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जिस ‘चिकन नेक’ को काटना चाहता था शरजील इमाम, वहाँ जमीन के भीतर से गुजरेगी ट्रेन: 40 km अंडरग्राउंड रेल टनल में दफन होंगी इस्लामी साजिशें

सिलीगुड़ी के पास ‘चिकन नेक’ भारत का वह संकरा क्षेत्र है, जो पूर्वोत्तर से पूरे देश को जोड़ता है। इसकी चौड़ाई मात्र 20 किलोमीटर और लंबाई करीब 60 किलोमीटर है। जेल में बंद शरजील इमाम जैसे देशद्रोही हों या बांग्लादेश-चीन जैसे पड़ोसी देश, सबने भारत को नुकसान पहुँचाने के लिए सामरिक दृष्टि से अहम इस ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ को काटने की बात कही थी। इसको देखते हुए अब भारत चिकन नेक को अभेद्य किला में परिवर्तित करने जा रहा है, जिससे दुश्मनों के मंसूबे धरे के धरे रह जाएँगे।

भारत की चिकन नेक को लेकर योजना

केंद्र सरकार चिकन नेक की सुरक्षा को लेकर लेकर काफी गंभीर है। इसके लिए ना केवल आसमान और धरती पर पैनी नजर रखी जा रही है, बल्कि अब धरती के अंदर भी इसकी सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की तैयारी चल रही है। अब चिकन नेक से होते हुए 40 किलोमीटर लंबे रेलवे टनल बनाने की तैयारी चल रही है।

रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मंगलवार (3 फरवरी 2026) को कहा, “नॉर्थ-ईस्ट को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाले स्ट्रेटेजिक कॉरिडोर के लिए खास प्लानिंग हो रही है। अंडरग्राउंड रेलवे ट्रैक बिछाने और मौजूदा ट्रैक को चार लाइन बनाने का काम चल रहा है।” बंगाल में टिन माइल हाट से रंगापानी तक जाने वाली अंडरग्राउंड रेल लाइनें 20-24 मीटर की गहराई पर बिछाई जाएँगी।

भारतीय रेलवे ने पश्चिम बंगाल के टिन माइल हाट और रंगापानी स्टेशनों के बीच अंडरग्राउंड रेल लाइन बिछाना तय किया है। यह भौगोलिक दृष्टि से काफी अहम है। टिन माइल हाट बंगाल के दार्जिलिंग जिले में है, जो सिलीगुड़ी से करीब 10 km दूर है। यह बांग्लादेश बॉर्डर के पास है। यहाँ से बांग्लादेश का पंचगढ़ जिला सिर्फ 68 किलोमीटर दूर है।

‘चिकन नेक’ भारत के लिए क्यों है अहम

चिकन नेक 22 किमी चौड़ी जमीन की पतली सी पट्टी है, ये पूरे भारत को पूर्वोत्तर के 8 राज्यों से जोड़ती है। असल में, यह नॉर्थ-ईस्ट का एकमात्र पुल है, जिससे होकर हाईवे, रेल लिंक, फ्यूल लाइन गुजरती है और यह सैनिक साजोसामान के पूर्वोत्तर तक पहुँचने का एकमात्र रास्ता भी है।

दरअसल चिकन नेक कॉरिडोर सामरिक दृष्टि से ऐसा चौराहा है, जहाँ से दक्षिण में बांग्लादेश, पश्चिम में नेपाल और उत्तर में चीन की चुम्बी वैली जाने का द्वार खुलता है। खास बात यह है कि चुम्बी वैली में, चीनी सेना का अच्छा खासा जमावड़ा है। इसलिए हर दिशा पर भारत को नजर रखने के लिए चिकन नेक की जरूरत है।

चिकन नेक पर कमजोर होते ही भारत का पूर्वोत्तर तक पहुँच खत्म हो जाएगा साथ ही सिक्किम और अरुणाचल जैसे राज्य की सीमा तक पहुँचना भी मुश्किल हो जाएगा। इन राज्यों के बड़े क्षेत्र पर चीन अपना दावा करता रहा है।

अंडरग्राउंड रेल से भारत को जबरदस्त फायदा होगा

रेलवे माल ढोने का सबसे आसान तरीका माना जाता है। एक मालगाड़ी एक बार में करीब 300 ट्रकों के बराबर माल ढो सकती है। चिकन नेक कॉरिडोर में अभी तक निर्माण कार्य जमीन पर होते रहे हैं। इन्हें पड़ोसी देश निशाना बना सकते हैं। प्राकृतिक आपदा से भी इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुँच सकता है। अंडर ग्राउंड टनेल हर आपदा में सुरक्षित रहेगा। न तो इसे दुश्मन देश हवाई हमला कर सकते हैं और न ही ड्रोन, आर्टिलरी से इसे निशाना बनाया जा सकता है। यानी युद्ध के वक्त ये कॉरिडोर जवानों और सामानों की आवाजाही के लिए संजीवनी साबित होगा।

डिफेंस एक्सपर्ट संजीव उन्नीथन के मुताबिक, अंडरग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर का पता लगाना मुश्किल होता है और यह सुरक्षित होता है। युद्ध में आपकी स्थिति मजबूत हो जाती है।”

उन्नीकृष्ण के मुताबिक, केन्द्र का यह कदम सामरिक दृष्टि से सबसे तेज इंफ्रास्ट्रक्चर विकास का उदाहरण है। यह भारत की टनलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर क्षमताओं के परिपक्व होने और कम समय में बड़े प्रोजेक्ट्स शुरू करने की क्षमता को दर्शाता है।

केंद्र सरकार की तारीफ करते हुए असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि यह ‘लंबे समय से चली आ रही स्ट्रेटेजिक कमज़ोरी’ को दूर करने वाला कदम है, जिसे 1971 के युद्ध के बाद ही कर लिया जाना चाहिए था। सरमा ने ट्वीट किया, “प्रस्तावित अंडरग्राउंड रेल लिंक एक बड़ी स्ट्रेटेजिक सफलता है, जो नॉर्थ ईस्ट और देश के बाकी हिस्सों के बीच एक सुरक्षित और फुलप्रूफ ट्रांसपोर्टेशन कॉरिडोर बनाता है।”

चीन का बड़ा सैनिक नेटवर्क पास में है मौजूद

चीन डोकलाम और अरुणाचल प्रदेश के पास इंफ्रास्ट्रक्चर का एक बड़ा नेटवर्क तैयार कर चुका है। सैटेलाइट से तस्वीरों के द्वारा भी इसकी पुष्टि हुई है। दूसरी तरह बांग्लादेश के साथ भारत के रिश्तों में खटास आए हैं। कई कट्टरपंथी बांग्लादेशी नेताओं ने भारत के सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर कब्जा करने और नॉर्थ ईस्ट को अलग करने की धमकी दे चुके हैं।

इसके अलावा, सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास रंगपुर में लालमोनिरहाट एयरबेस को बांग्लादेश फिर से विकसित कर रहा है। ऐसे में पड़ोसी देशों से भारत की एकता को अक्षुण्ण रखने का एकमात्र उपाय है कि हम अपने क्षेत्रों को अभेद्य बना लें।

भारत क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए बंगाल, असम और त्रिपुरा के एयरस्ट्रिप के नेटवर्क को मजबूत करने में जुट गया है। ये एयरस्ट्रिप द्वितीय विश्वयुद्ध के वक्त एक्टिव थे। भारत इन क्षेत्रों में अपनी सुरक्षा मजबूत करने में लगा हुआ है। इसको लेकर बंगाल में चोपड़ा, बिहार में किशनगंज और असम में लचित बोरफुकन में नए आर्मी बेस बनाए हैं। चीन की बढ़ती नेवल मौजूदगी और बांग्लादेश के साथ उसके गहरे डिफेंस जुड़ाव के बीच बंगाल के हल्दिया में एक नया नेवी बेस भी बनने वाला है।

रेलवे के कदम से देश की जीवन रेखा मानी जाने वाली इस नेटवर्क में कहीं से भी मिसाइलों को ट्रांसपोर्ट करना, छिपाना और लॉन्च करना आसान हो जाएगा। देश की सुरक्षा के लिए ये कदम मील का पत्थर साबित होगा।

शरजील इमाम ने चिकन नेक काटने की धमकी दी थी

2020 में दिल्ली दंगों की साजिश रचने वाला और भारत के खिलाफ जहर उगलने वाला शरजील इमाम ने सिलिगुडी कॉरिडोर को लेकर कहा था, “अगर 5 लाख लोग हमारे पास संगठित हों, तो हम हिंदुस्तान और नॉर्थ-ईस्ट को स्थाई तौर पर कट कर सकते हैं। स्थाई नहीं तो कम से कम एक-आध महीने के लिए तो कट कर ही सकते हैं। मतलब, इतना मवाद डालो पटरियों पर, रोड पर कि उन्हें हटाने में एक महीना लगे। जाएँ एयर फोर्स से। असम को काटना हमारी जिम्मेदारी है।”

अमित शाह ने दिया जवाब

शरजील इमाम ने चिकन नेक को अलग करने की बात कही थी, इस पर हाल ही में गृहमंत्री अमित शाह ने सिलिगुड़ी में जवाब दिया। उन्होंने कहा कि सिलीगुड़ी गलियारा भारत का था, है और रहेगा। इसपर धमकी देने या छेड़छाड़ करने की अनुमति किसी को नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा, “दिल्ली में कुछ लोगों ने नारे लगाए कि वे चिकन नेक को काट डालेंगे। अरे इसे कैसे काटोगे क्या तुम्हारे बाप की जमीन है यह भारत की जमीन है इस पर कोई हाथ नहीं लगा सकता”

उन्होंने कहा कि दिल्ली पुलिस ने ऐसे लोगों को जेल में डाल दिया है और विपक्ष ऐसे लोगों की पैरवी कर रहा है। लेकिन देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करने वालों को सुप्रीम कोर्ट ने करारा जवाब दिया और बेल अर्जी भी खारिज कर दी।

AI वीडियो-अप्रकाशित किताब के प्रोपेगेंडा को निशिकांत दुबे ने किताबों के सत्य से धोया, नेहरू-इंदिरा-सोनिया सबकी एक साथ पोल खुलने से बौखलाई कॉन्ग्रेस

पिछले तीन दिनों से संसद में राहुल गाँधी और उनके कॉन्ग्रेसी नेता बवाल मचाए हुए हैं। मुद्दा है चीन का। राहुल गाँधी संसद के भीतर एक ऐसी किताब के अंशों का हवाला दे रहे हैं, जो अभी तक छपी ही नहीं है। उसी किताब के आधार पर सरकार और प्रधानमंत्री को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि चीन के मुद्दे पर सच्चाई छुपाई जा रही है।

लेकिन बुधवार (04 फरवरी 2027) को तस्वीर अचानक बदल गई। बीजेपी नेता निशिकांत दुबे ने राहुल गाँधी की पूरी हवाबाजी महज एक मिनट में धराशायी कर दी। उन्होंने सदन में एक पहले से छपी हुई किताब के कुछ अंश पढ़कर सुनाए। इसके बाद न सिर्फ राहुल गाँधी, बल्कि कॉन्ग्रेस के बाकी नेता भी सन्न रह गए।

बिना छपी किताब और AI वीडियो के सहारे सरकार को बदनाम करने की कोशिश

मामले की शुरुआत 02 फरवरी 2026 को हुई, जब राहुल गाँधी अचानक संसद में कुछ पन्ने निकालकर पढ़ने लगे। उन्होंने इसे सीधे तौर पर ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ से जुड़ा मुद्दा बताया। राहुल गाँधी ने दावा किया कि ये अंश पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे की किताब से हैं। राहुल गाँधी ने कहा कि इस किताब में लिखा है कि चीन के साथ युद्ध जैसे हालात में सरकार ने कोई आदेश नहीं दिया। राहुल गाँधी का दावा है कि नरवणे उस वक्त अकेले पड़ गए थे और सरकार ने जानबूझकर पीछे हटने का फैसला लिया।

राहुल गाँधी के इस दावे पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने तुरंत सवाल उठाए। उन्होंने साफ पूछा कि ये कहानी आखिर आ कहाँ से रही है? राजनाथ सिंह ने कहा कि जिस किताब के अंश संसद में पढ़े जा रहे हैं, वह किताब अब तक छपी ही नहीं है। जब किताब छपी ही नहीं, तो उसके अंशों के आधार पर सरकार पर सवाल कैसे खड़े किए जा सकते हैं।

इसके बाद संसद में जोरदार हंगामा शुरू हो गया, जो अगले दिन के सत्र तक चलता रहा। विपक्ष के नेता टेबल पर चढ़े, स्पीकर की ओर कागज उछाले गए और नारेबाजी से सदन का कामकाज ठप हो गया।

लेकिन सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नीचा दिखाने की कोशिश संसद तक ही सीमित नहीं रही। कॉन्ग्रेस ने अपने आधिकारिक ‘एक्स’ हैंडल से एक AI वीडियो जारी किया, जिसमें उसी बिना छपी किताब की कहानी को विजुअल के रूप में दिखाया गया। इस वीडियो के सहारे से सरकार और प्रधानमंत्री को बदनाम करने की कोशिश की गई।

कॉन्ग्रेस की साजिश, निशिकांत दुबे ने की धराशायी

कॉन्ग्रेस की सरकार और प्रधानमंत्री को बदनाम करने की साजिश का जवाब देने संसद में बीजेपी नेता निशिकांत दुबे मैदान में उतरे। 04 फरवरी 2027 को उन्होंने राहुल गाँधी को सीधे-सीधे जवाब देते हुए जवाहर लाल नेहरू, सोनिया गँधी और इंदिरा गाँधी समेत गाँधी परिवार के अतीत को सदन के सामने खोलकर रख दिया, वह भी सारी छपी हुई किताबों से।

निशिकांत दुबे हाथ में छपी हुई किताबें लेकर आए और कहा कि अगर बिना छपी किताब के पन्ने लहराकर तीन दिन तक संसद ठप की जा सकती है, तो फिर उन किताबों पर भी चर्चा होनी चाहिए जो छप चुकी है और जिनमें कॉन्ग्रेस और नेहरू के कारनामें दर्ज हैं। उन्होंने ‘नेहरू: ए बायोग्राफी’, ‘एडविना एंड नेहरू’ और दूसरी पुस्तकों के अंश पढ़ते हुए नेहरू पर भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग और निजी जीवन की अय्याशियों की पोल खोली।

निशिकांत दुबे ने कहा कि देश को गुमराह करने की कॉन्ग्रेस की आदत पुरानी है और आज वही पार्टी राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भी झूठे नैरेटिव के सहारे प्रधानमंत्री और सरकार को बदनाम करने में लगी है। निशिकांत दुबे का हमाल यही नहीं रुका। उन्होंने राहुल गाँधी से सीधा सवाल किया क्या कॉन्ग्रेस इन किताबों को भी फर्जी बताएगी या फिर सच सामने आने पर चुप्पी साध लेगी।

इस पर कॉन्ग्रेस बौखला गई। प्रियंका गाँधी ने दुबे के बयान पर आपत्ति जताते हुए कहा कि संसद में इस तरह कि किताबें पढ़ना नियमों के खिलाफ है और बीजेपी जानबूझकर नेहरू का नाम उछालकर ध्यान भटकाना चाहती है। कॉन्ग्रेस नेताओं ने इसे निजी हमला बताया और हंगामा शुरू कर दिया।

निष्कर्ष: कॉन्ग्रेस का असली चेहरा

इससे पता चलता है कि कॉन्ग्रेस अब हर उस हद तक जाने को तैयार दिख रही है, जहाँ से सरकार और प्रधानमंत्री को नीचा दिखाया जा सके। पहले संसद में बिना छपी किताब के पन्ने लहराए गए, फिर उसी झूठी कहानी को सच साबित करने के लिए कॉन्ग्रेस ने AI वीडिया बनाकर चलाया। सवाल साफ है, जिस किताब का अस्तित्व ही सार्वजनिक तौर पर नहीं है, उसके सहारे कॉन्ग्रेस ने सरकार और प्रधानमंत्री की छवि खराब करने की पूरी कोशिश की। यह सोची-समझी साजिश नजर आती है।

लेकिन जैसे ही बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने संसद में छपी हुई किताबों का जिक्र कर दिया, कॉन्ग्रेस घबरा गई। जिन किताबों को कोई नकार नहीं सकता, जिनका रिकॉर्ड मौजूद है, जिनके लेखक और पन्ने सबके सामने हैं। उन्हीं से कॉन्ग्रेस को सबसे ज्यादा डर लगने लगा। साफ है, जो पार्टी अप्रकाशित किताब और AI वीडियो के सहारे झूठ गढ़ सकती है, वही पार्टी सच सामने आते ही बौखला जाती है। यही कॉन्ग्रेस का असली चेहरा है।

उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड खत्म, USMEA का हुआ गठन: जानें- पाठ्यक्रम से मान्यता के तरीकों तक, अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के लिए क्या-क्या बदलेगा

उत्तराखंड की धामी सरकार ने उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड को समाप्त कर दिया है। अब इसकी जगह सरकार ने उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण (Uttarakhand State Minority Education Authority – USMEA) का गठन किया है।

अब यह नया शिक्षा प्राधिकरण ही राज्य में चलने वाले सभी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के लिए सिलेबस तय करेगा, मान्यता देगा और शिक्षा की दिशा निर्धारित करेगा। यह नई व्यवस्था जुलाई 2026 से पूरी तरह लागू हो जाएगी जिसके बाद मदरसा बोर्ड का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।

सरकार का कहना है कि यह कदम शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, पारदर्शिता बढ़ाने और सभी अल्पसंख्यक समुदायों को समान अवसर देने के लिए उठाया गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और अल्पसंख्यक मंत्रालय के विशेष सचिव डॉ पराग मधुकर धकाते ने इस फैसले को शिक्षा सुधार की दिशा में एक निर्णायक कदम बताया है।

मदरसा बोर्ड को खत्म करने की जरूरत क्यों पड़ी?

अब तक उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षा की व्यवस्था मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय के मदरसों तक सीमित थी। सरकार का कहना है कि इससे अन्य अल्पसंख्यक समुदायों जैसे सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी को समान शैक्षणिक दर्जा और अवसर नहीं मिल पा रहे थे। इसके अलावा कई मदरसों पर अवैध संचालन, मानकों के उल्लंघन और शैक्षणिक गुणवत्ता की कमी के आरोप भी लगे थे।

राज्य में हाल के वर्षों में सैकड़ों अवैध मदरसों पर कार्रवाई के बाद सरकार इस निर्णय पर पहुँची कि अब एक नई, आधुनिक, समावेशी और जवाबदेह शिक्षा प्रणाली लागू करने की जरूरत है, जिसमें सभी अल्पसंख्यक संस्थानों के लिए एक समान नियम और ढाँचा हो।

अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम, 2025: नई शिक्षा नीति की नींव

मदरसा बोर्ड को समाप्त करने और नई व्यवस्था लागू करने के लिए सरकार ने उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम, 2025 लागू किया है। इस कानून के तहत अब राज्य के सभी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान एक ही प्राधिकरण के अधीन होंगे।

इस अधिनियम के अनुसार, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी समुदायों द्वारा चलाए जाने वाले संस्थानों को एक समान प्रक्रिया के तहत मान्यता दी जाएगी। सरकार ने यह निर्णय इसलिए लिया ताकि इससे शिक्षा प्रणाली अधिक पारदर्शी, न्यायपूर्ण और आधुनिक बने।

क्या है उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण (USMEA)?

नए गठित उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का मुख्य उद्देश्य अल्पसंख्यक छात्रों के लिए बेहतर, आधुनिक और रोजगारोन्मुख शिक्षा सुनिश्चित करना है। यह प्राधिकरण अब यह तय करेगा कि अल्पसंख्यक संस्थानों में कौन-सा पाठ्यक्रम पढ़ाया जाएगा, शिक्षा का स्तर क्या होगा और संस्थानों को किस शर्त पर मान्यता मिलेगी।

सरकार का कहना है कि यह प्राधिकरण संस्थानों के मजहबी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, लेकिन यह सुनिश्चित करेगा कि शिक्षा राज्य शिक्षा बोर्ड के मानकों के अनुरूप हो और छात्रों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ा जा सके।

अब सभी संस्थानों को उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड से मान्यता लेनी होगी और एक समान शैक्षणिक प्रणाली का पालन करना होगा। सरकार का दावा है कि इससे शिक्षा व्यवस्था में भेदभाव खत्म होगा और सभी समुदायों को समान अवसर मिलेंगे।

पाठ्यक्रम में क्या बदलाव होगा?

नई प्रणाली के तहत अब अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड के तय मानकों के अनुसार पढ़ाई करानी होगी। विज्ञान, गणित, भाषा, सामाजिक विज्ञान और आधुनिक विषयों पर अधिक जोर दिया जाएगा ताकि छात्र उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार के लिए बेहतर रूप से तैयार हो सकें।

मजहबी विषय पढ़ाने की अनुमति रहेगी, लेकिन वे शैक्षणिक गुणवत्ता और तय मानकों के अनुरूप होने चाहिए। सरकार का उद्देश्य है कि छात्रों को मजहबी शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक और व्यावहारिक ज्ञान भी मिले।

कौन हैं नए प्राधिकरण के प्रमुख सदस्य?

सरकार ने इस प्राधिकरण में अनुभवी शिक्षाविदों, प्रोफेसरों, समाजसेवियों और प्रशासनिक अधिकारियों को शामिल किया है, ताकि शिक्षा से जुड़े फैसले अकादमिक और बौद्धिक आधार पर लिए जा सकें।

डॉ सुरजीत सिंह गाँधी को इस प्राधिकरण का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है, जो BSM पीजी कॉलेज रुड़की में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे हैं। अन्य सदस्यों में प्रो राकेश जैन, डॉ सैयद अली हमीद, प्रो गुरमीत सिंह, प्रो पेमा तेनजिन, डॉ एल्बा मन्ड्रेले, प्रो रोबिना अमन, समाजसेवी राजेंद्र सिंह बिष्ट और सेवानिवृत्त अधिकारी चंद्रशेखर भट्ट शामिल हैं। इसके अलावा निदेशक कॉलेज शिक्षा, निदेशक SCERT और निदेशक अल्पसंख्यक कल्याण भी पदेन सदस्य होंगे।

मान्यता के लिए सख्त नियम लागू

नई व्यवस्था के तहत अब किसी भी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान को मान्यता पाने के लिए कड़े नियमों का पालन करना होगा। संस्थानों को सोसाइटी, ट्रस्ट या कंपनी एक्ट के तहत पंजीकरण, संस्था के नाम पर भूमि और संपत्ति का रिकॉर्ड, बैंक खाता और वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होगी।

यदि किसी संस्था पर वित्तीय गड़बड़ी, शैक्षणिक मानकों के उल्लंघन या मजहबी और सामाजिक सद्भाव के खिलाफ गतिविधियों का आरोप पाया गया, तो उसकी मान्यता रद्द भी की जा सकती है। सरकार का कहना है कि इससे फर्जी संस्थानों और अवैध संचालन पर लगाम लगेगी।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि अब यह नया प्राधिकरण तय करेगा कि अल्पसंख्यक बच्चों को कैसी शिक्षा दी जाएगी और यह सुनिश्चित करेगा कि सभी संस्थान उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड के मानकों का पालन करें। सरकार का दावा है कि यह कदम अल्पसंख्यक छात्रों को मुख्यधारा से जोड़ने, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, और उन्हें बेहतर भविष्य के लिए तैयार करने की दिशा में उठाया गया है।

क्या होता है लैमिनेटेड बैट, क्यों क्रिकेट में इसके इस्तेमाल की मिली अनुमति: MCC ने एकसाथ बदले 73 नियम

अब क्रिकेट पहले जैसा नहीं रहेगा। मैरीलेबोन क्रिकेट क्लब (MCC) ने क्रिकेट को आधुनिक समय के हिसाब से ढालने के लिहाज से क्रिकेट के नियमों में 73 बदलावों की घोषणा की है। MCC ने ‘लॉज ऑफ क्रिकेट’ का नया संस्करण तैयार किया गया है जो 2022 के बाद पहला संशोधित संस्करण है। क्लब का कहना है कि इन बदलावों का मकसद क्रिकेट के नियमों को खेल की मौजूदा जरूरतों के हिसाब से अपडेट करना है ताकि वे वर्तमान समय के साथ तालमेल बैठा सकें। ये नए नियम अक्टूबर से प्रभावी होंगे।

क्रिकेट के नियमों में किए गए बदलावों को लेकर काफी चर्चा हो रही है। इनमें सबसे अहम बदलाव बहु-दिवसीय मैचों यानी टेस्ट क्रिकेट जैसे मुकाबलों से जुड़ा है। पहले ऐसा होता था कि अगर दिन के आखिरी ओवर में विकेट गिर जाए तो ओवर वहीं खत्म हो जाता था। लेकिन नए नियम के अनुसार अब ऐसा नहीं होगा। अब दिन का आखिरी ओवर पूरा कराया जाएगा और नया बल्लेबाज मैदान पर आकर बाकी गेंदें खेलेगा।

इसके अलावा क्रिकेट में बल्लों को लेकर भी नियम बदले गए हैं। अब लैमिनेटेड बल्लों (यानी कई परतों से बने बल्लों) के इस्तेमाल की अनुमति दे दी गई है। ‘हिट विकेट’ नियम को भी पहले से ज्यादा साफ और आसान तरीके से समझाया गया है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि किन परिस्थितियों में बल्लेबाज को हिट विकेट आउट माना जाएगा। वहीं, ‘ओवरथ्रो’ यानी फील्डिंग के दौरान अतिरिक्त रन मिलने से जुड़े नियम की परिभाषा को भी सरल बना दिया गया है। इनमें सबसे अधिक चर्चा लैमिनेटेड बल्लों को लेकर हो रही है।

पहले लैमिनेटेड बल्ले से खेलना था अवैध

MCC ने ‘लॉज ऑफ क्रिकेट’ के नियम 5.8 के तहत ‘बल्लों की श्रेणियाँ’ (categories of bat) से जुड़े नियम में संशोधन की घोषणा की है। इसके तहत लैमिनेटेड बैट यानी ‘टाइप D’ के बल्लों की सभी तरह के क्रिकेट में अनुमित दी जा रही है। पहले इन बल्लों से ओपन एज क्रिकेट (यानी वयस्क खिलाड़ियों के क्रिकेट) खेलना अवैध माना जाता था। हालाँकि, जूनियर क्रिकेट तक इन बल्लों से खेलने की इजाजत थी।

क्या होते हैं लैमिनेटेड बल्ले?

लैमिनेटेड बल्ला अलग-अलग प्रकार की लकड़ी के टुकड़ों को जोड़कर बनाया जाता है, जिससे विलो लकड़ी से बने बल्लों की तुलना में इसकी लागत काफी कम हो जाती है। इसमें दो या तीन टुकड़ों को आपस में जोड़कर तैयार किया जाता है। आमतौर पर एक इंग्लिश विलो पेड़ को पूरी तरह तैयार होने में 15 साल या उससे अधिक समय लगता है। वहीं, क्रिकेट बल्लों की माँग तेजी से बढ़ रही है। इसी वजह से MCC लंबे समय से लैमिनेटेड बल्लों पर रिसर्च कर रहा था।

साल 2017 में MCC ने पहली बार जूनियर क्रिकेट में लैमिनेटेड बल्लों के इस्तेमाल की अनुमति दी थी। इसके बाद MCC ने दुनियाभर के बैट निर्माताओं के साथ मिलकर इस विषय पर काम किया। पिछले साल अक्टूबर में लॉर्ड्स में एक सम्मेलन भी आयोजित किया गया था। इन सभी प्रक्रियाओं के बाद MCC ने यह फैसला लिया कि लैमिनेटेड बल्लों का इस्तेमाल वयस्कों की क्लब क्रिकेट में भी किया जा सकता है।

और किन प्रमुख नियमों में हुआ बदलाव?

क्रिकेट के नियमों में कई अहम बदलाव किए गए हैं, जो खासतौर पर टेस्ट और मल्टी-डे क्रिकेट पर असर डालेंगे।

दिन के आखिरी ओवर में विकेट पर नया नियम

अब अगर दिन के आखिरी ओवर में विकेट गिरता है, तो ओवर वहीं खत्म नहीं होगा। पहले नया बल्लेबाज अगले दिन आता था, जिससे गेंदबाजों को नुकसान होता था। नए नियम के तहत पूरा ओवर उसी दिन खेला जाएगा, अगर परिस्थितियाँ अनुकूल हों। इससे खेल में रोमांच बढ़ेगा और गेंदबाजों को बेहतर मौका मिलेगा।

शॉर्ट रन पर नियम स्पष्ट

अब बल्लेबाज रन लेने के बाद वापस लौट सकते हैं, अगर धोखा देने की मंशा नहीं है तो कोई सजा नहीं होगी। लेकिन अगर जानबूझकर शॉर्ट रन किया गया, तो फील्डिंग टीम तय करेगी कि अगली गेंद पर कौन बल्लेबाज स्ट्राइक करेगा। इससे नियमों का गलत इस्तेमाल रोकने में मदद मिलेगी।

बाउंड्री कैच पर सख्ती

अब बाउंड्री लाइन के बाहर से बार-बार उछलकर कैच पकड़ना मान्य नहीं होगा। फील्डर बाहर से सिर्फ एक बार गेंद को छू सकता है, इसके बाद उसे पूरी तरह मैदान के अंदर रहना होगा। अगर वह बाहर गिरा या कदम रखा, तो गेंद बाउंड्री मानी जाएगी। इससे विवादास्पद कैच पर रोक लगेगी।

ओवरथ्रो की नई परिभाषा

अब ओवरथ्रो और मिसफील्ड के बीच साफ अंतर किया गया है। अगर फील्डर स्टंप्स पर थ्रो करता है, तो उसे ओवरथ्रो माना जाएगा। लेकिन गेंद रोकने में गलती को ओवरथ्रो नहीं माना जाएगा। इससे रन गिनने को लेकर होने वाला भ्रम कम होगा।

विकेटकीपर के नियम में बदलाव

अब गेंद रिलीज होने से पहले विकेटकीपर के स्टंप्स के सामने आने पर नो-बॉल नहीं होगा। नए नियम के अनुसार गेंद छोड़ने के बाद विकेटकीपर को स्टंप्स के पीछे रहना जरूरी होगा।

हिट विकेट नियम में बदलाव

अगर बल्लेबाज़ शॉट खेलने के बाद संतुलन खोकर स्टंप्स गिरा देता है, तो वह हिट विकेट आउट होगा। अगर फील्डर की टक्कर से वह स्टंप्स पर गिरता है, तो आउट नहीं होगा। साथ ही, बल्लेबाज के हाथ से बल्ला छूटकर स्टंप्स पर लग जाता है, तो वह आउट माना जाएगा। अगर बल्ला किसी खिलाड़ी से टकराकर स्टंप्स गिराए तो बल्लेबाज को आउट नहीं माना जाएगा।

MCC: वो क्लब जो बनाता है क्रिकेट के नियम

क्रिकेट के नियम आज जिस संस्था द्वारा तय किए जाते हैं, वह है MCC यानी मेरिलिबोन क्रिकेट क्लब (Marylebone Cricket Club)। दिलचस्प बात यह है कि MCC कोई अंतरराष्ट्रीय संगठन नहीं बल्कि एक निजी क्रिकेट क्लब है, जिसकी स्थापना 1787 में लंदन में हुई थी। इसके बावजूद MCC को क्रिकेट की दुनिया में नियम निर्धारक संस्था के रूप में मान्यता प्राप्त है।

MCC ने 1788 में क्रिकेट के पहले लिखित और आधिकारिक नियम तैयार किए थे जिन्हें बाद में ‘Laws of Cricket’ के नाम से जाना गया। समय के साथ क्रिकेट का विस्तार दुनिया भर में हुआ लेकिन नियमों को तय करने की जिम्मेदारी MCC के पास ही रही। यही वजह है कि आज भी क्रिकेट के मूल नियम MCC द्वारा बनाए और संशोधित किए जाते हैं।

1909 में जब इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (ICC) की स्थापना हुई, तो अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के संचालन और टूर्नामेंटों की जिम्मेदारी ICC को मिली। हालाँकि, क्रिकेट के नियमों का अधिकार MCC के पास ही रहा। ICC अपने अंतरराष्ट्रीय मैचों में MCC द्वारा बनाए गए नियमों को लागू करता है और जरूरत पड़ने पर MCC के साथ मिलकर उनमें बदलाव करता है।

आज भी जब क्रिकेट में कोई बड़ा बदलाव किया जाता है तो उसका आधार MCC द्वारा तैयार किए गए ‘Laws of Cricket’ होते हैं। MCC समय-समय पर खेल की बदलती परिस्थितियों, तकनीक और आधुनिक क्रिकेट की जरूरतों को देखते हुए नियमों में संशोधन करता है।

ऑनलाइन गेमिंग चैलेंज के लिए 24 घंटे में 4 बच्चों ने की आत्महत्या, किसी ने लगाई फाँसी तो किसी ने बालकनी से कूदकर दी जान: समझें- कितना खतरनाक है यह ट्रेंड और बच्चों को इससे कैसे बचाएँ

गाजियाबाद में 12 साल की पाखी, 14 साल की प्राची और 16 साल की निशिका ने 9वीं मंजिल से कूदकर एक साथ जान दे दी। ये तीनों बहनें थीं। शुरुआती जाँच में ये सामने आया है कि तीनों ‘कोरियन लवर’ ऑनलाइन गेम खेलती थीं।

बताया जा रहा है कि मंगलवार (3 जनवरी 2026) को उन तीनों बहनों के ऑनलाइन गेम का आखिरी टास्क था। तीनों ने टास्क के तहत 9वीं मंजिल से कूद कर जान दे दी। हालाँकि इसकी पुष्टि अभी नहीं हो पाई है, क्योंकि तीनों के फोन की जाँच के बाद ही इसका खुलासा हो पाएगा।

तीनों बहनें पिछले 2 साल से स्कूल नहीं जा रही थीं। इनका पढ़ने में मन नहीं लगता था। पिता ने इसकी वजह से इन्हें डाँटा भी था। तीनों कोरियन कल्चर से काफी प्रभावित थीं। माता-पिता के विरोध के बावजूद ये तीनों मोबाइल पर लगी रहती थीं।

पिता चेतन कुमार के मुताबिक बच्चियाँ काफी वक्त से ये गेम खेल रही थीं और 3 जनवरी को इनका 50वाँ यानी आखिरी टास्क था। इस टास्क को पूरा करने के बाद इनलोगों ने मौत को गले लगा लिया। अब आखिरी टास्क के मुताबिक इन्हें 9वीं मंजिल से कूदना था या टास्क पूरा करने के बाद इनलोगों ने अपने पिता के गेम खेलने से रोकने की वजह से जान दी, ये जाँच का विषय है

बालकनी से कूद गई बच्चियाँ

अभी तक जो बात सामने आई है, इसके मुताबिक बच्चियों ने दो स्टेप वाली सीढ़ी का सहारा लिया और फिर ऊपर चढ़ कर रेलिंग के ऊपर से कूद गई। इस दौरान एक बहन ने दूसरी बहन का हाथ पकड़ा और एक को पीठ पर बैठाया और कूद गई। इन बहनों में 14 साल की प्राची इस गेम की लीडर थी। उसके निर्देश के मुताबिक बाकी दोनों बहनें काम करती थी। हमेशा तीनों साथ रहती थीं। सुसाइड से पहले इनके कमरे में फर्श पर बिखरे हुए फोटो मिले हैं।

इनलोगों ने एक पन्ने का सुसाइड नोट भी लिखा है जिसके अंत में ‘मम्मी पापा सॉरी’ लिखा है। सुसाइड नोट में कहा है कि मुझे माफ कर दो पापा, सॉरी पापा। हार्ट ब्रेक की इमेज बनाई गई है, फिर लिखा है कि ‘इस डायरी में जो कुछ लिखा है, वह सब सच है’ अभी पढ़िए। आई ए रियली सॉरी, सॉरी पापा। दिवारों पर लिखा था, ‘आई एम वेरी वेरी अलोन, मेक मी ए हार्ट ऑफ ब्रोकन।’

पुलिस गेम के कंट्रोलर यानी उस लिंक की तलाश कर रही है, जिसके सहारे इन बच्चियों को निर्देश मिल रहे थे कि कौन-सा टास्क करना है। आखिर फोन में ही वह सारे टास्क होंगे जिसका पालन इन लोगों ने किया है।

भोपाल में भी बच्चे ने दी जान

भोपाल में मोबाइल गेमिंग की लत के चलते एक 14 साल के बच्चे अंश साहू ने फाँसी लगाकर अपनी जान दे दी। परिजनों को शक है कि उसने ऑनलाइन टास्क पूरी करने के लिए फाँसी लगाई। अंश 8वीं क्लास का छात्र था और परिवार का इकलौता बेटा था। उसके माता-पिता प्राइवेट स्कूल में पढ़ाते हैं।

पुलिस के मुताबिक, कुछ दिनों से वह ऑनलाइन गेम खेलने लगा था। माता-पिता ने उसे बहुत समझाया, लेकिन वह मान नहीं रहा था। वह काफी शांत बच्चा था और इनदिनों अकेले रहना पसंद करता था। 3 जनवरी 2026 को दोपहर में माता-पिता घर पर नहीं थे। उस वक्त उसने फाँसी लगा ली। वह कौन सा गेम खेल रहा था और उसकी मौत से इसका क्या संबंध है, इसकी जाँच के लिए फोरेंसिक टीम मोबाइल ले गई है।

ऑनलाइन गेमिंग का बच्चों पर असर

ऑनलाइन गेम्स जैसे पबजी, फ्री फायर और दूसरे गेम्स में बच्चों को टास्क दिया जाता है। एक के बाद एक मिल रहे टास्क को पूरा करने पर बच्चों में जोश आ जाता है। इस दौरान गेम की ऐसी लत लग जाती है कि बच्चा उन्हें पूरा करने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार रहता है। एक तरह के वह मानसिक तौर पर गेम की गिरफ्त में आ जाता है। इसे ‘गेमिंग डिसऑर्डर’ भी कहा जाता है।

इस दौरान बच्चा अपनी दिनचर्या भी भूल जाता है। पढ़ना-लिखना, खेलना-कूदना, स्कूल जाना सब कुछ वह भूल जाता है। बच्चा अकेला रहना पसंद करता है। परिजनों और दोस्तों से वह दूरी बनाने लगता है। आउटडोर गेम खेलना नहीं चाहता। परिजनों के टोकोटाकी से वह गुस्सा जाता है और उसके स्वभाव में चिढ़चिढ़ापन आ जाता है। कई बार बच्चा हिंसक भी हो जाता है।

ऑनलाइन गेमिंग के दौरान बच्चों को पता नहीं होता कि वह किसके साथ गेम खेल रहा है। ऐसे में साथ खेल रहा खिलाड़ी उसे साइबर बुलिंग का शिकार बना सकता है। कई बार दोस्ती करने की कोशिश करते हैं और विश्वास जीत कर निजी जानकारियाँ हासिल करते हैं।

इसी तरह का मामला एक्टर अक्षय कुमार ने सार्वजनिक मंच पर शेयर किया था। उनका कहना था कि उनकी बेटी को ऑनलाइन गेमिंग के दौरान न्यूड होकर फोटो खिंचने की माँग की गई थी। उन्होंने बेटी को समझाया और ऑनलाइन गेमिंग से दूर करने के लिए डॉक्टर से सलाह ली।

ऑनलाइन गेमिंग को छोड़ना इतना आसान नहीं होता, इसलिए जो इसे खेलते हैं, वे खेले बगैर नहीं रह पाते। फाइटिंग और शूटिंग वाले गेम से बच्चों में हिंसक प्रवृति बढ़ती है और इसका उनके दिमाग पर काफी बुरा असर पड़ता है। बच्चों की भाषा असभ्य भी हो जाती है। कई बार बच्चों को डराया धमकाया जाता है।

बच्चों के ‘मन की बात’ को समझना जरूरी

ऑनलाइन गेम कई तरह के होते हैं। कई गेम में दो व्यक्ति खेल रहे होते हैं तो कई गेमों में कई लोग एक साथ खेलते हैं। ऐसे गेम का इस्तेमाल बच्चों के ब्रेनवॉश करने में होता है। उन्हें पेरेंट्स से दूर करने, असामाजिक कार्यों की ओर प्रोत्साहित करने के लिए भी हो सकता है।

एक्सपर्ट के मुताबिक, बच्चों को भावनात्मक तौर पर सहारे की जरूरत होती है। पेरेंट्स से खुल कर बात नहीं कह पाना, जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम और ऑनलाइन रहना, बच्चों को गलत आदतों का शिकार बना सकता है। इसलिए बच्चों से बातचीत करने, उसे भरोसे में लेने और ऐसा माहौल बनाने की जरूरत है, जिससे बच्चा खुद ब खुद अपनी बातें शेयर करे और उसे पेरेंट्स समझा पाएँ।

बच्चों को अगर गेम की लत से दूर रखना या उबारना चाहते हैं तो उसके साथ वक्त बिताएँ। उसे अकेला न छोड़े। परिवार में अनुशासन लाएँ। परिवार कम से कम एक बार एक साथ बैठकर खाना खाय, ये तय करें। बच्चे को प्रोत्साहित करें और उसके साथ बातें करें। बच्चे को अपनी बात कहने देने का पूरा मौका दें। डाँटने-डपटने की जगह उससे दोस्ताना व्यवहार करें और उसके मन की बात को समझने की कोशिश करें। पुरानी पसंदीदा चीजों से उसे जोड़ने की कोशिश करें। मोबाइल और इंटरनेट को सीमित करें। उसके साथ माता-पिता या बहन-भाई, जिससे बच्चा ज्यादा घुल मिल जाता है, वे उसके साथ खेलें। उसे दूसरी चीजों की ओर प्रोत्साहित करे।

बच्चों को मोबाइल देकर न छोड़ें, बल्कि उसकी एक्टिविटी पर नजर रखें। ऑनलाइन गेम खेलने वाले बच्चों पर तो खास तौर पर नजर रखनी चाहिए, ताकि उसके गेम का पता पैरेंट्स को हो। पैरेंट्स अपने बैंक अकाउट की जानकारी बच्चों से शेयर न करें। बच्चों को अगर पैसे देते हैं, तो ये ध्यान दें कि कहीं वह उन पैसों को गेमिंग में तो खर्च नहीं कर रहा।

कई बार बच्चे ऑनलाइन चीजों को सही मान लेते हैं। चाहे गेम में टास्क मिला हो या चैलेंज। उन्हें वह सब सही लगता है और वे उसके परिणाम को समझ नहीं पाते। भोपाल का अंश और गाजियाबाद की तीनों बहनें ऐसे ही टास्क का शिकार थे और उसके लिए उन्होंने खुदकुशी कर ली।

भारत समेत कई देशों ने ऑनलाइन गेम रोका

भारत में ‘प्रमोशन एंड रेगुलेशन ऑफ ऑनलाइन गेमिंग बिल 2025’के तहत ऑमलाइन गेमिंग पर रोक लगाई गई थी। इसके तहत सरकार ने पैसे लगाने वाले और जुए जैसे गेम, सट्टेबाजी और बेटिंग वाले गेम पर पाबंदी लगा दी। भारत के अलावा चीन में 18 साल से नीचे के बच्चों को एक दिन में सिर्फ 3 घंटे गेम खेलने की इजाजत होती है।

इसमें भी विदेशी गेम्स पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। वेनेजुएला, कंबोडिया, तुर्की, सऊदी अरब, अफगानिस्तान, मलेशिया, सिंगापुर जैसे कई देश हैं, जहाँ ऑनलाइन गेम्स खेलने को लेकर कई तरह के प्रतिबंध लगाए गए हैं।

भारत में सभी ऑनलाइन गेम्स पर प्रतिबंध नहीं लगाए गए हैं। केवल पैसे वाले गेम्स पर रोक लगी है। वक्त आ गया है जब ऐसे गेम्स पर भी रोक लगे। बच्चों को गेमिंग और एडल्ट कंटेंट से दूर रखने के लिए कड़े कदम उठाने की जरूरत है। केन्द्र सरकार ने ऑनलाइन गेम्स को लेकर हेल्पलाइन नंबर 155260 जारी किया है। किसी भी तरह के साइबर धोखाधड़ी की स्थिति में संपर्क करें।

300 हिंदू युवतियों को देह व्यापार में धकेला, विदेशों तक फैले नेटवर्क: बस्ती में धर्मांतरण गिरोह का सरगना निकला अजफरुल हक, गुप्त होटल में पीड़िताओं का गैंगरेप

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में अजफरुल हक ने हिंदू युवतियों को प्रेमजाल में फँसाता है और फिर धर्मांतरण करने का दबाव बनाता है। इतना ही युवतियों का अश्लील वीडियो बनाकर ब्लैकमेल भी करता है। ऐसा वो 300 से ज्यादा हिंदू लड़कियों के साथ कर चुका है। उसके विदेशों तक नेटवर्क हैं। वह इन लड़कियों को देह व्यापार में धकेलता है।

मामला तब सामने आया जब बस्ती जिले की ही रहने वाली एक हिंदू पीड़िता ने 15 जनवरी 2026 को पुलिस में शिकायत दर्ज की। पीड़िता ने बताया कि साल 2022 में एक निजी अस्पताल में नौकरी के दौरान अजफरुल से मुलाकात हुई। तब अजफरुल ने खुद को हिंदू नाम ‘प्रिंस’ से संबोधित किया। अजफरुल ने युवती को अच्छे अस्पताल में नौकरी दिलवाने का झाँसा दिया और बातों-बातों में मोबाइल नंबर हासिल कर लिया। फिर शुरू हुई कहानी धर्मांतरण के दबाव की, रेप की और देह व्यापार में धकेलने की।

पीड़िता की आपबीती, भाइयों संग मिलकर किया गैंगरेप

अजफरुल ने पूरी प्लानिंग के साथ हिंदू युवतियों को फँसाता था। वह हाथ में कलावा भी बाँधता, जिससे उसकी असली पहचान सामने न आ सके। वह युवतियों को प्रेमजाल में फँसाकर दुष्कर्म करता, फिर अश्लील वीडियो बनाकर ब्लैकमेल करता और धर्मांतरण का दबाव बनाता।

आजतक को दिए इंटरव्यू में पीड़ित हिंदू युवती ने बताया कि अजफरुल ने बार-बार धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया, उसे टॉर्चर किया गया। यहाँ तक कि उसे ‘इस्लाम जिंदाबाद’ बोलने को भी कहा गया, लेकिन युवती ने इनकार करते हुए कहा कि वह हिंदू है, वह ऐसा कभी नहीं कहेगी।

पीड़िता ने अजफरुल से दूरी बनाई, तो उसके भाई को किडनैप करने की धमकी देने लगा। यहाँ तक कि परिवार को जान से मारने की भी धमकी दी। पीड़िता ने बताया कि अपने परिवार को बचाने के लिए उसे मजबूरत अजफरूल के पास जाना पड़ता था। तब पीड़िता ने अजफरुल के घर उसकी शिकायत लगाने की सोची, लेकिन उसे क्या पता था कि इसके पीछे पूरा गिरोह था।

अजफरुल और उसके भाइयों ने मिलकर पीड़िता का गैंगरेप किया। तब पीड़िता को पता लगा कि अजफरुल थाने का हिस्ट्रीशीटर अपराधी है और इसके काले कारनामों में पूरा घर शामिल है। आरोपितों ने पीड़िता को देह व्यापार में धकेलने की साजिश रची थी।

पीड़िता की FIR में अजफरुल और पूरे परिवार पर आरोप

पीड़िता ने अजफरुल और उसके भाई-बहन समेत पूरे परिवार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। बस्ती जिले के कोतवाली थाना क्षेत्र की रहने वाले युवती ने 15 जनवरी 2026 को 8 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज करवाई, जिसमें अजफरूल हक उर्फ प्रिंस, मजहर हुसेन उर्फ आजाद, मिस्वा उस्मानी, नवेना खातून, बेटू, शान उर्फ सोनू, शमां खान उर्फ शमीम बानो और एक अज्ञात व्यक्ति शामिल है।

FIR में पीड़िता ने आरोप लगाए कि अजफरुल और उसका पूरा परिवार धर्मांतरण गिरोह चला रहा है। इसमें अजफरुल सरगना है। पीड़िता ने यह भी आरोप लगाया कि अजफरुल के भाई शान ने भी उसके साथ रेप किया। शान फरार है। जबकि अजफरुल को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है।

300 हिंदू युवतियों को देह व्यापार में धकेला

पुलिस की जाँच में सामने आया कि आरोपित अजफरुल और उसका गिरहो हिंदू युवतियों का अश्लील वीडियो बनाता था। फिर उसी वीडियो के सहारे युवतियों को ब्लैकमेल करता था। वीडियो वायरल करने की धमकियों से युवतियों को बदनाम होने का डर रहता था, इसी का फायदा उठाकर उन्हें देह व्यापार में धकेला जाता था।

अजफरुल और उसके गिरोह पर 300 हिंदू युवतियों को देह व्यापार में धकेलने का आरोप है। इस धँधे में उसका भाई शान भी मुख्य आरोपित है। इन सभी युवतियों के वीडियो अलग-अलग राज्यों और नेपाल जैसे देशों में भेजे जाते थे। इन वीडियो को देख जिस्म फरोश इन लड़कियों की बोली लगाते थे और अजफरुल इनका सौदागर बनता था।

बस्ती में गुप्त होटल, अजफरुल के काले कारनामों का बना अड्डा

पुलिस के सामने इतने बड़े गिरोह का पर्दाफाश करना एक बड़ी चुनौती है। पुलिस ने अजफरुल के मोबाइल डेटा और सोशल मीडिया अकाउंट्स की जाँच में कई खुलासे हुए हैं। अजफरुल की कई युवतियों के साथ अशल्ली फोटो-वीडियो सामने आई हैं। साथ ही उसके काले कारनामों वाले गुप्त होटल तक भी पुलिस पहुँच गई है।

पुलिस की जाँच में सामने आया कि बस्ती में एक गुप्त होटल संचालित किया जा रहा था, जहाँ आरोपित अजफरुल और उसके मुस्लिम सहयोगी मिलकर हिंदू युवतियों को चुन-चुनकर अपना शिकार बनाते थे। इस होटल में कोई रिसेप्शन नहीं है, न ही कोई आईडी माँगी जाती है।

इस होटल में कई गुप्त दरवाजे हैं, जिनसे पुलिस की भनक लगे ही आरोपित आसानी से फरार हो सकें। होटल में कमरे के भीतर कमरे हैं और एक बेहद संकरी गली बनाई गई है। यहाँ बेखौफ देह व्यापार का धँधा चलाया जा सकता था। पुलिस ने इस होटल पर छापेमारी की। हालाँकि, तब होटल में कोई भी मौजूद नहीं था।

वहीं पुलिस को धर्मांतरण गिरोह के सरगना अजफरुल हक की कुछ अश्लील तस्वीरें भी मिली हैं। जो उसने पीड़ित हिंदू युवतियों के साथ खिंचवाई हैं। इन्हीं तस्वीरों के जरिए वह पीड़िताओं को ब्लैकमेल करता था। फिर देह व्यापार का धँधा करने पर मजबूर करता था।

पुलिस अब सारे सबूतों को मिलाकर कड़िया जोड़ रही है। इससे मामले में कई अहम खुलासे हो सकते हैं। आने वाले दिनों में जाँच जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, वैसे ही बड़े नेटवर्क का भंडाफोड़ होगा।

हिबा को शौहर से मिले धक्के, गाली और कुटाई: वह मुनव्वर राना की सबसे छोटी बेटी है, जिसके हिस्से में तीन तलाक आई

‘किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई, मैं घर में सब से छोटा था मिरे हिस्से में माँ आई’… ये शायर मुनव्वर राना का शेर है। जब मोदी सरकार तीन तलाक के खिलाफ कानून लेकर आई थी, तब मुनव्वर राना और उनका खानदान इस कानून के विरोध में संसद से सड़क तक उतरा था। अब दुर्भाग्य देखिए कि उनकी ही सबसे छोटी बेटी के हिस्से में तीन तलाक आया है।

दरअसल, लखनऊ में मुनव्वर राना की बेटी हिबा राना ने अपने शौहर सैय्यद मोहम्मद साकिब और ससुराल वालों पर तीन तलाक, दहेज के लिए प्रताड़ना और मारपीट के गंभीर आरोप लगाए हैं। लखनऊ के सआदतगंज थाने में दर्ज FIR के मुताबिक, हिबा को उनके शौहर ने 20 लाख रुपए और एक फ्लैट की माँग पूरी न होने पर बेरहमी से पीटा और ‘तीन तलाक’ बोलकर घर से धक्के मारकर बाहर निकाल दिया।

यह वही मुनव्वर राना का परिवार है, जिसने केंद्र सरकार के तीन तलाक विरोधी कानून का सड़कों पर उतरकर विरोध किया था। आज वक्त का पहिया ऐसा घूमा है कि जिस कानून को उन्होंने ‘इस्लाम में हस्तक्षेप’ बताया था, आज उसी कानून की धाराओं के तहत हिबा राना न्याय की गुहार लगा रही हैं।

20 लाख की भूख और सुसराल का असली चेहरा

हिबा राना ने पुलिस को दी अपनी शिकायत में बताया कि उनकी निकाह 19 दिसंबर 2013 को हुई थी। निकाह के समय उनके परिवार ने अपनी हैसियत से बढ़कर करीब 10 लाख रुपए नकद और सोने-हीरे के आभूषण दिए थे। लेकिन ससुराल वालों की लालच की भूख कभी शांत नहीं हुई। निकाह के कुछ समय बाद ही शौहर और ससुर ने 20 लाख रुपए नकद और एक अलग फ्लैट की माँग शुरू कर दी।

हिबा राना का आरोप है कि इस माँग को पूरा न करने पर उन्हें लगातार शारीरिक और मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया गया। कई बार उनके साथ जानवरों की तरह मारपीट की गई और जान से मारने की धमकियाँ दी गईं। हिबा के अनुसार, 9 अप्रैल 2025 को विवाद इतना बढ़ गया कि शौहर साकिब ने उनके साथ गाली-गलौज की और मारपीट शुरू कर दी।

जब हिबा की बहन उन्हें बचाने पहुँची, तो आरोपित और भी भड़क गया। उसने चिल्लाते हुए तीन बार ‘तलाक’ बोला और हिबा को धक्के मारकर घर से बाहर निकाल दिया। इतना ही नहीं, हिबा के दोनों मासूम बच्चों को कमरे में बंद कर दिया गया।

हिबा किसी तरह अपनी जान बचाकर मायके पहुँची और अब पुलिस के पास अपनी सुरक्षा और न्याय के लिए खड़ी हैं। सआदतगंज पुलिस ने शौहर और ससुर के खिलाफ दहेज प्रतिषेध अधिनियम और मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर लिया है।

FIR: आरोपों और धाराओं का जाल

लखनऊ पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर (संख्या 31/2026) में हिबा राना ने अपने शौहर सैय्यद मोहम्मद साकिब और ससुर सैय्यद हसीब अहमद को मुख्य आरोपित बनाया है। पुलिस ने इसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 (क्रूरता), 115(2) (चोट पहुँचाना), 351(2) (आपराधिक धमकी) और 352 के साथ-साथ मुस्लिम महिला (विवाह पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम की धारा 3 और 4 लगाई है। यह वही धाराएँ हैं जिनके तहत ‘तीन तलाक’ देना एक संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध है, जिसमें तीन साल तक की जेल का प्रावधान है।

सोर्स: यूपी पुलिस

मुनव्वर की बेटी हिबा ने अपनी शिकायत में विस्तार से बताया है कि कैसे उनके ससुर भी इस दहेज की माँग और धमकियों में शामिल थे। आरोपितों ने उन्हें मानसिक और शारीरिक यातनाएँ दीं। शिकायत में यह भी दर्ज है कि आरोपित शौहर और उसका परिवार लगातार हिबा को डरा-धमका रहा है। हिबा ने अपनी तहरीर में लिखा है कि उन्हें अपनी सुरक्षा को लेकर गंभीर भय है। पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सबूत जुटाने शुरू कर दिए हैं और जल्द ही आरोपितों की गिरफ्तारी हो सकती है। यह FIR एक दस्तावेज है जो बताता है कि जब रसूखदार परिवारों में भी बेटियाँ सुरक्षित नहीं होतीं, तब सख्त कानूनों की कितनी जरूरत होती है।

सोर्स: यूपी पुलिस

जब जुबाँ पर था विरोध और हकीकत ने दी पटकनी

आजतक चैनल पर एंकर अंजना ओम कश्यप के साथ बहस के दौरान मुनव्वर राना की बेटी ने इस कानून को लेकर जहर उगला था। उरूसा राना का तर्क था कि तलाक की प्रक्रिया में वक्त इसलिए दिया जाता है ताकि सुलह हो सके, इसलिए कानूनी दखल की जरूरत नहीं है। आज विडंबना देखिए, जिस ‘तीन तलाक’ को ये बहनें अस्तित्वहीन बता रही थीं, उसी के जरिए हिबा को घर से निकाला गया।

जब ‘मजहबी रवायत’ के पैरोकारों पर ही गिरी गाज

यह मामला केवल एक महिला के साथ हुई हिंसा का नहीं है, बल्कि यह उन लोगों के दोहरे मापदंडों की पोल खोलता है जो प्रगतिशीलता का नकाब ओढ़कर कट्टरपंथी कुरीतियों का समर्थन करते हैं। मुनव्वर राना ने साल 2016-17 में तीन तलाक कानून का खुलकर विरोध किया था।

मुनव्वर राना ने सार्वजनिक मंचों से उलेमाओं का साथ देते हुए कहा था कि सरकार को मजहबी मामलों में दखल नहीं देना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया था कि ‘जब मुसलमान किसी दूसरे मुल्क का चाँद देखकर ईद नहीं मनाते, तो पाकिस्तान या बांग्लादेश जैसे कानून से यहाँ के मामले कैसे हल हो सकते हैं?’

मुनव्वर राना और उनकी बेटियों- ‘सुमैया और हिबा’ ने इस कानून को मुस्लिम पुरुषों को फँसाने की साजिश करार दिया था। उनका कहना था कि अगर शौहर जेल चला जाएगा, तो औरत और बच्चों का खर्च कौन उठाएगा? लेकिन आज जब हिबा खुद उसी कुप्रथा का शिकार हुईं, तो उन्हें उलेमाओं के फतवों में नहीं, बल्कि भारतीय संविधान और मोदी सरकार के बनाए उसी कानून में सुरक्षा दिखी। यह विडंबना ही है कि जिन रिवाजों को ये लोग अपनी पहचान का हिस्सा मानते हैं, वही रवायतें जब इनके घर की बेटियों को बेघर करती हैं, तब इन्हें ‘सेकुलर’ और ‘आधुनिक’ कानून की याद आती है।

इस्लामी रवायत बनाम आधुनिक बेड़ियाँ: सोशल मीडिया पर उठे सवाल

यह अक्सर देखा गया है कि एक विशेष विचारधारा के लोग इस्लामी रवायतों के पक्ष में बड़े-बड़े तर्क देते हैं। वे इसे अपनी धार्मिक स्वायत्तता बताते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या कोई रवायत किसी इंसान की गरिमा से बड़ी हो सकती है? मुनव्वर राना जैसे लोग, जो अपनी शायरी में ‘माँ’ और ‘ममताबोध’ की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, वे तीन तलाक जैसी महिला विरोधी प्रथा पर उलेमाओं के साथ खड़े नजर आए थे। इन लोगों के लिए मजहबी पहचान अक्सर मानवाधिकारों से ऊपर हो जाती है। लेकिन हकीकत यह है कि ये रवायतें अक्सर महिलाओं के लिए बेड़ियाँ बन जाती हैं।

हिबा राना का केस यह साबित करता है कि धार्मिक कट्टरता और रूढ़िवाद का समर्थन करना तब तक अच्छा लगता है जब तक आग पड़ोसी के घर में लगी हो। जब अपनी ही बेटी को सड़क पर खड़ा कर दिया गया, तब समझ आया कि ‘तलाक-ए-बिद्दत’ (एक बार में तीन तलाक) कितनी खतरनाक बीमारी है। इन लोगों ने जिस कानून को ‘बेवजह’ बताया था, आज वही कानून हिबा के लिए आखिरी उम्मीद की किरण है।

सोशल मीडिया पर नेटिजन्स अब जायज सवाल पूछ रहे हैं कि जब आप इस कानून के खिलाफ थे, तो अब इसका सहारा क्यों ले रहे हैं? एक यूजर ने लिखा कि हिबा और मुनव्वर राना तो तीन तलाक के कट्टर समर्थक थे। जिस कानून का विरोध कर रहे थे, अब उसी की शरण में जाना पड़ रहा है।

एक यूजर ने तीन तलाक कानून के विरोध करने वालों के लिए लिखा, “कुकर्मों का फल”।

एक अन्य यूजर ने लिखा, “दर्दनाक सच सामने है। ट्रिपल तलाक सिर्फ बहस का मुद्दा नहीं, महिलाओं की ज़िंदगी का सवाल है। आज फिर साबित हुआ- कड़ा क़ानून क्यों ज़रूरी था।”

सुप्रीम कोर्ट में कार्यरत प्रशांत उमराव ने भी लिखा, “जब ट्रिपल तलाक का कानून बन रहा था तब इसका विरोध करने वालों में प्रमुख शायर मुनव्वर राणा और उनकी बेटियाँ थी। अब दिवंगत शायर मुनव्वर राना की बेटी हिबा राना को उनके शौहर ने तीन तलाक दे दिया है। हिबा राना ने अपने शौहर मोहम्मद साकिब और ससुर हसीब अहमद के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कराया है।”

दोहरेपन की हार और इंसाफ की पुकार

अंत में, यह मामला मुनव्वर राना के उस पूरे नैरेटिव को ध्वस्त कर देता है जिसमें वे खुद को लोकतंत्र और आजादी का सिपाही बताते थे। साक्षर समाज और प्रभावशाली परिवारों में भी अगर ‘तीन तलाक’ जैसा जहर मौजूद है, तो कल्पना कीजिए कि आम गरीब मुस्लिम महिलाओं का क्या हाल होता होगा। यह कानून किसी मजहब के खिलाफ नहीं, बल्कि उन जालिम मर्दों के खिलाफ है जो अपनी बीवी को एक इस्तेमाल की हुई वस्तु समझकर तीन शब्दों में बाहर फेंक देते हैं।

हिबा राना के साथ जो हुआ वह निंदनीय है, लेकिन उनके परिवार का जो वैचारिक पतन दिखा, वह शर्मनाक है। जिस कानून को मुनव्वर राना और उनकी बेटियों ने कोसते हुए संसद से सड़क तक विरोध किया, आज उसी कानून के नीचे शरण लेना उनकी सबसे बड़ी नैतिक हार है। यह उन तमाम लोगों के लिए सबक है जो तुष्टिकरण और वोट बैंक की राजनीति के लिए महिला अधिकारों की बलि चढ़ा देते हैं। आज मोदी सरकार का वही ‘कड़ा’ कानून हिबा राना को उनके बच्चों की कस्टडी और गुजारा भत्ता दिलाने का आधार बनेगा।

पहलगाम हमले में हिंदुओं का मजाक बनाने वाले मोहम्मद दीपक का दुबई से क्या है संबंध? ऑपइंडिया ने खोली पोल तो फेसबुक पोस्ट हो रहे डिलीट?

उत्तराखंड के कोटद्वार में एक दुकान के नाम को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। यहाँ शोएब अहमद नाम का एक मुस्लिम युवक ‘बाबा स्कूल ड्रेस एंड मैचिंग सेंटर’ नाम से दुकान चला रहा था। इस दुकान के नाम में इस्तेमाल किए गए ‘बाबा’ शब्द को लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध शुरू हो गया।

कोटद्वार के बारे में जानने वाले लोग जानते हैं कि यहाँ ‘बाबा’ शब्द का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है, जिसका मतलब है ‘सिद्धबली बाबा’। कोटद्वार में स्थित भगवान हनुमान को समर्पित सिद्धबली बाबा मंदिर न केवल एक प्राचीन और प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है बल्कि शहर की पहचान और आस्था का केंद्र भी माना जाता है। स्थानीय सनातन समाज की भावनाएँ सिद्धबली बाबा से गहराई से जुड़ी हुई हैं। इस मंदिर की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ भंडारा आयोजित करने के लिए लोगों को वर्षों तक इंतजार करना पड़ता है।

बताया जा रहा है कि शोएब अहमद कई वर्षों से ‘बाबा’ नाम का उपयोग कर दुकान चला रहा था। इस बात पर बजरंग दल के कुछ कार्यकर्ताओं ने आपत्ति जताई। उनका कहना था कि जब दुकानदार सिद्धबली बाबा में आस्था नहीं रखता तो निजी लाभ के लिए ‘बाबा’ नाम का उपयोग करना उचित नहीं है। इसी आधार पर उन्होंने दुकान के नाम से ‘बाबा’ शब्द हटाने की माँग की।

इस बीच मामला और गर्म हो गया जब यूथ कॉन्ग्रेस के जिलाध्यक्ष विजय रावत और पास में ही जिमखाना चलाने वाले दीपक कुमार कुछ युवकों के साथ मौके पर पहुँचे। बताया जा रहा है कि दुकान के नाम से ‘बाबा’ शब्द हटाने की माँग को लेकर वे नाराज हो गए और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं से उनकी बहस शुरू हो गई। घटना के दौरान जब दीपक कुमार से नाम पूछा गया तो उसने अपना नाम ‘मोहम्मद दीपक’ बताया। इसके बाद विवाद और बढ़ गया और माहौल तनावपूर्ण हो गया।

कोटद्वार में दुकान के नाम को लेकर शुरू हुआ विवाद धीरे-धीरे हिंसक झड़प में बदल गया। यूथ कॉन्ग्रेस पदाधिकारी विजय रावत और मोहम्मद दीपक बजरंग दल के कार्यकर्ताओं से भिड़ गए और दोनों पक्षों के बीच धक्का-मुक्की शुरू हो गई। घटना से जुड़े वीडियो में दिखा कि हाथापाई की शुरुआत विजय रावत और मोहम्मद दीपक की ओर से हुई थी। वीडियो में यह भी देखा जा सकता है कि मोहम्मद दीपक बजरंग दल के एक बुजुर्ग कार्यकर्ता के साथ बदसलूकी और धक्का-मुक्की करता नजर आ रहा है।

इस घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गए। इसके बाद मामला केवल स्थानीय विवाद न रहकर राजनीतिक और वैचारिक बहस में बदल गया। सोशल मीडिया पर मोहम्मद दीपक को लेकर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आने लगीं। कुछ वर्गों ने उसे ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ का प्रतीक बताना शुरू कर दिया। रातों-रात मोहम्मद दीपक वामी-इस्लामी, LibTard और कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम की आँखों का तारा बन गया। इसके साथ ही, उत्तराखंड में इस्लामी जिहाद से लड़ने वालों को जमकर बदनाम किया जाने लगा।

इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई। कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए मोहम्मद दीपक को ‘मुहब्बत का दीपक’ बताया और RSS पर समाज में नफरत फैलाने का आरोप लगाया।

वहीं, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता हरीश रावत भी इस विवाद में कूद पड़े। उन्होंने मोहम्मद दीपक को ‘उत्तराखंड का दीपक’ और ‘न्याय की रोशनी’ देने वाला बताया। हरीश रावत पहले भी मुस्लिम यूनिवर्सिटी के मुद्दे को लेकर चर्चा में रह चुके हैं, जिसे कुछ राजनीतिक विश्लेषक 2022 के विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस की हार से जोड़कर देखते हैं।

मामले को आगे समझने से पहले एक नाम पर ध्यान देना जरूरी हो जाता है- मोहम्मद दीपक। कोटद्वार में ‘हल्क जिम’ नाम से जिम चलाने वाले मोहम्मद दीपक को स्थानीय स्तर पर एक प्रभावशाली व्यक्ति के तौर पर देखा जाता है। मोहम्मद दीपक के संबंध यूथ कॉन्ग्रेस के जिलाध्यक्ष विजय रावत से काफी करीबी बताए जाते हैं। इसके अलावा सोशल मीडिया पर उपलब्ध तस्वीरों से यह भी सामने आता है कि उनकी कॉन्ग्रेस के कई बड़े नेताओं के साथ नजदीकियाँ रही हैं।

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता सुरेंद्र सिंह नेगी के साथ मोहम्मद दीपक

मोहम्मद दीपक के फेसबुक अकाउंट से यह भी संकेत मिलता है कि उनके मुस्लिम समुदाय के लोगों के साथ करीबी संबंध हैं। इनमें दुबई में कारोबार करने वाले चाँद मौला बक्श का नाम प्रमुख रूप से सामने आता है। सोशल मीडिया पर मौजूद पोस्ट के मुताबिक, चाँद मौला बक्श मोहम्मद दीपक के लिए बॉडी बिल्डिंग शो आयोजित करवाते हैं। हालाँकि, अब वो धीरे-धीरे इन पोस्ट को चुपचाप डिलीट करने लगा है।

मोहम्मद दीपक का पोस्ट

मोहम्मद दीपक द्वारा साझा किए गए एक वीडियो में एक युवक को नाचते हुए दिखाया गया है, जिसके साथ उन्होंने लिखा है कि ‘चाँद भाई ने कोटद्वार को दुबई बना दिया’।

मोहम्मद दीपक की फेसबुक पोस्ट

मोहम्मद दीपक ने एक विज्ञापन भी पोस्ट किया है जिसमें वो दुबई में 4 और 5 सितारा होटलों में नौकरी के लिए युवाओं को इंटरव्यू के लिए बुला रहे हैं। यहाँ चाँद मौला बक्श के बारे में एक और तथ्य बताना आवश्यक है कि वो भी दुबई में होटल व्यवसाय में ही हैं।

दुबई में इंटरव्यू के लिए दीपक का पोस्ट

दुबई में उत्तराखंड की लोक संस्कृति और परंपराओं के नाम पर कौथिग नाम से एक फेस्टिवल का आयोजन किया जाता है। उत्तराखंड के पहाड़ों से बड़ी संख्या में लोग दुबई में रहते हैं लेकिन उनके कौथिग का मुख्य आयोजक चाँद मौला बक्श होता है। दुर्भाग्य की बात ये है कि गढ़ रत्न नरेंद्र सिंह नेगी भी चाँद मियाँ के इस कौथिग में शामिल होते हैं और चाँद भाई को खाँटी उत्तराखंडी बताते हैं।

मोहम्मद दीपक का एक और वीडियो वायरल हो रहा है जिसमे वो बता रहे हैं कि मोहम्मद नाम में बहुत बड़ी ताकत है।

इसके अलावा उनके कई ऐसे फोटोज और वीडियोज वायरल हो रहे हैं जिनमे साफ दिखाई देता है कि उनकी मुस्लिमों से अच्छी यारी दोस्ती है जिनमे से अधिकतर जिम संचालक या सैलून चलाने वाले हैं। मोहम्मद दीपक की एक और पोस्ट वायरल हो रही है जिसमें वे पहलगाम हमले में शामिल आतंकियों को मुस्लिम कहने वालों को चूति@ कह रहे हैं।

पहलगाम हमले को लेकर मोहम्मद दीपक का पोस्ट

इसी पोस्ट के एक कमेंट में वे कहते हैं कि यदि आतंकियों ने हिंदू मर्दों को मारने से पहले उनकी पैंट उतारी थी तो फिर महिलाओं का क्या उतारा था?

महिलाओं को लेकर मोहम्मद दीपक की टिप्पणी

दीपक कुमार से मोहम्मद दीपक बनने की प्रक्रिया को लेकर कई सवाल सामने आ रहे हैं। उपलब्ध तथ्यों से यह संकेत मिलता है कि उनके नाम परिवर्तन के पीछे कुछ सामाजिक और वैचारिक कारण हो सकते हैं, जिन पर चर्चा की जा रही है।

दीपक कुमार के सोशल मीडिया अकाउंट का विश्लेषण करने पर यह बात सामने आती है कि उनकी फेसबुक वॉल पर हिंदू त्योहारों से जुड़ी शुभकामना पोस्ट लगभग नहीं दिखाई देतीं जबकि ईद जैसे मुस्लिम त्योहारों पर शुभकामनाओं से जुड़ी कई पोस्ट मौजूद हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि अपने नाम में गर्व से मोहम्मद जोड़ने वाले और मोहम्मद को अपनी ताकत का सोर्स बताने वाले दीपक के ब्रेनवॉश के पीछे क्या कोई इस्लामी तंत्र काम कर रहा था?

मोहम्मद दीपक को सेक्युलर जरूर बताया जा रहा है लेकिन उसकी हरकतों से साफ दिखता है कि वह इस्लाम से काफी प्रभावित है। ऐसे में क्या यह संभावना नहीं बनती है कि इसे हथियार बनाकर ‘जिम जिहाद’ का षड्यंत्र चल रहा हो? मोहम्मद दीपक के बहाने अब देवभूमि पर लांछन लगाने का खेल भी शुरू हो चुका है। इससे पहले देहरादून के विकासनगर में कश्मीरी मुसलमानों और मसूरी के बुल्लेशाह मजार के मामले में भी यही नैरेटिव बनाने की कोशिश की गई थी कि देवभूमि उत्तराखंड अब नफरतों का प्रदेश बन चुका है। लेकिन इस नैरेटिव के खिलाफ लोगों की मुखरता है से कट्टरपंथी घबराए हुए हैं।

मुसलमानों के षड्यंत्रों के खिलाफ पहाड़ी समाज अब मुखर होकर सामने आ रहा है, उसे देखकर जिहादियों और दंगाइयों की देवभूमि को निगलने की योजनाएँ खटाई में पड़ती हुई नजर आ रही हैं। ऐसे में अब यह एक नया फॉर्मूला निकाला गया है कि जिहादियों के खिलाफ लड़ने वालों को जमकर बदनाम किया जाए। ऐसा माहौल तैयार किया जाए जिससे संदेश जाए कि देवभूमि के हिंदू ही सनातन की लड़ाई लड़ने वालों के खिलाफ हैं।

मोहम्मद दीपक और कुछ नहीं बस जिहादियों के इस शतरंज का एक छोटा सा प्यादा है, जिसे अंतिम खाने तक चढ़ाकर घोड़ा बना दिया गया है। मोहम्मद दीपक को भारत का हीरो बताने वाले इसके मजे ले रहे हैं और दीपक इसे अपना प्रमोशन समझ रहा है लेकिन उसे पता नहीं है कि अगली कुछ चालों में राजा को फँसाने के लिए उसे क़ुर्बान कर दिया जाएगा।

ये शतरंज इस्लामी जिहादियों ने बिछाई है, इसे खेलने राहुल गाँधी जैसे नेता मैदान में मौजूद हैं जो मुस्लिम वोटर्स की खेती कर के सत्ता तक पहुँचना चाहते हैं और इन सबकी नजर मिला-जुलाकर देवभूमि में दारुल इस्लाम की स्थापना ही है। अगर ऐसा ना होता तो मोहम्मद दीपक को मोहम्मद नाम में ताकत नहीं दिख रही होती और राहुल गाँधी उसे उकसा नहीं रहे होते।

हालाँकि, इस नाम ने क्या खेल किए हैं, इसके प्रमाण इतिहास के साथ साथ भूगोल में भी दर्ज हैं और इन सभी का एक ही मकसद है और वो है सीरिया से लेकर पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश वाला मॉडल ही उत्तराखंड में लागू करना। देवभूमि के लोग इस बात को जितना जल्दी हो सके समझें, वरना इस सेक्युलर कॉकटेल की जद में जब आएँगे, तो वो ये नहीं पूछेंगे कि आप कॉन्ग्रेसी हैं या फिर भाजपाई, आप उनके लिए सिर्फ और सिर्फ काफिर रहेंगे।

गुजरात में दलित को घोड़ी ना चढ़ने देने की वजह आपसी विवाद, NDTV ने घुसाया ‘जातिवाद’: भ्रामक खबर पर हल्ला काट रहे सायमा जैसे वामपंथी, निशाने पर सवर्ण समाज

गुजरात के पाटन जिले का चंद्रुमाणा गाँव सुर्खियों में है, वजह है ‘कथित’ जातिवाद। हम कथित शब्द का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं, पहले यही साफ कर लेते हैं। जातिवाद होता है इससे हम कतई इनकार नहीं कर रहे लेकिन जातिवाद की आड़ में प्रोपेगेंडा भी जमकर होता है और यह ‘कथित’ उसी प्रोपेगेंडा के लिए है। अब समझते हैं कि वो कथित जातिवाद आखिर क्या है?

NDTV ने एक खबर छापी है, शीर्षक है ‘गुजरात में घोड़ी चढ़ने पर दलित दूल्हे पर तलवारों से किया गया हमला’। जाहिर तौर पर इससे वही भाव आता कि कुछ जातिवादी मानसिकता के लोग एक दलित को घोड़ी नहीं चढ़ने दिया जा रहा है।

लोगों को ना लगे कि NDTV की मंशा कुछ और है इसलिए खबर के पहले ही पैरा में उसे और भी स्पष्ट कर दिया गया है। NDTV ने पहली लाइनों में ही लिखा है, “ऐसे समय में जब भारत खुद को वैश्विक तकनीकी नेता और प्रगतिशील महाशक्ति के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, गुजरात के पाटन जिले का एक गाँव देश के ग्रामीण इलाकों में व्याप्त गहरी जातिगत दरारों की याद दिलाता है। दलित समुदाय के एक युवक विशाल चावड़ा के लिए जो दिन सबसे खुशी का होना चाहिए था, वह तलवारों और गालियों के दुःस्वप्न में बदल गया।”

हालाँकि, यह इस खबर का पूरा सच नहीं है। इस खबर में केवल एक चश्मदीद के हवाले से सारे के सारे आरोप गढ़ दिए गए हैं। पुलिस ने जब जाँच की और जो मामला सामने आया वो इस कथित जातिवाद की सारी परतें खोल देता है।

ओबीसी VS दलित मुद्दे को क्या बनाकर पेश किया

दरअसल, 1 फरवरी 2026 को पाटन तालुका पुलिस स्टेशन में एक शिकायत दर्ज कराई गई। शिकायतकर्ता गणपतभाई चावड़ा ने बताया कि उनके बेटे विशाल की शादी 1 फरवरी 2026 को थी। जब दूल्हा बारात के साथ एक मंदिर के पास चौराहे पर पहुँचा तो आरोपित हथियार लेकर वहाँ पहुँचे और उस पर हमला कर दिया। इसके साथ ही उन्होंने जातिसूचक गालियाँ देकर उसे धमकाया।

इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने एक ही परिवार के 8 लोगों के खिलाफ अत्याचार निवारण अधिनियम, भारतीय न्याय संहिता (BNS) और गुजरात पुलिस एक्ट की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया और आगे की जाँच शुरू कर दी।

इस घटना पर ‘ऊँची जाति बनाम दलित’ का नैरेटिव सेट कर प्रोपेगेंडा बनाने की भी कोशिश शुरू हो गई। हालाँकि, सच यह है कि इस घटना के आरोपित ठाकोर समाज से हैं। सभी आरोपित एक ही परिवार के सदस्य हैं। ठाकोर समाज OBC वर्ग में आता है। इसके बावजूद कई रिपोर्टों में यह स्पष्ट नहीं किया गया जिससे इस नैरेटिव को आगे बढ़ाने का खूब मौका मिला।

जमीन और DJ से जुड़ा है विवाद

जब पुलिस ने इस घटना की आगे जाँच की तो पता चला कि आरोपित और शिकायतकर्ता के बीच जमीन को लेकर काफी समय से विवाद चल रहा था। इतना ही नहीं 2022 में भी इन्हीं शिकायतकर्ताओं ने जमानत से जुड़े एक मामले में आरोपितों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें FIR भी दर्ज हुई थी।

SC/ST सेल के प्रभारी और घटना की जाँच कर रहे अधिकारी डीएसपी परेश रेनुका ने मीडिया को बताया कि घटना के समय आरोपितों के घर के आसपास किसी की मौत हुई थी। इसलिए उन्होंने बारात में DJ न बजाने को कहा था। इसी बात को लेकर दोनों पक्षों में कहासुनी हो गई, जो बाद में बढ़ती गई और मारपीट तक पहुँच गई। अधिकारी का साफ-साफ कहना है कि घटना में जातिगत टकराव जैसी कोई बात नहीं है और मामले की असली वजह पुरानी दुश्मनी ही है।

जाति के आधार पर भेदभाव पर किसके साथ?

इस पूरे मामले को ध्यान से समझने पर साफ हो जाता है कि यह घटना न तो जातिगत भेदभाव का मामला है और न ही इसमें तथाकथित ‘उच्च जातियों’ की कोई भूमिका है। लेकिन इसके बावजूद, कुछ लोगों के लिए यह घटना बिना तथ्य जाने-समझे सवर्ण समाज को कटघरे में खड़ा करने का एक और अवसर बन गई।

प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए कुख्यात RJ सायमा ने बिना तथ्यों को जानें ‘उच्च जाति’ पर तंज कसना शुरू कर दिया। RJ सायमा ने ‘X’ पर NDTV की ही खबर शेयर करते हुए तंज भरे लहजे में लिखा, “लेकिन उच्च जातियों को तो भेदभाव का सामना करना पड़ता है ना?”

सायमा अकेली ऐसी नहीं थीं, ‘Nehr who’ नाम के एक यूजर ने भी इसके लिए ‘उच्च जाति’ को जिम्मेदार बताया। यूजर ने NDTV की खबर को कोट करते हुए लिखा, “सुधार: जाति की दीवार तोड़ने पर दलित दूल्हे पर ऊँची जाति के लोगों ने हमला किया। अब आप समझ सकते हैं कि हमें #UGC की जरूरत क्यों है।”

वामपंथी वरुण ग्रोवर ने लिखा, “ये रही सामाजिक एकता।” ऐसे ही सैकड़ों यूजर्स हैं जिन्होंने इस घटना के लिए सवर्ण समाज को निशाने पर लिया है। जाहिर है NDTV से लेकर साम्या-वरुण और उन जैसे वामपंथी लोग जाति के नाम पर समाज के बीच भेदभाव फैलाने की एक और कोशिश करने में लगे हैं।

किसी भी विवाद को सच के बजाय जाति के चश्मे से दिखाने की कोशिश जा रही है। जमीन का पुराना झगड़ा, व्यक्तिगत दुश्मनी या स्थानीय विवाद इन सबको नजरअंदाज करके हर घटना को ‘ऊंची जाति बनाम दलित’ के रूप में पेश किया जा रहा है।

सोशल मीडिया इस आग में घी डालने का काम कर रहा है। अधूरी जानकारी, आधा सच और भ्रामक नैरेटिव तेजी से फैलाए जाते हैं। लोग बिना तथ्य जाँचे ही किसी एक समुदाय को दोषी ठहराने लगते हैं। परिणाम यह होता है कि निर्दोष लोगों या समुदाय को भी अपराधी की तरह देखा जाने लगता है या कुछ लोगों की कोशिश ऐसी ही होती है कि लोग उनको अपना दुश्मन समझने लगें।

यह भी सच है कि देश में जातिगत भेदभाव की समस्याएँ मौजूद हैं और उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन हर घटना को उसी ढाँचे में फिट कर देना भी उतना ही गलत है। जब यह सारा काम एक प्रोपेगेंडा के तहत होने लेग तो यह समाज के लिए जहर बनने लगता है।

‘गोमांस खाने वाले आएँगे तो ब्रजवासियों को सहन नहीं होगा’: बाँके बिहारी मंदिर में मुस्लिम को ठेका मिलने पर गुस्साए संत, सलीम अहमद पर पहचान छिपाकर काम लेने का आरोप

धर्मनगरी वृंदावन के विश्व प्रसिद्ध ठाकुर बाँके बिहारी मंदिर में इन दिनों भक्ति के साथ-साथ भारी आक्रोश का माहौल है। विवाद की जड़ मंदिर परिसर और कॉरिडोर में लग रही स्टील की रेलिंग है। दरअसल, भीड़ को नियंत्रित करने के लिए लगाई जा रही इन रेलिंगों का ठेका एक मुस्लिम ठेकेदार को दिए जाने की खबर जैसे ही फैली, ब्रज के साधु-संतों और हिंदू संगठनों ने इसे अपनी आस्था पर सीधा प्रहार बताते हुए मोर्चा खोल दिया है।

सोमवार (2 फरवरी 2026) को यह मामला उस समय और गरमा गया जब संतों ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर इस ठेके को तुरंत रद्द करने और मामले की उच्च स्तरीय जाँच कराने की माँग की। संतों का सीधा आरोप है कि ठेकेदार ने अपनी पहचान छिपाकर यह काम हासिल किया है।

क्या है पूरा विवाद: 21 हजार रेलिंग और ‘कनिका कंस्ट्रक्शन’ का पेच

बाँके बिहारी मंदिर में श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए प्रशासन ने दर्शन व्यवस्था को सुगम बनाने के लिए कतारबद्ध इंतजाम करने का फैसला लिया था। इसके तहत मंदिर के प्रवेश द्वार से निकास द्वार तक लगभग 21 हजार स्टील की रेलिंग लगाई जानी हैं। इस काम का टेंडर मेरठ की कंपनी ‘कनिका कंस्ट्रक्शन’ को दिया गया है।

विवाद तब शुरू हुआ जब स्थानीय लोगों और संतों को पता चला कि इस कंपनी के मुख्य पार्टनर सलीम अहमद (कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक कॉन्ग्रेस नेता सलीम खान) हैं। संतों का दावा है कि मंदिर जैसे परम पावन स्थान के भीतर, जहाँ भगवान की नित्य सेवा होती है, वहाँ किसी गैर-सनातनी को निर्माण कार्य का जिम्मा देना परंपराओं के खिलाफ है। सोशल मीडिया पर भी एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें लोग हरिद्वार की हर की पौड़ी का उदाहरण देते हुए मंदिर में मुस्लिम ठेकेदार के प्रवेश पर सवाल उठा रहे हैं।

संतों की तीखी प्रतिक्रिया: ‘गौमांस खाने वाले ब्रज में स्वीकार्य नहीं’

श्रीकृष्ण जन्मभूमि संघर्ष न्यास के अध्यक्ष दिनेश फलाहारी महाराज ने इस मामले में बेहद कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में कहा कि ब्रज वह भूमि है जहाँ राधा-कृष्ण ने महारास रचाया और माखन चोरी की लीलाएँ कीं।

फलाहारी महाराज ने कहा, “बाँके बिहारी जी के आंगन में गौमांस खाने वाले और सनातन धर्म को न मानने वाले लोगों का प्रवेश ब्रजवासियों को कभी सहन नहीं होगा। ये लोग हिंदुओं को काफिर कहते हैं, ऐसे में इन्हें मंदिर प्रांगण से एक किलोमीटर दूर तक नहीं फटकने देना चाहिए।” उन्होंने आगे तर्क दिया कि भारत में कुशल हिंदू ठेकेदारों की कोई कमी नहीं है, तो फिर ‘मुगलों के वंशजों’ को यह काम क्यों सौंपा गया, जिन्होंने हमारे मंदिर तोड़कर वहाँ नमाज पढ़ी थी।

पहचान छिपाकर ठेका लेने का संगीन आरोप

रिपोर्ट के मुताबिक, संतों का सबसे बड़ा आरोप यह है कि सलीम अहमद ने अपनी असल पहचान और कंपनी की जानकारी को स्पष्ट न करते हुए, यानी कथित तौर पर ‘पहचान छिपाकर‘ यह ठेका हासिल किया है।

संतों ने माँग की है कि टेंडर प्रक्रिया की बारीकी से जाँच हो कि आखिर किस अधिकारी की मिलीभगत से यह काम कनिका कंस्ट्रक्शन को मिला। चर्चा यह भी है कि इस टेंडर को दिलाने में मथुरा के एक एडीएम स्तर के अधिकारी का हाथ है और इसी कंपनी को कोविड काल में भोजन बाँटने का काम भी दिया गया था।

प्रबंधन समिति की सफाई: ‘अकबर भी तो आए थे’

इस भारी विरोध के बीच बाँके बिहारी मंदिर की हाई पावर मैनेजमेंट कमेटी के सदस्य शैलेंद्र गोस्वामी का बयान भी सामने आया है। उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात की आधिकारिक जानकारी नहीं थी कि ठेका लेने वाली कंपनी का स्वामी मुस्लिम है।

हालाँकि, उन्होंने एक तर्क देते हुए कहा कि ‘बाँके बिहारी जी के प्राकट्य कर्ता स्वामी हरिदास जी के दर्शन करने और उनका संगीत सुनने के लिए तो स्वयं मुगल शासक अकबर भी यहाँ आए थे।’ हालाँकि, संतों ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि दर्शन करना और मंदिर के गर्भगृह के पास निर्माण कार्य करने में जमीन-आसमान का अंतर है।

आगे क्या? संतों ने दी आंदोलन की चेतावनी

फिलहाल, विरोध को देखते हुए मंदिर में रेलिंग लगाने का काम ठप पड़ा है। संतों ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक यह टेंडर निरस्त कर किसी सनातनी भाई को नहीं दिया जाता, वे चुप नहीं बैठेंगे। ब्रजवासियों और भक्तों में भी इस बात को लेकर भारी रोष है। अब सबकी नजरें लखनऊ पर टिकी हैं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस संवेदनशील मामले में क्या फैसला लेते हैं।

वहीं, ADM पंकज वर्मा ने इसे बैंक का प्रोजक्ट बताया है। पंकज वर्मा ने आज तक से बातचीत में कहा है, “यह रेलिंग मंदिर के बजट से नहीं, बल्कि उन बैंकों द्वारा लगाई जा रही है जहाँ मंदिर का पैसा जमा होता है। बैंकों ने अपने CSR फंड के माध्यम से इसका प्रस्ताव दिया था। बैंक ने कोटेशन के आधार पर ‘कनिका कंस्ट्रक्शन’ को चुना।” प्रशासन का कहना है कि इस संस्था का संचालन रंजन नामक व्यक्ति द्वारा किया जा रहा है और मंदिर में काम की देखरेख फील्ड मैनेजर रुपेश शर्मा कर रहे हैं