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‘गोमांस खाने वाले आएँगे तो ब्रजवासियों को सहन नहीं होगा’: बाँके बिहारी मंदिर में मुस्लिम को ठेका मिलने पर गुस्साए संत, सलीम अहमद पर पहचान छिपाकर काम लेने का आरोप

विरोध को देखते हुए मंदिर में रेलिंग लगाने का काम ठप पड़ा है। संतों ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक यह टेंडर निरस्त कर किसी सनातनी भाई को नहीं दिया जाता, वे चुप नहीं बैठेंगे।

धर्मनगरी वृंदावन के विश्व प्रसिद्ध ठाकुर बाँके बिहारी मंदिर में इन दिनों भक्ति के साथ-साथ भारी आक्रोश का माहौल है। विवाद की जड़ मंदिर परिसर और कॉरिडोर में लग रही स्टील की रेलिंग है। दरअसल, भीड़ को नियंत्रित करने के लिए लगाई जा रही इन रेलिंगों का ठेका एक मुस्लिम ठेकेदार को दिए जाने की खबर जैसे ही फैली, ब्रज के साधु-संतों और हिंदू संगठनों ने इसे अपनी आस्था पर सीधा प्रहार बताते हुए मोर्चा खोल दिया है।

सोमवार (2 फरवरी 2026) को यह मामला उस समय और गरमा गया जब संतों ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर इस ठेके को तुरंत रद्द करने और मामले की उच्च स्तरीय जाँच कराने की माँग की। संतों का सीधा आरोप है कि ठेकेदार ने अपनी पहचान छिपाकर यह काम हासिल किया है।

क्या है पूरा विवाद: 21 हजार रेलिंग और ‘कनिका कंस्ट्रक्शन’ का पेच

बाँके बिहारी मंदिर में श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए प्रशासन ने दर्शन व्यवस्था को सुगम बनाने के लिए कतारबद्ध इंतजाम करने का फैसला लिया था। इसके तहत मंदिर के प्रवेश द्वार से निकास द्वार तक लगभग 21 हजार स्टील की रेलिंग लगाई जानी हैं। इस काम का टेंडर मेरठ की कंपनी ‘कनिका कंस्ट्रक्शन’ को दिया गया है।

विवाद तब शुरू हुआ जब स्थानीय लोगों और संतों को पता चला कि इस कंपनी के मुख्य पार्टनर सलीम अहमद (कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक कॉन्ग्रेस नेता सलीम खान) हैं। संतों का दावा है कि मंदिर जैसे परम पावन स्थान के भीतर, जहाँ भगवान की नित्य सेवा होती है, वहाँ किसी गैर-सनातनी को निर्माण कार्य का जिम्मा देना परंपराओं के खिलाफ है। सोशल मीडिया पर भी एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें लोग हरिद्वार की हर की पौड़ी का उदाहरण देते हुए मंदिर में मुस्लिम ठेकेदार के प्रवेश पर सवाल उठा रहे हैं।

संतों की तीखी प्रतिक्रिया: ‘गौमांस खाने वाले ब्रज में स्वीकार्य नहीं’

श्रीकृष्ण जन्मभूमि संघर्ष न्यास के अध्यक्ष दिनेश फलाहारी महाराज ने इस मामले में बेहद कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में कहा कि ब्रज वह भूमि है जहाँ राधा-कृष्ण ने महारास रचाया और माखन चोरी की लीलाएँ कीं।

फलाहारी महाराज ने कहा, “बाँके बिहारी जी के आंगन में गौमांस खाने वाले और सनातन धर्म को न मानने वाले लोगों का प्रवेश ब्रजवासियों को कभी सहन नहीं होगा। ये लोग हिंदुओं को काफिर कहते हैं, ऐसे में इन्हें मंदिर प्रांगण से एक किलोमीटर दूर तक नहीं फटकने देना चाहिए।” उन्होंने आगे तर्क दिया कि भारत में कुशल हिंदू ठेकेदारों की कोई कमी नहीं है, तो फिर ‘मुगलों के वंशजों’ को यह काम क्यों सौंपा गया, जिन्होंने हमारे मंदिर तोड़कर वहाँ नमाज पढ़ी थी।

पहचान छिपाकर ठेका लेने का संगीन आरोप

रिपोर्ट के मुताबिक, संतों का सबसे बड़ा आरोप यह है कि सलीम अहमद ने अपनी असल पहचान और कंपनी की जानकारी को स्पष्ट न करते हुए, यानी कथित तौर पर ‘पहचान छिपाकर‘ यह ठेका हासिल किया है।

संतों ने माँग की है कि टेंडर प्रक्रिया की बारीकी से जाँच हो कि आखिर किस अधिकारी की मिलीभगत से यह काम कनिका कंस्ट्रक्शन को मिला। चर्चा यह भी है कि इस टेंडर को दिलाने में मथुरा के एक एडीएम स्तर के अधिकारी का हाथ है और इसी कंपनी को कोविड काल में भोजन बाँटने का काम भी दिया गया था।

प्रबंधन समिति की सफाई: ‘अकबर भी तो आए थे’

इस भारी विरोध के बीच बाँके बिहारी मंदिर की हाई पावर मैनेजमेंट कमेटी के सदस्य शैलेंद्र गोस्वामी का बयान भी सामने आया है। उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात की आधिकारिक जानकारी नहीं थी कि ठेका लेने वाली कंपनी का स्वामी मुस्लिम है।

हालाँकि, उन्होंने एक तर्क देते हुए कहा कि ‘बाँके बिहारी जी के प्राकट्य कर्ता स्वामी हरिदास जी के दर्शन करने और उनका संगीत सुनने के लिए तो स्वयं मुगल शासक अकबर भी यहाँ आए थे।’ हालाँकि, संतों ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि दर्शन करना और मंदिर के गर्भगृह के पास निर्माण कार्य करने में जमीन-आसमान का अंतर है।

आगे क्या? संतों ने दी आंदोलन की चेतावनी

फिलहाल, विरोध को देखते हुए मंदिर में रेलिंग लगाने का काम ठप पड़ा है। संतों ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक यह टेंडर निरस्त कर किसी सनातनी भाई को नहीं दिया जाता, वे चुप नहीं बैठेंगे। ब्रजवासियों और भक्तों में भी इस बात को लेकर भारी रोष है। अब सबकी नजरें लखनऊ पर टिकी हैं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस संवेदनशील मामले में क्या फैसला लेते हैं।

वहीं, ADM पंकज वर्मा ने इसे बैंक का प्रोजक्ट बताया है। पंकज वर्मा ने आज तक से बातचीत में कहा है, “यह रेलिंग मंदिर के बजट से नहीं, बल्कि उन बैंकों द्वारा लगाई जा रही है जहाँ मंदिर का पैसा जमा होता है। बैंकों ने अपने CSR फंड के माध्यम से इसका प्रस्ताव दिया था। बैंक ने कोटेशन के आधार पर ‘कनिका कंस्ट्रक्शन’ को चुना।” प्रशासन का कहना है कि इस संस्था का संचालन रंजन नामक व्यक्ति द्वारा किया जा रहा है और मंदिर में काम की देखरेख फील्ड मैनेजर रुपेश शर्मा कर रहे हैं

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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