Home Blog Page 1216

योनिपट्ट से गायब शिवलिंग, टूटी हनुमान-गणेश की मूर्ति… देखें ज्ञानवापी में कैसे हुआ हिंदू देवी-देवताओं का अपमान, ASI ने साफ कहा- पहले ये मंदिर था

ज्ञानवापी की जगह एक बड़ा हिंदू मंदिर था… ऐसा भारतीय पुरात्व सर्वेक्षण ने अपनी रिपोर्ट में बताया है। उन्होंने कई सबूत पेश किए हैं जिनसे पता चलता कि हिंदू मंदिर को तोड़कर वहाँ ज्ञानवापी का ढाँचा खड़ा किया गया। 26 जनवरी की सुबह इस रिपोर्ट पर हिंदू पक्ष के वकील विष्णु जैन ने जानकारी दी थी। हालाँकि अब रिपोर्ट में जोड़ी गई कुछ तस्वीरें भी मीडिया में आ गई हैं जिन्हें देख हिंदू आक्रोशित हैं।

ASI की रिपोर्ट में साफ लिखा गया था ज्ञानवापी परिसर में हिंदू मंदिर था, जिसे 17वीं शताब्दी में तोड़कर नया ढाँचा बनाया गया और ज्ञानवापी परिसर को बनाने में उसी मंदिर के मलबे को लगा दिया गया।

बिन शिवलिंग के योनिपट्ट (तस्वीर साभार: दैनिक जागरण)

तस्वीरों में देख सकते हैं कि कितनी बेरहमी से हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों को खंडित किया गया। इन तस्वीरों में हनुमान जी की मूर्ति है, गणेश जी की प्रतिमा है, विष्णु जी हैं और योनिपट्टा भी है जिसमें से शिवलिंग गायब है।

खंडित गणेश प्रतिमा

बता दें कि ASI क रिपोर्ट में मंदिर होने के 32 सबूत मिले हैं।

चार भुजाधारी खंडित मूर्ति

ज्ञानवापी मामले में ASI रिपोर्ट से हुए मुख्य खुलासे

  • सबसे बड़ी चीज जो इस रिपोर्ट में आई वो भगवान शिव के 3 नाम दीवारों पर लिखे मिले हैं- जनार्दन, रुद्र और ओमेश्वर।
  • दीवारों पर कन्नड़, तेलुगु, देवनागरी और ग्रंथा भाषाओं में लेखनी मिली है।
  • ढाँचे के सारे खंभे भी गवाही दे रहे हैं कि वह पहले मंदिर का हिस्सा थे उन्हें मॉडिफाई करके वहाँ नए ढाँचे में शामिल किया गया।
  • ढाँचे की पश्चिमी दीवार से भी पता चलता है कि वो मंदिर की दीवार है जो 5 हजार साल पहले की नागर शैली में निर्मित है।
  • दीवार के नीचे 1 हजार साल पुराने अवशेष भी मिले हैं।
  • ये भी पता चला है कि ढाँचे से पहले मंदिर में बड़ा केंद्रीय कक्ष और उत्तर की ओर छोटा कक्ष था।
  • कुछ खंबों से हिंदू चिह्नों को मिटाने के भी प्रमाण मिले हैं।
  • इतना ही नही हनुमान जी और गणेश जी की खंडित मूर्तियाँ, दीवार पर त्रिशूल की आकृति भी मिली हैं। साथ ही तहखाने में भी हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ मिलीं।
  • यह भी पता चला कि ढाँचे का गुंबद महज 350 साल पुराना है जबकि उसके परिसर में मिलने वाले हिंदू साक्ष्य हजारों वर्ष पुराने हैं।
  • ढाँचे के निर्माण संबंधी एक शिलापट पर अंकित समय को मिटाने का भी प्रयास हुआ है।
  • ASI रिपोर्ट से निष्कर्ष आया है कि 2 सितंबर 1669 को मंदिर ढहा दिया गया था।

इस रिपोर्ट के आने के बाद  मुस्लिम पक्ष ने इस मुद्दे पर कानूनी लड़ाई आगे बढ़ाने का ऐलान किया है। वहीं हिंदू पक्ष के वकील विष्णु जैन ने कहा है कि 839 पेज की रिपोर्ट में वजूखाने को छोड़कर हर कोने का एक-एक ब्‍योरा एएसआई ने लिखा है। रिपोर्ट से यह साफ हो गया है कि मंदिर तोड़कर ज्ञानवापी ढाँचा बनाया गया थी। इसलिए अब हिंदुओं को वहाँ पूजा-पाठ की अनुमति मिलनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि ढाँचे के भीतर वजूखाने में मिले शिवलिंग का भी एएसआई सर्वे होने के बाद साफ हो जाएगा कि वो कोई फव्वारा नहीं शिवलिंग ही है। इसके अलावा भी कई सबूत मिलेंगे जो हिंदुओं के पक्ष को मजबूत करेंगे।

जिस DMK के नेता रखते हैं सनातन को मिटाने की ख्वाहिश, उनकी सरकार ने फेक न्यूज के उस्ताद मोहम्मद जुबैर को दिया अवाॅर्डः बताया ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ बढ़ाने वाला

तमिलनाडु में सनातन विरोधी पार्टी DMK सत्ता में है। इसके एक मंत्री ने हाल ही में सनातन को मिटाने की बात की थी। अब तमिलनाडु सरकार ने हिंदुओं के खिलाफ प्रोपेगेंडा और फेक न्यूज फैलाने वाले मोहम्मद जुबैर को सम्मानित किया है। गणतंत्र दिवस पर ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ बढ़ाने और सांप्रदायिक वैमनस्यता को रोकने में मदद करने के नाम पर जुबैर को पुरस्कृत किया गया है।

जुबैर ‘सर तन से जुदा’ गैंग के लिए खाद-पानी का काम करता रहा है। इसके एडिटेड वीडियो से देश भर के कट्टरपंथी सड़कों पर उतर जाते हैं। भाजपा की पूर्व नेता नूपुर शर्मा के मामले में सारी दुनिया ये देख चुकी है कि तरह से वह एकतरफा प्रोपेगेंडा फैलाता है, जिसके कारण बड़े पैमाने पर हिंसा हो जाती है। जुबैर को सनातनियों की ऑनलाइन लिंचिंग करने वाले गिरोह का मुख्य सरगना कहा जाता है।

तमिलनाडु सरकार ने जुबैर को ‘कोट्टई अमीर सांप्रदायिक सद्भाव पुरस्कार‘ प्रदान किया है। हालाँकि, ये कोई हैरान करने वाली खबर नहीं है, क्योंकि डीएमके के कई नेता-मंत्री भी सनातन विरोध में आगे रहे हैं। वहीं, मोहम्मद जुबैर इस्लामिक कट्टरपंथियों का साथ लेकर सनातनियों के खिलाफ माहौल तैयार करता रहता है।

तमिलनाडु सरकार से सम्मान मिलने पर जुबैर के फॉलोवर सोशल मीडिया पर भौकाल बना रहे हैं। उसके एक फॉलोवर ने X पर लिखा, “तमिलनाडु सरकार ने फैक्ट चेकर और ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर को कोट्टई अमीर सांप्रदायिक सद्भाव पुरस्कार से सम्मानित किया है। बधाई!! आशा है कि ऑल्ट न्यूज़ सभी दलों के फर्जी समाचार फैलाने वालों के तथ्यों की जाँच जारी रखेगा!”

इसी तरह का एक और ट्वीट अरविंद गुनासेकर नाम के एक ‘पत्रकार’ ने साझा किया है। यह व्यक्ति जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से जुड़ा रहा है। उसने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर एक ऑफिशियल डॉक्यूमेंट्स शेयर है। इस डॉक्यूमेंट मोहम्मद जुबैर को दिए गए सम्मान का विवरण दिया गया है।

इसमें लिखा है, “जुबैर ने ऑल्ट न्यूज़ नाम से एक वेबसाइट बनाई है और वह सोशल मीडिया पर आने वाली खबरों की सत्यता का विश्लेषण करते रहे हैं और अपनी वेबसाइट पर केवल वास्तविक खबरें ही प्रकाशित करते हैं। उनका काम समाज में फर्जी खबरों के कारण होने वाली हिंसा की घटना को रोकने में मदद करता है।”

डॉक्यूमेंट में आगे लिखा है कि जुबैर ने मार्च 2023 में राज्य के खिलाफ फैलाए जा रहे झूठ को ‘पर्दाफाश’ करने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। डॉक्यूमेंट में कहा गया है कि मार्च 2023 में सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसार हुआ कि तमिलनाडु में प्रवासी श्रमिकों पर हमला किया जा रहा है, जिसका एक वीडियो फुटेज भी वायरल हुआ था।

इसमें आगे लिखा है, “वीडियो फुटेज की प्रामाणिकता की पुष्टि करने के बाद जुबैर ने अपनी वेबसाइट ऑल्ट न्यूज़ पर प्रकाशित किया कि जो वीडियो फुटेज पोस्ट किया गया था, वह घटना वास्तव में तमिलनाडु में नहीं हुई थी। उनकी रिपोर्ट ने तमिलनाडु के खिलाफ अफवाहों के प्रसार को रोक दिया और तमिलनाडु में जाति, धर्म, नस्ल और भाषा के कारण होने वाली हिंसा को रोकने के लिए काम किया।”

बता दें कि मार्च 2023 में कई मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया था कि तमिलनाडु में काम करने वाले बिहार के श्रमिकों के खिलाफ हिंसा की घटनाएँ हुई हैं। हालाँकि, जुबैर ने अपनी वेबसाइट पर एक लेख में बताया था कि तमिलनाडु में मजदूरों पर हमले के जो वीडियो शेयर किए जा रहे हैं, वो गलत हैं। हालाँकि उसने सही खबरों के बारे में कभी नहीं बताया।

इस दौरान तमिलनाडु में प्रवासियों के खिलाफ डीएमके नेताओं की बयानबाजी लगातार जारी रही। तमिलनाडु के कई मंत्रियों ने उत्तर भारतीय लोगों के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियाँ कीं। उन्हें ‘वडक्कन’, ‘पानी पुरी वाला’ और ‘पानपराग वायाँ’ कहकर अपमानित किया गया। डीएमके नेताओं ने उत्तर भारतीयों के प्रति नफरत फैलाने वाली नस्लवादी भाषा का इस्तेमाल किया। मुख्यमंत्री स्टालिन के बेटे ने तो सनातन को मिटाने वाले बयान भी दिए।

यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी भाषा में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

जिनकी खोजी शिला से अरुण योगीराज ने बनाई रामलला की मूर्ति, उन पर कर्नाटक में लगा ₹80 हजार जुर्माना: पत्नी के गहने रखने पड़े गिरवी

अयोध्या के भव्य राम मंदिर में भगवान रामलला की जिस मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा हुई है, वह अरुण योगीराज की बनाई है। लेकिन इस मूर्ति को बनाने के लिए शिला खोजने वाले श्रीनिवास नटराज पर काॅन्ग्रेस शासित कर्नाटक में जुर्माना लगा दिया गया है। उन पर 80 हजार रुपए का जुर्माना कर्नाटक के खान एवं भूविज्ञान ने लगाया है। जुर्माने का भुगतान करने के लिए नटराज को अपनी पत्नी के गहने तक गिरवी रखने पड़े हैं।

रिपोर्ट के अनुसार रामलला की मूर्ति तराशने के लिए इस्तेमाल की गई कृष्ण शिला को खोजने वाले ठेकेदार श्रीनिवास नटराज पर अवैध खनन का आरोप लगा 80 हजार का जुर्माना लगाया गया है। हरोहल्ली-गुज्जेगौदानपुरा गाँव निवासी श्रीनिवास नटराज एक स्थानीय खदान ठेकेदार हैं। उन्हें रामदास नाम के किसान ने अपनी कृषि भूमि से चट्टानों को साफ करने का ठेका दिया गया था। उन्होंने इस भूमि की एक विशाल चट्टान को तीन शिलाखंडों में बाँटा था।

रामलला की बनाने के लिए मैसूर के मूर्तिकार अरुण योगीराज ने इन शिलाखंडों में से ही एक को चुना था। नटराज का कहना है कि इस शिलाखंड को सौंपने से पहले कुछ मुखबिरों ने विभाग को इसकी खबर दे दी और उन पर जुर्माना लगा दिया गया। विजयपथ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, नटराज को जुर्माने का भुगतान करने के लिए अपनी पत्नी के सोने के आभूषण गिरवी रखने पड़े।

नटराज का कहना है कि उन्होंने केवल चट्टानों को साफ किया और अगले खेत में चले गए। लेकिन खान और भूविज्ञान विभाग ने उन पर अवैध खनन का आरोप लगाकर जुर्माना लगा दिया। नटराज को इस बात का भी अफसोस है कि कोई भी उनकी मदद के लिए आगे नहीं आया। उन्होंने कहा, “मैं इंतजार कर रहा हूँ कि कोई मेरी भी मदद करेगा।”

70 साल के दलित किसान रामदास के स्वामित्व वाली जमीन से निकले काला ग्रेनाइट पत्थर को रामलला की मूर्ति बनाने के लिए खरीदा गया था। बता दें कि इसी किसान ने हाल ही में भगवान राम के मंदिर के निर्माण के लिए अपनी जमीन का एक हिस्सा दान करने का प्रतिज्ञा की थी।

रामदास के अनुसार वे अपनी 2.14 एकड़ जमीन को कृषि योग्य बनाने के लिए चट्टानों को साफ करना चाहते थे। जब जमीन को समतल करने में वे नाकाम रहे तो उन्होंने नटराज को इसका ठेका दे दिया। इसके बाद मूर्तिकार अरुण योगीराज ने इन्हीं में से एक शिला मूर्ति बनाने के लिए चुनी। नटराज के मुताबिक बाद में इसी जमीन से मिली चट्टानों के शिलाखंडों को भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न की मूर्ति को तराशने के लिए ले जाया गया।

अपनी जमीन पर राम मंदिर बनाने की प्रतिज्ञा के बारे में रामदास ने कहा, “हमारे पास दक्षिण की तरफ एक अंजनेय मंदिर है, जिससे ऐसा लगता है कि अंजनेय की मूर्ति उस जगह को देख रही है, जहाँ से रामलला की मूर्ति के लिए पत्थर का खोदा गया था। इसलिए, मैंने वहाँ भगवान राम को समर्पित एक मंदिर बनाने के लिए चार गुंटा (Guntas) जमीन दान करने का फैसला किया है। हम मंदिर के लिए भगवान राम की मूर्ति तराशने के लिए अरुण योगीराज से मिलेंगे।”

गौरतलब है कि राम मंदिर ट्रस्ट ने पत्थर से रामलला की मूर्ति बनाने के लिए तीन मूर्तिकारों को नियुक्त किया था। तीनों में से अरुण योगीराज की मूर्ति को ट्रस्ट ने राम मंदिर के गर्भगृह में स्थापित करने के लिए चुना था। 22 जनवरी 2024 पीएम नरेंद्र मोदी ने राम मंदिर में इस मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की थी।

2030 तक फ्रांस में पढ़ सकेंगे 30 हजार भारतीय छात्र, रिपब्लिक डे के चीफ गेस्ट का ऐलान: फ्रांस के राष्ट्रपति ने बताया महत्वाकांक्षी लक्ष्य

भारत के 75वें गणतंत्र दिवस 26 जनवरी 2024 की परेड में मुख्य अतिथि के रूप में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों शामिल हुए। उन्होंने साल 2030 तक फ्रांस में 30 हजार भारतीय छात्रों की उपस्थिति दर्ज करने का लक्ष्य रखा है। हालाँकि, उन्होंने ये भी कहा कि ये ऐलान बेहद महत्वाकांक्षी है, लेकिन इस लक्ष्य तक पहुँचना नामुमकिन भी नहीं है।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने एक्स पर लिखा, “2030 में फ्रांस में 30,000 भारतीय छात्र। यह एक बहुत ही महत्वाकांक्षी लक्ष्य है, लेकिन मैं इसे पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध हूँ।” उन्होंने बाकायदा एक कार्ययोजना भी तैयार की है। फ्रांस में भारतीय छात्रों की संख्या कैसे बढ़ाई जाएगी, इसके बारे में मैक्रों ने नोट शेयर किया है।

इस कार्ययोजना में लिखा गया है कि गैर-फ्रेंच भाषी छात्र भी फ्रांस में पढ़ाई कर सकें, इसके लिए इंटरनेशनल क्लासेज तैयार की जाएँगी। इसमें लिखा है, “फ्रेंच भाषा का ज्ञान देने के लिए सहयोग और फ्रेंचाइज नेटवर्क विकसित किया जाएगा। हम उन छात्रों को भी इंटरनेशनल क्लासेज के माध्यम से शिक्षा दे पाएँगे, जो फ्रेंच भाषा नहीं जानते। ऐसे लोगों को भी फ्रांस में पढ़ाई की अनुमति रहेगी।”

सबसे जरूरी बात ये है कि फ्रांस अपने यहाँ पढ़ चुके भारतीय छात्रों के लिए वीजा नियमों को भी सुविधाजनक बनाएगा। फ्रांस में 35 विश्वविद्यालय ऐसे हैं, जो दुनिया के शीर्ष विश्वविद्यालयों की लिस्ट में शामिल हैं। वहीं, 15 ऐसे विश्वविद्यालय हैं, जिन्हें टाइम्स हायर एजुकेशन रैंकिंग में स्थान मिला है।

बता दें कि साल 2024 भारत और फ्रांस के बीच सहयोग और संबंधों का ये महत्वपूर्ण वर्ष हैं। दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी के 25 वर्ष भी पूरे हो रहे हैं। भारत और फ्रांस के बीच साझेदारी किसी भी पश्चिमी देश के साथ भारत की पहली साझेदारी है। इसकी वजह से भारत और फ्रांस के संबंध ऐतिहासिक रूप से मजबूत हुए हैं।

भारत और फ्रांस के बीच रक्षा और सुरक्षा के साथ ही अंतरिक्ष और परमाणु मामलों में भी रणनीतिक साझेदारी है। हाल के कुछ समय में दोनों देशों के बीच इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को लेकर भी साझेदारी बढ़ रही है। दोनों देशों के बीच संबंध अपने स्वर्णिम दौर में है।

पहली महिला महावत से बहरूपिया बाबा तक, आम लोगों का ‘पद्म पुरस्कार’ बने मानः मोदी राज में कोठरी से निकल कोने-कोने में पहुँचा सम्मान

गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर पद्म पुरस्कारों के लिए नामों का ऐलान होने के बाद एक बार फिर से मोदी सरकार की तारीफें शुरू हो गई। साल 2024 में पद्म पुरस्कार विजेताओं में 132 नाम हैं। इनमें 5 हस्तियों को पद्म विभूषण दिया गया है, 17 को पद्मभूषण और 110 को पद्मश्री सम्मान मिला है।

पद्मविभूषण जहाँ असाधारण और विशिष्ट सेवा के लिए दिया जाता है। वहीं पद्मभूषण उच्च कोटि की विशिष्ट सेवा के लिए, और पद्मश्री विशिष्ट सेवा के लिए। हर वर्ष इन पद्म पुरस्कारों का निर्णय वो पद्म पुरस्कार समिति करती है जिसका गठन प्रधानमंत्री करते हैं। इस समिति में गृह सचिव, राष्ट्रपति के सचिव और चार से छह प्रतिष्ठित व्यक्ति सदस्य के रूप में शामिल होते हैं। समिति की सिफारिशें अनुमोदन के लिए प्रधानमंत्री और भारत के राष्ट्रपति को प्रस्तुत की जाती हैं। फिर नामों का ऐलान होता है।

इस बार इस लिस्ट में फिर उन गुमनाम नामों को सम्मान मिला है जिनकी कहानी और संघर्ष को स्थानीय स्तर पर भले ही पहचान मिली थी लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उनका नाम शायद ही कोई जानता था। इनमें असम के गौरपुर की पार्वती बरुआ हैं तो सरायकेला खरसांवा से चामी मुर्मू भी। इसमें रतन कहार हैं तो जॉर्डन लेप्चा भी। इस तरह कई ऐसे नाम हैं जिनकी कहानी हम तक आप तक नहीं पहुँचती, अगर मोदी सरकार इन्हें ये पुरस्कार देकर विशिष्ट पहचान न देती।

इन्हीं विशिष्ट जनों में से 4 की कहानी हम आपसे साझा करने जा रहे हैं।

पार्वती बरुआ

पहली कहानी पार्वती बरुआ की ही है। 67 साल की पार्वती दिखने में जितनी साधारण हैं उनका काज उतना ही असाधारण है। आमतौर पर सोचते हैं कि महावत का मतलब सिर्फ पुरुष ही होता है। लेकिन पार्वती ने इस सोच को चुनौती दी और देश की पहली महिला महावत बनीं। उन्होंने जंगली हाथियों से निपटने उन्हें पकड़ने में तीन राज्य सरकारों की मदद भी की है। वहीं कइयों की जान बचाने में भी उनकी अहम भूमिका रही है।

पार्वती बरूआ

संपन्न जीवन होने के बावजूद उन्होंने अपने पिता की तरह हाथियों में रुचि दिखाई। 14 साल की उम्र से वो हाथियों को अपने काबू में करना सीख गई थीं। हालाँकि उनसे जब पूछा गया कि वो इस क्षेत्र में क्यों इतनी प्रतिबद्ध हैं तो उन्होंने जवाब दिया था कि हाथी स्थिर, वफादार, स्नेही और अनुशासित होते हैं इसलिए वह उन्हें पसंद करती हैं। वह एलीफैंट स्पेशलिस्ट ग्रुप की सदस्य हैं। उनपर क्वीन ऑफ द एलिफेंट्स नाम से डॉक्यूमेंट्री बनी है।

राजस्थान के जानकी लाल उर्फ बहरूपिया बाबा

81 वर्षीय जानकी लाल को पद्मश्री से सम्मानित करने का निर्णय हुआ है। उन्हें ये सम्मान उनकी रूप बदलने वाली कला के कारण मिल रहा है। इस कला को बहरूपिया कला कहते हैं जो धीरे धीरे कला शैली से विलुप्त हो रही है। लेकिन जानकी लाल इस कला को वैश्विक दर्शकों लेकर स्थानीयों तक 60 साल से ज्यादा वक्त से भी दिखा रहे हैं।

जानकी लाल

उन्हें इस कला में महारत अपने पुरखों से हासिल हुई। उनकी तीन पीढ़ियाँ ये काम कर चुकी हैं। इस कला में जटिलता के साथ पौराणिक कथाओं, लोक कथाओं और पारंपरिक कहानियों को दर्शाया जाता है। जानकी लाल ने इस कला को अपने निजी जीवन में आर्थिक तंगी के बावजूद जीवित रखा। वह इस कला को दिखाने लंदन, न्यूयॉर्क, जर्मन, रोम, बर्मिंघम, दुबई, मेलबर्न गए थे। वहाँ उन्हें मंकी मैन कहा जाने लगा था क्योंकि उन्होंने फकीर, बंदर का रोल किया था। उनकी इसी कला को पहचाते हुए अब मोदी सरकार ने पद्म पुरस्कार देने का निर्णय लिया है।

प्रेमा धनराज

8 साल की उम्र में स्टोव फट जाने से 50 फीसद जलने वाली प्रेमा धनराज 14 सर्जरी से होकर गुजरीं थीं। इस छोटी उम्र में उन्होंने जो दर्द झेला उसे महसूस कर उन्होंने निर्णय लिया था कि वो ऐसी पीड़ा से गुजरने वाली महिलाओं की मदद करेंगी। उन्होंने इसके लिए बर्न सर्जन का पेशा चुना और फिर पूरा जीवन उन्हीं के लिए समर्पित कर दिया।

बर्न पीड़ितों के लिए जीवन समर्पित करने वालीं प्रेमा धनराज

उन्होंने अग्नि रक्षा एनजीओ की स्थापना कर 25,000 बर्न पीड़ितों को मुफ्त सर्जरी प्रदान की है। उन्होंने प्लास्टिक सर्जरी पर 3 किताबें भी लिखीं हैं। इसके अलावा उनके काम को वैश्विक स्तर पहचान मिली है। साथ ही इथियोपिया की पहली बर्न यूनिट स्थापित करने का भी श्रेय जाता है।

बाबू राम यादव

पीतल की कारीगरी का काम करने वाले बाबू राम यादव भी इस बार पद्मश्री पा रहे हैं। वह पीतल पर कलाकारी उकेरने का काम पिछले 6 दशकों से कर रहे हैं। ये कला कभी मरे नहीं इसके लिए वह कलाकारी की ट्रेनिंग भी देते हैं। उन्होंने अब तक दुनियाभर में 40 प्रदर्शनियों में अपना काम दिखाया है। बाबू राम यादव फिलहाल पीतल शिल्पकार के कौशल को बचाए रखने के लिए मुरादाबाद में एक कार्यशाला चलाते हैं। उन्होंने 1962 में पीतल पर कला का कौशल सीखना शुरू किया था। फिर इसे ही अपना पेशा बनाया और मैरोरी शिल्पकार बन गए। बाबू राम यादव पीतल के बर्तनों पर जटिल कलाकृतिया बनाने में माहिर हैं।

पीतल पर कारीगरी का हुनर पीढ़ी को सिखा रहे बाबू राम यादव

बता दें कि इन 4 नामों के अलावा जनजातीय कल्याण कार्यकर्ता जागेश्वर यादव, दिव्यांग सामाजिक कार्यकर्ता गुरविंदर सिंह, 650 से अधिक पारंपरिक चावल वैरायटियों को संरक्षित करने वाले सत्यनारायण बेलेरी, औषधीय चिकित्सक हेमचंद मांझी, दक्षिण अंडमान के जैविक किसान के चेल्लाम्मल, हर्बल चिकित्सा विशेषज्ञ यानुंग जामोह लेगो, पहली महिला प्रतिपादक उमा माहेश्वरी डी, बांस शिल्पकार जॉर्डन लेप्चा समेत कई लोगों के नाम हैं।

कॉन्ग्रेस ने नहीं दिया सम्मान, मोदी सरकार ने दिया पुरस्कार

इन नामों को सुन लोग कह रहे हैं कि पुरस्कार के असली हकदारों को अब जाकर सम्मान मिलना शुरू हुआ है वरना पहले किसी ने सोचा भी नहीं था कि इस तरह दूर दराज शहरों में कलाओं को संजोने वाली हस्तियों को इतने बड़े पुरस्कार से सम्मान मिलेगा। कॉन्ग्रेस के शासन काल में तो उन्हें ही सम्मान मिलता था जो उनके खास होते थे। खुद कॉन्ग्रेस समर्थकों ने भी इस बात को माना है।

पिछले साल मोदी सरकार ने शाह रशीद अहमद कादरी ने पद्म पुरस्कार पाने के बाद कहा था, “मैं शुरू से कॉन्ग्रेसी था… पाँच साल यूपीए शासन में उम्मीद की कि मुझे ये सम्मान मिलेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बीजेपी सरकार आई। हमें लगा ये हमें क्यों देंगे लेकिन ख्याल गलत था। उन्होंने मुझे चुना। बहुत-बहुत धन्यवाद।”

पद्मश्री पाने वाले सुपर 30 के आनंद कुमार, जो आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के बच्चों को मुफ्त में आईआईटी प्रवेश परीक्षा की ट्रेनिंग देते हैं, उन्होंने तो यहाँ तक कहा था कि जब सरकार ने उन्हें सम्मानित करने की सूचना दी तो उन्हें यकीन ही नहीं हुआ। उन्होंने

ऐसे ही कर्नाटक के वरिष्ठ नेता प्रमोध माधवराज ने भी 2021 में पद्म पुरस्कारों को लेकर जो मोदी सरकार ने ट्रेंड बदला उसकी तारीफ की थी। उन्होंने कहा था- नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार बनने के बाद, पद्म भूषण और पद्म श्री जैसे पुरस्कार उन लोगों को मिल रहे हैं जो इसके हकदार हैं। उन्होंने कहा था कि अनुकरणीय कारनामों के साथ जमीनी स्तर पर उपलब्धि हासिल करने वालों की पहचान करना और उन्हें पुरस्कार देना एक अच्छी शुरुआत है। उन्होंने ये भी कहा था- “मैं दूसरी पार्टी से हूँ लेकिन फिर भी नरेंद्र मोदी की इस ट्रेंड को बदलने के लिए तारीफ करूँगा।”

मोदी सरकार ने बदली पद्म पुरस्कारों की प्रक्रिया

गौरतलब है मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद पद्म पुरस्कार पाने की प्रक्रिया में बदलाव किया था। पहले जहाँ ये अवार्ड केवल उन लोगों को मिलते थे जो इसके लिए अप्लाई करते थे। उस प्रक्रिया में केवल उन लोगों का नाम आ पाता था था जिन्हें अवार्ड के बारे में पता होता था और जानकारी होती थी कि इसका कब नामांकन करना है, कहाँ उसे जमा कराना है, क्या सोर्स लगानी है आदि-आदि… ये सब बिंदु मिलकर निर्धारित करते थे कि किसका नाम यूपीए शासन में पद्म पुरस्कार के लिए घोषित होगा। इस प्रक्रिया में उन लोगों को अवार्ड ज्यादा मिलता था जो सरकार के करीबी होते थे, वहीं असली संघर्ष करने वाले गुमनाम ही रह जाते थे।

मोदी सरकार जब आई तो उन्होंने इन पुरस्कारों की महत्ता को समझते हुए इन्हें उन हस्तियों तक पहुँचाना शुरू किया जो वाकई जमीनी स्तर पर समाज में उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं मगर उनकी सिफारिश करने वाला कोई नहीं है, उन्हें ये भी नहीं पता है कि पद्म अवार्ड लेने के लिए क्या प्रक्रिया है।

मोदी सरकार ने इस सिस्टम को सुधारने के लिए सबसे पहले नामांकन की प्रक्रिया को पारदर्शी किया। उन्होंने ऑनलाइन नॉमिनेशन शुरू किया जिसमें कोई भी व्यक्ति किसी भी शख्स को उसके कार्यों के लिए नामित कर सकता था। इस प्रक्रिया से फायदा ये हुआ कि वो नाम भी सामने आए जिनके संघर्ष की कहानी लोगों तक नहीं थी। इससे सामान्य जन की इसमें भागीदारी बढ़ी और पद्म पुरस्कार पाकर हस्तियों ने पीएम मोदी का धन्यवाद किया।

लिस्ट उठाकर यदि देखें तो पता चलेगा कि 2016 के बाद से अब तक मोदी सरकार में कई ऐसे लोग सम्मानित हुए हैं जिन्हें उम्मीद ही नहीं थी कि उनके कार्यों के लिए उन्हें कोई पूछेगा। विलुप्त होती कलाओं को संरक्षित करने वालों को इस सम्मान से उत्साह भी बढ़ता है और उन्हें उनके मूल्य का एहसास भी हो पाता है।

आसपास सब तोड़ा पर जिन्न के डर से प्रशासन ने मजार को छोड़ा: मणि पर्वत के पुजारी का दावा, लोग बोले- मजार के नाम पर जंगल पर भी कर लिया कब्जा

अयोध्या के नवनिर्मित मंदिर में 22 जनवरी 2024 को भगवान रामलला की विधि-विधान से प्राण प्रतिष्ठा हुई। अंतराष्ट्रीय स्तर पर गूँजे इस आयोजन के बाद अयोध्या में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी है। ज्यादा से ज्यादा रामभक्त रामलला के दर्शन करने के लिए तीर्थनगरी पहुँच रहे हैं। ऑपइंडिया ने अपनी पिछली ग्राउंड रिपोर्टों में मणि पर्वत, गणेश कुंड और दशरथ समाधि के आसपास दरगाहें बनने का खुलासा किया था। इसी कड़ी में जब हमने और पड़ताल की तो हमें अयोध्या नगरी के अंतर्गत आने वाले अन्य हिस्सों में भी कई मजारें बनाई हुई मिलीं।

साकेत डिग्री कॉलेज से सटाकर बनी मजार

अयोध्या में साकेत महाविद्यालय उच्च शिक्षा का सबसे बड़ा संस्थान माना जाता है। यहाँ रेग्युलर और प्राइवेट तौर पर 10 हजार से अधिक छात्र-छात्राएँ विभिन्न विषयों में स्नातक और परास्नातक की शिक्षा लेते हैं। यह जगह जन्मभूमि की बॉउंड्री से 1 किलोमीटर से भी कम दूरी पर स्थित है। इस डिग्री कॉलेज की बॉउंड्री से सटे बगीचे हैं।

इन्हीं बगीचों को साफ़ करके रानोपाली की तरफ जा रही मुख्य सड़क के ठीक बगल में एक मजार बना दी गई है। इस मजार को पक्का भी कर दिया गया है। बाकायदा रंग-रोशन किया गया है और आसपास की जमीन को भी अनवरत साफ किया जा रहा है। साफ़-सफाई की आड़ में मजार का क्षेत्र बढ़ाया जा रहा है।

साकेत डिग्री कॉलेज से सट कर बनी मजार

एक ही साथ 2 छोटी-छोटी मजारें यहाँ पक्के चबूतरे पर बनी हुईं हैं। मजार पर सुबह-सुबह हरे रंग की चादरपोशी की जाती है। अगरबत्ती आदि भी सुलगा दी जाती है। यहाँ इस्लामी झंडे भी गाड़े गए हैं। फ़िलहाल इस मजार का कोई बोर्ड नहीं लगाया गया है। मजार से ठीक बगल में पंचर बनाने की एक दुकान खोली गई है। जब ऑपइंडिया की टीम मजार पर पहुँची तो वहाँ का खादिम और पंचर वाला मौके से खिसक गया।

जिन्न के डर से नहीं तोड़ी जंक्शन से सटी मजार

जब ऑपइंडिया की टीम मणि पर्वत के अंदर गई, तब वहाँ के पुजारी ने प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ काफी गुस्से में दिखे। उन्होंने कहा कि नवनिर्माण के नाम पर तमाम स्थानों पर तोड़फोड़ की गई, लेकिन मजारों और दरगाहों को छोड़ दिया गया।

पुजारी ने अयोध्या धाम जंक्शन से सटी एक मजार अभी भी होने का दावा किया। उन्होंने कहा, “जब लोगों ने अधिकारियों से मजार पर भी कार्रवाई करने के लिए कहा तो उन्होंने जवाब में कहा कि उन्हें जिन्न से डर लगता है।” पुजारी ने आगे कहा, “हिन्दू ही हिन्दू का दुश्मन है।”

मणि पर्वत के पुजारी

आसपास सब साफ़ लेकिन छोड़ दी गई मजार

मणि पर्वत के पुजारी के आरोपों की तस्दीक करने हम अयोध्या धाम जंक्शन पर गए। हमने पाया कि जंक्शन के दक्षिणी हिस्से पर सफेद रंग की एक बड़ी-सी मजार है। इस मजार के आसपास के निर्माणों को ध्वस्त कर दिया गया है, लेकिन मजार छोड़ दी गई है। यह मजार लोगों के आने-जाने वाले एक पतले से रास्ते से सटाकर बनाई गई है।

मजार के नीचे कोई प्राचीन निर्माण जैसा भी कुछ दिखा। ऊपर सीमेंट का नया निर्माण और हाल ही में रंग-रोशन हुआ है। हमने आसपास के निवासियों से इस मजार के बारे में जानने का प्रयास किया। जंक्शन के दक्षिणी हिस्से में चाय-बिस्किट बेचने वाले एक दुकानदार ने हमें बताया कि वह मजार बाबा लाल खाँ के नाम से जानी जाती है।

अयोध्या धाम जंक्शन से सटी बाबा लाल खाँ की मजार

मजार काफी समय पहले से बनी है, जिस पर पहले भी किसी विकास कार्य आदि को लेकर की गई कार्रवाई में इसे छोड़ दिया गया था। अयोध्या धाम जंक्शन के पिछले हिस्से के अलावा सामने के भाग में भी एक बड़ी दरगाह बनी हुई है। ऊँचे गुंबद वाली इस दरगाह के बाहरी हिस्से में अरबी भाषा में कुछ शब्द लिखे गए हैं।

इस दरगाह के बाहरी हिस्से में एक नल भी लगा दिया गया है, जिससे निकला पानी आसपास गंदगी की वजह बन गया है। दरगाह के पास खजूर के पेड़ भी लगाए गए हैं। गुंबद को हाल ही में हरे रंग से रंगा गया है और इसके ऊपर इस्लामी झंडा लगाया गया है। टाइल्स में भी मक्का-मदीना आदि की तस्वीरें उकेरी गई हैं।

अयोध्या धाम जंक्शन के बाहर बनी दरगाह

जंगल सब कब्जा है

मणि पर्वत की सीढ़ियों पर हमें एक भिखारी मिला। वह आने-जाने वाले श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए दान पर आश्रित है। हमने उससे पूछा कि आसपास कितनी मजारें हैं? हमारे सवाल के जवाब में उसने कहा, “पीछे के सारा जंगल कब्ज़े में है। जमाने से इस पर कब्ज़ा है।”

जब हम विद्याकुंड से निकल कर रानोपाली जाने वाली सड़क पर आगे बढ़े, तब हमें सड़क के दाईं तरफ एक लाइन से पक्की कब्रें दिखाई दीं। इनमें से तो कई मुख्य सड़क से काफी करीब बनी हुई हैं। हमें स्थानीय निवासियों ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताया कि अगर प्रशासन गहनता से जाँच करवाएगा तो रामजन्मभूमि से 2 किलोमीटर परिधि में दर्जनों मजारें और मिलेंगी।

आगे-आगे रामलला, पीछे-पीछे वंदन करते ऋषि-मुनि: 75वाँ गणतंत्र दिवस कई मायनों में खास, परेड की शुरुआत शंख ध्वनि एवं नगाड़ों से

पूरे देश में 75वें गणतंत्र दिवस की धूम है। दिल्ली के कर्तव्य पथ पर हुए गणतंत्र दिवस की परेड इस बार कई मायनों में खास है। एक तरफ अयोध्या में नवनिर्मित राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा हुई तो दूसरी तरफ गणतंत्र दिवस की झाँकी में भगवान रामलला सबसे आगे दिखे। पहली बार परेड की शुरुआत मिलिट्री बैंड की बजाय शंख और नगाड़े की ध्वनि से हुई। वहीं, विभिन्न राज्यों की अलग-अलग झाँकी में भारत की संस्कृति की झलक मिली।

इस बार के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों हैं। कर्तव्य पथ पर कार्यक्रम की शुरुआत में प्रधानमंत्री मोदी ने नेशनल वॉर मेमोरियल पहुँचकर वीर बलिदानियों को श्रद्धांजलि अर्पित की। इस बार गणतंत्र दिवस की थीम ‘विकसित भारत’ और ‘भारत-लोकतंत्र की मातृका’ है। परेड में 13,000 से अधिक विशेष अतिथि भाग ले रहे हैं।

इस बार उत्तर प्रदेश की झाँकी विशेष और आकर्षण का केंद्र रही। इस झाँकी की थीम अयोध्या एवं राम मंदिर है। झाँकी में भगवान राम के बाल स्वरूप रामलला को सबसे आगे दिखाया गया है। वहीं, ऋषि-मुनि उनके पीछे उनका वंदन करते दिख रहे हैं। झाँकी के चारों ओर दीपोत्सव को चित्रित किया गया है, जो कि भगवान राम के अयोध्या आगमन पर लोगों में खुशी को प्रदर्शित करता है।

परेड में भारत के चुनाव आयोग की झाँकी भी शामिल रही। इसमें लोगों को वोट देने के लिए संदेश दिया गया है। केंद्रीय लोक निर्माण विभाग की झाँकी सेंट्रल विस्ट्रा की थीम पर आधारित है। इस झाँकी में संसद को प्रदर्शित किया गया है। वहीं, संस्कृति मंत्रालय की झाँकी में बौद्ध एवं जैन संतों के संवाद को थीम बनाया गया है।

परेड के दौरान सबसे पहले अरुणाचल प्रदेश की झाँकी निकली। यह झाँकी विकसित भारत पर केंद्रित है। इसके बाद हरियाणा और फिर मणिपुर की झाँकी निकली। मणिपुर के बाद आत्मनिर्भर भारत पर आधारित मध्य प्रदेश की झाँकी निकली। इसके बाद ओडिशा, छत्तीगढ़ और राजस्थान की झाँकियाँ दिखाई दीं। राजस्थान की झाँकी में उत्सवधर्मी संस्कृति और महिला हस्तशिल्प उद्योगों के विकास को प्रदर्शित किया गया है।

झारखंड की झाँकी में तसर रेशम के उत्पादन में आदिवासी महिलाओं को दिखाया गया है। गुजरात की झाँकी में पर्यटन विकास को दर्शाया गया है। लद्दाख की झाँकी ‘विकसित भारत: लद्दाख की यात्रा में रोजगार के माध्यम से महिलाओं सशक्तिकरण’ पर आधारित है। झाँकी में लड़कियों को बर्फ के बीच आइस हॉकी खेलते हुए दिखाया गया है।

राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के साथ ही कर्तव्य पथ पर आयोजित मुख्य समारोह का समापन हो गया। इससे पहले सशस्त्र बलों के जवानों ने अपने-अपने करतब दिखाए। फ्लाई पास्ट की अंतिम फॉर्मेशन राफेल विमान के साथ संपन्न हुआ। इसके बाद सशस्त्र सेनाओं के सुप्रीम कमांडर एवं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू राष्ट्रपति भवन की ओर प्रस्थान कर गईं।

जुबैर ने पहले दलित लड़की का किया रेप, फिर मुस्लिम बनने का दबाव डाला: कहा- इस्लाम नहीं कबूला तो वीडियो वायरल कर दूँगा

उत्तर प्रदेश के नोएडा से एक दलित लड़की के साथ लव जिहाद का मामला सामने आया है। आरोपित की पहचान जुबैर के तौर पर सामने आई है। पीड़िता के अनुसार जान-पहचान बढ़ाकर जुबैर ने उसके साथ रेप किया। फिर इस्लाम कबूलने का दबाव डालने लगा। वह धर्मांतरण नहीं करने पर वीडियो वायरल करने की धमकी पीड़िता को दे रहा था।

इस संबंध में नोएडा के सेक्टर-63 थाने में शिकायत दर्ज की गई है। पीड़िता इसी सेक्टर में स्थित एक कंपनी में काम करती है। वह गाजियाबाद के शनि बाजार चौक की रहने वाली है। आरोपित जुबैर भी यहीं का रहने वाला है। पीड़िता से शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने जुबैर को गिरफ्तार कर लिया है।

ऑपइंडिया के पास मौजूद एफआईआर की काॅपी के अनुसार 20 साल की पीड़िता ने बताया है कि जुबैर करीब 5 साल से उसके पीछे पड़ा था। 11 जनवरी 2024 को जब वह ऑफिस जा रही थी तो जुबैर ने उसे ड्राॅप करने का प्रस्ताव दिया। लेकिन ऑफिस की जगह वह पीड़िता को पास के एक होटल में ले गया। यह होटल बहलोलपुर थाना क्षेत्र में आता है। पीड़िता के अनुसार यहीं उसका यौन शोषण कर वीडियो बनाया गया। जब पीड़िता के भाई को यह जानकारी मिली तो उसने जुबैर से वीडियो डिलीट करने को कहा। कथित तौर पर इसके बाद जुबैर और उसके भाई ने उसके साथ मारपीट की।

एक वीडियो में पीड़िता ने जुबैर पर इस्लाम कबूलने के लिए दबाव डालने का भी आरोप लगाया है। उसने कहा है, “मैं नोएडा में मैं जॉब करती थी। जुबैर नाम का लड़का मुझे परेशान करता था। एक दिन मुझे बहला-फुसलाकर वह होटल में ले गया। वीडियो बनाए। उसने कहा कि इस्लाम कबूल करना पड़ेगा वरना में वीडियो वायरल कर दूँगा।”

सेक्टर-63 थाना प्रभारी के मुताबिक गाजियाबाद की रहने वाली युवती सेक्टर-63 की कंपनी में काम करती है। कुछ वक्त पहले उसकी पहचान जुबैर से हुई थी। इसके बाद धीरे-धीरे दोनों के बीच बातचीत होने लगी। आरोपित जुबैर मूलत: बरेली का रहना वाला है। युवती का आरोप है कि 11 जनवरी, को जुबैर उसे एक होटल में ले गया और उसके साथ बलात्कार किया। इस दौरान जुबैर ने अपने मोबाइल से उसकी वीडियो भी बना ली।

इसके बाद से आरोपित लगातार युवती पर इस्लाम कबूल करने का दबाव बना रहा था। वीडियो वायरल करने की धमकी दे रहा था। धमकियों से परेशान होकर पीड़िता ने पुलिस से शिकायत की। थाना प्रभारी ने बताया कि युवती की शिकायत पर केस दर्ज कर जुबैर को गिरफ्तार कर लिया गया है। होटल में बनाए गए वीडियो को बरामद करने की कोशिश की जा रही है। मामले की जाँच की जा रही है।

क्या जो दिखते हैं वे नहीं होते राहुल गाँधी? असम CM के दावे से खड़े हुए सवाल, जानिए किसे कहा जा रहा काॅन्ग्रेस नेता का ‘डुप्लीकेट’

काॅन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी इस समय ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ पर हैं। क्या वे इस यात्रा में बाॅडी डबल का इस्तेमाल कर रहे हैं? यह सवाल असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के एक दावे से खड़ा हुआ है। सरमा ने एक मीडिया संस्थान के ट्वीट का हवाला देकर यह दावा किया है।

साथ ही कहा है कि काॅन्ग्रेस के लोगों ने उन्हें जो बताया है उसके अनुसार राहुल गाँधी ज्यादातर समय बस के भीतर बने एक खास जगह में रहते हैं। उन्होंने पूछा फिर बस के आगे कौन बैठा रहता है? उल्लेखनीय है कि भारत जोड़ो यात्रा के दौरान पैदल दूरी नापने वाले काॅन्ग्रेस नेता इस बार यात्रा में बस का इस्तेमाल कर रहे हैं।

सरमा ने गुरुवार (25 जनवरी 2024) को मीडिया से बात करते हुए कहा, “असम के अंदर एक बड़ा सवाल इंडिया टुडे एनई ने खड़ा कर दिया है कि उन्होंने (राहुल गाँधी) ने बस में बाॅडी डबल यूज किया था। मतलब बस के सामने जो राहुल गाँधी दिखाई देते हैं, वो राहुल नहीं होता है। राहुल अंदर में आठ लोगों के बैठने के लिए एक कमरा है, उसमें बैठते हैं। सवाल है कि क्या वे बाहर बाॅडी डबल यूज कर रहे हैं?”

मोबाइल पर इंडिया टुडे एनई का ट्वीट दिखाते हुए उन्होंने कहा, “जो सामने बैठा है वह राहुल गाँधी नहीं लगता है। वह दूर से राहुल गाँधी लगता है। मैंने यह देखा नहीं है। पर आप ट्वीट देख लीजिए। मुझे काॅन्ग्रेस के लोगों ने बताया है कि बस के अंदर में आठ लोगों के बैठने का बहुत ज्यादा स्पेस है ज्यादातर समय वे वहीं रहते हैं। तो बस के सामने कौन रहता है?”

इस दावे पर काॅन्ग्रेस की प्रतिक्रिया फिलहाल सामने नहीं आई है। बहरहाल आप नीचे इंडिया टुडे एनई का वह ट्वीट देख सकते हैं जिसका हवाला असम के मुख्यमंत्री ने दिया है।

बता दें कि मणिपुर से शुरू हुई यह यात्रा असम में प्रवेश करने के बाद ही विवादों में आ गई थी। मुख्यमंत्री ने राहुल गाँधी के खिलाफ भीड़ भड़काने के मामले में FIR दर्ज करने के निर्देश भी असम के डीजीपी को दिए थे।

कौन हैं राहुल गाँधी के ‘बॉडी डबल’

न्यूज 18 ने राहुल गाँधी के कथित ‘बाॅडी डबल’ का इंटरव्यू किया है। इनका नाम राकेश कुशवाह है। ग्रे दाढ़ी और सफेद टी-शर्ट में वे काॅन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष की तरह ही दिखते हैं। यह इंटरव्यू तब किया गया जब राहुल की यात्रा ऊपरी असम के जोरहाट में थी।

कुशवाह मध्य प्रदेश के भोपाल के रहने वाले हैं। वे 14 जनवरी 2024 से ही इस यात्रा के हिस्से हैं। यात्रा इसी दिन मणिपुर से शुरू हुई थी। उनका कहना है, “मैं गर्व महसूस कर रहा हूँ। युवा काॅन्ग्रेस के समय से ही मैं राहुल जी का अनुसरण अपने नेता के तौर पर करता रहा हूँ। यात्रा के पहले चरण में राहुल जी से मिलने के बाद मेरे लुक पर ध्यान गया। यह गर्व का क्षण है जब मेरे देशवासी मेरी तुलना राहुल जी से करते हैं और कई मौकों पर मुझे राहुल कहकर बुलाते हैं।”

कर्तव्य पथ पर पहली बार नारी शक्ति ने ढोल-नगाड़ों से किया गणतंत्र दिवस का आगाज, फिर शुरू हुई 40 वर्ष पुरानी परंपरा: 13 हजार विशेष अतिथि

पूरा भारत आज अपना 75वाँ गणतंत्र दिवस मना रहा है। कर्तव्य पथ पर ‘विकसित भारत और भारत लोकतंत्र की जननी है’ थीम पर कार्यक्रम जारी है। मुख्य अतिथि के तौर पर यहाँ फ्रांस के राष्ट्रपति इम्मैनुअल मैक्रों आए। उनके अलावा 13 हजार विशेष अतिथि भी मौजूद हैं। परेड की शुरुआत मिलिट्री बैंड की जगह शंख नगाड़ों से हुई।

कार्यक्रम से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ दी, फिर राष्ट्रीय समर स्मारक पहुँच बलिदानियों को श्रद्धांजलि दी। इसके बाद वह कर्तव्य पथ पहुँचे। यहाँ उन्होंने पारंपरिक बग्गी में आई राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और फ्रांसीसी समकक्ष मैक्रों का स्वागत किया।

बता दें कि बग्गी की परंपरा भारत में करीबन 40 साल बाद फिर शुरू हुई है। 1984 में बाद ये पहला मौका है, जब राष्ट्रपति पारंपरिक बग्घी में गणतंत्र दिवस समारोह के लिए निकलीं।

कर्तव्य पथ पर पूरा प्रोग्राम 90 मिनट का है। कार्यक्रम की शुरुआत इस बार मिलिट्री बैंड की जगह शंख नगाड़ों की ध्वनि हुई। इस परेड में आत्मनिर्भर भारत का प्रदर्शन किया गया। साथ ही नारी शक्ति केंद्र रहीं। पहली बार 100 से महिला कलाकारों ने इस कार्यक्रम की शुरुआत वाद्ययंत्र बजाने से की। इसके पहले राष्ट्रगान के साथ 21 तोपों की सलामी भी दी गई। इसके बाद हेलीकॉप्टर यूनिट के चार एमआई-17 से कर्तव्य पथ पर उपस्थित दर्शकों के लिए फूलों की वर्षा हुई।

वहीं गणतंत्र दिवस परेड की अगुवाई दुनिया की एकमात्र घुड़सवार (कैवेलरी) रेजीमेंट द्वारा की गई। इसका नेतृत्व मेजर यशदीप अहलावत ने किया। इसके बाद 11 मैकेनाइज्ड कॉलम, 12 मार्चिंग टुकड़ियाँ और आर्मी एविएशन कोर की ओर से सलामी दी गई। वहीं परेड के दौरान कुल 25 झांकियाँ कर्तव्य पथ पर निकलनी है।

बता दें कि भारत के गणतंत्र दिवस के मौके पर राष्ट्रपति मुर्मू ने भी संदेश जारी किया वहीं पीएम मोदी ने भी इसकी शुभकामना दी है। इसके अलावा विदेशों से भी बधाई आई है। अमेरिका हो या ऑस्ट्रेलिया, कनाडा हो या फिर फ्रांस। सबने इस दिन की बधाई देते हुए भारत के साथ मैत्री संबंधों पर चर्चा की। फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने तो पीएम मोदी के साथ सेल्फी शेयर करके कहा, “मेरे दोस्त नरेंद्र मोदी और सभी भारतीयों को गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ। इस मौके पर आपके बीच आकर खुश और गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ। खुशियाँ मनाएँ।”