गुजरात के पाटन जिले का चंद्रुमाणा गाँव सुर्खियों में है, वजह है ‘कथित’ जातिवाद। हम कथित शब्द का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं, पहले यही साफ कर लेते हैं। जातिवाद होता है इससे हम कतई इनकार नहीं कर रहे लेकिन जातिवाद की आड़ में प्रोपेगेंडा भी जमकर होता है और यह ‘कथित’ उसी प्रोपेगेंडा के लिए है। अब समझते हैं कि वो कथित जातिवाद आखिर क्या है?
NDTV ने एक खबर छापी है, शीर्षक है ‘गुजरात में घोड़ी चढ़ने पर दलित दूल्हे पर तलवारों से किया गया हमला’। जाहिर तौर पर इससे वही भाव आता कि कुछ जातिवादी मानसिकता के लोग एक दलित को घोड़ी नहीं चढ़ने दिया जा रहा है।
लोगों को ना लगे कि NDTV की मंशा कुछ और है इसलिए खबर के पहले ही पैरा में उसे और भी स्पष्ट कर दिया गया है। NDTV ने पहली लाइनों में ही लिखा है, “ऐसे समय में जब भारत खुद को वैश्विक तकनीकी नेता और प्रगतिशील महाशक्ति के रूप में प्रस्तुत कर रहा है, गुजरात के पाटन जिले का एक गाँव देश के ग्रामीण इलाकों में व्याप्त गहरी जातिगत दरारों की याद दिलाता है। दलित समुदाय के एक युवक विशाल चावड़ा के लिए जो दिन सबसे खुशी का होना चाहिए था, वह तलवारों और गालियों के दुःस्वप्न में बदल गया।”

हालाँकि, यह इस खबर का पूरा सच नहीं है। इस खबर में केवल एक चश्मदीद के हवाले से सारे के सारे आरोप गढ़ दिए गए हैं। पुलिस ने जब जाँच की और जो मामला सामने आया वो इस कथित जातिवाद की सारी परतें खोल देता है।
ओबीसी VS दलित मुद्दे को क्या बनाकर पेश किया
दरअसल, 1 फरवरी 2026 को पाटन तालुका पुलिस स्टेशन में एक शिकायत दर्ज कराई गई। शिकायतकर्ता गणपतभाई चावड़ा ने बताया कि उनके बेटे विशाल की शादी 1 फरवरी 2026 को थी। जब दूल्हा बारात के साथ एक मंदिर के पास चौराहे पर पहुँचा तो आरोपित हथियार लेकर वहाँ पहुँचे और उस पर हमला कर दिया। इसके साथ ही उन्होंने जातिसूचक गालियाँ देकर उसे धमकाया।
इस शिकायत के आधार पर पुलिस ने एक ही परिवार के 8 लोगों के खिलाफ अत्याचार निवारण अधिनियम, भारतीय न्याय संहिता (BNS) और गुजरात पुलिस एक्ट की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया और आगे की जाँच शुरू कर दी।
इस घटना पर ‘ऊँची जाति बनाम दलित’ का नैरेटिव सेट कर प्रोपेगेंडा बनाने की भी कोशिश शुरू हो गई। हालाँकि, सच यह है कि इस घटना के आरोपित ठाकोर समाज से हैं। सभी आरोपित एक ही परिवार के सदस्य हैं। ठाकोर समाज OBC वर्ग में आता है। इसके बावजूद कई रिपोर्टों में यह स्पष्ट नहीं किया गया जिससे इस नैरेटिव को आगे बढ़ाने का खूब मौका मिला।
जमीन और DJ से जुड़ा है विवाद
जब पुलिस ने इस घटना की आगे जाँच की तो पता चला कि आरोपित और शिकायतकर्ता के बीच जमीन को लेकर काफी समय से विवाद चल रहा था। इतना ही नहीं 2022 में भी इन्हीं शिकायतकर्ताओं ने जमानत से जुड़े एक मामले में आरोपितों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी, जिसमें FIR भी दर्ज हुई थी।
SC/ST सेल के प्रभारी और घटना की जाँच कर रहे अधिकारी डीएसपी परेश रेनुका ने मीडिया को बताया कि घटना के समय आरोपितों के घर के आसपास किसी की मौत हुई थी। इसलिए उन्होंने बारात में DJ न बजाने को कहा था। इसी बात को लेकर दोनों पक्षों में कहासुनी हो गई, जो बाद में बढ़ती गई और मारपीट तक पहुँच गई। अधिकारी का साफ-साफ कहना है कि घटना में जातिगत टकराव जैसी कोई बात नहीं है और मामले की असली वजह पुरानी दुश्मनी ही है।
जाति के आधार पर भेदभाव पर किसके साथ?
इस पूरे मामले को ध्यान से समझने पर साफ हो जाता है कि यह घटना न तो जातिगत भेदभाव का मामला है और न ही इसमें तथाकथित ‘उच्च जातियों’ की कोई भूमिका है। लेकिन इसके बावजूद, कुछ लोगों के लिए यह घटना बिना तथ्य जाने-समझे सवर्ण समाज को कटघरे में खड़ा करने का एक और अवसर बन गई।
प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए कुख्यात RJ सायमा ने बिना तथ्यों को जानें ‘उच्च जाति’ पर तंज कसना शुरू कर दिया। RJ सायमा ने ‘X’ पर NDTV की ही खबर शेयर करते हुए तंज भरे लहजे में लिखा, “लेकिन उच्च जातियों को तो भेदभाव का सामना करना पड़ता है ना?”
But upper’ed’ castes face discrimination na? https://t.co/m5sqW5jvtD
— Sayema (@_sayema) February 2, 2026
सायमा अकेली ऐसी नहीं थीं, ‘Nehr who’ नाम के एक यूजर ने भी इसके लिए ‘उच्च जाति’ को जिम्मेदार बताया। यूजर ने NDTV की खबर को कोट करते हुए लिखा, “सुधार: जाति की दीवार तोड़ने पर दलित दूल्हे पर ऊँची जाति के लोगों ने हमला किया। अब आप समझ सकते हैं कि हमें #UGC की जरूरत क्यों है।”
Corrections: Dalit groom attacked by Upper caste for breaking the caste barrier.
— Nehr_who? (@Nher_who) February 2, 2026
Now you know why we need #UGC https://t.co/FeHvpoYJhN
वामपंथी वरुण ग्रोवर ने लिखा, “ये रही सामाजिक एकता।” ऐसे ही सैकड़ों यूजर्स हैं जिन्होंने इस घटना के लिए सवर्ण समाज को निशाने पर लिया है। जाहिर है NDTV से लेकर साम्या-वरुण और उन जैसे वामपंथी लोग जाति के नाम पर समाज के बीच भेदभाव फैलाने की एक और कोशिश करने में लगे हैं।
किसी भी विवाद को सच के बजाय जाति के चश्मे से दिखाने की कोशिश जा रही है। जमीन का पुराना झगड़ा, व्यक्तिगत दुश्मनी या स्थानीय विवाद इन सबको नजरअंदाज करके हर घटना को ‘ऊंची जाति बनाम दलित’ के रूप में पेश किया जा रहा है।
सोशल मीडिया इस आग में घी डालने का काम कर रहा है। अधूरी जानकारी, आधा सच और भ्रामक नैरेटिव तेजी से फैलाए जाते हैं। लोग बिना तथ्य जाँचे ही किसी एक समुदाय को दोषी ठहराने लगते हैं। परिणाम यह होता है कि निर्दोष लोगों या समुदाय को भी अपराधी की तरह देखा जाने लगता है या कुछ लोगों की कोशिश ऐसी ही होती है कि लोग उनको अपना दुश्मन समझने लगें।
यह भी सच है कि देश में जातिगत भेदभाव की समस्याएँ मौजूद हैं और उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन हर घटना को उसी ढाँचे में फिट कर देना भी उतना ही गलत है। जब यह सारा काम एक प्रोपेगेंडा के तहत होने लेग तो यह समाज के लिए जहर बनने लगता है।


