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शिकायतों को किया नजरअंदाज, पीड़िता को ही ठहराया जिम्मेदार, धर्मांतरण गैंग को दी क्लीन चिट: जानें नासिक TCS कांड में POSH कमेटी सदस्य को क्यों नहीं मिली जमानत

महाराष्ट्र के नासिक स्थित टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग (BPO) में जबरन धर्मांतरण और यौन उत्पीड़न मामले में शुक्रवार (15 मई 2026) को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वी वी कथारे ने POSH कमेटी की सदस्य अश्विनी अशोक चैनानी की जमानत याचिका खारिज कर दी।

कोर्ट ने यह फैसला इस आधार पर दिया कि POSH कमेटी की सदस्य होने के बावजूद उन्होंने हिंदू पीड़िता की गंभीर शिकायतों को नजरअंदाज किया। अपनी जिम्मेदारी निभाने और मदद करने की बजाय उन्होंने पीड़िता को ही दोषी ठहराया और आरोपितों को छोड़ देने के लिए दबाव बनाया।

इसके साथ ही कोर्ट ने आरोपित आसिफ अंसारी, रजा मेमन, तौसीफ अत्तार और शाहरुख कुरैशी की जमानत याचिकाएँ भी खारिज कर दी थीं।

पीड़िता की आपबीती, लगातार उत्पीड़न और चैनानी की संवेदनहीनता

हिंदू पीड़िता TCS में एक एसोसिएट के तौर पर काम करती थी और टीम लीडर रजा मेमन के अधीन थी। मई 2023 में मेमन ने ट्रेनिंग एरिया में अकेली मौजूद पीड़िता से संपर्क किया और निजी सवाल पूछकर उससे नजदीकियाँ बढ़ाने की कोशिश की। वह उसे वर्ड पजल हल करने के लिए देता और कहता कि इसे किसी को न बताए।

उसकी हरकतों से पीड़िता असहज महसूस करने लगी। आरोप है कि मेमन उसे अजीब तरीके से घूरता था, जबरन बातचीत करने की कोशिश करता था और ऑफिस में अकेले होने पर अनुचित तरीके से छूता था। पीड़िता ने मौखिक रूप से क्वालिटी और ट्रेनिंग मैनेजर को इसकी जानकारी दी।

मैनेजर ने उसे सावधान रहने की सलाह दी और कहा कि मेमन अच्छा इंसान नहीं है। एक अन्य टीम लीडर निताली जगजाप ने भी उसे अकेले न रहने और हमेशा ग्रुप में रहने की सलाह दी। जब मेमन को इसकी जानकारी हुई तो उसने बदला लेने के लिए पीड़िता का नाम उसके पुरुष सहकर्मी अभिषेक के साथ जोड़ना शुरू कर दिया।

वह दोनों के अफेयर की अफवाह फैलाने लगा। पिछले नवंबर में पीड़िता की शादी हुई थी। वह लंच के बाद ऑफिस में आराम कर लिया करती थी। तब मेमन उसकी शादीशुदा जिंदगी और निजी संबंधों को लेकर भद्दे सवाल पूछता था। फरवरी में जब पीड़िता ने गोवा जाने के लिए छुट्टी माँगी तो उसने पूछा कि क्या वह शराब पीती है और क्या हनीमून मनाने जा रही है।

पीड़िता ने बताया कि वह उसे सिर से पाँव तक घूरता था और उसकी हरकतें साफ तौर पर यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आती थीं। आरोप यह भी है कि मेमन जानबूझकर उस पर काम का दबाव बढ़ाता था ताकि उसे मानसिक रूप से परेशान किया जा सके। परेशान होकर पीड़िता ने ऑफिस हेड अश्विनी चैनानी से शिकायत की।

आदेश में कहा गया है, “रजा मेमन, दानिश और तौशीफ, जो उसके उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार थे, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करने की बजाय चैनानी ने पीड़िता से पूछा कि वह हमेशा ‘हाइलाइट’ में क्यों रहना चाहती है और उसे आरोपितों को छोड़ देने के लिए कहा। कोर्ट ने कहा कि चैनानी के इस रवैये ने आरोपियों का मनोबल बढ़ाया और उनका उत्पीड़न जारी रहा।

19 मार्च को गुड़ी पड़वा के दिन पीड़िता साड़ी पहनकर ऑफिस गई थी। आरोप है कि शाहरुख नामक कर्मचारी ने उसे अश्लीलता से देखा जिससे वह शर्मिंदा महसूस करने लगी। पीड़िता ने पहले भी चैनानी से उसकी शिकायत की थी, लेकिन उन्होंने कोई कदम नहीं उठाया, जिससे आरोपित और ज्यादा बेखौफ हो गए।

कोर्ट ने चैनानी के बचाव के तर्कों को किया खारिज

चैनानी की ओर से कोर्ट में कहा गया कि उन्हें केवल इसलिए इस मामले में घसीटा गया क्योंकि उन्होंने मौखिक शिकायतों पर उचित प्रतिक्रिया नहीं दी। उनका दावा था कि वे पुणे ऑफिस में तैनात थीं और नासिक ऑफिस का रोजमर्रा का काम उनके सीधे नियंत्रण में नहीं था। इसलिए उन्हें घटनाओं की जानकारी नहीं थी और न ही उन्हें कोई लिखित शिकायत मिली।

उन्होंने यह भी कहा कि वे जाँच में सहयोग कर रही हैं और 26 जून को उनके बेटे की शादी है। वहीं महाराष्ट्र सरकार की ओर से कहा गया कि चैनानी ने पीड़िता की मौखिक शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया, जिसके कारण आरोपितों की हरकतें लगातार जारी रहीं। सरकार ने आशंका जताई कि जमानत मिलने पर वह गवाहों को प्रभावित कर सकती हैं और सबूतों से छेड़छाड़ हो सकती है।

चैनानी ने यह भी सवाल उठाया कि जयेश और निताली जगजाप के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई। इस पर कोर्ट ने कहा कि दोनों ने पीड़िता को आरोपित से सावधान रहने और अकेले न रहने की सलाह दी थी, जबकि चैनानी ने शिकायत को ही दबाने की कोशिश की। कोर्ट ने साफ कहा कि POSH कमेटी की सदस्य होने के नाते शिकायत मिलने पर कार्रवाई करना चैनानी की जिम्मेदारी थी।

कोर्ट ने मामले की गंभीरता बताते हुए कहा कि आरोपित पीड़िता से निजी सवाल पूछते थे, अश्लील टिप्पणियाँ करते थे और उसकी शादीशुदा जिंदगी, नींद, हनीमून और शराब पीने की आदत तक पर सवाल उठाते थे। FIR के मुताबिक, शाहरुख और मेमन उसे गलत नीयत से सिर से पाँव तक घूरते थे।

उन्होंने उसका पीछा भी किया, गुड़ी पड़वा पर साड़ी पहनने के बाद उसकी खूबसूरती पर भद्दी टिप्पणियाँ भी की गईं। जाँच में सामने आया कि कार्यस्थल के खराब माहौल से परेशान होकर पीड़िता ने मार्च 2026 में नौकरी छोड़ दी, जिसके बाद औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई।

कोर्ट ने कहा कि चैनानी ने POSH कमेटी सदस्य होने के बावजूद पीड़िता की शिकायतों के प्रति असंवेदनशील रवैया अपनाया। उन्होंने न केवल आरोपितों को बचाया बल्कि उन्हें यौन उत्पीड़न जारी रखने के लिए उकसाया भी।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि चैनानी ने हालात बिगड़ने का इंतजार किया लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया। उन्होंने आँख और कान बंद कर लिए, जबकि सब कुछ उनके सामने हो रहा था। कोर्ट ने यह भी कहा कि पहली FIR दर्ज होने के बाद भी उन्होंने नासिक ऑफिस जाकर हालात की समीक्षा नहीं की।

कोर्ट ने कहा कि शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी के लिए पीड़िता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि उसने तुरंत चैनानी को परिस्थितियों के बारे में सूचित कर दिया था।

शिकायत में देरी के पीछे कोर्ट ने मानी उचित वजह

कोर्ट ने कहा कि कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 की धारा 9 के अनुसार यदि महिला लिखित शिकायत नहीं कर पाती तो इंटरनल कमेटी का सदस्य उसकी मदद करेगा। ऐसे में शिकायत लिखित न होने को आधार बनाना गलत है।

कोर्ट ने कहा कि शिकायत उन्हीं लोगों के माध्यम से आगे बढ़नी थी जो खुद आरोपित थे और पीड़िता उन्हीं के अधीन काम करती थी। वह साधारण परिवार से आती है और आर्थिक मजबूरी में नौकरी कर रही थी। ऐसे में अपने वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ शिकायत करने से उसके करियर और नौकरी पर असर पड़ने का डर स्वाभाविक था।

कोर्ट ने यह भी माना कि यौन उत्पीड़न के आरोप सामने आने पर परिवार और पति भी उस पर नौकरी छोड़ने का दबाव डाल सकते थे। इसलिए शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी को परिस्थितियों के अनुसार उचित माना गया। जाँच एजेंसी ने कोर्ट को बताया कि चैनानी जाँच में सहयोग नहीं कर रही थीं। इसी वजह से उन्हें गिरफ्तार किया गया।

चैनानी ने अपने बचाव में एक पुराने केस का हवाला दिया जिसमें एक प्रिंसिपल के खिलाफ कार्यवाही रद्द कर दी गई थी। लेकिन कोर्ट ने कहा कि उस मामले में प्रिंसिपल के खिलाफ आरोपी की मदद या सहयोग करने के सबूत नहीं थे, जबकि इस मामले में चैनानी के खिलाफ स्पष्ट सबूत मौजूद हैं।

कोर्ट ने कहा कि पीड़िता द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकायत किए जाने के बावजूद POSH कमेटी सदस्य होने के बाद भी चैनानी ने शिकायत को नजरअंदाज किया और पीड़िता पर आरोपितों को छोड़ देने का दबाव बनाया। यह साफ तौर पर आरोपितों की मदद करने जैसा है।

कोर्ट ने कहा कि जाँच अभी शुरुआती चरण में है और आरोपित प्रभावशाली हैं। ऐसे में जमानत मिलने पर गवाहों को प्रभावित करने और सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका है। इसी आधार पर जमानत याचिका खारिज कर दी गई।

NCW की रिपोर्ट में भी सामने आया था कार्यस्थल का खराब माहौल और ‘जीरो POSH अनुपालन’

11 मई को राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने बताया था कि महाराष्ट्र सरकार को इस मामले की जाँच करने वाली फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की विस्तृत रिपोर्ट सौंप दी गई है। रिपोर्ट में नासिक ऑफिस के माहौल को बेहद जहरीला और परेशान करने वाला बताया गया।

इसमें लगातार बुलिंग, यौन उत्पीड़न, अधिकारों के दुरुपयोग और महिला कर्मचारियों के खिलाफ हिंदू विरोधी टिप्पणियों का जिक्र किया गया। कमेटी ने कहा कि नासिक ऑफिस में POSH कानून का सही तरीके से पालन नहीं किया जा रहा था। रिपोर्ट के मुताबिक पुणे और नासिक ऑफिस के लिए एक ही इंटरनल कमेटी बनाई गई थी, जो नियमों के खिलाफ है।

इतना ही नहीं, इंटरनल कमेटी के सदस्य कभी नासिक ऑफिस का निरीक्षण करने भी नहीं पहुँचे। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि ऑफिस में POSH नियमों से जुड़े पोस्टर, बोर्ड या जानकारी तक मौजूद नहीं थी। कर्मचारियों को नियमों और शिकायत प्रक्रिया के बारे में जागरूक करने के लिए कोई अभियान नहीं चलाया गया।

इंटरनल कमेटी के सदस्यों को लेकर भी कोई ट्रेनिंग या जागरूकता कार्यक्रम नहीं था। कमेटी ने निष्कर्ष निकाला कि ऑफिस में POSH कानून का ‘जीरो कंप्लायंस’ था।

कोर्ट के ताजा आदेश ने भी यह दिखा दिया कि कंपनी की व्यवस्था कितनी कमजोर और समझौता करने वाली थी। जिन लोगों पर हिंदू महिला कर्मचारियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी, वही उनकी शिकायतों को दबाने और आरोपितों को बचाने में लगे हुए थे।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

वर्जिन बच्चियों से निकाह के लिए तालिबान ने सुनाया फरमान, कहा- इनकी चुप्पी को ‘हाँ’ समझो: विदेशों तक में उठे सवाल, चुप्पी साधे बैठा रहा भारत का लिबरल गैंग

अफगानिस्तान में तालिबान सरकार ने एक नया फैमिली लॉ लागू किया है और इस कानून की एक लाइन को लेकर पूरी दुनिया में बहस शुरू हो गई है। इस नए नियम में कहा गया है कि अगर कोई ‘कुँवारी लड़की’ (वर्जिन लड़की) निकाह के प्रस्ताव पर कुछ नहीं बोलती, तो उसकी चुप्पी को ही उसकी मंजूरी यानी कंसेंट माना जाएगा। यही वजह है कि मानवाधिकार संगठन, महिला अधिकार कार्यकर्ता और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ इसे औरतों और बच्चियों की आजादी पर एक और बड़ा हमला बता रही हैं।

क्या है तालिबान का नया फैमिली लॉ?

तालिबान ने 31 आर्टिकल वाला एक नया फैमिली रेगुलेशन जारी किया है, जिसका नाम ‘प्रिंसिपल्स ऑफ सेपरेशन बिटवीन स्पाउसेस’ रखा गया है। इसे तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने मंजूरी दी है। यह कानून निकाह, तलाक, नाबालिगों का निकाह, मियां-बीवी के अलगाव और पारिवारिक विवादों से जुड़े नियम तय करता है। लेकिन सबसे विवादित हिस्सा वही है, जिसमें ‘कुँवारी लड़की’ की चुप्पी को उसकी मंजूरी माना गया है।

क्या है ‘खियार अल बुलूघ’ का नियम?

इस कानून में ‘खियार अल बुलूघ‘ नाम का एक इस्लामी कानूनी सिद्धांत भी शामिल किया गया है। इसका मतलब है ‘बालिग होने के बाद चुनने का अधिकार।’ इसके तहत अगर किसी बच्चे का निकाह कम उम्र में तय कर दिया गया है, तो वह बालिग होने के बाद उस निकाह को खत्म करने की माँग कर सकता है।

लेकिन यहाँ एक बड़ी शर्त भी रखी गई है। निकाह खत्म करने के लिए मजहबी अदालत की मंजूरी जरूरी होगी। यानी सिर्फ लड़की की इच्छा से निकाह खत्म नहीं होगा, बल्कि तालिबान की अदालत फैसला करेगी कि निकाह रद्द किया जाए या नहीं।

कानून में यह भी कहा गया है कि अगर शौहर निकाह के लिए सही नहीं माना जाता या दहेज को लेकर बहुत ज्यादा फर्क होता है, तो उस निकाह को मान्यता नहीं दी जाएगी। लेकिन आलोचकों का कहना है कि कौन ‘सही लड़का है’, इसका फैसला भी तालिबान की मजहबी अदालतें ही करेंगी।

नाबालिग बच्चों के निकाह को लेकर क्या कहता है कानून?

इस नए कानून में ‘बाल विवाह’ को लेकर कहा गया है कि कुछ परिस्थितियों में नाबालिग लड़के और लड़कियों के निकाह को मान्यता दी जा सकती है। कानून में अब्बा और दादा को बच्चों का निकाह तय करने का अधिकार दिया गया है। यानी परिवार के बड़े पुरुष यह फैसला कर सकते हैं कि लड़की का निकाह किससे और कब होगा।

कानून में यह भी कहा गया है कि अगर रिश्तेदारों द्वारा तय किए गए निकाह में लड़का ‘सामाजिक रूप से उपयुक्त’ माना जाता है और दहेज भी मजहबी मानकों के मुताबिक है, तो उस निकाह को वैध माना जा सकता है। आसान भाषा में कहें तो अगर परिवार और मजहबी अदालत को रिश्ता सही लगता है, तो कम उम्र में हुए निकाह भी स्वीकार किए जा सकते हैं।

निजी जिंदगी में भी बढ़ेगा तालिबान सरकार का दखल

इस कानून में सिर्फ निकाह ही नहीं बल्कि कई निजी मामलों में भी तालिबान की अदालतों को हस्तक्षेप का अधिकार दिया गया है। अगर किसी औरत पर व्यभिचार यानी अवैध संबंध का आरोप लगाता है, अगर कोई धर्म परिवर्तन करता है, अगर शौहर लंबे समय तक गायब रहता है या ‘जिहार’ जैसी स्थिति बनती है, तो तालिबानी जज फैसला ले सकेंगे।

‘जिहार’ इस्लामी कानून का एक पुराना सिद्धांत है जिसमें शौहर अपनी बीवी की तुलना ऐसी औरत रिश्तेदार से करता है जिससे निकाह करना मजहबी रूप से मना होता है। ऐसे मामलों में अदालत मियां-बीवी को अलग करने, जेल भेजने या दूसरी सजा देने का आदेश भी दे सकती है।

क्यों खतरनाक माना जा रहा कानून?

मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि किसी भी निकाह में लड़की की साफ और खुली सहमति जरूरी होती है। लेकिन अफगानिस्तान में औरतों की स्थिति पहले ही बहुत कमजोर हो चुकी है। 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद लड़कियों की पढ़ाई छठी क्लास के बाद बंद कर दी गई। औरतों को यूनिवर्सिटी जाने से रोक दिया गया। कई नौकरियों में औरतों के काम करने पर पाबंदी है और उनके अकेले यात्रा करने पर भी सख्त नियम लागू हैं।

ऐसे माहौल में अगर कोई लड़की डर, दबाव या परिवार की वजह से चुप रहती है, तो उसकी चुप्पी को ‘हाँ’ मान लेना जबरन निकाह का रास्ता खोल सकता है। जिस समाज में औरतों को खुलकर बोलने की आजादी ही नहीं हो, वहाँ ‘चुप्पी ही सहमति है’ जैसा नियम बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।

दुनिया भर में हो रही कानून की आलोचना

एमनेस्टी इंटरनेशनल समेत कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने इस कानून की आलोचना की है। उनका कहना है कि निकाह में सहमति हमेशा साफ, खुली और बिना दबाव के होनी चाहिए। किसी लड़की का डर या मजबूरी में चुप रहना सहमति नहीं माना जा सकता।

कई विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि तालिबान जिस तरह इन नियमों को मजहबी आधार पर सही ठहराने की कोशिश कर रहा है, वह इस्लाम की आधुनिक और व्यापक व्याख्याओं से मेल नहीं खाता। उनके मुताबिक मजहब के नाम पर औरतों की आवाज दबाना और उन्हें फैसले लेने के अधिकार से दूर रखना मानवाधिकारों के खिलाफ है।

यही कारण है कि तालिबान का यह नया कानून सिर्फ अफगानिस्तान तक सीमित मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि अब इसे दुनिया भर में औरतों की आजादी और अधिकारों से जुड़े बड़े सवाल के तौर पर देखा जा रहा है।

लड़कियों की ‘चुप्पी’ पर तालिबान का कानून, लेकिन लिबरल चेहरे खामोश क्यों?

यह कानून साफ तौर पर महिला विरोधी है। यह लड़कियों से उनका सबसे बुनियादी अधिकारी यानी उनकी शादी पर फैसला लेने का हक तक छीन लेता है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि भारत में खुद को लिबरल, प्रोग्रेसिव और महिला अधिकारों का समर्थक बताने वाले कई नामी इस्लामी अकाउंट्स और एक्टिविस्ट इस मुद्दे पर चुप हैं।

ये वही लोग हैं जो भारत में किसी भी मुद्द पर तुरंत ट्वीट करते हैं, लंबी पोस्ट लिखते हैं, सरकार की आलोचना करते हैं और नारीवाद की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। विदेशी मजहबी मुल्कों में मुस्लिमों से जुड़ा कोई भी मामला हो, तो सबसे पहले यही लोग आवाज उठाते नजर आते हैं। लेकिन अफगानिस्तान में लड़कियों की पढ़ाई बंद कर दी जाए, महिलाओं को घरों तक सीमित कर दिया जाए और अब लड़की की चुप्पी को ही शादी की मंजूरी मान लिया जाए, तब इनकी टाइमलाइन लगभग खाली नजर आती है।

न कोई बड़ा कैंपेन दिखता है, न लगातार ट्वीट्स, न रीट्वीट और न ही वैसी नाराजगी, जैसी भारत के मामलों में दिखाई जाती है। कहीं ‘सेव वूमेन’ की बात नहीं होती, कहीं ‘फेमिनिज्म’ की बहस नहीं होती और न ही महिलाओं की आजादी पर लंबे थ्रेड लिखे जाते हैं।

यही दोहरापन सबसे ज्यादा सवाल खड़े करता है। अगर महिलाओं के अधिकार सच में सबसे ऊपर हैं, तो फिर अफगानिस्तान की लड़कियाँ भी उतनी ही अहम होनी चाहिए जितनी भारत की महिलाएँ। लेकिन अक्सर ऐसा लगता है कि कुछ लोगों की एक्टिविज्म और नारीवाद की आवाज सिर्फ चुनिंदा मुद्दों तक सीमित रह जाती है।

क्या है अधिक मास के पीछे का विज्ञान और रहस्य: जानिए क्यों भारतीय पंचांग में जुड़ता है अतिरिक्त महीना और कैसे तय होता है अधिक ज्येष्ठ या अधिक श्रावण

भारतीय कैलेंडर केवल त्योहारों की तारीख तय करने का माध्यम नहीं रहा है। हजारों वर्षों से यह समय, ऋतुओं के बदलाव, सूर्य और चंद्रमा की गति और उनके जीवन पर प्रभाव को समझने की एक व्यवस्था भी रहा है। आज दुनिया का बड़ा हिस्सा ‘ग्रेगोरियन कैलेंडर’ का उपयोग करता है, लेकिन भारत का पारंपरिक पंचांग समय की गणना का अलग तरीका अपनाता है, जिसमें सूर्य और चंद्रमा दोनों की चाल को महत्व दिया जाता है।

इसी कारण भारतीय पंचांग को ‘लूनीसोलर सिस्टम’ यानी चंद्र-सौर प्रणाली कहा जाता है। इस व्यवस्था का सबसे रोचक हिस्सा है ‘अधिक मास’, जिसे ‘पुरुषोत्तम मास’ भी कहा जाता है। यह एक अतिरिक्त महीना होता है, जो कुछ वर्षों के अंतराल पर कैलेंडर का संतुलन बनाए रखने के लिए जोड़ा जाता है।

इस साल अधिक ज्येष्ठ मास शुरू हुआ है। इसके साथ ही फिर से लोगों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि यह अतिरिक्त महीना क्यों आता है, हर साल क्यों नहीं आता, कभी अधिक ज्येष्ठ तो कभी अधिक श्रावण क्यों बनता है और इसे धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण मानने के बावजूद विवाह जैसे शुभ कार्य इस दौरान क्यों टाले जाते हैं।

इन सवालों का जवाब केवल पौराणिक कथाओं में नहीं, बल्कि खगोल विज्ञान और गणित में भी छिपा है।

पश्चिमी कैलेंडर से अलग कैसे काम करता है भारतीय पंचांग?

दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला ग्रेगोरियन कैलेंडर केवल सूर्य की गति पर आधारित है। पृथ्वी को सूर्य का एक चक्कर पूरा करने में लगभग 365 दिन और करीब 6 घंटे लगते हैं। इसी अतिरिक्त समय को संतुलित करने के लिए हर चार साल में एक अतिरिक्त दिन जोड़कर लीप ईयर बनाया जाता है।

भारतीय पंचांग का तरीका अलग है। इसमें सूर्य और चंद्रमा दोनों को महत्व दिया जाता है। महीनों की गणना मुख्य रूप से चंद्रमा की गति से होती है, जबकि सूर्य की चाल कैलेंडर को ऋतुओं से जोड़कर रखती है। यही कारण है कि पंचांग में केवल तारीखें ही नहीं, बल्कि तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण भी शामिल होते हैं, जिन्हें पंचांग के पाँच अंग कहा जाता है।

इस व्यवस्था में चंद्रमा महीनों को तय करता है, जबकि सूर्य ऋतुओं का संतुलन बनाए रखता है। प्राचीन भारतीय विद्वानों ने समझ लिया था कि अगर केवल चंद्र के महीनों के आधार पर कैलेंडर चलाया जाए, तो धीरे-धीरे त्योहार और ऋतुएँ एक-दूसरे से अलग हो जाएँगी। इसलिए एक सुधार प्रणाली की जरूरत थी।

चंद्र और सौर वर्ष के अंतर से पड़ी अधिक मास की जरूरत

चंद्रमा को पूर्णिमा से पूर्णिमा तक एक चक्र पूरा करने में लगभग 29.5 दिन लगते हैं। ऐसे 12 चंद्र मास मिलकर करीब 354 दिनों का एक चंद्र वर्ष बनाते हैं। वहीं सौर वर्ष लगभग 365 दिनों का होता है। यानी दोनों के बीच हर साल करीब 11 दिनों का अंतर बन जाता है। अगर इस अंतर को ठीक न किया जाए, तो धीरे-धीरे कैलेंडर ऋतुओं से अलग होने लगेगा।

समय के साथ त्योहार अपने तय मौसमों से हट जाएँगे। ऐसा भी हो सकता है कि सर्दियों के त्योहार गर्मियों में आने लगें या फसल से जुड़े पर्व दूसरी ऋतुओं में पहुँच जाएँ। प्राचीन भारतीय खगोलविदों ने इस समस्या को बहुत पहले समझ लिया था और इसका समाधान निकाला। जब यह अंतर काफी बड़ा हो जाता है, तब एक पूरा अतिरिक्त महीना जोड़ दिया जाता है।

लगभग 32 महीने बाद ही क्यों आता है अधिक मास?

चूँकि चंद्र और सौर वर्ष के बीच हर साल लगभग 11 दिनों का अंतर होता है, इसलिए करीब तीन साल में यह अंतर 33 दिनों के आसपास पहुँच जाता है, जो लगभग एक चंद्र महीने के बराबर है। इसी वजह से लगभग 32 महीने 16 दिन और कुछ घंटों के बाद एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है। यही अधिक मास कहलाता है।

यह पश्चिमी लीप ईयर सिस्टम से अलग है। ग्रेगोरियन कैलेंडर में हर चार साल में केवल एक दिन जोड़ा जाता है, जबकि भारतीय पंचांग में पूरा महीना जोड़ा जाता है, क्योंकि यहाँ केवल दिनों का नहीं बल्कि चंद्र और सौर चक्रों के संतुलन का सवाल होता है। यह व्यवस्था प्राचीन भारतीय समय गणना की गहराई को दिखाती है।

आधुनिक उपकरणों के बिना भी विद्वानों ने ऐसा सिस्टम बनाया, जिसने त्योहारों, ऋतुओं और खगोलीय चक्रों को एक साथ जोड़े रखा।

कैसे तय होता है कौन-सा महीना बनेगा अधिक मास?

बहुत से लोग सोचते हैं कि अधिक मास हर तीन साल में आने वाला एक तय अतिरिक्त महीना है, लेकिन इसकी गणना इससे कहीं ज्यादा जटिल होती है। इसे तय करने में संक्रांति की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। संक्रांति का अर्थ है सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना।

सामान्य रूप से हर चंद्र महीने में सूर्य एक नई राशि में प्रवेश करता है और एक संक्रांति होती है। लेकिन अगर कोई चंद्र मास ऐसा गुजर जाए, जिसमें सूर्य किसी नई राशि में प्रवेश न करे, यानी उस पूरे महीने में कोई संक्रांति न हो, तो वही महीना अधिक मास बन जाता है। यही कारण है कि हर बार अधिक मास का नाम एक जैसा नहीं होता।

अगर यह स्थिति ज्येष्ठ महीने में बने, तो वह अधिक ज्येष्ठ कहलाता है। अगर श्रावण में बने, तो अधिक श्रावण कहा जाता है। इसी तरह अन्य महीने भी अधिक मास बन सकते हैं। इस साल यह स्थिति ज्येष्ठ महीने में बनी है, इसलिए इसे अधिक ज्येष्ठ कहा जा रहा है।

कभी अधिक ज्येष्ठ तो कभी अधिक श्रावण क्यों बनता है?

यह लोगों के बीच सबसे सामान्य सवालों में से एक है, क्योंकि अधिक मास को अक्सर केवल अधिक श्रावण से जोड़कर देखा जाता है। इसका जवाब फिर सूर्य और चंद्रमा की गति में ही छिपा है। चंद्र महीने अपनी गति से चलते रहते हैं, जबकि सूर्य अपनी अलग चाल से राशियों में आगे बढ़ता है।

कभी-कभी ऐसा होता है कि ज्येष्ठ के पूरे चंद्र महीने में सूर्य कोई नई राशि में प्रवेश नहीं करता। तब ज्येष्ठ अधिक ज्येष्ठ बन जाता है। दूसरी बार यही स्थिति श्रावण में बन सकती है, तब वह अधिक श्रावण कहलाएगा। यानी अतिरिक्त महीना किसी एक तय महीने से जुड़ा नहीं होता। यह पूरी तरह खगोलीय गणना और संक्रांति के नियमों पर निर्भर करता है।

इसी कारण कभी लोगों को अधिक ज्येष्ठ देखने को मिलता है और कभी अधिक श्रावण।

लोगों के बीच अधिक श्रावण की ज्यादा चर्चा क्यों होती है?

हालाँकि कोई भी महीना अधिक मास बन सकता है, लेकिन लोगों को अधिक श्रावण ज्यादा याद रहता है। इसकी वजह खगोल विज्ञान से ज्यादा सामाजिक और धार्मिक है। श्रावण या सावन का हिंदू परंपरा में विशेष महत्व है। यह भगवान शिव की उपासना से जुड़ा महीना माना जाता है।

कांवड़ यात्रा, सावन सोमवार, शिव मंदिरों में पूजा और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के कारण यह महीना सार्वजनिक जीवन में बेहद प्रमुख दिखाई देता है। जब अधिक श्रावण आता है, तो सोमवारों और धार्मिक अनुष्ठानों की संख्या बढ़ जाती है, जिससे लोगों का ध्यान इस ओर ज्यादा जाता है।

उदाहरण के तौर पर अधिक श्रावण के दौरान आठ सावन सोमवार और नौ मंगल गौरी व्रत तक पड़ सकते हैं। इसी वजह से कई लोगों को लगने लगा कि अधिक मास का मतलब हमेशा अतिरिक्त श्रावण ही होता है, जबकि ऐसा नहीं है।

श्रावण, चातुर्मास और विस्तारित पूजा-अर्चना

श्रावण को चातुर्मास का पहला महीना माना जाता है। चातुर्मास में श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक शामिल होते हैं। मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए श्रावण महीने में कठोर तप और व्रत किए थे। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनकी इच्छा स्वीकार की।

इसी कारण श्रावण महीना शिव और पार्वती की पूजा के लिए विशेष माना जाता है। अधिक श्रावण के दौरान यह महीना लंबा हो जाता है। भक्त भगवान शिव के लिए सोमवार का व्रत रखते हैं और मंगलवार को माता पार्वती की पूजा करते हैं। महिलाएँ परिवार की सुख-समृद्धि और लंबी आयु के लिए मंगल गौरी व्रत करती हैं।

बुधवार भगवान विट्ठल, गुरुवार गुरु, शुक्रवार माता लक्ष्मी और तुलसी, शनिवार शनि देव और रविवार सूर्य देव को समर्पित माना जाता है। इस दौरान भगवान शिव का अभिषेक भी किया जाता है। दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से बने पंचामृत से पूजा होती है। बेलपत्र चढ़ाए जाते हैं और महामृत्युंजय मंत्र, गायत्री मंत्र तथा रुद्र गायत्री का जाप किया जाता है।

कई लोग इस समय सात्विक जीवनशैली अपनाते हैं और मांसाहार, शराब व तंबाकू जैसी चीजों से दूरी बनाते हैं।

अलग-अलग कैलेंडर परंपराओं से भी बदलती हैं श्रावण की तारीखें

श्रावण को लेकर भ्रम की एक वजह भारत में मौजूद दो अलग-अलग चंद्र कैलेंडर परंपराएँ भी हैं। हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश जैसे उत्तर भारतीय राज्यों में पूर्णिमांत पंचांग का पालन होता है, जिसमें महीना पूर्णिमा पर समाप्त होता है।

वहीं महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, गोवा, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों में अमांत प्रणाली ज्यादा प्रचलित है, जिसमें महीना अमावस्या पर समाप्त होता है। इसी अंतर के कारण अलग-अलग राज्यों में श्रावण की तारीखें बदल सकती हैं, हालांकि धार्मिक महत्व लगभग समान रहता है।

मलमास से पुरुषोत्तम मास तक की पौराणिक कथा

अधिक मास का धार्मिक और पौराणिक महत्व भी काफी बड़ा है। पद्म पुराण और स्कंद पुराण में बताया गया है कि पहले इस अतिरिक्त महीने को मलमास कहा जाता था। कथा के अनुसार जब यह अतिरिक्त महीना बना, तब बाकी बारह महीनों ने इसे स्वीकार नहीं किया, क्योंकि इसका संबंध किसी संक्रांति से नहीं था। इसे उपेक्षित और महत्वहीन माना गया।

यहाँ ‘मल’ शब्द का अर्थ गंदगी नहीं बल्कि उपेक्षित या छोड़ा हुआ था। अपमानित होकर यह महीना भगवान विष्णु के पास पहुँचा और अपना दुःख बताया। तब भगवान विष्णु ने इसे अपनाया और अपना एक पवित्र नाम ‘पुरुषोत्तम’ इसे दे दिया, जिसका अर्थ है सर्वोच्च पुरुष। तभी से मलमास पुरुषोत्तम मास कहलाने लगा और इसे विशेष आध्यात्मिक महत्व प्राप्त हुआ।

यह कथा यह संदेश भी देती है कि जिसे समाज कभी महत्वहीन समझे, वही आगे चलकर सम्मान और आदर प्राप्त कर सकता है।

पुरुषोत्तम मास में भगवान विष्णु की पूजा का विशेष महत्व

पुरुषोत्तम मास का वैष्णव परंपरा में विशेष महत्व माना जाता है। इस दौरान भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण और उनके विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है। भक्त भगवद्गीता, श्रीमद्भागवत और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करते हैं। कई मंदिरों में कथा, भजन और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

मान्यता है कि चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर योगनिद्रा में चले जाते हैं, जबकि भगवान शिव सृष्टि के कार्यों का संचालन संभालते हैं। इसे पुराने चक्रों के समाप्त होने और नए बदलावों के आने के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है।

इस दौरान क्यों टाले जाते हैं विवाह और नए काम?

हालाँकि पुरुषोत्तम मास को पवित्र माना जाता है, लेकिन इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मूर्ति स्थापना और नए व्यापार जैसे शुभ कार्य अक्सर टाल दिए जाते हैं। परंपरागत रूप से इस महीने को आत्मचिंतन और भक्ति का समय माना गया।

इसे वार्षिक चक्र के बीच एक ठहराव की तरह देखा गया, जहाँ सामाजिक उत्सवों की बजाय पूजा, दान, ध्यान और साधना को महत्व दिया गया। यही वजह है कि इस महीने का सम्मान भी किया जाता है और बड़े मांगलिक कार्यों से इसे अलग भी रखा जाता है।

सामाजिक जीवन और खेती-किसानी में भी थी अधिक मास की भूमिका

इतिहास में पंचांग केवल मंदिरों और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं था। यह खेती, यात्रा, त्योहारों और दैनिक जीवन को भी प्रभावित करता था। इसलिए अधिक मास जैसी व्यवस्थाएँ ऋतुओं और सामाजिक गतिविधियों के बीच संतुलन बनाए रखने में मदद करती थीं।

अलग-अलग क्षेत्रों में इस महीने से जुड़ी अपनी परंपराएँ विकसित हुईं। कहीं दान-पुण्य को महत्व मिला, कहीं भागवत कथा आयोजित की गई, तो कहीं भगवान विष्णु की पूजा पर विशेष जोर दिया गया। इस तरह अधिक मास केवल गणितीय सुधार नहीं बल्कि सांस्कृतिक जीवन का भी हिस्सा बन गया।

अधिक मास- विज्ञान और आस्था के मिलन का प्रतीक

आज के समय में विज्ञान और आस्था को अक्सर एक-दूसरे के विरोध में देखा जाता है, लेकिन अधिक मास एक अलग तस्वीर पेश करता है। इसकी शुरुआत एक खगोलीय समस्या के समाधान के रूप में हुई थी, जहाँ चंद्र और सौर वर्षों के बीच संतुलन बनाने की जरूरत थी। बाद में इसके साथ धार्मिक मान्यताएँ और सांस्कृतिक परंपराएँ जुड़ती चली गईं।

इसी कारण अधिक मास आज खगोल विज्ञान, कैलेंडर गणना, पौराणिक कथाओं और सामाजिक परंपराओं के संगम का प्रतीक बन चुका है। यह महीना याद दिलाता है कि भारतीय समय गणना केवल दिनों की गिनती तक सीमित नहीं थी। इसमें ग्रहों की चाल, ऋतुएँ, खेती, त्योहार और मानव जीवन, सबको एक साथ जोड़ने की कोशिश की गई थी।

शायद यही वजह है कि हजारों साल पुरानी यह परंपरा आज भी लोगों के जीवन में उतनी ही प्रासंगिक बनी हुई है।

यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

नीदरलैंड में PM मोदी ने देखा समुद्र पर बना 32KM लंबा बांध: जानिए गुजरात के ₹90 हजार करोड़ के Kalpasar Project से कैसे है इसका कनेक्शन?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यूरोप के चार देशों के दौरे पर हैं। रविवार (17 मई 2026) को वे नीदरलैंड्स पहुँचे, जहाँ उन्होंने प्रधानमंत्री रॉब जेटन से मुलाकात की। इस दौरे के दौरान उन्होंने नीदरलैंड्स में दुनिया भर में मशहूर अफ्सलुइटडिज्क डैम का दौरा किया। इसका सीधा कनेक्शन गुजरात के कल्पसर प्रोजेक्ट से है।

अपने बाढ़ कंट्रोल और फ्रेश वॉटर मैनेजमेंट सिस्टम के लिए दुनिया का ध्यान खींचने वाले डैम का दौरा करने के बाद प्रधानमंत्री ने X पर लिखा, ‘वॉटर रिसोर्स एक ऐसा एरिया है जिसमें नीदरलैंड्स ने बहुत काम किया है। पूरी ग्लोबल कम्युनिटी इस मामले में नीदरलैंड्स से बहुत कुछ सीख सकती है। आज मुझे अफ्सलुइटडिज्क डैम का दौरा करने और इसकी खासियतों के बारे में जानने का मौका मिला।’

उन्होंने कहा कि हम इंडिया में मॉडर्न टेक्नोलॉजी लाने के लिए वचनबद्ध हैं, जिसका मकसद सिंचाई, बाढ़ से बचाव और इनलैंड वॉटरवे नेटवर्क को बढ़ाने में मदद करना है। इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने कुछ तस्वीरें भी शेयर कीं, जिनमें वे नीदरलैंड के प्रधानमंत्री और दूसरे अधिकारियों के साथ बांध का दौरा करते और उसके बारे में समझते हुए देखे जा सकते हैं।

PM मोदी के विदेश दौरे सिर्फ़ दौरे नहीं होते। ऐसे हर दौरे से देश को फ़ायदा पहुंचाने वाले कई फ़ैसले होते हैं, कई नई पहल होती हैं, और विदेशों में सफल रही टेक्नोलॉजी और पॉलिसी को भारत लाने का रास्ता खुलता है। नीदरलैंड में इस अजीब नाम वाले डैम का प्रधानमंत्री का दौरा भी ऐसे ही दौरों में से एक है और इसका सीधा कनेक्शन गुजरात के कल्पसर प्रोजेक्ट से है, जो अगर लागू हो गया तो यह भारत का सबसे बड़ा वॉटर इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट होगा।

नीदरलैंड में यह अफस्लुइटडिज्क डैम क्या है?

यह 32 किलोमीटर लंबा डैम, जो नीदरलैंड की पहचान है, नॉर्थ सी और इज़्सेलमीर मीठे पानी की झील को अलग करता है। इंजीनियरिंग का कमाल, यह डैम नीदरलैंड के निचले इलाकों को बाढ़ से भी बचाता है। इसे 1932 में बनाया गया था। उससे पहले, नीदरलैंड मेनलैंड और नॉर्थ सी के बीच का इलाका खुला रहता था और बाढ़ का पानी शहरों में घुस जाता था। 8 दशक पहले बने इस डैम ने इस समस्या का पक्का समाधान दिया है।

हालांकि, इसका काम यहीं तक सीमित नहीं है। इसके बनने से एक नेचुरल झील भी बनी, जिसका पानी इस्तेमाल किया जा सकता है। ट्रांसपोर्ट का रास्ता भी खुल गया है। इसके साथ ही, रिन्यूएबल एनर्जी बनाकर भी फ़ायदा उठाया जा सकता है। इस प्रोजेक्ट के बाद नई ज़मीन तैयार हुई और वहां खेती शुरू हुई, जो भी एक फ़ायदा है।

आसान शब्दों में कहें तो यह प्रोजेक्ट दुनिया के सबसे सफल वॉटर मैनेजमेंट प्रोजेक्ट्स में से एक है। अभी इस डैम को मॉडर्न बनाने का काम चल रहा है, जिसमें एडवांस्ड वॉटर डिस्चार्ज सिस्टम, फिश माइग्रेशन कॉरिडोर, स्टॉर्म प्रोटेक्शन सिस्टम वगैरह भी जोड़े जाएंगे। वहां की सरकार का कहना है कि इस सारे काम में 800 मिलियन पाउंड का खर्च आएगा।

PM मोदी के इस डैम पर जाने के पीछे वजह यह है कि भारत सरकार जानना चाहती है कि क्या यह डच वॉटर मैनेजमेंट मॉडल भारत में असरदार होगा और अगर होगा, तो इसका कितना इस्तेमाल किया जा सकता है। नीदरलैंड्स के पास बाढ़ कंट्रोल, समुद्री पानी के मैनेजमेंट, मीठे पानी के स्टोरेज सिस्टम वगैरह में दशकों का अनुभव है।

भारत भी अभी कुछ इलाकों में बाढ़, पानी की कमी, समुद्र का लेवल बढ़ना, क्लाइमेट चेंज वगैरह जैसी समस्याओं का सामना कर रहा है। सरकार जानना चाहती है कि भविष्य में सरकार इन समस्याओं को हल करने के लिए जो वॉटर इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स शुरू करेगी, उनमें इस डच मॉडल का इस्तेमाल कैसे किया जा सकता है।

कल्पसर प्रोजेक्ट में डच मॉडल काम आ सकता है

ऐसा ही एक प्रोजेक्ट गुजरात में पहले से ही पाइपलाइन में है – कल्पसर प्रोजेक्ट। कल्पसर प्रोजेक्ट के आइडिया के बीज दशकों पहले बोए गए थे। इसका बेसिक आइडिया गुजरात में खंभात की खाड़ी में भावनगर और भरूच के बीच एक डैम बनाकर मीठे पानी का एक नया रिज़र्वॉयर बनाना और समुद्र के पानी को खाड़ी में जाने से रोकना है। यह प्रोजेक्ट सौराष्ट्र और साउथ गुजरात को जोड़ेगा।

इस प्रोजेक्ट के कई मकसद हैं। डैम बनने से मीठे पानी का एक रिजर्व बन जाएगा और अरब सागर में गिरने वाले नदी के पानी को समुद्र में जाने से पहले स्टोर किया जाएगा। डैम से भावनगर और सौराष्ट्र के आस-पास के इलाकों में पानी की कई गंभीर समस्याओं का स्थाई समाधान हो जाएगा। यह पानी कच्छ तक पहुँचाया जा सकता है, जो अभी नर्मदा कैनाल के जरिए किया जाता है। इसके अलावा, इस पानी का इस्तेमाल सौराष्ट्र-दक्षिण गुजरात के इलाकों में खेती और सिंचाई के लिए किया जा सकता है।

यह प्रोजेक्ट बाढ़ कंट्रोल में भी कारगर साबित होगा। इससे पानी के बहाव को कंट्रोल किया जा सकेगा।

इस प्रोजेक्ट में डैम पर 10-लेन का ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर बनाने का भी प्रस्ताव है, जिससे भावनगर और भरूच के बीच 300 किलोमीटर की मौजूदा दूरी कम हो जाएगी और सौराष्ट्र और दक्षिण गुजरात सीधे जुड़ जाएँगे।

कल्पसर प्रोजेक्ट 70 के दशक से ही चर्चा में है। शुरुआत में, इसे टाइडल एनर्जी बनाने की जगह के तौर पर प्रस्तावित किया गया था, लेकिन बाद में बाढ़ कंट्रोल, मीठे पानी के स्टोरेज और ट्रांसपोर्ट पर ध्यान दिया गया। पिछले कुछ सालों में प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत भी बढ़ी है। इसकी लागत लगभग 85,000 से 90,000 करोड़ रुपए होने का अनुमान है।

प्रोजेक्ट के लिए जमीन पर काम अभी शुरू नहीं हुआ है। सरकार ने हाल ही में हुए विधानसभा में कहा कि कल्पसर प्रोजेक्ट अभी डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट को फाइनल करने के स्टेज में है। DPR के बाद इसे राज्य और केंद्र की मंजूरी के लिए भेजा जाएगा। इस प्रोजेक्ट के लिए इंटरनेशनल एक्सपर्ट्स ने 43 अलग-अलग तकनीकी पहलू से स्टडी की हैं, जिनमें से 25 से ज्यादा स्टडी पूरी हो चुकी हैं।

सरकार का कहना है कि प्रोजेक्ट शुरू होने के लगभग आठ साल में काम पूरा हो जाएगा, लेकिन प्रोजेक्ट के बड़े आकार और चुनौतियों को देखते हुए इसे बनाने में ही 12-15 साल लगेंगे। अनुमान है कि पूरे प्रोजेक्ट के शुरू होने से लेकर इसके पूरा होने तक दो दशक लग जाएँ।

कल्पसर और नीदरलैंड्स के इस डैम में कई समानताएँ हैं। भौगोलिक स्थितियाँ भी एक जैसी हैं। नीदरलैंड्स के डैम को देख और समझकर कल्पसर प्रोजेक्ट में आने वाली चुनौतियों का हल ढूँढा जा रहा है। इसमें डच सरकार और उसके एक्सपर्ट्स का टेक्निकल सपोर्ट भारत और गुजरात के लिए बहुत अहम है। इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी के दौरे के दौरान भारत और नीदरलैंड्स के बीच एक एग्रीमेंट साइन हुआ है, जिसके तहत नीदरलैंड्स, कल्पसर और ऐसे दूसरे प्रोजेक्ट्स के लिए डैम बनाने, कोस्टल इंजीनियरिंग, फ्लड कंट्रोल सिस्टम, वॉटर मैनेजमेंट और दूसरे तकनीकी जानकारियों से भारत की मदद करेगा।

नीदरलैंड ने दशकों पहले वॉटर मैनेजमेंट के क्षेत्र में काफी काम किया था। भारत भी अब इस दिशा में कदम बढ़ा रहा है और इसका सेंटर गुजरात बनने जा रहा है। यह पक्का है कि PM मोदी के नीदरलैंड्स दौरे और इस डैम के दौरे के बाद दोनों देशों के बीच साइन हुआ एग्रीमेंट स्वदेशी प्रोजेक्ट को गति देगा। दरअसल पीएम मोदी का दौरा सिर्फ देश के हित को साधने के लिए किया जाता है। इससे भी साफ होता है।

(यह लेख गुजराती में लिखी गई है। मूलरूप को पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

PM मोदी को 31वीं बार मिला अंतरराष्ट्रीय सम्मान, स्वीडन ने ‘रॉयल ऑर्डर ऑफ द पोलर स्टार’ से नवाजा: जानिए इस यात्रा से भारत को कैसे पहुँचेगा लाभ

स्वीडन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रतिष्ठित ‘रॉयल ऑर्डर ऑफ द पोलर स्टार कमांडर ग्रैंड क्रॉस’ से सम्मानित किया है। यह किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष या सरकार के प्रमुख को दिया जाने वाला स्वीडन का सर्वोच्च शाही सम्मान है। वहीं प्रधानमंत्री मोदी को मिलने वाला यह 31वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मान है। ये सम्मान भारत की 140 करोड़ जनता का भी है, जैसा पीएम अक्सर बोलते हैं। इन सबसे अहम ये है कि पीएम मोदी के इन दौरों ने भारत को कितना फायदा हुआ।

पीएम मोदी के दौरे से देश को फायदा

यूरोपीय देश नीदरलैंड के बाद स्वीडन पहुँचे पीएम मोदी के दौरे पर दुनिया की नजर है। स्वीडन के साथ व्यापार, तकनीक, रक्षा और ग्रीन एनर्जी जैसे कई मुद्दों पर नए समझौते होने की उम्मीद है। यूरोपीय यूनियन के साथ मुक्त व्यापार समझौता हो चुका है। ऐसे में स्वीडन और भारत अगले 5 सालों में द्विपक्षीय व्यापार और निवेश को दोगुना करने पर सहमत हो गए हैं।

साइबर सुरक्षा, एआई प्रबंधन, सेमीकंडक्टर और संयुक्त नौसेना अभ्यास पर सहमत हैं। यूरोपीय यूनियन के साथ भारत का मदर ऑफ ऑल डील्स को लागू करने पर भी सहमति बन गई है।

यूरोपीय देशों और अमेरिका के संबंधों में हाल में आई कड़वाहट के बाद यूरोपीय देश भारत जैसे देशों से उम्मीद कर रहे हैं। स्वीडन के साथ भारत के संबंध पहले से ही गहरे हैं। ऐसे में ये नई ऊँचाईयों को छू सकता है। यूरोपीय यूनियन के साथ भारत के मुक्त व्यापार डील को ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा जाता है। इसका स्वीडन पहले से अहम हिस्सा है। इस साल ये लागू होने वाला है।

इसके बाद व्यापार में काफी तरक्की होगी। भारतीय ज्वैलरी, चमड़े, कपड़े से लेकर दूसरे क्षेत्रों में एक बड़ा बाजार मिलने जा रहा है। स्वीडन से टेक्नोलॉजी भारत आएँगे।

हाई टेक्नोलॉजी और इनोवेशन में फायदा– स्वीडन दुनिया के सबसे इनोवेटिव देशों में एक माना जाता है। उसके साथ समझौते से भारत को एआई, साइबर सिक्योरिटी, ऑटोमेशन और डिजिटल टेक्नोलॉजी में सहयोग मिलेगा। भारतीय स्टार्टअप्स और टेक कंपनियों को यूरोपीय बाजार तक पहुँच आसान हो जाएगी।

रक्षा सहयोग- स्वीडन की कंपनियां एडवांस डिफेंस टेक्नोलॉजी में मजबूत हैं। फाइटर जेट, रडार, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और रक्षा निर्माण में सहयोग से भारत को फायदा होगा। ‘मेक इन इंडिया’ के तहत संयुक्त उत्पादन को लेकर भी पीएम मोदी के यात्रा के दौरान सहमति बन गई है।

ग्रीन एनर्जी और क्लीन टेक- स्वीडन ग्रीन टेक्नोलॉजी में काफी आगे है। भारत के साथ सहयोग से ग्रीन हाइड्रोजन, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, वेस्ट मैनेजमेंट,कार्बन कटौती तकनीक में सहयोग मिल सकता है।

निवेश और रोजगार– स्वीडिश कंपनियाँ भारत में मैन्युफैक्चरिंग और टेक सेक्टर में निवेश बढ़ाएँगी। इससे रोजगार और स्किल डेवलपमेंट को बढ़ावा मिलेगा।

शिक्षा और रिसर्च– भारत में दुनिया की नामी-गिरामी यूनिवर्सिटी अपना ब्रांच खोल रही हैं। ऐसे में भारतीय छात्रों और रिसर्च संस्थानों को स्वीडिश यूनिवर्सिटीज के साथ साझेदारी का भी फायदा मिल सकता है। इससे विज्ञान, हेल्थ सेक्टर और क्लाइमेट रिसर्च में सहयोग बढ़ सकता है।

स्वीडन के साथ मजबूत रिश्ते से भारत की यूरोप में राजनीतिक और आर्थिक स्थिति और मजबूत होती है। यह चीन के प्रभाव को संतुलित करने की रणनीति का भी हिस्सा माना जा रहा है।

गुटेनबर्ग में पीएम मोदी की बातचीत

गुटेनबर्ग में पीएम मोदी ने भारत-स्वीडन के बीच बढ़ती रणनीतिक साझेदारी पर जोर दिया। उन्होंने टेक्नोलॉजी, इनोवेशन , हरित विकास और वैश्विक सहयोग को मजबूत करने की बात कही।

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “भारत दुनिया के साथ मिलकर भविष्य की नई साझेदारी को आगे बढ़ाना चाहता है।” दोनों नेताओं ने आपसी व्यापार और निवेश को पांच साल में दोगुना करने का लक्ष्य भी तय किया है।

पीएम मोदी ने कहा कि आज के तनावपूर्ण वैश्विक माहौल में, भारत और स्वीडन जैसे लोकतंत्रों के बीच घनिष्ठ सहयोग विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। भारत ने तनाव को सुलझाने और चुनौतियों का सामना करने के साधन के रूप में संवाद और कूटनीति पर लगातार जोर दिया है।

भारत और स्वीडन सहमत हैं कि आतंकवाद पूरी मानवता के लिए गंभीर चुनौती है। पिछले वर्ष पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद स्वीडन के प्रधानमंत्री क्रिस्टर्सन ने भारत के रुख का समर्थन किया था।

पीएम मोदी ने कहा, ” सुरक्षा, रक्षा साझेदारी और मोबिलिटी समझौतों के क्षेत्रों में भी हमारे सहयोग ने एक नई दिशा ली है। इसके अलावा, भारत-EU व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद ने हमारी साझेदारी को और मजबूत किया है। सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में भारत आज एक नए आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है।”

पीएम मोदी का भव्य स्वागत

स्वीडन पहुँचने पर प्रधानमंत्री मोदी का बेहद भव्य और ऐतिहासिक स्वागत किया गया। उनकी सुरक्षा के लिए स्वीडन के आसमान में स्वीडिश फाइटर जेट्स एस्कॉर्ट कर रहे थे। मोदी 8 साल बाद स्वीडन पहुँचे हैं। इससे पहले उन्होंने 2018 में स्वीडन का दौरा किया था।

प्रधानमंत्री मोदी की अगवानी के लिए स्वीडन के प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टरसन खुद हवाई अड्डे पर पहुँचे। होटल पहुँचने पर बांग्ला रीति रिवाज के मुताबिक आरती की गई और रंगारंग कार्यक्रम हुआ।

पीएम मोदी को मिला 31वाँ इंटरनेशनल सम्मान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक स्तर पर भारत का मान बढ़ाते हुए एक ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया है, जो भारतीय इतिहास में अब तक किसी अन्य नेता को नहीं मिला। 2014 में प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी को पहला वैश्विक सम्मान 2016 में मिला था। यह सऊदी अरब ने दिया था, इसके बाद 2026 तक आते-आते उनके लिए सम्मानों की झड़ी लग गई। अब तक उन्हें 31 अंतरराष्ट्रीय सम्मान से नवाजा जा चुका है।

  • सऊदी अरब: ऑर्डर ऑफ किंग अब्दुल अजीज (3 अप्रैल 2016)
  • अफगानिस्तान: ऑर्डर ऑफ अमानुल्लाह खान (4 जून 2016)
  • फिलिस्तीन: ग्रैंड कॉलर ऑफ द स्टेट ऑफ फिलिस्तीन (10 फरवरी 2018)
  • संयुक्त अरब अमीरात (UAE): ऑर्डर ऑफ जायद (24 अगस्त 2019)
  • रूस: ऑर्डर ऑफ सेंट एंड्रयू (घोषणा 2019, प्राप्त 2024 में किया)
  • मालदीव: ऑर्डर ऑफ इज्जुद्दीन (8 जून 2019)
  • बहरीन: किंग हमद ऑर्डर ऑफ द रेनेसां (24 अगस्त 2019)
  • अमेरिका: लीजन ऑफ मेरिट (21 दिसंबर 2020) – डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रदान किया गया।
  • भूटान: ऑर्डर ऑफ द ड्रैगन किंग (दिसंबर 2021)
  • फिजी: कम्पेनियन ऑफ द ऑर्डर ऑफ फिजी (मई 2023)
  • पापुआ न्यू गिनी: ग्रैंड कम्पेनियन ऑफ द ऑर्डर ऑफ लोगोहू (मई 2023)
  • मिस्र: ऑर्डर ऑफ द नाइल (जून 2023)
  • फ्रांस: ग्रैंड क्रॉस ऑफ द लीजन ऑफ ऑनर (जुलाई 2023)
  • ग्रीस: ग्रैंड क्रॉस ऑफ द ऑर्डर ऑफ ऑनर (अगस्त 2023)
  • नाइजीरिया: ग्रैंड कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द नाइजर (17 नवंबर 2024)
  • डोमिनिका: डोमिनिका अवार्ड ऑफ ऑनर (20 नवंबर 2024)
  • गुयाना: ऑर्डर ऑफ एक्सीलेंस ऑफ गुयाना (20 नवंबर 2024)।
  • कुवैत: ऑर्डर ऑफ मुबारक द ग्रेट (22 दिसंबर 2024)
  • बारबाडोस: ऑर्डर ऑफ फ्रीडम ऑफ बारबाडोस (5 मार्च 2025)
  • मॉरीशस: ऑर्डर ऑफ द स्टार एंड की ऑफ द इंडियन ओशन (11 मार्च 2025)
  • श्रीलंका: श्रीलंका मित्र विभूषण (5 अप्रैल 2025)
  • साइप्रस: ऑर्डर ऑफ मकारियोस III (16 जून 2025)
  • घाना: ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ घाना (2 जुलाई 2025)
  • त्रिनिदाद और टोबैगो: ऑर्डर ऑफ द रिपब्लिक ऑफ त्रिनिदाद और टोबैगो (4 जुलाई 2025)
  • ब्राजील: ऑर्डर ऑफ द साउदर्न क्रॉस (8 जुलाई 2025)
  • नामीबिया: ऑर्डर ऑफ द वेलवित्सचिया (9 जुलाई 2025)
  • इथियोपिया: ग्रेट ऑनर निशान ऑफ इथियोपिया (16 दिसंबर 2025)
  • ओमान: ऑर्डर ऑफ ओमान (18 दिसंबर 2025)
  • इजरायल: मेडल ऑफ द नेसेट (25 फरवरी 2026)- पीएम मोदी यह सम्मान पाने वाले पहले विश्व नेता बने।
  • स्वीडन: ‘रॉयल ऑर्डर ऑफ द पोलर स्टार कमांडर ग्रैंड क्रॉस’ सम्मान

इसके अलावा दक्षिण कोरिया का सियोल शांति पुरस्कार), संयुक्त राष्ट्र (चैंपियंस ऑफ द अर्थ) जैसे प्रतिष्ठित वैश्विक निकायों के सम्मान भी शामिल हैं, जिन्होंने पीएम मोदी के नेतृत्व को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सर्वोच्च मान्यता दी है।

धार भोजशाला में सरस्वती मंदिर का इतिहास, कैसे लंदन पहुँची 11वीं शताब्दी में बनी माँ वाग्देवी की प्रतिमा: जानें मोदी सरकार के पास उसे वापस लाने के क्या हैं रास्ते

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने फैसले में उपलब्ध पुरातात्विक और ऐतिहासिक तथ्यों, ASI की सर्वे रिपोर्ट और कानूनी प्रावधानों को आधार बनाते हुए भोजशाला को माँ वाग्देवी यानी सरस्वती से जुड़ा एक हिंदू धार्मिक स्थल माना है।

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में हिंदुओं को पूजा का अधिकार दिया है। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने सरकार को ये निर्देश भी दिए हैं वो लंदन से भोजशाला की माँ वाग्देवी की मूर्ति लाने का प्रयास करें। अब सबसे बड़ा सवाल है कि वाग्देवी की वह प्रतिमा, जिसे भोजशाला की आत्मा माना जाता है वह भारत से निकलकर लंदन तक कैसे पहुँच गई?

राजा भोज और भोजशाला: माँ वाग्देवी और भोजशाला की आध्यात्मिक पहचान

धार की भोजशाला को हिंदू समाज माता सरस्वती के मंदिर और प्राचीन विश्वविद्यालय के रूप में देखता है। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, इसकी स्थापना 11वीं शताब्दी में परमार वंश के महान शासक राजा भोज ने की थी। राजा भोज केवल एक शक्तिशाली शासक ही नहीं, बल्कि शिक्षा, साहित्य, दर्शन, आयुर्वेद, खगोल विज्ञान और संस्कृत के बड़े संरक्षक माने जाते हैं।

उस समय धार उनकी राजधानी थी और भोजशाला ज्ञान तथा शिक्षा का प्रमुख केंद्र हुआ करती थी। यहाँ दूर-दूर से विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने आते थे और संगीत, संस्कृत, योग, दर्शन, व्याकरण, ज्योतिष तथा आयुर्वेद जैसे विषय पढ़ाए जाते थे। हिंदू पक्ष का दावा है कि यह स्थान केवल पूजा का स्थल नहीं था, बल्कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा का जीवंत प्रतीक था।

भोजशाला परिसर में आज भी ऐसे कई शिलालेख, नक्काशीदार स्तंभ और स्थापत्य अवशेष मौजूद हैं, जिनमें संस्कृत, प्राकृत और प्राचीन नागरी लिपि के चिन्ह दिखाई देते हैं। कई अभिलेखों में ‘ॐ नमः शिवाय’, ‘ॐ सरस्वत्यै नमः’ और परमार राजाओं की प्रशंसा का उल्लेख मिलने का दावा किया गया है।

इसी व्यवस्था के भीतर माँ सरस्वती या वाग्देवी की उपासना का उल्लेख मिलता है, जिन्हें ज्ञान और वाणी की देवी माना जाता है। इसी कारण भोजशाला को ज्ञान और आस्था दोनों का संगम माना गया। भोजशाला से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण बात इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान है, जो माँ वाग्देवी की परंपरा से जुड़ी हुई बताई जाती है।

वाग्देवी यानी सरस्वती को भारतीय संस्कृति में ज्ञान, शिक्षा, संगीत और वाणी की देवी माना जाता है। मान्यता के अनुसार, भोजशाला में एक विशेष वाग्देवी प्रतिमा स्थापित थी, जो पूरे शिक्षा केंद्र का आध्यात्मिक केंद्र बिंदु थी। यह प्रतिमा केवल पूजा की वस्तु नहीं थी, बल्कि उस समय की सांस्कृतिक चेतना और ज्ञान परंपरा का प्रतीक थी।

यहाँ शिक्षा और भक्ति एक साथ चलते थे। छात्र ज्ञान प्राप्त करने से पहले माँ सरस्वती का आशीर्वाद लेते थे और यही परंपरा भोजशाला की पहचान बन गई।

इतिहास के उतार-चढ़ाव और भोजशाला का बदला स्वरूप

भोजशाला पर कई बार इस्लामी आक्रमण हुए। दावा किया जाता है कि 1269 में कमाल मौलाना नाम का एक मुस्लिम फकीर मालवा पहुँचा और बाद में यहाँ इस्लामी प्रभाव बढ़ने लगा। इसके बाद 1305 में अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा पर हमला किया और भोजशाला को भारी नुकसान पहुँचाया।

हिंदू पक्ष का दावा है कि उस समय यहाँ अध्ययन कर रहे 1200 से अधिक छात्रों और शिक्षकों को बंदी बनाया गया और इस्लाम स्वीकार करने से इनकार करने पर उनकी हत्या कर दी गई। इसके बाद 1401 में दिलावर खान ने परिसर के एक हिस्से को दरगाह में बदलने का प्रयास किया।

फिर 1514 में महमूद शाह ने भोजशाला परिसर पर कब्जा मजबूत करने की कोशिश की और कमाल मौला मकबरे का विस्तार किया। हिंदू पक्ष का कहना है कि इन्हीं घटनाओं के आधार पर बाद में इसे मस्जिद और दरगाह बताया जाने लगा। बाद में मेदनी राय ने मुस्लिम शासकों के खिलाफ युद्ध कर क्षेत्र पर दोबारा नियंत्रण स्थापित किया।

1703 में मालवा पर मराठों का अधिकार हो गया और मुस्लिम शासन समाप्त हुआ। इसके बाद अंग्रेजों का शासन आया। 

प्रतिमा की विशेषताएँ: परमार काल की कला और शिल्प का उदाहरण

वाग्देवी की यह प्रतिमा परमार काल की उच्च स्तरीय मूर्तिकला का उदाहरण मानी जाती है, जिसे लगभग 11वीं सदी का बताया जाता है। यह प्रतिमा सफेद पत्थर (स्टोन स्कल्पचर) से बनी एक विस्तृत और संतुलित शिल्पकृति है, जिसमें देवी को पारंपरिक स्वरूप में चार भुजाओं के साथ दर्शाया गया है। प्रतिमा में भारतीय मध्यकालीन कला की बारीकी साफ दिखाई देती है।

चेहरे की शांत अभिव्यक्ति, आभूषणों की नक्काशी और शरीर की संतुलित मुद्रा इसे उस दौर की विशिष्ट मूर्तिकला परंपरा से जोड़ती है। ब्रिटिश म्यूजियम के रिकॉर्ड में इस प्रतिमा की पहचान को लेकर भिन्नता भी देखने को मिलती है। कहीं इसे वाग्देवी कहा गया है तो कहीं अम्बिका (जैन परंपरा की देवी) के रूप में दर्ज किया गया है।

लंदन कैसे पहुँची: 1875 की खोज और औपनिवेशिक दौर की भूमिका

इस प्रतिमा का आधुनिक इतिहास 1875 के आसपास ब्रिटिश काल से शुरू होता है। मुगलों के आक्रमण के बाद खंडित हुई इस प्रतिमा को अंग्रेजों ने खुदाई कर 1875 में निकाला था। इसके बाद 117 साल से प्रतिमा लंदन में ही है। साल 1880 में भोपावर के ब्रिटिश पॉलिटिकल एजेंट मेजर किनकेड इस कीमती मूर्ति को अपने साथ समेटकर इंग्लैंड ले गए थे।

लंदन के म्यूजियम में रखी प्रतिमा (फोटो साभार: दैनिक भास्कर)

उन्होंने उस समय क्षेत्र में पुरातात्विक गतिविधियों में भूमिका निभाई थी। उस दौर में भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था और पुरातात्विक महत्व की वस्तुओं को अक्सर ‘study’, ‘preservation’ या ‘collection’ के नाम पर बाहर भेज दिया जाता था। कई बार इन वस्तुओं का स्वामित्व स्पष्ट नहीं होता था और वे औपनिवेशिक संग्रहालयों तक पहुँच जाती थीं।

इसी प्रक्रिया के तहत यह प्रतिमा भी भारत से ब्रिटेन ले जाई गई और बाद में लंदन के संग्रहालय संग्रह का हिस्सा बन गई। समय के साथ यह ब्रिटिश म्यूजियम में भारतीय कला और मध्यकालीन मूर्तिकला के एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में दर्ज हुई।

लंदन के म्यूजियम में वर्तमान स्थिति

आज यह प्रतिमा लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम ग्रेट रसल स्ट्रीट में संरक्षित बताई जाती है। इसे संग्रहालय के एशियन आर्ट सेक्शन में रखा गया है, जहाँ भारत और एशिया से संबंधित सैकड़ों प्राचीन मूर्तियाँ और कलाकृतियाँ मौजूद हैं। यह प्रतिमा 7 से 8 फीट उँचे एक सुरक्षित काँच के डिस्प्ले केस में रखी गई है और इसे आम लोग भी देख सकते हैं।

म्यूजियम में इसे मध्यकालीन भारतीय मूर्तिकला के एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में प्रदर्शित किया गया है। हालाँकि इसकी पहचान को लेकर अलग-अलग विवरण मिलते हैं। भारत में इसे स्पष्ट रूप से माँ सरस्वती या वाग्देवी के रूप में पूजा और सम्मान दिया जाता है, जबकि संग्रहालय इसे एक ऐतिहासिक कलाकृति के रूप में वर्गीकृत करता है।

भारत वापसी की संभावना और प्रक्रिया

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने प्रतिमा की वापसी को लेकर बड़ा संकेत देते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “माँ वाग्देवी की प्रतिमा को UK से भारत वापस लाने के संबंध में केंद्र सरकार को विचार करने का निर्देश स्वागतयोग्य है। इस दिशा में राज्य सरकार भी आवश्यक प्रयास करेगी।”

उन्होंने आगे लिखा, “हमारी संस्कृति सदैव टसर्वधर्म समभावट, सामाजिक समरसता और भाईचारे की वाहक रही है। हम न्यायालय के निर्णय का पूर्ण सम्मान करते हैं और प्रदेश में सौहार्द, सांस्कृतिक गौरव एवं सामाजिक सद्भाव को और अधिक सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”

भारत सरकार इस मुद्दे को ब्रिटेन के सामने UNESCO के 1970 कन्वेंशन का संदर्भ देकर आधिकारिक स्तर पर उठा सकती है। इस अंतरराष्ट्रीय समझौते के अनुसार किसी भी देश से अवैध या बिना अनुमति के बाहर ले जाई गई सांस्कृतिक धरोहरों को उनके मूल देश को वापस लौटाने पर जोर दिया जाता है।

हालाँकि इस प्रक्रिया में कई व्यावहारिक अड़चनें भी हैं, क्योंकि ब्रिटेन का ‘British Museum Act 1963’ बहुत सख्त नियमों के तहत काम करता है, जो सामान्य परिस्थितियों में संग्रहालय की वस्तुओं को स्थायी रूप से देश से बाहर भेजने पर रोक लगाता है।

इसके बावजूद उम्मीद इसलिए बनी हुई है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने कूटनीतिक बातचीत और कानूनी प्रक्रियाओं के जरिए दुनिया के अलग-अलग देशों से अपनी कई प्राचीन मूर्तियाँ और सांस्कृतिक धरोहरें सफलतापूर्वक वापस हासिल की हैं। मोदी सरकार के नेतृत्व में कई देशों से औपनिवेशिक काल की मूर्तियाँ और सांस्कृतिक धरोहरें वापस लाई जा चुकी हैं।

सूअर बनेंगे इंसान, आसमान से बरसेंगे पत्थर… लड़कियों का सोशल मीडिया चलाना भी ‘इस्लाम विरोधी’: औरत विरोधी फतवों में केरलम के मौलाना ने जोड़ा नया अध्याय

केरलम के मौलाना अब्दुल हमीद फैजी अम्बालाकादावु के महिलाओं के खिलाफ दिए गए विवादित ‘फतवे’ को लेकर बड़ा बवाल शुरू हो गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, मौलाना समस्त युवजन संघम (SYS) से जुड़े हुए हैं जो समस्त केरल जम-इय्यतुल उलेमा के अधीन एक युवा संगठन है।

मौलाना अब्दुल हमीद फैजी ने आधुनिक समाज में मुस्लिम महिलाओं की भूमिका को लेकर बेहद सख्त टिप्पणी की है। उन्होंने महिलाओं के सार्वजनिक जीवन में भागीदारी, जैसे नौकरी करना, रिसेप्शनिस्ट बनना, एंकरिंग करना, स्टेज पर प्रदर्शन करना, सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना और गैर-महरम पुरुषों से बातचीत या हाथ मिलाने जैसी गतिविधियों को इस्लामी शिक्षाओं के खिलाफ बताया है।

अब्दुल हमीद फैजी ने क्या कहा?

यह विवाद मौलाना अब्दुल हमीद फैजी के एक फेसबुक पोस्ट के बाद शुरू हुआ। यह पोस्ट उनके फेसबुक अकाउंट पर 10 मई 2026 को शेयर किया गया था जिस पर लगातार विवाद छिड़ा हुआ है।

मौलवी अब्दुल हमीद ने अपने पोस्ट में लिखा, “‘लोगों को जमीन निगल जाएगी, इंसानों को बंदरों, सूअरों और दूसरी शक्लों में बदल दिया जाएगा और आसमान से पत्थरों की बारिश होगी…’ जब प्रोफेट मोहम्मद ने अपने साथियों से भविष्य में होने वाली इन बातों के बारे में बताया तो वहाँ मौजूद एक व्यक्ति ने पूछा:- ‘ऐ अल्लाह के रसूल, यह सब कब होगा’? इस पर नबी ने कहा:- ‘जब गाने वाली औरतें, संगीत के उपकरण, मंचीय कार्यक्रम आम हो जाएँगे और शराब पीना हर जगह फैल जाएगा’।”

इसके आगे अब्दुल हमीद ने महिलाओं की आलोचना करते हुए लिखा, “आज हमारी शादियों में गाने-बजाने के कार्यक्रम होते हैं। शादी समारोहों में हमारा स्वागत करने के लिए महिलाएँ हाथ जोड़कर खड़ी रहती हैं। गरीब लोगों की किडनी बदलवाने के लिए फंड जुटाने हेतु ‘इशल नाइट’ जैसे कार्यक्रम किए जाते हैं। रिसेप्शनिस्ट बनने के लिए सुंदर किशोर लड़कियों की जरूरत होती है। एंकरिंग के लिए भी महिलाओं की जरूरत पड़ती है।”

उन्होंने आगे लिखा, “स्कूल स्तर से ही हमारी लड़कियों को गाना सिखाया जाता है और उन्हें इसके लिए प्रोत्साहन दिया जाता है। हमारी बेटियाँ यूट्यूब और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर हर जगह दिखाई देती हैं। धार्मिक मंचों पर भी मुस्लिम महिलाएँ गैर-महरम पुरुषों को संबोधित करके भाषण देती हैं। हमारी महिलाओं को गैर-महरम पुरुषों से हाथ मिलाने और उन्हें गले लगाने में भी शर्म महसूस नहीं होती!”

मौलवी ने 50 साल पहले का जिक्र करते हुे कहा, “50 साल पहले, अगर पर्दा नहीं होता था तो महिलाएँ चलते समय हाथ में छाता रखती थीं, और जैसे ही कोई गैर-महरम पुरुष सामने आता था, वे छाते से अपना चेहरा ढक लेती थीं और इस्लाम के हिजाब के नियमों का पालन करती थीं। वही पीढ़ी आज इतने बड़े बदलाव का शिकार हो गई है। इस मामले में धार्मिक प्रमाणों को अपने तरीके से पेश करने वाले मुजाहिद और जमात समूहों की भी बड़ी भूमिका रही है।”

क्या कह रहे हैं आलोचक?

आलोचकों का कहना है कि मौलाना द्वारा महिलाओं की सार्वजनिक भूमिका को लेकर दी गई राय एक ऐसी सोच को दर्शाते हैं जिसे साफ तौर पर महिला विरोधी और सामाजिक रूप से उन्हें पिछड़ा मानने व पीछे ले जाने की कोशिश है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या मजहबी व्याख्याओं के नाम पर महिलाओं की स्वतंत्रता और उनके अधिकारों को सीमित किया जा सकता है।

जब महिलाओं के शिक्षा प्राप्त करने, नौकरी करने, सार्वजनिक मंचों पर बोलने, कला और मीडिया में भाग लेने जैसी सामान्य और आधुनिक भूमिकाओं को गलत या अस्वीकार्य बताया जाता है तो यह सीधे तौर पर उनके मौलिक अधिकारों पर ही सवाल उठाना है। आज के समय में जब महिलाएँ किसी भी समाज की प्रगति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं तो ऐसे में उन्हें केवल घर या सीमित सामाजिक दायरे तक बाँध देना निजी स्वतंत्रता से आगे बढ़कर पूरे समाज के विकास को बाधित करने की कोशिश बन जाती है।

आलोचकों का यह भी मानना है कि इस तरह के विचार समाज को आगे ले जाने के बजाय पीछे की ओर धकेलते हैं। इतिहास और आधुनिक विकास दोनों यह दिखाते हैं कि जिन समाजों ने महिलाओं को शिक्षा, रोजगार और नेतृत्व के अवसर दिए हैं तो वे अधिक प्रगतिशील और आर्थिक रूप से मजबूत बने हैं। इसके उल्ट जहाँ महिलाओं को सीमित दायरे में रखा गया, वहाँ सामाजिक विकास की गति धीमी रही है। इसलिए, महिलाओं की भागीदारी को सीमित करने वाली सोच केवल व्यक्तिगत नहीं रह जाती है।

आलोचकों का मानना है कि ऐसे बयान एक व्यापक रूढ़िवादी प्रवृत्ति का हिस्सा हैं जो आधुनिक सामाजिक बदलावों को स्वीकार करने के बजाय उन्हें रोकने या सीमित करने की कोशिश करती है। आलोचकों का कहना है कि मजहब और समाज के बीच संतुलन जरूरी है लेकिन अगर किसी व्याख्या के कारण आधी आबादी यानी महिलाओं के अधिकारों पर असर पड़ता है, तो उस पर फिर से विचार किए जाने की आवश्यकता है।

महिला विरोधी फतवों का लंबा इतिहास

हालाँकि, यह कोई पहली बार नहीं है जब महिलाओं के खिलाफ इस तरह का फतवा दिया गया हो। महिला के शरीर, पहचान, पेशा और सार्वजनिक भागीदारी पर नियंत्रण की कोशिश एक सुनियोजित पैटर्न रही है। इसके पीछे हर बाद इस्लाम और परंपराओं को हवाला दिया जाता रहा है।

ससुर ने किया रेप- अब शौहर को मानो ‘बेटा’

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर की मुस्लिम महिला इमराना के साथ उसके ससुर अली मोहम्मद ने बलात्कार किया। इसके बाद पंचायत ने फैसला दिया था कि शरिया कानून के तहत वह शौहर के साथ नहीं रह सकती और शौहर को ‘बेटा’ मानना होगा। दारुल उलूम ने फतवा किया कि इमराना का निकाह उसके पति नूर इलाही से ‘बातिल’ हो गया है। बाद में सामाजिक संगठनों ने आवाज उठाई, केस दर्ज हुआ और ससुर को 10 साल की सजा सुनाई गई।

सानिया मिर्जा को स्कर्ट पहनकर टेनिस खेलने से रोकने का फरमान

सुन्नी उलेमा बोर्ड के मौलाना हसीब-उल-हसन सिद्दीकी ने टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्जा के खिलाफ 2005 में फतवा जारी किया था। मौलाना का कहना था कि सानिया की ड्रेस ‘इस्लाम-विरोधी’ है। उन्हें ईरानी महिला बैडमिंटन खिलाड़ियों की तरह लंबी टुनिक और हिजाब पहनकर खेलने को कहा गया था।

जमीयत-ए-उलेमा-ए-हिंद ने धमकी दी कि न मानने पर खेलने से रोका जाएगा। सानिया ने फतवा नकार दिया और खेल जारी रखा।

महिलाओं और पुरुषों का एकसाथ काम करना हराम

मई 2010 में दारुल उलूम देवबंद के उलेमाओं ने फतवा जारी किया कि सरकारी दफ्तरों और कार्यस्थलों पर महिलाएँ और पुरुष एक साथ काम नहीं कर सकते, जब तक कि महिलाएँ पूरी तरह इस्लामी लिबास में ना हों। इस फतवे को महिलाओं के रोजगार और आर्थिक स्वतंत्रता पर सीधे हमले के रूप में देखा गया और बड़े पैमाने पर आलोचना हुई।

महिलाओं की फोटो खींचना और खिंचवाना हराम

2013 में देवबंद के रेक्टर ने फोटोग्राफी को ‘गैर-इस्लामी’ करार दिया। महिलाओं की फोटो खींचना, खिंचवाना सब पर रोक लगा दी गई। हालाँकि, इसमें चालाकी दिखाते हुए इसे केवल पहचान पत्र और पासपोर्ट के लिए जरूरी बताया गया। दारुल उलूम देवबंद के मोहतमिम मुफ्ती अब्दुल कासिम नोमानी ने कहा, “फोटोग्राफी करना इस्लाम विरोधी है।” इस फतवे को सोशल मीडिया युग में महिलाओं की हर तरह की डिजिटल पहचान मिटाने की कोशिश बताया गया।

भौंहें बनाना, बाल कटाना और ब्यूटी पार्लर जाना हराम

दारुल इफ्ता के प्रमुख मौलाना एल. सादिक कासमी ने अक्टूबर 2017 में एक फतवा जारी किया कि मुस्लिम महिलाओं के लिए भौंहें बनाना, बाल कटाना और ब्यूटी पार्लर जाना सख्त मना है। मौलाना कासमी ने कहा कि बाल महिला की खूबसूरती हैं और इन्हें कभी नहीं काटना चाहिए। वहीं, मेकअप को भी ‘दूसरे मर्दों को आकर्षित करने’ का जरिया बताकर हराम घोषित किया।

जींस, टाइट सलवार और डिजाइनर बुर्का पहनना हराम

दारुल उलूम देवबंद की इफ्ता समिति ने टाइट सलवार, जींस, स्कर्ट और डिजाइनर बुर्के को हराम घोषित किया। इफ्ता समिति की तरफ से कहा गया, “पैगंबर ने कहा है कि मुस्लिम महिलाओं को बाहरी दुनिया से बचाओ। जरूरत ना हो तो घर से मत निकलो।”

वहीं, तंजीम अब्नाए दारुल उलूम के मुफ्ती याद इलाही ने इस मामले में कहा कि पश्चिमी संस्कृति ने भारत को बरबाद किया है।

महिलाओं का फुटबॉल मैच देखना हराम

जनवरी 2018 में दारुल उलूम देवबंद के मुफ्ती अतहर कासमी ने फतवा दिया कि महिलाओं के लिए पुरुषों का फुटबॉल मैच देखना हराम है क्योंकि खिलाड़ी हाफ-पैंट पहनते हैं।

तीन तलाक के खिलाफ बोली तो किया ‘इस्लाम से बाहर’

बरेली की महिला अधिकार कार्यकर्ता निदा खान ने तीन तलाक का विरोध किया और पति के अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई थी। इससे मौलाना परेशान हो गए और 2018 में इसके जवाब में बरेली जामा मस्जिद के इमाम ने उनके खिलाफ फतवा जारी कर उन्हें इस्लाम से बाहर करने की घोषणा की। निदा ने इसकी आलोचना करते हुए कहा था कि कोई उन्हें इस्लाम से बाहर नहीं कर सकता है।

गैर मर्द से मेंहदी लगवाना हराम

2018 में दारुल उलूम देवबंद ने एक फतवा जारी किया था जिसमें कहा गया कि मुस्लिम महिलाओं का किसी अंजान पुरुष से मेहंदी लगवाना इस्लाम के अनुसार उचित नहीं है। संस्था के अनुसार, मेहंदी लगवाने के लिए किसी गैर-परिचित पुरुष को अपना हाथ देना गैर-इस्लामिक माना जाता है। साथ ही यह भी कहा गया कि इससे महिलाओं की सामाजिक छवि पर भी नकारात्मक असर पड़ सकता है, इसलिए मुस्लिम महिलाओं को ऐसी स्थितियों से बचना चाहिए।

सिंदूर-बिंदी लगाने के खिलाफ फतवा

ऑल इंडिया मुस्लिम जमात (AIMJ) के अध्यक्ष मौलाना शाहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने 2023 में एक फतवा जारी कर कहा कि गैर-मुस्लिम युवकों से शादी के बाद ‘सिंदूर’, ‘कलावा’ और ‘बिंदी’ लगाने वाली मुस्लिम महिलाएँ इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ जा रही हैं। फतवे में यहाँ तक कहा गया कि अगर ऐसा चलता रहा तो उन्हें समुदाय से बहिष्कृत कर दिया जाएगा।

औरतों का मेले में जाने इस्लाम के खिलाफ

जमीयत दावतुल मुस्लिमीन के संरक्षक और देवबंद के उलेमा मौलाना कारी इसहाक गोरा ने कहा कि मुस्लिम महिलाओं को मेलों में जाने से बचना चाहिए क्योंकि यह इस्लामी शिक्षाओं के अनुरूप नहीं है। उनका कहना है कि मेलों में देर रात तक महिलाओं का घूमना-फिरना उनकी सुरक्षा और सम्मान के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि आजकल मेलों में बड़ी संख्या में मुस्लिम युवा शामिल होते हैं और देर रात तक वहाँ मौजूद रहते हैं जो चिंताजनक और अनुचित है। इसहाक गोरा के अनुसार, ऐसी गतिविधियों का नई पीढ़ी के संस्कारों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

क्या है फतवा और इसकी कानूनी वैधता?

‘फतवा’ एक अरबी शब्द है। इसका मतलब होता है किसी मजहबी सवाल पर इस्लामी विद्वान (मौलाना या मुफ्ती) द्वारा दी गई राय या व्याख्या। यह किसी व्यक्ति या समुदाय को यह बताने की कोशिश होती है कि किसी विशेष स्थिति में मजहबी दृष्टि से क्या सही माना जाता है और क्या गलत। लेकिन यह समझना जरूरी है कि फतवा कोई कानूनी आदेश नहीं होता। यह सिर्फ एक मजहबी राय होती है। इसका मतलब यह है कि किसी भी व्यक्ति को फतवा मानने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

भारत के संविधान में फतवा को किसी भी तरह की कानूनी मान्यता नहीं दी गई है। इसका कोई कानूनी बल (legal force) नहीं होता। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी 2014 में यह स्पष्ट किया था कि फतवे किसी भी नागरिक पर लागू नहीं किए जा सकते। यानी कोई भी व्यक्ति केवल फतवे के आधार पर किसी को बाध्य नहीं कर सकता या उसके अधिकारों को सीमित नहीं कर सकता।

इसके बावजूद, कई बार फतवे समाज में एक तरह का दबाव बना देते हैं। कुछ जगहों पर लोग इन्हें मजहबी डर या सामाजिक बहिष्कार के कारण गंभीरता से लेते हैं। इस वजह से कई बार लोगों पर मानसिक दबाव, सामाजिक अलगाव या आलोचना जैसी स्थिति बन जाती है।

आंध्र प्रदेश में तीसरे-चौथे बच्चे के जन्म पर मिलेंगे ₹70000, CM चंद्रबाबू नायडू ने किया ऐलान: जानिए किसे मिलेगा फायदा और सरकार को क्यों उठाना पड़ा ये कदम

दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले भारत के दक्षिणी राज्य आंध्रप्रदेश को आबादी कम होने की चिंता सताने लगी है। मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने जनसंख्या वृद्धि को बढ़ावा देने के लिए सरकार की कोशिश के तहत तीसरे बच्चे के लिए ₹30000 और चौथे बच्चे के पैदा होने पर ₹40000 ‘इनाम’ देने की घोषणा की है। दूसरा बच्चा होने पर ₹25000 देने की घोषणा वे पहले ही विधानसभा में कर चुके हैं।

अब सवाल यह उठाता है कि आंध्रप्रदेश को ऐसा क्यों करना पड़ा, तो इसकी वजह राज्य में घट रहा जन्मदर है। राज्य को इससे ‘नुकसान’ होने की चिंता सता रही है। हालाँकि राज्य की जनसंख्या अभी घटी नहीं है, बल्कि राज्य में प्रजनन दर यानी टोटस फर्टिलिटी रेट घट कर 1.5 हो गया है।

किसी भी जगह में जनसंख्या स्थिर रखने के लिए टीएफआर 2.1 होना चाहिए, हालाँकि देश में टीएफआर 1.9 है। इससे पता चलता है कि देश में भी जन्मदर घट रहा है। इसकी तुलना में आंध्र प्रदेश की आबादी घट रही है, हालाँकि जन्मदर का घटना राज्य में शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि के साथ-साथ न्यूक्लियर फैमिली के बढ़ते चलन को भी दर्शाता है।

क्या कहा सीएम नायडू ने

घटते जन्मदर को देखते हुए आंध्र प्रदेश में ‘पॉपुलेशन पॉलिसी’ बनाई गई है। इसका मकसद इंसेंटिव, हेल्थकेयर सुधार और वर्कफोर्स उपायों के जरिए ज्यादा फर्टिलिटी को बढ़ावा देना है, ताकि घटती जन्म दर और ज्यादा बूढ़ी हो रही आबादी से निपटा जा सके।

नायडू सरकार को चिंता है कि जन्म दर में गिरावट से काम करने की उम्र वाली आबादी (18-60) कम हो जाएगी, जबकि बुज़ुर्ग आबादी बढ़ जाएगी। इससे आर्थिक विकास धीमा हो सकता है और सरकारी वेलफेयर सिस्टम पर दबाव बढ़ सकता है।

मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने शनिवार को श्रीकाकुलम जिले के नरसन्नापेटा में ‘स्वर्ण आंध्र – स्वच्छ आंध्र’ प्रोग्राम को संबोधित करते हुए कहा, “आबादी ही भविष्य की असली दौलत है। ये इंसेंटिव नई पॉपुलेशन मैनेजमेंट पॉलिसी का हिस्सा है, जिसका मकसद पॉपुलेशन ग्रोथ को बढ़ावा देना है, क्योंकि राज्य का विकास सिर्फ ह्यूमन रिसोर्स से ही मुमकिन है।”

किस राज्य में कितनी फर्टिलिटी रेट

  1. आंध्र प्रदेश में 2003 में टीएफआर 2.2 थी जो 2023 में घट कर 1.5 हो गई।
  2. तेलंगाना, कर्नाटक, केरल में भी टीएफआर करीब 1.5 है, जबकि तमिल नाडु में 1.3 है।
  3. उत्तर के राज्यों की बात की जाए, तो बिहार का टीएफआर 2.8 है। उत्तर प्रदेश का 2.6 है।
  4. मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, राजस्थान आदि राज्यों में फर्टिलिटी रेट नेशनल लेवल यानी 1.9 से ज्यादा है।

क्यों गिरा आंध्र प्रदेश का फर्टिलिटी रेट

1970 के दशक में जनसंख्या नियंत्रण पर पूरे देश में जोर दिया गया था। जबरदस्ती नसबंदी कराई गई थी। ‘हम दो हमारे दो’ का नारा बुलंद किया गया। जनसंख्या नियंत्रण में दक्षिणी राज्य ज्यादा सफल रहे। 2026 आते आते हालात ऐसे बन गए हैं कि दक्षिणी राज्यों में जन्मदर काफी कम हो गई है।

आंध्र प्रदेश इस खौफ में जी रहा है कि निकट भविष्य में बुजुर्गों की आबादी युवाओं से ज्यादा हो जाएगी। इससे ‘काम करने वाले हाथ’ कम हो जाएँगे, जबकि पेंशन और दूसरी सरकारी सुविधाओं के सहारे जीने वाली आबादी काफी बढ़ जाएगी। बुजुर्गों वाला राज्य बन कर रह जाएगा आंध्रप्रदेश।

राज्य में यूँ भी युवा आबादी बेहतर रोजगार के लिए दूसरी जगह पलायन कर रही है। इनकी संख्या और कम हो जाएगी। इससे राज्य में कामगारों की कमी और स्थानीय जनसंख्या के ढाँचे में बदलवा आ जाएगा।

आबादी घटने का राजनीतिक असर पड़ सकता है

अगर परिसीमन में जनसंख्या को मुख्य आधार बनाया गया, तो दक्षिणी राज्यों में फर्टिलिटी में गिरावट से संसद में उनके प्रतिनिधि तुलनात्मक रूप से कम हो सकते हैं। हालाँकि पीएम मोदी ने संसद में परिसीमन संशोधन बिल पर चर्चा के दौरान दक्षिणी राज्यों से वादा किया है कि तुलनात्मक रूप से उनकी पार्लियामेंट में हिस्सेदारी में कोई कमी नहीं आएगी।

दक्षिणी राज्यों का कहना है कि संसदीय चुनाव क्षेत्र आबादी के आधार पर बाँटे जाते हैं, इसलिए जिन राज्यों में आबादी धीमी गति से बढ़ती है, वहाँ उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे ज्यादा आबादी वाले राज्यों की तुलना में उनके प्रतिनिधित्व में कमी आ सकती है।

परिसीमन की प्रक्रिया भी शुरू होने वाली है। ये प्रक्रिया 50 सालों से रुकी हुई थी, लेकिन परिसीमन कराने की मोदी सरकार की पहल के बाद ये मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में आ गया और दक्षिण के राज्य एक्टिव हो गए।

नायडू सरकार भविष्य की ओर देख रही है। आगे आने वाले समय में काम करने वाले युवाओं की कमी न हो, उद्योगों को मजदूर और प्रोफेशनल मिलते रहें, टैक्स देने वाली आबादी घटे नहीं और बुजुर्गों की देखभाल का बोझ बहुत ज्यादा न बढ़े, ताकि राज्य के विकास की गाड़ी सरपट दौड़ती रहे।

इसी सोच के तहत 3 या अधिक बच्चों वाले परिवारों को प्रोत्साहन, सरकारी योजनाओं में लाभ और स्थानीय निकाय चुनावों से जुड़े नियमों में ढील दिए जाने की बात भी सामने आ रही है।

नायडू के अपील का पूरे देश पर पड़ेगा असर

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री नायडू की ‘ज्यादा बच्चे पैदा करने’ की अपील का असर केवल आंध्रप्रदेश तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह भारत में जनसंख्या, राजनीति और अर्थव्यवस्था पर भी असर डालेगा।

दुनिया में जनसंख्या के मामले पर नंबर वन देश में एक बार फिर जनसंख्या बढ़ाने की होड़ लग सकती है। हालाँकि इसका तुरंत बड़ा प्रभाव दिखने की उम्मीद कम है, लेकिन राजनीतिक और वैचारिक असर जरूर दिख सकता है।

पार्टियों की राजनीति फिर ‘जनसंख्या बढ़ाने’ पर टिक सकती है। जरूरत जनसंख्या बढ़ाने की नहीं, बल्कि ऐसा ढाँचा तैयार करने की है, जहाँ कम आबादी होने पर ‘अन्याय’ न हो और ज्यादा आबादी वालों को रेबड़ियाँ न बाँटी जाए।

महाराष्ट्र के प्रस्तावित देवस्थान इनाम निरसन अधिनियम का विरोध, CM फडणवीस से हस्तक्षेप की माँग: जानिए वक्फ छूट से क्यों खफा हुए हिंदू

महाराष्ट्र सरकार के राजस्व विभाग द्वारा प्रस्तावित ‘देवस्थान इनाम निरसन अधिनियम, 2026’ के मसौदे को लेकर राज्य में विवाद गहरा गया है। महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात कर इस विधेयक के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराया और एक ज्ञापन सौंपा। हिंदू संगठनों का आरोप है कि इस कानून के जरिए मंदिरों की ऐतिहासिक जमीनों पर अवैध कब्जों को वैध करने और उन्हें निजी हाथों में सौंपने की साजिश रची जा रही है। इस विवाद का सबसे बड़ा कारण वक्फ संपत्तियों को इस अधिनियम से बाहर रखना है।

प्रस्तावित मसौदे के तहत वर्ष 2011 से पहले के अवैध कब्जों को वैध बनाने और कब्जाधारियों को मालिकाना हक देने का प्रावधान है, जिसे महासंघ ने भू-माफिया को फायदा पहुँचाने वाला बताया है। महाराष्ट्र मंदिर महासंघ ने चेतावनी दी है कि अगर इसे इसी रूप में लागू किया गया तो पूरे राज्य में आंदोलन किया जाएगा।

यह ड्राफ्ट महाराष्ट्र सरकार के राजस्व विभाग द्वारा तैयार किया गया है, जिसमें देवस्थान इनाम यानी मंदिरों और धार्मिक संस्थानों को ऐतिहासिक रूप से दी गई जमीनों को खत्म करने और उनके स्वामित्व, कब्जा अधिकार, हस्तांतरण, अतिक्रमण और किरायेदारी से जुड़े मामलों के लिए नया कानूनी ढाँचा बनाने की बात कही गई है।

देवस्थान इनाम जमीन क्या हैं?

देवस्थान इनाम जमीनें वे भूमि हैं जो पहले के समय में राजाओं द्वारा मंदिरों, धार्मिक संस्थानों और चैरिटेबल संस्थाओं को दी गई थीं। इन पर अक्सर लगान में छूट भी मिलती थी। मसौदे में इन्हें ऐसी भूमि बताया गया है जो गाँव या गाँव का कोई हिस्सा, भूमि राजस्व या टैक्स छूट के रूप में धार्मिक संस्थानों को दी गई हो।

इस विधेयक में साफ तौर पर 1954 के हैदराबाद इनाम निरसन अधिनियम, 1952 के आतियत कानून और 1995 के वक्फ अधिनियम के तहत आने वाली जमीनों को बाहर रखा गया है। इसी वक्फ छूट को लेकर विवाद सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है।

विधेयक का विरोध क्यों हो रहा है?

महाराष्ट्र मंदिर महासंघ का आरोप है कि यह कानून मंदिरों की जमीनों को किरायेदारों, कब्जाधारियों और निजी लोगों को ट्रांसफर कराने का रास्ता खोल देगा। संगठन का कहना है कि मंदिर की संपत्ति देवता की होती है और उसे न तो ट्रस्टी बेच सकते हैं और न ही सरकार ट्रांसफर कर सकती है।

महासंघ के राष्ट्रीय संगठन मंत्री सुनील घनवट ने तीन मुख्य आपत्तियाँ बताई हैं। पहली यह कि सरकार के पास देवस्थान जमीनों का स्वामित्व ही नहीं है, इसलिए वह इनके हस्तांतरण का कानून नहीं बना सकती। उनका कहना है कि पहले के कानून सिर्फ जमीन को सुरक्षित रखने के लिए थे, न कि उसे निजी हाथों में देने के लिए।

दूसरी आपत्ति यह है कि ये जमीनें ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हैं और कई जमीनें छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे मराठा शासकों या पुराने राजवंशों द्वारा दी गई थीं। ऐसे में इन्हें निजी हाथों में जाने देना मंदिर व्यवस्था को कमजोर करेगा।

तीसरी आपत्ति वक्फ जमीनों को छूट देने को लेकर है। संगठन का कहना है कि कानून में वक्फ संपत्तियों को बचाया गया है लेकिन हिंदू मंदिरों की जमीनों पर ही नियम लागू किए जा रहे हैं, जो असमान व्यवहार है।

संगठन का आरोप है कि यह कानून मंदिरों के स्वामित्व को कमजोर करेगा, अतिक्रमण को वैध बनाएगा, बिल्डरों और जमीन माफिया को फायदा देगा और मंदिरों की आर्थिक स्वतंत्रता को नुकसान पहुँचाएगा।

ड्राफ्ट कानून के मुख्य प्रावधान

देवस्थान इनाम समाप्त करना
धारा 3 के तहत सभी देवस्थान इनाम समाप्त कर दिए जाएँगे, केवल नकद अनुदान को छोड़कर। इससे मंदिरों की जमीनों पर पुराने कानूनी अधिकार खत्म हो जाएँगे।

कब्जाधारियों को अधिकार देना

धारा 4 के तहत खेती करने वाले किरायेदारों, मिरासदारों और अन्य धारकों को कब्जे के अधिकार दिए जाएँगे और उन्हें ऑक्यूपेंट क्लास-1 का दर्जा मिलेगा। इससे मंदिरों की जमीनों पर मजबूत मालिकाना अधिकार जैसा प्रभाव पड़ेगा।

2011 से पहले के कब्जे को वैध करना

मसौदे में कहा गया है कि 1 जनवरी 2011 से पहले जो लोग जमीन पर कब्जे में हैं, अगर कुछ शर्तें पूरी करते हैं तो उन्हें जमीन का अधिकार दिया जा सकता है। इसमें बाजार मूल्य का भुगतान और आर्थिक सीमा की शर्त भी शामिल हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में 2011 से पहले रहने वालों को बिना शुल्क के भी अधिकार दिए जा सकते हैं। आलोचकों का कहना है कि यह अतिक्रमण को वैध बनाने जैसा है।

अवैध कब्जे पर सख्त कार्रवाई

इसी कानून में अवैध कब्जे पर 2 से 5 साल की सजा, भारी जुर्माना और तत्काल बेदखली का प्रावधान भी है। सरकार पुराने कब्जों को वैध और नए कब्जों पर सख्ती दोनों कर रही है, लेकिन संगठन का कहना है कि इससे गलत संदेश जाएगा।

वक्फ छूट विवाद क्यों बढ़ा?

महासंघ ने वक्फ संपत्तियों को कानून से बाहर रखने पर कड़ा विरोध जताया है। उनका कहना है कि अगर वक्फ जमीनों को सुरक्षा दी जा सकती है तो मंदिरों की जमीनों को क्यों नहीं। इस मुद्दे ने अब जमीन सुधार से आगे बढ़कर धार्मिक संस्थानों के साथ असमान व्यवहार और मंदिर स्वायत्तता की बहस का रूप ले लिया है।

संवैधानिक चिंताएँ

महासंघ का कहना है कि यह कानून अनुच्छेद 25, 26 और 300A का उल्लंघन करता है। उनका तर्क है कि मंदिरों की जमीनें पूजा-पाठ, प्रशासन, दान कार्य, पुजारियों के वेतन और धार्मिक गतिविधियों के लिए जरूरी हैं।

महाराष्ट्र मंदिर महासंघ की माँगें

संगठन ने एक मेमोरेंडम दिया जिसमें ड्राफ्ट एक्ट को तुरंत वापस लेने, लैंड रिकॉर्ड में देवस्थान की ज़मीन को साफ़ तौर पर नॉन-ट्रांसफरेबल स्टेटस देने, मंदिर की जमीन के लिए एक सख़्त एंटी-लैंड ग्रैबिंग कानून बनाने, पिछले कब्जों और जाली रिकॉर्ड की SIT जाँच कराने और मंदिर की जमीन के झगड़ों को छह महीने के अंदर सुलझाने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाने की मांग की गई।

महासंघ ने चेतावनी दी कि अगर सरकार इस कानून पर आगे बढ़ती है, तो वह मंदिर ट्रस्ट, भक्तों और हिंदू संगठनों को शामिल करके पूरे राज्य में आंदोलन शुरू कर सकता है।

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात

महाराष्ट्र मंदिर महासंघ के नेशनल ऑर्गेनाइजर सुनील घनवत की लीडरशिप में एक डेलीगेशन ने MLA प्रताप अडसद और प्रताप पचपुते के साथ महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मिलकर प्रपोज़्ड कानून के खिलाफ एक मेमोरेंडम दिया।

घनवत ने बाद में कहा कि मुख्यमंत्री ने मामले की गंभीरता को माना और अधिकारियों को संबंधित विभाग और मंत्रियों के साथ बैठक करने का निर्देश दिया।

आगे क्या होगा?

यह मसौदा अभी जनता के सुझाव और आपत्तियों के लिए रखा गया है। 5 जून 2026 तक लोग अपनी राय दे सकते हैं। सरकार अब इसमें संशोधन, बदलाव या इसे विधानसभा में पेश करने का फैसला ले सकती है।

लेकिन मंदिर संगठनों के विरोध और वक्फ तुलना के कारण यह मामला आने वाले समय में महाराष्ट्र की बड़ी राजनीतिक और धार्मिक बहस बन सकता है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

₹182 करोड़ की ‘जिहादी ड्रग’ कैप्टागॉन भारत में पहली बार जब्त, होता है बेहद खतरनाक: जानें इसका मिडिल ईस्ट कनेक्शन और कैसे पड़ा ये नाम

भारत में पहली बार कैप्टागॉन  नाम की खतरनाक सिंथेटिक ड्रग की इतनी बड़ी खेप पकड़ी गई है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने ऑपरेशन रेजपिल के तहत करीब 182 करोड़ रुपए कीमत की कैप्टागॉन ड्रग्स जब्त की है।

इस मामले में एक सीरियाई नागरिक को भी गिरफ्तार किया गया है। जाँच एजेंसियों के मुताबिक यह खेप मिडिल ईस्ट भेजी जानी थी और भारत का इस्तेमाल ट्रांजिट रूट यानी रास्ते के तौर पर किया जा रहा था।

गृह मंत्री अमित शाह ने इसे भारत की जीरो टॉलरेंस नीति की बड़ी सफलता बताया है। कैप्टागॉन को दुनिया भर में ‘जिहादी ड्रग’ और ‘गरीबों का कोकीन’ जैसे नामों से भी जाना जाता है। आइए जानते है कि आखिर यह ड्रग क्या है, इसका इस्तेमाल कौन करता है, इसे इतना खतरनाक क्यों माना जाता है और भारत से इसका क्या कनेक्शन निकला।

क्या है कैप्टागॉन?

कैप्टागॉन एक सिंथेटिक स्टिमुलेंट ड्रग है। इसका असली नाम फेनेथिलीन है। इसे 1960 के दशक में दवा के तौर पर बनाया गया था। शुरुआत में इसका इस्तेमाल ध्यान संबंधी समस्याओं, डिप्रेशन और नार्कोलेप्सी जैसी बीमारी के इलाज में किया जाता था।

लेकिन धीरे-धीरे यह सामने आया कि इस दवा की लत बहुत तेजी से लगती है और इसका गलत इस्तेमाल बढ़ रहा है। इसके बाद दुनिया के कई देशों में इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। हालाँकि आज अवैध बाजार में जो कैप्टागॉन बिकता है, वह असली मेडिकल दवा नहीं है।

इसे लैब में तैयार किया जाता है और इसमें एम्फेटामाइन, मेथाम्फेटामाइन, कैफीन और दूसरे खतरनाक केमिकल मिलाए जाते हैं। यही वजह है कि इसका असर बेहद तेज और खतरनाक माना जाता है।

शरीर और दिमाग पर कैसे असर करती है यह ड्रग?

कैप्टागॉन लेने के बाद इंसान को अचानक बहुत ज्यादा ऊर्जा महसूस होती है। उसे लंबे समय तक नींद नहीं आती, थकान कम लगती है और डर का एहसास भी कम हो जाता है। कई लोग इसे लेने के बाद खुद को ज्यादा ताकतवर और आत्मविश्वासी महसूस करते हैं।

जाँच एजेंसियों और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के मुताबिक इस ड्रग का इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति घंटों तक जाग सकता है। भूख कम लगती है और शरीर दर्द को भी कम महसूस करता है। लेकिन इसके साथ ही यह इंसान को आक्रामक, हिंसक और लापरवाह भी बना सकता है।

लंबे समय तक इस्तेमाल करने के कारण कई प्रकार की समस्या हो सकती है जैसे मानसिक बीमारी, हार्ट प्रॉब्लम, तनाव, डिप्रेशन और गंभीर एडिक्शन जैसी समस्याएँ पैदा हो सकती हैं। ड्रग एक्सपर्ट्स के मुताबिक यह सिर्फ नशा नहीं बल्कि मानसिक नियंत्रण को कमजोर करने वाला खतरनाक सिंथेटिक पदार्थ है।

क्यों कहा जाता है जिहादी ड्रग?

कैप्टागॉन का वैज्ञानिक नाम ‘जिहादी ड्रग’ नहीं है। यह शब्द मीडिया और सुरक्षा एजेंसियों द्वारा इस्तेमाल किया जाता है। इसे यह नाम इसलिए मिला क्योंकि कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि मिडिल ईस्ट के युद्धग्रस्त इलाकों और कट्टरपंथी संगठनों के लड़ाके इसका इस्तेमाल करते रहे हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक इस ड्रग को लेने के बाद लड़ाकों को डर कम लगता था, थकान महसूस नहीं होती थी और वे लंबे समय तक जागकर लड़ाई कर सकते थे। यही वजह है कि इसे युद्ध और हिंसक गतिविधियों से जोड़कर देखा जाने लगा।

सीरिया से जुड़ी कई डॉक्यूमेंट्री और रिपोर्ट्स में पूर्व लड़ाकों ने बताया कि युद्ध के दौरान उन्हें यह गोली दी जाती थी ताकि वे लगातार लड़ सकें। कुछ रिपोर्ट्स में ISIS और दूसरे उग्रवादी संगठनों के साथ भी इसका नाम जोड़ा गया है।

हालाँकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि हर उपयोगकर्ता आतंकी नहीं होता। मिडिल ईस्ट के कई देशों में आम लोग भी इसे पार्टी ड्रग या स्टिमुलेंट के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।

मिडिल ईस्ट में क्यों फैला इसका नेटवर्क?

कैप्टागॉन का सबसे बड़ा अवैध बाजार मिडिल ईस्ट माना जाता है। खासकर सऊदी अरब, कतर, UAE और कुवैत जैसे देशों में इसकी बड़ी माँग बताई जाती है। कई जगह शराब पर सख्त पाबंदियाँ होने के कारण युवा वर्ग और पार्टी कल्चर से जुड़े लोग इस ड्रग की तरफ आकर्षित होते हैं।

संयुक्त राष्ट्र और कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की रिपोर्ट के मुताबिक अरब देशों में हर साल करोड़ों कैप्टागॉन गोलियाँ पकड़ी जाती हैं। इसे ‘गरीबों का कोकीन’ भी कहा जाता है क्योंकि यह कोकीन से सस्ती पड़ती है, लेकिन असर काफी तेज होता है।

सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इसकी तस्करी से अरबों रुपए कमाए जाते हैं। यह पैसा संगठित अपराध, हथियारों की तस्करी और कुछ मामलों में चरमपंथी नेटवर्क तक भी पहुँच सकता है।

भारत में कैसे पकड़ी गई इतनी बड़ी खेप?

पूरे मामले का खुलासा एक विदेशी एजेंसी से मिले इनपुट के बाद हुआ। जानकारी मिली थी कि भारत का इस्तेमाल कैप्टागॉन की तस्करी के लिए ट्रांजिट रूट के रूप में किया जा रहा है। इसके बाद NCB ने दिल्ली के नेब सराय इलाके में एक मकान की पहचान की।

11 मई 2026 को यहाँ छापा मारा गया। तलाशी के दौरान एक चपाती कटिंग मशीन में छिपाकर रखी गई करीब 31.5 किलो कैप्टागॉन टैबलेट बरामद हुई। जाँच में पता चला कि यह खेप सऊदी अरब के जेद्दा भेजी जानी थी।

पूछताछ के बाद 14 मई को गुजरात के मुंद्रा पोर्ट स्थित कंटेनर फैसिलिटेशन स्टेशन में एक और बड़ा खुलासा हुआ। वहाँ एक कंटेनर से करीब 196 किलो कैप्टागॉन पाउडर बरामद किया गया। कंटेनर को ‘भेड़ की ऊन’ बताकर सीरिया से भारत लाया गया था।

जाँच एजेंसियों के मुताबिक ड्रग्स को छिपाने के लिए हाईटेक तरीके इस्तेमाल किए जा रहे थे। कहीं चाय की पत्तियों के डिब्बे तो कहीं मशीनों और कार्गो कंटेनर का इस्तेमाल किया गया।

कौन है गिरफ्तार आरोपित और क्या है विदेशी कनेक्शन?

इस मामले में गिरफ्तार आरोपित सीरिया का नागरिक बताया जा रहा है। जाँच में सामने आया कि वह करीब डेढ़ साल पहले भारत पर्यटक वीजा पर आया था लेकिन वीजा खत्म होने के बाद भी अवैध रूप से भारत में रह रहा था।

एजेंसियाँ अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि उसके संबंध किन अंतरराष्ट्रीय ड्रग सिंडिकेट से थे। जाँच में हवाला नेटवर्क, समुद्री तस्करी, फर्जी ट्रेड डॉक्यूमेंट और विदेशी हैंडलर्स के एंगल भी देखे जा रहे हैं। NCB को शक है कि भारत का इस्तेमाल सिर्फ ट्रांजिट पॉइंट की तरह किया जा रहा था और असली बाजार मिडिल ईस्ट के देश थे।

क्यों बढ़ रही है चिंता?

सुरक्षा एजेंसियों के लिए कैप्टागॉन सिर्फ एक ड्रग नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा बड़ा खतरा बन चुका है। इसकी वजह है कि यह बहुत तेजी से लत लगाता है, हिंसक व्यवहार बढ़ा सकता है, मानसिक संतुलन बिगाड़ सकता है और इसका कनेक्शन अंतरराष्ट्रीय अपराध नेटवर्क से भी जोड़ा जाता है।

जाँच एजेंसियों के मुताबिक ड्रग्स तस्करी में अब हवाला नेटवर्क, फर्जी दस्तावेज, समुद्री रास्ते और कंटेनर कारोबार का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। भारत में हाल के वर्षों में ड्रग्स तस्करी के कई बड़े मामले सामने आए हैं। एजेंसियों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट अब भारत के बंदरगाहों और व्यापारिक रूट्स का इस्तेमाल बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

सरकार का क्या कहना है?

गृह मंत्री अमित शाह ने साफ कहा है कि भारत में ड्रग्स के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति लागू है। उन्होंने कहा कि देश में आने वाले या भारत की जमीन का इस्तेमाल करके बाहर भेजे जाने वाले हर ड्रग्स पर कार्रवाई होगी।

सरकार ने 2047 तक ‘ड्रग-फ्री इंडिया’ का लक्ष्य रखा है। इसी के तहत NCB, कोस्ट गार्ड, कस्टम और दूसरी एजेंसियाँ समुद्री रास्तों, एयर कार्गो और कंटेनर नेटवर्क पर निगरानी बढ़ा रही हैं।

ऑपरेशन रेजपिल को इसी अभियान की बड़ी सफलता माना जा रहा है। पहली बार भारत में इतनी बड़ी मात्रा में कैप्टागॉन पकड़े जाने से यह साफ हो गया है कि अंतरराष्ट्रीय ड्रग सिंडिकेट अब भारत को भी अपने नेटवर्क में इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहे हैं।

ऐसे में एजेंसियों के सामने चुनौती सिर्फ नशे को रोकने की नहीं बल्कि संगठित अपराध और विदेशी नेटवर्क पर भी शिकंजा कसने की है।