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मोदी सरकार ने खेती-किसानी को दिया खूब खाद-पानी, फिर ‘किसानों’ के नाम पर तमाशा क्यों? जानिए 10 साल में कैसे बदली कृषि क्षेत्र की तस्वीर

देश की राजधानी में पुलिस अलर्ट पर है। सड़कों पर ट्रैफिक रेंग रही है। आम आदमी परेशान है। यह स्थिति ‘दिल्ली चलो’ नाम के मार्च से उत्पन्न हुई है। कथित किसान खेत-खलिहान छोड़कर हरियाणा की सीमा पर पुलिस से भिड़ रहे हैं ताकि वे दिल्ली की तरफ बढ़ सके।

कृषि और किसानों की खुशहाली के नाम पर चल रहे इस तमाशे में प्रधानमंत्री को धमकी दी जा रही है। उनकी लोकप्रियता का ग्राफ गिराने की बात हो रही है। खालिस्तान के समर्थन में पोस्टर दिख रहे हैं। आम चुनावों से पहले किसानों के नाम पर देश में अराजक स्थिति पैदा करने की कोशिश हो रही है। इन साजिशों को काॅन्ग्रेस सहित विपक्षी दलों का भी समर्थन हासिल है।

यदि कृषि क्षेत्र में मोदी सरकार के कार्यों पर गौर करें तो इस तथ्य को और बल मिलता है कि इस तमाशे का मकसद किसानों का भला कम, राजनीति ज्यादा है। 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने। के बाद से देश का कृषि बजट करीब 5 गुना बढ़ा है। 10 साल में खाद्यान्नों का उत्पादन रिकाॅर्ड स्तर पर पहुँच गया है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में 62.5 फीसदी का इजाफा हुआ है। खाद सब्सिडी तीन गुना हो चुका है। किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं के जरिए कृषकों तक सीधे पैसा पहुँचाया जा रहा है।

सीधे-सरल शब्दों में कहें तो मोदी सरकार के 10 साल में किसानों की खुशहाली के लिए ढेर सारे काम हुए हैं। जमीन पर उनका असर भी दिखता है। यही कारण है कि किसानों के नाम पर बखेड़ा करने की इन कोशिशों का असर कुछ खास क्षेत्र तक सीमित है। इन कथित किसानों को आम लोगों का समर्थन नहीं मिल रहा है।

मोदी सरकार में MSP में हुआ बड़ा बदलाव

सरकार द्वारा जिन मूल्यों पर किसानों की फसल खरीदी जाती है, उसे न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) कहते हैं। हर फसली वर्ष में सरकार इन मूल्यों के विषय में घोषणा करती है। पंजाब के किसान मुख्य रूप से धान और गेँहू उगाते हैं। यदि इनके ही समर्थन मूल्य की बात की जाए तो वर्ष 2014 में जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सत्ता में आए थे, तब देश में धान का MSP ₹1310, जबकि गेँहू MSP ₹1475 था।

अब अगर वर्तमान मूल्यों की बात की जाए तो इसमें काफी बढ़ोतरी हुई है। फसली सीजन 2023-24 के लिए सरकार ने धान और गेँहू का MSP क्रमशः ₹2183 और ₹2200 रखा है। यह 2014 में ₹1310 और ₹1475 हुआ करता था। ऐसे में अगर 2014 से तुलना की जाए तो धान के MSP में 66.6% जबकि गेँहू के MSP में लगभग 50% की बढ़ोतरी हुई है। ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ इन्हीं फसलों के दामों में बढ़ोतरी हुई है। अन्य फसलों पर भी सरकार ने धान दिया है।

मोदी सरकार ने MSP में उत्तरोतर बढ़ोतरी की है।

धान और गेँहू के अलावा बाजरा, मक्का और अरहर जैसी प्रमुख फसलों की MSP मोदी सरकार ने बढ़ाई है। बाजरे के MSP में सरकार ने 2014 से अब तक कुल 106% की बढ़ोतरी की है। यह 2014 में ₹1500 हुआ करता था, अब यह बढ़कर ₹3180 हो चुका है। अरहर दाल का MSP 2014 में ₹4300 हुआ करता था जो अब बढ़कर ₹7000 हो चुका है। यानी इसके MSP में 62% की बढ़ोतरी हुई है। इससे स्पष्ट है कि केंद्र सरकार MSP के मुद्दे पर काफी गंभीर है। इस दिशा में 10 साल में 62.5% की औसतन वृद्धि देखने को मिली है।

मोदी सरकार में सरकारी खरीद 30 फीसदी बढ़ी

ऐसा नहीं है कि मोदी सरकार ने सिर्फ MSP बढ़ाई है, बल्कि वह लगातार MSP की दरों पर खरीदी जाने वाली फसलों की मात्रा भी लगातार बढ़ाती आई है। केंद्र सरकार की रिपोर्ट बताती है कि 2014-15 के दौरान सरकार ने MSP पर 761 लाख मीट्रिक टन फसल खरीदी थी। यह 2022-24 में यह आँकड़ा बढ़ कर 1062 लाख टन हो चुका है। इसका अर्थ है कि इस दौरान देश में फसलों की सरकारी खरीद में लगभग 30% की बढ़ोतरी हुई है। इस बढ़ोतरी का सीधा फायदा किसानों को हुआ है।

मोदी सरकार में खाद सब्सिडी तिगुनी

केंद्र सरकार ने MSP बढ़ाने और उस पर ज्यादा अन्न खरीदने के साथ ही साथ खेती की लागत घटाने पर भी ध्यान दिया है। केंद्र सरकार लगातार खाद और बीज पर सब्सिडी बढ़ाती आई है। एक रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2014-15 में केंद्र सरकार किसानों को ₹73,067 करोड़ की खाद सब्सिडी दिया करती थी। यह वर्ष 2022-23 में बढ़ कर ₹2.54 लाख करोड़ पहुँच गई।

खाद सब्सिडी बढ़ने के साथ ही देश में खाद का उत्पादन भी अधिक हो रहा है। यूरिया के ही उत्पादन को देखा जाए तो वर्ष 2014 में यह 225 लाख टन था, अब बढ़ कर 284 लाख टन हो चुका है। देश में नैनो यूरिया का भी उत्पादन हो रहा है।

कृषि बजट पाँच गुना, किसान सम्मान निधि भी

वर्ष 2014 के बाद से अब तक कृषि बजट भी पाँच गुना हो चुका है। वर्ष 2013-14 में UPA सरकार ने कृषि क्षेत्र को ₹29,687 करोड़ दिए थे। यह 2024-25 के अंतरिम बजट में बढ़कर ₹1.27 लाख करोड़ हो गया है। यानी इन दस वर्षों में कृषि के लिए दिए जाने वाले पैसे में 436% की वृद्धि हुई है। सरकार ने कृषि बजट बढ़ाने के साथ ही किसान सम्मान निधि जैसी योजना लाकर उन्हें सीधा लाभ भी दिया है। इस योजना के तहत सरकार हर किसान को ₹6000 प्रतिवर्ष देती है।

आँकड़े बताते हैं कि फरवरी 2019 में से अब तक इसके अंतर्गत किसानों को ₹2.82 लाख करोड़ सीधे उनके खाते में सरकार दे चुकी है। इस योजना के तहत देश के 11 करोड़ से अधिक किसान लाभान्वित हो रहे हैं। पंजाब में भी इस योजना का लाभ 8.5 लाख किसानों को दिया जा रहा है।

कॉन्ग्रेस-आप के शासन में पंजाब बेपटरी

पंजाब को भारत के अग्रणी अन्न उत्पादक राज्यों में गिना जाता रहा है। हालाँकि, बीते कुछ वर्षों से यह तस्वीर बदल रही है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा खाद्य उत्पादन के लिए जारी किए गए आँकड़ों को देखने से पता चलता है कि अन्न उत्पादन में पंजाब में 2017-18 के बाद से वृद्धि ही नहीं हुई है। पंजाब में उगाई जाने वाली मुख्य फसलें धान और गेहूँ में यह स्थिति स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है।

यह बात ध्यान देने वाली है कि पंजाब में 2017 में ही सरकार बदली थी और अकाली-भाजपा गठबंधन को हराकर कॉन्ग्रेस सत्ता में आई थी। इसके बाद 2022 में फिर आम आदमी पार्टी ने कॉन्ग्रेस को बेदखल कर दिया। दोनों पार्टियों पर राज्य के कुप्रबन्धन और किसानों को गुमराह करने के आरोप लगते रहे हैं।

किसानों के प्रदर्शन पर राजनीति हावी

इस बार के किसानों के प्रदर्शन को किसान आन्दोलन 2.0 बताया जा रहा है। पिछली बार हुए एक मुद्दा किसान कानूनों का था। वर्तमान में ऐसा कोई भी मुद्दा उनके सामने नहीं है। किसानों के यूनियन द्वारा रखी गई माँगे भी स्पष्ट नहीं हैं। उलटे बीच-बीच में खालिस्तान की माँग हो रही है।

इसी प्रदर्शन से किसान नेता जगजीत सिंह दल्लेवाल का एक बयान भी सामने आया है, जहाँ वह प्रधानमंत्री मोदी के ग्राफ को नीचे लाने की बात कर रहे हैं। इस बयान के बाद प्रश्न उठ रहे हैं कि यदि यह किसानों का प्रदर्शन है और अपनी माँगें मनवाने के लिए किया जा रहा है तो फिर इससे प्रधानमंत्री मोदी के ग्राफ का क्या लेना-देना है?

मोदी सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र में किए गए बदलावों से यह स्थिति भी स्पष्ट है कि देश में किसानों की हालत में बदलाव आया है। ऐसे में प्रदर्शन के पीछे के राजनैतिक हितों के होने और उन्हें साधने के प्रयासों से इनकार नहीं किया जा सकता।

‘संदेशखाली में RSS का बेस’: शाहजहाँ को CM ममता बनर्जी ने दी क्लीनचिट, कहा- मास्क पहनकर बयान दे रहे BJP कार्यकर्ता

पश्चिम बंगाल के संदेशखाली में महिलाओं के साथ सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के स्थानीय नेताओं द्वारा यौन दुराचार करने के मामले में घिरी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भाजपा पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि संदेशखाली में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का बेस है। वहाँ पहले भी दंगे हो चुके हैं। ममता के इस बयान पर भाजपा ने तृणमूल सुप्रीमो को आड़े हाथों लिया है।

आजतक की रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिम बंगाल की विधानसभा में ममता बनर्जी ने कहा कि संदेशखाली में बाहर से आकर बीजेपी के कार्यकर्ता मास्क पहनकर बयान दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि वहाँ टारगेट शाहजहाँ शेख था। ED ने सबसे पहले उसे निशाने पर लिया और अब बीजेपी बाहर से लोगों को ला रही है। शाहजहाँ को एक तरह से क्लिनचिट देते हुए ममता ने कहा, “इस मामले में हमने एक्शन लेते हुए एक कमेटी बनाई है।”

संदेशखाली हिंसा पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा, “मैंने कभी भी अन्याय का समर्थन नहीं किया। मैंने राज्य आयोग और प्रशासन को वहाँ भेजा है। इस मामले में अब तक 17 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। हमारी महिला टीम वहाँ मौजूद है। एक महिला पुलिस टीम लोगों से मुलाकात कर रही है। उनकी शिकायतों को सुनने के लिए उनके दरवाजे पर है।”

ममता ने आगे कहा, “हम निश्चित रूप से उन मुद्दों का समाधान करेंगे, जो रिपोर्ट किए जाएँगे। मुझे इस पर कार्रवाई करने के लिए पहले मामले को जानना होगा। वहाँ आरएसएस का बेस है। वहाँ 7-8 साल पहले दंगे हुए थे। यह एक संवेदनशील दंगा स्थल है। हमने सरस्वती पूजा के दौरान स्थिति को दृढ़ता से सँभाला, अन्यथा कुछ और प्लान था।”

ममता बनर्जी के बयान पर भाजपा के नेता रविशंकर प्रसाद ने कहा, ममता जी ने जो बात कही है, वह बेहद शर्मनाक बात कही है। जो महिलाएँ टीम के साथ अपने चेहरे को आधा ढँक कर अपने खिलाफ यौन शोषण की बात कह रही थीं, उनको लेकर इन्होंने (ममता बनर्जी ने) कहा है कि ये महिलाएँ अपना मुँह खोलकर क्यों नहीं बोलतीं? मैं इनके खिलाफ कार्रवाई करूँगी।”

रविशंकर ने आगे कहा, “उन्होंने कहा कि संदेशखाली RSS का बर्नर है। इसका क्या मतलब है? आप इतना क्रूर और महिला विरोधी कैसे हो सकती हैं ममता जी? आज आपके TMC के गुर्गे रात में महिलाओं के दरवाजे खटखटाते हैं। उनका यौन शोषण करने का प्रयास करते हैं। ये महिलाएँ खुलकर बोल रही हैं। वो राज्यपाल जी के समाने गईं। दुनिया के सामने अपनी भयावहता खुद बयां कर रही हैं और ममता जी कह रही हैं कि RSS बर्नर है।”

इससे पहले संदेशखाली मुद्दे को लेकर स्मृति ईरानी ने भी बंगाल की ममता सरकार पर हमला बोला था। स्मृति ईरानी ने कहा था कि संदेशखाली की हिंदू महिलाएँ मदद माँग रही हैं। टीएमसी नेता शाहजहाँ कहाँ है? ममता और उनकी सरकार के लोगों ने कभी उन गुंडों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की। स्मृति ईरानी ने यह भी दावा किया था कि महिलाओं के साथ हुए अत्याचार पर पुलिसकर्मी भी मूकदर्शक है।

बता दें कि पुलिस ने बुधवार (14 फरवरी 2024) को कहा था कि संदेशखाली पर मीडिया ने जानबूझकर गलत खबर फैलाई। उनके पास ऐसी कोई शिकायत नहीं है कि स्थानीय महिलाओं से रेप हुआ है।इसलिए पुलिस उन मीडिया संस्थानों के खिलाफ एक्शन लेगी, जिन्होंने ऐसी खबरें फैलाने का काम किया है।

पुलिस ने कहा कि संदेशखाली में राज्य महिला आयोग द्वारा की गई जाँच में अभी तक किसी महिला के द्वारा रेप की कोई शिकायत नहीं दी गई है। राज्य महिला आयोग की टीम में 10 महिला सदस्य हैं और इसकी अध्यक्षता डीआईजी-सीआईडी कर रही हैं। इस टीम ने संदेशखाली में दौरा किया और उन्होंने भी यही कहा कि स्थानीय महिलाओं ने जाँच में रेप की बात नहीं कही है।

वहीं, बंगाल अशोकनगर के टीएमसी विधायक नारायण गोस्वामी ने एक इंटरव्यू में संदेशखाली की महिलाओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था, “संदेशखाली की जनजातीय महिलाओं को उनके डील-डौल, रंग-रूप से पहचाना जा सकता है। लेकिन जो महिलाएँ कैमरे पर आकर आरोप लगा रही हैं वो गोरी हैं। क्या फिर भी हम उन्हें स्थानीय जनजातीय महिला कहेंगे।”

संदेशखाली का दौरा करके लौटे राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष अरुण हलदर ने कहा, “मुझे संदेशखाली के बारे में रिपोर्ट मिली है। बहुत से लोग बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन उन्हें बोलने का मौका नहीं दे रहे। पीड़ित लोग अनुसूचित जाति के हैं। उनको सुनने के लिए पूरा कमीशन आया है। इन लोगों की बातों को सुनकर मैं राष्ट्रपति को रिपोर्ट दूँगा। सच और झूठ लोगों की बात से पता चलेगा। एकतरफा राज्य सरकार जो कर रही है, उस पर भरोसा नहीं कर सकते।”

बता दें कि इससे पहले संदेशखाली की एक महिला ने मीडिया से बात करते हुए बताया था कि टीएमसी के गुंडों द्वारा बलात्कार की बात बताने पर रेप का मेडिकल प्रमाण पत्र दिखाने के लिए कहा जा रहा है। महिला ने पूछा कि आखिर कौन-सी पीड़िता सामने आकर यह स्वीकार करेगी। महिला ने बताया कि उसके साथ यौन दुराचार नहीं हुआ है, लेकिन गाँव की कई महिलाओं के साथ ऐसा हुआ है।

ध्यान देने वाली बात है कि संदेशखाली में पिछले कुछ दिनों से महिलाएँ सत्ताधारी पार्टी के गुंडों के विरुद्ध सड़कों पर उतरी हुई हैं। इस दौरान उन्होंने टीएमसी गुंडों के भयावह कारनामों का खुलासा किया है। महिलाओं ने बताया कि वहाँ की महिलाओं के साथ टीएमसी के गुंडों द्वारा रेप और गैंगरेप आम बात है। वो टीएमसी की महिला कार्यकर्ताओं को भी नहीं छोड़ते।

महिलाओं का आरोप है कि पार्टी की मीटिंग में ये नेता सिर्फ महिलाओं को ही बुलाते हैं। महिला कार्यकर्ताओं को धमकाते हुए कहते हैं कि पति को मरने से बचाना है तो पार्टी के दफ्तर में आना पड़ेगा। जब महिलाएँ पार्टी के दफ्तर जाती हैं तो टीएमसी के गुंडे उनका यौन शोषण करते हैं। महिलाओं का आरोप है कि उन्हें अपनी अपने परिजनों की सुरक्षा के लिए चुप रहना पड़ता है।

महिलाओं का ये भी आरोप है कि टीएमसी के गुंडे जमीनों पर कब्जा करते हैं और विरोध करने वालों को गैंगरेप की धमकी देते हैं। यही नहीं, उन्हें जो भी महिला पसंद आती है, उसे उठाकर अपने साथ ले जात हैं और मन भर जाता है तो घर भेज देते हैं। महिलाओं का यह भी आरोप है कि पश्चिम बंगाल की पुलिस टीएमसी के गुंडों के लिए सहायक का काम करती है और पीड़ितों को ही दबाती है।

हिरोइन से सांसद बनी मिमी चकवर्ती ने ‘राजनीति’ से की तौबा, ममता बनर्जी को भेजा इस्तीफा: TMC के स्थानीय नेतृत्व से नाराजगी बनी वजह

बांग्ला फिल्मों की अभिनेत्री और पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की सांसद मिमी चक्रवर्ती ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। मिमी ने अपना इस्तीफा TMC सुप्रीमो ममता बनर्जी को सौंपा है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, वे अपनी जादवपुर सीट और स्थानीय नेतृत्व से खुश नहीं हैं। उन्हें स्थानीय नेताओं का पर्याप्त समर्थन नहीं मिल रहा है। इसलिए वो अपने पद से इस्तीफा दे रही हैं।

मिमी चक्रवर्ती ने अपना इस्तीफा लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को नहीं सौंपा है। इसलिए फिलहाल उनकी सांसदी पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। इससे पहले मिमी ने दो स्थायी समितियों की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। मिमी औद्योगिक मामलों पर संसद की स्थायी समिति की सदस्य थीं। वह केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय और नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की संयुक्त समिति की भी सदस्य भी थीं।

इतना ही नहीं, मिमी चक्रवर्ती ने अपने लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले स्वास्थ्य केंद्र संगठन के अध्यक्ष पद से भी इस्तीफा दे दिया था। मिमी जादवपुर लोकसभा के अंतर्गत नलमुड़ी और जिरंगछा ब्लॉक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र रोगी कल्याण संघ की अध्यक्ष थीं। इस इस्तीफे के बाद उनके अगले कदम को लेकर राजनीतिक गलियारे में अटकलें तेज हो गई थीं।

आखिरकार मिमी चक्रवर्ती ने गुरुवार (15 फरवरी 2024) को अपने सांसद पद से इस्तीफा दे दिया। अब देखना है कि वह राजनीति से संन्यास लेती हैं या कोई और पार्टी में शामिल होती हैं। हालाँकि, अपने इस्तीफे को लेकर जो बयान दिया है, उससे लगता है कि वह संन्यास लेने के ही मूड में हैं। हालाँकि, मीडिया रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि वह अपने लोकसभा सीट और स्थानीय नेतृत्व से खुश नहीं हैं।

मिमी चक्रवर्ती ने कहा, “राजनीति मेरे लिए नहीं है। अगर आप किसी की मदद कर रहे हैं तो आपको यहाँ (राजनीति में) किसी को बढ़ावा देना होगा… एक राजनेता होने के अलावा मैं एक अभिनेत्री के रूप में भी काम करती हूँ। मेरी समान जिम्मेदारियाँ हैं। यदि आप राजनीति में हैं तो आपकी आलोचना की जाती है, चाहे आप काम करें या नहीं। मैंने अपने मुद्दों के बारे में ममता बनर्जी से बात की है।”

तृणमूल सांसद ने आगे कहा, “मैं उन्हें (ममता बनर्जी को) उस पार्टी से अपने इस्तीफे के बारे में बताना चाहती थी, जिसने मुझे आगे बढ़ने का मौका दिया। मैंने उन्हें साल 2022 में भी सांसद पद से अपने इस्तीफे के बारे में बताया था। उस समय उन्होंने इसे खारिज कर दिया था। वह जो कहेंगी उसके बाद मैं आगे की प्रक्रिया पूरी करूँगी।”

मिमी चक्रवर्ती को TMC ने साल 2019 के लोकसभा चुनावों में जादवपुर सीट से चुनावी मैदान में उतारा था। मिमी ने भाजपा के उम्मीदवार अनुपम हजरा को 2.95 लाख वोटों से हराया था। इस चुनाव में मिमी चक्रवर्ती को कुल 6,88,472 वोट मिले थे। वहीं, भाजपा प्रत्याशी अनुपम हजरा को 3,93,233 वोट हासिल मिले थे।

मिमी चक्रवर्ती का जन्म 11 फरवरी 1989 को पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी में हुआ था। आज बंगाली फिल्म इंडस्ट्री का एक जाना-माना नाम हैं। उन्होंने साल 2012 में फिल्म ‘चैंपियन’ से अपने करियर की शुरुआत की थी और अब तक 25 से अधिक सफल फिल्मों में काम चुकी हैं। वह बंगाल में काफी लोकप्रिय हैं। उनकी लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें 2019 में टिकट दी गई थी।

INDI गठबंधन की डूबती नाव से अब NC कूदी, अकेले लड़ेगी चुनाव: फारूक अब्दुल्ला ने मोदी लहर में ‘घर वापसी’ के भी दिए संकेत

इंडी गठबंधन को झटके पर झटके लग रहे हैं। एक एक करके सारे साथी दूर होते जा रहे हैं। अब नेशनल कॉन्फ्रेंस ने भी इंडी गठबंधन की जगह अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। फारूक अब्दुल्ला ने गुरुवार (15 फरवरी 2024) को इस बात का ऐलान कर दिया है कि उनकी पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस इस साल के लोकसभा चुनाव में अकेले मैदान में उतरेगी। यही नहीं, उन्होंने एनडीए से भी जुड़ने के संकेत दिए हैं।

पूर्व केंद्रीय मंत्री और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने कहा, “मुझे लगता है कि दोनों राज्यों में संसदीय चुनावों के साथ चुनाव शुरू होंगे। रही बात सीट बँटवारे की तो नेशनल कॉन्फ्रेंस अकेले चुनाव लड़ेगी, इसमें कोई संदेह नहीं है।” इंडी गठबंधन के तमाम साथियों ने एक-एक करके अपनी राहें जुदा कर ली है। ममता बनर्जी, नीतीश कुमार, अरविंद केजरीवाल के बाद अब फारूक अब्दुल्ला का ये ऐलान उस गठबंधन के ताबूत में एक और कील की तरह है।

गुपकार गठबंधन के साथी क्या करेंगे?

बता दें कि जम्मू-कश्मीर में गुपकार नाम का गठबंधन है, जिसमें महबूबा मुफ्ती की पीडीपी समेत कई पार्टियाँ शामिल हैं। वहीं फारूक अब्दुल्ला ने एनडीए से भी जुड़ने के संकेत दिए हैं। आजतक से बात करते हुए फारूक अब्दुल्ला ने कहा है कि मुझे देश बनाने के लिए जो करना पड़ेगा, वो करूँगा। वहीं प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से मुलाकात के सवाल पर कहा कि जब वो बुलाएँगे तो कौन बात नहीं करना चाहेगा। फारूक अब्दुल्ला ने एनडीए में शामिल होने पर कहा कि हम भविष्य में एनडीए में शामिल होने की संभावनाओं को नकार नहीं सकते। उन्होंने बताया कि इंडिया ब्लॉक में सीटों की शेयरिंग पर बातचीत फेल हो गई, जिसकी वजह से ये फैसला लिया है।

अरविंद केजरीवाल-ममता बनर्जी भी कर चुके हैं राह अलग

फारूक अब्दुल्ला से पहले ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, नीतीश कुमार, जयंत चौधरी जैसे साथी इंडी गठबंधन को छोड़ चुके हैं। ममता बनर्जी पहले ही पश्चिम बंगाल में अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी हैं। अरविंद केजरीवाल ने भी पंजाब और चंडीगढ़ में अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा की है, तो आप ने अरुणाचल प्रदेश में भी पार्टी अपने उम्मीदवार के नाम की घोषणा कर चुकी है।

यही नहीं, दिल्ली में भी आम आदमी पार्टी ने 7 में से 6 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। इसके अलावा नीतीश कुमार, जिन्होंने इस इंडी गठबंधन को खड़ा किया, वो इंडी गठबंधन को छोड़कर एनडीए में आ चुके हैं और बिहार में सत्ता बदल चुकी है। वहीं, उत्तर प्रदेश में सपा और इंडी गठबंधन के साथ रहे जयंत चौधरी भी इंडी गठबंधन से अलग होकर एनडीए में आ चुके हैं।

‘लोग बहुत कुछ कहना चाहते हैं पर उन्हें बोलने नहीं दे रहे’: संदेशखाली की पीड़िताओं से मिला SC आयोग, राष्ट्रपति को जाएगी रिपोर्ट

पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले में तनाव के बीच राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की टीम संदेशखाली पहुँची। इस टीम ने पीड़ितों से मुलाकात की। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की टीम राष्ट्रपति को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की सदस्य अंजू बाला ने कहा कि प्रशासन ने पीड़ितों की शिकायत तक दर्ज नहीं की है।

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष अरुण हलदर ने कहा, “मुझे संदेशखाली के बारे में रिपोर्ट मिली है। बहुत से लोग बहुत कुछ कहना चाहते थे लेकिन उन्हें बोलने का मौका नहीं दे रहे। पीड़ित लोग अनुसूचित जाति के हैं। उनको सुनने के लिए पूरा कमीशन आया है। इन लोगों की बातों को सुनकर मैं राष्ट्रपति को रिपोर्ट दूँगा। सच और झूठ लोगों की बात से पता चलेगा। एकतरफा राज्य सरकार जो कर रही है, उस पर भरोसा नहीं कर सकते। कल सुबह 11 बजे राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजी जाएगी।” उन्होंने कहा कि ये आयोग राजनीतिक नहीं है, संवैधानिक है। हम यहाँ राजनीति करने नहीं, बल्कि लोगों की परेशानियों को सुनने आए हैं।

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की सदस्य अंजू बाला ने कहा, “यह एक शर्मनाक घटना है कि आज के समय में भी महिलाओं के साथ ऐसा कुछ हो सकता है। कोई भी महिला उन्हें पसंद आती थी, तो वो उसे ले जाते थे। यहाँ राजनीति का स्तर इस तरह गिर जाएगा कि आप महिलाओं को यूज करेंगे और यूज करने के बाद हटा देंगे। इस तरह की राजनीति नहीं होनी चाहिए। यहाँ की मुख्यमंत्री खुद एक महिला हैं, उनका नाम ममता रखती है लेकिन दिल में ममता नाम की चीज नहीं है। यहाँ तो 376 तक का मुकदमा दर्ज नहीं हुआ है। हम मुलाकात करेंगे और जो धाराएँ लगनी चाहिए, वो लगवाने की कोशिश करेंगे।”

पीड़ितों से मुलाकात के बाच अंजू बाला ने अपनी बातों को दोहराया। उन्होंने कहा कि “ममता बनर्जी में ममता नाम की कोई चीज नहीं” है। उन्होंने कहा, “सीएम ममता बनर्जी कुछ भी खुलासा नहीं करना चाहतीं, वह महिलाओं पर अत्याचार की एफआईआर दर्ज नहीं करतीं। देश उन्हें माफ नहीं करेगा। हम चाहते हैं कि संदेशखाली में राष्ट्रपति शासन लगाया जाए, क्योंकि यहाँ लोग बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं हैं।” अंजू बाला ने केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को भी धन्यवाद कहा, क्योंकि उन्हीं की वजह से इस घटनाक्रम के बारे में पूरे देश को पता चला।

बता दें कि 8 फरवरी को संदेशखाली में महिलाओं ने टीएमसी के नेता और कथित तौर पर ममता बनर्जी के करीबी शेख शाहजहाँ के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। इस दौरान वहाँ काफी बवाल हुआ, जिसमें कई लोग घायल भी हो गए। संदेशखाली की महिलाओं ने आरोप लगाए हैं कि उन पर अत्याचार किया गया है। यहाँ तक कि टीएमसी की महिला कार्यकर्ताओं ने भी ये गंभीर आरोप लगाए। इस मामले में अब महिलाओं ने आरोप लगाए हैं कि उनसे बलात्कार का सर्टिफिकेट माँगा जा रहा है।

बता दें कि संदेशखाली में पिछले कुछ दिनों से महिलाएँ सत्ताधारी पार्टी के गुंडों के विरुद्ध सड़कों पर उतरी हुई हैं। इस दौरान उन्होंने टीएमसी गुंडों के भयावह कारनामों का खुलासा किया है। महिलाओं ने बताया कि वहाँ की महिलाओं के साथ टीएमसी के गुंडों द्वारा रेप और गैंगरेप आम बात है। वो टीएमसी की महिला कार्यकर्ताओं को भी नहीं छोड़ते।

महिलाओं का आरोप है कि पार्टी की मीटिंग में ये नेता सिर्फ महिलाओं को ही बुलाते हैं। महिला कार्यकर्ताओं को धमकाते हुए कहते हैं कि पति को मरने से बचाना है तो पार्टी के दफ्तर में आना पड़ेगा। जब महिलाएँ पार्टी के दफ्तर जाती हैं तो टीएमसी के गुंडे उनका यौन शोषण करते हैं। महिलाओं का आरोप है कि उन्हें अपनी अपने परिजनों की सुरक्षा के लिए चुप रहना पड़ता।

जूनागढ़ में जहर उगलने के लिए मुफ्ती अजहरी को मिले थे ₹40,000: रिपोर्ट में दावा- पुलिस एक्शन से सहमे दंगाइयों को उकसाने का दिया गया था टास्क

गुजरात के जूनागढ़ में भड़काऊ भाषण देने वाले मुफ़्ती सलमान अजहरी से राज्य के अलग-अलग हिस्सों की पुलिस अब भी पूछताछ कर रही है। उसे जूनागढ़ वाले मामले में अदालत से राहत मिल गई थी, लेकिन इसके बाद मोडासा और कच्छ के समख्याली में उसके विरुद्ध दर्ज मामलों में पूछताछ हो रही है। अजहरी के खिलाफ जूनागढ़, कच्छ और मोडासा में भड़काऊ भाषण देने के मामले दर्ज हैं।

मुफ़्ती अजहरी से जूनागढ़ पुलिस की पूछताछ में कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जूनागढ़ क्राइम ब्रांच की जाँच में सामने आया है कि मुफ्ती सलमान अजहरी को यह जहरीले भाषण देने के लिए ₹40,000 दिए गए थे। यह पैसे उसे इन कार्यक्रमों के आयोजकों ने दिए थे।

इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि मुफ़्ती सलमान अजहरी ने जिस कार्यक्रम में यह जहरीला भाषण दिया था, वह नशा छुड़ाने के नाम पर आयोजित किया गया था। यह कार्यक्रम नरसिंह विद्यामंदिर स्कूल के मैदान में आयोजित किया गया था। पुलिस ऐसे ही और भी कार्यक्रमों की जाँच कर रही है।

मुफ़्ती सलमान अजहरी जहरीले भाषणों के लिए काफी कुख्यात है। अजहरी की सोशल मीडिया पर 4.69 लाख की अच्छी-खासी फैन फॉलोइंग है। वह कट्टरपंथी विचार फैलाता रहा है। उसके यूट्यूब वीडियो से भी उसे बड़ी कमाई होती है। यह बात अलग है कि जब पुलिस ने उससे सोशल मीडिया से होने वाली कमाई के बारे में पूछा तो उसने इसकी जानकारी होने से मना कर दिया।

अजहरी ने दावा किया कि उसके सोशल मीडिया अकाउंट दूसरे लोग सम्भालते हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि पुलिस जाँच में मुफ़्ती अजहरी ने और भी कई बातें उगली हैं। यह भी सामने आया है कि जूनागढ़ में जून 2023 में हुए माजेवाड़ी दंगे में जब पुलिस ने दंगाइयों पर कार्रवाई की तो उनका हौसला टूट गया था। इन दंगाइयों का हौसला बुलंद करने के लिए अजहरी को यहाँ बुलाया गया था।

जब मुफ़्ती सलमान अजहरी का यह कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा था तो आयोजकों को कुछ लोगों ने इस विषय में चेताया भी था। लोगों ने आयोजकों से कहा था कि मुफ़्ती सलमान अजहरी हमेशा भड़काऊ भाषण देता है। ऐसे में अगर वह यही दोहराता है तो समस्याएँ खड़ी हो सकती हैं। हालाँकि, मुफ़्ती के भड़काऊ भाषणों के दीवानों ने इस पर ध्यान नहीं दिया और उसे बुलाया जिसके बाद उसने यहाँ जहर उगला।

रामलला, रामरथी के बाद अब कारसेवक की बारी: जानिए कौन हैं अजित गोपछडे, कभी ऑटो ड्राइवर रहे मयंक नायक भी जाएँगे राज्यसभा

राज्यसभा चुनावों के लिए भाजपा ने अपने अधिकांश उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। पार्टी ने बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र आदि राज्यों से अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं। इन नामों में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से लेकर रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव तक के नाम शामिल हैं। हालाँकि, इस सूची में दो ऐसे नाम भी हैं, जिन्होंने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा है।

ये दोनों नाम हैं महाराष्ट्र के अजित गोपछडे और गुजरात के मयंक भाई नायक। इनको दोनों को पार्टी ने राज्य सभा भेजने का निर्णय लिया है। दोनों ही उम्मीदवार भाजपा के समर्पित कार्यकर्ता हैं। बता दें कि अयोध्या में राममंदिर की प्राण प्रतिष्ठा और भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को भारत रत्न पुरस्कार देने के बाद अब कारसेवक को राज्यसभा भेजने का निर्णय लिया है।

कारसेवक रहे हैं अजित गोपछड़े

महाराष्ट्र के नांदेड़ जिले से आने वाले और पेशे से डॉक्टर अजित गोपछड़े लगभग तीन दशक से संघ और भाजपा से जुड़े हैं। वर्तमान में वे पार्टी के महाराष्ट्र डॉक्टर मोर्चा के अध्यक्ष हैं। इसके अलावा, वह रामजन्मभूमि आन्दोलन के दौरान सबसे आगे रहने वाले कारसेवकों में एक थे। गोपछडे की सन 1992 की वे तस्वीरें वायरल हो रही हैं, जिनमें वे बाबरी ढाँचे के गुम्बद पर दिख रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि लिंगायत समुदाय से आने वाले गोपछडे तब MBBS की पढ़ाई पूरी ही की थी और बाकी कारसेवकों के साथ वे अयोध्या पहुँचे थे। उन्होंने कारसेवक के तौर पर बाबरी पर चढ़ने को लेकर कहा,” मैं वहाँ सामान्य कारसेवक के तौर पर गया था। मेरे साथ उस समय और भी कई सम्मानित लोग थे। हमने उस दिन भगवान राम के लिए अपनी सेवाएँ दी थीं।”

गोपीनाथ मुंडे, प्रमोद महाजन और नितिन गडकरी जैसे महाराष्ट्र भाजपा के बड़े नामों के करीबी रहे गोपछडे अपने छात्र जीवन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से भी जुड़े रहे थे। वे पार्टी के कार्यकर्ता होने के साथ ही समाजसेवी भी हैं। उन्होंने कोरोना महामारी के दौरान भी काफी काम किया था। वह महाराष्ट्र में एक ब्लड बैंक शुरू करने में भी अग्रणी रहे हैं।

राज्यसभा के लिए नामित होने पर गोपछडे ने कहा कि उन्हें इसकी उम्मीद नहीं थी। उन्होंने मीडिया को बताया, “मैं तो पार्टी का एक साधारण कार्यकर्ता हूँ। मुझे आशा नहीं थी कि मैं राज्यसभा के लिए नामित किया जाऊँगा। मैं भाजपा में बीते 25-30 वर्षों से हूँ। मैं मेडिकल रिसर्च और शिक्षा के क्षेत्र में काम करना चाहता हूँ।” महाराष्ट्र से गोपछड़े के अलावा अशोक चव्हाण और मेधा कुलकर्णी को भी नामित किया गया है।

गुजरात से मयंक भाई नायक को राज्य सभा टिकट, चलाते थे ऑटो

भाजपा ने गुजरात से राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के अलावा राज्य के ओबीसी मोर्चा के मुखिया मयंक भाई नायक को भी राज्यसभा भेजने का निर्णय लिया है। मयंक नायक भी पार्टी से तीन दशक से अधिक समय से जुड़े हैं। गुजरात के मेहसाणा से आने वाले मयंक नायक मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, वे 1980 के दशक में परिवार का खर्चा चलाने के लिए ऑटो भी चला चुके हैं।

मयंक नायक केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के करीबी माने जाते हैं। वह उनकी गाँधीनगर सीट के प्रभारी भी हैं। मयंक 2002 के बाद से गुजरात में होने वाली पार्टी की सभी यात्राओं का हिस्सा रहे हैं। वह हाल ही में सम्पन्न हुए मेरी मिट्टी, मेरा देश अभियान के गुजरात प्रभारी रहे हैं। वह पार्टी के लिए मात्र गुजरात ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में भी काम कर चुके हैं।

राज्यसभा के लिए नामित होने पर मयंक नायक ने कहा, “मैं आश्चर्यचकित हूँ कि पार्टी ने मेरे जैसे साधारण कार्यकर्ता को इतनी बड़ी जिम्मेदारी दे दी है। यह स्पष्ट सन्देश है कि कार्यकर्ता को पार्टी के लिए काम करते रहना चाहिए। यह मेरे लिए सरप्राइज है।” मयंक नायक और जेपी नड्डा के अलावा गुजरात से पार्टी ने बड़े हीरा कारोबारी गोविन्द भाई ढोलकिया को भी राज्यसभा भेजने का निर्णय लिया गया है।

क्या है चुनावी बाॅन्ड, कब और कैसे हुई शुरुआत: सुप्रीम कोर्ट ने क्यों लगाई रोक, क्यों माँगा हिसाब; जानिए सब कुछ

सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड (चुनावी बॉन्ड) पर रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक माना है। इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ कर रही थी, जिसकी अगुवाई खुद सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ कर रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ चुनावी बॉन्ड को अवैधानिक बताया है, बल्कि अब तक इसे कितने लोगों ने खरीदा है, किन पार्टियों को चंदा दिया गया है, इसकी भी जानकारी सार्वजनिक करने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए एसबीआई को तीन सप्ताह का समय दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में चार याचिकाओं की सुनवाई कर रही थी। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली 05 न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ पिछले साल से ही मामले को सुन रही थी। इस पीठ में जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा भी रहे। सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने 29 अक्टूबर 2023 को हलफनामा पेश किया था। सुप्रीम कोर्ट ने 31 अक्टूबर 2023 से 2 नवंबर 2023 तक तीन दिनों तक सभी पक्षों को सुना था और अब फैसला दिया है।

अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि चुनावी बॉन्ड योजना पारदर्शिता की कमी, दानदाताओं की गुमनामी और राजनीतिक दलों पर अमीर व्यक्तियों और कंपनियों के प्रभाव के कारण लोकतंत्र के लिए खतरा है। न्यायालय ने यह भी कहा कि योजना कानून के तहत स्थापित मौजूदा नियामक ढाँचे को कमजोर करती है। चुनावी बॉन्ड योजना एक विवादास्पद मुद्दा रहा है। इसके पक्ष और विपक्ष दोनों में तर्क हैं। यह अभी भी देखा जाना बाकी है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भारतीय लोकतंत्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

चुनावी बॉन्ड कैसे करता है काम?

चुनावी बॉण्ड को साल 2017 में एक वित्त विधेयक के माध्यम से पेश किया गया था। सरकार ने इसे 2 जनवरी 2018 में लागू किया। इससे उन्हीं पार्टियों को फायदा होता है, जो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए के तहत पंजीकृत हों। यही नहीं, उस राजनीतिक पार्टी को लोकसभा या विधानसभा के ताजे चुनाव में कम से कम 1 प्रतिशत वोट भी हासिल करना होता है, तभी वो चुनावी बॉन्ड पा सकते हैं।

चुनावी बॉन्ड भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की चुनिंदा शाखाओं से 1,000 रुपये, 10,000 रुपये, 1 लाख रुपये और 1 करोड़ रुपये के मूल्यवर्ग में खरीदे जा सकते हैं। एसबीआई की 29 शाखाओं को इलेक्टोरल बॉन्ड जारी करने और उसे भुनाने के लिए अधिकृत किया गया था। ये शाखाएँ नई दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, गाँधीनगर, चंडीगढ़, पटना, राँची, गुवाहाटी, भोपाल, जयपुर और बेंगलुरु में हैं। राजनीतिक दलों को चुनावी बॉन्ड को 15 दिनों के भीतर एसबीआई में भुनाना होता है, और इस राशि की जानकारी चुनाव आयोग को देनी होती है। हालाँकि वो अपने दानदाताओं के बारे में कोई जानकारी नहीं रखते।

सरकार ने दावा किया कि यह योजना राजनीतिक दलों के लिए धन जुटाने का एक पारदर्शी तरीका प्रदान करेगी और काले धन के इस्तेमाल को कम करेगी। यह राजनीतिक दलों के लिए धन जुटाने का एक पारदर्शी तरीका प्रदान करता है। यह काले धन के इस्तेमाल को कम करने में मदद करता है। यह राजनीतिक दलों को व्यक्तियों और कंपनियों से अधिक स्वतंत्रता प्रदान करता है।

चुनावी बॉन्ड खरीदकर किसी पार्टी को देने से ‘बॉन्ड खरीदने वाले’ को कोई फायदा नहीं होगा। न ही इस पैसे का कोई रिटर्न मिलता है। ये अमाउंट पॉलिटिकल पार्टियों को दिए जाने वाले दान की तरह है, ऐसे में इससे 80जीजी 80जीजीबी के तहत इनकम टैक्स में छूट मिलती है। हालाँकि चुनावी बॉन्ड को लेकर तमाम आशंकाएँ भी जताई जा रही थी।

चुनावी बॉन्ड के खिलाफ गईं कौन सी बातें?

अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सभी राजनीतिक दलों को इलेक्शन कमीशन के समक्ष इलेक्टोरल बॉन्ड्स की जानकारी देनी होगी। इसके साथ दलों को बैंक डीटेल्स भी देना होगा। अदालत ने कहा है कि राजनीतिक दल,आयोग को एक सील बंद लिफाफे में सारी जानकारी दें, लेकिन ये मामला केवल यहीं नहीं थमा बल्कि इस पूरे चुनावी बॉन्ड स्कीम की वैधता को ही चुनौती दी गई।

दरअसल, चुनावी बॉन्ड को लेकर सबसे बड़ी परेशानी इसके माध्यम से पैसे दे रहे लोगों के बारे में जानकारी का सार्वजनिक न होना है। आरटीआई के माध्यम से भी इसकी जानकारी नहीं दी जा रही थी, और बोला जाता था कि ये सूचना आम नागरिकों के लिए है ही नहीं। ऐसे में कौन ये बॉन्ड खरीद रहा है और किस पार्टी को इस माध्यम से दान दे रहा है, ये जानकारी कभी बाहर ही नहीं आ पाती थी।

एक आँकड़े के मुताबिक, चुनावी बॉन्ड के जरिए अब तक 5851 करोड़ रुपए जुटाए जा चुके हैं। सिर्फ मई 2023 में ही 822 करोड़ रुपए के चुनावी बॉन्ड जारी किए गए। वहीं, पिछले लोकसभा चुनाव के समय जनवरी से मई 2019 तक 4794 करोड़ रुपए के बॉन्ड जारी किए गए। ये चुनावी बॉन्ड हर साल दो बार जारी किए जाते हैं। आम तौर पर चुनाव के समय। साल 2018 से अब तक इसे 11 बार जारी किया जा चुका है। इसके माध्यम से राजनीतिक पार्टियों को 5851 करोड़ रुपए का चंदा मिला।

BJP को छोड़ो नहीं तो बम से उड़ा देंगेः नीतीश कुमार को धमकी देना वाला निकला बोरी सिलाई करने वाला, दिल्ली HC को भी उड़ाने की धमकी

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और दिल्ली हाई कोर्ट को बम से उड़ाने की धमकी दी गई है। कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को बुधवार (14 फरवरी 2024) की देर शाम को ईमेल मिला, जिसमें कहा गया कि गुरुवार को कोर्ट में बड़ा धमाका करने की बात कही गई है। वहीं, बिहार में नीतीश कुमार को भाजपा से अलग नहीं होने पर उन्हें बम से उड़ाने और उनके विधायकों को जान से मारने की धमकी दी गई है। यह धमकी DGP को ऑडियो क्लिप भेजकर दी गई है।

दरअसल, एक बदमाश ने बिहार के पुलिस महानिदेशक (DGP) आरएस भट्टी को एक ऑडियो क्लिप भेजा। आरोपित ने अपने वीडियो में कहा, “नीतीश को कहें कि वह भाजपा के साथ नहीं जाएँ, वरना उन्हें बम से उड़ा देंगे और उनके विधायकों को भी मारेंगे।” ऑडियो सामने आने के बाद पुलिस ने सोनू पासवान नाम के बदमाश को अरेस्ट कर लिया है। 

ऑडियो क्लिप के बाद आर्थिक अपराध इकाई में पहले सनहा हुआ। इसके बाद प्राथमिकी दर्ज की गई। फिर बिहार पुलिस बदमाश की पहचान में जुट गई। जाँच में पुलिस को पता चला कि धमकी देने वाला आरोपित सोनू पासवान बिहार के ही समस्तीपुर के दयानगर का रहना वाला है और वह बेंगलुरु में बोरी सिलाई का काम करता है।

सोनू को कर्नाटक के देवनगिरी जिले से गिरफ्तार किया गया है। सोनू ने बताया कि यूट्यूब और टीवी चैनलों पर तख्ता पलट की खबरों से विचलित होकर उसने धमकी वाला मैसेज भेजा था। बार-बार तख्ता पलट से बिहार में विकास प्रभावित हो रहा था और गरीबी एवं बेरोजगारी बढ़ रही है। पुलिस ने उसके मोबाइल को भी जब्त कर लिया है।

उधर, दिल्ली हाई कोर्ट में विस्फोट की धमकी मिलने के बाद पुलिस सतर्क हो गई। इसको लेकर भेजे गए ईमेल में कहा गया है, “मैं तुम्हें 15 फरवरी को बम से उड़ा दूँगा। यह विस्फोट दिल्ली में सबसे बड़ा विस्फोट होगा। जितना संभव हो सके उतनी सुरक्षा तैनात कर लो… सभी मंत्रियों को बुला लो। हम तुम सबको एक साथ उड़ा देंगे।”

दिल्ली हाई कोर्ट में विस्फोट की धमकी मिलने के बाद परिसर में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। पूरे परिसर की तलाशी ली जा रही है। हालाँकि, जाँच के बाद परिसर में किसी तरह की संदिग्ध वस्तु नहीं मिली। वहीं, धमकी वाला ईमेल भेजने वाले शख्स की पहचान करने की कोशिश जारी है।

‘ये तो गोरी महिलाएँ, इनका डील-डौल संदेशखाली की आदिवासी औरतों जैसा नहीं’: पीड़िताओं का TMC विधायक ने उड़ाया मजाक, बीजेपी MP ने लताड़ा

पश्चिम बंगाल के संदेशखाली में महिलाओं द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों से सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस के बड़े नेताओं को कोई फर्क नहीं पड़ा। उनके बयानों से ऐसा जान पड़ रहा है कि उनके भीतर पीड़िताओं का दर्द समझने के लिए संवेदनशीलता भी नहीं बची।

हाल में 24 परगना जिला परिषद के अध्यक्ष और अशोकनगर के टीएमसी विधायत नारायण गोस्वामी ने अपने एक इंटरव्यू के वक्त पीड़ित महिलाओं पर आपत्तिजनक बयान दिया था। उन्होंने आरोप लगाने वाली महिलाओं का मखौल उड़ाते हुए उनके रंग-रूप पर टिप्पणी की थी, जिसके बाद अब भाजपा सांसद लॉकेट चटर्जी ने उन्हें करारा जवाब दिया।

तृणमूल कॉन्ग्रेस के विधायक नारायण गोस्वामी ने कहा था- “संदेशखाली की जनजातीय महिलाओं को उनके डील-डौल, रंग-रूप से पहचाना जा सकता है। लेकिन जो महिलाएँ कैमरे पर आकर आरोप लगा रही हैं वो गोरी हैं। क्या फिर भी हम उन्हें स्थानीय जनजातीय महिला कहेंगे।”

हिंदुस्तान टाइम्स बांग्ला के अनुसार, उन्होंने ये भी कहा कि वह इस बिंदु पर जाँच कर रहे हैं। जरूरत पड़ने पर मामला पुलिस को दिया जाएगा। कुछ जानकारी पहले सामने आ गई हैं। जिन महिलाओं ने कैमरे पर आरोप लगाए वो संभवत: सीपीएम की महिला समिति की सदस्य हैं। इनमें कोई आशा कार्यकर्ता है, कोई आईसीडीएस कर्मी। उन्हें सामने लाकर नाटक हो रहा है। जो वीडियो आप लोग देख रहे हैं वो स्क्रिप्टेड है।

नारायण गोस्वामी के इस बयान के बाद भाजपा सांसद लॉकेट चटर्जी ने इस टिप्पणी को बेहद शर्मनाक बताया है। चटर्जी ने कहा-

“टीएमसी विधायक नारायण गोस्वामी द्वारा संदेशखाली की महिलाओं पर की गई अभद्र टिप्पणी स्पष्ट रूप से उनकी गंदी मानसिकता को व्यक्त करती है। जनजातीय समुदाय और महिलाओं को उनकी शारीरिक संरचना और त्वचा के रंग के आधार पर कमतर आंकना पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस की विकृत और नस्लवादी राजनीति का स्पष्ट संकेत है। नील-शदा (काली-गोरी) बहिनी का नस्लवाद कब रुकेगा?”

बता दें कि एक ओर संदेशखाली की महिलाओं के बयान आने के बाद जहाँ टीएमसी नेता ऐसे असंवेदनशील बयान देखते दिख रहे हैं। वहीं भारतीय जनता पार्टी के नेता लगातार उनके साथ अपनी एकजुटता दिखा रहे हैं। प्रदेश में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने 30 अन्य विधायकों के साथ इस मामले में प्रदर्शन किया। वहीं भाजप नेता सुकंता मजूमदार भी पीड़िताओं से मिलने के लिए जब जा रहे थे तो पुलिसकर्मियों द्वारा उन्हें रोका गया। इसके बाद झड़प की खबर सामने आई और बाद में पता चला कि सुकंता मजूमदार अस्पताल में भर्ती हैं।