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पाकिस्तान अब खत्म: मुस्लिम Gen Z ने खोली पोल, फौज-सरकार ने लेख डिलीट करवा खुद के पैर पर मारी कुल्हाड़ी

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख अमेरिका को ‘खुश’ करने में लगे हैं। वहाँ जोरदार लॉबिंग की जा रही है ताकि छवि सुधारी जा सके। ऑपरेशन सिंदूर के बाद हर महीने $50,000 यानी 45 लाख रुपए खर्च किए जा रहे हैं। छवि सुधारने में अब तक 9 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च हो चुके हैं। लेकिन Gen Z हुक्मरानों को ये बता रहे हैं कि ‘तुमसे ना हो पाएगा’।

तंगहाली के बीच लॉबिंग में खर्च किए करोड़ों

FARA के दस्तावेज बता रहे हैं कि पाकिस्तान सरकार और उसके थिंक टैंक अमेरिका में अपनी छवि सुधारने में लगे हुए हैं। इस्लामाबाद पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट ने यूनाइटेड स्टेट्स में लॉबिंग और पब्लिक पॉलिसी आउटरीच पर $900,000 यानी ₹80864097.30 खर्च किए। इस दौरान पाकिस्तानी दूतावास ने अमेरिकी फर्म एर्विन ग्रेव्स स्ट्रैटजी ग्रुप LLC के साथ समझौता किया, ताकि हर अमेरिकी सांसद, अधिकारियों और नीति बनाने वालों तक पहुँच बन सके। मीडिया में नैरेटिव बदलने के लिए एक अमेरिकी कंपनी, कॉर्विस होल्डिंग इंक को लगाया गया ताकि पाकिस्तान के पक्ष में माहौल बनाया जा सके।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को खुश करने के लिए अमेरिकी दौरे के दौरान आर्मी चीफ आसीम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने रेयर अर्थ मिनरल्स भी गिफ्ट किए। इसका नतीजा ये रहा कि रेयर अर्थ मिनरल्स और मेटल्स पर पाकिस्तान और यूनाइटेड स्टेट्स के बीच करार हुआ। दस्तावेज में खोज, माइनिंग, प्रोसेसिंग और ग्लोबल सप्लाई चेन को लेकर सहयोग के बारे में बताया गया है, जिसकी $1 ट्रिलियन यानी करीब 8.9 लाख करोड़ रुपए तक इंडिकेटिव कमर्शियल वैल्यू होगी।

बुजुर्गों की इतनी ‘कोशिश’ के बावजूद Gen Z इन्हें देश के लिए ‘बेकार’ बता रहे हैं।

बगावत के लिए तैयार पाकिस्तान के Gen Z

पाकिस्तान के Gen Z का गुस्सा भड़क रहा है। ये लोग सत्ता पर काबिज नेताओं और सेना के अधिकारियों को चुनौती दे रहे हैं। सेना ने एक वायरल लेख को हटवा दिया है, जिसमें उनकी पोल पट्टी खोली कर रख दी गई थी।

देश के हर हिस्से में हो रहे विरोध को कुचलने वाली असीम मुनीर की सेना को एक लेख ने विचलित कर दिया। कैसे पाकिस्तान के सोशल मीडिया यूजर इस मुद्दे पर अपनी सरकार-सेना को घेर रहे हैं, ट्विटर पर इस ट्रेंड को देख कर समझा जा सकता है।

इसमें कहा गया है कि ‘जितना चाहें, आप लोगों को लड़वाएँ’, जेन जी इस पर मीम बनाएगा। दरअसल अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ़ अर्कांसस में PhD स्टूडेंट जोरैन निजमानी के एक लेख को डिलीट कर दिया गया। इसमें उसने पाकिस्तान के हुक्मरानों को साफ-साफ बताया था कि Gen Z अब उनकी बातों में आने वाला नहीं है और न ही उनके झूठे दावों को मानने वाला है।

इसमें बताया गया है कि नौजवान और जेन जी अब पुराने नेताओं की बातों में नहीं आने वाले हैं। पाकिस्तान की मौजूदा व्यवस्था से यह बगावत की शुरुआत है। लेख देखते ही देखते वायरल हो गया। इससे घबराकर लेख को डिजिटल प्लेटफॉर्म से हटा लिया गया।

पाकिस्तान में अब Gen Z बगावत करने जा रहे हैं। इस बगावत में हिंसा नहीं बल्कि विचार है। विचारों को रोकने के लिए पाकिस्तानी शासन के प्रयास को भी ये लेख बता रहा है। जबरदस्ती चुप करने की कोशिश की जा रही है। बगावत की शुरुआत एक युवा पाकिस्तानी छात्र के विचार से शुरू हुआ है। उसने बताया है कि कैसे देश की युवा पीढ़ी पुराने नेताओं के आदेश मानना ​छोड़ चुकी है।

लेख में साफ कहा गया है कि “आप जितना चाहे उतना लड़ाइयाँ करवा सकते हैं, Gen Z उससे मीम बनाएगा। सभी मेनस्ट्रीम मीडिया को सेंसर कर दो, Gen Z अपनी राय बताने के लिए रंबल, यूट्यूब और डिस्कॉर्ड जैसे प्लेटफॉर्म पर चला जाएगा। बूमर्स, अब आप विचारों को सेंसर नहीं कर सकते। वे दिन गए जब आप लोगों को बेवकूफ बना सकते थे। अब किसी को बेवकूफ नहीं बनाया सकता है।”

यह लेख एक्सप्रेस ट्रिब्यून के डिजिटल एडिशन पर था, जो अब मौजूद नहीं है यानी जैसा लेखक जोरैन निजमानी ने कहा, ठीक वैसा ही हुआ है। यहाँ सच बताने के लिए यूट्यूब से लेकर दूसरे सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया जा रहा है। चैनल पर सेना प्रमुख असीम मुनीर और शहबाज सरकार के खिलाफ खबरें आनी बंद हो गई हैं। इस पर ही Gen Z कह रहा है कि इस तरह की घटिया तरीकों से हुक्मरान नहीं बच सकते। सच को ज्यादा देर तक दबाया नहीं जा सकता।

पाकिस्तानी सेना के हुक्म से हटाया गया लेख

अमेरिका में रहने वाले पाकिस्तानी PhD स्टूडेंट जोरैन निजमानी का ‘इट इज ओवर’ टाइटल वाला यह लेख असल में 1 जनवरी को एक जाने-माने पाकिस्तानी अखबार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर था। हालाँकि कुछ घंटों बाद ही इसे हटा दिया गया। इसके पीछे पाकिस्तान की आर्मी का दबाव था।

दरअसल निजमानी जेन जी के बीच इस लेख की वजह से ‘हीरो’ बन गया। लेख पर रोक के बाद इसका स्क्रीन शॉट जेन जी शेयर कर रहे हैं। जेन जी का गुस्सा आसीम मुनीर की पाकिस्तानी आर्मी पर दिख रहा है। इसे सेंसरशिप कहा जा रहा है और बेबाक लेखन के लिए एक्टर फाजिला काजी और कैसर खान निजमानी के बेटे जोरैन निजमानी की तारीफ की जा रही है।

देशभक्ति जबरन पढ़ाई-सिखाई नहीं जाती- जोरैन निजमानी

लेख में बताया गया है कि पाकिस्तान के सत्ताधारी वर्ग का अब युवा पीढ़ी पर अपना असर खत्म हो गया है। देश के हुक्मरान देशभक्ति को बढ़ाने के लिए स्पॉन्सर लेक्चर, सेमिनार और कैंपेन चला रहे हैं, इसका कोई असर नहीं पड़ रहा है। सरकार के ये सारे प्रयास बेकार हैं।

उन्होंने लिखा, “सत्ता में बैठे बड़े-बूढ़ों पर से युवा पीढ़ी यकीन नहीं कर रही है। ये लोग समझ रहे हैं कि सत्ताधारी बस आम जनता को बरगला रहे हैं। ये लोग स्कूलों और कॉलेजों में देशभक्ति को बढ़ावा देने के लिए चाहे कितने भी वाद-विवाद और सेमिनार कर लें, यह काम नहीं कर रहा है।”

सेना का नाम लिए बिना सारी बातें कही गई है। पीएचडी छात्र निजमानी कहते हैं कि देशभक्ति भाषणों या नारों से नहीं सिखाई जा सकती, बल्कि यह अपने आप बढ़ती है, जब नागरिकों को समान अवसर, भरोसेमंद इंफ्रास्ट्रक्चर, काम करने वाले सिस्टम और गारंटी वाले अधिकार दिए जाते हैं।

उन्होंने कहा, “जब बराबर मौके, अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर और अच्छे सिस्टम हों तो देशभक्ति अपने आप आती ​​है। जब आप आम जनता की बुनियादी जरूरतों को पूरी करते हैं। उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि उनके अधिकार सुरक्षित हैं, तब आपको स्कूलों या कॉलेजों में जाकर देशभक्ति सिखाने की जरुरत नहीं होती। लोग खुद ही अपने देश को पसंद करते हैं।”

पाकिस्तानी सच्चाई को बता रहा ये लेख हुक्मरानों को इतना कड़वा लगा कि उन्होंने इसे हटवा दिया, क्योंकि जनता असलियत को समझ रही है। हालाँकि लेख Gen Z और Gen Alpha को सेंटर में रख कर लिखा गया है।

इसमें कहा गया है, “युवा दिमाग, Gen Z, Alphas अच्छी तरह जानते हैं कि क्या हो रहा है। देशभक्ति के विचार को ‘बेचने’ की कोशिशों को वे अच्छी तरह समझ रहे हैं। इंटरनेट की वजह से, हमारे पास जो भी थोड़ी बहुत एजुकेशन बची है, उसकी वजह से लोगों तक बातें पहुँच रही हैं। वरना लोगों को अनपढ़ रखने की सत्ता पर बैठे लोगों ने पूरी कोशिश की, लेकिन फेल हो गए। हालाँकि जनता अपनी बात डर की वजह से नहीं कह पा रही है, क्योंकि उसे साँस लेना ज्यादा पसंद है।”

इंटरनेट और सोशल मीडिया ने दुनिया की जानकारी लोगों तक पहुँचाना आसान बना दिया है, इसलिए लोगों की सोच को कंट्रोल नहीं किया जा सकता। युवाओं में काफी बेचैनी है, जो लगातार बढ़ रही है।

उन्होंने आगे कहा, “युवा समझ रहे हैं कि वे सत्ता में बैठे लोगों को चैलेंज नहीं कर सकते, इसलिए देश छोड़ रहे हैं। वे चुपचाप निकल जाना पसंद करेंगे। पीछे मुड़कर भी नहीं देखेंगे क्योंकि उनके दोस्तों ने आवाज उठाई तो उन्हें चुप करा दिया गया।”

पाकिस्तान में लेख हटाने का हो रहा विरोध

डिजिटल प्लेटफॉर्म से लेख हटाने का पाकिस्तान में काफी विरोध हो रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) की कनाडाई विंग ने दावा किया कि आर्टिकल हटाने से यह पक्का हो गया है कि जबरदस्ती की देशभक्ति अब काम नहीं करती।

पार्टी ने X पर एक पोस्ट में लिखा, “ज़ोरेन निज़ामानी का आर्टिकल ‘इट इज ओवर’ को हटाया जाना, ये बताता है कि पाकिस्तान का सच क्या है। जबरदस्ती की देशभक्ति अब काम नहीं करती। Gen Z करप्शन, गैर-बराबरी और दोहरे चरित्र को समझती है। इंसाफ़, नौकरी और इज्जत के बिना प्रोपेगैंडा फेल हो जाता है। पुराने कंट्रोल के तरीके खत्म हो गए हैं, युवा आगे बढ़ गए हैं।”

पाकिस्तानी एक्टिविस्ट मेहलका समदानी ने लिखा, “हैरानी की बात नहीं है कि यह लेख अब एक्सप्रेस ट्रिब्यून के डिजिटल एडिशन से एक्सेस नहीं हो रहा है – ठीक वैसी ही सेंसरशिप जिसके बारे में ज़ोरेन बात करते हैं।”

वकील अब्दुल मोइज़ जाफ़री ने कहा, “यह बहुत बढ़िया लेख है। पाकिस्तान में अपनी नौकरी में फेल हो रहे हर जवान से लेकर हर बूढ़े आदमी के दिल से लिखा गया है।” पाकिस्तान की मानवाधिकार आयोग ने भी लेख हटाने की आलोचना की है और कहा है कि एक्सप्रेस ट्रिब्यून से जोरीन निजमानी का लेख हटाना पाकिस्तान में बोलने की आजादी पर बढ़ती पाबंदियों का उदाहरण है।

पाकिस्तान की ये हालत है कि बलूचिस्तान, पीओके समेत कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन चल रहा है। खाने-पीने के लाले पड़े हैं। आम जनता को दो जून की रोटी नसीब नहीं हो रही। सबकुछ काफी महँगा हो गया है। देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो चुकी है। इस बीच जेन जी का गुस्सा भड़कने लगा है। हुक्मरानों के ऐशो आराम जेन जी को दिख रहे हैं। ऐसे में भारत का एक और पड़ोसी देश जेन जी के गुस्से का शिकार होने के लिए तैयार है।

‘माजिद फ्रीमैन के लिए हो जाओ एकजुट’: लेस्टर हिंदू-विरोधी हिंसा को भड़काने वाले के समर्थन में उतरा कट्टरपंथी संगठन Cage International, भीड़ को कोर्ट के बाहर इकट्ठा होने के लिए उकसाया

सितंबर 2024 में मुस्लिम ‘एक्टिविस्ट’ माजिद फ्रीमैन को 2022 में लेस्टर में हुई हिंदू-विरोधी हिंसा के दौरान भड़काऊ गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में 22 हफ्ते की जेल की सजा सुनाई गई थी। उस पर आरोप था कि उसने उस हिंसा के दौरान हिंदुओं की भूमिका को लेकर झूठी और भ्रामक बातें फैलाई थीं। उस समय माजिद फ्रीमैन ने अदालत में अपने बचाव में कोई दलील भी नहीं दी क्योंकि उसके पास अपने कुकृत्यों को सही ठहराने का कोई आधार नहीं था।

अब ब्रिटेन का NGO कैज इंटरनेशनल (CAGE International) उसकी इन्हीं गतिविधियों को नजरअंदाज करते हुए इस्लामी कट्टरपंथी को निर्दोष साबित करने की कोशिश में एक अभियान चला रहा है और उसकी हिंदू-विरोधी और आपराधिक भूमिका को छिपाने का प्रयास कर रहा है।

CAGE International को पहले CagePrisoners Project के नाम से जाना जाता था। 9 जनवरी को लेस्टर मामले में होने वाले माजिद फ्रीमैन के दोबारा ट्रायल से पहले उसके समर्थन में लोगों को जुटा रहा है। इस संगठन ने एक पर्चे में फ्रीमैन को ‘मानवतावादी’ और ‘एंटी-जेनोसाइड एक्टिविस्ट’ बताया है। इसमें दावा किया गया है कि उसे ‘2022 में हिंदुत्व से प्रेरित दंगों के दौरान लेस्टर समुदाय का बचाव करने के अपराध में एक राजनीतिक रूप से प्रेरित मुकदमे में दोषी ठहराया गया’।

CAGE International ने X पर लिखा, “माजिद फ्रीमैन के लिए एकजुट हों। मानवतावादी और प्रो-फिलिस्तीन एक्टिविस्ट माजिद फ्रीमैन ने 2022 में हिंदुत्व से प्रेरित दंगों के दौरान, लेस्टरशायर पुलिस की कई नाकामियों के बाद लेस्टर के लोगों के लिए आवाज उठाई थी। उसे पिछले साल एक राजनीतिक मुकदमे में दोषी ठहराया गया। उसके दोबारा ट्रायल में उसके साथ एकजुटता दिखाएँ। हम माजिद के साथ खड़े हैं।”

हिंदू अधिकारों की वकालत करने वाले INSIGHT UK समूह ने इसे लेकर CAGE International पर सवाल उठाए हैं। INSIGHT UK ने संगठन पर ‘विक्टिम-फ्लिपिंग’ का आरोप लगाया है ताकि उसके हिंदू विरोधी कृत्यों को कम करके दिखाया जा सके।

INSIGHT UK ने लिखा, “माजिद फ्रीमैन को दोषी ठहराया गया है। इसके बावजूद CAGE ‘पीड़ित को ही अपराधी’ बता रहा है और एक ऐसा अभियान चला रहा है जो उसे एक सताए गए समुदाय के रक्षक के रूप में पेश कर रहा है और उसके उन कामों को कम करके दिखा रहा है। इसने पहले से ही तनावग्रस्त और हिंसा झेल रहे शहर में हिंदू विरोधी भावनाओं को भड़काया था। CAGE का चरमपंथियों का बचाव करने का लंबा इतिहास है और अब ऐसे व्यक्ति के लिए समर्थन क्यों जुटा रहा है जिसके कामों ने लीसेस्टर में हिंदुओं के लिए नफरत और डर को और बढ़ा दिया?”

माजिद फ्रीमैन की सजा और पूरा मामला

9 सितंबर 2024 को माजिद फ्रीमैन को 22 हफ्ते की जेल की सजा सुनाई गई। उस पर आरोप था कि उसने 2022 में ब्रिटेन के लीसेस्टर शहर में हुए हिंदू-विरोधी दंगों के दौरान हिंसा भड़काने की कोशिश की और सोशल मीडिया के जरिए झूठ और भ्रामक जानकारी फैलाई। नॉर्थ हैम्पटन मजिस्ट्रेट्स कोर्ट में डिस्ट्रिक्ट जज अमर मेहता ने उसे पब्लिक ऑर्डर ऑफेंस की धारा 4 के तहत दोषी ठहराया था। अदालत ने कहा कि फ्रीमैन का इरादा हिंसा करवाने का था और उसने ऐसे अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया जिनका मकसद लोगों को हिंसा के लिए उकसाना था।

जुलाई 2023 में माजिद फ्रीमैन एक और गंभीर मामले में भी घिर चुका था। उस पर आतंकवाद भड़काने और प्रतिबंधित आतंकी संगठन हमास का समर्थन करने के आरोप लगे थे। अभियोजन पक्ष के अनुसार, माजिद फ्रीमैन का असली नाम माजिद नोवसार्का है। उसे 9 जुलाई 2023 को काउंटर टेररिज्म से जुड़े मामलों में गिरफ्तार किया गया था। अदालत को बताया गया कि 26 दिसंबर 2022 से 20 जून 2023 के बीच फ्रीमैन ने कई बार ऐसे बयान दिए जो हमास जैसे प्रतिबंधित आतंकी संगठन के पक्ष में थे।

सरकारी वकील बिर्गिटे हागेम ने कोर्ट में कहा था कि माजिद फ्रीमैन 11 मार्च 2015 को सोशल मीडिया के जरिए लोगों को आतंकी गतिविधियाँ करने, उनकी योजना बनाने या दूसरों को इसके लिए उकसाने की कोशिश कर रहा था। इसका संबंध फ्रांस की व्यंग्य पत्रिका ‘चार्ली हेब्दो’ पर हुए 2015 के आतंकी हमले से था।

माजिद फ्रीमैन ने लीसेस्टर में हिंदू विरोधी हिंसा भड़काई

भारत-पाकिस्तान टी20 मैच में 28 अगस्त 2022 को भारत की जीत के बाद लीसेस्टर में तनाव फैल गया। इस दौरान हुई एक झड़प में भारतीय ध्वज का अपमान किया गया। हालात बिगड़ने के बावजूद स्थानीय हिंदू समुदाय ने शांति बनाए रखने की कोशिश की और यहाँ तक कि झंडे का अपमान करने वाले व्यक्ति की मदद भी की।

इसके बावजूद माजिद फ्रीमैन ने हिंदुओं के खिलाफ झूठा प्रचार शुरू किया, जिससे हिंसा और भड़क गई। 30 अगस्त 2022 को उन्होंने यह झूठा दावा किया कि लीसेस्टर में हिंदुओं ने मुसलमानों की मौत जैसे नारे लगाए। बाद में पुलिस जाँच में यह आरोप पूरी तरह गलत पाया गया।

इसी दिन माजिद फ्रीमैन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर यह अफवाह भी फैलाई कि लीसेस्टर में कुरान का अपमान किया गया है और इसके लिए हिंदुओं को जिम्मेदार ठहराया। जाँच में यह दावा भी पूरी तरह झूठा साबित हुआ। हालाँकि, इन झूठी खबरों और भ्रामक दावों के कारण पहले ही माहौल बिगड़ चुका था और तनाव बढ़ गया था।

इसके अलावा माजिद फ्रीमैन ने एक और झूठा आरोप लगाकर माहौल को और भड़काया। उन्होंने दावा किया कि हिंदू युवकों के एक समूह ने एक मुस्लिम किशोर का पीछा कर उस पर हमला किया, जबकि यह आरोप भी गलत पाया गया। 4 सितंबर 2022 को, जब लीसेस्टर में मुस्लिम भीड़ हिंदुओं पर हमला कर रही थी, उसी दौरान माजिद फ्रीमैन ने सोशल मीडिया के जरिए अपने समुदाय के लोगों को हिंदुओं के खिलाफ और उकसाया। उनके भड़काऊ पोस्टों ने स्थिति को और गंभीर बना दिया और हिंसा को बढ़ावा मिला।

लीसेस्टर में हिंदुओं पर 4 से 7 सितंबर के बीच मुस्लिमों ने हमले किए। स्थानीय गणेश चतुर्थी समारोह को भीड़ ने बाधित किया और हिंदू धार्मिक प्रतीकों पर अंडे फेंके। एक हिंदू पुरुष पर हमला भी हुआ। एक अन्य मामले में, जब माजिद फ्रीमैन ने झूठा दावा किया कि कुछ हिंदू पुरुषों ने एक मुस्लिम लड़की का अपहरण करने की कोशिश की, तो एक हिंदू पुरुष को सोशल मीडिया पर निशाना बनाया गया। पुलिस ने बाद में खुलासा किया कि यह पूरी कहानी झूठी थी।

सोशल मीडिया पर माजिद फ्रीमैन की टीम, ‘केज इंटरनेशनल’ (CAGE International) और अमेरिका स्थित ‘इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल’ (IAMC) जैसे कट्टरपंथी संगठन लंबे समय से एक खास कहानी को हवा दे रहे हैं। उनका दावा है कि लीसेस्टर हिंसा के दौरान फ्रीमैन ने एक हिंदू व्यक्ति की जान बचाई थी। इस नैरेटिव के जरिए वे फ्रीमैन को हिंसा भड़काने वाले अपराधी के बजाय एक ‘रक्षक’ के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं।

हालाँकि, यह कहानी बिल्कुल वैसी ही लगती है जैसा शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद बांग्लादेश में देखने को मिला था। उस समय भी ‘इस्लामो-लेफ्टिस्ट’ गुटों ने यह नैरेटिव फैलाया था कि ‘मुस्लिम हिंदू मंदिरों की रक्षा के लिए मानव श्रृंखला बना रहे हैं’। यहाँ बड़ा सवाल यह उठता है कि वे आखिर हिंदुओं की रक्षा किससे कर रहे थे?

ठीक यही बात माजिद फ्रीमैन पर भी लागू होती है। फ्रीमैन ने बुनियादी तौर पर अपने ही समुदाय के लोगों को हिंदुओं पर हमला करने के लिए उकसाया था। ऐसे में, जिस भीड़ को उसने खुद भड़काया, उसी भीड़ से कथित तौर पर एक हिंदू को बचा लेने भर से उसके दंगा भड़काने के गुनाह कम नहीं हो जाते। यह दलील देना कि वह रक्षक है, उतना ही बेतुका है जितना आग लगाने वाले का यह कहना कि उसने एक व्यक्ति को जलने से बचा लिया था।

केज इंटरनेशनल की ‘माजिद फ्रीमैन को रिहा करो’ की वकालत

वर्ष 2003 में ‘केजप्रिज़नर्स प्रोजेक्ट’ (CagePrisoners Project) के रूप में शुरू हुआ यह संगठन 2013 में ‘केज इंटरनेशनल’ (CAGE International) बन गया। अपनी वेबसाइट के अनुसार, यह संस्था उन कैदियों की स्थिति और उनके ठिकाने के बारे में जानकारी देने का काम करती है, जिन्हें ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध’ के तहत पकड़ा गया है। यह डेटा उनके परिवारों, वकीलों, मीडिया और शिक्षाविदों के लिए जुटाया जाता है।

हालाँकि, इस एनजीओ (NGO) का इतिहास विवादों से भरा रहा है। ‘आतंकवाद विरोधी कानूनों’ के दुरुपयोग का विरोध करने के नाम पर यह संस्था कई बार इस्लामी कट्टरपंथियों और यहाँ तक कि खूंखार आतंकवादियों का बचाव करती नजर आई है। इसका एक बड़ा उदाहरण सितंबर 2022 में देखने को मिला, जब ‘केज इंटरनेशनल’ ने मोहम्मद रहीम अल-अफगानी की रिहाई की वकालत की थी। गौरतलब है कि अल-अफगानी खूंखार आतंकी ओसामा बिन लादेन का बेहद करीबी सहयोगी रहा है।

इसके अलावा, केज इंटरनेशनल (CAGE International) ‘लेडी अल-कायदा’ के नाम से कुख्यात आफिया सिद्दीकी की रिहाई के लिए भी वकालत कर चुका है। सिद्दीकी फिलहाल अफगानिस्तान में अमेरिकी अधिकारियों पर हमले के जुर्म में दोषी करार दिए जाने के बाद 86 साल की जेल की सजा काट रही है। ऑपइंडिया की एक पिछली रिपोर्ट के अनुसार, 2008 में अमेरिकी न्याय विभाग ने उसके पास से कई संदिग्ध चीजें बरामद की थीं। इनमें उसके हाथ से लिखे कुछ नोट्स भी शामिल थे, जिनमें बड़े पैमाने पर जनहानि करने वाले हमलों का जिक्र किया गया था।

इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि ‘केज इंटरनेशनल’ (CAGE International) फिलिस्तीनी इस्लामिक आतंकी संगठन हमास का भी कट्टर समर्थक है। अगर फिर से माजिद फ्रीमैन की बात करें, तो इसी ‘इस्लामिस्ट एनजीओ’ ने जुलाई 2025 में फ्रीमैन के समर्थन में एक एकजुटता कार्यक्रम आयोजित किया था। इस संस्था ने दावा किया कि फ्रीमैन पर आतंकवाद के आरोप सिर्फ इसलिए लगाए गए हैं क्योंकि उन्होंने फिलिस्तीन के साथ एकजुटता जाहिर करते हुए कुछ शब्द साझा किए थे।

लीसेस्टर में हिंदुओं के खिलाफ हुई हिंसा के मामले में माजिद फ्रीमैन को दोषी करार दिए जाने के तुरंत बाद, ‘केज इंटरनेशनल’ने एक नया नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की। इस कट्टरपंथी संगठन ने दावा किया कि फ्रीमैन को एक ‘राजनीति से प्रेरित हिंदुत्व दंगा ट्रायल’ के तहत जेल भेजा गया है।

हैरानी की बात यह है कि इस संगठन ने लीसेस्टर के पीड़ित हिंदुओं को ही ‘हिंदुत्ववादी आंदोलनकारी’ बता दिया और उन्हें 2022 की उस हिंसा का गुनहगार ठहराने की कोशिश की, जो असल में कट्टरपंथियों द्वारा सुनियोजित थी। जबकि सच यह है कि उस समय हिंदू समाज ही इन हमलों का शिकार हुआ था और इस पूरी हिंसा की आग को माजिद फ्रीमैन द्वारा फैलाई गई झूठी खबरों (डिसइन्फॉर्मेशन) ने ही हवा दी थी।

लीसेस्टर में हुई हिंसा को लेकर ‘केज इंटरनेशनल’ ने बेहद गंभीर और भ्रामक दावा किया है। इस संगठन का कहना है कि ‘2022 में लीसेस्टर में ‘हिंदुत्व’ से प्रेरित जो दंगे हुए, उनमें लीसेस्टरशायर पुलिस और विशेष रूप से चीफ कांस्टेबल रॉब निक्सन स्थिति को संभालने में पूरी तरह नाकाम रहे। पुलिस ने मुस्लिम मोहल्लों में हिंदुत्ववादी आंदोलनकारियों को अर्धसैनिक शैली (paramilitary-style) में मार्च करने की इजाजत दी, जिससे सीधे तौर पर सामुदायिक तनाव पैदा हुआ।’

हालाँकि, सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। भले ही माजिद फ्रीमैन, मोहम्मद हिजाब (एक अन्य कट्टरपंथी और हिंसा का मुख्य उकसाने वाला) और उनके समर्थक लगातार ‘हिंदुत्व’ और हिंदुओं को इस हिंसा का दोषी ठहराने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन ब्रिटेन की अदालत ने उनके इस प्रोपेगेंडा की धज्जियाँ पहले ही उड़ा दी हैं। कोर्ट की जाँच में यह साफ हो चुका है कि हिंदुओं के खिलाफ हिंसा सुनियोजित थी।

अब, 9 जनवरी को होने वाले माजिद फ्रीमैन के दोबारा ट्रायल से पहले, ‘केज इंटरनेशनल’ (मुख्य रूप से पाकिस्तानी मूल के ब्रिटिश मुस्लिम चलाते हैं) कट्टरपंथियों को लीसेस्टर क्राउन कोर्ट के बाहर जुटने के लिए उकसा रहा है। इसे ‘एकजुटता’ दिखाने का नाम दिया जा रहा है, लेकिन जानकारों के बीच यह चिंता बढ़ गई है कि यह एकजुटता नहीं, बल्कि अदालती कार्यवाही को प्रभावित करने के लिए ‘शक्ति प्रदर्शन’ की एक सोची-समझी कोशिश है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है। इसको पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करें)

सोमनाथ मंदिर के पुननिर्माण में अड़ंगा डाल नेहरू ने की शुरुआत, वही लीगेसी आगे बढ़ाता रहा गाँधी परिवार: प्रवेश के बाद राहुल गाँधी ने खुद को बताया ‘गैर-हिंदू’

सोमनाथ का नाम आते ही इतिहास अपनेआप बोलने लगता है। वह मंदिर, जिसे बार-बार तोड़ा गया, बार-बार लूटा गया, पर हर बार हिंदू समाज ने उसे फिर खड़ा किया। मंदिर के इसी संघर्ष को 1000 साल पूरे होने जा रहे हैं, जब 1026 ईस्वी में मुस्लिम शासक महमूद गजनवी ने मंदिर पर आक्रमण किया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी बताया और कहा कि यह संदेश देता है कि मिटाने की मानसिकता रखने वाले खत्म हो जाते हैं।

इसी बीच राहुल गाँधी का नाम भी सोमनाथ मंदिर से चर्चा में आया है। राहुल गाँधी का वह पुराना किस्सा, जिसपर कॉन्ग्रेसियों ने खूब पाखंड फैलाया। जब साल 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल गाँधी सोमनाथ मंदिर गए थे। उस वक्त मंदिर के विजिटर रजिस्टर की एक एंट्री को लेकर विवाद हुआ।

मंदिर के रजिस्टर में धर्म के कॉलम में राहुल गाँधी का धर्म ‘ईसाई’ दर्ज बताया गया। बाद में इस पर तर्क भी दिए गए, लेकिन सवाल वहीं का वहीं रहा। कॉन्ग्रेस के पास स्पष्टीकरण के लिए कुछ नहीं था, बल्कि लोगों को और ज्यादा भ्रम में डाल दिया गया। बात यहाँ आकर टिकी कि राहुल गाँधी का गैर-हिंदू रजिस्टर में नाम लिखा गया। लेकिन आज भी राहुल गाँधी के ‘ईसाई’ होने का लोगों का सवाल ज्यों की त्यों ही है।

यह राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस की वही सोच है, जो बार-बार हिंदू आस्था के सवाल पर असहज दिखाई देती है। यह कोई एक घटना या बयान की बात नहीं है, बल्कि एक लंबी राजनीतिक और वैचारिक परंपरा का हिस्सा है। राहुल गाँधी खुद को हिंदू बताते हैं, मंदिर-मंदिर दर्शन करते हैं, लेकिन जब बात धार्मिक पहचान की आती है तो तस्वीर धुँधली हो जाती है।

सोमनाथ सिर्फ राहुल गाँधी की एक यात्रा का मुद्दा नहीं है। यह उस विरासत का हिस्सा है, जिसे उनकी पार्टी कॉन्ग्रेस दशकों से लेकर चल रही है। आजादी के बाद जब देश ने तय किया कि सोमनाथ मंदिर का पुनर्निमाण होगा, तब देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद इसके पक्ष में थे। सरदार पटेल ने इसे हिंदू समाज के आत्मसम्मान से जोड़ा।

लेकिन उस समय राहुल गाँधी के परनाना तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस पुनर्निमाण से असहज थे। उन्होंने खुलकर कहा था कि देश को धार्मिक पुनर्निमाण से दूर रहना चाहिए। उन्होंने राष्ट्रपति के उद्घाटन में जाने पर भी आपत्ति जताई। यह तथ्य इतिहास का हिस्सा है।

क्यों राहुल गाँधी का साल 2017 के उस किस्से से लेकर नेहरू के सोमनाथ विरोध तक एक ही धागे में जुड़े दिखते हैं। क्यों यह कॉन्ग्रेस पार्टी की वही हिंदू-विरोधी लीगेसी है। यह कोई अचानक पैदा हुई सोच नहीं, बल्कि दशकों से चली आ रही वह असहजता है। जो हिंदू आस्था के सवाल पर बार-बार सामने आती रही है। राहुल गाँधी का सोमनाथ जाना और फिर विजिटर रजिस्टर में धर्म को लेकर उठा विवाद नेहरू की सोमनाथ मंदिर पर असहजता का आधुनिक रूप लगता है, जैसे इतिहास खुद वर्तमान को आईना दिखा रहा हो।

समय बदला, पीढ़ियाँ बदलीं लेकिन यह असहजता बनी रही। कभी राम मंदिर आंदोलन को कट्टरता कहकर खारिज किया गया। कभी काँवड़ यात्रा पर सवाल उठाए गए कि सड़कें क्यों रोकी जाती हैं। कभी दीपावली पर पटाखों को लेकर नैतिकता का पाठ पढ़ाया गया।

कॉन्ग्रेस की राजनीति में यह पैटर्न बार-बार उभरता है। हिंदू आस्था को या तो संदेह की नजर से देखा जाता है या फिर उसे राजनीतिक रूप देकर असहज मान लिया जाता है। राहुल गाँधी का साल 2017 वाला सोमनाथ मंदिर का किस्सा इसी लंबे सिलसिले की एक कड़ी बन जाता है। यह किस्सा छोटा हो सकता है, लेकिन यह उस बड़ी कहानी को मजबूती देता है जिसमें कॉन्ग्रेस और हिंदू आस्था के बीच दूरी साफ दिखाई देती है।

यही वजह है कि जब आज सोमनाथ पर हुए आक्रमण के 1000 साल पूरे होने की बात होती है, तो सिर्फ महमूद गजनवी की बात नहीं होनी चाहिए। बल्कि यह भी जरूरी है कि आज की राजनीति उस इतिहास से क्या सीख लेती है।

एक तरफ प्रधानमंत्री खुलकर सोमनाथ को भारत की अटूट आस्था का प्रतीक बताते हैं और दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस की वही पुरानी असहजता बार-बार सामने आती है। यही कारण है कि समस्या सिर्फ घटना या बयान की नहीं, बल्कि उस लीगेसी की है, जो हिंदू आस्था को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाते।

सोमनाथ आज भी खड़ा है, वो भी पहले से अधिक मजबूत। शायद यही इस देश की सबसे बड़ी सच्चाई है।

सपा के गुंडाराज में डर से नहीं आती थी इंडस्ट्रियाँ, CM योगी के राज में UP बना पसंदीदा: 16 महीनों में तैयार हुआ अशोक लेलैंड का EV प्लांट

उत्तर प्रदेश के लखनऊ के सरोजिनी नगर में जहाँ कभी पहले लैंब्रेटा बनाने वाला स्कूटर इंडिया की फैक्टरी हुआ करती थी, वहाँ अब लोगों को उनके गंतव्य तक पहुँचाने वाले इलेक्ट्रिक व्हीकल बसें बनाई जा रही हैं। यह कर रहा है- अशोक लेलैंड। 9 जनवरी 2026 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अशोक लेलैंड के स्मार्ट इलेक्ट्रिक बसों के प्लांट का उद्घाटन करने वाले हैं।

अशोक लेलैंड का यह प्लांट महज 16 महीनों में ही बनकर तैयार हो गया है और यह अपने आप में ही एक उपलब्धि है। अशोक लीलैंड के लखनऊ के ईवी प्लांट के बारे में हिंदूजा ग्रुप के कॉरपोरेट और सेल्स के अध्यक्ष एस के चढ्ढा बताते हैं कि आमतौर पर इस तरह के प्लांट को बनाने में 38 से 40 महीने लग जाते हैं लेकिन इसे 16 महीना में पूरा करने का पूरा श्रेय सीएम योगी की सरकार की सहायता और उनके दृढ़ निश्चय को जाता है।

लगभग 2 साल पहले हमने उत्तर प्रदेश में इस प्लांट का सपना देखा था और अब वह सच हुआ है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रयासों का ही सबसे बड़ा योगदान रहा है।

योगी सरकार के इंडस्ट्रियल पॉलिसी के कारण ही अशोक लेलैंड ने उत्तर प्रदेश में इंडस्ट्री लगाने पर विचार किया। 2023 में योगी सरकार के साथ समझौता पत्र पर हस्ताक्षर करने के बाद अशोक लेलैंड को योगी सरकार ने सरोजिनी नगर में 70 एकड़ की जमीन आवंटित की।

यह जमीन इससे पहले स्कूटर इंडिया के पास थी। वह फैक्ट्री बंद हुई तो जमीन खाली हो गई और योगी सरकार ने 75% लैंड सब्सिडी के साथ इलेक्ट्रॉनिक व्हीकल का प्लांट लगाने के लिए यह जमीन अशोक लेलैंड को दे दी।

अशोक लेलैंड का लखनऊ स्थित प्लांट

चड्ढा बताते हैं कि कई जगहों को देखने के बाद ईवी प्लांट के लिए इस जगह को सुनिश्चित किया गया। चड्ढा कहते हैं कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की दृढ़ इच्छा शक्ति और उनकी कमिटमेंट के चलते ही हिंदूजा ग्रुप नाम अशोक लीलैंड को यहाँ पर शुरू करने को लेकर सकारात्मकता मिली।

15 सितंबर 2023 में अशोक लेलैंड का उत्तर प्रदेश सरकार के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया गया। इसके बाद फरवरी 2024 में भूमि पूजन के साथ ही प्लांट का निर्माण शुरू हो गया। 16 महीने में इस परियोजना को पूरा कर अशोक लेलैंड ने एक नया इतिहास रचा है कि हमारे समूह के लिए यह एक ऐतिहासिक मौका है।

गुंडा राज में लगता था डर

एसके चढ्ढा बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में यह हमारा पहला प्लांट है। इससे पहले यहाँ प्लांट बनाने की बात से काफी डर लगता था। इसके पीछे असुरक्षा, निर्माण कार्य को रोकने, काम में बढ़ा डालने जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ता था।

योगी सरकार के आने के बाद यहाँ की विकास योजनाएँ, प्रयागराज का कुंभ मेला का प्रबंधन और अन्य विकास के काम को देखा और इसके बाद ही लखनऊ में प्लांट लगाने का निर्णय शुरू किया गया। इस प्लांट के पहले चरण में 2500 बसों का निर्माण किया जाएगा। इसके बाद इसकी संख्या को बढ़ाकर 5000 और फिर 10000 तक की जाएगी।

EV बस की असेंबली करते कामगार

इसके चढ्ढा बताते हैं कि इस प्लांट में महिलाओं के प्रशिक्षण के लिए स्किल डेवलपमेंट सेंटर ‘नालंदा’ तैयार किया गया है। यह सीएम योगी आदित्यनाथ का महिला सशक्तिकरण को लेकर किया गया प्रण है कि देश की बेटियों को भी प्रशिक्षण मिले और वह भविष्य की टेक्नोक्रेट बनकर सामने आएँ।

₹1000 करोड़ का होगा निवेश

अशोक लेलैंड ने लखनऊ के इस प्लांट में 1000 करोड़ रुपए का निवेश करने की योजना बनाई है। हर साल इस मैन्युफैक्चरिंग यूनिट से पहले 2500 बसें तैयार होंगी। चड्ढा का कहना है कि इस ईवी प्लांट को आगे और भी विस्तार दिया जाएगा और इससे लगभग 10,000 लोगों को रोजगार मिलने की भी संभावना जताई है।

अशोक लेलैंड के लखनऊ के प्लांट हेड शक्ति सिंह यादव ने बताया कि उत्तर प्रदेश में देश की 30% से अधिक जनसंख्या रहती है। सरकार का भी यही विजन है कि प्रदेश और देश में प्रदूषण रहित वाहनों की संख्या बढ़ाई जाए।

इसी विजन को धरातल पर लाने के लिए अशोक लेलैंड ने लखनऊ में प्लांट बनाया है जिसमें इलेक्ट्रिक व्हीकल को वरीयता दी जाएगी। इस प्लांट में ईवी वाहनों के साथ अल्टरनेट फ्यूल्स और हाइड्रोजन बेस्ड वाहनों को भी निर्मित किए जाने पर योजना बनाई गई है।

शक्ति सिंह का कहना है कि योगी सरकार की योजना में सिंगल विंडो पोर्टल में सिंगल विंडो पोर्टल प्रणाली ‘निवेश मित्रा’ बनाई है। उसे प्रदेश में काम करना काफी आसान हो गया है। इसके तहत योजना के लिए हर तरह की मंजूरी ऑनलाइन ही मिल जाती है। इस तरह का प्रावधान अन्य किसी भी राज्य में नहीं है।

इस पोर्टल की वजह से ही सरकार की अलग-अलग विभागों की मंजूरी आसानी से मिलना संभव हुई है। पहले लगभग इन 45 विभागों में लगभग 500 पत्रों की मंजूरी लेनी पड़ती थी जिसमें पहले काफी समय लगता था। निवेश मित्रा ने इसे आसान बनाया है।

प्लांट को लेकर शक्ति सिंह कहते हैं कि यह उत्तर प्रदेश के अर्थव्यवस्था में मील का पत्थर साबित होगा क्योंकि प्रदेश की कई डीजल बसों को इलेक्ट्रिक बसों में बदल जाएगा।इसके अलावा उत्तर प्रदेश में रहने वाले श्रमिकों और कामगारों को भी दक्षता के प्रति प्रशिक्षण के साथ रोजगार के अवसर मिलेंगे।

शक्ति सिंह के अनुसार 2500 बसों के निर्माण के लिए लगभग 1000 कामगार लोगों की आवश्यकता पड़ेगी। इसके अलावा सब्सिडियरी श्रमिकों और सप्लायर को भी फायदा मिलेगा।फरवरी 2024 में प्लांट लगाने के बाद इसका उद्घाटन नवंबर 2025 में ही होना था लेकिन कुछ निजी करणों के चलते अशोक लीलैंड को यह समझ जनवरी तक स्थगित करना पड़ा।

टाटा ने भी योगी सरकार में की शुरुआत

अशोक लीलैंड से पहले वर्ष 2019 में टाटा मोटर्स ने भी लखनऊ में ही इलेक्ट्रिक व्हीकल बनाने का काम शुरू किया है। इसी कड़ी में अशोक लीलैंड भी अब शामिल हो गया है। इससे उत्तर प्रदेश ईवी ट्रांसपोर्टेशन का हब भी बनने की ओर अग्रसर हो गया है, जहां से पूरे देश में स्मार्ट स्विच इलेक्ट्रिक व्हीकल जाएगी और लोगों का जीवन आसान बनाएंगी।

यह बात तो साफ है कि योगी सरकार की इंडस्ट्रियल पॉलिसी के चलते ही महज 2 वर्षों में एक ऐसे प्रोजेक्ट को फाइलों से जमीन पर उतार दिया जो न केवल आम जनमानस को सुविधा देगी पर साथ ही रोजगार सृजन का भी मौका मिलेगा।

जहाँ अखिलेश की सरकार में गुंडाराज के चलते उद्यमी उत्तर प्रदेश में आना भी जरूरी नहीं समझते थे, वहीं अशोक लेलैंड के इस प्रोजेक्ट के धरातल पर आने से अब और भी इंडस्ट्री उत्तर प्रदेश में अपनी जगह तलाश रही हैं।

सिर्फ एक तीर का निशान और 10000 km दूर अंटार्कटिका के भूगोल की सारी जानकारी: जानिए सोमनाथ मंदिर में स्थापित ‘बाण स्तंभ’ का रहस्य

भारत की पश्चिमी तटरेखा पर अरब सागर के किनारे स्थित सोमनाथ मंदिर प्राचीन हिंदू सभ्यता की गौरवशाली विरासत, अदम्य साहस और पुनर्जागरण का जीवंत प्रतीक है। भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माना जाता है।

सदियों से यह केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, वैज्ञानिक दृष्टि और सनातन परंपरा की अविचल शक्ति का साक्षी रहा है। इसी मंदिर परिसर में स्थित एक रहस्यमयी स्तंभ, बाण स्तंभ आज भी श्रद्धालुओं और इतिहासकारों के लिए जिज्ञासा का केंद्र बना हुआ है।

बाण स्तंभ: जहाँ आध्यात्म और विज्ञान का अद्भुत संगम

सोमनाथ मंदिर के दक्षिण दिशा में, समुद्र की ओर मुख किए खड़ा बाण स्तंभ प्राचीन भारत के वैज्ञानिक और भौगोलिक ज्ञान का अनोखा प्रमाण है। इस स्तंभ के शीर्ष पर एक गोलाकार संरचना है, जिसके आर-पार एक बाण (तीर) अंकित है, जो ठीक दक्षिण दिशा की ओर संकेत करता है।

‘भारत की समुद्री विरासत’ नामक पुस्तक का भाग

स्तंभ के निचले भाग पर संस्कृत में अंकित एक शिलालेख लिखा है, “आसमुद्रान्त दक्षिण ध्रुव पर्यंत अबाधित ज्योतिर्मार्ग” यानी  इस स्थान से लेकर दक्षिण ध्रुव (अंटार्कटिका) तक कोई पर्वत या अवरोधक नहीं है। यह कथन एक भौगोलिक सत्य है।

सोमनाथ तट से लेकर लगभग 10,000 किलोमीटर दूर अंटार्कटिका तक वास्तव में कोई बड़ा स्थलखंड या पर्वत नहीं आता। यह शिलालेख इस बात का प्रमाण है कि छठी शताब्दी के आसपास के भारतवासियों को पृथ्वी की दिशा, समुद्री मार्ग और भूगोल का गहरा ज्ञान था, वह भी उस युग में जब आधुनिक नेविगेशन उपकरणों का अस्तित्व नहीं था।

गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में वेरावल के समीप प्रभास पाटन में स्थित सोमनाथ मंदिर का उल्लेख शिव पुराण के 14वें अध्याय में मिलता है। यह स्थान कपिला, हिरण और पौराणिक सरस्वती नदियों के संगम के कारण त्रिवेणी संगम के नाम से भी प्रसिद्ध है।

सोमनाथ केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि सनातन धर्म की निरंतरता, विश्वास और सांस्कृतिक आत्मा का केंद्र है। समुद्र की लहरों के बीच खड़ा यह मंदिर सदियों से भारत की आध्यात्मिक चेतना का मार्गदर्शन करता आया है।

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व: 1000 वर्षों की संघर्षगाथा

जनवरी 2026 सोमनाथ मंदिर के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव है। इस वर्ष आक्रांता महमूद गजनवी द्वारा वर्ष 1026 में किए गए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। इसके बाद मंदिर पर कई बार आक्रमण हुए, इस्लामी आक्रांताओं द्वारा इसे ध्वस्त किया गया, लेकिन हर बार सोमनाथ अपने खंडहरों पर फिर से उठ खड़ा हुआ।

आजादी के बाद भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल, प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद और केएम मुंशी जैसे दूरदर्शी नेताओं के प्रयासों से मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ और 11 मई 1951 को इसे वर्तमान स्वरूप में राष्ट्र को समर्पित किया गया।

सोमनाथ की इसी हजार वर्षीय संघर्ष और पुनरुत्थान की यात्रा को स्मरण करते हुए सोमनाथ स्वाभिमान पर्व मनाया जा रहा है। 5 जनवरी 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अवसर पर एक विस्तृत लेख साझा किया, जिसमें उन्होंने सोमनाथ को भारत की आत्मा, स्वाभिमान और सनातन परंपरा की अमर पहचान बताया।

सोमनाथ मंदिर आज भी यह संदेश देता है कि आक्रमण हो सकते हैं, संरचनाएँ गिर सकती हैं, लेकिन भारत की आस्था, संस्कृति और चेतना को कभी नष्ट नहीं किया जा सकता।

पहले तोड़े हिंदू-जैन मंदिर, तब भरूच में खड़ी हुई जामा मस्जिद: जानिए क्या बताता है इतिहास, दस्तावेजों में सब दर्ज

भरूच शहर की जामा मस्जिद एक बार फिर विवादों के घेरे में है। दो दिन पहले, अखिल भारतीय संत समिति के संतों ने आरोप लगाया कि मस्जिद ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) से सुरक्षित होने के बावजूद वहाँ अवैध निर्माण किया गया है और पुरातत्व विभाग के नियमों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। संतों ने इन आरोपों के साथ धरना प्रदर्शन किया। आखिरकार पुलिस प्रशासन को बीच-बचाव करना पड़ा और कार्रवाई का भरोसा देते हुए दो महीने का समय माँगा। संतों ने भी पुलिस पर भरोसा जताते हुए धरना खत्म कर दिया है और अब गेंद पुलिस के पाले में है।

धरने और संतों की माँगों के बीच अब एक पुराना मुद्दा फिर से चर्चा में है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या भरूच की यह जामा मस्जिद मंदिर तोड़कर बनाई गई थी? क्या यहाँ अतीत में हिंदू और जैन मंदिर थे? इतिहास और उस दौर की किताबें इस बारे में क्या कहती हैं, आइए जानते हैं।

इसका सबसे हालिया जिक्र सीताराम गोयल की एडिट की हुई किताब ‘हिंदू टेंपल्स: व्हॉट हैपन्ड टू देम’ (Hindu Temples: What Happened to Them) में मिलता है। वैसे तो यह किताब मुख्य रूप से राम जन्मभूमि विवाद पर केंद्रित थी, लेकिन इसमें एक अलग हिस्सा उन मस्जिदों और धार्मिक ढाँचों का भी है, जिन्हें भारत में मंदिरों को नष्ट करके बनाया गया था। इस किताब में राज्य और जिले के हिसाब से ऐसी मस्जिदों की पूरी सूची दी गई है।

सीताराम गोयल की किताब की क्रमवार सूची में अगर हम गुजरात वाला हिस्सा खोलें और भरूच जिले को देखें, तो सबसे पहला नाम ‘जामा मस्जिद’ का ही आता है। इसमें उल्लेख है कि इस मस्जिद का निर्माण साल 1321 में किया गया था। साथ ही यह भी साफ लिखा गया है कि मस्जिद को बनाने में हिंदू और जैन मंदिरों की सामग्री (स्तंभ और अवशेष) का इस्तेमाल किया गया था।

इसी पुस्तक का दूसरा भाग है- ‘द इस्लामिक एविडेंस’ (The Islamic Evidence)। यहाँ भी भरूच की इस मस्जिद का जिक्र मिलता है। मुगल काल के दस्तावेजों का हवाला देते हुए लिखा गया है कि भरूच की जामा मस्जिद में हिंदू और जैन मंदिरों के खंभों का उपयोग हुआ है।

कई ऐतिहासिक दस्तावेज इस बात पर एकमत हैं कि भरूच की यह जामा मस्जिद अलाउद्दीन खिलजी के समय में बनी थी। खिलजी एक आक्रामक हमलावर था, जिसने भारत में हिंदुओं की आस्था पर चोट करते हुए कई मंदिरों को तोड़ा था। सोमनाथ मंदिर भी उन्हीं मंदिरों में से एक था।

प्रसिद्ध इतिहासकार अमीर खुसरो लिखते हैं कि साल 1300 में खिलजी ने गुजरात के मंदिरों को निशाना बनाया और इस काम के लिए उलुघ खान को गुजरात भेजा। उलुघ खान सबसे पहले सोमनाथ आया, यहाँ उसने मंदिर तोड़ा और जमकर लूटपाट की। इसके बाद वह खंभात की ओर बढ़ा। अमीर खुसरो के अनुसार, खंभात के बाद उसने तटीय इलाकों के कई शहरों में तबाही मचाई और मंदिर ध्वस्त किए। भरूच भी इन्हीं तटीय शहरों में से एक था।

1832 में UK में जन्में पुरातत्वविद (Archaeologist) जेम्स बर्गेस ने भारत में काफी काम किया। वे 1886 से 1889 तक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के महानिदेशक (DG) भी रहे। उससे पहले वे पश्चिमी भारत के पुरातत्व विभाग के निदेशक थे। उन्होंने पश्चिमी भारत के ऐसे कई ऐतिहासिक स्थलों का दौरा किया और जो कुछ देखा, उसे अपनी डायरी और किताबों में दर्ज किया।

जेम्स बर्गेस ने अपनी किताब ‘ऑन द मुहम्मडन आर्किटेक्चर ऑफ भरूच, खंभात, धोलका, चंपानेर एंड महमूदबाद इन गुजरात’ में भरूच की इस मस्जिद का विशेष उल्लेख किया है।

इस जगह का परिचय देते हुए जेम्स बर्गेस लिखते हैं कि लगभग 1297 के आसपास खिलजी के आदेश पर भरूच में हमले शुरू हुए थे। इन हमलों के दौरान हिंदू मंदिर निशाने पर थे। जैसा कि अन्य जगहों पर हुआ, भरूच में भी हिंदू और जैन मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया और उन्हीं मंदिरों की सामग्री (खंभों और पत्थरों) का उपयोग करके ‘जामा मस्जिद’ खड़ी की गई।

बर्गेस ने अपनी किताब में मस्जिद के नक्शे और तस्वीरों के साथ पूरी जानकारी दी है, जिससे यह बात और स्पष्ट होती है। निर्माण की बारीकियों बताते हुए बर्गेस कहते हैं कि मस्जिद के खंभों के बीच की दूरी एक समान नहीं है। कहीं यह दूरी 8 फीट है, कहीं 13 फीट, तो कहीं 10 फीट। माप में इस अंतर की वजह से मस्जिद के गुंबदों के आकार में भी कमियाँ रह गई थीं।

बर्गेस की किताब से आभार

बर्गेस लिखते हैं कि निर्माण में यह ऊँच-नीच इसलिए है क्योंकि इसमें हिंदू मंदिरों की सामग्री का इस्तेमाल किया गया था। मस्जिद की छत का कुछ हिस्सा पुराने जैन और हिंदू मंदिरों के छोटे गुंबदों से लिया गया है। वहीं, कुछ खंभों पर जानवरों की कलाकृतियाँ बनी हुई हैं, जो साफ तौर पर दर्शाती हैं कि ये स्तंभ हिंदू मंदिरों के थे।

मस्जिद की पिछली दीवार पर बनी ‘मेहराब’ (दीवार में अर्धगोलाकार जगह) का जिक्र करते हुए बर्गेस लिखते हैं कि इसकी बनावट गुजरात की सामान्य मस्जिदों जैसी नहीं है। यहाँ तक कि तीनों मेहराबों की निर्माण शैली भी एक-दूसरे से काफी अलग दिखाई देती है।

आगे वे आंगन (कोर्टयार्ड) के बारे में लिखते हुए बताते हैं कि प्रवेश द्वार पर लगा संगमरमर का दरवाजा स्पष्ट रूप से किसी जैन मंदिर का लगता है। इस पर जैन धर्म से जुड़ी आकृतियाँ भी दिखाई देती हैं। बर्गेस ने यह भी नोट किया है कि इनमें से ज्यादातर आकृतियों को जानबूझकर नष्ट कर दिया गया था।

बर्गेस की किताब से आभार

‘भरूच जिला डायरेक्टरी की रिपोर्ट’ नाम के एक दस्तावेज में लिखा है कि खिलजी के समय में प्राचीन शहर पर आक्रमण हुआ था और उसी दौरान जैन देरासर (मंदिर) पर कब्जा करके वहाँ मस्जिद बनाई गई थी।

इसी रिपोर्ट में मंदिरों की लिस्ट में ‘शामलिया विहार’ नाम के एक देरासर (मंदिर) का उल्लेख मिलता है, जिसके बारे में यह नोट किया गया है कि बाद में मुस्लिम शासकों के समय इसे भी तोड़कर मस्जिद बना दिया गया था।

भरूच जिला कलेक्टर की आधिकारिक वेबसाइट पर भी यह दर्ज है कि जामा मस्जिद का निर्माण प्राचीन जैन मंदिरों के अवशेषों से किया गया था। इसके अलावा, इसमें बताया गया है कि मस्जिद का अधिकांश हिस्सा मंदिर की सामग्री से बना है। वेबसाइट पर स्पष्ट रूप से लिखा गया है कि इसके पत्थर मंदिरों से लिए गए थे और इसकी ‘मेहराब’ में हिंदू मंदिर के चिह्न (निशान) मौजूद हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन तमाम दस्तावेजों और ऐतिहासिक साक्ष्यों में कहीं भी कोई विरोधाभास नहीं दिखता है। सभी की जानकारी एक-दूसरे से पूरी तरह मेल खाती है। यहाँ तक कि सरकारी वेबसाइट भी इन सभी तथ्यों की पुष्टि करती है।

यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती भाषा में लिखी गई है। मेघल सिंह परमार की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

आज तेल के लिए हो रहे युद्ध, कभी ‘पक्षियों की बीट’ के लिए बौराई थी दुनिया: पढ़िए जब स्पेन ने Bird Poop के लिए लड़ी जंग, अमेरिका कानून ही ले आया

संयुक्त राज्य अमेरिका ने 3 जनवरी 2026 को वेनेज़ुएला पर एक बड़ा सैन्य हमला किया, जिसे ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिज़ॉल्व’ नाम दिया गया। इस अभियान में अमेरिकी सेना ने 150 से अधिक विमानों, डेल्टा फ़ोर्स और अन्य विशेष सशस्त्र इकाइयों की मदद से वेनेज़ुएला की राजधानी काराकास में हवाई और जमीनी हमले किए। इसके बाद राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिसिलिया फ्लोरेस को हिरासत में लेकर अमेरिका भेज दिया गया। कई देशों ने इस कार्रवाई को राष्ट्रपति के अपहरण के समान बताया।

अमेरिकी सरकार का कहना है कि उसकी नाराज़गी मादुरो सरकार से इसलिए है क्योंकि वेनेज़ुएला में ड्रग्स और नार्को-आतंकवाद को बढ़ावा दिया गया। लेकिन दुनिया के बड़े हिस्से की राय है कि इस टकराव की असली वजह वेनेज़ुएला का विशाल तेल भंडार और उससे अमेरिकी कंपनियों को होने वाला आर्थिक लाभ है।

वैश्विक तेल भंडार

पिछले कई दशकों में दुनिया के अनेक युद्ध तेल के लिए लड़े गए हैं। हालांकि इतिहास बताता है कि संसाधनों को लेकर संघर्ष हमेशा तेल तक सीमित नहीं रहे हैं। आज जब वैश्विक ध्यान दक्षिण अमेरिका पर है, तो यह जानना रोचक है कि कभी इसी क्षेत्र में एक युद्ध तेल के लिए नहीं, बल्कि पक्षियों की बीट—जिसे गुआनो कहा जाता है—जैसे संसाधन के लिए लड़ा गया था।

यदि कोई यह मानता है कि अमेरिका का ऐसा आक्रामक रवैया हाल की घटना है, तो इतिहास इससे अलग तस्वीर पेश करता है। अन्य औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी शक्तियों की तरह अमेरिका भी लंबे समय से प्राकृतिक संसाधनों पर गहरी नजर रखता रहा है। कई बार उसने नैतिकता को पीछे छोड़कर अपने हितों को प्राथमिकता दी। इसी कारण एक समय में अमेरिका ने न केवल सोना और चाँदी, बल्कि पक्षियों और चमगादड़ों की बीट तक को भी ‘राष्ट्रीय हित’ का विषय माना।

पक्षियों के मल क्यों आते थे काम

यह दिलचस्प ऐतिहासिक कहानी 19वीं सदी के मध्य के अमेरिका से जुड़ी है। उस समय अमेरिका में खेती तेजी से फैल रही थी। किसान अब सिर्फ अपने खाने भर की खेती नहीं कर रहे थे, बल्कि बाजार और मुनाफे पर आधारित खेती हर जगह शुरू हो चुकी थी। बड़े-बड़े प्लांटेशन अभी भी मौजूद थे, जहाँ ग़ुलामों से काम लिया जाता था, और यह व्यवस्था अटलांटिक दास व्यापार से जुड़ी हुई थी। खेती का पूरा औद्योगीकरण और उसका वैज्ञानिक ज्ञान अभी आने में कई दशक बाकी थे।

इस मुनाफा-केंद्रित खेती के साथ एक गंभीर समस्या सामने आने लगी। हरके बाद पैदावार घटने लगी। 1850 तक अमेरिका के चौथे-पाँचवें खेतों की जमीन अपनी उपजाऊ शक्ति खोने लगी थी। ऐसा लगने लगा कि लगातार ज्यादा मुनाफा कमाने की लालच किसानों से उनकी मिट्टी की ताकत छीन रही है।

साम्राज्यों का तर्क सीधा और कठोर होता है, मुनाफा लगातार बढ़ना चाहिए। लेकिन बढ़ते मुनाफे के लिए ज्यादा संसाधनों की जरूरत होती है और कई बार ये संसाधन देश की सीमाओं के बाहर होते हैं। जब किसी चीज की कमी होने लगती है, तो वही चीज रणनीतिक संसाधन बन जाती है।

इसी दौर में एक ऐसी चीज अचानक बेहद कीमती बन गई, जिससे आज ज्यादातर लोग दूरी बनाए रखना पसंद करते हैं। जो चीज आज हमारी बालकनियों को गंदा कर देती है, वही 19वीं सदी में दुनिया भर की चाहत बन गई। यह चीज अंतरराष्ट्रीय कानून, नौसेना की तैनाती और यहाँ तक कि युद्धों का कारण बनी।

यह पदार्थ था गुआनो समुद्री पक्षियों और चमगादड़ों की सूखी बीट, जिसे पीसकर खेतों में खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। गुआनो मुख्य रूप से गरम और सूखे, बिना आबादी वाले द्वीपों से मिलता था, जो मध्य अमेरिका और प्रशांत महासागर में स्थित थे।

दिलचस्प बात यह थी कि बाजार और मुनाफे की खेती से पैदा हुई समस्या का समाधान भी उसी बाजार में मौजूद था। अमेरिकी किसानों के लिए मिट्टी की उर्वरता लौटाने का जवाब गुआनो बना और इसी ने आगे चलकर पूरी दुनिया की राजनीति और युद्धों को प्रभावित किया।

गुआनो: दुनिया का सबसे असंभावित चमत्कारी पदार्थ

आज सुनने में गुआनो किसी साम्राज्य की नींव जैसा नहीं लगता, लेकिन 19वीं सदी में यह बेहद कीमती संसाधन था। गुआनो में नाइट्रोजन, फॉस्फेट और पोटैशियम भरपूर मात्रा में होते हैं। यही तीन तत्व आज भी NPK खाद के मुख्य घटक हैं। इस वजह से गुआनो एक चमत्कारी जैविक खाद माना जाता था, जो बंजर मिट्टी को फिर से उपजाऊ खेत में बदल देता था।

गुआनो का असर इतना जबरदस्त था कि कई जगहों पर फसल की पैदावार कई गुना बढ़ गई। उस दौर में जब कृषि पूरी अर्थव्यवस्था की रीढ़ थी और बारूद बनाने के लिए नाइट्रेट्स (खासकर पोटैशियम) की जरूरत होती थी, तब गुआनो दोहरा फायदा देने वाला रणनीतिक संसाधन बन गया खेती के लिए भी और सैन्य ताकत के लिए भी।

इसी कारण औपनिवेशिक शक्तियाँ, जो ज्यादा उत्पादन और सैन्य बढ़त चाहती थीं, गुआनो पर कब्जा जमाने के लिए आपस में होड़ करने लगीं। लेकिन गुआनो हर जगह नहीं मिलता था। इसके भंडार बहुत दुर्लभ थे और दुनिया के कुछ गिने-चुने, दूरदराज़ और निर्जन द्वीपों तक सीमित थे।

ये द्वीप सैकड़ों, बल्कि हजारों वर्षों तक इंसानों की पहुँच से बाहर रहे। इसी वजह से वहाँ समुद्री पक्षियों की बीट की परतें एक के ऊपर एक जमा होती गईं। समय के साथ ये परतें सख़्त होकर चट्टानों जैसी बन गईं और इन्हीं से विशाल गुआनो भंडार तैयार हुए।

इन द्वीपों की जलवायु भी गुआनो को ताक़तवर बनाने में मददगार थी। गर्म और सूखा मौसम, और बहुत कम बारिश, इसके पोषक तत्वों को बहने से बचाता था। इसी कारण इनमें मौजूद तत्व लंबे समय तक सुरक्षित रहते थे।

आज के नज़रिए से यह बात अजीब लग सकती है कि देश कभी पक्षियों की बीट के लिए युद्ध करें। लेकिन उन्नीसवीं सदी के रणनीतिकारों के लिए यह हँसने की नहीं, बल्कि बेहद गंभीर और ज़रूरी बात थी।

सदियों से पक्षियों के मल से ढके द्वीप

वो चट्टानें जिसकी कीमत पहले किसी ने नहीं समझी, बाद में युद्ध हुआ

पेरू के तट के पास स्थित द्वीपों पर उच्च गुणवत्ता का गुआनो बनने के लिए बिल्कुल अनुकूल परिस्थितियाँ थीं। इसी वजह से पेरू का गुआनो दुनिया में सबसे ज्यादा कीमती माना जाता था, क्योंकि उसमें पोषक तत्वों की मात्रा सबसे अधिक थी। औपनिवेशिक ताकतें इन गुआनो द्वीपों को सोने की खान की तरह देखती थीं। इनमें सबसे प्रसिद्ध थे चिंचा द्वीप (Chincha Islands), जो पेरू के समुद्र तट से कुछ दूरी पर स्थित हैं।

ये द्वीप बंजर, तेज हवाओं से घिरे और पूरी तरह निर्जन थे। पहली नजर में ये चट्टानी टापू बिल्कुल बेकार लगते थे। लेकिन इन्हीं परिस्थितियों की वजह से यहाँ बेहद बड़ी मात्रा में सबसे शुद्ध और ताकतवर गुआनो जमा हो पाया था। यह गुआनो सालों तक खेती की उत्पादकता बनाए रखने और उससे मिलने वाली आय के लिए काफी था, इतना कि इसने साम्राज्यों को ईर्ष्या में डाल दिया।

स्पेन, जिसकी अमेरिका पर पकड़ 19वीं सदी की शुरुआत से ही कमजोर पड़ रही थी, उसने इसमें अपना मौका देखा। 14 अप्रैल 1864 को स्पेन ने चिंचा द्वीपों पर कब्जा कर लिया और वहाँ से गुआनो निकालना शुरू कर दिया, ताकि अपनी खराब होती आर्थिक हालत को संभाला जा सके। लेकिन पेरू और उसके पड़ोसी देश गुआनो की कीमत को अच्छी तरह समझते थे और वे स्पेन को यह खजाना बिना विरोध के देने को तैयार नहीं थे।

नतीजा यह हुआ कि पेरू, चिली, इक्वाडोर और बोलीविया की संयुक्त सेनाओं ने स्पेन को चिंचा द्वीपों से पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। सुनने में अजीब जरूर लग सकता है कि इतिहास में कैसे ये अनोखा संघर्ष हुआ जहाँ पक्षियों की बीट को लेकर लड़ाई हुई। लेकिन उस समय इस युद्ध में शामिल देशों के लिए मामला बेहद गंभीर था। गुआनो की बिक्री से सेनाओं को पैसा मिलता था, व्यापार चलता था और कई देशों की आर्थिक हालत इसी पर टिकी हुई थी।

पेरू के तट के पास स्थित चिनचा द्वीप

USA ने उठाया फायदा

इन युद्धों को देखते हुए, अमेरिका ने इसका पहले ही हल निकाला। 1856 में अमेरिकी कॉन्ग्रेस ने गुआनो आइलैंड्स एक्ट नाम का एक कानून पास किया, जो आज भी लागू है। आज यह कानून अजीब लग सकता है, लेकिन उस समय अमेरिकी नेताओं को यह पूरी तरह व्यावहारिक लगा।

इस कानून के तहत किसी भी अमेरिकी नागरिक को यह अधिकार मिल गया कि वह गुआनो से भरपूर किसी निर्जन द्वीप पर अमेरिका की ओर से दावा कर सके। इसके बाद अमेरिकी नागरिक समुद्र यात्राओं पर निकले, गुआनो वाले द्वीप खोजे और उन्हें अमेरिकी क्षेत्र घोषित किया।

1857 में अमेरिका ने 22 तोपों से लैस एक युद्धपोत भेजा, ताकि इन नए दावा किए गए द्वीपों से गुआनो इकट्ठा किया जा सके और उसकी जाँच की जा सके। इसी तरीके से कैरेबियन सागर और प्रशांत महासागर में दर्जनों द्वीपों पर अमेरिका ने दावा किया। वहाँ अमेरिकी झंडे लगाए गए और प्राकृतिक संसाधन निकाले गए।

इन द्वीपों पर बसावट आमतौर पर स्थायी नहीं होती थी। उद्देश्य साफ था गुआनो को अमेरिका भेजो, मुनाफा कमाओ और फिर अगला द्वीप खोजो। अमेरिकी रवैया बेहद व्यावहारिक और सरल था, जहाँ गुआनो है, वहाँ अमेरिका का हित है। गुआनो आइलैंड्स एक्ट के तहत अमेरिका ने सौ से भी ज्यादा द्वीपों पर दावा किया। लेकिन जैसे ही गुआनो खत्म हुआ, ज्यादातर द्वीपों को छोड़ दिया गया।

अमेरिकी गुआनो द्वीप

जिस तरह गुआनो का महत्व अचानक बढ़ा था, उसी तरह वह जल्दी ही खत्म भी हो गया। वैज्ञानिक प्रगति के साथ यह समझ में आ गया कि गुआनो फसलों की पैदावार क्यों बढ़ाता है। इसके पीछे नाइट्रोजन और फॉस्फोरस की भूमिका साफ हो गई।

इसके बाद कृत्रिम (सिंथेटिक) उर्वरकों का उत्पादन शुरू हुआ, जिनसे बड़ी मात्रा में नाइट्रोजन और फॉस्फोरस मिलने लगे। अब कुछ टन पक्षियों की बीट के लिए युद्धपोत भेजने, कूटनीतिक तनाव पैदा करने या तोपें चलाने की जरूरत नहीं रही।

शुरुआत में गुआनो की जगह बोन मील, पिसा हुआ फॉस्फेट पत्थर जैसे विकल्प इस्तेमाल होने लगे। फिर 1910 के दशक में हैबर प्रक्रिया आने के बाद यूरिया खाद आम हो गई।

इतिहासकारों के लिए इसमें एक रोचक सबक है, जिस संसाधनके लिए कभी युद्धों और कानूनों को सही ठहराता था, वह कुछ ही दशकों में बेकार हो गया। बड़े-बड़े साम्राज्यों ने खुद को बदला, नई दिशा अपनाई और आगे बढ़ गए। पीछे रह गए खाली पड़े द्वीप, जिन पर अब भी सफेद, चॉक जैसी परतें जमी हैं, जो इतिहास की अजीब विडंबनाओं की याद दिलाती हैं।

पूरी बात को समझने के लिए गुआनो युग की एक छोटी समय रेखा पर नजर डालना जरूरी है। 1840 के दशक के आसपास यूरोप में मिट्टी की उर्वरता कम होने लगी थी। 1840 से 1860 के बीच पेरू के गुआनो से भरे द्वीपों को बड़े पैमाने पर खोदकर खाली किया गया।

1856 में अमेरिका ने गुआनो आइलैंड्स एक्ट लागू किया। 1864 से 1866 के बीच स्पेनिश साम्राज्य और उसकी पूर्व उपनिवेशों के बीच चिनचा द्वीपों को लेकर युद्ध हुआ। फिर 1800 के दशक के अंत तक दुनिया ने पक्षियों की बीट यानी गुआनो को लगभग नज़रअंदाज़ कर दिया और कृत्रिम उर्वरकों की ओर बढ़ गई।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रारब्ध राय ने लिखी है जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)

आज ट्रंप के बयानों को सुन कॉन्ग्रेस कर रही देश के PM का अपमान, कभी मनमोहन सिंह के लिए नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान को दिखा दी थी औकात: क्या पुराना वक्त भूल गए ‘चमचे’

इन दिनों डोनाल्ड ट्रंप का आक्रामक और अस्थिर मिजाज दुनियाभर में तनाव का कारण बना हुआ है। लेकिन चिंता की बात यह है कि भारत को लेकर भी उनका रवैया लगातार तल्ख होता जा रहै। जहाँ ट्रंप अपने से कमजोर देशों पर सीधे कार्रवाई करने से नहीं हिचक रहे, वहीं भारत जैसे सशक्त और आत्मनिर्भर देश के मामले में वह बयानबाजी के जरिए माहौल गरम करने की कोशिश कर रहे हैं।

स्थिति तब और खराब हो जाती है जब ट्रंप की इस बयानबाजी को देश की विपक्षी पार्टियाँ अपने राजनीतिक हितों के लिए भुनाने लगती हैं। भारत पर दूसरे देशों की टिप्पणियों को आधार बनाकर वे सरकार पर हमला बोलने लगती हैं, बिना यह सोचे कि इससे अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश की प्रतिष्ठा को ही नुकसान पहुँच सकता है।

विपक्ष का यह रवैया हाल के दिनों में और अधिक स्पष्ट हुआ है, जब डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर दिए गए बयानों का इस्तेमाल सोशल मीडिया पर उनकी छवि को कमजोर करने के लिए किया गया। हैरानी की बात यह है कि कॉन्ग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेता भी अमेरिका के संदर्भ में अपने ही प्रधानमंत्री को कमतर दिखाने से पीछे नहीं रहे, जो राजनीतिक विरोध की सामाओं को पार कर देता है।

दरअसल, हाल ही में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यक्तिगत तौर पर भारत की लंबित रक्षा सौदे और व्यापारिक मुद्दों में उनसे बात की। ट्रंप ने कहा, “भारत ने अपाचे हेलीकॉप्टर का ऑर्डर दिया था, लेकिन 5 सालों तक डिलीवरी नहीं हुई। प्रधानमंत्री मोदी मुझसे मिलने आए थे। महोदय, क्या मैं आपसे मिल सकता हूँ?” डोनाल्ड ट्रंप ने आगे पीएम नरेंद्र मोदी के साथ उनके मजबूत संबंध बताते हुए कहा, “मेरा उनके साथ बहुत अच्छा रिश्ता है।”

ट्रंप के बयान पर कॉन्ग्रेस ने चलाया प्रोपेगेंडा

ट्रंप के इस बयान को कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम ने प्रोपेगेंडा का रूप देकर सोशल मीडिया पर परोसा। वो भी बयान के एक अधूरा हिस्से को उठाकर, जिसमें ट्रंप ने पीएम मोदी की बात करते हुए कहा- ‘क्या मैं आपसे मिल सकता हूँ?’ इस अधूरे बयान से प्रधानमंत्री की आलोचना को लेकर धड़ाधड़ पोस्ट किए गए। प्रधानमंत्री मोदी पर विदेशों में भारत की बेइज्जती करवाने के आरोप लगाए गए। खासतौर पर राहुल गाँधी के ‘नरेंदर-सरेंडर’ वाले वीडियो से कॉन्ग्रेस ने प्रधानमंत्री का मजाक उड़ाया।

कॉन्ग्रेस की वरिष्ठ नेता सुप्रिया श्रीनाते ने कहा, “नेपाल, बांग्लादेश संभल नहीं रहा है। चीन का नाम ले नहीं पाते। अमेरिका में ‘सर सर’ करते मिमिया रहे हैं, इनसे कोई भी उम्मीद करना बेमानी है। मैंने किसी का नाम नहीं लिया- लेकिन सब जानते हैं वो कौन है वैसे बौखलाए भक्त अभी खुद ही दास्तान बयां करेंगे।”

कॉन्ग्रेस के छात्र संगठन (NSUI) ने कहा, “इनका इतिहास ही “I am sorry, Sir” से शुरू हुआ था। उसी कायर विरासत को प्रधानमंत्री मोदी आगे बढ़ा रहे हैं- हाथ जोड़कर ट्रंप के सामने “May I see you, Sir” की याचना करते हुए। जो देश कभी सातवें बेड़े के सामने डटकर खड़ा था, आज उसका प्रधानमंत्री दुनिया भर में रोज-रोज ट्रंप से बेइज्जती कराने के नए कीर्तिमान रच रहा है।”

कॉन्ग्रेसी प्रोपेगेंडा को बढ़ावा देने वाले मोहित चौहान कहते हैं, “लेकिन अब वे मुझसे नाराज हैं क्योंकि मैंने रूस पर भारी टैरिफ लगाकर भारत को रूस से तेल खरीदने से रोक दिया है। ट्रंप रोजाना भारत का अपमान करते हैं, लेकिन मोदी उनसे इतना डरते हैं कि एक शब्द भी नहीं बोलते। भारत को राहुल गाँधी जैसे सशक्त और शिक्षित प्रधानमंत्री की जरूरत है।”

ट्रंप के बयान के अधूरे हिस्से से गढ़ा नैरेटिव

कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम ने डोनाल्ड ट्रंप के बयान के केवल एक हिस्से को चुनकर सोशल मीडिया पर नैरेटिव गढ़ा। ट्रंप के बयान के उन शब्दों पर फोकस किया गया, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी इज्जत से बात कर केवल एक सवाल पूछ रहे हैं। ट्रंप ने इस बयान को इस तरह पेश किया, मानो भारत के प्रधानमंत्री विदेशी ताकतों के सामने कमजोर पड़ गए हों।

असलियत यह है कि ट्रंप ने उसी बयान में अगली ही पंक्ति में साफ कहा कि वे और प्रधानमंत्री काफी अच्छे दोस्त हैं। यह तथ्य कॉन्ग्रेस के इस प्रोपेगेंडा में जानबूझकर नजरअंदाज कर दिया गया, क्योंकि पूरी बात सामने आ जाती तो बनाया गया नैरेटिव टिक ही नहीं पाता। साफ है कि सच को पूरा बताने के बजाए अधूरे बयान को हथियार बनाकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की गई।

अंतरराष्ट्रीय छवि को दरकिनार कर प्रधानमंत्री के लिए वही आपत्तिजनक भाषा

प्रोपेगेंडा फैलाने की जल्दबाजी में यह भी नहीं सोचा गया कि इसका असर कहीं न कहीं देश की अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी पड़ सकता है। प्रधानमंत्री को निशाना बनाते हुए की गई बयानबाजी में यह विचार तक नहीं किया गया कि विदेश नीति जैसे संवेदनशील मुद्दों पर गैर-जिम्मेदार टिप्पणियाँ भारत की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचा सकती हैं। राजनीतिक विरोध के नाम पर संयम और मर्यादा दोनों को दरकिनार कर दिया गया।

यहाँ तक कि राहुल गाँधी द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए इस्तेमाल किए गए आपत्तिजनक शब्द ‘नरेंद्र-सरेंडर’ को प्रतिक्रिया के तौर पर बड़े पैमाने पर फैलाया गया। यह पहली बार नहीं है, जब प्रधानमंत्री की आलोचना आपत्तिजनक भाषा में की गई हो, लेकिन इस बार मामला देश की सीमाओं से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँच गया। यही वजह है कि यह विवाद केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि देश की साख से जुड़ा सवाल बन गया।

नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री पद का सम्मान, कॉन्ग्रेस को नहीं बूझेगा

दूसरी ओर नरेंद्र मोदी हैं, जिन्होंने प्रधानमंत्री पद का सम्मान हमेशा बरकरार रखा। एक बार पाकिस्तान में जब नवाज शरीफ ने तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को ‘देहाती महिला’ कहा था। उस समय पीएम मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे और खुद प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे। लेकिन नवाज शरीफ की इस टिप्पणी पर वह चुप नहीं बैठे, बल्कि कड़ा विरोध दर्ज किया।

पीएम मोदी ने कहा था, “आप मेरे प्रधानमंत्री को देहाती महिला कैसे कह सकते हैं। भारत के प्रधानमंत्री को देहाती महिला कैसे कह सकते हैं। भारत के प्रधानमंत्री का इससे अधिक अपमान और नहीं हो सकता। हम राजनीति के विषय पर उनसे लड़ सकते हैं लेकिन इसे बर्दाश्त नहीं कर सकते। सवा सौ करोड़ लोगों का यह देश अपने प्रधानमंत्री का अपमान बर्दाश्त नहीं करेगा।”

इससे साफ होता कि पीएम नरेंद्र मोदी अपने देश के प्रधानमंत्री का कितना सम्मान करते हैं। वह भी तब जब वह खुद उसी विपक्षी पार्टी के सामने चुनाव लड़ रहे हैं। साफ है कि भारत की आंतरिक राजनीति जैसी भी हो, लेकिन विदेशों में जाकर भारत और उसके प्रधानमंत्री का अपमान करना गलत है। लेकिन राहुल गाँधी और उनका कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम इसे समझने में असमर्थ है। इसीलिए राहुल गाँधी आए दिन विदेशों में जाकर भारत के आंतरिक मुद्दों पर बात करते हुए देश की मौजूदा सरकार और उसके प्रधानमंत्री को कोसते हैं।

ये इन दोनों पार्टियों की मानसिकता का सबूत है कि कॉन्ग्रेस कैसे प्रोपेगेंडा और राजनीतिक हित के लिए किसी भी हद तक जा सकता है, जबकि बीजेपी ने हमेशा प्रधानमंत्री पद का सम्मान किया है, यह देखे बिना की उस पद पर विपक्षी दल का व्यक्ति ही क्यों न हो।

‘मौत का सौदागर’ से लेकर ‘मोदी तेरी कब्र खुदेगी’ तक लगातार रिसता रहा है कॉन्ग्रेस-वामपंथ का जहर, लोकतंत्र में चुने हुए PM से यह कैसी घृणा?

दिल्ली की हवाओं में जब भी राजनीति का पारा चढ़ता है, कुछ खास तरह के नारे गूँजने लगते हैं। वर्ष 2022 से लेकर 2026 की शुरुआत तक, देश के विभिन्न हिस्सों- चाहे वह JNU का कैंपस हो, कॉन्ग्रेस की रैलियाँ हों या पहलवानों का धरना, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ ‘मोदी तेरी कब्र खुदेगी’ और ‘मौत’ जैसे आपत्तिजनक नारे एक पैटर्न की तरह सामने आए हैं। बता दें कि गालियों की इस फेहरिस्त की शुरुआत गुजरात में कॉन्ग्रेस नेता सोनिया गाँधी की ‘मौत के सौदागर’ से शुरू हुई थी।

2026: जेएनयू में ‘मोदी-शाह कब्र खुदेगी’ के नारों की गूँज

वामपंथी विचारधारा का गढ़ कहे जाने वाले जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के लिए विवाद और नारे कोई नई बात नहीं हैं। 5 जनवरी 2026 की रात एक बार फिर साबरमती हॉस्टल के बाहर ‘रेजिस्टेंस’ के नाम पर हुजूम जुटा। बहाना था 2020 की हिंसा की बरसी, लेकिन असली मकसद कुछ और ही निकला। जैसे ही खबर आई कि उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है, वैसे ही वहाँ मौजूद छात्र-छात्राओं का स्वर बदल गया।

देखते ही देखते कैंपस ‘मोदी-शाह की कब्र खुदेगी’ के नारों से गूँज उठा। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसे सुप्रीम कोर्ट की अवमानना और लोकतंत्र पर हमला बताते हुए पुलिस से FIR दर्ज करने की माँग की है। यह जेएनयू की वही पुरानी फितरत है जहाँ शिक्षा के मंदिर को राजनीतिक अखाड़ा बनाकर देश के शीर्ष नेतृत्व के लिए कब्रें खोदी जाती हैं।

2025: रामलीला मैदान में कॉन्ग्रेस का ‘नफरती’ राग

साल 2025 में भी यही कहानी दोहराई गई। मौका था दिल्ली के रामलीला मैदान में कॉन्ग्रेस की ‘वोट चोरी’ के खिलाफ रैली का। कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के बीच से वही शब्द निकले- ‘मोदी, तेरी कब्र खुदेगी।’ हैरानी की बात यह थी कि मंच पर बड़े नेता मौजूद थे और नीचे कार्यकर्ताओं के साथ महिला विंग की पदाधिकारी भी सुर में सुर मिला रही थीं।

भाजपा ने इसे ‘अर्बन नक्सलियों’ की भाषा बताया और कहा कि कॉन्ग्रेस अब ‘मुस्लिम लीग नक्सलवादी पार्टी’ जैसी भाषा बोल रही है। संवैधानिक संस्थाओं को डराने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त की तस्वीरों को कैदी के रूप में दिखाया गया। यह वही दौर था जब राजनीति के मंच से सीधे तौर पर प्रधानमंत्री की मौत की कामना की जा रही थी।

2023: पहलवान प्रदर्शन और पवन खेड़ा की गिरफ्तारी का ‘इत्तेफाक’

2023 में यह नफरती नारा दो बड़े मंचों पर दिखा। फरवरी में जब कॉन्ग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा को दिल्ली एयरपोर्ट पर विमान से उतारा गया और गिरफ्तार किया गया, तब वहाँ मौजूद राज्यसभा सांसद और बड़े नेताओं के सामने कार्यकर्ताओं ने जमीन पर बैठकर चिल्लाना शुरू किया- ‘मोदी तेरी कब्र खुदेगी।’

यही नहीं, अप्रैल 2023 में जब जंतर-मंतर पर पहलवानों का धरना चल रहा था, तब विनेश फोगाट और अन्य प्रदर्शनकारियों की मौजूदगी में भीड़ ने फिर से वही ‘मोदी तेरी कब्र खुदेगी’ वाला राग छेड़ा। खेल के मैदान से न्याय की माँग करने वाले मंचों पर अचानक इस तरह के नारों का घुस आना यह बताता था कि पर्दे के पीछे कोई और है जो इन नारों की स्क्रिप्ट लिख रहा है।

2022: ‘हिटलर की मौत’ और ‘कुत्ते की मौत’ वाला घटिया स्तर

नफरत के इस इतिहास में 2022 का साल सबसे ज्यादा विवादास्पद रहा। ‘अग्निपथ योजना’ के विरोध के दौरान पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोध कांत सहाय ने सारी मर्यादाएँ लांघ दीं। उन्होंने सरेआम कहा, “मोदी हिटलर की राह चलेगा तो हिटलर की मौत मरेगा।”

मौत की कामना करने का यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। महाराष्ट्र में नागपुर में कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष शेख हुसैन ने और भी आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘जैसे कुत्ते की मौत होती है, वैसे ही नरेंद्र मोदी की मौत होगी।’ इन बयानों के बाद भाजपा की तरफ से देशभर में विरोध प्रदर्शन किए गए थे और कई जगह FIR दर्ज हुई।

लोकतंत्र में ‘कब्र’ की भाषा कितनी सही?

प्रधानमंत्री के खिलाफ पिछले चार-पांच सालों का यह ‘नारा संकलन’ (Compilation) एक खतरनाक ट्रेंड को दर्शाता है। 2007 के ‘मौत के सौदागर’ वाले बयान से शुरू हुआ यह सफर 2026 के ‘कब्र खुदेगी’ तक पहुँच गया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में मतभेद का इजहार सिर्फ मौत और कब्र के नारों से ही मुमकिन है? जेएनयू से लेकर रामलीला मैदान तक लगने वाले ये आपत्तिजनक नारे आज भी गवाह हैं कि राजनीति किस कदर व्यक्तिगत नफरत की आग में झुलस रही है।

ASI संरक्षित स्मारक, फिर भी हुआ अवैध निर्माण: भरूच की ‘जामा मस्जिद’ को लेकर अनशन पर बैठे संत, कहा- यह जैन मंदिर और चक्रधर स्वामी की जन्मस्थली

गुजरात के भरूच में पायनियर स्कूल के सामने स्थित जामा मस्जिद इन दिनों विवाद का केंद्र बन गई है। अखिल भारतीय संत समिति के संतों ने इस मस्जिद को लेकर विरोध शुरू किया है। उनका दावा है कि यह जगह दरअसल एक प्राचीन जैन मंदिर है और यहीं चक्रधर स्वामी का जन्म हुआ था। संत समिति का आरोप है कि यह मस्जिद भारतीय पुरातत्व विभाग (ASI) के संरक्षण में होने के बावजूद यहाँ नियमों के खिलाफ अवैध निर्माण किया गया है। पूरे मामले को देखते हुए भरूच के एसपी मौके पर पहुँचे और ASI अधिकारियों व संत समिति के प्रतिनिधियों से बातचीत की। उन्होंने सभी मुद्दों पर चर्चा कर सर्वे कराने का भरोसा दिया।

अखिल भारतीय संत समिति ने सोमवार (5 जनवरी 2025) को शक्तिनाथ मैदान में धरना दिया। संतों ने कहा कि जब तक ASI सख्त कार्रवाई नहीं करता, तब तक वे पानी भी नहीं पिएँगे। इससे पहले भी संत समिति इस जामा मस्जिद को समली विहार जैन मंदिर और चक्रधर स्वामी की जन्मस्थली बता चुकी है। वर्तमान में इस जामा मस्जिद में दिन में 5 वक्त की नमाज होती है और यहाँ मदरसे में बच्चों को शिक्षा भी दी जाती है।

बताया जाता है कि करीब 1905 में पुरातत्व विभाग ने इस मस्जिद को अपने अधीन ले लिया था और इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया था। हालाँकि, संत समिति का कहना है कि इसके बावजूद यहाँ नियमों के खिलाफ निर्माण और गतिविधियाँ हो रही हैं। संतों का आरोप है कि मुस्लिम समुदाय के कुछ लोग कानून का उल्लंघन कर इस ऐतिहासिक स्थल की असली पहचान बदलने की कोशिश कर रहे हैं।

इस मामले को लेकर संतों ने विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने माँग की कि इस जगह को उसकी पुरानी मूल स्थिति में वापस लाया जाए और यहाँ चल रही सभी अवैध गतिविधियों को तुरंत रोका जाए। अखिल भारतीय संत समिति के अध्यक्ष संत अविचल देवाचारी ने कहा कि यह एक ऐतिहासिक धरोहर स्थल है और यहाँ किसी भी तरह का दूसरा धार्मिक या सांस्कृतिक चिह्न नहीं है।

उन्होंने कहा कि जब पुरातत्व विभाग ने इस स्थल को अपने कब्जे में ले रखा है, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी भी उसी की है। अगर यहाँ कोई गतिविधि चल रही है तो उसे रोका जाना चाहिए। संतों ने यह भी माँग की कि जो भी नया निर्माण पहले मौजूद नहीं था और बाद में किया गया है, उसे तुरंत हटाया जाए। संत अविचल देवाचारी ने कहा कि सभी संतों और हिंदू समाज की यही माँग है कि इस स्थल को सिर्फ एक पुरातात्विक स्मारक के रूप में ही संरक्षित रखा जाए।

संतों ने क्या कहा?

‘ऑपइंडिया’ से बात करते हुए आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अखिल भारतीय संत समाज के संन्यासी स्वामी मुक्तानंद ने कहा कि भरूच के हेड पोस्ट ऑफिस के पास स्थित यह जामा मस्जिद असल में पहले समली विहार जैन मंदिर के नाम से जानी जाती थी और यहीं चक्रधर स्वामी का जन्म हुआ था। उन्होंने बताया कि यह ऐतिहासिक स्थल भारत सरकार की संपत्ति है और ASI के संरक्षण में आने वाला राष्ट्रीय स्मारक है। ऐसे में इसमें किसी भी तरह का बदलाव करना कानूनन अपराध है। इसके बावजूद यहाँ नियमों का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है।

स्वामी मुक्तानंद ने कहा कि देश में ASI के संरक्षण में करीब 3800 स्मारक हैं, जिनमें से लगभग 820 स्मारक ‘लिविंग मॉन्यूमेंट’ यानी जीवित स्मारक माने जाते हैं। उन्होंने भोजशाला में माता सरस्वती मंदिर और काशी का ज्ञानवापी मंदिर का उदाहरण देते हुए कहा कि ये दोनों भी संरक्षित जीवित स्थल हैं और वहाँ कानून के अनुसार कोई बदलाव नहीं किया गया। उसी तरह भरूच का यह स्थल भी जीवित स्मारक की श्रेणी में आता है।

उन्होंने साफ कहा कि कानून के मुताबिक किसी भी जीवित स्मारक में एक कील तक ठोंकना गैरकानूनी है। इसके बावजूद भरूच की जामा मस्जिद में वजूखाना बनाया गया है, पंखे, लाइटें, बोर्ड लगाए गए हैं और मदरसे से जुड़ा सामान भी वहाँ रखा गया है, जो सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन है।

उन्होंने आगे कहा कि अगर कोई स्थल ‘जीवित स्मारक’ है, तो वहाँ पूजा या नमाज की अनुमति हफ्ते में सिर्फ एक दिन होती है, जैसे ताजमहल में केवल शुक्रवार को नमाज की इजाजत है। उन्होंने बताया कि एक समय कुछ लोगों ने ताजमहल में दिन में 5 वक्त नमाज पढ़ने की कोशिश की थी जिसके बाद ASI ने अदालत का रुख किया और उसे रुकवाया। इसी तरह भोजशाला में भी मंगलवार को ही पूजा की अनुमति है। हफ्ते में केवल एक दिन ही धार्मिक गतिविधि की इजाजत होती है लेकिन भरूच की जामा मस्जिद में इन नियमों का लगातार उल्लंघन हो रहा है।

उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे संरक्षित स्मारकों में कुछ समय के लिए पूजा या नमाज की जा सकती है लेकिन वहाँ कोई धार्मिक चिन्ह नहीं रखा जा सकता। पूजा या नमाज तो हो सकती है लेकिन कोई निर्माण या स्थाई ढाँचा बनाना पूरी तरह मना है। उनके अनुसार भरूच की जामा मस्जिद में इन सभी नियमों को नजरअंदाज किया गया है और इस संरक्षित स्थल के अंदरूनी हिस्से को पूरी तरह एक मस्जिद की तरह बना दिया गया है, जो आमतौर पर किसी भी संरक्षित स्मारक में नहीं होता।

उन्होंने यह भी कहा कि कानून के मुताबिक इस स्मारक के 100 मीटर के दायरे में कोई भी निर्माण नहीं किया जा सकता। अगर ऐसा होता है तो ASI को कार्रवाई करनी होती है। इसके बावजूद भरूच की जामा मस्जिद से सटे हुए कई मकान बना दिए गए हैं। ये मकान स्मारक की दीवार से बिल्कुल चिपकाकर बनाए गए हैं।

संतों की मांगें क्या हैं?

संत समिति ने ऑपइंडिया को बताया कि यह साबित हो चुका है कि भरूच में मौजूदा जामा मस्जिद की जगह पर पहले एक हिंदू-जैन मंदिर था। यह बात वहाँ की निर्माण शैली और स्मारक की बनावट देखकर साफ तौर पर समझ में आती है। संतों का हालिया विरोध इस बात को लेकर है कि इस स्मारक में नियमों का उल्लंघन रोका जाए और ASI द्वारा एक नया सर्वे कराया जाए।

संतों ने कहा है कि इस समय उनकी केवल यही माँग है कि इस स्मारक का प्रबंधन ASI के हाथ में रहे और जो नियमों का उल्लंघन यहां किया जा रहा है, उसे पूरी तरह बंद किया जाए। संत समिति की मांगें इस प्रकार हैं:-

  1. जिस समय इस स्थल को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम 1904 के तहत विभाग ने अपने अधीन लिया था, उस समय का नक्शा, राजपत्र (गजट) अधिसूचना और यह बताते हुए कॉन्ट्रैक्ट लेटर सार्वजनिक किया जाए कि यह स्थान किससे और कैसे लिया गया था।
  2. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम 1958 के अनुसार इस संरक्षित स्मारक के प्रवेश का समय तय किया जाए और नियमों के मुताबिक इसके खुलने और बंद होने की व्यवस्था की जाए।
  3. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम 1958 के अनुसार नियमों के खिलाफ जो गतिविधियाँ यहाँ चल रही हैं, उन्हें तुरंत रोका जाए।
  4. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम 1958 के तहत संरक्षित स्मारक में उसकी मूल संरचना बदलने के उद्देश्य से जो भी निर्माण किया गया है, उसे तुरंत हटाया जाए।
  5. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम 1958 के अनुसार स्मारक की मूल संरचना और परिसर में सीमेंट का उपयोग प्रतिबंधित है। इसके बावजूद रेत, सीमेंट और ईंटों से कंक्रीट निर्माण कर अवैध गतिविधियों की व्यवस्था बनाई गई है, उसे तुरंत हटाया जाए।
  6. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम 1958 तथा इसकी धारा 20A(1) और 20B (2010) के अनुसार 100 मीटर और 200 मीटर क्षेत्र को प्रतिबंधित और नियंत्रित क्षेत्र घोषित किया गया है लेकिन इसके बावजूद कई मकान और अन्य कंक्रीट संरचनाएँ बनाई गई हैं। इन्हें नियमों के अनुसार हटाया जाए और संरक्षित क्षेत्र की सुरक्षा की जाए।
  7. स्मारक के मुख्य प्रवेश द्वार पर नियमों के खिलाफ कंक्रीट मकान बना दिए गए हैं, जिससे मुख्य प्रवेश मार्ग संकरा हो गया है। इसे इसकी मूल स्थिति में बहाल किया जाए।
  8. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम के तहत संरक्षित स्थलों की सुरक्षा और प्रबंधन के लिए बनाए गए नियमों का कई वर्षों से इस स्थल पर पालन नहीं किया गया है। इन नियमों के उल्लंघन के लिए संबंधित विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ पद के दुरुपयोग और आपराधिक लापरवाही के आरोप में कानूनी कार्रवाई शुरू की जाए और विभाग द्वारा इस संरक्षित स्थल पर पुलिस सुरक्षा की व्यवस्था की जाए।

दो दिन में सर्वे शुरू होगा: संत समाज

स्वामी मुक्तानंद ने आगे बताया कि आवेदन देने के बाद भी जब कोई कार्रवाई नहीं हुई तो अखिल भारतीय संत समिति के संन्यासियों ने 5 जनवरी से अनिश्चितकालीन उपवास शुरू कर दिया। इसके बाद प्रशासन ने तुरंत इस मामले को संज्ञान में लिया। स्वामी मुक्तानंद ने कहा कि एसपी अक्षय राज की मध्यस्थता में ASI अधिकारियों और संत समाज के बीच एक बैठक हुई जिसमें सभी मुद्दों पर कार्रवाई का आश्वासन दिया गया।

उन्होंने बताया कि स्थल पर जो अस्थाई व्यवस्थाएँ की गई हैं उन्हें 8 से 10 दिनों के भीतर हटा दिया जाएगा। वहीं, जो स्थाई निर्माण या व्यवस्थाएँ की गई हैं उन्हें अगले दो महीनों के भीतर हटाने की बात कही गई है। इसके अलावा, अगले 2-3 दिनों में सर्वे भी शुरू कर दिया जाएगा और सर्वे के दौरान संत समाज के कुछ लोगों को भी साथ रखा जाएगा।

(यह खबर मूल रूप से भार्गव राज्यगुरु ने गुजराती में लिखी है, जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ा जा सकता है।)