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चोला किसानों का पर नारे खालिस्तान के, तस्वीर भिंडरावाले की और धमकी PM कोः खेत-खलिहान का भला नहीं, राजनीति का नया मोर्चा है ‘दिल्ली चलो’

साल 2020-21 के बाद किसानों का आंदोलन एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार पहले से ज्यादा किसान संगठन (100 से अधिक) इस प्रदर्शन में शामिल हैं। ज्यादा से ज्यादा ट्रैक्टरों को दिल्ली में लाने का प्रयास हो रहा है। प्रशासन समझा रहा है तो उनकी बात अनसुनी हो रही। पुलिस रोक रही है तो उपद्रव चल रहा है।

अजीब बात ये है कि सब कुछ लोकसभा चुनावों से ठीक पहले होना शुरू हुआ है और जिस तरह के बयान सामने आ रहे हैं उनका क्रम देख ऐसा मालूम पड़ रहा है कि इस प्रदर्शन का मकसद किसानों का हित नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ राजनीति है।

शुरुआत से देखें तो कहा गया कि किसानों का यह आंदोलन न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर कानून बनाने की माँग को लेकर है। किसान चाहते हैं कि सरकार उनकी सभी फसलों के लिए न्यूनतम मूल्य तय करे ताकि उनको कोई नुकसान न हो। अब सरकार इस मुद्दे पर बातचीत करके समाधान निकालने को तैयार है। वो बस सामान्य जीवन को बाधित न करें। लेकिन बॉर्डर पर इकट्ठा कथित किसान पीछे होने का नाम नहीं ले रहे।

उलटा इस प्रदर्शन के जरिए बयानबाजी करके अराजकता फैलाने का भरपूर प्रयास हो रहा है। उदाहरण के लिए ऐसे ट्रैक्टरों को दिल्ली सीमा पर लाने की कोशिश है जिनमें भिंडरावाले के झंडे लगे हैं। इसके अलावा वो लोग भी इस प्रदर्शन का हिस्सा बन चुके हैं जो खुलेआम कैमरा ऑन करवाकर ये बोल रहे हैं कि उन्हें खालिस्तान दे दिया जाए वरना वो पाकिस्तान के साथ सीमा खोलेंगे। इन बातों के अलावा भड़काऊ नारेबाजी भी सुनने में आ रही। साथ ही प्रधानमंत्री को खुलेआम धमकी देने का काम भी हो रहा है।

अब एक ऐसे प्रदर्शन में, जिसे ‘अन्नदाता’ के नाम पर प्रमोट किया जा रहा हो। उसमें ऐसी बातों का क्या हो सकता है। 2020-21 के प्रदर्शन में भी यही सब देखने को मिला था जिसके बाद इस पन्नू जैसे खालिस्तानियों ने इस प्रदर्शन के दौरान नए-नए ऐलान कर दिए थे। उसने दिल्ली में बैठे प्रदर्शनकारियों से 26 जनवरी को हंगामा करने को कहा था, जो कि बाद में हुआ भी।

अब इस बार की भूमिका भी ऐसी तैयार की जा रही है कि किसान आंदोलन में खालिस्तानियों की घुसपैठ हो सके और भीड़े हिंसा कर सके। खुफिया रिपोर्ट में पहले ही बताया जा चुका है कि दिल्ली सीमा पर आने पर अड़े कथित किसान पीएम आवास और भाजपा नेताओं के घर के बाहर धरने की योजना लंबे समय से बना रहे थे। इसके लिए उन्होंने रिहर्सल भी की थी और 100 से ज्यादा मीटिंग भी। संभव है कि ये प्रदर्शनकारी बाइक, रेल, बस मेट्रो आदि से दिल्ली में घुसें।

राजनीतिक पार्टी उठा रहीं फायदा

एक तरफ जहाँ कथित किसानों ने प्रदर्शन को लेकर पूरी तैयार की हुई है तो वहीं दूसरी ओर पॉलिटिकल पार्टियाँ इस मौके का लाभ उठाने से पीछे नहीं हट रही। आम आदमी पार्टी के प्रमुख और दिल्ली सीएम केजरीवाल दिल्ली वालों की परवाह किए बिना ऐसे प्रदर्शनों को समर्थन दे रहे हैं। वहीं कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने माहौल का फायदा उठाकर गारंटी दी है कि अगर उनकी कॉन्ग्रेस सरकार सत्ता में आई तो किसानों को हर फसल के लिए MSP सुनिश्चित की जाएगी।

स्वामीनाथन रिपोर्ट पर कॉन्ग्रेस के दो चेहरे

दिलचस्प बात ये है कि राहुल गाँधी ने इस वादे के साथ ये भी कहा है कि वो उस स्वामीनाथन रिपोर्ट में रखी गई सब बातों को किसानों के हित में लागू करेंगे, जिसे यूपीए सरकार ने 2010 में खारिज कर दिया था। अगर कॉन्ग्रेस पार्टी को किसानों के हित के लिए इस कदम को उठाना ही था तो उन्होंने इसे तब क्यों नहीं लागू किया जब उनके पास सारी सत्ता थी।

आज विपक्ष में बैठकर इस मुद्दे पर उस समय वादे करना जब एक वर्ग सड़कों पर उतरा हुआ है, क्या राजनीति से अलग कुछ है? और राहुल गाँधी की इस राजनीति को समर्थन देने वाले लोग क्या राजनीति नहीं कर रहे?

हिंसक प्रदर्शनकारियों के खिलाफ केस को रद्द कराने की क्यों है माँग

इसके अलावा ये भी जानने वाली बात है कि इस प्रदर्शन की एक माँगों में से एक माँग यह भी है कि जिन लोगों पर किसान आंदोलन में केस हुआ था उन सभी केसों को रद्द किया जाए। अब ये केस किस बात पर हुए थे ये भी ध्यान देने वाली चीज है। पिछले किसान आंदोलन के समय जो प्रदर्शन हुए थे उसमें हिंसा की घटनाएँ भी सामने आई थी जिसमें लाल किले तक पर हमला हुआ था। इसी के बाद पुलिस ने इस मामले में केस किया था।

ये प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि प्रशासन उन प्राथमिकियों को रद्द कर दे और किसी उपद्रवी के खिलाफ कोई कार्रवाई न करे। सोचिए एक किसान आंदोलन में ऐसी माँग का क्या अर्थ हो सकता है। क्या ये प्रदर्शनकारी उपद्रव को जायज मानते हैं?

संसद सत्र खत्म होने के बाद क्यों उठाया मुद्दा

सबसे बड़ा बिंदु जो इस ओर इशारा करता है कि ये पूरा प्रदर्शन राजनीतिक है वो ये कि इसे लोकसभा चुनाव से ठीक पहले आयोजित किया जा रहा है। इस प्रदर्शन में कई संगठन शामिल हैं जो किसानों का नेतृत्व करने का दावा करते हैं और अच्छे से जानते हैं कि अगर कोई कानून लाना है तो वो उसका मुद्दा संसद सत्र के समय उठना चाहिए। लेकिन इन किसानों ने न तो संसद सत्र शुरू होने से पहले और न उसके चालू रहने के दौरान अपने प्रदर्शन की तारीख चुनी। बल्कि जब सत्र समाप्त हो गया उसके बाद इन्हीं ‘चलो दिल्ली’ के तहत सीमाओं पर ट्रैक्टर इकट्ठा करने शुरू किए।

इसके अलावा एक सवाल यह भी बनता है कि जो किसान दिल्ली कूच की तैयारी में लगे हैं क्या सिर्फ वही किसान हैं और वहीं सरकार द्वारा एमएसपी पर कानून न होने से परेशान हैं? नहीं, देश के कई अन्य राज्य भी हैं जो कृषि में खासा योगदान दे रहे। लेकिन वो इस प्रदर्शन में शामिल होने नहीं आ रहे हैं।

सवाल तो उठता है न केवल पंजाब के किसानों को ही सरकार से इतनी समस्या क्यों है? और क्यों ये लोग अपनी बात मनवाने के लिए सामान्य जनजीवन को प्रभावित करने पर तुले हैं, वो भी तब जब सरकार कह रही है कि वो इस मामले पर बातचीत करेंगे और समस्या का समधान किया जाएगा। अगर वाकई इस प्रदर्शन का उद्देश्य राजनीति नहीं है तो फिर क्यों इससे पॉलिकिल पार्टियाँ जुड़ती जा रही हैं? क्यों इसके जरिए देश के प्रधानमंत्री को धमकियाँ दी जा रही हैं। क्यों उपद्रवियों को बचाने का प्रयास हो रहा है और क्यों भिंडरावाले की विचारधारा क्रांति का प्रतीक दिखाई जा रही है?

खबर में जिक्र हुई स्वामीनाथन रिपोर्ट की संक्षिप्त जानकारी: किसानों की समस्याओं को समझते हुए प्रोफेसर एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में 2004 में राष्ट्रीय किसान आयोग का गठन हुआ था। इस आयोग ने 2004 से 2006 के बीच पाँच रिपोर्टें पेश कीं। इसमें कई सुझाव दिए गए थे। जैसे देश में खाद्य और न्यूट्रिशन सिक्योरिटी के लिए रणनीति बनाई जाए, कृषि प्रणाली की प्रोडक्टिविटी और स्थिरता में सुधार किया जाए, किसानों को मिलने वाले कर्ज का फ्लो बढ़ाने के लिए सुधार हो, पहाड़ी और तटीय क्षेत्रों के साथ शुष्क भूमि पर किसानों के लिए फार्मिंग प्रोग्राम हो, कृषि के लिए स्थानीय निकाय सशक्त बनें। इसके साथ ही इस आयोग की रिपोर्ट में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) सुनश्चित करने का सुझाव भी दिया गया था और फसल की औसत लागत से कम से कम 50 प्रतिशत अधिक एमएसपी देना का सुझाव दिया था।

क्षिप्रा में स्नान, महाकाल के दर्शन, फिर अयोध्या रवाना… कर्नाटक से दिल्ली आ रहे थे प्रदर्शनकारी किसान, MP पुलिस ने करवा दी ‘तीर्थयात्रा’: भड़के कॉन्ग्रेस CM सिद्धारमैया

कर्नाटक से दिल्ली जा रहे प्रदर्शनकारी किसानों को मध्य प्रदेश पुलिस ने भोपाल में रोक लिया और उन्हें तीर्थयात्रा करवाई। यह सभी प्रदर्शनकारी किसान पंजाब के प्रदर्शनकारियों के साथ मिलकर दिल्ली में विरोध प्रदर्शन के लिए जा रहे थे।

जानकारी के अनुसार, कर्नाटक के अलग-अलग से लगभग 70 किसान दिल्ली प्रदर्शन के लिए जा रहे थे। यह सभी कर्नाटक एक्सप्रेस से कर्नाटक से दिल्ली की ओर जा रहे थे। इनकी सूचना मिलने पर 11 फरवरी, 2024 को मध्य प्रदेश पुलिस ने इन्हें ट्रेन से उतारकर पूछताछ की।

इसके बाद इन किसानों को भोपाल स्टेशन के पास ही एक बड़े गेस्ट हाउस में ठहरा दिया गया। यहाँ पर इन किसानों को रोकने के बाद इन्हें मध्य प्रदेश के धार्मिक शहर उज्जैन ले जाया गया। यहाँ किसानों ने क्षिप्रा नदी में स्नान और महाकाल के दर्शन किए। इसके बाद यहाँ भी प्रशासन ने इनके रुकने की व्यवस्था की।

उज्जैन में किसानों को दर्शन करवाने के बाद इन्हें बुधवार (14 फरवरी, 2024) को अयोध्या में जाने वाली ट्रेन में बैठा दिया गया। अब यह सभी किसान अयोध्या जाकर रामलला के दर्शन करेंगे और वहाँ से आगे की यात्रा करेंगे।

कर्नाटक इन किसानों में शामिल परशुराम ने ‘दैनिक भास्कर’ को बताया, “रात भर हमें पुलिस की निगरानी में रखा गया। आज सुबह हम दिल्ली जाना चाहते थे, लेकिन पुलिस फोर्स ने रोके रखा। गाड़ियों में बैठाकर रेलवे स्टेशन लाए और अयोध्या जाने वाली ट्रेन में बैठा दिया। हमारे साथ कोच में एक पुलिस जवान को भी भेजा है।”

कर्नाटक के किसानों को पहले गिरफ्तार करने की खबर आई थी लेकिन मध्य प्रदेश पुलिस ने इसका खंडन किया था और कहा था कि उन्हें सिर्फ दिल्ली जाने रोका गया है, उन्हें एक मैरिज हाल में रोक कर खाने-पीने की सारी व्यवस्थाएँ करवाई गई हैं।

कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने भी मध्य प्रदेश सरकार से इन किसानों को छोड़ने को कहा था। गौरतलब है कि यह किसान दिल्ली में 200 यूनियन के विरोध प्रदर्शन में शामिल होना चाह रहे थे। पंजाब के किसान पहले ही हरियाणा सीमा पर पुलिस से उलझ रहे हैं। किसानों के प्रदर्शन में कई पुलिसवालों के घायल होने की सूचना भी आई है।

छत्तीसगढ़ में गरीबों के 125 PM आवास पर मुस्लिमों का कब्जा, मजार जैसा ढाँचा तैयार कर झाड़-फूँक: रिपोर्ट में बताया- आते हैं बांग्लादेशी-रोहिंग्या भी

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत गरीबों के लिए बनवाए गए घरों पर अवैध कब्जा करने मामला सामने आया है। सामने आया है कि 125 से ज्यादा मकानों पर मुस्लिम समुदाय के लोग कब्जा करके उसमें अवैध रूप से रह रहे हैं। इतना ही नहीं, उन मकानों में गुंबद बनाकर उसे मस्जिद-मजार आदि का रूप दे दिया गया है और इसमें झाड़-फूँक का काम किया जा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, नगर निगम सीमा क्षेत्र के वार्ड संख्या 43 देवरीखुर्द में साल 2013 में हाउसिंग बोर्ड ने 400 प्रधानमंत्री आवास बनवाए थे। जिनके पास घर नहीं थे, उन परिवारों को 335 आवास आवंटित किए गए। बाकी बचे हुए 65 मकानों पर नगर निगम ने ताला लगा दिया था। इसके बाद धीरे-धीरे बाहरी लोग आए और इन 65 मकानों के ताले तोड़कर उसमें रहने लगे।

इतना ही नहीं, जिन 335 परिवारों को मकान आवंटित किए गए थे, उनमें से 60 परिवारों को डरा-धमकाकर उनके मकानों पर भी अवैध कब्जा कर लिया गया। इसके बाद इन मकानों में अवैध निर्माण करके उनमें गुंबद बनाकर इस्लामी पहचान दे दी गई। इसके साथ ही झाड़-फूँक का काम शुरू कर दिया गया। यहाँ झाड़-फूँक के जरिए रुहानी और जिस्मानी तकलीफों को दूर करने का दावा किया जाता है। 

आवंटित मकान पर अवैध कब्जा (साभार: दैनिक भास्कर)

न्यूज 18 की रिपोर्ट में सामने आया है कि यहाँ के मकान नंबर 199 और 200 में मजारनुमा संरचना बनाकर झाड़-फूँक की जाती है। ये दोनों मकान शंकर धरु और सुखदेव के नाम पर आवंटित हैं। इन दोनों मकानों में कब्जा करके जाकिर खान रह रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहाँ रोहिंग्या और बांग्लादेशी मुस्लिम भी पहुँचते हैं।

स्थानीय लोगों कहना है कि प्रधानमंत्री आवास के ज्यादातर मकानों को बेच दिया गया है। हालाँकि, इसके प्रावधान कहते हैं कि इन मकानों को बेचा नहीं जा सकता है। वहीं, ज्यादातर मकानों में लोग अवैध कब्जे करके रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहाँ के 125 से अधिक मकानों पर अवैध कब्जा कर रखा गया है। यहाँ बाहरी लोगों की आवाजाही लगी रहती है।

हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी के अध्यक्ष बीपी सिंह कहना है कि प्रधानमंत्री आवास में पिछले कुछ सालों से मजार जैसा ढाँचा बना दिया गया है और उसकी आड़ में असामाजिक लोगों का जमावड़ा लगा रहता है। यहाँ तालापारा के लोग आकर शराबखोरी करते हैं। उन्होंने बताया कि देवरीखुर्द में बांग्लादेश और उत्तर प्रदेश के लोग रह रहे थे, लेकिन उनका वेरीफिकेशन तक नहीं किया गया है।

बीपी सिंह ने कहा कि यहाँ बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जिनके पास न तो वोटर आईडी कार्ड है और न ही राशन कार्ड है। उन्होंने कहा कि नगर निगम प्रशासन से यहाँ रहने वाले लोगों का सत्यापन करने और अवैध रूप से रहने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की माँग की गई है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रशासन से मजार को हटाने के लिए भी कई बार माँग की जा चुकी है।

मामले ने जब तूल पकड़ा तो नगर निगम के कार्यपालक अभियंता सुरेश बरूआ ने कहा कि देवरीखुर्द के प्रधानमंत्री आवास में अवैध निर्माण की जानकारी उन्हें मिली है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री आवास के निर्माण में बदलाव करना गलत है। इस मामले में कब्जाधारियों को नोटिस जारी करके अवैध निर्माण तोड़ने की कार्रवाई की जाएगी।

इतना ही नहीं, यहाँ लव जिहाद का मामला भी सामने आ चुका है। यहाँ 13 साल की एक किशोरी को इमरान नाम के एक शख्स ने झाँसा देकर उत्तर प्रदेश भगा ले गया था। हालाँकि, हिंदू संगठनों के प्रयास के बाद पुलिस ने बच्ची 10 फरवरी 2024 को बरामद कर लिया। इस मामले में पुलिस FIR दर्ज करके मामले की जाँच कर रही है। वहीं, आरोपित इमरान फिलहाल फरार है।

‘जय श्री राम’ का नारा लगा दंगाइयों से भिड़े पुरुष, दुपट्टा फाड़ महिलाओं ने पुलिस वालों का रोका खून: हल्द्वानी के हिन्दू बोले – जान भी चली जाती तो गम नहीं

उत्तराखंड के हल्द्वानी में गुरुवार (8 फरवरी, 2024) को अवैध कब्ज़ा हटाने गए प्रशासन पर भीषण हमला हुआ था। बनभूलपुरा क्षेत्र में हुए इस हमले में पत्थरबाजी के अलावा तलवारें और गोलियाँ तक चलीं। इस्लामी भीड़ द्वारा हजारों नागरिकों, सैकड़ों पुलिसकर्मियों और दर्जनों पत्रकारों के प्राण संकट में डालने वाली इस हिंसा का मास्टरमाइंड अब्दुल मलिक बताया जा रहा है। अभी तक पुलिस ने कुल 36 दंगाइयों को गिरफ्तार किया है और बाकियों की तलाश जारी है।

ऐसे में कुछ ऐसे नाम ऐसे सामने आए हैं जिन्होंने अपने प्राणों को संकट में डाल कर न सिर्फ दंगाइयों को अधिक नुकसान करने से रोका बल्कि पुलिसकर्मियों तक की जान बचाई। अपनी ग्राउंड रिपोर्ट में ऑपइंडिया की टीम हल्द्वानी के उस हिन्दू बहुल गाँधीनगर क्षेत्र में पहुँची जहाँ लोगों के प्रतिरोध के चले हिंसक भीड़ आगे शहर में नहीं घुस पाई।

जब हम गाँधीनगर पहुँचे तब वहाँ उत्तराखंड पुलिस के साथ पैरामिलिट्री के जवान तैनात मिले। किसी को भी गलियों में भीड़ जुटा कर खड़े होने की इजाजत नहीं थी। पुलिस के सायरन लगातार गूँज रहे थे। लोग अपने-अपने घरों में थे। गलियों में पत्थरबाजी के निशान साफ देखे जा सकते थे। नालियों में पत्थरों के साथ ईंटों के टुकड़े पड़े थे जो 8 फरवरी को उन्मादी भीड़ द्वारा दिखाई गई क्रूरता का नजारा पेश कर रहे थे। पुलिस ने हमें गाँधीनगर पार कर के वनभूलपुरा क्षेत्र में घुसने से रोक दिया।

हमने गाँधीनगर में ही जानकारियाँ जुटाईं तो वहाँ ऐसे लोग मिले जिन्होंने शहर को बचाने के लिए खुद का जीवन खतरे में डाल दिया था।

गाँधीनगर की वो गली जिस से आगे नहीं बढ़ पाए दंगाई

हमने दिया पुलिसकर्मियों को फर्स्ट एड

गाँधीनगर में हमें अपने घर के आगे बैठे मनीष सोनकर दिखे। मनीष के सिर पर पट्टी बँधी थी। उन्होंने हमें बताया कि घटना के दिन पुलिसकर्मी और नगर निगम स्टाफ भागते हुए उनकी गली में आए। हजारों की भीड़ उनका पीछा कर रही थी। मनीष ने अपने घर के दरवाजे खोल दिए जिस से तमाम पुलिस वालों व नगर निगम स्टाफ अंदर आ गए। तब मनीष के परिजनों ने उन पुलिस वालों की मरहम-पट्टी की। उनको खाना और चाय दिया गया।

कई महिला स्टाफ ने कहा, “वो हमें मार डालेंगे। हमें बचा लो। हमारे कपड़े तक फाड़ने की कोशिश हुई।” लगभग सभी पुलिस वालों के गहरे घाव लगे थे जहाँ से खून बह रहा था।

घायल मनीष सोनकर

मनीष का दावा है कि हिंसक भीड़ पत्थरों, पेट्रोल बम और तलवारों से लैस थी। औरतों और बच्चों को आगे कर दिया गया था। हमले के लिए छतों की ओट ली गई थी। जब मनीष को लगा कि हमलावर भीड़ उनके मोहल्ले में घुस कर पुलिस वालों व अन्य लोगों को मार डालेगी तब वो अपने साथियों सहित आगे बढ़े। मोहल्ले वालों के प्रतिरोध से न सिर्फ हमलावर भीड़ रुकी बल्कि थोड़ी देर के बाद पीछे भी हटी। बाद में बैकअप फ़ोर्स आने पर घायल जवानों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया। खुद मनीष प्रतिरोध करते हुए लगे पत्थर की चोट से बेहोश हो गए थे।

23 साल के ऋतिक ने भी किया मुकाबला

मनीष के बाद गाँधीनगर में हमें 23 वर्षीय ऋतिक मिले। ऋतिक ने बताया कि अगर हमलावर उनके मोहल्ले और पुलिस के ऊपर पत्थर चलाएँगे तो सामने वाला चुपचाप कैसे देख सकता है। भीड़ में से ऋतिक ने पहचाना कि अधिकतर हमलावर स्थानीय थे जो कि गाड़ी आदि चलाने का काम करते थे। इसमें बच्चे, बूढ़े और महिलाएँ भी शामिल थीं। ये हमलावर सामान्य दिनों में स्थानीय हिन्दुओं से यार-दोस्त के रूप में मिलने आते थे। ऋतिक का दावा है कि लाठी लिए पुलिस खुद को भी इसलिए नहीं बचा पाई क्योंकि हमलावरों ने इसकी तैयारी कई महीनों पहले की थी। ऋतिक के चेहरे और हाथों पर पत्थर लगे हैं।

घायल ऋतिक कुमार

अपने जवानों के लिए कुछ भी कर सकते हैं

गाँधीनगर की एक अन्य गली में हमें आर्यन मिले। आर्यन का हाथ टूटा हुआ है। उन्होंने हमें बताया कि ‘अल्लाह हू अकबर’ का नारा लगाती हिंसक भीड़ का जो रूप उन्होंने देखा वो अक्सर फिल्मों में ही नजर आता है। आर्यन के घर में शरण पाई एक महिला पुलिसकर्मी ने रोते हुए उन्हें बताया था कि हिंसा में उनकी अँगूठी तक छीन ली गई। वहीं एक अन्य पुलिसकर्मी जब भाग नहीं पाई तो वो एक नाले में छिप गई और बैकअप फ़ोर्स पहुँचने के बाद ही वहाँ से निकली। हमले के लिए रेलवे लाइन पर बिछे पत्थर पहले से बटोर कर रख लिए गए थे। साजिशन पहले से लाइट काट कर के अँधेरा कर दिया गया था।

घायल आर्यन सोनकर

आर्यन ने हमें आगे बताया कि जब पुलिसकर्मी अपनी जान बचा कर लौट कर भाग रहे थे वो वापसी की रास्तों में हमलावरों ने अपने पुराने वाहनों को आग लगा दी थी। दावा है कि सामाजिक ताने-बाने के खिलाफ पूरी भीड़ में एक भी बुजुर्ग किसी हमलावर को रोकते या समझाते नहीं दिखा। हमलावरों में कई मर्दों ने तो खुद को छिपाने के लिए बुर्का तक पहन रखा था। हमने आर्यन से पूछा कि पुलिस वालों की रक्षा में घाव खाने पर मन में क्या विचार आ रहे? इस पर आर्यन ने कहा, “हमारे जवानों के साथ ऐसा होगा तो देखा नहीं जा सकता। ऐसा कुछ बर्दाश्त नहीं हो सकता मुझ से। हम अपने जवानों के लिए कुछ भी कर सकते हैं।”

‘जय श्री राम’ बोल कर किया दंगाइयों का मुकाबला

गाँधीनगर के वार्ड नंबर 27 में रहने वाले अमरदीप सोनकर का सिर फटा मिला। वो बिस्तर पर लेटे थे और उनके सिरहने के पास उनकी 2 बेटियाँ बैठी थीं। दवा खाने के बाद अमरदीप ने लड़खड़ाती आवाज में हमसे बात की। अमरदीप ने भीड़ में से पहचान कर हमें कुछ नाम गिनाए जिसमें अलीबाबा, जावेद, कलीम और अजीम आदि हैं। पुलिस वालों की जान लेने पर आमादा हिंसक भीड़ को अमरदीप ने साथियों सहित ‘जय श्री राम’ का नारा लगा कर रोका। अमरदीप का इलाज सरकारी खर्च पर हो रहा है। उनका दावा है कि अगर गाँधीनगर के हिन्दुओं ने आगे बढ़ कर हिंसक भीड़ को न रोका होता तो शायद पूरा शहर जला दिया जाता।

घायल अमरदीप सोनकर

घायल पति के साथ पुलिस वालों के इलाज में जुटी थीं अमरदीप की पत्नी

ऑपइंडिया ने अमरदीप की पत्नी से भी बात की। उन्होंने बताया कि घटना के दिन उनका घर घायल महिला-पुरुष पुलिसकर्मियों से भरा हुआ था। हर कोई बदहवास था क्योंकि लगभग सभी के कहीं न कहीं चोट आईं थी जहाँ से खून बह रहा था। इसी समय खुद अमरदीप भी घायल हो कर साथियों द्वारा घर लाए गए। अमरदीप की पत्नी ने अपने पति और पुलिसकर्मियों की अपने स्तर से इलाज और सेवा एक साथ की। उनको संतोष और ख़ुशी है कि अब सभी पुलिसकर्मी सुरक्षित हैं।

ऑपइंडिया से बात करतीं अमरदीप सोनकर की पत्नी

दुपट्टा उतार कर बनाई पट्टी

हमें गाँधीनगर में ही पूजा सोनकर मिलीं। उन्होंने बताया कि 8 फरवरी को उनकी पूरी गली शरण माँगते पुलिसकर्मियों से भरी हुई थी। सभी ने अपने दरवाजे खोल दिए थे। हमले की खबर सुन कर जहाँ मोहल्ले के तमाम मर्द एकजुट हो कर दंगाइयों को रोकने चले गए थे वहीं महिलाएँ घायल पुलिस वालों के इलाज में जुट गईं थीं। कुछ पुलिस वालों का बहता खून देख कर पट्टी न होने पर पूजा ने घाव पर अपना दुपट्टा उतार कर बाँध दिया था। वहीं कई अन्य महिलाओं ने भी अपनी शॉल आदि घायल पुलिस वालों के घाव पर बाँधी।

पूजा सोनकर, हल्द्वानी

शुभम के भाई और चाचा दोनों घायल

गाँधीनगर के रहने वाले शुभम गुप्ता हमें अस्पताल में अपने परिजनों का इलाज करवाते मिले। उन्होंने बताया कि दंगाइयों से घायल पुलिसकर्मियों को बचाते हुए उनके चाचा और भाई दोनों घायल हैं। पत्थर लगने से शुभम के भाई को 16 टाँके लगाने पड़े। उन्होंने बताया कि हमलावरों के हाथों में भैंसों को काटने वाले चापड़ मौजूद थे। इसी से हुए हमले में कई वर्दी वालों को गहरे घाव हुए। उन्होंने यह भी देखा कि मौलाना जैसी शक्ल वाले एक व्यक्ति ने पुलिस की गाड़ी के नीचे पेट्रोल डाल कर आग लगा दी थी।

हिंसक भीड़ द्वारा महिलाओं को आगे किए जाने से पुलिस भी कार्रवाई करने में थोड़ा हिचक रही थी। शुभम ने यह भी बताया कि हिंसा में भले ही कुछ बाहरी तत्व शामिल हुए हों पर अधिकतर बनभूलपुरा के स्थानीय निवासी ही दिख रहे थे।

चश्मदीद शुभम गुप्ता

भगत सिंह के फैन और घरों में हर तरफ देवताओं की तस्वीरें

दंगाइयों से लड़े तमाम युवकों में से कुछ ऐसे भी थे जो खुल कर सामने आने से हिचकिचा रहे थे। उन्हीं में से एक ने खुद को क्रांतिकारी भगत सिंह का फैन बताया। उन्होंने सीना खोल कर टैटू भी दिखाया जिसमें सरदार भगत सिंह छपे हुए हैं। बिना कैमरे के बातचीत करते हुए सरदार भगत सिंह के इस फैन ने हमसे कहा कि वो अपने देश के जवानों के लिए जान भी दे सकते हैं। साथ ही उन्होंने आगे बताया कि 8 फरवरी को पुलिस वालों की जान बचाते हुए अगर उनके प्राण चले जाते तो भी उन्हें ख़ुशी होती।

भगत सिंह का फैन

गाँधीनगर में हिंसक भीड़ का मुकाबला करने वाले अधिकतर लोग दलित समुदाय से हैं। उनके घरों में हिन्दू देवी-देवताओं की तस्वीरें हर कमरे में लगी हुईं हैं। अधिकतर लोगों के हाथों में कलावा और गले में रुद्राक्ष की माला भी दिखी। ज्यादातर ने खुद को बजरंग बली का भक्त बताया।

हल्द्वानी हिंसा का प्रतिरोध करने वाले हिन्दुओं के घर

फ़िलहाल हमलावरों का मुकाबला करते हुए घायल हिन्दू समाज के अधिकतर लोगों का इलाज अलग-अलग जगहों पर चल रहा है। घायलों में कई लोगों की जानकारी प्रशासन को न होने की वजह से वो अपने खुद के खर्च से इलाज करवा रहे हैं। हालाँकि सभी के चेहरे पर संतोष के भाव हैं कि उन्होंने न सिर्फ दंगाइयों से शहर को बचाया बल्कि अपने प्रदेश की रक्षा कर रहे पुलिस वालों के भी काम आए। ऑपइंडिया की टीम ने पूरे हल्द्वानी में न सिर्फ आम जनता बल्कि खुद पुलिस वालों के मुँह से कहते सुना कि गाँधीनगर के लोगों ने गजब की बहादुरी दिखाई।

इंदिरा गाँधी और नरगिस दत्त के नाम से नहीं होगा अब फिल्म पुरस्कार, सरकार ने नेशनल अवॉर्ड में किए कई बदलाव: पैसा भी बढ़ाया

अब राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और दिवंगत अभिनेत्री नरगिस दत्त के नाम पर नहीं दिए जाएँगे। इसका ऐलान मंगलवार (13 फरवरी 2024) को किया गया। ऐसा 70वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के लिए बनाए गए नियमों के अंतर्गत किया जा रहा है। वहीं, कई पुरस्कारों को एकीकृत किया गया है। इसके साथ ही उसमें दी जाने वाली राशि भी बढ़ाई गई है।

यह उन कुछ बदलावों में से है, जो कि इस बार के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में किए गए हैं। सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा 70वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के नियम-कानून भी बदले हैं। इसके अंतर्गत दी जाने वाली धनराशि भी बढ़ाई गई है। यह सभी बदलाव एक समिति द्वारा किए गए हैं, जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने कोविड महामारी के दौरान बनाया था।

सरकार द्वारा बनाई गई कमिटी द्वारा किए गए बदलाव के अनुसार, अब इंदिरा गाँधी बेस्ट डेब्यू फिल्म का नाम बदलकर ‘बेस्ट डेब्यू फिल्म ऑफ अ डायरेक्टर’ कर दिया गया है। वहीं, नरगिस दत्त के नाम पर राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने वाली फीचर फिल्म को दिए जाने वाले पुरस्कार का नाम ‘बेस्ट फिल्म ऑन प्रमोटिंग नेशनल, सोशल एंड इनवॉयरमेंटल वैल्यूज’ कर दिया गया है।

इंदिरा गाँधी बेस्ट डेब्यू फिल्म के अंतर्गत जिस फिल्म को यह पुरस्कार दिया जाता था, उसके निर्देशक और निर्माता- दोनों के बीच यह धनराशि बाँटी जाती थी। अब यह राशि सिर्फ निर्देशक को ही मिलेगी। इसमें कोई बँटवारा नहीं होगा। वहीं, ‘बेस्ट फिल्म ऑन प्रमोटिंग नेशनल, सोशल एंड इनवॉयरमेंटल वैल्यूज’ के अंतर्गत दिए जाने वाले पुरस्कार को सामाजिक मुद्दों और पर्यावरण संरक्षण वाले अनुभागों को भी एक में मिला दिया गया है।

देश के सबसे बड़ा फिल्म पुरस्कार माना जाने वाले दादा साहब फाल्के के अंतर्गत फिल्म कलाकार को दी जाने वाली धनराशि को बढ़ाकर ₹10 लाख से बढ़ाकर ₹15 लाख कर दिया गया है। इसके अलावा, सभी वर्ग में दिए जाने वाले स्वर्ण कमल पुरस्कार और रजत कमल पुरस्कार की राशि को क्रमशः ₹3 लाख और ₹2 लाख कर दिया गया है।

स्वर्ण कमल पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ फिल्म, पहली फिल्म, भरपूर मनोरंजन प्रदान करने वाली फिल्म, निर्देशन और बच्चों की फिल्म वाली श्रेणी में दी जाती है। वहीं, रजत कमल पुरस्कार राष्ट्रीय, सामाजिक और पर्यावरणीय मूल्यों को बढ़ावा देने वाली सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म, सभी अभिनय श्रेणियों, सर्वश्रेष्ठ पटकथा, संगीत और ऐसी अन्य श्रेणियों के विजेताओं को दिया जाता है।

इसके अलावा, एक और बदलाव किया गया है। ‘सर्वश्रेष्ठ एनिमेशन फिल्म’ और ‘सर्वश्रेष्ठ स्पेशल इफेक्ट’ के पुरस्कार को दो उप-श्रेणियों के साथ ‘सर्वश्रेष्ठ एवीजीसी (एनीमेशन, विजुअल इफेक्ट्स, गेमिंग और कॉमिक्स) फिल्म’ नामक एक नई श्रेणी में जोड़ा गया है। पहले यह अलग-अलग होता था। तीन सब-कैटेगरी वाले बेस्ट ऑटोबायोग्राफी सेक्शन को अब बेस्ट साउंड डिजाइन के नाम से जाना जाएगा।

इस कैटेगरी के अंतर्गत दी जाने वाली पुरस्कार राशि को ₹50,000 से बढ़ाकर ₹2 लाख कर दिया गया है। कमिटी ने और भी बहुत सारे बदलाव किए हैं। ये बदलाव करने वाली कमिटी की मुखिया सूचना और प्रसारण मंत्रालय की अतिरिक्त सचिव नीरजा शेखर हैं। उनके साथ ही कमिटी में फिल्म निर्माता प्रियदर्शन, राष्ट्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के चेयरमैन प्रसून जोशी समेत अन्य सदस्य शामिल हैं।

‘हमने लोगों की जरूरतों और सपनों को पूरा करने पर ध्यान दिया’: दुबई में ‘वर्ल्ड गवर्नमेंट्स समिट’ में बोले PM मोदी – सरकार ऐसी हो जो सबको साथ लेकर चले

UAE दौरे पर गए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार (14 फरवरी, 2024) को UAE में ‘वर्ल्ड गवर्नमेंट्स समिट’ को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि ये प्लेटफॉर्म दुनिया के विभिन्न नेताओं को एक साझा मंच पर लाने का माध्यम बना है। उन्होंने कहा कि जिस तरह से दुबई दुनिया भर में वैश्विक अर्थव्यवस्था, वाणिज्य और तकनीक का केंद्र बन कर उभर रहा है, ये विश्व के समक्ष एक उदाहरण पेश कर रहा है। उन्होंने कहा कि आज हम 21वीं सदी में हैं। पीएम मोदी ने कहा कि एक तरफ दुनिया आधुनिकता की तरफ बढ़ रही है तो पिछली सदी से चले आ रही चुनौतियाँ भी उतने ही व्यापक हो रही हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि फ़ूड सिक्योरिटी हो, हेल्थ सिक्योरिटी हो, वॉटर सिक्योरिटी हो, एनर्जी सिक्योरिटी हो, शिक्षा हो, समाज को सद्भाव वाला बनाना हो, हर सरकार अपने नागरिकों के प्रति अनेक दायित्वों से बँधी हुई है। उन्होंने कहा कि आज हर सरकार के सामने सवाल है कि वो किस अप्रोच के साथ आगे बढ़े। बकौल पीएम मोदी, उनका मानना है कि आज विश्व को ऐसी सरकारों की जरूरत है जो Inclusive हों, जो सबको साथ लेकर चले।

पीएम मोदी ने दुबई में मंच से कहा कि आज हर सरकार के सामने सवाल है कि वो किस अप्रोच के साथ आगे बढ़े। बकौल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उनका मानना है कि आज विश्व को ऐसी सरकारों की जरूरत है जो इन्क्लूसिव हों, जो सबको साथ लेकर चले। उन्होंने कहा कि आज विश्व को आवश्यकता ऐसी सरकारों की है जो Ease of Living, Ease of Justice, Ease of Mobility, Ease of Innovation, Ease of Doing Business को अपनी प्राथमिकता बनाकर चलें।

पीएम मोदी ने कहा, “मैं मानता हूँ कि सरकार का अभाव भी नहीं होना चाहिए और सरकार का दबाव भी नहीं होना चाहिए। बल्कि मैं तो ये मानता हूँ कि लोगों की जिंदगी में सरकार का दखल कम से कम हो, ये सुनिश्चित करना भी सरकार का काम है। इन 23 वर्षों में सरकार में मेरा सबसे बड़ा सिद्धांत रहा है- मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस। मैंने हमेशा ऐसा माहौल बनाने पर जोर दिया है, जो नागरिकों में उद्योग और ऊर्जा दोनों को और बढ़ाए।

पीएम मोदी ने कहा कि हम टॉप-डाउन और बॉटम-अप अप्रोच के साथ-साथ पूर्ण सामाजिक अप्रोच को लेकर भी चले हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘सबका साथ-सबका विकास’ के मंत्र पर चलते हुए हम Last Mile Delivery और सैचुरेशन की अप्रोच पर बल दे रहे हैं। उन्होंने कहा कि सैचुरेशन की अप्रोच, यानी सरकार की योजनाओं के लाभ से कोई भी लाभार्थी छूटे नहीं, सरकार खुद उस तक पहुँचे। उन्होंने कहा कि गवर्नेस के इस मॉडल में भेदभाव और भ्रष्टाचार दोनों की ही गुंजाइश समाप्त हो जाती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि हमने गवर्नेंस में जन-भावनाओं को प्राथमिकता दी है, हम देशवासियों की जरूरत के प्रति संवेदनशील हैं। उन्होंने वैश्विक नेताओं को बताया कि हमने लोगों की जरूरतों और लोगों के सपनों को पूरा करने पर ध्यान दिया है। इस दौरान उन्होंने आतंकवाद को मानवता के लिए खतरा बताया और जलवायु परिवर्तन को भी चिंता जताई। तकनीक का इस्तेमाल कर के हो रहे अपराध की तरफ भी उन्होंने ध्यान बँटाया।

पीएम मोदी ने कहा कि भारत आज Solar, Wind, Hydro के साथ-साथ Biofuels, Green Hydrogen पर भी काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति हमें सिखाती है कि प्रकृति से जितना हासिल किया है, उसे लौटाने का प्रयास भी करना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत ने विश्व को एक नया मार्ग सुझाया है, जिस पर चलते हुए हम पर्यावरण की बहुत मदद कर सकते हैं। ये मार्ग है – मिशन लाइफ यानि Lifestyle For Environment का, ये मिशन Pro Planet People का रास्ता दिखाता है।

51 करोड़ अकाउंट, 35 करोड़ रुपे कार्ड, ₹2 लाख करोड़ डिपॉजिट: ‘जनधन’ से गरीबों को डायरेक्ट लाभ, करप्शन फुर्र

देश हर पाँच साल पर होने वाले सबसे बड़े त्योहार यानि आम चुनाव की दहलीज पर है। पीएम मोदी की सरकार के 10 साल पूरे होने को हैं। अब वे अपने तीसरे कार्यकाल के लिए मैदान में हैं। प्रधानमंत्री मोदी अपनी योजनाओं की सफलता के बल पर लोगों से वोट माँग रहे हैं। यह सरकार इन योजनाओं पर कितना खरी उतरी है, ऑपइंडिया अगले कुछ दिनों में इनकी पड़ताल आपके सामने रखेगा। इस कड़ी में प्रधानमंत्री जनधन योजना (PMJDY) पर बात सबसे पहले होगी।

सबसे पहले प्रधानमंत्री जनधन योजना को चुनने के पीछे भी एक कारण है। कारण यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सत्ता में आने के बाद सबसे पहले इसी बड़ी योजना की शुरुआत की थी। इस योजना का ऐलान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 15 अगस्त 2014 को लाल किले की प्राचीर से किया था।

इस योजना की आधिकारिक शुरुआत 28 अगस्त 2014 को हुई थी। इसका योजना का उद्देश्य देश के हर घर में कम-से-कम एक बैंक खाता सुनिश्चित करवाना था। इसके आधार पर सरकार आगे की योजनाओं का क्रियान्वयन करना चाहती थी, जो लाभदायक भी सिद्ध हुआ।

क्यों लाई गई PM जनधन योजना?

दरअसल, पीएम मोदी को पता था कि जब तक सरकारी सहायता लोगों तक सीधे नहीं पहुँचेगी तब तक भ्रष्टाचार कम नहीं होगा और मदद सीधे पहुँचे, इसके लिए लोगों के पास बैंक खाते होने जरूरी थे। देश की आजादी के लगभग 7 दशक पूरे होने और बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद भी एक बड़ी आबादी के पास बैंक सुविधाओं का एक्सेस नहीं था। वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2011 तक भारत की लगभग 70% आबादी बैंक खाते की सुविधा से महरूम थी।

देश की आबादी का बड़ा हिस्सा सिर्फ इसलिए खाता नहीं खुलवा सकता था, क्योंकि उसके पास उसमें जमा करने के लिए न्यूनतम राशि भी नहीं थी। यह इस राह में सबसे बड़ा रोड़ा था। जब देश में लोगों के पास खाते नहीं थे तो एटीएम जैसी सुविधाओं की बात ही छोड़ दी जाए। इसमें भी हमारा देश दुनिया के बाक़ी विकासशील देशों से कहीं पीछे थे।

साल दर साल बदली तस्वीर

मोदी सरकार ने यह सभी समस्याएँ इसी एक योजना के जरिए सुलझाने की सोची और 28 अगस्त 2014 को जनधन योजना शुरू हो गई। यह भी अनोखी बात थी कि कोई योजना ऐलान के मात्र दो सप्ताह के भीतर जमीन पर उतर आई हो। इसके लिए सरकारी बैंकों ने गाँवों में अपने कैम्प लगाए। बैंक मित्र नियुक्त किए गए, जो कि गरीब एवं वंचित तबके के लोगों को इसके बारे में जागरूक कर उनके खाते खुलवाते।

योजना के अंतर्गत सरकार ने खाता खोलने के लिए कोई न्यूनतम राशि रखने की शर्त हटा दी। सिर्फ आधार एवं अन्य पहचान पत्र पर बैंकों ने खाते खोले। जनधन योजना के शुरू ही हिट हो गई। गाँव-गाँव में लगे कैम्प असर दिखाने लगे। जनधन योजना की रिपोर्ट बताती है कि योजना चालू होने के एक महीने के भीतर ही 3.3 करोड़ से अधिक खाते खुले। इनमें से 1.8 करोड़ से अधिक खाते ग्रामीण इलाकों में खोले गए थे।

साल दर साल जनधन योजना के अंतर्गत खातों की सँख्या बढ़ी है
साल दर साल इस योजना के अंतर्गत खातों की सँख्या बढ़ी है

मात्र एक वर्ष में जनधन योजना के अंतर्गत 17.9 करोड़ खाते खोले गए। उससे भी बड़ी सफलता यह रही कि इनमें से 60% खाते ग्रामीण इलाकों में खोले गए थे। एक माह के भीतर ही देश के 1 करोड़ लोगों को रुपे ATM कार्ड भी दे दिए गए। एक साला पूरा होते-होते देश में इस योजना के अंतर्गत खोले जाने वाले खातों की संख्या लगभग 18 करोड़ पहुँच गई। इसमें से लगभग 11 करोड़ खाते ग्रामीण क्षेत्रों में खोले गए थे।

वर्तमान स्थिति के अनुसार, जनधन योजना के अंतर्गत 51 करोड़ से अधिक खाते देश भर में खोले जा चुके हैं। अब देश की बहुत बड़ी आबादी के पास बैंक खाते और ATM है। इस योजना के तहत देश में 35 करोड़ से अधिक रुपे एटीएम जारी किए जा चुके हैं। इन कार्ड की खासियत यह है कि इन पर आमजनों को कोई चार्ज नहीं देना पड़ता, जबकि पहले विदेशी कम्पनियों के कार्ड पर सालाना फीस देनी पड़ती थी।

खाते खुले तो पहुँची सीधी मदद

जनधन खातों का सबसे बड़ा लाभ देश की आम जनता को सरकारी लाभ लेने में रहा है। सरकार द्वारा लोगों के खाते में सीधे लाभ भेजने में बीते 10 वर्षों में खासी तेजी आई है। रिपोर्ट बताती है कि डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के तहत जहाँ 2013-14 में मात्र 10.8 करोड़ लोगों को सीधे सहायता राशि भेजी जा रही थी। वहीं, कोरोनाकाल के दौरान यह संख्या 98 करोड़ पहुँच गई। 98 करोड़ लाभार्थियों को अलग-अलग योजनाओं के तहत सहायता राशि उपलब्ध करवाई गई। यह इसीलिए संभव हो पाया, क्योंकि अब इन सबके पास बैंक खाता है।

जनधन योजना से बैंकों की भी सुधरी हालत

प्रधानमंत्री जनधन योजना से सिर्फ लोगों को ही नहीं, बल्कि बैंकों को भी फायदा हुआ है। लोगों द्वारा छोटी-छोटी बचत को बैंक में जमा करने के कारण अब बैंकों के पास अधिक पूँजी आ रही है। रिपोर्ट बताती है कि जनधन योजना के अंतर्गत खोले गए खातों में देश के लोगों ने ₹2 लाख करोड़ से अधिक की धनराशि जमा कर रखी है। इस धनराशि के आने से बैंकों को अपना संचालन करने में आसानी हुई है।

यह योजना लोगों की बचत को बढ़ाने और बैंक के द्वार तक लाने में ही नहीं, बल्कि उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना, किसान सम्मान निधि, शौचालय योजना और अनेकों ऐसी योजनाओं का लाभ दिलाने का आधार बनी है। इसने भारत में वित्तीय क्रान्ति लाने में बड़ी भूमिका निभाई है। ऐसे में मोदी सरकार द्वारा शुरू की गई यह योजना ऑपइंडिया की पड़ताल में सफल साबित होती है। हालाँकि, अभी भी इसमें नवाचार की गुंजाइश है।

‘यह आपकी मेहनत है’: डायरेक्टर का नेशनल अवाॅर्ड लौटा गए चोर, घर के बाहर छोड़ी चिट्ठी में लिखा- सर माफ कर दो

तमिलनाडु में एक अजीब घटना घटी है। यहाँ के मदुरै में में रहने वाले फिल्म डायरेक्टर के घर चोरों ने बीते गुरुवार (7 फरवरी) की रात चोरी की घटना को अंजाम दिया। चोरों ने फिल्म डायरेक्टर के घर से कैश, सोना तो चुराया ही, साथ ही उनके द्वारा जीते गए 2 नेशनल अवॉर्ड की ट्रॉफिया भी उड़ा ले गए। इस घटना की पुलिस जाँच ही कर रही थी, कि अब चोरी किए गए पदक चोरों ने वापस कर दिए, साथ ही माफी नामे के साथ एक नोट भी छोड़ा है। इस खबर के सामने आने के बाद से सब हैरान हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, ये मामला दो-दो नेशनल अवॉर्ड जीत चुके तमिल फिल्म डायरेक्टर एम मणिकंदन से जुड़ा है। यहाँ चोरों ने कैश, सोना और नेशनल अवॉर्ड के तौर पर मिले दो पदक उड़ा ले गए। चोर बाकायदा सेंध लगाकर उनके घर में घुसे थे। उनके घर से 1 लाख रुपए नकद के साथ लाखों रुपए का सोना भी चोर ले गए। हालाँकि चोरी के कुछ दिनों बाद शायद चोरों का मन बदल गया।

चोरों ने सोमवार की रात (12 फरवरी 2024) को उनके घर के बाहर नेशनल अवॉर्ड के रूप में मिले दोनों पदकों और तमिल में माफीनामा लिख कर एक प्लास्टिक बैग में रख कर छोड़ दिया। चोरों ने माफी नामे में लिखा, “सर, हमें माफ कर दो, ये (अवॉर्ड) आपकी मेहनत है।” इस घटना के बाद स्थानीय पुलिस मामले की जाँच में जुट गई। हालाँकि उस इलाके में सीसीटीवी कैमरों के न लगे होने की वजह से चोरों का कोई सुराग नहीं मिल पाया है।

मणिकंदन ने जीते हैं दो नेशनल अवॉर्ड

मणिकंदन की पहली फिल्म ‘काका मुत्तई’ को साल 2015 में 62वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ बाल फिल्म का अवॉर्ड मिला था। वहीं, पिछले साल ही ‘कदैसी विवासयी’ फिल्म को सर्वश्रेष्ठ तमिल फिल्म का नेशनल अवॉर्ड मिला था। वो चेन्नई में रहते हैं, लेकिन मदुरै के उसिलामपट्टी में ये घर है। जहाँ कुछ लोगों को उन्होंने देखरेख लिए रखा है। उन्होंने चोरी की वारदात की पुलिस में शिकायत भी की थी।

‘अब मोदी पंजाब आया तो बचेगा नही’: ये कैसे ‘किसान’ जो PM को दे रहे धमकी, खालिस्तान के समर्थन में भी सुनाई पड़े हैं स्वर

दिल्ली सीमा पर जुटने के लिए पंजाब से किसान निकलकर शंभू बॉर्डर पर जुटे हैं। इस बीच प्रशासन उन्हें समझाने की, मनाने की, उनकी बात सुनने की कोशिश कर रहा है। लेकिन कुछ उपद्रवी तत्व ऐसे हैं जिनकी मंशा किसानों के हित की नहीं बल्कि अपने एजेंडे को अंजाम देने की है। शंभू बॉर्डर से एक कथित किसान का वीडियो सामने आया है। इस वीडियो में वो पीएम मोदी को धमकी देता दिख रहा है।

ये वीडियो अजीत अंजुम के चैनल पर मौजूद है। वीडियो में 21:37 सेकेंड के बाद इस कथित किसान की धमकी को सुना जा सकता है। प्रदर्शन करने निकला ये ‘किसान’ कहता है- “अगर मोदी आया न वापस पंजाब तो उसे इस आँसू गैस के दर्शन कराएँगे वो टेंशन न लें। पिछली बार आया था न फिरोजपुर से भाग गया था। बहाना मारा था कि मैं बच के आ गया। इस बार आएगा तो बच के नहीं जाएगा।”

किसान आंदोलन में खालिस्तानी तत्व

बता दें कि पुरानी घटनाओं को देखते हुए और खुफिया रिपोर्ट्स के मद्देनजर शुरू से ही किसानों के इस आंदोलन पर और इसमें शामिल अराजक तत्वों की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं।

इससे पहले एक यूट्यूब चैनल सत्य खबर ने 12 फरवरी को एक वीडियो साझा किया। इस वीडियो में कुछ सिख खालिस्तान की माँग करते दिख रहे हैं। उनमें से एक सिख ने कहा, “हम सिंघु बॉर्डर पर खड़े हैं, जहाँ तुम लोगों ने बैरिकेड लगा रखे हैं। एक काम करो: हरियाणा के बॉर्डर को हमेशा के लिए बंद कर दो। हम पाकिस्तान के साथ सीमा खोलेंगे। तुम लोगों ने हमें भारत से अलग किया तो अब अलग ही हो जाते हैं।”

इसके बाद इन लोगों ने केंद्र की मोदी सरकार पर भी निशाना साधा। उस कथित किसान ने आगे कहा, “मोदी सरकार पंजाब को अपना नहीं समझती है। अगर वो पंजाब को अपना नहीं समझते हैं तो हमें अलग हो जाने दो। हमें अपना देश खालिस्तान बनाने दो। हम पाकिस्तान के साथ जुड़ जाएँगे। हमने दीवारें नहीं बनाईं, तुमने बनाईं। तुमने हमें भारत से अलग कर दिया है। अब हम खालिस्तान बनाएँगे।”

किसान आंदोलन में इस तरह के बयान आने से पहले ट्रैक्टर पर भिंडरावाले की फोटो वाला झंडा भी देखा गया था और अब खुलेआम पीएम मोदी को धमकी दी जाने लगी है।

पंजाब में हुई थी पीएम की सुरक्षा में सेंध

धमकी में जिस पंजाब की घटना का जिक्र है वो 5 जनवरी 2022 की है। उस समय पीएम मोदी का विमान बठिंडा में लैंड हुआ था, जहाँ से उन्हें हैलीकॉप्टर से हुसैनीवाला स्थित ‘नेशनल मार्टियर्स मेमोरियल’ जाना था। वहाँ उन्हें ‘राष्ट्रीय शहीदी स्मारक’ में बलिदानी क्रांतिकारियों भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को श्रद्धांजलि अर्पित करनी थी।

बारिश और विजिबिलिटी कम होने के कारण उन्हें मौसम के ठीक होने के लिए 20 मिनट तक इंतजार करना पड़ा। जब मौसम ठीक नहीं हुआ तो निर्णय लिया गया कि सड़क मार्ग से ही प्रधानमंत्री हुसैनीवाला तक का सफर तय करेंगे। जब प्रधानमंत्री का काफिला एक फ्लाईओवर पर पहुँचा तो वहाँ पता चला कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने रास्ता जाम कर के रखा हुआ था।

हुसैनीवाला से 30 किलोमीटर दूर पीएम मोदी का काफिला फँसा रहा। लगभग 15-20 मिनट तक पीएम मोदी वहाँ फँसे रहे। यह प्रधानमंत्री की सुरक्षा में एक बड़ी सेंध था। सड़क मार्ग से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा दो घंटे में तय होनी थी, जिसके लिए पंजाब के पुलिस महानिरीक्षक (DGP) को ज़रूरी प्रबंधन करने के निर्देश दे दिए गए थे।

यूपी में हलाल सर्टिफिकेट के पीछे एक बड़े उलेमा का हाथ: सबूत जुटाने में लगी STF, टेरर फंडिंग की भी चल रही जाँच

हलाल सर्टिफिकेट देने के मामले में उत्तर प्रदेश के एक मुस्लिम मजहबी उलेमा का नाम सामने आया है। इसको लेकर यूपी STF को कई अहम साक्ष्य मिले हैं। इसको लेकर पिछले दिनों चार गिरफ्तार लोगों गिरफ्तार किया गया था। उनसे भी कुछ बेहद महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिली हैं। अब STF इस उलेमा की कुंडली खंगालने में लग गई है। हालाँकि, उस उलेमा का नाम अभी सामने नहीं आया है।

दरअसल, उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) ने सोमवार (12 फरवरी 2024) को हलाल काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मौलाना हबीब युसूफ पटेल, उपाध्यक्ष मौलाना मुईदशीर सपडीहा, जनरल सेक्रेटरी मुफ़्ती ताहिर जाकिर और कोषाध्यक्ष मोहम्मद अनवर खान को गिरफ्तार किया है। ये हलाल सर्टिफिकेट देने के नाम पर ‘हराम’ की कमाई कर रहे थे।

इन लोगों के पास न कोई लैब थी, न वो किसी सामान की टेस्टिंग करते थे, बस 10 हजार लिया और सर्टिफिकेट दे दिया। मुंबई में बैठकर पैसे बना रहे ऐसे ही मौलानाओं की चौकड़ी को यूपी एसटीएफ ने पहले तो पूछताछ के लिए बुलाया, और जब पूछताछ में उन्हें पूरी तरह से बेनकाब कर दिया, तो फिर उन्हें सलाखों के पीछे भेज दिया।

दरअसल, इंडिया प्राइवेट लिमिटेड चेन्नई, जमीयत उलेमा हिंद हलाल ट्रस्ट दिल्ली, हलाल काउंसिल ऑफ इंडिया मुंबई जैसी मुस्लिम संस्थाएँ कंपनियों को हलाल प्रमाण पत्र दे रही थीं। इस प्रमाण पत्र का उद्देश्य यह बताना था कि ये सारे प्रोडक्ट मुस्लिमों द्वारा शरीयत के तहत तैयार किया गया है और इसे मुस्लिम इस्तेमाल कर सकते हैं।

STF की जाँच और पकड़े गए आरोपितों से पूछताछ में सामने आया है कि ये लोग खाड़ी देशों में अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ाने के लिए हलाल प्रमाण पत्र जारी करते थे। कंपनियों द्वारा पैसे देते ही ये लोग बिना किसी जाँच के हलाल प्रमाण पत्र दे देते थे। दरअसल, हलाल प्रमाण पत्र होने से खाड़ी देश और मुस्लिम समाज के लोग बिना किसी रोक-टोक के इनका माल खरीदेंगे।

STF ने हलाल प्रकरण से जुड़े आरोपियों के बैंक खाते फ्रीज कराने के साथ उनके सहयोगियों की धरपकड़ में लगी है। साथ ही इनके लेनदेन करने वालों की मंशा का भी पता लगाया जा रहा है। जानकारी के मुताबिक यह रकम देश के साथ विदेशी खातों में भी भेजी जा रही थी। जिससे इसका देश विरोधी गतिविधियों में इस्तेमाल करने की बात सामने आ रही है।

STF के एक अधिकारी के मुताबिक, कंपनियों को हलाल सर्टिफिकेट देकर ये लोग मोटा पैसा बना रहे थे। अब STF इस बात की भी जाँच की जा रही है कि इन पैसे से टेरर फंडिंग से लेकर एक विशेष धर्म के लोगों को लाभ पहुँचाने के लिए तो नहीं की जा रही थी। अब तक करीब 20 कंपनियों के नाम सामने आए हैं, जिसके साथ ये लोग लेनदेन कर रहे थे।

यूपी एसटीएफ ने आरोपितों के बैंक खाते फ्रीज करा दिए हैं। उनके लेनदेन का विवरण भी जुटाया जा रहा है। इससे पता चल सकेगा कि इन खातों में कहाँ-कहाँ से और किन-किन लोगों ने पैसे भेजे हैं। इसके साथ ही इन पैसों को आरोपितों ने किन-किन लोगों एवं संस्थाओं को हस्तांतरित किया, इसकी भी जाँच की जाएगी।

बता दें कि पिछले साल योगी आदित्यनाथ की सरकार ने उत्तर प्रदेश में हलाल सर्टिफिकेट वाले सामान बेचने पर जेल भेजने का फैसला किया था। प्रदेश सरकार की ओर से जारी आदेश में कहा गया था कि हलाल सर्टिफिकेट उत्पाद की गुणवत्ता से संबंधित नहीं है। ऐसे में ये भ्रम की स्थिति पैदा करते हैं। जिन उत्पादों पर इस तरह के प्रतिबंध लगाए गए हैं, उनका उल्लेख राज्य सरकार के पत्र में किया गया है।

इस पत्र में बताया गया है कि डेरी उत्पाद, चीनी, बेकरी उत्पाद, पिपरमिंट ऑयल, रेडी टू ईट सेवरीज व खाद्य तेल आदि के लेबल पर हलाल प्रमाणन का उल्लेख किया जा रहा है, जो कि गलत है। उत्तर प्रदेश सरकार का कहना है कि इन उत्पादों के लिए एफएसएसएआई (Food Safety and Standards Authority of India) प्रमाण पत्र ही काफी है।