01 फरवरी 2026 को केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लगातार 9वीं बार देश का बजट पेश किया। यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है। जहाँ हर बार की तरह बजट से पहले निर्मला सीतारमण की साड़ी लोगों तक पहुँच जाती है, और उस साड़ी के जरिए बुनकरों की मेहनत पहुँच जाती है। साथ ही इससे भारत की सांस्कृतिक विरासत और कपड़ा उद्योग को भी बढ़ावा मिलता है। लेकिन रवीश कुमार इसे पचा नहीं पा रहे हैं।
रवीश कुमार ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की साड़ी की खबरों पर तक आपत्ति जताई। अपने फेसबुक अकाउंट पर एक पोस्ट में रवीश कुमार लिखते हैं, “चैनल बता रहा है कि वित्त मंत्री ने काँजीवरम पहनी है, बाकी जो लोग खड़े हैं, उनकी साड़ी और सूट का भी बता देता कि कहाँ से खरीद कर लाए हैं।”

इस बार के बजट में भी सरकार का फोकस साफ है कि देश अपनी जरूरतें खुद पूरी करे, खासकर खादी और रेशम से रोजगार बनाने पर जोर दिया है। भारत के हैंडलूम को दुनिया तक पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है। देश की मीडिया ने भी बजट की इन सभी विशेषताओं पर खबरें चलाईं।
लेकिन भारतीय संस्कृति को बढ़ावा मिलते देख रवीश कुमार परेशान हैं। क्योंकि यह उनकी ‘प्रोपेगेंडा पत्रकारिता’ को सूट नहीं कर रहा है। क्योंकि यहाँ ग्रामीण विकास की बात हो रही, आत्मनिर्भर भारत की बात हो रही और बात हो रही है उस नारी की ‘साड़ी’ की जो देश की हर महिला आत्मविश्वास के लिए पहनती है।
इसीलिए रवीश कुमार को मीडिया की कवरेज से भी दिक्कत हो रही है, जो वित्त मंत्री की साड़ी का प्रचार कर रही है। क्योंकि मीडिया उनकी तरह ‘जंगलराज के राजकुमार’ तेजस्वी यादव के टी-शर्ट का प्रचार नहीं करता है। न ही बिहार की सड़कों पर ‘हसीनाओं का दिल चुराने वाले’ राहुल गाँधी की बुलेट को तवज्जो देता है।
रवीश कुमार ने बिहार चुनाव 2025 के दौरान तेजस्वी यादव की टी-शर्ट पर पूरा एक यूट्यूब वीडियो बनाया। थंबनेल में तेजस्वी की भिन्न-भिन्न रंगों की टी-शर्ट को भी चमकाया। वीडियो में टी-शर्ट के रंग, स्टाइल और पहनावे को सत्ता में बदलाव से जोड़ते हुए विश्लेषण किया। तब उन्हें टी-शर्ट में तेजस्वी यादव ‘कॉन्फिडेंट’ और ‘गंभीर’ नजर आए। तब तेजस्वी यादव की टी-शर्टों की खूब ब्रांडिंग की।
इतना ही नहीं, इन्हीं चुनावों से पहले कॉन्ग्रेस-RJD की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ में तेजस्वी यादव और राहुल गाँधी की बुलेट की सवारी पर रवीश ने इसे ‘हसीनाओं का दिल चुरा लिया’ कहकर प्रचार किया था। तब रवीश कहते है कि राहुल गाँधी ने बुलेट की छवि बदलकर रख दी, बुलेट को ‘हसीन’ बना दिया। नीचे अटैच किए गए वीडियो के पहले दो मिनट में रवीश के शब्द हैं, “बुलेट पर सवार राहुल गाँधी और तेजस्वी यादव दोनों की हँसी पर हसीनाओं के दिल आ गए हैं। राहुल गाँधी ने बुलेट की सवारी को हसीन बना दिया है।”
यहाँ तक रवीश कुमार को सब ठीक लगता है। लेकिन जब बात वित्त मंत्री की साड़ी पर आती है, तो यही रवीश कुमार असहज नजर आते हैं। उन्हें साड़ी पर बात करना या उसकी चर्चा करना प्रचार जैसा लगने लगता है। यही साबित हो जाता है कि ‘प्रोपेगेंडाबाज’ पत्रकार कपड़ो की ब्रांडिंग भी राजनीतिक नजरिए से करते हैं।
एक तरफ वे पश्चिमी पहनाने जैसे टी-शर्ट को आधुनिकता, आत्मविश्वास और राजनीतिक समझ से जोड़ते हैं, उस पर पूरे वीडियो बनाते हैं। दूसरी तरफ जब भारतीय परंपरा का प्रतीक साड़ी सामने आती है, तो वही चीज उन्हें खटकने लगती है। साड़ी, जो दशकों से भारतीय संस्कृति, गरिमा और पहचान का हिस्सा रही है, उस पर बात करना उन्हें अनावश्यक प्रचार जैसा लगता है।
वैचारिक कब्जियत से पीड़ित रवीश कुमार अबकी केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की साड़ी पर कूथे हैं। जंगलराज के राजकुमार तेजस्वी यादव की टीशर्ट से लेकर गाँधी परिवार के युवराज राहुल गाँधी की बुलेट देखकर ‘भाट’ बनने वाले रवीश कुमार को इस बात से दिक्कत है कि मीडिया ने यह क्यों बताया कि वित्त मंत्री ने इस बार कांजीवरम साड़ी पहनी है।
जैसा कि हम सब जानते हैं कि निर्मला सीतारमण जब भी बजट पेश करती हैं, उनकी साड़ियों की भी चर्चा होती है। इसका कारण यह है कि बजट देश के सामने बाद में आता है, उससे पहले साड़ी के जरिए देश के अलग-अलग हिस्से की विरासत और बुनकरों का काम संसद के जरिए राष्ट्र के घर-घर तक पहुंचता है। उसकी ग्लोबल ब्रांडिंग होती है।
इसका सीधा फायदा उस विरासत से जुड़े लोगों को होता है। उनका बजट बढ़ता है। उनके जीवन में खुशहाली आती है। पर जिसे आम आदमी की खुशहाली पच जाए वो कैसा रवीश कुमार? फिर उसे वैचारिक कब्जियत ही क्यों हो?


