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शराब पीकर शाहिदा से मारपीट करता था शौहर, ओम प्रकाश से शादी कर बनी शारदा: 2 नाबालिग बच्चे भी बिताएँगे अब हिंदू जीवन

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में एक मुस्लिम महिला शाहिदा ने बुधवार (14 फरवरी 2024) को विधि-विधान से हिंदू धर्म अपनाकर ओम प्रकाश से शादी कर ली। शाहिदा का अब नया नाम शारदा हो गया है। शाहिदा अपने शराबी शौहर से पहले ही तलाक ले चुकी थीं। शाहिदा के 2 नाबालिग बेटे भी अब हिन्दू धर्म के अनुसार जीवन बिताएँगे। इस घर वापसी में हिन्दू संगठनों ने शाहिदा की मदद की है।

ऑपइंडिया ने शाहिदा के पति ओम प्रकाश से इस मामले की जानकारी ली। ओम प्रकाश ने बताया कि शाहिदा का निकाह काफी समय पहले बुलंदशहर में परिजनों की इच्छा से एक मुस्लिम युवक से हुआ था। वह बहुत शराब पीता था और शाहिदा को बेरहमी से पीटता था। वह कुछ काम भी नहीं करता था, जिससे घर चलाने के भी लाले पड़ गए थे। इस बीच शाहिदा 2 बेटों की माँ भी बन गई। बड़े बेटे का नाम अरहाम और छोटे का नाम साद था।

ओमप्रकाश बताते हैं कि बच्चों के जन्म होने के बाद भी उसके अब्बा पर कोई फर्क नहीं पड़ा। वो निठल्ला बैठा रहता था और अपनी बीवी से ही पैसे माँगा करता था। इस बीच शाहिदा के मायके में उसके अब्बा हशमत अली और अम्मी का इंतकाल हो गया। शाहिदा का भाई और भाभी ही मायके में बचे, जिनसे उसे कोई खास सपोर्ट नहीं मिल रहा था। डेढ़ साल पहले जब शाहिदा और उनके शौहर के बीच का घरेलू झगड़ा सीमा पार कर गया तो दोनों ने अलग होने का फैसला कर लिया।

आखिरकार शाहिदा का कानूनी तलाक हो गया। हालाँकि, तलाक के बाद शाहिदा को अब ससुराल के साथ मायके का भी सहारा नहीं रह गया था। दोनों बच्चों की पढ़ाई की फ़िक्र में 8वीं पास शाहिदा गाजियाबाद चली आई। यहाँ वो एक फोन कम्पनी में काम करने लगी। यहीं पर बरेली निवासी ओम प्रकाश भी काम करते थे। ओम प्रकाश की शादी नहीं हुई थी। शाहिदा से उनकी बातचीत शुरू हुई।

शाहिदा ने ओम प्रकाश को अपनी पारिवारिक समस्याएँ बताईं तो ओम प्रकाश ने उनकी कई बार मदद की। इस मेलजोल के दौरान दोनों के बीच प्यार पनप गया। ओम प्रकाश के साथ शाहिदा हिन्दू धर्म को भी अच्छे से जान गई थी। वो इससे प्रभावित होकर खुद अपनी मर्जी से पूजा-पाठ करने लगी। एक दिन शाहिदा ने ओम प्रकाश से शादी की इच्छा जताई। दो अलग-अलग समुदायों से होने की वजह से ओम प्रकाश ने इस मामले में कानूनी जानकारों की सलाह ली।

उन्होंने बरेली के हिन्दू जागरण मंच के पदाधिकारी हिमांशु पटेल से बात की। हिमांशु ने उनको पूरा सहारा देने का भरोसा दिया। आखिरकार ओम प्रकाश और शाहिदा ने बुधवार (14 फरवरी 2024) को बरेली के भीटानाथ मंदिर में वैदिक विधि-विधान से शादी कर ली। इस अवसर पर हिन्दू संगठनों के तमाम पदाधिकारी मौजूद रहे, जिन्होंने दोनों को उपहार के साथ सदा सुखी रहने का आशीर्वाद दिया।

शाहिदा को जहाँ नया नाम शारदा मिला है, वहीं शारदा बड़ा बेटा अहराम अब रोहित और छोटा बेटा साद अब रोहन नाम से जाना जाएगा। ओम प्रकाश अब वापस गाजियाबाद नहीं जाएँगे। वो अपने ही गाँव में खेती-बाड़ी करेंगे और दुकान आदि चलाएँगे। उन्होंने अपनी बीवी के लिए भी एक दुकान खुलवाने की तैयारी की है। शारदा बनी शाहिदा के दोनों बच्चे भी अपनी आरम्भिक शिक्षा-दीक्षा बरेली से ही पूरी करेंगे।

ऑपइंडिया से बात करते हुए हिन्दू जागरण मंच के पदाधिकारी हिमांशु पटेल ने बताया कि पति-पत्नी दोनों बालिग हैं। शाहिदा अपने पति ओम प्रकाश के साथ काफी खुश है और अपने कदम को बिना किसी दबाव के अपनी मर्जी बताया है। हिमांशु ने यह भी कहा कि वो स्वेच्छा से घर वापसी के इच्छुक लोगों की भविष्य में भी पूरी मदद करेंगे।

ED ने 6ठी बार सीएम केजरीवाल को भेजा समन, शराब घोटाले में पूछताछ से जुड़ा है मामला: 5 बार पेश नहीं होने पर कोर्ट पहुँची था प्रवर्तन निदेशालय

केंद्रीय जाँच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को पूछताछ को लेकर पेश होने के लिए छठा समन भेजा है। इस बार एजेंसी ने उन्हें 19 फरवरी 2024 का समय दिया है। ED उनसे दिल्ली शराब घोटाला मामले में पूछताछ करना चाहती है। बता दें कि ED सीएम केजरीवाल को अब तक पाँच बार समन भेज चुकी है, लेकिन वे बार ह हर बार पेश होने से बचते रहे।

अरविंद केजरीवाल हर बार ईडी के समन को अवैध बता देते हैं। अलग-अलग समय पर वह अलग-अलग बहाना ED से बचने के लिए अपनाते आए हैं। पिछली बार जब अरविंद केजरीवाल पेश नहीं हुए तो ईडी ने दिल्ली के राउज एवेन्यू कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इस मामले में कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल को 17 फरवरी 2024 को कोर्ट में पेश होने के लिए कहा था।

दरअसल, ईडी ने नवम्बर 2023 में जब केजरीवाल को समन भेजा गया था तो उन्होंने कहा था कि वह मध्य प्रदेश चुनाव प्रचार के लिए जा रहे हैं। हालाँकि, उनकी पार्टी मध्य प्रदेश में 90% सीट पर अपनी जमानत नहीं बचा पाई थी। इसके बाद दिसम्बर में जब उन्हें जाँच एजेंसी ने बुलाया तो उन्होंने कहा कि वे विपश्यना के लिए पंजाब जा रहे हैं। इसलिए वे नहीं आ सकते।

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ईडी द्वारा भेजे गए समन को राजनीतिक साजिश बताते आए हैं। वह यह भी सवाल करते रहे हैं कि एक मुख्यमंत्री को ईडी किस हैसियत से पूछताछ के लिए बुला रही है। अरविंद केजरीवाल कहते रहे हैं कि उन्हें गिरफ्तार करने की साजिश की जा रही है, ताकि वे लोकसभा चुनावों में अपनी पार्टी AAP के लिए चुनाव प्रचार ना कर सकें।

गौरतलब है कि मौजूदा समन ED की शिकायत पर कोर्ट के आदेश के बाद आया है। कोर्ट ने ED की शिकायत पर कहा था कि केजरीवाल एजेंसी के सामने पेश होने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं। ED ने 3 फरवरी, 2024 को कोर्ट का रास्ता अरविन्द केजरीवाल के कई बार पेश ना होने से आजिज आकर अपनाया था।

केंद्रीय एजेंसी ने मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर आम जनता के समक्ष गलत उदहारण पेश करने का आरोप लगाया था। कोर्ट ने इस मामले में कहा था कि ED की शिकायत में अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ साक्ष्य मौजूद हैं। कोर्ट ने उन्हें 17 फरवरी, 2024 को अदालत में पेश होने को कहा था।

गौरतलब है कि केजरीवाल से पहले झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी ED से बचते आए थे। ED उन्हें 10 बार पूछताछ के लिए बुला चुकी थी। वह भी इन समन के पीछे राजनीतिक साजिश बता रहे थे। हालाँकि, 31 जनवरी को जब उनसे ED ने पूछताछ की तो उन्होंने इसके बाद इस्तीफ़ा दे दिया। ED ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था।

अबूधाबी में भव्य हिन्दू मंदिर का PM मोदी ने किया उद्घाटन, पत्थर पर लिखा उपनिषद का सन्देश: अक्षय कुमार और UAE के मंत्री रहे मौजूद

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने UAE (यूनाइटेड अरब अमीरात) के अबुधाबी में भव्य हिन्दू मंदिर का उद्घाटन किया। BAPS (बोचासनवासी अक्षर पुरुषोत्तम) स्वामीनारायण मंदिर 108 फ़ीट ऊँचा है। न सिर्फ UAE के हिन्दू समाज, बल्कि भारत-यूएई के रिश्तों में भी ये मंदिर एक नया अध्याय जोड़ेगा। स्वामीनारायण संस्था हिन्दू धर्म के वैष्णव संप्रदाय का हिस्सा है। दुनिया भर में इसके 1550 मंदिर हैं। नई दिल्ली और गुजरात के गाँधीनगर में स्थित अक्षर धाम मंदिर इसके सबसे लोकप्रिय मंदिरों में से एक है।

अभिनेता अक्षय कुमार भी मंदिर के उद्घाटन समारोह में मौजूद रहे। इस दौरान पीएम मोदी ने स्वामीनारायण की मूर्ति का अभिषेक भी किया। उन्होंने वहाँ पर बच्चों के साथ भी संवाद किया, उनकी कलाकृतियाँ देखीं। इस दौरान UAE के सहिष्णुता एवं सह-अस्तित्व मंत्री नाह्यान बिन मुबारक अल नाह्यान भी मौजूद रहे। मंदिर में एक पत्थर पर पीएम मोदी ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का संदेश भी लिखा, जो उपनिषद से लिया गया है। मंदिर के कलाकारों से भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बातचीत की।

लंदन, हॉस्टन, शिकागो, अटलांटा, टोरंटो, लॉस एंजेल्स और नैरोबी जैसे दुनिया के सबसे बड़े व समृद्ध शहरों तक में BAPS स्वामीनारायण मंदिर हैं। दुनिया भर में इसके 3850 केंद्र हैं। साथ ये ये हर सप्ताह 17,000 आयोजनों को संपन्न कराता है। प्रमुख स्वामी जी महाराज संस्था के 10वें अध्यक्ष हैं, जिन्होंने 5 अप्रैल, 1997 को इस रेगिस्तान में एक भव्य हिन्दू मंदिर का सपना देखा था। UAE में अभी 33 लाख से भी अधिक भारतीय रहते हैं, ऐसे में संस्था की सोच थी कि वहाँ उनके लिए पूजा स्थल होने चाहिए।

इस मंदिर को 7 शिखर के साथ निर्मित किया गया है। नागर शैली में बने इस मंदिर का अगला हिस्सा वैश्विक मूल्यों की ओर इंगित करता है, वहीं जहाँ विभिन्न संस्कृतियों में सद्भाव का संदेश है, हिन्दू ऋषि-मुनियों को दर्शाया गया है और अवतारों की गाथाएँ कही गई हैं। ये मंदिर परिसर 27 एकड़ में फैला हुआ है, जिसमें से 13.5 एकड़ में मुख्य मंदिर है। 13.5 एकड़ का पार्किंग एरिया है, जिसमें 1400 कारण और 50 बसों को आराम से खड़ा किया जा सकता है।

2019 में UAE के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन ज़याद अल नाह्यान ने ये भूमि हिन्दू मंदिर के लिए उपहार में दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उद्घाटन से एक दिन पहले मंगलवार (13 जनवरी, 2024) को आयोजित एक कार्यक्रम में बताया भी कि यूएई के राष्ट्रपति ने कहा था कि वो जिस जमीन पर लकीर खींच देंगे, उसे मंदिर के लिए दे दिया जाएगा। इस मंदिर के सभागार में 3000 लोग एक साथ भजन-कीर्तन कर सकते हैं। मंदिर को 2020 में सर्वेश्रेष्ठ इंटीरियर डिजाइन और 2019 में MEP मिडल ईस्ट अवॉर्ड्स में सर्वश्रेष्ठ मेकेनिकल प्रोजेक्ट का सम्मान मिला।

ये मंदिर 108 फ़ीट ऊँचा, 262 फ़ीट लंबा और 180 फ़ीट चौड़ा है। इसमें राजस्थान के बलुआ पत्थर और इटली के संगमरमर का इस्तेमाल किया गया है। 20,000 टन पत्थर और संगमरमर 700 कंटेनरों में लाया गया था। मंदिर के निर्माण में 700 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं। मंदिर में कोई भी जंग लगने वाली वस्तु का इस्तेमाल नहीं किया गया है। भारत के अलग-अलग क्षेत्रों के देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ हैं। मंदिर के पास एक ‘नदी’ भी बनाई गई है, जिसमें गंगा और यमुना का जल डाला गया है।

‘चोर-पुलिस मेरा भी फेवरिट गेम है’… मौका वैलेंटाइन्स डे का, सबसे ज्यादा लोग सर्च कर रहे ‘हथकड़ी’: ग्रॉसरी एप के संस्थापक ने बताया

दुनिया भर में बुधवार (14 फरवरी, 2024) को प्रेमी व शादीशुदा जोड़ों ने ‘वैलेंटाइन्स डे’ मनाया। फरवरी में इससे एक सप्ताह पहले ही ‘वैलेंटाइन्स वीक’ शुरू हो जाता है, जिसमें हर दिन प्रेम को अलग-अलग तरीके से प्रकट किया जाता रहा है। वैलेंटाइन्स डे के साथ ही 14 फरवरी को इसका समापन हो जाता है। अब इंस्टैंट ग्रोसरी एप Blinkit के संस्थापक ने कुछ ऐसा खुलासा किया है, जिस पर सोशल मीडिया पर लोग मज़े ले रहे हैं। उन्होंने बताया कि इस दिन लोग हथकड़ी खरीद रहे हैं।

Blinkit के संस्थापक अलबिंदर ढींडसा ने ट्वीट किया, “हमने कभी ‘हथकड़ी’ (Handcuff) को लेकर Blinkit पर इतने सर्च नहीं देखे, जितने आज किए जा रहे हैं।” इस पर उनकी कंपनी Blinkit ने उन्हें रिप्लाई दिया, “चोर-पुलिस तो मेरा भी फेवरिट गेम है।” इसके बाद अलबिंदर ढींडसा ने हाथ से अपना सिर पीटने वाली इमोजी लगाई। कई लोगों ने मजाक करते हुए कहा कि क्या पुलिस अब इंटरनेट से हथकड़ी खरीद रही है? कइयों ने लिखा कि हमें भी गिरफ्तार किया जाए।

बता दें कि विदेशी अश्लील फिल्मों में अक्सर हथकड़ी पहन कर रोमांस करते हुए जोड़ों को दिखाया जाता रहा है। देखा-देखी अब भारत में भी इस तरह के वीडियो बनने शुरू हो गए हैं। इसी का अनुसरण करते हुए कुछ जोड़े ‘एक्सपेरिमेंट’ करते हैं और रोमांस के वक्त ‘चोर-पुलिस का खेल’ खेलते रहे हैं। इसके तहत लड़का या लड़की में से किसी एक को हथकड़ी पहना दी जाती है और फिर दूसरा उस पर हावी हो जाता है। कई लोग फन के लिए भी इस तरह के काम करते हैं।

जहाँ तक वैलेन्टिनेस वीक की बात है, 7 फरवरी को ‘रोज (गुलाब) डे’, 8 फरवरी को प्रोपोज़ डे, 9 फरवरी को चॉकलेट डे, 10 फरवरी को टेडी डे, 11 फरवरी को प्रॉमिस डे, 12 फरवरी को हग डे और 13 फरवरी को किस डे मनाया जाता रहा है। ईसाई सेंट वैलेंटाइन के नाम पर इसे मनाया जाता है। उसके बारे में कहा जाता है कि वो एक रोमन पादरी था। बताया जाता है कि रोमन सम्राट मार्कस ऑरेलियस ने उसे जेल में बंद कर दिया था और फिर उसकी हत्या कर दी गई।

‘मेडिकल सार्टिफिकेट दिखाओ कि तुम्हारा रेप हुआ है’: बंगाल की संदेशखाली की महिलाओं ने कहा- रात को दरवाजा पीटते हैं गुंडे, पुलिस पर नहीं भरोसा

पश्चिम बंगाल के संदेशखाली में सत्ताधारी तृणूल कॉन्ग्रेस (TMC) के नेताओं द्वारा महिलाओं के साथ यौन शोषण को लेकर नए खुलासे हो रहे हैं। कुछ महिलाओं का कहना है कि अब प्रशासन उनसे रेप का मेडिकल प्रमाण पत्र माँग रहा है। इसको लेकर महिलाओं ने गुस्सा जताया है। इसके साथ ही उन्होंने राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी सरकार पर सवाल भी उठाया है।

मीडिया से बात करते हुए एक महिला ने बताया कि उसने गुंडों द्वारा बलात्कार की बात बताई तो उससे अब रेप का मेडिकल प्रमाण पत्र दिखाने के लिए कहा जा रहा है। महिला ने पूछा कि आखिर कौन-सी पीड़िता सामने आकर यह स्वीकार करेगी। महिला ने बताया कि उसके साथ यौन दुराचार नहीं हुआ है, लेकिन गाँव की कई महिलाओं के साथ ऐसा हुआ है।

वहीं इस हिंसा की शिकार एक अन्य महिला ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “रोजगार देने से क्या होता है? हमें अपनी जमीन और अपना मान-सम्मान वापस चाहिए। हमारे साथ जो मारपीट और जोर जबरदस्ती हुई, जो लड़कियों को उठाकर ले जाता था, वो मान सम्मान कोई वापस कर सकता है क्या?”

इन महिलाओं ने स्पष्ट रूप से तृणमूल कॉन्ग्रेस के नेता शाहजहाँ शेख और उसके गुर्गे शिबू तथा उत्तम पर आरोप लगाए। महिलाओं ने कहा कि वो रात को सो नहीं पा रही हैं। गुंडे घर की खिड़की-दरवाजों से धमकी देते हैं। गेट पर टॉर्च मारते हैं और दरवाजा पीटते हैं। महिलाओं ने अपनी जान का खतरा बताया है और कहा है कि उन्हें बंगाल पुलिस पर भरोसा नहीं है।

इन आरोपों के बीच पुलिस और राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी यहाँ से शिकायतें प्राप्त की हैं। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट में कहा गया है कि सुंदरबन के एक टापू में बसे संदेशखाली की महिलाओं ने सिर्फ रेप का आरोप नहीं लगाया है, बल्कि मारपीट, जमीन कब्जाने, छेड़छाड़, जान से मारने की धमकी और बकाया राशि वापस ना देने के भी आरोप लगाए हैं।

संदेशखाली महिलाओं का आरोप

बता दें कि संदेशखाली में पिछले कुछ दिनों से महिलाएँ सत्ताधारी पार्टी के गुंडों के विरुद्ध सड़कों पर उतरी हुई हैं। इस दौरान उन्होंने टीएमसी गुंडों के भयावह कारनामों का खुलासा किया है। महिलाओं ने बताया कि वहाँ की महिलाओं के साथ टीएमसी के गुंडों द्वारा रेप और गैंगरेप आम बात है। वो टीएमसी की महिला कार्यकर्ताओं को भी नहीं छोड़ते।

महिलाओं का आरोप है कि पार्टी की मीटिंग में ये नेता सिर्फ महिलाओं को ही बुलाते हैं। महिला कार्यकर्ताओं को धमकाते हुए कहते हैं कि पति को मरने से बचाना है तो पार्टी के दफ्तर में आना पड़ेगा। जब महिलाएँ पार्टी के दफ्तर जाती हैं तो टीएमसी के गुंडे उनका यौन शोषण करते हैं। महिलाओं का आरोप है कि उन्हें अपनी अपने परिजनों की सुरक्षा के लिए चुप रहना पड़ता है।

महिलाओं का ये भी आरोप है कि टीएमसी के गुंडे जमीनों पर कब्जा करते हैं और विरोध करने वालों को गैंगरेप की धमकी देते हैं। यही नहीं, उन्हें जो भी महिला पसंद आती है, उसे उठाकर अपने साथ ले जात हैं और मन भर जाता है तो घर भेज देते हैं। महिलाओं का यह भी आरोप है कि पश्चिम बंगाल की पुलिस टीएमसी के गुंडों के लिए सहायक का काम करती है और पीड़ितों को ही दबाती है।

69.15 रुपए में 1 किलो गेहूँ… राहुल गाँधी की गारंटी: अमीर हो या गरीब, मार्केट में इसी रेट से खरीदना होगा – समझिए MSP और C2+50 का गणित

राहुल गाँधी ने 13 फरवरी को ट्विटर पर ऐलान किया कि कॉन्ग्रेस की सरकार बनते ही स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू कर दी जाएँगी। राहुल गाँधी ने इसे ‘न्याय के पथ पर पहली गारंटी’ करार दिया। खास बात ये है कि राहुल गाँधी ने ये ऐलान उस समय किया, जब किसान आंदोलन 2.0 शुरू हो चुका है और पंजाब-हरियाणा के किसानों ने दिल्ली की सीमाओं पर डट चुके हैं। राहुल गाँधी ने जिस बात का ऐलान किया है, और जिस समय किया है, वो ये बताता है कि किसान आंदोलन का कॉन्ग्रेस किस तरह से फायदा उठाना चाहती है। वैसे, इस लेख में हम न सिर्फ स्वामीनाथन आयोग के बारे में आपको बताएंगे, बल्कि ये भी समझाएंगे कि इससे क्या फायदे-नुकसान होंगे। इसके साथ ही एमएसपी क्या है? और किसानों की 24 फसलों वाली सूची पर एमएसपी लागू कर दिया जाए, तो उसके क्या नफा-नुकसान होंगे।

सबसे पहली बात, राहुल गाँधी ने किया क्या ऐलान?

राहुल गाँधी ने एक्स पर लिखा, “किसान भाइयों आज ऐतिहासिक दिन है! कॉन्ग्रेस ने हर किसान को फसल पर स्वामीनाथन कमीशन के अनुसार MSP की कानूनी गारंटी देने का फैसला लिया है। यह कदम 15 करोड़ किसान परिवारों की समृद्धि सुनिश्चित कर उनका जीवन बदल देगा। न्याय के पथ पर यह कॉन्ग्रेस की पहली गारंटी है।”

दरअसल, राहुल गाँधी जिस स्वामीनाथन आयोग की बात कर रहे हैं, उस आयोग का गठन कॉन्ग्रेस की यूपीए-1 सरकार ने किया था। 18 नवंबर को प्रोफेसर एम एस स्वामीनाथन की अगुवाई में बनाई गई इस कमेटी ने 5 हिस्सों में अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी। इस आयोग ने दिसंबर 2004 में पहली रिपोर्ट, अगस्त 2005 में दूसरी, दिसंबर 2005 में तीसरी और अप्रैल 2006 में चौथी रिपोर्ट सौंपी। पाँचवी और अंतिम रिपोर्ट 6 अक्टूबर 2006 को सौंपी गई, जिसमें किसानों को लेकर कई अहम बिंदुओं को शामिल किया गया था। इस रिपोर्ट में क्या कुछ था, वो हम आगे बताएँगे, अभी जानिए कि उस रिपोर्ट का क्या हुआ?

यूपीए-1 सरकार, जिसमें राहुल गाँधी सांसद थे, सोनिया गाँधी सुपर पीएम थी और कथित तौर पर किसानों, पिछड़ों, दलितों, मुस्लिम वोटरों की राजनीति करने वाली पार्टियाँ भी थी, साथ ही वो पार्टियाँ भी, जो खुद को कम्युनिष्ट बताते हुए नास्तिकता का प्रबल समर्थक बताती थी। उस समय ने 2007 में राष्ट्रीय कृषि नीति की घोषणा की थी, जिसमें प्रो एमएस स्वामीनाथन की रिपोर्ट का कोई जिक्र नहीं था। ऐसा क्यों था? क्योंकि कॉन्ग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने आयोग की रिपोर्ट को अव्यवहारिक और बाजार को ‘हिला’ देने वाला माना और उसकी सिफारिशों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया।

वैसे, इसका खुलासा संसद में साल 2010 में हुआ, जब यूपीए-1 यूपीए-2 में बदल चुकी थी। उस समय बीजेपी के राज्यसभा सांसद और बाद में केंद्रीय मंत्री बने प्रकाश जावड़ेकर ने यूपीए-2 सरकार से संसद में पूछा था कि क्या स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू की गई हैं? अगर की गई हैं, तो उसके क्या प्रावधान हैं। अगर आयोग की सिफारिशों को लागू नहीं किया गया, तो इसके पीछे के कारण क्या हैं? इसका जवाब आया कृषि राज्य मंत्री की तरफ से, उस समय कृषि राज्य मंत्री केवी थॉमस थे।

संसद में लिखित में जवाब देते हुए केवी थॉमस ने कहा, “प्रो. एम एस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में राष्ट्रीय किसान आयोग ने सिफारिश की है कि एमएसपी को उत्पादन की औसत लागत से कम से कम 50 प्रतिशत अधिक होना चाहिए। लेकिन इस सिफारिश को सरकार ने स्वीकार नहीं किया है। क्योंकि एमएसपी की सिफारिश कृषि लागत और मूल्य आयोग द्वारा कई मामलों पर विचार के बाद की जाती है। ऐसे में लागत पर कम से कम 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी करना बाजार को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में एमएसपी और उत्पादन लागत के बीच संबंध कुछ मामलों में प्रतिकूल हो सकता है।” और ये रही कॉन्ग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए-2 सरकार के जवाब की कॉपी…

अब सवाल ये आता है कि राहुल गाँधी उस आयोग की सिफारिशों को लागू करने की गारंटी क्यों दे रहे हैं? जिसे सरकार में रहते हुए खुद कॉन्ग्रेस ही नकार चुकी है। जबकि मौजूदा केंद्र सरकार ने एमएसपी में आने वाली फसलों की न सिर्फ संख्या बढ़ाई है, बल्कि एमएसपी भी लगातार बढ़ाई है। अब जिस स्वामीनाथन आयोग को लागू करने की बात की जा रही है, उसका फसलों की एमएसपी तय करने का फॉर्मूला क्या है? ये जानना भी बेहद जरूरी है। उससे पहले ये जान लीजिए कि एमएसपी क्या है और सरकार को किसान को फसल का मूल्य देने के बाद और कितना खर्च करना पड़ता है?

एमएसपी क्या है? ये कैसे तय होता है?

भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के अंतर्गत कमीशन फॉर एग्रीकल्चरल कोस्ट्स एंड प्राइसेस डिपार्टमेंट (सीएसीपी) एमएसपी तय करता है। एमएसपी का मतलब है-न्यूनतम समर्थन मूल्य। इसे अंग्रेजी में मिनिमम सपोर्ट प्राइस कहते हैं। मौजूदा समय में केंद्र सरकार 24 फसलों पर एमएसपी देती है। ये फसल की कीमत होती है, जिसे सरकार तय करती है। सरकार इसी दाम पर किसानों से अनाज खरीदती है, फिर उसे अपनी व्यवस्थाओं के माध्यम से गरीबों को सस्ते में बेचती है। एमएसपी तय होने के बाद सरकार जिस दाम में खरीदती है, उसका पूरा भुगतान वो सीधे किसान को करती है। लेकिन छोटी जोत वाले किसानों को इसका बहुत ज्यादा फायदा नहीं पहुँचता।

बहरहाल, मुद्दे पर आते हैं। सरकार जिस अनाज को किसान से खरीदती है, उसके बाद भी उस अनाज पर सरकार को काफी पैसा खर्च करना पड़ता है। ये खर्च फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया यानी एफसीआई के माध्यम से होता है। इसमें मंडी से गेहूँ की खरीद एमएसपी पर करने के बाद सरकार को लगभग 34 प्रतिशत पैसा बाकी के कामों में खर्च करना पड़ा है।

टीवी9 से बातचीत में एफसीआई के पूर्व अध्यक्ष आलोक सिन्हा ने बताया है कि सरकार को क्यों एमएसपी देने के बाद भी काफी पैसा खर्च करना पड़ता है। उन्होंने बताया, एफसीआई को एमएसपी के ऊपर मंडी से गेहूँ खरीदने के लिए 14 फीसदी की प्रोक्योरमेंट कॉस्ट यानी मंडी टैक्स, आढ़त टैक्स, रूरल डेवलपमेंट सेस, पैकेजिंग, लेबर, स्टोरेज देना पड़ता है। इसके बाद उसे आम लोगों तक पहुँचाने में 12 प्रतिशत खर्च आता है, इसमें लेबर चार्ज, ट्रांसपोर्ट, लोडिंग-अनलोडिंग का खर्च आता है। यही नहीं, अपने गोदामों तक इस आनाज को पहुँचाने और वहाँ से निकालने के बीच में जितने समय तक वो अनाज गोदाम में होता है, उस पर भी 8 प्रतिशत की लागत आती है। इसमें गोदामों को चलाने, उसके रखरखाव इत्यादि का भी खर्च आता है।

इस इस उदाहरण से समझें कि एमएसपी पर गेहूँ की खरीद अगर 2500 रुपए प्रति क्विंतल के हिसाब से की गई, इसमें 25 रुपए प्रति किलोग्राम सरकार ने लागत मानी। और इसी एमएसपी पर सरकार ने 1000 क्विंतल गेहूँ खरीद लिया, तो सरकार का खर्च 2500X1000= 25,00,000 रुपए तो किसानों को देने में खर्च हो गए। इसके बाद आम लोगों तक मुफ्त में या मामूली कीमत पर यही गेहूँ पहुँचाने के लिए सरकार को 25,00,000 + 34% अन्य खर्च भी करना पड़ा। इस तरह से 1000 क्विंतल गेहूँ की खरीद पर सरकार को 25 लाख रुपए नहीं, बल्कि 8 लाख 50 हजार अन्य खर्चों को जोड़कर कुल 33 लाख 50 हजार रुपए खर्च करने पड़े। यानी प्रति किलो की खरीद पर सरकार ने किसानों को 25 रुपए दिए, लेकिन वही अनाज गरीबों को मुफ्त में पहुँचाने के लिए सरकार पर कुल खर्च आया 33.50 रुपए का। यही नहीं, सरकार को इस फसल की खरीद के दौरान औसतन 8 प्रतिशत खराब गुणवत्ता का भी अनाज मिलता है। वो अनाज सरकार किसी को दे नहीं सकती, तो ये नुकसान भी सरकार को उठाना पड़ता है।

स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें क्या हैं? और कैसे ये गैर-व्यावहारिक है

खैर, मामला स्वामीनाथन आयोग का है। तो अब समझ लीजिए कि स्वामीनाथन आयोग ने क्या सिफारिशें की हैं। स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश है-एमएसपी को सी2+50 प्रतिशत के फॉर्मूले से लागू करने की। किसान आंदोलनकारी मोदी सरकार से एमएसपी पर यही फॉर्मूला लागू करने करने की माँग कर रहे हैं। ऐसे में सी2+50 प्रतिशत का मामला कैसे पूरे देश को अस्त व्यस्त कर सकता है, ये भी जान लीजिए।

स्वामीनाथन आयोग ने सी2+50 का आँकड़ा बताने के लिए फसल लागत को तीन हिस्सों में बाँटा था। ए2, ए2+एफएल और सी2, इसमें ए2 का मतलब फसल के पैदा होने तक की सभी लागत, जैसे जुताई, बुवाई, खाद, पानी, बीज और कीटनाशक जैसी चीजें शामिल हैं। इसमें मजदूरी भी शामिल है। दूसरा ए2+एफएल का मतलब है-लागत + किसान परिवार की मेहनत। वहीं, सी2 का मतलब है-ए2+एफएल+ जमीन के लीज का खर्च और ब्याज पर लिए पैसों की भी लागत। इस तरह से ये सी2 हुआ। स्वामीनाथन आयोग ने इसी सी2 को कुल लागत माना और उसका 50प्रतिशत हिस्सा किसान को लाभ के तौर पर देते हुए फॉर्मूला बताया सी2+50 का।

इसे और भी सरल तरीके से ऐसे समझें। मान लीजिए किसी किसान ने 100 क्विंटल गेहूँ उगाया। एमएसपी पर सरकार इसे 2500 रुपए यानी 25 रुपए प्रति किलो लागत मानते हुए खरीद रही है। तो किसान को मिले 2,50,000 रुपए। यानी ढाई लाख। अब इसे स्वामीनाथन आयोग के सुझाव के हिसाब से देखें, तो मान लीजिए कि 100 क्विंटल गेहूँ की पैदावार के लिए किसान ने 5 एकड़ जमीन की। इसे सालाना 20 हजार रुपए में लीज पर लिया। इसके अतिरिक्त किसान परिवार में 4 लोग खेत में काम कर रहे हैं, तो उनकी मजदूरी जोड़ लीजिए। चूँकि किसान आंदोलन कारी मजदूरी को 300 रुपए प्रतिदिन से बढ़ाकर 700 रुपए करने की माँग कर रहे हैं, तो यही कीमत रखते हैं। इस तरह से 4 लोगों का परिवार प्रति दिन 4X700=2800 रुपए की हुई। तीस दिन वाले एक माह में ये मजदूरी 84,000 हजार रुपए हुई। गेहूँ के उत्पादन में 4 माह का समय लगता है। चार माह में उन्होंने औसतन 84,000 की मजदूरी की, बाकी दिन उन्होंने दूसरे काम किए। ऐसे में सी2 + फॉर्मूले के तहत 100 क्विंतल गेहूँ की कीमत सरकार को कितनी पड़ेगी?

ये कीमत 2,50,000 + 84,000 + 10,000= 3,44,000 +50% (1,72,000) (चूँकि साल में औसतन दो फसल उगती है, ऐसे में लीज की कीमत 10 हजार ही रखते हैं, जो न्यूनतम है) बैठेगी। ऐसे में सरकार अगर सी2+50 फॉर्मूले के तहत ये गेहूँ खरीदना चाहेगी, तो उसे ये 100 क्विंतल गेहूँ खरीदने के लिए उसे 3,44,000+1,72,000= 5,16,000 रुपए किसान को देने पड़ेंगे। अब इसी अनुपात में एमएसपी के हिसाब से खर्च होने वाला 34% का खर्च भी बढ़ सकता है। हालाँकि अभी हम उतना ही जोड़ते हैं। ऐसे में 34 प्रतिशत का खर्च कुल 1,75,440 रुपए जोड़कर कुल लागत 6,91,440 (5,16,000 + 1,75,440) पड़ेगी। इस तरह से एक किलो गेहूँ जो 25 रुपए में सरकार खरीद रही है, उसकी कीमत 69.15 रुपए बैठेगी। अब सोचिए, अगर सरकार करीब 70 रुपए किलो गेहूँ खरीदेगी, तो बाजार में इसका क्या दाम होगा? आम लोगों को गेहूँ कैसे मिल पाएगा?

अभी पूर्वी यूपी-बिहार के निकले युवा जो बाहर के शहरों में प्रति माह 15-20 हजार रुपए कमा कर अपना जीवन जैसे-तैसे चला रहे हैं, वो युवा कहाँ जाएँगे? यहाँ बात सिर्फ गेहूँ की हुई है, इसी अनुपात में अन्य फसलों की कीमत क्या होगी? इसका अंदाजा लगा सकते हैं। ऐसे में स्वामीनाथन आयोग के सी2+50 फॉर्मूले को कैसे लागू किया जाएगा ? ये सवाल राहुल गाँधी से पूछा जाना चाहिए।

वैसे, एक साधारण आँकड़ा जो साल 2020 का है, सरकार का आँकड़ा है, उसे भी रखना बेहद जरूरी हो जाता है। स्वामीनाथन आयोग छोड़ दीजिए, सिर्फ एमएसपी को कानूनी गारंटी देने पर ही सरकार की क्या हालत हो सकती है, वो जान लीजिए। केंद्र सरकार के मुताबिक, वित्त वर्ष 2020 में देश की कृषि उपज का कुल मूल्य 40 लाख करोड़ रुपए था। इसमें इसमें डेयरी, खेती, बागवानी, पशुधन और एमएसपी फसलों के उत्पाद शामिल हैं। इसमें सिर्फ 24 फसलें एमएसपी के दायरे में हैं। उनका कुल मूल्य 10 लाख करोड़ रुपए था। इसका सिर्फ 25 प्रतिशत हिस्सा ही सरकार खरीद पाई, जिसमें 2.5 लाख करोड़ खर्च हुए। ये कुल कृषि उपज का महज 6.25 प्रतिशत है। जबकि एमएसपी वाली फसलों के हिसाब से सिर्फ 25 प्रतिशत। ऐसे में सवाल ये है कि अगर सरकार ने एमएसपी गारंटी कानून लागू कर दी, तो उसे 10 लाख करोड़ रुपए सिर्फ इन फसलों को साल 2020 की एमएसपी पर खर्च करने होंगे। अभी तो सरकार ने एमएसपी भी बढ़ाई है। तो ये आँकड़ा बढ़ेगा।

अब इसके आगे ये देखिए कि इस साल केंद्र सरकार ने बुनियादी ढाँचे पर खर्च करने के लिए अब तक की सबसे बड़ी रकम 11.11 लाख करोड़ रुपए तय किए हैं। ऐसे में अगर इतना पैसा सिर्फ एमएसपी वाली फसलों की खरीदी पर खर्च हो जाएगी, सरकार बाकी विकास कार्यों पर कैसे खर्च करेगी? दूसरी बात, देश के किसान फिर इन्हीं 24 फसलों का उत्पादन शुरू कर देंगे और ये उत्पादन भी बढ़ जाएगा। फिर बाकी खाद्य पदार्थों की आपूर्ति सरकार को विदेशों से आयात करके पूरी करनी पड़ेगी, जैसे अभी खाद्य तेलों और दालों की करनी पड़ती है। उसकी व्यवस्था कैसे की जाएगी? दूसरा, आपके उत्पाद की सी2=50 फॉर्मूले के चलते जो कीमत हो जाएगी, वो दुनिया में कहीं भी खरीदी नहीं जा सकेगी। फिर इस अनाज का क्या होगा?

अब आते हैं मूल सवाल पर कि किसानों की माँगों को सरकार क्यों नहीं मान रही है? किसानों द्वारा एमएसपी की गारंटी के लिए माँगा जा रहा कानून क्यों नहीं बनाया जा रहा है? तो उम्मीद है कि इन सवालों के जवाब आपको मिल गए होंगे। दरअसल, किसान संगठनों की माँगे न सिर्फ अव्यवहारिक हैं, बल्कि देश को खत्म कर देने वाली भी है। ऐसे में राहुल गाँधी ने चुनावी लॉलीपॉप की तरह भले ही स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की बात कह दी हो, पर उन्हें भी पता है कि ऐसा करना भारत देश ही नहीं, दुनिया के किसी भी देश के लिए तबाही की तरह होगी। वैसे, साल 1977 से 1981 के बीच अमेरिका में ‘गारंटी कानून’ के चलते सरकार और पूरे देश की क्या हश्र हुई, वो जानना भी दिलचस्प है।

अतीत के अनुभव को भी देख लेते राहुल गाँधी

चलिए, वो किस्सा भी बता देते हैं कि सरकार एमएसपी पर गारंटी कानून और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को क्यों नहीं मान पा रही है, चाहते हुए भी। दरअसल, साल 1977 में अमेरिका के राष्ट्रपति थे जिमी कार्टर। उन्होंने ऐलान किया कि अमेरिका में दूध के दाम हर 6 माह में बढ़ेंगे और पैसा सरकार देगी। ऐसे में लोगों ने दुग्ध उत्पादन में तेजी ला दी। सरकार के पास स्टोरेज की कमी हो गई। स्थानीय स्तर पर दूध की खपत कम हो गई, क्योंकि दाम बढ़ते गए और लोग डॉलर के चक्कर में सारा दूध बेचते गए। सरकार ने इसका हल निकाला कि वो दूध की जगह चीज खरीदेगी। बस, फिर क्या था? कॉरपोरेट कंपनियाँ मैदान में आ गई। उन्होंने सरकार द्वारा तय किए रेट पर दूध खरीदना शुरू कर दिया, और चीज बनाकर सरकार को सप्लाई करने लगे।

एक समस्या और आई कि किसानों ने कंपनियों को खराब गुणवत्ता का दूध भी बेचना शुरू कर दिया, क्योंकि उन्हें अधिकाधिक कमाई दिख रही थी और सरकार कानून के चलते सबकुछ खरीदने को मजबूर ती। ऐसे में सरकार ने कहा कि वो ‘चीज’ को टेस्ट करने के बाद खरीदेगी, यानी गुणवत्ता की जाँच (क्वॉलिटी चेकिंग) शुरू हो गई। उधर, सरकार के सारे गोदाम चीज से भरने लगे। सरकार ने 120 फुटबॉल स्टेडियमों के आकार के बराबर का बहुत बड़ा गोदाम बनवाया लेकिन समस्या कम नहीं हुई।

साल 1981 आते-आते अमेरिकी सरकार ने 200 करोड़ डॉलर से भी अधिक की रकम दूध और चीज खरीदने पर खर्च कर दिया था। ये सारा सामान उत्पादन की तुलना में बिका भी नहीं, महँगा होने के चलते स्थानीय स्तर पर इसका उपभोग भी नहीं हुआ। ऐसे में 1981 में राष्ट्रपति बने रोनाल्ड रीगन ने फैसला लिया कि अब बस, सरकार और दूध-चीज नहीं खरीद सकती। उन्होंने इस योजना को बंद कर दिया। लेकिन तब तक पूरी व्यवस्था की चूलें हिल चुकी थी।

अब सवाल आपसे है, कि आप क्या चाहते हैं? क्या सरकार को इन राजनीतिक माँगों को माँग कर देश को बर्बादी की कगार पर ढकेल देना चाहिए या फिर उनकी अन्य समस्याओं की तरफ देखना चाहिए? सवाल ये भी है कि एमएसपी सिर्फ 24 फसलों की होगी, तो बाकी फसले उगाने वाले या फलों की खेती में जुटे किसानों का क्या होगा? या फिर कुछ मुट्ठी भर किसानों के लिए एमएसपी लागू कर दिया जाए और देश की बड़ी आबादी को भूख से मरने के लिए छोड़ दिया जाए? या फिर राहुल गाँधी-अरविंद केजरीवाल (किसान आंदोलन को समर्थन) की तरह बिना हिसाब-किताब के ही ‘कुछ भी’ घोषणा करके राजनीतिक रोटियाँ सेंक ली जाए? सोचिए, ये काम आप पर छोड़ता हूँ।

उमर खालिद ने सुप्रीम कोर्ट से वापस ली अपनी जमानत अर्जी, दिल्ली दंगों में जेल में है बंद: वकील कपिल सिब्बल बोले – हालात में बदलाव के कारण लिया फैसला

दिल्ली दंगों के मुख्य आरोपितों में से एक उमर खालिद ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी जमानत याचिका वापस ले ली है। उसकी जमानत पर बुधवार (14 फरवरी, 2024) को सुनवाई होनी थी। खालिद के वकील कपिल सिब्बल ने इसकी पुष्टि की है। याचिका वापस लेने की वजह हालात में बदलाव को बताया गया है। अब उमर खालिद निचली अदालतों में जमानत की संभावनाएँ खोजेगा। हालाँकि, जिला अदालत और हाईकोर्ट में उमर खालिद की जमानत अर्जी पहले ही ख़ारिज हो चुकी हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बुधवार (14 फरवरी, 2024) को उमर खालिद की जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई थी। यह सुनवाई न्यायमूर्ति बेला M त्रिवेदी और न्यायमूर्ति पंकज मित्तल की बेंच में होनी थी। सुनवाई से ठीक पहले उमर खालिद के वकील कपिल सिब्बल में सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दे कर याचिका वापस लेने की अपील की। अर्जी वापस लेने की वजह उसने हालात में बदलाव होना बताया। कपिल सिब्बल की यह अर्जी सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर ली। अब कपिल सिब्बल का कहना है कि वो निचली अदालतों में मौजूद कानूनी विकल्पों पर काम करेंगे।

बताते चलें कि इस से पहले उमर खालिद की जमानत याचिका की अर्जी दिल्ली की कड़कड़डूमा सत्र अदालत मार्च 2022 में ख़ारिज कर चुकी है। उमर खालिद ने इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अक्टूबर 2022 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी उमर खालिद को जमानत देने से इनकार कर दिया था। तब से यह माना जा रहा था कि उमर खालिद जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकता है। मई 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से उमर खालिद के केस में जवाब तलब किया था। नवंबर 2023 में दोनों पक्षों के वकीलों के मौजूद न होने की वजह से मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में नहीं हो पाई थी।

गौरतलब है कि 2020 के दिल्ली दंगों में साजिश रचने के आरोपित JNU के पूर्व छात्र उमर खालिद को दिल्ली पुलिस ने सितंबर 2020 को गिरफ्तार किया था। तब से वो लगातार जेल में ही है। उस पर UAPA एक्ट सहित कई गंभीर धाराओं में केस दर्ज है।

बेटे राहुल के बाद माँ सोनिया का भी यूपी से पलायन, गाँधी परिवार से मुक्त हुआ उत्तर प्रदेश, न्याय यात्रा भी किसानों के चक्कर में रुकी

कॉन्ग्रेस संसदीय दल की नेता सोनिया गाँधी ने बुधवार (14 फरवरी 2024) को राजस्थान से राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल किया। वह फिलहाल उत्तर प्रदेश के रायबरेली लोकसभा से लोकसभा सांसद हैं। इसके साथ ही कॉन्ग्रेस सांसद राहुल गाँधी ने भी अपनी न्याय यात्रा को रोक दिया है और किसानों के प्रदर्शन में शामिल होने का फैसला लिया है।

सोनिया गाँधी ने जयपुर में राज्यसभा चुनावों के लिए नामांकन किया है। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि आगामी लोकसभा चुनावों में वह रायबरेली लोकसभा सीट से चुनाव नहीं लड़ेंगी। इसी के साथ साल 1977 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि उत्तर प्रदेश से गाँधी परिवार का कोई भी सदस्य लोकसभा या राज्यसभा में नहीं होगा।

आजादी के बाद से ही प्रधानमंत्री रहे जवाहरलाल नेहरु से लेकर इंदिरा गाँधी, संजय गाँधी, राजीव गाँधी और सोनिया तक सभी उत्तर प्रदेश से लोकसभा सांसद रह चुके हैं। वहीं, राहुल गाँधी भी उत्तर प्रदेश के अमेठी से सांसद रह चुके हैं। हालाँकि, वे साल 2019 के लोकसभा चुनाव हार गए और वर्तमान में केरल की वायनाड सीट से सांसद हैं।

सोनिया गाँधी के उत्तर प्रदेश छोड़ने के पीछे कई कयास लगाए जा रहे हैं। कॉन्ग्रेस के करीबी इसके पीछे उनके स्वास्थ्य को आधार बता रहे हैं। उनका दावा है कि सोनिया गाँधी स्वास्थ्य कारणों से अपने संसदीय क्षेत्र का दौरा नहीं कर पाती हैं। इसलिए वे लोकसभा के बजाय पार्टी की बात रखने के लिए अब राज्यसभा जाएँगी।

रायबरेली सीट कॉन्ग्रेस और गाँधी परिवार के लिए बेहद सुरक्षित सीट मानी जाती रही है। साल 1952 से अब तक के लोकसभा चुनावों में सिर्फ 3 बार कॉन्ग्रेस यहाँ हारी है। 1977 के चुनाव में मैदान में राज नारायण ने इस सीट पर इंदिरा गाँधी को हराया था। इसके बाद 1996 और 1998 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के प्रत्याशी अशोक सिंह ने कॉन्ग्रेस प्रत्याशी को हराया था।

उधर भाजपा ने गाँधी परिवार पर हारने के डर से रायबरेली छोड़ने की बात कही है। भाजपा ने कहा है कि सोनिया गाँधी का राज्यसभा जाना उत्तर प्रदेश में उनका हार को स्वीकार करना है। दरअसल, सोनिया गाँधी 2004 से रायबरेली की सांसद हैं। सोनिया गाँधी ने साल 2004 में अमेठी सीट राहुल गाँधी के लिए छोड़ दी थी। वह बेल्लारी से चुनाव भी लड़ी थीं, लेकिन उन्होंने यह सीट छोड़ दी थी।

सोनिया गाँधी ने जिस रायबरेली लोकसभा को अब छोड़ने का निर्णय लिया है, उस पर अधिकांश समय कोई ना कोई नेहरु-गाँधी परिवार का ही सदस्य काबिज रहा है। सोनिया के ससुर फिरोज गाँधी और उनकी सास इंदिरा गाँधी भी इस सीट से सांसद रह चुकी हैं। कयास लग रहे हैं कि प्रियंका गाँधी इस सीट से चुनाव लड़ सकती हैं। हालाँकि, ये अभी कयास ही है।

अगर सोनिया गाँधी यहाँ से उतरतीं तो भी उनकी जीत कठिन थी। चुनाव दर चुनाव उनकी जीत का अंतर भी कम होता गया है। 2006 के लोकसभा उपचुनाव में सोनिया को लगभग 80% वोट मिले थे। वहीं, 2009 में यह घटकर 72%, साल 2014 में 63% और साल 2019 में 55% रह गया। माना जा रहा है कि भाजपा यहाँ से यूपी सरकार में मंत्री दिनेश प्रताप सिंह को उतारेगी। साल 2019 में भी उन्हें उतारा गया था।

सोनिया के जयपुर में राज्यसभा के नामांकन के अलावा यह भी सामने आया है कि राहुल गाँधी अब अपनी भारत जोड़ो न्याय यात्रा को रद्द करके दिल्ली में किसान प्रदर्शन में शामिल होने जा रहे हैं। वह अभी तक झारखंड में अपनी भारत जोड़ो न्याय यात्रा कर रहे थे। वह इसे रद्द करके आज जयपुर पहुँचे हैं।

जयपुर पहुंँचकर राहुल गाँधी सोनिया गाँधी के नामांकन में शामिल हुए। अब माना जा रहा है कि वह किसान विरोध प्रदर्शन में शामिल होंगे और यात्रा उतने दिन रुकी रहेगी। यह यात्रा 14 जनवरी 2024 को पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर से शुरू हुई थी। इसके एक सप्ताह पहले खत्म किए जाने की भी खबर है।

शिवलिंग, शिलालेख, अभी भी बज रहा 300 साल पुराना शंख… सहारनपुर के कुएँ में हुई खुदाई तो मिलीं माँ पार्वती, नंदी और गणेश की प्रतिमाएँ भी

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में एक मंदिर परिसर में हो रही खुदाई के दौरान शिवलिंग और मूर्तियों सहित कई अन्य प्राचीन धार्मिक वस्तुएँ मिली हैं। यह खुदाई मराठाकालीन मंदिर में बने एक कुएँ और उसके आसपास करवाई जा रही है। खुदाई करा रहे लोगों का कहना है कि जल्द ही मूर्तियों की वैदिक विधि-विधान से प्राण-प्रतिष्ठा करवाई जाएगी। सोमवार (12 फरवरी, 2024) को प्रशासनिक अधिकारियों ने भी मंदिर का दौरा किया। मामले की जाँच पुरातत्व विभाग से करवाने की माँग की जा रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, खुदाई का यह कार्य गोटेश्वर महादेव मंदिर पर चल रहा है। सिद्धपीठ बाग़ शिवाला स्थित यह मंदिर मंडी समिति रोड पर है। 35 वर्षों से बंद पड़े इस मंदिर को 11 दिसंबर, 2020 को जिला प्रशासन ने जिले के प्रबुद्ध लोगों को सौंपा था। यह माँग ‘विश्व हिन्दू परिषद’ (VHP) ने उठाई थी। कुछ समय पहले यहाँ की साफ़-सफाई श्रद्धालुओं द्वारा करवाई का रही थी। इसी दौरान एक प्राचीन कुआँ भी साफ किया जाने लगा। जब कुएँ में श्रमिकों ने लगभग 15 फ़ीट खुदाई की वो उसमें मूर्तियाँ निकलना शुरू हुईं।

खबर फैलते ही आसपास के लोगों की भीड़ जमा हो गई। थोड़ी खुदाई और करने पर कुएँ से शिवलिंग, माता पार्वती, नंदी, भगवान गणेश व बजरंग बली की मूर्तियाँ निकलीं। इसी दौरान एक शंख भी मिला जो अभी तक बज रहा है। मंदिर समिति के सदस्य अनिल त्यागी ने बताया कि कुछ शिलालेख भी मिले हैं। इस बाबत उन्होंने जिले के प्रशासनिक अधिकारियों को सूचित कर दिया। सूचना पर सहारनपुर के कई वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुँचे। मंदिर समिति के सदस्यों ने उनसे मूर्तियों की पुरातत्व विभाग से जाँच करवाए जाने की माँग की है। उनका दावा है कि ये मूर्तियाँ मराठों द्वारा स्थापित की गई हैं। समिति के सदस्यों के मुताबिक मंदिर के आसपास की जमीनों को कुछ लोगों द्वारा कब्ज़ा भी करने की कोशिश की जा रही थी।

अनिल त्यागी का यह भी दावा है कि और खुदाई करने पर मंदिर के अंदर से तहखाना भी निकलेगा। सोमवार को मंदिर पहुँचे जिले के कई सीनियर अधिकारियों ने मंदिर समिति से खुदाई का काम रोक देने की अपील की। फिलहाल खुदाई रोक दी गई है। आगे की खुदाई संभवतः प्रशासन द्वारा आधिकारिक देखरेख में कार्रवाई जाएगी। मंदिर समिति के सदस्यों ने प्रशासन से माँग की है कि मंदिर के प्राचीनता की जाँच पुरातत्व विभाग से करवाई जाए। पुजारी एकता परिषद ने ऐलान किया है कि वो निकल रही मूर्तियों की विधि-विधान से मंदिर परिसर में प्राण-प्रतिष्ठा करवाएँगे।

‘इस्लाम में अल्लाह से ऊपर कोई नहीं’: राजस्थान के स्कूलों में सूर्य नमस्कार कार्यक्रम के खिलाफ मुस्लिम संगठनों ने दी याचिका, हाई कोर्ट ने खारिज की

राजस्थान हाई कोर्ट (Rajasthan High Court) ने मुस्लिम संगठन की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें राज्य के सभी विद्यालयों में सूर्य नमस्कार पर रोक लगाने का निर्देश देने का आग्रह किया गया था। राजस्थान HC ने याचिका ख़ारिज करते हुए मुस्लिम संगठनों पर कई कड़ी टिप्पणी भी की है। अदालत ने 1 मार्च को दोबारा सुनवाई करने की बात कही है।

मुस्लिम फोरम नाम वाले मंच के तत्वाधान में कई मुस्लिम संगठनों ने यह याचिका राजस्थान हाई कोर्ट में डाली थी। संगठन की तरफ से यह याचिका AIMIM के महासचिव काशिफ ज़ुबेरी ने लगाई थी। इसमें उन्होंने माँग की थी कि राजस्थान के स्कूलों में 15 फरवरी 2024 को प्रस्तावित सूर्य नमस्कार को रोका जाए।

मुस्लिम पक्ष का कहना था कि सूर्य नमस्कार में श्लोक भी पढ़े जाते हैं, जो कि इस्लाम के खिलाफ है, क्योंकि मुस्लिम सिर्फ अल्लाह की इबादत करते हैं। राजस्थान हाई कोर्ट ने यह याचिका खारिज करते हुए कहा कि मुस्लिम फोरम स्कूली बच्चों का प्रतिनिधि नहीं है और ना ही कोई रजिस्टर्ड संस्था है। ऐसे में उनका यह दावा खारिज हो जाता है।

राजस्थान हाई कोर्ट ने इसी के साथ गुरुवार (15 फरवरी 2024) को स्कूलों में होने वाले सूर्य नमस्कार के कार्यक्रम पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। इस कार्यक्रम को आयोजित करने का आदेश राजस्थान सरकार ने दिया था। यह कार्यक्रम सूर्य सप्तमी के मौके पर आयोजित किया जा रहा है।

उधर मुस्लिम संगठनों ने राजस्थान के स्कूलों में पढ़ने वाले मुस्लिम बच्चों से इसका बहिष्कार करने और इस दिन स्कूल नहीं जाने के लिए कहा है। जमीयत के प्रदेश महासचिव अब्दुल वहीद खत्री ने कहा कि हिंदू सूर्य को भगवान मानते हैं लेकिन इस्लाम में अल्लाह से ऊपर कोई नहीं है।

जमीयत उलेमा-ए-हिन्द ने इसके पीछे संवैधानिक आजादी का भी राग अलापा है। एक मौलाना ने सूर्य नमस्कार समेत सरस्वती पूजा और वन्दे मातरम को भी हिन्दुओं का रिवाज बताया है। बता दें कि इससे पहले कट्टरपंथी मुस्लिम सूर्य नमस्कार का विरोध करते रहे हैं।

वहीं, प्रदेश सरकार की तरफ से राजस्थान के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने स्कूलों बच्चों से अधिक से अधिक संख्या में सूर्य नमस्कार कार्यक्रम में शामिल होने की अपील की है। उन्होंने कहा है कि यह आयोजन राजस्थान के सभी स्कूलों में सुबह 10:30 बजे आयोजित किया जाएगा।