2026-2027 के बजट को पेश करते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने किसानों के लिए कई महत्वपूर्ण घोषणाएँ की थीं। इन्हीं घोषणाओं में एक एआई डिजिटल प्लैटफॉर्म को लॉन्च करने को लेकर थी। इसको साकार करते हुए ‘भारत‑VISTAAR’ नाम के डिजिटल प्लेटफॉर्म को केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किसानों को समर्पित किया।
कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसे लॉन्च करते हुए कहा कि इस ऐप के जरिए पूरी कृषि व्यवस्था को जोड़ेंगे। सरकारी योजनाओं की जानकारी, किसी के खिलाफ शिकायत से लेकर आपके खेत को क्या जरूरी है, उसमें क्या उपजाएँ, नमी, कीटों की समस्या और उससे निजात के उपाए समेत तमाम दिक्कतों का समाधान होगा।
इस ऐप का उद्देश्य कृषि से जुड़ी जानकारी, वैज्ञानिक सलाह और सरकारी संसाधनों को एक ही डिजिटल इंटरफेस पर एकीकृत करना है। यह प्लेटफ़ॉर्म भारत के AgriStack पोर्टल, जिसमें किसानों के डिजिटल रिकॉर्ड, फसल डेटा और कृषि सूचनाएँ हैं, को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के वैज्ञानिक कृषि अभ्यास और AI सिस्टम से जोड़ता है। इसका उद्देश्य खेती से जुड़े फैसलों को सरल, त्वरित और डेटा-आधारित बनाना है।
प्रिय किसान साथियों, खेती को लेकर जो भी सवाल मन में उमड़ते हैं, उनका समाधान अब एक कॉल पर होगा।
Bharat Vistaar किसानों का नया साथी है, जो फसल उत्पादन से लेकर रोगों से बचाव के उपायों और मंडी भाव तक बताएगा।
सरकार ने इस ऐप को लॉन्च करते समय जो विजन रखा है, अगर वो सफल होता है तो कृषि क्षेत्र में क्रांति आ जाएगी। इसके जरिए
स्थानीय भाषाओं में कृषि सलाह, मौसम सूचना, मिट्टी का विश्लेषण और फसल-विशिष्ट सुझाव देगा, जिससे भारत के छोटे और सीमांत किसानों तक उपयोगी जानकारी आसानी से पहुँचेगी।
उन्नत AI तकनीक के माध्यम से यह प्लेटफ़ॉर्म मौसम, मिट्टी, बाजार भाव, कीट और रोगों से निपटने के उपाय जैसे डेटा-आधारित सुझाव देगा।
किसान इस सिस्टम के जरिए सरकारी कृषि योजनाओं के बारे में जान सकते हैं, आवेदन कर सकते हैं और उनमें प्रगति को ट्रैक कर सकते हैं।
किसानों के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा
इस ऐप की मदद से किसानों को मौसम पूर्वानुमान, मिट्टी की स्थिति, बीज और उर्वरक चयन जैसी सलाह मिल सकती है, जिससे खेती में निर्णय अधिक वैज्ञानिक और सटीक होंगे। इससे कृषि जोखिम, जैसे मौसम-आधारित नुकसान और फसल विफलता की संभावना कम हो सकती है।
AI-आधारित सलाह किसानों को सही समय पर संसाधनों का उपयोग (जैसे पानी, उर्वरक और कीटनाशक) करने में मदद करती है, जिससे खेती की लागत कम होने और फसल उत्पादन बढ़ने की संभावनाएँ मजबूत होती हैं। बहुत से छोटे किसानों के लिए भाषा एक बड़ी बाधा होती है। ‘भारत विस्तार’ में स्थानीय भाषाओं को प्राथमिकता दी जाएगी, जिससे किसान समझदारी से तकनीकी सलाह ले सकते हैं, जो पहले मुश्किल था।
AI टूल को शुरू में हिंदी और इंग्लिश में लॉन्च किया गया है। इसके बाद गुजराती, बांग्ला, पंजाबी, तेलुगू, तमिल, कन्नड़ समेत 11 क्षेत्रीय भाषाओं में भी उपलब्ध हो जाएँगे। इसके लिए कृषि मंत्रालय ने ओडिशा, बिहार, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान राज्यों के साथ MoU साइन किए हैं। यहाँ ट्रायल शुरू हो गया है।
कृषि मंत्री ने भारत- अमेरिका ट्रेड डील को लेकर भी कहा कि दूध, घी, दही, पनीर कोई भी डेयरी और उत्पाद जो दूध से संबंधित हैं, भारत की धरती पर किसी भी कीमत पर नहीं आएगा, ताकि हमारे दूध उत्पादक किसानों को कोई नुकसान न हो। उन्होंने कहा कि विपक्षी पार्टियाँ आरोप लगा कर किसानों में डर पैदा करने की कोशिश कर रही हैं, जो पूरी तरह निराधार है। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस के शासन में 20 अरब डॉलर के कृषि उत्पाद का आयात होता था और डेयरी उत्पाद भी आयात किए जाते थे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 अगस्त 2020 को अयोध्या में प्रभु राम के मंदिर की नींव रखी और 22 जनवरी 2024 को श्री राम जन्मभूमि मंदिर का भव्य उद्घाटन भी हो गया। इस ऐतिहासिक घटना से भारत की सांस्कृतिक चेतना की पुनर्स्थापना तो हुई ही, साथ ही साथ अयोध्या केवल एक धार्मिक नगरी से आगे बढ़कर अर्थव्यवस्था के एक बड़े केंद्र के रूप में भी उभरकर सामने आने लगी। केंद्र की नरेंद्र मोदी और UP की योगी आदित्यनाथ की सरकार की कोशिशों से अयोध्या विकास की पटरी पर दौड़ रही है।
सदियों से भारत के मंदिर केवल आस्था के केंद्र नहीं रहे बल्कि उन्होंने स्थानीय अर्थव्यवस्था, रोजगार और बुनियादी ढाँचे को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई है। तिरुपति, वैष्णो देवी और शिरडी जैसे तीर्थस्थल इसके उदाहरण हैं। अब अयोध्या भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए आधुनिक विकास और सांस्कृतिक विरासत के संगम का नया मॉडल बनती दिखाई दे रही है।
IIM लखनऊ ने भारत के अयोध्या का आर्थिक पुनर्जागरण: श्री राम मंदिर पर एक केस स्टडी (The Economic Renaissance of Ayodhya, India: A Case Study on Sri Ram Mandir) शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें बताया गया है कि किस तरह राम मंदिर ने अयोध्या का आर्थिक कायाकल्प कर दिया है।
कितनी बड़ी है भारत की टेंपल इकोनॉमी?
टेंपल इकोनॉमी (Temple Economy) का मतलब उन सभी आर्थिक गतिविधियों से है जो मंदिरों के कारण पैदा होती हैं जैसे दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालु, तीर्थ पर्यटन, मंदिर प्रबंधन, प्रसाद, फूल-माला, होटल, परिवहन और अन्य सेवाएँ। भारत में मंदिर सिर्फ पूजा के स्थान नहीं रहे बल्कि हजारों सालों से आर्थिक गतिविधियों के बड़े केंद्र भी रहे हैं। पुराने समय में जब अर्थव्यवस्था स्थानीय स्तर पर चलती थी, तब मंदिर आसपास के लोगों को रोजगार और व्यापार के अवसर देते थे। तीर्थयात्रा के कारण दुकानदारों, कारीगरों, पुजारियों, गाइडों और अन्य काम करने वालों को काम मिलता था।
वाराणसी, मदुरै, पुष्कर और उज्जैन जैसे शहर इसके उदाहरण हैं। ये शहर किसी बड़े उद्योग के लिए नहीं बल्कि अपने प्रसिद्ध मंदिरों और तीर्थ स्थलों के लिए जाने जाते हैं। मंदिरों के आसपास बनी यह अर्थव्यवस्था सदियों से इन शहरों को सहारा देती रही है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों जैसे सुप्रभेदगम, विजयगम, अनलगम और प्रोद्गीतगम में भी बताया गया है कि मंदिरों को ऐसी सामाजिक और आर्थिक गतिविधियाँ करनी चाहिए जो समाज के सभी वर्गों, खासकर कमजोर वर्गों को लाभ पहुँचाएँ और संतुलित विकास में मदद करें।
State Bank of India (SBI) और अन्य आर्थिक विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार, भारत की टेंपल इकोनॉमी हर साल लगभग ₹3.02 लाख करोड़ से ₹6 लाख करोड़ तक का योगदान देती है। यह देश के कुल GDP का करीब 2.3% से 3% हिस्सा है। इसी संदर्भ में राम मंदिर अयोध्या की अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभा रहा है और शहर को दुनिया के प्रमुख तीर्थ स्थलों में शामिल कर रहा है।
राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने 5 फरवरी 2020 से 5 फरवरी 2025 के बीच लगभग ₹400 करोड़ कर के रूप में सरकार को दिए। इसमें ₹270 करोड़ GST और ₹130 करोड़ अन्य करों के रूप में शामिल हैं। राम मंदिर के निर्माण पर सरकार को लगभग ₹400 करोड़ GST मिलने का अनुमान है।
करोड़ों श्रद्धालुओं से दिखा बढ़ता आर्थिक प्रभाव
अयोध्या में श्री राम मंदिर के उद्घाटन के बाद आर्थिक गतिविधियों का प्रभाव कई गुना बढ़ गया है। धार्मिक पर्यटन ने यहाँ परिवहन, होटल, भोजन, व्यापार और दान अर्थव्यवस्था को अभूतपूर्व गति दी है। IIM लखनऊ की रिपोर्ट में बताया गया है कि जनवरी से सितंबर 2024 के बीच अयोध्या में 13.77 करोड़ श्रद्धालु पहुँचे जो वर्ष के अंत तक 16-18 करोड़ तक का अनुमान था।
इसकी तुलना करें तो ईसाईयों के सबसे बड़े तीर्थस्थल वेटिकन में हर साल लगभग 0.9 करोड़ और मुस्लिमों के मक्का में करीब 2 करोड़ लोग पहुँचते हैं। अयोध्या कई दूसरे धार्मिक स्थलों को पीछे छोड़ते हुए एक बड़ा तीर्थस्थल बनने वाला है जिससे 2025-26 तक हर साल टूरिज्म से 100 बिलियन (₹10000 करोड़) से ज्यादा का रेवेन्यू मिल सकता है।
भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के एक शोध के मुताबिक, वित्त वर्ष 2024 में सिर्फ अयोध्या से जुड़ी तीर्थ यात्रा और उससे संबंधित गतिविधियों से ₹4 लाख करोड़ से ज्यादा का आर्थिक उत्पादन (इकोनॉमिक आउटपुट) होने का अनुमान था। यानी राम मंदिर के कारण यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं से पर्यटक, होटल, दुकानों और परिवहन जैसी सेवाओं से बहुत बड़ा आर्थिक फायदा हो रहा है।
मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के बाद इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक ही दिन में ₹3 करोड़ से ज्यादा की भेंट चढ़ाई गई थी। यह दिखाता है कि श्रद्धालुओं की आस्था के साथ-साथ यहाँ बड़ी आर्थिक गतिविधि भी जुड़ी हुई है।
वित्त वर्ष 2025 में उत्तर प्रदेश सरकार को अतिरिक्त ₹25,000 करोड़ तक का कर राजस्व मिलने की संभावना जताई गई है। इसमें जीएसटी (GST) और अन्य तरह के टैक्स शामिल हैं। यानी मंदिर और पर्यटन से राज्य की आमदनी भी बढ़ रही है, जिसका इस्तेमाल विकास कार्यों में किया जा सकता है।
अयोध्या में होटल और लॉज का तेजी से विकास हो रहा है। 150 से ज्यादा होटल और लॉज अलग-अलग चरणों में बन रहे हैं या तैयार हो चुके हैं। बड़े होटल ब्रांड जैसे ताज होटल्स, रेडिसन और OYO भी यहाँ अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं। सालभर होटलों में औसतन 60% से 70% तक कमरे भरे रहते हैं। त्योहारों और खास मौकों पर यह आँकड़ा 100% तक पहुँच जाता है यानी एक भी कमरा खाली नहीं रहता।
डोमिनोज और पिज्जा हट जैसी अंतरराष्ट्रीय फूड चेन ने भी अयोध्या में अपने आउटलेट शुरू किए हैं। इससे स्थानीय लोगों को रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं और शहर की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है।
रोजगार और रियल एस्टेट में ऐतिहासिक उछाल
रिपोर्ट के मुताबिक, राम मंदिर निर्माण की परियोजना से सीधे 1,000 से अधिक लोगों को रोजगार मिला है, जो राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से जुड़े हुए हैं। यानी मंदिर के प्रबंधन, सुरक्षा, प्रशासन और अन्य कार्यों में हजार से ज्यादा लोग नियमित रूप से काम कर रहे हैं। निर्माण के दौरान स्थिति और भी व्यापक थी। मंदिर के निर्माण कार्यों में 50,000 से अधिक मजदूर अलग-अलग चरणों में जुड़े। इसमें राजमिस्त्री, इंजीनियर, पत्थर तराशने वाले कारीगर, ट्रांसपोर्ट से जुड़े लोग और अन्य श्रमिक शामिल थे। इससे हजारों परिवारों की आमदनी बढ़ी।
मंदिर बनने के बाद सिर्फ प्रत्यक्ष रोजगार ही नहीं बल्कि अप्रत्यक्ष रोजगार भी तेजी से बढ़ा। सीधे और अप्रत्यक्ष दोनों तरह से करीब 1.2 लाख नई नौकरियाँ पैदा हुई हैं। ये नौकरियाँ होटल और पर्यटन, हस्तशिल्प और धार्मिक वस्तुओं के व्यापार, स्थानीय परिवहन और टूर गाइड सेवाओं जैसे क्षेत्रों में बनी हैं। लोगों को कई क्षेत्रों में नया रोजगार या अतिरिक्त कमाई का अवसर मिला।
जमीन की कीमतों में भी जबरदस्त उछाल देखने को मिला। 2020 से पहले यहाँ जमीन की कीमत ₹400 से ₹800 प्रति वर्ग फुट के बीच थी। लेकिन 2024 तक यही कीमत बढ़कर ₹4,000 से ₹10,000 प्रति वर्ग फुट तक पहुँच गई। यानी सिर्फ चार साल में करीब दस गुना बढ़ोतरी हुई। इससे अयोध्या निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गई है।
धार्मिक सामग्री बेचने वाले दुकानदारों की बिक्री में काफी इजाफा हुआ है। खास तौर पर GI टैग वाले अयोध्या के बेसन लड्डू बनाने वालों और स्थानीय हस्तशिल्प कारीगरों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। तीर्थयात्रियों की संख्या बढ़ने से इन उत्पादों की माँग भी लगातार बढ़ रही है। कई छोटे विक्रेताओं ने 2024 में ₹5 लाख से अधिक की कमाई की जो पहले के मुकाबले काफी ज्यादा है। नए बाजार, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और मॉल की योजनाएँ भी बनाई जा रही हैं, जिससे आने वाले वर्षों में रोजगार और व्यापार के अवसर और बढ़ने की संभावना है।
सड़क, रेल, हवाई अड्डा: अयोध्या के इन्फ्रा पर जोर
सरकार ने अयोध्या को एक आधुनिक और विश्व स्तरीय आध्यात्मिक नगरी बनाने के लिए अयोध्या मास्टर प्लान 2031 के तहत ₹85,000 करोड़ से अधिक के निवेश का प्रस्ताव रखा है। इसका उद्देश्य सिर्फ मंदिर क्षेत्र का विकास नहीं बल्कि पूरे शहर को योजनाबद्ध तरीके से विकसित करना है ताकि आने वाले वर्षों में बढ़ती आबादी और तीर्थयात्रियों को बेहतर सुविधाएँ मिल सकें।
इस योजना में नई सड़कों, बेहतर जल निकासी व्यवस्था, स्मार्ट ट्रैफिक सिस्टम, आधुनिक बस टर्मिनल, पार्किंग जोन और शहरी सुविधाओं के विस्तार पर जोर दिया गया है। यानी अयोध्या को एक व्यवस्थित और साफ-सुथारे शहर के रूप में तैयार किया जा रहा है। इसके अलावा सड़कों, हवाई अड्डों और रेलवे स्टेशनों को भी विकसित किया गया है।
दिसंबर 2023 से शुरू हुआ महर्षि वाल्मिकी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा अयोध्या की कनेक्टिविटी में बड़ा बदलाव लेकर आया है। वित्त वर्ष 2025 में इस हवाई अड्डे ने 1.1 करोड़ से अधिक यात्रियों को संभाला जो पिछले वर्षों की तुलना में 423% वृद्धि दिखाता है। इसका मतलब है कि अब देश-विदेश से बड़ी संख्या में लोग सीधे अयोध्या पहुँच पा रहे हैं। भविष्य में इसकी क्षमता को 10 करोड़ यात्रियों प्रति वर्ष तक बढ़ाने की योजना है।
साथ ही, अयोध्या धाम जंक्शन रेलवे स्टेशन का पुनर्निर्माण किया गया है। स्टेशन को भव्य डिजाइन, बेहतर वेटिंग रूम, एस्केलेटर, लिफ्ट और आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित किया गया है। इसके अलावा, नए एक्सप्रेसवे और चौड़ी सड़कों ने अयोध्या को लखनऊ, वाराणसी, प्रयागराज और गोरखपुर से जोड़ दिया है। इससे यात्रा समय कम हुआ है और व्यापार तथा लॉजिस्टिक्स गतिविधियाँ भी तेज हुई हैं।
2021 से पहले और 2025 की अयोध्या
2021 से पहले की अयोध्या और 2025 की अयोध्या के बीच का अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। 2021 से पहले शहर में केवल 500 ई-रिक्शा थे, जो 2025 तक बढ़कर 17,000 हो गए यह बताता है कि आवागमन में जोरदार वृद्धि हुई है। होटल उद्योग में भी बड़ा बदलाव आया है, जहाँ पहले केवल 20 होटल थे, वहीं 2025 में उनकी संख्या 200 तक पहुँच गई, जिनमें 5-स्टार होटल भी शामिल हैं। बैंकिंग सेवाएँ 15 से बढ़कर 60 हो गईं, जो बढ़ती आर्थिक गतिविधियों और निवेश का संकेत देती हैं।
इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकानों की संख्या 108 से बढ़कर 401 हो गई। पेट्रोल/CNG पंप 50 से कम से बढ़कर 75 से अधिक हो गए, जो वाहनों और परिवहन विस्तार को दर्शाता है। वहीं, स्ट्रीट वेंडर्स की संख्या 500 से बढ़कर लगभग 2,000 हो गई, जिससे छोटे व्यापार और स्वरोजगार में चार गुना तक उछाल दिखाई देता है। कुल मिलाकर, 2021 की तुलना में 2025 की अयोध्या अधिक सक्रिय, अधिक व्यावसायिक और कहीं अधिक तेजी से विकसित होती हुई नजर आती है।
अयोध्या के विकास का असर अब सिर्फ शहर तक सीमित नहीं है बल्कि आसपास के जिलों तक भी साफ दिखाई दे रहा है। फैजाबाद, बस्ती, सुलतानपुर, अमेठी, लखनऊ और गोरखपुर में भी आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ी हैं। इन क्षेत्रों में होटल, गेस्ट हाउस और धर्मशालाओं की संख्या बढ़ रही है। साथ ही, लॉजिस्टिक्स हब और परिवहन सेवाओं का विस्तार हुआ है।
इन आर्थिक गतिविधियों से साफ है कि मोदी और योगी सरकार की मंशा केवल अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण करने की नहीं है बल्कि दोनों सरकारें अयोध्या को एक बड़े विजन के तहत विकसित कर रही हैं। जब दुनिया के मानचित्र पर बड़े तीर्थस्थलों का जिक्र किया जाएगा तो उसमें अयोध्या का नाम शीर्ष स्थानों में रहे इसकी पूरी तैयारी सरकारें कर रही हैं।
मजहब को आधार बनाकर राजनीति करने वाले हर छोटे-बड़े नेता को अपना असली मकसद अच्छे से पता है। इसका एक उदाहरण एक समय में AIMIM पार्टी के बड़े नेता अकबरुद्दीन ओवैसी ने दिया था और एक उदाहरण अब उनकी ही पार्टी की युवा महिला नेता सहर युनूस शेख ने पेश किया है। सहर ने हैदराबाद जाकर भीड़ के सामने ’15 मिनट’ वाला बयान इस लहजे में दोहराया है जिससे साफ पता चलता है कि उनका इशारा क्या था।
आगे बढ़ने से पहले आपको याद दिला दें कि साल 2013 में अकबरुद्दीन ओवैसी ने ’15 मिनट हटा लो पुलिस को’ वाला विवादित बयान दिया था। अपने भड़काऊ बयान में उन्होंने कहा था, “अगर 15 मिनट के लिए पुलिस हटा दी जाए तो हम (मुसलमान) 100 करोड़ (हिंदुओं) को खत्म कर देंगे।”
इस भड़काऊ बयान को सुनने के बाद उनपर IPC (अब BNS) की धारा 120(b) और 153(a) व अन्य धाराओं के तहत लंबा केस चला था। 2022 में उन्हें इस मामले में जाकर बरी किया गया था। बाद में उन्होंने जेल से निकलकर अपने ऊपर भड़काऊ बयानबाजी करने वाले आरोपों को खारिज करने की कोशिश की थी।
अब AIMIM के यही नेता उसी 15 मिनट वाले बयान को खुलेआम दोहराते हैं। सहर शेख को देखिए। मुंबई के मुंब्रा में नगर निगम चुनाव जीतने के बाद उन्हें हैदराबाद में ‘दारुल इस्लाम दिन’ को मनाने के लिए बुलाया गया।
सहर मंच पर गईं और स्पीच शुरू करने से पहले ही साफ कर दिया कि उनके दिमाग में क्या चल रहा है। वीडियो में देख सकते हैं कि इस्लाम का नाम लेकर और हिजाब पहनकर सोशल मीडिया पर पॉपुलर होने वाली सहर को देखते ही भीड़ ने हल्ला करना शुरू कर दिया था। सहर पहले ये देख कर मुस्कुराई और उसके बाद उन्होंने कहा “2 मिनट की शांति चाहिए…नहीं-नहीं 15 मिनट की।”
वीडियो में जिस तरह से सहर 15 मिनट वाली बात को नेताओं को देखकर कह रही हैं उससे साफ है कि ये कोई मजाक नहीं था। ये संदेश था कि सहर के जहन में भी वही जहर भरा है जो अकबरुद्दीन में था।
वहीं उनके साथ हँसने वाली भीड़ भी ये बता रही थी कि उन सबको इस 15 मिनट के मायने बहुत अच्छे से पता हैं। वो इस बात से वाकिफ हैं कि अगर देश से 15 मिनट के लिए कानून व्यवस्था गायब हो जाए तो उन्हें एकजुट होकर क्या करना है और किसके साथ करना है।
सहर का ये अंदाज हिंदुओं के लिए एक चेतावनी है, लेकिन हिंदुओं को उनके रवैये पर हैरान होने की जरूरत नहीं है। AIMIM से जब सहर को पार्षद चुना गया था तब उन्होंने अपनी जीत के बाद लोगों को संबोधित करते हुए यही कहा था कि अगली बार पूरे मुंब्रा को ‘हरे रंग‘ में रंग देना।
जब इस बयान पर बवाल मचा तो वो अपनी बात से पलट गईं। उन्होंने कहा कि ये रंग उनकी पार्टी का रंग है। जो इसके मायने निकाले जा रहे हैं उनका वो अर्थ था ही नहीं। अपनी सफाई में उन्होंने सेकुलर होने तक का दावा किया था। हालाँकि लोगों को सच्चाई का पता था। इस बार भी यही हुआ है। हो सकता है सहर बाद में ये कह दें कि 15 मिनट से उनका अर्थ वाकई भीड़ को शांत करने से था, लेकिन हिंदुओं को इसके मायने पता होने चाहिए।
छत्तीसगढ़ में जनजातीय गाँवों में ईसाई मिशनरियों और बाहरी पादरियों के प्रवेश पर रोक जारी रहेगा। ग्राम सभाओं के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा है। सर्वोच्च न्यायालय ने फरवरी 2026 में दिए गए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दी। याचिका में कांकेर सहित कई जिलों के जनजातीय गाँवों में पादरियों की एंट्री रोकने वाले होर्डिंग्स को असंवैधानिक करार दिया गया था।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि ग्राम सभाओं को ये अधिकार है कि वे अपनी संस्कृति और परंपरा की रक्षा के लिए कदम उठा सकती है। कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के आदेश में दखल देने से मना कर दिया, जिसमें लालच और धोखाधड़ी से किए गए धर्मांतरण का सामाजिक सद्भाव और जनजातीय सांस्कृतिक पहचान पर क्या असर पड़ता है, इसके बारे में विस्तार से बताया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के उस अवलोकन को सही करार दिया है, जिसमें ‘लालच और धोखाधड़ी’ के द्वारा धर्म परिवर्तन कराए जाने को रोकने के लिए होडिंग लगाने को असंवैधानिक नहीं माना था।
The plea states that the High Court order reads like a “lecture” and ignores reports of attacks and village bans on Christians.
सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि ये मामला सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। इसमें किसी भी धर्म को मानने की आजादी के उल्लंघन जैसी बात नहीं है। स्थानीय ग्राम सभाएँ PESA एक्ट 1996 के तहत अपनी परंपराओं को बचाने के लिए बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि अगर जनजातीय लोगों की परंपरा और संस्कृति की रक्षा के लिए ‘बाहरी हस्तक्षेप’ को रोकना और नियंत्रित करना जरूरी है, तो ऐसा किया जा सकता है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि एंट्री पर रोक ईसाइयों के साथ भेदभाव है और ये संविधान 25 का उल्लंघन है। छत्तीसगढ़ सरकार और ग्राम सभा की ओर से कहा गया था कि होडिंग्स केवल उन पादरियों की एंट्री रोकने के लिए है, जो बहला फुसलाकर या जबरन गाँववालों का धर्मांतरण करा रहे हैं।
Court: please see the writ petition before the high court and the relief claimed. You have been asked to go the gram Sabha.
Gonsalves: the high court has given a long statement about how Christians are doing this and that without any material. You can’t stop me from doing my…
यह मामला कांकेर जिले के आठ जनजातीय लोगों के गाँव में ग्राम सभाओं द्वारा पास किए गए प्रस्तावों से जुड़ा है। ये गाँव हैं-कुडल, परवी, जुनवानी, घोटा, घोटिया, हबेचुर, मुसुरपुट्टा और सुलागी। गाँववालों ने होर्डिंग्स लगा कर कहा था कि PESA एक्ट 1996 के तहत पादरियों और ‘बाहरी लोगों’ की एंट्री पर बैन है।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में दिगबल टांडी ने एक रिट पिटीशन फाइल की थी, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि होर्डिंग्स लगा कर पादरियों और धर्मपरिवर्तन करने वाले स्थानीय जनजातीय लोगों को गाँवों में आने से असल में रोका जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि इससे संविधान के आर्टिकल 14, 19(1)(d) और 25 का उल्लंघन होता है। याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि ईसाई आदिवासियों को दफनाने के अधिकार से वंचित किया जा रहा है। उनका सामाजिक बहिष्कार किया जा रहा है और उन्हें जबरदस्ती भगाया जा रहा है, जिससे सांप्रदायिक तनाव पैदा हो रहा है।
हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की बेंच ने अपने फैसले में होर्डिंग्स लगाने से ग्रामसभा को रोकने से इनकार कर दिया। हाई कोर्ट ने कहा कि गैर-कानूनी या जबरदस्ती धर्म बदलने के खिलाफ चेतावनी देने वाले बैनर लगाना अपने आप में गैर-संवैधानिक नहीं कहा जा सकता।
हाई कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि धर्म बदलना भारत के सामाजिक-राजनीतिक माहौल में लंबे समय से एक सेंसिटिव मुद्दा रहा है। हालांकि संविधान धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने की आज़ादी की गारंटी देता है, लेकिन कोर्ट ने चेतावनी दी कि जबरदस्ती, लालच या धोखे से इस आज़ादी का गलत इस्तेमाल करना बहुत चिंता की बात है।
हाई कोर्ट ने कहा कि भारत में मिशनरी एक्टिविटी ओपनिवेशिक काल से चली आ रही है, जो शुरू में सामाजिक सुधार, पढ़ाई-लिखाई और हेल्थकेयर पर फोकस होती थी। समय के साथ, कुछ मिशनरी ग्रुप्स ने ऐसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े तबकों, खासकर अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित जातियों के बीच धर्म बदलने के लिए करना शुरू कर दिया।
हाई कोर्ट के मुताबिक, जब धर्म बदलना निजी आस्था का मामला नहीं रह जाता और लालच या कमज़ोरी का फायदा उठाने का नतीजा बन जाता है, तो यह जबरदस्ती नया कल्चर पैदा करता है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की कृत्यों से जनजातीय समुदायों में ध्रुवीकरण, सामाजिक बहिष्कार और कभी-कभी हिंसक झड़पें हुई हैं।
हाई कोर्ट ने साफ किया कि आर्टिकल 25 खुद में पूरा अधिकार नहीं है, यह नैतिकता और दूसरे मामलों के अधीन है। इसका मतलब यह है कि लालच देकर धर्म बदलना सिर्फ धार्मिक चिंता नहीं है, बल्कि एक सामाजिक खतरा है।
हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता के भेदभाव के आरोपों को खारिज कर दिया और कहा कि उसे ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे पता चले कि सर्कुलर या होर्डिंग्स ईसाइयों के खिलाफ भेदभाव को बढ़ाता है। उसने कहा कि होर्डिंग्स सिर्फ कुछ पादरियों की एंट्री पर रोक से जुड़ा है, जो धर्म बदलने के लिए कार्यक्रम आयोजित करना चाहते हैं।
हाई कोर्ट ने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता ने कोर्ट आने से पहले दूसरे कानूनी उपायों का इस्तेमाल नहीं किया था और उसे पहले संबंधित ग्राम सभाओं के सामने समाधान की माँग करनी चाहिए थी।
“बेवकूफ और #तिये में धागे भर का फर्क होवे है। धागे के इंगे बेवकूफ और धागे के उंगे #तिया। और जो धागा खींच लो तो कौन बेवकूफ और कौन #तिया – करोड़ रुपये का प्रश्न है भईया।”
T20 वर्ल्ड कप 2026 चल रहा है। सूर्य कुमार यादव की कप्तानी में भारत ने पाकिस्तान को इस वर्ल्ड कप में सिर्फ हराया नहीं, मसल दिया – खेलते हुए भी, खेल से बाहर भी। हिंदुस्तानी जनता खुश है। कोई खुश नहीं है तो वो है भारत की कथित सेकुलर मीडिया और इनके सेकुलर पाठक। क्योंकि इन्हें बेवकूफ और #तिये में फर्क पता ही नहीं है।
भारत मैच जीत गया, इससे Economic Times को मतलब नहीं। उसे मतलब है कि सूर्य कुमार यादव ने पाकिस्तानी खिलाड़ियों से हाथ क्यों नहीं मिलाया। तकलीफ इतनी है कि इस विषय पर ज्ञान देते हुए यहाँ तक लिख दिया कि इतिहास इसे कठोरता के साथ देखेगा, सवाल पूछेगा।
वैसे इतिहास होता क्या है – यह सवाल Economic Times को क्रिकेट और T20 वर्ल्ड कप 2026 के बजाय अपने गिरेबान में झाँक कर देखना चाहिए। जब वो ऐसा करेंगे तो पाएँगे कि उनके Times of India ग्रुप के जो मालिक हैं, उन्होंने इतिहास में शुरू किया था ‘अमन की आशा’ वाला घटिया प्रोग्राम।
भारत पर आतंकी हमले हों
हर समय हमारे सैनिक बलिदान देते रहें
आम जनता आतंकी गोलियों की शिकार बनती रहे
पैंट खोल कर खतना देखने के बाद लोगों को इस्लामी आतंक का शिकार बनाया जाता रहे
यह सब कुछ चलता रहे लेकिन Times of India की ‘अमन की आशा’ बंद नहीं हो। पाकिस्तानी सिंगर-एक्टर-क्रिकेटरों को भारत में नौकरी मिलती रहे – यह है Economic Times के मालिक का इतिहास। इतिहास यह भी है कि Times of India ने ‘अमन की आशा’ वाली यह नौटंकी शुरू की थी पाकिस्तानी मीडिया हाउस ‘जंग समूह’ के साथ मिलकर। इसी मीडिया हाउस के Geo News ने ऑपरेशन सिंदूर के समय भारत को लेकर क्या-क्या लिखा है, नीचे के स्क्रीनशॉट से पाठक समझ सकते हैं – यह और बात है कि धंधे के लिए Economic Times शायद ही समझे।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ को लेकर पाकिस्तानी वेबसाइट Geo News से संबंधित गूगल सर्च का स्क्रीनशॉट
अब करते हैं क्रिकेट की बात, सूर्य कुमार यादव की बात। करेंगे ईशान किशन की भी बात। और बात होगी शिवरात्रि की भी। वो इसलिए क्योंकि Economic Times से क्रिकेट और धर्म की समझ करना बेमानी है, देश-हित और राष्ट्रीयता तो खैर धंधे में सर से लेकर पाँव तक डूबा हुआ मीडिया हाउस क्या ही समझेगा और समझाएगा।
T20 वर्ल्ड कप 2026 के दौरान होने वाले भारत-पाकिस्तान मैच से पहले ही सूर्य कुमार यादव ने स्पष्ट कर दिया था कि मैच बराबरी वालों के बीच नहीं है। मतलब पाकिस्तानी क्रिकेटरों और पाकिस्तानियों को उन्होंने मैच से पहले ही औकात बता दी थी। मैच में मसल कर अपने इरादे पर मुहर भी लगा दी। लेकिन Economic Times को चाहिए था हाथ मिलाते ‘अमन की आशा’ वाला थीम – जो हो न सका। इंटरनेशनल भिखारियों से शायद कोई हाथ मिला भी ले… लेकिन हत्यारों से क्यों?
हत्यारा शब्द के लिए संदर्भ है: फाहिम अशरफ। ऑपरेशन सिंदूर को लेकर इस पाकिस्तानी क्रिकेटर ने इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट डाली थी। जरा सोचिए क्रिकेट के कौन से ‘स्पिरिट ऑफ द गेम’ के तहत ऐसे खिलाड़ी वाले टीम से हाथ मिलाने की परंपरा निभाई जाए?
बात सिर्फ सूर्य कुमार यादव की नहीं है। पाकिस्तानियों को लेकर ईशान किशन क्या सोचते हैं, यह भी सुना जाए। और ईशान किशन ‘स्पिरिट ऑफ द गेम’ के तहत ऐसा सोचते हैं, यह भी नहीं है। वो ऐसा सोचने पर मजबूर हुए क्योंकि पिछले कुछ सालों से पाकिस्तान कट्टर इस्लाम के नाम पर भारत के खिलाफ क्या-क्या करता रहा है, इससे वो वाकिफ हैं, आँख मूँद कर सब कुछ देखने वाले बेवकूफ नहीं हैं।
और हाँ, T20 वर्ल्ड कप 2026 में पाकिस्तान को रगड़-रगड़ के मसलने के बाद कप्तान सूर्य कुमार यादव ने जीत का जश्न कैसे मनाया? हर हर महादेव के उद्घोष के साथ। क्योंकि उनको याद था कि उनके देश के नागरिकों की हत्या धर्म देख कर की गई थी। इसलिए क्रिकेट तो एक माध्यम था, जीत तो धर्म को ही समर्पित थी।
‘ओमकारा’ फिल्म का जो डायलॉग सबसे शुरू में लिखा गया है, वो Economic Times के लिए ही है। धागे की पहचान कर उन्हें अपना ऑप्शन तय करना है। पूरी भारतीय क्रिकेट टीम, कप्तान सूर्य कुमार यादव या ईशान किशन – किसी को भी दोनों ऑप्शन में से किसी से भी सलाह लेने की जरूरत नहीं है।
बॉलीवुड और हॉलीवुड में अपनी पहचान बना चुकीं अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा इन दिनों एक इंटरव्यू को लेकर सोशल मीडिया पर विवादों में घिर गई हैं। इस इंटरव्यू में भारत का गलत नक्शा दिखाया गया, जिसके बाद नेटिजन्स ने प्रियंका चोपड़ा की चुप्पी को लेकर खूब आलोचना की। नेटिजन्स ने पूछा कि क्या भारत का गलत नक्शा दिखाने से प्रियंका चोपड़ा को फर्क नहीं पड़ता?
यह इंटरव्यू अंतरराष्ट्रीय एंटरटेनमेंट मैगजीन ‘वैरायटी’ (Variety) के लिए था, जिसमें एक ‘इंडियन और नॉट इंडियन’ (Indian or Not Indian) नाम का एक सेगमेंट था। इस वीडियो की शुरुआत में भारत का गलत नक्शा दिखाया गया, जिसमें पाकिस्तान अधिकृत (PoK) को शामिल नहीं किया गया। यूट्यूब पर यह वीडियो अपलोड होते ही नेटिजन्स ने नाराजगी जाहिर की।
वीडियो की शुरुआत में दिखाया का भारत का गलत नक्शा (फोटो साभार: Youtube- Variety)
कुछ यूजर्स ने लिखा कि भारत का नक्शा गलत दिखाना गंभीर बात है। वहीं कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि इंटरव्यू के दौरान प्रियंका चोपड़ा ने इस पर आपत्ति क्यों नहीं जताई। कई लोगों ने सीधे उनसे पूछा कि क्या उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी या फिर उन्होंने इसे नजरअंदाज किया।
भारत के गलत नक्शे पर नेटिजन्स की प्रतिक्रिया
अंतरराष्ट्रीय मैगजीन ‘वैरायटी’ ने प्रियंका चोपड़ा के साथ इस इंटरव्यू का वीडियो यूट्यूब पर अपलोड किया है। इस वीडियो पर नेटिजन्स के भर-भरकर कमेंट सामने आए हैं, जिसमें भारत के गलत नक्शें को लेक आलोचना की जा रही है। इसी विवाद में प्रियंका चोपड़ा को भी घेरा गया है।
एक यूजर ने कमेंट किया, “शुरुआत में दिखाया गया भारत का नक्शा निश्चित रूप से भारतीय नहीं है!”
अन्य यूजर ने कमेंट किया, “वे बार-बार भारत का विकृत नक्शा क्यों दिखाते रहते हैं?”
एक यूजर ने लिखा, “ये पश्चिमी देश न तो हमारे नक्शे को समझते हैं और न ही हमारे देश के इतिहास को, जो वाकई बेहद निराशाजनक है… उम्मीद है प्रियंका इसे देखेंगी और समझेंगी। मेरा मतलब है कि उन्होंने कश्मीर और लद्दाख के आधे हिस्से को ही हटा दिया है, जो कि नियंत्रण रेखा (LOP) और संपर्क रेखा (LOC) पर है, लेकिन फिर भी भारत का अभिन्न अंग है। शुरुआत में दिखाया गया नक्शा निश्चित रूप से पूरे भारत को नहीं दर्शाता। यह वाकई बेहद असंवेदनशील है।”
एक यूजर ने आपत्ति जताते हुए कहा कि एक भारतीय का इंटरव्यू करना, वो भी भारत के गलत नक्शे के साथ। उन्होंने कहा कि यह सही नहीं है।
अन्य यूजर ने लिखा, “भारत का गलत नक्शा इस्तेमाल न करें। उस हिस्से को हटा दें या फिर भारत सरकार द्वारा जारी किया गया असली और सही नक्शा ही दिखाएँ।”
अन्य यूजर ने लिखा, “आप भारत का गलत नक्शा क्यों दिखा रहे हैं… यह हमारा अपमान है… किसी की ज़मीन पर कब्ज़ा नहीं किया जा सकता… यह बात याद रखें।”
एक यूजर ने कहा, “मुझे नहीं पता कि आप जानबूझकर भारत का गलत नक्शा लगा रहे हैं या नहीं, लेकिन यह बहुत ही अपमानजनक है और आपके परिचय वाले हिस्से में मुझे यह जानकारी नहीं मिल पाई।”
एक यूजर ने वीडियो को डिसलाइक कर दिया यह कहते हुए कि भारत का गलत नक्शा दिखाया गया है।
एक यूजर ने गुस्से में लिखा, “वीडियो से पहले और बाद में जो संगीत बजाया गया है, वह बिल्कुल भी भारतीय नहीं है और वीडियो में दिखाया गया नक्शा भी सटीक नहीं है। कश्मीर भारत का हिस्सा है। वह शानदार है, लेकिन संपादक बिल्कुल ही घटिया है।”
वीडियो में भारत के गलत नक्शा दिखाने से ज्यादा यूजर्श को इस बात से परेशानी हुई कि भारतीय होने के नाते प्रियंका चोपड़ा ने इस मुद्दे पर चुप्पी क्यों साधी है। नेटिजन्स ने पूछा कि क्या प्रियंका चोपड़ा को इससे फर्क नहीं पड़ता है। बता दें कि 5 दिन पहले रिलीज हुए इस इंटरव्यू में भारत का गलत नक्शा दिखाने के बावजूद प्रियंका चोपड़ा या उनकी टीम की तरफ से कोई आपत्ति दर्ज नहीं की गई और न ही सार्वजनिक तौर पर कोई बयान जारी किया गया है। न ही अब तक मैगजीन ने कोई माफी माँगी है।
इंटरव्यू में प्रियंका चोपड़ा से भारतीय होने के नाते पूछे कई सवाल
दरअसल, वैरायटी ने प्रियंका चोपड़ा के साथ ‘इंडियन और नॉट इंडियन’ के इस सेगमेंट में भारत से जुड़े कई सवाल पूछे। उनसे अलग-अलग चीजों के बारे में पूछा जाता है कि वे चीजें भारतीय हैं या नहीं।
इंटरव्यू के दौरान प्रियंका से खाने-पीने की चीजों, संस्कृति और परंपराओं से जुड़े सवाल पूछे गए। उन्होंने मोर, योग, शतरंज, चाय, बासमती चावल, घी और बटर चिकन को भारतीय बताया। वहीं उन्होंने कहा कि चिकन टिक्का मसाला और चाय लाटे भारतीय नहीं माने जाते। वह सवालों के जवाब हल्के-फुल्के और मजेदार अंदाज में देती नजर आईं।
लेकिन वीडियो की शुरुआत में दिखाए गए भारत के नक्शे ने लोगों का ध्यान खींचा। नेटिजन्स ने वीडियो के कमेंट बॉक्स में बहस की। कुछ लोगों ने वीडियो के उस हिस्से को हटाने या सही नक्शा दिखाने की माँग की। हालाँकि अब तक कोई बयान या नक्शा हटाने की कार्रवाई नहीं हुई है।
उत्तर प्रदेश की मेरठ पुलिस ने 14 फरवरी 2026 को एक अम्मी और उसकी बेटी के खिलाफ केस दर्ज किया। आरोप है कि ये दोनों करीब 30 साल से भारत में रह रही थीं, जबकि वे पाकिस्तानी नागरिक हैं। इस मामले की शिकायत सामाजिक कार्यकर्ता रुखसाना ने की है। उन्होंने आरोप लगाया कि अम्मी-बेटी ने धोखे से भारतीय पहचान पत्र बनवा लिए। रुखसाना ने शिकायत में बताया कि पाकिस्तानी नागरिक होने के बावजूद दोनों ने फर्जी तरीके से आधार कार्ड, वोटर आईडी और भारतीय पासपोर्ट तक हासिल कर लिया।
मीडिया से बात करते हुए SSP अविनाश पांडेय ने बताया कि उन्हें फरहत मसूद नाम के एक व्यक्ति के बारे में जानकारी मिली। वह दिल्ली गेट इलाके में रहता है। बताया जा रहा है कि फरहत मसूद पाकिस्तान गया था, जहाँ उसने सबा नाम की औरत से निकाह किया। वहीं पाकिस्तान में उनकी एक बेटी पैदा हुई। सबा और उसकी बेटी दोनों ही पाकिस्तानी नागरिक हैं।
30 साल से बिना नागरिकता के रह रही पाकिस्तानी मां-बेटी#मेरठ : जली कोठी में रह रही मां-बेटी
⏩सबा उर्फ नाजी उर्फ नाजिया और एनम फरहत
⏩ 30 साल से भारत में बिना भारतीय नागरिकता निवास
⏩ एसपी सिटी आयुष विक्रम ने FIR के बाद जांच के आदेश दिए
SSP ने बताया कि शुरुआती जाँच में यह साफ हो गया है कि आरोपित बिना वैध भारतीय नागरिकता के यहाँ रह रहे थे। उन्होंने कहा कि इससे पहले SP सिटी द्वारा की गई जाँच में भी आरोपों में सच्चाई पाई गई थी। जाँच में तथ्य सामने आने के बाद अब इस मामले में औपचारिक रूप से FIR दर्ज कर ली गई है। पुलिस ने बताया कि आगे की कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है और पूरे मामले की गहराई से जाँच के आदेश दे दिए गए हैं।
मामले में FIR की पूरी जानकारी
ऑपइंडिया ने इस मामले में दर्ज की गई FIR की कॉपी देखी है। इस FIR में सबा मसूद उर्फ नाजी उर्फ नाजिया और उशकी बेटी ऐमन फरहत को मुख्य आरोपित बताया गया है। इन दोनों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS)2023 की कई धाराएँ लगाई गई हैं।
इनमें धारा 318(4), 336(3), 338, 340(2), 351(2) और 352 शामिल हैं। ये धाराएँ धोखाधड़ी, जालसाजी, फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल करने और आपराधिक धमकी देने जैसे आरोपों से जुड़ी हुई हैं।
(फोटो साभार: UP पुलिस)
शिकायतकर्ता ने बताया कि सबा ने पाकिस्तान में फरहत मसूद से निकाह किया था और उनके बेटी ऐमन का जन्म वहीं 25 मई 1993 को हुआ था। उन्होंने आगे कहा कि जब सबा भारत आई, तो ऐमन भी उसके साथ ही आई थी। ऐमन ने भारत में एंट्री सबा के पाकिस्तानी पासपोर्ट के जरिए की थी। उस पासपोर्ट में ऐमन का नाम और उसकी जन्मतिथि साफ-साफ दर्ज थी।
शिकायतकर्ता रुखसाना ने आगे बताया कि अम्मी और बेटी, दोनों ही पाकिस्तानी नागरिक होने के बावजूद मेरठ में रह रही थीं। उन्होंने कभी भी कानूनी तरीके से भारतीय नागरिकता लेने की प्रक्रिया पूरी नहीं की। रुखसाना ने यह भी कहा कि ऐमन ने मेरठ में ही पढ़ाई की, जबकि वह पाकिस्तानी नागरिक थी।
(फोटो साभार: UP पुलिस)
उन्होंने आगे बताया कि ऐमन के लिए भारतीय पासपोर्ट बनवाने के लिए फर्जी और बनावटी दस्तावेज तैयार किए गए। रुखसाना के मुताबिक, सबा ने भी दो अलग-अलग नामों से वोटर कार्ड बनवा लिए थे। इनमें एक सबा मसूद के नाम से और दूसरा नाजिया मसूद के नाम से था। शिकायत में कहा गया है कि ये सब जानबूझकर अपनी असली पहचान छिपाने और भारतीय अधिकारियों को धोखा देने के लिए किया गया।
रुखसाना ने अपनी शिकायत में सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई। उनका कहना है कि आरोपित फर्जी पासपोर्ट और दस्तावेजों के आधार पर कई बार पाकिस्तान और दूसरे देशों की यात्रा कर चुके हैं। उन्होंने पुलिस को यह भी बताया कि सबा के अब्बा हनीफ अहमद कथित तौर पर पाकिस्तान नागरिक थे और उनका संबंध ISI से बताया जाता है। रुखसाना के अनुसार, इसी वजह से यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी गंभीर हो जाता है।
शिकायत में यह भी कहा गया है कि आरोपित अपनी असली पहचान छिपाकर दिल्ली में सेना मुख्यालय और दूसरे सरकारी दफ्तरों में भी अकसर आते-जाते रहे हैं। FIR में यह भी दर्ज है कि शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि जब उन्होंने पहले इस मामले पर आपत्ति जताई थी तब उन्हें धमकाया और डराया गया था। रुखसाना का कहना है कि आरोपितों ने उन्हें यह कहकर दबाव बनाने की कोशिश की कि उनकी राजनीतिक पहुँच है और पुलिस प्रशासन में भी उनके संबंध हैं।
(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)
भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई का इस्तेमाल हर क्षेत्र में लगातार बढ़ रहा है। 2027 में ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को हासिल करने में एआई अहम भूमिका निभाएगा। लेकिन इसका फायदा कुछ लोगों तक ही सीमित न रह जाए, इसके लिए सरकार कई योजनाएँ लेकर आई है। मूल रूप से एआई समाज में हर तबके तक पहुँच के साथ आर्थिक विकास में अहम भूमिका निभाएगा। सरकार ने एआई इकोसिस्टम को आकार देने में लगी हुई है।
कंप्यूटरिंग पावर, जीपीयू और अनुसंधान के अवसर हर व्यक्ति तक पहुँचे, इसलिए किफायती दरों पर इसे उपलब्ध कराए जा रहे हैं। स्टार्टअप्स और इनोवेटर्स को विश्वस्तरीय एआई इंफ्रास्ट्रक्चर से जोड़ा जा रहा है। इंडिया एआई मिशन की स्थापना की गई है।
साभार-pib
इसके अंतर्गत राष्ट्रीय कंप्यूटर सुविधा के माध्यम से 38000 से अधिक जीपीयू को शामिल किया गया है। एआई कोश में 9500 से अधिक डेटासेट और 273 क्षेत्रीय मॉडल शामिल हैं। राष्ट्रीय सुपर कंप्यूटरिंग मिशन से ऐरावत और परम सिद्धि एआई समेत 40 से ज्यादा पेटाफ्लॉप सिस्टम काम कर रहे हैं। इंडिया एआई और फ्यूटरस्किल्स पहल के माध्यम से अभी 500 पीएचडी, 5000 पोस्ट ग्रेजुएट और 8000 ग्रेजुएट स्टूडेंट्स की मदद की जा रही है।
अलग-अलग राज्यों में 570 एआई डेटा लैब और 27 इंडिया एआई लैब इनोवेशन को बढ़ावा दे रही हैं। करीब 90 फीसदी स्टार्टअप किसी न किसी एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे इनोवेशन के इकोसिस्टम में एआई की जड़ें गहरी होती जा रही है।
इंडिया एआई कंप्यूट, एआई एप्लिकेशन डेवलपमेंट पहल, एआई कोश समेत 7 स्तंभों पर आधारित ये ढाँचा भारत में अनुसंधान, कौशल विकास, नवाचार और जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल को बढ़ावा दे रहा है। ये सारी कवायद देश को एआई पावरहाउस बनाने की दिशा में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
भारत में एआई का बढ़ता इकोसिस्टम
भारत में एआई इकोसिस्टम तेजी से बढ़ रहा है अब करीब 60 लाख लोग इससे जुड़ गए हैं। देश में 1800 से अधिक ग्लोबल सेंटर हैं जिसमें से 500 से ज्यादा सेंटर्स में एआई का इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है। देश में करीब 1.8 लाख स्टार्टअप्स हैं।
(साभार-pib)
पिछले साल के स्टार्टअप्स में करीब 90 फीसदी एआई का इस्तेमाल कर रहे हैं। उद्योग, बैंकिंग, बीमा, ऑटोमोटिव और उपभोक्ता वस्तुओं के क्षेत्र में एआई का करीब 60 फीसदी इस्तेमाल हो रहा है। बीसीजी के सर्वे के मुताबिक, करीब 26 फीसदी भारतीय कंपनियाँ एआई के इस्तेमाल में परिपक्व हो गई हैं।
एआई के 7 सिद्धांत
एआई के विकास में 7 बातों पर जोर दिया गया है। इसमें कहा गया है कि नवाचार की प्रगति के लिए जोखिम कम करना जरूरी है। इसके लिए विश्वास जरूरी है। विश्वास वह मूलभूत सिद्धांत है जो भारत में सभी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास और तैनाती का मार्गदर्शन करता है।
(साभार-PIB)
जनता हर हाल में एआई के केन्द्र में रखा जाना चाहिए। एआई सिस्टम को इस तरह से इस्तेमाल किया जाना चाहिए ताकि मानवीय और सामाजिक मूल्यों में वृद्धि हो और सबको इसका फायदा मिले। नवाचार को वरीयता मिले और सामाजिक-आर्थिक विकास हो, समावेशी विकास को बढ़ावा मिले और बगैर भेदभाव के हाशिए पर पड़े समुदायों तक इसका फायदा पहुँचे।
कृषि क्षेत्र में एआई
फसलों को होने वाली बीमारियों का पता लगाने, मौसम की भविष्यवाणी , मिट्टी की जाँच और उसकी उर्वरकता को बढ़ाने और सिंचाई को आधुनिक बनाने में एआई का इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे पैदावार में जबरदस्त इजाफा होगा। सरकार ‘किसान ई-मित्र’ चैटबॉट बनाई है जिसके माध्यम से 11 भाषाओं में किसानों की मदद की जा रही है। 2025 तक 93 लाख सवालों के जवाब दिए गए।
डिजिटल कृषि मिशन के तहत 7.63 करोड़ से अधिक किसान आईडी कार्ड बना कर 23.5 करोड़ खेती वाली जमीन का सर्वे कराया गया और एक डिजिटल आधार तैयार किया गया। राष्ट्रीय कीट निगरानी सिस्टम बनाया गया है जो 66 फसलों और उनमें लगने वाली 432 कीटों का पता लगाने के लिए 10000 लोगों को नियुक्त किया। ये किसानों को परामर्श देते हैं।
स्थानीय मानसून के हिसाब से खरीफ 2025 के लिए एआई आधारित परियोजना शुरू किया गया जो एसएमएस के जरिेए 13 राज्यों के 3.88 करोड़ किसानों को बुवाई और दूसरी जानकारी दी। यस टेक, क्रॉपिक और पीएमएफबीवाई व्हाट्सएप चैटबॉट बनाया गया।
(साभार-PIB)
खेती की जाने वाली जमीन की मिट्टी की उर्वरकता और स्वास्थ्य का पता लगाने में एआई का इस्तेमाल हो रहा है। इससे मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी और मृदा तनाव का पता चलता है। समय रहते किसान को बताया जाता है कि उसे क्या करना चाहिए। भारत की कृषि व्यवस्था में मानसून का काफी प्रभाव है इसलिए वर्षा के बदलते पैटर्न,तापमान में उतार चढ़ाव का पूर्वानुमान लगाता है।
इससे बुवाई का वक्त,सिंचाई, कीट प्रबंधन और खाद के उपयोग को लेकर किसानों को सही सलाह देता है। फसलों को होने वाले रोगों, कीटों की जानकारी देता है और फसलों को संभावित नुकसान से किसानों को बचाता है।
जलवायु संबंधी दूसरी जानकारी किसानों के लिए फायदेमंद हैं। उपग्रह से मिले चित्रों, ड्रोन, सेंसर और दूसरे माध्यम से मिली जानकारी को एआई एक साथ समीक्षा कर सही जानकारी उपलब्ध कराता है।
कृषि में आधुनिक मशीनों का उपयोग
खेती को सही तरीके से करने के लिए उसका विश्लेषण जरूरी है। जीपीएस, सेंसर, उपग्रहों और ड्रोन की मदद से एआई भूमि की सटीक जानकारी देता है। मिट्टी की क्वालिटी, नमी का स्तर, फसल की पौष्टिकता से संबंधित डेटा को स्थानीय स्तर पर जमा करता है और पानी, उर्वरक, कीटनाशक जैसे इनपुट का ठीक उसी स्थान और समय पर डाला जाना सुनिश्चित करता है , जहाँ और जितनी उनकी आवश्यकता होती है। इससे उत्पादकता बढ़ती है और संसाधनों का अधिकतम उपयोग करता है जिससे किसानों का खर्च कम हो जाता है।
भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान रोबॉटिक खेती को विकसित करने में लगा हुआ है। इसमें जीपीएस के सहारे खुद चलने वाले ट्रैक्टर, एआई द्वारा बीजों के चयन, जमीन की उर्वरकता का पता लगाना, सिंचाई में रॉबोट का इस्तेमाल ताकि बुवाई, कटाई से लेकर सिंचाई तक को मानव रहित बनाने पर विचार हो रहा है। इससे किसानों के खर्च कम होंगे। यहाँ तक कि फसलों की गुणवत्ता अच्छी होगी। उनकी निगरानी करना आसान हो जाएगा और फसलों की बीमारी, पोष्टिकता और बीमारियों का इलाज भी आसानी से हो जाएगा।
भारत सरकार ने 22 अक्टूबर 2025 को “फ्यूचर फार्मिंग इन इंडिया: एआई प्लेबुक फॉर एग्रीकल्चर” शीर्षक से एक बुकलेट जारी किया। इसमें छोटे किसानों को कैसे एआई का जिम्मेदारीपूर्वक इस्तेमाल किया जाए, इसकी जानकारी दी गई है। इससे किसानों को अच्छी और कम खर्च पर फसलों को पाने और बाजार तक पहुँचाने में मदद मिलेगी।
स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में एआई
AI का उपयोग टीबी, कैंसर और न्यूरोलॉजी डिसऑर्डर का पता लगाने और उसके निदान में अहम भूमिका निभा रहा है। एआई भारत सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं की डिलीवरी में आ रही कमियों की जानकारी देता है। चिकित्सा उपकरणों, सेवाओं और दवाओं की गुणवत्ता में सुधार लाने और उन्हें किफायती बनाने में मदद कर रहा है। यहाँ तक कि दूर बैठ कर बीमारियों का इलाज और देखभाल करने में मदद कर रहा है।
राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम में एआई का इस्तेमाल किया जा रहा है। रोग को फैलने से जुड़ी 4500 चेतावनी जारी की गई। अप्रैल 2023 से नवंबर 2025 के बीच 282 लाख टेलीमेडिसिन सुझावों में एआई का इस्तेमाल हुआ और एआई के बताए गए निदान के जरिए 12 लाख रोगियों की मदद की गई।
(साभार-PIB)
रेडियोलॉजी एआई के द्बारा कैंसर के संभावित मामलों के लिए गांठों और केविटीज की पहचान हेतु डिजिटल एक्स-रे की ऑटोमेटेड रीडिंग लेता है। ये 8 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में लागू है। इससे विशेषज्ञों की कमी को पूरा करने में मदद मिल रही है।
शुगर पेशेंट की रेटिना की जाँच अक्सर होती है। इसके अलावा दिखाई कम देने पर रेटिना पर प्रेशर पड़ता है। ऐसे में एआई रेटिनल ट्रायज नॉन स्किल लोगों को भी रेटिना की तस्वीर लेने में मदद करता है, उसकी रिडिंग, ग्रेडिंग करता है और जरूरी होने पर विशेषज्ञों को दिखाने को कहता है। भारत का पहला एआई-सक्षम सामुदायिक स्क्रीनिंग कार्यक्रम दिसंबर 2025 में लॉन्च किया गया जीनोमिक-आयुर्वेद हाइब्रिड के माध्यम से प्रकृति और प्राचीन ग्रंथों के आधार पर रोग के संकेत पहचानने के लिए एआई का उपयोग हो रहा है। पारंपरिक ज्ञान के साथ एआई को एकीकृत करने के लिए डब्ल्यूएचओ ने इसे एक ग्लोबल मॉडल के तौर पर मान्यता दी। कैंसर रोगियों के लिए बायोबैंक तैयार किया जा रहा है जिसमें कैंसर रोगियों की प्रोफाइल होगी और ये शोधकर्ताओं को कैंसर का जल्दी पता लगाने और एआई टूल्स विकसित करने में मदद करता है। स्वास्थ्य संबंधी धोखाधड़ी को रोकने में भी एआई सहायक है।
विभिन्न रोगों के निदान और हाशिए पर रहने वाले समुदायों के स्वास्थ्य परिणाम में सुधार लाने से लेकर स्वच्छ जल जैसी बुनियादी सुविधाओं तक पहुँच सुनिश्चित करने तक भारत में स्वास्थ्य सेवा में एआई का नवाचारी उपयोग मानवता के लिए फायदेमंद है। मानव जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण चुनौतियों को हल करने, समावेशी सामाजिक और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने और विकसित भारत @2047 के विजन को साकार करने के लिए प्रौद्योगिकी के उपयोग को साकार कर रहा है।
शिक्षा के क्षेत्र में एआई
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत एआई को CBSE पाठ्यक्रम, DIKSHA प्लेटफॉर्म और YUVAi जैसी पहल के माध्यम से छात्रों में कौशल का विकास किया जा रहा है। 38000 से अधिक GPUs ₹65 प्रति घंटे के हिसाब से मौजूद है जिससे एआई तक पहुँच को बढ़ावा मिला है। 5G अब 99.9 प्रतिशत जिलों में मौजूद है। इससे पूरे भारत में एआई इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूती मिल रही है। ए
आईकोश साझा राष्ट्रीय संसाधन के रूप में 7,500+ डेटासेट और 273 मॉडल दे रहा है। क्राफ्ट्समेन ट्रेनिंग स्कीम यानी शिल्पकार प्रशिक्षण योजना के तहत, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, इंडस्ट्रियल रोबोटिक्स और पर्यावरण के अनुकूल तकनीकों सहित 31 नए जमाने के पाठ्यक्रमों में प्रशिक्षण दिया जा रहा है। ये राष्ट्रीय कौशल प्रशिक्षण संस्थानों के राष्ट्रव्यापी नेटवर्क के माध्यम से संचालित किए जा रहे हैं। अनुसंधान आधारित नवाचार को बढ़ावा देने के लिए उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं।
दरअसल एआई का लोकतांत्रिकरण किया जा रहा है यानी सबके लिए इसे सुलभ, किफायती और उपयोगी बनाना है। आर्थिक मौके बढ़ाना है।
(साभार-PIB)
भारत की सांस्कृतिक विरासत और भाषाई विविधता इसकी सामाजिक पहचान और साझा ज्ञान प्रणालियों को आकार देती है। एआई का इस्तेमाल पांडुलिपियों के डिजिटाइज़ेशन, शैक्षणिक सामग्री के अनुवाद और आदिवासी और लुप्तप्राय भाषाओं को शामिल करके सांस्कृतिक और ज्ञान संपत्तियों को इस्तेमाल लायक बनाने के लिए किया जा रहा है।
एआई का इस्तेमाल सांस्कृतिक और रचनात्मक क्षेत्रों को डिजिटली जोड़ने के साथ-साथ कारीगरों को प्लेटफॉर्म और नए अवसर प्रदान करने के लिए किया जा रहा है। सर्वम् एआई (Sarvam AI) भारतीय भाषाओं के लिए बड़े भाषा और स्पीच मॉडल विकसित कर रहा है, जिससे वॉइस इंटरफेस, दस्तावेजों की प्रोसेसिंग और नागरिक सेवाओं की आसान बनाया जा सके।
भाषिणी, राष्ट्रीय भाषा अनुवाद मिशन के तहत, में 350+ एआई मॉडल हैं, जिनमें स्पीच रिकग्निशन, मशीनी अनुवाद, टेक्स्ट-टु-स्पीच, ओसीआर और भाषा पहचानना शामिल हैं, जिससे डिजिटल सेवाएँ बहुभाषाई हो सकें।
बैंकिंग और वित्तीय सेवा
बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र में एआई का इस्तेमाल धोखाधड़ी का पता लगाने, व्यक्तिगत बैंकिंग, और कस्टमर सर्विस के लिए किया जा रहा है। इसका उपयोग संदिग्ध लेनदेन, बेनामी अकाउंट्स और असामान्य म्यूल अकाउंट्स के पैटर्न की पहचान करने के लिए किया जा रहा है। मशीन लर्निंग एल्गोरिदम का उपयोग करके एआई बैंकिंग डेटा का विश्लेषण करता है, जिससे धोखाधड़ी का पता लगाने में मदद मिलती है और बैंकों को करोड़ों के नुकसान से बचाया जा सकता है।
एआई ग्राहकों के सामान्य खर्च करने के पैटर्न को सीखता है और यदि कोई लेन-देन सामान्य पैटर्न से अलग होता है, तो उसे संदिग्ध मानकर तत्काल कार्रवाई (जैसे कार्ड ब्लॉक करना) करता है।
जनरेटिव एआई का उपयोग लोन एप्रूवल के दौरान पहचान पत्रों और दस्तावेजों की सत्यता की जाँच करने के लिए किया जा रहा है, ताकि फर्जीवाड़े को रोका जा सके।
कोर्ट और न्याय दिलाने में एआई का इस्तेमाल
कानून और लोगों को न्याय दिलवाने में एआई का इस्तेमाल होने लगा है। साल 2023 में शुरू हुए ई-कोर्ट फेज III के माध्यम से कोर्ट रूम और लेखागारों में बदलाव आ गया है। एआई का उपयोग अदालती फैसलों के अनुवाद, केस प्रबंधन और अनुसूची के लिए किया जा रहा है। दस्तावेजों की डिजिटल फाइलिंग की जा रही है। वाद सूचियों को व्यवस्थित किया जा रहा है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुनवाई नियमित तौर पर हो रही है। कोर्ट के रिकॉर्ड और फैसले पूरे देश में कहीं भी देखा और पढ़ा जा सकता है।
(साभार-pib)
सरकार, उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालयों, एनआईसी और आईआईटी मद्रास जैसे संस्थानों की मदद से एआई टूल्स तैयार किया गया है जिससे मौखिक दलीलों का लिखना, फैसलों का अनुवाद, ईफाइलिंग में गलतियों को पहचानना, विधिक शोध शामिल है।
इसका असर किसी केस के फैसले के दौरान दोषी ठहराने, वाद-विवाद करने और तथ्यों को कोर्ट में रखने की परंपरा पर नहीं पड़ा है। लेकिन एआई का असर ये हुआ है कि अब लंबी सुनवाई की जरूरत नहीं है, तथ्यों को खोजने में कम वक्त, मातृभाषा में कोर्ट के फैसले की जानकारी, रिकॉर्ड ढूँढने में कम वक्त लगना जैसी सुविधाएँ बढ़ी हैं। इसका न्यायिक फैसले के मूल भावना पर असर नहीं पड़ता है, बल्कि मुकदमों में होने वाली देरी और तनाव से लोग बचते हैं। तारीख पे तारीख से लोगों को निजात आगे मिलेगी, ऐसी उम्मीद है।
विनिर्माण में एआई की अहम भूमिका
विनिर्माण के क्षेत्र में एआई का इस्तेमाल धड़ल्ले से हो रहा है। उद्योग और मोटर वाहनों की परिचालन दक्षता बढ़ाने में एआई अहम भूमिका निभा रहा है। इससे उत्पादन बढ़ाने, लागत कम करने और गुणवत्ता सुधारने में मदद मिल रही है। सेंसर डेटा के द्वारा खराब होने से पहले ही मशीनों की पहचान कर उसकी मरम्मत कर दी जाती है, जिससे अचानक बंद होने जैसी परेशानियों से बचा जा सकता है।
AI-पावर्ड विज़न कम्प्यूटर सिस्टम उत्पाद की गुणवत्ता की जाँच करते हैं, जो मनुष्य द्वारा किए जाने वाले निरीक्षण से ज्यादा अच्छा होता है और गड़बड़ी जल्दी पकड़ में आ जाती है। एआई बाजार का विश्लेषण कर ये बताता है कि माँग कितनी है जिससे आपूर्ति का अंदाजा लग जाता है।
डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना यानी डीपीआई के साथ एआई को जोड़कर सरकारी सेवाओं को सुलभ और कुशल बनाया जा रहा है। एआई का इस्तेमाल हर क्षेत्र में हो रहा है। इसका जिम्मेदारी से उपयोग के लिए दिशानिर्देश जारी किए गए हैं और गवर्नेंस फ्रेमवर्क विकसित किए जा रहे हैं। ताकि देश में एआई सुशासन में मदद करे। विश्वास के साथ पूरे देश की भलाई और लोकतंत्र को मजबूत करने में एआई अहम भूमिका निभाए। भारत इस नजरिए के साथ भारत@ 2047 डिजिटल मिशन पर है।
पंजाब में कैंसर का संकट बेहद गंभीर होता जा रहा है। औसतन हर दिन आठ महिलाओं की कैंसर से मौत हो रही है। ताजा आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में करीब 2,700 महिलाओं की जान कैंसर के कारण जा चुकी है।
यह मामला 12 फरवरी को राज्यसभा में उठाया गया। आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसद बलबीर सिंह सीचेवाल ने सदन में इस गंभीर स्थिति की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि यह पंजाब के अस्तित्व से जुड़ा विषय है। उन्होंने केंद्र सरकार और पंजाब सरकार से तत्काल कदम उठाने की माँग की।
सीचेवाल ने राज्यसभा में उठाया मुद्दा
सीचेवाल ने विशेष उल्लेख (Special Mention) के दौरान पंजाब में महिलाओं के बीच बढ़ते कैंसर मामलों का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि राज्य में कैंसर के मामलों में तेजी से हो रही बढ़ोतरी बेहद चिंताजनक है और इस पर तुरंत कार्रवाई की जरूरत है।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2025 में पंजाब में लगभग 2,700 महिलाओं की कैंसर से मौत हुई जो औसतन प्रतिदिन 8 महिलाओं की मृत्यु के बराबर है। वर्ष 2021 से 2025 के बीच कुल 13,299 महिलाओं की कैंसर से जान गई। इनमें सबसे अधिक 7,186 मौतें स्तन कैंसर से हुईं, इसके बाद गर्भाशय ग्रीवा कैंसर (Cervix Uteri) से 3,502 और अंडाशय कैंसर (Ovary cancer) से 2,611 महिलाओं की मृत्यु हुई।
उन्होंने आगे कहा, “चिंताजनक बात यह है कि 40 से 45 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं में भी कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि यह बीमारी अब केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही बल्कि कम उम्र की महिलाओं के लिए भी बड़ा खतरा बनती जा रही है। उन्होंने पर्यावरणीय कारणों, खासकर जल प्रदूषण और कृषि में रासायनिक उर्वरकों के व्यापक उपयोग को इसके प्रमुख कारणों में बताया। उनका कहना था कि ये रसायन मिट्टी में मिलकर अंततः खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मानव शरीर में पहुँच जाते हैं।
सीचेवाल ने कहा कि ये आँकड़े नीति बनाने वालों और समाज दोनों के लिए चेतावनी हैं और इस पर गंभीरता से ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।
पंजाब में कैंसर के बढ़ते केस, इलाज में राहत की माँग
पर्यावरण प्रदूषण को कैंसर के बड़े कारणों में से एक माना गया है। प्रदूषित पीने का पानी, खेती में केमिकल खाद और कीटनाशकों का ज्यादा इस्तेमाल और उद्योगों का कचरा इसके संभावित कारण बताए गए हैं। सीचेवाल ने कहा कि जब माताओं के स्तन दूध में DDT जैसे खतरनाक रसायन पाए गए तब जाकर इन रसायनों पर रोक लगाई गई। इससे साफ होता है कि जहरीले तत्व कितनी गहराई तक इंसानी शरीर में पहुँच सकते हैं।
उन्होंने सरकार से माँग की कि महिलाओं के लिए कैंसर का इलाज पूरी तरह मुफ्त किया जाए। साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को सरकारी या निजी अस्पतालों में इलाज के लिए कम से कम 75 से 80 प्रतिशत तक की सहायता दी जाए। उन्होंने कहा कि महिलाएँ परिवार और समाज की रीढ़ होती हैं, इसलिए पंजाब के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए उनके स्वास्थ्य की रक्षा जरूरी है।
पंजाब को क्यों कहा जाता है कैंसर कैपिटल?
पंजाब खासकर मालवा क्षेत्र को लंबे समय से भारत की ‘कैंसर कैपिटल’ कहा जाता है। कृषि उत्पादन के लिए मशहूर मालवा आज ‘कैंसर बेल्ट’ के नाम से भी जाना जाने लगा है।
Asian Pacific Journal of Cancer Prevention में प्रकाशित एक शोध पत्र में पंजाब के 500 कैंसर मरीजों का अध्ययन किया गया था। इस अध्ययन के अनुसार, 500 मरीजों में से 65% महिलाएँ और 35% पुरुष थे। महिलाओं में 50–54 और 60–64 वर्ष आयु वर्ग सबसे अधिक प्रभावित पाया गया। वहीं, पुरुषों में 65–69 और 60–64 वर्ष आयु वर्ग में कैंसर का खतरा सबसे ज्यादा देखा गया।
महिलाओं में सबसे अधिक स्तन कैंसर के मामले सामने आए, इसके बाद गर्भाशय ग्रीवा (सर्विक्स) और अंडाशय (ओवरी) का कैंसर प्रमुख रहा। पुरुषों में सबसे ज्यादा कोलन (बड़ी आंत) का कैंसर पाया गया, इसके बाद भोजन नली (इसोफेगस) और जीभ का कैंसर प्रमुख रहा।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पंजाब में प्रति 1 लाख आबादी पर कम से कम 172 कैंसर मरीज दर्ज किए गए थे जबकि मालवा क्षेत्र में कैंसर के मामले और भी अधिक पाए गए। हाल के अनुमानों के मुताबिक मालवा में कैंसर की दर चिंताजनक स्तर तक पहुँच चुकी है। कैंसर के बढ़ते मामलों के लिए कृषि रसायनों और कीटनाशकों को व्यापक रूप से जिम्मेदार ठहराया जाता है।
राष्ट्रीय स्तर पर भी कैंसर के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2023 में भारत में लगभग 15 लाख कैंसर के मामले दर्ज किए गए जो 2022 में 14.6 लाख थे। विशेषज्ञों का मानना है कि जीवनशैली में बदलाव, पर्यावरण प्रदूषण, आनुवंशिक कारण और देर से जाँच (डायग्नोसिस) कैंसर के मामलों में वृद्धि के प्रमुख कारण हैं। हालाँकि, पूरे देश में कैंसर के मामले बढ़ रहे हैं लेकिन पंजाब की स्थिति विशेष रूप से गंभीर मानी जा रही है क्योंकि यहाँ प्रदूषण और कृषि केमिकल्स से इसका संबंध है।
पंजाब की ‘कैंसर ट्रेन’
पंजाब की कैंसर स्थिति का सबसे मार्मिक प्रतीक है बठिंडा-बीकानेर ट्रेन जिसे लोग ‘कैंसर ट्रेन‘ कहते हैं। हर रात करीब 9:30 बजे 12 डिब्बों वाली यह ट्रेन बठिंडा से सैकड़ों यात्रियों, जिनमें कई कैंसर मरीज होते हैं, को लेकर रवाना होती है। लगभग 325 किलोमीटर का सफर तय कर यह सुबह राजस्थान के बीकानेर पहुँचती है।
अधिकांश मरीज आचार्य तुलसी क्षेत्रीय कैंसर अस्पताल और रिसर्च सेंटर में इलाज कराने जाते हैं। बीकानेर में इलाज अपेक्षाकृत सस्ता होने के कारण बड़ी संख्या में मरीज दूसरे राज्य से रुख करते हैं। कैंसर मरीजों को ट्रेन में मुफ्त यात्रा की सुविधा मिलती है जबकि उनके साथ आने वाले को 75% किराया छूट दी जाती है।
मुख्यमंत्री पंजाब कैंसर राहत कोष योजना के तहत बीकानेर के कुछ अस्पतालों में मरीजों को 15 लाख रुपए तक की आर्थिक सहायता भी दी जाती है। रातभर सफर कर इलाज के लिए जाते मरीजों के हाथों में मेडिकल फाइलों से भरे प्लास्टिक कवर, इस गंभीर संकट की दर्दनाक तस्वीर बन चुके हैं।
कौन हैं बलबीर सिंह सीचेवाल?
संत बलबीर सिंह सीचेवाल को ‘ईको बाबा’ के नाम से जाना जाता है। वह पंजाब के एक सिख पर्यावरण कार्यकर्ता, आध्यात्मिक नेता और राज्यसभा सांसद हैं। उन्हें आम आदमी पार्टी (AAP) ने उनके पर्यावरण संरक्षण कार्यों के लिए नामित किया था।
उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान उस समय मिली जब उन्होंने काली बेईं नदी की सफाई का बड़ा अभियान चलाया। यह नदी लगभग 160 किलोमीटर बहने के बाद सतलुज और ब्यास नदियों में मिलती है। एक समय यह नदी औद्योगिक कचरे और दर्जनों गांवों के गंदे पानी के कारण पूरी तरह प्रदूषित होकर कूड़ाघर बन चुकी थी।
ऐसे हालात में संत सीचेवाल ने स्वयंसेवकों के सहयोग से एक विशाल जनआंदोलन खड़ा किया और नदी को पुनर्जीवित करने का काम किया। उनके इस प्रयास की विश्व स्तर पर सराहना हुई। वर्ष 2008 में उन्हें ‘टाइम’ पत्रिका द्वारा ‘पर्यावरण के नायक’ (Hero of the Environment) सम्मान दिया गया। उस समय यह सम्मान पाने वाले वे एकमात्र भारतीय और एशियाई थे।
उन्होंने ‘सीचेवाल मॉडल’ भी शुरू किया जो कम लागत वाली अंडरग्राउंड सीवेज व्यवस्था है। इस प्रणाली के माध्यम से गंदे पानी को शुद्ध कर खेतों में उपयोग किया जाता है। इस मॉडल को पंजाब सरकार का समर्थन भी मिला है। संत सीचेवाल स्वास्थ्य समस्याओं विशेषकर कैंसर को प्रदूषण से जोड़ते हैं। वे साफ जल और साफ हवा के लिए लगातार आवाज उठाते रहे हैं और संसद में किसानों से लेकर पर्यावरण संकट तक के मुद्दों पर सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में श्रृति सागर ने लिखी है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)
नई दिल्ली में 16 से 20 फरवरी 2026 तक होने जा रहा भारत-एआई प्रभाव शिखर सम्मेलन 2026 (India AI Impact Summit 2026) अब शुरू हो चुका है। यह किसी विकासशील देश में होने वाला पहला वैश्विक AI शिखर सम्मेलन है और अब तक आयोजित 4 ग्लोबल AI समिट में इसे सबसे बड़ा आयोजन माना जा रहा है, जिसका फोकस जिम्मेदार, समावेशी और असरदार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर है। इस समिट को लेकर दुनिया भर में जबरदस्त उत्साह है और 100 से अधिक देशों से लोगों ने इसके लिए पंजीकरण कराया है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कार्यक्रम में विश्व भर के नेताओं, उद्योगपतियों, इनोवेटरों, नीति निर्माताओं, शोधकर्ताओं और टेक्नोलॉजी को लेकर उत्साही लोगों का स्वागत किया है। PM मोदी ने X पर लिखा, “AI पर चर्चा करने के लिए पूरी दुनिया इकट्ठा है! समिट की थीम ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ है, जो मानव-केंद्रित प्रगति के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करने की हमारी साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है।”
Bringing the world together to discuss AI!
Starting today, India hosts the AI Impact Summit at Bharat Mandapam in Delhi. I warmly welcome world leaders, captains of industry, innovators, policymakers, researchers and tech enthusiasts from across the world for this Summit. The…
समिट में 15–20 राष्ट्राध्यक्ष, 50 से अधिक मंत्री, 40 से ज्यादा भारतीय और वैश्विक कंपनियों के CEO और लगभग 500 बड़े इनोवेटर, शोधकर्ता और टेक्नोलॉजी लीडर्स शामिल होने वाले हैं। इसके साथ ही 500 से अधिक एआई स्टार्टअप्स अपने आइडिया और तकनीक का प्रदर्शन करेंगे और करीब 500 सत्र आयोजित किए जाएँगे जिससे यह AI पर केंद्रित सबसे बड़े वैश्विक आयोजनों में से एक बन गया है। आयोजकों के अनुसार, इस कार्यक्रम में करीब 2.5 लाख से ज्यादा लोगों के आने की उम्मीद है। इनमें 3,250 से ज्यादा वक्ता अपने विचार साझा करेंगे।
इस समिट की खास बात यह है कि इसमें सिर्फ चर्चा नहीं बल्कि जमीनी स्तर पर ठोस नतीजों पर जोर दिया जाएगा। समिट से पहले 1,300 से ज्यादा प्रस्ताव मिले और भारत सहित दुनिया भर में 500 से अधिक प्री-समिट कार्यक्रम आयोजित किए गए। इसके अलावा 7 प्रमुख कार्यक्रमों के जरिए 3 लाख से अधिक लोग इस पूरी प्रक्रिया से जुड़े हैं जो इस आयोजन के प्रति राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती रुचि को दिखा रहे हैं।
यह एक्सपो 70,000 वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्र में फैले 10 Arena में आयोजित किया जाएगा। इसमें वैश्विक टेक कंपनियाँ, स्टार्टअप्स, शैक्षणिक संस्थान, अनुसंधान संगठनों, केंद्रीय मंत्रालयों, राज्य सरकारों और अंतरराष्ट्रीय भागीदारों की सक्रिय भागीदारी रहेगी।
कार्यक्रम में 13 देशों के पवेलियन भी स्थापित किए जाएँगे, जो AI इकोसिस्टम को मिल रहे वैश्विक सहयोग को प्रदर्शित करेंगे। इनमें ऑस्ट्रेलिया, जापान, रूस, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड्स, स्विट्जरलैंड, सर्बिया, एस्टोनिया, ताजिकिस्तान और अफ्रीकी देशों के पवेलियन शामिल होंगे।
कौन-कौन प्रमुख नेता होंगे शामिल?
इंडिया–एआई इम्पैक्ट समिट में दुनिया के कई प्रमुख देशों के शीर्ष नेता हिस्सा ले रहे हैं। इस वैश्विक सम्मेलन में भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग तोबगे, बोलिविया के उपराष्ट्रपति एडमंड लारा मोंटानो, ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा, क्रोएशिया के प्रधानमंत्री आंद्रेय प्लेंकोविच, एस्टोनिया के राष्ट्रपति अलार करिस, फिनलैंड के प्रधानमंत्री पेटेरी ऑरपो, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और ग्रीस के प्रधानमंत्री किरियाकोस मित्सोताकिस हिस्सा लेंगे।
इसके साथ ही, गुयाना के उपराष्ट्रपति भरत जगदेव, कजाखस्तान के प्रधानमंत्री ओल्झास बेक्टेनोव, लिकटेंस्टीन के युवराज प्रिंस एलोइस, मॉरीशस के प्रधानमंत्री नवीनचंद्र रामगुलाम, सर्बिया के राष्ट्रपति अलेक्सांदर वुचिच, स्लोवाकिया के राष्ट्रपति पीटर पेलेग्रिनी, स्पेन के राष्ट्रपति पेद्रो सांचेज, श्रीलंका के राष्ट्रपति कुमार दिसानायका, सेशेल्स के उपराष्ट्रपति सेबेस्टियन पिल्ले, स्विट्जरलैंड के राष्ट्रपति गी पारमेलिन, नीदरलैंड्स के प्रधानमंत्री डिक स्कूफ और UAE से अबू धाबी के क्राउन प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायेद अल नाहयान समिट में शामिल हो रहे हैं।
इनके अलवे 45 से अधिक देशों के मंत्रीस्तरीय प्रतिनिधिमंडल तथा संयुक्त राष्ट्र महासचिव और कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों के वरिष्ठ अधिकारी भी इस समिट में भाग लेंगे।
टेक लीडर्स का भी लगेगा जमावड़ा
शिखर सम्मेलन में वैश्विक तकनीकी जगत (Global Technology World) की कई बड़ी हस्तियाँ भाग ले रही हैं। इनमें ओपनएआई (OpenAI) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) सैम ऑल्टमैन, गूगल डीपमाइंड के सह-संस्थापक और CEO सर डेमिस हसाबिस, गूगल और अल्फाबेट के CEO सुंदर पिचाई तथा एंथ्रोपिक के CEO डारियो अमोदेई प्रमुख रूप से शामिल हैं। मेटा के चीफ AI अधिकारी अलेक्जेंडर वांग भी इस मंच का हिस्सा बन रहे हैं।
इसके अतिरिक्त एडोब के चेयरमैन और CEO शंतनु नारायण, एक्सेंचर की चेयरमैन और CEO जूली स्वीट, इंफोसिस के CEO और प्रबंध निदेशक सलील पारेख व एचसीएल टेक के CEO और प्रबंध निदेशक सी. विजयकुमार भी सम्मेलन में भाग ले रहे हैं। माइक्रॉन के चेयरमैन, प्रेसिडेंट और CEO संजय मेहरोत्रा भी इसमें शामिल होंगे।
भारत और वैश्विक उद्योग जगत से जुड़े अन्य प्रमुख नामों में पेटीएम के संस्थापक और CEO विजय शेखर शर्मा, सेल्सफोर्स इंडिया की चेयरपर्सन और CEO अरुंधति भट्टाचार्य तथा मिस्ट्रल एआई के सह-संस्थापक और CEO आर्थर मेंश शामिल हैं। कुलमिलाकर कहें तो दुनिया के करीब 100 देशों के तकनीकी क्षेत्र के शीर्ष नेता इस शिखर सम्मेलन में भाग लेने जा रहे हैं। इसे वैश्विक कंपनियों के लिए भारत में अपने कारोबार का विस्तार करने और नई साझेदारियों के अवसर तलाशने के एक अहम मंच के रूप में भी देखा जा रहा है।
पहले तीन AI Summit कहाँ और कब हुए?
ग्लोबल स्तर पर AI के नियम, सुरक्षा और जिम्मेदार उपयोग को लेकर औपचारिक शिखर सम्मेलनों की शुरुआत साल 2023 से हुई। भारत से पहले 3 बड़े देशों में उच्च-स्तरीय AI समिट आयोजित की जा चुकी हैं। इन बैठकों में एआई के AI, उसके नियमन और देशों के बीच सहयोग जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई थी।
पहली AI समिट सबसे पहला सम्मेलन नवंबर 2023 में ब्रिटेन की राजधानी लंदन में हुआ था। इसे AI सेफ्टी समिट कहा गया। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य उन्नत AI मॉडलों से जुड़े संभावित खतरों को समझना था। इसमें AI के दुरुपयोग, साइबर हमलों, डीपफेक, जैविक और सैन्य जोखिमों जैसे विषयों पर चर्चा हुई। साथ ही देशों ने AI सुरक्षा पर मिलकर शोध करने और साझा मानक बनाने की जरूरत पर सहमति जताई।
दूसरी AI समिट इसके बाद मई 2024 में दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में दूसरा सम्मेलन आयोजित हुआ। यहाँ चर्चा सिर्फ सुरक्षा तक सीमित नहीं रही बल्कि एआई गवर्नेंस, पारदर्शिता, कंपनियों की जिम्मेदारी और सिस्टम की विश्वसनीयता जैसे मुद्दों पर भी बात हुई। टेक कंपनियों से कहा गया कि वे अपने उन्नत AI मॉडलों के जोखिम का आकलन सार्वजनिक करें और सुरक्षा उपायों को मजबूत बनाएँ।
तीसरी AI समिट तीसरा बड़ा सम्मेलन 2024 में फ्रांस की राजधानी पेरिस में आयोजित हुआ। इस बैठक में AI से मिलने वाले आर्थिक अवसरों, नवाचार, स्टार्टअप इकोसिस्टम, डेटा सुरक्षा और नैतिक मानकों पर जोर दिया गया। यूरोपीय देशों ने एआई के लिए सख्त नियम बनाने, डिजिटल अधिकारों की रक्षा करने और मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता देने की बात रखी गई।
AI समिट के तीन सूत्र
India–AI Impact Summit 2026 को तीन बुनियादी सूत्रों के आधार पर आगे बढ़ाया जा रहा है। ये सूत्र ग्लोबल स्तर पर AI के क्षेत्र में सहयोग की दिशा तय करने वाले मुख्य सिद्धांतों को लेकर तय किए गए हैं।
पहला सूत्र ‘जन’ है। इसके तहत मानव-केंद्रित AI को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है। लक्ष्य यह है कि AI तकनीक लोगों के अधिकारों की रक्षा करे, आम नागरिकों तक सेवाओं की पहुँच आसान बनाए, तकनीक पर भरोसा मजबूत करे और समाज के हर वर्ग को उसका न्यायसंगत लाभ मिल सके।
दूसरा सूत्र ‘पृथ्वी’ है। इसके अंतर्गत पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार AI विकास पर ध्यान दिया गया है। इसमें ऊर्जा-कुशल प्रणालियों को बढ़ावा देना, संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग सुनिश्चित करना और जलवायु संरक्षण से जुड़ी पहलों को समर्थन देना शामिल है ताकि AI का विकास पर्यावरण की सहनशीलता के अनुरूप हो।
तीसरा सूत्र ‘प्रगति’ है। इस सूत्र का उद्देश्य नवाचार, कौशल विकास और क्षमता निर्माण को प्रोत्साहित करना है। साथ ही, AI के माध्यम से उत्पादकता, आर्थिक विकास और तकनीकी उन्नति को बढ़ावा देकर समावेशी विकास सुनिश्चित करने पर बल दिया गया है। समिट का मकसद यह है कि AI केवल तकनीकी प्रगति का माध्यम न बनकर, मानव कल्याण, पर्यावरण संरक्षण और संतुलित आर्थिक विकास का आधार भी बने।
AI समिट के 7 चक्रों का क्या है संदेश?
भारत-एआई प्रभाव शिखर सम्मेलन में इस बार चर्चाएँ 7 प्रमुख ‘चक्रों’ के इर्द-गिर्द केंद्रित होंगी। ये चक्र उन अहम क्षेत्रों को सामने रखते हैं, जिनमें बहुपक्षीय सहयोग के जरिए समावेशी और सतत सामाजिक परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। शिखर सम्मेलन का उद्देश्य केवल विमर्श तक सीमित नहीं है बल्कि AI को मानव विकास, सामाजिक न्याय और आर्थिक प्रगति से जोड़ने की व्यापक रणनीति तैयार करना भी है।
पहला चक्र ‘मानव पूँजी’ पर केंद्रित है। इसके तहत कौशल विकास कार्यक्रमों के जरिए ऐसा तंत्र तैयार करने पर जोर दिया जाएगा, जिससे AI अर्थव्यवस्था के लिए कार्यबल तैयार हो सके। भारत के नजरिए से देखें तो यह पहल राष्ट्रीय विकास की प्राथमिकताओं के अनुरूप युवाओं और पेशेवरों को नई तकनीकों के लिए सक्षम बनाने की दिशा में अहम मानी जा रही है।
दूसरा चक्र ‘सामाजिक सशक्तिकरण’ के लिए समावेशन से जुड़ा है। इसमें साझा AI समाधानों और बड़े स्तर पर लागू किए जा सकने वाले मॉडलों के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने पर चर्चा होगी। इसका मकसद नागरिक-केंद्रित AI समाधान विकसित करना है ताकि सरकारी और सार्वजनिक सेवाओं की पहुँच समाज के अंतिम व्यक्ति तक मजबूत हो सके।
तीसरा चक्र सुरक्षित और भरोसेमंद AI पर केंद्रित है। इसमें AI के वैश्विक सिद्धांतों को व्यवहारिक सुरक्षा और शासन ढाँचे में बदलने की दिशा में विचार-विमर्श होगा। भारत के लिए यह घरेलू AI गवर्नेंस को मजबूत करने, सार्वजनिक प्लेटफॉर्म पर सुरक्षित तैनाती सुनिश्चित करने और नवाचार को बढ़ावा देते हुए आम जनता का विश्वास बनाए रखने में सहायक माना जा रहा है।
चौथा चक्र लचीलापन, नवाचार और दक्षता से जुड़ा है। इसमें बड़े पैमाने पर AI प्रणालियों से पैदा होने वाली पर्यावरणीय और संसाधन संबंधी चुनौतियों के समाधान पर चर्चा की जाएगी। यह पहल इस बात पर जोर देती है कि AI का बढ़ता उपयोग पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार और सामाजिक रूप से न्यायसंगत बना रहे ताकि वैश्विक स्तर पर तकनीकी असमानताएँ और न बढ़ें।
पाँचवाँ चक्र विज्ञान पर आधारित है। इसमें डेटा, कंप्यूटिंग संसाधनों और अनुसंधान क्षमता तक असमान पहुँच को कम करने पर विचार होगा ताकि AI के जरिए वैज्ञानिक रिसर्च की रफ्तार तेज की जा सके। भारत के लिए यह स्वास्थ्य, कृषि और जलवायु जैसे क्षेत्रों में रिसर्च को मजबूती देने और वैश्विक वैज्ञानिक प्रगति में सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर माना जा रहा है।
छठा चक्र AI संसाधनों के लोकतंत्रीकरण पर केंद्रित है। इसका उद्देश्य ऐसा वैश्विक तंत्र विकसित करना है, जिसमें AI विकास के बुनियादी साधन सभी के लिए सुलभ और किफायती हों। इससे भारत में स्टार्टअप, शोधकर्ताओं और सार्वजनिक संस्थानों की ग्लोबल AI मूल्य श्रृंखला में समान भागीदारी सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।
सातवाँ और अंतिम चक्र आर्थिक विकास और सामाजिक भलाई के लिए AI के उपयोग पर केंद्रित है। इसमें ऐसे प्रभावशाली उपयोग मामलों की पहचान और समर्थन पर जोर दिया जाएगा, जो एआई के माध्यम से आर्थिक समृद्धि और सामाजिक कल्याण दोनों को आगे बढ़ा सकें।
कुल मिलाकर, शिखर सम्मेलन का फोकस इस बात पर है कि AI को केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं बल्कि व्यापक सामाजिक परिवर्तन और समावेशी विकास के औजार के रूप में देखा जाए।
भारत के लिए क्यों खास है यह समिट?
India AI Impact Summit 2026 से ऐसे ठोस फैसलों की उम्मीद की जा रही है, जो भारत की प्राथमिकताओं के अनुरूप हों। इस शिखर सम्मेलन का मुख्य फोकस केवल AI पर चर्चा तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि इसे जमीन पर लागू करने की व्यावहारिक रणनीति तैयार करने पर होगा ताकि सरकार और उद्योग दोनों स्तरों पर इसका प्रभावी इस्तेमाल हो सके।
समिट में AI के बेहतर उपयोग के लिए नीतियों के बीच तालमेल और संस्थागत समन्वय को मजबूत करने पर जोर दिया जाएगा। इसका सीधा लाभ यह होगा कि अलग-अलग मंत्रालयों, राज्यों और उद्योगों के बीच स्पष्ट दिशा और सहयोग बनेगा जिससे योजनाओं को तेजी से लागू किया जा सके। साथ ही, AI से जुड़े शासन और नियामक ढाँचे को मजबूत करने पर भी ध्यान दिया जाएगा ताकि नई तकनीक का इस्तेमाल सुरक्षित और जिम्मेदारीपूर्ण तरीके से हो।
भारत जैसे बड़े देश के लिए यह भी महत्वपूर्ण है कि अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों की AI के लिए तैयारी का आकलन किया जाए। समिट में इस बात पर चर्चा होगी कि किन क्षेत्रों में AI आधारित औद्योगिक विकास की ज्यादा संभावनाएँ हैं और वहाँ किस तरह की नीतिगत व बुनियादी मदद की जरूरत है। इससे क्षेत्रीय असमानता कम करने और संतुलित औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है।
इसके अलावा, AI के उपयोग और संभावनाओं के बारे में व्यापक जागरूकता बढ़ाने पर भी ध्यान दिया जाएगा। सरकार, शिक्षण संस्थानों, स्टार्टअप और उद्योग जगत के बीच दीर्घकालिक साझेदारी को बढ़ावा देकर एक मजबूत और जिम्मेदार AI इकोसिस्टम तैयार करने की दिशा में कदम उठाए जाएँगे।
यह शिखर सम्मेलन भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण हो सकता है क्योंकि यह AI को केवल एक उभरती तकनीक नहीं बल्कि आर्थिक विकास, बेहतर शासन, रोजगार सृजन और समावेशी प्रगति के साधन के रूप में स्थापित करने की दिशा में ठोस आधार तैयार कर सकता है।