महाराष्ट्र के नासिक स्थित टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग (BPO) में जबरन धर्मांतरण और यौन उत्पीड़न मामले में शुक्रवार (15 मई 2026) को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वी वी कथारे ने POSH कमेटी की सदस्य अश्विनी अशोक चैनानी की जमानत याचिका खारिज कर दी।
कोर्ट ने यह फैसला इस आधार पर दिया कि POSH कमेटी की सदस्य होने के बावजूद उन्होंने हिंदू पीड़िता की गंभीर शिकायतों को नजरअंदाज किया। अपनी जिम्मेदारी निभाने और मदद करने की बजाय उन्होंने पीड़िता को ही दोषी ठहराया और आरोपितों को छोड़ देने के लिए दबाव बनाया।

इसके साथ ही कोर्ट ने आरोपित आसिफ अंसारी, रजा मेमन, तौसीफ अत्तार और शाहरुख कुरैशी की जमानत याचिकाएँ भी खारिज कर दी थीं।
पीड़िता की आपबीती, लगातार उत्पीड़न और चैनानी की संवेदनहीनता
हिंदू पीड़िता TCS में एक एसोसिएट के तौर पर काम करती थी और टीम लीडर रजा मेमन के अधीन थी। मई 2023 में मेमन ने ट्रेनिंग एरिया में अकेली मौजूद पीड़िता से संपर्क किया और निजी सवाल पूछकर उससे नजदीकियाँ बढ़ाने की कोशिश की। वह उसे वर्ड पजल हल करने के लिए देता और कहता कि इसे किसी को न बताए।
उसकी हरकतों से पीड़िता असहज महसूस करने लगी। आरोप है कि मेमन उसे अजीब तरीके से घूरता था, जबरन बातचीत करने की कोशिश करता था और ऑफिस में अकेले होने पर अनुचित तरीके से छूता था। पीड़िता ने मौखिक रूप से क्वालिटी और ट्रेनिंग मैनेजर को इसकी जानकारी दी।

मैनेजर ने उसे सावधान रहने की सलाह दी और कहा कि मेमन अच्छा इंसान नहीं है। एक अन्य टीम लीडर निताली जगजाप ने भी उसे अकेले न रहने और हमेशा ग्रुप में रहने की सलाह दी। जब मेमन को इसकी जानकारी हुई तो उसने बदला लेने के लिए पीड़िता का नाम उसके पुरुष सहकर्मी अभिषेक के साथ जोड़ना शुरू कर दिया।
वह दोनों के अफेयर की अफवाह फैलाने लगा। पिछले नवंबर में पीड़िता की शादी हुई थी। वह लंच के बाद ऑफिस में आराम कर लिया करती थी। तब मेमन उसकी शादीशुदा जिंदगी और निजी संबंधों को लेकर भद्दे सवाल पूछता था। फरवरी में जब पीड़िता ने गोवा जाने के लिए छुट्टी माँगी तो उसने पूछा कि क्या वह शराब पीती है और क्या हनीमून मनाने जा रही है।

पीड़िता ने बताया कि वह उसे सिर से पाँव तक घूरता था और उसकी हरकतें साफ तौर पर यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आती थीं। आरोप यह भी है कि मेमन जानबूझकर उस पर काम का दबाव बढ़ाता था ताकि उसे मानसिक रूप से परेशान किया जा सके। परेशान होकर पीड़िता ने ऑफिस हेड अश्विनी चैनानी से शिकायत की।
आदेश में कहा गया है, “रजा मेमन, दानिश और तौशीफ, जो उसके उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार थे, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करने की बजाय चैनानी ने पीड़िता से पूछा कि वह हमेशा ‘हाइलाइट’ में क्यों रहना चाहती है और उसे आरोपितों को छोड़ देने के लिए कहा। कोर्ट ने कहा कि चैनानी के इस रवैये ने आरोपियों का मनोबल बढ़ाया और उनका उत्पीड़न जारी रहा।
19 मार्च को गुड़ी पड़वा के दिन पीड़िता साड़ी पहनकर ऑफिस गई थी। आरोप है कि शाहरुख नामक कर्मचारी ने उसे अश्लीलता से देखा जिससे वह शर्मिंदा महसूस करने लगी। पीड़िता ने पहले भी चैनानी से उसकी शिकायत की थी, लेकिन उन्होंने कोई कदम नहीं उठाया, जिससे आरोपित और ज्यादा बेखौफ हो गए।

कोर्ट ने चैनानी के बचाव के तर्कों को किया खारिज
चैनानी की ओर से कोर्ट में कहा गया कि उन्हें केवल इसलिए इस मामले में घसीटा गया क्योंकि उन्होंने मौखिक शिकायतों पर उचित प्रतिक्रिया नहीं दी। उनका दावा था कि वे पुणे ऑफिस में तैनात थीं और नासिक ऑफिस का रोजमर्रा का काम उनके सीधे नियंत्रण में नहीं था। इसलिए उन्हें घटनाओं की जानकारी नहीं थी और न ही उन्हें कोई लिखित शिकायत मिली।
उन्होंने यह भी कहा कि वे जाँच में सहयोग कर रही हैं और 26 जून को उनके बेटे की शादी है। वहीं महाराष्ट्र सरकार की ओर से कहा गया कि चैनानी ने पीड़िता की मौखिक शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया, जिसके कारण आरोपितों की हरकतें लगातार जारी रहीं। सरकार ने आशंका जताई कि जमानत मिलने पर वह गवाहों को प्रभावित कर सकती हैं और सबूतों से छेड़छाड़ हो सकती है।
चैनानी ने यह भी सवाल उठाया कि जयेश और निताली जगजाप के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई। इस पर कोर्ट ने कहा कि दोनों ने पीड़िता को आरोपित से सावधान रहने और अकेले न रहने की सलाह दी थी, जबकि चैनानी ने शिकायत को ही दबाने की कोशिश की। कोर्ट ने साफ कहा कि POSH कमेटी की सदस्य होने के नाते शिकायत मिलने पर कार्रवाई करना चैनानी की जिम्मेदारी थी।

कोर्ट ने मामले की गंभीरता बताते हुए कहा कि आरोपित पीड़िता से निजी सवाल पूछते थे, अश्लील टिप्पणियाँ करते थे और उसकी शादीशुदा जिंदगी, नींद, हनीमून और शराब पीने की आदत तक पर सवाल उठाते थे। FIR के मुताबिक, शाहरुख और मेमन उसे गलत नीयत से सिर से पाँव तक घूरते थे।
उन्होंने उसका पीछा भी किया, गुड़ी पड़वा पर साड़ी पहनने के बाद उसकी खूबसूरती पर भद्दी टिप्पणियाँ भी की गईं। जाँच में सामने आया कि कार्यस्थल के खराब माहौल से परेशान होकर पीड़िता ने मार्च 2026 में नौकरी छोड़ दी, जिसके बाद औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई।

कोर्ट ने कहा कि चैनानी ने POSH कमेटी सदस्य होने के बावजूद पीड़िता की शिकायतों के प्रति असंवेदनशील रवैया अपनाया। उन्होंने न केवल आरोपितों को बचाया बल्कि उन्हें यौन उत्पीड़न जारी रखने के लिए उकसाया भी।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि चैनानी ने हालात बिगड़ने का इंतजार किया लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया। उन्होंने आँख और कान बंद कर लिए, जबकि सब कुछ उनके सामने हो रहा था। कोर्ट ने यह भी कहा कि पहली FIR दर्ज होने के बाद भी उन्होंने नासिक ऑफिस जाकर हालात की समीक्षा नहीं की।

कोर्ट ने कहा कि शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी के लिए पीड़िता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि उसने तुरंत चैनानी को परिस्थितियों के बारे में सूचित कर दिया था।

शिकायत में देरी के पीछे कोर्ट ने मानी उचित वजह
कोर्ट ने कहा कि कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 की धारा 9 के अनुसार यदि महिला लिखित शिकायत नहीं कर पाती तो इंटरनल कमेटी का सदस्य उसकी मदद करेगा। ऐसे में शिकायत लिखित न होने को आधार बनाना गलत है।
कोर्ट ने कहा कि शिकायत उन्हीं लोगों के माध्यम से आगे बढ़नी थी जो खुद आरोपित थे और पीड़िता उन्हीं के अधीन काम करती थी। वह साधारण परिवार से आती है और आर्थिक मजबूरी में नौकरी कर रही थी। ऐसे में अपने वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ शिकायत करने से उसके करियर और नौकरी पर असर पड़ने का डर स्वाभाविक था।

कोर्ट ने यह भी माना कि यौन उत्पीड़न के आरोप सामने आने पर परिवार और पति भी उस पर नौकरी छोड़ने का दबाव डाल सकते थे। इसलिए शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी को परिस्थितियों के अनुसार उचित माना गया। जाँच एजेंसी ने कोर्ट को बताया कि चैनानी जाँच में सहयोग नहीं कर रही थीं। इसी वजह से उन्हें गिरफ्तार किया गया।
चैनानी ने अपने बचाव में एक पुराने केस का हवाला दिया जिसमें एक प्रिंसिपल के खिलाफ कार्यवाही रद्द कर दी गई थी। लेकिन कोर्ट ने कहा कि उस मामले में प्रिंसिपल के खिलाफ आरोपी की मदद या सहयोग करने के सबूत नहीं थे, जबकि इस मामले में चैनानी के खिलाफ स्पष्ट सबूत मौजूद हैं।
कोर्ट ने कहा कि पीड़िता द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकायत किए जाने के बावजूद POSH कमेटी सदस्य होने के बाद भी चैनानी ने शिकायत को नजरअंदाज किया और पीड़िता पर आरोपितों को छोड़ देने का दबाव बनाया। यह साफ तौर पर आरोपितों की मदद करने जैसा है।

कोर्ट ने कहा कि जाँच अभी शुरुआती चरण में है और आरोपित प्रभावशाली हैं। ऐसे में जमानत मिलने पर गवाहों को प्रभावित करने और सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका है। इसी आधार पर जमानत याचिका खारिज कर दी गई।
NCW की रिपोर्ट में भी सामने आया था कार्यस्थल का खराब माहौल और ‘जीरो POSH अनुपालन’
11 मई को राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने बताया था कि महाराष्ट्र सरकार को इस मामले की जाँच करने वाली फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की विस्तृत रिपोर्ट सौंप दी गई है। रिपोर्ट में नासिक ऑफिस के माहौल को बेहद जहरीला और परेशान करने वाला बताया गया।
इसमें लगातार बुलिंग, यौन उत्पीड़न, अधिकारों के दुरुपयोग और महिला कर्मचारियों के खिलाफ हिंदू विरोधी टिप्पणियों का जिक्र किया गया। कमेटी ने कहा कि नासिक ऑफिस में POSH कानून का सही तरीके से पालन नहीं किया जा रहा था। रिपोर्ट के मुताबिक पुणे और नासिक ऑफिस के लिए एक ही इंटरनल कमेटी बनाई गई थी, जो नियमों के खिलाफ है।
इतना ही नहीं, इंटरनल कमेटी के सदस्य कभी नासिक ऑफिस का निरीक्षण करने भी नहीं पहुँचे। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि ऑफिस में POSH नियमों से जुड़े पोस्टर, बोर्ड या जानकारी तक मौजूद नहीं थी। कर्मचारियों को नियमों और शिकायत प्रक्रिया के बारे में जागरूक करने के लिए कोई अभियान नहीं चलाया गया।
इंटरनल कमेटी के सदस्यों को लेकर भी कोई ट्रेनिंग या जागरूकता कार्यक्रम नहीं था। कमेटी ने निष्कर्ष निकाला कि ऑफिस में POSH कानून का ‘जीरो कंप्लायंस’ था।
कोर्ट के ताजा आदेश ने भी यह दिखा दिया कि कंपनी की व्यवस्था कितनी कमजोर और समझौता करने वाली थी। जिन लोगों पर हिंदू महिला कर्मचारियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी, वही उनकी शिकायतों को दबाने और आरोपितों को बचाने में लगे हुए थे।
(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)




