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RSS पर न्यूयॉर्क टाइम्स की ‘फैंटेसी कहानी’, भारत को चलाने वाली ‘सीक्रेट सोसायटी’ बताया: बौद्धिक दिवालियापन है नाजी टैग से डर फैलाने की वामपंथी मीडिया की कोशिश

न्यूयॉर्क टाइम्स ने 26 दिसंबर को ‘From the Shadows to Power: How the Hindu Right Reshaped India’ शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख को मुजीब मशाल और हरि कुमार ने लिखा है। यह लेख सिर्फ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की आलोचना भर नहीं है बल्कि समाज के लिए काम कर रहे देश के सबसे बड़े हिंदू संगठन को बदनाम करने की साजिश है।

लेख में एक तरह की वैचारिक कहानी गढ़ी गई है जिसमें RSS को एक रहस्यमय, बेहद ताकतवर और तथाकथित ‘फार-राइट’ गुप्त संगठन के रूप में दिखाया गया है। लेख का पूरा चित्रण ऐसा है मानो RSS भारत का कोई गुप्त ‘इल्यूमिनाटी’ हो, जो पर्दे के पीछे से सब कुछ नियंत्रित कर रहा हो। अगर इस लेख या फिर न्यूयॉर्क टाइम्स और अन्य लेफ्ट-लिबरल मीडिया संस्थानों में छपने वाले ऐसे ही दूसरे लेखों पर भरोसा किया जाए, तो ऐसा बताया जाता है कि RSS ने भारत की संस्थाओं में ‘घुसपैठ’ कर ली है और चुपचाप देश के पंथनिरपेक्ष गणराज्य को कमजोर किया जा रहा है।

साभार: न्यूयॉर्क टाइम्स

मसला यह नहीं है कि न्यूयॉर्क टाइम्स या कोई अन्य मीडिया संस्थान RSS की आलोचना करता है। भारत में काम करने वाले और देश की राजनीति को प्रभावित करने वाले संगठनों पर सवाल उठाना उनका अधिकार है। असली समस्या यह है कि यह आलोचना किस तरह की जा रही है।

इन लेखों में इस्तेमाल की गई भाषा बेहद पूर्वाग्रह से भरी हुई है। इतिहास को चुनिंदा तरीके से पेश किया गया है और ठोस सबूतों की जगह इशारों और आरोपों ने ले ली है। इन लेखों की सामग्री एक जानी-पहचानी लेफ्ट-लिबरल सोच को सामने लाती है।

यह वही सोच है, जिसमें हिंदुओं के संगठित होने को ही अपने आप में खतरनाक बताया जाता है। ऐसा दिखाने की कोशिश की जाती है मानो धार्मिक नारे लगाते हुए हिंदू ही खुद को और देश की पंथनिरपेक्ष व्यवस्था को नुकसान पहुँचा रहे हों।

‘फार-राइट’ शब्द का इस्तेमाल, समझाने के लिए नहीं बल्कि ठप्पा लगाने के लिए

न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित लेख में बार-बार RSS को ‘फार-राइट हिंदू राष्ट्रवादी संगठन’ बताया गया है। यह शब्द सीधे तौर पर पश्चिमी राजनीति की शब्दावली से लिया गया है और बिना किसी भारतीय संदर्भ के इस्तेमाल किया गया है। भारत और पश्चिमी देशों में ‘फार-राइट’ की अवधारणा पूरी तरह अलग है।

भारत में RSS न तो कोई राजनीतिक पार्टी है और न ही कोई गुप्त या हिंसक संगठन। यह एक स्वयंसेवक आधारित सांस्कृतिक संगठन है, जो बीते 100 वर्षों से सामाजिक जीवन में काम कर रहा है।

साभार: न्यूयॉर्क टाइम्स

इसके बावजूद लेख में ‘फार-राइट’ शब्द को किसी विश्लेषण की श्रेणी के रूप में नहीं बल्कि पहले से तय निष्कर्ष या एजेंडे की तरह इस्तेमाल किया गया है। जैसे ही पश्चिमी संदर्भ वाला ‘फार-राइट’ का ठप्पा किसी भारतीय संगठन पर लगाया जाता है, लेखक भारतीय सामाजिक वास्तविकताओं को समझने और उनसे जुड़ने की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता है। इसके बाद जन-आंदोलन से लेकर वैचारिक प्रभाव तक हर चीज को अपने आप ‘उग्रवाद’ के रूप में पेश किया जाने लगता है।

‘नाजी’ शब्द बोले बिना नाजी जैसा चित्रण

न्यूयॉर्क टाइम्स के इस लेख में सीधे तौर पर ‘नाजी’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है। न ही RSS की तुलना खुलकर हिटलर या थर्ड राइख से की गई है। यह जानबूझकर किया गया है। इसकी जगह लेख इशारों और जोड़-तोड़ के सहारे पाठकों को एक तय नतीजे तक पहुँचाने की कोशिश करता है। इसके लिए बार-बार फासीवादी दौर की तस्वीरों और संदर्भों का इस्तेमाल किया गया है।

लेख में कहा गया है कि RSS के शुरुआती नेताओं ने 1930 और 1940 के दशक में यूरोप की फासीवादी पार्टियों के राष्ट्रवादी विचारों से प्रेरणा ली थी। साथ ही एमएस गोलवलकर के लेखन का जिक्र करते हुए उसे हिटलर द्वारा यहूदियों के साथ किए गए व्यवहार से जोड़ा गया है। इन ऐतिहासिक संदर्भों की पड़ताल नहीं की गई बल्कि इन्हें इस तरह इस्तेमाल किया गया है कि आज के RSS को यूरोपीय फासीवाद के नैतिक बोझ से जोड़ दिया जाए।

साभार: न्यूयॉर्क टाइम्स

पूरे लेख में इस्तेमाल की गई भाषा भी इसी धारणा को मजबूत करती है। ‘शैडोई कबाल’ (गुप्त साजिश करने वाला गुट), ‘गुप्त संगठन’, ‘अर्धसैनिक अनुशासन’, ‘सुप्रीमेसी’ (श्रेष्ठता), ‘संस्थाओं में घुसपैठ’ जैसे शब्द वही हैं जिन्हें पश्चिमी मीडिया आमतौर पर तानाशाही आंदोलनों के लिए इस्तेमाल करता है।

सीधे आरोप लगाए बिना लेकिन फासीवादी संकेतों से पूरी कहानी भरकर लेख एक तरह का शक पैदा करता है। इस तरीके से लेख लिखने वालों को यह कहने की गुंजाइश मिल जाती है कि उन्होंने कोई सीधा आरोप नहीं लगाया जबकि असल उद्देश्य पूरा हो जाता है। नतीजतन, हिंदुओं के सामाजिक संगठन को ही अपने आप में खतरनाक दिखाने की कोशिश की जाती है।

राजनीतिक संगठन से ‘गुप्त संस्था’ तक का गढ़ा गया सफर

RSS से जुड़े नेता जब राजनीति में आते हैं, तो वे सार्वजनिक मंचों से भाषण देते हैं और अपनी पहचान छिपाते नहीं हैं। RSS से जुड़े लोग खुले तौर पर स्थानीय बैठकों का आयोजन करते हैं और मोहल्लों के पार्कों में रोज शाखाएँ लगाते हैं। यह कोई छुपी हुई गतिविधि नहीं है। इन शाखाओं में कोई भी व्यक्ति आ सकता है, चाहे वह संगठन का सदस्य हो या नहीं।

इसके बावजूद न्यूयॉर्क टाइम्स RSS को बार-बार ‘शेडो’ और ‘सीक्रेट’ संगठन बताता है। लेख में संगठन को निष्पक्ष रूप से देखने या कोई अलग नजरिया रखने की कोशिश नहीं की गई। लेख में दिखाई गई तस्वीर और RSS की वास्तविक स्थिति के बीच का फर्क कहीं भी साफ नहीं किया गया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी अपने RSS से जुड़ाव को नहीं छिपाया। वे खुद को संगठन का ‘कार्यकर्ता’ कहते रहे हैं। केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद, न्यायाधीश, अधिकारी और अन्य पेशेवर लोग भी खुले तौर पर संघ से अपने संबंध स्वीकार करते रहे हैं।

फिर भी RSS को भारत की राजनीति और समाज का कोई गुप्त ‘इल्यूमिनाटी’ दिखाया जाता है। जबकि असल में गुप्त संगठन ऐसे नहीं होते, जहाँ सदस्य खुलेआम अपनी पहचान बताते फिरें और सार्वजनिक कार्यक्रमों में हिस्सा लें। दरअसल, न्यूयॉर्क टाइम्स की असहजता गोपनीयता से नहीं बल्कि संगठन के बड़े आकार से जुड़ी दिखती है।

सबूत के बिना ‘घुसपैठ’ का आरोप

लेख में दावा किया गया है कि RSS ने न्यायपालिका, पुलिस, मीडिया और शिक्षा संस्थानों में ‘घुसपैठ’ कर ली है। यह एक गंभीर आरोप है लेकिन इसके लिए कोई सबूत नहीं दिया गया है। ना कोई दस्तावेज, ना कोई आदेश प्रणाली, ना कोई निर्देश और ना ही कोई वित्तीय कड़ी दिखाई गई है।

इसके बजाय विचारधारा की समानता और संगठनों के आपसी संबंधों को ही साजिश का प्रमाण मान लिया गया है। इसी तर्क से देखा जाए तो दशकों से विश्वविद्यालयों पर हावी वामपंथी शिक्षाविद भी ‘घुसपैठ’ के दायरे में आएँगे। लेकिन जब ऐसे आरोप उठते हैं, तो लेफ्ट-लिबरल इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताते हैं।

लेख में ‘एफिलिएट’ शब्द का भी बार-बार इस्तेमाल किया गया है। किसी भी हिंदू मुद्दे से जुड़े समूह की गतिविधि को बिना जिम्मेदारी तय किए सीधे RSS से जोड़ दिया जाता है।

फासीवाद और गाँधी की हत्या का संदर्भ लेकिन अदालत के फैसले का नहीं

RSS पर लिखते समय पश्चिमी मीडिया अक्सर शुरुआती संघ विचारकों को फासीवाद से जोड़ता है और महात्मा गाँधी की हत्या का मुद्दा बार-बार उठाता है। इस लेख में भी वही तरीका अपनाया गया है। जबकि भारतीय अदालतें दशकों पहले RSS को एक संगठन के रूप में इस मामले में बरी कर चुकी हैं।

इसके बावजूद न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे संस्थान उस कानूनी निष्कर्ष तक जानबूझकर नहीं पहुँचते और संकेतों को अधूरा छोड़ देते हैं ताकि संदेह बना रहे। गांधी हत्या के लिए RSS को जिम्मेदार ठहराने का दावा बिना न्यायिक फैसले पर बात किए आसानी से किया जाता है क्योंकि यह तय की गई कहानी के अनुकूल बैठता है।

यह इतिहास की निष्पक्ष जाँच नहीं बल्कि एक तय नैरेटिव को बनाए रखने की कोशिश है। RSS को लगातार नैतिक रूप से संदिग्ध दिखाया जाता है क्योंकि अगर अदालतों के फैसलों को स्वीकार कर लिया जाए तो पूरी कहानी ही बिखर जाएगी।

बिना पूरे संदर्भ के बुलडोजर का जिक्र

इसके बाद लेख उत्तर प्रदेश के हिस्से पर आता है, जो पहले से तय ढाँचे पर चलता है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सत्ता में आने के बाद से पश्चिमी मीडिया लगातार उनकी नकारात्मक छवि बनाने की कोशिश करता रहा है।

साभार: न्यूयॉर्क टाइम्स

लेख में पूरा घटनाक्रम ‘आई लव मोहम्मद’ पोस्टर विवाद के इर्द-गिर्द गढ़ा गया है, जिससे राज्य के कुछ हिस्सों में सांप्रदायिक तनाव फैला। हालाँकि, यह नहीं बताया गया कि हालात तेजी से बिगड़कर कानून-व्यवस्था की समस्या बन गए थे, जहाँ हिंसा भड़काने की कोशिश हुई और मुख्यमंत्री के लिए हस्तक्षेप करना जरूरी हो गया।

इसी तरह कांवड़ यात्रा के दौरान शांतिपूर्ण श्रद्धालुओं पर फूल बरसाने को भी पश्चिमी मीडिया ने सवालों के घेरे में रखा जबकि उत्तर प्रदेश में पुलिस कार्रवाई हमेशा कानून-व्यवस्था बिगड़ने की घटनाओं के बाद हुई है। ज्ञानवापी और संभल मस्जिद जैसे मामलों में भी दंगाइयों ने माहौल बिगाड़ने की कोशिश की जिसे योगी आदित्यनाथ की सख्ती ने बड़े टकराव में बदलने से रोका।

बुलडोजर, गिरफ्तारी, इंटरनेट बंद और पुलिस कार्रवाई को लेख में धार्मिक दमन बताया गया है लेकिन उन घटनाओं का जिक्र नहीं है, जिनकी वजह से सरकार को कार्रवाई करनी पड़ी। जब योगी आदित्यनाथ ने सत्ता संभाली थी उस वक्त प्रदेश में दंगे, गैंगवार और अपराध आम थे। 2017 के बाद कानून-व्यवस्था में बड़ा बदलाव आया है। बुलडोजर कार्रवाई भी तभी होती है, जब इमारत अवैध हो और उसका संबंध अपराधी से साबित हो।

इस लेख में इस पूरे क्रम को हटाकर प्रशासनिक कार्रवाई को वैचारिक उत्पीड़न बना दिया गया है। शासन को अपने आप तानाशाही और जनसमर्थन को भीड़ की मानसिकता बताकर पेश किया गया है।

जब सेवा को फासीवादी ढाँचा बताया जाने लगे

पश्चिमी और लेफ्ट-लिबरल मीडिया जिसमें भारतीय भी शामिल हैं, अक्सर हिंदुओं से जुड़ी हर गतिविधि को नकारात्मक रूप में पेश करता है। हाल ही में ‘द कारवां’ ने RSS से जुड़े स्कूलों, छात्रावासों, अनाथालयों, वृद्धाश्रमों, चिकित्सा सेवाओं, योग केंद्रों और आपदा राहत कार्यों को ‘आखिरी छोर तक वैचारिक नियंत्रण’ का जरिया बताया। न्यूयॉर्क टाइम्स के लेख में भी इसी रिपोर्ट का हवाला दिया गया है।

यह नजरिया असल चिंता को उजागर करता है। समस्या काम से नहीं बल्कि संगठन से है। अगर यही सेवाएँ किसी विदेशी फंडिंग वाले NGO या सोरोस-USAID से जुड़े संस्थान करते तो उनकी तारीफ होती। यहाँ आलोचना राजनीतिक नहीं रह जाती बल्कि सभ्यतागत हो जाती है। जहाँ हिंदू समाज की स्वयंसेवी व्यवस्था को ही अवैध ठहराया जाता है।

लेफ्ट-लिबरल मीडिया को असल बेचैनी किस बात से है

न्यूयॉर्क टाइम्स के लेख के पीछे एक छिपा हुआ डर दिखता है। RSS ने बिना विदेशी फंडिंग, बिना अभिजात (एलीट) वर्ग की मंजूरी और बिना पश्चिमी उदारवाद के अनुरुप बने, पीढ़ियों तक चलने वाली संस्थाएँ खड़ी की हैं। भारत में ऐसा कोई दूसरा संगठन नहीं कर पाया।

RSS सम्मेलन नहीं बल्कि कार्यकर्ता तैयार करता है। यह दानदाताओं पर नहीं बल्कि स्वयंसेवकों पर चलता है। यह अनुदानों और नौकरशाही पर नहीं बल्कि विकेंद्रीकरण पर आधारित है। RSS की यही स्थायित्व और स्वतंत्रता वाम-उदारवादी और पश्चिमी मीडिया को साजिश जैसी लगती है, क्योंकि वे या तो इस मॉडल को समझना नहीं चाहते या वैचारिक विरोध के कारण समझने से इनकार करते हैं।

लोकतंत्र को माना जाता है, सम्मान नहीं दिया जाता

न्यूयॉर्क टाइम्स का लेख बार-बार यह संकेत देता है कि भले ही भारत में चुनाव होते हों लेकिन असल सत्ता RSS के हाथ में है। संस्थाएँ काम तो कर रही हैं लेकिन उन्हें ‘कब्जे में लिया गया’ बताया जाता है। चुनावी जीत को जनसमर्थन नहीं बल्कि संगठन की चालाकी के रूप में समझाया जाता है। इस तरह पश्चिमी टिप्पणीकार ना कहते हुए भी भारतीय लोकतंत्र पर सवाल खड़े कर देते हैं।

जब राजनीतिक नतीजे उनकी सोच के मुताबिक नहीं होते, तो लोकतंत्र को ही कमजोर बताया जाने लगता है। 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से पश्चिमी मीडिया बार-बार यह दावा करता रहा है कि भारत में लोकतंत्र कमजोर हो रहा है या देश तानाशाही की ओर बढ़ गया है।

पत्रकारिता के नाम पर डर की कहानी

इसमें कोई शक नहीं कि RSS की आलोचना हो सकती है। अगर किसी को लगता है कि संगठन ने कुछ गलत किया है, तो सवाल उठाना उसका अधिकार है। उसके विचार, राजनीति और प्रभाव पर चर्चा होनी चाहिए लेकिन न्यूयॉर्क टाइम्स ने जो पेश किया है, वह आलोचना नहीं बल्कि डर पर आधारित कहानी है।

भारी-भरकम शब्दों, अधूरे ऐतिहासिक संदर्भों और सभ्यतागत गलतफहमी के जरिए एक नैरेटिव गढ़ा गया है। RSS को एक सबसे शक्तिशाली गुप्त संगठन बताकर और नाजी से तुलना दोहराकर लेख भारत से ज्यादा लेफ्ट-लिबरल सोच की उस परेशानी को दिखाता है, जो यह स्वीकार नहीं कर पाती कि हिंदू समाज अपने तरीके से संगठित हो सकता है। RSS किसी ‘छाया से निकलकर’ नहीं आया। वह हमेशा सबके सामने रहा है। असल परेशानी यह है कि अब वह अपने अस्तित्व के लिए किसी से अनुमति नहीं माँगता है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

हम रिफॉर्म एक्सप्रेस पर सवार, 2025 में राष्ट्रीय मिशन के रूप में अपनाए गए सुधार: PM मोदी का दुनिया को संदेश, कहा- भारत पर भरोसा बनाए रखें

भारत वैश्विक ध्यान का केंद्र बनकर उभरा है। यह हमारे लोगों के रचनात्मक उत्साह के कारण संभव हुआ है। आज, दुनिया भारत को आशा और विश्वास की दृष्टि से देखती है। वे अगली पीढ़ी के उन सुधारों की सराहना करते हैं जिनसे प्रगति की गति तेज हुई है, जो राष्ट्र की विकास क्षमता को और अधिक सशक्त बनाते हैं।

मैं अनेक लोगों से कहता रहा हूँ कि भारत रिफॉर्म एक्सप्रेस पर सवार हो चुका है। इस रिफॉर्म एक्सप्रेस का मुख्य आधार भारत की जनसंख्या, हमारी युवा पीढ़ी और हमारे लोगों का अदम्य साहस है।

2025 को भारत के लिए एक ऐसे वर्ष के रूप में याद किया जाएगा जब उसने पिछले 11 वर्षों में हासिल की गई उपलब्धियों के आधार पर सुधारों को एक सतत राष्ट्रीय मिशन के रूप में अपनाया। हमने संस्थानों का आधुनिकीकरण किया, शासन को सरल बनाया और दीर्घकालिक, समावेशी विकास की नींव को मजबूत किया।

हमने उच्च आकांक्षाओं, तेज क्रियान्वयन और गहन परिवर्तन के साथ निर्णायक रूप से आगे बढ़ने का कार्य किया। ये सुधार नागरिकों को गरिमा के साथ जीवन जीने में सक्षम बनाने, उद्यमियों को आत्मविश्वास के साथ नवाचार करने और संस्थानों को स्पष्टता व विश्वास के साथ कार्य करने योग्य बनाने से जुड़े हैं।

आइए, किए गए सुधारों के कुछ उदाहरणों पर गौर करें-

जीएसटी रिफॉर्म:

• 5% और 18% की दो-स्तरीय टैक्स प्रणाली लागू की गई है।

• घरेलू उपभोक्ताओं, एमएसएमई, किसानों और श्रम-प्रधान क्षेत्रों पर बोझ कम किया गया।

• इसका उद्देश्य विवादों में कमी लाना और अनुपालन को बेहतर बनाना है।

• इस रिफॉर्म से उपभोक्ता भावना और माँग में वृद्धि हुई है। त्योहारी सीजन में बिक्री बढ़ी है।

मध्यम वर्ग को अभूतपूर्व राहत:

• पहली बार, 12 लाख रुपए तक की वार्षिक आय वाले व्यक्तियों को कोई इनकम टैक्स नहीं लगा।

• 1961 के पुराने इनकम टैक्स एक्ट को आधुनिक और सरल इनकम टैक्स एक्ट, 2025 से प्रतिस्थापित किया गया।

• ये सुधार मिलकर भारत को एक पारदर्शी, तकनीकी-आधारित टैक्स प्रशासन की ओर ले जाते हैं।

छोटे और मध्यम बिजनेस को बढ़ावा:

• ‘छोटी कंपनियों’ की परिभाषा का विस्तार कर 100 करोड़ रुपए तक के टर्नओवर वाली कंपनियों को शामिल किया गया।

• हजारों कंपनियों के लिए संचालन का बोझ और उससे जुड़ी लागत कम होगी।

100% एफडीआई इंश्योरेंस रिफॉर्म:

• भारतीय इंश्योरेंस कंपनियों में 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति दी गई है।

• इससे इंश्योरेंस कवरेज और नागरिकों की सुरक्षा को बढ़ावा मिलेगा।

• प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ-साथ, लोगों को बेहतर इंश्योरेंस विकल्प और बेहतर सेवा वितरण भी मिलेगा।

सिक्योरिटी मार्केट रिफॉर्म:

• सिक्योरिटी मार्केट कोड बिल संसद में पेश किया गया है। यह एसईबीआई में शासन मानकों को मजबूत करेगा, निवेशकों की सुरक्षा बढ़ाएगा, संचालन का बोझ कम करेगा और एक विकसित भारत के लिए तकनीकी -आधारित सिक्योरिटी मार्केट को सक्षम बनाएगा।

• रिफॉर्म से संचालन और अन्य अतिरिक्त खर्चों में कमी के कारण बचत सुनिश्चित होगी।

मैरीटाइम और ब्लू इकोनॉमी रिफॉर्म्स:

• संसद के एक ही सत्र, मानसून सत्र में, पांच ऐतिहासिक मैरीटाइम एक्ट पारित किए गए: बिल ऑफ लैडिंग एक्ट, 2025; माल ढुलाई एक्ट, 2025; तटीय शिपिंग एक्ट, 2025; मर्चेंट शिपिंग एक्ट, 2025; और भारतीय बंदरगाह एक्ट, 2025।

• ये सुधार दस्तावेजीकरण को सरल बनाते हैं, विवाद समाधान को आसान करते हैं और लॉजिस्टिक्स लागत को कम करते हैं।

• 1908, 1925 और 1958 के पुराने कानूनों को भी प्रतिस्थापित किया गया।

जन विश्वास… अपराधीकरण के युग का अंत:

• सैकड़ों पुराने कानूनों को निरस्त कर दिया गया है।

• रिपीलिंग और संशोधन बिल, 2025 के माध्यम से 71 अधिनियम निरस्त किए गए हैं।

व्यापार करने में सुगमता को बढ़ावा:

• सिंथेटिक फाइबर, धागे, प्लास्टिक, पॉलिमर और बेस मेटल्स से संबंधित कुल 22 QCOs रद्द किए गए, जबकि विभिन्न स्टील, इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रिकल, एलॉय और उपभोक्ता उत्पाद श्रेणियों में 53 QCOs निलंबित किए गए, जिनमें औद्योगिक और उपभोक्ता सामग्रियों की एक विस्तृत श्रृंखला शामिल है।

• इससे परिधान निर्यात में भारत की हिस्सेदारी बढ़ेगी; जूते, ऑटोमोबाइल जैसे विभिन्न उद्योगों में उत्पादन लागत कम होगी; घरेलू उपभोक्ताओं के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स, साइकिल और ऑटोमोटिव उत्पादों की कीमतें कम होंगी।

ऐतिहासिक लेबर रिफॉर्म्स:

• श्रम कानूनों को नया रूप दिया गया है, जिसमें 29 बिखरे हुए श्रम कानूनों को मिलाकर चार आधुनिक श्रम संहिताएँ बनाई गईं।

• भारत ने एक ऐसा लेबर फ्रेमवर्क तैयार किया है जो श्रमिकों के हितों की रक्षा करते हुए व्यावसायिक इकोसिस्टम को बढ़ावा देता है।

• ये सुधार उचित वेतन, समय पर वेतन भुगतान, बेहतर औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और सुरक्षित कार्यस्थलों पर केंद्रित हैं।

• ये कार्यबल में महिलाओं की अधिक भागीदारी सुनिश्चित करते हैं।

• संविदा श्रमिकों सहित असंगठित श्रमिकों को ESIC और EPFO के अंतर्गत लाया गया है, जिससे औपचारिक कार्यबल का दायरा बढ़ा है।

भारतीय उत्पादों के लिए विविध और विस्तारित बाजार:

न्यूजीलैंड, ओमान और ब्रिटेन के साथ व्यापार समझौते किए गए हैं। इनसे निवेश बढ़ेगा, रोजगार सृजन को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय उद्यमियों को भी प्रोत्साहन मिलेगा। ये वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक विश्वसनीय और प्रतिस्पर्धी भागीदार के रूप में भारत की स्थिति को मजबूत करते हैं।

स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, आइसलैंड और लिकटेंस्टीन से मिलकर बने यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौता (FTA) लागू हो गया है। यह विकसित यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं के साथ भारत का पहला मुक्त व्यापार समझौता है।

परमाणु ऊर्जा रिफॉर्म्स:

शांति अधिनियम भारत की स्वच्छ ऊर्जा और तकनीकी यात्रा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

• यह परमाणु विज्ञान और तकनीकी के सुरक्षित, संरक्षित और उत्तरदायित्वपूर्ण विस्तार के लिए एक मजबूत ढांचा सुनिश्चित करता है।

• यह भारत को एआई युग की बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम बनाता है, जैसे डेटा सेंटर, उन्नत निर्माण, ग्रीन हाइड्रोजन और उच्च-तकनीकी उद्योगों को ऊर्जा प्रदान करना।

• यह स्वास्थ्य सेवा, कृषि, खाद्य सुरक्षा, जल प्रबंधन, उद्योग, अनुसंधान और पर्यावरणीय स्थिरता में परमाणु तकनीक के शांतिपूर्ण उपयोग को बढ़ावा देता है, जिससे समावेशी विकास और जीवन की बेहतर गुणवत्ता को समर्थन मिलता है।

• यह निजी क्षेत्र की भागीदारी, नवाचार और कौशल विकास के लिए नए रास्ते खोलता है। यह भारत के युवाओं को अत्याधुनिक तकनीकी और अगली पीढ़ी के ऊर्जा समाधानों में नेतृत्व करने के अवसर प्रदान करता है।

निवेशकों, नवप्रवर्तकों और संस्थानों के लिए भारत के साथ साझेदारी करने, निवेश करने, नवाचार करने और एक स्वच्छ, लचीला और भविष्य के लिए तैयार ऊर्जा इकोसिस्टम का निर्माण करने का यह एक उपयुक्त अवसर है।

ग्रामीण रोजगार गारंटी में ऐतिहासिक रिफॉर्म:

• विकसित भारत-G RAM G एक्ट, 2025 के तहत रोजगार गारंटी को 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन कर दिया गया है।

• इससे गांवों के इंफ्रास्ट्रक्चर और आजीविका को सुदृढ़ करने पर अधिक व्यय होगा।

• इसका उद्देश्य ग्रामीण श्रम को उच्च आय और बेहतर संपत्ति सुनिश्चित करने का साधन बनाना है।

शिक्षा रिफॉर्म्स:

संसद में बिल पेश किया गया है।

• एक एकल, एकीकृत उच्च शिक्षा नियामक स्थापित किया जाएगा।

• यूजीसी, एआईसीटीई, एनसीटीई जैसे कईबहुस्तरीय संस्थाओं को विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान से प्रतिस्थापित किया जाएगा।

• संस्थागत स्वायत्तता को मजबूत किया जाएगा और नवाचार एवं अनुसंधान को बढ़ावा दिया जाएगा।

2025 के सुधारों की महत्ता न केवल उनके व्यापक दायरे में है, बल्कि उनके अंतर्निहित दर्शन में भी है। हमारी सरकार ने आधुनिक लोकतंत्र की सच्ची भावना के अनुरूप नियंत्रण के स्थान पर सहयोग और विनियमन के स्थान पर सुविधा प्रदान करने को प्राथमिकता दी है।

ये सुधार सहानुभूति के साथ तैयार किए गए हैं, जिनमें छोटे व्यवसायों, युवा पेशेवरों, किसानों, श्रमिकों और मध्यम वर्ग की वास्तविकताओं को ध्यान में रखा गया है। ये परामर्श द्वारा आकारित, आंकड़ों द्वारा निर्देशित और भारत के संवैधानिक मूल्यों पर आधारित हैं। ये सुधार नियंत्रण-आधारित अर्थव्यवस्था से विश्वास-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ने के हमारे दशकों पुराने प्रयासों को गति प्रदान करते हैं, जिसमें नागरिक को केंद्र में रखा गया है।

इन सुधारों का उद्देश्य एक समृद्ध और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण करना है। विकसित भारत का निर्माण हमारी विकास यात्रा का मार्गदर्शक सिद्धांत है। हम आने वाले वर्षों में भी सुधार एजेंडा को आगे बढ़ाते रहेंगे।

मैं भारत और विदेश में सभी से आग्रह करता हूँ कि वे भारत के विकास वृत्तांत से अपना जुड़ाव और मजबूत करें। भारत पर भरोसा बनाए रखें और हमारे लोगों में निवेश करते रहें!

(प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह लेख अपने ब्लॉग पर लिखा है, आप इस लिंक पर क्लिक कर इसे पढ़ सकते हैं)

क्या इथेनॉल फैक्ट्रियाँ सच में जानलेवा प्रदूषण फैलाती हैं? अनाज आधारित प्लांट ZLD तकनीक से सुरक्षित, लेकिन नियमों का पालन जरूरी: जानें- क्यों मचा है राजस्थान में बवाल

राजस्थान के हनुमानगढ़ के टिब्बी और संगरिया में अनाज आधारित इथेनॉल फैक्ट्री लगाने का फैसला हुआ, तो लगा राजस्थान में अब इस तरह के उद्योगों की बाढ़ आ जाएगी। अशोक गहलोत के समय एक कार्यक्रम में चंडीगढ़ बेस्ड कंपनी ने हनुमानगढ़ के चावल बेल्ट में इथेनॉल फैक्ट्री लगाने का ऐलान किया, जिसमें ₹450 करोड़ का निवेश होना तय हुआ था। जमीन ले ली गई। प्रक्रिया पूरी हो गई और फिर तभी यहाँ किसानों ने बीते कई माह से मोर्चा संभाल लिया।

आरोप लगाया गया कि इस फैक्ट्री की वजह से मिट्टी दूषित हो जाएगी। भूमिगत जल खराब हो जाएगा। चिमनी से निकले धुएँ से वातावरण जहरीला हो जाएगा। लोगों में बीमारियाँ फैलेंगी और विकास के नाम पर हर तरफ विनाश हो जाएगा। इसके बाद विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ। कई दिनों तक शांति से विरोध हुआ और फिर विरोध प्रदर्शन ने हिंसक रूप से लिया। फैक्ट्री की बाउंड्री वॉल गिरा दी गई, जमकर हंगामा हुआ।

कॉन्ग्रेस जो अब विपक्ष में आ चुकी है, उसके सांसद-विधायक हिंसा की अगुवाई करने लगे। आखिरकार किसानों के लगातार विरोध-प्रदर्शन के बाद फैक्ट्री प्रबंधन ने तय किया कि वो अब हनुमानगढ़ में अपनी इथेनॉल फैक्ट्री नहीं लगाएगी

इस घटनाक्रम के दूसरे ही दिन हनुमानगढ़ के संगरिया में लगने जा रही दूसरी फैक्ट्री को लेकर बवाल शुरू हो गया। महापंचायतें बुलाई जाने लगी। पंजाब जैसे राज्यों से प्रदर्शनकारी हनुमानगढ़ पहुँचे थे, अब वो संगरिया का रुख करने वाले हैं। बहरहाल, ये सब इसलिए बताया जा रहा है, ताकि आपके मन भी सवाल उठे कि क्या वाकई इथेनॉल की फैक्ट्री लगने से इतनी व्यापक तबाही आ जाएगी कि हर तरफ मातम मच जाएगा?

सवाल ये है कि क्या इथेनॉल फैक्ट्री से इतनी तबाही होगी भी या फिर ये सिर्फ डर की वजह से है। दरअसल, 3 साल पहले पंजाब के फिरोजपुर जिले के जीरा कस्बे में विरोध प्रदर्शन की वजह से एक इथेनॉल फैक्ट्री बंद की जा चुकी है। जीरा का यह प्लांट पहले 2006 में एक डिस्टिलरी के रूप में शुरू हुआ था और 2014 में इसे इथेनॉल उत्पादन इकाई में बदल दिया गया. प्लांट के आसपास के गांवों के निवासियों ने शिकायत की थी कि इससे ज़हरीला कचरा निकल रहा है, जिससे भूजल और जमीन प्रदूषित हो रही है।

यह मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) तक पहुँचा, जहाँ 2023 में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने एक रिपोर्ट दाख़िल की। रिपोर्ट में औद्योगिक इकाई के आसपास के इलाक़ों में भूजल और मिट्टी के गंभीर रूप से प्रदूषित होने की बात कही गई थी। लगातार बढ़ते विरोध के बीच जुलाई 2022 में जीरा का यह प्लांट बंद कर दिया गया था। अब इसी तरह के प्रदूषण के डर की वजह से इस फैक्ट्री का विरोध किया जा रहा है।

हालाँकि सच ये है कि जीरा की फैक्ट्री एक स्थानीय अकाली नेता के मालिकाना हक वाली फैक्ट्री थी। जिसकी प्रदूषण संबंधी अनदेखियों के चलते इतना नुकसान हुआ। चूँकि जीरा में नुकसान सामने आ चुका है, तो लोगों में डर है। ऐसे में सवाल ये है कि क्या वाकई इथेनॉल बनाने वाली फैक्ट्रियाँ इतनी ही घातक होती हैं या फिर जीरा का मामला एक अपवाद है?

क्या इथेनॉल फैक्ट्रियों का प्रदूषण जानलेवा है?

इथेनॉल प्लांट्स (विशेषकर जो अनाज/चावल/मक्का आधारित होते हैं) को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा ‘Red Category’ (लाल श्रेणी) के उद्योगों में रखा जाता है। इसका अर्थ है कि अगर आधुनिक तकनीक का उपयोग न हो, तो ये आत्यधिक जानलेवा और प्रदूषणकारी हो सकते हैं। यहाँ ये ध्यान देना है कि ये फैक्ट्री गन्ना नहीं, चावल से चलती।

क्या प्रदूषण को रोका जा सकता है?

तकनीकी पक्ष के साथ जवाब दें तो हाँ, आधुनिक तकनीक से इसे 99% तक नियंत्रित किया जा सकता है। आज के समय में सरकार ने इथेनॉल प्लांट्स के लिए ZLD (Zero Liquid Discharge) तकनीक अनिवार्य कर दी है। इसमें फैक्ट्री से एक बूंद भी गंदा पानी बाहर नहीं निकलना चाहिए। फैक्ट्री को पानी को रिसाइकिल करना होता है और बचे हुए ठोस कचरे (DDGS) को सुखाकर पशु आहार के रूप में बेचा जाता है। वहीं, हवा के प्रदूषण को रोकने के लिए चिमनियों में ESP (Electrostatic Precipitators) लगाना अनिवार्य है जो हवा में राख के कणों को जाने से रोकता है।

अनाज से इथेनॉल और गन्ने से इथेनॉल बनाने में मुख्य अंतर

इथेनॉल एक जैव ईंधन है जो मुख्य रूप से किण्वन (Fermentation) और आसवन (Distillation) प्रक्रिया से बनता है। भारत में यह पेट्रोल में मिलाकर उपयोग होता है। अनाज (जैसे मक्का, चावल, क्षतिग्रस्त अनाज) और गन्ना दोनों से इथेनॉल बनता है, लेकिन प्रक्रिया, उपज, पर्यावरण प्रभाव और लागत में काफी अंतर है।

कच्चा माल और प्रक्रिया का अंतर

गन्ने से इथेनॉल बनाने की प्रक्रिया: गन्ने को कुचलकर रस निकाला जाता है। चीनी बनाने के बाद बचा मोलासेस (गुड़ की गाढ़ी चाशनी), B-हैवी मोलासेस या सीधे गन्ने का रस/सिरप उपयोग होता है। इसमें शुगर (सुक्रोज) सीधे यीस्ट से किण्वित होकर इथेनॉल बनाती है। प्रक्रिया सरल और तेज है।

अनाज से इथेनॉल बनाने की प्रक्रिया: अनाज (मक्का, चावल आदि) में स्टार्च होता है। पहले स्टार्च को पीसकर गर्म पानी में मिलाया जाता है, फिर एंजाइम (अमाइलेज) से शुगर में बदला जाता है (सैकरीफिकेशन)। उसके बाद यीस्ट से किण्वन होता है। यह प्रक्रिया लंबी और अधिक ऊर्जा वाली है।

उपज (यील्ड) और दक्षता: अनाज से प्रति टन कच्चे माल से अधिक इथेनॉल मिलता है (चावल से 450-480 लीटर, अन्य अनाज से 380-460 लीटर)। वहीं गन्ने की मोलासेस से कम उपज होती है, लेकिन गन्ने की प्रक्रिया में बगासे (खोई) से बिजली बनाई जा सकती है, जो ऊर्जा बचाती है।

भारत में इथेनॉल उत्पादन की वर्तमान स्थिति: भारत में इथेनॉल पहले गन्ना मुख्य स्रोत था, लेकिन अब अनाज (खासकर मक्का) से अधिक इथेनॉल बन रहा है। साल 2023-24 में कुल इथेनॉल का 60% अनाज से और 40% गन्ने से आया। दोनों तरीके भारत के 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग लक्ष्य (2025 तक) के लिए जरूरी हैं, लेकिन अनाज आधारित उत्पादन अधिक टिकाऊ और विविधता वाला विकल्प है। ऐसे में अब सरकार अनाज आधारित डिस्टिलरी को प्रोत्साहन दे रही है।

चावल (अनाज) से इथेनॉल vs गन्ना से इथेनॉल बनाने में प्रदूषण की तुलना

राजस्थान में चावल आधारित इथेनॉल प्लांट की योजना है, जो अनाज (ग्रेन-बेस्ड) श्रेणी में आता है। दोनों प्रक्रियाओं में मुख्य अंतर प्रदूषण के स्तर में है- गन्ना आधारित (मोलासेस) प्रक्रिया ज्यादा प्रदूषण फैलाती है, खासकर पानी और मिट्टी का। अनाज आधारित (जैसे चावल या मक्का) कम प्रदूषण वाली और पर्यावरण अनुकूल मानी जाती है।

प्रदूषण कौन ज्यादा फैलाता है?

गन्ना आधारित इथेनॉल बनाने में जल प्रदूषण (सबसे बड़ा) का खतरा है। दरअसल, इथेनॉल बनाने की प्रक्रिया में ‘स्पेंट वॉश’ (Spent_Wash) निकलता है। यह बहुत ही जहरीला और गहरे रंग का तरल पदार्थ होता है। यदि इसे बिना ट्रीट किए जमीन पर छोड़ दिया जाए या नहर में डाल दिया जाए, तो यह मीलों तक भूजल (Groundwater) और मिट्टी को बंजर बना सकता है। भारत में कई शुगर मिल्स/डिस्टिलरी से अनट्रीटेड एफ्लुएंट डिस्चार्ज के केस हैं, जो गंगा जैसी नदियों को प्रभावित करते हैं।

इस तरह की फैक्ट्रियों से वायु प्रदूषण भी होता है। बॉयलर चलाने के लिए यदि धान की भूसी (Rice husk) या कोयले का इस्तेमाल होता है, तो उससे राख (Fly ash) और धुआँ निकलता है। वहीं, किण्वन (Fermentation) की प्रक्रिया के कारण आसपास के 2-3 किलोमीटर के क्षेत्र में एक अजीब सी खट्टी गंध रह सकती है।

अनाज आधारित कम प्रदूषित: कम पानी लगता है (मक्का से ~2570 लीटर पानी प्रति लीटर इथेनॉल vs गन्ना से 3000+), और ज्यादातर प्लांट ZLD (Zero Liquid Discharge) होते हैं, ऐसे में कोई तरल कचरा बाहर नहीं निकलता। ठोस कचरा (DDGS) उपयोगी होता है। भारत में ग्रेन-बेस्ड प्लांट को सरकार ज्यादा प्रोत्साहन दे रही है क्योंकि ये पर्यावरण के लिए बेहतर हैं।

कचरे का निपटान कैसे होता है?

गन्ना आधारित: स्पेंट वॉश को बायोमेथेनेशन, कंसंट्रेशन (इवैपोरेशन) और इंसीनरेशन से ट्रीट करते हैं। नए नियमों से ZLD अनिवार्य है, लेकिन पुराने प्लांट में अक्सर अनट्रीटेड डिस्चार्ज होता है। बगासे (खोई) से बिजली बनती है।

अनाज आधारित: इवैपोरेशन और ड्राइंग से ठोस DDGS बनता है, जो चारा बनकर बिकता है। ZLD आसान होता है, कोई तरल प्रदूषण नहीं। राजस्थान जैसे सूखे इलाके में ये ज्यादा उपयुक्त।

कुल मिलाकर, राजस्थान में चावल आधारित प्लांट बेहतर विकल्प है क्योंकि कम पानी और प्रदूषण। लेकिन स्थानीय विरोध (हनुमानगढ़ में) ZLD होने के बावजूद पानी निकासी और हवा प्रदूषण की आशंका से है। सरकार ZLD सुनिश्चित करती है तो समस्या कम हो सकती है।

ZLD तकनीक क्या है?

ZLD का फुल फॉर्म है Zero Liquid Discharge (जीरो लिक्विड डिस्चार्ज)। यह एक उन्नत वेस्टवाटर ट्रीटमेंट तकनीक है जिसमें इंडस्ट्री से निकलने वाले वेस्टवाटर (गंदे पानी) का 100% ट्रीटमेंट किया जाता है, ताकि बाहर कोई लिक्विड वेस्ट न निकले। पूरा पानी रिसाइकल हो जाता है और बचा ठोस कचरा (सॉलिड्स) सुरक्षित तरीके से डिस्पोज किया जाता है।

यह तकनीक मुख्य रूप से पानी की कमी वाले इलाकों, सख्त पर्यावरण नियमों वाले देशों (जैसे भारत) और प्रदूषण करने वाली इंडस्ट्रीज (डिस्टिलरी, टेक्सटाइल, केमिकल, फार्मा, शुगर मिल्स) में इस्तेमाल होती है। भारत में CPCB (सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड) ने कई इंडस्ट्रीज के लिए ZLD अनिवार्य कर दिया है, खासकर इथेनॉल डिस्टिलरी में।

ZLD क्यों जरूरी है?

  • पर्यावरण संरक्षण: नदियों, झीलों या जमीन में गंदा पानी नहीं जाता।
  • पानी की बचत: 95-99% पानी रिसाइकल होकर दोबारा इस्तेमाल होता है।
  • संसाधन रिकवरी: कचरे से नमक, केमिकल या फर्टिलाइजर जैसे उपयोगी पदार्थ निकाले जा सकते हैं।
  • कानूनी अनुपालन: भारत में कई राज्यों में ZLD प्लांट लगाना अनिवार्य है।

ZLD प्रक्रिया से प्रदूषण कैसे किया जा सकता है कम

ZLD सिस्टम आमतौर पर कई स्टेज में काम करता है। हर इंडस्ट्री के वेस्टवाटर के हिसाब से थोड़ा बदलाव होता है, लेकिन बेसिक फ्लो ऐसा है-

प्री-ट्रीटमेंट (Pretreatment): वेस्टवाटर से बड़े कण, तेल, ग्रीस या सस्पेंडेड सॉलिड्स हटाए जाते हैं। इसमें फिल्ट्रेशन, सेडिमेंटेशन या केमिकल ट्रीटमेंट (जैसे pH एडजस्टमेंट) होता है।

बायोलॉजिकल ट्रीटमेंट: ऑर्गेनिक मैटर (BOD/COD) को बैक्टीरिया से ब्रेकडाउन किया जाता है। इथेनॉल डिस्टिलरी में स्पेंट वॉश का यह स्टेज महत्वपूर्ण है।

मेम्ब्रेन टेक्नोलॉजी (RO/Ultrafiltration): रिवर्स ऑस्मोसिस (RO) या अल्ट्राफिल्ट्रेशन से नमक और अशुद्धियाँ अलग की जाती हैं। इससे 70-90% साफ पानी निकलता है (परमिएट) और कंसंट्रेटेड ब्राइन बचता है।

इवैपोरेशन (Evaporation): बचे कंसंट्रेट को मल्टी-इफेक्ट इवैपोरेटर (MEE) से गर्म करके पानी उड़ाया जाता है। इससे और पानी रिकवर होता है।

क्रिस्टलाइजेशन या ड्रायिंग: आखिरी स्टेज में बचा गाढ़ा ब्राइन क्रिस्टलाइजर या स्प्रे ड्रायर से ठोस नमक/सॉलिड्स में बदल दिया जाता है। कोई लिक्विड नहीं बचता।

इथेनॉल डिस्टिलरी में खास: गन्ना आधारित में स्पेंट वॉश बहुत प्रदूषित होता है, इसलिए बायो-मेथेनेशन के बाद MEE + क्रिस्टलाइजर इस्तेमाल होता है। अनाज आधारित में DDGS बनता है, जो आसान ZLD देता है।

भारत में कई कंपनियाँ जैसे Uttam Energy, Alfa Laval, Saltworks ZLD प्लांट बनाती हैं, खासकर इथेनॉल प्लांट्स के लिए। ZLD पर्यावरण के लिए बेहतरीन है, लेकिन सही डिजाइन और ऑपरेशन जरूरी है। राजस्थान जैसे सूखे इलाकों में इथेनॉल प्लांट्स के लिए यह परफेक्ट सॉल्यूशन है।

उद्योग बंद करना समस्या का हल नहीं

बहरहाल, इथेनॉल फैक्ट्री हो या कोई भी फैक्ट्री, भारत में प्रदूषण को लेकर नियम कागजों पर बहुत सख्त हैं, लेकिन धरातल पर उनका पालन कई कारकों पर निर्भर करता है। चूँकि भारत सरकार इथेनॉल ब्लेंडिंग (ई-20 पेट्रोल) पर बहुत जोर दे रही है, इसलिए इन प्लांट्स पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की सीधी निगरानी रहती है।

वैसे, आजकल ‘ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम’ (OCEMS) लगे होते हैं जो सीधे बोर्ड को डेटा भेजते हैं। कई बार स्थानीय अधिकारी रात के समय या भारी बारिश के दौरान निगरानी में ढिलाई बरतते हैं, उस समय कुछ फैक्ट्रियाँ गंदा पानी छोड़ देती हैं। ZLD प्लांट और ESP को चलाने का खर्च (बिजली और केमिकल) बहुत ज्यादा होता है। मुनाफा बढ़ाने के लिए कभी-कभी मालिक इन मशीनों को बंद कर देते हैं।

हालाँकि फैक्ट्री का विरोध करने की बजाय, स्थानीय लोगों और जागरूक नागरिकों की एक ‘निगरानी समिति’ होनी चाहिए जो यह सुनिश्चित करे कि फैक्ट्री से गंदा पानी बाहर न निकले और रोजगार में स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता मिले। उद्योग बंद करना समस्या का हल नहीं है, लेकिन नियमों का पालन न करना एक अपराध है। दोनों के बीच का संतुलन ही सही विकास है।

चूँकि कॉन्ग्रेस की विध्वसंक नीतियों के चलते अब फैक्ट्री बंद हो गई, तो ये राजस्थान के विकास और उद्योग के लिए बड़ा झटका है। एक फैक्ट्री आने के बाद 10 और फैक्ट्रियाँ भी आती। हनुमानगढ़ एक इंडस्ट्रियल हब बन सकता था, लेकिन कॉन्ग्रेस की राजनीति की वजह से पूरे राजस्थान को झटका लगा है। इस प्रोजेक्ट के बाहर जाने से दूसरे कई प्रोजेक्ट भी नहीं आएँगे।

BMC चुनाव 2026 में BJP बनी शिवसेना का ‘बड़ा भाई’, मुंबई पर कब्जे के लिए ठाकरे ब्रदर्स आए साथ: जानें- सीट बंटवारे से लेकर इस ‘धनी’ सियासी जंग की हर अहम बात

देश की सबसे अमीर नगर निगम बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) के चुनाव अब सर पर आ गए हैं। 15 जनवरी 2026 को वोटिंग होगी और 16 जनवरी को नतीजे आएँगे। कुल 227 सीटों वाली इस निगम पर कब्जा करने की लड़ाई में सत्तारूढ़ महायुति और विपक्षी दलों के बीच काँटे की टक्कर होने वाली है।

नामांकन की आखिरी तारीख 30 दिसंबर 2025 से ठीक एक दिन पहले महायुति ने अपना सीट बँटवारा फाइनल कर लिया। इसी बीच विपक्ष में भी गठबंधन की तस्वीर साफ हुई है। यह चुनाव सिर्फ मुंबई की सत्ता की लड़ाई नहीं, बल्कि मराठी अस्मिता, विकास और हिंदुत्व के मुद्दों पर भी बड़ा मुकाबला है। आइए विस्तार से समझते हैं कि सीट बंटवारा कैसे हुआ, कौन बड़ा भाई बना और शिवसेना के दो गुटों के बीच क्या जंग चल रही है।

महायुति में सीट बँटवारा, बीजेपी बनी बड़ा भाई

महायुति गठबंधन में भाजपा और एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना मुख्य पार्टनर हैं। अजित पवार की एनसीपी इस बार मुंबई में अलग लड़ रही है। लंबी खींचतान के बाद 29 दिसंबर 2025 को सीट बंटवारे पर मुहर लग गई। अब कुल 227 सीटों में से भाजपा को 137 सीटें मिली हैं, वहीं, एकनाथ शिंदे वाली शिवसेना को 90 सीटें मिलीं।

दोनों दल अपने कोटे से कुछ सीटें छोटे सहयोगियों को दे सकते हैं। मुंबई भाजपा अध्यक्ष अमित साटम ने कहा कि पहले 207 सीटों पर सहमति बनी थी, फिर बाकी 20 पर भी फैसला हो गया। अब संयुक्त प्रचार शुरू होगा।

बीजेपी और शिवसेना-शिंदे ने दिखाई मजबूती

यह बंटवारा भाजपा की मजबूती दिखाता है। पहले की बातचीत में शिंदे गुट 100 से 125 सीटें माँग रहा था, लेकिन भाजपा ने अपनी पकड़ मजबूत रखी। 2024 के विधानसभा चुनाव और हाल की नगर परिषद चुनावों में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। उसकी संगठन शक्ति और केंद्र की ताकत ने उसे गठबंधन में ‘बड़ा भाई’ बना दिया।

पहले मुंबई की राजनीति में शिवसेना हमेशा बड़ा भाई रही थी। 2017 के बीएमसी चुनाव में अविभाजित शिवसेना सबसे बड़ी पार्टी बनी थी और महापौर पद उसके पास था। लेकिन अब शिंदे गुट को भाजपा पर निर्भर रहना पड़ रहा है।

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की कई बैठकों के बाद यह फॉर्मूला तय हुआ। महायुति का दावा है कि वे 150 से ज्यादा सीटें जीतकर मुंबई में अपना महापौर बनाएंगे।

शिवसेना बनाम शिवसेना, ठाकरे भाइयों का गठबंधन

इस चुनाव की सबसे बड़ी खासियत है दो शिवसेना गुटों का आमना-सामना। एक तरफ शिंदे गुट महायुति के साथ सरकारी ताकत और विकास के नाम पर वोट माँग रहा है। दूसरी तरफ उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना (यूबीटी) ने राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) से गठबंधन किया है। 20 साल बाद ठाकरे भाई एक साथ आए हैं। उन्होंने ‘मराठी मानूस’ की अस्मिता और ‘बीजेपी की लूट’ के मुद्दे पर फोकस किया है।

सीट बंटवारे में उद्धव की शिवसेना (यूबीटी) को 145-150 सीटें मिली हैं, तो एमएनएस को 65-70 सीटें। हालाँकि कुछ सीटें शरद पवार की एनसीपी (एसपी) को भी दी जा सकती हैं, लेकिन बातचीत चल रही है।

भांडुप और विखरोली जैसे कुछ वार्डों पर दोनों दलों में थोड़ी खींचतान हुई, लेकिन बड़े हित में फैसला हो गया। उद्धव और राज ठाकरे ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस करके गठबंधन का ऐलान किया। उनका कहना है कि मुंबई को मराठी लोगों का गढ़ बनाए रखना है और बीजेपी की ‘बाहरी’ सत्ता को रोकना है।

यह गठबंधन महायुति के लिए बड़ी चुनौती है। 2017 में एमएनएस ने 7 सीटें जीती थीं, जो बाद में उद्धव गुट में शामिल हो गईं। अब दोनों ठाकरे मिलकर मराठी वोटों को एकजुट करने की कोशिश कर रहे हैं।

विपक्ष का दूसरा खेमा- कॉन्ग्रेस और वंचित बहुजन आघाड़ी का गठबंधन

महाविकास आघाड़ी (एमवीए) में दरार पड़ गई। जिसके बाद कॉन्ग्रेस ने उद्धव-राज के गठबंधन को ‘सांप्रदायिक’ बताकर अलग रहने का फैसला किया। ऐसे में कॉन्ग्रेस ने प्रकाश अंबेडकर की वंचित बहुजन आघाड़ी (वीबीए) से गठबंधन किया। यह गठबंधन दलित, अल्पसंख्यक और उत्तर भारतीय वोटों को जोड़ने की कोशिश है।

सीट बँटवारे में कॉन्ग्रेस को करीब 165 सीटें मिली हैं, तो वीबीए को 62 सीटें मिली हैं। इसके अलावा कुछ सीटें राष्ट्रीय समाज पक्ष और आरपीआई (गवई) को भी मिल सकती हैं।

कॉन्ग्रेस ने अपनी पहली लिस्ट में 87 उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं। महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने कहा कि यह विचारधारा का गठबंधन है, सत्ता की लड़ाई नहीं। लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं में थोड़ी नाराजगी है क्योंकि कई मजबूत सीटें वीबीए को दी गईं।

BMC चुनाव काफी अहम, विधानसभा चुनाव से पहले का सेमीफाइनल

बीएमसी का बजट 74 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा है। यह एशिया की सबसे अमीर निगम है। सड़कें, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास के काम यहां के मुख्य मुद्दे हैं। पिछले चुनाव 2017 में अविभाजित शिवसेना ने 84 सीटें, भाजपा ने 82, कॉन्ग्रेस ने 31, एनसीपी ने 9 और एमएनएस ने 7 सीटें जीती थीं। उसके बाद शिवसेना टूटी और शिंदे गुट भाजपा के साथ चला गया।

अब महायुति विकास और हिंदुत्व के नाम पर वोट माँग रही है। विपक्ष मराठी अस्मिता, भ्रष्टाचार और बीजेपी की ‘केंद्र की ताकत’ के खिलाफ लड़ रहा है। नामांकन 23 दिसंबर से शुरू हो चुके हैं। कई दलों ने अपनी लिस्टें जारी कर दी हैं। भाजपा और कॉन्ग्रेस ने 60-80 उम्मीदवारों के नाम घोषित किए हैं।

यह चुनाव मुंबई की राजनीति का नया अध्याय लिखेगा। क्या भाजपा पहली बार सबसे बड़ी पार्टी बनकर महापौर पद हासिल करेगी? या ठाकरे भाई मिलकर पुरानी शिवसेना की ताकत लौटाएँगे? या कॉन्ग्रेस-वीबीए कोई सरप्राइज देंगे? 15 जनवरी को वोटिंग के बाद सब साफ हो जाएगा। मुंबईकरों की नजर इस रोचक मुकाबले पर टिकी है।

DW न्यूज, ध्रुव राठी और KAS: NGO, एक्टिविज्म के सहारे भारत के खिलाफ जर्मनी की वैचारिक जंग; जानिए क्यों राहुल गाँधी पहुँचे हर्टी स्कूल

2023 में भारत की एक अदालत ने कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी को मानहानि के एक मामले में दोषी ठहराया। उन्हें सजा सुनाई गई और कुछ समय के लिए उनकी लोकसभा सदस्यता भी रद्द हुई। यह मामला पूरी तरह भारत का था, नागरिक से लेकर अदालत और कानून तक सब भारतीय थे लेकिन इस फैसले पर सबसे पहला अंतरराष्ट्रीय बयान भारत के किसी पड़ोसी या रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी से नहीं बल्कि जर्मनी से आया। जर्मन विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह स्थिति पर नजर बनाए हुए है और उम्मीद करता है कि न्यायिक स्वतंत्रता से समझौता नहीं होगा।

यहीं से एक बड़ा सवाल खड़ा होता है। सवाल यह नहीं कि बयान आया बल्कि यह कि जर्मनी को क्यों लगा कि उसे भारत के एक आंतरिक न्यायिक मामले पर टिप्पणी करनी चाहिए। यही सवाल आज उस बड़ी पजल की हिस्सा बनता है जिसे अब तक अक्सर नजरअंदाज किया गया है।

DW न्यूज और हिंदी-उर्दू स्पेस में जर्मनी की मौजूदगी

आमतौर पर जब भारत में विदेशी दखल, रेजिम चेंज या नैरेटिव वॉर की चर्चा होती है, तो उंगलियाँ सीधे अमेरिका की ओर उठती हैं। CIA, USAID और डीप स्टेट जैसे शब्द आम हो चुके हैं लेकिन इसी शोर में एक देश अक्सर बिना ध्यान खींचे निकल जाता है- जर्मनी।

BBC और Voice of America के अलावा अगर किसी विदेशी शक्ति ने भारत के हिंदी-उर्दू स्पेस को रणनीतिक रूप से साधा, तो वह न रूस था, न फ्रांस बल्कि वह जर्मनी था। डॉयचे वेले (DW) न्यूज इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। वर्ष 2024 में DW के हिंदी-उर्दू प्लेटफॉर्म को भारत में 60 साल पूरे हुए। टैक्सपेयर्स के पैसे से चलने वाला यह स्टेट-फंडेड मीडिया भारत कवरेज में एक साफ पैटर्न दिखाता है जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भारतीय मीडिया और बहुसंख्यक समाज पर लगातार हमले, कोविड काल में ‘out of control India‘ जैसे नैरेटिव, कश्मीर में सुरक्षा बलों को ‘occupying force‘ कहना और अलगाववादी स्वरों को मंच देना शामिल है।

BBC की भारत में गहरी पैठ को औपनिवेशिक और कॉमनवेल्थ इतिहास से समझा जा सकता है लेकिन DW की इतनी लंबी और सुसंगठित मौजूदगी को संयोग नहीं कहा जा सकता। यह जर्मनी की नई सॉफ्ट पावर रणनीति का हिस्सा है जिसमें कम शोर लेकिन गहरी पैठ के साथ नैरेटिव सेट करना शामिल है।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद का जर्मनी: टैंकों से नहीं, विचारों से वापसी

दूसरे विश्व युद्ध के बाद दुनिया ने मान लिया था कि जर्मनी अब सिर्फ एक व्यापारिक साझेदार भर रह जाएगा। वास्तविकता यह है कि शुरुआती झटकों के बाद जर्मनी कभी हाशिए पर गया ही नहीं। उसकी वापसी टैंकों और मिसाइलों के साथ नहीं हुई बल्कि संस्थाओं, नैतिकता और लोकतंत्र की भाषा के जरिए हुई।

युद्ध के बाद जर्मनी ने ‘Wandel durch Handel‘ यानी ‘व्यापार के जरिए बदलाव’ की नीति अपनाई जिसमें कम राजनीति, कम नैतिक उपदेश और ज्यादा आर्थिक-सॉफ्ट पावर थी। यह उसका पहला चरण था। अब जर्मनी खुद को केवल आर्थिक शक्ति नहीं बल्कि एक ‘मोरल सुपरपावर‘ के रूप में पेश करना चाहता है जो दुनिया को बताए कि लोकतंत्र कैसा होना चाहिए, मानवाधिकार क्या होते हैं और आजादी की सही परिभाषा क्या है।

यहीं से समस्या शुरू होती है। जब कोई देश खुद को नैतिक निर्णायक मान लेता है, तो दूसरों की संप्रभुता उसे बाधा लगने लगती है। भारत, जो अपने लोकतंत्र के लिए पश्चिमी देशों से प्रमाणपत्र नहीं चाहता है वो स्वाभाविक रूप से इस टकराव का केंद्र बन जाता है।

अपराधबोध से नैतिक दादागिरी तक

जर्मनी की आधुनिक विदेश नीति उसके नाजी अतीत और यहूदियों के नरसंहार के गहरे अपराधबोध से जुड़ी है। दशकों तक चले इस अपराधबोध से निकलने के लिए जर्मनी ने ‘मोरल रीब्रांडिंग’ का रास्ता चुना यानी खुद को दुनिया का नैतिक शिक्षक बना लेना। समय के साथ यह प्रायश्चित दखल में बदलता गया। इस दखल का नतीजा भारत जैसे देशों के लोकतंत्र को ‘सुधारने’ की जिद में नजर आने लगा।

अमेरिका जहाँ खुले सैन्य ऑपरेशन, तख्तापल्ट और युद्ध करता है। वहीं, जर्मनी का तरीका शांत और संस्थागत है और वो NGOs, अकादमिक नेटवर्क, मीडिया और फाउंडेशन्स के जरिए विचारधारा का विस्तार। यही कारण है कि जर्मनी कम दिखाई देता है लेकिन जमीनी स्तर पर उसकी पकड़ कहीं ज्यादा गहरी होती है।

भारत में जर्मनी के फ्रंट्स

भारत में जर्मनी का प्रभाव कई चेहरों में दिखता है जैसे सिविल सोसायटी, अकादमिक नेटवर्क, मीडिया, डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स और ‘डेमोक्रेटिक बैकस्लाइडिंग’ का फ्रेम आदि। इनके चेहरे अलग हैं, दिशा एक ही है।

ऐसा भी नहीं है कि किसी का ध्यान जर्मनी के इन तरीकों पर कभी गया ही नहीं। ऑपइंडिया ने जब CSDS पर रिसर्च की थी तो हमने बताया था कि CSDS जैसी संस्थाओं के पीछे जर्मनी की भूमिका कितनी गहरी है। हमारे इस रिसर्च पेपर में आप पढ़ भी सकते हैं कि जर्मनी अपनी संस्थाओं को उन देशों में सक्रिय होने के लिए फंडिंग दे रहा है जहाँ उसने मान लिया है कि ‘लोकतंत्र खतरे में है’।

यही कारण है कि जर्मन विदेश मंत्रालय अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी, मणिपुर हिंसा या अन्य भारतीय आंतरिक मामलों पर बयान देने से नहीं हिचकता। यह केवल कूटनीतिक प्रतिक्रिया नहीं बल्कि जर्मनी की उस नई विदेश नीति का हिस्सा है, जिसमें ‘मानवाधिकारों की रक्षा, देश की अपनी संप्रभुता से ऊपर’ रखी जाती है।

राहुल गाँधी, हर्टी स्कूल और नैरेटिव एक्सपोर्ट

इसी संदर्भ में राहुल गाँधी की जर्मनी यात्राओं को भी देखा जाता है। हाल ही में उन्होंने जर्मनी के हर्टी स्कूल ऑफ गवर्नेंस में लेक्चर दिया। यह संस्थान भी नाजी अतीत के ‘प्रायश्चित’ से जुड़ा है। यह स्कूल जिस हर्टी फाउंडेशन ने बनाया था, वो असल में 19वीं सदी के एक बड़े डिपार्टमेंट स्टोर (Tietz department store) से आया है लेकिन नाजी दौर में इस यहूदी टिट्ज़ परिवार की संपत्ति को आर्यीकरण (Aryanization) के नाम पर छीन लिया गया था, जिससे फाउंडेशन को फायदा पहुँचा। यह फाउंडेशन अब ‘प्रायश्चित’ के नाम पर ‘लोकतंत्र को मजबूत करने’ के लिए भारी निवेश करता है।

अब यह कथित ‘प्रायश्चित’ दूसरे देशों के लोकतंत्र में दखल डालने का बहाना बन गया है जिसमें भारत जैसे देशों की राजनीति में अपनी नीतियों और विचारों को थोपना शामिल है। जब ऐसे मंचों से जब राहुल गाँधी ‘Institutional Capture’ या ‘People will fight each other’ जैसे बयान देते हैं, तो यह केवल भाषण नहीं रह जाते बल्कि यह एक नैरेटिव का निर्यात होता है। और इसका असल इंजन है KAS।

KAS: एक वैचारिक इंजन

कोनराड आडेनाउअर श्टिफ्टुंग (Konrad Adenauer Stiftung) जिसे संक्षेप में KAS कहा जाता है, इस पूरी कहानी का सबसे अहम किरदार है। यह कोई न्यूट्रल NGO या सामान्य थिंक-टैंक नहीं है। KAS दरअसल जर्मनी की सत्तारूढ़ राजनीतिक परंपरा की वैचारिक मशीन है, जिसकी जड़ें सीधे Christian Democratic Union (CDU) में जाती हैं। खुद KAS अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर स्पष्ट रूप से स्वीकार करता है कि वह CDU से politically affiliated संस्था है। इसमें कोई पर्दा नहीं है, कोई संकोच नहीं है।

इसमें हैरानी भी नहीं होनी चाहिए क्योंकि CDU और KAS, इन दोनों के पीछे जो वैचारिक आत्मा थी, वह एक ही व्यक्ति था- कोनराड आडेनाउअर (Konrad Adenauer)। यदि इस एक व्यक्ति को समझ लिया जाए, तो न केवल आधुनिक जर्मनी की राजनीति को समझा जा सकता है, बल्कि यह भी समझ में आता है कि आज जर्मनी कई मोर्चों पर इतना बेचैन और आक्रामक क्यों दिखाई देता है।

कोनराड आडेनाउअर: जर्मनी के पहले चांसलर की कहानी

कोनराड आडेनाउअर कोई साधारण नेता नहीं थे। वे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पश्चिम जर्मनी के पहले चांसलर बने। नाजी तबाही के बाद खंडहरों में खड़े जर्मनी को दोबारा उठाने और उसे पश्चिमी दुनिया की मुख्यधारा में वापस लाने वाला चेहरा वही थे। उन्होंने जर्मनी को अलग-थलग नहीं छोड़ा। उन्होंने जर्मनी को अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के साथ जोड़ा, NATO में शामिल कराया और यूरोपीय एकीकरण की नींव रखी, जिसकी शुरुआत European Coal and Steel Community से हुई। यह सब केवल सत्ता या रणनीति की राजनीति नहीं थी। इसके पीछे एक गहरी वैचारिक योजना थी।

कोनराड कट्टर रोमन कैथोलिक थे। वे पूरी जिंदगी बाइबिल पढ़ते रहे और राजनीति को ईसाई नैतिकता से अलग मानने को तैयार नहीं थे। उनका विश्वास था कि ईसाई सामाजिक मूल्यों के बिना कोई भी समाज टिकाऊ नहीं हो सकता। उनके लिए यूरोप केवल भौगोलिक इकाई नहीं बल्कि एक Christian civilization था और यदि उसमें से ईसाई मूल्य निकाल दिए गए, तो वह सभ्यता खोखली हो जाएगी।

इसी कारण द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कोनराड की नजर में असली वैश्विक संघर्ष था- ईसाई सभ्यता बनाम मार्क्सवाद। वे कम्युनिज्म को नाजीवाद जितना ही खतरनाक मानते थे और सोवियत संघ को स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ा खतरा समझते थे। यही सोच उन्हें NATO और अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी तक ले गई।

इसी वैचारिक आधार पर Christian Democratic Union (CDU) का गठन हुआ। CDU कोई सामान्य पार्टी नहीं थी। इसे जानबूझकर इस तरह गढ़ा गया कि सदियों से बँटे कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट एक मंच पर आ सकें और ईसाई सिद्धांतों पर आधारित राजनीति कर सकें। कोनराड का मानना था कि राजनीति को ईसाई नैतिकता से चलना चाहिए।

पेशे से वकील कोनराड 1917 में कोलोन के मेयर बने लेकिन 1933 में नाजियों के सत्ता में आते ही उन्हें पद से हटा दिया गया। नाजी शासन के दौरान उन्हें जेल जाना पड़ा। 1944 में हिटलर की हत्या की कोशिश के बाद गेस्टापो (नाजियों की सीक्रेट पुलिस) ने उन्हें फिर गिरफ्तार किया। युद्ध के बाद वह राइनलैंड के Christian Democratic दल के अध्यक्ष बने फिर British Zone के CDU का अध्यक्ष इसके बाद Parliamentary Council का राष्ट्रपति और अंततः पश्चिम जर्मनी का चांसलर बन गए।

20 दिसंबर 1955 को CDU से जुड़े नेताओं ने Society for Christian Democratic Educational Work नामक संस्था बनाई, जिसका उद्देश्य शिक्षा, रिसर्च और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के जरिए ईसाई लोकतांत्रिक विचारधारा को फैलाना था। 1964 में इस संस्था का नाम बदलकर Konrad Adenauer Stiftung रखा गया। यानी KAS सीधे तौर पर CDU की वैचारिक विरासत और कोनराड आडेनाउअर की सोच का संस्थागत विस्तार है।

भारत और दुनिया में KAS का वैचारिक युद्ध

आज यही KAS भारत में सक्रिय है। यह CSDS जैसी संस्थाओं को फंडिंग देता है। इन्हीं के जरिए भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए जाते हैं, बहुसंख्यक समाज को निशाना बनाया जाता है और संप्रभुता को कमजोर करने वाले नैरेटिव गढ़े जाते हैं। जानकारी के अनुसार 2016 से अब तक KAS ने CSDS को 2.6 करोड़ रुपए से अधिक की फंडिंग दी है।

कागजों पर KAS शिक्षा, रिसर्च और स्कॉलरशिप की बात करता है लेकिन जमीनी स्तर पर इसका काम युवाओं को ट्रेन करना, पॉलिसी नैरेटिव बनाना और मीडिया व अकादमिक नेटवर्क तैयार करना है। इससे सीधे सरकारें नहीं गिरतीं लेकिन समाज की सोच बदली जाती है। आज सरकारें टैंकों से नहीं बल्कि विचारों और डिजिटल नैरेटिव्स से अस्थिर होती हैं।

भारत से जुड़े मामलों पर जर्मनी के बयान, केजरीवाल की गिरफ्तारी, मणिपुर हिंसा या मानवाधिकार बनाम संप्रभुता ये सब इसी वैचारिक फ्रेम से आते हैं। KAS जैसे संगठन टैंक नहीं भेजते बल्कि वे विचार, नेटवर्क और नैरेटिव भेजते हैं।

यह मॉडल अमेरिका के USAID जैसा है। फर्क यह है कि USAID अमेरिकी मॉडल को बढ़ावा देता है जबकि KAS यूरोपीय और विशेष रूप से जर्मन रास्ते को। KAS देशों को EU मॉडल के अनुरूप ढालने की कोशिश करता है। इसी कारण दोनों संस्थाओं के बीच कई देशों में टकराव भी दिखता है। KAS चाहती है कि देश यूरोप से जुड़ें और USAID चाहती है कि देश अमेरिका के अनुसार चलें।

इतिहास में भी जर्मनी का भारत को लेकर रुख इसी रणनीति से तय रहा है। 1961 में गोवा मुक्ति पर पश्चिम जर्मनी ने भारत की आलोचना की क्योंकि पुर्तगाल NATO का सदस्य था। 1971 में बांग्लादेश युद्ध के दौरान भी शुरुआत में जर्मनी ने भारत की आलोचना की। 1974 और 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद जर्मनी ने सहायता रोकी और भारत पर NPT में शामिल होने का दबाव डाला।

जर्मन राजनीति का श्टिफ्टुंग मॉडल

जर्मनी की राजनीतिक व्यवस्था में एक अनोखी चीज है Stiftung यानी राजनीतिक फाउंडेशन्स। ये फाउंडेशन पार्टियों से जुड़े होते हैं, सरकारी फंड लेते हैं और दुनिया भर में ‘लोकतंत्र सिखाने’ निकलते हैं। भारत में इनके पैटर्न के कारण गृह मंत्रालय ने कई बार सख्त रुख अपनाया है। इसी प्रक्रिया में CPR और Oxfam India जैसे संगठनों के FCRA लाइसेंस रद्द हुए हैं।

जर्मनी की इस रणनीति के तीन प्रमुख स्तंभ उसके राजनीतिक फाउंडेशन मॉडल Stiftung में दिखाई देते हैं। पहला नाम फ़्रीडरिष एबर्ट श्टिफ्टुंग (Friedrich Ebert Stiftung- FES) का है। यह संस्था जर्मनी की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (SPD) से जुड़ी मानी जाती है। आरोप है कि FES उन गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को फंड देती है, जो ‘लेबर राइट्स’ के नाम पर औद्योगिक अशांति को बढ़ावा देते हैं और विकास परियोजनाओं का विरोध करते हैं। वर्ष 2022 में FES की एक रिपोर्ट को लेकर विवाद हुआ था, जिसमें भारत की तुलना authoritarian regimes से की गई थी और ‘cow vigilantes’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया था।

दूसरी संस्था है हाइनरिष बॉएल श्टिफ्टुंग (Heinrich Böll Stiftung- HBS) जो जर्मनी की ग्रीन पार्टी से जुड़ी है। भारत को लेकर सबसे आक्रामक रुख इसी संस्था का बताया जाता है। कोयला परियोजनाओं, न्यूक्लियर एनर्जी, अडानी जैसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स से लेकर आरोग्य सेतु ऐप तक, HBS ने कई मुद्दों पर आपत्ति जताई है। जाँच एजेंसियों द्वारा जब कई मामलों में money trail खंगाली गई, तो कुछ मामलों में उसका सिरा इन जर्मन फाउंडेशनों तक पहुँचने की बात सामने आई।

तीसरी अहम संस्था है कोनराड आडेनाउअर श्टिफ्टुंग (Konrad Adenauer Stiftung- KAS), जो जर्मनी की क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (CDU) से जुड़ी है। KAS का फोकस युवाओं, पॉलिसी मेकर्स और अकादमिक जगत पर बताया जाता है। यह संस्था सर्वे, फेलोशिप और विभिन्न प्रोग्राम्स के जरिए सरकार विरोधी विचारधाराओं को वैचारिक रूप देने का काम करती है। मीडिया, रिसर्च और ट्रेनिंग तीनों क्षेत्रों में KAS एक साथ सक्रिय रहती है।

Feminist Foreign Policy: नैतिकता या दखल?

जर्मनी की विदेश नीति में एक नया शब्द हाल के वर्षों में बार-बार सामने आया है- Feminist Foreign Policy। जर्मनी की विदेश मंत्री ऐनालेना बेयरबॉक ने इसे ‘महिलाओं के अधिकार और समानता’ के नाम पर पेश किया। लेकिन भारत के संदर्भ में इस नीति को लेकर सवाल उठने लगे हैं। भारत के मामले में जर्मनी की इस नीति के तहत दिए गए कई बयान विवादों में रहे हैं। कश्मीर मुद्दे पर जर्मनी का पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाते हुए संयुक्त राष्ट्र के दखल की बात करना, मणिपुर हिंसा को ‘हिंदू बनाम ईसाई’ के फ्रेम में पेश करना और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ़्तारी पर सार्वजनिक टिप्पणी करना इन सबको भारत की ‘रेड लाइन’ पार करने के उदाहरण के रूप में देखा गया।

विशेषज्ञों का कहना है कि जर्मनी केवल कूटनीतिक बयानों तक सीमित नहीं है बल्कि उसने भारत में डिजिटल और सूचना युद्ध के लिए भी कई मोर्चे तैयार किए हैं। इसमें अंतरराष्ट्रीय मीडिया और सोशल मीडिया की अहम भूमिका मानी जाती है। जर्मनी के सरकारी मीडिया संस्थान डॉयचे वेले (DW) का नाम पहले भी इन बहसों में आ चुका है।

इसके अलावा, कुछ भारतीय डिजिटल प्लेटफॉर्म और मीडिया संस्थानों के जर्मनी से जुड़े नेटवर्क भी चर्चा में हैं। द कारवां जैसे मीडिया संस्थान का नाम Konrad Adenauer Stiftung (KAS) के Media Programme Asia नेटवर्क से जुड़ा है। आरोप है कि जर्मनी बदलते समय के साथ अपने सूचना युद्ध की रणनीति और पैकेजिंग दोनों में बदलाव करता रहा है।

इसी कड़ी में कुछ डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स पर भी सवाल उठते हैं, जिनका प्रभाव 2019 के आम चुनाव से पहले अचानक बढ़ा। उदाहरण के तौर पर ध्रुव राठी, जो पहले ज्यादा चर्चित नहीं थे लेकिन बाद में BBC, NDTV जैसे मंचों पर जाति, आरक्षण, गंगा, चुनाव और EVM जैसे संवेदनशील मुद्दों पर दिखाई देने लगे और यूट्यूब पर तेजी से लोकप्रिय हुए।

जर्मनी भारत-विरोधी डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स के लिए एक तरह का सुरक्षित ठिकाना बन गया है। जर्मनी के सख्त प्राइवेसी और फ्री स्पीच कानून उन्हें भारतीय कानूनी कार्रवाई से बचाने में मदद करते हैं।

जर्मनी की Normative Power

विश्लेषकों के मुताबिक, यह सब जर्मनी की उस रणनीति का हिस्सा है जिसे Normative Power कहा जाता है। एक बहुध्रुवीय दुनिया में जर्मनी सैन्य ताकत के बजाय नैरेटिव, संस्थाओं और विचारधाराओं के जरिए अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है। जर्मनी यह तय करने की भूमिका अपने हाथ में रखना चाहता है कि कौन देश ‘लोकतांत्रिक’ है और कौन नहीं।

भारत आज जर्मनी का एक अहम आर्थिक साझेदार है लेकिन जर्मनी का राजनीतिक और बौद्धिक वर्ग भारत को एक उभरते हुए सभ्यतावादी राज्य (Civilizational State) के रूप में स्वीकार करने में असहज दिखता है। खासतौर पर तब जब वैश्विक अर्थव्यवस्था में टॉप-3 की दौड़ में भारत के आगे बढ़ने से जर्मनी के पीछे छूटने की आशंका है।

क्या हम इस खेल को पहचान रहे हैं कि आज की जंग बॉर्डर पर नहीं बल्कि संस्थाओं, विचारों और नैरेटिव्स में लड़ी जा रही है। ऑपइंडिया की इन सभी पर नजर बनी हुई है और इसीलिए हम CSDS की तरह ही जर्मनी के बाकी के इन फ्रंट्स पर भी जल्दी ही एक और बड़ी रिसर्च लेकर आएँगे ताकि इस पूरे नेक्सस की बारीकियों और मोडस ऑपरेंडाई से आप भी वाकिफ हो सकें।

हिंदू अस्मिता, घुसैपठिए, भ्रष्टाचार और TMC की निकम्मी सरकार: अमित शाह ने बताई ‘बंगाल विजय’ की रणनीति, जानें- कैसे ममता का किला ढहाने की तैयारी कर रही BJP?

बंगाल में आगामी 2026 में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी की रणनीति साफ है। पार्टी ने घुसपैठ और उसकी वजह से हो रहे डेमोग्राफी बदलने के मुद्दे को जोरशोर से उठा रही है। राज्य में फैले भ्रष्टाचार और घोटालों की फेहरिस्त भी जनता के सामने गिना रही है। गरीबी, बेरोजगारी और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दे भी पार्टी के लिए अहम है।

घुसपैठ का मुद्दा अहम

राज्य में ममता सरकार को पटखनी देने के लिए अहम मुद्दा घुसपैठिया है। बीजेपी जनता से वादा कर रही है कि अगर उनकी सरकार बनेगी तो घुसपैठियों को बाहर निकाला जाएगा। दो दिवसीय दौरे पर बंगाल गए केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि सरकार बनने के बाद एक मजबूत नेशनल ग्रिड बनाया जाएगा ताकि राज्य में परिंदा भी पर नहीं मार सके। उन्होंने ममता सरकार पर ये भी आरोप लगाया कि राज्य सरकार सीमा पर बाड़ लगाने के लिए जमीन नहीं दे रही है इसलिए सीमा सील करने में दिक्कतें पेश आ रही हैं।

बंगाल के बाहर असम, त्रिपुरा से लेकर पंजाब, कश्मीर, गुजरात जैसे सीमावर्ती राज्यों में घुसपैठ अब करीब करीब बंद है। हालाँकि कश्मीर में आतंकी सीमा पार कर आते हैं, लेकिन ये आम लोग नहीं हैं। इसे घुसपैठ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

राज्य में करीब 30 फीसदी मुस्लिम हैं। लेकिन मुर्शिदाबाद जैसे सीमावर्ती इलाकों में घुसपैठ की वजह से डेमोग्राफी बदल गई है। यहाँ करीब 70 फीसदी मुस्लिम हैं। यही वजह है कि पूर्व टीएमसी नेता हुमायूँ कबीर यहाँ बाबरी मस्जिद बनाने जा रहा है। इसके लिए करोड़ो रुपए जुटा भी चुका है। बीजेपी इस मुद्दे को भी उठा रही है और जनता को बता रही है कि आखिर ममता बनर्जी की शह के बिना बाबरी मस्जिद बनाना कैसे संभव है।

बीजेपी ने पूरे पश्चिम बंगाल में, खासकर बांग्लादेश की सीमा से सटे जिलों में, 1,000 से अधिक सीएए सहायता शिविर बना चुकी है। इन शिविरों का उद्देश्य हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता के लिए ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया में मदद करना, कागजात जुटाने में सहायता करना और प्रक्रिया को लेकर सही जानकारी देना है।

ममता कर रही मुस्लिमों का तुष्टिकरण

बीजेपी लगातार ममता बनर्जी पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाती रही है। बीजेपी मानती है कि राज्य में लाखों ‘फर्जी’ मतदाता हैं जो घुसपैठ कर आए हैं। इन घुसपैठिए को पहचानने के लिए राज्य में एसआईआर हो रहा है। लेकिन ममता बनर्जी शुरू से एसआईआर का विरोध कर रही है।

पार्टी टीएमसी पर ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ का आरोप लगा रही है और हिंदुओं के एकीकरण को अपनी रणनीति का हिस्सा बना रही है। मतुआ और अन्य शरणार्थी समुदायों के बीच नागरिकता संशोधन अधिनियम यानी सीएए के कार्यान्वयन को एक बड़े वादे के रूप में रखा जा रहा है। ममता बनर्जी सीएए का विरोध करती हैं। भाजपा का तर्क है कि मतुआ समुदाय को नागरिकता और सुरक्षा दिलाना उनकी प्राथमिकता है।

भ्रष्टाचार और कुशासन

बीजेपी लगातार तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार को ‘भ्रष्टाचार, डर और कुशासन’ के मुद्दों पर घेर रही है। पार्टी ममता बनर्जी के 14 साल के शासनकाल में हुए घोटालों का जिक्र कर रही है। शिक्षक भर्ती घोटाला, राशन घोटाला, कोयला घोटाला, रेत तस्करी, नगर पालिका भर्ती घोटाला, मनरेगा घोटाला, आवास घोटाला समेत कई घोटालों की चर्चा की जाती है। इस दौरान उन मंत्रियों और पार्टी नेताओं का नाम बताना नहीं भूलती, जो भ्रष्टाचार के आरोप में जेल जा चुके हैं या जिन पर मामले चल रहे हैं।

बंगाल के मंत्री रह चुके पार्थो चटर्जी, ज्योतिप्रिय मल्लिक, मलय घटक से लेकर अनुव्रत मंडल, माणिक भट्टाचार्या, नरेश पाल, फिरहाद हकीम, सोवन चटर्जी, कुणाल घोष का नाम बीजेपी गिनाती है। इनलोगों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और इनमें से ज्यादातर सलाखों के पीछे भी गए। ऐसे नेताओं के बारे में बताकर पार्टी मानती है कि बंगाल की जनता जरूर इस बार चुनाव में टीएमसी को ‘सजा’ देगी।

गृहमंत्री शाह ने बंगाल में घोटालों और नेताओं का जिक्र करते हुए कहा कि इनके घर से 25 करोड़,20 करोड़,27 करोड़ निकलते हैं और इनकी काली कमाई गिनते गिनते मशीनें भी बंद हो जाती हैं।

महिला सुरक्षा का मुद्दा

संदेशखाली और आरजी कर जैसी घटनाओं का जिक्र करते हुए बीजेपी महिला सुरक्षा में राज्य सरकार की विफलता के रूप में पेश कर रही है। बीजेपी ममता बनर्जी के दुर्गापुर गैंगरेप मामले पर की गई टिप्पणी का भी उल्लेख करती है। ममता बनर्जी ने कहा था कि महिलाओं को अपनी सुरक्षा खुद करनी चाहिए। महिलाओं के रात में बाहर निकलने पर भी सवाल खड़े किए थे।

इसका राजनीति दलों और महिला अधिकार संगठनों ने भी विरोध करते हुए कहा था कि ये ‘पीड़िता को दोषी ठहराने’ जैसा बयान है। बीजेपी का कहना है कि बंगाल जैसे राज्य में जहाँ महिलाएँ काफी आगे हैं, वहाँ मुगल शासन की तरह के ‘फरमान’ जारी होते हैं। उन्हें शाम 7 बजे तक घर पहुँच जाने की सलाह दी जाती है।

गृहमंत्री अमित शाह ने ममता बनर्जी पर हमला करते हुए कहा, “ऑफिशियली कहा गया है कि महिलाओं को शाम 7 बजे के बाद घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए। हम किस ज़माने में जी रहे हैं? क्या हम मुगल काल में जी रहे हैं? ममता जी, यह एक आजाद भारत है। यह पक्का करना कि महिलाएं जब चाहें सुरक्षित रूप से बाहर निकल सकें, उनका संवैधानिक अधिकार है। आपकी सरकार यह बेसिक सुरक्षा देने में नाकाम रही है।”

बीजेपी ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना के जवाब में महिलाओं के लिए अधिक वित्तीय सहायता और सरकारी नौकरियों में 33% आरक्षण जैसे वादे करने की तैयारी कर रही है। बिहार मॉडल को अपनाते हुए महिलाओं के खातों में कुछ रकम डाले जा सकते हैं।

बंगाल की ‘विरासत’ की चर्चा

बीजेपी ‘बंगाल की विरासत’ को पुनर्जीवित करने का वादा जनता से कर रही है। बंग गौरव, बंग संस्कृति की बात कर रही है। टीएमसी ने संसद में वंदे मातरम गाने का विरोध किया। बीजेपी इसे मुद्दा बना रही है और बंकिम चंद्र चटर्जी के अपमान से इसे जोड़ रही है। स्वामी विवेकानंद, गुरुदेव रविन्द्र नाथ टैगोर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपनों का बंगाल बनाने की बात भी पार्टी कर रही है।

गरीबी और बेरोजगारी के लिए ममता बनर्जी सरकार की नीतियों पर करारा प्रहार करते हुए बीजेपी उद्योगों की कमी के कारण हो रहे पलायन को रोकने का वादा कर रही है। ममता सरकार में आर्थिक स्थिति कमजोर होने और गरीबी बढ़ने का मुद्दा भी जोर शोर से उठाया जा रहा है। बीजेपी का कहना है कि एक समय था जब देश का नागरिक 100 रुपए कमाता था तो बंगाल का नागरिक 127 रुपए कमाता था, लेकिन अब देश का नागरिक 100 रुपए कमाता है और बंगाल का नागरिक सिर्फ 73 रुपए कमा पाता है। एक समय था जब भारत की GDP में योगदान के मामले में बंगाल तीसरे नंबर पर था। आज यह 22वें नंबर पर आ गया है।

राज्य में हिंसा और राजनीतिक मर्डर भी बड़ा मुद्दा है। अमित शाह के मुताबिक, माना जा रहा था कि कम्युनिस्टों के हारने के बाद हिंसा और बदले की राजनीति खत्म हो जाएगी, लेकिन वे कम्युनिस्टों से भी आगे निकल गए हैं।

दरअसल राज्य में अब तक 300 से ज्यादा बीजेपी कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है। बंगाल के गाँवों से 3000 से ज्यादा कार्यकर्ता विस्थापित हो चुके हैं। टीएमसी से जुड़े नहीं होने पर बंगाल के गाँवों में छोटा- मोटा काम भी नहीं मिल पाता है। लोगों को राशन लेने और ब्लॉक स्तर के काम के लिए भी टीएमसी के ‘कैडर’ का सहारा लेना पड़ता है। राज्य में डर का माहौल है। अगर कोई टीएमसी कार्यकर्ताओं का विरोध करे, तो ये घर में घुस कर पीटते हैं। कई बार तो जान से भी मार डालते हैं।

बंगाल में राजनीतिक हत्या, भ्रष्टाचार और घुसपैठ से जनता त्रस्त है। हिन्दू अस्मिता का सवाल उठाकर बीजेपी अपनी रणनीति को धार दे रही है। बंगाल के लिए ये सारे मुद्दे अहम हैं क्योंकि जनता इनसे त्रस्त है। आरजी कर और दुर्गापुर रेप कांड को लेकर सड़क पर उतरी जनता इस बार टीएमसी को मजा चखाना चाहती है। बीजेपी को इसका फायदा मिल सकता है।

पार्टी इस बार बंगाल में सत्ता परिवर्तन की उम्मीद कर रही है। बीजेपी का लक्ष्य 2026 के चुनावों में राज्य की 294 सीटों में से 200 सीटें जीतने का है। मार्च-अप्रैल 2026 में चुनाव होने की संभावना है।

क्रिसमस के विरोध पर कहा- ‘शर्म करें हिंदू’, लाल किला ब्लास्ट वाले आतंकी उमर पर सवाल को बताया ‘Funny’: आरफा खानम ने बताया कितना दोगला है उनका इकोसिस्टम

भारत के लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम का सबसे असरदार हथियार न तो सिर्फ आँकड़ों से खेलना है, न ही चुनिंदा मुद्दों पर गुस्सा दिखाना। उनका असली हथियार है ‘बौद्धिक बेईमानी’ है, जिसे नैतिक श्रेष्ठता का जामा पहनाकर पेश किया जाता है।

यह एक सोची-समझी रणनीति है, जिसमें समर्थकों को गुमराह किया जाता है, मनचाहे नैरेटिव को साफ-सुथरा बनाकर फैलाया जाता है और असहज सच्चाइयों को दबा दिया जाता है। यह सब करते हुए ये लोग खुद को ‘संवैधानिक मूल्यों’ और ‘मानवाधिकारों’ का सबसे बड़ा रक्षक बताने लगते हैं।

असल में इस बौद्धिक बेईमानी का एक मकसद होता है- इस्लामी कट्टरपंथ से जुड़ी आपराधिक घटनाओं को हल्की और साफ दिखाना। हिंसा को सीधे अपराध मानने के बजाए उसे परिस्थिति, नाराजगी या गलतफहमी बताकर पेश किया जाता है।

हाल ही में पद्मजा जोशी के The Buck Stops Here के एपिसोड में इसका साफ उदाहरण देखने को मिला। जब ‘द वायर‘ से जुड़ी ‘पत्रकार’ आरफा खानम शेरवानी से ऐसा सवाल पूछा गया, जिसने लेफ्ट-लिबरल नैरेटिव की मामूली सोच को चुनौती दी, तो यह पूरी मानसिकता उजागर हो गई।

बहस तो सिर्फ एक मंच थी। असली मुद्दा यह था कि कैसे तथाकथित लिबरल लोग अपराधी की पहचान और राजनीतिक मुद्दे और राजनीतिक फायदे के हिसाब से नैतिकता के पैमाने बदलते हैं और उसी आधार पर जनता की सोच को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं।

क्रिसमस की सजावट को नुकसान पहुँचाने की कुछ घटनाओं को यह कहकर पेश किया गया कि ‘मोदी के भारत में ईसाइयों पर हमला’ हो रहा है। यह तरीका भारत के खुद को नैतिकता का ठेकेदार मानने वालों के लिए नया नहीं है।

कुछ गुमनाम और हाशिये के लोगों की हरकतों को जानबूझकर किसी विचारधारा से जुड़ा हुआ बताया जाता है, फिर उसे बढ़ा-चढ़ाकर पूरे समाज पर आरोप लगाने का आधार बना दिया जाता है। इसके बाद पूरे हिंदू समाज को सामूहिक नैतिक दोषी ठहराने की कोशिश होती है और फिर वही जाने पहचाने चेहरे आगे आकर घोषणा कर देते हैं कि देश में धर्मनिरपेक्षता खत्म हो चुकी है।

राजनीति करने के लिए नैतिकता का चयनित पाठ

लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम एक सख्त दोहरे खाँचे पर चलता है, जहाँ हिंदुओं को हमेशा ताकतवर जालिम दिखाया जाता है और मुस्लिमों को हर हाल में पीड़ित। किसी भी छोटी से बड़ी घटना को इसी नजरिए से देखा जाता है। यहाँ तथ्य पीछे रह जाते हैं और विचारधारा सबसे ऊपर होती है।

इसी वजह से क्रिसमस की सजावट को नुकसान पहुँचाने जैसी घटनाएँ तुरंत ‘बहुसंख्यक फासीवाद’ और यहाँ तक कि ‘नरसंहार’ का सबूत बना दी जाती हैं। न जाँच का इंतजार किया जाता है, न ही संतुलन रखा जाता है। सीधे पूरे हिंदू समाज को सामूहिक रूप से दोषी ठहरा दिया जाता है, जैसे यह कोई तय नैतिक सोच हो।

लेकिन जब बात इस्लामी आतंकवाद की आती है। खासकर जब उसमें पढ़े-लिखें पेशेवर लोग और साफ वैचारिक सोच शामिल हो, तो यही इकोसिस्टम अचानक बारीकियाँ, कानूनी सावधानी और प्रक्रियागत संयम की दुहाई देने लगता है।

यह विरोधाभास कोई संयोग नहीं है। यह पूरी तरह जानबूझकर किया जाता है। यही बात तब सामने आई, जब आरफा से साफ और सीधे शब्दों में यह सवाल पूछा गया कि क्या वह हालिया नवंबर 2025 में दिल्ली के लाल किले के पास हुए हमले में शामिल पढ़े-लिखे मुस्लिम पेशेवरों की भूमिका निंदा करेंगी या नहीं।

लाल किला के पास हुए आंतकी हमले को लेकर सवाल आरफा को लगा ‘मजेदार’

वकील और सामाजिक कार्यकर्ता सुबुही खान ने एक ऐसा सवाल पूछकर इस पाखंड को उजागर कर दिया, जिसने लेफ्ट-लिबरल सोच की असलियत सामने रख दी। दिल्ली के लाल किला के पास हुए आतंकी हमले में मुस्लिम डॉक्टरों की भूमिका का जिक्र करते हुए सुबुही खान ने पूछा कि क्या आरफा खानम को इस जिहादी हिंसा के लिए भी शर्मिंदगी महसूस होती है, जैसे कि उन्हें हिंदुओं से क्रिसमस की सजावट तोड़े जाने वाली घटनाओं पर हो रही है।

अपने तीखे सवाल में सुबुही खान ने इस बात पर भी जोर दिया कि एक पढ़े-लिखे डॉक्टर ने फिदायीन (आत्मघाती) हमला किया और उसे ‘शहादत’ बताया गया। इसके बाद उन्होंने आरफा से सीधा और बेहद असरदार सवाल पूछा- क्या एक भारतीय मुस्लिम होने के नाते इस आंतकी घटना पर उनका भी सिर शर्म से झुकता है, जैसे वह बहुसंख्यक समाज से उम्मीद करती हैं कि वे क्रिसमस की सजावट तोड़ने जाने वाली घटनाओं पर शर्म महसूस करें?

इस सवाल पर आरफा खान ने न तो निंदनीय, न ही आत्ममंथन की प्रतिक्रिया दी। बल्कि उन्होंने सवाल को ही खारिज कर दिया। आरफा ‘यह बहुत मजेदार सवाल है’ कहकर मुस्कुराने लगीं और यही बात उन्होंने कई बार दोहराई।

यह कोई जबान फिसलने वाली प्रतिक्रिया नहीं थी। यह विचारों की ट्रेनिंग का खुला प्रदर्शन था।

लेफ्ट-लिबरल सोच के लिए इस्लामी आतंकवाद कोई नैतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि एक राजनीतिक असुविधा है। यह पीड़ित होने की बनाई गई कहानी को बिगाड़ देता है और समर्थकों को सुनाए जा रहे नैरेटिव में उलझन पैदा करता है। इसीलिए इसे या तो छोटा दिखाया जाता है या कानूनी प्रक्रियाओं में उलझा दिया जाता है, या फिर मजाक बनाकर टाल दिया जाता है।

कुछ मामले विचाराधीन, कुछ में संक्षिप्त निर्णय

जब दबाव बढ़ा, तो आरफा खान ने वही जाना-पहचाना बहाना पकड़ते हुए कहा, “मामला अभी जाँच में हैं।” कानून और प्रक्रिया यह अचानक दिखने वाला सम्मान तब अच्छा लगता, अगर यह चुनिंदा न होता।

जब किसी हिंदू कार्यकर्ता पर आरोप लगते हैं, तो यही लोग तुरंत नैतिक फैसला सुना देते हैं। तब न अदालत मायने रखती है, न जाँच की जरूरत समझी जाती है। अपराध पहले मान लिया जाता है, फिर उसे बढ़ा-चढ़ाकर पूरे समाज पर थोप दिया जाता है। लेकिन जैसे ही बातचीत में जिहाद आता है, तब नैतिक फैसला अनिश्चित समय के लिए टाल दिया जाता है। यह कानून की सावधानी नहीं है। यह नैरेटिव को संभालने की कोशिश है।

लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम हिंसा का विरोध नहीं करता, वह उसे वर्गों में बाँट देता है। गलत पक्ष की हिंसा को विचारधारा से जोड़ा जाता है, जबकि सही पक्ष की हिंसा को परिस्थिति, गलती या मजाक बताकर हल्का कर दिया जाता है।

बांग्लादेश पर उतर गया मुखौटा

अगर आरफा खान की बांग्लादेश पर की गई टिप्पणियों को देखा जाए, तो यहाँ उनकी बौद्धिक बेईमानी और भद्दी हो जाती है। जब इस्लामी भीड़ ने शेख हसीना को सत्ता से हटाया, तो शेरवानी ने इस उथल पुथल को ‘लोकतांत्रिक बदलाव’ बताकर सराहा।

इसके बाद जो हुआ, वह बिल्कुल अनुमान के मुताबिक था- हिंदुओं के घर जलाए गए, मंदिरों को नुकसान पहुँचाया गया और इस्लामी भीड़ ने हिंदुओं की हत्या की। सबसे डरावना मामला हाल ही में सामने आया, जब दीपू चंद्र दास को कथित ईशनिंदा के आरोप में इस्लामी भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला।

इसके बावजूद अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले रक्षक पूरी तरह चुप रहे। न कोई गुस्सा दिखा, न कोई अंतरराष्ट्रीय अभियान चला, न ही अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर बड़े-बड़े भाषण दिए गए। क्योंकि इस मानसिकता में हिंदू पीडित माने ही नहीं जाते। उनका दर्द तय की गई कहानी में फिट नहीं बैठता, इसीलिए उसे नजरअंदाज कर दिया जाता है, जैसा कुछ हुआ ही न हो।

देश को गुमराह और जनमत को अपने हिसाब से मोड़ने की कोशिश

इसी तरह लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम खुद को जिंदा रखता है और अपने समर्थकों के साथ-साथ आम जनता को गुमराह करता है। यह काम सिर्फ खुली झूठी बातों से नहीं होता, बल्कि लोगों की नैतिक सोच को धीरे-धीरे खास दिशा में ढालकर किया जाता है।

नैतिकता अब कर्म या उसके नतीजों पर नहीं टिकी रहती, बल्कि पहचान के आधार पर तय की जाती है। हिंसा की निंदा या उसका बचाव उसकी क्रूरता के आधार पर नहीं, बल्कि इस बात पर होता है कि उसे करने वाला कौन है। अपराध खुद दूसरी प्राथमकिता हो जाता है, अपराधी की राजनीतिक पहचान सबसे अहम बन जाती है।

सामूहिक दोष भी चुनिंदा तौर पर थोपा जाता है। कुछ गिने-चुने लोगों की हरकतों के लिए पूरे हिंदू समाज से शर्म महसूस करने की उम्मीद की जाती है। लेकिन जब इस्लामी हिंसा की बात आती है, तो सामूहिक आत्ममंथन की माँग को सख्ती से खारिज कर दिया जाता है।

इतना ही नहीं, जो लोग सवाल उठाते हैं, उन्हें ‘इस्लामाफोबिया’, ‘धार्मिक नफरत बढ़ाने’ जैसे आरोप लगाकर चुप कराने की कोशिश की जाती है। सिर्फ इसीलिए क्योंकि उन्होंने आतंकवादियों पर सवाल उठाए, जिन्होंने धर्म का इस्तेमाल हिंसा फैलाने के लिए की। जो लोग हर समय ‘समाज की जिम्मेदारी’ पर उपदेश देते हैं, वही लोग जैसे ही जवाबदेही अपनी पसंदीदा जमात तक पहुँचती है तो अचानक व्यक्तिगत सोच की आड़ ले लेते हैं और सामूहिक जिम्मेदारी से पीछे हट जाते हैं।

जब उग्रवाद असुविधाजनक हो जाता है, तो उसे कानूनी बहानों के पीछे छिपा दिया जाता है। ‘मामला अदालत में है’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कानूनी सिद्धांत नहीं, बल्कि नैतिक बहस को चुप कराने, निंदा को अनिश्चित समय तक टालने और जनता का ध्यान भटकाकर खत्म करने के लिए किया जाता है। यहाँ कानूनी प्रक्रिया न्याय का साधन नहीं, टालने का तरीका बन जाती है।

असहज सवालों के जवाब नहीं दिए जाते हैं, उनका मजाक उड़ाया जाता है। जिहाद, कट्टरपंथ और आतंकवाद से जुड़ी जायज चिंताओं को ‘मजाकिया’ बताकर अपने समर्थकों को खतरों का सामना करने के बजाए उन्हें हँसी में उड़ाने की आदत डालता है। यह मजाक कोई संयोग नहीं है, यह एक सोची-समझी ट्रेनिंग है। इससे यह संकेत दिया जाता है कि किन सवालों की इजाजत है और किन पर चुप रहना जरूरी है।

सबसे अहम बात यह है कि यहाँ संवेदना को भी हथियार बना दिया जाता है। पीड़ित होने का दर्जा सोच-समझकर बाँटा जाता है, सिर्फ वहीं जहाँ उससे वैचारिक फायदा हो। जो पीड़ा तय कहानी को मजबूत करती है, उसे बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है और अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाया जाता है।

लेकिन जो दर्द उस कहानी को बिगाड़ देता है, उसे या तो छोटा दिखाया जाता है या संदर्भों में उलझा दिया जाता है या पूरी तरह मिटा दिया जाता है। इस सोच में करुणा इंसानी नहीं, बल्कि लेन-देन का सौदा बन जाती है।

चुनिंदा आक्रोश से उजागर होता पैटर्न

यह चुनिंदा नैतिकता का पाठ कोई अलग-अलग मौके की बात नहीं है, बल्कि लगातार दिखाई देता है और आरफा खानम शेरवानी का रिकॉर्ड भी इसे साफ दर्शाता है। जहाँ वह ‘आई लव मोहम्मद’ जैसे नारे को मजहब का शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति बताकर जोर-शोर से बचाती हैं, वहीं ‘आई लव महादेव’ कहने के कारण हिंदुओं पर हुए हिंसक हमलों पर वह खामोश रही हैं।

सितंबर 2025 में गुजरात के गाँधीनगर जिले के बहियाल गाँव में एक हिंदू युवक के सोशल मीडिया पोस्ट ने भयंकर और एकतरफा सांप्रदायिक हिंसा भड़काई, जिसमें उसने भगवान शिव के प्रति भक्ति जताई थी। उसकी दुकान को तोड़कर आग लगा दी गई। हिंदुओं की गाड़ियों में आगजनी, गरबा समारोह पर हमला किया गया। पुलिसकर्मी भी मारे गए और लगभग 80 घरों वाले हिंदू मोहल्ले में हजारों की भीड़ ने उत्पात मचाया।

सीसीटीवी फुटेज में मुस्लिम भीड़ पत्थर फेंकते, लाठियाँ चलाते और हिंदू संपत्ति को चुन-चुनकर तोड़ते दिखी, जबकि गवाहों के वीडियों में एक हिंदू माँ अपने लापता बेटे के लिए दहशत में रोती भी दिखाई दी।

इतना सब होने के बावजूद शरेवानी की तरफ से कोई गुस्सा या नारजगी नहीं दिखाई दी। न अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर कोई उपदेश, न संविधानिक मूल्यों पर कोई लेक्चर। उनकी खामोशी जोरदार थी।

यह चुप्पी और भी ज्यादा सप्ष्ट हो जाती है, जब इसकी तुलना उनके इस्लामी नारे बचाने के रुख से की जाए। ये नारे अक्सर दंगों, आगजनी, पत्थरबाजी, पुलिस पर हमलों और ‘सर तन से जुदा’ जैसी खुली धमकियों के साथ जुड़े रहे हैं।

शेरवानी लगातार कहती हैं कि ये नारे केवल धर्म की अभिव्यक्ति हैं, लेकिन उन्होंने कभी सवाल नहीं उठाया कि ये नारे इतनी बार हिंसा के साथ क्यों जुड़े होते हैं या धर्म के नाम पर ‘युद्ध’ जैसी पोस्टर की भाषा क्यों PFI जैसे समूहों की पुराने बाते दोहराती हैं, जिन्होंने खुले तौर पर हिंदुओं के नाश की कल्पना की थी।

हिंदू धर्म का मजाक उड़ाने से लेकर लव जिहाद जैसे दर्ज मामलों को नजरअंदाज करना और जबरन इस्लामी धर्मांतरण के अपराधियों की सुरक्षा करने वाली खबरों बचाव करना। यही है आरफा खान शेरवानी की पत्रकारिता।

इन घटनाओं को मिलाकर देखा जाए तो एक साफ पैटर्न सामने आता है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है। यह सोच बताती है कि हिंदू अभिव्यक्ति को हमेशा उकसावे के रूप में देखा जाता है, जबकि इस्लामी हिंसा को परिस्थिति के अनुसार और जवाबदेही को इच्छानुसार माना जाता है। वो भी बस तब तक जब तक यह पसंदीदा कहानी को चुनौती न दे।

बौद्धिक बेईमानी कोई कमजोरी नहीं, इस्लामी-लेफ्ट इकोसिस्टम की नींव

टीवी की बहस में जो हुआ, वह शब्दों की कमी नहीं थी। बल्कि ईमानदारी की कमी थी। आतंक पर पूछे गए सवाल पर हँसी कोई घमंड नहीं था, बल्कि असलियत का खुलासा था।

आज भारत में लेफ्ट-लिबरल सोच समान सिद्धांतों पर नहीं चलती है। यह छूट और अपवादों पर चलती है। इसका मकसद न्याय नहीं, बल्कि नैरेटिव पर कब्जा करना है और बौद्धिक बेईमानी इस सिस्टम की कोई खामी नहीं, बल्कि उसकी बुनियाद है।

जब नैतिकता शर्तों पर तय होने लगे, तो भरोसा टूट जाता है। जब आतंक को हल्का बताया जाए, तो पत्रकारिता मर जाती है। और जब समर्थकों को बार-बार गुमराह किया जाए, तो एक दिन विश्वास भी खत्म हो जाता है।

यह नकाब किसी गलती से नहीं उतरा है। यह इसीलिए उतरा क्योंकि सच में यह ताकत होती है कि वह खुद को सामने ले आए, चाहे यह इकोसिस्टम उसे पसंद करे या नहीं।

(यह रिपोर्ट मूलरूप से अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

बांग्लादेश में ‘बैटल ऑफ बेगम्स’ का दौर खत्म: जिसने भारत से निभाई दुश्मनी, इस्लामी कट्टरपंथियों के हवाले किया मुल्क… नहीं रहीं वो खालिदा जिया

बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की अध्यक्ष बेगम खालिदा जिया का मंगलवार (30 दिसंबर 2025) सुबह निधन हो गया। वे 80 वर्ष की थीं। लंबी बीमारी से जूझ रही खालिदा जिया ढाका के एवरकेयर अस्पताल में भर्ती थीं, जहाँ उन्होंने अंतिम सांस ली। उनकी पार्टी बीएनपी ने सोशल मीडिया पर इस दुखद खबर की पुष्टि की।

खालिदा जिया की मौत से बांग्लादेश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण अध्याय का अंत हो गया है। वे दशकों तक देश की सियासत की धुरी रहीं और अपनी कट्टर प्रतिद्वंद्वी शेख हसीना के साथ उनकी दुश्मनी ने पूरे देश को प्रभावित किया।

अविभाजित भारत में जन्म, परिवार ने चुना पाकिस्तान

खालिदा जिया का जन्म 15 अगस्त 1945 को ब्रिटिश भारत के बंगाल प्रेसिडेंसी के जलपाईगुड़ी जिले में हुआ था, जो आज पश्चिम बंगाल का हिस्सा है। उनका बचपन का नाम खालिदा खानम ‘पुतुल’ था। उनका परिवार एक साधारण व्यापारी परिवार से था। 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद उनका परिवार पूर्वी बंगाल (आज का बांग्लादेश) के दिनाजपुर जिले में आकर बस गया। खालिदा जिया ने दिनाजपुर की मिशनरी स्कूल और गर्ल्स स्कूल में पढ़ाई की। वे खुद को ‘सेल्फ-एजुकेटेड’ बताती थीं और हाई स्कूल की डिग्री के कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं हैं।

15 साल की उम्र में फौजी अफसर से निकाह, आगे चल कर बनी फर्स्ट लेडी

साल 1960 में मात्र 15 साल की उम्र में खालिदा की शादी पाकिस्तानी आर्मी के कैप्टन जियाउर रहमान से हो गई। जियाउर रहमान बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई के प्रमुख नायक थे। उन्होंने 1971 के मुक्ति संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और बाद में बांग्लादेश के राष्ट्रपति बने। शादी के बाद खालिदा जिया एक साधारण गृहिणी बनकर रह गईं। वे दो बेटों तारेक रहमान और आरफ रहमान की परवरिश में व्यस्त रहीं। उस समय उन्हें एक शर्मीली और घरेलू महिला के रूप में जाना जाता था, जो राजनीति से दूर रहती थीं।

शौहर और राष्ट्रपति जियाउर रहमान की हत्या के बाद संभाली पार्टी

जियाउर रहमान ने 1978 में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की स्थापना की। वे 1977 से राष्ट्रपति थे और देश को सैन्य शासन से लोकतंत्र की ओर ले जा रहे थे। लेकिन 30 मई 1981 को चटगाँव में एक असफल सैन्य तख्तापलट में जियाउर रहमान की हत्या कर दी गई। इस घटना ने खालिदा जिया की जिंदगी बदल दी। शौहर की मौत के बाद बीएनपी संकट में पड़ गई। कई नेता पार्टी छोड़कर चले गए। ऐसे में खालिदा जिया ने 1982 में पार्टी की सदस्यता ली और 1984 में बीएनपी की चेयरपर्सन बन गईं। एक गृहिणी से राजनीतिक नेता बनने की उनकी यात्रा प्रेरणादायक थी।

शेख हसीना के साथ मिलकर खालिदा जिया ने किया तानाशाही का विरोध

1980 के दशक में बांग्लादेश पर जनरल हुसैन मुहम्मद इरशाद का सैन्य शासन था। खालिदा जिया ने इरशाद के खिलाफ लोकतंत्र बहाली की लड़ाई का नेतृत्व किया। वे सात दलों के गठबंधन की प्रमुख बनीं और हड़तालों, प्रदर्शनों के जरिए सैन्य तानाशाही का विरोध किया। इस दौरान उन्हें कई बार गिरफ्तार किया गया और घर में नजरबंद रखा गया। लेकिन वे डटी रहीं। 1990 में जन आंदोलन के दबाव से इरशाद को सत्ता छोड़नी पड़ी।

लोकतंत्र की बहाली के लिए हुई लंबी लड़ाई में शेख हसीना ने भी मोर्चा थामे रखा। ये वही समय था, जब बांग्लादेश के लिए दोनों बेगमों ने एक पक्ष की तरफ से लड़ाई लड़ी, हालाँकि राजनीतिक वजहों से दोनों हमेशा अलग-अलग खेमों की अगुवाई करती रही।

साल 1991 में बांग्लादेश में पहली बार स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव हुए। बीएनपी ने भारी जीत हासिल की और खालिदा जिया देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। वे मुस्लिम बहुल देश में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गईं दूसरी महिला नेता थीं (पहली पाकिस्तान की बेनजीर भुट्टो थीं)। उनके पहले कार्यकाल (1991-1996) में कई महत्वपूर्ण सुधार हुए। उन्होंने संसदीय व्यवस्था बहाल की, विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया, प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त और अनिवार्य बनाया। लड़कियों की शिक्षा पर विशेष जोर दिया गया। अर्थव्यवस्था में सुधार आए और बांग्लादेश अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूत हुआ।

साल 1996 में वे चुनाव हार गईं और शेख हसीना की अवामी लीग सत्ता में आई। लेकिन 2001 में बीएनपी की वापसी हुई और खालिदा जिया दूसरी बार प्रधानमंत्री बनीं। इस कार्यकाल में भी कई उपलब्धियाँ रहीं, लेकिन भ्रष्टाचार के आरोप और इस्लामी कट्टरपंथी और आतंकवादियों के उभार ने उनकी सरकार को विवादास्पद बना दिया।

साल 2006 में सैन्य समर्थित अंतरिम सरकार ने सत्ता संभाली और खालिदा जिया पर भ्रष्टाचार के कई मामले दर्ज किए गए। उन्हें जेल भेजा गया और लंबे समय तक नजरबंद रखा गया। वे हमेशा कहती रहीं कि ये मामले राजनीतिक बदले की कार्रवाई हैं। 2025 में बांग्लादेश की सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य भ्रष्टाचार मामले में उन्हें बरी कर दिया।

साल 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद खालिदा जिया को नजरबंदी से रिहा किया गया। वे फिर से सक्रिय राजनीति में लौटने की तैयारी कर रही थीं, लेकिन स्वास्थ्य ने साथ नहीं दिया। अंतिम वर्षों में वे लीवर सिरोसिस, डायबिटीज, गठिया, हृदय और फेफड़ों की बीमारियों से पीड़ित रहीं। 2025 की शुरुआत में लंदन में इलाज के बाद वे वापस ढाका लौटीं, लेकिन हालत बिगड़ती गई और अब उनका निधन हो गया।

शेख हसीना और खालिदा जिया की प्रतिद्वंद्विता: जानें- ‘बैटल ऑफ द बेगम्स’ के बारे में

बांग्लादेश की राजनीति को दशकों तक परिभाषित करने वाली शेख हसीना (अवामी लीग) और खालिदा जिया (बीएनपी) की दुश्मनी को दुनिया ‘बैटल ऑफ द बेगम्स‘ कहती है। यह प्रतिद्वंद्विता सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि व्यक्तिगत और वैचारिक भी थी, जो बांग्लादेश को बार-बार अस्थिरता में धकेलती रही। दोनों महिलाओं ने मिलकर 1991 से 2024 तक बांग्लादेश पर बारी-बारी से शासन किया, लेकिन उनकी लड़ाई ने हड़तालें, हिंसा और राजनीतिक संकट पैदा किए।

प्रतिद्वंद्विता की जड़ें 1970 के दशक में हैं। शेख हसीना बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की बेटी हैं, जिनकी 1975 में हत्या हुई। खालिदा जिया राष्ट्रपति जियाउर रहमान की बीवी थीं, जिनकी 1981 में हत्या हो गई। दोनों एक-दूसरे पर अप्रत्यक्ष रूप से हत्या की साजिश का आरोप लगाती रहीं। हसीना कहती थीं कि जियाउर रहमान मुजीब हत्याकांड से जुड़े थे, जबकि खालिदा अवामी लीग को अपने शौहर की हत्या का जिम्मेदार ठहराती थीं।

लोकतंत्र की बहाली के लिए 1980 के दशक में दोनों महिलाएँ एक साथ दिखीं। उस समय जनरल हुसैन मुहम्मद इरशाद का सैन्य शासन था। खालिदा जिया ने 1984 में बीएनपी की कमान संभाली, जबकि शेख हसीना 1981 में अवामी लीग की नेता बनीं। दोनों ने इरशाद के खिलाफ लोकतंत्र बहाली का आंदोलन चलाया। 1990 में हड़तालों और प्रदर्शनों से इरशाद को सत्ता छोड़नी पड़ी। यह दोनों का एकमात्र साथ था। उसके बाद दुश्मनी शुरू हो गई।

खालिदा जिया ने जीतकर पहली महिला प्रधानमंत्री बनकर हसीना को हराया। इसके बाद दोनों बारी-बारी सत्ता में आईं, जिसमें खालिदा जिया (1991-96 और 2001-06), शेख हसीना (1996-2001 और 2009-2024) तक सत्ता में रहीं।

खालिदा जिया और शेख हसीना में खूनी संघर्ष

साल 1991 में पहला निष्पक्ष चुनाव हुआ। खालिदा जिया की बीएनपी ने जीत हासिल की और वे देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं। जमात-ए-इस्लामी जैसे इस्लामी दलों का समर्थन मिला। हसीना विपक्ष में रहीं। 1996 में हसीना की अवामी लीग सत्ता में आई। खालिदा ने धांधली का आरोप लगाया। फिर 2001 में खालिदा की बड़ी जीत हुई। इस दौरान दोनों पार्टियाँ एक-दूसरे पर हिंसा और भ्रष्टाचार के आरोप लगाती रहीं।

2004 में हसीना पर ग्रेनेड हमला हुआ, जिसमें कई लोग मारे गए। हसीना ने इसके लिए खालिदा की सरकार को जिम्मेदार ठहराया। खालिदा के बेटे तारेक रहमान पर भी आरोप लगे।

दोनों के बीच वैचारिक मतभेद भी गहरे थे। हसीना सेक्युलरिज्म और भारत के साथ अच्छे रिश्तों की पक्षधर रहीं, जबकि खालिदा इस्लामिक पहचान और बांग्लादेशी राष्ट्रवाद पर जोर देती थीं। उनकी लड़ाई केरटेकर गवर्नमेंट सिस्टम, भ्रष्टाचार आरोप और चुनावी धाँधली के मुद्दों पर केंद्रित रही। 2007 में सैन्य हस्तक्षेप और 2018 में खालिदा को भ्रष्टाचार केस में जेल भी इसी दुश्मनी का नतीजा थी।

साल 2024 में इस्लामी कट्टरपंथियों के समर्थन से हुए कथित छात्र आंदोलन की वजह से शेख हसीना सत्ता से बाहर हो गईं और वो भारत आ गई, जबकि खालिदा जिया अपनी रिहाई के बाद और सक्रिय हो गई। हालाँकि वो बीमार रहीं।

बहरहाल, शेख हसीना और खालिदा जिया की यह प्रतिद्वंदिता बांग्लादेश की राजनीति को दो हिस्सों में बाँटती रही। हड़तालें, ब्लॉकेड और हिंसा आम हो गई। अब खालिदा जिया के जाने से यह दुश्मनी खत्म लगती है। हसीना निर्वासन में हैं, जबकि बीएनपी के तारेक रहमान आगे आ रहे हैं। बांग्लादेश की राजनीति नया मोड़ ले रही है, ऐसे में ‘बैटलिंग बेगम्स’ का अध्याय इतिहास बन गया।

भारत से क्यों नफरत करती थी खालिदा जिया, जड़ में था इस्लाम

खालिदा जिया की भारत विरोधी छवि बांग्लादेश की राजनीति में गहराई से जुड़ी हुई है। कई विश्लेषक उन्हें ‘एंटी-इंडिया’ नेता मानते हैं। लेकिन इसकी जड़ें उनके शौहर जियाउर रहमान की विदेश नीति में हैं। जियाउर रहमान ने बांग्लादेश की विदेश नीति को ‘भारत और पाकिस्तान से समान दूरी’ की नीति पर आधारित किया था।

1971 के मुक्ति युद्ध में भारत ने बांग्लादेश की आजादी में बड़ी भूमिका निभाई थी। शेख मुजीबुर रहमान की अवामी लीग भारत की करीबी थी। लेकिन 1975 में मुजीब की हत्या के बाद सत्ता परिवर्तन हुआ। जियाउर रहमान ने सत्ता संभाली और नीति बदली। वे नहीं चाहते थे कि बांग्लादेश भारत का ‘जूनियर पार्टनर’ बन जाए। उन्होंने भारत की 1971 की मदद को स्वीकार किया, लेकिन देश की संप्रभुता को प्राथमिकता दी। जियाउर रहमान ने पाकिस्तान से संबंध सुधारने शुरू किए, हालाँकि पाकिस्तान ने बांग्लादेश की आजादी का विरोध किया था। उन्होंने चीन, सऊदी अरब, अमेरिका और इस्लामी देशों से नजदीकियाँ बढ़ाईं।

इस ‘समदूरी’ नीति का मतलब था- भारत से अच्छे संबंध, लेकिन अत्यधिक निर्भरता नहीं। जियाउर रहमान ने दक्षेस (SAARC) की स्थापना की कल्पना की, ताकि दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग हो और भारत का वर्चस्व कम हो। वे भारत के साथ गंगा जल बंटवारे जैसे मुद्दों पर कड़ा रुख अपनाते थे। 1977 में जब भारत ने एकतरफा गंगा का पानी रोक लिया, तो जियाउर रहमान ने संयुक्त राष्ट्र और नॉन-अलाइंड मूवमेंट में मामला उठाया, जिससे अंतरराष्ट्रीय दबाव बना और समझौता हुआ।

खालिदा जिया ने अपने शौहर की इसी नीति को आगे बढ़ाया। बीएनपी की विचारधारा में भारत विरोध एक आधारभूत हिस्सा बन गया। विपक्ष में रहते हुए खालिदा जिया ने भारत विरोधी बयानबाजी की। वे अवामी लीग की भारत समर्थक नीतियों की आलोचना करती थीं। उनके शासन में उत्तर-पूर्वी भारत के उग्रवादी समूहों को बांग्लादेश में पनाह मिलने के आरोप लगे। 2001-2006 के कार्यकाल में पाकिस्तान से नजदीकियाँ बढ़ीं और जमात-ए-इस्लामी जैसे इस्लामी दलों से गठबंधन किया।

कई घटनाएँ उनकी भारत विरोधी छवि को मजबूत करती हैं। 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बांग्लादेश में विरोध हुआ, लेकिन बीएनपी ने इसे राजनीतिक मुद्दा बनाया। 2013 में भारतीय राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के ढाका दौरे पर खालिदा जिया ने उनसे मिलने से इनकार कर दिया, जो एक बड़ा कूटनीतिक संकेत था। उनके दौर में सीमा विवाद, पानी बँटवारा और प्रवासियों के मुद्दे पर तनाव रहा।

जानिए- कौन है तारिक रहमान, जो संभालेगा खालिदा जिया की विरासत

हालाँकि, कुछ मौकों पर वे भारत से संवाद करने को तैयार दिखीं। 2012 में उन्होंने भारत का दौरा किया और मनमोहन सिंह से मिलकर उग्रवाद के खिलाफ सहयोग की बात की। लेकिन कुल मिलाकर, बीएनपी की राष्ट्रवादी नीति में भारत को ‘बड़ा पड़ोसी’ के रूप में सतर्कता से देखा जाता था। विश्लेषकों के अनुसार, यह नफरत नहीं, बल्कि मौके की पॉलिटिक्स थी। अवामी लीग भारत को करीबी मानती है, जबकि बीएनपी पाकिस्तान और चीन की ओर झुकाव रखती है।

‘ब्रीफकेस में अखिलेश यादव को भेजा गया मेरे भाई का सिर’: ऑपइंडिया से बोले नीरज मिश्रा के भाई, 2004 में सपाइयों से विवाद के बाद BJP बूथ एजेंट का मिला था शव

ब्राह्मण हितैषी होने की छवि गढ़ने की कोशिश कर रहे समाजवादी पार्टी के मुखिया और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का असली चरित्र समय-समय पर सामने आता रहा है। इस कथित ब्राह्मण प्रेम का इतिहास खूनी रहा है। कन्नौज के नीरज मिश्रा का नाम शायद बहुत से लोग नहीं जानते हों लेकिन नीरज वो शख्स थे जिन्होंने कभी अखिलेश यादव से टक्कर ली और 24 घंटों के भीतर उनकी सिर कटी लाश मिली थी। नीरज के भाई मुनीष मिश्रा ने ऑपइंडिया से बातचीत में अपने भाई की हत्या का सीधा आरोप अखिलेश यादव पर लगाया है।

आज तक नहीं मिला नीरज का कटा हुआ सिर

मामले की शुरुआत 5 मई 2004 से होती है, जब उत्तर प्रदेश के कन्नौज लोकसभा क्षेत्र में आम चुनाव के लिए मतदान हो रहा था। उस चुनाव में समाजवादी पार्टी की ओर से उम्मीदवार थे तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश यादव जबकि उनके मुकाबले में भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार रामानंद यादव मैदान में थे। ऑस्ट्रेलिया से पढ़ाई कर लौटे अखिलेश यादव के लिए यह पहला लोकसभा चुनाव था।

मतदान के दौरान कन्नौज के छिबरामऊ क्षेत्र के कसावां गाँव में स्थित बाबा हरिपुरी इंटर कॉलेज के बूथ पर स्थिति अचानक तनावपूर्ण हो गई। बूथ लूटने को लेकर भाजपा और सपा कार्यकर्ताओं के बीच तीखी बहस शुरू हुई जो जल्द ही हिंसा में बदल गई। इसी दौरान भाजपा के बूथ प्रमुख नीरज मिश्रा अचानक लापता हो गए।

अगले दिन यानी 6 मई 2004 को नीरज मिश्रा का धड़ ईशन नदी से बरामद किया गया जबकि उनका सिर कभी नहीं मिल सका। नीरज मिश्रा कसावां गाँव के ही निवासी थे और मतदान के दिन उसी बूथ पर तैनात थे, जहाँ विवाद हुआ था। इस हत्याकांड में आरोपियों के खिलाफ लंबी कानूनी लड़ाई चली। बाद में अदालत ने दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई लेकिन समय के साथ सभी आरोपी जमानत पर रिहा हो गए।

नीरज मिश्रा के परिजनों का आरोप था कि तत्कालीन सांसद से जुड़े लोग बूथ पर कब्जा करने के इरादे से वहाँ पहुँचे थे। जब नीरज मिश्रा ने पोलिंग बूथ पर कब्जा करने का विरोध किया, तो दोनों पक्षों के बीच धक्का-मुक्की शुरू हो गई। आरोप है कि इसी दौरान नीरज ने एक नेता को धक्का दे दिया जिसके बाद उनके साथ मौजूद लोगों ने नीरज मिश्रा को जबरन उठा लिया। अगले दिन उनकी बिना सिर की लाश मिली।

अखिलेश यादव ने कराई मनीष की हत्या: ऑपइंडिया से बोले मुनीष मिश्रा

मुनीष मिश्रा ने अपनी भाई की भयावह हत्या को लेकर ऑपइंडिया के अर्पित त्रिपाठी से बातचीत की है। मुनीष ने बातचीत में ही कहा, “अखिलेश ने भाई का सर कटवा दिया था।” मुनीष बताते हैं “कसावा गाँव में बूथ था और नीरज मिश्रा भाजपा के बूथ एजेंट थे। पहले वहाँ आसपास के यादव गाँवों के लोग भी वोट डालने आते थे लेकिन अब वो बूथ हटा दिया गया है।”

इस पूरे घटनाक्रम को लेकर मुनीष मिश्रा ने विस्तार से बताया, “अखिलेश जी ने बटेला, जाफराबाद आसपास की पोलिंग लूटते हुए कसावा में 25-30 गाड़ियों के काफिले से साथ एंट्री ली। एक पीठासीन अधिकारी से बदतमीजी की गई जिस पर उन्होंने रिएक्ट कर दिया। (अखिलेश यादव ने) रुतबे में एक आदमी को हाथ मार दिया। मेरे भाई ने उसका विरोध किया और उनकी अखिलेश यादव से धक्का मुक्की हो गई।”

‘जिंदा या मुर्दा- नीरज मिश्रा मुझे चाहिए’

मुनीष ने आगे कहा, “धक्का-मुक्की ज्यादा हुई तो युवराज को ये नागवार गुजरा कि किसी ने मेरे हाथ क्यों लगा दिया। पुलिस बल, सीईओ, उमाशंकर यादव इंस्पेक्टर इनके साथ चल रहा था। यह इतना बौखला गया कि अखिलेश यादव ने वहीं से अपने पिताजी को फोन किया और चिल्ला कर कहा कि नीरज मिश्रा मुझे जिंदा या मुर्दा चाहिए।”

भाई की हत्या को लेकर मुनीष बताते हैं, “शाम को जैसे ही पोलिंग खत्म हुई तो इन्होंने (सपा कार्यकर्ताओं) तांडव शुरू किया। हमारा खेती-बाड़ी देखने वाले एक बसपा कार्यकर्ता के घर तोड़-फोड़ कर दी। उसकी माताजी मौके पर थी, महिलाओं के सामने अभद्रता की। इन कार्यकर्ताओं ने उनकी योनि में पंखे की डंडी डाल दी।” उन्होंने कहा, “इसके बाद फायरिंग में एक सपा कार्यकर्ता मारा गया। जिसमें नीरज का कहीं कोई इन्वॉल्वमेंट नहीं था।”

सपा कार्यकर्ताओं ने नीरज की बेरहमी से क्रूरतम हत्या कर दी: मुनीष

मुनीष ने आगे कहा, “इसके बाद फिर इन्होंने हमारे घर पर चढ़ाई की। नीरज ट्यूबवेल की तरफ निकल गया। वो अकेला था, निहत्था था और सिपाही ने उसकी घेराबंदी कर दी। नीरज मिश्रा को पुलिसवालों ने पकड़ा और बाद में सपा के कार्यकर्ताओं को दे दिया। फिर वो अपने गाँव की तरफ मारते-पीटते, बाद में घसीटते हुए ले गए। और बेरहमी से सपा के कार्यकर्ताओं ने क्रूरतम, निर्मम तरीके से उसकी मारते-मारते हत्या कर दी।”

मुनीष ने अपनी बातचीत में हत्या करने वालों में मुख्य तौर पर अशोक यादव, अवनीश यादव, राम शरण उर्फ मुन्नू सिंह, पप्पू सिंह, सुनील यादव और राम विलास यादव का नाम लिया। उन्होंने कहा, “ये अखिलेश के बिल्कुल राइट आर्म थे। अखिलेश से फोन से बात हो रही थी। आसपास लोगों की हिम्मत नहीं पड़ी किसी की भी उनसे बोलने की। क्योंकि पूरे जनपद की फोर्स चल रही थी। मारने के बाद सीओ ने इंस्पेक्टर से कहा कि इसको अब तुम लाश गायब कर दो और फिर हम देख लेंगे।”

मुनीष ने आगे कहा, “इन लोगों ने उसका सिर काट दिया और अखिलेश को खुश करने के लिए सिर को अपने पास रख लिया। सिर कटे शव को नदी में डाल दिया। जब शव मिला तो सपा के कार्यकर्ता लाश छीनने के लिए आगे बढ़े क्योंकि ये लाश गायब करना चाहते थे ताकि केस खत्म हो जाए। सिर आज तक नहीं मिला वो ब्रीफकेस में रख के अखिलेश यादव के पास लखनऊ भेजा गया था। 10 साल तक केस लड़ते रहे और 2014 में अशोक, अवनीश और मुन्नू, पप्पू-विलास को आजीवन कारावास हुआ।”

कोर्ट केस लड़ते वक्त भी मुनीष को धमकियाँ मिलती रहीं, उन्हें झूठे मुकदमे तक में फँसाया गया। मुनीष ने बताया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सत्ता संभालने के बाद उन्हें बुलाया और सुरक्षा के लिए उन्होंने गनर दिया है।

‘किसी ने नहीं सुना क्योंकि हमारा सच असुविधाजनक था’: क्या है उन्नाव रेप केस जिसमें कुलदीप सेंगर की रिहाई पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक, क्यों एक बेटी ने लिखा- थकी हूँ, डरी हूँ

सुप्रीम कोर्ट ने 2017 के उन्नाव रेप केस में उत्तर प्रदेश के पूर्व MLA कुलदीप सिंह सेंगर को जमानत देने के दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले पर रोक लगा दी। 29 दिसंबर 2025 को सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सीबीआई की अपील पर सुनवाई करते हुए यह रोक लगाई।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि इस मामले में कई सवाल उठ रहे हैं। कोर्ट ने देखा कि प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रन फ़्रॉम सेक्सुअल ऑफ़ेंस (POCSO) एक्ट के सेक्शन 5 के तहत ‘पब्लिक सर्वेंट’ शब्द का दिल्ली हाई कोर्ट का मतलब गलत हो सकता है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के मतलब से लेजिस्लेटर गंभीर सेक्सुअल असॉल्ट के नियमों के तहत जिम्मेदारी से बच सकते हैं।

दिल्ली हाई कोर्ट के बेल ऑर्डर पर रोक लगाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने सेंगर को नोटिस जारी किया और निर्देश दिया कि उसे जेल से रिहा न किया जाए। बेंच ने कहा, “हमें पता है कि जब किसी दोषी को रिहा किया जाता है, तो ऐसे ऑर्डर पर आमतौर पर रोक नहीं लगाई जाती है। लेकिन खास बातों के मद्देनजर हम 23 दिसंबर के हाई कोर्ट के ऑर्डर पर रोक लगाते हैं।” खास बात यह है कि सेंगर को बेल तो मिल गई, लेकिन दूसरे मामलों में शामिल होने की वजह से वह जेल में ही रहा।

CBI की तरफ से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि हाई कोर्ट ने यह मानकर गलती की कि POCSO एक्ट के सेक्शन 5(c) के तहत अपराध नहीं बनता, क्योंकि सेंगर पब्लिक सर्वेंट नहीं था। उन्होंने बताया कि सेंगर MLA के तौर पर पब्लिक ट्रस्ट की पोजीशन पर था और उसे पीड़िता के पिता की मौत के लिए पहले ही दोषी ठहराया जा चुका था। SG मेहता ने POCSO एक्ट के सेक्शन 42A का भी जिक्र किया।

सेंगर की तरफ से सीनियर वकील सिद्धार्थ दवे और एन हरिहरन ने हाई कोर्ट के आदेश का बचाव करते हुए कहा कि सजा सिर्फ इसलिए दी गई क्योंकि ट्रायल कोर्ट ने उन्हें पब्लिक सर्वेंट के तौर पर वर्गीकृत किया था। और ऐसा वर्णीकरण कानूनी तौर पर शक के दायरे में आता है।

सेंगर के परिवार ने कोर्ट के आदेश पर निराशा जताई

मीडिया से बात करते हुए, सेंगर की बेटी ऐश्वर्या सेंगर ने कहा कि वे “केस के मेरिट पर बहस भी शुरू नहीं कर सकते”। उन्होंने बताया कि केस में विक्टिम ने कई बार अपना बयान बदला था और तीन मौकों पर कहे गए क्राइम का समय बदला था।

उन्होंने कहा, “आज हम केस के मेरिट पर बहस भी शुरू नहीं कर पाए, कि उसने कई बार अपना बयान बदला है, तीन बार टाइम बदला है, दोपहर 2 बजे से शुरू करके, शाम 6 बजे और फिर आखिर में रात 8 बजे। AIIMS मेडिकल बोर्ड ने कहा है कि वह 18 साल से ज्यादा की थी… मैं पिछले 8 सालों से इंसाफ़ के लिए लड़ रही हूँ, लेकिन शायद मेरे और मेरे परिवार के दुखों का कोई मतलब नहीं है। हमसे हमारी इज्जत, हमारी शांति और यहाँ तक कि सुने जाने का हमारा बुनियादी हक भी छीन लिया गया है। अभी भी इंसाफ की उम्मीद है। मैं मीडिया से आग्रह करती हूँ कि कोई गलत जानकारी न फैलाए।”

सेंगर की दूसरी बेटी, इशिता ने भी एक पब्लिक स्टेटमेंट जारी करके पिछले आठ सालों में केस पर कोर्ट और पब्लिक के रिस्पॉन्स से अपनी परेशानी और निराशा जाहिर की। उन्होंने कहा कि उनका परिवार चुप रहा, इंस्टीट्यूशन और सही प्रोसेस पर भरोसा किया, लेकिन उसे लगातार धमकियाँ मिली। सोशल मीडिया पर मौत और रेप तक की धमकियाँ दी गई।

उन्होंने अपने परिवार पर पड़े आर्थिक, सामाजिक और इमोशनल असर के बारे में बताया। उसके मुताबिक पब्लिक प्रेशर में सबूतों और कानूनी प्रक्रिया को दबा दिया गया। उन्होंने अधिकारियों से बगैर किसी दबाव के कानून के मुताबिक काम करने की अपील करते हुए अपनी बात खत्म की। साथ ही कोर्ट पर अपना भरोसा जताया।

हाई कोर्ट ने गंभीर अपराध न होने का हवाला देते हुए जमानत दी

इससे पहले 23 दिसंबर 2025 को, दिल्ली हाई कोर्ट ने सेंगर की उम्रकैद की सजा सस्पेंड कर दी थी और अपील पेंडिंग रहने तक उन्हें सशर्त जमानत दे दी थी। जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद और जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर की डिवीजन बेंच ने फैसला सुनाया कि सेंगर POCSO एक्ट के सेक्शन 5(c) के तहत ‘पब्लिक सर्वेंट’ की परिभाषा में नहीं आते, जो पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट के अपराध को बढ़ाता है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि POCSO एक्ट के सेक्शन 2(2) के अनुसार, डेफिनिशन इंडियन पीनल कोड (IPC), CrPC, जुवेनाइल जस्टिस एक्ट या IT एक्ट से ली जानी चाहिए और IPC के सेक्शन 21 के तहत, एक MLA को पब्लिक सर्वेंट नहीं माना जाता है।

इस आधार पर कोर्ट ने माना कि सेक्शन 5 के तहत गंभीर अपराध लागू नहीं होता है। इसके अलावा, कुलदीप सिंह सेंगर पहले ही 7 साल और 5 महीने से ज़्यादा कस्टडी में बिता चुका है, जो सेक्शन 4 POCSO के तहत बेस अपराध के लिए कम से कम 7 साल की सज़ा से ज़्यादा है, इसलिए अपील पेंडिंग रहने तक बेल दिया जा सकता है।

गौरतलब है कि दिल्ली हाई कोर्ट ने उसे बेल तो दे दी, लेकिन किसी भी अपराध से बरी नहीं किया। उसे केस की टेक्निकैलिटी के आधार पर बेल दी गई थी, मेरिट के आधार पर नहीं।

सोशल मीडिया पर आरोप और गड़बड़ियों के दावे

कई सोशल मीडिया यूजर्स और कमेंट करने वालों ने उन्नाव रेप केस में कथित गड़बड़ियों को लेकर चिंता जताई है, और दावा किया है कि कुलदीप सिंह सेंगर को शायद गलत तरीके से फँसाया गया है। इन दावों में कोर्ट के रिकॉर्ड और मीडिया रिपोर्ट्स से लिए गए कई पॉइंट्स का हवाला दिया गया है।

एक बात जो उठाई गई है, वह है घटना के कथित समय में अंतर। कोर्ट के डॉक्यूमेंट्स में बताई गई समरी के अनुसार, पीड़िता ने घटना के तीन अलग-अलग समय बताए हैं, 17 अगस्त 2017 को मुख्यमंत्री को लिखे लेटर में दोपहर 2:00 बजे, 12 सितंबर 2017 को मीडिया इंटरव्यू में शाम 6:00 बजे, और प्रॉसिक्यूशन की थ्योरी में रात 8:00 बजे से 8:30 बजे के बीच।

एक और मुद्दा पीड़िता की उम्र को लेकर है। स्कूल एडमिशन रजिस्टर और मेडिकल राय सहित अलग-अलग सोर्स से जमा किए गए डॉक्यूमेंट्स में उसकी जन्मतिथि 17 अगस्त 2001, 5 जुलाई 1998 और अगस्त 2002 दर्ज है। RML हॉस्पिटल, CMO उन्नाव और AIIMS के मेडिकल असेसमेंट से पता चलता है कि कथित अपराध के समय उसकी उम्र 18 साल से ज़्यादा थी, जबकि स्कूल रिकॉर्ड और कोर्ट की गवाही से पता चलता है कि वह नाबालिग थी।

यूज़र्स ने सर्वाइवर की रिपोर्टिंग की टाइमलाइन के आधार पर आरोपों की क्रेडिबिलिटी पर भी सवाल उठाए हैं। यह देखा गया है कि उसने कथित घटना की तुरंत रिपोर्ट नहीं की और बाद में अपनी कंप्लेंट में नए नाम जोड़े, जिनमें से कुछ को बाद में यह कहकर हटा दिया गया कि उसे वकीलों ने ‘गुमराह’ किया था।

एक अलग वायरल दावे से पता चलता है कि एक महिला आरोपी का नाम बाद में बयान में डाला गया था, जिसमें कैरेट मार्क का इस्तेमाल करके ‘बराबर’ शब्द शामिल किया गया था। इसका मतलब है कि मुख्य आरोपी से मेल खाने के लिए उसकी भूमिका को बदला गया था। आलोचकों का तर्क है कि इस तरह की एडिटिंग से आरोप तय करने के तरीके पर सवाल उठते हैं।

जमानत आदेश के खिलाफ विरोध प्रदर्शन

23 दिसंबर 2025 को कुलदीप सेंगर को जमानत देने के दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के बाद नई दिल्ली में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। उन्नाव पीड़िता की माँ और ऑल-इंडिया डेमोक्रेटिक विमेंस एसोसिएशन (AIDWA) के सदस्यों सहित लगभग 30 कार्यकर्ताओं ने हाई कोर्ट के बाहर 26 दिसंबर को प्रदर्शन किया। उनके हाथों में तख्तियां थीं और वे ‘बलात्कारियों को बचाना बंद करो’ जैसे नारे लगा रहे थे।

इंडियन यूथ कॉन्ग्रेस (IYC) ने जमानत आदेश की निंदा करते हुए एक कैंडललाइट मार्च निकाला। 27 दिसंबर को एक्टिविस्ट योगिता भयाना और कांग्रेस लीडर मुमताज पटेल ने पार्लियामेंट के पास एक धरना दिया। उन्हें पुलिस हिरासत में भी लिया गया। अधिकारियों ने उस इलाके को नॉन-परमिटेड प्रोटेस्ट जोन घोषित कर दिया है।

सेंटर फॉर स्ट्रगलिंग वीमेन, प्रगतिशील महिला संगठन, और ऑल इंडिया महिला सांस्कृतिक संगठन समेत कई महिला अधिकार संगठनों ने 28 दिसंबर को स्टूडेंट ग्रुप्स के साथ जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन किया। उन्नाव पीड़िता और उसकी माँ भी इसमें शामिल हुईं।

उन्नाव केस टाइम लाइन

2017 – शुरुआती आरोप और FIR

4 जून 2017 को, माखी गाँव की एक 17 साल की लड़की ने दावा किया कि सेंगर ने नौकरी दिलाने के बहाने उसे अपने घर पर बुलाकर उसके साथ रेप किया। उसने दावा किया कि सेंगर ने उसे मुंह न खोलने की धमकी दी। 11 से 20 जून 2017 के बीच, कथित तौर पर पीड़िता को अगवा कर लिया गया और स्थानीय लोगों ने उसके साथ गैंगरेप किया। 20 जून को IPC की धारा 363, 366 और 376 के तहत आरोपितों पर FIR दर्ज की गई। FIR में सेंगर का नाम नहीं था।

अगस्त 2017 में पीड़िता ने सेंगर के खिलाफ शिकायत दर्ज करने की कोशिश की। पुलिस ने कथित तौर पर उसका नाम शामिल करने से इनकार कर दिया। फरवरी 2018 में उसने सेंगर का नाम आरोपित के तौर पर शामिल करने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

2018 – कस्टोडियल डेथ और CBI जांच

3 अप्रैल 2018 को, पीड़िता के पिता को सेंगर के भाई अतुल और दूसरों ने पीटा। 5 अप्रैल को, पिता को आर्म्स एक्ट के झूठे आरोपों में जेल भेज दिया गया। जाँच के दौरान पता चला कि पीड़िता के पिता के पास मिली देसी पिस्तौल प्लांट की हुई थी। 8 अप्रैल को पीड़िता ने विरोध में मुख्यमंत्री के घर के बाहर खुद को आग लगाने की कोशिश की।

9 अप्रैल को, उसके पिता की ज्यूडिशियल कस्टडी में मौत हो गई। पोस्टमॉर्टम में चोट के 14 निशान मिले। 10 अप्रैल को, अतुल सेंगर को गिरफ्तार किया गया और इस मामले ने पूरे देश का ध्यान खींचा। 12 अप्रैल को ये मामला CBI को सौंप दिया गया, जिसने कुलदीप सेंगर के खिलाफ FIR दर्ज की।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने देरी की आलोचना की और उनकी गिरफ्तारी का आदेश दिया। 13 अप्रैल को सेंगर को CBI ने गिरफ्तार कर लिया। 15 अप्रैल को लड़की को सेंगर के घर ले जाने के आरोप में शशि सिंह को गिरफ्तार किया गया। 18 अप्रैल को, पीड़िता ने मजिस्ट्रेट के सामने अपना बयान दर्ज कराया; पीड़िता की उम्र विवाद का मुद्दा बन गई।

2018 – चार्जशीट और ट्रायल

11 जुलाई 2018 को CBI ने सेंगर और शशि सिंह के खिलाफ रेप और किडनैपिंग के लिए चार्जशीट फाइल की। ​​13 जुलाई को पीड़िता के पिता की कस्टोडियल डेथ के मामले में दूसरी चार्जशीट फाइल की गई। इसमें अतुल सेंगर और दूसरों का नाम भी था।

2019 – सुप्रीम कोर्ट का दखल और सजा

28 जुलाई 2019 को पीड़िता और उसके परिजन कार दुर्घटना में बुरी तरह घायल हुए। दो रिश्तेदारों की मौत भी इस दुर्घटना में हो गई। पीड़िता और उसका वकील गंभीर रूप से घायल हो गए। 29 जुलाई को, सेंगर और दूसरों के खिलाफ मर्डर और साज़िश के लिए FIR दर्ज की गई।

31 जुलाई को, सुप्रीम कोर्ट ने सभी संबंधित केस दिल्ली ट्रांसफर कर दिए और पीड़िता और उसके परिवार के लिए CRPF प्रोटेक्शन का ऑर्डर दिया। 5 अगस्त 2019 को, दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में रेप का ट्रायल शुरू हुआ। 11 सितंबर को, पीड़िता ने AIIMS हॉस्पिटल में एक स्पेशल इन-कैमरा हियरिंग में गवाही दी।

16 दिसंबर 2019 को, सेंगर को IPC और POCSO के तहत नाबालिग से रेप का दोषी ठहराया गया। 20 दिसंबर 2019 को सैंगर को उम्रकैद की सजा सुनाई गई और 25 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया।

2020 – हिरासत में डेथ का दोषी

4 मार्च 2020 को सेंगर और दूसरों को कस्टोडियल डेथ केस में गैर-इरादतन हत्या का दोषी ठहराया गया। 13 मार्च 2020 को इस मामले में भी 10 साल जेल की सज़ा सुनाई गई।

2021-2024 – अपील और सुरक्षा

सेंगर इस दौरान जेल में ही रहा। कई जमानत अर्जी खारिज कर दी गईं। पीड़िता अपने परिवार के साथ CRPF प्रोटेक्शन में रहती रही। 23 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने पीड़िता के रिश्तेदारों की सिक्योरिटी कम करने की इजाजत दी, लेकिन निर्देश दिया कि पीड़ित की प्रोटेक्शन जारी रहनी चाहिए।

2025 – हाई कोर्ट बेल और सुप्रीम कोर्ट स्टे

23 दिसंबर 2025 को, दिल्ली हाई कोर्ट ने सेंगर की उम्रकैद की सजा सस्पेंड कर दी और उसे बेल दे दी। कोर्ट ने कहा कि वह POCSO एक्ट के तहत पब्लिक सर्वेंट नहीं है और उसने काफी समय जेल में काटा है। कोर्ट ने तर्क दिया कि गंभीर जुर्म के प्रोविज़न उस पर लागू नहीं होते, और चूंकि वह पहले ही सात साल से ज़्यादा कस्टडी में बिता चुका था, जो एक्ट के सेक्शन 4 के तहत मिनिमम सज़ा से ज़्यादा था, इसलिए अपील पेंडिंग रहने तक बेल सही थी।

29 दिसंबर 2025 को, सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के ऑर्डर पर स्टे लगा दिया और जेल से उसकी रिहाई पर रोक लगा दी। बेंच ने POCSO के तहत लेजिस्लेटर को ‘पब्लिक सर्वेंट’ स्टेटस से बाहर रखने के कानूनी असर पर गंभीर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के मतलब से लेजिस्लेटर को एग्रेवेटेड असॉल्ट के प्रोविज़न से छूट मिल सकती है और वह मामले की डिटेल में जाँच करने के लिए तैयार हो गया।

उन्नाव केस पर पूरे देश की नजर है। इसमें कानूनी कार्रवाई अभी भी चल रही है। दिल्ली हाई कोर्ट ने कुलदीप सेंगर को बेल दे दी है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने ऑर्डर पर रोक लगा दी है और मामले की डिटेल में सुनवाई करेगा। बेल ऑर्डर के बाद कई शहरों में प्रोटेस्ट हुए हैं। इस केस ने कानूनी और प्रोसेस से जुड़े सवाल खड़े किए हैं जो आगे कोर्ट के सामने आएँगे।

(ये लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)