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2026: भारत का वर्ष- नेतृत्व, निर्णायकता और दिशा

जब हम एक और अंग्रेजी नववर्ष में प्रवेश कर चुके हैं, तो इतिहास के दो वाक्य स्मृति में कौंधते हैं। एक, गोपाल कृष्ण गोखले का कथन कि ‘बंगाल जो आज सोचता है, भारत कल सोचता है’। दूसरा, लोकसभा में सुषमा स्वराज का निर्भीक उद्घोष कि ‘हाँ, हम सांप्रदायिक हैं, क्योंकि हम वंदे मातरम् गाने की वकालत करते हैं…’।

सनातन परंपरा में भले ही अंग्रेजी नववर्ष का कोई आध्यात्मिक महत्व न हो, किंतु वैश्विक समयबोध में यह केवल कैलेंडर परिवर्तन नहीं रह गया है। कुछ वर्ष ऐसे होते हैं, जो इतिहास की धुरी मोड़ देते हैं। 2026 ऐसा ही वर्ष है।

पिछले कई दशकों तक भारत से यह अपेक्षा की जाती रही कि वह हर मुद्दे पर ‘स्पष्टीकरण’ दे। कभी कश्मीर पर, कभी नागरिकता कानून पर तो कभी अपने धर्म, संस्कृति और राष्ट्रबोध पर।

लेकिन 2026 में भारत उस दौर से आगे निकल चुका है। आज का भारत सफाई नहीं देता। आज का भारत दिशा देता है। विमर्श निर्धारित करता है।

यह वर्ष उस आत्मविश्वास का प्रतीक है, जो केवल आर्थिक आँकड़ों से नहीं, बल्कि सभ्यतागत चेतना से उपजता है। वही चेतना जिसने भारत को सहस्राब्दियों तक जीवित रखा।

नववर्ष 2026 का संदेश: भारत- उदीयमान शक्ति नहीं, निर्णायक शक्ति

1 जनवरी 2026 से भारत BRICS की अध्यक्षता सँभाल रहा है। यह महज एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि वैश्विक विमर्श की धुरी सँभालने का क्षण है।

आज की विश्व व्यवस्था में भारत;

  • ग्लोबल साउथ की स्वाभाविक आवाज है
  • पूर्व और पश्चिम के बीच संतुलन का केंद्र है
  • लोकतंत्र, तकनीक और संस्कृति का जीवंत संगम है

जहाँ अमेरिका नेतृत्व खोने की बेचैनी में है, जहाँ यूरोप अपनी पहचान और ऊर्जा संकट से जूझ रहा है, वहीं भारत स्थिरता और विश्वास का आधार बनकर उभरा है।

राष्ट्रवाद अब गाली नहीं, मॉडल है

एक समय था जब राष्ट्रवाद को पिछड़ेपन का पर्याय बताया गया। भारत को समझाया गया कि ‘सेकुलर और आधुनिक’ दिखने के लिए अपनी जड़ों से दूरी बनानी होगी। सुषमा स्वराज के जिस संबोधन का मैंने शुरुआत में जिक्र किया है, वह इसी टीस से निकली थी।

लोकसभा में 11 जून 1996 का उनका यह संबोधन इस विकृति के विरुद्ध चेतावनी थी। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि देश को यह समझना होगा कि धर्मनिरपेक्षता का वास्तविक स्वरूप क्या है और उसे किस प्रकार विकृत किया गया।

इसी विकृति का परिणाम बंगाल ने भी भुगता। हिंदुओं के नरसंहार के बाद जिस प्रदेश ने विभाजन झेला, स्वतंत्रता के पश्चात उसी पर तुष्टिकरण, वामपंथी हिंसा और घुसपैठ को थोप दिया गया।

आज पश्चिम बंगाल पुनः वैचारिक और सामाजिक संकट के चौराहे पर खड़ा है। 2026 का विधानसभा चुनाव कोई साधारण राजनीतिक प्रक्रिया नहीं है। यह बंगाल के आत्मबोध और राष्ट्रीय चेतना की परीक्षा है। आज के भारत की सोच के साथ खड़ा होने का वर्ष है। फिर से उस वैभव की ओर लौटने का वर्ष है, जिसने गोखले को वह बात कहने को प्रेरित किया था, जिसके बिना आज भी बंगाल की बात पूर्ण नहीं होती है।

सेकुलरिज्म का अंत, सभ्यतागत राष्ट्रवाद का उदय

2026 में वह कृत्रिम सेकुलर विमर्श बिखर चुका है, जिसने राष्ट्रबोध को अपराधबोध में बदल दिया था। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रवाद को पुनः सम्मानजनक और वैश्विक रूप से स्वीकार्य बनाया है।

आज भारत का राष्ट्रवाद;

  • समावेशी है
  • आत्मविश्वासी है
  • वैचारिक रूप से स्पष्ट है
  • वैश्विक रूप से स्वीकार्य है

भारत ने यह सिद्ध किया है कि आधुनिकता के लिए आत्मविस्मरण आवश्यक नहीं और सहयोग के लिए संप्रभुता का त्याग अनिवार्य नहीं है।

ऑपइंडिया की भूमिका: सिर्फ खबर नहीं, वैचारिक हस्तक्षेप

नववर्ष 2026 में ऑपइंडिया की भूमिका केवल समाचार देने तक सीमित नहीं है। यह उस नैरेटिव के विरुद्ध खड़ा मंच है, जिसने;

  • भारत को निरंतर अपराधी ठहराया
  • हिंदू समाज को अपराध बोध से भरा
  • राष्ट्रहित को संदेह का विषय बना दिया

ऑपइंडिया का लक्ष्य स्पष्ट है- तथ्यों के साथ निर्भीकता और राष्ट्र के साथ स्पष्ट प्रतिबद्धता।

2026: किसका वर्ष?

यह वर्ष उनका नहीं होगा;

  • जो विदेशी प्रमाण-पत्र के बिना कुछ नहीं मानते
  • जो भारत की प्रत्येक उपलब्धि में संशय खोजते हैं
  • जो अपनी ही सभ्यता से संकोच करते हैं

यह वर्ष उनका होगा;

  • जो भारत को नेतृत्व करते देखना चाहते हैं
  • जो इतिहास से लज्जित नहीं, प्रेरित होते हैं
  • जो जानते हैं कि प्रगति जड़ों से कटकर नहीं आती

2026 का संकल्प

इस नववर्ष, ऑपइंडिया अपने पाठकों से केवल एक ही संकल्प चाहता है- सच के पक्ष में खड़े रहिए, भ्रम से लड़िए, और भारत को समझने में गर्व महसूस कीजिए।

2026 भारत के लिए परीक्षा नहीं, उद्घोषणा है। यह उस भारत की घोषणा है जो अब पूछता नहीं, बताता है।

सपा की गोद में बैठी दैनिक भास्कर की ‘रशियन’ पत्रकारिता, अपने राजनीतिक आका को तेल लगाने के लिए खुद का न निकालो जनाजा

आजकल मीडिया और राजनीति का गठजोड़ इतना घिनौना हो चुका है कि राष्ट्रीय स्तर के अखबार और कथित समाजवादी दल मिलकर समाज में विकृति फैला रहे हैं। दैनिक भास्कर जैसे बड़े न्यूजपेपर, जो कभी विश्वसनीयता का दावा करते थे, अब सनसनीखेज हेडलाइंस के जरिए क्लिकबेट और अश्लील इंसिनुएशन परोस रहे हैं। हालिया उदाहरण देखिए, दैनिक भास्कर की एक खबर का शीर्षक- “नेताजी रशियन के साथ मनाएँगे नया साल।”

यह शीर्षक उत्तर प्रदेश की राजनीति पर आधारित एक रिपोर्ट का हिस्सा है, जिसमें कुमार विश्वास की राज्यसभा सीट की महत्वाकांक्षा और अखिलेश यादव की पार्टी की आंतरिक कलह का जिक्र है। लेकिन भास्कर ने जानबूझकर ‘रशियन’ शब्द को ऐसे ट्विस्ट किया कि यह रूसी महिलाओं के प्रति एक घटिया, यौन संकेत देने वाला इंसिनुएशन बन गया।

दैनिक भास्कर की खबर का स्क्रीनशॉट (फोटो साभार: Bhaskar website)

यह कोई संयोग नहीं है। सस्ते कॉमेडियन ‘रशियन’ शब्द का स्टीरियोटाइप के रूप में इस्तेमाल करते रहे हैं और अब दैनिक भास्कर जैसे संस्थान अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए इसे मेनस्ट्रीम बनाना चाहते हैं। ‘रशियन’ शब्द का द्विअर्थी इस्तेमाल विदेशी महिलाओं खासकर रूसी महिलाओं को वेश्यावृत्ति या सस्ते मनोरंजन से जोड़ता है। भास्कर की हेडलाइन ने इस शीर्षक से ठीक यही काम किया और राजनीतिक खबर को अश्लील जोक में बदल दिया।

क्या यह पत्रकारिता है या कॉमेडी शो का सस्ता स्टंट? दैनिक भास्कर जैसे राष्ट्रीय अखबार का यह स्तर देखकर शर्म आती है। पाठकों को सूचना देने की बजाय, वे उनके मन में विकृति पैदा कर रहे हैं। महिलाओं का सम्मान तो दूर, एक पूरे देश रूस का अपमान कर रहे हैं। रूस भारत का पुराना मित्र है, जो हर संकट में साथ खड़ा रहा। लेकिन भास्कर के लिए यह सब TRP और क्लिक्स का खेल है।

और यह अकेला मामला नहीं है। भास्कर की ‘ये बात खरी है’ सीरीज पहले से ही विवादों में रही है, जहां तथ्यों को तोड़-मरोड़कर सनसनी पैदा की जाती है। अब वे कॉमेडी के नाम पर अश्लीलता परोस रहे हैं। पहले स्टैंड-अप कॉमेडियन यह काम करते थे, अब कथित पत्रकार जोकर बनकर देश के मित्र राष्ट्र का मजाक उड़ा रहे हैं। क्या यही है जिम्मेदार पत्रकारिता?

राष्ट्रीय अखबार होने का मतलब यह थोड़े है कि आप समाज में जहर घोलें। भास्कर के संपादक और रिपोर्टर शायद भूल गए हैं कि उनका काम सूचना देना है, न कि पाठकों के दिमाग में गंदगी भरना। यह नारी सम्मान का अपमान है, रूसी महिलाओं की गरिमा का अपमान है और भारत-रूस मैत्री का अपमान है।

अब आते हैं समाजवादी पार्टी पर, जो इस घटिया खबर को लपककर अपनी गंदी राजनीति चमकाने में लग गई। सपा के मीडिया सेल ने भास्कर की इसी खबर को शेयर करते हुए लिखा, “भाजपा और उसके गठबंधन सहयोगी दलों के नेताओं का चाल चरित्र चेहरा सबके सामने सार्वजनिक है। भाजपा नेताओं को रशियन चाहिए, ये भाजपाई कितने गंदे चाल चरित्र के हैं ये सब सबको दिखाई दे रहा है अब।”

वाह! क्या स्तर है समाजवादी पार्टी का। एक सनसनीखेज हेडलाइन को आधार बनाकर वे पूरे भाजपा और उसके सहयोगियों पर कीचड़ उछाल रहे हैं। लेकिन ये वही समाजवादी पार्टी है, जिसके संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने एक बार बलात्कार जैसे जघन्य अपराध पर कहा था कि “लड़कों से गलतियाँ हो जाती हैं।”

उस बयान ने पूरे देश को हिला दिया था, महिलाओं के सम्मान पर सवाल उठाए थे। आज उनके वारिसान इसी पार्टी में बैठकर दूसरों के चरित्र पर लेक्चर दे रहे हैं?

समाजवादी पार्टी की यह दोहरी मानसिकता जगजाहिर है। जब उनके अपने नेता महिलाओं के प्रति संवेदनहीन बयान देते हैं, तब चुप्पी साध लेते हैं, लेकिन राजनीतिक फायदा देखकर घटिया हेडलाइंस को हथियार बना लेते हैं। अखिलेश यादव की पार्टी महिलाओं के सम्मान की दुहाई देती है, लेकिन खुद ऐसी खबरों को बढ़ावा देकर समाज में विकृति फैला रही है। यह राजनीति नहीं, घटियापन है।

सपा को याद रखना चाहिए कि जनता सब देख रही है- उनका चाल, चरित्र और चेहरा। वे भारत के मित्र रूस का अपमान करके क्या साबित करना चाहते हैं? कि वे सत्ता के लिए कितने नीचे गिर सकते हैं?

यह प्रकरण मीडिया और विपक्ष की गिरती साख को उजागर करता है। दैनिक भास्कर जैसे अखबार को चाहिए कि वे अपनी हेडलाइंस पर संयम बरतें, सनसनी की बजाय तथ्य परोसें। ‘रशियन’ जैसे शब्दों का दुरुपयोग बंद करें, जो एक पूरे राष्ट्र और उसकी महिलाओं का अपमान है। और समाजवादी पार्टी को चाहिए कि वे अपनी पुरानी गलतियों पर माफी माँगें, मुलायम सिंह के उस बयान पर आत्मचिंतन करें, बजाय दूसरों पर कीचड़ उछालने के।

यह मामला सिर्फ एक शीर्षक या एक ट्वीट तक सीमित नहीं है, बल्कि मीडिया की गिरती भाषा, राजनीतिक दलों की विकृत मानसिकता और महिलाओं के प्रति समाज में फैलाए जा रहे ज़हरीले संकेतों का गंभीर उदाहरण बन चुका है। जिस शब्दावली और संदर्भ में ‘रशियन’ शब्द को परोसा गया, वह न सिर्फ स्त्री-सम्मान के खिलाफ है, बल्कि एक सम्प्रभु राष्ट्र और भारत के मित्र देश रूस का खुला अपमान भी है। यह सवाल अब टालने लायक नहीं रहा कि क्या राष्ट्रीय स्तर का अख़बार और एक राजनीतिक दल मिलकर समाज को उसी गटर में ढकेल रहे हैं, जहाँ कभी स्टैंड-अप कॉमेडी के नाम पर सस्ते जोक सुनाए जाते थे।

भास्कर ऐसा इसलिए भी करता है, ताकि वो विपक्ष की राजनीति के काम आ सके। यही कारण है कि उसकी इस घटिया पत्रकारिता को प्रोमोट करते हुए समाजवादी पार्टी ने उसे शेयर किया है।

बहरहाल, जनता अब जाग चुकी है। ऐसे जोकरों को नकारने का समय आ गया है। दैनिक भास्कर जैसे मीडिया हाउस और सपा जैसे दल अगर नहीं सुधरे, तो उनका हश्र वही होगा जो सस्ते जोकर्स का होता है- जनता की नजरों में गिरना और भुला दिया जाना।

UP पुलिस ने निकाली बंपर वैकेंसी, युवाओं को योगी सरकार ने दिया नए साल का तोहफा: 32679 पदों के लिए OTR जरूरी, जानें- कैसे करें अप्लाई

उत्तर प्रदेश में नए साल में योगी सरकार ने युवाओं को तोहफा दिया है। युवाओं के सरकारी नौकरी की वैकेंसी निकली है। उत्तर प्रदेश पुलिस में आरक्षी नागरिक पुलिस एवं समकक्ष पदों पर सीधी भर्ती- 2025 के अंतर्गत कुल 32679 पदों के लिए वैकेंसी निकली है। इसके लिए अभ्यर्थी को ऑनलाइन आवेदन करना होगा। आवेदन करने की तिथि 31/12/2025 से 30/01/2026 यानी पूरे एक महीना है।

आवेदन करने से पहले अभ्यर्थी को रजिस्ट्रेशन करना होगा। वन टाइम रजिस्ट्रेशन के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड यानी uppbpb.gov.in पर जाकर वन टाइम पंजीकरण कराना अनिवार्य है।

इसके तहत आरक्षी नागरिक पुलिस (पुरुष/ महिला), आरक्षी पीएसीसी/ सशस्त्र पुलिस ( पुरुष), महिला बटालियन हेतु महिला आरक्षी, आरक्षी विशेष सुरक्षा बल ( पुरुष), आरक्षी घुडसवार पुलिस (पुरुष), जेल वार्डर की नियुक्ति होगी।

आरक्षी नागरिक पुलिस (पुरुष/ महिला)

इसके लिए अनारक्षित सीटों की संख्या 4191, ईडब्लूएस के लिए 1046, अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 2826, अनुसूचित जाति के लिए 2198 और अनुसूचित जनजाति के लिए 208 सीटें हैं। यानी कुल मिलाकर 10469 सीट उपलब्ध हैं।

आरक्षी पीएसीसी/ सशस्त्र पुलिस ( पुरुष)

इस श्रेणी में अनारक्षित सीटों की संख्या 6060, ईडब्लूएस के लिए 1512, अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 4083, अनुसूचित जाति के लिए 3176 और अनुसूचित जनजाति के लिए 300 सीटें हैं। यानी कुल मिलाकर 15131 सीट उपलब्ध हैं।

आरक्षी विशेष सुरक्षाबल (पुरुष)

इस श्रेणी में अनारक्षित सीटों की संख्या 538, ईडब्लूएस के लिए 134, अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 362, अनुसूचित जाति के लिए 281 और अनुसूचित जनजाति के लिए 26 सीटें हैं। यानी कुल मिलाकर 1341 सीट उपलब्ध हैं।

महिला बटालियन हेतू महिला आरक्षी

इस श्रेणी में अनारक्षित सीटों की संख्या 916, ईडब्लूएस के लिए 228, अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 615, अनुसूचित जाति के लिए 478 और अनुसूचित जनजाति के लिए 45 सीटें हैं। यानी कुल मिलाकर 2282 सीटें उपलब्ध हैं।

आरक्षी घुडसवारी पुलिस

इसके लिए पुरुष अभ्यर्थी आवेदन कर सकते हैं। इसमें अनारक्षित सीटों की संख्या 30, ईडब्लूएस के लिए 7, अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 19, अनुसूचित जाति के लिए 14 और अनुसूचित जनजाति के लिए 1 सीट है। यानी कुल मिलाकर 71 सीटें उपलब्ध हैं।

जेल वार्डर पुरुष श्रेणी

अनारक्षित सीटों की संख्या 1314, ईडब्लूएस के लिए 327, अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 885, अनुसूचित जाति के लिए 688 और अनुसूचित जनजाति के लिए 65 सीटें हैं। यानी कुल मिलाकर 3279 सीट उपलब्ध हैं।

जेल वार्डर महिला श्रेणी

इस कटेगरी में अनारक्षित सीटों की संख्या 44, ईडब्लूएस के लिए 10, अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 28, अनुसूचित जाति के लिए 22 और अनुसूचित जनजाति के लिए 2 सीटें हैं। यानी कुल मिलाकर 106 सीट उपलब्ध हैं।

आवेदन करने के लिए सामान्य, ईडब्लूएस और अन्य पिछड़ा वर्ग को 500 रुपए और दूसरे वर्ग को 400 रुपए जमा करने होंगे।

शैक्षणिक योग्यता

भारत के किसी भी बोर्ड द्वारा 12वीं पास या सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त समकक्ष योग्यता होना आवश्यक है। आवेदन करते वक्त सर्टिफिकेट की कॉपी भी संलग्न करना है। 12वीं परीक्षा देने वाले अभ्यर्थी इसके पात्र नहीं होंगे।

उम्र सीमा

पुरुष अभ्यर्थी 1.7.2025 को 18 साल पूर्ण कर चुका हो और 22 से ज्यादा का नहीं हो। यानी अभ्यर्थी का जन्म 2 जुलाई 2003 से पहले और 1जुलाई 2007 के बाद का नहीं होना चाहिए

महिला अभ्यर्थी 1.7.2025 को 18 साल पूर्ण कर चुकी हो और 25 साल से ज्यादा की नहीं हो यानी महिला अभ्यर्थी का जन्म 2 जुलाई 2000 से पहले और 1 जुलाई 2007 के बाद नहीं हुआ हो। हालाँकि पिछड़ा वर्ग, एससी और एसटी उम्मीदवारों की अधिकतम उम्रसीमा में छूट दी गई है।

चयन की प्रक्रिया

उम्मीदवारों का चयन लिखित परीक्षा, पीईटी व पीएसटी के आधार पर किया जाएगा। लिखित परीक्षा में सफल होने वाले उम्मीदवार शारीरिक पात्रता परीक्षा या शारीरिक दक्षता परीक्षा के लिए पात्र माने जाएँगे। इसके बाद डॉक्यूमेंट्स वेरिफिकेशन के लिए बुलाया जाएगा।

पर्यटन से तीर्थाटन की ओर: नए साल से पहले काशी-मथुरा-वृंदावन और अयोध्या में श्रद्धालुओं का सैलाब, आस्था से आकार ले रही ‘हिंदू इकोनॉमी’

नए साल 2026 के मौके पर अयोध्या, काशी और मथुरा जैसे आस्था के नगरों में श्रद्धा का एक अलग ही भाव दिखाई दे रहा है। देश के कोने-कोने से लाखों लोग इन पवित्र नगरियों में पहुँच रहे हैं ताकि नए साल की शुरुआत भगवान के दर्शन और मन की शांति के साथ कर सकें। गलियों, घाटों और मंदिरों में उमड़ा जनसैलाब ऐसा है मानो कोई ‘मिनी महाकुंभ’ लगा हो।

यह केवल धार्मिक यात्रा भर नहीं है बल्कि भारत की सोच में आ रहे बदलाव की तस्वीर भी है। इस व्यापक सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव को ‘हिंदू इकोनॉमी’ के तौर पर देखा जा रहा है। कुछ साल पहले तक नए साल का मतलब सिर्फ पार्टी, क्लब और शोर-शराबा हुआ करता था लेकिन आज लोग अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं। परंपरा और विकास के इस संगम ने तीर्थाटन को सिर्फ आस्था नहीं बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान और आत्मगौरव का प्रतीक बना दिया है।

अयोध्या, काशी और मथुरा में आस्था का समागम

देश के हर कोने में और हर बड़े तीर्थस्थल पर लाखों श्रद्धालु पहुँच रहे हैं। उत्तर प्रदेश के इन तीन प्रमुख धार्मिक शहरों में इस समय श्रद्धालुओं की इतनी भारी भीड़ है कि प्रशासन के लिए भी इसे संभालना एक बड़ी चुनौती बन गया है। राम-कृष्ण-शिव के जयकारे लगाते लोग किसी भी तरह बस अपने ईष्ट के दर्शन पाने के लिए बेताब, बैचेन हैं।

वाराणसी (काशी)- वाराणसी में बाबा विश्वनाथ के दर्शन के लिए भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा है। बीते तीन दिनों में 11 लाख से अधिक श्रद्धालु बाबा विश्वनाथ के दर्शन कर चुके हैं। अनुमान है कि साल के आखिरी दिन यहाँ करीब 6 लाख लोग पहुँचेंगे और नए साल के पहले दिन 9-10 लाख तक भक्तों की संख्या पहुँच सकती है। भीड़ का आलम यह है कि मंदिर के बाहर भक्तों की कतारें 3 किलोमीटर तक लंबी हो गई हैं।

भीड़ को लगातार आगे बढ़ाने के लिए भक्तों को शिवलिंग के पास रुकने का मौका नहीं मिल रहा है और औसतन 10 सेकंड से भी कम समय में दर्शन करने पड़ रहे हैं। सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन ने 3 जनवरी तक ‘स्पर्श दर्शन’ (शिवलिंग को छूकर पूजा करना) पर पूरी तरह रोक लगा दी है, ताकि लाइनें तेजी से चलती रहें।

अयोध्या धाम- अयोध्या में रामलला के दर्शन के लिए वर्ष के अंतिम सप्ताह में ही भारी भीड़ उमड़ रही है। प्रतिदिन 1.50 लाख से अधिक श्रद्धालु दर्शन कर रहे हैं। साल के आखिरी दिन में रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा की दूसरी सालगिरह मनाई गई। इस पावन अवसर पर यहाँ लगभग 5 लाख श्रद्धालुओं के आने की संभावना की गई थी।

इस बार भक्तों के लिए सबसे बड़ा आकर्षण कर्नाटक से आई सोने की राम प्रतिमा है, जिसकी कीमत करीब 30 करोड़ रुपए बताई जा रही है और जिस पर बेशकीमती हीरे-जवाहरात जड़े हैं। शहर की सुरक्षा और व्यवस्था इतनी महत्वपूर्ण है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद वहाँ पहुँचकर सारी तैयारियों की निगरानी कर रहे हैं।

मथुरा-वृंदावन- मथुरा-वृंदावन में भी हालात कुछ ऐसे ही हैं। बांके बिहारी मंदिर के पास गलियों में तिल रखने की जगह नहीं है। भीड़ इतनी अनियंत्रित हो गई है कि मंदिर प्रबंधन ने भक्तों से लिखित अपील की है कि वे 5 जनवरी तक वृंदावन न आएँ।

श्रद्धालुओं को मंदिर तक पहुँचने के लिए 3 किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ रहा है। गिरिराज, नंदगाँव और बरसाना में भी भारी भीड़ देखी जा रही है। शहर के चारों ओर पार्किंग स्थल चिन्हित किए गए हैं ताकि यातायात को सुचारू रखा जा सके।

जब मंदिर ने ताजमहल को पीछे छोड़ा

भारत में दशकों से पर्यटन का मतलब ‘ताजमहल’ हुआ करता था लेकिन अब यह धारणा पूरी तरह बदल गई है। साल 2024-25 के सरकारी आँकड़ों पर नजर डालें तो एक ऐतिहासिक सच सामने आता है। अयोध्या के भव्य राम मंदिर में साल भर में करीब 18 करोड़ 10 लाख लोग पहुँचे। वहीं दूसरी ओर, दुनिया के सात अजूबों में शामिल ताजमहल को देखने वालों की संख्या 16 करोड़ 70 लाख रही। इसका मतलब यह है कि राम मंदिर ने ताजमहल को करीब 1 करोड़ 40 लाख के अंतर से पीछे छोड़ दिया है। भारत के इतिहास में यह पहली बार हुआ है जब किसी मंदिर ने दुनिया भर में मशहूर ताजमहल की लोकप्रियता और वहाँ पहुँचने वाले लोगों की संख्या (फुटफॉल) को मात दी है।

आस्था के नए केंद्र और टूटते रिकॉर्ड सिर्फ अयोध्या ही नहीं, बल्कि देश के अन्य प्रमुख मंदिरों में भी श्रद्धालुओं की संख्या ने पुराने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। साल 2024 के दौरान काशी विश्वनाथ मंदिर में 8.30 करोड़ से ज्यादा भक्तों ने माथा टेका। अगर हम सिर्फ पिछले साल यानी 1 जनवरी 2025 की बात करें, तो उस एक अकेले दिन में अयोध्या में 5 लाख, काशी में 7 लाख और उज्जैन के महाकाल मंदिर में 6 लाख लोगों ने दर्शन किए थे। यह अपने आप में एक विश्व रिकॉर्ड जैसा है कि एक ही दिन में लाखों लोग भगवान का आशीर्वाद लेने पहुँचे। जिस तरह की भीड़ इस समय (दिसंबर 2025 के अंत में) देखी जा रही है, उससे साफ है कि आने वाले नए साल 2026 की शुरुआत में ये पिछले सारे रिकॉर्ड भी टूट जाएँगे।

ये आँकड़े साबित करते हैं कि भारत के लोगों की पसंद अब बदल रही है। लोग अब घूमने-फिरने के लिए केवल ऐतिहासिक स्मारकों या किलों को ही नहीं चुन रहे बल्कि अपनी आस्था और धर्म से जुड़े केंद्रों पर जाना उनकी पहली पसंद बन गया है। यही कारण है कि आज अयोध्या और काशी जैसे शहर पर्यटन के वैश्विक नक्शे पर सबसे ऊपर उभर कर आए हैं।

‘हिंदू इकोनॉमी’ का उदय: करोड़ों का कारोबार

तीर्थस्थलों पर उमड़ने वाली यह भीड़ अब केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसने देश की अर्थव्यवस्था को एक नई रफ्तार दे दी है। इसे हम ‘आस्था की अर्थव्यवस्था’ कह सकते हैं, जहाँ लोगों की श्रद्धा से हजारों करोड़ों का कारोबार हो रहा है।

होटल और रहने का कारोबार– धार्मिक शहरों में इस समय ठहरने की जगह मिलना किसी चुनौती से कम नहीं है। अयोध्या, वाराणसी और मथुरा के सभी होटल, गेस्ट हाउस और धर्मशालाएँ 100% फुल हो चुकी हैं। भारी माँग के कारण होटलों ने अपना किराया सामान्य दिनों की तुलना में 30% से 50% तक बढ़ा दिया है। इतना ही नहीं, जो लोग अपने घरों में ‘होम-स्टे’ (मेहमानों को ठहराने की सुविधा) चलाते हैं, उन्हें भी सामान्य से दोगुनी कीमत मिल रही है। लोग भगवान के दर्शन के लिए इतने उत्साहित हैं कि वे रहने के लिए मोटी रकम खर्च करने से भी पीछे नहीं हट रहे हैं। पहले जो दुकानदार दिन का ₹1000 कमाते थे, अब वे ₹5000 से ₹8000 तक कमा रहे हैं।

फूल और प्रसाद का बाजार- भक्ति के इस माहौल ने स्थानीय किसानों और व्यापारियों की लॉटरी लगा दी है। अनुमान है कि केवल नए साल के इन दो-तीन दिनों के भीतर अयोध्या, काशी और मथुरा में करीब 20 लाख गुलाब और 2 हजार टन गेंदा फूल बिक जाएँगे। यह फूल और प्रसाद का व्यापार इतना बड़ा हो चुका है कि इससे करोड़ों रुपए का लेन-देन हो रहा है। इससे न केवल शहर के व्यापारियों को फायदा हो रहा है, बल्कि आसपास के गाँवों के उन किसानों की किस्मत भी बदल रही है जो फूलों की खेती करते हैं।

परिवहन और यात्रा, कमाई में चार गुना उछाल– लोग इन तीर्थ स्थलों पर पहुँचने के लिए हर संभव रास्ता अपना रहे हैं। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों से आने वाली सभी ट्रेनें और फ्लाइट्स कई हफ्ते पहले ही पूरी तरह बुक हो चुकी हैं। स्थानीय स्तर पर भी परिवहन का काम बहुत तेजी से बढ़ा है। ई-रिक्शा, ऑटो और टैक्सी चलाने वालों की चाँदी हो गई है। यात्रियों की भारी भीड़ के कारण इन चालकों की रोजाना की कमाई में 4 गुना तक की बढ़ोतरी देखी गई है।

अयोध्या में लगभग ₹85,000 करोड़ की विकास परियोजनाओं ने रोजगार के लाखों नए द्वार खोले हैं। एविएशन, ट्रांसपोर्ट, और सेवा क्षेत्र में युवाओं को मनमाफिक अवसर मिल रहे हैं। प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाले युवाओं का औसत वेतन ₹40,000 प्रति माह तक पहुँच गया है, जो इस क्षेत्र में आर्थिक क्रांति का प्रमाण है।

मोदी-योगी के विजन से विरासत की पुनर्स्थापना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भारत में आस्था और विकास के बीच दशकों से खड़ी की गई झूठी बहस को खत्म कर दिया है। लंबे समय तक भारत पर शासन करने वाली विचारधारा द्वारा यह मान्यता थोपी गई कि धार्मिक चेतना आधुनिक राष्ट्र-निर्माण के खिलाफ है लेकिन मोदी-योगी मॉडल ने आस्था को भारत की सांस्कृतिक शक्ति और आर्थिक ताकत के रूप में परिभाषित किया है। यही वजह है कि आज तीर्थ केवल पूजा स्थल नहीं बल्कि राष्ट्र की चेतना-प्रेरणा-अर्थ तंत्र को गति देने वाले केंद्र बन चुके हैं।

अयोध्या इस बदलाव का सबसे ठोस प्रमाण है। 500 वर्षों के ऐतिहासिक संघर्ष के बाद रामलला का अपने भव्य मंदिर में विराजमान होना केवल धार्मिक घटना नहीं बल्कि सांस्कृतिक की फिर से स्थापना थी। इसके साथ ही अयोध्या का पूरा कायाकल्प जिसमें हवाई अड्डे से लेकर आधुनिक सड़कें, पर्यटन ढांचा और नागरिक सुविधाएँ हैं वो दिखाता है कि आस्था और आधुनिकता एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर ने इसी दर्शन को और मजबूती दी जहाँ श्रद्धा को सुव्यवस्था, सौंदर्य और सुगमता के साथ जोड़ा गया। काशी आज वैश्विक तीर्थाटन का बड़ा केंद्र बनकर उभरी है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को सीधा बल मिला है।

योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश के तीर्थों पर सुरक्षा, सफाई और व्यवस्था में बड़ा सुधार हुआ है। प्रयागराज महाकुंभ, मथुरा-वृंदावन और चित्रकूट जैसे स्थानों पर भी यह साफ दिखाई देता है कि परंपरा और आधुनिक शासन-प्रशासन साथ-साथ चल सकते हैं। मोदी-योगी की जोड़ी ने मंदिरों और तीर्थों को पिछड़ेपन की सोच से बाहर निकालकर उन्हें विरासत और विकास का केंद्र बना दिया है।

यह बदलाव सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं है बल्कि समाज और अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा है। आज त्योहारों, नए साल और खास मौकों पर बड़ी संख्या में लोग तीर्थों की ओर जा रहे हैं। यह दिखाता है कि भारत गर्व और आत्मविश्वास के साथ अपने संस्कारों और जड़ों की ओर फिर से लौट रहा है। मोदी–योगी के नेतृत्व ने आस्था को खुलकर अपनाने का भरोसा दिया है। यही सच्चे अर्थों में विरासत की वापसी है और विकसित भारत की मजबूत नींव भी।

उच्च विकास दर, नियंत्रित महँगाई, घटती बेरोजगारी और संतुलित अर्थव्यवस्था: जानें- कैसे भारत ने 2025 में लिखी विकास की नई परिभाषा

साल 2025 भारत की आर्थिक यात्रा का एक स्वर्णिम अध्याय साबित हुआ। वैश्विक स्तर पर व्यापारिक अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक मंदी की आशंकाओं के बावजूद भारत ने अपनी मजबूत घरेलू माँग, दूरदर्शी नीतियों और साहसिक सुधारों के बल पर न केवल स्थिरता बनाए रखी, बल्कि नई ऊँचाइयाँ हासिल कीं। बात चाहे सैन्य ताकत (ऑपरेशन सिंदूर) की हो या आर्थिक ताकत की… पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत अपनी ही रफ्तार में आगे बढ़ता रहा।

आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर 2025) में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर 8.2 प्रतिशत दर्ज की गई, जो पिछले छह तिमाहियों का उच्चतम स्तर है। यह पिछले वर्ष की इसी तिमाही के 5.6 प्रतिशत और पहली तिमाही के 7.8 प्रतिशत से काफी अधिक है।

इस मजबूत प्रदर्शन ने भारत को दुनिया की सबसे तेज बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शीर्ष पर बनाए रखा। भारत की जीडीपी अब 4.18 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँच चुकी है, जिससे हम जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गए हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगले 2.5 से 3 वर्षों में भारत जर्मनी को पछाड़कर तीसरे स्थान पर पहुँच जाएगा और 2030 तक जीडीपी 7.3 ट्रिलियन डॉलर हो जाएगी।

इस विकास की मुख्य वजह मजबूत निजी खपत रही, जो घरेलू माँग का प्रमुख चालक है। साथ ही सरकारी पूंजीगत व्यय की प्राथमिकता, जीएसटी और आयकर सरलीकरण जैसे सुधारों ने उपभोक्ता विश्वास को बढ़ावा दिया।

प्रमुख क्षेत्रों में चौतरफा गति को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए अपने जीडीपी विकास अनुमान को 6.8 प्रतिशत से बढ़ाकर 7.3 प्रतिशत कर दिया है।

अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने भी इसी आशावाद को दोहराया है, जिसमें विश्व बैंक ने 2026 में 6.5 प्रतिशत विकास का अनुमान लगाया है। मूडीज को उम्मीद है कि भारत 2026 में 6.4 प्रतिशत और 2027 में 6.5 प्रतिशत की वृद्धि के साथ सबसे तेजी से बढ़ने वाली जी-20 अर्थव्यवस्था बना रहेगा।

आईएमएफ ने 2025 के लिए अपने अनुमान बढ़ाकर 6.6 प्रतिशत और 2026 के लिए 6.2 प्रतिशत कर दिए हैं। ओईसीडी ने 2025 में 6.7 प्रतिशत और 2026 में 6.2 प्रतिशत विकास का पूर्वानुमान लगाया है, तो एसएंडपी ने जारी वित्त वर्ष में 6.5 प्रतिशत और अगले वर्ष 6.7 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान लगाया है।

एशियाई विकास बैंक ने अपने 2025 के पूर्वानुमान को बढ़ाकर 7.2 प्रतिशत कर दिया है और फिच ने मजबूत उपभोक्ता माँग के कारण वित्त वर्ष 26 के अनुमान को बढ़ाकर 7.4 प्रतिशत कर दिया है। ये सभी आँकड़े जी-20 देशों में सबसे अधिक है।

विकास के इस सफर में तीन प्रमुख स्तंभ उभरकर सामने आए हैं, उच्च विकास, स्थिरता और आत्मविश्वास। वैश्विक व्यापार में अनिश्चितताओं के बीच भारत की घरेलू माँग ने अर्थव्यवस्था को संभाला। हाई-फ्रीक्वेंसी इंडिकेटर्स जैसे क्रय प्रबंधक सूचकांक (पीएमआई), क्रेडिट वृद्धि और शहरी खपत सभी सकारात्मक संकेत दे रहे हैं। वाणिज्यिक क्षेत्र में मजबूत क्रेडिट प्रवाह और कॉर्पोरेट बैलेंस शीट की मजबूती ने निवेश को प्रोत्साहित किया।

आम जनता को घटती महँगाई से बड़ी राहत

महँगाई के मोर्चे पर 2025 भारत के लिए राहत भरा वर्ष रहा। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) आधारित महँगाई जनवरी 2025 में 4.26 प्रतिशत से शुरू होकर नवंबर तक घटकर 0.71 प्रतिशत पर आ गई, जो कई वर्षों का निचला स्तर है। यह आरबीआई के 4 प्रतिशत के लक्ष्य (सहिष्णुता बैंड +/-2 प्रतिशत) से काफी नीचे है। मुख्य कारण खाद्य वस्तुओं की कीमतों में गिरावट रहा, विशेषकर सब्जियाँ, दालें और अनाज में। इसकी वजह से खाद्य महंगाई नवंबर में -3.91 प्रतिशत तक नकारात्मक हो गई।

आरबीआई ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए महँगाई अनुमान को 2.6 प्रतिशत से घटाकर 2.0 प्रतिशत कर दिया। थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) महँगाई भी नवंबर में -0.32 प्रतिशत पर रही। इस अनुकूल महँगाई परिदृश्य ने आरबीआई को नीतिगत रेपो दर को 25 आधार अंक घटाकर 5.25 प्रतिशत करने की गुंजाइश दी। यह स्थिति अर्थव्यवस्था के लिए एक दुर्लभ ‘गोल्डीलॉक्स पीरियड’ है, जहाँ विकास तेज है और महँगाई कम। कम महँगाई से घरेलू बचत बढ़ी, खपत मजबूत हुई और मौद्रिक नीति में लचीलापन आया।

बेरोजगारी में ऐतिहासिक गिरावट दिखी, रोजगार सृजन को नई गति मिली

बेरोजगारी और आर्थिक गतिविधि की गति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और एक-दूसरे के पूरक हैं। जैसे-जैसे विकास की रफ्तार बढ़ती है, वस्तुओं और सेवाओं के अधिक उत्पादन से श्रम की माँग बढ़ती है, जिससे रोजगार के अधिक अवसर पैदा होते हैं और बेरोजगारी कम होती है। इस संदर्भ में भारत की घटती बेरोजगारी दर इसकी आर्थिक गति की मजबूती को दर्शाती है। विकास की निरंतरता को देखते हुए, भारत के बेहतर होते रोजगार परिणाम निरंतर विकास और रोजगार सृजन के बीच अच्छे तालमेल को दिखाते हैं।

आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के अनुसार, नवंबर 2025 में 15 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के लिए बेरोजगारी दर घटकर 4.8 प्रतिशत हो गई, जो कई महीनों का निचला स्तर है। महिलाओं की बेरोजगारी में भारी कमी आई, ग्रामीण महिलाओं में 4.0 प्रतिशत से 3.4 प्रतिशत और शहरी में 9.7 प्रतिशत से 9.3 प्रतिशत रही, तो ग्रामीण बेरोजगारी 3.9 प्रतिशत और शहरी 6.5 प्रतिशत पर रही।

श्रम बल भागीदारी दर (एलएफपीआर) सात महीनों के उच्चतम स्तर 55.8 प्रतिशत पर पहुँची, जबकि श्रमिक जनसंख्या अनुपात (डब्ल्यूपीआर) 53.2 प्रतिशत हो गया। ये आँकड़े बताते हैं कि अधिक लोग कार्यबल में शामिल हो रहे हैं और उन्हें रोजगार मिल रहा है। ग्रामीण क्षेत्र में कृषि और निर्माण तथा शहरी में सेवा क्षेत्र ने रोजगार बढ़ाए। महिलाओं की भागीदारी बढ़ना विशेष रूप से उत्साहजनक है।

भारत की युवा जनसंख्या (10-24 वर्ष आयु वर्ग में लगभग 26 प्रतिशत) एक बड़ा अवसर है। सुधारों से गुणवत्तापूर्ण रोजगार सृजन हुआ, जो समावेशी विकास सुनिश्चित कर रहा है। विकास और रोजगार के बीच का चक्र मजबूत हुआ, तेज विकास से अधिक नौकरियां और अधिक नौकरियों से मजबूत खपत।

निर्यात में मजबूती, वैश्विक बाजारों में भारत की बढ़ती हिस्सेदारी

भारत ने व्यापार के बाहरी क्षेत्र ने भी मजबूती दिखाई। नवंबर 2025 में मर्चेंडाइज निर्यात बढ़कर 38.13 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया, जो पिछले वर्ष के मुकाबले 19 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि है। प्रमुख वस्तुएँ जैसे इंजीनियरिंग गुड्स (23 प्रतिशत वृद्धि), इलेक्ट्रॉनिक गुड्स, फार्मास्यूटिकल्स और पेट्रोलियम उत्पादों ने योगदान दिया। सेवा निर्यात भी मजबूत रहा, अप्रैल-नवंबर में 8.65 प्रतिशत बढ़कर 270 बिलियन डॉलर के करीब।

विदेशी मुद्रा भंडार 686 बिलियन डॉलर पर पहुँचा, जो 11 महीनों से अधिक के आयात को कवर करता है। चालू खाता घाटा जीडीपी के 1.3 प्रतिशत पर सीमित रहा। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) में भारी वृद्धि हुई, जिसमें अप्रैल-सितंबर में शुद्ध एफडीआई 127 प्रतिशत बढ़ा। व्यापार समझौतों से न्यूजीलैंड, ओमान, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और ईएफटीए देशों के साथ संबंध मजबूत हुए।

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में नेक्स्ट-जेनरेशन रिफॉर्म्स से बही सुधारों की बयार

ये उपलब्धियाँ बिना ठोस आधार के हासिल नहीं हुईं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लेख में 2025 को ‘सुधारों का वर्ष’ कहा, जहाँ भारत ‘रिफॉर्म एक्सप्रेस’ पर सवार हुआ। सुधारों का इंजन भारत की जनसांख्यिकी, युवा ऊर्जा और लोगों का जज्बा है।

जीएसटी सुधारों में दो मुख्य स्लैब (5% और 18%) लागू किए गए। घरों, MSMEs, किसानों और ज्यादा लेबर वाले सेक्टर्स पर टैक्स का बोझ कम किया गया है। इसका मकसद विवादों को कम करना और बेहतर कंप्लायंस सुनिश्चित करना है। इस सुधार से कंज्यूमर सेंटिमेंट और डिमांड को बढ़ावा मिला है। सुधार लागू होने के बाद फेस्टिव सीजन में बिक्री बढ़ी है।

इस साल आयकर में अभूतपूर्व राहत मिली है। पहली बार सालाना 12 लाख रुपए तक कमाने वाले लोगों को कोई इनकम टैक्स नहीं देना पड़ा। साल 1961 के पुराने इनकम-टैक्स एक्ट को आधुनिक और सरल इनकम टैक्स एक्ट, 2025 से बदल दिया गया है। ये सभी सुधार मिलकर भारत को एक पारदर्शी, टेक्नोलॉजी-आधारित टैक्स एडमिनिस्ट्रेशन की ओर ले जा रहे हैं।

इसके अलावा सरकार ने एमएसएमई के लिए ‘छोटी कंपनियों’ की परिभाषा बढ़ाकर टर्नओवर 100 करोड़ तक कर दिया है। इससे हजारों कंपनियों के लिए कंप्लायंस का बोझ और उससे जुड़ी लागत कम होगी। भारत सरकार ने भारतीय बीमा कंपनियों में 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति दी है। इससे बीमा कवरेज और नागरिकों की सुरक्षा को बढ़ावा मिलेगा। प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ-साथ, लोगों को बेहतर बीमा विकल्प मिलेंगे।

भारत सरकार ने लेबर सुधारों में 29 पुराने कानूनों को चार नए कोड में समाहित किया। भारत ने एक ऐसा लेबर फ्रेमवर्क बनाया है जो कर्मचारियों के हितों की रक्षा करता है और साथ ही बिजनेस इकोसिस्टम को भी बढ़ावा देता है। ये सुधार सही वेतन, समय पर वेतन भुगतान, बेहतर औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और सुरक्षित कार्यस्थलों पर केंद्रित हैं। ये वर्कफोर्स में महिलाओं की ज्यादा भागीदारी सुनिश्चित करते हैं। संविदा श्रमिकों सहित असंगठित श्रमिकों को ESIC और EPFO के अंतर्गत लाया गया है, जिससे औपचारिक वर्कफोर्स का दायरा बढ़ा है।

इस साल सबसे महत्वपूर्ण कदम रहा न्यूक्लियर एनर्जी में SHANTI एक्ट से प्राइवेट भागीदारी को खोलने का। SHANTI एक्ट भारत की क्लीन-एनर्जी और टेक्नोलॉजी के सफर में एक बड़ा बदलाव लाने वाला कदम है। न्यूक्लियर साइंस और टेक्नोलॉजी के सुरक्षित, पक्के और जवाबदेह विस्तार के लिए एक मजबूत ढाँचा सुनिश्चित करता है। भारत को AI युग की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद करता है, जैसे डेटा सेंटर, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग, ग्रीन हाइड्रोजन और हाई-टेक्नोलॉजी इंडस्ट्रीज को पावर देना। इन सबसे ज्यादा रोजगार और ग्रोथ होगी।

मोदी सरकार ने विकसित भारत- G RAM G एक्ट, 2025 रोजगार गारंटी फ्रेमवर्क रोजगार गारंटी को 100 से बढ़ाकर 125 दिन कर दिया है। इससे गाँव के इंफ्रास्ट्रक्चर और आजीविका को मजबूत करने की दिशा में खर्च बढ़ेगा। इसका मकसद ग्रामीण काम को ज्यादा इनकम और बेहतर एसेट्स सुनिश्चित करने का जरिया बनाना है।

शिक्षा के क्षेत्र में देखें तो इस साल मोदी सरकार ने शिक्षा में सिंगल रेगुलेटर का प्रस्ताव रखा है। इसके तरह UGC, AICTE, NCTE जैसी कई ओवरलैपिंग बॉडीज को ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान’ (Viksit Bharat Shiksha Adhishthan) से बदल दिया जाएगा। इस कदम से देश में इंस्टीट्यूशनल ऑटोनॉमी को मजबूत किया जाएगा, साथ ही इनोवेशन और रिसर्च को बढ़ावा दिया जाएगा।

विकसित भारत की ओर बढ़ती राष्ट्र की यात्रा

साल 2025 ने साबित किया कि भारत वैश्विक चुनौतियों के बीच भी अपनी राह खुद बनाने में सक्षम है। उच्च विकास, कम महँगाई, घटती बेरोजगारी और मजबूत निर्यात ने अर्थव्यवस्था को नई ताकत दी। सुधारों ने नींव मजबूत की। 2047 के विकसित भारत के सपने को साकार करने की दिशा में यह वर्ष मील का पत्थर है। आने वाले वर्षों में सुधारों की यह गति जारी रहेगी, क्योंकि भारत की उड़ान अब रुकने वाली नहीं।

काशी, मथुरा, मदुरै… साल 2025 में हिंदुओं की लड़ाई जारी, अदालतों में न्याय मिलने की जगह मिला सिर्फ स्टे ऑर्डर: जानें- किस तरह की कानूनी लड़ाई लड़ रहे सनातनी

2025 में धार्मिक झगड़े एक बार फिर भारत के न्याय सिस्टम में सबसे आगे रहे। मंदिर-मस्जिद झगड़ों से लेकर प्रशासन और राज्य के दखल के सवाल भी कोर्ट के चौखट तक गए। देश भर की अदालतों को बार-बार उन मामलों पर फैसला सुनाने के लिए कहा गया, जहाँ आस्था, कानून, इतिहास और पब्लिक ऑर्डर एक-दूसरे से जुड़े थे। हालाँकि इस साल इन मामलों में न्याय की सक्रियता के बावजूद बहुत कम फैसले सामने आए।

ज्यादातर हाई-प्रोफाइल झगड़ों पर अंतरिम रोक, यथास्थिति बनाए रखने के आदेश, कोर्ट द्वारा बनाई गई कमेटियों और प्रक्रिया में देरी की वजह से होल्डिंग पैटर्न में डाल दिया गया। अंतिम फैसला न देकर अदालतों ने अशांति को रोकने को प्राथमिकता दी। इसकी वजह से समाधान असल में टल गया।

साल 2025 न्यायिक बंद होने से नहीं बल्कि न्यायिक सावधानी से तय हुआ, जैसा कि वाराणसी में ज्ञानवापी कॉम्प्लेक्स, मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि विवाद, मदुरै के कार्तिगई दीपम विवाद और मध्य प्रदेश में भोजशाला विवाद से पता चलता है। ये मामले धार्मिक झगड़ों को कानूनी तौर पर आखिरी फैसला देने के बजाय अंतरिम कंट्रोल के जरिए मैनेज करने के एक जैसे पैटर्न को दिखाते हैं।

आखिर धार्मिक विवाद के मामले कैसे और क्यों अनसुलझे रह गए? 2025 के आखिर में हर विवाद की क्या स्थिति थी और यह लंबी कानूनी उलझन भारत में धार्मिक मुकदमों के भविष्य के लिए क्या संकेत देती है।

अंतरिम आदेशों का साल, फैसलों का नहीं

2025 में धार्मिक झगड़ों में एक बात आम थी कि आखिरी फैसले के बजाय अंतरिम तरीकों पर लगातार भरोसा किया गया। मालिकाना हक, पूजा के अधिकार या ऐतिहासिक दावों के सवालों को सुलझाने के बजाय, अदालतों ने बार-बार कुछ समय के लिए कानूनी तरीकों से कार्रवाई रोकने का विकल्प चुना।

कोर्ट ने कई मामलों में सर्वे, निरीक्षण या निर्माण से जुड़े कामों को रोकने के लिए कुछ समय के लिए रोक लगाई । यथास्थिति बनाए रखने का आदेश आम तरीका बन गया। कुछ मामलों- जैसे बांके बिहारी मंदिर विवाद में, अदालतों ने रोजमर्रा के कामों को मैनेज करने के लिए कमेटियाँ बनाईं, जिससे असल में जरूरी फैसले टाल दिए गए।

इस तरह के न्यायिक तरीके की वजह हिंसा और तनाव पैदा होने का खतरा था। कई झगड़ों में सांप्रदायिक तनाव पैदा होने की बात सामने आई। इसको देखते हुए अदालतें ऐसे फैसले देने से सतर्क दिखीं, जो स्थिति को खराब कर सकते हैं। इसके अलावा ये झगड़े राजनीतिक रूप से बहुत ज्यादा संवेदनशील थे। मंदिर-मस्जिद विवाद हो या उसके प्रशासन से जुड़ा कोई मसला, इसके फैसले से राजनीतिक लामबंदी, धरना प्रदर्शन और फैसले पर सवाल उठने का खतरा बना रहता है।

अदालतों को पता है कि वे राजनीतिक रूप से संवेदनशील माहौल में काम कर रहे थे। आखिरकार, जज संवैधानिक रूप से मुश्किल रास्ते पर चल रहे थे। पूजा की जगहें (स्पेशल प्रोविज़न) एक्ट, 1991 में धार्मिक आजादी, सेक्युलरिज़्म और ऐतिहासिक दावों से जुड़े सवाल संवैधानिक तौर पर मुश्किलें पेश करते हैं। अदालतें मिसाल कायम करने के बजाए, फैसला देने में सावधान दिखीं।

पूरे साल लगातार न्यायालय की सुनवाई के बावजूद, 2025 में कोई भी बड़ा धार्मिक विवाद पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ। हर केस अलग-अलग प्रक्रिया के स्टेज पर लटका हुआ है।

ज्ञानवापी–काशी विश्वनाथ मंदिर विवाद, वाराणसी

2025 में ज्ञानवापी विवाद में कानूनी कार्यवाही जारी रही, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के आदेशों पर रोक लगाई, जबकि वाराणसी कोर्ट ने 1991 के मूल मुकदमे को ट्रांसफर करने की याचिका खारिज की और ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) सर्वेक्षण पर सुनवाई जारी रही। इसमें व्यास जी के तहखाने की छत की मरम्मत और सुरक्षित रखने की माँग पर बहस हुई, साथ ही अवैध धन उगाही और धार्मिक स्थलों पर नमाजियों की संख्या जैसे विवाद भी सामने आए, लेकिन कोई बड़ा अंतिम फैसला नहीं आया, मामला कोर्ट में अटका रहा।

इससे पहले जनवरी 2024 में कोर्ट ने आदेश दिया कि ज्ञानवापी कॉम्प्लेक्स के बेसमेंट में पूजा की इजाजत देने के लिए इंतजाम किए जाएँ। 1991 के असली मुकदमे की मेंटेनेबिलिटी को पहले 2022 में बरकरार रखा गया था।

यह मामला 1991 में देवता आदि विश्वेश्वर की ओर से दायर एक मुकदमे से शुरू हुआ था, जिसमें दावा किया गया था कि मस्जिद काशी विश्वनाथ मंदिर की जगह पर बनाई गई थी।

2021 में, पाँच हिंदू महिलाओं ने वाराणसी सिविल कोर्ट में एक अलग मुकदमा दायर करके मस्जिद कॉम्प्लेक्स के अंदर मौजूद मूर्तियों की पूजा करने की इजाजत माँगी थी।

शाही जामा मस्जिद-हरिहर मंदिर, संभल

यह विवाद तब शुरू हुआ जब संभल के एक सिविल कोर्ट ने नवंबर 2024 में शाही जामा मस्जिद की जगह के सर्वे की इजाज़त दी। हिंदुओं का दावा था कि मस्जिद कल्कि को समर्पित हरिहर मंदिर की जगह पर है। मस्जिद की मैनेजमेंट कमिटी सर्वे के ऑर्डर को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुँची। जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद के पास एक कुएं से जुड़े म्युनिसिपल नोटिस पर रोक लगा दी और स्टेटस रिपोर्ट माँगी।

अगस्त 2025 में कोर्ट ने यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया और हिंदू याचिकाकर्ता को नोटिस जारी किया। यथास्थिति के ऑर्डर को बाद में फिर बढ़ा दिया गया। साइट पर किसी भी सर्वे या बदलाव पर रोक लगा दी गई। यह पूरा मामला अदालती कार्यवाही और तनावपूर्ण माहौल के बीच फँसा रहा, जिसमें कई नई याचिकाएं दायर हुईं और कोर्ट में मामला लंबित है।

मदुरै कार्तिगई दीपम लैंप विवाद (तमिलनाडु)

यह विवाद इस बात पर है कि क्या हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर पारंपरिक कार्तिगई दीपम जला सकते हैं, जहाँ भगवान मुरुगन मंदिर और दरगाह दोनों हैं। हिंदू भक्तों का कहना है कि पहाड़ी की चोटी पर दीया जलाना एक जरूरी और लंबे समय से चली आ रही धार्मिक प्रथा है, और राज्य और HR&CE डिपार्टमेंट ने कानून और व्यवस्था का हवाला देते हुए इसे बार-बार रोका है। दिसंबर 2025 में मद्रास हाई कोर्ट ने थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी पर पुराने दीपाथून खंभे पर कार्तिगई दीपम जलाने की इजाजत माँगने वाली याचिका को मंजूरी दे दी।

जस्टिस जी आर स्वामीनाथन ने सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर मैनेजमेंट को 3 दिसंबर को त्योहार के दिन पुराने दीपाथून खंभे पर कार्तिगई दीपम दीया जलाने का इंतजाम करने की इजाजत दी और निर्देश दिया। तमिलनाडु सरकार ने परंपरा और कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए आदेश का विरोध किया।

त्योहार के दिन विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया और झड़पें हुई। इसके बाद सेंट्रल सिक्योरिटी फोर्स को पूरे इलाके में तैनात कर दिया गया। हाई कोर्ट ने बाद में अपने निर्देशों को लागू करने में कथित नाकामी के लिए राज्य के अधिकारियों को नोटिस जारी किया। तमिलनाडु सरकार ने हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और मामला अभी भी पेंडिंग है।

बांके बिहारी मंदिर मैनेजमेंट विवाद (वृंदावन)

यह विवाद ऐतिहासिक बांके बिहारी मंदिर के कंट्रोल और एडमिनिस्ट्रेशन को लेकर है, जिसे पारंपरिक रूप से सेवायत परिवार मैनेज करते आए हैं। अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने रोजमर्रा के कामकाज और श्रद्धालुओं की संख्या को देखते हुए एक ताकतवर मंदिर मैनेजमेंट कमेटी बनाई थी।

यह कमेटी उत्तर प्रदेश के एक ऑर्डिनेंस की संवैधानिक वैधता पर फैसला आने तक बनाई गई थी, जिसने मंदिर एडमिनिस्ट्रेशन को एक कानूनी ट्रस्ट के तहत ला दिया था। दिसंबर 2025 में मंदिर की मैनेजमेंट कमेटी और एक सेवायत ने कोर्ट द्वारा बनाई गई कमेटी के दायरे और अधिकार पर सवाल उठाते हुए एक नई याचिका दायर की। फिलहाल यह मामला 2026 की शुरुआत में आगे की सुनवाई के लिए लिस्टेड है।

अजमेर शरीफ दरगाह गिराने का मामला

दिसंबर 2025 में दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रभावित पक्षों को सुनवाई का मौका दिए बिना अजमेर शरीफ दरगाह कॉम्प्लेक्स के अंदर के स्ट्रक्चर गिराने से केंद्र सरकार को रोक दिया था। यह अंतरिम आदेश दरगाह के एक खादिम की अर्जी पर दिया गया था, जिसमें मिनिस्ट्री ऑफ़ माइनॉरिटी अफेयर्स के कथित अतिक्रमण हटाने के नोटिस को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने नेचुरल जस्टिस के सिद्धांतों का पालन करने पर ज़ोर दिया और केंद्र को दरगाह ख्वाजा साहिब एक्ट, 1955 के तहत दरगाह कमेटी बनाने में तेजी लाने का भी निर्देश दिया। मामला अभी भी पेंडिंग है।

2026 का स्वागत ऐसे ही बड़े धार्मिक झगड़ों के अनसुलझे सवालों से होगा। 2025 में ज्यादातर मामलों में अंतिम फैसले को टाला गया और अंतरिम फैसले से काम चलाया गया। हालाँकि इस सावधानी भरे तरीके से शायद तुरंत अशांति को रोका जा सका हो, लेकिन इसने यह भी पक्का किया कि इतिहास, अधिकारों और संवैधानिक व्याख्या के बुनियादी सवालों को टाल दिया गया। जैसे-जैसे ये झगड़े 2026 में आगे बढ़ेंगे, न्यायपालिका के सामने चुनौती यह होगी कि क्या लगातार रोक संवैधानिक स्पष्टता की जगह ले सकती है या निर्णायक समाधान आखिरकार जरूरी हो जाएगा।

(यह मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

$1=14 लाख रियाल, 42% महँगाई दर और सड़कों पर हजारों Gen Z: मुल्लाओं को हटाने तक पहुँचा ईरान का ‘आर्थिक आंदोलन’, जानें- क्यों प्रदर्शनकारियों के समर्थन में खड़ा है अमेरिका

ईरान में आर्थिक संकट के चलते बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन जारी है। तेहरान से शुरू हुए ये प्रदर्शन कई शहरों में फैल चुके हैं। लोगों के बीच ईरानी मुद्रा ‘रियाल’ का डॉलर के मुकाबले में रिकॉर्ड गिरावट और 42 प्रतिशत पहुँची महँगाई को लेकर गुस्सा है। लोग सड़कों पर उतरकर ईरान के इस्लामी रिजीम का विरोध कर रहे हैं, इनमें बड़ी संख्या में Gen Z छात्र-छात्राएँ भी शामिल हैं।

सबसे पहले 28 दिसंबर 2025 को तेहरान के ग्रैंड बाजार के दुकानदारों और व्यापारियों ने विरोध शुरू किया। विरोध में दुकानें बंद रखी गईं। इसके बाद विरोध तेहरान, इस्फहान, शिराज, मशहद, हमेदान और तमाम शहरों तक फैल गया। तीन दिन से जारी प्रदर्शन के कुछ वीडियो सामने आ रहे हैं, जिसमें लोग सड़कों पर उतरकर नारे लगा रहे हैं- ‘मुल्लाओं को ईरान छोड़ना होगा’, ‘आजादी-ए-आजादी’ और ‘तानाशाही का अंत हो।’

प्रदर्शनों पर ईरान की सरकार ने कहा कि वह बातचीत के लिए तैयार है। राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने गृह मंत्री को प्रतिनिधियों से बातचीत करने का निर्देश दिया। साथ ही राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने ईरान के केंद्रीय बैंक के गवर्नर मोहम्मदरेजा फरजिन का इस्तीफा भी स्वीकार कर लिया और उनकी जगह पूर्व अर्थव्यवस्था एवं वित्त मंत्री अब्दोलनासेर हेम्मती को नियुक्त किया गया है।

विरोध प्रदर्शन में Gen Z छात्रों की भागीदारी

इन प्रदर्शनों में जेन जी छात्र देशभर के 10 प्रमुख विश्वविद्यालयों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, जिनमें तेहरान की 7 सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी शामिल हैं। इल्ना और सरकारी समाचार एजेंसी IRNA के मुताबिक, मध्य शहर इस्फहान के टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी के साथ ही यज्द और जंजन जैसे शहरों के संस्थानों में भी विरोध प्रदर्शन हुए।

तेहरान के अमीरकबीर यूनिवर्सिटी, ख्वाजे नसीर और बाकी कैंपसों में छात्रों ने हड़ताल, भूख हड़ताल और कैंटीन के घटिया भोजन को सड़क पर फेंककर विरोध जताया। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में पुलिस की आँसू गैस, फायरिंग और गिरफ्तारियों की कार्रवाई भी सामने आई हैं, फिर भी छात्र डटकर प्रदर्शन जारी रखे हुए हैं।

अमीरकबीर यूनिवर्सिटी के पास IRGC के बसिज बलों ने छात्रों पर हमला किया, जिसमें एक छात्र गंभीर रूप से घायल हो गया और कई को गिरफ्तार किया गया। जेन जी की यह भागीदारी साल 2022 के महसा अमीनी प्रदर्शनों की याद दिलाती है और आंदोलन को नई ताकत दे रही है।

ईरान में आर्थिक उथल-पुथल

ईरान में ये प्रदर्शन देश में जारी आर्थिक संकट को लेकर हो रहे हैं। यह संकट ईरानी मुद्रा ‘रियाल’ की भारी गिरावट से शुरू हुआ, जो आम लोगों की जिंदगी को मुश्किल बना रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों, खराब सरकारी नीतियों और वैश्विक दबाव से अर्थव्यवस्था चरमरा गई, जिससे महँगाई आसमान छूने लगी और लोग सड़कों पर उतर आए।

यूँ तो ईरान की मुद्रा रियाल अमेरिकी डॉलर के मुकाबले पहले ही कमजोर थी, लेकिन दिसंबर 2025 में यह ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुँच गई- एक अमेरिकी डॉलर के बदले 14 लाख रियाल। पहले जहाँ एक डॉलर से 50-60 हजार रियाल मिलते थे, अब लाखों रियाल चाहिए। इससे आयात होने वाले सामान जैसे तेल, दवा, अनाज महँगे हो गए। ईरान वैसे भी तेल बेचकर कमाई करता है, लेकिन प्रतिबंध से डॉलर नहीं मिल पाते इसीलिए रिजर्व खत्म हो गए।

देश में महँगाई दर 42 प्रतिशत तक बढ़ गई, यानी पिछले साल की तुलना में चीजें औसतन 42 प्रतिशत महँगी हो गईं। उदाहरण के लिए रोटी, दूध, सब्जी की कीमतें 72 प्रतिशत तक उछल गईं। एक आम परिवार जो पहले एक लाख में गुजारा कर लेता था, अब 2 से 3 लाख भी कम पड़ जाते हैं। इतना सब होने के बाद केंद्रीय बैंक प्रमुख ने इस्तीफा दे दिया क्योंकि वे मुद्रा स्थिर नहीं कर पाए।

इस्लामी शासन से परेशान ईरान

ईरान में जारी प्रदर्शनों में शामिल लोग इस्लामिक रिजीम यानी सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के नेतृत्व वाली इस्लामी सरकार के खिलाफ हैं, जो 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से चली आ रही है। शुरू में आर्थिक गुस्सा था, लेकिन अब लोग तानाशाही शासन के खिलाफ विद्रोह बना चुके हैं, जहाँ ‘मुल्लाओं को ईरान छोड़ना होगा’ जैसे नारे गूँज रहे हैं।

प्रदर्शनकारी इन्हें ‘मुल्ला तानाशाह’ कहकर कोस रहे हैं, क्योंकि देश का पैसा सैन्य हथियारों, प्रॉक्सी युद्दों (जैसे हिजबुल्लाह, हूती) पर खर्च किया जा रहा है, बजाए जनता की भलाई पर। देश में खासकर महिलाओं के हिजाब कानून और सख्त इस्लामी नियमों से तंग आ चुके हैं।

तेहरान के विश्वविद्यालयों में छात्र ‘इस्लामिक रिपब्लिक मुर्दाबाद’ चिल्ला रहे हैं और धार्मिक प्रतीकों को निशाना बना रहे हैं। व्यापारी भी कह रहे हैं कि रिजीम की नीतियों से अर्थव्यवस्था बर्बाद हुई, न कि अमेरिकी सैंक्शंस से। यह 1979 क्रांति के खिलाफ पहला बड़ा विद्रोह लगता है, जहाँ लोग धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की माँग कर रहे हैं।

ईरान में प्रदर्शन पर अमेरिका का बयान और भूमिका

ईरान में इस्लामी शासन के विरोध में जारी प्रदर्शनों पर अमेरिका ने खुलकर समर्थन जताया है। खासकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रदर्शनकारियों को प्रोत्साहित किया और इस्लामी शासन की आलोचना की। ट्रंप ने ईरान की अर्थव्यवस्था को ‘टूट चुकी’ बताया और कहा कि सरकार हर विरोध को दबाने के लिए लोगों पर गोली चलाती है।

29 दिसंबर 2025 को मार-ए-लागो में इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस में डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, “ईरान में जब भी दंगे होते हैं या कोई समूह बनता है। वे लोगों पर गोली चला देते हैं। वे लोगों को मार देते हैं।” उन्होंने इस्लामी रिजीम को ‘क्रूर’ करार दिया और कहा कि देश में सालों से असंतोष है, लेकिन रिग चेंज की सीधी माँग नहीं की। ट्रंप ने मुद्रा ‘रियाल’ की गिरावट और महँगाई पर फोकस किया।

UN राजदूत माइक वॉल्टज ने एक्स पर लिखा, “ईरान के लोग आजादी चाहते हैं। हम तेहरान और पूरे देश में प्रदर्शनकारियों के साथ खड़े हैं।” वहीं अमेरिकी सरकार के फारसी अकाउंट ने कहा कि वाशिंगटन ईरानी लोगों की आवाज को सुनने का समर्थन करता है और रिजीम से भी मौलिक अधिकारों का सम्मान करने को कहा। साथ ही इस्लामी शासन की प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई की भी निंदा की। ये बयान प्रदर्शन के तेज करने में सहायक साबित हुए।

बता दें कि ट्रंप प्रशासन ने ईरान पर सैंक्शंस बढ़ाए हैं, जो आर्थिक संकट की जड़ हैं। लेकिन प्रदर्शनों पर अप्रत्यक्ष समर्थन देकर दबाव बनाया। ईरानी की इस्लामी सरकार ने इन बयानों को हस्तक्षेप बताया है, जबकि राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने बातचीत का संकेत दिया है।

रक्षा मंत्रालय की ₹4666 करोड़ की मेगा डिफेंस डील: 4 लाख स्वदेशी CQB कार्बाइन और ‘ब्लैक शार्क’ टॉरपीडो से लैस होगी सेना, जानें कैसे बढ़ेगी भारत की ताकत

भारतीय रक्षा मंत्रालय ने साल 2025 के जाते-जाते देश की सुरक्षा को अभेद्य बनाने के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। मंगलवार (30 दिसंबर 2025) को सरकार ने कुल 4,666 करोड़ रुपए के दो बड़े रक्षा समझौतों पर मुहर लगाई। इस डील के तहत सेना और नौसेना को 4.25 लाख से ज्यादा नई ‘कार्बाइन’ बंदूकें और समंदर की गहराई में तबाही मचाने वाले 48 ‘हैवी वेट टॉरपीडो’ मिलेंगे।

यह कदम न केवल हमारी सैन्य ताकत को कई गुना बढ़ा देगा, बल्कि ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के सपने को भी हकीकत में बदलेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि अब हमारे जवान पुराने हथियारों को छोड़, आधुनिक स्वदेशी तकनीक से लैस होकर सरहदों की रक्षा करेंगे।

क्या हैं ये हथियार और कैसे करते हैं काम?

जब हम सेना की ताकत की बात करते हैं, तो ये दोनों हथियार युद्ध के मैदान में पासा पलटने का दम रखते हैं। सबसे पहले बात करते हैं CQB कार्बाइन की, जो असल में एक छोटी और बहुत हल्की ऑटोमेटिक बंदूक है। इसे खास तौर पर उन मौकों के लिए बनाया गया है जब दुश्मन बहुत करीब हो, जैसे कि किसी घर के अंदर छिपे आतंकियों से मुकाबला करना हो या घने जंगलों में आमने-सामने की मुठभेड़ हो।

इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह बहुत छोटी होने के कारण तंग जगहों पर आसानी से घुमाई जा सकती है और पलक झपकते ही ढेर सारी गोलियाँ बरसा देती है, जिससे दुश्मन को संभलने या छिपने का मौका ही नहीं मिलता।

वहीं दूसरी ओर, हैवी वेट टॉरपीडो को आप आसान शब्दों में ‘पानी के नीचे चलने वाली मिसाइल’ कह सकते हैं। ये आकार में बहुत बड़े और बेहद शक्तिशाली होते हैं, जिन्हें हमारी पनडुब्बियों (Submarines) के जरिए समंदर की गहराई से छोड़ा जाता है।

इनका मुख्य काम पानी की सतह पर तैर रहे दुश्मन के बड़े युद्धपोतों या पानी के नीचे छिपी उनकी पनडुब्बियों को ढूँढ निकालना और उन्हें सीधा निशाना बनाकर तबाह करना है। इनके आने से समंदर के अंदर हमारी मारक क्षमता और भी ज्यादा घातक हो जाएगी।

स्वदेशी गन से लैस होंगे जवान, ‘मेक इन इंडिया’ को मिलेगा बढ़ावा

भारतीय थल सेना और नौसेना को और भी आधुनिक बनाने के लिए सरकार 2,770 करोड़ रुपए खर्च कर रही है। इस भारी-भरकम बजट से 4.25 लाख से भी ज्यादा नई कार्बाइन बंदूकें खरीदी जाएँगी।

सबसे अच्छी बात यह है कि यह पूरा सौदा विदेशी कंपनियों के बजाय भारत की अपनी कंपनियों, जैसे भारत फोर्ज और PLR सिस्टम्स (अडानी डिफेंस और इजरायल की कंपनी का साझा प्रयास) के साथ हुआ है। इससे देश का पैसा देश में ही रहेगा और हमारी सेना को बेहतरीन हथियार मिलेंगे।

इन नई बंदूकों के आने से हमारे जवानों को बहुत बड़ा फायदा होगा। दरअसल, अभी तक हमारे सैनिक पुराने समय के भारी-भरकम हथियारों का इस्तेमाल कर रहे थे, जिन्हें ढोना और इस्तेमाल करना थोड़ा मुश्किल होता था। लेकिन ये नई कार्बाइन वजन में काफी हल्की हैं और चलाने में भी बहुत आसान हैं, जिससे युद्ध या मुठभेड़ के समय जवान और भी फुर्ती से दुश्मन का मुकाबला कर सकेंगे।

यह पूरी डील ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है। इन बंदूकों का लगभग 60% हिस्सा भारत फोर्ज कंपनी खुद बनाएगी। इसका सीधा मतलब यह है कि अब हमें हथियारों के लिए दूसरे देशों का मुँह नहीं ताकना पड़ेगा।

साथ ही, भारत में इनका निर्माण होने से हजारों लोगों के लिए नौकरी के नए रास्ते भी खुलेंगे। अगले 5 सालों के भीतर ये आधुनिक बंदूकें हमारे जांबाज सिपाहियों के हाथों में पहुँच जाएँगी, जिससे उनकी ताकत कई गुना बढ़ जाएगी।

दुश्मन के लिए काल बनेंगे ‘ब्लैक शार्क’

भारतीय नौसेना की मारक क्षमता को और भी घातक बनाने के लिए सरकार ने इटली की कंपनी (WASS) के साथ 1,896 करोड़ रुपए का एक बड़ा समझौता किया है। इस डील के जरिए भारत को 48 ‘ब्लैक शार्क’ टॉरपीडो मिलेंगे, जो अपनी रफ्तार और अचूक निशाने के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। ये टॉरपीडो हमारी नौसेना की उन 6 आधुनिक ‘कलवरी क्लास’ (स्कॉर्पीन) पनडुब्बियों में लगाए जाएँगे, जिन्हें पूरी शान से मुंबई के मझगाँव डॉक में तैयार किया गया है।

इन टॉरपीडो की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इनमें दुनिया के सबसे आधुनिक सेंसर लगे हुए हैं, जो दुश्मन की लोकेशन को तुरंत पकड़ लेते हैं। इनकी रफ्तार इतनी तेज है कि एक बार दागे जाने के बाद दुश्मन को बचने या भागने का मौका भी नहीं मिलता।

इन टॉरपीडो की डिलीवरी साल 2028 से शुरू होगी और 2030 तक सभी 48 टॉरपीडो भारत पहुँच जाएँगे। इनके आने के बाद हिंद महासागर में भारत की पकड़ और भी मजबूत हो जाएगी और दुश्मन की कोई भी पनडुब्बी हमारी सीमा में घुसने की हिम्मत नहीं कर पाएगी।

क्यों खास है यह समझौता और भारत को क्या फायदे होंगे?

इस रक्षा सौदे से भारत को तीन बड़े और सीधे फायदे होने वाले हैं। सबसे पहली बात तो यह है कि अब सेना से पुरानी तकनीक की छुट्टी हो जाएगी। हमारे जवान काफी समय से उन हथियारों का इस्तेमाल कर रहे थे जो अब पुराने पड़ चुके थे। इस डील के बाद हमारे सैनिकों के पास दुनिया के सबसे आधुनिक और खतरनाक हथियार होंगे, जिससे युद्ध के मैदान में उनकी ताकत और सुरक्षा दोनों बढ़ जाएगी।

दूसरा बड़ा फायदा यह है कि इससे देश की प्राइवेट कंपनियों को बहुत मजबूती मिलेगी। यह पहली बार है जब इतनी बड़ी संख्या में हथियार बनाने का काम भारत की निजी कंपनियों को सौंपा गया है। इसका असर सिर्फ बड़ी कंपनियों तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश की छोटी-छोटी कंपनियों (MSMEs) को भी हथियारों के कल-पुर्जे बनाने का ऑर्डर मिलेगा। इससे न केवल स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि देश के युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी खुलेंगे।

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण फायदा देश की आर्थिक मजबूती से जुड़ा है। रक्षा मंत्रालय ने इस साल (2025-26) में अब तक 1.82 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा के हथियारों का सौदा किया है। इस भारी-भरकम रकम का एक बहुत बड़ा हिस्सा विदेशी कंपनियों के पास जाने के बजाय भारत की अपनी कंपनियों की जेब में जा रहा है। इसका सीधा मतलब यह है कि देश का पैसा देश के अंदर ही रहेगा, जिससे हमारी अर्थव्यवस्था और भी मजबूत होगी और हम रक्षा के क्षेत्र में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनने की ओर बढ़ेंगे।

‘देश बचाना है तो बंगाल को बचाना होगा’: BJP नेता बीएल संतोष के बयान के मायने, क्या वाकई राजनीतिक से बढ़कर सभ्यतागत है पश्चिम बंगाल की लड़ाई?

बंगाल से लगातार हो रहे घुसपैठ और उसकी वजह से हो रहा डेमोग्राफी बदलाव देश के लिए खतरनाक है। बंगाल की संस्कृति और उसकी पहचान को इससे खतरा पैदा हो गया है। राजनीतिक संरक्षण में हो रहा ये घुसपैठ बंगाल चुनाव के लिए ही अहम नहीं है, बल्कि इससे देश की सुरक्षा, संप्रभुत्ता जुड़ी हुई है। इसलिए बीजेपी नेता बीएल संतोष ने देश को बचाने के लिए बंगाल चुनाव को जीतने पर बल दिया है।

क्या कहा बीजेपी नेता बीएल संतोष ने?

बीजेपी नेता बीएल संतोष ने कहा है कि हमारे लिए बंगाल सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि एक सभ्यता को बचाने की लड़ाई है। उनका मानना है कि भारत को बचाने के लिए बंगाल को बचाना जरूरी है। उन्होंने आगे कहा कि बंगाल में डेमोग्राफी बदलावों को रोकना और हर हाल में सरकार बनाना उनका लक्ष्य है, जिसे वे भारत के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं।

सभ्यता बचाने की लड़ाई है बंगाल चुनाव

बीजेपी नेता बीएल संतोष बंगाल चुनाव को सियासी लड़ाई से बढ़कर बंगाल की संस्कृति और पहचान को बचाने की लड़ाई से जोडकर देखते हैं। बंगाल में लगातार हिन्दुओं का पलायन हो रहा है। यहाँ कट्टरपंथियों द्वारा हिन्दु त्यौहारों का कई बार विरोध किया गया। कई बार दुर्गापूजा विसर्जन और मुहर्रम के जुलूस एक दिन होने पर विसर्जन की तारीख बदल दी गई।

प्रशासन ने दुर्गापूजा उत्सव को कैंसिल कर दिया। यही हाल राम नवमी जुलूस पर भी रहा। कई जगहों पर हिंसा और झड़पें हुई। होली- दिवाली जैसे पर्व मनाने के दौरान भी कई बार विवाद हुए। मार्च 2025 में बसंत उत्सव के दौरान शांतिनिकेतन के सोनाझुरी हाट में पर्यावरण संरक्षण का हवाला देते हुए होली समारोह पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इस पर काफी बवाल भी हुआ।

राज्य में बढ़ रहे घुसपैठिए और डेमोग्राफी बदल रहा है

बंगाल में 2011 की जनगणना के मुताबिक, पूरे देश में हिन्दू आबादी घटी है। ये करीब 0.7 फीसदी कम हुई है जबकि पश्चिम बंगाल में हिन्दू आबादी 1.94 फीसदी घटी है। यहाँ मुस्लिम आबादी में 0.8 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। ये तो 2011 के आंकड़े हैं। इससे पता चलता है कि राज्य में मुस्लिम की तुलना में हिन्दुओं की संख्या तेजी से घट रही है। इस बीच लगातार घुसपैठ बढ़ी है।

ये घुसपैठिए बंगाल के गाँव में घुस कर अपनी पैठ जमा लेते हैं। धीरे धीरे टीएमसी के संरक्षण में पहचान पत्र प्राप्त कर लेते हैं और भारत का नागरिक बन जाते हैं। यही वजह है कि बंगाल में 2001 में मुस्लिम आबादी 25 फीसदी थी, जो 2011 में बढ़कर 27 फीसदी के पार जा चुकी थी। बंगाल की 9.5 करोड़ की आबादी में करीब 2.5 करोड़ मुस्लिम हैं। ये दर्शाता है कि घुसपैठ कितना बड़ा सिरदर्द है।

दरअसल पश्चिम बंगाल में एक घुसपैठिए एक वोटर की तरह है। बांग्ला भाषी होने की वजह से गाँव गाँव में फैले होते हैं। ये लोग पूरे बंगाल में मौजूद हैं, लेकिन बांग्लादेश से सटे मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर जैसे इलाकों में इनकी संख्या 50 फीसदी तक पहुँच चुकी है। इसके अलावा उत्तर 24 परगना और दक्षिण 24 परगना क्षेत्र में इसकी संख्या और ज्यादा है।

मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद का शिलान्यास कर चुके पूर्व टीएमसी विधायक हुमायूँ कबीर के मुताबिक मुर्शिदाबाद में 70 फीसदी मुस्लिम आबादी है। इससे अंदाज लगाया जा सकता है कि बंगाल में डेमोग्राफी में कितना बदलाव आया है।

यह कोई इत्तफाक से नहीं है, बल्कि राजनीतिक संरक्षण में किया गया एक सुनियोजित और व्यवस्थित बदलाव है। बीजेपी के मुताबिक, 46 विधानसभा क्षेत्रों में, केवल एक दशक के भीतर मतदाताओं की जनसंख्या में 40 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। इनमें से ज्यादातर वे जिले हैं, जो बांग्लादेश से सटे हुए हैं। इससे पता चलता है कि डेमोग्राफी में कितना बदलाव आया है।

डेमोग्राफी बदलावों की वजह से सामाजिक तनाव और ध्रुवीकरण बढ़ा है। हिन्दू परिवारों को पलायन करने पर मजबूर होना पड़ा है। हिन्दुओं पर हमले बढ़े हैं।

बंगाल की पहचान और संस्कृति को खतरा

बंगाल में हिंदू परिवारों का लगातार पलायन हो रहा है और पारंपरिक त्योहारों व सांस्कृतिक रीति रिवाजों पर इसका असर पड़ रहा है। बंगाल की मूल पहचान को खतरा पैदा हो रहा है। हाल ही में मुर्शिदाबाद में पूर्व टीएमसी विधायक ने बाबरी मस्जिद बनाने के लिए शिलान्यास किया है। यहाँ बड़ी संख्या में मुस्लिम पहुँच रहे हैं।

अब सवाल ये उठता है कि बाबर जैसे आक्रांताओं के नाम पर मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद बनाने का क्या औचित्य है। जब राम जन्मभूमि के निर्माण के साथ ही बाबरी मस्जिद का नामोनिशान मिट गया तो फिर बाबर के नाम पर बंगाल में मस्जिद बनाना सामाजिक समरसता को कमजोर ही करता है। मुस्लिम तुष्टिकरण की वजह से ममता सरकार इसे रोक भी नहीं रही है। बल्कि खुद हुमायूँ कबीर ने बताया है कि बंगाल पुलिस उनकी मदद कर रही है।

माना जाता है कि राज्य की 294 सीटों में से 80-100 सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक माने जाते हैं। ऐसे में ममता सरकार लगातार घुसपैठिए को संरक्षण देकर अपना वोट बैंक पुख्ता करने में लगी है। कहा ये भी जाता है कि 2011 और 2016 के चुनाव में ममता बनर्जी की सरकार इस घुसपैठियों के बदौलत सत्ता तक पहुँची। इससे पहले 2006 तक ये वोट बैंक लेफ्ट के साथ था।

बंगाल के घुसपैठ का असर असम, त्रिपुरा से लेकर बाकी पूर्वोत्तर राज्यों में भी पड़ा है। इसलिए असम के सीएम हेमंता बिस्वा सरमा ने कहा है कि घुसपैठियों के बंगाल द्वार को बंद करना देश के लिए बेहद जरूरी है। असम के CM हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा, “यही असली बात है। असम और त्रिपुरा घुसपैठ के खिलाफ लड़ रहे हैं, वहीं बंगाल घुसपैठियों के लिए अपने दरवाज़े खोल रहा है। हमें पश्चिम बंगाल-बांग्लादेश बॉर्डर पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए। होम मिनिस्टर ने एक नेशनल ग्रिड का प्रस्ताव दिया है; हम इसका स्वागत करते हैं।”

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा

बंगाल में घुसपैठ देश की सुरक्षा के लिए भी खतरनाक है। अक्सर घुसपैठिए अवैध कारोबार में संलिप्त होते हैं। अवैध हथियार से लेकर नशे के कारोबार में इनकी भूमिका पाई जाती है। आतंकवाद से लेकर स्थानीय अपराध तक में घुसपैठिए संलिप्त पाए गए। ऐसे में बीजेपी नेता बीएल संतोष ने ठीक ही कहा है कि देश के लिए बंगाल से ममता सरकार का जाना जरूरी है। ये बंगाल की पहचान और संस्कृति के लिए भी जरूरी है।

RSS पर न्यूयॉर्क टाइम्स की ‘फैंटेसी कहानी’, भारत को चलाने वाली ‘सीक्रेट सोसायटी’ बताया: बौद्धिक दिवालियापन है नाजी टैग से डर फैलाने की वामपंथी मीडिया की कोशिश

न्यूयॉर्क टाइम्स ने 26 दिसंबर को ‘From the Shadows to Power: How the Hindu Right Reshaped India’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख को मुजीब मशाल और हरि कुमार ने लिखा है। यह लेख सिर्फ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की आलोचना भर नहीं है बल्कि समाज के लिए काम कर रहे देश के सबसे बड़े हिंदू संगठन को बदनाम करने की साजिश है।

लेख में एक तरह की वैचारिक कहानी गढ़ी गई है जिसमें RSS को एक रहस्यमय, बेहद ताकतवर और तथाकथित ‘फार-राइट’ गुप्त संगठन के रूप में दिखाया गया है। लेख का पूरा चित्रण ऐसा है मानो RSS भारत का कोई गुप्त ‘इल्यूमिनाटी’ हो, जो पर्दे के पीछे से सब कुछ नियंत्रित कर रहा हो। अगर इस लेख या फिर न्यूयॉर्क टाइम्स और अन्य लेफ्ट-लिबरल मीडिया संस्थानों में छपने वाले ऐसे ही दूसरे लेखों पर भरोसा किया जाए, तो ऐसा बताया जाता है कि RSS ने भारत की संस्थाओं में ‘घुसपैठ’ कर ली है और चुपचाप देश के पंथनिरपेक्ष गणराज्य को कमजोर किया जा रहा है।

साभार: न्यूयॉर्क टाइम्स

मसला यह नहीं है कि न्यूयॉर्क टाइम्स या कोई अन्य मीडिया संस्थान RSS की आलोचना करता है। भारत में काम करने वाले और देश की राजनीति को प्रभावित करने वाले संगठनों पर सवाल उठाना उनका अधिकार है। असली समस्या यह है कि यह आलोचना किस तरह की जा रही है।

इन लेखों में इस्तेमाल की गई भाषा बेहद पूर्वाग्रह से भरी हुई है। इतिहास को चुनिंदा तरीके से पेश किया गया है और ठोस सबूतों की जगह इशारों और आरोपों ने ले ली है। इन लेखों की सामग्री एक जानी-पहचानी लेफ्ट-लिबरल सोच को सामने लाती है।

यह वही सोच है, जिसमें हिंदुओं के संगठित होने को ही अपने आप में खतरनाक बताया जाता है। ऐसा दिखाने की कोशिश की जाती है मानो धार्मिक नारे लगाते हुए हिंदू ही खुद को और देश की पंथनिरपेक्ष व्यवस्था को नुकसान पहुँचा रहे हों।

‘फार-राइट’ शब्द का इस्तेमाल, समझाने के लिए नहीं बल्कि ठप्पा लगाने के लिए

न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित लेख में बार-बार RSS को ‘फार-राइट हिंदू राष्ट्रवादी संगठन’ बताया गया है। यह शब्द सीधे तौर पर पश्चिमी राजनीति की शब्दावली से लिया गया है और बिना किसी भारतीय संदर्भ के इस्तेमाल किया गया है। भारत और पश्चिमी देशों में ‘फार-राइट’ की अवधारणा पूरी तरह अलग है।

भारत में RSS न तो कोई राजनीतिक पार्टी है और न ही कोई गुप्त या हिंसक संगठन। यह एक स्वयंसेवक आधारित सांस्कृतिक संगठन है, जो बीते 100 वर्षों से सामाजिक जीवन में काम कर रहा है।

साभार: न्यूयॉर्क टाइम्स

इसके बावजूद लेख में ‘फार-राइट’ शब्द को किसी विश्लेषण की श्रेणी के रूप में नहीं बल्कि पहले से तय निष्कर्ष या एजेंडे की तरह इस्तेमाल किया गया है। जैसे ही पश्चिमी संदर्भ वाला ‘फार-राइट’ का ठप्पा किसी भारतीय संगठन पर लगाया जाता है, लेखक भारतीय सामाजिक वास्तविकताओं को समझने और उनसे जुड़ने की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता है। इसके बाद जन-आंदोलन से लेकर वैचारिक प्रभाव तक हर चीज को अपने आप ‘उग्रवाद’ के रूप में पेश किया जाने लगता है।

‘नाजी’ शब्द बोले बिना नाजी जैसा चित्रण

न्यूयॉर्क टाइम्स के इस लेख में सीधे तौर पर ‘नाजी’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है। न ही RSS की तुलना खुलकर हिटलर या थर्ड राइख से की गई है। यह जानबूझकर किया गया है। इसकी जगह लेख इशारों और जोड़-तोड़ के सहारे पाठकों को एक तय नतीजे तक पहुँचाने की कोशिश करता है। इसके लिए बार-बार फासीवादी दौर की तस्वीरों और संदर्भों का इस्तेमाल किया गया है।

लेख में कहा गया है कि RSS के शुरुआती नेताओं ने 1930 और 1940 के दशक में यूरोप की फासीवादी पार्टियों के राष्ट्रवादी विचारों से प्रेरणा ली थी। साथ ही एमएस गोलवलकर के लेखन का जिक्र करते हुए उसे हिटलर द्वारा यहूदियों के साथ किए गए व्यवहार से जोड़ा गया है। इन ऐतिहासिक संदर्भों की पड़ताल नहीं की गई बल्कि इन्हें इस तरह इस्तेमाल किया गया है कि आज के RSS को यूरोपीय फासीवाद के नैतिक बोझ से जोड़ दिया जाए।

साभार: न्यूयॉर्क टाइम्स

पूरे लेख में इस्तेमाल की गई भाषा भी इसी धारणा को मजबूत करती है। ‘शैडोई कबाल’ (गुप्त साजिश करने वाला गुट), ‘गुप्त संगठन’, ‘अर्धसैनिक अनुशासन’, ‘सुप्रीमेसी’ (श्रेष्ठता), ‘संस्थाओं में घुसपैठ’ जैसे शब्द वही हैं जिन्हें पश्चिमी मीडिया आमतौर पर तानाशाही आंदोलनों के लिए इस्तेमाल करता है।

सीधे आरोप लगाए बिना लेकिन फासीवादी संकेतों से पूरी कहानी भरकर लेख एक तरह का शक पैदा करता है। इस तरीके से लेख लिखने वालों को यह कहने की गुंजाइश मिल जाती है कि उन्होंने कोई सीधा आरोप नहीं लगाया जबकि असल उद्देश्य पूरा हो जाता है। नतीजतन, हिंदुओं के सामाजिक संगठन को ही अपने आप में खतरनाक दिखाने की कोशिश की जाती है।

राजनीतिक संगठन से ‘गुप्त संस्था’ तक का गढ़ा गया सफर

RSS से जुड़े नेता जब राजनीति में आते हैं, तो वे सार्वजनिक मंचों से भाषण देते हैं और अपनी पहचान छिपाते नहीं हैं। RSS से जुड़े लोग खुले तौर पर स्थानीय बैठकों का आयोजन करते हैं और मोहल्लों के पार्कों में रोज शाखाएँ लगाते हैं। यह कोई छुपी हुई गतिविधि नहीं है। इन शाखाओं में कोई भी व्यक्ति आ सकता है, चाहे वह संगठन का सदस्य हो या नहीं।

इसके बावजूद न्यूयॉर्क टाइम्स RSS को बार-बार ‘शेडो’ और ‘सीक्रेट’ संगठन बताता है। लेख में संगठन को निष्पक्ष रूप से देखने या कोई अलग नजरिया रखने की कोशिश नहीं की गई। लेख में दिखाई गई तस्वीर और RSS की वास्तविक स्थिति के बीच का फर्क कहीं भी साफ नहीं किया गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी अपने RSS से जुड़ाव को नहीं छिपाया। वे खुद को संगठन का ‘कार्यकर्ता’ कहते रहे हैं। केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद, न्यायाधीश, अधिकारी और अन्य पेशेवर लोग भी खुले तौर पर संघ से अपने संबंध स्वीकार करते रहे हैं।

फिर भी RSS को भारत की राजनीति और समाज का कोई गुप्त ‘इल्यूमिनाटी’ दिखाया जाता है। जबकि असल में गुप्त संगठन ऐसे नहीं होते, जहाँ सदस्य खुलेआम अपनी पहचान बताते फिरें और सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिस्सा लें। दरअसल, न्यूयॉर्क टाइम्स की असहजता गोपनीयता से नहीं बल्कि संगठन के बड़े आकार से जुड़ी दिखती है।

सबूत के बिना ‘घुसपैठ’ का आरोप

लेख में दावा किया गया है कि RSS ने न्यायपालिका, पुलिस, मीडिया और शिक्षा संस्थानों में ‘घुसपैठ’ कर ली है। यह एक गंभीर आरोप है लेकिन इसके लिए कोई सबूत नहीं दिया गया है। ना कोई दस्तावेज, ना कोई आदेश प्रणाली, ना कोई निर्देश और ना ही कोई वित्तीय कड़ी दिखाई गई है।

इसके बजाय विचारधारा की समानता और संगठनों के आपसी संबंधों को ही साजिश का प्रमाण मान लिया गया है। इसी तर्क से देखा जाए तो दशकों से विश्वविद्यालयों पर हावी वामपंथी शिक्षाविद भी ‘घुसपैठ’ के दायरे में आएँगे। लेकिन जब ऐसे आरोप उठते हैं, तो लेफ्ट-लिबरल इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताते हैं।

लेख में ‘एफिलिएट’ शब्द का भी बार-बार इस्तेमाल किया गया है। किसी भी हिंदू मुद्दे से जुड़े समूह की गतिविधि को बिना जिम्मेदारी तय किए सीधे RSS से जोड़ दिया जाता है।

फासीवाद और गाँधी की हत्या का संदर्भ लेकिन अदालत के फैसले का नहीं

RSS पर लिखते समय पश्चिमी मीडिया अक्सर शुरुआती संघ विचारकों को फासीवाद से जोड़ता है और महात्मा गाँधी की हत्या का मुद्दा बार-बार उठाता है। इस लेख में भी वही तरीका अपनाया गया है। जबकि भारतीय अदालतें दशकों पहले RSS को एक संगठन के रूप में इस मामले में बरी कर चुकी हैं।

इसके बावजूद न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे संस्थान उस कानूनी निष्कर्ष तक जानबूझकर नहीं पहुँचते और संकेतों को अधूरा छोड़ देते हैं ताकि संदेह बना रहे। गांधी हत्या के लिए RSS को जिम्मेदार ठहराने का दावा बिना न्यायिक फैसले पर बात किए आसानी से किया जाता है क्योंकि यह तय की गई कहानी के अनुकूल बैठता है।

यह इतिहास की निष्पक्ष जाँच नहीं बल्कि एक तय नैरेटिव को बनाए रखने की कोशिश है। RSS को लगातार नैतिक रूप से संदिग्ध दिखाया जाता है क्योंकि अगर अदालतों के फैसलों को स्वीकार कर लिया जाए तो पूरी कहानी ही बिखर जाएगी।

बिना पूरे संदर्भ के बुलडोजर का जिक्र

इसके बाद लेख उत्तर प्रदेश के हिस्से पर आता है, जो पहले से तय ढाँचे पर चलता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सत्ता में आने के बाद से पश्चिमी मीडिया लगातार उनकी नकारात्मक छवि बनाने की कोशिश करता रहा है।

साभार: न्यूयॉर्क टाइम्स

लेख में पूरा घटनाक्रम ‘आई लव मोहम्मद’ पोस्टर विवाद के इर्द-गिर्द गढ़ा गया है, जिससे राज्य के कुछ हिस्सों में सांप्रदायिक तनाव फैला। हालाँकि, यह नहीं बताया गया कि हालात तेजी से बिगड़कर कानून-व्यवस्था की समस्या बन गए थे, जहाँ हिंसा भड़काने की कोशिश हुई और मुख्यमंत्री के लिए हस्तक्षेप करना जरूरी हो गया।

इसी तरह कांवड़ यात्रा के दौरान शांतिपूर्ण श्रद्धालुओं पर फूल बरसाने को भी पश्चिमी मीडिया ने सवालों के घेरे में रखा जबकि उत्तर प्रदेश में पुलिस कार्रवाई हमेशा कानून-व्यवस्था बिगड़ने की घटनाओं के बाद हुई है। ज्ञानवापी और संभल मस्जिद जैसे मामलों में भी दंगाइयों ने माहौल बिगाड़ने की कोशिश की जिसे योगी आदित्यनाथ की सख्ती ने बड़े टकराव में बदलने से रोका।

बुलडोजर, गिरफ्तारी, इंटरनेट बंद और पुलिस कार्रवाई को लेख में धार्मिक दमन बताया गया है लेकिन उन घटनाओं का जिक्र नहीं है, जिनकी वजह से सरकार को कार्रवाई करनी पड़ी। जब योगी आदित्यनाथ ने सत्ता संभाली थी उस वक्त प्रदेश में दंगे, गैंगवार और अपराध आम थे। 2017 के बाद कानून-व्यवस्था में बड़ा बदलाव आया है। बुलडोजर कार्रवाई भी तभी होती है, जब इमारत अवैध हो और उसका संबंध अपराधी से साबित हो।

इस लेख में इस पूरे क्रम को हटाकर प्रशासनिक कार्रवाई को वैचारिक उत्पीड़न बना दिया गया है। शासन को अपने आप तानाशाही और जनसमर्थन को भीड़ की मानसिकता बताकर पेश किया गया है।

जब सेवा को फासीवादी ढाँचा बताया जाने लगे

पश्चिमी और लेफ्ट-लिबरल मीडिया जिसमें भारतीय भी शामिल हैं, अक्सर हिंदुओं से जुड़ी हर गतिविधि को नकारात्मक रूप में पेश करता है। हाल ही में ‘द कारवां’ ने RSS से जुड़े स्कूलों, छात्रावासों, अनाथालयों, वृद्धाश्रमों, चिकित्सा सेवाओं, योग केंद्रों और आपदा राहत कार्यों को ‘आखिरी छोर तक वैचारिक नियंत्रण’ का जरिया बताया। न्यूयॉर्क टाइम्स के लेख में भी इसी रिपोर्ट का हवाला दिया गया है।

यह नजरिया असल चिंता को उजागर करता है। समस्या काम से नहीं बल्कि संगठन से है। अगर यही सेवाएँ किसी विदेशी फंडिंग वाले NGO या सोरोस-USAID से जुड़े संस्थान करते तो उनकी तारीफ होती। यहाँ आलोचना राजनीतिक नहीं रह जाती बल्कि सभ्यतागत हो जाती है। जहाँ हिंदू समाज की स्वयंसेवी व्यवस्था को ही अवैध ठहराया जाता है।

लेफ्ट-लिबरल मीडिया को असल बेचैनी किस बात से है

न्यूयॉर्क टाइम्स के लेख के पीछे एक छिपा हुआ डर दिखता है। RSS ने बिना विदेशी फंडिंग, बिना अभिजात (एलीट) वर्ग की मंजूरी और बिना पश्चिमी उदारवाद के अनुरुप बने, पीढ़ियों तक चलने वाली संस्थाएँ खड़ी की हैं। भारत में ऐसा कोई दूसरा संगठन नहीं कर पाया।

RSS सम्मेलन नहीं बल्कि कार्यकर्ता तैयार करता है। यह दानदाताओं पर नहीं बल्कि स्वयंसेवकों पर चलता है। यह अनुदानों और नौकरशाही पर नहीं बल्कि विकेंद्रीकरण पर आधारित है। RSS की यही स्थायित्व और स्वतंत्रता वाम-उदारवादी और पश्चिमी मीडिया को साजिश जैसी लगती है, क्योंकि वे या तो इस मॉडल को समझना नहीं चाहते या वैचारिक विरोध के कारण समझने से इनकार करते हैं।

लोकतंत्र को माना जाता है, सम्मान नहीं दिया जाता

न्यूयॉर्क टाइम्स का लेख बार-बार यह संकेत देता है कि भले ही भारत में चुनाव होते हों लेकिन असल सत्ता RSS के हाथ में है। संस्थाएँ काम तो कर रही हैं लेकिन उन्हें ‘कब्जे में लिया गया’ बताया जाता है। चुनावी जीत को जनसमर्थन नहीं बल्कि संगठन की चालाकी के रूप में समझाया जाता है। इस तरह पश्चिमी टिप्पणीकार ना कहते हुए भी भारतीय लोकतंत्र पर सवाल खड़े कर देते हैं।

जब राजनीतिक नतीजे उनकी सोच के मुताबिक नहीं होते, तो लोकतंत्र को ही कमजोर बताया जाने लगता है। 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से पश्चिमी मीडिया बार-बार यह दावा करता रहा है कि भारत में लोकतंत्र कमजोर हो रहा है या देश तानाशाही की ओर बढ़ गया है।

पत्रकारिता के नाम पर डर की कहानी

इसमें कोई शक नहीं कि RSS की आलोचना हो सकती है। अगर किसी को लगता है कि संगठन ने कुछ गलत किया है, तो सवाल उठाना उसका अधिकार है। उसके विचार, राजनीति और प्रभाव पर चर्चा होनी चाहिए लेकिन न्यूयॉर्क टाइम्स ने जो पेश किया है, वह आलोचना नहीं बल्कि डर पर आधारित कहानी है।

भारी-भरकम शब्दों, अधूरे ऐतिहासिक संदर्भों और सभ्यतागत गलतफहमी के जरिए एक नैरेटिव गढ़ा गया है। RSS को एक सबसे शक्तिशाली गुप्त संगठन बताकर और नाजी से तुलना दोहराकर लेख भारत से ज्यादा लेफ्ट-लिबरल सोच की उस परेशानी को दिखाता है, जो यह स्वीकार नहीं कर पाती कि हिंदू समाज अपने तरीके से संगठित हो सकता है। RSS किसी ‘छाया से निकलकर’ नहीं आया। वह हमेशा सबके सामने रहा है। असल परेशानी यह है कि अब वह अपने अस्तित्व के लिए किसी से अनुमति नहीं माँगता है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)