Home Blog Page 1175

‘मेडिकल सार्टिफिकेट दिखाओ कि तुम्हारा रेप हुआ है’: बंगाल की संदेशखाली की महिलाओं ने कहा- रात को दरवाजा पीटते हैं गुंडे, पुलिस पर नहीं भरोसा

पश्चिम बंगाल के संदेशखाली में सत्ताधारी तृणूल कॉन्ग्रेस (TMC) के नेताओं द्वारा महिलाओं के साथ यौन शोषण को लेकर नए खुलासे हो रहे हैं। कुछ महिलाओं का कहना है कि अब प्रशासन उनसे रेप का मेडिकल प्रमाण पत्र माँग रहा है। इसको लेकर महिलाओं ने गुस्सा जताया है। इसके साथ ही उन्होंने राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी सरकार पर सवाल भी उठाया है।

मीडिया से बात करते हुए एक महिला ने बताया कि उसने गुंडों द्वारा बलात्कार की बात बताई तो उससे अब रेप का मेडिकल प्रमाण पत्र दिखाने के लिए कहा जा रहा है। महिला ने पूछा कि आखिर कौन-सी पीड़िता सामने आकर यह स्वीकार करेगी। महिला ने बताया कि उसके साथ यौन दुराचार नहीं हुआ है, लेकिन गाँव की कई महिलाओं के साथ ऐसा हुआ है।

वहीं इस हिंसा की शिकार एक अन्य महिला ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “रोजगार देने से क्या होता है? हमें अपनी जमीन और अपना मान-सम्मान वापस चाहिए। हमारे साथ जो मारपीट और जोर जबरदस्ती हुई, जो लड़कियों को उठाकर ले जाता था, वो मान सम्मान कोई वापस कर सकता है क्या?”

इन महिलाओं ने स्पष्ट रूप से तृणमूल कॉन्ग्रेस के नेता शाहजहाँ शेख और उसके गुर्गे शिबू तथा उत्तम पर आरोप लगाए। महिलाओं ने कहा कि वो रात को सो नहीं पा रही हैं। गुंडे घर की खिड़की-दरवाजों से धमकी देते हैं। गेट पर टॉर्च मारते हैं और दरवाजा पीटते हैं। महिलाओं ने अपनी जान का खतरा बताया है और कहा है कि उन्हें बंगाल पुलिस पर भरोसा नहीं है।

इन आरोपों के बीच पुलिस और राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी यहाँ से शिकायतें प्राप्त की हैं। टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट में कहा गया है कि सुंदरबन के एक टापू में बसे संदेशखाली की महिलाओं ने सिर्फ रेप का आरोप नहीं लगाया है, बल्कि मारपीट, जमीन कब्जाने, छेड़छाड़, जान से मारने की धमकी और बकाया राशि वापस ना देने के भी आरोप लगाए हैं।

संदेशखाली महिलाओं का आरोप

बता दें कि संदेशखाली में पिछले कुछ दिनों से महिलाएँ सत्ताधारी पार्टी के गुंडों के विरुद्ध सड़कों पर उतरी हुई हैं। इस दौरान उन्होंने टीएमसी गुंडों के भयावह कारनामों का खुलासा किया है। महिलाओं ने बताया कि वहाँ की महिलाओं के साथ टीएमसी के गुंडों द्वारा रेप और गैंगरेप आम बात है। वो टीएमसी की महिला कार्यकर्ताओं को भी नहीं छोड़ते।

महिलाओं का आरोप है कि पार्टी की मीटिंग में ये नेता सिर्फ महिलाओं को ही बुलाते हैं। महिला कार्यकर्ताओं को धमकाते हुए कहते हैं कि पति को मरने से बचाना है तो पार्टी के दफ्तर में आना पड़ेगा। जब महिलाएँ पार्टी के दफ्तर जाती हैं तो टीएमसी के गुंडे उनका यौन शोषण करते हैं। महिलाओं का आरोप है कि उन्हें अपनी अपने परिजनों की सुरक्षा के लिए चुप रहना पड़ता है।

महिलाओं का ये भी आरोप है कि टीएमसी के गुंडे जमीनों पर कब्जा करते हैं और विरोध करने वालों को गैंगरेप की धमकी देते हैं। यही नहीं, उन्हें जो भी महिला पसंद आती है, उसे उठाकर अपने साथ ले जात हैं और मन भर जाता है तो घर भेज देते हैं। महिलाओं का यह भी आरोप है कि पश्चिम बंगाल की पुलिस टीएमसी के गुंडों के लिए सहायक का काम करती है और पीड़ितों को ही दबाती है।

69.15 रुपए में 1 किलो गेहूँ… राहुल गाँधी की गारंटी: अमीर हो या गरीब, मार्केट में इसी रेट से खरीदना होगा – समझिए MSP और C2+50 का गणित

राहुल गाँधी ने 13 फरवरी को ट्विटर पर ऐलान किया कि कॉन्ग्रेस की सरकार बनते ही स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू कर दी जाएँगी। राहुल गाँधी ने इसे ‘न्याय के पथ पर पहली गारंटी’ करार दिया। खास बात ये है कि राहुल गाँधी ने ये ऐलान उस समय किया, जब किसान आंदोलन 2.0 शुरू हो चुका है और पंजाब-हरियाणा के किसानों ने दिल्ली की सीमाओं पर डट चुके हैं। राहुल गाँधी ने जिस बात का ऐलान किया है, और जिस समय किया है, वो ये बताता है कि किसान आंदोलन का कॉन्ग्रेस किस तरह से फायदा उठाना चाहती है। वैसे, इस लेख में हम न सिर्फ स्वामीनाथन आयोग के बारे में आपको बताएंगे, बल्कि ये भी समझाएंगे कि इससे क्या फायदे-नुकसान होंगे। इसके साथ ही एमएसपी क्या है? और किसानों की 24 फसलों वाली सूची पर एमएसपी लागू कर दिया जाए, तो उसके क्या नफा-नुकसान होंगे।

सबसे पहली बात, राहुल गाँधी ने किया क्या ऐलान?

राहुल गाँधी ने एक्स पर लिखा, “किसान भाइयों आज ऐतिहासिक दिन है! कॉन्ग्रेस ने हर किसान को फसल पर स्वामीनाथन कमीशन के अनुसार MSP की कानूनी गारंटी देने का फैसला लिया है। यह कदम 15 करोड़ किसान परिवारों की समृद्धि सुनिश्चित कर उनका जीवन बदल देगा। न्याय के पथ पर यह कॉन्ग्रेस की पहली गारंटी है।”

दरअसल, राहुल गाँधी जिस स्वामीनाथन आयोग की बात कर रहे हैं, उस आयोग का गठन कॉन्ग्रेस की यूपीए-1 सरकार ने किया था। 18 नवंबर को प्रोफेसर एम एस स्वामीनाथन की अगुवाई में बनाई गई इस कमेटी ने 5 हिस्सों में अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी। इस आयोग ने दिसंबर 2004 में पहली रिपोर्ट, अगस्त 2005 में दूसरी, दिसंबर 2005 में तीसरी और अप्रैल 2006 में चौथी रिपोर्ट सौंपी। पाँचवी और अंतिम रिपोर्ट 6 अक्टूबर 2006 को सौंपी गई, जिसमें किसानों को लेकर कई अहम बिंदुओं को शामिल किया गया था। इस रिपोर्ट में क्या कुछ था, वो हम आगे बताएँगे, अभी जानिए कि उस रिपोर्ट का क्या हुआ?

यूपीए-1 सरकार, जिसमें राहुल गाँधी सांसद थे, सोनिया गाँधी सुपर पीएम थी और कथित तौर पर किसानों, पिछड़ों, दलितों, मुस्लिम वोटरों की राजनीति करने वाली पार्टियाँ भी थी, साथ ही वो पार्टियाँ भी, जो खुद को कम्युनिष्ट बताते हुए नास्तिकता का प्रबल समर्थक बताती थी। उस समय ने 2007 में राष्ट्रीय कृषि नीति की घोषणा की थी, जिसमें प्रो एमएस स्वामीनाथन की रिपोर्ट का कोई जिक्र नहीं था। ऐसा क्यों था? क्योंकि कॉन्ग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने आयोग की रिपोर्ट को अव्यवहारिक और बाजार को ‘हिला’ देने वाला माना और उसकी सिफारिशों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया।

वैसे, इसका खुलासा संसद में साल 2010 में हुआ, जब यूपीए-1 यूपीए-2 में बदल चुकी थी। उस समय बीजेपी के राज्यसभा सांसद और बाद में केंद्रीय मंत्री बने प्रकाश जावड़ेकर ने यूपीए-2 सरकार से संसद में पूछा था कि क्या स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू की गई हैं? अगर की गई हैं, तो उसके क्या प्रावधान हैं। अगर आयोग की सिफारिशों को लागू नहीं किया गया, तो इसके पीछे के कारण क्या हैं? इसका जवाब आया कृषि राज्य मंत्री की तरफ से, उस समय कृषि राज्य मंत्री केवी थॉमस थे।

संसद में लिखित में जवाब देते हुए केवी थॉमस ने कहा, “प्रो. एम एस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में राष्ट्रीय किसान आयोग ने सिफारिश की है कि एमएसपी को उत्पादन की औसत लागत से कम से कम 50 प्रतिशत अधिक होना चाहिए। लेकिन इस सिफारिश को सरकार ने स्वीकार नहीं किया है। क्योंकि एमएसपी की सिफारिश कृषि लागत और मूल्य आयोग द्वारा कई मामलों पर विचार के बाद की जाती है। ऐसे में लागत पर कम से कम 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी करना बाजार को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में एमएसपी और उत्पादन लागत के बीच संबंध कुछ मामलों में प्रतिकूल हो सकता है।” और ये रही कॉन्ग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए-2 सरकार के जवाब की कॉपी…

अब सवाल ये आता है कि राहुल गाँधी उस आयोग की सिफारिशों को लागू करने की गारंटी क्यों दे रहे हैं? जिसे सरकार में रहते हुए खुद कॉन्ग्रेस ही नकार चुकी है। जबकि मौजूदा केंद्र सरकार ने एमएसपी में आने वाली फसलों की न सिर्फ संख्या बढ़ाई है, बल्कि एमएसपी भी लगातार बढ़ाई है। अब जिस स्वामीनाथन आयोग को लागू करने की बात की जा रही है, उसका फसलों की एमएसपी तय करने का फॉर्मूला क्या है? ये जानना भी बेहद जरूरी है। उससे पहले ये जान लीजिए कि एमएसपी क्या है और सरकार को किसान को फसल का मूल्य देने के बाद और कितना खर्च करना पड़ता है?

एमएसपी क्या है? ये कैसे तय होता है?

भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के अंतर्गत कमीशन फॉर एग्रीकल्चरल कोस्ट्स एंड प्राइसेस डिपार्टमेंट (सीएसीपी) एमएसपी तय करता है। एमएसपी का मतलब है-न्यूनतम समर्थन मूल्य। इसे अंग्रेजी में मिनिमम सपोर्ट प्राइस कहते हैं। मौजूदा समय में केंद्र सरकार 24 फसलों पर एमएसपी देती है। ये फसल की कीमत होती है, जिसे सरकार तय करती है। सरकार इसी दाम पर किसानों से अनाज खरीदती है, फिर उसे अपनी व्यवस्थाओं के माध्यम से गरीबों को सस्ते में बेचती है। एमएसपी तय होने के बाद सरकार जिस दाम में खरीदती है, उसका पूरा भुगतान वो सीधे किसान को करती है। लेकिन छोटी जोत वाले किसानों को इसका बहुत ज्यादा फायदा नहीं पहुँचता।

बहरहाल, मुद्दे पर आते हैं। सरकार जिस अनाज को किसान से खरीदती है, उसके बाद भी उस अनाज पर सरकार को काफी पैसा खर्च करना पड़ता है। ये खर्च फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया यानी एफसीआई के माध्यम से होता है। इसमें मंडी से गेहूँ की खरीद एमएसपी पर करने के बाद सरकार को लगभग 34 प्रतिशत पैसा बाकी के कामों में खर्च करना पड़ा है।

टीवी9 से बातचीत में एफसीआई के पूर्व अध्यक्ष आलोक सिन्हा ने बताया है कि सरकार को क्यों एमएसपी देने के बाद भी काफी पैसा खर्च करना पड़ता है। उन्होंने बताया, एफसीआई को एमएसपी के ऊपर मंडी से गेहूँ खरीदने के लिए 14 फीसदी की प्रोक्योरमेंट कॉस्ट यानी मंडी टैक्स, आढ़त टैक्स, रूरल डेवलपमेंट सेस, पैकेजिंग, लेबर, स्टोरेज देना पड़ता है। इसके बाद उसे आम लोगों तक पहुँचाने में 12 प्रतिशत खर्च आता है, इसमें लेबर चार्ज, ट्रांसपोर्ट, लोडिंग-अनलोडिंग का खर्च आता है। यही नहीं, अपने गोदामों तक इस आनाज को पहुँचाने और वहाँ से निकालने के बीच में जितने समय तक वो अनाज गोदाम में होता है, उस पर भी 8 प्रतिशत की लागत आती है। इसमें गोदामों को चलाने, उसके रखरखाव इत्यादि का भी खर्च आता है।

इस इस उदाहरण से समझें कि एमएसपी पर गेहूँ की खरीद अगर 2500 रुपए प्रति क्विंतल के हिसाब से की गई, इसमें 25 रुपए प्रति किलोग्राम सरकार ने लागत मानी। और इसी एमएसपी पर सरकार ने 1000 क्विंतल गेहूँ खरीद लिया, तो सरकार का खर्च 2500X1000= 25,00,000 रुपए तो किसानों को देने में खर्च हो गए। इसके बाद आम लोगों तक मुफ्त में या मामूली कीमत पर यही गेहूँ पहुँचाने के लिए सरकार को 25,00,000 + 34% अन्य खर्च भी करना पड़ा। इस तरह से 1000 क्विंतल गेहूँ की खरीद पर सरकार को 25 लाख रुपए नहीं, बल्कि 8 लाख 50 हजार अन्य खर्चों को जोड़कर कुल 33 लाख 50 हजार रुपए खर्च करने पड़े। यानी प्रति किलो की खरीद पर सरकार ने किसानों को 25 रुपए दिए, लेकिन वही अनाज गरीबों को मुफ्त में पहुँचाने के लिए सरकार पर कुल खर्च आया 33.50 रुपए का। यही नहीं, सरकार को इस फसल की खरीद के दौरान औसतन 8 प्रतिशत खराब गुणवत्ता का भी अनाज मिलता है। वो अनाज सरकार किसी को दे नहीं सकती, तो ये नुकसान भी सरकार को उठाना पड़ता है।

स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें क्या हैं? और कैसे ये गैर-व्यावहारिक है

खैर, मामला स्वामीनाथन आयोग का है। तो अब समझ लीजिए कि स्वामीनाथन आयोग ने क्या सिफारिशें की हैं। स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश है-एमएसपी को सी2+50 प्रतिशत के फॉर्मूले से लागू करने की। किसान आंदोलनकारी मोदी सरकार से एमएसपी पर यही फॉर्मूला लागू करने करने की माँग कर रहे हैं। ऐसे में सी2+50 प्रतिशत का मामला कैसे पूरे देश को अस्त व्यस्त कर सकता है, ये भी जान लीजिए।

स्वामीनाथन आयोग ने सी2+50 का आँकड़ा बताने के लिए फसल लागत को तीन हिस्सों में बाँटा था। ए2, ए2+एफएल और सी2, इसमें ए2 का मतलब फसल के पैदा होने तक की सभी लागत, जैसे जुताई, बुवाई, खाद, पानी, बीज और कीटनाशक जैसी चीजें शामिल हैं। इसमें मजदूरी भी शामिल है। दूसरा ए2+एफएल का मतलब है-लागत + किसान परिवार की मेहनत। वहीं, सी2 का मतलब है-ए2+एफएल+ जमीन के लीज का खर्च और ब्याज पर लिए पैसों की भी लागत। इस तरह से ये सी2 हुआ। स्वामीनाथन आयोग ने इसी सी2 को कुल लागत माना और उसका 50प्रतिशत हिस्सा किसान को लाभ के तौर पर देते हुए फॉर्मूला बताया सी2+50 का।

इसे और भी सरल तरीके से ऐसे समझें। मान लीजिए किसी किसान ने 100 क्विंटल गेहूँ उगाया। एमएसपी पर सरकार इसे 2500 रुपए यानी 25 रुपए प्रति किलो लागत मानते हुए खरीद रही है। तो किसान को मिले 2,50,000 रुपए। यानी ढाई लाख। अब इसे स्वामीनाथन आयोग के सुझाव के हिसाब से देखें, तो मान लीजिए कि 100 क्विंटल गेहूँ की पैदावार के लिए किसान ने 5 एकड़ जमीन की। इसे सालाना 20 हजार रुपए में लीज पर लिया। इसके अतिरिक्त किसान परिवार में 4 लोग खेत में काम कर रहे हैं, तो उनकी मजदूरी जोड़ लीजिए। चूँकि किसान आंदोलन कारी मजदूरी को 300 रुपए प्रतिदिन से बढ़ाकर 700 रुपए करने की माँग कर रहे हैं, तो यही कीमत रखते हैं। इस तरह से 4 लोगों का परिवार प्रति दिन 4X700=2800 रुपए की हुई। तीस दिन वाले एक माह में ये मजदूरी 84,000 हजार रुपए हुई। गेहूँ के उत्पादन में 4 माह का समय लगता है। चार माह में उन्होंने औसतन 84,000 की मजदूरी की, बाकी दिन उन्होंने दूसरे काम किए। ऐसे में सी2 + फॉर्मूले के तहत 100 क्विंतल गेहूँ की कीमत सरकार को कितनी पड़ेगी?

ये कीमत 2,50,000 + 84,000 + 10,000= 3,44,000 +50% (1,72,000) (चूँकि साल में औसतन दो फसल उगती है, ऐसे में लीज की कीमत 10 हजार ही रखते हैं, जो न्यूनतम है) बैठेगी। ऐसे में सरकार अगर सी2+50 फॉर्मूले के तहत ये गेहूँ खरीदना चाहेगी, तो उसे ये 100 क्विंतल गेहूँ खरीदने के लिए उसे 3,44,000+1,72,000= 5,16,000 रुपए किसान को देने पड़ेंगे। अब इसी अनुपात में एमएसपी के हिसाब से खर्च होने वाला 34% का खर्च भी बढ़ सकता है। हालाँकि अभी हम उतना ही जोड़ते हैं। ऐसे में 34 प्रतिशत का खर्च कुल 1,75,440 रुपए जोड़कर कुल लागत 6,91,440 (5,16,000 + 1,75,440) पड़ेगी। इस तरह से एक किलो गेहूँ जो 25 रुपए में सरकार खरीद रही है, उसकी कीमत 69.15 रुपए बैठेगी। अब सोचिए, अगर सरकार करीब 70 रुपए किलो गेहूँ खरीदेगी, तो बाजार में इसका क्या दाम होगा? आम लोगों को गेहूँ कैसे मिल पाएगा?

अभी पूर्वी यूपी-बिहार के निकले युवा जो बाहर के शहरों में प्रति माह 15-20 हजार रुपए कमा कर अपना जीवन जैसे-तैसे चला रहे हैं, वो युवा कहाँ जाएँगे? यहाँ बात सिर्फ गेहूँ की हुई है, इसी अनुपात में अन्य फसलों की कीमत क्या होगी? इसका अंदाजा लगा सकते हैं। ऐसे में स्वामीनाथन आयोग के सी2+50 फॉर्मूले को कैसे लागू किया जाएगा ? ये सवाल राहुल गाँधी से पूछा जाना चाहिए।

वैसे, एक साधारण आँकड़ा जो साल 2020 का है, सरकार का आँकड़ा है, उसे भी रखना बेहद जरूरी हो जाता है। स्वामीनाथन आयोग छोड़ दीजिए, सिर्फ एमएसपी को कानूनी गारंटी देने पर ही सरकार की क्या हालत हो सकती है, वो जान लीजिए। केंद्र सरकार के मुताबिक, वित्त वर्ष 2020 में देश की कृषि उपज का कुल मूल्य 40 लाख करोड़ रुपए था। इसमें इसमें डेयरी, खेती, बागवानी, पशुधन और एमएसपी फसलों के उत्पाद शामिल हैं। इसमें सिर्फ 24 फसलें एमएसपी के दायरे में हैं। उनका कुल मूल्य 10 लाख करोड़ रुपए था। इसका सिर्फ 25 प्रतिशत हिस्सा ही सरकार खरीद पाई, जिसमें 2.5 लाख करोड़ खर्च हुए। ये कुल कृषि उपज का महज 6.25 प्रतिशत है। जबकि एमएसपी वाली फसलों के हिसाब से सिर्फ 25 प्रतिशत। ऐसे में सवाल ये है कि अगर सरकार ने एमएसपी गारंटी कानून लागू कर दी, तो उसे 10 लाख करोड़ रुपए सिर्फ इन फसलों को साल 2020 की एमएसपी पर खर्च करने होंगे। अभी तो सरकार ने एमएसपी भी बढ़ाई है। तो ये आँकड़ा बढ़ेगा।

अब इसके आगे ये देखिए कि इस साल केंद्र सरकार ने बुनियादी ढाँचे पर खर्च करने के लिए अब तक की सबसे बड़ी रकम 11.11 लाख करोड़ रुपए तय किए हैं। ऐसे में अगर इतना पैसा सिर्फ एमएसपी वाली फसलों की खरीदी पर खर्च हो जाएगी, सरकार बाकी विकास कार्यों पर कैसे खर्च करेगी? दूसरी बात, देश के किसान फिर इन्हीं 24 फसलों का उत्पादन शुरू कर देंगे और ये उत्पादन भी बढ़ जाएगा। फिर बाकी खाद्य पदार्थों की आपूर्ति सरकार को विदेशों से आयात करके पूरी करनी पड़ेगी, जैसे अभी खाद्य तेलों और दालों की करनी पड़ती है। उसकी व्यवस्था कैसे की जाएगी? दूसरा, आपके उत्पाद की सी2=50 फॉर्मूले के चलते जो कीमत हो जाएगी, वो दुनिया में कहीं भी खरीदी नहीं जा सकेगी। फिर इस अनाज का क्या होगा?

अब आते हैं मूल सवाल पर कि किसानों की माँगों को सरकार क्यों नहीं मान रही है? किसानों द्वारा एमएसपी की गारंटी के लिए माँगा जा रहा कानून क्यों नहीं बनाया जा रहा है? तो उम्मीद है कि इन सवालों के जवाब आपको मिल गए होंगे। दरअसल, किसान संगठनों की माँगे न सिर्फ अव्यवहारिक हैं, बल्कि देश को खत्म कर देने वाली भी है। ऐसे में राहुल गाँधी ने चुनावी लॉलीपॉप की तरह भले ही स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करने की बात कह दी हो, पर उन्हें भी पता है कि ऐसा करना भारत देश ही नहीं, दुनिया के किसी भी देश के लिए तबाही की तरह होगी। वैसे, साल 1977 से 1981 के बीच अमेरिका में ‘गारंटी कानून’ के चलते सरकार और पूरे देश की क्या हश्र हुई, वो जानना भी दिलचस्प है।

अतीत के अनुभव को भी देख लेते राहुल गाँधी

चलिए, वो किस्सा भी बता देते हैं कि सरकार एमएसपी पर गारंटी कानून और स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को क्यों नहीं मान पा रही है, चाहते हुए भी। दरअसल, साल 1977 में अमेरिका के राष्ट्रपति थे जिमी कार्टर। उन्होंने ऐलान किया कि अमेरिका में दूध के दाम हर 6 माह में बढ़ेंगे और पैसा सरकार देगी। ऐसे में लोगों ने दुग्ध उत्पादन में तेजी ला दी। सरकार के पास स्टोरेज की कमी हो गई। स्थानीय स्तर पर दूध की खपत कम हो गई, क्योंकि दाम बढ़ते गए और लोग डॉलर के चक्कर में सारा दूध बेचते गए। सरकार ने इसका हल निकाला कि वो दूध की जगह चीज खरीदेगी। बस, फिर क्या था? कॉरपोरेट कंपनियाँ मैदान में आ गई। उन्होंने सरकार द्वारा तय किए रेट पर दूध खरीदना शुरू कर दिया, और चीज बनाकर सरकार को सप्लाई करने लगे।

एक समस्या और आई कि किसानों ने कंपनियों को खराब गुणवत्ता का दूध भी बेचना शुरू कर दिया, क्योंकि उन्हें अधिकाधिक कमाई दिख रही थी और सरकार कानून के चलते सबकुछ खरीदने को मजबूर ती। ऐसे में सरकार ने कहा कि वो ‘चीज’ को टेस्ट करने के बाद खरीदेगी, यानी गुणवत्ता की जाँच (क्वॉलिटी चेकिंग) शुरू हो गई। उधर, सरकार के सारे गोदाम चीज से भरने लगे। सरकार ने 120 फुटबॉल स्टेडियमों के आकार के बराबर का बहुत बड़ा गोदाम बनवाया लेकिन समस्या कम नहीं हुई।

साल 1981 आते-आते अमेरिकी सरकार ने 200 करोड़ डॉलर से भी अधिक की रकम दूध और चीज खरीदने पर खर्च कर दिया था। ये सारा सामान उत्पादन की तुलना में बिका भी नहीं, महँगा होने के चलते स्थानीय स्तर पर इसका उपभोग भी नहीं हुआ। ऐसे में 1981 में राष्ट्रपति बने रोनाल्ड रीगन ने फैसला लिया कि अब बस, सरकार और दूध-चीज नहीं खरीद सकती। उन्होंने इस योजना को बंद कर दिया। लेकिन तब तक पूरी व्यवस्था की चूलें हिल चुकी थी।

अब सवाल आपसे है, कि आप क्या चाहते हैं? क्या सरकार को इन राजनीतिक माँगों को माँग कर देश को बर्बादी की कगार पर ढकेल देना चाहिए या फिर उनकी अन्य समस्याओं की तरफ देखना चाहिए? सवाल ये भी है कि एमएसपी सिर्फ 24 फसलों की होगी, तो बाकी फसले उगाने वाले या फलों की खेती में जुटे किसानों का क्या होगा? या फिर कुछ मुट्ठी भर किसानों के लिए एमएसपी लागू कर दिया जाए और देश की बड़ी आबादी को भूख से मरने के लिए छोड़ दिया जाए? या फिर राहुल गाँधी-अरविंद केजरीवाल (किसान आंदोलन को समर्थन) की तरह बिना हिसाब-किताब के ही ‘कुछ भी’ घोषणा करके राजनीतिक रोटियाँ सेंक ली जाए? सोचिए, ये काम आप पर छोड़ता हूँ।

उमर खालिद ने सुप्रीम कोर्ट से वापस ली अपनी जमानत अर्जी, दिल्ली दंगों में जेल में है बंद: वकील कपिल सिब्बल बोले – हालात में बदलाव के कारण लिया फैसला

दिल्ली दंगों के मुख्य आरोपितों में से एक उमर खालिद ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी जमानत याचिका वापस ले ली है। उसकी जमानत पर बुधवार (14 फरवरी, 2024) को सुनवाई होनी थी। खालिद के वकील कपिल सिब्बल ने इसकी पुष्टि की है। याचिका वापस लेने की वजह हालात में बदलाव को बताया गया है। अब उमर खालिद निचली अदालतों में जमानत की संभावनाएँ खोजेगा। हालाँकि, जिला अदालत और हाईकोर्ट में उमर खालिद की जमानत अर्जी पहले ही ख़ारिज हो चुकी हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बुधवार (14 फरवरी, 2024) को उमर खालिद की जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई थी। यह सुनवाई न्यायमूर्ति बेला M त्रिवेदी और न्यायमूर्ति पंकज मित्तल की बेंच में होनी थी। सुनवाई से ठीक पहले उमर खालिद के वकील कपिल सिब्बल में सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दे कर याचिका वापस लेने की अपील की। अर्जी वापस लेने की वजह उसने हालात में बदलाव होना बताया। कपिल सिब्बल की यह अर्जी सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर ली। अब कपिल सिब्बल का कहना है कि वो निचली अदालतों में मौजूद कानूनी विकल्पों पर काम करेंगे।

बताते चलें कि इस से पहले उमर खालिद की जमानत याचिका की अर्जी दिल्ली की कड़कड़डूमा सत्र अदालत मार्च 2022 में ख़ारिज कर चुकी है। उमर खालिद ने इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अक्टूबर 2022 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी उमर खालिद को जमानत देने से इनकार कर दिया था। तब से यह माना जा रहा था कि उमर खालिद जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकता है। मई 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से उमर खालिद के केस में जवाब तलब किया था। नवंबर 2023 में दोनों पक्षों के वकीलों के मौजूद न होने की वजह से मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में नहीं हो पाई थी।

गौरतलब है कि 2020 के दिल्ली दंगों में साजिश रचने के आरोपित JNU के पूर्व छात्र उमर खालिद को दिल्ली पुलिस ने सितंबर 2020 को गिरफ्तार किया था। तब से वो लगातार जेल में ही है। उस पर UAPA एक्ट सहित कई गंभीर धाराओं में केस दर्ज है।

बेटे राहुल के बाद माँ सोनिया का भी यूपी से पलायन, गाँधी परिवार से मुक्त हुआ उत्तर प्रदेश, न्याय यात्रा भी किसानों के चक्कर में रुकी

कॉन्ग्रेस संसदीय दल की नेता सोनिया गाँधी ने बुधवार (14 फरवरी 2024) को राजस्थान से राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल किया। वह फिलहाल उत्तर प्रदेश के रायबरेली लोकसभा से लोकसभा सांसद हैं। इसके साथ ही कॉन्ग्रेस सांसद राहुल गाँधी ने भी अपनी न्याय यात्रा को रोक दिया है और किसानों के प्रदर्शन में शामिल होने का फैसला लिया है।

सोनिया गाँधी ने जयपुर में राज्यसभा चुनावों के लिए नामांकन किया है। इससे यह स्पष्ट हो गया है कि आगामी लोकसभा चुनावों में वह रायबरेली लोकसभा सीट से चुनाव नहीं लड़ेंगी। इसी के साथ साल 1977 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि उत्तर प्रदेश से गाँधी परिवार का कोई भी सदस्य लोकसभा या राज्यसभा में नहीं होगा।

आजादी के बाद से ही प्रधानमंत्री रहे जवाहरलाल नेहरु से लेकर इंदिरा गाँधी, संजय गाँधी, राजीव गाँधी और सोनिया तक सभी उत्तर प्रदेश से लोकसभा सांसद रह चुके हैं। वहीं, राहुल गाँधी भी उत्तर प्रदेश के अमेठी से सांसद रह चुके हैं। हालाँकि, वे साल 2019 के लोकसभा चुनाव हार गए और वर्तमान में केरल की वायनाड सीट से सांसद हैं।

सोनिया गाँधी के उत्तर प्रदेश छोड़ने के पीछे कई कयास लगाए जा रहे हैं। कॉन्ग्रेस के करीबी इसके पीछे उनके स्वास्थ्य को आधार बता रहे हैं। उनका दावा है कि सोनिया गाँधी स्वास्थ्य कारणों से अपने संसदीय क्षेत्र का दौरा नहीं कर पाती हैं। इसलिए वे लोकसभा के बजाय पार्टी की बात रखने के लिए अब राज्यसभा जाएँगी।

रायबरेली सीट कॉन्ग्रेस और गाँधी परिवार के लिए बेहद सुरक्षित सीट मानी जाती रही है। साल 1952 से अब तक के लोकसभा चुनावों में सिर्फ 3 बार कॉन्ग्रेस यहाँ हारी है। 1977 के चुनाव में मैदान में राज नारायण ने इस सीट पर इंदिरा गाँधी को हराया था। इसके बाद 1996 और 1998 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के प्रत्याशी अशोक सिंह ने कॉन्ग्रेस प्रत्याशी को हराया था।

उधर भाजपा ने गाँधी परिवार पर हारने के डर से रायबरेली छोड़ने की बात कही है। भाजपा ने कहा है कि सोनिया गाँधी का राज्यसभा जाना उत्तर प्रदेश में उनका हार को स्वीकार करना है। दरअसल, सोनिया गाँधी 2004 से रायबरेली की सांसद हैं। सोनिया गाँधी ने साल 2004 में अमेठी सीट राहुल गाँधी के लिए छोड़ दी थी। वह बेल्लारी से चुनाव भी लड़ी थीं, लेकिन उन्होंने यह सीट छोड़ दी थी।

सोनिया गाँधी ने जिस रायबरेली लोकसभा को अब छोड़ने का निर्णय लिया है, उस पर अधिकांश समय कोई ना कोई नेहरु-गाँधी परिवार का ही सदस्य काबिज रहा है। सोनिया के ससुर फिरोज गाँधी और उनकी सास इंदिरा गाँधी भी इस सीट से सांसद रह चुकी हैं। कयास लग रहे हैं कि प्रियंका गाँधी इस सीट से चुनाव लड़ सकती हैं। हालाँकि, ये अभी कयास ही है।

अगर सोनिया गाँधी यहाँ से उतरतीं तो भी उनकी जीत कठिन थी। चुनाव दर चुनाव उनकी जीत का अंतर भी कम होता गया है। 2006 के लोकसभा उपचुनाव में सोनिया को लगभग 80% वोट मिले थे। वहीं, 2009 में यह घटकर 72%, साल 2014 में 63% और साल 2019 में 55% रह गया। माना जा रहा है कि भाजपा यहाँ से यूपी सरकार में मंत्री दिनेश प्रताप सिंह को उतारेगी। साल 2019 में भी उन्हें उतारा गया था।

सोनिया के जयपुर में राज्यसभा के नामांकन के अलावा यह भी सामने आया है कि राहुल गाँधी अब अपनी भारत जोड़ो न्याय यात्रा को रद्द करके दिल्ली में किसान प्रदर्शन में शामिल होने जा रहे हैं। वह अभी तक झारखंड में अपनी भारत जोड़ो न्याय यात्रा कर रहे थे। वह इसे रद्द करके आज जयपुर पहुँचे हैं।

जयपुर पहुंँचकर राहुल गाँधी सोनिया गाँधी के नामांकन में शामिल हुए। अब माना जा रहा है कि वह किसान विरोध प्रदर्शन में शामिल होंगे और यात्रा उतने दिन रुकी रहेगी। यह यात्रा 14 जनवरी 2024 को पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर से शुरू हुई थी। इसके एक सप्ताह पहले खत्म किए जाने की भी खबर है।

शिवलिंग, शिलालेख, अभी भी बज रहा 300 साल पुराना शंख… सहारनपुर के कुएँ में हुई खुदाई तो मिलीं माँ पार्वती, नंदी और गणेश की प्रतिमाएँ भी

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में एक मंदिर परिसर में हो रही खुदाई के दौरान शिवलिंग और मूर्तियों सहित कई अन्य प्राचीन धार्मिक वस्तुएँ मिली हैं। यह खुदाई मराठाकालीन मंदिर में बने एक कुएँ और उसके आसपास करवाई जा रही है। खुदाई करा रहे लोगों का कहना है कि जल्द ही मूर्तियों की वैदिक विधि-विधान से प्राण-प्रतिष्ठा करवाई जाएगी। सोमवार (12 फरवरी, 2024) को प्रशासनिक अधिकारियों ने भी मंदिर का दौरा किया। मामले की जाँच पुरातत्व विभाग से करवाने की माँग की जा रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, खुदाई का यह कार्य गोटेश्वर महादेव मंदिर पर चल रहा है। सिद्धपीठ बाग़ शिवाला स्थित यह मंदिर मंडी समिति रोड पर है। 35 वर्षों से बंद पड़े इस मंदिर को 11 दिसंबर, 2020 को जिला प्रशासन ने जिले के प्रबुद्ध लोगों को सौंपा था। यह माँग ‘विश्व हिन्दू परिषद’ (VHP) ने उठाई थी। कुछ समय पहले यहाँ की साफ़-सफाई श्रद्धालुओं द्वारा करवाई का रही थी। इसी दौरान एक प्राचीन कुआँ भी साफ किया जाने लगा। जब कुएँ में श्रमिकों ने लगभग 15 फ़ीट खुदाई की वो उसमें मूर्तियाँ निकलना शुरू हुईं।

खबर फैलते ही आसपास के लोगों की भीड़ जमा हो गई। थोड़ी खुदाई और करने पर कुएँ से शिवलिंग, माता पार्वती, नंदी, भगवान गणेश व बजरंग बली की मूर्तियाँ निकलीं। इसी दौरान एक शंख भी मिला जो अभी तक बज रहा है। मंदिर समिति के सदस्य अनिल त्यागी ने बताया कि कुछ शिलालेख भी मिले हैं। इस बाबत उन्होंने जिले के प्रशासनिक अधिकारियों को सूचित कर दिया। सूचना पर सहारनपुर के कई वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुँचे। मंदिर समिति के सदस्यों ने उनसे मूर्तियों की पुरातत्व विभाग से जाँच करवाए जाने की माँग की है। उनका दावा है कि ये मूर्तियाँ मराठों द्वारा स्थापित की गई हैं। समिति के सदस्यों के मुताबिक मंदिर के आसपास की जमीनों को कुछ लोगों द्वारा कब्ज़ा भी करने की कोशिश की जा रही थी।

अनिल त्यागी का यह भी दावा है कि और खुदाई करने पर मंदिर के अंदर से तहखाना भी निकलेगा। सोमवार को मंदिर पहुँचे जिले के कई सीनियर अधिकारियों ने मंदिर समिति से खुदाई का काम रोक देने की अपील की। फिलहाल खुदाई रोक दी गई है। आगे की खुदाई संभवतः प्रशासन द्वारा आधिकारिक देखरेख में कार्रवाई जाएगी। मंदिर समिति के सदस्यों ने प्रशासन से माँग की है कि मंदिर के प्राचीनता की जाँच पुरातत्व विभाग से करवाई जाए। पुजारी एकता परिषद ने ऐलान किया है कि वो निकल रही मूर्तियों की विधि-विधान से मंदिर परिसर में प्राण-प्रतिष्ठा करवाएँगे।

‘इस्लाम में अल्लाह से ऊपर कोई नहीं’: राजस्थान के स्कूलों में सूर्य नमस्कार कार्यक्रम के खिलाफ मुस्लिम संगठनों ने दी याचिका, हाई कोर्ट ने खारिज की

राजस्थान हाई कोर्ट (Rajasthan High Court) ने मुस्लिम संगठन की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें राज्य के सभी विद्यालयों में सूर्य नमस्कार पर रोक लगाने का निर्देश देने का आग्रह किया गया था। राजस्थान HC ने याचिका ख़ारिज करते हुए मुस्लिम संगठनों पर कई कड़ी टिप्पणी भी की है। अदालत ने 1 मार्च को दोबारा सुनवाई करने की बात कही है।

मुस्लिम फोरम नाम वाले मंच के तत्वाधान में कई मुस्लिम संगठनों ने यह याचिका राजस्थान हाई कोर्ट में डाली थी। संगठन की तरफ से यह याचिका AIMIM के महासचिव काशिफ ज़ुबेरी ने लगाई थी। इसमें उन्होंने माँग की थी कि राजस्थान के स्कूलों में 15 फरवरी 2024 को प्रस्तावित सूर्य नमस्कार को रोका जाए।

मुस्लिम पक्ष का कहना था कि सूर्य नमस्कार में श्लोक भी पढ़े जाते हैं, जो कि इस्लाम के खिलाफ है, क्योंकि मुस्लिम सिर्फ अल्लाह की इबादत करते हैं। राजस्थान हाई कोर्ट ने यह याचिका खारिज करते हुए कहा कि मुस्लिम फोरम स्कूली बच्चों का प्रतिनिधि नहीं है और ना ही कोई रजिस्टर्ड संस्था है। ऐसे में उनका यह दावा खारिज हो जाता है।

राजस्थान हाई कोर्ट ने इसी के साथ गुरुवार (15 फरवरी 2024) को स्कूलों में होने वाले सूर्य नमस्कार के कार्यक्रम पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। इस कार्यक्रम को आयोजित करने का आदेश राजस्थान सरकार ने दिया था। यह कार्यक्रम सूर्य सप्तमी के मौके पर आयोजित किया जा रहा है।

उधर मुस्लिम संगठनों ने राजस्थान के स्कूलों में पढ़ने वाले मुस्लिम बच्चों से इसका बहिष्कार करने और इस दिन स्कूल नहीं जाने के लिए कहा है। जमीयत के प्रदेश महासचिव अब्दुल वहीद खत्री ने कहा कि हिंदू सूर्य को भगवान मानते हैं लेकिन इस्लाम में अल्लाह से ऊपर कोई नहीं है।

जमीयत उलेमा-ए-हिन्द ने इसके पीछे संवैधानिक आजादी का भी राग अलापा है। एक मौलाना ने सूर्य नमस्कार समेत सरस्वती पूजा और वन्दे मातरम को भी हिन्दुओं का रिवाज बताया है। बता दें कि इससे पहले कट्टरपंथी मुस्लिम सूर्य नमस्कार का विरोध करते रहे हैं।

वहीं, प्रदेश सरकार की तरफ से राजस्थान के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने स्कूलों बच्चों से अधिक से अधिक संख्या में सूर्य नमस्कार कार्यक्रम में शामिल होने की अपील की है। उन्होंने कहा है कि यह आयोजन राजस्थान के सभी स्कूलों में सुबह 10:30 बजे आयोजित किया जाएगा।

चोला किसानों का पर नारे खालिस्तान के, तस्वीर भिंडरावाले की और धमकी PM कोः खेत-खलिहान का भला नहीं, राजनीति का नया मोर्चा है ‘दिल्ली चलो’

साल 2020-21 के बाद किसानों का आंदोलन एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार पहले से ज्यादा किसान संगठन (100 से अधिक) इस प्रदर्शन में शामिल हैं। ज्यादा से ज्यादा ट्रैक्टरों को दिल्ली में लाने का प्रयास हो रहा है। प्रशासन समझा रहा है तो उनकी बात अनसुनी हो रही। पुलिस रोक रही है तो उपद्रव चल रहा है।

अजीब बात ये है कि सब कुछ लोकसभा चुनावों से ठीक पहले होना शुरू हुआ है और जिस तरह के बयान सामने आ रहे हैं उनका क्रम देख ऐसा मालूम पड़ रहा है कि इस प्रदर्शन का मकसद किसानों का हित नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ राजनीति है।

शुरुआत से देखें तो कहा गया कि किसानों का यह आंदोलन न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर कानून बनाने की माँग को लेकर है। किसान चाहते हैं कि सरकार उनकी सभी फसलों के लिए न्यूनतम मूल्य तय करे ताकि उनको कोई नुकसान न हो। अब सरकार इस मुद्दे पर बातचीत करके समाधान निकालने को तैयार है। वो बस सामान्य जीवन को बाधित न करें। लेकिन बॉर्डर पर इकट्ठा कथित किसान पीछे होने का नाम नहीं ले रहे।

उलटा इस प्रदर्शन के जरिए बयानबाजी करके अराजकता फैलाने का भरपूर प्रयास हो रहा है। उदाहरण के लिए ऐसे ट्रैक्टरों को दिल्ली सीमा पर लाने की कोशिश है जिनमें भिंडरावाले के झंडे लगे हैं। इसके अलावा वो लोग भी इस प्रदर्शन का हिस्सा बन चुके हैं जो खुलेआम कैमरा ऑन करवाकर ये बोल रहे हैं कि उन्हें खालिस्तान दे दिया जाए वरना वो पाकिस्तान के साथ सीमा खोलेंगे। इन बातों के अलावा भड़काऊ नारेबाजी भी सुनने में आ रही। साथ ही प्रधानमंत्री को खुलेआम धमकी देने का काम भी हो रहा है।

अब एक ऐसे प्रदर्शन में, जिसे ‘अन्नदाता’ के नाम पर प्रमोट किया जा रहा हो। उसमें ऐसी बातों का क्या हो सकता है। 2020-21 के प्रदर्शन में भी यही सब देखने को मिला था जिसके बाद इस पन्नू जैसे खालिस्तानियों ने इस प्रदर्शन के दौरान नए-नए ऐलान कर दिए थे। उसने दिल्ली में बैठे प्रदर्शनकारियों से 26 जनवरी को हंगामा करने को कहा था, जो कि बाद में हुआ भी।

अब इस बार की भूमिका भी ऐसी तैयार की जा रही है कि किसान आंदोलन में खालिस्तानियों की घुसपैठ हो सके और भीड़े हिंसा कर सके। खुफिया रिपोर्ट में पहले ही बताया जा चुका है कि दिल्ली सीमा पर आने पर अड़े कथित किसान पीएम आवास और भाजपा नेताओं के घर के बाहर धरने की योजना लंबे समय से बना रहे थे। इसके लिए उन्होंने रिहर्सल भी की थी और 100 से ज्यादा मीटिंग भी। संभव है कि ये प्रदर्शनकारी बाइक, रेल, बस मेट्रो आदि से दिल्ली में घुसें।

राजनीतिक पार्टी उठा रहीं फायदा

एक तरफ जहाँ कथित किसानों ने प्रदर्शन को लेकर पूरी तैयार की हुई है तो वहीं दूसरी ओर पॉलिटिकल पार्टियाँ इस मौके का लाभ उठाने से पीछे नहीं हट रही। आम आदमी पार्टी के प्रमुख और दिल्ली सीएम केजरीवाल दिल्ली वालों की परवाह किए बिना ऐसे प्रदर्शनों को समर्थन दे रहे हैं। वहीं कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने माहौल का फायदा उठाकर गारंटी दी है कि अगर उनकी कॉन्ग्रेस सरकार सत्ता में आई तो किसानों को हर फसल के लिए MSP सुनिश्चित की जाएगी।

स्वामीनाथन रिपोर्ट पर कॉन्ग्रेस के दो चेहरे

दिलचस्प बात ये है कि राहुल गाँधी ने इस वादे के साथ ये भी कहा है कि वो उस स्वामीनाथन रिपोर्ट में रखी गई सब बातों को किसानों के हित में लागू करेंगे, जिसे यूपीए सरकार ने 2010 में खारिज कर दिया था। अगर कॉन्ग्रेस पार्टी को किसानों के हित के लिए इस कदम को उठाना ही था तो उन्होंने इसे तब क्यों नहीं लागू किया जब उनके पास सारी सत्ता थी।

आज विपक्ष में बैठकर इस मुद्दे पर उस समय वादे करना जब एक वर्ग सड़कों पर उतरा हुआ है, क्या राजनीति से अलग कुछ है? और राहुल गाँधी की इस राजनीति को समर्थन देने वाले लोग क्या राजनीति नहीं कर रहे?

हिंसक प्रदर्शनकारियों के खिलाफ केस को रद्द कराने की क्यों है माँग

इसके अलावा ये भी जानने वाली बात है कि इस प्रदर्शन की एक माँगों में से एक माँग यह भी है कि जिन लोगों पर किसान आंदोलन में केस हुआ था उन सभी केसों को रद्द किया जाए। अब ये केस किस बात पर हुए थे ये भी ध्यान देने वाली चीज है। पिछले किसान आंदोलन के समय जो प्रदर्शन हुए थे उसमें हिंसा की घटनाएँ भी सामने आई थी जिसमें लाल किले तक पर हमला हुआ था। इसी के बाद पुलिस ने इस मामले में केस किया था।

ये प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि प्रशासन उन प्राथमिकियों को रद्द कर दे और किसी उपद्रवी के खिलाफ कोई कार्रवाई न करे। सोचिए एक किसान आंदोलन में ऐसी माँग का क्या अर्थ हो सकता है। क्या ये प्रदर्शनकारी उपद्रव को जायज मानते हैं?

संसद सत्र खत्म होने के बाद क्यों उठाया मुद्दा

सबसे बड़ा बिंदु जो इस ओर इशारा करता है कि ये पूरा प्रदर्शन राजनीतिक है वो ये कि इसे लोकसभा चुनाव से ठीक पहले आयोजित किया जा रहा है। इस प्रदर्शन में कई संगठन शामिल हैं जो किसानों का नेतृत्व करने का दावा करते हैं और अच्छे से जानते हैं कि अगर कोई कानून लाना है तो वो उसका मुद्दा संसद सत्र के समय उठना चाहिए। लेकिन इन किसानों ने न तो संसद सत्र शुरू होने से पहले और न उसके चालू रहने के दौरान अपने प्रदर्शन की तारीख चुनी। बल्कि जब सत्र समाप्त हो गया उसके बाद इन्हीं ‘चलो दिल्ली’ के तहत सीमाओं पर ट्रैक्टर इकट्ठा करने शुरू किए।

इसके अलावा एक सवाल यह भी बनता है कि जो किसान दिल्ली कूच की तैयारी में लगे हैं क्या सिर्फ वही किसान हैं और वहीं सरकार द्वारा एमएसपी पर कानून न होने से परेशान हैं? नहीं, देश के कई अन्य राज्य भी हैं जो कृषि में खासा योगदान दे रहे। लेकिन वो इस प्रदर्शन में शामिल होने नहीं आ रहे हैं।

सवाल तो उठता है न केवल पंजाब के किसानों को ही सरकार से इतनी समस्या क्यों है? और क्यों ये लोग अपनी बात मनवाने के लिए सामान्य जनजीवन को प्रभावित करने पर तुले हैं, वो भी तब जब सरकार कह रही है कि वो इस मामले पर बातचीत करेंगे और समस्या का समधान किया जाएगा। अगर वाकई इस प्रदर्शन का उद्देश्य राजनीति नहीं है तो फिर क्यों इससे पॉलिकिल पार्टियाँ जुड़ती जा रही हैं? क्यों इसके जरिए देश के प्रधानमंत्री को धमकियाँ दी जा रही हैं। क्यों उपद्रवियों को बचाने का प्रयास हो रहा है और क्यों भिंडरावाले की विचारधारा क्रांति का प्रतीक दिखाई जा रही है?

खबर में जिक्र हुई स्वामीनाथन रिपोर्ट की संक्षिप्त जानकारी: किसानों की समस्याओं को समझते हुए प्रोफेसर एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में 2004 में राष्ट्रीय किसान आयोग का गठन हुआ था। इस आयोग ने 2004 से 2006 के बीच पाँच रिपोर्टें पेश कीं। इसमें कई सुझाव दिए गए थे। जैसे देश में खाद्य और न्यूट्रिशन सिक्योरिटी के लिए रणनीति बनाई जाए, कृषि प्रणाली की प्रोडक्टिविटी और स्थिरता में सुधार किया जाए, किसानों को मिलने वाले कर्ज का फ्लो बढ़ाने के लिए सुधार हो, पहाड़ी और तटीय क्षेत्रों के साथ शुष्क भूमि पर किसानों के लिए फार्मिंग प्रोग्राम हो, कृषि के लिए स्थानीय निकाय सशक्त बनें। इसके साथ ही इस आयोग की रिपोर्ट में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) सुनश्चित करने का सुझाव भी दिया गया था और फसल की औसत लागत से कम से कम 50 प्रतिशत अधिक एमएसपी देना का सुझाव दिया था।

क्षिप्रा में स्नान, महाकाल के दर्शन, फिर अयोध्या रवाना… कर्नाटक से दिल्ली आ रहे थे प्रदर्शनकारी किसान, MP पुलिस ने करवा दी ‘तीर्थयात्रा’: भड़के कॉन्ग्रेस CM सिद्धारमैया

कर्नाटक से दिल्ली जा रहे प्रदर्शनकारी किसानों को मध्य प्रदेश पुलिस ने भोपाल में रोक लिया और उन्हें तीर्थयात्रा करवाई। यह सभी प्रदर्शनकारी किसान पंजाब के प्रदर्शनकारियों के साथ मिलकर दिल्ली में विरोध प्रदर्शन के लिए जा रहे थे।

जानकारी के अनुसार, कर्नाटक के अलग-अलग से लगभग 70 किसान दिल्ली प्रदर्शन के लिए जा रहे थे। यह सभी कर्नाटक एक्सप्रेस से कर्नाटक से दिल्ली की ओर जा रहे थे। इनकी सूचना मिलने पर 11 फरवरी, 2024 को मध्य प्रदेश पुलिस ने इन्हें ट्रेन से उतारकर पूछताछ की।

इसके बाद इन किसानों को भोपाल स्टेशन के पास ही एक बड़े गेस्ट हाउस में ठहरा दिया गया। यहाँ पर इन किसानों को रोकने के बाद इन्हें मध्य प्रदेश के धार्मिक शहर उज्जैन ले जाया गया। यहाँ किसानों ने क्षिप्रा नदी में स्नान और महाकाल के दर्शन किए। इसके बाद यहाँ भी प्रशासन ने इनके रुकने की व्यवस्था की।

उज्जैन में किसानों को दर्शन करवाने के बाद इन्हें बुधवार (14 फरवरी, 2024) को अयोध्या में जाने वाली ट्रेन में बैठा दिया गया। अब यह सभी किसान अयोध्या जाकर रामलला के दर्शन करेंगे और वहाँ से आगे की यात्रा करेंगे।

कर्नाटक इन किसानों में शामिल परशुराम ने ‘दैनिक भास्कर’ को बताया, “रात भर हमें पुलिस की निगरानी में रखा गया। आज सुबह हम दिल्ली जाना चाहते थे, लेकिन पुलिस फोर्स ने रोके रखा। गाड़ियों में बैठाकर रेलवे स्टेशन लाए और अयोध्या जाने वाली ट्रेन में बैठा दिया। हमारे साथ कोच में एक पुलिस जवान को भी भेजा है।”

कर्नाटक के किसानों को पहले गिरफ्तार करने की खबर आई थी लेकिन मध्य प्रदेश पुलिस ने इसका खंडन किया था और कहा था कि उन्हें सिर्फ दिल्ली जाने रोका गया है, उन्हें एक मैरिज हाल में रोक कर खाने-पीने की सारी व्यवस्थाएँ करवाई गई हैं।

कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने भी मध्य प्रदेश सरकार से इन किसानों को छोड़ने को कहा था। गौरतलब है कि यह किसान दिल्ली में 200 यूनियन के विरोध प्रदर्शन में शामिल होना चाह रहे थे। पंजाब के किसान पहले ही हरियाणा सीमा पर पुलिस से उलझ रहे हैं। किसानों के प्रदर्शन में कई पुलिसवालों के घायल होने की सूचना भी आई है।

छत्तीसगढ़ में गरीबों के 125 PM आवास पर मुस्लिमों का कब्जा, मजार जैसा ढाँचा तैयार कर झाड़-फूँक: रिपोर्ट में बताया- आते हैं बांग्लादेशी-रोहिंग्या भी

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत गरीबों के लिए बनवाए गए घरों पर अवैध कब्जा करने मामला सामने आया है। सामने आया है कि 125 से ज्यादा मकानों पर मुस्लिम समुदाय के लोग कब्जा करके उसमें अवैध रूप से रह रहे हैं। इतना ही नहीं, उन मकानों में गुंबद बनाकर उसे मस्जिद-मजार आदि का रूप दे दिया गया है और इसमें झाड़-फूँक का काम किया जा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, नगर निगम सीमा क्षेत्र के वार्ड संख्या 43 देवरीखुर्द में साल 2013 में हाउसिंग बोर्ड ने 400 प्रधानमंत्री आवास बनवाए थे। जिनके पास घर नहीं थे, उन परिवारों को 335 आवास आवंटित किए गए। बाकी बचे हुए 65 मकानों पर नगर निगम ने ताला लगा दिया था। इसके बाद धीरे-धीरे बाहरी लोग आए और इन 65 मकानों के ताले तोड़कर उसमें रहने लगे।

इतना ही नहीं, जिन 335 परिवारों को मकान आवंटित किए गए थे, उनमें से 60 परिवारों को डरा-धमकाकर उनके मकानों पर भी अवैध कब्जा कर लिया गया। इसके बाद इन मकानों में अवैध निर्माण करके उनमें गुंबद बनाकर इस्लामी पहचान दे दी गई। इसके साथ ही झाड़-फूँक का काम शुरू कर दिया गया। यहाँ झाड़-फूँक के जरिए रुहानी और जिस्मानी तकलीफों को दूर करने का दावा किया जाता है। 

आवंटित मकान पर अवैध कब्जा (साभार: दैनिक भास्कर)

न्यूज 18 की रिपोर्ट में सामने आया है कि यहाँ के मकान नंबर 199 और 200 में मजारनुमा संरचना बनाकर झाड़-फूँक की जाती है। ये दोनों मकान शंकर धरु और सुखदेव के नाम पर आवंटित हैं। इन दोनों मकानों में कब्जा करके जाकिर खान रह रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहाँ रोहिंग्या और बांग्लादेशी मुस्लिम भी पहुँचते हैं।

स्थानीय लोगों कहना है कि प्रधानमंत्री आवास के ज्यादातर मकानों को बेच दिया गया है। हालाँकि, इसके प्रावधान कहते हैं कि इन मकानों को बेचा नहीं जा सकता है। वहीं, ज्यादातर मकानों में लोग अवैध कब्जे करके रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहाँ के 125 से अधिक मकानों पर अवैध कब्जा कर रखा गया है। यहाँ बाहरी लोगों की आवाजाही लगी रहती है।

हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी के अध्यक्ष बीपी सिंह कहना है कि प्रधानमंत्री आवास में पिछले कुछ सालों से मजार जैसा ढाँचा बना दिया गया है और उसकी आड़ में असामाजिक लोगों का जमावड़ा लगा रहता है। यहाँ तालापारा के लोग आकर शराबखोरी करते हैं। उन्होंने बताया कि देवरीखुर्द में बांग्लादेश और उत्तर प्रदेश के लोग रह रहे थे, लेकिन उनका वेरीफिकेशन तक नहीं किया गया है।

बीपी सिंह ने कहा कि यहाँ बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जिनके पास न तो वोटर आईडी कार्ड है और न ही राशन कार्ड है। उन्होंने कहा कि नगर निगम प्रशासन से यहाँ रहने वाले लोगों का सत्यापन करने और अवैध रूप से रहने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की माँग की गई है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रशासन से मजार को हटाने के लिए भी कई बार माँग की जा चुकी है।

मामले ने जब तूल पकड़ा तो नगर निगम के कार्यपालक अभियंता सुरेश बरूआ ने कहा कि देवरीखुर्द के प्रधानमंत्री आवास में अवैध निर्माण की जानकारी उन्हें मिली है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री आवास के निर्माण में बदलाव करना गलत है। इस मामले में कब्जाधारियों को नोटिस जारी करके अवैध निर्माण तोड़ने की कार्रवाई की जाएगी।

इतना ही नहीं, यहाँ लव जिहाद का मामला भी सामने आ चुका है। यहाँ 13 साल की एक किशोरी को इमरान नाम के एक शख्स ने झाँसा देकर उत्तर प्रदेश भगा ले गया था। हालाँकि, हिंदू संगठनों के प्रयास के बाद पुलिस ने बच्ची 10 फरवरी 2024 को बरामद कर लिया। इस मामले में पुलिस FIR दर्ज करके मामले की जाँच कर रही है। वहीं, आरोपित इमरान फिलहाल फरार है।

‘जय श्री राम’ का नारा लगा दंगाइयों से भिड़े पुरुष, दुपट्टा फाड़ महिलाओं ने पुलिस वालों का रोका खून: हल्द्वानी के हिन्दू बोले – जान भी चली जाती तो गम नहीं

उत्तराखंड के हल्द्वानी में गुरुवार (8 फरवरी, 2024) को अवैध कब्ज़ा हटाने गए प्रशासन पर भीषण हमला हुआ था। बनभूलपुरा क्षेत्र में हुए इस हमले में पत्थरबाजी के अलावा तलवारें और गोलियाँ तक चलीं। इस्लामी भीड़ द्वारा हजारों नागरिकों, सैकड़ों पुलिसकर्मियों और दर्जनों पत्रकारों के प्राण संकट में डालने वाली इस हिंसा का मास्टरमाइंड अब्दुल मलिक बताया जा रहा है। अभी तक पुलिस ने कुल 36 दंगाइयों को गिरफ्तार किया है और बाकियों की तलाश जारी है।

ऐसे में कुछ ऐसे नाम ऐसे सामने आए हैं जिन्होंने अपने प्राणों को संकट में डाल कर न सिर्फ दंगाइयों को अधिक नुकसान करने से रोका बल्कि पुलिसकर्मियों तक की जान बचाई। अपनी ग्राउंड रिपोर्ट में ऑपइंडिया की टीम हल्द्वानी के उस हिन्दू बहुल गाँधीनगर क्षेत्र में पहुँची जहाँ लोगों के प्रतिरोध के चले हिंसक भीड़ आगे शहर में नहीं घुस पाई।

जब हम गाँधीनगर पहुँचे तब वहाँ उत्तराखंड पुलिस के साथ पैरामिलिट्री के जवान तैनात मिले। किसी को भी गलियों में भीड़ जुटा कर खड़े होने की इजाजत नहीं थी। पुलिस के सायरन लगातार गूँज रहे थे। लोग अपने-अपने घरों में थे। गलियों में पत्थरबाजी के निशान साफ देखे जा सकते थे। नालियों में पत्थरों के साथ ईंटों के टुकड़े पड़े थे जो 8 फरवरी को उन्मादी भीड़ द्वारा दिखाई गई क्रूरता का नजारा पेश कर रहे थे। पुलिस ने हमें गाँधीनगर पार कर के वनभूलपुरा क्षेत्र में घुसने से रोक दिया।

हमने गाँधीनगर में ही जानकारियाँ जुटाईं तो वहाँ ऐसे लोग मिले जिन्होंने शहर को बचाने के लिए खुद का जीवन खतरे में डाल दिया था।

गाँधीनगर की वो गली जिस से आगे नहीं बढ़ पाए दंगाई

हमने दिया पुलिसकर्मियों को फर्स्ट एड

गाँधीनगर में हमें अपने घर के आगे बैठे मनीष सोनकर दिखे। मनीष के सिर पर पट्टी बँधी थी। उन्होंने हमें बताया कि घटना के दिन पुलिसकर्मी और नगर निगम स्टाफ भागते हुए उनकी गली में आए। हजारों की भीड़ उनका पीछा कर रही थी। मनीष ने अपने घर के दरवाजे खोल दिए जिस से तमाम पुलिस वालों व नगर निगम स्टाफ अंदर आ गए। तब मनीष के परिजनों ने उन पुलिस वालों की मरहम-पट्टी की। उनको खाना और चाय दिया गया।

कई महिला स्टाफ ने कहा, “वो हमें मार डालेंगे। हमें बचा लो। हमारे कपड़े तक फाड़ने की कोशिश हुई।” लगभग सभी पुलिस वालों के गहरे घाव लगे थे जहाँ से खून बह रहा था।

घायल मनीष सोनकर

मनीष का दावा है कि हिंसक भीड़ पत्थरों, पेट्रोल बम और तलवारों से लैस थी। औरतों और बच्चों को आगे कर दिया गया था। हमले के लिए छतों की ओट ली गई थी। जब मनीष को लगा कि हमलावर भीड़ उनके मोहल्ले में घुस कर पुलिस वालों व अन्य लोगों को मार डालेगी तब वो अपने साथियों सहित आगे बढ़े। मोहल्ले वालों के प्रतिरोध से न सिर्फ हमलावर भीड़ रुकी बल्कि थोड़ी देर के बाद पीछे भी हटी। बाद में बैकअप फ़ोर्स आने पर घायल जवानों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया। खुद मनीष प्रतिरोध करते हुए लगे पत्थर की चोट से बेहोश हो गए थे।

23 साल के ऋतिक ने भी किया मुकाबला

मनीष के बाद गाँधीनगर में हमें 23 वर्षीय ऋतिक मिले। ऋतिक ने बताया कि अगर हमलावर उनके मोहल्ले और पुलिस के ऊपर पत्थर चलाएँगे तो सामने वाला चुपचाप कैसे देख सकता है। भीड़ में से ऋतिक ने पहचाना कि अधिकतर हमलावर स्थानीय थे जो कि गाड़ी आदि चलाने का काम करते थे। इसमें बच्चे, बूढ़े और महिलाएँ भी शामिल थीं। ये हमलावर सामान्य दिनों में स्थानीय हिन्दुओं से यार-दोस्त के रूप में मिलने आते थे। ऋतिक का दावा है कि लाठी लिए पुलिस खुद को भी इसलिए नहीं बचा पाई क्योंकि हमलावरों ने इसकी तैयारी कई महीनों पहले की थी। ऋतिक के चेहरे और हाथों पर पत्थर लगे हैं।

घायल ऋतिक कुमार

अपने जवानों के लिए कुछ भी कर सकते हैं

गाँधीनगर की एक अन्य गली में हमें आर्यन मिले। आर्यन का हाथ टूटा हुआ है। उन्होंने हमें बताया कि ‘अल्लाह हू अकबर’ का नारा लगाती हिंसक भीड़ का जो रूप उन्होंने देखा वो अक्सर फिल्मों में ही नजर आता है। आर्यन के घर में शरण पाई एक महिला पुलिसकर्मी ने रोते हुए उन्हें बताया था कि हिंसा में उनकी अँगूठी तक छीन ली गई। वहीं एक अन्य पुलिसकर्मी जब भाग नहीं पाई तो वो एक नाले में छिप गई और बैकअप फ़ोर्स पहुँचने के बाद ही वहाँ से निकली। हमले के लिए रेलवे लाइन पर बिछे पत्थर पहले से बटोर कर रख लिए गए थे। साजिशन पहले से लाइट काट कर के अँधेरा कर दिया गया था।

घायल आर्यन सोनकर

आर्यन ने हमें आगे बताया कि जब पुलिसकर्मी अपनी जान बचा कर लौट कर भाग रहे थे वो वापसी की रास्तों में हमलावरों ने अपने पुराने वाहनों को आग लगा दी थी। दावा है कि सामाजिक ताने-बाने के खिलाफ पूरी भीड़ में एक भी बुजुर्ग किसी हमलावर को रोकते या समझाते नहीं दिखा। हमलावरों में कई मर्दों ने तो खुद को छिपाने के लिए बुर्का तक पहन रखा था। हमने आर्यन से पूछा कि पुलिस वालों की रक्षा में घाव खाने पर मन में क्या विचार आ रहे? इस पर आर्यन ने कहा, “हमारे जवानों के साथ ऐसा होगा तो देखा नहीं जा सकता। ऐसा कुछ बर्दाश्त नहीं हो सकता मुझ से। हम अपने जवानों के लिए कुछ भी कर सकते हैं।”

‘जय श्री राम’ बोल कर किया दंगाइयों का मुकाबला

गाँधीनगर के वार्ड नंबर 27 में रहने वाले अमरदीप सोनकर का सिर फटा मिला। वो बिस्तर पर लेटे थे और उनके सिरहने के पास उनकी 2 बेटियाँ बैठी थीं। दवा खाने के बाद अमरदीप ने लड़खड़ाती आवाज में हमसे बात की। अमरदीप ने भीड़ में से पहचान कर हमें कुछ नाम गिनाए जिसमें अलीबाबा, जावेद, कलीम और अजीम आदि हैं। पुलिस वालों की जान लेने पर आमादा हिंसक भीड़ को अमरदीप ने साथियों सहित ‘जय श्री राम’ का नारा लगा कर रोका। अमरदीप का इलाज सरकारी खर्च पर हो रहा है। उनका दावा है कि अगर गाँधीनगर के हिन्दुओं ने आगे बढ़ कर हिंसक भीड़ को न रोका होता तो शायद पूरा शहर जला दिया जाता।

घायल अमरदीप सोनकर

घायल पति के साथ पुलिस वालों के इलाज में जुटी थीं अमरदीप की पत्नी

ऑपइंडिया ने अमरदीप की पत्नी से भी बात की। उन्होंने बताया कि घटना के दिन उनका घर घायल महिला-पुरुष पुलिसकर्मियों से भरा हुआ था। हर कोई बदहवास था क्योंकि लगभग सभी के कहीं न कहीं चोट आईं थी जहाँ से खून बह रहा था। इसी समय खुद अमरदीप भी घायल हो कर साथियों द्वारा घर लाए गए। अमरदीप की पत्नी ने अपने पति और पुलिसकर्मियों की अपने स्तर से इलाज और सेवा एक साथ की। उनको संतोष और ख़ुशी है कि अब सभी पुलिसकर्मी सुरक्षित हैं।

ऑपइंडिया से बात करतीं अमरदीप सोनकर की पत्नी

दुपट्टा उतार कर बनाई पट्टी

हमें गाँधीनगर में ही पूजा सोनकर मिलीं। उन्होंने बताया कि 8 फरवरी को उनकी पूरी गली शरण माँगते पुलिसकर्मियों से भरी हुई थी। सभी ने अपने दरवाजे खोल दिए थे। हमले की खबर सुन कर जहाँ मोहल्ले के तमाम मर्द एकजुट हो कर दंगाइयों को रोकने चले गए थे वहीं महिलाएँ घायल पुलिस वालों के इलाज में जुट गईं थीं। कुछ पुलिस वालों का बहता खून देख कर पट्टी न होने पर पूजा ने घाव पर अपना दुपट्टा उतार कर बाँध दिया था। वहीं कई अन्य महिलाओं ने भी अपनी शॉल आदि घायल पुलिस वालों के घाव पर बाँधी।

पूजा सोनकर, हल्द्वानी

शुभम के भाई और चाचा दोनों घायल

गाँधीनगर के रहने वाले शुभम गुप्ता हमें अस्पताल में अपने परिजनों का इलाज करवाते मिले। उन्होंने बताया कि दंगाइयों से घायल पुलिसकर्मियों को बचाते हुए उनके चाचा और भाई दोनों घायल हैं। पत्थर लगने से शुभम के भाई को 16 टाँके लगाने पड़े। उन्होंने बताया कि हमलावरों के हाथों में भैंसों को काटने वाले चापड़ मौजूद थे। इसी से हुए हमले में कई वर्दी वालों को गहरे घाव हुए। उन्होंने यह भी देखा कि मौलाना जैसी शक्ल वाले एक व्यक्ति ने पुलिस की गाड़ी के नीचे पेट्रोल डाल कर आग लगा दी थी।

हिंसक भीड़ द्वारा महिलाओं को आगे किए जाने से पुलिस भी कार्रवाई करने में थोड़ा हिचक रही थी। शुभम ने यह भी बताया कि हिंसा में भले ही कुछ बाहरी तत्व शामिल हुए हों पर अधिकतर बनभूलपुरा के स्थानीय निवासी ही दिख रहे थे।

चश्मदीद शुभम गुप्ता

भगत सिंह के फैन और घरों में हर तरफ देवताओं की तस्वीरें

दंगाइयों से लड़े तमाम युवकों में से कुछ ऐसे भी थे जो खुल कर सामने आने से हिचकिचा रहे थे। उन्हीं में से एक ने खुद को क्रांतिकारी भगत सिंह का फैन बताया। उन्होंने सीना खोल कर टैटू भी दिखाया जिसमें सरदार भगत सिंह छपे हुए हैं। बिना कैमरे के बातचीत करते हुए सरदार भगत सिंह के इस फैन ने हमसे कहा कि वो अपने देश के जवानों के लिए जान भी दे सकते हैं। साथ ही उन्होंने आगे बताया कि 8 फरवरी को पुलिस वालों की जान बचाते हुए अगर उनके प्राण चले जाते तो भी उन्हें ख़ुशी होती।

भगत सिंह का फैन

गाँधीनगर में हिंसक भीड़ का मुकाबला करने वाले अधिकतर लोग दलित समुदाय से हैं। उनके घरों में हिन्दू देवी-देवताओं की तस्वीरें हर कमरे में लगी हुईं हैं। अधिकतर लोगों के हाथों में कलावा और गले में रुद्राक्ष की माला भी दिखी। ज्यादातर ने खुद को बजरंग बली का भक्त बताया।

हल्द्वानी हिंसा का प्रतिरोध करने वाले हिन्दुओं के घर

फ़िलहाल हमलावरों का मुकाबला करते हुए घायल हिन्दू समाज के अधिकतर लोगों का इलाज अलग-अलग जगहों पर चल रहा है। घायलों में कई लोगों की जानकारी प्रशासन को न होने की वजह से वो अपने खुद के खर्च से इलाज करवा रहे हैं। हालाँकि सभी के चेहरे पर संतोष के भाव हैं कि उन्होंने न सिर्फ दंगाइयों से शहर को बचाया बल्कि अपने प्रदेश की रक्षा कर रहे पुलिस वालों के भी काम आए। ऑपइंडिया की टीम ने पूरे हल्द्वानी में न सिर्फ आम जनता बल्कि खुद पुलिस वालों के मुँह से कहते सुना कि गाँधीनगर के लोगों ने गजब की बहादुरी दिखाई।