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US ने 64 साल पहले वियतनाम में शुरू किया था ‘ऑपरेशन रैंच हैंड’, अब भी दोनों तरफ दिखते हैं तबाही के निशान: जानें- पीढ़ियों को दिए किस तरह के जख्म

अमेरिका ने 10 जनवरी 1962 को वियतनाम में चलाया था ऐसा सैन्य अभियान, जिसमें उसने पूरी ताकत लगा दी और सारी दुनिया में उस ताकत की नुमाइश भी की, लेकिन उस लड़ाई में अमेरिका को मिली हार। ऐसी हार, जिसका असर आज तक दिखता है। अमेरिका ने इस लड़ाई को जीतने के लिए जो सबसे बड़ा अभियान चलाया था, उसने वियतनाम को ऐसे घाव दिए जिसके जख्म आज तक दिखते हैं। ये ऑपरेशन था ‘रैंच हैंड’।

यूँ तो ‘ऑपरेशन रैंच हैंड’ का उद्देश्य था जंगलों को उजाड़ना, ताकि वो वियत कॉन्ग और उत्तरी वियतनामी बलों पर हावी हो सके, लेकिन इसमें न सिर्फ उसे करारी हार का मुँह देखना पड़ा, बल्कि उसने वियतनाम की जल, जंगल, जमीन… सबकुछ तबाह करके रख दिया।

क्या था ऑपरेशन रैंच हैंड?

अमेरिकी रणनीतिकारों का मानना था कि घने जंगल और फसलें वियत कॉन्ग (कम्युनिस्ट गुरिल्ला लड़ाकों ) की सबसे बड़ी ताकत हैं। इसलिए ‘एरिया-डिनायल’ के नाम पर पेड़-पौधों को खत्म कर दिया जाए।

1962 में शुरू हुआ ऑपरेशन ‘रैंच हैंड’ 1971 तक चला। इसको काफी बड़े पैमाने पर किया गया था, जिसमें दक्षिणी वियतनाम के बड़े हिस्से, मैंग्रोव वन, नदियों के किनारे और कृषि भूमि निशाने पर रहे।

एजेंट ऑरेंज सबसे तेज असर दिखाने वाला रसायन था, इसलिए उसका इस्तेमाल सबसे ज्यादा हुआ। समस्या यह भी थी कि T- 2,4,5 के निर्माण में डाइऑक्सिन मिला, जो काफी ज्यादा मात्रा मिला था, जो दीर्घजीवी और जैव-श्रृंखला में जमा होने वाला जहर है। तत्काल प्रभाव जंगलों के पत्ते झड़ना था, लेकिन दीर्घकालिक प्रभाव इंसानों और पर्यावरण पर पड़े, जिनकी कीमत कई पीढ़ियों ने चुकाई।

रसायनकि हथियारों ने वियतनाम की पीढ़ियाँ कर दी बर्बाद

अमेरिकी वायुसेना के C-123 विमानों से 1962 से 1971 के बीच वियतनाम, लाओस और कंबोडिया के हिस्सों में लगभग 1.9 करोड़ गैलन शाकनाशी रसायनों का छिड़काव किया गया। इनमें सबसे ज्यादा इस्तेमाल हुआ एजेंट ऑरेंज, जो 2,4-D और 2,4,5-T का मिश्रण था और इसी के साथ आया घातक डाइऑक्सिन (TCDD)।

जंगल नष्ट हुए, खेत उजड़े, लेकिन दुश्मन नहीं रुका। बल्कि इसके विपरीत इस अभियान ने दशकों तक चलने वाली मानवीय और पर्यावरणीय त्रासदी को जन्म दिया। जन्मजात विकृतियाँ, कैंसर, त्वचा रोग, मानसिक-शारीरिक अपंगता, इन सबका असर वियतनामी नागरिकों और अमेरिकी सैनिकों ने झेला।

समय बीतने के साथ 2021 जब दुनिया ने काबुल में अमेरिकी दूतावास से हेलिकॉप्टरों द्वारा निकालने की तस्वीरें देखीं, तो 1975 के साइगोन पतन की याद ताजा हो गई। तकनीक, ताकत और दावे, सब धरे रह गए।

ऑपरेशन रैंच हैंड अमेरिका की उसी कहानी का अध्याय है, जहाँ सैन्य प्रयोग ने नैतिकता, राजनीति और मानवता, तीनों मोर्चों पर अमेरिका को निचोड़ कर रख दिया था।

पर्यावरण पर क्या पड़ा प्रभाव?

रैंच हैंड ने वियतनाम की प्रकृति और जीवों को गहरी चोट पहुँचाई। लाखों एकड़ जंगल और खेती योग्य जमीन बंजर हो गई। तटीय इलाकों के मैंग्रोव वन, जो तूफानों से रक्षा करते थे, बड़े पैमाने पर नष्ट हो गए। मिट्टी से पोषक तत्व खत्म हो गए, जैव-विविधता घटी और कई क्षेत्रों में आज भी खेती कठिन है।

डाइऑक्सिन मिट्टी और तलछट (नदी के अंदर) दशकों तक बना रहता है। यह पानी और भोजन के जरिये इंसानी शरीर में पहुँचता है, खासकर पशुओं के माध्यम से। नतीजा ये रहा कि युद्ध खत्म होने के बाद भी जहर खत्म नहीं हुआ।

वियतनाम और अमेरिकी सैनिक के स्वास्थ्य पर प्रभाव  

वियतनामी आँकलनों के मुताबिक लाखों लोग एजेंट ऑरेंज के संपर्क में आए और लाखों आज भी इसके स्वास्थ्य प्रभाव झेल रहे हैं। जन्मजात विकृतियाँ, अतिरिक्त उँगलियाँ, स्पाइना बिफिडा, कैंसर, हृदय दोष, विकासात्मक विकार आदि ये सब देखने को मिले। रेड क्रॉस और अन्य अध्ययनों ने गंभीर मामलों की संख्या बहुत बड़ी बताई।


वहीं 26 से 38 लाख अमेरिकी सैनिकों के संपर्क में आने का अनुमान है। वियतनाम में तैनात रहे सैनिकों में कई प्रकार के कैंसर, पार्किंसन, इस्केमिक हृदय रोग जैसे जोखिम बढ़े पाए गए।

अमेरिका में वेटरन्स अफेयर्स विभाग ने कई बीमारियों को एजेंट ऑरेंज से जोड़कर इलाज और लाभ मान्य किए, लेकिन सैनिकों के बच्चों में जन्मजात विकारों के मामले में मान्यता सीमित रही, जिससे पीड़ित परिवारों में असंतुष्ट रहा।

डाइऑक्सिन का रहा पीढ़ियों तक असर

डाइऑक्सिन ऐसा जहरीला रसायन है जो चर्बी में घुल जाता है और शरीर में 11 से 15 सालों तक बना रह सकता है, पर्यावरण में यह 100 साल से भी ज्यादा टिक सकता है।

यह DNA की अभिव्यक्ति को प्रभावित कर सकता है, यानी बिना DNA को नुकसान पहुँचाए भी अगली पीढ़ियों में इसका असर दिख सकता है। यही कारण है कि युद्ध के दशकों बाद भी नवजात शिशुओं में विकृतियाँ दिखीं। स्तन-दूध और रक्त में डाइऑक्सिन के निशान मिले। यह केवल एक समय की दुर्घटना नहीं, बल्कि पीढ़ीगत त्रासदी बन गई।

अमेरिका की जिम्मेदारी

युद्ध के बाद अमेरिका ने लंबे समय तक जिम्मेदारी से दूरी बनाए रखी। 1970 के दशक के अंत में सैनिकों ने कंपनियों पर मुकदमे किए। 1984 में रसायन बनाने वाली कंपनियों ने समझौता किया पर मुआवज़ा सीमित रहा और अपनी गलती को स्वीकार नहीं किया गया।

राजनयिक रिश्ते 1995 में बहाल हुए। 2006 के बाद एजेंट ऑरेंज पर औपचारिक सहयोग शुरू हुआ। अमेरिका ने सफाई और विकलांग सहायता के लिए धन दिया लेकिन यह नुकसान की तुलना में कम था।

वियतनाम में कई हॉटस्पॉट जैसे दा नांग और बिएन होआ एयरबेस आज भी चुनौती हैं। दा नांग में बड़ा प्रोजेक्ट पूरा हुआ पर बिएन होआ में लंबी सफाई अभी भी जारी है।
इस बीच विदेशी सहायता में कटौती की आशंकाओं ने चिंता बढ़ाई, क्योंकि आधा-अधूरा काम जहर को और फैलने का मौका देता है।

साइगोन का पतन और अमेरिका की बदनामी

30 अप्रैल 1975 को साइगोन का पतन हुआ और वियतनाम युद्ध खत्म हो गया। अमेरिकी दूतावास की छत से हेलीकॉप्टरों की मदद से लोगों को निकालने की तस्वीरें पूरी दुनिया में छा गईं। यह अमेरिका की सैन्य और नैतिक हार का प्रतीक बन गया।

ऑपरेशन रैंच हैंड अपने घोषित लक्ष्य में पूरी तरह विफल रहा। जंगल तो उजड़ गए, लेकिन वियत कॉन्ग नहीं रुका। ऑपरेशन रैंच हैंड उस युद्ध का प्रतीक बन गया जहाँ लक्ष्य पाने की कोशिश में नैतिकता को भूला दिया गया और अंतरराष्ट्रीय आलोचना, घरेलू विरोध और नैतिक पतन का शिकार हो गया।

ऑपरेशन रैंच हैंड ने दिखाया कि रासायनिक युद्ध केवल तत्काल रणनीति नहीं, बल्कि लंबे समय तक असर डालने वाला अपराध है। जंगल उखड़ गए लेकिन विरोध नहीं खत्म हुआ। बल्कि इसका सबसे ज्यादा नुकसान अमेरिका को हुआ और उसकी नैतिकता पर सवाल उठने लगे।

आज वियतनाम और अमेरिका के संबंध बेहतर हैं। पर्यटन बढ़ा, रणनीतिक साझेदारी बनी। लेकिन जमीन के नीचे दबा जहर आज भी मौजूद है। पीड़ित परिवार न्याय, इलाज और साफ-सफाई की माँग आज भी  कर रहा हैं।

भारत में होते लाहौर और सियालकोट, कॉन्ग्रेस की दब्बू नीतियों ने सब बिगाड़ा: जानिए- 60 साल पहले हुए ताशकंद समझौते को, जिसकी कीमत अब तक भुगत रहा है हिंदुस्तान

भारत के इतिहास में 10 जनवरी 1966 का दिन एक ऐसा काला अध्याय है जो आज भी हमें चुभता है। इसी दिन ताशकंद में भारत और पाकिस्तान के बीच एक समझौता हुआ था, जिसे ताशकंद समझौता कहा जाता है। इस समझौते के तहत हमारे बहादुर सैनिकों ने 1965 के युद्ध में अपनी जान की बाजी लगाकर और दुश्मनों का खून बहाकर जो इलाके जीते थे, उन्हें बातचीत की मेज पर बस यूँ ही लौटा दिया गया।

सोचिए अगर ताशकंद समझौता न होता तो आज लाहौर शहर पाकिस्तान का नहीं, बल्कि भारत का हिस्सा होता। हमारा नक्शा कितना अलग और मजबूत दिखता। लेकिन ऐसा नहीं हो सका और इसके लिए जिम्मेदार थी उस समय की कॉन्ग्रेस सरकार की कमजोर और दबाव में झुक जाने वाली विदेश नीति। इस एक फैसले ने देश को सदियों का नुकसान पहुँचाया, जिसकी कीमत हम आज भी चुकाते हैं।

कश्मीर में घुसपैठ, आतंकवाद की घटनाएँ, पुलवामा जैसे हमले… ये सब उस भूल की देन हैं। इस रिपोर्ट में हम उस दौर की पूरी कहानी को विस्तार से समझेंगे, ताकि इतिहास से सबक लिया जा सके और ऐसी गलतियाँ दोबारा न हों।

1965 में भारत से बुरी तरह हारा था पाकिस्तान

साल 1965 का भारत-पाक युद्ध मुख्य रूप से कश्मीर मुद्दे पर शुरू हुआ था। पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान ने एक महत्वाकांक्षी योजना बनाई थी, जिसे ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ नाम दिया गया। इस ऑपरेशन के तहत पाकिस्तान ने हजारों घुसपैठिए और फौजियों को जम्मू-कश्मीर में भेजा, ताकि स्थानीय लोगों को भड़काकर विद्रोह कराया जा सके और कश्मीर पर कब्जा कर लिया जाए। अयूब खान इतने घमंड में थे कि उन्होंने कहा था कि वह दिल्ली पर कब्जा करके ‘दिल्ली में डिनर’ करेंगे। लेकिन भारतीय सेना ने उनके इस सपने को चकनाचूर कर दिया।

हमारे सैनिकों ने न सिर्फ घुसपैठियों को पकड़ा, बल्कि पाकिस्तान पर पलटवार किया। उस समय भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री थे, जो एक सादगी भरे लेकिन मजबूत इरादों वाले नेता थे। उन्होंने अपने सैनिकों से कहा था, “कल का नाश्ता हम लाहौर में करेंगे।”

यह बात सिर्फ एक नारा नहीं थी, बल्कि भारतीय सेना की हिम्मत का प्रतीक थी। और सच में युद्ध के दौरान यह काफी हद तक सच साबित होने वाला था, क्योंकि हमारे जवान लाहौर की सीमाओं तक पहुँच गए थे। इस युद्ध ने दिखाया कि भारत की सेना कितनी तैयार और बहादुर थी, लेकिन राजनीतिक फैसलों ने सब कुछ बदल दिया।

कश्मीर से लेकर कच्छ तक भारी पड़े भारतीय सैनिक, लाहौर सेक्टर में भी घुसे

युद्ध कई मोर्चों पर लड़ा गया और हर जगह भारतीय सेना का दबदबा रहा। लाहौर सेक्टर में तो भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानी रक्षा लाइनों को ध्वस्त कर दिया। हम इच्छोगिल नहर तक पहुँच गए थे, जो लाहौर शहर की आखिरी रक्षा लाइन मानी जाती थी। अगर थोड़ा और आगे बढ़ते तो लाहौर पर कब्जा हो जाता। इसी तरह कश्मीर में हाजी पीर दर्रा जैसे रणनीतिक महत्व के इलाके पर भारत का कब्जा हो गया, जो पाकिस्तान के लिए बहुत बड़ा झटका था। क्योंकि यह दर्रा घुसपैठ के रास्ते को नियंत्रित करता था।

पाकिस्तानी सेना बुरी तरह हार रही थी। उनके हजारों सैनिक मारे गए, उनके सबसे आधुनिक पैटन टैंक तबाह हो गए और हवाई जहाज गिरा दिए गए। भारत ने स्पष्ट रूप से बढ़त बना ली थी। युद्ध के दौरान पाकिस्तान को इतना नुकसान हुआ कि उनके पास लड़ने की ताकत ही कम हो गई थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत को विजेता माना जा रहा था, क्योंकि हमने न सिर्फ अपनी रक्षा की, बल्कि दुश्मन की जमीन पर कदम रखा। लेकिन अफसोस यह जीत अधर में लटक गई।

भारतीय जवानों की बहादुरी के किस्से आज भी सुनाए जाते हैं और वे हमें गर्व से भर देते हैं। मिसाल के तौर पर असल उत्तर की लड़ाई को याद कीजिए। वहाँ पाकिस्तान के सबसे उन्नत पैटन टैंकों को भारतीय सेना ने नेस्तनाबूद कर दिया। हमारे शेरमन टैंकों ने उन पर भारी पड़कर दिखाया कि हिम्मत हथियारों से बड़ी होती है।

इस लड़ाई में मेजर भूपिंदर सिंह जैसे अधिकारी बलिदान हुए, लेकिन उन्होंने दुश्मन को पीछे धकेल दिया। इसी तरह चंब सेक्टर में हमारे जवानों ने पाकिस्तानी हमलों को रोका और कब्जा कर लिया। पाकिस्तान को भारी नुकसान हुआ, उसके करीब 4,000 से ज्यादा फौजी मारे गए, जबकि भारत के लगभग 3,000 जवान वीरगति को प्राप्त हुए।

पाकिस्तान के 200 से ज्यादा टैंक तबाह हुए, जबकि हमारे सिर्फ 80। हवाई युद्ध में भी भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के कई एफ-86 सेबर जेट गिराए। अंतरराष्ट्रीय मीडिया भी भारत की जीत की बात कर रहा था। लेकिन यहीं से कहानी बदल गई, क्योंकि राजनीतिक हस्तक्षेप हो गया और युद्ध का फैसला मैदान से निकलकर मेज पर आ गया।

शीत युद्ध के दौर में बंटी हुई थी दुनिया, सोवियत संघ के बुलावे पर बातचीत

शीत युद्ध का दौर था, जब दुनिया दो खेमों में बँटी हुई थी, एक तरफ अमेरिका था तो दूसरी तरफ सोवियत संघ। दोनों ही महाशक्तियाँ भारत-पाक युद्ध को रोकना चाहती थीं, क्योंकि इससे एशिया में अस्थिरता फैल रही थी। अमेरिका ने पाकिस्तान को हथियार दिए थे, लेकिन युद्ध शुरू होने पर दोनों देशों पर हथियार सप्लाई रोक दी। सोवियत संघ ने मध्यस्थता की पहल की। सोवियत प्रधानमंत्री एलेक्सी कोसिगिन ने भारत और पाकिस्तान को ताशकंद बुलाया।

हमारे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने न्योता स्वीकार किया और ताशकंद गए। पाकिस्तान की ओर से अयूब खान थे। बातचीत शुरू हुई और दबाव का दौर चल पड़ा। सोवियत संघ शांति चाहता था, क्योंकि वह भारत को अपना सहयोगी मानता था, लेकिन पाकिस्तान को भी नहीं खोना चाहता था। अमेरिका भी पीछे से दबाव डाल रहा था। शास्त्री जी पर यह दबाव इतना बढ़ गया कि वे मजबूत होने के बावजूद झुकने को मजबूर हो गए।

अंतर्राष्ट्रीय दबाव में झुड़ी सरकार, नेहरू ने ही की थी शुरुआत

कॉन्ग्रेस सरकार अंतरराष्ट्रीय दबाव में आ गई और यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई। अमेरिका ने हथियारों पर एम्बार्गो लगा दिया था, जिससे पाकिस्तान को तो ज्यादा नुकसान पहुँच रहा था, क्योंकि वे अमेरिकी हथियारों पर निर्भर थे, लेकिन भारत भी कुछ हद तक प्रभावित था। सोवियत संघ शांति चाहता था और उसने शास्त्री जी को समझाया कि युद्ध जारी रखना दोनों देशों के लिए घातक होगा।

शास्त्री जी एक मजबूत नेता थे, लेकिन कॉन्ग्रेस पार्टी और उसकी ब्यूरोक्रेसी की कमजोर कूटनीति ने उन्हें अकेला छोड़ दिया। पार्टी के नेता और सलाहकार दबाव में झुक गए, क्योंकि कॉन्ग्रेस की पुरानी नीति ही थी कि अंतरराष्ट्रीय दबाव में झुककर शांति कायम की जाए। नेहरू जी के समय से यह सिलसिला चला आ रहा था, जब उन्होंने 1948 के युद्ध में भी जीत के करीब पहुँचकर संयुक्त राष्ट्र में मामला ले जाकर पाकिस्तान को फायदा दे दिया था। शास्त्री जी पर इतना दबाव पड़ा कि वे समझौते के लिए राजी हो गए, जबकि मैदान में जीत हमारी थी।

हमने दुश्मन को सौंप दिए अपनी जीत के इलाके

10 जनवरी 1966 को ताशकंद घोषणा पर हस्ताक्षर हुए और यह दिन भारत के लिए एक दुखद मोड़ साबित हुआ। समझौते के मुख्य बिंदु थे कि दोनों देश युद्ध के दौरान कब्जाए गए सभी क्षेत्रों को खाली करेंगे और 5 अगस्त 1965 से पहले की स्थिति को बहाल करेंगे। इसके अलावा दोनों देश शांतिपूर्ण तरीके से अपने विवाद सुलझाएँगे और बल का इस्तेमाल नहीं करेंगे। राजनयिक संबंध सामान्य किए जाएँगे, व्यापार और संचार के रास्ते खोले जाएंगे। एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं होगा और युद्धबंदियों के साथ मानवीय व्यवहार किया जाएगा।

यह सब सुनने में तो अच्छा लगता है, जैसे शांति का एक बड़ा कदम हो, लेकिन हकीकत में भारत ने अपनी जीती हुई रणनीतिक बढ़त को पूरी तरह गँवा दिया। हमने लाहौर सेक्टर, सियालकोट और कश्मीर के महत्वपूर्ण इलाकों को लौटा दिया, जबकि पाकिस्तान ने कुछ नहीं दिया। यह समझौता एकतरफा था, जो भारत के लिए नुकसानदेह साबित हुआ।

हाजी पीर दर्रा वापस करना भारत की सबसे बड़ी गलती

हाजी पीर दर्रा वापस करना सबसे बड़ी गलती थी और यह फैसला आज तक हमें सताता है। यह दर्रा कश्मीर में घुसपैठ रोकने के लिए बेहद महत्वपूर्ण था, क्योंकि यह पाकिस्तान से भारत में आने वाले रास्तों को नियंत्रित करता था। युद्ध में हमारे सैनिकों ने इसे जीता था, लेकिन समझौते में लौटा दिया गया। नतीजा क्या हुआ?

पाकिस्तान ने बाद में इसी रास्ते से आतंकवादियों को भेजना शुरू कर दिया। 1980 और 1990 के दशक में कश्मीर में जो आतंकवाद फैला, उसके पीछे हाजी पीर जैसे क्षेत्रों का वापस होना एक बड़ा कारण था। इसी तरह, लाहौर सेक्टर में जीते क्षेत्र भी लौटा दिए गए। अगर हम इन्हें रखते, तो पाकिस्तान की रक्षा लाइनें कमजोर हो जातीं और कश्मीर पर उसका दावा और भी कमजोर पड़ जाता। लाहौर शहर की सुरक्षा पर असर पड़ता और पाकिस्तान कभी इतना आक्रामक नहीं होता। लेकिन कॉन्ग्रेस की कमजोर नीति ने यह सब लौटा दिया, जिससे पाकिस्तान को नई ताकत मिली।

विदेश नीति में भारत की कमजोरी का फायदा पाकिस्तान ने उठाया

कॉन्ग्रेस की यह दब्बू नीति नेहरू जी के समय से चली आ रही थी और यह भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी कमजोरी रही है। नेहरू जी ने 1947-48 के कश्मीर युद्ध में भी जीत के करीब पहुंचकर युद्ध रोक दिया और मामला संयुक्त राष्ट्र में ले गए, जिससे पाकिस्तान को फायदा हुआ और कश्मीर समस्या आज तक लटकी हुई है। 1962 के चीन युद्ध में भी कॉन्ग्रेस की कमजोर तैयारी और नीति का नतीजा भुगता। 1965 में भी यही हुआ, जीत के मुहाने पर खड़े होकर कॉन्ग्रेस ने सब लौटा दिया। यह राजनीतिक कमजोरी थी, क्योंकि पार्टी अंतरराष्ट्रीय दबाव में झुक जाती थी।

नेहरू जी की ‘अहिंसा’ और ‘शांति’ की नीति अच्छी थी, लेकिन दुश्मन के सामने इतनी कमजोर साबित हुई कि देश को नुकसान हुआ। शास्त्री जी जैसे मजबूत नेता भी इस नीति के शिकार हो गए। अगर कॉन्ग्रेस ने कड़ा रुख अपनाया होता, तो इतिहास अलग होता।

हार कर भी हीरो बन गया अयूब खान

युद्ध में भारत ने कम नुकसान उठाया था और यह साबित करता है कि हमारी जीत कितनी स्पष्ट थी। पाकिस्तान के 4,000 से ज्यादा सैनिक मारे गए, जबकि भारत के करीब 3,000। पाकिस्तान के 200 से ज्यादा टैंक तबाह हुए, उनके एफ-86 सेबर जेट गिराए गए। हमारे सैनिकों ने सियालकोट, लाहौर और कच्छ के रण में दुश्मन को पीछे धकेला। लेकिन ताशकंद समझौते से सब बराबर हो गया। पाकिस्तान को नई जिंदगी मिल गई, जबकि वे हार चुके थे। अयूब खान घर लौटकर हीरो बन गए, क्योंकि उन्होंने कुछ नहीं खोया। भारत ने अपनी जीती जमीन लौटाकर खुद को कमजोर साबित किया। यह फैसला कॉन्ग्रेस की कमजोर नेतृत्व का नतीजा था।

आज भी होती है शास्त्री की मौत की जाँच की माँग

समझौते के अगले दिन 11 जनवरी को शास्त्री जी की रहस्यमय मौत हो गई, जो आज तक एक पहेली बनी हुई है। आधिकारिक रूप से इसे हार्ट अटैक बताया गया, लेकिन कई सवाल उठे। उनका शरीर नीला पड़ गया था, जो जहर के असर जैसा लगता था। पोस्टमॉर्टम नहीं हुआ, जो संदेह बढ़ाता है। परिवार ने जहर देने की आशंका जताई और कहा कि शास्त्री जी समझौते से खुश नहीं थे। कुछ लोग सोवियत संघ या पाकिस्तानी साजिश कहते हैं, क्योंकि सोवियत को समझौता चाहिए था और पाकिस्तान को शास्त्री जी की मौत से फायदा हुआ। यह मौत समझौते से जुड़ी कई थ्योरी पैदा करती है और आज भी जाँच की माँग होती है। शास्त्री जी की मौत ने पूरे देश को सदमे में डाल दिया।

शास्त्री जी मजबूत नेता थे और उनका ‘जय जवान जय किसान’ नारा आज भी गूँजता है। उन्होंने देश को खाद्यान्न संकट से उबारा और युद्ध में सेना का मनोबल बढ़ाया। लेकिन कॉन्ग्रेस की पुरानी नीति ने उन्हें दबाव में डाल दिया। अगर वे और समय माँगते या कड़ा रुख अपनाते, तो शायद नतीजा अलग होता। उनकी मौत ने देश को शोक में डुबो दिया और समझौते की आलोचना बढ़ गई। लोग कहते हैं कि शास्त्री जी समझौते से दुखी थे और इसी तनाव से उनकी मौत हुई।

भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों में आलोचना

भारत में ताशकंद समझौते की कड़ी आलोचना हुई और यह स्वाभाविक था। लोग सड़कों पर उतर आए, प्रदर्शन हुए। सेना में भी निराशा फैल गई, क्योंकि जवानों ने खून बहाकर जीती जमीन लौटाना किसी को स्वीकार नहीं था। विपक्षी दलों ने कॉन्ग्रेस पर कमजोरी का आरोप लगाया और कहा कि यह देशद्रोह जैसा है। यह साबित करता है कि कॉन्ग्रेस की विदेश नीति हमेशा दबाव में झुकने वाली रही और राष्ट्रीय हितों की रक्षा नहीं कर पाई।

पाकिस्तान में भी समझौते की आलोचना हुई, क्योंकि कश्मीर पर कुछ हासिल नहीं हुआ। लेकिन उन्हें भारत की जीती जमीन मिल गई, जो उनके लिए बड़ी राहत थी। ताशकंद ने पाकिस्तान को आतंकवाद फैलाने का मौका दिया। हाजी पीर वापस देने से घुसपैठ आसान हो गई और कश्मीर में दशकों तक अशांति रही।

आज तक कॉन्ग्रेस की गलतियों की सजा भुगत रहा है भारत

आज जब पुलवामा, उरी जैसे हमले होते हैं, तो ताशकंद की याद आती है। अगर वो क्षेत्र भारत के पास होते, तो पाकिस्तान इतना मजबूत नहीं होता और आतंकवाद की जड़ें इतनी गहरी न होतीं। कॉन्ग्रेस की यह गलती देश आज तक भुगत रहा है और हजारों जानें गई हैं। वर्तमान सरकार ने नीति बदली है। सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट जैसे ऑपरेशन दिखाते हैं कि अब दबाव में नहीं झुकते। दुश्मन को जवाब दिया जाता है। यह बदलाव जरूरी था। ताशकंद जैसी भूल दोबारा न हो, इसके लिए मजबूत कूटनीति चाहिए।

ताशकंद समझौता न होता तो हिंदुस्तान के होते लाहौर-सियालकोट

अगर ताशकंद समझौता न होता, तो नक्शा अलग होता। लाहौर, सियालकोट जैसे शहर भारत के होते और पाकिस्तान इतना बड़ा खतरा न बनता।

आज 60 साल बाद भी यह सबक है कि युद्ध जीतकर भी सतर्क रहना चाहिए। बातचीत अच्छी है, लेकिन राष्ट्रीय हित पर समझौता नहीं। कॉन्ग्रेस की पुरानी नीतियों से सीख लेकर आज मजबूत भारत बन रहा है और दुश्मन को मुँहतोड़ जवाब दिया जा रहा है। यह इतिहास की वो घटना है जो दर्द देती है। हमारे जवानों का बलिदान सम्मान चाहिए, लौटाना नहीं। ताशकंद समझौता इसकी याद दिलाता है और हमें बताता है कि कमजोरी की कीमत कितनी भारी होती है।

लाखों की फौज के साथ सोमनाथ मंदिर तोड़ने पहुँचा जफर खान, 16 साल के योद्धा ने 11 दिन बहाया खून: पढ़ें- सिर कटने पर भी म्लेच्छों से लड़ने वाले वीर की शौर्यगाथा

भारत का कण-कण अपनी शूरवीरता कहानी कहती है। इसके पग-पग पर बलिदान की गाथा है। विदेशी आक्रांताओं से लड़ते हुए यहाँ से वीरों ने ना समय देखा और ना उम्र, ना परिवार और ना परिणाम, बस राष्ट्र और धर्म को बचाने के अपने सनातन कर्तव्यों के लिए खुद को बलि वेदी पर न्योछावर कर दिए। ऐसे लाखों शूरवीरों की कहानी भारत की इस पवित्र भूमि में समाहित है। ऐसे ही एक शूरवीर का नाम हमीर सिंहजी गोहिल हैं।

गहलोत राजवंश के क्षत्रिय कुल में जन्म लेने वाले महाप्रतापी हमीर सिंहजी गोहिल एक ऐसे शख्सियत हैं, जिन्होंने सनातन परंपरा के मान्य द्वादशलिंगों में से प्रथम लिंग सोमनाथ मंदिर को बचाने के लिए अपने प्राणों की चिंता नहीं की। अब हमीर सिंह गोहिल पर ‘केसरी वीर’ नाम से एक बॉलीवुड फिल्म भी आ चुकी है, जिसमें उनके पराक्रम को दिखाया गया है।

वीर हमीर सिंह जी गोहिल पर गुजराती में कई किताबें लिखी गई हैं और साल 2012 में एक गुजराती फिल्म ‘वीर हमीरजी- सोमनाथ नी सखाते’ बनी है। इस फिल्म को अकादमी पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय फीचर फिल्म की श्रेणी में भारतीय प्रस्तुति के रूप में भी चुना गया था। हालाँकि, अंतिम कट में यह फिल्म पिछड़ गई।

हमीर सिंह गोहिल और जफर खान का आक्रमण

भारत के इतिहास में वीर हमीर सिंह गोहिल को पराक्रम और उनके साहस के लिए याद किया जाता रहेगा। उन्होंने दिल्ली के सुल्तान मोहम्मद तुगलक-II के गर्वनर जफर खान की सेना से युद्ध करते हुए अद्वितीय साहस का परिचय दिया था। उन्होंने अपने भील दोस्त वेगड़ा जी के साथ अपनी अंतिम साँस तक युद्ध किया और सोमनाथ मंदिर को बचाते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे।

वीर हमीर सिंह गोहिल की समाधि (साभार: nirvandiaries)

बात 14वीं शताब्दी की है। गुजरात के अमरेली जिले के अर्थिला के राजा थे भीमजी सिंह गोहिल। उनके तीन बेटे थे। दुदाजी, अर्जुनजी और हमीरजी। एक बार अपने मझले भाई अर्जुन जी के साथ वे मुर्गों की लड़ाई के चक्कर में दोनों भाई के बीच विवाद हो गया और अर्जुन जी ने उन्हें सौराष्ट्र छोड़कर जाने का आदेश दे दिया। वे 200 क्षत्रियों को लेकर मारवाड़ की ओर चले गए।

कुछ समय के बाद अर्जुन जी अपनी गलती का अहसास हुआ और अपने छोटे भाई हमीर जी बुलवा भेजा। वे आपस आ गए। घर पहुँचकर वे अपने भाइयों और भाभी से मिले। इस तरह पूरी प्रजा हमीर जी के वापस आने पर खुश थी। तीनों भाई जंगलों में जाकर शिकार खेलने और युद्ध का लगातार अभ्यास करते। उनकी उम्र 16 साल थी, लेकिन अभी शादी नहीं हुई थी।

उधर, गुजरात के हालात बदल रहे थे। दिल्ली का सुल्तान मोहम्मद तुगलक द्वितीय जूनागढ़ में अपने गवर्नर शम्ससुद्दीन को हटाकर जफर खान को गवर्नर नियुक्त किया था। जफर खान बेहद ही क्रूर और धर्मांध था। वह गुजरात में हिंदुओं पर तरह-तरह से अत्याचार करता था और मंदिरों को ध्वस्त करता। जफर खान का अगला निशाना हिंदुओं का प्रसिद्ध तीर्थस्थल सोमेश्वर धाम यानी सोमनाथ मंदिर था।

उसने सोमनाथ में रसूल खान को थानेदार नियुक्त किया और आदेश दिया को मंदिर में हिंदुओं को इकट्ठा ना होने दे। कहा जाता है कि उस दिन महाशिवरात्रि था और हर कोई भगवान शिव का अभिषेक करना चाहता था। रसूल खान ने उन्हें रोकने के लिए श्रद्धालुओें के साथ मारपीट शुरू कर दी। इसे आक्रोशित हिंदू श्रद्धालुओं ने रसूल खान को मार डाला। इससे जफर खान को सोमनाथ मंदिर पर हमला करने का मौका मिल गया।

उधर, भीमजी सिंह गोहिल और उनके दोनों बेटे बदले हालात के लिए तैयार हो रहे थे, जबकि हमीर सिंह जी को इसके बारे में जानकारी नहीं थी। एक दिन वे दरबारगढ़ आए और अपने सबसे बड़े भाई दूदाजी की पत्नी से भोजन माँगा। तब उनकी बड़ी भाभी ने कहा, “क्यों देवर जी, इतनी जल्दी क्या है? भोजन करके सोमनाथ मंदिर की रक्षा के लिए साका करने जाना है?”

हमीर सिंह जी को पहली बार सोमनाथ मंदिर पर संकट के बारे में पता चला। उन्होंने अपनी भाभी से पूछा कि ‘क्या सोमनाथ पर संकट है?’ तब उनकी भाभी ने बताया कि दिल्ली का सूबेदार जफर खान अपने दल के साथ हमले के लिए रास्ते में है। यह बात सुनकर हमीर सिंह जी बिना खाना खाए ही खड़े हो गए। वे अपने 200 साथियों को लेकर जफर खान से लड़ने के लिए तैयारी करने लगे।

मंदिर के बाहर लगी वीर हमीर सिंह जी गोहिल की विशाल प्रतिमा (साभार: nirvandiaries)

कहा जाता है कि रास्ते में हमीर सिंह जी को अंधेरी रात में किसी महिला के शोक गीत गाते हुए आवाज सुनाई दी। एक झोंपड़ी में एक वृद्ध चारण यह शोक गीत गा रही थी। हमीर सिंह ने वहाँ जाकर पूछा तो महिला ने कहा कि वह अपने मृत पुत्र के लिए शोकगीत गा रही है। इसके बाद वीर हमीर सिंह ने लाखबाई चारण नाम की वृद्धा से अपने लिए भी शोकगीत गाने को कहा और बताया कि वह सोमनाथ के लिए साका करने जा रहे हैं।

वेगड़ा भी हमीर सिंह जी के साथ जफर खान के खिलाफ युद्ध के लिए अपनी 1200 सैनिकों को लेकर निकल गए। वे सोमनाथ मंदिर के प्रांगण में पहुँचकर जफर खान की सेना का इंतजार करने लगे। जफर खान अपनी सेना के साथ जैसे सोमनाथ मंदिर की ओर बढ़ा, दोनों ओर के सैनिकों में भीषण युद्ध हुआ। जफर खान के सैनिक गाजर-मूली की तरह काटे जाने लगे। आखिरकार जफर खान ने हाथियों पर लाए तोपों का इस्तेमाल शुरू कर दिया।

इससे हमीर सिंह जी की सेना को भारी नुकसान हुआ। वेगड़ा अपनी सेना के साथ बाहरी रक्षा कवच के रूप में जफर खान से लड़ रहे थे। वहीं, हमीर सिंह मंदिर और गर्भगृह को बचा रहे थे। इसी बीच जफर खान के एक महावत ने अपनी हाथी को इशारा करके वेगड़ा को रौंद दिया। हमीर सिंह के साथी वीर वेगड़ा वीरगति को प्राप्त हो गए। जफर खान ने मंदिर को तीन तरफ से घेर रखा था और चौथी तरफ समुद्र था।

जफर खान की विशाल सेना को 200 राजपूतों की सेना ने रात भर उलझा कर रखा। रात में निर्णय हुआ कि सुबह होते ही जफर खान की सेना पर हमला किया जाएगा। ऐसा ही हुआ। सिर पर केसरिया साफा बाँधे शौर्यवान राजपूतों की सेना ने जफर खान पर हमला कर दिया। दोनोें से तरफ से भीषण युद्ध हुआ था। जफर खान की विशाल सेना के बीच राजपूत वीरगति को प्राप्त होने लगे।

इसी बीच जफर खान ने भी हमीर सिंह जी पर पीछे से हमला कर दिया। उनका सिर कट कर धरती पर गिर गया, लेकिन धड़ युद्ध करता रहा। आखिरकार बेजान धड़ कब तक लड़ता? वीर हमीर सिंह गोहिल सोमनाथ को बचाते हुए भगवान शिव के धाम चले गए। अकेले 9 दिनों तक वे जफर खान को मंदिर में घुसने नहीं दिए। उधर वृद्धा चारण हमीर सिंह जी गोहिल के लिए शोकगीत गाती रहीं। ऐसा रहा है हमीरसिंह जी का स्वर्णिम इतिहास।

सोमनाथ मंदिर का बार-बार विध्वंस

सोमनाथ मंदिर, जिसे सोमेश्वर भी कहा जाता है, भगवान शंकर को समर्पित हिंदुओं का प्रसिद्ध मंदिर है। कपिला, हिरण और सरस्वती नामक तीन नदियों का संगम पर यह स्थित है। कहा जाता है कि इस मंदिर को स्वयं चंद्रदेव ने बनवाया था। कालांतर में इस मंदिर का 649 ईस्वी में वल्लभी के यदुवंशी क्षत्रियों ने इसका निर्माण कराया। इस मंदिर पर पहला हमला अरब का सूबेदार अल जुनैद ने 725 ईस्वी में किया था।

इसके बाद प्रतिहार वंश के क्षत्रिय महाराजा नागभट्ट-II ने 815 ईस्वी में इस मंदिर का फिर से निर्माण कराया था। उन्होंने अपने आलेखों में इसका जिक्र किया है। उन्होंने इतिहास में लिखवाया है कि उन्होंने सोमेश्वर सहित सौराष्ट्र के कई तीर्थों का दौरा किया था। अरब यात्री अलबरूनी ने अपने संस्मरण में इस मंदिर के वैभव के बारे में विस्तार से बताया था। इससे गजनी का कबायली शासक महमूद आक्रर्षित हो गया।

उसने सोमनाथ पर आक्रमण कर लूटने की योजना बनाई और अपने 5000 सैनिकों को लेकर गुजरात की ओर चल पड़ा। सन 1026 में महाराजा भीमदेव सिंह सोलंकी-I का शासन था। उस समय तुर्क मुस्लिम शासक महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर हमला कर दिया और लूटपाट करके इस ज्योतिर्लिंग को तोड़ दिया। कहा जाता है कि मंदिर से उसने उस समय वह 2 करोड़ दीनार लूटकर ले गया था।

एक शिलालेख के अनुसार, महाराजा कुमारपाल (शासनकाल 1143-72) ने ‘उत्कृष्ट पत्थरों से और रत्नों’ से सन 1169 में सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण किया। उन्होंने लकड़ी के इस मंदिर को पूरी तरह बदल दिया। सन 1299 में उलुग खान के नेतृत्व में अलाउद्दीन खिलजी की सेना ने गुजरात पर फिर हमला किया। इसमें क्षत्रिय राजा कर्ण सिंह मंदिर को बचाते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए।

उसके बाद मंदिर का पुनर्निर्माण सौराष्ट्र के चूड़सामा वंश के क्षत्रिय राजा महिपाल-I ने सन 1308 में करवाया। बाद में उनके बेटे खेंगारा गद्दी पर बैठे तो उन्होंने शिवलिंग की की स्थापना करवाई। यह कार्य उन्होंने सन 1331 और 1351 के बीच की थी। सन 1395 में इस मंदिर को तीसरी बार ज़फ़र खान ने नष्ट कर दिया। वह मोहम्मद बिन तुलगक-II का सेनापति था। बाद में वह गुजरात का सुल्तान बन गया था।

इसके बाद 1451 में गुजरात के सुल्तान मोहम्द बेगड़ा ने इसे फिर से नष्ट कर दिया। इसके बाद आजाद भारत में इस मंदिर के पुनर्निर्माण का काम शुरू हुआ। मंदिर के निर्माण की देखरेख और धन इकट्ठा करने के लिए सोमनाथ ट्रस्ट की स्थापना की गई थी। इस मंदिर की स्थापना के लिए 11 मई 1951 को भारत के राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने स्थापना समारोह आयोजित किया था।

वीर हमीर सिंह जी गोहिल की समाधि (nirvandiaries)

हमीर सिंह की समाधि पर चढ़ाकर मंदिर के शिखर पर चढ़ाया जाता है ध्वज

वर्तमान में इस ट्रस्ट के आजीवन अध्यक्ष भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। इस मंदिर को बचाने के लिए अपना प्राण उत्सर्ग करने वाले वीर हमीर सिंह गोहिल की प्रतिमा मंदिर में स्थापित है, जिसे मंदिर में आने वाले श्रद्धालु बड़े भक्तिभाव से पूजते हैं। वीर हमीर सिंह गोहिल के साथ भील समुदाय के उनके साथी वीर वेगड़ा की प्रतिमा भी मंदिर में स्थित है।

इसके अलावा, सोमनाथ मंदिर के बाहर घोड़े पर सवार और हाथ में भाला लिए वीर हमीर सिंह जी गोहिल की आदमकद प्रतिमा स्थापित की गई है। इसका मंदिर और श्रद्धालुओं में विशेष महत्व है। सोमनाथ मंदिर के शिखर पर फहराया जाने वाला झंडा पहले वीर हमीर सिंह गोहिल के स्मारक पर चढ़ाया जाता है। उसके बाद मंदिर के शिखर पर लगाया जाता है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट 23 फरवरी 2025 को लिखी गई थी। इसे कुछ बदलावों के साथ फिर से प्रकाशित किया गया है।)

नौकरी के बदले जमीन हड़पने का खेल: कोर्ट ने लालू-राबड़ी समेत 41 लोगों पर किए आरोप तय, जानिए कौन सी थीं वो 7 डील जिसने पूरे नेटवर्क की पोल खोली

बिहार की राजनीति में दशकों से अपनी धाक जमाने वाले लालू प्रसाद यादव के परिवार के लिए ‘लैंड फॉर जॉब’ घोटाला एक ऐसा चक्रव्यूह बन गया है, जिससे निकलना उनके लिए अब और भी कठिन होता जा रहा है। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार समेत 41 लोगों पर आरोप तय कर दिए हैं। कोर्ट ने माना है कि यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि सत्ता का दुरुपयोग कर चलाया गया एक संगठित नेटवर्क था।

एक संगठित आपराधिक नेटवर्क का उदय

यह कहानी शुरू होती है साल 2004 में, जब देश में यूपीए-1 की सरकार बनी और लालू प्रसाद यादव को रेल मंत्रालय जैसा महत्वपूर्ण विभाग सौंपा गया। 2004 से 2009 के अपने इस पाँच साल के कार्यकाल के दौरान लालू यादव ने रेलवे के विकास के कई दावे किए, लेकिन पर्दे के पीछे कुछ और ही खेल चल रहा था। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने हाल ही में टिप्पणी की कि यह मामला पहली नजर में किसी साधारण भ्रष्टाचार जैसा नहीं, बल्कि एक ‘संगठित आपराधिक नेटवर्क‘ जैसा दिखाई देता है।

अदालत का मानना है कि सत्ता, पद और प्रभाव का ऐसा दुरुपयोग कम ही देखने को मिलता है, जहाँ सरकारी नियुक्तियों को एक निजी सौदेबाजी की वस्तु बना दिया गया। कोर्ट ने इस मामले में लालू प्रसाद यादव, उनकी पत्नी राबड़ी देवी, उनकी बेटियों मीसा भारती और हेमा यादव, और उनके बेटों तेजस्वी और तेज प्रताप यादव समेत कुल 41 आरोपितों के खिलाफ आरोप (Charges) तय कर दिए हैं। यह एक ऐसा पड़ाव है जहाँ से अब लालू परिवार को कोर्ट में लंबे ट्रायल का सामना करना होगा।

नौकरी के बदले जमीन: सरकारी पद का निजी इस्तेमाल

जाँच एजेंसियों (CBI और ED) का दावा है कि लालू यादव ने रेल मंत्री रहते हुए एक बेहद शातिर तरीका अपनाया। रेलवे में ग्रुप-डी (चतुर्थ श्रेणी) की नौकरियों के लिए कोई विज्ञापन नहीं निकाला गया, न ही कोई पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई गई। इसके बजाय, उन लोगों को चुना गया जो नौकरी के बदले अपनी जमीन लालू परिवार के नाम करने को तैयार थे।

इस घोटाले का पैमाना इतना बड़ा है कि लालू परिवार ने इसके जरिए बिहार के पटना जैसे महत्वपूर्ण इलाकों में 1 लाख स्क्वायर फीट से ज्यादा जमीन अपने कब्जे में ले ली। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इन बेशकीमती जमीनों के लिए जो कागजी भुगतान दिखाया गया, वह महज 26 लाख रुपए था। जबकि सीबीआई के मुताबिक, उस समय के सरकारी सर्कल रेट के हिसाब से भी इनकी कीमत 4.39 करोड़ रुपए से ज्यादा थी। अगर बाजार भाव की बात करें, तो यह कीमत सर्कल रेट से भी चार से छह गुना ज्यादा थी। यानी करोड़ों की संपत्ति को सिर्फ कुछ लाख रुपए में, और कई बार तो ‘गिफ्ट’ के नाम पर हथिया लिया गया।

बिना विज्ञापन और अधूरे आवेदनों पर मेहरबानी

जाँच में यह बात भी सामने आई कि नियमों की जमकर धज्जियाँ उड़ाई गईं। आमतौर पर सरकारी नौकरियों के लिए विज्ञापन जारी किए जाते हैं, परीक्षाएँ होती हैं और इंटरव्यू होते हैं, लेकिन यहाँ मामला उल्टा था। उम्मीदवारों ने मुंबई, जबलपुर, कोलकाता, जयपुर और हाजीपुर जैसे रेलवे जोनों के लिए आवेदन दिए।

कई मामलों में तो आवेदन मिलने के महज तीन दिन के भीतर ही नौकरी को मंजूरी दे दी गई। आश्चर्य की बात यह है कि कई उम्मीदवारों के आवेदन फॉर्म अधूरे थे, उनके पते तक साफ नहीं थे, फिर भी उन्हें रेलवे में ‘नियुक्त’ कर दिया गया। यह सब इसलिए हुआ क्योंकि उनके परिवार की जमीन की रजिस्ट्री लालू परिवार के किसी न किसी सदस्य के नाम हो चुकी थी।

7 बड़ी डील्स: जिनसे खुला भ्रष्टाचार का पूरा काला चिट्ठा

सीबीआई ने इस पूरे घोटाले को साबित करने के लिए सात प्रमुख डील्स का हवाला दिया है।

डील-1 (किशुन देव राय और राबड़ी देवी): 6 फरवरी 2008 को पटना के रहने वाले किशुन देव राय ने अपनी 3,375 वर्ग फीट की जमीन राबड़ी देवी को सिर्फ 3.75 लाख रुपए में बेच दी। इस रजिस्ट्री के होते ही उसी साल किशुन देव राय के परिवार के तीन सदस्यों ‘राज कुमार सिंह, मिथिलेश कुमार और अजय कुमार’ को मध्य रेलवे मुंबई में नौकरी दे दी गई।

डील-2 (संजय राय और राबड़ी देवी): फरवरी 2008 में ही पटना के महुआबाग के संजय राय ने अपनी 3,375 वर्ग फीट जमीन फिर से राबड़ी देवी के नाम कर दी। कीमत वही 3.75 लाख रुपए रखी गई। इस जमीन के ‘सौदे’ के बदले संजय राय के परिवार के दो सदस्यों को रेलवे में ग्रुप-डी की नौकरी मिल गई।

डील-3 (किरण देवी और मीसा भारती): नवंबर 2007 का मामला और भी बड़ा था। किरण देवी ने अपनी 80,905 वर्ग फीट की विशाल जमीन महज 3.70 लाख रुपए में लालू की बेटी मीसा भारती के नाम कर दी। इसके ठीक बाद 2008 में उनके बेटे अभिषेक कुमार को मुंबई सेंट्रल रेलवे में नियुक्त कर दिया गया।

डील-4 (हजारी राय और एके इन्फोसिस्टम): फरवरी 2007 में हजारी राय ने अपनी 9,527 स्क्वायर फीट जमीन ‘एके इन्फोसिस्टम प्राइवेट लिमिटेड’ नामक कंपनी को बेची। इसके बदले उनके भतीजों दिलचंद कुमार और प्रेम चंद कुमार को रेलवे में नौकरी मिली। दिलचस्प बात यह है कि 2014 में इस पूरी कंपनी का मालिकाना हक और नियंत्रण राबड़ी देवी और मीसा भारती ने अपने हाथ में ले लिया, जिससे जमीन सीधे उनके पास आ गई।

डील-5 (लाल बाबू राय और राबड़ी देवी): पटना के लाल बाबू राय के बेटे लाल चंद कुमार को 2006 में जयपुर रेलवे में नौकरी मिली थी। इसकी ‘फीस’ के तौर पर मई 2015 में लाल बाबू राय ने अपनी 1,360 वर्ग फीट जमीन 13 लाख रुपए में राबड़ी देवी के नाम कर दी।

डील-6 (बृज नंदन राय, हृदयानंद चौधरी और हेमा यादव): इस डील में एक बिचौलिए का इस्तेमाल दिखा। 2008 में बृज नंदन राय ने अपनी जमीन हृदयानंद चौधरी को बेची। हृदयानंद वही व्यक्ति थे जिन्हें 2005 में हाजीपुर रेलवे में नौकरी मिली थी। 2014 में हृदयानंद ने यह जमीन एक ‘गिफ्ट डीड’ के जरिए लालू की दूसरी बेटी हेमा यादव को दान (Gift) कर दी।

डील-7 (विशुन देव राय, ललन चौधरी और हेमा यादव): यहाँ भी वही तरीका अपनाया गया। विशुन देव राय ने अपनी जमीन ललन चौधरी को दी। ललन के पोते पिंटू कुमार को 2008 में मुंबई रेलवे में नौकरी मिली। बाद में 2014 में ललन चौधरी ने वह जमीन हेमा यादव को ट्रांसफर कर दी।

नाबालिग बच्चों के नाम पर संपत्ति का खेल

CBI की चार्जशीट में सबसे चौंकाने वाला खुलासा तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव को लेकर है। 14 जून 2005 की एक डील का जिक्र है, जहाँ एक पिता ने अपने बेटे को नौकरी दिलाने के बदले महज 5,700 रुपए (पाँच हजार सात सौ) में दो कीमती जमीनें राबड़ी देवी के संरक्षण में तेजस्वी और तेज प्रताप के नाम कर दीं।

उस समय ये दोनों भाई नाबालिग थे। जाँच एजेंसी का कहना है कि यह इस बात का सबूत है कि भ्रष्टाचार की योजना कितनी पहले से और कितनी गहराई तक तैयार की गई थी कि बच्चों के भविष्य के नाम पर तब से ही संपत्तियाँ बटोरना शुरू कर दिया गया था।

कानूनी कार्रवाई का सफर: 2022 से 2026 तक

इस घोटाले पर कानूनी शिकंजा 2022 में कसना शुरू हुआ, जब CBI ने लालू परिवार के खिलाफ एक नई FIR दर्ज की और दिल्ली-बिहार के 17 ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की। इसके बाद ED (प्रवर्तन निदेशालय) ने मनी लॉन्ड्रिंग के कोण से भी जाँच शुरू की।

मई 2025 तक आते-आते CBI ने पुख्ता सबूतों के साथ चार्जशीट दाखिल की, जिसमें लालू यादव को मुख्य साजिशकर्ता बताया गया। 24 अगस्त को हुई छापेमारी के बाद जाँच एजेंसियों ने स्पष्ट किया कि नौकरी पाने वाले कई उम्मीदवार अयोग्य थे और उन्होंने फर्जी दस्तावेजों का सहारा लिया था।

राजनीतिक भविष्य पर मंडराते बादल

राउज एवेन्यू कोर्ट द्वारा आरोप तय किए जाने का मतलब है कि अब यह मामला ‘प्रथम दृष्टया’ (Prima Facie) सही पाया गया है और अब गवाहों के बयान और जिरह शुरू होगी। लालू प्रसाद यादव पहले से ही चारा घोटाले के कई मामलों में सजायाफ्ता हैं और खराब स्वास्थ्य के चलते जमानत पर हैं। अब उनके साथ उनके दोनों बेटों (तेजस्वी और तेज प्रताप) और बेटियों पर भी जेल जाने की तलवार लटक रही है।

कोर्ट की टिप्पणियों ने यह साफ कर दिया है कि लोकतंत्र में जब पद का इस्तेमाल ‘प्राइवेट प्रॉपर्टी’ बनाने के लिए किया जाता है, तो कानून की नजरों से बचना नामुमकिन होता है। अब सबकी नजरें कोर्ट के ट्रायल पर टिकी हैं, जो तय करेगा कि बिहार का यह शक्तिशाली राजनीतिक परिवार इस कानूनी भंवर से निकल पाएगा या नहीं।

‘UK यूनिवर्सिटीज में पल रहा कट्टरपंथ, हमारे बच्चे नहीं पढ़ेंगे वहाँ’: जानिए क्या है ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ जिसे ब्रिटेन में बैन कराना चाहता है UAE, सुनवाई न होने पर छात्रों की स्कॉलरशिप रद्द की

संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने युवाओं के बीच इस्लामी कट्टरपंथ को रोकने के मकसद से एक बड़ा कदम उठाया है। यूएई ने ब्रिटेन (UK) में पढ़ाई करने के इच्छुक अपने नागरिकों को दी जाने वाली फंडिंग में भारी कटौती कर दी है। यूएई का यह फैसला उस समय आया है जब ब्रिटेन ने इस्लामी आतंकवादी संगठन ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ पर प्रतिबंध लगाने से इनकार कर दिया।

ब्रिटेन (UK) के साथ बिगड़ते संबंधों के बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने एक बड़ा फैसला लेते हुए ब्रिटिश संस्थानों को उन ग्लोबल यूनिवर्सिटीज की लिस्ट से बाहर कर दिया है, जिनके लिए स्कॉलरशिप और डिग्री सर्टिफिकेशन की अनुमति दी जाती थी। ‘फाइनांशियल टाइम्स’ (FT) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अबू धाबी का यह कड़ा कदम उन चिंताओं से उपजा है कि ब्रिटिश यूनिवर्सिटी कैंपसों में इस्लामी कट्टरपंथ का गंभीर खतरा बढ़ रहा है।

‘फाइनेंशियल टाइम्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, जब ब्रिटिश अधिकारियों ने यूएई से विदेशी विश्वविद्यालयों की संशोधित सूची में से अपने संस्थानों के नाम गायब होने पर सवाल किया, तो यूएई के अधिकारियों ने पुष्टि की कि यह कटौती जानबूझकर की गई है। इस चर्चा की जानकारी रखने वाले एक सूत्र के हवाले से बताया गया कि यूएई प्रशासन नहीं चाहता कि उनके बच्चे ब्रिटिश यूनिवर्सिटी कैंपसों में जाकर कट्टरपंथ का शिकार हों।

आँकड़ों से पता चलता है कि शैक्षणिक वर्ष 2023-24 के दौरान ब्रिटेन की यूनिवर्सिटीज में ‘इस्लामी कट्टरपंथ’ के लक्षण दिखने की वजह से 70 छात्रों के नाम ‘प्रिवेंट डी-रेडिकलाइजेशन प्रोग्राम’ (कट्टरपंथ विरोधी कार्यक्रम) के पास भेजे गए थे। हालाँकि, ब्रिटेन में पढ़ने वाले कुल 30 लाख छात्रों की तुलना में यह संख्या बहुत छोटी है, लेकिन पिछले साल के मुकाबले यह आँकड़ा लगभग दोगुना हो गया है।

पिछले 10 सालों में यूएई ने अपने देश के भीतर कट्टरपंथियों पर बहुत कड़ा शिकंजा कसा है और 2014 में ही ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ को एक आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था। यूएई लंबे समय से यह माँग कर रहा है कि ब्रिटेन को भी मुस्लिम ब्रदरहुड पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए, लेकिन ब्रिटेन अब तक ऐसा करने से कतरा रहा है।

ब्रिटेन की ढिलाई से बढ़े कट्टरपंथियों के हौसले: UAE ने मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े संगठनों को किया ब्लैकलिस्ट

संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने जनवरी 2025 में ब्रिटेन में मौजूद 8 संगठनों को ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ जैसे इस्लामी आतंकी संगठन से संबंध रखने के कारण ब्लैकलिस्ट कर दिया। इन संगठनों की पहचान ‘कैंब्रिज एजुकेशन एंड ट्रेनिंग सेंटर लिमिटेड’, ‘IMA6INE लिमिटेड’, ‘वेम्बली ट्री लिमिटेड’, ‘वस्ला फॉर ऑल’, ‘फ्यूचर ग्रेजुएट्स लिमिटेड’, ‘यास फॉर इन्वेस्टमेंट एंड रियल एस्टेट’, ‘होल्डको यूके प्रॉपर्टीज लिमिटेड’ और ‘नफेल कैपिटल’ के रूप में हुई है।

हैरानी की बात यह है कि कट्टरपंथी संगठन ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ पर मिस्र, सऊदी अरब और खुद यूएई जैसे प्रमुख मुस्लिम देशों ने भी बैन लगा रखा है। इसके विपरीत, ब्रिटेन जैसा ‘धर्मनिरपेक्ष’ देश इस संगठन के खिलाफ नरम रुख अपनाए हुए है। उसने अब तक न तो इसे बैन किया है और न ही इसे आधिकारिक तौर पर आतंकवादी संगठन घोषित किया है।

ब्रिटेन इन दिनों तेजी से बढ़ते इस्लामी कट्टरपंथ और धर्मांतरण की गंभीर समस्या से जूझ रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ ने ब्रिटेन में अपना नेटवर्क उन छात्रों और कट्टरपंथी निर्वासितों के जरिए फैलाया है, जो अपने देशों में हुई कार्रवाई के बाद वहाँ शरण लेने पहुँचे थे। ये संगठन दक्षिण एशिया के उन कट्टरपंथियों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं, जो जमात-ए-इस्लामी का प्रतिनिधित्व करते हैं और अबुल आला मौदूदी के विचारों को बढ़ावा देने के लिए बने हैं।

साल 2024 में, पूर्व कम्युनिटी सेक्रेटरी माइकल गोव ने ‘मुस्लिम एसोसिएशन ऑफ ब्रिटेन’ (MAB) को स्पष्ट रूप से मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़ा संगठन बताया था। इससे पहले 2015 में भी ब्रिटिश सरकार की एक समीक्षा में यह खुलासा हुआ था कि MAB पर पूरी तरह से मुस्लिम ब्रदरहुड का वर्चस्व है।

एक सरकारी समीक्षा में विस्तार से बताया गया है कि कैसे ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ ने पिछले पाँच दशकों के दौरान धीरे-धीरे ब्रिटेन में अपना आधार मजबूत किया है। 1980 के दशक के उत्तरार्ध तक, इस संगठन ने इराक और फिलिस्तीन जैसे मुद्दों का इस्तेमाल करके ब्रिटेन में बसे दूसरी पीढ़ी के मुस्लिमों को एकजुट करना और उन्हें अपने साथ जोड़ना शुरू कर दिया था।

1990 के दशक तक, मुस्लिम ब्रदरहुड ने अपनी जिहादी विचारधारा को फैलाने और नए समर्थकों को लुभाने के लिए कई तरह के संगठन खड़े कर लिए थे। 2015 की एक रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से किसी भी संगठन ने खुलकर अपनी पहचान मुस्लिम ब्रदरहुड के रूप में नहीं बताई और इस संगठन की सदस्यता हमेशा की तरह एक ‘राज’ ही बनी रही।

इसके बावजूद, मुस्लिम ब्रदरहुड ने कई सालों तक ‘इस्लामिक सोसाइटी ऑफ ब्रिटेन’ (ISB) को अपने हिसाब से चलाया, ‘मुस्लिम एसोसिएशन ऑफ ब्रिटेन’ (MAB) पर अपना दबदबा बनाए रखा और ‘मुस्लिम काउंसिल ऑफ ब्रिटेन’ (MCB) को स्थापित करने व चलाने में अहम भूमिका निभाई। MAB ने फिलिस्तीन और इराक जैसे मुद्दों के जरिए राजनीति में सक्रियता बढ़ाई और चुनावों में अपने उम्मीदवार उतारे। वहीं, MCB ने सरकार के साथ बातचीत का रास्ता साफ किया। इतना ही नहीं, MAB ने सुरक्षा मुद्दों पर पुलिस के साथ मिलकर काम किया और उत्तरी लंदन की एक मस्जिद से कट्टरपंथी प्रचारक अबू हमजा को बाहर निकालने में मदद की, जिसके बाद से उस मस्जिद के प्रबंधन में MAB की अहम भूमिका बनी हुई है।

2015 की रिपोर्ट से लिया गया अंश जिसका टाइटल है: मुस्लिम ब्रदरहुड रिव्यू: मुख्य निष्कर्ष

समीक्षा में यह भी सामने आया कि ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ अपने विभिन्न संगठनों के जरिए ब्रिटेन में बड़े पैमाने पर चंदा (फंड) इकट्ठा कर रहा है। ‘यूके इस्लामिक मिशन’ (UKIM) और ‘इस्लामिक फोरम फॉर यूरोप’ (IFE) जैसे ब्रदरहुड के नियंत्रण वाले संगठन ब्रिटेन में दर्जनों मस्जिदें चला रहे हैं। ये संगठन फिलिस्तीनी आतंकी समूह ‘हमास’ के खुले समर्थक रहे हैं।

2015 की इस रिपोर्ट में आगे बताया गया कि भले ही ब्रिटेन में मुस्लिम ब्रदरहुड खुद को ‘अल-कायदा’ और कट्टरपंथी सलाफवाद का विरोधी बताता हो, लेकिन सच्चाई कुछ और है। ब्रिटिश सरकार की जाँच में पाया गया कि यह संगठन प्रतिबंधित आतंकी समूहों का समर्थन करता है और आतंकवाद पर इसके विचार ब्रिटेन के राष्ट्रीय हितों, मूल्यों और सुरक्षा के बिल्कुल खिलाफ हैं।

हैरानी की बात यह है कि 2015 की समीक्षा में मुस्लिम ब्रदरहुड की जिहादी प्रवृत्तियों का कच्चा चिट्ठा सामने आने के बावजूद, ब्रिटिश सरकार ने इसे बैन नहीं किया। सरकार का तर्क था कि ब्रिटेन के भीतर इस संगठन की किसी आतंकी गतिविधि में शामिल होने का कोई ठोस सबूत नहीं मिला है।

‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ की पूरी काला-चिट्ठा: खौफनाक इतिहास से लेकर ग्लोबल जिहाद तक

‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ या ‘इखवान अल-मुस्लिमीन’ की स्थापना साल 1928 में मिस्र के एक शिक्षक और इस्लामी विद्वान हसन अल-बन्ना ने की थी। इस संगठन की नींव पश्चिमी उपनिवेशवाद के विरोध और ओटोमन साम्राज्य के पतन के बाद खत्म होते इस्लामी मूल्यों को बचाने के नाम पर रखी गई थी। अल-बन्ना ने इसे एक ‘पैन-इस्लामिस्ट’ आंदोलन के रूप में शुरू किया था, जिसका शुरुआती जोर समाज सेवा और इस्लामी वकालत पर था।

अपने शुरुआती सालों में, मुस्लिम ब्रदरहुड ने मिस्र की कमजोर सरकारों की कमियों का फायदा उठाकर गरीबों और अनपढ़ लोगों के लिए स्कूल, अस्पताल और मस्जिदें बनवाईं। इसके साथ ही, उसने धर्मनिरपेक्षता और साम्राज्यवाद के ‘इलाज’ के रूप में इस्लाम और ‘तौहीद’ (अल्लाह की सर्वोच्चता) का प्रचार करना शुरू किया। मुस्लिम ब्रदरहुड का नारा (मोटो) यह साफ कर देता है कि भले ही शुरुआत में यह सीधे तौर पर हिंसा से न जुड़ा रहा हो, लेकिन ‘जिहाद’ हमेशा से इसका मूल रास्ता रहा है।

‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ का मूल नारा (मोटो) उनके इरादों को पूरी तरह साफ करता है, “अल्लाह हमारा उद्देश्य है; पैगंबर हमारे नेता हैं; कुरान हमारा कानून है; जिहाद हमारा रास्ता है; और अल्लाह की राह में मरना हमारी सर्वोच्च इच्छा है।”

1930 के दशक तक, हज़ारों सदस्यों के साथ यह संगठन राजनीति में कदम रख चुका था। हालाँकि, इस कट्टरपंथी संगठन की ‘सीक्रेट अपैरेटस’ (al-Nizam al-Khas) नाम की एक पैरामिलिट्री विंग भी थी, जो राजनीतिक हत्याओं और जिहादी हिंसा को अंजाम देती थी। साल 1948 में, इस संगठन पर प्रतिबंध लगाने के कारण ‘सीक्रेट अपैरेटस’ के सदस्यों ने मिस्र के प्रधानमंत्री महमूद अल-नोकराशी पाशा की हत्या कर दी थी। इसके बदले में, 1949 में मिस्र की गुप्त पुलिस ने संगठन के संस्थापक हसन अल-बन्ना की हत्या कर दी।

‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ की गुप्त शाखा (Secret Apparatus) के सदस्यों को कड़ा शारीरिक और सैन्य प्रशिक्षण दिया जाता था, जिसमें हथियार चलाना और गुप्त अभियानों को अंजाम देना शामिल था। धोखे और गोपनीयता (तक़िया) का सहारा लेकर ये जिहादी राजनीतिक दलों, सेना, खुफिया एजेंसियों, मीडिया, शिक्षण संस्थानों और एनजीओ तक में घुसपैठ कर उन्हें भीतर से खोखला कर देते हैं। ब्रिटेन जैसे देशों में भले ही वे सीधे तौर पर हिंसा न कर रहे हों, लेकिन मीडिया, राजनीति और चैरिटी के जरिए अपना जिहादी एजेंडा आगे बढ़ाना आज भी जारी है।

मिस्र में साल 2012 में इस संगठन ने चुनाव जीता और मोहम्मद मुर्सी राष्ट्रपति बने, लेकिन 2013 में जनरल अब्दुल फतह अल-सीसी के नेतृत्व में हुए सैन्य तख्तापलट ने उन्हें सत्ता से हटा दिया। इसके बाद मिस्र में इस संगठन को बैन कर ‘आतंकवादी संगठन’ घोषित कर दिया गया। आज भी मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका की कई सरकारें इसे अपनी स्थिरता के लिए खतरा मानती हैं। हाल ही में, टेक्सास के गवर्नर ग्रेग एबॉट ने भी मुस्लिम ब्रदरहुड और ‘काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस’ को ‘विदेशी आतंकवादी और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक संगठन’ मानने का ऐलान किया है।

यूएई, सऊदी अरब, मिस्र, बहरीन और रूस जैसे देश पहले ही ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ को एक आतंकवादी संगठन घोषित कर चुके हैं। अप्रैल 2025 में जॉर्डन ने भी इस समूह पर तब बैन लगा दिया, जब उसने रॉकेट और ड्रोन के जरिए हमलों की साजिश रचने वाले इसके सदस्यों को गिरफ्तार किया।

मुस्लिम ब्रदरहुड की विचारधारा ने 1940 के दशक में मौलाना अबुल आला मौदूदी की ‘जमात-ए-इस्लामी’ को भी प्रभावित किया था। भारत में प्रतिबंधित आतंकी संगठन जैसे सिमी (SIMI) और पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI), जो हिंदुओं के खिलाफ जिहादी हमलों और भारत को एक इस्लामी राष्ट्र बनाने की साजिशों में शामिल रहे हैं, वे भी मुस्लिम ब्रदरहुड की रणनीतियों से प्रेरणा लेते हैं। भारत में सक्रिय आतंकी समूहों को उकसाने के अलावा, इस संगठन ने 2021 में भारत के आर्थिक हितों को चोट पहुँचाने के लिए ‘भारतीय उत्पादों के बहिष्कार‘ (#BoycottIndianProducts) का अभियान चलाया था। वहीं 2023 में, पैगंबर मुहम्मद के सम्मान की रक्षा के बहाने इस संगठन ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि खराब करने की गहरी साजिश रची थी।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है। इसको पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें)

CBI का छापा, सोनिया का पास्ता मेकर और इंदिरा गाँधी: ममता बनर्जी के ‘दखल’ से चर्चा में 49 साल पुराना किस्सा

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस के चुनावी प्रबंधन का काम देखने वाली I-PAC कंपनी पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) के छापे के दौरान जो ड्रामा हुआ, उसे ऑन टीवी हर किसी ने देखा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद कंपनी के मालिक के घर पहुँची और जरूरी फाइलें, लैपटॉप और अन्य दस्तावेज लेकर निकल गईं। उनका यह रवैया देख हर कोई हैरान रह गया कि मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए ऐसा कैसे किया जा सकता है।

यह पहली बार नहीं है जब किसी बड़े राजनीतिक नाम ने जाँच एजेंसियों से बचने के लिए असामान्य कदम उठाए हों। इतिहास में ऐसा एक बड़ा उदाहरण 1977 का है जिसका जिक्र कैथरीन फ्रैंक की किताब- इंदिरा- द लाइन ऑफ इंदिरा नेहरू में पढ़ने को मिलता है।

फ्रैंक कैथरीन की किताब, जिसमें घटना का जिक्र है (फोटो साभार: अमेजन)

जब इंदिरा गाँधी के घर पड़ी CBI की रेड

ये वो समय था जब 1977 में आपातकाल के बाद जाँच के लिए शाह आयोग का गठन किया गया। आयोग का उद्देश्य इमरजेंसी के दौरान हुई ज्यादतियों और दुरुपयोग की जाँच करना था। आयोग ने इंदिरा गाँधी को कई बार पूछताछ के लिए बुलाया, लेकिन वह हर बार अपने वकील फ्रैंक एंथनी की सलाह पर आयोग के समक्ष पेश होने से इनकार करती रहीं और इसे असंवैधानिक और गैरकानूनी भी ठहरा दिया।

एक तरफ इंदिरा गाँधी लगातार शाह कमीशन से बचने की कोशिशों में लगी हुईं थीं। दूसरी तरफ जाँच एजेंसियों की पड़ताल शुरू थी। किताब में लिखे अंश के अनुसार, 3 अक्तूबर 1977 का दिन आया। उनके घर 12 विलिंगडन क्रेसेंट पर सीबीआई की रेड पड़ी। उनके बेटे संजय और बहू मेनका लॉन पर बैडमिंटन खेल रहे थे। दो सीबीआई अधिकारी उन्हें गिरफ्तार करने आए और इंदिरा गाँधी से कहा कि वे हिरासत में ली जाती हैं। हालाँकि, इंदिरा ने ऐसा होने की उम्मीद लगाई हुई थी और शायद इससे निपटने की उनकी रणनीति भी तैयार थी।

सीबीआई अधिकारियों से उस समय इंदिरा गाँधी ने पैकिंग के लिए समय माँगा और घर के भीतर चली गईं। करीबन 5 घंटे वह घर में रहीं और शाम के 8 बजे वह सफेद साड़ी (हरी बॉर्डर वाली) पहनकर भीड़ के आगे आईं। बताया जाता है कि इन पाँच घंटों में इंदिरा गाँधी ने घर के भीतर बहुत कुछ किया। उन्होंने अपने समर्थकों को बुलाया, प्रेस को सूचित किया, परिजनों से बात की और सामान बाँधा, जिसमें सबसे हैरान करने वाली चीज थी सोनिया गाँधी का एक पास्ता मेकर।

कैथरीन फ्रैंक की किताब में लिखे अंश का स्क्रीनशॉट

किताब में एक अफवाह के तौर पर ही सही, लेकिन ये बताया गया है इंदिरा गाँधी के सामान में उस समय पास्ता मेकर मिलने की कोई वजह नहीं थी सिवाय इसके कि उन्होंने इससे उन दस्तावेजों को नष्ट किया जो उनके लिए समस्या बन सकते थें।

कैथरीन फ्रैंक की किताब में लिखे अंश का स्क्रीनशॉट

इसके बाद क्या सब हुआ ये इतिहास में दर्ज है। इंदिरा गाँधी ने तब इस गिरफ्तारी को अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए भुनाया। बाद में सुनवाई हुई। मजिस्ट्रेट कोर्ट ने ठोस सबूत न मिलने पर उन्हें रिहा कर दिया। और ये चर्चा कभी नहीं हुई कि वो कागज क्या थे जिन्हें इंदिरा गाँधी ने पास्ता मेकर में डालकर काट दिया।

आज जब मीडिया में ममता बनर्जी से जुड़ी खबरें आई है तो ये किस्सा और भी प्रांसगिक हो गया कि कैसे इंदिरा गाँधी ने चालाकी से न केवल 5 घंटे में अपने लिए समर्थन बटोरा बल्कि अपने खिलाफ रखें सबूतों को भी नष्ट कर दिया। ये सच है कि उस समय इंदिरा के पक्ष में जैसे लोग आए 1978 में उन्हें उसका सीधा फायदा हुआ, मगर बंगाल में स्थिति ऐसी नहीं देखने को मिल रही। लोग ममता बनर्जी की हरकत पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। ईडी उनकी हरकत के खिलाफ हाई कोर्ट चला गया है। वहीं बंगाल सीएम ने भी इस मामले में अधिकारियों के विरुद्ध शिकायत दी है। देखना यही है कि इस घटना को बंगाल की जनता कैसे लेगी?

अब AI बनेगा आपका सेहत का साथी: OpenAI ने लॉन्च किया ChatGPT Health, आपके मेडिकल रिकॉर्ड से देगा सटीक सलाह, जानें कैसे काम करेगा यह नया फीचर

कैलिफोर्निया में सैन फ्रांसिस्को की कंपनी OpenAI ने बुधवार (7 जनवरी 2026) को ChatGPT Health पेश किया है। यह खास फीचर लोगों के हेल्थ ऐप्स और मेडिकल रिकॉर्ड्स को सुरक्षित तरीके से जोड़ने की सुविधा देता है। इसे दुनिया के 60 देशों के 260 से ज्यादा डॉक्टरों ने मिलकर तैयार किया है ताकि यूजर्स को सेहत से जुड़ी बेहतर जानकारी मिल सके।

यूजर्स अब ChatGPT के एक सुरक्षित और अलग हिस्से में सेहत से जुड़े सवाल पूछ सकेंगे। खास बात यह है कि आप इसमें अपने मेडिकल रिकॉर्ड और फिटनेस ऐप्स को जोड़ सकते हैं, ताकि AI आपकी अपनी जानकारी के आधार पर सटीक जवाब दे सके।

OpenAI का कहना है, “आप सुरक्षित तरीके से अपना हेल्थ डेटा लिंक कर सकते हैं ताकि आपको काम की सलाह मिले। इसे डॉक्टरों की मदद से बनाया गया है ताकि लोग अपनी सेहत का बेहतर ख्याल रख सकें। पर ध्यान रहे, यह डॉक्टरों का साथ देने के लिए है, उनकी जगह लेने के लिए नहीं।”

डॉक्टर की जगह नहीं, बस मदद के लिए है यह सिस्टम

OpenAI ने साफ किया है कि यह नया फीचर डॉक्टरों की जगह लेने के लिए नहीं, बल्कि उनकी मदद के लिए है। कंपनी के मुताबिक, लोग पहले से ही सेहत से जुड़ी जानकारी के लिए ChatGPT का खूब इस्तेमाल कर रहे हैं। एक स्टडी में सामने आया है कि दुनिया भर में हर हफ्ते करीब 23 करोड़ लोग अपनी बीमारियों के बारे में सवाल पूछते हैं। अक्सर लोग देर रात, क्लिनिक बंद होने के बाद यहाँ आते हैं, क्योंकि उस वक्त कोई डॉक्टर उपलब्ध नहीं होता और गूगल पर जानकारी ढूँढना उलझन भरा हो जाता है।

OpenAI की अधिकारी फिजी सिमो का कहना है कि इस नए फीचर का मकसद यूजर्स को अपनी सेहत के प्रति जागरूक और भरोसेमंद बनाना है। उन्होंने बताया कि आज के समय में हेल्थकेयर सिस्टम इतना उलझा हुआ है कि अच्छी सुविधा मिलने के बाद भी लोग परेशान रहते हैं। ऐसे में AI डॉक्टर और मरीज दोनों के लिए एक मददगार साथी साबित हो सकता है।

सिमो ने जोर देकर कहा कि “AI इलाज की जगह नहीं ले सकता”, लेकिन यह पेचीदा मेडिकल सिस्टम को समझने में बहुत काम आ सकता है। इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह ढेर सारी मुश्किल जानकारियों को इकट्ठा करके उन्हें बहुत आसान भाषा में समझा देता है।

सेहत का डेटा रहेगा सुरक्षित, आपकी मर्जी से होगा लिंक

OpenAI ने साफ किया है कि आपकी सेहत से जुड़ी जानकारी पूरी तरह सुरक्षित रहेगी। यूजर्स अपनी पसंद के मुताबिक Apple Health, इलेक्ट्रॉनिक मेडिकल रिकॉर्ड्स (फिलहाल सिर्फ अमेरिका में) और MyFitnessPal, Peloton या Weight Watchers जैसे ऐप्स को लिंक कर पाएँगे। जब आप इसकी इजाजत देंगे, तभी ChatGPT आपकी लैब रिपोर्ट, नींद का पैटर्न, कसरत और खान-पान के आधार पर आपको सलाह देगा।

कंपनी ने बताया कि कोई भी डेटा अपने आप लिंक नहीं होगा। कंपनी ने बताया कि कोई भी डेटा अपने आप लिंक नहीं होगा। यूजर्स को एक-एक करके खुद उन ऐप्स को चुनना होगा जिन्हें वे लिंक करना चाहते हैं। इस काम के लिए OpenAI ने अमेरिकी कंपनी b.well के साथ हाथ मिलाया है। यह कंपनी लाखों डॉक्टरों और अस्पतालों से मेडिकल रिकॉर्ड इकट्ठा करती है और उन्हें इस तरह तैयार करती है कि AI उन्हें आसानी से समझ सके। सबसे खास बात यह है कि डेटा पर पूरा कंट्रोल आपका होगा। अगर आप कभी भी अपना रिकॉर्ड डिस्कनेक्ट करना चाहें, तो कर सकते हैं। जैसे ही आप डिस्कनेक्ट करेंगे, कंपनी आपके सारे डेटा को अपने सिस्टम से पूरी तरह डिलीट कर देगी।

OpenAI ने इस सिस्टम को इस तरह तैयार किया है कि यह बातचीत के दौरान आपकी निजी जानकारी को सेव नहीं करेगा। आप जब चाहें अपनी चैट डिलीट कर सकते हैं और 30 दिनों के अंदर उसे सर्वर से पूरी तरह हटा दिया जाएगा। आपकी सारी चैट और डेटा हमेशा सुरक्षित (encrypted) रहता है, और सुरक्षा को और मजबूत करने के लिए आप ‘मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन’ (MFA) भी ऑन कर सकते हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आपकी सेहत से जुड़ी जानकारी ChatGPT के बाकी हिस्सों से बिल्कुल अलग रखी जाएगी। ChatGPT हेल्थ का अपना अलग सिस्टम, मेमोरी और फाइलों का रिकॉर्ड होगा। कंपनी ने साफ किया है कि आपकी सेहत से जुड़ी बातचीत का इस्तेमाल उनके मुख्य AI मॉडल को ट्रेनिंग देने के लिए नहीं किया जाएगा। सुरक्षा के लिहाज से, अगर आप सामान्य चैट में सेहत से जुड़ा कोई सवाल पूछते हैं, तो खुद ChatGPT आपको सुरक्षित ‘हेल्थ चैट’ वाले हिस्से में जाने की सलाह दे सकता है।

बिना डराए सही जानकारी देने वाला प्लेटफॉर्म

OpenAI के मुताबिक, ChatGPT Health को इस तरह तैयार किया गया है कि यह आपको डराने के बजाय सही जानकारी दे और जरूरत पड़ने पर आपको डॉक्टर के पास जाने की सलाह दे। कंपनी की अधिकारी फिजी सिमो ने भरोसा दिलाया है कि मॉडल को जानकारीपूर्ण बनाया गया है ताकि यह ‘अलार्मिंग’ या डरावना न लगे। इस फीचर को धीरे-धीरे रोलआउट किया जाएगा ताकि अनुभव के आधार पर इसमें सुधार होता रहे। फिलहाल इसके लिए आपको वेटलिस्ट (Waitlist) में शामिल होना होगा।

यह सुविधा उन यूजर्स के लिए है जो यूरोपीय आर्थिक क्षेत्र, स्विट्जरलैंड और यूके से बाहर रहते हैं। इसमें ChatGPT फ्री, गो, प्लस और प्रो प्लान वाले सभी यूजर्स शामिल हो सकेंगे। शुरुआत में यह सुविधा बीटा टेस्टिंग के लिए एक छोटे ग्रुप को दी जाएगी, लेकिन कंपनी का लक्ष्य इसे जल्द ही सभी यूजर्स (फ्री यूजर्स समेत) के लिए उपलब्ध कराना है।

ChatGPT Health की लॉन्चिंग ठीक उसी समय हुई है जब रेगुलेटर्स (सरकारी निगरानी संस्थाएँ) हेल्थ टेक्नोलॉजी की जाँच-परख कर रहे हैं। इसकी लॉन्चिंग से एक दिन पहले, अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) के कमिश्नर मार्टी मकारी ने एक बड़ी घोषणा की थी। उन्होंने कहा कि एजेंसी अब उन वियरेबल गैजेट्स (जैसे स्मार्टवॉच) और सॉफ्टवेयर की निगरानी कम करेगी जिनका मकसद लोगों को स्वस्थ जीवन के लिए प्रोत्साहित करना है।

मार्टी मकारी ने ChatGPT का जिक्र करते हुए इसे एक ऐसा प्रोडक्ट बताया जिसका प्रचार किया जाना चाहिए। हालाँकि, इसके साथ ही उन्होंने एक चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा कि इस तरह की तकनीक के साथ सुरक्षा से जुड़ी गंभीर चिंताओं का भी ध्यान रखना बहुत जरूरी है।

सुविधा के साथ प्राइवेसी का बड़ा खतरा

पिछले कुछ सालों में तकनीक और AI की दुनिया पूरी तरह बदल गई है। एक तरफ तो इन बदलावों ने हमारी जिंदगी बहुत आसान बना दी है, लेकिन दूसरी तरफ हमारी प्राइवेसी (निजी जानकारी) पर बड़ा खतरा पैदा कर दिया है।

दुनिया की बड़ी टेक कंपनियाँ प्राइवेसी के मामले में अक्सर विवादों में रहती हैं। जैसे Meta (Facebook) का ‘कैम्ब्रिज एनालिटिका’ स्कैंडल, जहाँ करोड़ों लोगों की जानकारी उनकी मर्जी के बिना ले ली गई थी। इसी तरह, TikTok जैसे चीनी ऐप्स पर भी डेटा चोरी के आरोप लगे हैं, जिसकी वजह से कई देशों में इन्हें बैन कर दिया गया। यहाँ तक कि YouTube पर भी यूजर्स की निजी जानकारी इकट्ठा करने के आरोप लगते रहे हैं।

अब OpenAI ने भी ‘ChatGPT Health’ को लेकर बड़े दावे किए हैं कि वे सेहत से जुड़ी जानकारी को सुरक्षित रखेंगे। लेकिन इतिहास गवाह है कि कई कंपनियाँ ऐसे वादे करती रही हैं जो बाद में खोखले साबित हुए। हो सकता है कि OpenAI इस मामले में अलग साबित हो, लेकिन जब तक वे अपने वादे को पूरी तरह निभाकर नहीं दिखाते, तब तक सुरक्षा को लेकर डर बना ही रहेगा।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में रुक्मा राठौर ने लिखी है। इसको पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें)

ध्रुव राठी के एआई ऐप ‘AI Fiesta’ पर डेटा चोरी को यूट्यूबर ने किया एक्सपोज तो उन्हें जर्मनी के नंबर से आया कॉल: वीडियो डिलीट करने की दी धमकी, जानिए पूरा मामला

यूट्यूबर अनुभव गुप्ता ने 7 जनवरी को X (पहले ट्विटर) पर एक पोस्ट के जरिए खुलासा किया कि उन्हें एक धमकी भरा कॉल आया है, जिसमें उनसे ध्रुव राठी और उनके AI ऐप ‘AI Fiesta’ के खिलाफ बनाया गया ‘एक्स्पोज वीडियो’ हटाने को कहा गया। 22 दिसंबर को पब्लिश किए गए इस वीडियो में गुप्ता ने गंभीर आरोप लगाए थे कि राठी बड़े पैमाने पर डेटा प्राइवेसी का उल्लंघन कर रहे हैं। साथ ही, उन्होंने इस ऐप से जुड़ी मार्केटिंग और बिजनेस करने के तरीकों को भी भ्रामक और संदिग्ध बताया था।

गुप्ता के अनुसार, उन्हें यह कॉल तब आई जब उनका वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने लगा। अनुभव गुप्ता ने बताया कि फोन करने वाले ने उनसे वीडियो हटाने की माँग की। गुप्ता ने उस फोन नंबर का भी ज़िक्र किया जिससे उन्हें कॉल आया था, जिसमें जर्मनी का कंट्री कोड (+49) लगा हुआ था। X पर उस नंबर को शेयर करते हुए उन्होंने दावा किया कि इस कॉल का मकसद उन्हें डरा-धमकाकर वीडियो डिलीट करवाना था, जबकि उनका कहना है कि वीडियो में दी गई जानकारी पूरी तरह से ऐप से जुड़ी पब्लिक पॉलिसी और डॉक्यूमेंट्स पर आधारित है।

अपनी पोस्ट में अनुभव गुप्ता ने लिखा, “मेरा वीडियो हटाने के लिए मुझे एक धमकी भरा कॉल आया है, जिसमें मैंने बताया था कि कैसे ध्रुव राठी आपका डेटा चुरा रहे हैं। मैं इसे नहीं हटाऊँगा ‘जर्मन शेफर्ड’।” उनके इस बयान को उनके फॉलोअर्स ने काफी सपोर्ट किया और सिर्फ X पर ही इसे 450 से ज्यादा बार रीपोस्ट और 2,000 से अधिक लाइक्स मिले।

अनुभव गुप्ता ने AI Fiesta के बारे में क्या बताया?

22 दिसंबर के अपने वीडियो में अनुभव गुप्ता ने बताया कि ‘AI Fiesta’ न केवल यूजर्स के प्रॉम्प्ट्स (सवालों) को स्टोर करता है, बल्कि AI के जरिए दिए गए जवाबों को भी सेव करता है। उनका कहना था कि इस तरीके से यूज़र्स द्वारा डाली गई बेहद निजी, राजनीतिक और संवेदनशील जानकारी कंपनी के पास सुरक्षित रह सकती है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि आमतौर पर लोग वेबसाइट्स या ऐप्स का इस्तेमाल करते समय उनकी प्राइवेसी पॉलिसी और टर्म्स एंड कंडीशंस नहीं पढ़ते। यूज़र्स अक्सर बिना सोचे-समझे इन शर्तों पर सहमति दे देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं, उन्हें इसके संभावित नतीजों का अंदाजा भी नहीं होता।

अनुभव गुप्ता ने कहा कि डेटा को स्टोर करने की यह बात ऐप की प्राइवेसी पॉलिसी में साफ तौर पर लिखी गई है, जो यूजर्स की सुरक्षा और उनकी मर्जी (इंफॉर्म्ड कंसेंट) पर गंभीर सवाल खड़े करती है। इस मामले में ऑपइंडिया ने जब खुद जाँच की, तो उन्होंने पुष्टि की कि AI Fiesta की प्राइवेसी पॉलिसी में बिल्कुल वही बातें लिखी हैं जिनका दावा अनुभव गुप्ता ने अपने वीडियो में किया है।

स्रोत: AI Fiesta

अनुभव गुप्ता ने आगे बताया कि यह ऐप यूजर्स के IP एड्रेस और ‘डिवाइस इंफॉर्मेशन’ जैसी जानकारी इकट्ठा करता है। उनका तर्क है कि ‘डिवाइस इंफॉर्मेशन’ एक बहुत ही धुंधला और गोल-मोल शब्द है, जिसका इस्तेमाल जानबूझकर किया गया है ताकि यूजर्स की हरकतों (बिहेवियरल ट्रैकिंग) और उनकी लोकेशन पर बारीकी से नजर रखी जा सके।

अनुभव गुप्ता ने इस बात पर भी जोर दिया कि अगर ऐसा डेटा लीक होता है या गलत हाथों में पड़ता है, तो यूजर्स फिशिंग, प्रोफाइलिंग या टारगेटेड मैनिपुलेशन (सोच-समझकर की जाने वाली हेरफेर) का शिकार हो सकते हैं।

गुमराह करने वाले प्रचार और नकली भरोसे के आरोप

अनुभव गुप्ता ने वीडियो में एक और बड़ा आरोप AI Fiesta की मार्केटिंग और इसके झूठे दावों को लेकर लगाया है। उनका कहना है कि ऐप ने ’36 घंटों में 3 मिलियन ARR’ (Annual Recurring Revenue) का आँकड़ा प्रचारित किया ताकि मार्केट में एक आर्टिफीसियल हाइप बनाई जा सके और लोगों को लगे कि यह ऐप बहुत बड़ी कमर्शियल सक्सेस है। अनुभव गुप्ता का तर्क है कि यह दावा पूरी तरह से भ्रामक है और इसका मकसद सिर्फ उन यूजर्स को अपनी ओर खींचना है जो पैसे देकर सर्विस लें, जबकि मार्केट में पहले से ही कई AI टूल्स बिल्कुल फ्री में उपलब्ध हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि AI Fiesta ने गूगल प्ले स्टोर पर ‘बॉट-जनरेटेड’ या खरीदे गए रिव्यूज का सहारा लिया है। गुप्ता ने सबूत के तौर पर कई 5-स्टार रिव्यूज की ओर इशारा किया, जिनमें एक जैसे शब्द, एक जैसा सेंटेंस स्ट्रक्चर और कॉमन कीवर्ड्स बार-बार दोहराए गए थे, जो यह साफ दिखाते हैं कि ये फीडबैक असली नहीं हैं। उन्होंने दावा किया कि ऐसे नकली रिव्यूज सिर्फ इसलिए खरीदे जाते हैं ताकि ऐप को इस्तेमाल करने की सोच रहे संभावित ग्राहकों को गुमराह किया जा सके।

स्रोत: गूगल प्ले स्टोर

ऑपइंडिया ने अनुभव गुप्ता द्वारा किए गए इन दावों की क्रॉस-चेकिंग की और उन्हें सही पाया, जैसा कि यहाँ दिए गए स्क्रीनशॉट्स से भी साफ होता है। इन दोनों स्क्रीनशॉट सेट्स में तीन ऐसे 5-स्टार रिव्यूज देखे जा सकते हैं, जिनमें लगभग एक जैसी भाषा और शब्दों का इस्तेमाल किया गया है।

स्रोत: गूगल प्ले स्टोर

गोपनीयता समर्थक बनाम डेटा संग्रहकर्ता

इस पूरे खुलासे के केंद्र में वह बात थी जिसे गुप्ता ने ध्रुव राठी का ‘दोगुलापन’ (हिपोक्रेसी) बताया। गुप्ता ने इस बात पर जोर दिया कि राठी ने अपनी पब्लिक इमेज एक ऐसे इंसान की बनाई है जो लोगों को डेटा के गलत इस्तेमाल, निगरानी (सर्वेलांस) और प्राइवेसी के खतरों के बारे में चेतावनी देता है। लेकिन इसके ठीक उलट, उनके अपने ऐप ‘AI Fiesta’ की नीतियांँ यूजर डेटा स्टोर करने, IP एड्रेस इकट्ठा करने और डिवाइस की तमाम जानकारियाँ लेने की अनुमति देती हैं।

स्रोत: AI Fiesta

अनुभव गुप्ता ने आगे यह भी आरोप लगाया कि ऐप की शर्तों (Terms) में ऐसे डिस्क्लेमर दिए गए हैं जो कहते हैं कि कोई भी सिस्टम पूरी तरह से सुरक्षित नहीं है। गुप्ता का तर्क है कि ऐसा करके कंपनी ने खुद को एक सुरक्षा कवच दे दिया है, ताकि भविष्य में अगर कोई डेटा लीक या ‘डेटा ब्रीच’ होता है, तो वे अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह बच सकें।

जवाबदेही और अधिकार क्षेत्र पर सवाल

अनुभव गुप्ता ने ऐप के कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर को लेकर भी सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने बताया कि ‘AI Fiesta’ अमेरिका के डेलावेयर (Delaware) में रजिस्टर्ड है, और उनका तर्क है कि इसे ‘देश का सबसे बड़ा AI प्लेटफॉर्म’ बताकर प्रमोट करना भ्रामक है। गुप्ता का कहना है कि जब इस ऐप का रजिस्ट्रेशन, डेटा इन्फ्रास्ट्रक्चर और लीडरशिप भारत में स्थित ही नहीं है, तो इसे भारतीय पहचान के साथ ब्रांड करना गलत है।

स्रोत: Ai Fiesta

यह पहली बार नहीं है जब ध्रुव राठी पर किसी को डराने-धमकाने का आरोप लगा हो। इससे पहले सितंबर 2023 में, यूट्यूबर कैरोलिना गोस्वामी और उनके पति ने भी आरोप लगाया था कि ध्रुव राठी के ‘सपोर्टर्स‘ ने यूरोप में उन पर हमला किया था, क्योंकि उन्होंने राठी के वीडियो का फैक्ट-चेक किया था।

इस बीच, ऑपइंडिया ने अनुभव गुप्ता से संपर्क कर धमकी वाले कॉल और ध्रुव राठी पर किए गए उनके खुलासे के बारे में और जानकारी माँगी है। अगर उनकी ओर से कोई जवाब आता है, तो इस रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। इसको पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें)

आए दिन राजनीतिक हत्याएँ और गैंगवार, नशे के अड्डे से लेकर खालिस्तानी आंतकवाद तक: जानें कैसे AAP सरकार में पंजाब में बढ़ रहा अपराध?

अमृतसर के मैरीगोल्ड मैरिज पैलेस में रविवार (4 जनवरी 2026) को उस समय सनसनी फैल गई, जब आम आदमी पार्टी (AAP) के सरपंच जरमैल सिंह की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई। CCTV फुटेज में दिखा कि थ्री-पीस सूट पहने दो हमलावर शादी समारोह में बेखौफ अंदर घुसे, 50 वर्षीय ग्रामप्रधान के पास पहुँचे और बेहद करीब से सिर में गोली मार दी।

गोली चलने के बाद शादी में मौजूद लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे, जबकि हमलावर मौके से फरार हो गए। घटना के कुछ ही घंटों बाद सोशल मीडिया पर सामने आए एक पोस्ट में गैंगस्टर प्रभ ने इस हत्या की जिम्मेदारी ली। वैसे तो पंजाब में हिंसा की घटनाएँ नई नहीं हैं, लेकिन सत्तारूढ़ पार्टी के एक स्थानीय नेता की इस तरह खुलेआम हत्या ने पूरे राज्य में कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने घटना की कड़ी निंदा करते हुए पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के नेतृत्व में पुलिस व्यवस्था पूरी तरह विफल होने का आरोप लगाया। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री मान के पास ही राज्य का गृह मंत्रालय भी है।

एक्स पर एक अन्य पोस्ट में सुखबीर सिंह बादल ने बताया कि साल 2026 के पहले छह दिनों में ही पंजाब में चार हत्याएँ हो चुकी हैं। उन्होंने लिखा कि शुक्रवार (2 जनवरी 2026) को कपूरथला में एक महिला की हत्या हुई, मोगा के भिंडर कलाँ इलाके में एक व्यक्ति को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया गया, जगराओं के मनुके गाँव में कबड्डी खिलाड़ी गगनदीप की हत्या कर दी गई और इसके अलावा अमृतसर में आम आदमी पार्टी के सरपंच की दिनदहाड़े हत्या हुई।

एक्स पर एक पोस्ट में, भारतीय जनता पार्टी (पंजाब) ने कहा कि राज्य में कोई ‘कानून और व्यवस्था’ नहीं है। पार्टी ने कहा, ‘यह गुंडाराज का शासन है’।

दिनदहाड़े राजनीतिक हत्याएँ

सरपंच की हत्या कोई अकेली घटना नहीं थी, बल्कि यह पिछले कुछ महीनों में पंजाब को झकझोर देने वाली राजनीतिक हत्याओं की एक कड़ी का हिस्सा है। सरपंच की हत्या से ठीक 48 घंटे पहले मोगा में कॉन्ग्रेस नेता उमरसीर सिंह को गोलियों से भून दिया गया। बताया गया कि इस हमले के पीछे स्थानीय रंजिश थी, जिसमें आम आदमी पार्टी के एक पदाधिकारी का नाम भी सामने आया, जो चिंता का विषय है।

लगातार हुई इन राजनीतिक हत्याओं से एक सत्तारूढ़ दल के नेता और दूसरी विपक्षी पार्टी के नेता की एक कड़वी सच्चाई सामने ला दी है कि पंजाब में अब न तो सत्ता पक्ष और न ही विपक्ष का कोई नेता खुद को सुरक्षित महसूस कर सकता है।

इस मुद्दे पर कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ विधायक और पूर्व मंत्री परगट सिंह ने राज्य में हिंसा के मामलों में बढ़ोतरी की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा, “हाल के वर्षों में पंजाब ने ऐसी अराजकता कभी नहीं देखी।” परगट सिंह समेत कई विपक्षी नेताओं ने हालात को सरकार के नियंत्रण से बाहर बताते हुए मुख्यमंत्री भगवंत मान के इस्तीफे की माँग की।

गौर करने वाली बात यह है कि ये सभी राजनीतिक हत्याएँ दिनदहाड़े, सार्वजनिक जगहों पर की गईं। सरपंच की हत्या के CCTV फुटेज से साफ दिखता है कि हमलावरों को पुलिस की कोई चिंता नहीं थी। इसी तरह उमरसीर सिंह की हत्या के बाद भी आरोपित आसानी से फरार हो गए।

कॉन्ग्रेस विधायक गुरजीत औजला ने आम आदमी पार्टी सरकार पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने में पूरी तरह नाकाम रहने का आरोप लगाया और कहा कि अब छोटे-छोटे स्थानीय विवाद भी खुलेआम जानलेवा हिंसा में बदल रहे हैं।

यह पहली बार नहीं है जब आम आदमी पार्टी की सरकार के दौरान पंजाब में इतनी बड़ी और चर्चित हत्याएँ हुई हों। साल 2022 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध लेकिन विवादित गायक और कॉन्ग्रेस नेता सिद्धू मूसेवाला की दिनदहाड़े, आधुनिक हथियारों से की गई हत्या ने राज्य में गैंगवार और संगठित अपराध के बढ़ते खतरे की चेतावनी दी थी।

बाद में यह हत्या गैंग आपसी रंजिश से जुड़ी पाई गई, जिसने राजनीति और संगठित अपराध के खतरनाक गठजोड़ को उजागर किया। इसके बाद हिंसक घटनाओं की संख्या और दुस्साहस लगातार बढ़ता चला गया।

जबरन वसूली, गिरोह और खेल के मैदान में जंग

राजनीति से आगे बढ़कर अब संगठित अपराध गिरोहों ने पंजाब को अपना खेल और जंग का मैदान बना लिया है। नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा ने कहा कि राज्य में गैंगस्टरों से फिरौती की कॉल आना अब आम बात हो गई है और इस डर के माहौल में आम लोग खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं।

बाजवा ने आरोप लगाया कि गैंग सरगना खुलेआम घूम रहे हैं और प्रशासन ने ग्रामीण इलाकों में लगभग अपना नियंत्रण खो दिया है। वहीं शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने मौजूदा हालात को जंगल राज बताते हुए कहा कि व्यापारी, डॉक्टर, कलाकार और खिलाड़ी सभी फिरौती माँगने वालों के गंभीर खतरों का सामना कर रहे हैं और हिंसक बदला लेना अब सामान्य होता जा रहा है।

कानून-व्यवस्था की हालत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जुलाई 2025 में फाजिल्का जिले के अबोहर में प्रसिद्ध कारोबारी संजय वर्मा की उनकी दुकान के बाहर दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई। संजय वर्मा मशहूर कपड़ा ब्रांड वियर वेल के सह-संस्थापक थे और उन्हें कुर्ता-पायजामा किंग के नाम से जाना जाता था। इस हत्या के बाद व्यापारियों ने विरोध में हड़ताल भी भी किया था।

राज्य की कुख्यात गैंगवार अब खेल के मैदान तक पहुँच चुकी है। पंजाब के लोकप्रिय ग्रामीण खेल कबड्डी में भी हाल के वर्षों में खून-खराबा देखने को मिला है, क्योंकि अपराधी गिरोह इसके बड़े और मुनाफे वाले टूर्नामेंटों को प्रभावित करने की कोशिश करते रहे हैं।

दिसंबर 2025 में मोहाली के एक खचाखच भरे स्टेडियम में कबड्डी प्रमोटर कंवर दिग्विजय उर्फ राणा बलाचौरिया की खुद को प्रशंसक बताने वाले हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी। यह वारदात अपराध और खेल के खतरनाक गठजोड़ की मिसाल बन गई। करीब 100 करोड़ रुपए के कारोबार वाली कबड्डी अब सट्टेबाजी, गैंग रंजिश और हिसाब-किताब चुकाने का जरिया बनती जा रही है।

अक्टूबर 2025 में जगराओं में मैदान पर हुए विवाद के दौरान 25 वर्षीय खिलाड़ी तेजपाल सिंह को गोली मार दी गई थी। एक महीने बाद समराला में एक अन्य खिलाड़ी गुरविंदर सिंह की हत्या कर दी गई, जिसकी जिम्मेदारी सोशल मीडिया पर लॉरेंस बिश्नोई गैंग ने ली थी।

इससे पहले 2022 में जालंधर में एक टूर्नामेंट के दौरान अंतरराष्ट्रीय कबड्डी स्टार संदीप नंगल अंबियाँ की भी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। जाँच में सामने आया कि यह हत्या खेल प्रमोटरों के बीच रंजिश का नतीजा थी।

हर हत्या के साथ मुनाफे वाली कबड्डी दुनिया में अंडरवर्ल्ड का संतुलन बदलता रहा, जहाँ गिरोह टूर्नामेंटों पर कब्जा, सट्टेबाजी और खिलाड़ियों के कॉन्ट्रैक्ट्स पर असर डालने की कोशिश करते हैं।

इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में एक जाँच अधिकारी ने बताया कि गैंगों की पकड़ इतनी गहरी हो चुकी है कि कई खिलाड़ी चुपचाप मैच हारने के दबाव और गैंग से जुड़े सट्टेबाजों की धमकियों की बात करते हैं।

राज्य में गैंगस्टर कानून के डर के बिना अपनी गतिविधियाँ चला रहे हैं। हालाँकि मुख्यमंत्री भगवंत मान की सरकार गैंगवार पर लगाम लगाने के प्रयास भी कर रही है। साल 2022 में राज्य सरकार ने एंटी-गैंगस्टर टास्क फोर्स (AGTF) का गठन किया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक नवंबर 2025 तक टास्क फोर्स ने 2,209 गैंगस्टरों को गिरफ्तार किया, 21 को ढेर किया, 825 नेटवर्क तोड़े और बड़ी मात्रा में हथियार, वाहन और नशा बरामद किया। बावजूद इसके, आरोप लगते रहे हैं कि बीते कुछ वर्षों में सरकारी चूक के कारण गैंगों को फलने-फूलने का मौका मिला।

प्रताप सिंह बाजवा ने यहाँ तक आरोप लगाया है कि सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी और पुलिस के कुछ लोग चुपचाप गैंगस्टरों का इस्तेमाल अपने राजनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए कर रहे हैं। उनका दावा है कि जो पीड़ित फिरौती की शिकायत लेकर पुलिस के पास जाते हैं, उन्हें सख्त कार्रवाई का भरोसा देने के बजाय अपराधियों से ही आपस में समझौता कर लेने की सलाह दी जाती है।

बाजवा के ये आरोप बेहद गंभीर हैं, क्योंकि ये जनता की सोच और भरोसे की हकीकत को सामने लाते हैं। आम लोगों के बीच यह धारणा बनती जा रही है कि पुलिस या तो प्रभावशाली गैंग सरगनाओं से निपटने में सक्षम नहीं है या फिर ऐसा करना ही नहीं चाहती।

इसी हालात पर चिंता जताते हुए पंजाब कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने राज्य को गैंगलैंड बताया। उन्होंने कहा कि पंजाब में आम लोग डर और खौफ के साए में जी रहे हैं, जबकि गैंगस्टर खुलेआम घूम रहे हैं और कानून उन्हें छू भी नहीं पा रहा है।

नार्को-टेरर स्टेट, ड्रग्स और आतंकी हमले

एक तरफ जहाँ पंजाब में घरेलू अपराध लगातार बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ नशे की गंभीर समस्या का एक और खतरनाक पहलू सामने आता है, जो नर्को-आतंकवाद से जुड़ता है। ओपइंडिया पहले भी पंजाब के संदर्भ में नर्को-आतंकवाद पर विस्तार से रिपोर्ट कर चुका है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक साल 2023 में पंजाब में NDPS एक्ट के तहत 11,589 मामले दर्ज किए गए। यह केरल और महाराष्ट्र के बाद देश में तीसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है। खास बात यह है कि इन मामलों में से 7,785 केस नशे की तस्करी से जुड़े थे, न कि सिर्फ व्यक्तिगत सेवन से।

ये आंकड़े साफ बताते हैं कि पंजाब केवल नशे का बाजार नहीं है, बल्कि संगठित ड्रग तस्करी का एक बड़ा ट्रांजिट रूट भी बन चुका है। पाकिस्तान से लगी लंबी सीमा के कारण पंजाब तस्करों के लिए पसंदीदा रास्ता बन गया है। सीमा पार बैठे नेटवर्क ड्रोन, सुरंगों और कूरियर सिस्टम के जरिए न सिर्फ नशा, बल्कि हथियार भी पंजाब में भेज रहे हैं।

शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने एक बयान में आम आदमी पार्टी सरकार की उदासीनता को नर्को-आतंकवाद के दोबारा सिर उठाने के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने दिसंबर 2022 में तरनतारन में हुए रॉकेट-प्रोपेल्ड ग्रेनेड (RPG) हमलों को सीधे तौर पर बढ़ते नशे के कारोबार और कमजोर सीमा सुरक्षा से जोड़ा। वहीं कॉन्ग्रेस नेता राजा वड़िंग ने सोशल मीडिया पर हालात को बेहद गंभीर बताते हुए राज्य और केंद्र सरकार से मिलकर नशे के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की।

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि पंजाब में इस तरह के हमले पहले भी होते रहे हैं। मई 2022 में एक पुलिस इमारत पर RPG हमला हुआ था, जबकि 2021 में लुधियाना जिला कोर्ट में विस्फोट हुआ। सितंबर 2024 में भी चंडीगढ़ के सेक्टर-10 में धमाका हुआ, जो पंजाब और हरियाणा की साझा राजधानी है। इन घटनाओं से साफ है कि सरकार चाहे किसी भी पार्टी की रही हो, राज्य समय-समय पर ऐसे हमलों से दहलता रहा है।

इन दुस्साहसी हमलों ने न सिर्फ पड़ोसी राज्यों को चिंता में डाला है, बल्कि केंद्रीय एजेंसियों की भी नींद उड़ाई है। आम पंजाबियों के लिए ये धमाके 1980 और 1990 के दशक के उस दौर की डरावनी याद दिलाते हैं, जब उग्रवाद के दौरान बम धमाके और गोलीबारी आम बात थी।

इसी बीच राज्य में खालिस्तानी अलगाववादी प्रचार भी ज्यादा खुलकर सामने आने लगा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण स्वयंभू उपदेशक अमृतपाल सिंह का उभार रहा। फरवरी 2023 में उसका कट्टर खालिस्तानी अभियान हिंसा में तब बदल गया, जब उसके समर्थकों ने तलवारों, बंदूकों और श्री गुरु ग्रंथ साहिब को ढाल बनाकर अमृतसर के पास अजनाला थाने पर धावा बोल दिया। वे उसके एक गिरफ्तार साथी की रिहाई की माँग कर रहे थे।

थाने पर हुए इस हमले के दृश्य पूरे देश में दिखाए गए। सैकड़ों लोगों ने बैरिकेड तोड़कर थाने को घेर लिया, कई पुलिसकर्मी घायल हुए और यह राज्य प्रशासन के लिए बड़ी बेइज्जती साबित हुई। सबसे खतरनाक बात यह रही कि भीड़ अपने मकसद में कामयाब रही और अमृतपाल के साथी को छुड़ा ले गई। इससे यह संदेश गया कि कट्टरपंथी पुलिस को खुली चुनौती दे सकते हैं।

इसके बाद कई हफ्तों तक अमृतपाल सिंह पुलिस से बचता रहा, जब तक कि देशव्यापी तलाशी अभियान के बाद उसे गिरफ्तार नहीं कर लिया गया। अजनाला कांड और उसके बाद की खालिस्तान समर्थक गतिविधियों ने यह उजागर कर दिया कि राज्य की आतंक-रोधी व्यवस्था कितनी कमजोर हो चुकी है।

जाँच के दौरान जब अमृतपाल से जुड़े ठिकानों पर छापे मारे गए, तो अधिकारियों ने बताया कि वह एक निजी मिलिशिया खड़ी कर रहा था। वहाँ से हथियार, बुलेटप्रूफ जैकेट और अन्य आपत्तिजनक सामान बरामद हुआ। बाद में उसे गिरफ्तार कर असम की जेल में भेज दिया गया और ‘वारिस पंजाब दे’ संगठन के प्रमुख अमृतपाल सिंह पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगाया गया।

हैरानी की बात यह रही कि गंभीर आरोपों में जेल में बंद होने के बावजूद उसे 2024 का लोकसभा चुनाव लड़ने की अनुमति दी गई, जिसे उसने जीत भी लिया। हालाँकि सांसद बनने के बावजूद वह जेल में ही रहा और संसद की एक भी बैठक में शामिल नहीं हो सका।

पाकिस्तान से ड्रोन के जरिए भेजे जा रहे हथियार, विदेश बैठे खालिस्तानी नेताओं के प्रचार वीडियो और पंजाब की धरती पर होने वाले रहस्यमय धमाके ये सभी पिछले दो दशकों में कागजों पर बनी शांति को धीरे-धीरे कमजोर करते जा रहे हैं।

AAP सरकार में पंजाब का हाल

जब 2022 में भगवंत मान ने पंजाब के मुख्यमंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभाली, तो उनकी सरकार ने नई शुरुआत का वादा किया था। गैंगवार और नशे पर काबू पाने के लिए कुछ फैसले भी किए गए, लेकिन उनके नतीजे सीमित ही नजर आए।

सरकार की ओर से ड्रग माफिया के घरों पर बुलडोजर चलाने, पंजाब पुलिस की विशेष इकाइयों द्वारा नशे की बरामदगी करने और सीमा पर BSF के साथ मिलकर ड्रोन पकड़ने की कार्रवाई की गई। आम आदमी पार्टी ने एक प्रेस विज्ञप्ति में दावा किया कि 2024 में 283 ड्रोन, जिनमें हेरोइन, हथियार और गोला-बारूद थे उनको जब्त किया गया। अगस्त 2025 तक 137 ड्रोन और बरामद किए गए। इसके बावजूद राज्य से नशे की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई है।

इसी तरह, हत्या, चोरी और अन्य अपराधों में बढ़ोतरी ने राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है। हालात ऐसे हो गए कि जज तक चोरी से नहीं बचे। मार्च 2023 में अतिरिक्त सत्र जज रवदीप हुंदल के सरकारी आवास में चोरी हुई, जहाँ चोर नल और गीजर तक उखाड़ ले गए। अक्टूबर 2024 में अमृतसर का एक CCTV वीडियो सामने आया, जिसमें दिनदहाड़े एक महिला ने बहादुरी दिखाते हुए तीन चोरों को अपने घर में घुसने से रोक दिया।

कॉन्ग्रेस के नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा ने मुख्यमंत्री भगवंत मान के इस्तीफे की माँग करते हुए कहा कि वह गृह विभाग और पंजाब पुलिस को प्रभावी ढंग से संभालने में विफल रहे हैं। बाजवा ने कहा कि अगर मुख्यमंत्री में जरा भी आत्मसम्मान है, तो उन्हें पद छोड़ देना चाहिए।

पिछले साल जुलाई में अबोहर के व्यापारी की दिनदहाड़े हत्या के बाद बाजवा ने विधानसभा में कहा था कि आज कोई भी पंजाबी सुरक्षित नहीं है और गैंगस्टर इसलिए बेखौफ हैं क्योंकि प्रशासन सोया हुआ है।

हालाँकि हाल के महीनों में पंजाब पुलिस ने राइफलें, RDX विस्फोटक और हेरोइन की बड़ी खेपें बरामद की हैं, जो यह दिखाती हैं कि अपराध और आतंक का नेटवर्क कितना हथियारबंद और मजबूत है।

लेकिन इन सफलताओं पर लगातार हो रहे हमलों की बेखौफ घटनाएँ भारी पड़ जाती हैं। भाजपा नेता सुनील जाखड़ ने कहा कि हर हत्या के बाद आम आदमी पार्टी सरकार की कान फोड़ने वाली चुप्पी गैंगस्टरों का हौसला और बढ़ा देती है और नियंत्रण में देरी का मतलब है कि हालात हाथ से निकलते जा रहे हैं।

शिरोमणि अकाली दल के वरिष्ठ नेता दलजीत चीमा ने भी मुख्यमंत्री पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने में नाकाम रहने का आरोप लगाया और कहा कि अगर वह हालात नहीं संभाल सकते, तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए।

आँकड़े भी इन चिंताओं की पुष्टि करते हैं। NCRB के 2023 के आंकड़ों के मुताबिक, आम आदमी पार्टी सरकार के शुरुआती साल में पंजाब में संज्ञेय अपराधों (IPC + विशेष कानून) में हल्की बढ़ोतरी हुई थी, हालाँकि 2023 में इसमें थोड़ी गिरावट दर्ज की गई। 2023 में राज्य में कुल 69,944 मामले दर्ज हुए, जिनमें 44,872 IPC अपराध और 25,072 विशेष या स्थानीय कानूनों के तहत मामले थे।

हालाँकि प्रति लाख आबादी पर अपराध दर करीब 228 है, जो कई बड़े राज्यों से कम है, लेकिन अपराधों की प्रकृति लोगों को ज्यादा डरा रही है। हिंसक अपराधों की संख्या और उनका असर साफ दिख रहा है।

2023 में पंजाब में 681 हत्याएँ दर्ज हुईं, यानी हर एक लाख आबादी पर करीब 2.2 हत्याएँ। यह 2022 के 718 मामलों से बस मामूली कम है। दूसरे शब्दों में, राज्य में औसतन रोज दो लोगों की हत्या अब भी हो रही है, जिनमें से कई आपसी रंजिश और गैंगवार से जुड़ी हैं।

संपत्ति से जुड़े अपराध, जैसे चोरी और सेंधमारी, हर साल IPC मामलों का बड़ा हिस्सा बने रहते हैं। पंजाब में चोरी के हजारों मामले दर्ज हुए, जिससे संपत्ति अपराध दर करीब 146 प्रति लाख तक पहुँच गई।

इन आंकड़ों के पीछे नशे का कारक भी अहम है। 2023 में NDPS एक्ट के तहत मामले बढ़कर 11,589 हो गए, यानी 37.6 प्रति लाख आबादी और नशीले पदार्थों की बरामदगी में पंजाब देश के अग्रणी राज्यों में रहा।

NCRB की ताजा रिपोर्ट से साफ तस्वीर उभरती है कि पंजाब में अपराध न सिर्फ संख्या में ज्यादा हैं, बल्कि उनका स्वरूप भी लगातार ज्यादा खौफनाक होता जा रहा है। कुल मिलाकर, पंजाब एक बेहद नाजुक मोड़ पर खड़ा है। जिस राज्य ने उग्रवाद के भयावह दौर से निकलने के लिए भारी कीमत चुकाई थी, वह अब नए लेकिन जाने-पहचाने खतरों का सामना कर रहा है।

अब जिम्मेदारी सरकार पर है कि वह सिर्फ शब्दों से नहीं, बल्कि काम करके साबित करे कि वह अपराध और आतंक के इस जाल को तोड़ सकती है। अगर सरकार इसमें नाकाम रही, तो जनता का फैसला सख्त होगा और वह पूरी तरह जायज भी होगा।

(मूलरूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

संस्कारों से ही बचेगी संस्कृति, पाश्चात्य अंधानुकरण छोड़ना जरूरी

आज जब पूरा विश्व सनातन संस्कृति की चर्चा कर रहा है, तब यह समझना आवश्यक है कि व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और विश्व मानवता के लिए इससे अधिक शुभ और कल्याणकारी कुछ नहीं हो सकता। जब हम सच्चे अर्थ में सनातनी बन जाएँ, तभी हम इस संस्कृति की महत्ता को समझ पाएँगे।

वैश्विक समस्याओं का समाधान

वास्तविकता यह है कि विनाश के मुहाने पर खड़ी वैश्विक समस्याओं का समाधान और विश्व मानवता का कल्याण केवल सनातन संस्कृति के आधार पर ही संभव है। यह वह संस्कृति है जो ‘जियो और जीने दो’ तथा ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दुःखभाग्भवेत्’ की अवधारणा को जीने और आत्मसात करने के मूल्यों में निहित है।

सनातन धर्म या संस्कृति केवल शब्दोच्चार या नारा मात्र नहीं है। यह सनातन संस्कृति के जीवन मूल्यों को धारण करने से ही संभव है। हमारे यहाँ मूल्य केवल शब्दों में ही वर्णित नहीं किए गए हैं, बल्कि उन शब्दों को व्यावहारिक जीवन में कसौटी पर परखा भी गया है।

जीवन मूल्यों की कसौटी

सतयुग काल में राजा हरिश्चंद्र को सत्य बोलने की कितनी बड़ी, कठिन, दुःसह, मृत्यु से भी अधिक पीड़ा देने वाली परीक्षा देनी पड़ी, यह जगविदित है। शासकों की संतानें भी उन्हीं ऋषि आश्रमों में शिक्षा प्राप्त करने जाती थीं, जहाँ सभी बालक शिक्षा ग्रहण करते थे। सभी को एक समान नियम और अनुशासन का पालन करना होता था।

आज की तरह नहीं, जब शिक्षा के अलग स्तर, पाठ्यक्रम, सुविधाएँ और वर्ग-भेदित शिक्षा व्यवस्था है। संस्कार, अनुशासन और संयम शिक्षा से दूर हो गए हैं।

प्रयागराज: सनातन मूल्यों का जीवंत प्रतीक

3 जनवरी, पौष मास की पूर्णिमा से सनातन संस्कृति की अवधारणा ऋषि भरद्वाज की तपस्थली तीर्थराज प्रयागराज में त्रिवेणी के तट पर साकार होती है। इस कड़कड़ाती ठंड के बीच हजारों की संख्या में श्रद्धालु मौन व्रत धारण कर नित्य त्रिवेणी में प्रातःकालीन स्नान, जप, तप, दान और ईश्वर चिंतन करते हुए ‘सिया राम मय सब जग जानी’ की अवधारणा को आत्मसात करने का अभ्यास करते हैं।

भगवान श्रीकृष्ण का उद्घोष ‘ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति’ और आचार्य शंकर के अद्वैत दर्शन की अवधारणा का सजीव वर्णन यहाँ देखने को मिलता है।

सनातन संस्कृति की व्यापकता

गुरु नानकदेव, संत कबीर साहब जैसे सनातन संस्कृति के अनेक महान संतों और महात्माओं ने अपनी तपस्या और साधना के माध्यम से परम सत्य को अपने-अपने तरीके से जाना। किसी ने वैष्णव मार्ग, किसी ने शाक्त, किसी ने तंत्र, किसी ने शक्ति उपासना, योग मार्ग, हठयोग, किसी ने भक्ति भाव, किसी ने प्रेम और सेवा, सद्गुरु भक्ति, तो किसी ने प्रकृति की उपासना-नदी, समुद्र, जलाशय, जंगल, जीव-जड़ प्रकृति- सब में उसी एक परम तत्त्व को विभिन्न साधना मार्गों से जानकर मानवता के विकास का मार्ग दिखाया।

उन्होंने मानव के कष्टों से निवारण के उपाय दिए, साथ ही समाज व्यवस्था, राज्य व्यवस्था, न्याय व्यवस्था तथा अर्थ व्यवस्था का मार्गदर्शन किया है।

सनातन संस्कृति असीम और निस्सीम है। यह किसी सीमा में बँधी नहीं है। यह दुनिया की सबसे उदात्त, उदार संस्कृति है और अंतरिक्ष की तरह व्यापक है। इसे जाति, पंथ, संप्रदाय या पूजा पद्धति में आबद्ध नहीं किया जा सकता।

आत्ममंथन का समय

यदि हम अपने को सनातनी मानते हैं, तो हमें सनातन धर्म के मूल्यों को पहले अपने में आत्मसात करना होगा। जाति-पाति की संकीर्ण सोच और अहंकार से ऊपर उठकर सोचना होगा।

राजनीतिक निर्णय व नीतियाँ, राजनीतिक पद-प्रतिष्ठा, प्रशासनिक व्यवस्था, पद-प्रतिष्ठा और भरोसे का आधार यदि कार्य-कुशलता, कार्य-दक्षता, अनुशासन, ईमानदारी, निष्ठा और लोक कल्याण की भावना के बजाय जाति है, तो हम जनता-जनार्दन या राष्ट्र, किसी का भी भला नहीं कर सकते। न ही हम सनातन संस्कृति को सच्चे अर्थ में मानते हैं।

वर्तमान चुनौतियाँ

आज हम सभी की दोहरी जीवन शैली, कार्य प्रणाली और दोहरे जीवन मूल्य जगजाहिर हैं। इससे न हम अपना हित कर सकते हैं, न समाज का। आज जहाँ हम खड़े हैं- हमसे तात्पर्य हमारे पूरे विश्व परिवार से है- हमें बहुत सूक्ष्मता से, बिना जाति-पाति के पूर्वाग्रह के, समाज के नीति-नियंताओं, बुद्धिजीवी समाज, विचार जगत के लोगों, न्याय और प्रशासनिक व्यवस्था के लोगों की सोच, व्यवस्था और कार्यशैली का मूल्यांकन करना होगा। हमें यह देखना होगा कि हम कहाँ जा रहे हैं। क्या यही सनातन संस्कृति के मूल्य हैं?

समाज में बढ़ती विकृतियाँ

आज जिस प्रकार की घटनाएँ सामने आ रही हैं, यदि सनातन संस्कृति के मूल्यों के अनुरूप सोचें, तो सहज ही हम निर्णय कर सकते हैं।

धन के लोभ की अराजक मानसिकता: समाचार माध्यमों से समाज में नित्य घटने वाली क्रूरतम हिंसक घटनाएँ और हत्याएँ सामने आ रही हैं। माँ-पिता, भाई-बहन की हत्याओं की घटनाएँ, नित्य निरंतर बढ़ती महिलाओं और बच्चों के साथ घटित होने वाली घटनाएँ चिंताजनक हैं।

राजनीतिक जीवन के मूल्य: आज हम कहाँ खड़े हैं? किस तरह के लोग और किन उद्देश्यों को लेकर आ रहे हैं? विभिन्न राजनीतिक दलों का नेतृत्व किन लोगों को संरक्षण दे रहा है, किन्हें आगे बढ़ा रहा है? यह सब सनातन मूल्यों के कितना अनुरूप है, यह विचारणीय विषय है।

शिक्षा और स्वास्थ्य: व्यवसायीकरण की त्रासदी

लोक कल्याणकारी सेवाएँ: स्वास्थ्य, चिकित्सा, शिक्षा, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल- उद्योग बन गए हैं। केजी से लेकर हजारों रुपए तक का शुल्क है। आउटसोर्सिंग की नौकरी करके 12, 15, 18, 20–22 हजार रुपए प्रतिमाह पर जीवन यापन करने वाले लोग क्या अपने बच्चों को शिक्षा दिला सकते हैं? किसी ने विचार किया?

गुणवत्ता के नाम पर जो संस्कार युवा पीढ़ी में सामने आ रहे हैं, वे मूल्यांकन के लिए पर्याप्त हैं। वे माता-पिता बहुत भाग्यशाली हैं, जिनके बच्चे माता-पिता और परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। अन्यथा, ओल्ड एज होम हैं। यहाँ तक कि माता-पिता के अंतिम संस्कार में भी अब लोग ऑनलाइन भाग लेने लगे हैं।

चिकित्सा व्यवस्था में तो व्यक्ति वस्तु बनकर रह गया है। मनुष्यता गौण है। केवल मनुष्य शोषण की वस्तु है। व्यापार का धर्म केवल लाभ और हानि है। कोई मानवता और संवेदना नहीं होती। यही अंतर भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति में है।

पुनर्विचार की आवश्यकता

हमने पश्चिमी देशों- अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस आदि से प्रभावित होकर जो मॉडल अपनाया, उसके व्यापक परिणाम सामने आ रहे हैं। हरिद्वार की हर की पौड़ी में, काशी में भगवती गंगा जी की आरती, अयोध्या में सरयू मैया सहित विभिन्न तीर्थों में स्नान, आरती और पूजन मन को अत्यंत आह्लादित करने वाला है। परंतु केवल बाह्य आडंबर से सनातन संस्कृति की रक्षा नहीं हो सकती।

हम सभी को इस पर अवश्य विचार करना चाहिए कि हमारी सनातन संस्कृति के मूल्य क्या यही हैं? क्या हम सच्चे अर्थ में सनातनी जीवन जी रहे हैं? यदि नहीं, तो अब समय आ गया है कि हम अपने मूल्यों की ओर लौटें, उन्हें अपने जीवन में उतारें और विश्व मानवता के लिए एक मार्गदर्शक बनें।

सनातन संस्कृति केवल एक विचारधारा नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक समग्र पद्धति है। आइए, हम इसे अपने आचरण में उतारें और भारत को पुनः विश्वगुरु बनाने का संकल्प लें।