राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के रावला थाना क्षेत्र में खौफनाक हत्या का मामला सामने आया है। यहाँ शादी के महज तीन महीने बाद एक पत्नी ने अपने ही पति को मौत के घाट उतारने की ऐसी साजिश रची, जिसे जानकर हर कोई सन्न रह गया। यह हत्या अचानक नहीं हुई, बल्कि इसके पीछे महीनों से की जा रही सोची-समझी प्लानिंग थी।
इस हत्या की प्लानिंग इंदौर के राजा रघुवंशी हत्याकांड की तरह थी, जहाँ राजा की पत्नी सोनम रघुवंशी ने प्रेमी राज के साथ मिलकर हत्या की योजना बनाई थी और घुमाने के नाम पर मौत के घाट उतार दिया था।
7 साल का प्रेम संबंध, जिसे परिवार भी जानता था
सादुलशहर निवासी अर्जु उर्फ अंजली (23) और संजय उर्फ संजू (25) पिछले करीब 6 से 7 साल से एक-दूसरे के प्रेम संबंध में थे। दोनों श्रीगंगानगर के एक ही कॉलेज में पढ़ते थे। पढ़ाई के दौरान दोस्ती हुई, जो धीरे-धीरे प्यार में बदल गई। दोनों अक्सर मिलते-जुलते रहते थे और एक-दूसरे के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं करते थे।
इस रिश्ते की जानकारी अंजली के परिजनों को भी थी, लेकिन सामाजिक दबाव, पारिवारिक प्रतिष्ठा और अन्य कारणों से उन्होंने अंजली की शादी रावला निवासी आशीष कुमार (27) से कर दी। आशीष पढ़ा-लिखा युवक था, जिसने Msc कर रखी थी और हाल ही में एक निजी स्कूल में शिक्षक के पद पर नौकरी शुरू की थी।
30 अक्टूबर 2025 को अंजली और आशीष की शादी हुई। लेकिन यह शादी अंजली की मर्जी से नहीं थी। शादी के बाद भी उसका मन अपने प्रेमी संजय में ही अटका रहा। वहीं संजय भी इस शादी से बेहद परेशान था और लगातार अंजली के संपर्क में बना हुआ था।
शादी के बाद बढ़ता तनाव और पढ़ाई का बहाना
शादी के बाद अंजली ससुराल में खुश नहीं थी। उसे लगने लगा कि अब वह संजय से दूर हो गई है और शायद दोबारा कभी उसके साथ नहीं रह पाएगी। इसी बेचैनी में उसने श्रीगंगानगर में MA की पढ़ाई करने का बहाना बनाया और पति आशीष से वहाँ जाकर रहने की इजाजत माँगी। अंजली की योजना पढ़ाई के नाम पर संजय के साथ दोबारा नजदीकी बढ़ाना।
लेकिन आशीष ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। उसने साफ कह दिया कि वह अकेले किसी दूसरे शहर में रहने की अनुमति नहीं देगा। आशीष के इस इनकार को अंजली ने प्रेम संबंध के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट मान लिया। इसी नाराजगी को उसने संजय के साथ साझा किया और यहीं से एक खौफनाक साजिश की नींव पड़ी।
मायके में बनी मौत की योजना
हत्या से करीब 16 दिन पहले अंजली मायके गई। परिजनों को लगा कि वह कुछ दिन आराम करने और घरवालों से मिलने आई है, लेकिन असल में वह संजय से मिलने और आगे की योजना बनाने गई थी। इसी दौरान अंजली और संजय ने आशीष को रास्ते से हटाने का पूरा प्लान तैयार किया।
उन्होंने तय किया कि हत्या ऐसी जगह की जाएगी, जहाँ कोई गवाह न हो और बाद में उसे सड़क हादसा या लूट का रूप दिया जा सके। उन्होंने जगह, समय, हथियार और भागने के रास्ते तक की पूरी रूपरेखा बनाई। संजय ने अपने दो दोस्तों, रोहित उर्फ रॉकी और बादल उर्फ सिद्धार्थ को भी इस साजिश में शामिल कर लिया।
30 जनवरी की रात को घूमने के लिए ले गई बाहर
30 जनवरी 2026 की रात अंजली रोज की तरह आशीष के साथ खाना खाने के बाद उसे घूमने के लिए बाहर ले गई। आशीष को जरा भी अंदाजा नहीं था कि यह उसकी जिंदगी की आखिरी सैर होगी। अंजली उसे गाँव से बाहर एक सुनसान सड़क पर ले गई।
वहीं झाड़ियों में पहले से संजय अपने दोनों साथियों के साथ छिपा हुआ था। जैसे ही अंजली ने इशारा किया, तीनों आरोपित अचानक बाहर निकले और आशीष पर डंडों से ताबड़तोड़ हमला कर दिया। आशीष जमीन पर गिर पड़ा, लेकिन उसकी सांसें अभी चल रही थीं।
यह देखकर आरोपितों ने उसके गले में मफलर डालकर पूरी ताकत से गला घोंट दिया, जिससे उसकी मौके पर ही मौत हो गई। यह पूरी वारदात कुछ ही मिनटों में अंजाम दे दी गई, लेकिन इसके पीछे की योजना कई दिनों से तैयार की जा रही थी।
हत्या के बाद गढ़ी हादसे और लूट की कहानी
हत्या के बाद अंजली ने खुद अपने कानों के झुमके और आशीष का मोबाइल फोन आरोपितों को दे दिया, ताकि मामला लूट जैसा लगे। योजना यह थी कि पुलिस को लगे कि किसी अज्ञात वाहन की टक्कर या लूट के दौरान आशीष की मौत हुई है।
अंजली खुद सड़क पर बेहोशी का नाटक करती हुई लेट गई। कुछ देर बाद परिजनों और पुलिस को सूचना दी गई। पुलिस मौके पर पहुँची और दोनों को अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने आशीष को मृत घोषित कर दिया। शुरुआत में पुलिस ने मामला सड़क दुर्घटना मानकर जाँच शुरू की, लेकिन पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने पूरी कहानी पलट दी।
पोस्टमॉर्टम और तकनीकी जाँच से खुली साजिश
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में आशीष के सिर पर गंभीर चोटों और गले पर दबाव के स्पष्ट निशान मिले। डॉक्टरों ने साफ कहा कि यह सामान्य सड़क हादसा नहीं, बल्कि बेरहमी से की गई हत्या है। इसके बाद पुलिस ने कॉल डिटेल रिकॉर्ड, मोबाइल लोकेशन और एफएसएल जाँच शुरू की।
जाँच में सामने आया कि घटना से पहले और बाद में अंजली और संजय के बीच लगातार बातचीत हो रही थी। मोबाइल लोकेशन भी घटनास्थल के आसपास मिली। सख्ती से पूछताछ करने पर अंजली टूट गई और पूरी साजिश का खुलासा हो गया। पुलिस ने इस मामले में अंजली, उसके प्रेमी संजय और उसके दोनों साथी रोहित और बादल को गिरफ्तार कर लिया है।
तीनों युवकों को 5 दिन की और अंजली को 2 दिन की पुलिस रिमांड पर भेजा गया है। पुलिस अब यह भी जाँच कर रही है कि क्या इस साजिश में कोई और व्यक्ति शामिल था, हत्या के लिए हथियार कहाँ से लाए गए और योजना कितने समय से बनाई जा रही थी।
भारत दुनिया में सड़क दुर्घटनाओं से सबसे ज्यादा प्रभावित देश है। राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएच) कुल सड़क नेटवर्क का केवल 2.3% हैं, लेकिन यहाँ होने वाली मौतें देश की कुल सड़क हादसों में हुई मौतों का 36% से ज्यादा होती हैं। हालाँकि वर्ष 2025 में पहली बार तीन साल की बढ़ती प्रवृत्ति टूटी और एनएच पर दुर्घटनाएँ तथा मौतें दोनों 11% से अधिक घटीं।
सड़क परिवहन एवँ राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के लोकसभा में पेश आँकड़ों के अनुसार, 2025 में एनएच पर 1,34,307 दुर्घटनाएँ हुईं और 57,482 लोगों की जान गई, जो 2024 के 1,50,958 दुर्घटनाओं और 64,772 मौतों से काफी कम है।
इस ऐतिहासिक कमी में उत्तर प्रदेश का योगदान सबसे बड़ा रहा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में राज्य ने 2017 से ही सड़क सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। चाहे राष्ट्रीय राजमार्ग हों या राज्य की सड़कें, गुणवत्ता सुधार, इंजीनियरिंग में सुधार, सख्त प्रवर्तन और त्वरित आपात सहायता… सब पर लगातार काम हुआ। परिणामस्वरूप उत्तर प्रदेश में एनएच पर मौतें 2024 के 9,560 से घटकर 2025 में 6,973 रह गईं यानी 2,587 जानें बचीं। यह देश में सबसे बड़ी गिरावट है।
साल 2025 के आँकड़ों में यूपी ने की सुधारों की अगुवाई
MoRTH के प्रोविजनल आँकड़े (eDAR पोर्टल पर राज्यों से प्राप्त जानकारी पर आधारित) स्पष्ट दिखाते हैं कि 2025 में एनएच पर कुल दुर्घटनाएँ 16,651 और मौतें 7,290 कम हुईं। इस कमी का नेतृत्व इन पाँच राज्यों ने किया- उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना। इनमें से उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश ने अकेले 6,072 मौतों की कमी में योगदान दिया।
राज्यवार प्रमुख आँकड़े-
उत्तर प्रदेश: मौतें 9,560 से 6,973 (2,587 कम)
मध्य प्रदेश: मौतें 4,644 से 2,882 (1,762 कम)
पंजाब, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना ने भी उल्लेखनीय सुधार दिखाया।
वहीं कुछ राज्यों में वृद्धि हुई
गुजरात: दुर्घटनाएँ 3,519 से 3,944, मौतें 2,192 से 2,380
झारखंड: दुर्घटनाएँ 2,039 से 2,056, मौतें 1,686 से 1,783
उत्तराखंड: दुर्घटनाएँ 828 से 875, मौतें 543 से 605
दिल्ली: दुर्घटनाएँ 593 से 1,827 (बड़ी बढ़ोतरी)
सड़क दुर्घटना के मामले में यूपी में सबसे ज्यादा सुधार
ये आँकड़े साबित करते हैं कि जहाँ कुछ राज्य पीछे रहे, वहीं उत्तर प्रदेश ने सबसे प्रभावी और व्यवस्थित सुधार किया। यह संयोग नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की दूरदर्शी नीतियों और सख्त निगरानी का परिणाम है।
योगी सरकार की नीतियों से आया सुधार
उत्तर प्रदेश में 2025 में राष्ट्रीय राजमार्गों पर मौतें 9,560 से घटकर 6,973 हो गईं। यह देश में सबसे बड़ी कमी है। यह संयोग नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लगातार सख्ती और बहुआयामी रणनीति का नतीजा है। सरकार बनने के बाद से ही सड़क सुरक्षा को ‘सामाजिक चुनौती’ मानते हुए 4E मॉडल (Education, Enforcement, Engineering, Emergency Care) पर जोर दिया गया है।
यूपी में BJP सरकार बनते ही सड़क सुरक्षा को प्राथमिकता
योगी आदित्यनाथ ने 18 मार्च 2017 को पहली बार मुख्यमंत्री बनते ही सड़क गुणवत्ता और सुरक्षा पर सख्त निर्देश दिए थे। 25 मार्च 2017 को उन्होंने आदेश दिया कि ढाई महीने (जून 2017 तक) में पूरे प्रदेश की सड़कों को गड्ढामुक्त किया जाए। यह अभियान इतना गंभीर था कि अधिकारियों को व्यक्तिगत जिम्मेदारी सौंपी गई और समय-समय पर समीक्षा की गई।
इस शुरुआती कदम ने आधार तैयार किया। गड्ढों से होने वाली दुर्घटनाएँ उत्तर प्रदेश में बहुत आम थीं। गड्ढामुक्त सड़क अभियान ने न केवल सड़कों की गुणवत्ता सुधारी, बल्कि लोगों में विश्वास भी जगाया कि सरकार सड़क सुरक्षा को गंभीरता से ले रही है।
साल 2017 के बाद गड्ढामुक्त अभियान रुका नहीं। हर साल, खासकर त्योहारों से पहले, मुख्यमंत्री ने सख्त निर्देश दिए। सितंबर 2025 में फिर चेतावनी दी गई कि त्योहारों से पहले सभी शहरों और गाँवों की सड़कें गड्ढामुक्त होंगी। नगर निगमों, पीडब्ल्यूडी और ग्राम विकास विभाग को जवाबदेह बनाया गया।
दरअसल, खराब सड़कें दुर्घटनाओं का बड़ा कारण होती हैं, जिसमें वाहन फिसलना, टायर फटना, अचानक ब्रेक लगाने से जुड़ी घटनाएँ आम हो जाती है। ऐसे में योगी सरकार ने गड्ढा मुक्त अभियान को नियमित बना दिया है। सड़कों की गुणवत्ता में सुधार से न केवल एनएच, बल्कि राज्य राजमार्ग और ग्रामीण सड़कों पर भी दुर्घटनाएँ घटीं। यह योगी सरकार की वह नीति है जो लंबे समय तक असर दिखाती है।
कोहरे में सड़क सुरक्षा को लेकर सख्त निर्देश
उत्तर प्रदेश में सर्दियों में घना कोहरा दुर्घटनाओं का बड़ा कारण बनता है। दिसंबर 2025 में यमुना एक्सप्रेसवे पर मथुरा में हुए भीषण हादसे (13 मौतें) के बाद मुख्यमंत्री योगी ने तुरंत समीक्षा की और कड़े कदम उठाए।
एक्सप्रेसवे पर गश्त बढ़ाना, ब्लैक स्पॉट्स पर टीम तैनात करना
रिफ्लेक्टर्स लगाना, 24×7 क्रेन और एम्बुलेंस उपलब्ध कराना
कोहरे में स्पीड लिमिट 120 किमी/घंटा से घटाकर 80 किमी/घंटा करने का प्रस्ताव
टू-व्हीलर सवारों के लिए टोल प्लाजा पर रुकने की व्यवस्था, कंबल और बुनियादी सुविधाएं
टोल प्लाजा पर पब्लिक एड्रेस सिस्टम से रियल-टाइम सूचना
सुरक्षा दिशानिर्देशों वाले पर्चे बाँटना, हेल्पलाइन नंबर 14449 का प्रचार
सड़क पर पार्किंग पूरी तरह प्रतिबंधित
स्ट्रीट लाइटिंग की निरंतर जाँच, खराब लाइट तुरंत ठीक करना
ये उपाय यमुना, आगरा-लखनऊ, पूर्वांचल, बुंदेलखंड और गोरखपुर लिंक एक्सप्रेसवे पर लागू किए गए। परिणामस्वरूप कोहरे में होने वाली रियर-एंड टक्करें काफी कम हुईं। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि कोई व्यक्ति खुले में सोता न मिले और बेघरों के लिए रैन बसेलर और अलाव की व्यवस्था हो। यह मानवीय दृष्टिकोण भी योगी सरकार की विशेषता है।
AI आधारित रोड सेफ्टी प्रोजेक्ट लागू करने वाला देश का पहला राज्य
अगस्त 2025 में उत्तर प्रदेश देश का पहला राज्य बना जिसे केंद्र सरकार से AI आधारित सड़क सुरक्षा पायलट प्रोजेक्ट लागू करने की मंजूरी मिली। इसके लिए 2025-26 के बजट में 10 करोड़ रुपये रखे गए। जिसमें-
ITI लिमिटेड और mLogica के साथ सहयोग
दुर्घटना, वाहन, मौसम, सड़क विशेषताएँ और ड्राइवर प्रोफाइल का डेटा एनालिसिस
AI मॉडल से दुर्घटना के कारण पहचानना और भविष्य में रोकथाम
रियल-टाइम डेटा से नीति निर्माण
6 सप्ताह का पायलट प्रोजेक्ट, फिर केंद्र को विस्तृत रिपोर्ट
यह तकनीकी कदम दिखाता है कि योगी सरकार पारंपरिक उपायों के साथ-साथ आधुनिक तकनीक भी अपनाने में सबसे आगे है। AI से दुर्घटनाओं के बारे में पहले से अंदाजा लगाकर उन्हें पहले ही रोका जा सकता है, यह योगी सरकार की दूरदर्शिता का प्रमाण है।
जनवरी को घोषित किया ‘सड़क सुरक्षा माह’
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 21 दिसंबर 2025 को निर्देश दिया कि जनवरी 2026 को पूरे राज्य में ‘सड़क सुरक्षा माह’ मनाया जाए। 4E मॉडल पर आधारित यह अभियान जन आंदोलन बने, इसके लिए विशेष निर्देश दिए गए-
पहला सप्ताह: जागरूकता, तहसील से जिला स्तर तक प्रचार
वास्तविक दुर्घटना केस स्टडी का उपयोग
NSS, NCC, डिजास्टर मित्र, स्काउट्स-गाइड्स की भागीदारी
बार-बार नियम तोड़ने वालों के लाइसेंस जब्त करना, वाहन जब्त करना
ब्लैक स्पॉट्स की स्थायी मरम्मत, रोड सेफ्टी ऑडिट
केवल टेबल-टॉप स्पीड ब्रेकर
एम्बुलेंस, स्कूल वाहन, भारी वाहनों की फिटनेस जांच
300 किमी से अधिक दूरी के लिए दो ड्राइवर अनिवार्य
गोल्डन ऑवर पर जोर, 108 और ALS एम्बुलेंस का रिस्पॉन्स टाइम कम करना
अवैध पार्किंग, अतिक्रमण पर सख्ती
शराब की दुकानों को स्कूल-कॉलेज से दूर रखना
नवंबर 2025 तक राज्य में 46,223 दुर्घटनाओं और 24,776 मौतों की जानकारी सामने आने पर योगी आदित्यनाथ बेहद गंभीर हो गए। उन्होंने इसे ‘पूरे परिवार का आजीवन दर्द’ बताते हुए बेहद कड़े मापदंडों को अपनाने का आदेश दिया, ताकि सड़क दुर्घटनाओं पर कड़ाई से लगाम लगाई जा सके।
एक मॉडल राज्य की दिशा में बढ़े यूपी के कदम
उत्तर प्रदेश ने 2025 में राष्ट्रीय राजमार्गों पर सबसे बड़ी गिरावट दर्ज कर साबित किया कि दृढ़ इच्छाशक्ति और बहुआयामी रणनीति से सड़क सुरक्षा में क्रांतिकारी बदलाव संभव है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 2017 से लेकर 2025 तक हर मौसम, हर चुनौती के लिए त्वरित और सख्त कदम उठाए। कोहरे में विशेष उपाय, AI तकनीक, जन आंदोलन, गड्ढामुक्त अभियान और 4E मॉडल का संतुलित क्रियान्वयन… ये सभी कदम मिलकर उत्तर प्रदेश को सड़क सुरक्षा में मॉडल राज्य बना रहे हैं।
यह प्रयास केवल आँकड़ों में कमी नहीं, बल्कि हजारों परिवारों को आजीवन दर्द से बचाने की दिशा में एक मानवीय पहल है। अन्य राज्य भी उत्तर प्रदेश के इन कदमों से प्रेरणा ले सकते हैं।
भारत और अमेरिका के बीच हुई ट्रेड डील में डोनाल्ड ट्रंप ने टैरिफ 50% से घटाकर 18% कर दिया। यद्यपि टैरिफ में यह कमी अस्थायी है, तथापि यह ट्रेड डील भारत को एक नई राह पर लेकर जायेगी। जिससे भारत आर्थिक चुनौतियां एवं संकट धीरे-धीरे समाप्त होती चली जायेंगी। यह टैरिफ छूट भारत को व्यापारिक गतिविधियों में सकारात्मक दिशा की ओर ले जायेगी। भारत वर्तमान में दुनिया की एक बड़ी अर्थव्यवस्था है, जिसमें अपार संभावनाएँ हैं। जहाँ बहुत बड़ी आबादी प्रौढ़ है और श्रम केंद्रित है।
उनके श्रम से भारत की अर्थव्यवस्था गति पकड़ेगी। अमेरिका के साथ यह ट्रेड डील भारत को विकसित देश बनाने के क्रम में भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। इस तरह के बड़े निर्णय भारत को 2047 से पहले ही विकसित भारत के सपने को साकार रूप प्रदान कर सकते हैं।
दरअसल टैरिफ अंतराष्ट्रीय व्यापार में लगने वाला कर है। इसे निर्यात कर भी कहते हैं। अभी कुछ महीने पहले ट्रंप के टैरिफ बढाये जाने पर विपक्षी नेता यह कहते हुए नहीं थक रहे थे कि भारतीय अर्थव्यवस्था दम तोड़ चुकी है। परंतु प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें किसी प्रकार कहीं कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और आज जिस रूप में सभी को प्रतिक्रिया मिली है, उससे विपक्ष को दाँतो तले चने चबाने पड़ रहे हैं।
प्रधानमंत्री ने धैर्य पूर्वक काम करते हुए अपने विपक्षियों को जवाब दिया है और यह बताया कि वैचारिक असहमति तो चलती रहेंगी, राष्ट्रहित पहले है। आज पूरी दुनिया भारतीय राजनीति के शिखर पुरुष माननीय मोदी जी की कूटनीति की प्रशसंक हैं।
विपक्ष यह आरोप लगाता रहता है कि मोदी काल में अर्थव्यवस्था दर घट रही है, लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है। सभी राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय आँकड़े यह बता रहे हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था दर लगातार वृद्धि कर रही है। कई संस्थाओं की रिपोर्ट आप देखेंगे तो स्वत: आपको यह ज्ञात होगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था किस रूप से आगे की ओर अग्रसर है।
इंडियन इकोनॉमी की फिटनेस रिपोर्ट
वर्ष
WB GDP
IMF GD
ADB GDP
2014
7.4%
7.4%
7.4%
2020
-6.6%
-6.6%
-6.6%
2025
6.3%
6.5%
7.2%
2026
6.6%
6.5%
6. 7%
भारत की GDP विकास दर पर जिस भी रूप में विपक्षी दल प्रश्न चिन्ह लगा रहे थे, यह टैरिफ छूट उन्हें करारा जवाब देता है। भारतीय अर्थव्यवस्था निरंतर प्रगतिशील है लेकिन विपक्ष केवल आलोचना करने के लिए सकारत्मक प्रयास को नकारात्मक दृष्टि के अनुरूप देखता है और उसमें कमियाँ खोजने का असफल प्रयास करता है।
व्यापार समझौते के दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति ने एक्स पर एक पोस्ट किया, “आज सुबह भारत के प्रधानमंत्री मोदी से बात करके मुझे बहुत सम्मान महसूस हुआ। वह मेरे सबसे अच्छे दोस्तों में से एक हैं, और अपने देश के एक शक्तिशाली और सम्मानित नेता हैं। हमने कई बातों पर बात की, जिसमें व्यापार और रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध को खत्म करना शामिल है। वह रूसी तेल खरीदना बंद करने और संयुक्त राज्य अमेरिका और वेनेजुएला से बहुत ज्यादा खरीदने पर सहमत हुए। इससे यूक्रेन में चल रहे युद्ध को खत्म करने में मदद मिलेगी, जिसमें हर हफ्ते हजारों लोग मर रहे हैं।”
राष्ट्रपति ट्रंप ने लिखा, “प्रधानमंत्री मोदी के प्रति दोस्ती और सम्मान के कारण और उनके अनुरोध पर, तुरंत प्रभाव से, हम संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत के बीच एक व्यापार समझौते पर सहमत हुए, जिसके तहत संयुक्त राज्य अमेरिका एक कम पारस्परिक टैरिफ लगाएगा, इसे 25% से घटाकर 18% कर देगा। वे भी इसी तरह संयुक्त राज्य अमेरिका के खिलाफ अपने टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं को घटाकर शून्य कर देंगे।”
उन्होंने आगे लिखा, “प्रधानमंत्री ने 500 बिलियन डॉलर से ज्यादा अमेरिकी ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, कृषि, कोयला और कई अन्य उत्पादों के अलावा, बहुत ज़्यादा स्तर पर “बाय अमेरिकन” के लिए भी प्रतिबद्धता जताई। भारत के साथ हमारे अद्भुत संबंध आगे और भी मजबूत होंगे। प्रधानमंत्री मोदी और मैं दो ऐसे लोग हैं जो काम पूरा करते हैं, जो ज्यादातर लोगों के बारे में नहीं कहा जा सकता। इस मामले पर ध्यान देने के लिए धन्यवाद!“
प्रस्तुत संदेश भारत और अमेरिका के प्रगाढ़ संबंध की भी व्याख्या करता है। यह संदेश यह भी बताता है कि भारत की विश्व में क्या स्थिति है। भारत का नेतृत्व अन्य देशों के मुकाबले कितना श्रेष्ठ है, इसकी भी पुष्टि इस संदेश के माध्यम से होती है। विपक्षी दल मोदी और ट्रंप की दोस्ती पर भी सवाल उठा रहे थे, यह संदेश उन्हें जवाब भी देता दिखाई देरा है।
अमेरिका द्वारा 18% तक टैरिफ घटाने से भारत पर होने वाले सकारात्मक प्रभावों की बहुत लम्बी सूची है। इससे भारत के सभी क्षेत्रों में सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिलेगा। भारत में इस तरह के निर्णय की बेहद आवश्यकता थी। भारत में विनिमार्ण कार्य होने से लोगो को रोजगार उपलब्ध होगा। जिससे प्रति व्यक्ति आय बढ़ेगी।
टैरिफ के आने से भारतीय निर्यात सस्ता होगा, कम टैरिफ से भारतीय सामान अमेरिका में सस्ते दाम पर बिक पाएँगे। निर्यात में वृद्धि, टेक्सटाइल, गारमेंट्स, ज्वेलरी, लेदर और इंजीनियरिंग गुड्स का निर्यात बढ़ेगा। रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। निर्यात आधारित उद्योगों में उत्पादन बढ़ने से नौकरियाँ बढ़ेंगी। भारत में उत्पादन की मात्रा में बढ़ोतरी होगी।
प्रस्तुत टैरिफ छूट से वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भारत को चीन, वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों पर प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलेगा। उद्योग के स्तर पर भी भारत में बडे़ परिवर्तन देखने को मिलेंगे। पश्चिम एक बाजार के रूप में भारत को दिखाई देगा। भारत में उद्योगों में भी वृद्धि देखने को मिलेगा।
पहले ऊँचे टैरिफ से प्रभावित MSME और निर्यातक कंपनियों को बड़ी राहत मिलेगी। इस बहुमुखी परिवर्तन से भारत एक विकसित अर्थव्यवस्था बनने की ओर और तेजी से बढ़ेगा। आर्थिक विकास को निर्यात और उत्पादन बढ़ने से GDP विकास दर को सकारात्मक समर्थन मिलेगा।
भारत–अमेरिका व्यापार संबंध में भी मजबूती देखने को मिलेगी। व्यापार के माध्यम से अमेरिका और भारत का एक दूसरे के सहयोग से यह संबंध और भी प्रगाढ़ हो सकता है, क्योंकि अन्य देशों को यह लाभ नहीं मिल सकेगा। अमेरिका ने यह केवल भारत के लिए किया है।
यह टैरिफ छूट देश के भीतर बैठे मोदी सरकार की आलोचन करने वाले विपक्षी समूह के मुंह पर तमाचा है। उन्हें प्रधानमंत्री मोदी ने अपने कुशल नेतृत्व की झांकी प्रदान की है, जिसमें वह अर्थव्यवस्था के स्तर पर विकास कर रहे भारत की नई तस्वीर देख सकते हैं।
केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा 31 मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद के खात्मे का जो संकल्प लिया गया था, वह अब केवल एक राजनीतिक बयान नहीं रह गया है, बल्कि जमीनी हकीकत में बदलता हुआ दिखाई दे रहा है।
दशकों तक जिन इलाकों को लाल आतंक का गढ़ माना जाता था, जहाँ हिंसा, डर और अस्थिरता आम जनजीवन का हिस्सा बन चुके थे, वहाँ अब धीरे-धीरे शांति, विकास और भरोसे की वापसी हो रही है। जैसे-जैसे तय की गई डेडलाइन करीब आ रही है, वैसे-वैसे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की तस्वीर भी बदलती दिख रही है।
नक्सलवाद जिन इलाकों में पैर जमाए बैठा था, वहाँ विकास रुक गया था, प्रशासन कमजोर पड़ गया था और आम लोग डर के साए में जीवन जीने को मजबूर थे। लेकिन हाल के वर्षों में खासतौर से 2025 और 2026 की शुरुआत में हुई निर्णायक कार्रवाइयों ने यह संकेत दे दिया है कि लाल आतंक अब अपने अंतिम दौर में पहुँच चुका है।
नक्सल मुक्त छत्तीसगढ़ के आँकड़े
छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ अभियान अब निर्णायक चरण में पहुँच चुका है और नवंबर 2025 से अक्टूबर 2025 के बीच राज्य के कई नक्सल प्रभावित जिलों में बड़ी सफलताएँ दर्ज की गई हैं, जिससे बस्तर अंचल में माओवादी नेटवर्क की पकड़ तेजी से कमजोर हुई है।
नारायणपुर जिले में 25 नवंबर 2025 को 28 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जिनमें 19 महिलाएँ शामिल थीं और 22 नक्सलियों पर कुल 89 लाख रुपए का इनाम घोषित था, ये सभी दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी से जुड़े थे और पूर्वी बस्तर डिवीजन की मिलिट्री कंपनी नंबर 6 के सक्रिय कैडर रहे, जिनमें पंडी ध्रुव उर्फ दिनेश, दुले मंडावी उर्फ मुन्नी, छत्तीस पोयम और पदनी ओयम जैसे हार्डकोर सदस्य भी शामिल थे, जिन्होंने SLR, INSAS और .303 राइफलें पुलिस को सौंपीं।
नारायणपुर नक्सली सरेंडर (फोटो साभार: ETV Bharat)
नारायणपुर जिले में ही 2025 के दौरान कुल 287 नक्सली मुख्यधारा में लौट चुके हैं, जो इस बात का संकेत है कि यह इलाका अब तेजी से नक्सल प्रभाव से बाहर आ रहा है। इसी तरह कांकेर जिले में नॉर्थ सब-जोनल ब्यूरो से जुड़े 21 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जिनमें 4 DVCM, 9 ACM और 8 पार्टी सदस्य शामिल थे।
ये सभी केशकाल डिवीजन के कुएमारी और किसकोडो एरिया कमेटी से जुड़े थे और उन्होंने 3 AK-47, 4 SLR, 2 INSAS, 6 .303 और 1 BGL लॉन्चर सहित कुल 18 हथियार जमा किए, जबकि कांकेर के कामतेड़ स्थित BSF कैंप में करीब 50 नक्सलियों ने भी सरेंडर किया, जिनमें बटालियन कमांडर स्तर के कैडर भी शामिल थे।
24 जुलाई 2025 को छत्तीसगढ़ के बीजापुर में 25, दंतेवाड़ा 15, नारायणपुर 8, सुकमा 5 और कांकेर 13 में एक ही दिन में कुल 66 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जिन पर ₹1.3 करोड़ से अधिक का इनाम घोषित था, जिससे यह साफ हुआ कि बीजापुर, दंतेवाड़ा, सुकमा और कांकेर जैसे परंपरागत नक्सल प्रभावित जिले अब धीरे-धीरे उग्रवाद से बाहर निकल रहे हैं।
(फोटो साभार : X_@ITBP_official)
इसके अलावा 15 और 16 अक्टूबर 2025 को छत्तीसगढ़ में दो दिनों के भीतर 197 नक्सलियों ने हथियार डाले, जिसमें 16 अक्टूबर को 170 और 15 अक्टूबर को 27 नक्सली शामिल थे, जो हाल के वर्षों में राज्य का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण अभियान माना जा रहा है।
2025 में अब तक छत्तीसगढ़ में 1000 से अधिक नक्सली आत्मसमर्पण कर चुके हैं, जबकि 2024–25 के दौरान 500 से अधिक नक्सली मुठभेड़ों में मारे गए, जिससे बस्तर, नॉर्थ बस्तर, अबूझमाड़, बीजापुर, कांकेर, नारायणपुर, सुकमा और दंतेवाड़ा जैसे इलाकों में नक्सल संगठन की कमर टूट चुकी है।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के अनुसार, जनवरी 2024 में बीजेपी सरकार के सत्ता में आने के बाद से अब तक छत्तीसगढ़ में 2100 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, 1785 गिरफ्तार हुए और 477 मुठभेड़ों में ढेर किए गए, जबकि अबूझमाड़ और नॉर्थ बस्तर को आधिकारिक रूप से नक्सल मुक्त घोषित किया जा चुका है।
छत्तीसगढ़ और ओडिशा : नक्सल मुक्त होते इलाके
ओडिशा के मलकानगिरी जिले में गुरुवार (05 फरवरी 2026) नक्सल विरोधी अभियान को बड़ी सफलता मिली है। यहाँ एक टॉप माओवादी कमांडर सुखराम मरकाम ने पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया। उस पर 21 लाख रुपए का इनाम घोषित था और वह लंबे समय से फायरिंग, IED ब्लास्ट, अपहरण और आम नागरिकों की हत्या जैसी गंभीर घटनाओं में शामिल रहा है।
मलकानगिरी के SP विनोद पाटिल ने इसे बड़ी कामयाबी बताते हुए कहा कि नक्सलियों के लिए हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का यही सही समय है। उन्होंने बाकी नक्सली कैडरों से भी सरेंडर करने की अपील की। सरेंडर के दौरान आरोपित ने SLR राइफल, कारतूस और दो शक्तिशाली IED भी पुलिस को सौंपे, जिससे इलाके की सुरक्षा और मजबूत हुई है।
(फोटो साभार: दैनिक जागरण)
पुलिस के अनुसार, इस सरेंडर के बाद मलकानगिरी जिला अब प्रभावी रूप से नक्सल मुक्त हो गया है। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि लगातार चलाए गए सुरक्षा अभियानों, मजबूत खुफिया तंत्र और प्रशासन की सतर्कता का नतीजा है।
इसी तरह छत्तीसगढ़ के एक बड़े नक्सल प्रभावित इलाके को भी नवंबर 2025 में आधिकारिक रूप से नक्सल मुक्त घोषित किया गया था। यह इलाका कभी नक्सली हिंसा और डर का केंद्र हुआ करता था, लेकिन अब वहाँ शांति लौट रही है। सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई और स्थानीय प्रशासन की सक्रियता से नक्सलियों की पकड़ कमजोर पड़ गई।
मलकानगिरी के कुछ हिस्सों को भी हाल ही में नक्सल मुक्त घोषित किया गया है। पहले जहाँ पुलिस का पहुँचना भी खतरे से खाली नहीं था, अब वहाँ चौकियाँ मजबूत हो रही हैं, सड़कें बन रही हैं, संचार सुविधाएँ बेहतर हो रही हैं और सरकारी योजनाएँ आम लोगों तक पहुँच रही हैं।
ये घटनाएँ इस बात का साफ संकेत हैं कि नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई अब निर्णायक दौर में पहुँच चुकी है। पुलिस और प्रशासन की मेहनत से प्रभावित इलाकों में धीरे-धीरे सामान्य जीवन लौट रहा है, लोग बिना डर के रह पा रहे हैं और विकास का रास्ता खुल रहा है।
छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के गोगुंडा इलाके में सुरक्षाबलों ने माओवादी आतंक के प्रतीक बने कुख्यात नेता रमन्ना के 20 फीट ऊँचे स्मारक को ध्वस्त कर दिया है। CRPF की 74वीं बटालियन ने एंटी-नक्सल ऑपरेशन के तहत इस ढाँचे को विस्फोट के जरिए जमींदोज किया।
फोटो साभार – ईटीवी भारत
यह स्मारक माओवादी संगठन के लिए डर और वैचारिक प्रचार का माध्यम था, जिसे खत्म कर सुरक्षाबलों ने नक्सलियों के मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर बड़ा प्रहार किया है। यह कार्रवाई बस्तर और सुकमा क्षेत्र को नक्सलमुक्त बनाने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।
नक्सलवाद पर निर्णायक प्रहार का वर्ष रहा 2025
साल 2025 को नक्सलवाद के खिलाफ एक निर्णायक और ऐतिहासिक वर्ष माना जा रहा है, क्योंकि इस दौरान सुरक्षाबलों ने नक्सलियों के खात्मे के लिए बड़े और प्रभावी ऑपरेशन किए।
जंगलों में फैले नक्सली नेटवर्क को खत्म किया गया, कई बड़े नक्सली कमांडरों को मार गिराया गया या गिरफ्तार किया गया और उनके फंडिंग व हथियार सप्लाई के रास्तों पर सख्त कार्रवाई करते हुए रोक लगाई गई।
इस साल सैकड़ों नक्सली मुठभेड़ों में मारे गए या पकड़े गए, कई बड़े संगठन कमजोर हो गए और बड़ी संख्या में नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों और राज्य पुलिस के संयुक्त अभियानों से नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या भी घट गई।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, नक्सली हिंसा की घटनाओं में पिछले वर्षों की तुलना में बड़ी गिरावट आई है, जिससे साफ है कि सरकार की नीति अब सिर्फ बचाव तक सीमित नहीं रही, बल्कि आक्रामक, मजबूत और निर्णायक हो चुकी है।
पहले कैसे थे हालात? जब डर ही कानून था
नक्सल प्रभावित इलाकों के पुराने हालात पर नजर डालें, तो साफ समझ आता है कि इन क्षेत्रों में सामान्य जीवन इनके लिए कितना मुश्किल था। कई गाँवों में स्कूल सालों तक बंद रहे, क्योंकि शिक्षक और अभिभावक दोनों ही नक्सली हिंसा से डरते थे। स्वास्थ्य सेवाएँ लगभग न के बराबर थीं, डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ का वहाँ पहुँचना मुश्किल माना जाता था।
सड़कें अधूरी थीं, मोबाइल नेटवर्क कमजोर या बिल्कुल नहीं था और बैंकिंग सुविधाएँ लोगों की पहुँच से बाहर थीं। ग्रामीणों से जबरन वसूली आम बात थी और नक्सली फरमान ही कई जगहों पर स्थानीय कानून का रूप ले चुके थे। शाम ढलते ही लोग अपने घरों में कैद हो जाते थे और बच्चों का भविष्य अंधकार में डूबता जा रहा था।
नक्सली केवल हथियारों के बल पर नहीं, बल्कि डर, प्रतीकों और मानसिक दबाव के जरिए लोगों पर काबू पते थे। उनके झंडे, पोस्टर और उनके ‘स्मारक’ आम लोगों के भीतर डर का काम करती थी।
बदलती जमीनी हकीकत: विकास, शिक्षा और भरोसे की वापसी
अब वही इलाके धीरे-धीरे एक नई पहचान की ओर बढ़ रहे हैं। जिन क्षेत्रों में पहले सरकारी गाड़ियाँ भी मुश्किल से पहुँच पाती थीं, वहाँ अब नई सड़कें बन रही हैं, पुल तैयार हो रहे हैं और मोबाइल व इंटरनेट नेटवर्क मजबूत किया जा रहा है। बैंकिंग सेवाएँ, डाक सुविधाएँ और राशन वितरण प्रणाली पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी हो गई हैं।
स्कूल दोबारा खुल रहे हैं, बच्चों की नियमित उपस्थिति बढ़ रही है और युवाओं में शिक्षा व रोजगार को लेकर नई जागरूकता दिखाई दे रही है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सक्रिय हो रहे हैं, एम्बुलेंस सेवाएँ पहुँच रही हैं और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ ग्रामीणों तक पहुँचने लगा है।
छत्तीसगढ़ का सुकमा अब बदलते दौर की नई कहानी लिख रहा है। घने जंगल, मुश्किल भौगोलिक हालात और सीमित सरकारी पहुँच के चलते यहाँ लंबे समय तक ‘लाल आतंक’ पनपता रहा लेकिन अब हालात बदलने लगे हैं।
केंद्र और राज्य सरकार की पहल पर शुरू हुई ‘आम बगीचा योजना’ ने इलाके की नक्सली पहचान को पलट देना शुरू कर दिया है। छोटे-छोटे बागानों ने ग्रामीणों की आमदनी बढ़ाई है, महिलाओं ने व्यवसाय में कदम रखा है और कुछ तो ‘लखपति दीदी’ बनने की ओर अग्रसर हैं।
यह सिर्फ आर्थिक बदलाव नहीं है बल्कि सुरक्षा, आत्मविश्वास और सामाजिक सोच में भी स्पष्ट सुधार दिख रहा है। जब विकास यहाँ तक पहुँचता है, तो असर केवल पैसों तक सीमित नहीं रहता, यह लोगों की उम्मीदें, हौसला और भविष्य की चुनौतियों से निपटने की शक्ति भी बढ़ाता है।
‘आम बगीचा परियोजना’ का मुख्य उद्देश्य यह है कि ग्रामीण लोग खेती के अलावा स्थायी और टिकाऊ तरीकों से आय हासिल कर सकें। अस्थिरता के बीच छोटे-मोटे खेत और बारहमासी फसलें जोखिम भरी होती हैं। फलों के पेड़, खासकर संकर किस्में, कुछ सालों के भीतर नियमित फल देने लगती हैं और कई वर्षों के लिए आय का स्रोत बन जाता हैं।
मर्काम धूलाने कहा की “प्रशासन की मदद से हमने आम, नींबू और नारियल लगाए, अब कमाई होने वाली है।”
#WATCH | Sukma, Chhattisgarh: Local Markam Dhula says, "They (people from administration) came to my house and asked me about planting lemon, mango trees, and coconut trees. We said we would plant them… It's been 2 years… Now the harvest is about to come… There are 350… pic.twitter.com/OBWdIKGso5
प्रशासन ने देखा कि सुकमा की मिट्टी और जलवायु फलों के लिए अनुकूल है, इसलिए यहाँ बागवानी को बढ़ावा देना मतलब लोगों को लंबे समय के लिए आर्थिक सुरक्षा देना है। साथ ही महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ जैसी योजनाओं से जोड़कर उनकी आर्थिक भागीदारी बढ़ाने की भी कोशिश की जा रही है।
जहाँ पहले डर का माहौल था, वहाँ अब सामान्य जीवन की वापसी हो रही है। लोग खुले तौर पर अपने व्यवसाय शुरू कर रहे हैं, कृषि और स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा मिल रहा है और विकास की नई उम्मीदें जन्म ले रही हैं।
क्या कहते है आँकड़े
सरकारी और गृह मंत्रालय के ताज़ा आँकड़े यह स्पष्ट करते हैं कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में हिंसा ऐतिहासिक रूप से सबसे निचले स्तर पर पहुँच चुकी है। संसद में साझा किए गए नवीनतम डेटा के अनुसार, भारत में नक्सली हिंसा अपने चरम वर्ष 2010 की तुलना में करीब 89% तक घट चुकी है।
जहाँ 2010 में 1,936 हिंसक घटनाएँ दर्ज हुई थीं, वहीं 2025 में यह संख्या घटकर लगभग 218 रह गई है। इसी तरह, नक्सल हिंसा से होने वाली मौतों में भी 91% तक की गिरावट आई है।
2010 में जहाँ 1005 मौतें दर्ज हुई थीं, वहीं 2024-25 में यह आंकड़ा घटकर लगभग 93 से 150 के बीच सिमट कर रह गया है। नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या 2014 में 126 से घटकर 2025 में केवल 11 रह गई है, जबकि सबसे अधिक प्रभावित जिलों की संख्या 36 से घटकर सिर्फ 3 (बीजापुर, सुकमा और नारायणपुर छत्तीसगढ़) तक सिमट गई है, जो रेड कॉरिडोर के लगभग पतन का संकेत है।
2025 में ही सुरक्षा बलों ने 317–364 नक्सलियों को मार गिराया, जिनमें 12 से अधिक शीर्ष कमांडर शामिल थे, साथ ही 942-1022 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया और लगभग 2000-2337 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जो संगठन के आंतरिक मनोबल के टूटने और सरकार की पुनर्वास नीति की सफलता को दर्शाता है।
बीते एक दशक में 8000 से अधिक नक्सली हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौट चुके हैं और सरकार की सरेंडर कम रिहैबिलिटेशन नीति, आर्थिक सहायता, कौशल प्रशिक्षण, मासिक वजीफा और रोजगार योजनाओं ने इस बदलाव को गति दी है।
जैसे-जैसे 31 मार्च 2026 की तारीख नजदीक आ रही है, नक्सली संगठनों के भीतर बेचैनी और भ्रम की स्थिति बढ़ती जा रही है। निचले स्तर के कैडर हथियार छोड़ रहे हैं, नेतृत्व संकट गहरा रहा है और संगठन के भीतर अविश्वास की भावना पैदा हो रही है।
फंडिंग नेटवर्क कमजोर पड़ रहे हैं, सप्लाई चैनल टूट रहे हैं और कई नक्सली समूह अपने अस्तित्व को लेकर असमंजस में हैं। रिपोर्ट्स बताती हैं कि हाल के समय में बड़ी संख्या में नक्सली स्वेच्छा से आत्मसमर्पण कर चुके हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि लाल आतंक अब अपने अंतिम चरण में प्रवेश कर चुका है।
लाल आतंक से आजाद होती जमीन: बदलती पहचान और नई उम्मीदें
जहाँ पहले बारूद की गंध और हिंसा का साया था, वहाँ अब विकास, शिक्षा और अवसरों की चर्चा हो रही है। नई पीढ़ी अपने भविष्य को लेकर अधिक आशावान दिखाई दे रही है। छोटे व्यापार, कृषि आधारित उद्यम, पर्यटन और स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा मिल रहा है।
नक्सल प्रभावित रहे इलाके अब हिंसा की पहचान से बाहर निकलकर विकास और संभावनाओं की पहचान गढ़ने लगे हैं। लोग अपने क्षेत्र को डर से नहीं, बल्कि उम्मीद और अवसर से जोड़कर देखने लगे हैं।
पूर्व क्रिकेटर नासिर हुसैन का बयान क्रिकेट को जोड़ने के बजाय उसे और बाँटता हुआ दिख रहा है। ICC और BCCI पर सवाल उठाना एक बात है, लेकिन बहिष्कार और अव्यवस्था को पसंद करना क्रिकेट की भावना के खिलाफ है। नासिर हुसैन ने पाकिस्तान के 15 फरवरी को भारत के खिलाफ T20 वर्ल्ड कप मैच का बॉयकॉट करने के फैसले को सही कहा है, उसे वर्ल्ड क्रिकेट में ‘फेयरनेस’ के तौर पर पेश किया जा रहा है।
स्काई स्पोर्ट्स पॉडकास्ट के दौरान हुसैन ने सवाल किया कि अगर भारत ने सरकारी पाबंदियों या सुरक्षा चिंताओं का हवाला देकर कहीं खेलने से मना कर दिया होता, तो क्या ICC इतना ही सख्त रवैया अपनाता। उन्होंने टॉप बॉडी पर असरदार बोर्ड के आगे झुकने का आरोप लगाया, साथ ही बांग्लादेश और पाकिस्तान की ‘अपनी बात पर अड़े रहने’ की तारीफ की।
यह सब बयान बीसीसीआई और भारत को कटघड़े में खड़े करने के लिए थे, जबकि विवाद की जड़ में बांग्लादेश और पाकिस्तान का फैसला था।
This is an absolutely clownish take. League organisers do not, and cannot, force franchise owners to sign specific players. No Indian investor is going to pour money into a league if they are compelled to buy Pakistani or Bangladeshi players against their will. That is not how… pic.twitter.com/ECi6qeqO6T
हुसैन ने बांग्लादेश की भारत में नहीं खेलने के फैसले की तुलना चैंपियंस ट्रॉफी के दौरान भारत के पाकिस्तान जाने से मना करने से कर दी। इससे भी उनकी मंशा समझ में आती है।
सबसे पहले, बात करते हैं बहस की अहम वजह बांग्लादेश की। बांग्लादेश को BCCI की मर्जी से T20 वर्ल्ड कप से बाहर नहीं किया गया था। ICC ने अपने सदस्यों की मीटिंग बुलाई थी। चौदह बोर्ड ने बांग्लादेश को शामिल करने के खिलाफ वोट किया। सिर्फ बांग्लादेश और पाकिस्तान की क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने इसका समर्थन किया।
यह भारत का दबाव नहीं था, बल्कि यह दुनिया के ज़्यादातर क्रिकेट खेलने वाले देशों का बांग्लादेश को यह बताना था कि आप किसी ग्लोबल टूर्नामेंट से एक महीने पहले शेड्यूल और कॉन्ट्रैक्ट इस तरह नहीं तोड़ सकते। यह उम्मीद नहीं कर सकते कि बाकी सब इस गड़बड़ी को झेल लेंगे।
बांग्लादेश को अचानक भारत दौरे के दौरान सुरक्षा सताने लगी
जब KKR ने आम लोगों के विरोध को देखते हुए बांग्लादेशी बॉलर मुस्तफिजुर रहमान को अपनी टीम से बाहर निकाल दिया और उसका IPL कॉन्ट्रैक्ट खत्म कर दिया गया। इसके बाद बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड को अचानक भारत दौरे को लेकर ‘सिक्योरिटी की चिंता’ होने लगी। पहले ऐसा कोई डर नहीं था। टीम पहले भी भारत दौरे पर आ चुकी थी। कैलेंडर काफी पहले से पता था। घबराहट तभी सामने आई जब एक फ्रेंचाइजी का फैसला उन्हें पसंद नहीं आया।
नासिर हुसैन ने केकेआर के फैसले को बीसीसीआई का फैसला मान लिया। BCCI आईपीएल की KKR जैसी फ्रेंचाइजी नहीं चलाता। लीग ऑर्गनाइजर प्राइवेट मालिकों को खास खिलाड़ियों को साइन करने या बनाए रखने के लिए मजबूर नहीं करते हैं, और न ही कर सकते हैं। फ्रेंचाइजी क्रिकेट का पूरा कमर्शियल लॉजिक यही है। अगर इन्वेस्टर्स को बताया जाए कि उन्हें किसे खरीदना है, तो मॉडल खत्म हो जाएगा। कोई भी सीरियस भारतीय बोली लगाने वाला ऐसी लीग में पैसा नहीं लगाएगा जहाँ खिलाड़ियों की पसंद नेशनैलिटी कोटा या पॉलिटिकल प्रेशर से तय होती हो। इसकी जानकारी तो नासिर हुसैन को होगी ही।
अगर बांग्लादेश को लगता कि उसके साथ गलत बर्ताव हो रहा है, तो उसके पास कई ऑप्शन थे, IPL से बात करना, अपने खिलाड़ियों को हिस्सा लेने से रोकना, या बोर्ड के जरिए बातचीत करना। इसके बजाय उसने टूर्नामेंट से कुछ हफ़्ते पहले ही ‘सिक्योरिटी की चिंताएँ’ खड़ी कर दीं, जिससे बहुत ज़्यादा दिक्कतें पैदा हो गईं।
ICC ने उसी तरह जवाब दिया जैसा कोई भी रेगुलेटर देता, उन नियमों और टाइमलाइन को लागू करके जिन पर सब पहले ही राज़ी हो चुके थे और स्कॉर्टलैंड को बांग्लादेश की जगह मौका देकर ये बता दिया कि सबकुछ ठीक है।
हुसैन ने सबसे बड़ी गलती बांग्लादेश के आखिरी मिनट में हटने की तुलना भारत के 2025 चैंपियंस ट्रॉफी के लिए पाकिस्तान जाने से मना करने से करके की हैं। वह लोगों को यह नहीं बताते हैं कि भारत ने ICC और PCB दोनों को महीनों पहले ही बता दी थी। वह अपने पॉडकास्ट के दौरान ये नहीं कहते कि भारत में आतंकवाद फैलाने के पीछे पाकिस्तान का हाथ रहा है। भारत ने इसलिए पाकिस्तान में जाने से इनकार किया था।
अप्रैल 2025 में पहलगाम में हुआ आतंकी हमला इसका जीता जागता सबूत है। पाकिस्तानी आतंकवादियों ने भारतीय टूरिस्ट को गैर-मुस्लिम बताकर उन पर गोलियाँ चलाईं। ये घटना चैंपियंस ट्रॉफी खत्म होने के कुछ हफ़्ते बाद हुआ था। यह कोई पुराना इतिहास या एब्स्ट्रैक्ट जियोपॉलिटिक्स नहीं है।
इसके बावजूद, भारत ने एशिया कप में पाकिस्तान के खिलाफ अपने मैच खेले। BCCI आसानी से टूर्नामेंट से हट सकता था, लेकिन उसने पूरी तरह से एसोसिएट देशों के कमर्शियल फायदे के लिए खेला। बदले में उसे क्या मिला? पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड का एक सिरफिरा चीफ, जो ट्रॉफी लेकर भाग गया। भारतीय खिलाड़ियों ने पाकिस्तानी खिलाड़ियों से हाथ नहीं मिलाया था और टीम ने पाकिस्तान के किसी सियासी व्यक्ति से ट्रॉफी लेने से मना कर दिया। भारतीय खिलाड़ी चाहते थे कि उन्हें कोई दूसरा व्यक्ति ट्रॉफी दे, लेकिन पीसीबी चीफ अड़े रहे। नतीजा महीनों तक ट्रॉफी पाकिस्तान में पड़ा रहा।
बांग्लादेश को भारत से बॉर्डर पार से आतंक का सामना नहीं करना पड़ता। पाकिस्तान भारत में आतंकियों को भेजता है, हथियार भेजता है और अब नशे का अवैध कारोबार भी करता है। ऐसे में यह दिखाना कि ये एक जैसे हालात हैं, बेईमानी है।
क्या नासिर हुसैन को कई महीनों पहले सुरक्षा कारणों से भारत द्वारा पाकिस्तान में नहीं खेलने और आखिरी मिनट में पॉलिटिकल गुस्से की वजह से बांग्लादेश का टी20 से बाहर जाने के बीच का फर्क नहीं पता।
फिर भावनाओं और भावुकता के क्षण आते हैं। वे कहते हैं, “किसी समय, किसी को कहना चाहिए, बहुत हो गई यह पॉलिटिक्स, क्या हम वापस क्रिकेट खेलना शुरू कर सकते हैं?”
यह PCB नहीं था, जिसने सबके सामने ऐलान किया था कि पाकिस्तान 15 फरवरी को भारत के साथ नहीं खेलेगा। यह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ थे, जिन्होंने भारत के साथ मैच नहीं खेलने की बात कही। जब कोई सरकार का मुखिया खेल का बॉयकॉट करने का ऐलान करता है, तो राजनीति उन्हें नहीं दिखाई देती है।
बल्कि BCCI को ही खेल का राजनीतिकरण करने का आरोप लगा रहे नासिर हुसैन की सोच एकतरफा नजर आती है।
नासिर हुसैन ने खुलकर कहा, ‘मुझे अच्छा लगता है कि बांग्लादेश अपने खिलाड़ियों के लिए डटा रहा। मुझे यह भी पसंद है कि पाकिस्तान ने बांग्लादेश का समर्थन किया।’ यह सोच क्रिकेट भावना के विरुद्ध है। कोई क्रिकेटर वैश्विक आयोजन के बहिष्कार की तारीफ कैसे कर सकता है?
पूर्व क्रिकेटर नासिर हुसैन ने कहा, ‘सबको बस एक ही चीज चाहिए, निरंतरता। बांग्लादेश, पाकिस्तान और भारत के साथ एक जैसा व्यवहार होना चाहिए।’ उन्होंने यह भी जोड़ा, ‘पावर के साथ जिम्मेदारी आती है।’ लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि अनुबंध तोड़ना, मैच न खेलना और अंतिम समय पर टूर्नामेंट में अमूक मैच नहीं खेलने का ऐलान करना किस तरह जिम्मेदारी है?
ICC पर यह आरोप लगाना कि यह BCCI का ही एक एक्सटेंशन है, पूरी सच्चाई से नजर फेरना है। फाइनेंशियल सच्चाई को नजरअंदाज करना है। दरअसल ICC के सबसे बड़े रेवेन्यू ड्राइवर इंडिया-सेंट्रिक ब्रॉडकास्ट डील हैं, खासकर इंडिया-पाकिस्तान मैच। उस पैसे का एक बड़ा हिस्सा एसोसिएट और छोटे बोर्ड को रीडिस्ट्रिब्यूट किया जाता है।
जब पाकिस्तान मैचों का बॉयकॉट करता है या बांग्लादेश शेड्यूल बिगाड़ देता है, तो यह ‘इंडिया को नुकसान’ नहीं पहुँचा रहा है, यह उसी पूल को छोटा कर रहा है जो ग्लोबल क्रिकेट के कमज़ोर सदस्यों को सपोर्ट करता है। ठीक इसीलिए यह आइडिया कि ICC को लगातार कॉन्ट्रैक्ट तोड़ने में शामिल होना चाहिए, बेतुका है। नियम किसी वजह से होते हैं। अगर आप हारते हैं, तो आपको पैसे देने पड़ते हैं। अगर आप एग्रीमेंट तोड़ते हैं, तो आपको नतीजे भुगतने पड़ते हैं। यह ‘BCCI कंट्रोल’ नहीं है, यह बेसिक गवर्नेंस है।
अगर पाकिस्तान को लगता है कि उसके पास इस सिस्टम के बाहर जिंदा रहने के लिए आर्थिक ताकत है, तो वह कोशिश करने के लिए आज़ाद है। वह एक पैरेलल बॉडी बना सकता है और दूसरों को भी इसमें शामिल होने के लिए मना सकता है। इसे मौजूदा स्ट्रक्चर को नुकसान पहुँचाने और खुद को पीड़ित दिखाने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए।
वर्ल्ड कप 2023, जब हुसैन की इंग्लिश टीम ने नहीं खेला था मैच
पूर्व क्रिकेटर नासिर हुसैन यह भी भूल गए कि उनके नेतृत्व में इंग्लैंड टीम ने राजनीतिक वजहों से जिम्बाब्वे में खेलने से मना कर दिया था। हालाँकि इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात हुसैन का अपना इतिहास है। 2003 के वर्ल्ड कप में, हुसैन की लीडरशिप वाली इंग्लैंड टीम ने जिम्बाब्वे के साथ खेलने से मना कर दिया था, क्योंकि वहाँ रॉबर्ट मुगाबे के शासन का विरोध हो रहा था। वहाँ इंग्लैंड की टीम को कोई सुरक्षा खतरा नहीं था। हुसैन ने उस फैसले का सपोर्ट किया।
उन्होंने ECB पर एक छोटे बोर्ड को धमकाने का आरोप नहीं लगाया। उन्होंने ICC की निरंतरता पर कुछ नहीं कहा। उन्होंने यह शिकायत नहीं की कि क्रिकेट का राजनीतिकरण किया जा रहा है। इसके विपरीत उन्होंने बाद में कहा कि उन्हें अपने इस रवैये पर ‘गर्व’ है।
2009: हुसैन तब कहाँ थे, जब इंग्लैंड ने ज़िम्बाब्वे को वीजा देने से मना कर दिया
साल 2009 में जिम्बाब्वे को T20 वर्ल्ड कप से आसानी से बाहर कर दिया गया और उसकी जगह स्कॉटलैंड को शामिल कर लिया गया, जिसे ICC ने “विन-विन” सॉल्यूशन कहा। इंग्लैंड ने जिम्बाब्वे के खिलाड़ियों को वीजा देने से मना कर दिया। फिर से, हुसैन ने ताकतवर बोर्ड्स के छोटी टीमों को कुचलने के बारे में कोई बात नहीं कही। ज़िम्मेदारी के बारे में कोई लेक्चर नहीं दिया। जिम्बाब्वे क्रिकेट को ‘कमजोर’ करने पर कोई आँसू नहीं बहाए। साफ़ है, खेल में पॉलिटिक्स तब ठीक है जब इंग्लैंड ऐसा करता है, लेकिन जब भारत नियमों का पालन करने पर जोर देता है, तो यह बहुत बुरा लगता है।
दरअसल हुसैन ने जो बातें कही वह ‘निरंतरता’ के बारे में नहीं है। यह पावर में बदलाव के बारे में है। वर्ल्ड क्रिकेट में सेंटर ऑफ़ ग्रेविटी अब लॉर्ड्स या ECB नहीं है। यह BCCI है। यह सच्चाई एंग्लो कमेंट्री के एक खास हिस्से को परेशान करती है, जो तब पूरी तरह से सहज था जब ‘सिद्धांत’ इंग्लिश हितों के साथ जुड़े होते थे और जब वे नहीं होते थे तो काफ़ी लचीला था।
क्रिकेट कभी भी पॉलिटिकल वैक्यूम में नहीं रहा। 2003 में भी नहीं था। 2009 में भी नहीं था। आज भी नहीं है। फ़र्क यह है कि अब, भारत से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह दूसरे बोर्ड के पॉलिटिकल नाटकों का खर्च चुपचाप उठाए। ICC को अपने कॉन्ट्रैक्ट लागू करने चाहिए। BCCI को अपने हितों की रक्षा करनी चाहिए। और पाकिस्तान और बांग्लादेश को यह तय करना चाहिए कि वे नियमों पर आधारित सिस्टम का हिस्सा बनना चाहते हैं या नहीं।
जहाँ तक नासिर हुसैन की बात है, तो ‘कंसिस्टेंसी’ के लिए उनका अचानक आया जुनून ज़्यादा असरदार होगा अगर वे इसे अपने रिकॉर्ड पर लागू करें। जब इंग्लैंड ने ज़िम्बाब्वे का बॉयकॉट किया, तो पॉलिटिक्स और खेल टकराए थे। जब पाकिस्तान अपनी सरकार के कहने पर भारत के साथ खेलने का बॉयकॉट करता है, तो अचानक उनकी भाषा बदल जाती है और सारा दोष BCCI पर डालते हैं कि है इसने क्रिकेट को खराब कर दिया है। यह सिद्धांत नहीं है, यह क्रिकेट पर कंट्रोल खोने का गुस्सा है।
(यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे मूल रूप में पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
नेटफ्लिक्स पर ‘घूसखोर पंडत’ नाम की फिल्म का टीजर सामने आया। उसी पल साफ हो गया कि असल में कुछ बदला नहीं है। बल्कि ये ओटीटी प्लैटफॉर्म और बॉलीवुड इंडस्ट्री का वही पुराना खेल है। फिल्म की रिलीज डेट तय नहीं हुई है, लेकिन नाम तय कर चुका है कि निशाना कौन होगा। ‘घूसखोर’ और ‘पंडत’ को एक साथ जोड़ देना कोई मासूम क्रिएटिविटी नहीं है, यह वही प्रोपेगेंडा है जो बॉलीवुड और नेटफ्लिक्स सालों से इस्तेमाल करते आए हैं, जहाँ पंडित और ब्राह्मण पहचान ‘सेफ टारगेट’ समझी जाती है।
इससे पहले ‘धुरंधर’ आई, ‘द कश्मीर फाइल्स’ आई और जब लोगों को लगने लगा कि अब शायद असली मुद्दों पर फिल्मे बनने लगी हैं, पूरा माहौल दक्षिणपंथी हो गया, तभी ‘घूसखोर पंडत’ नाम से फिल्म आ टपकती है। एक ओर जब देशभर में UGC के नए नियमों को लेकर ब्राह्मणों के खिलाफ नफरत खुलेआम फैलाई जा रही है, उसी बीच में इस नाम का आना किसी भी तरह से संयोग नहीं कहा जा सकता है।
बल्कि फिल्म का ऐसा नाम एक प्रयोग जरूर कहा जा सकता है, जिससे हिंदुओं की सहनशीलता को परखा जा सके। प्रयोग उन ‘द कश्मीर फाइल्स’, ‘द बंगाल फाइल्स’ और ‘धुरंधर’ के आलोचकों के लिए भी है, जिससे ‘घूसखोर पंडत’ नाम देकर बॉलीवुड की छवि को बैलेंस किया जा सके। लेकिन यह नया नहीं है, ये बॉलीवुड में सालों से होता आया है, जहाँ पंडित और बाबा की छवि को बदनाम कर, उन्हें घूस, लालच और पाखंड से जोड़कर बेहिचक पेश किया जाता है। क्योंकि फिल्म इंडस्ट्री को पता है कि यही ‘सेफ टारगेट’ है।
घूसखोर पंडत कोई मासूम टाइटल भी नहीं है और न ही इसे किसी एक कहानी की आजादी कहकर टाला जा सकता है। बॉलीवुड और अब नेटफ्लिक्स बरसों से पंडित और ब्राह्मण पहचान को एक खास फ्रेम में फिट करता आया है, जहाँ नाम के साथ ही चरित्र का फैसला सुना दिया जाता है।
‘दुश्मन’ में गोकुल पंडित को बलात्कारी और सीरियल किलर बनाया गया, ‘मातृभूमि’ में पंडित जगन्नाथ सामाजिक हिंसा और क्रूरता का चेहरा बना, ‘पीके’ और ‘OMG’ जैसी फिल्मों में पंडित और साधुओं को ढोंगी और ठग के रूप में पेश किया गया। बार-बार यही मैसेज दिया गया कि पंडित और बाबा का मतलब लालच, पाखंड और झूठ-फरेब।
यही सोच ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर और ज्यादा बेखौफ होकर सामने आई, खासकर नेटफ्लिक्स पर। जहाँ ‘अन्नपूर्णा‘ में ब्राह्मण लड़की को मांस पकाते और खाते दिखाया गया, भगवान राम को लेकर संवाद डाले गए और विरोध के बाद FIR हुई तो फिल्म हटा ली गई। ऐसे ही ‘लीला’ में एक काल्पनिक हिंदू राष्ट्र को कट्टर, जातिवादी और हिंसक बताकर पूरे हिंदू समाज को ही नकारात्मक रंग में रंग दिया गया।
इतना ही नहीं ‘ए सूटेबल बॉय’ में मंदिर को महज एक सेट बनाकर हिंदू लड़की और मुस्लिम लड़के का किसिंग सीन दिखाया गया और फिर प्रगतिशील का नाम दिया गया। इसी बैकग्राउंड में जब नेटफ्लिक्स ‘घूसखोर पंडत’ जैसा नाम सामने लाता है, तो यह किसी एक फिल्म का मामला नहीं रह जाता। यह उसी सिलसिले की अगली कड़ी बन जाता है, जहाँ हिंदू और पंडित पहचान को बार-बार व्यंग्य और अच्छे सिनेमा की आड़ में अपमानित किया जाता है, और इसे सबसे सुरक्षित रणनीति मानी जाती है।
वैसे ‘घूसखोर पंडत’ के नाम ने एक बात तो साफ कर दी है कि अब दर्शक अंधे नहीं है। फिल्म का टीजर आते ही जिस तरह सोशल मीडिया पर लोगों का गुस्सा फूटा, ‘शेमऑननेटफ्लिक्स’ नाम से हैशटैग ट्रेंड हुए और सीधा नेटफ्लिक्स के मेकर्स पर कानूनी कार्रवाई हुई, उसने बॉलीवुड के पुराने नैरेटिव से रची गई दोहरी साजिश को धराशायी कर दिया।
जबकि पहले हुआ करता था कि कोई फिल्म आती थी, पंडित और बाबा की छवि को बदनाम कर पतली गली से निकल जाती थी। और कुछ चुनिंदा लोग विरोध करते रह जाते थे और वो भी बोलते-बोलते थककर शांत हो जाते थे। अब ऐसा नहीं है। घूसखोर पंडत नाम पर विवाद मामले में विरोध फिल्म की रिलीज से पहले ही शुरू हो गया, क्योंकि लोग पैटर्न पहचान चुके हैं।
यही वजह है कि लोग सवाल उठा रहे है कि हर बार ‘सेफ टारगेट’ पंडितों को क्यों समझा जाता है? सबसे बड़ा सवाल लोग पूछ रहे हैं कि अगर यही टाइटल किसी और पहचान के साथ होता, अगर फिल्म का नाम घूसखोर ‘मौलवी’ या ‘घूसखोर मौलाना’ रखा गया होता, तो क्या नेटफ्लिक्स और बॉलीवुड इतने निश्चिंत होकर टीजर लॉन्च कर पाते। क्या तब इसे क्रिएटिव फ्रीडम कहा जाता?
यही इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा संकेत है। बॉलीवुड और नेटफ्लिक्स अब वही पुराना नैरेटिव आसानी से आगे नहीं बढ़ा सकते। जिस समाज को उन्होंने सालों तक ‘सेफ टारगेट’ समझा, वह अब जवाब दे रहा है, नाम पर सवाल उठा रहा है और नैरेटिव को धो रहा है। ‘घूसखोर पंडत’ एक फिल्म से ज्यादा एक चेतावनी बन चुका है, उस इंडस्ट्री के लिए जो अब तक यह मानकर चल रही थी कि वह कुछ भी परोस देंगे और कोई पूछने वाला नहीं होगा। अब पूछने वाले भी हैं और यही बात उन्हें सबसे ज्यादा चुभ रही है।
असम में ‘मियाँ’ शब्द को लेकर जबरदस्त घमासान मचा हुआ है। इस शब्द की गूँज कोर्ट में भी सुनाई दी। विपक्ष इसको लेकर बीजेपी पर मुस्लिमों के खिलाफ अभियान चलाने का आरोप लगा रही है। सीएम हिमंता बिस्वा सरमा को कोर्ट में घसीटा गया है। दिल्ली से लेकर असम तक एफआईआर दर्ज करवाई गई है।
ओवैसी ने ‘मियाँ’ पर पूछे सीएम से सवाल
एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि क्या कोई नेता ऐसा कह सकता है कि ऑटो रिक्शा में कोई मियाँ ड्राइवर है तो उसे किराया पाँच रुपए की जगह चार रुपए दो। उनका कहना है कि असम में मियाँ बंगाली मुस्लिम को कहते हैं, जो 150-200 साल पहले अंग्रेजों द्वारा लाकर यहाँ बसाए गए। ये भारत के नागरिक हैं और इन्हें ऑटो के लिए 1 रुपए कम देने की बात खुद मुख्यमंत्री कह रहे हैं। उन्होंने कहा, “असम के मुख्यमंत्री, आप कितने छोटे हैं?”
"How small are you?": Owaisi attacks Assam CM Sarma over "Miya" remark
मियाँ शब्द पर विपक्ष बीजेपी को घेरने में लगी हुई है। राजनीतिक गलियारों से लेकर सोशल मीडिया तक में कड़ी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। विपक्षी दलों का आरोप है कि मुख्यमंत्री ने ये बयान समुदाय विशेष यानी मुस्लिमों को ध्यान में रख कर दिया है। कॉन्ग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने मियाँ शब्द को मुख्यमंत्री पर झूठ बोलने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने न तो ऐसे शब्द लिखे हैं और न ही इसे माना है।
‘मियाँ’ शब्द अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों के लिए हो रहा इस्तेमाल
दरअसल सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने खुद ही असम में प्रवासियों की बढ़ती संख्या पर चिंता जताई थी। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में उन्होंने कहा कि उनकी आलोचना करने वालों को असम में गैर-कानूनी माइग्रेशन पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बारे में सोचना चाहिए। उन्होंने साफ किया कि इस शब्द का इस्तेमाल लोकल लेवल पर बिना डॉक्यूमेंट वाले बांग्लादेशी मुस्लिम माइग्रेशन को लेकर किया गया था।
बांग्लादेश से आए हुए लोग खुद को मिया कहकर ही संबोधित करते हैं। वे मिया कविता लिखते हैं, मिया संग्रहालय की मांग करते हैं, तो अगर मैं उन्हें मिया कहकर संबोधित करूँ, तो उसमें दिक्कत क्या है। pic.twitter.com/z57lzJr94s
सीएम सरमा शुरुआत से ही ‘मियाँ’ शब्द को परिभाषित करते आ रहे हैं। हर बार सार्वजनिक मंच से उन्होंने कहा कि ‘मियाँ’ शब्द बांग्लादेशी घुसपैठियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जो असम में तेजी से फैल रहे हैं। असमिया संस्कृति और राज्य के साथ-साथ ये घुसपैठिए देश के लिए बड़ा खतरा हैं। इसलिए इनलोगों को असम से बाहर निकाल कर ही वे दम लेंगे।
असम में 'मिया' का मतलब बांग्लादेशी घुसपैठिया है।
एक नहीं, चाहे 1000 राहुल गांधी चिल्लाएँ, मैं रुकने वाला नहीं हूँ। घुसपैठियों को असम छोड़ना ही पड़ेगा। यह असम के अस्तित्व का सवाल है। pic.twitter.com/ThCw7Crtwf
मुख्यमंत्री ने इसे असम के अस्तित्व की लड़ाई बताते हुए विपक्ष को ललकारा है। उन्होंने राहुल गाँधी पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि चाहे एक नहीं, बल्कि 1000 राहुल गाँधी भी चिल्लाएँ तो भी वे अपने इस अभियान से पीछे हटने वाले नहीं हैं।
‘मियाँ’ लोगों को तकलीफ देना मेरा काम- हिमंता
मुख्यमंत्री ने विपक्ष और कॉन्ग्रेस के आरोपों पर पलटवार करते हुए कहा, “कॉन्ग्रेस मुझे भले गाली दे, लेकिन मेरा काम मियाँ लोगों को तकलीफ देना है।” सीएम सरमा ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि अगर मियाँ लोग परेशान नहीं होंगे, तो वे दुलियाजान और तिनसुकिया जैसे इलाकों में घुस आएँगे। सीएम हिमंता ने तिनसुकिया में जमीन के लेन-देन की एक लिस्ट का हवाला देते हुए चिंता जताई कि हिंदू अपनी जमीनें बेच रहे हैं और मियाँ मुसलमान उन्हें खरीद रहे हैं। सीएम ने सवाल उठाया, “अगर हम अभी सावधान नहीं हुए, तो कब होंगे?”
सीएम ने स्पष्ट किया कि वोटर लिस्ट में जो सुधार चल रहा है, उसका मकसद यही है कि मियाँ लोग वोट न दे सकें। सीएम हिमंता ने कहा, “यह तो अभी शुरुआत है। जब राज्य में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) लागू होगा, तब 4 से 5 लाख मियाँ वोटों को चुन-चुनकर लिस्ट से बाहर किया जाएगा।” उनके मुताबिक, यह ध्रुवीकरण हिंदू-मुस्लिम के बीच नहीं, बल्कि ‘असमिया बनाम बांग्लादेशी’ के बीच है, जिसमें असमिया मुसलमान उनके दुश्मन नहीं हैं।
‘आत्मसमर्पण नहीं, आखिरी दम तक लड़ेंगे’
मुख्यमंत्री ने कहा कि वह एक असमिया होने के नाते कभी घुटने नहीं टेकेंगे। उन्होंने कहा कि जो लोग जनसांख्यिकीय बदलाव के आगे हार मान चुके हैं, वे आत्मसमर्पण कर दें, लेकिन वह लड़ेंगे और ध्रुवीकरण करेंगे। हिमंता बिस्वा सरमा ने साफ कर दिया कि घुसपैठियों के कारण राज्य की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान खतरे में है और इसे बचाने के लिए कड़े कदम उठाना अब वक्त की जरूरत है।
विपक्ष की आलोचनाओं के बीच हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा कि उन्होंने बांग्लादेशियों को मियाँ नाम नहीं दिया है, बल्कि वे खुद को मियाँ कहते हैं। उन्होंने मियाँ कविता लिखी। उन्होंने कहा कि अगर बांग्लादेशी घुसपैठियों को वे मियाँ कहते हैं तो वे लोग असम के लोगों को असमिया कह सकते हैं। इसमें दिक्कत क्या है।
असम में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। असमिया अस्मिता की रक्षा और बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा अहम है, क्योंकि राज्य में घुसपैठ की समस्या से जनता त्रस्त है। मियाँ वाले नैरेटिव का काट कॉन्ग्रेस को नहीं मिल रहा है। बस वह विरोध ही जता पा रही है। वह खुल कर मुस्लिमों का समर्थन भी नहीं कर पा रही है।
असम में घुसपैठ बड़ी समस्या
असम विधानसभा में सरकार ने साल 2025 में घुसपैठियों पर पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में बताया था कि राज्य में 1971 से लेकर 2014 के बीच 47,928 घुसपैठियों की पहचान की गई है। इन लोगों को राज्य के फॉरेन ट्रिब्यूनल ने विदेशी घोषित किया है। असम विधानसभा में मुख्यमंत्री और गृहमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने बताया कि इन 47,928 विदेशी लोगों में से 27,309 मुस्लिम हैं जबकि 20613 हिन्दू हैं। यानी कुल घुसपैठियों में 56% मुस्लिम हैं।
राज्य विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, 27,309 मुस्लिम घुसपैठियों में से सबसे अधिक 4182 जोरहाट जिले में जबकि 3897 मुस्लिम गुवाहाटी शहर में पहचाने गए हैं। डिब्रूगढ़ में 2782 लोगों को मुस्लिम घुसपैठिया बताया गया है। इसके अलावा होजाई, सिवासनगर, नगांव और कछार में भी 2000 से अधिक मुस्लिम घुसपैठियों की पहचान हुई है। इसके अलावा भी असम के कई जिलों में मुस्लिम घुसपैठियों को पहचाना गया है। वहीं बाहर से आने वाले सबसे अधिक हिन्दुओं की सँख्या कछार, गुवाहाटी और लखीमपुर जैसे जिलों में हैं।
घुसपैठ से त्रस्त असम में अगर असमिया संस्कृति और परंपरा की रक्षा करनी है, तो घुसपैठियों को बाहर निकालना बेहद जरूरी है। यही वजह है कि सीएम हिमंता इस मुद्दे पर आक्रामक हैं और राज्य से लगातार घुसपैठियों को खदेड़ने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने साफ कहा है कि असमिया पहचान बचाने के लिए अगले 30 साल तक ‘ध्रुवीकरण की राजनीति’ जारी रहेगी।
बिहार के उप-मुख्यमंत्री और राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री विजय कुमार सिन्हा के नेतृत्व में विभाग में हो रहे सुधारों की एक नई सुबह की शुरुआत हुई है। लंबे समय से बिहार की जनता जमीन से जुड़े मामलों में भ्रष्टाचार, देरी और रिश्वतखोरी की शिकार रही है। अंचलाधिकारी (CO) स्तर पर 90% से अधिक भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी थीं, जहाँ दाखिल-खारिज, म्यूटेशन, नाम सुधार जैसे बुनियादी काम बिना घूस के नहीं होते थे।
दलालों का एक पूरा नेटवर्क खड़ा हो गया था, जो अंचल और थाना मिलकर जनता की जमीन लूटने का रैकेट चला रहे थे। इसी कारण बिहार में जमीन विवादों से जुड़ी मारपीट, हत्याएँ और अपराध बढ़ते जा रहे थे। लेकिन विजय कुमार सिन्हा के सख्त रुख और ईमानदारी से भरे संकल्प ने इन भ्रष्ट तत्वों में खौफ पैदा कर दिया है।
सिन्हा ने विभाग में भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि राजस्व विभाग जनता की सेवा के लिए है, परेशान करने के लिए नहीं। जनता दरबार और भूमि सुधार जनकल्याण संवाद कार्यक्रमों में वे खुद बैठकर शिकायतें सुनते हैं और दोषी अधिकारियों पर तत्काल कार्रवाई करते हैं।
गया के बोधगया में आयोजित एक ऐसे ही कार्यक्रम में आमस अंचल के CO अरशद मदनी पर रिश्वत लेने के आरोप लगे। एक आवेदक ने बताया कि 25000 रुपए की रिश्वत सरकारी बॉडीगार्ड के माध्यम से ली गई। सिन्हा ने मंच से ही CO को हटाने, जाँच कराने और यदि दोष सिद्ध हुआ तो निलंबन व FIR दर्ज करने का आदेश दिया।
बिहार में सीओ साहब ने लिया 25000 रुपया घुस, मंच से ही विजय सिन्हा ने कर दिया सीओ का पावर सीज,बजने लगी तालियां। pic.twitter.com/DxLHX9fKsO
इसी तरह अन्य शिकायतों पर उन्होंने अधिकारियों को चेतावनी दी कि फाइलें लटकाने या जनता को भटकाने वाले अब नहीं बचेंगे। उनका व्यंग्यपूर्ण बयान- ‘नाम सुधारने के लिए अंचल में कौन-कौन से देवता खुश किए जाते हैं, मुझे सब मालूम है’- भ्रष्टाचार और बिचौलियों पर सीधा प्रहार था।
अधिकारियों में यह खौफ साफ दिख रहा है। जब सरकार ने भ्रष्टाचार पर लगाम कसनी शुरू की, तो अंचलाधिकारियों ने हड़ताल (सामूहिक अवकाश) की धमकी दी और 2 फरवरी 2026 से अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए। उनका मुख्य मुद्दा अनुमंडल राजस्व पदाधिकारी जैसे नए पदों के सृजन से संवर्गीय आशंका था।
जनहित में अंचल कार्यालय बंद नहीं रह सकते थे, खासकर बजट सत्र के दौरान। सिन्हा ने सख्ती दिखाई-नो वर्क, नो पे लागू किया, सरकारी गाड़ी और कार्यालय की चाबी वापस लेने का आदेश दिया और वरीय कर्मचारियों, BDO, DSLR आदि को अंचल का प्रभार सौंपने का विकल्प दिया। प्रधान सचिव सीके अनिल ने मंत्री के सामने ही चेतावनी दी कि हड़ताल वापस न ली तो डिसमिस कर दिया जाएगा।
परिणामस्वरूप, हड़ताल पहले दिन ही टूट गई। शाम को सिन्हा से मुलाकात के बाद बिहार राजस्व सेवा संघ ने हड़ताल वापस ले ली। उन्होंने तीन सदस्यीय समिति गठित की, जिसमें प्रधान सचिव सीके अनिल अध्यक्ष हैं। समिति माँगों, प्रमोशन, न्यायालयीय आदेशों और संवर्गीय संतुलन पर विचार करेगी। सिन्हा ने आश्वासन दिया कि जायज माँगें पूरी होंगी, सेवा नियमावली का सम्मान होगा और किसी के साथ अन्याय नहीं होगा। उनका बयान- “ठीक है, दवा हो रहा है, असर भी दिख रहा है, घबराइए नहीं, सब कुछ समाधान होगा”- सुधार की प्रक्रिया को दवा की तरह प्रभावी बताता है।
यह पहली बार है जब सरकार ने इतनी सख्ती से भ्रष्ट अंचलाधिकारियों पर नकेल कसी है। पहले दलालों के माध्यम से रिश्वत ऊपरी कमाई होती थी, जो CO के खाते में नहीं आती थी। कई अधिकारियों के खर्च उनकी सैलरी से कहीं अधिक थे-बच्चों की फीस अकेले वेतन के बराबर। लेकिन अब जाँच का डर है। सिन्हा के आने से ईमानदारी को प्रोत्साहन मिला है। जनता में खुशी की लहर है। लोग कह रहे हैं कि CO अब पैसा वसूली के लिए दलाल नहीं रख पाएँगे और काम बिना रिश्वत के होगा।
सिन्हा का यह प्रयास ऐतिहासिक है। वे न केवल भूमाफियाओं को ‘सिर पर कफन बाँधकर’ चुनौती दे रहे हैं बल्कि विभाग को पारदर्शी और जन-केंद्रित बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) हर अंचल में खोलने, शनिवार को grievance redressal, ऑनलाइन सेवाओं को मजबूत करने जैसे कदम आम आदमी की मदद करेंगे। ईमानदार अधिकारी अब सम्मानित होंगे जबकि भ्रष्टों पर कार्रवाई तय है।
आने वाला समय बताएगा कि बिहार में जमीन विवाद कम होंगे, अपराध की जड़ें सूखेंगी। जनता सिन्हा के साथ है। बिहार की जनता अब उम्मीद की किरण देख रही है-भ्रष्टाचार मुक्त राजस्व व्यवस्था की। विजय कुमार सिन्हा का यह संघर्ष बिहार के इतिहास में स्वर्णिम अध्याय बनेगा।
सिलीगुड़ी के पास ‘चिकन नेक’ भारत का वह संकरा क्षेत्र है, जो पूर्वोत्तर से पूरे देश को जोड़ता है। इसकी चौड़ाई मात्र 20 किलोमीटर और लंबाई करीब 60 किलोमीटर है। जेल में बंद शरजील इमाम जैसे देशद्रोही हों या बांग्लादेश-चीन जैसे पड़ोसी देश, सबने भारत को नुकसान पहुँचाने के लिए सामरिक दृष्टि से अहम इस ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ को काटने की बात कही थी। इसको देखते हुए अब भारत चिकन नेक को अभेद्य किला में परिवर्तित करने जा रहा है, जिससे दुश्मनों के मंसूबे धरे के धरे रह जाएँगे।
भारत की चिकन नेक को लेकर योजना
केंद्र सरकार चिकन नेक की सुरक्षा को लेकर लेकर काफी गंभीर है। इसके लिए ना केवल आसमान और धरती पर पैनी नजर रखी जा रही है, बल्कि अब धरती के अंदर भी इसकी सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की तैयारी चल रही है। अब चिकन नेक से होते हुए 40 किलोमीटर लंबे रेलवे टनल बनाने की तैयारी चल रही है।
रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मंगलवार (3 फरवरी 2026) को कहा, “नॉर्थ-ईस्ट को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाले स्ट्रेटेजिक कॉरिडोर के लिए खास प्लानिंग हो रही है। अंडरग्राउंड रेलवे ट्रैक बिछाने और मौजूदा ट्रैक को चार लाइन बनाने का काम चल रहा है।” बंगाल में टिन माइल हाट से रंगापानी तक जाने वाली अंडरग्राउंड रेल लाइनें 20-24 मीटर की गहराई पर बिछाई जाएँगी।
भारतीय रेलवे ने पश्चिम बंगाल के टिन माइल हाट और रंगापानी स्टेशनों के बीच अंडरग्राउंड रेल लाइन बिछाना तय किया है। यह भौगोलिक दृष्टि से काफी अहम है। टिन माइल हाट बंगाल के दार्जिलिंग जिले में है, जो सिलीगुड़ी से करीब 10 km दूर है। यह बांग्लादेश बॉर्डर के पास है। यहाँ से बांग्लादेश का पंचगढ़ जिला सिर्फ 68 किलोमीटर दूर है।
This is BIG.
For decades, the “Chicken’s Neck” has been used as an intimidation tactic by anti-national forces, both within and beyond our borders. The proposed underground rail link marks a major strategic breakthrough, creating a secure and foolproof transportation corridor… pic.twitter.com/8lypj7MoZJ
चिकन नेक 22 किमी चौड़ी जमीन की पतली सी पट्टी है, ये पूरे भारत को पूर्वोत्तर के 8 राज्यों से जोड़ती है। असल में, यह नॉर्थ-ईस्ट का एकमात्र पुल है, जिससे होकर हाईवे, रेल लिंक, फ्यूल लाइन गुजरती है और यह सैनिक साजोसामान के पूर्वोत्तर तक पहुँचने का एकमात्र रास्ता भी है।
दरअसल चिकन नेक कॉरिडोर सामरिक दृष्टि से ऐसा चौराहा है, जहाँ से दक्षिण में बांग्लादेश, पश्चिम में नेपाल और उत्तर में चीन की चुम्बी वैली जाने का द्वार खुलता है। खास बात यह है कि चुम्बी वैली में, चीनी सेना का अच्छा खासा जमावड़ा है। इसलिए हर दिशा पर भारत को नजर रखने के लिए चिकन नेक की जरूरत है।
चिकन नेक पर कमजोर होते ही भारत का पूर्वोत्तर तक पहुँच खत्म हो जाएगा साथ ही सिक्किम और अरुणाचल जैसे राज्य की सीमा तक पहुँचना भी मुश्किल हो जाएगा। इन राज्यों के बड़े क्षेत्र पर चीन अपना दावा करता रहा है।
अंडरग्राउंड रेल से भारत को जबरदस्त फायदा होगा
रेलवे माल ढोने का सबसे आसान तरीका माना जाता है। एक मालगाड़ी एक बार में करीब 300 ट्रकों के बराबर माल ढो सकती है। चिकन नेक कॉरिडोर में अभी तक निर्माण कार्य जमीन पर होते रहे हैं। इन्हें पड़ोसी देश निशाना बना सकते हैं। प्राकृतिक आपदा से भी इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान पहुँच सकता है। अंडर ग्राउंड टनेल हर आपदा में सुरक्षित रहेगा। न तो इसे दुश्मन देश हवाई हमला कर सकते हैं और न ही ड्रोन, आर्टिलरी से इसे निशाना बनाया जा सकता है। यानी युद्ध के वक्त ये कॉरिडोर जवानों और सामानों की आवाजाही के लिए संजीवनी साबित होगा।
डिफेंस एक्सपर्ट संजीव उन्नीथन के मुताबिक, अंडरग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर का पता लगाना मुश्किल होता है और यह सुरक्षित होता है। युद्ध में आपकी स्थिति मजबूत हो जाती है।”
उन्नीकृष्ण के मुताबिक, केन्द्र का यह कदम सामरिक दृष्टि से सबसे तेज इंफ्रास्ट्रक्चर विकास का उदाहरण है। यह भारत की टनलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर क्षमताओं के परिपक्व होने और कम समय में बड़े प्रोजेक्ट्स शुरू करने की क्षमता को दर्शाता है।
केंद्र सरकार की तारीफ करते हुए असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि यह ‘लंबे समय से चली आ रही स्ट्रेटेजिक कमज़ोरी’ को दूर करने वाला कदम है, जिसे 1971 के युद्ध के बाद ही कर लिया जाना चाहिए था। सरमा ने ट्वीट किया, “प्रस्तावित अंडरग्राउंड रेल लिंक एक बड़ी स्ट्रेटेजिक सफलता है, जो नॉर्थ ईस्ट और देश के बाकी हिस्सों के बीच एक सुरक्षित और फुलप्रूफ ट्रांसपोर्टेशन कॉरिडोर बनाता है।”
चीन का बड़ा सैनिक नेटवर्क पास में है मौजूद
चीन डोकलाम और अरुणाचल प्रदेश के पास इंफ्रास्ट्रक्चर का एक बड़ा नेटवर्क तैयार कर चुका है। सैटेलाइट से तस्वीरों के द्वारा भी इसकी पुष्टि हुई है। दूसरी तरह बांग्लादेश के साथ भारत के रिश्तों में खटास आए हैं। कई कट्टरपंथी बांग्लादेशी नेताओं ने भारत के सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर कब्जा करने और नॉर्थ ईस्ट को अलग करने की धमकी दे चुके हैं।
इसके अलावा, सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास रंगपुर में लालमोनिरहाट एयरबेस को बांग्लादेश फिर से विकसित कर रहा है। ऐसे में पड़ोसी देशों से भारत की एकता को अक्षुण्ण रखने का एकमात्र उपाय है कि हम अपने क्षेत्रों को अभेद्य बना लें।
भारत क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए बंगाल, असम और त्रिपुरा के एयरस्ट्रिप के नेटवर्क को मजबूत करने में जुट गया है। ये एयरस्ट्रिप द्वितीय विश्वयुद्ध के वक्त एक्टिव थे। भारत इन क्षेत्रों में अपनी सुरक्षा मजबूत करने में लगा हुआ है। इसको लेकर बंगाल में चोपड़ा, बिहार में किशनगंज और असम में लचित बोरफुकन में नए आर्मी बेस बनाए हैं। चीन की बढ़ती नेवल मौजूदगी और बांग्लादेश के साथ उसके गहरे डिफेंस जुड़ाव के बीच बंगाल के हल्दिया में एक नया नेवी बेस भी बनने वाला है।
रेलवे के कदम से देश की जीवन रेखा मानी जाने वाली इस नेटवर्क में कहीं से भी मिसाइलों को ट्रांसपोर्ट करना, छिपाना और लॉन्च करना आसान हो जाएगा। देश की सुरक्षा के लिए ये कदम मील का पत्थर साबित होगा।
शरजील इमाम ने चिकन नेक काटने की धमकी दी थी
2020 में दिल्ली दंगों की साजिश रचने वाला और भारत के खिलाफ जहर उगलने वाला शरजील इमाम ने सिलिगुडी कॉरिडोर को लेकर कहा था, “अगर 5 लाख लोग हमारे पास संगठित हों, तो हम हिंदुस्तान और नॉर्थ-ईस्ट को स्थाई तौर पर कट कर सकते हैं। स्थाई नहीं तो कम से कम एक-आध महीने के लिए तो कट कर ही सकते हैं। मतलब, इतना मवाद डालो पटरियों पर, रोड पर कि उन्हें हटाने में एक महीना लगे। जाएँ एयर फोर्स से। असम को काटना हमारी जिम्मेदारी है।”
अमित शाह ने दिया जवाब
शरजील इमाम ने चिकन नेक को अलग करने की बात कही थी, इस पर हाल ही में गृहमंत्री अमित शाह ने सिलिगुड़ी में जवाब दिया। उन्होंने कहा कि सिलीगुड़ी गलियारा भारत का था, है और रहेगा। इसपर धमकी देने या छेड़छाड़ करने की अनुमति किसी को नहीं दी जा सकती। उन्होंने कहा, “दिल्ली में कुछ लोगों ने नारे लगाए कि वे चिकन नेक को काट डालेंगे। अरे इसे कैसे काटोगे क्या तुम्हारे बाप की जमीन है यह भारत की जमीन है इस पर कोई हाथ नहीं लगा सकता”
उन्होंने कहा कि दिल्ली पुलिस ने ऐसे लोगों को जेल में डाल दिया है और विपक्ष ऐसे लोगों की पैरवी कर रहा है। लेकिन देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करने वालों को सुप्रीम कोर्ट ने करारा जवाब दिया और बेल अर्जी भी खारिज कर दी।
पिछले तीन दिनों से संसद में राहुल गाँधी और उनके कॉन्ग्रेसी नेता बवाल मचाए हुए हैं। मुद्दा है चीन का। राहुल गाँधी संसद के भीतर एक ऐसी किताब के अंशों का हवाला दे रहे हैं, जो अभी तक छपी ही नहीं है। उसी किताब के आधार पर सरकार और प्रधानमंत्री को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि चीन के मुद्दे पर सच्चाई छुपाई जा रही है।
लेकिन बुधवार (04 फरवरी 2027) को तस्वीर अचानक बदल गई। बीजेपी नेता निशिकांत दुबे ने राहुल गाँधी की पूरी हवाबाजी महज एक मिनट में धराशायी कर दी। उन्होंने सदन में एक पहले से छपी हुई किताब के कुछ अंश पढ़कर सुनाए। इसके बाद न सिर्फ राहुल गाँधी, बल्कि कॉन्ग्रेस के बाकी नेता भी सन्न रह गए।
बिना छपी किताब और AI वीडियो के सहारे सरकार को बदनाम करने की कोशिश
मामले की शुरुआत 02 फरवरी 2026 को हुई, जब राहुल गाँधी अचानक संसद में कुछ पन्ने निकालकर पढ़ने लगे। उन्होंने इसे सीधे तौर पर ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ से जुड़ा मुद्दा बताया। राहुल गाँधी ने दावा किया कि ये अंश पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एमएम नरवणे की किताब से हैं। राहुल गाँधी ने कहा कि इस किताब में लिखा है कि चीन के साथ युद्ध जैसे हालात में सरकार ने कोई आदेश नहीं दिया। राहुल गाँधी का दावा है कि नरवणे उस वक्त अकेले पड़ गए थे और सरकार ने जानबूझकर पीछे हटने का फैसला लिया।
राहुल गाँधी के इस दावे पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने तुरंत सवाल उठाए। उन्होंने साफ पूछा कि ये कहानी आखिर आ कहाँ से रही है? राजनाथ सिंह ने कहा कि जिस किताब के अंश संसद में पढ़े जा रहे हैं, वह किताब अब तक छपी ही नहीं है। जब किताब छपी ही नहीं, तो उसके अंशों के आधार पर सरकार पर सवाल कैसे खड़े किए जा सकते हैं।
इसके बाद संसद में जोरदार हंगामा शुरू हो गया, जो अगले दिन के सत्र तक चलता रहा। विपक्ष के नेता टेबल पर चढ़े, स्पीकर की ओर कागज उछाले गए और नारेबाजी से सदन का कामकाज ठप हो गया।
लेकिन सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नीचा दिखाने की कोशिश संसद तक ही सीमित नहीं रही। कॉन्ग्रेस ने अपने आधिकारिक ‘एक्स’ हैंडल से एक AI वीडियो जारी किया, जिसमें उसी बिना छपी किताब की कहानी को विजुअल के रूप में दिखाया गया। इस वीडियो के सहारे से सरकार और प्रधानमंत्री को बदनाम करने की कोशिश की गई।
कॉन्ग्रेस की साजिश, निशिकांत दुबे ने की धराशायी
कॉन्ग्रेस की सरकार और प्रधानमंत्री को बदनाम करने की साजिश का जवाब देने संसद में बीजेपी नेता निशिकांत दुबे मैदान में उतरे। 04 फरवरी 2027 को उन्होंने राहुल गाँधी को सीधे-सीधे जवाब देते हुए जवाहर लाल नेहरू, सोनिया गँधी और इंदिरा गाँधी समेत गाँधी परिवार के अतीत को सदन के सामने खोलकर रख दिया, वह भी सारी छपी हुई किताबों से।
निशिकांत दुबे हाथ में छपी हुई किताबें लेकर आए और कहा कि अगर बिना छपी किताब के पन्ने लहराकर तीन दिन तक संसद ठप की जा सकती है, तो फिर उन किताबों पर भी चर्चा होनी चाहिए जो छप चुकी है और जिनमें कॉन्ग्रेस और नेहरू के कारनामें दर्ज हैं। उन्होंने ‘नेहरू: ए बायोग्राफी’, ‘एडविना एंड नेहरू’ और दूसरी पुस्तकों के अंश पढ़ते हुए नेहरू पर भ्रष्टाचार, सत्ता के दुरुपयोग और निजी जीवन की अय्याशियों की पोल खोली।
बिना छपी किताब पर राहुल गांधी जी आपने पिछले 3 दिनों से संसद को बंधक बनाकर रखा है । कुछ छपी किताब पर भी सदन में बहस हो जाए । गांधी/ नेहरू परिवार का इतिहास झूठ,मक्कारी,अय्याशी,भ्रष्टाचारी और देश तोड़ने वालों का है. pic.twitter.com/eKqMqPc7Hu
निशिकांत दुबे ने कहा कि देश को गुमराह करने की कॉन्ग्रेस की आदत पुरानी है और आज वही पार्टी राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भी झूठे नैरेटिव के सहारे प्रधानमंत्री और सरकार को बदनाम करने में लगी है। निशिकांत दुबे का हमाल यही नहीं रुका। उन्होंने राहुल गाँधी से सीधा सवाल किया क्या कॉन्ग्रेस इन किताबों को भी फर्जी बताएगी या फिर सच सामने आने पर चुप्पी साध लेगी।
इस पर कॉन्ग्रेस बौखला गई। प्रियंका गाँधी ने दुबे के बयान पर आपत्ति जताते हुए कहा कि संसद में इस तरह कि किताबें पढ़ना नियमों के खिलाफ है और बीजेपी जानबूझकर नेहरू का नाम उछालकर ध्यान भटकाना चाहती है। कॉन्ग्रेस नेताओं ने इसे निजी हमला बताया और हंगामा शुरू कर दिया।
निष्कर्ष: कॉन्ग्रेस का असली चेहरा
इससे पता चलता है कि कॉन्ग्रेस अब हर उस हद तक जाने को तैयार दिख रही है, जहाँ से सरकार और प्रधानमंत्री को नीचा दिखाया जा सके। पहले संसद में बिना छपी किताब के पन्ने लहराए गए, फिर उसी झूठी कहानी को सच साबित करने के लिए कॉन्ग्रेस ने AI वीडिया बनाकर चलाया। सवाल साफ है, जिस किताब का अस्तित्व ही सार्वजनिक तौर पर नहीं है, उसके सहारे कॉन्ग्रेस ने सरकार और प्रधानमंत्री की छवि खराब करने की पूरी कोशिश की। यह सोची-समझी साजिश नजर आती है।
लेकिन जैसे ही बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने संसद में छपी हुई किताबों का जिक्र कर दिया, कॉन्ग्रेस घबरा गई। जिन किताबों को कोई नकार नहीं सकता, जिनका रिकॉर्ड मौजूद है, जिनके लेखक और पन्ने सबके सामने हैं। उन्हीं से कॉन्ग्रेस को सबसे ज्यादा डर लगने लगा। साफ है, जो पार्टी अप्रकाशित किताब और AI वीडियो के सहारे झूठ गढ़ सकती है, वही पार्टी सच सामने आते ही बौखला जाती है। यही कॉन्ग्रेस का असली चेहरा है।