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टेक्सास में भगवान हनुमान की प्रतिमा पर ट्रंप के समर्थक ने उठाए सवाल, भारतवंशियों ने जमकर लताड़ा: कहा- यह हिंदुओं के पैसों की जमीन पर है

अमेरिका के टेक्सास में शुगरलैंड स्थित श्री अष्टलक्ष्मी मंदिर में भगवान हनुमान की 90 फीट ऊँची विशाल प्रतिमा पर एक बार फिर विवाद सामने आया है। डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के कार्यकर्ता ने प्रतिमा की वीडियो शेयर की है और इसकी मौजूदगी पर सवाल उठाया है। इस पर भारतवंशियों ने उन्हें जमकर लताड़ लगाई है।

सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म ‘एक्स’ पर रिपब्लिकन के कार्यकर्ता कार्लोस टर्सियोस ने वीडियो शेयर कर लिखा, “यह इस्लामाबाद, पाकिस्तान या भारत का नई दिल्ली नहीं है। यह अमेरिका के टेक्सास राज्य का शुगर लैंड शहर है। तीसरी दुनिया से आए एलियंस धीरे-धीरे टेक्सास और पूरे अमेरिका में बढ़ते जा रहे हैं। आखिर अमेरिका की तीसरी सबसे बड़ी मूर्ति यह क्यों है?”

बता दें कि ‘स्टैच्यू ऑफ यूनियन’ नाम से मशहूर भगनाव हनुमान की ये प्रतिमा अमेरिका की सबसे ऊँची प्रतिमाओं में से एक है। इस प्रतिमा का अनावरण अगस्त 2024 में हुआ था और इसे भारत के प्रसिद्ध मूर्तिकारों द्वारा तैयार किया गया है। यह प्रतिमा भगवान हनुमान को खड़े हुए आशीर्वाद मुद्रा में दर्शाती है, जो शक्ति, भक्ति और साहस का प्रतीक है। प्रतिमा के चलते यह स्थान टेक्सास और आसपास के राज्यों में रहने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र बन चुका है।

रिपब्लिकन पार्टी के कार्यकर्ता को भारतवंशियों ने लताड़ा

टेक्सास में भगवान हनुमान की प्रतिमा वाले पोस्ट पर रिपब्लिकन पार्टी के कार्यकर्ता कार्लोस टर्सियोस को भारतवंशियों ने मिलकर लताड़ा। उनके पोस्ट पर वसंत भट्ट नाम यूजर ने प्रतिक्रिया दी, “यह निजी जमीन पर बना है, जिसे हिंदुओं ने अपने पैसों से खरीदा है। सांस्कृतिक बहस आप लोग सालों पहले ही हार चुके हैं और आने वाले चुनाव भी हारने वाले हैं। आपका ‘अमेरिका फर्स्ट’ वाला नारा अब सिर्फ पुरानी नस्लवादी सोच जैसा दिखता है।”

आँचल नाम के एक्स यूजर ने कहा, “इसमें गलत क्या है? भारत में भी कई ऐसे धर्मों के पूजा स्थल हैं जिनकी शुरुआत भारत में नहीं हुई। वैसे भी, भारत दुनिया के उन शीर्ष 20 देशों में है जहाँ ईसाइयों की बड़ी आबादी है। हमारे ईसाई भाई-बहन भारत में उतनी ही आज़ादी के साथ रहते हैं जितनी भारतीय हिंदू रहते हैं।”

वहीं ‘हिंदू ऑफ वर्ल्ड’ ने कहा, “इतने ‘बहादुर’ बन रहे हो कि गदा पकड़े एक भगवान की मूर्ति से ही डर लग रहा है।” उन्होंने आगे कहा, “भगवान हनुमान निस्वार्थ सेवा का प्रतीक हैं, शायद तुम्हारी समझ वाली ईसाई धर्म की सोच में यही बात छूट गई। अगर तीसरी दुनिया जैसा व्यवहार देखना है, तो आईने में देखो- नफरत, डर और अज्ञान ही किसी गिरते समाज की असली निशानी होती है।”

उन्होंने यह भी कहा, “तुम एक मूर्ति को ‘हमला’ बता रहे हो, लेकिन असल में तुम्हारा अपना मन कड़वाहट और अज्ञान से भरा हुआ है। मूर्ति की ऊँचाई पर रोते रहो, शायद एक दिन तुम्हारी समझ भी उतनी ऊँची हो जाए।”

एक भारतवंशी ‘कार्तिक गाडा’ ने अमेरिका में बोले जाने वाली भाषाओं का चार्ट पेश करते हुए कहा कि अमेरिका में बोली जाने वाली भाषाओं के आँकड़ों से साफ दिखता है कि करीब 4.1 करोड़ घरों में स्पेनिश बोली जाती है, जबकि टॉ-10 भाषाओं में कोई भी भारतीय भाषा शामिल नहीं है।

उन्होंने कहा कि घर की भाषा किसी समुदाय के घुलने-मिलने का बड़ा संकेत होती है, इसीलिए इस आधार पर अभी तुलना करना सही नहीं है। उन्होंने टर्सियोग पर तंज कसते हुए कहा कि इस हिसाब से तुम्हें अभी लंबा रास्ता तय करना है, तब जाकर तुम भारतीय-अमेरिकियों के बराबर घुलने-मिलने की बात कर सकते हो।

ट्रंप के नेता भी प्रतिमा पर सवाल उठाने पर लताड़े जा चुके

यह पहली बार नहीं है, जब किसी अमेरिकी ने टेक्सास में भगवान हनुमान की प्रतिमा पर सवाल खड़े किए हों। इससे पहले भी रिपब्लिकन पार्टी के नेता और डोनाल्ड ट्रंप के करीबी अलेक्जेंडर डंकन में विवादित टिप्पणी कर चुके हैं, जिसे लेकर उनकी खूब आलोचना हुई थी।

सितंबर 2025 में अलेक्जेंडर डंकन ने भी ‘एक्स’ पर भगवान हनुमान की प्रतिमा का वीडियो शेयर करते हुए सवाल किया था, “हम टेक्सास में इस मूर्ति को क्यों बनने दे रहे हैं? हम एक ईसाई राष्ट्र हैं।” उन्होंने बाइबिल का हवाला देते हुए कहा था कि ईश्वर के अलावा किसी और देवता की पूजा करना और मूर्तियाँ बनाना गलत है। तब भी डंकन के इस बयान ने अमेरिकी हिंदू समुदाय के गुस्से को बढ़ा दिया था।

हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन (HAF) ने उनके बयान की कड़ी आलोचना की थी और इसे हिंदू-विरोधी तथा भड़काऊ करार दिया था। संगठन ने रिपब्लिकन पार्टी से माँग की है कि वे डंकन के खिलाफ कार्रवाई करें, क्योंकि उनके बयान से न केवल धार्मिक भावनाएँ आहत हुई, बल्कि यह अमेरिकी संविधान के पहले संशोधन के भी खिलाफ है, जो हर धर्म को समान स्वतंत्रता देता है।

‘सवर्णों की शादी नार्सिसिस्टिक, आंदोलन एंटी-डेमोक्रेटिक’: मिलिए गलगोटिया के अंबेडकरवादी डीन रविकांत किसाना से, जिसकी यूनिवर्सिटी ने AI समिट में भारत को कराया शर्मिंदा

इस समय गलगोटिया यूनिवर्सिटी गलत वजहों से सुर्खियों में है। दिल्ली में चल रहे इंडिया AI इम्पैक्ट समिट में इस यूनिवर्सिटी ने एक रोबोट डॉग को अपनी इनोवेशन बताकर प्रदर्शित किया। नाम दिया ‘ओरियन’। दावा किया कि यह उनके छात्रों और फैकल्टी की मेहनत का नतीजा है। लेकिन सच सामने आते ही हंगामा मच गया। यह रोबोट डॉग असल में चीन की कंपनी यूनिट्री का कमर्शियल प्रोडक्ट Go2 था, जो भारत में आसानी से खरीदा जा सकता है।

सोशल मीडिया पर लोग इसे फ्रॉड बता रहे हैं। आयोजकों ने गलगोटिया यूनिवर्सिटी के स्टॉल को तुरंत खाली करने का आदेश दे दिया। पूरी दुनिया के सामने भारत की एक यूनिवर्सिटी ने झूठ बोलकर देश की छवि खराब की। लोग पूछ रहे हैं कि ऐसी यूनिवर्सिटी जो झूठ और धोखे पर चलती है, वहाँ शिक्षा का क्या स्तर होगा? खैर, ये सवाल उठा तो हमने इंटरनेट की दुनिया खंगाली और जो कुछ मिला, वो हम आपके सामने रख रहे हैं।

मिलिए गलगोटिया यूनिवर्सिटी के अंबेडरकारी डीन रविकांत से

गलगोटिया यूनिवर्सिटी के लिबरल एजुकेशन स्कूल के डीन हैं डॉ. रविकांत किसाना। खुद को अंबेडकरवादी बताने वाले किसाना की किताब और बयान भी विवादों में रहते हैं। उनकी किताब “Meet the Savarnas: Indian Millennials Whose Mediocrity Broke Everything” में सवर्ण समाज पर तीखा हमला किया गया है। वे सवर्णों की शादियों को ‘नार्सिसिस्टिक यानि आत्ममुग्ध बताते हैं। यही नहीं, यूजीसी के खिलाफ चले सवर्ण आंदोलनों को ‘एंटी-डेमोक्रेटिक’ कहने से भी नहीं चूकते हैं। खैर, ऐसे व्यक्ति को डीन बनाने वाली यूनिवर्सिटी अब AI समिट में पकड़ी गई है। क्या यह संयोग है या यूनिवर्सिटी की सोच का आईना?

कौन हैं रविकांत किसाना?

रविकांत किसाना खुद को ‘बफेलो इंटेलेक्चुअल’ कहते हैं। वे सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं और पॉडकास्ट भी चलाते हैं। उनकी बायोग्राफी में लिखा है कि वे अम्बेडकरवादी संगठनों जैसे नालंदा अकादमी, वर्धा के साथ मिलकर काम करते हैं। पहले वे फ्लेम यूनिवर्सिटी, IIM कोझीकोड, वोक्सेन यूनिवर्सिटी और NLSIU बेंगलुरु जैसे संस्थानों में पढ़ा चुके हैं।

नवंबर 2025 में इंडिया फेस्टिवल ऑफ पॉडकास्टिंग (IFP) में उन्हें स्पीकर के तौर पर बुलाया गया था, जहाँ उन्हें गलगोटिया यूनिवर्सिटी का डीन और प्रोफेसर बताया गया। जनवरी 2026 में उनके लिंक्डइन प्रोफाइल पर भी यही पद लिखा है – ‘Dean, School of Liberal Education & Languages, Professor, Galgotias University।’

किसाना की विशेषज्ञता क्रिटिकल कास्ट स्टडीज और एथनोग्राफिक रिसर्च में है। लेकिन उनकी लेखनी मुख्य रूप से सवर्ण समाज की आलोचना पर केंद्रित है। वे सवर्णों को ‘कूल, क्लूलेस कस्टोडियंस ऑफ कास्ट प्रिविलेज’ कहते हैं। उनकी किताब में सवर्ण मिलेनियल्स की औसतता (Mediocrity) को भारत की कई समस्याओं की जड़ बताया गया है।

किताब में सवर्णों पर क्या-क्या हमले?

साल 2025 में पेंगुइन रैंडम हाउस से छपी किताब ‘Meet the Savarnas’ में किसाना ने सवर्ण जीवन के हर पहलू को निगेटिव अंदाज में पेश किया है। किताब की शुरुआत में ही वे कहते हैं, “सवर्ण इस किताब को पढ़ें, पचाएँ, आत्ममंथन करें या गुस्सा हों- यह उनकी अपनी पहचान से मिलने का मौका है। अगर उन्हें खुद का चेहरा पसंद नहीं आता, तो यह उनकी अंदरूनी समस्या है।”

एक अध्याय में वे सवर्ण शादियों का वर्णन करते हैं, “एक सामान्य सवर्ण शादी में परिवार के विभिन्न गुट आपस में प्रतिस्पर्धा और साजिश करते हैं। आखिरकार सवर्ण शादी परिवार की विभिन्न शाखाओं में फैली एक कभी न खत्म होने वाली सागा का सिर्फ एक एपिसोड होती है। हर साल कई शादियाँ होती रहती हैं। नए कानून हर शादी में जटिलता बढ़ाते हैं, जबकि व्यक्तिगत शादियों की सेहत और बच्चों का जन्म परिवार की समृद्धि से अंक घटाते हैं। यह तमाशा इतना भव्य और दिखावा भरा होता है कि इसे महत्वपूर्ण मानना ही पड़ता है। लेकिन असल में यह स्पेक्टेकल जितना महत्वपूर्ण लगता है, उतना ही नार्सिसिस्टिक (स्वार्थी और आत्ममुग्ध) भी है।”

किसाना आगे लिखते हैं कि सवर्ण युवा अपनी जवानी में रेडिकल पोज बनाते हैं, लेकिन शादी के बाद वही अंकल-आंटी बन जाते हैं जिनके खिलाफ वे बगावत करते थे। उनकी एक इंस्टाग्राम पोस्ट में लिखा है, “शादी वह पॉइंट है जहाँ सवर्ण अपनी युवावस्था के रेडिकल पोज को छोड़कर ठीक वैसे ही अंकल-आंटी बन जाते हैं जिनके खिलाफ वे बगावत करते थे।”

किताब में सवर्ण आंदोलनों को भी एंटी-डेमोक्रेटिक बताया गया है। किसाना का दावा है कि सवर्ण हमेशा खुद को ‘सेल्फ-मेड’ मानते हैं, अपनी सफलता को सिर्फ व्यक्तिगत संघर्ष का नतीजा बताते हैं, जबकि यह ऐतिहासिक विशेषाधिकारों का परिणाम है। वे ‘ग्लास फ्लोर’ की बात करते हैं – सवर्णों के नीचे एक अदृश्य फ्लोर होता है जो उन्हें गिरने नहीं देता, जबकि दूसरों को तोड़ता है।

एक रिव्यू में लिखा गया, “किसाना की किताब सवर्णों की नाजुक संरचना को किताबी रूप में पहली बार खोलकर रख देती है। यह पढ़ना मजेदार है, लेकिन सवर्णों के लिए शायद असहज करने वाला।”

गलगोटिया कैंपस बना नफरत फैलाने का अड्डा

खास बात ये है कि रविकांत किसाना न सिर्फ खुद सवर्णों के खिलाफ आग उगलता है, बल्कि गलगोटिया यूनिवर्सिटी के कैंपस को भी सामाजिक न्याय की आड़ में नफरत फैलाने का अड्डा बनाया जा चुका है। गलगोटिया के कैंपस में ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, जहाँ खुलेआम नफरत परोसी जाती रही है। ऐसे ही एक कार्यक्रम का पोस्टर भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसे देखकर समझ सकते हैं कि जिस यूनिवर्सिटी में ऐसी गतिविधियाँ चलती हों, वहाँ इनोवेशन के नाम पर किस तरह का फ्रॉड होता होगा।

फोटो साभार: X_Ruchhan

किसाना के विवादित सोच पर लोग उठा रहे उंगली

किसाना के बयानों से विवाद स्वाभाविक है। सोशल मीडिया पर लोग उन्हें सवर्ण-विरोधी बताते हैं। एक हालिया पोस्ट में उन्हें ब्राह्मणिकल माइंड को ‘कोलोनाइजर का माइंड’ कहते हुए कोट किया गया। लोग पूछ रहे हैं कि ऐसे विचार रखने वाले व्यक्ति को एक बड़ी यूनिवर्सिटी का डीन बनाना कितना सही है? क्या यह जातीय विभाजन को बढ़ावा नहीं देता?

गलगोटिया यूनिवर्सिटी पहले से ही अपनी डिग्री की गुणवत्ता को लेकर आलोचना झेलती रही है। लोग इसे ‘डिग्री मिल’ कहते हैं। अब AI समिट में चीनी रोबोट को अपना बताकर पकड़े जाने से यह आलोचना और तेज हो गई है। सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है कि यह यूनिवर्सिटी फ्रॉड है और इसे बंद कर देना चाहिए। इसी मौके पर किसाना का डीन होना फिर से चर्चा में आ गया। लोग कह रहे हैं- जो यूनिवर्सिटी इनोवेशन के नाम पर झूठ बोलती है, वहाँ डीन के पद पर ऐसा व्यक्ति है जो समाज को जाति के नाम पर बाँटने का काम करता है।

भारत को शर्मिंदा करने का सिलसिला

AI समिट में हुआ धोखा सिर्फ यूनिवर्सिटी की नहीं, पूरे देश की बदनामी है। प्रधानमंत्री के ‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भर भारत के सपने के सामने एक यूनिवर्सिटी ने चीनी प्रोडक्ट को अपना बताकर धोखा दिया। यूनिवर्सिटी ने बाद में सफाई दी कि यह सिर्फ लर्निंग के लिए था, लेकिन पहले दावे कुछ और थे। यह झूठ देश के सामने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब करता है।

ऐसी यूनिवर्सिटी में अगर डीन कोई ऐसा व्यक्ति हो जो समाज के बड़े वर्ग को निशाना बनाता हो, तो सवाल उठते हैं कि वहाँ शिक्षा का स्तर क्या है? क्या ऐसी संस्थाएँ युवाओं को एकता सिखाएँगी या विभाजन?

रविकांत किसाना की विचारधारा उनकी व्यक्तिगत हो सकती है, लेकिन एक जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति से उम्मीद की जाती है कि वे समाज को जोड़ने का काम करें न कि बाँटने का। गलगोटिया यूनिवर्सिटी का ताजा कारनामा दिखाता है कि संस्थान की प्राथमिकता क्या है। देश को ऐसे संस्थानों की जरूरत है जो इनोवेशन और एकता सिखाएँ न कि समाज में झूठ फैलाकर विभाजनकारी बातों को बढ़ावा दे।

बांग्लादेश चुनाव में ‘सब चंगा’ लेकिन ECI ‘तुगलकी आयोग’: ममता बनर्जी की ‘खास’ वोट बैंक को साधने की रणनीति

पश्चिम बंगाल की राजनीति में विरोधाभासों का दौर नया नहीं है, लेकिन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के हालिया बयानों ने नैतिकता और तर्क को एक नए धरातल पर लाकर खड़ा कर दिया है। एक ओर वे पड़ोसी देश बांग्लादेश में हुए चुनावों को ‘अत्यंत शांतिपूर्ण’ बताकर वहाँ की व्यवस्था के प्रति अपना अटूट प्रेम जाहिर कर रही हैं, जबकि हकीकत में वहाँ अल्पसंख्यकों पर जुल्म और हिंसा का हंगामा मचा हुआ है।

दूसरी ओर, वे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की रीढ़ यानी भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) को ‘तुगलकी’ और ‘वाशिंग मशीन’ जैसे शब्दों से नवाज रही हैं। यह विडंबना ही है कि जिन्हें घर की लोकतांत्रिक संस्थाओं में खोट नजर आता है, उन्हें सीमा पार की धांधली और खून-खराबे में शांति दिखाई दे रही है।

बांग्लादेश का ‘खूनी चुनावी सच’ और ममता की तारीफ

ममता बनर्जी का यह बयान कि बांग्लादेश के चुनाव कितने शांतिपूर्ण रहे, वास्तव में उन हजारों पीड़ितों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है जिन्होंने वहाँ चुनावी हिंसा और मजहबी कट्टरवाद को झेला है। रिपोर्टों के अनुसार, बांग्लादेश के 13वें संसदीय चुनाव के दौरान अक्टूबर 2025 से फरवरी 2026 के बीच 10 लोगों की मौत हुई और 2500 से ज्यादा लोग घायल हुए।

वहाँ हिंदुओं के घरों को आग के हवाले किया गया और अल्पसंख्यकों को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया। लेकिन ममता दीदी को यह सब ‘शांतिपूर्ण’ नजर आता है। शायद उनके लिए ‘शांति’ की परिभाषा केवल सत्ता के समीकरणों तक ही सीमित है।

ममता बनर्जी का बांग्लादेश के लिए यह प्रेम अकारण नहीं है, बल्कि यह उनकी खास वोट बैंक की राजनीति का हिस्सा लगता है। जिस देश में पत्रकारों को पीटा जा रहा है और जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टरपंथी संगठन सड़कों पर हंगामा कर रहे हैं, वहाँ ममता बनर्जी को सब कुछ ‘हरा-भरा’ नजर आ रहा है।

यह प्रेम केवल कूटनीतिक नहीं है, बल्कि यह एक गहरी तुष्टीकरण की राजनीति की ओर इशारा करता है। जब एक लोकतांत्रिक मुख्यमंत्री पड़ोसी देश की अस्थिरता और अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों पर आँख मूँदकर वहाँ के चुनावों को सर्टिफिकेट बाँटती हैं, तो सवाल उठना लाजमी है।

चुनाव आयोग पर ‘तुगलकी’ वार

भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) निष्पक्ष चुनाव के लिए दुनिया भर में जाना जाता है, लेकिन ममता बनर्जी के लिए अब एक ‘राजनीतिक दुश्मन’ बन चुका है। उन्होंने चुनाव आयोग को ‘मोहम्मद बिन तुगलक’ और ‘भाजपा की वाशिंग मशीन’ करार दिया है। ममता बनर्जी का कहना है कि चुनाव आयोग लोकतांत्रिक अधिकारों को धो रहा है।

दिल्ली की सड़कों पर काला शॉल ओढ़कर विरोध प्रदर्शन करना और सुप्रीम कोर्ट तक भागना, ममता की उस रणनीति का हिस्सा है जिसमें वे खुद को हमेशा ‘बेचारा’ और केंद्र सरकार को ‘तानाशाह’ साबित करने की कोशिश करती हैं।

ममता बनर्जी का आयोग पर यह हमला तब और तेज हो गया जब मतदाता सूची के पुनरीक्षण (SIR) में गड़बड़ी पाई गई। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा के इशारे पर 58 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए और इसकी तुलना ‘रावण द्वारा सीता के अपहरण’ से कर दी।

ममता बनर्जी जनता को यह कहकर भड़का रही हैं कि निर्वाचन आयोग आतंकियों जैसा व्यवहार कर रहा है। जब एक मुख्यमंत्री संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ इस तरह की भाषा का प्रयोग करती हैं, तो वे सीधे तौर पर अराजकता को निमंत्रण देती हैं। उनका यह कहना कि ‘अगर कुछ लोग 420 हैं, तो मैं 440 वोल्ट हूँ,’ डराने और धमकाने वाली राजनीति का प्रमाण है।

बांग्लादेशी चुनावों में धांधली के आरोप

ममता बनर्जी भले ही बांग्लादेश के चुनावों को शांतिपूर्ण कहें, लेकिन वहाँ के जमीनी हालात और खुद वहाँ के नेता कुछ और ही कहानी बयाँ कर रहे हैं। जमात के नेतृत्व वाले 11 दलों के गठबंधन ने खुलेआम चुनाव में अनियमितताओं और धांधली के आरोप लगाए हैं।

जमात-ए-इस्लामी के सहायक महासचिव हामिद उर रहमान आजाद ने साफ कहा कि ‘शुरुआत अच्छी थी, लेकिन अंत बहुत खराब हुआ।’ उन्होंने आरोप लगाया कि जाली वोट डाले गए, काले धन का प्रवाह हुआ और चुनाव के नतीजों में ओवरराइटिंग और गड़बड़ी की गई। कई जगहों पर पोलिंग एजेंटों के हस्ताक्षर तक गायब थे।

हैरानी की बात यह है कि जब बांग्लादेश के भीतर से ही 32 निर्वाचन क्षेत्रों में दोबारा गिनती की माँग उठ रही है और वहाँ की सड़कों पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, तब ममता बनर्जी को वहाँ सब कुछ ‘साफ’ दिखाई देता है। क्या वे उन रिपोर्ट्स को नहीं पढ़तीं जिनमें बताया गया है कि धांधली की कवरेज कर रहे पत्रकारों पर हमले हुए और जमात समर्थकों के घरों को फूँका गया?

भ्रष्ट अधिकारियों को ‘प्रमोशन’ का इनाम

लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब कोई सरकार गलत काम करने वाले अधिकारियों के साथ खड़ी हो जाए। भारतीय निर्वाचन आयोग ने बंगाल में मतदाता सूची के पुनरीक्षण (SIR) में गंभीर गड़बड़ी और लापरवाही के आरोप में 7 अधिकारियों (AERO) को निलंबित किया। कायदे से एक मुख्यमंत्री को जाँच का समर्थन करना चाहिए था, लेकिन ममता बनर्जी ने घोषणा कर दी कि वे इन अधिकारियों को ‘प्रमोट’ करेंगी।

वे कहती हैं कि ‘जिन अधिकारियों को ईसी (EC) डिमोट करेगा, हम उन्हें अच्छी जगह पोस्टिंग देंगे और प्रमोशन देंगे।’ यह सीधे तौर पर निर्वाचन आयोग को चुनौती है और उन अधिकारियों को शह देना है जो निष्पक्ष काम करने के बजाय सत्ता के एजेंट बनकर काम करते हैं।

‘घर में आग, पड़ोस में राग’

ममता बनर्जी की राजनीति अब ‘आंदोलन’ से हटकर ‘अराजकता’ की ओर मुड़ती दिख रही है। एक मुख्यमंत्री का यह दोहरा मापदंड रोंगटे खड़े करने वाला है। जिस बांग्लादेश में हिंदुओं के मंदिर तोड़े गए, जहाँ चुनावी हिंसा में हजारों लोग लहूलुहान हुए, वहाँ उन्हें ‘शांति’ की खुशबू आती है।

क्या यह इसलिए है क्योंकि वहाँ की स्थिति पर सवाल उठाने से उनका खास वोट बैंक नाराज हो जाएगा? वहीं दूसरी ओर, अपने ही देश की उस संस्था (ECI) को वे तुगलकी और आतंकवादी जैसा व्यवहार करने वाला बता रही हैं, जिसने उन्हें तीन बार मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचने का रास्ता दिया।

यह कैसी राजनीति है जहाँ दागी अधिकारियों को ‘सुरक्षा कवच’ दिया जाता है और संवैधानिक संस्थाओं को सरेआम बेइज्जत किया जाता है? ममता जी कहती हैं कि वे ‘सत्य को उजागर’ करेंगी, लेकिन क्या वे उन 500 से ज्यादा घरों और दुकानों का सच देख पा रही हैं जो बांग्लादेश में चुनावी हिंसा की भेंट चढ़ गए? भारतीय लोकतंत्र को ‘वाशिंग मशीन’ कहना आसान है, लेकिन अराजकता को ‘प्रमोशन’ देना बहुत महँगा पड़ेगा।

सत्ता आती-जाती रहती है, लेकिन जब एक संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति सड़कों पर लोगों को भड़काने लगे और गलत को सही बताने की जिद पर अड़ जाए, तो नुकसान केवल एक पार्टी का नहीं, बल्कि पूरे देश के लोकतांत्रिक ढाँचे का होता है। ममता बनर्जी का यह ‘बांग्लादेश प्रेम’ और ‘भारतीय आयोग से नफरत’ केवल एक राजनीतिक चाल नहीं, बल्कि एक खतरनाक मानसिकता का परिचायक है जो केवल ‘अराजकता’ में ही अपना भविष्य देखती है।

हमारे खिलाफ चल रहा ‘प्रोपेगैंडा कैंपेन’: चीनी रोबोट डॉग को लेकर विवाद के बाद गलगोटिया ने खुद को ही बताया पीड़ित, जानें- कैसे गलत है यूनिवर्सिटी का दावा

गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने 17 और 18 फरवरी की रात खुद को विक्टिम दिखाते हुए एक रिलीज में कहा कि उसके खिलाफ ‘नेगेटिव प्रोपेगैंडा कैंपेन’ चलाया जा रहा है। यह उस बीच हुआ जब यूनिवर्सिटी को AI इम्पैक्ट समिट 2026 में अपने AI इकोसिस्टम के हिस्से के रूप में चीनी रोबोट डॉग दिखाने पर आलोचना का सामना करना पड़ा। हालाँकि, विश्वविद्यालय के अपने पुराने बयानों, अब डिलीट किए गए DD इंडिया वीडियो और NewsVoir के जरिए जारी प्रेस रिलीज में पूरी तस्वीर कुछ और ही दिखती है।

‘नेगेटिव प्रोपेगैंडा’ पोस्ट और इनकार

हालिया प्रेस रिलीज में विश्वविद्यालय ने कहा, “यूनिवर्सिटी, फैकल्टी और छात्र अपने विश्वविद्यालय के खिलाफ प्रोपेगैंडा कैंपेन से गहरे आहत हैं।” विश्वविद्यालय ने दावा किया कि रोबोटिक प्रोग्रामिंग पहल केवल छात्रों को AI से परिचित कराने के लिए थी और इसमें ‘वैश्विक रूप से उपलब्ध उपकरण और संसाधनों’ का इस्तेमाल किया गया था। उन्होंने चेतावनी दी कि नेगेटिविटी फैलाना छात्रों के मनोबल को नुकसान पहुँचा सकता है।

इससे पहले जारी एक स्पष्टीकरण में गलगोटिया ने कहा, “स्पष्ट कर दें कि गलगोटिया ने यह रोबोडॉग नहीं बनाया है, न ही हमने ऐसा दावा किया है।” इसमें यूनिट्री रोबोडॉग को केवल एक लर्निंग टूल बताया गया और कहा गया कि विश्वविद्यालय ने इसे कभी स्वदेशी विकास के रूप में पेश नहीं किया। विश्वविद्यालय का कहना था कि उसने कभी भी रोबोडॉग बनाने का ‘दावा’ नहीं किया। लेकिन मौजूद रिकॉर्ड से अलग ही तस्वीर सामने आती है।

डिलीट किए जाने से पहले DD के वीडियो में क्या आया नजर?

AI इम्पैक्ट समिट 2026 में भारत मंडपम में DD इंडिया के अब डिलीट किए गए वीडियो में गलगोटिया यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर नेहा सिंह रोबोटिक डॉग को विश्वविद्यालय के ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ द्वारा विकसित बताया था। सोशल मीडिया पर इस डिलीट किए गए वीडियो का क्लिप तेजी से शेयर किया जा रहा है।

मूल क्लिप डिलीट किए जाने से पहले लोगों द्वारा खूब शेयर किया गया था। समिट में रोबोडॉग को केवल खरीदे गए डिवाइस के रूप में नहीं बल्कि विश्वविद्यालय के अपने ‘डेवलपमेंट इकोसिस्टम’ के हिस्से के रूप में दिखाया गया था।

350 करोड़ रुपए का AI इकोसिस्टम और ORION रीब्रांडिंग

दिलचस्प बात यह है कि NewsVoir के जरिए वितरित की गई विश्वविद्यालय की प्रेस रिलीज में खुद विरोधाभास दिखात है। इसकी हेडलाइन में लिखा गया, “गलगोटिया यूनिवर्सिटी पविलियन AI इम्पैक्ट समिट 2026 में 350+ करोड़ रुपए के AI शोकेस के साथ प्रमुख आकर्षण के रूप में उभरा।” प्रेस रिलीज में कहा गया कि विश्वविद्यालय ने ‘कम्प्रीहेंसिव 350+ करोड़ रुपए का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इकोसिस्टम’ पेश किया।

रिलीज में कहा गया कि पविलियन का मुख्य आकर्षण ORION (ऑपरेशनल रोबोटिक इंटेलिजेंस नोड) था, जो ‘प्रतिनिधियों के साथ लाइव इंटरैक्ट करता और रोबोटिक्स व इंटेलिजेंट सिस्टम्स इंटीग्रेशन का प्रदर्शन करता था’।

चीनी यूनिट्री रोबोडॉग को ORION के रूप में रीब्रांड किया गया और विश्वविद्यालय के AI ड्रिवन सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और इंफ्रास्ट्रक्चर के हिस्से के रूप में पेश किया गया। हालाँकि, दिक्कत यह थी कि रोबोट पर अभी भी यूनिट्री का ब्रांडिंग दिखाई दे रहा था। यानी प्रोडक्ट का नाम बदल दिया गया लेकिन निर्माता के मार्किंग्स नहीं हटाए गए।

गलगोटिया की मासूम बनने की कोशिश

विश्वविद्यालय द्वारा ग्लोबल तकनीक छात्रों के सीखने के लिए इम्पोर्ट करना कोई नई बात नहीं है। गलगोटिया ने खुद लिखा कि ‘इनोवेशन की कोई सीमा नहीं होती’ और छात्रों को अत्याधुनिक उपकरणों से अवगत कराया जाना चाहिए। लेकिन मुद्दा केवल तकनीक खरीदने का नहीं है बल्कि इसे पेश करने का तरीका है।

एक बड़े अंतरराष्ट्रीय समिट में, रोबोट का नाम ORION रखा गया, 350+ करोड़ रुपए के AI इकोसिस्टम के तहत दिखाया गया, सेंटर ऑफ एक्सीलेंस का हिस्सा बताया गया, राष्ट्रीय मीडिया द्वारा बढ़ावा मिला और सरकारी हैंडल पर शेयर किया गया। इसके बाद आलोचना को ‘नेगेटिव प्रोपेगैंडा’ कहना और यह दावा करना कि ऐसा कभी नहीं कहा गया, विश्वसनीयता पर ही सवाल उठाता है।

ड्रोन सॉकर

एक और दावा, जो प्रोफेसर नेहा सिंह ने DD न्यूज़ से किया, वह था ड्रोन सॉकर का। यह मूल रूप से एक बॉल के अंदर फिट किया गया ड्रोन है।उन्होंने कहा, “इसके एंड-टू-एंड इंजीनियरिंग से लेकर इसके एप्लिकेशन तक सब कुछ विश्वविद्यालय में हुआ है। और यह भारत का पहला ड्रोन सॉकर एरेना है, जो आप गलगोटिया कैंपस में देख सकते हैं। यहाँ छात्र इसे उड़ाते हैं और इसे नए तरीकों से विकसित कर रहे हैं, इसमें मजबूत और बेहतर फीचर्स जोड़ रहे हैं।”

हालाँकि, सोशल मीडिया यूजर्स ने बताया कि यह ड्रोन काफी हद तक स्ट्राइकर V3 ARF सॉकर ड्रोन जैसा है, जो Skyball द्वारा बेचा जाता है और इसका इस्तेमाल ड्रोन गेम में होता है। इसकी कीमत लगभग $453 (करीब 40,000 रुपए) है।

निष्कर्ष

विवाद का मुद्दा यह नहीं कि छात्र ग्लोबल तकनीक से सीख रहे हैं या विश्वविद्यालय विदेशी हार्डवेयर खरीद रहे हैं। असली मुद्दा यह है कि इन प्रोडक्ट्स को ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर कैसे पेश किया गया और जब सवाल उठे तो कैसे बचाव किया गया। विश्वविद्यालय ने ऐसा दिखाने की कोशिश की कि उसने इन उन्नत तकनीकों को इन-हाउस विकासित किया जो सच नहीं था। सवाल उठने पर उन्होंने कहानी बदलकर खुद को मासूम और आलोचना को भी प्रोपेगैंडा बताकर खारिज करने की कोशिश की।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

जिस ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के विरोध में थीं सोनिया गाँधी, उसे NGT ने दी मंजूरी: जानें- क्या है ₹92000 करोड़ की यह परियोजना जिससे सिंगापुर को पछाड़ देगा भारत

देश के सबसे बड़े इंफ्रा प्रोजेक्ट ग्रेट निकोबार परियोजना को एनजीटी ने मंजूरी दे दी है। 92,000 करोड़ रुपए से बनने वाला यह प्रोजेक्ट भारत के लिए गेमचेंजर साबित होगा। सैन्य रणनीति, सुरक्षा, व्यापार और पर्यावरण के दृष्टिकोण से अंडमान निकोबार का सबसे निचला द्वीप ग्रेट निकोबार काफी अहम है। सरकार को उम्मीद है कि 2040 तक ये पूरी तरह तैयार हो जाएगा।अगर ये प्रोजेक्ट पूरी तरह बन जाता है तो भारत को एक ‘हॉगकॉग’ या ‘सिंगापुर’ मिल जाएगा। भारत हिन्द महासागर में चीन पर बढ़त बना लेगा।

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी ने ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट को मंजूरी दी है। एनजीटी की कोलकाता स्थिति ईस्टर्न जोनल बेंच ने परियोजना को सामरिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण बताते हुए मंजूरी दी, साथ ही यहाँ पर्यावरण के पर्याप्त सुरक्षा के उपाय किए जाने का शर्त भी लगाया।

क्या है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट

सामरिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण भारत का दक्षिणी छोर पर इंफ्रा प्रोजक्ट बनने जा रहा है। ये मलक्का जलडमरूमध्य से करीब 900 किमी दूर होगा। मलक्का जलडमरूमध्य वह समुद्री रास्ता है जिससे दुनिया की 30-40 फीसदी समुद्री व्यापार होता है। यह इंग्लिश चैनल के बाद दुनिया का सबसे व्यस्त समुद्री मार्ग है, जहाँ से जापान, चीन, दक्षिण कोरिया और पश्चिम एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया से यूरोप तक शिप और कंटेनर गुजरता है। इसे हिन्द महासागर का ‘चोक प्वांइट पॉलिटिक्स’ का केन्द्र भी माना जाता है।

इस प्रोजेक्ट के कई आयाम है। 166 वर्ग मीटर के पूरे क्षेत्र में तीन क्षेत्रों में काम किया जाएगा। इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, जहाँ बड़े बड़े जहाज आकर रुक सकें। ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट यानी आमलोगों की आवाजाही और सेना के इस्तेमाल के लिए एयरपोर्ट। पावर प्लांट, जो करीब 450 मेगावॉट का होगा और ऊर्जा की जरूरतों को पूरा कर सके। नई टाउनशिप, जहाँ लाखों लोग बसाए जा सकें।

ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट से फायदा

भारत ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग और ट्रेड हब बन जाएगा, लाखों नौकरियाँ पैदा होगी। अभी लॉजिस्टिक्स कॉस्ट ज्यादा होने से परेशानी आ रही है। जब ग्रेट निकोबार में आधुनिक पोर्ट बनेगा तो कंटेनर सीधे यहाँ पहुँचेंगे। समय के साथ-साथ खर्च भी कम होंगे। दूसरे देशों की शिप भी पहुँचेगी और भारत को समुद्री व्यापार में हिस्सेदारी मिलेगी। इतना ही नहीं सुरक्षा की दृष्टिकोण से भी ये प्रोजेक्ट काफी अहम है। इस प्रोजेक्ट पर 92000 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है।

चीन ने श्रीलंका के हंबनटोटा, म्यांमार के क्यौकफ्यू और पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाहों में बड़े पैमाने पर निवेश किया है। एक तरह से उसने समुद्र में भारत को घेरने की कोशिश की है। ऐसे में भारत के लिए जरूरी है कि समुद्र में अपनी ताकत बढ़ाए। इस प्रोजेक्ट से निगरानी और सैनिकों की मौजूदगी आसान हो जाएगी। इंडो-पैसिफिक रणनीति के लिए भी ये काफी अहम है।

साल 2024 में नरेंद्र मोदी सरकार ने गलाथिया बे को ‘प्रमुख बंदरगाह’ घोषित किया। 90000 करोड़ रुपए का ये प्रोजेक्ट शिपिंग, बंदरगाह और जलमार्ग मंत्रालय के तहत बनेगा और इसे केंद्र से पैसा मिलेगा। इसे चार चरणों में बनाया जाएगा। पहला चरण 2028 तक पूरा होगा, जो 40 लाख TEU (कंटेनर) संभालेगा। 2058 तक ये बंदरगाह 1.6 करोड़ कंटेनर तक संभालने के काबिल हो जाएगा।

ये सिर्फ एक और बंदरगाह बनाने की बात नहीं है, बल्कि ये भारत की समुद्री कमजोरी को ठीक करने का मौका है। भारत के पूर्वी तट के ज्यादातर बंदरगाहों की गहराई 8-12 मीटर है, जो बड़े जहाजों के लिए कम है। दुनिया के बड़े बंदरगाह 12-20 मीटर गहरे हैं, जो 1.65 लाख टन से ज्यादा के जहाज संभाल सकते हैं। इसीलिए भारत का 25% कार्गो कोलंबो, सिंगापुर और क्लैंग जैसे विदेशी बंदरगाहों से जाता है। इससे हर साल 1,500 करोड़ रुपये का सीधा नुकसान और अर्थव्यवस्था को 3,000-4,500 करोड़ का झटका लगता है।

गलाथिया बे की 18-20 मीटर की प्राकृतिक गहराई और पूर्व-पश्चिम समुद्री रास्ते के पास इसकी जगह इसे इस निर्भरता को खत्म करने के लिए बिल्कुल सही बनाती है। रणनीतिक तौर पर ये भारत को बांग्लादेश और म्यांमार के कार्गो के लिए सिंगापुर से मुकाबला करने की ताकत देता है, जहाँ अभी 70% से ज्यादा कार्गो विदेशी बंदरगाहों से जाता है।

कॉन्ग्रेस कर रही है विरोध

कॉन्ग्रेस और पर्यावणविद इसके दीर्घकालीन पर्यावरण क्षति को लेकर विरोध कर रहे हैं। परियोजना का विरोध करने वाले कॉन्ग्रेस और पर्यावरणविद का मानना है कि इससे जैव विविधता, पारिस्थिकी तंत्र और शेरोन जैसे जनजातीय समुदाय को नुकसान होगा, जिनकी आबादी पहले ही सैकड़ों में बची है।

परियोजना के विरोध में कई याचिकाएँ कोलकाता हाईकोर्ट में अभी लंबित हैं। इस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस नेता सोनिया गाँधी ने कहा कि ‘शोम्पेन और निकोबारी जनजातीय का अस्तित्व दाँव पर है’ और ‘भारत की आने वाली पीढ़ियाँ इस बड़े पैमाने की तबाही को नहीं झेल सकतीं।’ लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर कॉन्ग्रेस नेता सोनिया गाँधी कुछ नहीं कह रही हैं।

भारत का 40% से ज्यादा ट्रांसशिपमेंट कोलंबो से होता है, जहाँ चीन एक टर्मिनल चलाता है और उसने वहाँ अरबों रुपये लगाए हैं। श्रीलंका बीजिंग के कर्ज में डूबता जा रहा है और वहाँ चीनी जासूसी जहाज भी रुकते हैं। इससे भारत की कमजोरी साफ दिखती है। ऐसे में गलाथिया बे का विरोध करना पर्यावरण की चिंता नहीं, बल्कि रणनीतिक भूल है।

भारत अब विदेशी बंदरगाहों का इस्तेमाल और चीन के दबदबे को हिन्द महासागर में झेल नहीं सकता। ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट पर्यावरण को नष्ट करने का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करने, नौकरियाँ पैदा करने और भारत को समुद्री ताकत बनाने का प्रोजेक्ट है।

PM मोदी ने बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान को लिखा पत्र, भारत आने का दिया न्यौता: क्या हैं कूटनीतिक मायने?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान और उनके परिवार को भारत की आधिकारिक यात्रा का निमंत्रण दिया है। यह निमंत्रण प्रधानमंत्री मोदी ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के माध्यम से सौंपा जो तारिक रहमान के शपथ ग्रहण समारोह में ढाका पहुँचे थे।

बीते मंगलवार (17 फरवरी 2026) को बांग्लादेश के नव निर्वाचित प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने शपथ ली। इस अवसर पर भारत की ओर से लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ढाका पहुँचे और शपथ ग्रहण समारोह के बाद तारिक रहमान से मुलाकात की। इस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी का पत्र उन्हें सौंपा। तारिक रहमान ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की भारी बहुमत जीत के बाद प्रधानमंत्री पद की शपथ ली है।

PM मोदी ने पत्र में क्या लिखा?

PM मोदी ने तारिक रहमान को बधाई देते हुए पत्र में लिखा, “आपकी जीत इस बात का प्रमाण है कि बांग्लादेश के लोगों ने आप पर भरोसा और विश्वास जताया है और आपके नेतृत्व में देश को शांति, स्थिरता और समृद्धि की दिशा में आगे बढ़ाने के लिए जो जनादेश दिया है। दो करीबी पड़ोसी देशों के रूप में भारत और बांग्लादेश के बीच गहरा संबंध है जो हमारे साझा इतिहास, सांस्कृतिक जुड़ाव और हमारे लोगों की शांति व समृद्धि की आकांक्षाओं पर आधारित है।”

पीएम मोदी ने आगे लिखा, “मैं आपके साथ मिलकर हमारे बहुआयामी द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने, क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने और कनेक्टिविटी, व्यापार, तकनीक, शिक्षा, कौशल विकास, ऊर्जा, स्वास्थ्य सेवा, साथ ही सांस्कृतिक और जन-संपर्क गतिविधियों सहित विभिन्न क्षेत्रों में हमारे साझा लक्ष्यों को आगे बढ़ाने की आशा करता हूँ। दो तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं के रूप में, भारत और बांग्लादेश वास्तव में एक-दूसरे के सतत विकास के लिए प्रेरक बन सकते हैं, एक-दूसरे की सुरक्षा में मदद कर सकते हैं और आपसी समृद्धि सुनिश्चित कर सकते हैं।”

उन्होंने उन्हें आमंत्रण देते हुए लिखा, “मैं इस अवसर का उपयोग करते हुए आपको, डॉ. जुबैदा रहमान और आपकी बेटी जैमा के साथ सुविधाजनक समय पर भारत आने का आमंत्रण देता हूँ। भारत में आपका हार्दिक स्वागत होगा।”

पत्र को लेकर क्या है विश्लेषकों का मत?

विश्लेषकों का मानना है कि भारत-बांग्लादेश के बीच मजबूत पारस्परिक संबंधों और क्षेत्रीय सहयोग को ध्यान में रखते हुए यह निमंत्रण दोनों देशों के रिश्तों को और मजबूती प्रदान करेगा। शपथ ग्रहण समारोह में भारत की भागीदारी और प्रधानमंत्री मोदी का संदेश बांग्लादेश में भारत की सकारात्मक छवि को और सुदृढ़ करने वाला माना जा रहा है।

इस पत्र को लेकर राजनयिकों का मानना है कि यह कदम उस बड़े प्रयास का हिस्सा है जिसमें यूनुस की पिछली सरकार के दौरान बिगड़े भारत-बांग्लादेश संबंधों को सुधारा जा रहा है। उस समय दोनों देशों के बीच सहयोग कम हो गया था और बयानबाजी भी काफी तीखी थी, जिससे रिश्तों में खटास साफ दिखी थी। नई दिल्ली को बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय पर हुए हमलों के मामले में उचित प्रतिक्रिया न मिलने और भारतीय सरकार व मीडिया की लगातार की जा रही आलोचनाओं पर चिंता थी।

ऐसे माहौल में, PM मोदी का रहमान को व्यक्तिगत संदेश देना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि पुराने मतभेद भुलाकर अब सीधे राजनीतिक संवाद के जरिए विश्वास फिर से बनाया जा सकता है। शपथ ग्रहण समारोह में भारतीय लोकसभा अध्यक्ष की मौजूदगी ने यह संदेश और भी मजबूत कर दिया कि भारत, बांग्लादेश के नए नेतृत्व के साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार और उत्साहित है।

खालिदा जिया के निधन पर PM मोदी ने भेजा था शोक संदेश

पिछले साल दिसंबर में जब बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और तारिक रहमान की माँ खालिदा जिया का निधन हुआ तब प्रधानमंत्री मोदी ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर के जरिए रहमान को शोक पत्र भेजा था। पत्र में प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी संवेदना व्यक्त करते हुए लिखा कि उन्हें जून 2015 में ढाका में बेगम साहिबा से हुई मुलाकात और बातचीत की याद बहुत जीवंत है।

उन्होंने लिखा था कि बेगम साहिबा एक मजबूत इच्छाशक्ति और दृढ़ निश्चय वाली नेता थीं और वे बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनने का गौरव भी हासिल कर चुकी थीं। उन्होंने न केवल बांग्लादेश के विकास में बल्कि भारत-बांग्लादेश संबंधों को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।

फडणवीस सरकार ने महाराष्ट्र में 5% मुस्लिम आरक्षण किया रद्द, 2014 में कॉन्ग्रेस- NCP सरकार ने अध्यादेश लाकर दिया था कोटा

महाराष्ट्र की फडणवीस सरकार ने सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टिकोण से कमजोर माने जाने वाले मुस्लिमों को दिए जा रहे 5 फीसदी आरक्षण को खत्म कर दिया है। 2014 में ये व्यवस्था लागू की गई थी लेकिन देवेन्द्र फडणवीस सरकार ने 17 फरवरी 2026 को इस आदेश को रद्द कर दिया।

सरकारी आदेश के मुताबिक, 2014 में जिन सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े मुस्लिमों को विशेष पिछड़ा वर्ग-ए (SBC-A) के तहत आरक्षण दिया गया था, वह आदेश अब समाप्त कर दिया गया है। इसमें सरकारी और अर्ध सरकारी नौकरियों में सीधी भर्ती और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के दौरान आरक्षण मिलता था। इसपर रोक लग गई है। नए आदेश के बाद मुस्लिमों को जारी किया जाने वाला जाति प्रमाणपत्र और वैधता प्रमाणपत्र पर भी रोक लग गई है। 2014 का यह आदेश अनिश्चित स्थिति में था, जिसे सरकार ने रद्द कर स्थिति साफ कर दी है।

महाराष्ट्र में जुलाई 2014 में तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण की अगुवाई वाली कॉन्ग्रेस-एनसीपी गठबंधन की सरकार ने मुस्लिमों और मराठा आरक्षण को अध्यादेश के जरिए लागू किया था। मराठा समुदाय को 16 फीसदी आरक्षण और मुस्लिम समुदाय को 5 फीसदी आरक्षण दिया गया था। इससे राज्य में आरक्षण कुल 73 फीसदी हो गया था। दोनों आरक्षण का प्रस्ताव तत्कालीन अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री नसीम खान ने कैबिनेट के सामने रखा था, जिसे मंजूरी मिल गई थी। इसके बाद मुस्लिमों में पात्रता प्रमाण पत्र जारी करने के निर्देश दिए गए।

बॉम्बे हाईकोर्ट में दी गई चुनौती

हालाँकि 2014 में ही इस फैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। कोर्ट ने 14 नवंबर 2014 को अंतरिम आदेश जारी कर 16 फीसदी मराठा आरक्षण पर रोक लगा दी, क्योंकि इससे 50 फीसदी आरक्षण की सीमा का उल्लंघन हो रहा था, लेकिन मुस्लिम आरक्षण को बरकरार रखा था। 2019 में हाईकोर्ट ने मराठा आरक्षण को वैध ठहराया, जिसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने 2021 में रद्द कर दिया।

अध्यादेश की अवधि समाप्त हो चुकी है

फडणवीस सरकार का कहना है कि जिस अध्यादेश के जरिेए मुस्लिम आरक्षण लागू किया गया, उसकी अवधि खत्म हो चुकी है। ये कानून में तब्दील नहीं हुआ है इसलिए अवधि समाप्त होते ही अध्यादेश के आदेश भी खत्म हो जाते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने संबंधित आदेश को औपचारिक रूप से रद्द कर दिया है।

सरकार के मुताबिक, ये आदेश सरकारी रिकॉर्ड को दुरुस्त करने के लिए दिया गया है। हालाँकि जानकार बता रहे हैं कि मुस्लिम आरक्षण राज्य का संवेदनशील मुद्दा है इसको लेकर राज्य में प्रतिक्रिया हो सकती है।

उपसचिव का भी तबादला

अल्पसंख्यक विभाग के उप सचिव मिलिंद शेनॉय का ट्रांसफर कर दिया गया है। माना जा रहा है कि ये कार्रवाई 28 जनवरी से 2 फरवरी 2026 के बीच 75 से अधिक शैक्षणिक संस्थानों को रिकॉर्ड समय में अल्पसंख्यक दर्जा दिए जाने को लेकर हुए विवाद के बाद लिया गया। कई फाइलों पर पूर्व उपमुख्यमंत्री अजित पवार के निधन के बाद डिजिटल हस्ताक्षर मिले, इसके बाद कहा गया कि मंत्री के निधन के बाद इतनी जल्दी इतनी फाइल क्लियर कैसे हुई। विवाद के बाद सीएम फडणवीस ने सारी मंजूरियाँ रद्द कर दी।

‘पायजामे का नाड़ा खोलना रेप की कोशिश’: SC ने पलटा इलाहाबाद HC का आदेश, CJI बोले- इसे हल्के में लेना समाज के लिए खतरनाक

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (17 फरवरी 2026) को अहम फैसला सुनाते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस विवादित आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें कहा गया था कि किसी महिला को गलत तरीके से छूना और उसके पायजामे की नाड़ा खोलना ‘रेप की कोशिश’ नहीं माना जा सकता।

शीर्ष अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि अगर कोई आरोपित किसी लड़की का पायजामा खोलने की कोशिश करता है, उसके कपड़े से छेड़छाड़ करता है और उसे जबरन खींचता है, तो यह केवल छेड़छाड़ या यौन उत्पीड़न नहीं बल्कि साफतौर पर ‘रेप की कोशिश’ की श्रेणी में आएगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे कृत्य को हल्के में लेना कानून और समाज, दोनों के लिए खतरनाक है।

अदालत ने यह भी माना कि हाई कोर्ट का नजरिया कानून की सही व्याख्या नहीं करता और इससे गलत संदेश जा सकता है। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का फैसला खारिज कर दिया और कहा कि इस मामले में रेप की कोशिश से जुड़ी धाराएँ लागू होंगी।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को सुओ मोतो (Suo Motu) यानी खुद संज्ञान लिया, क्योंकि हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ NGO ‘वी द वीमन’ (We the Women) सहित वरिष्ठ वकीलों और एक्सपर्ट्स ने सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखा था कि यह निर्णय ‘संवेदनहीन’ और कानून के खिलाफ है।

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई में जस्टिस जॉयमाला बागची और जस्टिस एनवी अनजारिया की बेंच ने इस मामले में सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा कि किसी अपराध को कोशिश मानने के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह पूरी तरह अंजाम तक पहुँच जाए। अगर आरोपित ने ऐसा ठोस कदम उठा लिया हो जिससे साफ पता चले कि उसका इरादा अपराध करने का था और वह उस दिशा में आगे बढ़ चुका था, तो उसे कोशिश माना जाएगा।

अदालत ने कहा कि इस मामले में आरोपित का व्यवहार स्पष्ट रूप से गंभीर यौन हमले की दिशा में था और इसे हल्के अपराध की तरह नहीं देखा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस मामले में BNS की धारा 376 को धारा 511 के साथ पढ़ा जाना चाहिए, जो बलात्कार की कोशिश से जुड़ी है। साथ ही POCSO कानून की धारा 18 भी लागू होगी, जो नाबालिग के साथ पेनिट्रेटिव यौन अपराध की कोशिश से संबंधित है।

अदालत ने यह भी कहा कि नाबालिगों के मामलों में अदालतों को ज्यादा संवेदनशील रुख अपनाना चाहिए और तकनीकी आधार पर गंभीर धाराएँ हटाना न्याय के उद्देश्य के खिलाफ है।शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के उस हिस्से को पूरी तरह रद्द कर दिया जिसमें बलात्कार की कोशिश की धारा हटाई गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि मामला उन्हीं गंभीर धाराओं के तहत आगे बढ़े जैसा निचली अदालत ने पहले तय किया था।

क्या था इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला?

दरअसल, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 17 मार्च 2025 को एक विवादित फैसला सुनाया था, जिसने पूरे देश में बहस छेड़ दी थी। यह आदेश जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की सिंगल बेंच ने दिया था। मामला उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले से जुड़ा था, जहाँ एक 11 साल की नाबालिग बच्ची के साथ छेड़छाड़ का आरोप था। घटना साल 2021 की बताई गई थी।

मामले के अनुसार, दो आरोपितों पर आरोप था कि उन्होंने बच्ची के साथ जबरदस्ती की, उसके स्तन पकड़े, उसका पायजामे का नाड़ा तोड़ा और उसे एक सुनसान जगह की ओर खींचने की कोशिश की। निचली अदालत ने इन तथ्यों को गंभीर मानते हुए आरोपितों को BNS की धारा 376 (रेप) और POCSO एक्ट की धारा 18 (रेप की कोशिश) के तहत मुकदमा चलाने का आदेश दिया था।

लेकिन 17 मार्च 2025 के अपने फैसले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध त्थ्यों के आधार पर यह साबित नहीं होता कि आरोपितों ने ‘रेप करने की पूरी कोशिश’ की थी। अदालत ने कहा कि सिर्फ पायजामे का नाड़ा तोड़ना और शरीर के ऊपरी हिस्से को पकड़ना, अपने आप में ‘रेप की कोशिश’ साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है, क्योंकि कथित तौर पर कपड़े पूरी तरह नहीं उतारे गए थे।

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि यह कृत्य गंभीर है, लेकिन इसे गंभीर यौन उत्पीड़न माना जाएगा, न कि रेप की कोशिश। इसीलिए अदालत ने BNS की धारा 354(b) और POCSO एक्ट की धारा 9/10 के तहत मुकदमा चलाने को सही ठहराया।

टॉप 3 AI सुपर पावर में हो भारत: PM मोदी ने बताया 2047 का विजन, कहा- मानव और विश्व कल्याण के लिए हो तकनीक का इस्तेमाल

ग्लोबल साउथ में पहली बार दिल्ली में हो रहे एआई इंपैक्ट समिट को लेकर एएनआई से खास बातचीत में पीएम मोदी ने विकसित भारत का विजन और एआई की भूमिका से लेकर सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय की बात कही।

उन्होंने कहा कि यह शिखर सम्मेलन राष्ट्राध्यक्षों और सरकार प्रमुखों, मंत्रियों, वैश्विक प्रौद्योगिकी के नेताओं और उद्योग जगत एक साथ लाता है, ताकि समावेशी विकास को बढ़ावा देने, सार्वजनिक प्रणालियों को मजबूत करने और सतत विकास को सक्षम बनाने में एआई की भूमिका पर विचार-विमर्श किया जा सके। उन्होंने कहा कि भारत को एआई के टॉप 3 देशों में शामिल होना चाहिए। साथ ही इस बात पर जोर दिया कि एआई को मानव-केंद्रित रहते हुए वैश्विक विकास को गति देना चाहिए।

पीएम मोदी ने खास बातचीत में विजन 2047 में एआई के योगदान, समावेशी समाज, मानव कल्याण और एमएसएमई के विकास से लेकर रोजगार और एआई से डरने नहीं बल्कि तैयारी के साथ उसका इस्तेमाल कैसे करना है इस पर भी अपनी बात कही।

भारत को टॉप 3 देशों में एक होना चाहिए

आत्मनिर्भरता की दिशा में बढ़ रहे भारत को केवल टेक्नोलॉजी उपभोक्ता बन कर नहीं रहना है बल्कि टेक्नोलॉजी क्रिएटर भी बनना है। पीएम मोदी ने कहा कि एआई का विजन संप्रभुता, समावेशी समाज और इनोवेशन पर आधारित है। भारत के एआई मॉडल आने वाले वर्षों में दुनियाभर में धूम मचाएँगे। एआई से कार्य करने में सटीकता आएगी और युवकों को हाईक्वालिटी जॉब मिलेगा यानी रोजगार के क्षेत्र में भी एआई क्रांति लाने वाला है। पीएम मोदी ने कहा, “भारत को दुनिया की टॉप तीन AI सुपरपावर में से एक होना चाहिए।”

उन्होंने कहा, “यह AI ही है जो सच में नागरिकों को सशक्त बनाता है और 2047 तक भारत के विकसित राष्ट्र बनने की यात्रा को तेज़ करेगा और ग्लोबल साउथ के लिए एक स्केलेबल मॉडल देता है।”

गवर्नेंस में एआई का बेहतर इस्तेमाल संभव

स्टार्टअप, रिसर्च इंस्टिट्यूट और टेक्नोलॉजी का पूरा इकोसिस्टम ऐसे एआई सॉल्यूशन विकसित कर सकते हैं, जो विनिर्माण से लेकर गवर्नेंस तक को बेहतर बना सकता है। इससे न सिर्फ रोजगार के अवसर पैदा होंगे बल्कि देश को नई दिशा मिलेगी। पीएम मोदी ने कहा कि उन्हें पूरा भरोसा है कि भारत की युवा शक्ति ऐसा एआई सॉल्यूशन बना सकते हैं, जो किसानों, महिलाओं, छोटे और मंझोले उद्योगपतियों के लिए मददगार साबित होगा। केन्द्रीय बजट में भी इस विजन को रखा गया है।

वैश्विक विकास में सहायक होगा एआई

पीएम मोदी ने कहा, “हमारा विजन साफ है, AI को पूरी तरह से मानव-केंद्रित रहते हुए वैश्विक विकास को गति देनी चाहिए।” यह दुनिया को नई दिशा दिखा सकता है। उन्होने कहा कि इससे डरने के बजाए इसको लेकर तैयारी की जानी चाहिए। इसलिए हम AI से चलने वाले भविष्य के लिए अपने लोगों को स्किलिंग और री-स्किलिंग में इन्वेस्ट कर रहे हैं।

जॉब मार्केट में AI से होने वाली रुकावटों के डर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “तैयारी डर का सबसे अच्छा इलाज है। इसीलिए हम AI से चलने वाले भविष्य के लिए अपने लोगों की स्किलिंग और री-स्किलिंग में इन्वेस्ट कर रहे हैं।”

भारत को सिर्फ टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए बल्कि उसे क्रिएट भी करना चाहिए। AI में आत्मनिर्भर भारत का मतलब है कि भारत डिजिटल सेंचुरी के लिए अपना कोड खुद लिखे। चूंकि पहला ग्लोबल AI समिट ग्लोबल साउथ में हो रहा है, भारत एक ऐसा प्लेटफॉर्म बना रहा है जो कम प्रतिनिधित्व वाली आवाजों और डेवलपमेंट प्रायोरिटीज को बढ़ावा देगा।

भारत का IT सेक्टर 2030 तक करीब ₹3300 करोड़ तक पहुँच सकता है

एआई मार्केट प्रोजेक्शन दिखाते हैं कि भारत का एआई सेक्टर तेजी से आगे बढ़ेगा। 2025 में इंडिया AI सेफ्टी इंस्टीट्यूट को लॉन्च किया गया। भारत ने AI सिस्टम के एथिकल, सेफ और जिम्मेदार डिप्लॉयमेंट को बढ़ावा देने के लिए एक मैकेनिज्म तैयार किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ANI से कहा, “AI बाजार के अनुमान बताते हैं कि भारत का IT सेक्टर 2030 तक 400 बिलियन डॉलर यानी ₹3300 करोड़ तक पहुँच सकता है, जो AI-सक्षम आउटसोर्सिंग और डोमेन-विशिष्ट स्वचालन की नई लहरों से प्रेरित होगा।”

AI एक सिविलाइज़ेशनल इन्फ्लेक्शन पॉइंट पर है- पीएम

PM मोदी ने मानव-केंद्रित इनोवेशन का आह्वान करते हुए कहा कि AI एक सिविलाइजेशनल इन्फ्लेक्शन पॉइंट पर है। यह इंसान की क्षमता में जबरदस्त इजाफा कर सकता है। लेकिन अगर इसे बिना दिशानिर्देश के छोड़ दिया जाए, तो ये सामाजिक संरचना को भी प्रभावित कर सकता है। इसलिए इंडिया एआई समिट को ‘इम्पैक्ट’ के साथ जोड़ा गया, ताकि इनोवेशन ही नहीं जिम्मेदारी के साथ इक्विटेबल आउटकम भी मिले।

‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ को चरितार्थ करे। टेक्नोलॉजी इंसानियत की सेवा के लिए है, इंसान की जगह नहीं ले सकती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ की भावना भारत के सभ्यतागत दर्शन का प्रतिबिंब है। तकनीक का अंतिम लक्ष्य ‘सबका कल्याण और सबकी प्रसन्नता’ होना चाहिए।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ANI से कहा, “यह AI ही है जो सच में नागरिकों को सशक्त बनाता है और 2047 तक भारत के विकसित राष्ट्र बनने की यात्रा को तेज करेगा और ग्लोबल साउथ के लिए एक स्केलेबल मॉडल देता है।”

प्रधानमंत्री का विजन एआई को लेकर साफ है कि जीवन के हर क्षेत्र में इसका इस्तेमाल किया जाना चाहिए। मानव कल्याण इसका उद्देश्य होना चाहिए, गुड गवर्नेंस से लेकर एमएसएमई तक का मददगार होना चाहिए। युवाओं को इसमें आगे आकर नए इनोवेशन पूरी जिम्मेदारी के साथ करना चाहिए। पीएम ने कहा है कि ऐसे युवाओं की मदद के लिए सरकार पूरी तरह से तैयार है।

‘भारत क्लॉड का दूसरा सबसे बड़ा बाजार, सबसे मुश्किल काम कर रहे यहाँ के डेवलपर्स’: AI इम्पैक्ट समिट की मेजबानी के बीच एंथ्रोपिक ने बेंगलुरु में खोला ऑफिस

दिल्ली में आयोजित AI इम्पैक्ट समिट 2026 के बीच अमेरिकी AI कंपनी एंथ्रोपिक ने बेंगलुरु में अपना नया ऑफिस खोलने की घोषणा की। यह एशिया में टोक्यो के बाद उसका दूसरा बड़ा सेंटर है। भारत में कंपनी की कमान एंथ्रोपिक इंडिया की मैनेजिंग डायरेक्टर इरीना घोष सँभालेंगी। कंपनी ने एंटरप्राइज, स्टार्टअप, शिक्षा, कृषि और सार्वजनिक क्षेत्र में कई साझेदारियों का भी ऐलान किया है।

एंथ्रोपिक के लोकप्रिय AI असिस्टेंट क्लॉड डॉट एआई (Claude.ai) के लिए भारत अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बाजार बन गया है। कंपनी के अनुसार, भारत में क्लॉड का लगभग आधा उपयोग कोडिंग, गणना और सॉफ्टवेयर विकास जैसे तकनीकी कामों में हो रहा है।

भारत में असंभव चीजें भी संभव हैं: राहुल पाटिल

बेंगलुरु कार्यालय के उद्घाटन पर आयोजित डेवलपर समिट में एंथ्रोपिक के मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी (Chief Technology Officer) राहुल पाटिल ने बेंगलुरु में बिताए बचपन को याद किया। उन्होंने कहा, “भारत में असंभव चीजें भी संभव हैं।”

राहुल पाटिल ने बताया कि उनकी माता कंप्यूटर विज्ञान की शिक्षिका थीं। उन्होंने अपनी पढ़ाई बाल्डविन इंस्टीट्यूशंस (Baldwin Institutions), सेंट जोसेफ्स कॉलेज (St. Joseph’s College) और बाद में पीईएस विश्वविद्यालय (PES University) से की। पाटिल ने यह भी साझा किया कि इंजीनियरिंग के पहले वर्ष में ही उनकी मुलाकात पत्नी से हुई थी। अपने भाषण में उन्होंने कहा कि भारत आज न केवल AI के क्षेत्र में बड़ा बाजार बन चुका है बल्कि वैश्विक प्रौद्योगिकी नेतृत्व गढ़ने वाली महत्वपूर्ण भूमि भी है।

भारतीय भाषाओं में AI को मजबूत करने पर फोकस

एंथ्रोपिक भारत में AI को भारतीय भाषाओं में मजबूत बनाने पर खास ध्यान दे रही है। कंपनी का कहना है कि देश में एक अरब से अधिक लोग दर्जनभर से ज्यादा आधिकारिक भाषाएँ बोलते हैं लेकिन AI सिस्टम अब तक अंग्रेजी में ज्यादा बेहतर काम करते रहे हैं।

इस कमी को दूर करने के लिए एंथ्रोपिक ने छह महीने पहले दस प्रमुख भारतीय भाषाओं हिंदी, बांग्ला, मराठी, तेलुगु, तमिल, पंजाबी, गुजराती, कन्नड़, मलयालम और उर्दू में सुधार का अभियान शुरू किया। बेहतर और संतुलित प्रशिक्षण डेटा तैयार किया गया, जिससे भाषा की प्रवाह और समझ में साफ सुधार हुआ है।

कंपनी कर्या और कलेक्टिव इंटेलिजेंस प्रोजेक्ट के साथ मिलकर ऐसे सिस्टम भी बना रही है जो खासकर कृषि और कानून जैसे भारतीय क्षेत्रों में AI की क्षमता जाँचें। डिजिटल ग्रीन और अदालत AI के विशेषज्ञ भी इस पहल में जुड़े हैं। लक्ष्य है इन परीक्षण उपकरणों को सार्वजनिक करना ताकि भारतीय उपयोगकर्ताओं के लिए बेहतर AI सिस्टम तैयार किए जा सकें।

क्लॉड को अपना रहे बड़े स्टार्टअप

एंथ्रोपिक का कहना है कि अक्टूबर 2025 में विस्तार योजना की घोषणा के बाद भारत में उसका राजस्व दोगुना हो गया है। यह बढ़ोतरी बड़े उद्योग समूहों, डिजिटल कंपनियों और शुरुआती चरण के स्टार्टअप्स से आ रही है।

एअर इंडिया अपने डेवलपर्स को कम लागत और तेजी से कस्टम सॉफ्टवेयर तैयार करने में मदद के लिए क्लॉड कोड का उपयोग कर रही है। फिनटेक मंच CRED ने फीचर डिलीवरी में दोगुनी तेजी और टेस्ट कवरेज में 10% सुधार की जानकारी दी है। वहीं, वैश्विक आईटी सेवा कंपनी Cognizant अपने 3.5 लाख कर्मचारियों के बीच क्लॉड को लागू कर रही है ताकि सिस्टम और AI अपनाने की रफ्तार बढ़ाई जा सके।

स्टार्टअप दुनिया में Razorpay ने अपने रिस्क सिस्टम, रोजमर्रा के कामकाज और अंदरूनी फैसलों में AI को जोड़ दिया है। एंटरप्रेट (Enterpret) अपने AI अस्टिस्टेंट को चलाने के लिए क्लॉड का इस्तेमाल कर रही है और इससे ग्राहकों की राय और जानकारी सीधे क्लॉड तक पहुँच जाती है।

एक और स्टार्टअप Emergent लोगों को साधारण भाषा में बताकर सॉफ्टवेयर बनवाने की सुविधा देता है। इसने पाँच महीने से भी कम समय में करीब 2.5 डॉलर की सालाना कमाई और बीस लाख उपयोगकर्ता बना लिए। यह पूरा मंच क्लॉड पर ही तैयार हुआ है।

इस तेजी से बढ़ते माहौल को सहारा देने के लिए एंथ्रोपिक की भारत टीम कंपनियों और नए कारोबारों को जमीन से जुड़ी AI सलाह देगी ताकि वे अपनी जरूरत के हिसाब से क्लॉड आधारित समाधान बना सकें और आगे बढ़ा सकें।

शिक्षा के लिए AI का इस्तेमाल

भारत में क्लॉड का करीब 12 प्रतिशत उपयोग पढ़ाई से जुड़ा है। एंथ्रोपिक ने प्रथम (Pratham) के साथ मिलकर सुरक्षा और बेहतर शिक्षा पर काम शुरू किया है। प्रथम ने एंथ्रोपिक को अपना पहला रणनीतिक AI लैब सहयोगी चुना है। क्लॉड से चलने वाली ‘एनीटाइम टेस्टिंग मशीन’ 20 स्कूलों के 1,500 छात्रों पर आजमाई जा रही है और 2026 तक 100 स्कूलों तक पहुँचेगी। इसे पढ़ाई छोड़ चुकी 5,000 से ज्यादा महिलाओं के लिए भी जोड़ा गया है ताकि वे तैयारी जारी रख सकें।

कंपनी सेंट्रल स्क्वायर फाउंडेशन (Central Square Foundation) के साथ मिलकर निजी ट्यूटर, टीचर कोचिंग और परीक्षा आधारित पढ़ाई जैसे AI साधनों को बढ़ावा दे रही है। इसका लक्ष्य है कि तकनीकी मदद देकर इन्हें वंचित इलाकों के बच्चों तक पहुँचा दिया जाए।

खेती, स्वास्थ्य और न्याय तंत्र में AI

भारत की डिजिटल सार्वजनिक व्यवस्था को बड़े और आपस में जुड़े तंत्र के रूप में दुनिया में मिसाल माना जाता है। एंथ्रोपिक, एकस्टेप फाउंडेशन (EkStep Foundation) के साथ मिलकर देख रही है कि AI को इस मजबूत आधार से कैसे जोड़ा जाए।

खेती, जो देश की अर्थव्यवस्था का लगभग छठा हिस्सा है और आधी आबादी को रोजगार देती है, बड़ा फोकस क्षेत्र है। ओपन एग्रीनेट (OpenAgriNet) पहल के तहत किसानों और कृषि कामगारों तक विशेषज्ञ जानकारी पहुँचाने के लिए क्लॉड को जोड़ा जा रहा है। स्वास्थ्य क्षेत्र में नूरा हेल्थ (Noora Health) और इंटेलेहेल्थ (Intelehealth) जैसे संगठन क्लॉड कोड और कोवर्क (Cowork) के जरिए अपने सिस्टम बेहतर करने और दूरदराज के मरीजों को बेहतर इलाज से जोड़ने पर काम कर रहे हैं।

करीब 5 करोड़ लंबित मामलों वाले भारत के न्याय तंत्र में भी AI से मदद की कोशिश है। अदालत एआई (Adalat AI) के साथ मिलकर राष्ट्रीय वॉट्सऐप हेल्पलाइन शुरू की जा रही है जो मामलों की ताजा जानकारी, दस्तावेजों का सार, अनुवाद और कानूनी सवालों के जवाब भारतीय भाषाओं में देगी। सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय ने भारत डिजिटल (Bharat Digital) के सहयोग से पहला सरकारी MCP सर्वर शुरू किया है, ताकि AI प्रणालियाँ राष्ट्रीय आँकड़ों तक पहुँच पा सकें। निजी क्षेत्र में स्विगी (Swiggy) क्लॉड के जरिए किराना मँगाने और भोजन आरक्षण की सुविधा दे रहा है।

वैश्विक AI कंपनियाँ भारत को क्यों चुन रही हैं?

एंथ्रोपिक का विस्तार एक बड़े ट्रेंड का हिस्सा है। पिछले 2 वर्षों में कई वैश्विक AI कंपनियों ने शोध, साझेदारी और बाजार विस्तार के लिए भारत में निवेश बढ़ाया है। OpenAI और Microsoft ने शोध सहयोग, क्लाउड भागीदारी और डेवलपर कार्यक्रमों के जरिए भारत में अपनी मौजूदगी मजबूत की है। Google ने भी भारतीय उपयोगकर्ताओं के लिए एआई शोध और उत्पादों का विस्तार किया है।

भारत के पास तीन बड़ी ताकतें हैं दुनिया के सबसे बड़े डेवलपर समूहों में से एक, मजबूत डिजिटल सार्वजनिक ढाँचा जैसे पहचान और भुगतान प्रणाली, और कई भाषाओं व विविध जरूरतों वाला विशाल बाजार। यही कारण है कि भारत AI परीक्षण और विस्तार के लिए उपयुक्त बन गया है। आने वाले वर्षों में भारत का AI बाजार तेजी से बढ़ने और डिजिटल अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देने की उम्मीद है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में दिव्या भारती ने लिखी है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)