधित करेंगे। इस मौके पर वे 14 नए ग्रीनफील्ड स्मार्ट GIDC एस्टेट की घोषणा करेंगे और राजकोट में मेडिकल डिवाइस पार्क का उद्घाटन भी करेंगे।

कच्छ-सौराष्ट्र VGRC से उम्मीदें

राजकोट में होने वाली इस रीजनल कॉन्फ्रेंस (VGRC) में 22 देशों के 350 से ज्यादा विदेशी प्रतिनिधि और 22 अंतरराष्ट्रीय छात्रों के शामिल होने की उम्मीद है। संभावना है कि जापान, दक्षिण कोरिया, रवांडा, यूक्रेन, वियतनाम और नीदरलैंड जैसे देश इस आयोजन में गुजरात के साथ साझेदारी करेंगे। इसके अलावा कई अंतरराष्ट्रीय संगठन भी इसमें हिस्सा लेंगे। अब तक इस कॉन्फ्रेंस के लिए 5,000 से 6,000 से अधिक रजिस्ट्रेशन हो चुके हैं और अरबों रुपए के निवेश समझौतों (MoUs) की उम्मीद जताई जा रही है।

इस कॉन्फ्रेंस का मुख्य लक्ष्य गुजरात के स्थानीय उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना है। इसमें मोरबी के मशहूर सिरामिक उद्योग, राजकोट के इंजीनियरिंग और ऑटो पार्ट्स हब के साथ-साथ कांडला और मुंद्रा जैसे बंदरगाहों (लॉजिस्टिक्स) को दुनिया से जोड़ने पर खास जोर दिया जाएगा। इसके अलावा मछली पालन (फिशरीज), पेट्रोकेमिकल्स, खेती से जुड़े फूड प्रोसेसिंग उद्योग, खनिज, ग्रीन एनर्जी, जहाज निर्माण और पर्यटन जैसे क्षेत्रों के विकास पर भी पूरा ध्यान दिया जाएगा।

इतना ही नहीं, इस आयोजन में छोटे उद्योगों (MSME), नए स्टार्टअप्स और युवाओं के कौशल विकास (Skill Development) को भी बढ़ावा दिया जाएगा। कॉन्फ्रेंस के दौरान होने वाले विशेष सेमिनार में भविष्य की जरूरतों, जैसे कि समुद्री अर्थव्यवस्था (ब्लू इकोनॉमी), पर्यावरण के अनुकूल स्टार्टअप, शिप रिसाइक्लिंग, ग्रीन हाइड्रोजन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसे आधुनिक विषयों पर विस्तार से चर्चा होगी।

यद्यपि इस समिट में होने वाले कुल निवेश या MoUs का कोई सटीक आँकड़ा अभी सामने नहीं आया है, लेकिन उत्तर गुजरात VGRC की शानदार सफलता को देखते हुए यह माना जा रहा है कि यहाँ भी हजारों की संख्या में MoUs होंगे और लाखों करोड़ रुपए का निवेश आएगा।

दक्षिण गुजरात VGRC (सूरत)

दक्षिण गुजरात की इस रीजनल कॉन्फ्रेंस में मुख्य रूप से केमिकल्स और पेट्रोकेमिकल्स, टेक्सटाइल (कपड़ा उद्योग), जेम्स एंड ज्वेलरी (हीरा उद्योग), पर्यटन, खेती और फूड प्रोसेसिंग पर ध्यान दिया जाएगा। जैसा कि हम जानते हैं, सूरत भारत में हीरे और कपड़ों के व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र है, इसलिए इस कॉन्फ्रेंस से इन क्षेत्रों में नए निवेश और निर्यात (एक्सपोर्ट) को रफ्तार मिलने की बड़ी उम्मीद है। इस आयोजन के जरिए सूरत, वलसाड और नवसारी जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में भारी निवेश आकर्षित करने का लक्ष्य रखा गया है।

मध्य गुजरात VGRC (वडोदरा)

वडोदरा में होने वाली इस कॉन्फ्रेंस में मशीनरी और उपकरण, सेमीकंडक्टर्स, शिक्षा और स्किलिंग, IT (सूचना प्रौद्योगिकी), फार्मास्यूटिकल्स, बायो-टेक, एयरोस्पेस और डिफेंस (रक्षा क्षेत्र) जैसे आधुनिक विषयों पर फोकस रहेगा। इसके अलावा पेट्रोकेमिकल्स, ऑटो कंपोनेंट्स, क्रिटिकल मिनरल्स और पर्यटन पर भी चर्चा होगी। वडोदरा को पहले से ही ‘फार्मा और इंजीनियरिंग हब’ माना जाता है, इसलिए यहाँ हाई-टेक और एडवांस मैन्युफैक्चरिंग यानी आधुनिक तकनीकी उत्पादन पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।

VGRC कैसे दे रहा है ट्रंप के टैरिफ को टक्कर?

जैसा कि हमने देखा, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारतीय निर्यात (एक्सपोर्ट) पर 50% तक टैरिफ लगा दिया गया है। इसका सीधा और बुरा असर गुजरात के हीरा उद्योग, टेक्सटाइल, जेम्स एंड ज्वेलरी, केमिकल्स और सिरामिक्स जैसे प्रमुख क्षेत्रों पर पड़ा है। अमेरिका को होने वाले निर्यात में कमी आई है, जिससे रोजगार पर भी संकट मंडरा रहा है।

इस बड़ी चुनौती का सामना करने के लिए गुजरात सरकार ने वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस (VGRC) को एक रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है। इसके जरिए ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ (ODOP) और क्षेत्रीय ताकतों को बढ़ावा देकर स्थानीय उद्योगों को सीधे ग्लोबल मार्केट से जोड़ा जा रहा है। इसका मकसद अमेरिकी बाजार पर निर्भरता कम करना और आत्मनिर्भरता बढ़ाना है।

नए बाजारों की खोज और नेटवर्किंग: VGRC में होने वाली B2B और B2G मीटिंग्स, बायर्स-सेलर्स मीट और प्रदर्शनियों के माध्यम से स्थानीय निर्माताओं को अफ्रीका, एशिया, यूरोप और मिडिल ईस्ट जैसे नए बाजारों से जोड़ा जा रहा है। इससे अमेरिकी टैरिफ के असर को कम करने और निर्यात को स्थिर रखने में मदद मिल रही है। उदाहरण के लिए, मसालों और डेयरी क्षेत्र में नए एक्सपोर्ट समझौतों और कोल्ड चेन निवेश की उम्मीद की जा रही है।

क्षेत्रवार रणनीति और आर्थिक स्थिरता: हर रीजनल कॉन्फ्रेंस में उस क्षेत्र की खासियतों पर ध्यान दिया जा रहा है। जैसे सौराष्ट्र में सिरामिक्स और पोर्ट्स, तो मध्य गुजरात में सेमीकंडक्टर्स और ग्रीन मोबिलिटी पर जोर देकर निवेश आकर्षित किया जा रहा है। इससे उन उद्योगों को, जिन पर टैरिफ का बुरा असर पड़ा है, रिन्यूएबल एनर्जी, ग्रीन हाइड्रोजन और एयरोस्पेस जैसे उभरते क्षेत्रों की ओर मोड़कर आर्थिक मजबूती दी जा रही है।

समस्याओं का समाधान और भविष्य की योजना: VGRC एक ऐसा मंच है जहाँ स्थानीय उद्यमी, छोटे उद्योग (MSME) और सरकार के नीति-निर्धारक एक साथ बैठते हैं। यहाँ भविष्य की चुनौतियों, नए बाजारों की तलाश और सरकारी प्रोत्साहन (Incentives) जैसे विषयों पर खुलकर चर्चा होती है। यह प्लेटफॉर्म उद्योगों को अपनी चिंताएं साझा करने और मिलकर समाधान खोजने में बड़ी मदद कर रहा है।

भविष्य की दिशा और बड़े लक्ष्य

वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट का 11वाँ संस्करण पहले 2026 में होने वाला था, लेकिन अब इसे साल 2027 के लिए टाल दिया गया है। इसके पीछे मुख्य कारण 2027 के गुजरात विधानसभा चुनाव, तैयारी के लिए अतिरिक्त समय और सेमीकंडक्टर, ग्रीन हाइड्रोजन व रिन्यूएबल एनर्जी जैसी दूरगामी पॉलिसियों पर ध्यान केंद्रित करना है। इस बीच, VGRC (रीजनल कॉन्फ्रेंस) एक मजबूत आधार का काम कर रही है, ताकि राज्य के हर क्षेत्र का विकास सुनिश्चित हो सके। 2027 की ग्लोबल समिट इन्हीं क्षेत्रीय सफलताओं के दम पर और भी बड़े निवेश को आकर्षित करेगी।

अर्थव्यवस्था का महा-विजन: वर्तमान में भारत की जीडीपी (GDP) में गुजरात का योगदान लगभग 8.3-8.5% है। राज्य सरकार का लक्ष्य साल 2047 तक गुजरात को $3.5 ट्रिलियन की इकोनॉमी बनाना है। इस विजन के तहत प्रति व्यक्ति आय को $38,000-$40,000 तक पहुँचाने और ‘नेट जीरो एमिशन’ (पर्यावरण अनुकूल विकास) का लक्ष्य रखा गया है। VGRC इस मिशन में एक महत्वपूर्ण कड़ी है- क्षेत्रीय विकास के जरिए ही राज्य के योगदान को बढ़ाकर भारत की अर्थव्यवस्था को नई ऊँचाइयों पर ले जाया जाएगा।

स्थानीय उम्मीदें और वैश्विक सपने: VGRC का असली उद्देश्य स्थानीय आकांक्षाओं को वैश्विक अवसरों से जोड़ना है। इससे शहरी और ग्रामीण इलाकों के विकास में संतुलन आएगा और छोटे उद्योगों (MSME) व स्टार्टअप्स को नई ताकत मिलेगी। इन चारों क्षेत्रीय सम्मेलनों की सफलता 2027 की ग्लोबल समिट के लिए एक मजबूत नींव रखेगी, जिसमें बड़े पैमाने पर अंतरराष्ट्रीय भागीदारी देखने को मिलेगी।

एक नए युग की शुरुआत वाइब्रेंट गुजरात रीजनल कॉन्फ्रेंस महज एक आयोजन नहीं, बल्कि गुजरात की आर्थिक मजबूती और सबको साथ लेकर चलने वाले विकास का प्रतीक है। इस क्षेत्रीय रणनीति के जरिए गुजरात वैश्विक चुनौतियों का डटकर मुकाबला कर रहा है, स्थानीय उद्योगों को सशक्त बना रहा है और हर गुजराती को विकास का भागीदार बना रहा है। 2047 तक $3.5 ट्रिलियन की इकोनॉमी की ओर बढ़ता गुजरात, इन क्षेत्रीय और ग्लोबल रणनीतियों के दम पर भारत के विकास का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ बनेगा।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती की लेखक प्रार्थना आमीन ने लिखी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

सिर्फ भगवान शिव का स्थान ही नहीं, अनंत काल से समंदर में सनातन की शक्ति का प्रतीक भी है सोमनाथ: जानें- व्यापारिक नेटवर्क से दुनिया की प्राचीन संस्कृतियों को कैसे साधता था भारत

जियोपॉलिटिकल थ्योरिस्ट निकोलस स्पाईकमैन की एक थ्योरी है- ‘Those who control the rimland, control the heartland’ यानी समुद्र पर नियंत्रण रखने वाला ही जमीन की सत्ता तय करता है। आजकल की जियो पॉलिटिक्स के लिए यह 20वीं सदी का सिद्धांत है लेकिन भारत के लिए यह कोई नया विचार नहीं था। भारत यह जानता था कि जो समुद्र को समझता है, वही जमीन को सुरक्षित रख सकता है और इसी ज्ञान का सबसे बड़ा प्रतीक था एक मंदिर, जो सिर्फ पूजा का स्थल नहीं था बल्कि हिंद महासागर से जुड़ी एक पूरी सभ्यता का प्रवेश-द्वार था। उस मंदिर का नाम था- ‘सोमनाथ’।

सोमनाथ को केवल इतिहास की एक अलग-थलग घटना के रूप में देखना एक बड़ी ऐतिहासिक भूल है। आम तौर पर इसे महज इतना समझ लिया जाता है कि गजनी आया, मंदिर टूटा और कहानी समाप्त हो गया। जबकि सच यह है कि सोमनाथ एक लंबी और सुनियोजित श्रृंखला का पहला बड़ा प्रहार था। उस भारतीय समुद्री सभ्यता पर, जो सदियों से हिंद महासागर को अपने नियमों पर चला रही थी। अगर हम सोमनाथ को कच्छ, भरूच, सूरत, कोंकण और अंत में गोवा से जोड़कर नहीं देखते, तो इतिहास का असली पैटर्न कभी सामने ही नहीं आएगा।

11वीं सदी से पहले भारत को केवल जमीन तक सीमित मानना, उसके इतिहास को अधूरा पढ़ने जैसा है। भारत उस दौर में एक  मैरी-टाइम पावर विदाउट एम्पायर था (maritime power without empire)। एक ऐसी समुद्री शक्ति, जो उपनिवेश नहीं बनाती थी लेकिन महासागरों में मौजूद थी। अरब सागर और हिंद महासागर में भारतीय व्यापारी, नाविक और तीर्थयात्री बिना किसी डर के आवाजाही करते थे।

पहली सदी का यूनानी ग्रंथ टपेरिप्लस ऑफ द एरिथ्रीअन सीट (Periplus of the Erythraean Sea) यानी, एरिथ्रियन सागर का समुद्री वृत्तांत साफ बताता है कि भारत का व्यापारिक नेटवर्क ओमान, यमन, बसरा और पूर्वी अफ्रीका तक फैला हुआ था।

ये सारी बातें सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं हैं। भारत की समुद्री समझ कोई खोई हुई कहानी नहीं बल्कि एक जीवित परंपरा है बल्कि इसीका एक उदाहरण आज हमारे सामने है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आर्थिक सलाहकार Sanjeev Sanyal इन दिनों INSV कौंडिन्य नाम के एक खास जहाज की यात्रा पर हैं।  संजीव सान्याल खुद इस जहाज पर सवार होकर रोजाना इस यात्रा के अपडेट भी शेयर कर रहे हैं।

ये जहाज इसलिए भी खास है क्योंकि यह कोई आम नौसेना का जहाज नहीं है। यह जहाज बिल्कुल उसी तरह बनाया गया है, जैसे हजार साल पहले भारतीय व्यापारी जहाज बनाए जाते थे। इसमें एक भी लोहे की कील नहीं है। पूरा जहाज नारियल की रस्सियों से सिला हुआ है। यानी वही तकनीक, जिससे भारत मजबूती से कभी समुद्रों में मौजूद था।  इस  INSV कौंडिन्य जहाज की यात्रा गुजरात से शुरू हुई है और ओमान तक, लगभग 1400 किलोमीटर का समुद्री सफर तय कर रही है। भारतीय नौसेना का यह विशेष अभियान दुनिया को यह दिखाने के लिए है कि भारत की समुद्री विरासत कोई हवा हवाई बातें नहीं, बल्कि ये एक जाँची परखी, व्यावहारिक और वैश्विक प्रणाली रही है।

यह व्यवस्था किसी एक केंद्र से संचालित होने वाला सिस्टम नहीं थी, बल्कि कई हाथों में बँटा हुआ, फिर भी मजबूती से काम करने वाला एक डिसेंट्रलाइज्ड नेटवर्क था। इसका केंद्र राज्य नहीं, बल्कि मंदिर थे। मध्यकालीन भारत में विशेषकर 10वीं से 12वीं सदी के चोल और सोलंकी काल में मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं थे, बल्कि उस समय की अर्थव्यवस्था के केंद्रीय वित्तीय संस्थान के रूप में काम करते थे।

राजा और व्यापारी अपनी आय का बड़ा हिस्सा मंदिरों को दान करते थे, जिसे मंदिर तिजोरियों में बंद नहीं रखते थे। यह पूंजी व्यापारी गिल्डों और मर्चेंट यूनियनों को ब्याज पर दी जाती थी, ताकि वे सुमात्रा, जावा, जांजीबार और पूर्वी अफ्रीका तक की जोखिमपूर्ण समुद्री यात्राएँ कर सकें। समुद्र पार व्यापार में डूबते जहाज, लूट और मौसम जैसे बड़े जोखिम शामिल थे, जिन्हें कोई अकेला व्यापारी नहीं झेल सकता था लेकिन मंदिरों का विशाल खजाना इन नुकसानों को सहन कर सकता था। सफल होकर लौटने पर व्यापारी मुनाफे का एक हिस्सा मंदिर को अर्पित करते थे।

हिंदू समुद्री व्यापार संस्थागत था और इसमें मणिग्रामम और ऐन्नुरुवर जैसी श्रेणियाँ थीं, जिन्हें ‘पाँच सौ स्वामी’ भी कहा जाता था। इनके पास अपनी निजी सेनाएँ और नौसेनाएँ होती थीं, जो समुद्री डाकुओं से जहाजों की रक्षा करती थीं। पश्चिमी भारत में इस पूरी व्यवस्था का सबसे बड़ा केंद्र था सोमनाथ। प्रभास पाटन का बंदरगाह हड़प्पा काल से सक्रिय था। रोमन साम्राज्य से लेकर पश्चिम एशिया और अफ्रीका तक का व्यापार यहीं से ऑपरेट होता था। द्वारका से लेकर सोमनाथ और खंभात तक फैला तटीय मार्ग केवल व्यापार का नहीं बल्कि तीर्थ, संस्कृति और सामाजिक जुड़ाव का मार्ग था। इस तरह से सोमनाथ केवल भगवान शिव का निवास नहीं था। वह समुद्री भारत का फाइनेंशियल, सांस्कृतिक और कानूनी केंद्र था।

इस्लाम की एंट्री और उम्मा का इकॉनमी आतंक

सातवीं सदी के बाद हिंद महासागर में अरब और फारसी व्यापारी उभरे, जिन्होंने अंजुवन्नम जैसे व्यापारिक संघ बनाए। हिंदू नेटवर्क जहाँ मंदिर और गिल्ड्स पर आधारित था तो वहीं जबकि इस्लामिक नेटवर्क मस्जिद और बाजार पर। दसवीं-ग्यारहवीं सदी तक मुस्लिम नेटवर्क ने हिंदू व्यापारियों को पीछे धकेलना शुरू किया।

इसी दौरान महमूद गजनवी का सोमनाथ हमला हुआ, एक सुनियोजित रणनीति, जिसमें लगभग 20 मिलियन दीनार की संपत्ति लूटी गई। सोमनाथ टूटने के बाद वहाँ मस्जिद नहीं बनी क्योंकि इसका उद्देश्य धर्म परिवर्तन नहीं बल्कि मंदिर की आर्थिक और कानूनी भूमिका समाप्त करना था। शिवलिंग का खंडन उस कानूनी-आर्थिक इकाई को खत्म करने जैसा था।

खिलाफत और इस्लामी सल्तनतों के लिए व्यापार पैसा कमाने की चीज नहीं बल्कि सत्ता बढ़ाने की रणनीति था। जब उन्होंने देखा कि हिंद महासागर का बड़ा हिस्सा एक ऐसे नेटवर्क के सहारे चल रहा है, जिसे न तलवार से जीता जा सकता है और न सीधे कंट्रोल किया जा सकता है, तो उन्होंने रास्ता बदल लिया और सीधी लड़ाई की जगह उस नेटवर्क की रीढ़ तोड़ने पर ध्यान दिया। इसी रणनीति का पहला बड़ा, प्रतीकात्मक वार था, गजनी के महमूद का सोमनाथ अभियान।

सोमनाथ के साथ केवल मंदिर नहीं टूटा बल्कि भारतीय समुद्री आत्मविश्वास भी क्षतिग्रस्त हुआ। यह हमला भारत को धार्मिक नुकसान के साथ-साथ स्ट्रेटेजिक और आर्थिक कमजोरियाँ पहुँचाने के लिए किया गया था। सोमनाथ उस समय समुद्री भारत का प्रतीक था और हमला हिंदू टेम्पल ट्रेड नेटवर्क पर निशाना था। उद्देश्य था सभ्यतागत मनोबल तोड़ना, जिसे आज हम अयोध्या, काशी और सोमनाथ में कल्चरल इकॉनमी के रूप में देख सकते हैं।

इस्लामिक आक्रमणों के बाद, धीरे-धीरे धर्मशास्त्रों में समुद्र पार करने को ‘काला पानी’ कहकर सामाजिक रूप से हतोत्साहित किया जाने लगा। यह एक भू-राजनीतिक हार को सामाजिक नियम में बदलने जैसा था। राधाकुमुद मुकर्जी अपनी किताब में बताते हैं कि कैसे प्राचीन भारत की जीवंत नेविगेशन परंपरा मध्यकाल में शिथिल हो गई। 

यहीं एक अहम तुलना नजर आती है। जब पश्चिम में गजनी सोमनाथ को लूट रहा था, उसी समय पूर्व में राजेंद्र चोल अपनी नौसेना के साथ सुमात्रा पर आक्रमण कर रहे थे। चोलों ने आक्रामक नौसैनिक अभियानों से समुद्र में अपनी शक्ति दिखाई। वहीं. गुजरात और सोलंकी राजवंश वाले क्षेत्रों ने समुद्र को कभी कम नहीं आँका। उन्होंने इसे अपनी ताकत बनाया- एक ओर रक्षा के लिए ताकि दुश्मन आए तो समुद्री रास्तों से मुँहतोड़ जवाब दिया जा सके और दूसरी ओर व्यापार से आय बढ़ाने के लिए।

गजनी के हमले ने भारत की पश्चिमी भुजा को काट दिया। लेकिन भारत की पूर्वी भुजा कुछ और सदियों तक सक्रिय रही। यही कारण है कि भारत की समुद्री सभ्यता एक दिन में नहीं गिरी। उसे हिस्सों में तोड़ा गया।

सोमनाथ मंदिर परिसर में खड़ा ‘बाण स्तंभ’ इसका साफ सबूत है। यह स्तंभ दिखाता है कि प्राचीन भारतीय नाविकों को दिशा की समझ थी, खगोल का ज्ञान था और उन्हें यह भी पता था कि पृथ्वी गोल है। स्तंभ पर लिखा है कि इस बिंदु से दक्षिण ध्रुव तक कोई जमीनी रुकावट नहीं है। आज के उपग्रहों ने साबित कर दिया है कि यह बात सही है।

सोमनाथ के बाद यही कहानी पूरे पश्चिमी तट पर दोहराई गई। भरूच, कोंकण और सौराष्ट्र के पुराने व्यापारिक नगर धीरे-धीरे दबाव में आने लगे। दिल्ली सल्तनत और उसके बाद मुगल साम्राज्य मूल रूप से जमीन पर टिकी हुई ताकतें थीं। उनकी शक्ति खेतों, किलों और सेनाओं पर थी, समुद्र पर नहीं। उन्होंने कभी एक मजबूत और संगठित नौसेना खड़ी करने की गंभीर कोशिश नहीं की।

यहाँ तक कि मुगलों को अपनी हज यात्राओं की सुरक्षा के लिए भी विदेशी नाविकों और बेड़ों पर निर्भर रहना पड़ा। यानी समुद्र उनके लिए शक्ति स्थापित करने का क्षेत्र नहीं था बल्कि एक ऐसी जगह थी जिसे दूसरों के भरोसे छोड़ा गया था। और यही दूरी धीरे-धीरे भारत को उसके समुद्र से और दूर ले जाती चली गई।

मुगल काल

1299 में जब अलाउद्दीन खिलजी की सेनाएँ दोबारा सोमनाथ पहुँचीं, तो मंदिर फिर तोड़ा गया और गुजरात को दिल्ली सल्तनत में मिला लिया गया। इसके साथ ही केवल एक धार्मिक स्थल नहीं गिरा, बल्कि उस पूरे समुद्री तंत्र पर पहला स्थायी प्रशासनिक नियंत्रण स्थापित हुआ। 14वीं सदी में गुजरात सल्तनत स्वतंत्र हुई। 15वीं सदी में यह प्रक्रिया और आगे बढ़ी, जब बहमनी सल्तनत और उससे निकली आदिलशाही ने कोंकण और गोवा पर कब्जा कर लिया। गोवा, जो कभी कदंब और फिर विजयनगर साम्राज्य का हिस्सा था, अब मुस्लिम शासन के अधीन चला गया। पश्चिमी तट पर हिंदू समुद्री प्रभुत्व की आखिरी बड़ी कड़ी भी यहीं टूट गई।

जहाँ-जहाँ इस्लामी व्यापारिक प्रभाव पहुँचा वहाँ केवल कारोबार नहीं फैला बल्कि मस्जिदें, सराय और स्थायी समुदाय भी स्थापित हुए। यह महज धर्म का प्रसार नहीं बल्कि खलीफाओं और इस्लामी सत्ता केंद्रों के संरक्षण में पनपा एक संगठित, समुदाय-आधारित व्यापारिक नेटवर्क था। इसी दौर में हिंद महासागर एक आर्थिक मार्ग से बदलकर राजनीतिक‑धार्मिक नेटवर्क का विस्तार बन गया।

उसी समय भारत का समुद्र से मानसिक जुड़ाव कमजोर पड़ चुका था। परिणामस्वरूप 15वीं सदी में जब पुर्तगाली गोवा पहुँचे तो उन्हें किसी संगठित भारतीय नौसेना का सामना नहीं करना पड़ा। 1498 में वास्को‑डी‑गामा एक ऐसे समुद्र में दाखिल हुआ जो कभी भारतीय जहाजों से भरा रहता था लेकिन अब लगभग खाली था। पुर्तगाली व्यापार नहीं, समुद्र पर प्रभुत्व स्थापित करने आए थे और 16वीं सदी तक उन्होंने हिंदू‑नेतृत्व वाले समुद्री नेटवर्क को लगभग समाप्त कर दिया।

11वीं से 16वीं सदी के बीच यह प्रक्रिया चरणबद्ध रही यानी पहले प्रतीक टूटे, फिर संस्थान कमजोर हुए, फिर प्रशासन बदला और अंततः समुद्र हाथ से निकल गया। महमूद गजनी ने जिसे प्रतीकात्मक रूप से शुरू किया उसे यूरोपीय शक्तियों ने संरचनात्मक रूप से पूरा किया। यह दो नेटवर्कों की टक्कर थी- एक विकेंद्रीकृत हिंदू टेम्पल नेटवर्क और दूसरा राज्य‑समर्थित, केंद्रीकृत इस्लामिक नेटवर्क। नतीजा यह हुआ कि भारत को धीरे‑धीरे उसके ही समुद्र से काट दिया गया और सदियों का समुद्री प्रभुत्व खो गया।

1951 में सोमनाथ का पुनर्निर्माण उस समुद्री भारत की स्मृति को वापस लाने का प्रयास था, जिसे सदियों पहले रणनीतिक रूप से मिटा दिया गया था। सरदार वल्लभभाई पटेल इसे सभ्यतागत आत्मविश्वास की वापसी मानते थे जबकि जवाहरलाल नेहरू तो इसे भारत के सेक्युलर ढाँचे के लिए खतरा मानते थे। इस करण वो हमेशा आशंकित ही रहे और यह आशंका दरअसल उस आत्मविश्वास की थी, जो समुद्र के रास्ते फिर लौट सकता था।

अल-बरूनी ने बहुत पहले लिखा था कि हिंदू अपने राज्य हार सकते हैं, अपने देवता नहीं। आज इसे थोड़ा और आगे बढ़ाकर कहा जा सकता है कि हिंदू सभ्यता को समुद्र से काटा जा सकता है लेकिन समुद्र की स्मृति उससे छीनी नहीं जा सकती। सोमनाथ से गोवा तक की यह कहानी सिर्फ मंदिर बनाम मस्जिद की नहीं है। यह उस क्षण की कहानी है जब एक सभ्यता को समझ में आ गया कि उसे हराने के लिए पहले उसे उसके समुद्र से अलग करना होगा।

Indo-Pacific में भारत की वापसी: एक अधूरी सभ्यता का पुनरागमन

मुगलों के आक्रमणों और उसके बाद की राजनीतिक प्रक्रियाओं ने सोमनाथ से गोवा तक भारत को धीरे-धीरे उसके समुद्र से काट दिया। लेकिन इतिहास कभी सीधी रेखा में नहीं चलता- सभ्यताएँ गिरती नहीं बल्कि लंबी अवधि में बदलाव के दौर लेती हैं। इसलिए आज जब हम ‘इंडो-पैसिफिक’ में भारत की मौजूदगी देखते हैं तो यह कोई अचानक बनी रणनीति नहीं बल्कि उस यात्रा की वापसी जैसी है जो लगभग हजार साल से अधूरी रही।

अक्सर ‘इंडो-पैसिफिक’ को अमेरिकी रणनीति या चीन-विरोधी गठबंधन के नजरिए से देखा जाता है, लेकिन यह अधूरा दृष्टिकोण है। यह क्षेत्र वही है जहाँ कभी भारतीय व्यापार, संस्कृति और नौसैनिक प्रभाव बिना औपनिवेशिक हस्तक्षेप के फैला हुआ था। चोल साम्राज्य की नौसैनिक यात्राएँ, दक्षिण-पूर्व एशिया में मौजूद भारतीय मंदिर और संस्कृत-तमिल शिलालेख इस बात के प्रमाण हैं कि भारत कभी केवल एक महाद्वीपीय राज्य नहीं बल्कि एक समुद्री सभ्यता था।

इतिहासकार के.ए. नीलकांत शास्त्री और आर.सी. मजूमदार बताते हैं कि चोल नौसेना ने श्रीलंका, सुमात्रा और मलय प्रायद्वीप तक सैन्य अभियान तो चलाए ही, साथ ही साथ व्यापारिक और सांस्कृतिक मार्गों को भी सुरक्षित किया। यह कोई औपनिवेशिक कब्ज़ा नहीं था बल्कि ये कनेक्टिविटी और सिक्योरिटी का मॉडल था।

यही मॉडल पश्चिमी भारत में मंदिर-आधारित समुद्री नेटवर्क के रूप में दिखता है। समुद्र यहाँ अधिकार थोपने का साधन नहीं था बल्कि नियंत्रण का माध्यम था। इसीलिए भारत की मौजूदगी समुद्रों में थी लेकिन भारतीय साम्राज्य समुद्रों पर नहीं थोपे गए। भारत का समुद्री स्वभाव वर्चस्व का नहीं, प्रवाह का था।

गजनी से गोवा तक की ऐतिहासिक प्रक्रिया ने भारत को समुद्र से काट दिया और इसका सबसे गहरा असर यह हुआ कि भारत ने अपनी समुद्री कल्पना ही खो दी मुगल काल में शक्ति जमीन पर केंद्रित रही समुद्र को या तो अनदेखा किया गया या दूसरों के भरोसे छोड़ दिया गया अंग्रेजों के आने के साथ यह दूरी स्थायी हो गई और समुद्र भारतीय चेतना से लगभग अलग हो गया यही कारण है कि आजादी के बाद भी भारत दशकों तक एक जमीन-केंद्रित राज्य बना रहा

21वीं सदी में हालात बदल गए चीन का समुद्री विस्तार साउथ चाइना सी का सैन्यीकरण और हिंद महासागर में बढ़ती चीनी मौजूदगी ने भारत को वही सवाल फिर याद दिलाया जो सोमनाथ के बाद धीरे-धीरे भुला दिया गया था समुद्र किसका है यही सवाल भारत की इंडो-पैसिफिक सोच को सही संदर्भ में समझने की कुंजी है।

भारत आज हिंद महासागर क्षेत्र में नौसैनिक साझेदारियाँ बना रहा है, QUAD जैसे ढाँचों में शामिल हो रहा है और अपनी नौसेना को कैरियर केंद्रित बना रहा है यह किसी पश्चिमी एजेंडे की नकल नहीं बल्कि हमारी सभ्यतागत स्मृति की वापसी है INS विक्रांत या अंडमान-निकोबार कमान केवल सैन्य ठिकाने नहीं हैं वे उस टूटे हुए समुद्री भारत के प्रतीक हैं जो दोबारा खड़ा हो रहा है

इंडो-पैसिफिक हिंद महासागर और प्रशांत महासागर को जोड़ने वाला विशाल क्षेत्र है जहाँ आज दुनिया का आधे से ज्यादा व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक गतिविधियाँ केंद्रित हैं भारत इसे स्वतंत्र, खुला और समावेशी इंडो-पैसिफिक कहता है इसका मतलब यह नहीं कि भारत प्रभुत्व चाहता है बल्कि यह कि कोई एक ताकत समुद्र को अपनी जागीर न बना ले 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शांग्री-ला डायलॉग में इसी दृष्टि को स्पष्ट किया था उन्होंने इंडो-पैसिफिक को वह जगह बताया जहाँ सभी देश प्रगति और समृद्धि के लिए साथ आ सकते हैं

यह कोई संयोग नहीं कि भारत आज नियम-आधारित व्यवस्था की बात करता है इसका अर्थ है कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में नियम लागू हों मनमानी नहीं यह वही मॉडल है जो कभी हिंदू मंदिर नेटवर्क में था जहाँ व्यापार नियमों से चलता था तलवार से नहीं जहाँ समुद्र संपर्क का माध्यम था वर्चस्व का नहीं भारत की कोशिश यही है कि क्षेत्र में शांति बनी रहे व्यापार बढ़े और कोई दबंगई न करे।

यही कारण है कि भारत का इंडो-पैसिफिक दृष्टिकोण अमेरिकी या चीनी मॉडल से अलग दिखता है। चीन जहाँ समुद्र को शक्ति और ऋण के जरिए नियंत्रित करना चाहता है तो वहीं भारत सांस्कृतिक परिचितता, व्यापार की निरंतरता और रणनीतिक संयम पर जोर देता है। यह कोई नई नीति नहीं है बल्कि प्राचीन समुद्री सभ्यता की घर वापसी है।

अगर सोमनाथ उस क्षण का प्रतीक था जब भारत को समुद्र से काटा गया, तो इंडो-पैसिफिक में भारत की वापसी उस क्षण का संकेत है जब एक सभ्यता अपनी अधूरी कहानी को फिर से लिखना शुरू करती है। यह कहानी अभी पूरी नहीं हुई है लेकिन इतना तय है कि जो सभ्यता कभी हिंद महासागर की धड़कन थी, वह हमेशा के लिए किनारे पर नहीं रह सकती।

और शायद इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सबक यही है। सोमनाथ का टूटना भारत की समुद्री हार नहीं था लेकिन उसी क्षण से समुद्र भारत की कहानी से बाहर होना शुरू हो गया। आज जो लौट रहा है, वह समुद्र नहीं बल्कि भारत की वही भूली हुई सभ्यतागत आदत है। यही हमारी समुद्री स्मृति है और शायद इसी स्मृति का पर्व हम आज सोमनाथ में मना रहे हैं।

कर्नाटक के विज्ञापन का 69% हिस्सा सिर्फ कॉन्ग्रेस की नेशनल हेराल्ड को, रीडरशिप-O: जानें- कैसे जनता की गाढ़ी कमाई रिश्वतखोरी में उड़ा रही सिद्धारमैय्या सरकार

कर्नाटक सरकार ने कथित तौर पर विवादित अखबार नेशनल हेराल्ड को किसी भी अन्य राष्ट्रीय दैनिक अखबार से ज्यादा विज्ञापन के लिए पैसे दिए हैं, जिससे जनता के पैसों के इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई जा रही है। आधिकारिक दस्तावेजों से पता चला है कि नेशनल हेराल्ड को सरकार के विज्ञापन बजट से करोड़ों रुपए मिले, जबकि राज्य में इसका डिस्ट्रीब्यूशन लगभग नहीं के बराबर है और पाठक संख्या भी लगभग शून्य है।

डेटा से सामने आया है कि नेशनल हेराल्ड को 2023–2024 में 1.90 करोड़ रुपए दिए गए और 2024–2025 में लगभग 1 करोड़ रुपए (यानी 99 लाख रुपए), जबकि प्रतिष्ठित राष्ट्रीय अखबारों को काफी कम रकम मिली, कई को तो दिए गए राशि का आधा से भी कम मिला।

सरकार ने 2024–2025 में राष्ट्रीय प्रकाशनों पर विज्ञापन के लिए 1.42 करोड़ रुपए खर्च किए, जिसमें से अकेले 69% हिस्सा नेशनल हेराल्ड को दिया गया। वहीं, उसी समय प्रमुख राष्ट्रीय दैनिक अखबार खाली हाथ रहे। पिछले तीन सालों में सरकार ने नेशनल हेराल्ड के लिए विज्ञापन पर 4.31 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए हैं, जो किसी भी राष्ट्रीय मीडिया पर हुए खर्च से सबसे ज्यादा है।

सरकार ने 2025–2026 के लिए पहले ही 99 लाख रुपए जारी कर दिए हैं। दिलचस्प बात यह है कि सूचना विभाग की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के पास है। पिछले दो वित्तीय वर्षों में नेशनल हेराल्ड राष्ट्रीय अखबारों में कर्नाटक के विज्ञापन बजट का सबसे बड़ा प्राप्तकर्ता रहा है, भले ही इसके पाठकों की संख्या बेहद कम हो।

खुली लूट, दिनदहाड़े डकैती: बीजेपी का हमला, कॉन्ग्रेस ने किया बचाव

कर्नाटक सरकार के इस कारनामे का खुलासा होने के बाद से राज्य में राजनीतिक हंगामा मच गया है। विपक्ष ने इस फैसले की कड़ी निंदा की है, जबकि सत्ताधारी दल ने इसका बेबाकी से बचाव किया। बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री डॉ. सीएन अश्वथ नारायण ने इसे “टैक्सपेयर्स के पैसे की खुली लूट” करार दिया। उन्होंने कहा कि नेशनल हेराल्ड पहले से ही प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जाँच के दायरे में है।

नारायण ने कहा, “कर्नाटक या कहीं और सर्कुलेशन न होने वाले अखबार को जनता का पैसा क्यों दिया जाए? ऐसी संस्था से, जो पहले से गंभीर आर्थिक जाँच का सामना कर रही है, सरकारी फंड क्यों जोड़े जाएँ?”

केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने भी इसी तरह हमला बोला और कहा कि नेशनल हेराल्ड को किसी भी स्थापित अखबार से ज्यादा विज्ञापन राजस्व मिलना अपने आप में एक घोटाला है। उन्होंने कहा, “इस तथाकथित मालिक सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी इस घोटाले में जाँच के दायरे में हैं और फिलहाल जमानत पर हैं।”

हालाँकि, कर्नाटक के मंत्री ईश्वर खंद्रे ने ईडी की जाँच को ही ‘एंटी-नेशनल’ बता दिया और सवालिया लहजे में पूछा, “नेशनल हेराल्ड को विज्ञापन देने में क्या गलत है?” उन्होंने बीजेपी पर मामले को राजनीतिक रंग देने का आरोप लगाया। हैरानी की बात ये है कि उन्होंने सीधे-सीधे लूट-खसोट के आरोपों को देशभक्ति से जोड़ दिया, जबकि सारी दुनिया को पता है कि नेशनल हेराल्ड के मालिकान कौन हैं और उन पर कैसे आरोप दर्ज हैं।

ईश्वर खंद्रे ने ही नहीं, कर्नाटक के एक और मंत्री ने भी सिद्धारमैय्या सरकार के इस फैसले का बचाव किया। कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के सुपुत्र और कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियांक खड़गे ने आरएसएस तक को मामले में घसीट लिया। उन्होंने बीजेपी से ‘ऑर्गनाइजर’ मैगजीन की फाइनेंशियल डिटेल्स भी माँग ली।

खड़गे ने कहा, “बीजेपी को आरएसएस की मैगजीन ऑर्गनाइजर की फंडिंग के बारे में चिंता करनी चाहिए, न कि नेशनल हेराल्ड की। उनके पास बैंक अकाउंट्स नहीं हैं और वे रजिस्टर्ड तक नहीं हैं। यहाँ सब क्लियर है। नेशनल हेराल्ड नाम का संस्थान कानूनी तौर पर रजिस्टर्ड है। उसे सरकारी और कॉरपोरेट संस्थान भी विज्ञापन देते हैं। ऐसे में इस तरह की बातों को लेकर क्या कोई कानून है कि नेशनल हेराल्ड को विज्ञापन न दिया जाए। अगर ऐसा कोई कानून है, तो हमें भी बताया जाए कि हम कौन से कानून का उल्लंघन कर रहे हैं।”

उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने भी बढ़ती आलोचना के बीच सरकार के फैसले का बचाव किया। उन्होंने जोर देकर कहा, “कोई भी सरकार किसी भी मीडिया संस्था को विज्ञापन दे सकती है जिसे वो अपना काम करते हुए लगे। हमने कई अन्य राज्यों को कन्नड़ अखबारों को विज्ञापन देते देखा है। वो क्या कर रहे हैं? क्या हम उनसे सवाल करेंगे? इसमें कुछ गलत नहीं है।”

राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता ने इसका जवाब देते हुए कहा कि शिवकुमार खुद नेशनल हेराल्ड मामले में जमानत पर हैं, फिर भी सिद्धारमैया कॉन्ग्रेस से जुड़ी संस्था को सरकारी खजाने से पैसे पहुँचा रहे हैं। उन्होंने तर्क दिया, “कर्नाटक सरकार का विज्ञापन राजस्व नेशनल हेराल्ड की कुल कमाई का 69% बनता है, जबकि बाकी सभी स्रोतों से सिर्फ 31% योगदान है। यह दिनदहाड़े डकैती है।”

शिवकुमार ने पिछले साल माना था कि उन्होंने नेशनल हेराल्ड को 25 लाख रुपए दिए थे, यह दावा करते हुए कि यह पार्टी द्वारा संचालित प्रकाशन है। यह बयान तब आया जब उनके भाई डीके सुरेश और तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी को ईडी की चार्जशीट में शामिल किया गया।

बीजेपी ने फिलहाल सिद्धारमैया सरकार से अपने इस कदम का जवाब देने और विज्ञापन फंड वितरण के मानदंडों की पूरी व्याख्या करने की माँग की है।

इस बीच कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता पवन खेड़ा (पार्टी के मीडिया एवं प्रचार विभाग के प्रमुख भी हैं) ने कहा, “नेशनल हेराल्ड आजादी के समय से राष्ट्रीय धरोहर है। अगर मीडिया को ही फंड दिए जाते हैं तो मीडिया को क्या समस्या है।” यह बात उन्होंने सीएनएन-न्यूज18 को दिए इंटरव्यू में कही और पुरानी संस्थाओं को समर्थन देना उचित बताया।

नेशनल हेराल्ड का इतिहास और घोटाले की शुरुआत

नेशनल हेराल्ड प्रवर्तन निदेशालय की मनी लॉन्ड्रिंग जाँच के केंद्र में है, जो इसके मूल कंपनी एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) से जुड़ी है। सोनिया गाँधी और उनके बेटे राहुल गाँधी इस मामले में आरोपित बनाए गए हैं, साथ ही अन्य कॉन्ग्रेस नेताओं के नाम भी हैं।

पंडित जवाहरलाल नेहरू और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों ने 1938 में नेशनल हेराल्ड की स्थापना की थी, जो भारत की आजादी के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी का मुखपत्र बन गया। नेशनल हेराल्ड अखबार एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) द्वारा प्रकाशित किया जाता था। अप्रैल 2008 तक एजेएल पर कॉन्ग्रेस का 90.26 करोड़ रुपए का बकाया था। पार्टी ने समय-समय पर एजेएल को शून्य प्रतिशत ब्याज पर लोन दिए ताकि यह चलता रहे, लेकिन 2008 में यह अस्थिरता के कारण बंद हो गया।

इसके बाद 2010 में यंग इंडियन प्राइवेट लिमिटेड (वाईआईएल) नाम से एक नई कंपनी बनाई गई। इसमें सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी, मोटीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडिस जैसे प्रमुख कॉन्ग्रेसी शामिल थे। पार्टी ने अपने 90 करोड़ रुपए के बकाए की वसूली के अधिकार इस नई कंपनी को मात्र 50 लाख रुपए में ट्रांसफर कर दिए, जिससे यंग इंडियन को एजेएल की बहुमत हिस्सेदारी मिल गई।

एजेएल अपने कर्ज चुकाने में असमर्थ रहा और यंग इंडियन ने अधिकांश शेयर खरीदकर अंततः पूरी कंपनी हासिल कर ली। इसके परिणामस्वरूप सभी संपत्तियां गाँधी परिवार के नियंत्रण वाली संस्था के पास चली गईं। इसमें मुंबई, नई दिल्ली, लखनऊ, भोपाल, इंदौर, पटना आदि प्रमुख शहरों में स्थित अचल संपत्तियाँ शामिल थीं, जिनकी कीमत 2000 करोड़ रुपए से ज्यादा बताई जाती है।

यंग इंडियन ने बाद में घोषणा की कि अखबार प्रकाशित करना उसका उद्देश्य नहीं है, लेकिन फिर भी इस गैर-लाभकारी संस्था ने 2016 में डिजिटल फॉर्मेट में नेशनल हेराल्ड सहित तीन अखबार दोबारा प्रकाशित करना शुरू किया। 2011 में सुब्रमण्यम स्वामी ने दावा किया कि गाँधी परिवार ने यंग इंडियन बनाकर एजेएल की अचल संपत्तियों पर कब्जा करने की योजना बनाई।

उन्होंने इस मामले को अदालत में ले जाकर राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी पर अपनी पार्टी को ठगने का आरोप लगाया। स्वामी ने कहा कि यंग इंडियन ने 90.26 करोड़ रुपए का कर्ज मात्र 50 लाख रुपए में खत्म कर दिया। उनके अनुसार, पार्टी का एजेएल को व्यावसायिक आधार पर ऋण देना गैरकानूनी था।

कई सालों से चल रही जाँच

साल 2014 में मजिस्ट्रेट कोर्ट ने सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी और अन्य को समन जारी किया। इसमें देखा गया कि यंग इंडियन एक ‘नकली ढाँचा’ लगता है जिसके जरिए सार्वजनिक संपत्तियों को निजी उपयोग में लाया गया। उसी साल ईडी और इनकम टैक्स विभाग ने अलग-अलग प्रारंभिक जाँच शुरू की। दिल्ली हाईकोर्ट ने गाँधी परिवार की अपील खारिज कर समन को बरकरार रखा। सोनिया और राहुल को कोर्ट में पेश होना पड़ा और जमानत मिली।

कुछ साल बाद, इनकम टैक्स विभाग की रिपोर्ट और स्वामी की शिकायत के आधार पर 2018 में ईडी ने प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (पीएमएलए) के तहत औपचारिक मामला दर्ज किया।

साल 2022 में जाँच और तेज हुई जब जुलाई में सोनिया से कई दौर की पूछताछ हुई और जून में राहुल से पाँच दिनों में 50 घंटे से ज्यादा पूछताछ की गई। यंग इंडियन और एजेएल से जुड़ी जगहों पर छापे मारे गए। 2022 में एक ट्रायल जज ने स्वामी की 2013 की शिकायत पर यंग इंडियन के खिलाफ इनकम टैक्स जाँच पर संज्ञान लिया, जिसके बाद ईडी ने पीएमएलए के आपराधिक प्रावधानों के तहत नया केस दर्ज किया।

साल 2023 में ईडी ने दिल्ली, मुंबई और लखनऊ में एजेएल की संपत्तियों को अस्थायी रूप से जब्त किया, जिनकी अनुमानित कीमत 750 करोड़ रुपए से ज्यादा थी। 2024 में कॉन्ग्रेस पदाधिकारियों और पूर्व एजेएल कर्मचारियों से और पूछताछ हुई और एजेंसी ने एक और पीएमएलए शिकायत दर्ज की।

पिछले साल ईडी ने दिल्ली की स्पेशल एमपी/एमएलए कोर्ट में सोनिया और राहुल को मुख्य आरोपित बनाते हुए पीएमएलए चार्जशीट दाखिल की। ईडी ने दिल्ली पुलिस के इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (ईओडब्ल्यू) को भी पत्र लिखकर नई एफआईआर दर्ज करने का अनुरोध किया।

इसके बाद आधिकारिक शिकायत दर्ज हुई जिसमें सोनिया और राहुल के साथ कॉन्ग्रेस नेता सुमन दुबे, सैम पित्रोदा और अज्ञात व्यक्तियों के नाम शामिल थे। हालाँकि, दिल्ली कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप खारिज कर दिए क्योंकि वे स्वामी की निजी शिकायत पर आधारित थे।

कोर्ट ने कहा कि दिल्ली पुलिस के ईओडब्ल्यू ने औपचारिक शिकायत दी है और जज ने ईडी के दावों की सत्यता पर विचार करना उचित नहीं समझा। फिर भी, कोर्ट ने कहा कि केंद्रीय एजेंसी अपनी जाँच जारी रख सकती है क्योंकि दिल्ली पुलिस ने औपचारिक शिकायत दर्ज की है।

यह ध्यान देने योग्य है कि नेशनल हेराल्ड मामले में आपराधिक साजिश, पार्टी फंड का दुरुपयोग, मनी लॉन्ड्रिंग, टैक्स चोरी, सार्वजनिक रूप से पट्टे पर दी गई जमीन का व्यावसायिक दुरुपयोग, धोखाधड़ी से कब्जा और जमीन हड़पने जैसे गंभीर आरोप हैं।

कॉन्ग्रेस के लिए कैश काउ बना कर्नाटक

कॉन्ग्रेस ने न केवल कर्नाटक के संसाधनों को अपनी सत्ता बरकरार रखने वाली मुफ्तखोरी की राजनीति के लिए खाली किया है, बल्कि राज्य की संपत्तियों का इस्तेमाल नेशनल हेराल्ड जैसी भ्रष्ट संस्था को सहारा देने के लिए भी किया है। यह सरकार द्वारा निजी हितों के लिए कमजोर खजाने का फायदा उठाने का एक और संदिग्ध कदम बनकर उभरा है।

कॉन्ग्रेस द्वारा ‘धरोहर संस्था’ कहा जाने वाला यह प्रकाशन तब तक शायद ऐसा कहलाने लायक होता, यदि कॉन्ग्रेस की भ्रष्ट प्रथाओं का इतिहास न होता। लेकिन अब गंभीर आरोपों के चलते यह उससे बहुत दूर हो चुका है। सरदार वल्लभभाई पटेल ने भी नेशनल हेराल्ड के भीतर की चालाकी पर प्रकाश डाला था, जिसे नेहरू ने हमेशा की तरह खारिज कर दिया। इस मामले में भी ग्रैंड ओल्ड पार्टी ने साबित कर दिया है कि “जितना बदलाव होता है, उतना ही सब कुछ पहले जैसा रहता है।”

इसके अलावा कॉन्ग्रेस नेताओं ने इस कदम का बचाव किया और आरएसएस को घसीटने की कोशिश की, यह भूलकर कि आरएसएस का प्रकाशन ‘ऑर्गनाइजर’ न तो किसी भ्रष्टाचार में फंसा है और न ही ऐसे किसी आरोप का सामना कर रहा है।

कॉन्ग्रेस से निष्पक्षता और ईमानदारी की उम्मीद करना यूनिकॉर्न की तलाश करने जैसा है। लेकिन उस पौराणिक जीव को ढूँढने की संभावना इससे ज्यादा है जितनी कॉन्ग्रेस से ईमानदारी की। इसके अलावा कॉन्ग्रेस के भ्रष्टाचार से भरे ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए ये कदम हैरान करने वाले नहीं हैं।

वह पार्टी जो कभी ‘Iron Hand’ से शासन करती थी, 2014 में अपने घोटालों की भयानक मात्रा के कारण सत्ता से बाहर हो गई और तब से देश के कुछ ही हिस्सों तक सीमित रह गई है। अब यह जहाँ-जहाँ सत्ता में है, वहाँ से अपनी भ्रष्ट विरासत को बनाए रखने के लिए जो कुछ कर सकती है, कर रही है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

US ने 64 साल पहले वियतनाम में शुरू किया था ‘ऑपरेशन रैंच हैंड’, अब भी दोनों तरफ दिखते हैं तबाही के निशान: जानें- पीढ़ियों को दिए किस तरह के जख्म

अमेरिका ने 10 जनवरी 1962 को वियतनाम में चलाया था ऐसा सैन्य अभियान, जिसमें उसने पूरी ताकत लगा दी और सारी दुनिया में उस ताकत की नुमाइश भी की, लेकिन उस लड़ाई में अमेरिका को मिली हार। ऐसी हार, जिसका असर आज तक दिखता है। अमेरिका ने इस लड़ाई को जीतने के लिए जो सबसे बड़ा अभियान चलाया था, उसने वियतनाम को ऐसे घाव दिए जिसके जख्म आज तक दिखते हैं। ये ऑपरेशन था ‘रैंच हैंड’।

यूँ तो ‘ऑपरेशन रैंच हैंड’ का उद्देश्य था जंगलों को उजाड़ना, ताकि वो वियत कॉन्ग और उत्तरी वियतनामी बलों पर हावी हो सके, लेकिन इसमें न सिर्फ उसे करारी हार का मुँह देखना पड़ा, बल्कि उसने वियतनाम की जल, जंगल, जमीन… सबकुछ तबाह करके रख दिया।

क्या था ऑपरेशन रैंच हैंड?

अमेरिकी रणनीतिकारों का मानना था कि घने जंगल और फसलें वियत कॉन्ग (कम्युनिस्ट गुरिल्ला लड़ाकों ) की सबसे बड़ी ताकत हैं। इसलिए ‘एरिया-डिनायल’ के नाम पर पेड़-पौधों को खत्म कर दिया जाए।

1962 में शुरू हुआ ऑपरेशन ‘रैंच हैंड’ 1971 तक चला। इसको काफी बड़े पैमाने पर किया गया था, जिसमें दक्षिणी वियतनाम के बड़े हिस्से, मैंग्रोव वन, नदियों के किनारे और कृषि भूमि निशाने पर रहे।

एजेंट ऑरेंज सबसे तेज असर दिखाने वाला रसायन था, इसलिए उसका इस्तेमाल सबसे ज्यादा हुआ। समस्या यह भी थी कि T- 2,4,5 के निर्माण में डाइऑक्सिन मिला, जो काफी ज्यादा मात्रा मिला था, जो दीर्घजीवी और जैव-श्रृंखला में जमा होने वाला जहर है। तत्काल प्रभाव जंगलों के पत्ते झड़ना था, लेकिन दीर्घकालिक प्रभाव इंसानों और पर्यावरण पर पड़े, जिनकी कीमत कई पीढ़ियों ने चुकाई।

रसायनकि हथियारों ने वियतनाम की पीढ़ियाँ कर दी बर्बाद

अमेरिकी वायुसेना के C-123 विमानों से 1962 से 1971 के बीच वियतनाम, लाओस और कंबोडिया के हिस्सों में लगभग 1.9 करोड़ गैलन शाकनाशी रसायनों का छिड़काव किया गया। इनमें सबसे ज्यादा इस्तेमाल हुआ एजेंट ऑरेंज, जो 2,4-D और 2,4,5-T का मिश्रण था और इसी के साथ आया घातक डाइऑक्सिन (TCDD)।

जंगल नष्ट हुए, खेत उजड़े, लेकिन दुश्मन नहीं रुका। बल्कि इसके विपरीत इस अभियान ने दशकों तक चलने वाली मानवीय और पर्यावरणीय त्रासदी को जन्म दिया। जन्मजात विकृतियाँ, कैंसर, त्वचा रोग, मानसिक-शारीरिक अपंगता, इन सबका असर वियतनामी नागरिकों और अमेरिकी सैनिकों ने झेला।

समय बीतने के साथ 2021 जब दुनिया ने काबुल में अमेरिकी दूतावास से हेलिकॉप्टरों द्वारा निकालने की तस्वीरें देखीं, तो 1975 के साइगोन पतन की याद ताजा हो गई। तकनीक, ताकत और दावे, सब धरे रह गए।

ऑपरेशन रैंच हैंड अमेरिका की उसी कहानी का अध्याय है, जहाँ सैन्य प्रयोग ने नैतिकता, राजनीति और मानवता, तीनों मोर्चों पर अमेरिका को निचोड़ कर रख दिया था।

पर्यावरण पर क्या पड़ा प्रभाव?

रैंच हैंड ने वियतनाम की प्रकृति और जीवों को गहरी चोट पहुँचाई। लाखों एकड़ जंगल और खेती योग्य जमीन बंजर हो गई। तटीय इलाकों के मैंग्रोव वन, जो तूफानों से रक्षा करते थे, बड़े पैमाने पर नष्ट हो गए। मिट्टी से पोषक तत्व खत्म हो गए, जैव-विविधता घटी और कई क्षेत्रों में आज भी खेती कठिन है।

डाइऑक्सिन मिट्टी और तलछट (नदी के अंदर) दशकों तक बना रहता है। यह पानी और भोजन के जरिये इंसानी शरीर में पहुँचता है, खासकर पशुओं के माध्यम से। नतीजा ये रहा कि युद्ध खत्म होने के बाद भी जहर खत्म नहीं हुआ।

वियतनाम और अमेरिकी सैनिक के स्वास्थ्य पर प्रभाव  

वियतनामी आँकलनों के मुताबिक लाखों लोग एजेंट ऑरेंज के संपर्क में आए और लाखों आज भी इसके स्वास्थ्य प्रभाव झेल रहे हैं। जन्मजात विकृतियाँ, अतिरिक्त उँगलियाँ, स्पाइना बिफिडा, कैंसर, हृदय दोष, विकासात्मक विकार आदि ये सब देखने को मिले। रेड क्रॉस और अन्य अध्ययनों ने गंभीर मामलों की संख्या बहुत बड़ी बताई।


वहीं 26 से 38 लाख अमेरिकी सैनिकों के संपर्क में आने का अनुमान है। वियतनाम में तैनात रहे सैनिकों में कई प्रकार के कैंसर, पार्किंसन, इस्केमिक हृदय रोग जैसे जोखिम बढ़े पाए गए।

अमेरिका में वेटरन्स अफेयर्स विभाग ने कई बीमारियों को एजेंट ऑरेंज से जोड़कर इलाज और लाभ मान्य किए, लेकिन सैनिकों के बच्चों में जन्मजात विकारों के मामले में मान्यता सीमित रही, जिससे पीड़ित परिवारों में असंतुष्ट रहा।

डाइऑक्सिन का रहा पीढ़ियों तक असर

डाइऑक्सिन ऐसा जहरीला रसायन है जो चर्बी में घुल जाता है और शरीर में 11 से 15 सालों तक बना रह सकता है, पर्यावरण में यह 100 साल से भी ज्यादा टिक सकता है।

यह DNA की अभिव्यक्ति को प्रभावित कर सकता है, यानी बिना DNA को नुकसान पहुँचाए भी अगली पीढ़ियों में इसका असर दिख सकता है। यही कारण है कि युद्ध के दशकों बाद भी नवजात शिशुओं में विकृतियाँ दिखीं। स्तन-दूध और रक्त में डाइऑक्सिन के निशान मिले। यह केवल एक समय की दुर्घटना नहीं, बल्कि पीढ़ीगत त्रासदी बन गई।

अमेरिका की जिम्मेदारी

युद्ध के बाद अमेरिका ने लंबे समय तक जिम्मेदारी से दूरी बनाए रखी। 1970 के दशक के अंत में सैनिकों ने कंपनियों पर मुकदमे किए। 1984 में रसायन बनाने वाली कंपनियों ने समझौता किया पर मुआवज़ा सीमित रहा और अपनी गलती को स्वीकार नहीं किया गया।

राजनयिक रिश्ते 1995 में बहाल हुए। 2006 के बाद एजेंट ऑरेंज पर औपचारिक सहयोग शुरू हुआ। अमेरिका ने सफाई और विकलांग सहायता के लिए धन दिया लेकिन यह नुकसान की तुलना में कम था।

वियतनाम में कई हॉटस्पॉट जैसे दा नांग और बिएन होआ एयरबेस आज भी चुनौती हैं। दा नांग में बड़ा प्रोजेक्ट पूरा हुआ पर बिएन होआ में लंबी सफाई अभी भी जारी है।
इस बीच विदेशी सहायता में कटौती की आशंकाओं ने चिंता बढ़ाई, क्योंकि आधा-अधूरा काम जहर को और फैलने का मौका देता है।

साइगोन का पतन और अमेरिका की बदनामी

30 अप्रैल 1975 को साइगोन का पतन हुआ और वियतनाम युद्ध खत्म हो गया। अमेरिकी दूतावास की छत से हेलीकॉप्टरों की मदद से लोगों को निकालने की तस्वीरें पूरी दुनिया में छा गईं। यह अमेरिका की सैन्य और नैतिक हार का प्रतीक बन गया।

ऑपरेशन रैंच हैंड अपने घोषित लक्ष्य में पूरी तरह विफल रहा। जंगल तो उजड़ गए, लेकिन वियत कॉन्ग नहीं रुका। ऑपरेशन रैंच हैंड उस युद्ध का प्रतीक बन गया जहाँ लक्ष्य पाने की कोशिश में नैतिकता को भूला दिया गया और अंतरराष्ट्रीय आलोचना, घरेलू विरोध और नैतिक पतन का शिकार हो गया।

ऑपरेशन रैंच हैंड ने दिखाया कि रासायनिक युद्ध केवल तत्काल रणनीति नहीं, बल्कि लंबे समय तक असर डालने वाला अपराध है। जंगल उखड़ गए लेकिन विरोध नहीं खत्म हुआ। बल्कि इसका सबसे ज्यादा नुकसान अमेरिका को हुआ और उसकी नैतिकता पर सवाल उठने लगे।

आज वियतनाम और अमेरिका के संबंध बेहतर हैं। पर्यटन बढ़ा, रणनीतिक साझेदारी बनी। लेकिन जमीन के नीचे दबा जहर आज भी मौजूद है। पीड़ित परिवार न्याय, इलाज और साफ-सफाई की माँग आज भी  कर रहा हैं।