पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में स्थित करीब 650 साल पुरानी अदीना ‘मस्जिद’ को लेकर बड़ा धार्मिक और राजनीतिक विवाद शुरू हो गया है। स्थानीय बीजेपी नेताओं के समर्थन से एक हिंदू संगठन ने मस्जिद के पास पूजा-पाठ शुरू कर दिया है। संगठन का कहना है कि यह ऐतिहासिक ढाँचा एक प्राचीन हिंदू मंदिर को तोड़कर बनाया गया था।
‘आदिनाथ पुरातन शिव मंदिर’ संगठन ने घोषणा की कि वह मस्जिद परिसर के बाहर 3.6 फीट ऊँचा और करीब 1.5 टन वजनी शिवलिंग स्थापित करेगा। यह शिवलिंग तारकेश्वर से लाया जा रहा है, जो यहाँ से करीब 289 किलोमीटर दूर है।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, संगठन के मुख्य संरक्षक और बीजेपी नेता काजल गोस्वामी ने कहा, “इस तथाकथित मस्जिद में हिंदू और बौद्ध धर्म की मूर्तियाँ मौजूद हैं। आदिनाथ मंदिर को तोड़कर यहाँ मस्जिद बनाई गई थी।” उन्होंने आगे कहा, “हमारा उद्देश्य मंदिर को फिर से स्थापित करना है और शिवलिंग को उसके अंदर रखना है।”
A fresh dispute has emerged around West Bengal's 650-year-old Adina Masjid, with a BJP leader announcing plans to install a Shiva Lingam outside the protected monument while claiming it was originally a temple. The ASI has barred religious activity inside the monument, and… pic.twitter.com/nG5XlCDAL7
हालाँकि, काजल गोस्वामी ने कहा कि उनका संगठन कानून का पूरी तरह पालन करेगा और किसी भी तरह की कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा नहीं होने देगा। उन्होंने बताया कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और पुलिस अधिकारियों ने उन्हें निर्देश दिया कि संरक्षित स्मारक क्षेत्र के बाहर ही पूजा-अर्चना की जाए।
इन घटनाक्रमों के बाद मालदा जिला पुलिस ने सख्त सलाह जारी की। पुलिस ने लोगों को याद दिलाया कि अदीना स्मारक 1958 के AMASR (प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष) अधिनियम के तहत केंद्र सरकार द्वारा संरक्षित स्मारक है। इसलिए परिसर के भीतर बिना अनुमति किसी भी तरह की धार्मिक पूजा या अनुष्ठान करना पूरी तरह प्रतिबंधित है।
इस मुद्दे ने अब राजनीतिक रूप भी ले लिया है। BJP के राज्यसभा सांसद समित भट्टाचार्य ने संसद में यह मामला उठाते हुए केंद्र सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से मूल आदिनाथ मंदिर की सुरक्षा पर ध्यान देने की माँग की। वहीं, विपक्षी नेताओं ने बीजेपी पर निशाना साधा है। CPI(M) के पोलित ब्यूरो सदस्य मोहम्मद सलीम ने आरोप लगाया कि BJP आने वाले चुनावों से पहले लोगों को बाँटने के लिए अपनी पुरानी राजनीतिक रणनीति अपना रही है।
प्राचीन मंदिर का मस्जिद में परिवर्तन
बंगाल के मालदा जिले के पांडुआ में स्थित अदीना मस्जिद के बारे में सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है कि इसका निर्माण 1373 से 1375 ईस्वी के बीच इलियास शाही वंश के सुल्तान सिकंदर शाह ने कराया था। इतिहास की कई किताबों में इसे भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे बड़ी मध्यकालीन मस्जिद बताया जाता है।
हालाँकि, पुरातात्विक और वास्तु संबंधी कई प्रमाण बताते हैं कि इस स्थान का इतिहास इससे भी कहीं अधिक पुराना है। इन प्रमाणों के मुताबिक, मस्जिद का निर्माण मुख्य रूप से पाल-सेन काल (8वीं से 12वीं शताब्दी) के पहले से मौजूद हिंदू और बौद्ध धार्मिक स्थलों से लिए गए पत्थरों, स्तंभों और नक्काशीदार सामग्री का उपयोग करके किया गया था।
मस्जिद में मौजूद कई मूर्तियाँ औऱ अन्य अवशेष इस बात की ओर संकेत करते हैं कि यहाँ पहले भगवान शिव को समर्पित भव्य आदिनाथ मंदिर और भगवान विष्णु का एक मंदिर मौजूद था। मस्जिद का मिंबर (जहाँ से इमाम संबोधन देते हैं) भी काले बेसाल्ट पत्थर से बने एक ऐसे दरवाजे का उपयोग करके बनाया गया है, जिसे मंदिर के खंडहरों से लिया गया था।
इसके अलावा मस्जिद की दीवारों, दरवाजों, मेहराबों और मिहराब (नमाज की दिशा बताने वाला स्थान) पर भगवान शिव, भगवान गणेश और अन्य हिंदू प्रतीकों की नक्काशी दिखाई देती है। यहाँ फूलों की आकृतियाँ, चैत्य मेहराब, कीर्तिमुख, मोतियों की मालाएँ और जंजीर-घंटी जैसे कई डिजाइन भी बने हुए हैं। इस तरह की सजावट आम तौर पर इस्लामी वास्तुकला का हिस्सा नहीं मानी जाती। इसलिए माना जाता है कि ये नक्काशी और डिजाइन पाल-सेन काल के समय के हैं।
इस मस्जिद के केंद्रीय मिहराब में इस स्थान के हिंदू अतीत के कई संकेत दिखाई देते हैं। मिहराब का सामने का हिस्सा तीन पत्तियों जैसी आकृति वाली मेहराब से सजाया गया है। मेहराब के दोनों ओर बने हिस्सों पर फूलों जैसी आकृतियाँ उकेरी गई हैं। मिहराब के अंदर बने पैनलों पर भी मेहराब, फूलों की आकृतियाँ और मेहराब के ऊपरी हिस्से से लटकती जंजीत और घंटी के डिजाइन दिखाई देते हैं।
इतिहासकारों के मुताबिक, जंजीर और घंटी जैसे ये डिजाइन हिंदू वास्तुकला की विशेष पहचान माने जाते हैं। इस तरह की नक्काशी हिंदू काल में बनाए गए स्तंभों पर भी देखी जाती है।
आज भी इस परिसर और इसके आसपास की दीवारों में टूटे हुए शिवलिंग और उलटी पड़ी हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियाँ दिखाई देती हैं। कई लोगों का मानना है कि ये अवशेष इस बात की ओर इशारा करते हैं कि मध्यकालीन आक्रमणों के दौरान इस क्षेत्र की हिंदू विरासत को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुँचाया गया था।
इस मुद्दे को कानूनी और सामाजिक स्तर पर तब अधिक चर्चा मिली, जब वरिष्ठ अधिवक्ता हरि शंकर जैन ने हिंदुओं से इस स्थल पर पूजा करने का अपना अधिकार वापस पाने की अपील की। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर सुल्तान सिकंदर शाह के शासनकाल के दौरान हुए ऐतिहासिक विध्वंस का भी मुद्दा उठाया।
TMC सांसद यूसुफ पठान ने इसे मस्जिद के तौर पर पेश करने की कोशिश की
यह विवाद उस समय राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आ गया, जब तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के सांसद यूसुफ पठान ने इस स्थल का दौरा किया और इसे केवल इस्लामी वास्तुकला की एक ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया।
सोशल मीडिया पर अपनी यात्रा की तस्वीरें साझा करते हुए यूसुफ पठान ने लिखा, “बंगाल के मालदा में स्थित अदीना मस्जिद 14वीं शताब्दी की एक ऐतिहासिक मस्जिद है। इसका निर्माण इलियाह शाही वंस के दूसरे शासक सुल्तान सिकंदर शाह ने 1373 से 1375 ईस्वी के बीच कराया था। अपने समय में यह भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे बड़ी मस्जिद थी और उस दौर की शानदार वास्तुकला का उदाहरण है।”
The Adina Mosque in Malda, West Bengal, is a historic mosque built in the 14th century by Sultan Sikandar Shah, the second ruler of the Ilyas Shahi dynasty. Constructed in 1373-1375 CE, it was the largest mosque in the Indian subcontinent during its time, showcasing the region's… pic.twitter.com/EI0pBiQ9Og
इसके बाद सोशल मीडिया पर कई लोग और राजनीतिक कमेंटेटर ने TMC सांसद की आलोचना की। उनका कहना था कि उन्होंने इस स्थल से जुड़े हिंदू इतिहास और विरासत का कोई उल्लेख नहीं किया। कई सोशल मीडिया यूजर्स ने परिसर में मौजूद नक्काशियों और मूर्तियों की तस्वीरें साझा करते हुए अपने दावे पेश किए। अधिवक्ता शेखर कुमार झा ने दीवार पर बनी भगवान गणेश की एक नक्काशी की तस्वीर साझा करते हुए लिखा, “इतिहास: आदिनाथ मंदिर को अदीना मस्जिद बना दिया गया।”
Dear Yusuf Pathan, you are standing in the campus of one of the largest Hindu Temples, Adinath Temple, which was desecrated and occupied by Islamic invaders. Attached are some images for your reference. It is time to undo the injustice and barbarity, and reestablish the temple's… pic.twitter.com/CUc1z5lnHD
वहीं, ‘PlanH’ नाम के एक यूजर ने यूसुफ पठान को जवाब देते हुए लिखा, “प्रिय यूसुफ पठान, आप भारत के सबसे बड़े हिंदू मंदिरों में से एक आदिनाथ मंदिर के परिसर में खड़े हैं, जिसे इस्लामी आक्रमणकारियों ने अपवित्र कर अपने कब्जे में ले लिया था। आपके संदर्भ के लिए कुछ तस्वीरें अटैच हैं। अब समय आ गया है कि इस अन्याय और बर्बरता को समाप्त कर मंदिर की पुरानी गरिमा को फिर से स्थापित किया जाए।”
एक और यूजर ‘अब्दुल किताबी’ ने लिखा, “एक सच्चे मुसलमान के तौर पर हमें यह मस्जिद हिंदुओं को वापस कर देनी चाहिए।”
वहीं, कुछ अन्य लोगों ने इतिहास को लेकर सवाल उठाते हुए कहा, “क्या
BJP सरकार के दौरान अधिकारों की बहाली और पुनर्स्थापना की दिशा में कदम
कई दशकों तक स्थानीय हिंदुओं को इस विवादित स्थल पर पूजा-पाठ या किसी भी तरह का धार्मिक अनुष्ठान करने की अनुमति नहीं थी। यह परिसर ASI के संरक्षण में था। इसके कारण यहाँ पूजा और आगे पुरातात्विक जाँच कराने की कोशिशों पर रोक लगी रही। हालाँकि, साल 2024 की शुरुआत में इस स्थल को लेकर माहौल बदलना शुरू हुआ।
युवा पुजारी हिरण्मय के नेतृत्व में हिंदू श्रद्धालुओं का एक समूह परिसर के अंदर पहुँचा। उन्होंने वहाँ मौजूद मूर्तियों और वास्तुकला में बने एक शिवलिंग की पहचान की। इसके बाद उन्होंने मंत्रोच्चार करते हुए पूजा शुरू कर दी। स्थानीय मुस्लिमों की शिकायत के बाद पुलिस मौके पर पहुँची और उस समय पूजा रुकवा दी। हालाँकि, इस घटना को स्थानीय हिंदुओं के लिए एक बड़ा मोड़ माना गया।
अब BJP नेताओं के समर्थन के साथ इस स्थल को वापस पाने की माँग और तेज हो गई है। इस अभियान से जुड़े लोग अयोध्या राम जन्मभूमि, ज्ञानवापी और मथुरा जैसे मामलों का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि लोगों की धार्मिक आस्था को हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता।
साथ ही, इस मामले में कोलकाता हाई कोर्ट में पूरे परिसर का ASI से सर्वे कराने की माँग करने की तैयारी भी चल रही है। इसके अलावा, परिसर के बाहर शिवलिंग स्थापित करने का काम भी जारी है। हिंदू समुदाय का कहना है कि वह कानूनी और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी धार्मिक विरासत को वापस पाने की दिशा में कदम उठा रहा है।
(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)
जंतर-मंतर की भीड़ में एक युवा खड़ा था। उसके हाथ में प्लेकार्ड था, आँखों में गुस्सा और दिल में सवाल। NEET पेपर लीक की खबरों ने हजारों सपनों को हिला दिया था। कॉकरोच जनता पार्टी के बैनर तले युवाओं और GenZ की टोली जमा थी। वे कह रहे थे- सिस्टम बदलो, जवाब दो। दूर दिल्ली के किसी कमरे में एक आदमी यह सब देख रहा था। उम्र में फर्क बहुत था, लेकिन बात समझने में कोई फर्क नहीं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फैसला किया- पुराने तरीके छोड़ो, वहाँ जाओ जहाँ युवा हैं। इंस्टाग्राम खोलो, सेल्फी मोड ऑन करो, और सीधे बात करो। पिछले 24 घंटे में उन्होंने दो Reels अपलोड किए। और फिर जो हुआ, वह सोशल मीडिया की दुनिया में नया रिकॉर्ड बन गया। यह सिर्फ वीडियो नहीं था। यह एक नई कोशिश थी- उम्र के फासले को पार करके युवाओं के दिल तक पहुँचने की।
जंतर-मंतर से शुरू हुई कहानी
देखिए, हालात ऐसे थे कि युवा सड़क पर उतर आए थे। कॉकरोच जनता पार्टी के नाम से चला यह आंदोलन NEET-UG पेपर लीक, परीक्षा प्रणाली में सुधार, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और उन परिवारों के मुआवजे की माँग कर रहा था, जहाँ छात्रों ने आत्महत्या कर ली थी। सरकार कह रही थी कि गिरफ्तारियाँ हो चुकी हैं, दोबारा परीक्षा कराई गई, लेकिन युवा संतुष्ट नहीं थे। ऐसे में PM मोदी ने पुरानी प्रेस कॉन्फ्रेंस या लंबे भाषण का रास्ता नहीं चुना। उन्होंने वह तरीका अपनाया जो आज के Gen-Z को सबसे ज्यादा पसंद है– छोटा वीडियो, सीधी बात, सेल्फी स्टाइल।
पहले Video में उन्होंने साफ कहा कि पेपर लीक कोई छोटी बात नहीं है। लाखों छात्रों और उनके माता-पिता को बहुत दर्द हुआ है। पिछले ढाई महीने में कई कदम उठाए गए, दोषियों को गिरफ्तार किया गया, करीब 22 लाख छात्रों को दोबारा परीक्षा का मौका मिला। अब और सख्त कार्रवाई होगी। कैबिनेट में बिल आएगा, फास्ट ट्रैक कोर्ट होंगे। यह वीडियो रात के समय आया, जब ज्यादातर युवा फोन स्क्रॉल कर रहे होते हैं। भाषा साधारण थी, लहजा अपनापन वाला। जैसे कोई बड़ा भाई या चाचा समझा रहा हो। उम्र का फासला तो था, लेकिन बात जेन-जी की भाषा में थी।
फिर दूसरा वीडियो, युवाओं तक पहुँचना का मकसद
दूसरा Video सिर्फ 24 घंटे के अंदर आया। इसमें PM मोदी ने धन्यवाद दिया। ‘थैंक यू फ्रेंड्स। कल रात आप सभी से मिलने का मौका मिला। जिस तरह आपने Video पर रिएक्ट किया, सकारात्मक सुझाव दिए, सबका शुक्रिया। आपका प्यार बना रहेगा और हमारा रिश्ता और मजबूत होगा।’ इतनी सी बात, लेकिन असर गहरा। युवाओं ने महसूस किया कि उनकी बात सुनी जा रही है। सुझाव माँगे जा रहे हैं। यह सिर्फ एकतरफा संदेश नहीं था। यह बातचीत की शुरुआत लग रही थी।
पीएम मोदी बार-बार यही कह रहे हैं कि वे युवाओं के साथ जुड़ना चाहते हैं, उनकी बात सुनना चाहते हैं और उन्हें भरोसा दिलाना चाहते हैं कि सरकार उनके साथ है। परीक्षाओं में धांधली उनके भविष्य से खिलवाड़ है, इसलिए सख्त कानून लाए जाएँगे। कैबिनेट ने पब्लिक एग्जामिनेशन्स (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) एक्ट में संशोधन को मंजूरी दे दी। न्यूनतम पाँच साल की सजा, संगठित गिरोहों के लिए 10 साल तक और एक करोड़ रुपए तक जुर्माना। NEET, JEE, CUET, UPSC, SSC सब कवर होंगे। PM ने कहा था कि प्रेस कॉन्फ्रेंस पुरानी बात हो गई। अब लाइव जाकर युवाओं से सीधा संवाद बेहतर है। उन्होंने हर रविवार रात आठ बजे इंस्टाग्राम लाइव का ऐलान भी किया।
PM के 2 वीडियो के आँकड़े– चौंकाने वाली संख्या
बता दें कि PM मोदी के इंस्टाग्राम अकाउंट पर फॉलोअर्स अब 103 मिलियन यानी 10 करोड़ 30 लाख हो चुके हैं। पहली वीडियो 23 जुलाई को आधी रात को आई थी। इसमें 17.9 मिलियन यानी 1 करोड़ 79 लाख लाइक्स आए, 1.7 मिलियन यानी 17 लाख कमेंट्स पड़े और इम्प्रेशन 346 मिलियन यानी 34 करोड़ 60 लाख तक पहुँच गए। यह Video खुद PM मोदी ने अपने हाथ में फोन लेकर रिकॉर्ड किया था। छात्रों को आश्वासन दिया कि पेपर माफिया पर सख्ती होगी और उनकी मेहनत बर्बाद नहीं होगी।
दूसरी Video 24 जुलाई को अपलोड हुआ। इसमें 10.4 मिलियन यानी 1 करोड़ 4 लाख लाइक्स, 1 मिलियन यानी 10 लाख कमेंट्स और इम्प्रेशन 158 मिलियन यानी 15 करोड़ 80 लाख आए। इसमें PM ने युवाओं का आभार जताया। दोनों वीडियो मिलकर साबित करते हैं कि जब बात दिल से और सही प्लेटफॉर्म पर हो, तो युवा सुनते हैं। ये आँकड़े सिर्फ नंबर नहीं हैं। ये दिखाते हैं कि युवा सरकार की बात सुनने को तैयार हैं, बशर्ते बात उनकी भाषा में हो।
अब PM मोदी का मंत्रियों को साफ संदेश– इंस्टाग्राम पर आओ, रील्स बनाओ
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद युवाओं तक पहुँचने का रास्ता तो बना ही लिया, साथ ही उन्होंने अपने मंत्रिमंडल के सभी सहयोगियों को भी यह संदेश जारी किया। हाल ही में हुई एक उच्चस्तरीय कैबिनेट बैठक के दौरान प्रधानमंत्री ने सभी मंत्रियों से यह सवाल किया कि उनमें से कितने लोग इंस्टाग्राम जैसी आधुनिक सोशल मीडिया साइट्स पर एक्टिव है और इसका इस्तेमाल कर रहे हैं।
पीएम मोदी ने मंत्रियों को साफ शब्दों में हिदायत दी कि केवल सरकारी फाइलों के आँकड़े या कागजी योजनाएँ पेश करने से काम नहीं चलेगा, बल्कि उन्हें भी रील्स और डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल करना होगा। प्रधानमंत्री का मानना है कि देश की एक बहुत बड़ी युवा आबादी अपना वक्त इन्हीं प्लेटफॉर्म्स पर बिताती है, इसलिए सरकार को उनके साथ सीधे जुड़ने की अपनी क्षमता को और ज्यादा मजबूत करना चाहिए।
मंत्रियों को दिए गए इस निर्देश के पीछे एक बहुत बड़ी राजनीतिक दूरदर्शिता छिपी है, जिसे जंतर-मंतर पर सुलग रहे आंदोलन को शांत करने के एक शांत और प्रभावी जरिया के रूप में भी देखा जा रहा है। सरकार यह अच्छी तरह समझ चुकी है कि सड़कों पर चल रहे विरोध प्रदर्शनों और युवाओं के गुस्से को केवल पुलिस या बयानों से नहीं दबाया जा सकता, बल्कि इसके लिए पारदर्शी संवाद और उनकी भाषा में बात करना जरूरी है।
इसी रणनीति का हिस्सा है कि सरकार ने पेपर लीक जैसी गंभीर समस्याओं से निपटने के लिए एक बेहद कड़े कानून का मसौदा तैयार किया है, जिसके तहत संगठित अपराधियों को 10 साल तक की जेल और 10 करोड़ रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान है। साथ ही NTA में बड़े स्तर पर संस्थागत सुधार भी किए जा रहे हैं, जिनकी जानकारी अब सरकार सीधे इन डिजिटल माध्यमों से युवाओं तक पहुँचा रही है।
इंस्टाग्राम कैसे बना GenZ का सबसे पसंदीदा ठिकाना?
अब बात करते हैं उस प्लेटफॉर्म की, जिसने यह सब मुमकिन बनाया। इंस्टाग्राम की शुरुआत 6 अक्टूबर 2010 को हुई थी। इसे दो युवकों ने बनाया– केविन सिस्ट्रॉम और माइक क्रीगर। दोनों स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी से जुड़े थे। पहले उन्होंने बर्बन नाम का एक ऐप बनाया था, जिसमें लोकेशन चेक-इन और फोटो शेयरिंग दोनों थे। लेकिन उन्होंने देखा कि लोग फोटो वाले हिस्से को ज्यादा पसंद करते हैं। तो बाकी सब हटाकर सिर्फ फोटो शेयरिंग पर फोकस किया। नाम रखा इंस्टाग्राम– इंस्टेंट कैमरा और टेलीग्राम का मेल। मकसद साधारण था– मोबाइल से अच्छे फिल्टर वाली तस्वीरें आसानी से दोस्तों के साथ शेयर करना। पुरानी पोलरॉइड फोटो की याद दिलाने वाला अंदाज़।
शुरुआत में सिर्फ आईफोन के लिए था। पहले दिन 25 हजार यूजर्स जुड़ गए। एक महीने में दस लाख, एक साल में एक करोड़। 2012 में फेसबुक ने इसे करीब एक अरब डॉलर में खरीद लिया। आज यह मेटा के अधीन है। शुरुआत फोटो शेयरिंग से हुई थी, लेकिन समय के साथ स्टोरीज, रील्स, लाइव, शॉपिंग, क्लोज फ्रेंड्स जैसे फीचर्स जुड़ते गए।
आज 2026 में इंस्टाग्राम GenZ का फेवरेट बन चुका है। यह बात बिल्कुल साफ हो चुकी है कि 13 से 27 साल की उम्र के युवाओं यानी GenZ के बीच इंस्टाग्राम ने अपनी एक बेहद खास जगह बना ली है। आज का इंस्टाग्राम सिर्फ तस्वीरें शेयर करने वाला पुराना ऐप नहीं रहा, बल्कि यह आज के युवाओं की डिजिटल पहचान, शॉपिंग करने का जरिया, मनोरंजन का साधन और कई बार गूगल जैसे सर्च इंजन की जगह लेने वाला प्लेटफॉर्म बन चुका है। रिपोर्ट्स और आँकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि यह बड़ा बदलाव रातों-रात नहीं आया, बल्कि कंपनी द्वारा समय पर किए गए नए बदलावों, छोटे वीडियो की सोच और भारत जैसे विशाल देशों में इसकी बढ़ती लोकप्रियता का नतीजा है।
एक रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 58 प्रतिशत Gen-Z यूजर हर रोज इंस्टाग्राम का इस्तेमाल करते हैं, जो यह साबित करने के लिए काफी है कि दूसरे वीडियो ऐप्स के बाजार में होने के बावजूद यह टॉप पर बना हुआ है। एक अन्य स्टडी से यह भी सामने आया कि साल 2025 तक इंस्टाग्राम युवाओं के बीच अपने से पुरानी पीढ़ी यानी मिलेनियल्स से भी ज्यादा पॉपुलर हो चुका था और इस पीढ़ी के करीब 5.24 करोड़ लोग इससे जुड़े हुए थे। अगर अमेरिका के 18 से 29 साल के युवाओं की बात करें, तो यूट्यूब के बाद इंस्टाग्राम दूसरा सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला प्लेटफॉर्म है, जिसे करीब 80% युवा पसंद करते हैं।
भारत की तस्वीर इस मामले में और भी ज्यादा दिलचस्प और हैरान करने वाली है। ताजा आँकड़ों के मुताबिक, 2026 में भारत दुनिया का वह देश बन चुका है जहाँ सबसे ज्यादा इंस्टाग्राम यूजर्स मौजूद हैं, और यहाँ एक्टिव यूजर्स की संख्या 47.2 करोड़ के आँकड़े को पार कर चुकी है। भारत में तेजी से बढ़ती युवा आबादी इस प्लेटफॉर्म को बुलंदियों पर पहुँचाने में सबसे अहम भूमिका निभा रही है।
रील्स (Reels): वो जादुई फीचर जिसने पूरी बाजी ही पलट दी
अगर यह तलाश की जाए कि इंस्टाग्राम युवाओं के बीच इतना लोकप्रिय क्यों हुआ, तो सबसे बड़ा नाम ‘रील्स’ का आता है। छोटे, तेज और लोगों की पसंद के हिसाब से चलने वाले इस वीडियो फॉर्मेट ने पूरे ऐप का रूप ही बदल कर रख दिया है। मेटा और IPSOS की एक साझा रिपोर्ट बताती है कि भारत में 98 प्रतिशत Gen-Z यूजर, 85 प्रतिशत महिलाएँ और 88 प्रतिशत प्रीमियम दर्शक रोज बिना चूके रील्स देखते हैं। इसके अलावा मेटा का यह भी दावा है कि लोगों को जोड़ने के मामले में रील्स अन्य छोटे वीडियो प्लेटफॉर्म्स के मुकाबले लगभग 60 प्रतिशत ज्यादा असरदार साबित हो रहा है।
एक और रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 84% युवा किसी भी नए सामान या ब्रांड की खोज इसी प्लेटफॉर्म के जरिए करते हैं, जबकि 89% यूजर रोज रील्स देखते या उनसे बातचीत करते हैं। इससे साफ पता चलता है कि रील्स अब केवल मनोरंजन का साधन नहीं रह गया है, बल्कि यह लोगों की पसंद, सोच और खरीदारी के फैसलों को भी सीधे तौर पर प्रभावित कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यही ट्रेंड है, जहाँ रील्स देखने वाले 74 प्रतिशत लोग 18 से 34 साल की उम्र के यानी युवा वर्ग से ताल्लुक रखते हैं।
गूगल को टक्कर: जानकारी ढूँढने का नया सर्च इंजन बन रहा ऐप
आज की युवा पीढ़ी के लिए इंस्टाग्राम सिर्फ खाली समय में रील्स स्क्रॉल करने की जगह नहीं है, बल्कि यह किसी भी नई जानकारी को ढूँढने का पहला माध्यम बनता जा रहा है। एक सर्वे के मुताबिक, अमेरिका के 46% युवाओं ने माना कि वे गूगल जैसे पुराने सर्च इंजन पर जाने के बजाय सोशल मीडिया पर चीजें खोजना ज्यादा पसंद करते हैं, और इंस्टाग्राम पर सबसे ज्यादा सर्च किए जाने वाले विषयों में फैशन और ब्रांड्स सबसे आगे रहे हैं। इसके अलावा टिक टॉक और रेडिट के साथ-साथ युवा खबरों से अपडेट रहने के लिए भी इसी का सहारा लेते हैं।
पारंपरिक सर्च इंजन की जगह इस विज़ुअल ऐप का लेना इस बात का पक्का संकेत है कि आज का युवा लंबे लेख पढ़ने के बजाय तस्वीरों और छोटे वीडियो पर ज्यादा भरोसा करता है। छुट्टियों की योजना बनाने में भी यही हाल है, जहाँ भारतीय युवा अलग से यात्रा की जगह नहीं तलाशते, बल्कि इंस्टाग्राम का एल्गोरिदम खुद-बखुद उनकी फीड को खूबसूरत जगहों के वीडियो से भर देता है, जिसे युवा भविष्य के लिए अपने ‘कलेक्शन’ में सेव कर लेते हैं।
असली कनेक्शन की तलाश और छोटे-छोटे फीचर्स का कमाल
Gen-Z की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे केवल चुपचाप वीडियो देखने वाले दर्शक नहीं हैं, बल्कि वे इस प्लेटफॉर्म पर अपनी एक अलग पहचान बनाते हैं। रिपोर्ट्स बताती हैं कि इस पीढ़ी का लगभग आधा हिस्सा टीवी पर आने वाले बड़े सेलिब्रिटीज के मुकाबले सोशल मीडिया क्रिएटर्स के साथ ज्यादा अपनापन महसूस करता है। इंस्टाग्राम ने ‘क्लोज फ्रेंड्स’, ‘स्टोरीज’ और ‘नोट्स’ जैसे फीचर्स लाकर इसी चाहत को पूरा किया है, जिससे लोग पूरी दुनिया के सामने आने के बजाय अपने खास और भरोसेमंद दोस्तों के छोटे दायरे में खुलकर बात कर पाते हैं।
हालाँकि इस मामले में इंस्टाग्राम को दूसरे ऐप्स से कड़ी टक्कर भी मिल रही है। मेटा का ही दूसरा ऐप ‘थ्रेड्स’ युवाओं के बीच तेजी से पैर पसार रहा है और इसके करीब 4.2 करोड़ एक्टिव युवा यूजर हैं। वहीं, ‘बीरियल’ (BeReal) जैसे पूरी तरह असली पल दिखाने वाले ऐप के भी 4 करोड़ से ज्यादा युवा यूजर हैं, जो यह दिखाता है कि आज का युवा किसी एक ऐप पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहता, बल्कि मनोरंजन के लिए अलग और निजी पलों के लिए दूसरे ऐप का इस्तेमाल करता है।
शॉपिंग का नया अड्डा: Reels से सीधे सामान खरीदने का दौर
इंस्टाग्राम की ताकत का एक और बड़ा पहलू ‘सोशल कॉमर्स’ यानी खरीदारी से जुड़ा है। भारत में मेटा की स्टडी बताती है कि Reels अब केवल टाइमपास नहीं बल्कि ऑनलाइन शॉपिंग का बहुत बड़ा जरिया बन चुका है, जो 81 प्रतिशत नए सामान की खोज और 47 प्रतिशत खरीददारी के फैसलों को सीधे तौर पर तय करता है। पूरी दुनिया में भी यही हाल है, जहाँ 72 प्रतिशत युवाओं ने किसी न किसी सोशल ऐप के जरिए सीधे सामान खरीदा है और लगभग सभी ने अपने स्मार्टफोन से ही पेमेंट की है।
सिक्के का दूसरा पहलू: डेटा की चिंता और मानसिक सेहत का सवाल
हालाँकि, यह चमक-धमक वाली तस्वीर ही सब कुछ नहीं है, क्योंकि इस सिक्के का एक दूसरा पहलू भी है। Gen-Z का एक बड़ा तबका इंस्टाग्राम और इसकी मुख्य कंपनी मेटा द्वारा यूजर के डेटा के इस्तेमाल के तरीकों को लेकर काफी डरा हुआ रहता है। एक रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 67 प्रतिशत युवा इंस्टाग्राम और फेसबुक को यूजर के डेटा का गलत इस्तेमाल करने वाला मानते हैं, जिसकी वजह से कई लोग अब टेलीग्राम या रेडिट जैसे ऐप्स की तरफ भी जा रहे हैं।
इसके अलावा मानसिक सेहत को लेकर भी युवाओं में जागरूकता बहुत बढ़ गई है। एक अध्ययन के मुताबिक, सोशल मीडिया का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करने के बावजूद यह पीढ़ी इसके दिमाग पर पड़ने वाले बुरे असर को लेकर भी सबसे ज्यादा सजग है। एक सर्वे में सामने आया कि अमेरिका के एक-तिहाई युवा अब सोशल मीडिया पर अपना समय कम करना चाहते हैं, भले ही वे इसके मौजूदा इस्तेमाल से खुश हों।
युवाओं से जुड़े, युवाओं की आवाज में…
कुल मिलाकर देखा जाए तो इंस्टाग्राम के युवाओं का सबसे पसंदीदा ठिकाना बनने की यह पूरी कहानी किसी एक फीचर का कमाल नहीं है, बल्कि यह एक पूरे सिस्टम की सफलता है। Reels ने वीडियो देखने का तरीका बदला, स्टोरीज ने आपसी रिश्तों को जोड़ा, शॉपिंग फीचर्स ने इसे बाजार बना दिया और एल्गोरिदम ने इसे गूगल जैसा सर्च इंजन अनुभव दे दिया। भारत जैसे देशों में जहाँ मोबाइल इस्तेमाल करने वाले युवाओं की संख्या बहुत तेजी से बढ़ रही है, वहाँ यह ट्रेंड और भी मजबूत होता दिख रहा है। फिर भी, डेटा की सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताएं यह बताती हैं कि युवा किसी एक ऐप के गुलाम नहीं हैं।
PM मोदी बार-बार यही बता रहे हैं कि वे युवाओं की बात सुनना चाहते हैं। सुझाव माँग रहे हैं। भरोसा दिला रहे हैं कि पेपर लीक जैसी समस्या पर सख्ती होगी। आंदोलन को सिर्फ पुलिस से नहीं, संवाद से भी शांत करने की कोशिश दिख रही है। उम्र का फासला है, लेकिन तकनीक ने उसे पाट दिया। जेन-जी की भाषा में बात करके वे कह रहे हैं – मैं तुम्हारे साथ हूँ।
यह सिर्फ 2 Video की कहानी नहीं है। यह बदलते समय की कहानी है। जब नेता युवाओं के पास जाएँ, उनकी भाषा बोलें, उनकी प्लेटफॉर्म पर आएँ, तो दूरी कम होती है। जंतर-मंतर की आवाज अब इंस्टाग्राम रील्स तक पहुँच गई है। आँकड़े चौंका देने वाले हैं, लेकिन असली परीक्षा आगे है– कानून कितना सख्त लागू होता है, परीक्षा प्रणाली कितनी साफ होती है और युवा कितना भरोसा महसूस करते हैं। PM मोदी ने रास्ता दिखाया है।
सनातन परंपरा में चातुर्मास का समय केवल महीनों का बदलना मात्र नहीं है, बल्कि यह आत्म-साधना, संयम और आत्म-निरीक्षण का एक पावन और विस्तृत पर्व है। पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी से इसका आरंभ होता है और कार्तिक मास की देवउठनी एकादशी तक यह चलता है।
देवशयनी एकादशी को हरिशयनी या पद्मा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस वर्ष यह पवित्र अवधि 25 जुलाई 2026 से शुरू होकर 21 नवंबर तक, यानी कुल 120 दिनों तक चलेगी। इन चार महीनों के लंबे अंतराल को एक विशेष धर्म-काल माना गया है, जिसके दौरान सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर योगनिद्रा में लीन रहते हैं।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस अवधि में वे पाताल लोक में राजा बलि के यहाँ निवास करते हैं। भगवान विष्णु के योगनिद्रा में रहने के कारण पृथ्वी पर विवाह, सगाई, मुंडन, नामकरण और गृह प्रवेश जैसे सभी मांगलिक कार्यों पर पूरी तरह से विराम लग जाता है।
ढोल और शहनाइयों की गूँज खामोश हो जाती है, लेकिन उनकी जगह मंदिरों और घरों में भक्ति गीतों, भजनों और सत्संग का मधुर स्वर गूँजने लगता है। भले ही सांसारिक उत्सवों पर रोक लग जाती है, लेकिन यह समय जप, तप, ध्यान, व्रत और आत्मिक उन्नति के लिए साल का सबसे सर्वोत्तम समय माना गया है।
आइए विस्तार से समझते हैं कि चातुर्मास का हमारे जीवन में क्या महत्व है और इस दौरान किन-किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
जब योगनिद्रा में लीन होते हैं हरि: जानिए कौन सँभालेगा सृष्टि का संचालन?
धार्मिक मान्यताओं और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, जब भगवान श्रीहरि विष्णु चार माह के लिए अपनी योगनिद्रा में चले जाते हैं, तब संपूर्ण सृष्टि के संचालन और संरक्षण का भारी दायित्व देवाधिदेव महादेव अर्थात् भगवान शिव के कंधों पर आ जाता है।
इस पूरे कालखंड में भगवान शिव ही पालनकर्ता और संहारक, दोनों भूमिकाओं में रहकर सृष्टि की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाते हैं। चातुर्मास की कथा अत्यंत रोचक है।
श्रीमद्भागवत पुराण और पद्म पुराण के प्रसंगों के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि दान में माँगी थी, तब बलि की अटूट भक्ति और दानशीलता से वे अत्यंत प्रसन्न हुए थे। प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने राजा बलि को वरदान दिया था कि वे हर साल चार महीने उनके पाताल लोक स्थित महल में निवास करेंगे।
इसी पौराणिक घटना के कारण देवशयनी एकादशी से चातुर्मास की शुरुआत मानी जाती है और देवउठनी एकादशी पर जब विष्णु जी पुनः जागृत होते हैं, तब वे अपने लोक लौटते हैं।
यद्यपि पंचांगीय गणना के अनुसार, चातुर्मास में आषाढ़, सावन, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक, ये पाँच महीने स्पर्श होते हैं, परंतु तिथियों के आधार पर देवशयनी से देवउठनी एकादशी तक की कुल अवधि चार महीने की ही बैठती है। सनातन धर्म के साथ-साथ जैन परंपरा में भी चातुर्मास का बहुत गहरा महत्व है।
जैन समाज का चातुर्मास भी इसी समय के आसपास, 29 जुलाई से शुरू होगा, जहाँ साधु-संत यात्राएँ रोककर एक ही स्थान पर ठहरते हैं और समाज को ध्यान तथा धर्मोपदेश देते हैं।
शुभ कार्यों पर विराम, फिर भी भक्ति का महाकुंभ: चातुर्मास के 120 दिनों का उत्सव
यद्यपि चातुर्मास में विवाह या नए घर में प्रवेश जैसे शुभ संस्कार वर्जित होते हैं, परंतु यह काल पूजा-पाठ, उपवास और बड़े-बड़े उत्सवों से पूरी तरह से भरा होता है। इस दौरान आपकी नियमित पूजा या किसी व्रत-त्योहार को मनाने पर कोई पाबंदी नहीं होती है, बल्कि इनका फल और भी कई गुना बढ़ जाता है।
इन 120 दिनों की अवधि में देश भर में पंद्रह से भी अधिक बड़े धार्मिक पर्व मनाए जाते हैं, जो जीवन में नई ऊर्जा भरते हैं। इस धर्म-काल की शुरुआत सावन के महीने से होती है, जो पूरी तरह से भगवान शिव की आराधना और उनकी कृपा पाने के लिए समर्पित है। इस महीने में भक्त बड़ी श्रद्धा के साथ शिवजी का जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और कांवड़ यात्रा करते हैं।
सावन के बाद भाद्रपद का महीना आता है, जिसे भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव यानी जन्माष्टमी और प्रथम पूज्य विघ्नहर्ता श्री गणेश की स्थापना यानी गणेश चतुर्थी के उल्लास के लिए जाना जाता है। इसके बाद आश्विन महीने की शुरुआत में पितरों की शांति और उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए पंद्रह दिनों का पितृ पक्ष या श्राद्ध पक्ष आता है।
इसके तुरंत बाद शक्ति की देवी माँ दुर्गा की उपासना का सबसे बड़ा पर्व शारदीय नवरात्रि आता है, जिसका समापन बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक दशहरे के साथ होता है।
अंत में कार्तिक का महीना आता है, जो दीपों और उल्लास का महीना है। इस दौरान करवा चौथ, धनतेरस, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज और सूर्य उपासना का महापर्व छठ पूजा बड़े ही धूमधाम से मनाए जाते हैं। अंततः कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देवउठनी एकादशी के साथ चातुर्मास का समापन होता है और सभी रुके हुए मांगलिक कार्य फिर से शुरू हो जाते हैं।
भक्ति में छुपा सेहत का राज: आयुर्वेद और शास्त्र अनुसार क्या खाएँ, क्या त्यागें?
चातुर्मास का समय केवल आध्यात्मिक उन्नति तक सीमित नहीं है, बल्कि आयुर्वेद और स्वास्थ्य विज्ञान के दृष्टिकोण से भी यह अवधि हमारे शरीर के लिए बहुत संवेदनशील मानी गई है। मानसून या वर्षा ऋतु के समय मनुष्य के शरीर की जठराग्नि यानी पाचन शक्ति काफी मंद पड़ जाती है।
इसके साथ ही नमी के कारण वातावरण में बैक्टीरिया, कीड़े-मकोड़े और संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसलिए हमारे शास्त्रों में इन चार महीनों के दौरान खान-पान के कुछ बहुत ही कड़े और विशेष नियम बताए गए हैं, ताकि शरीर बीमारियों से बचा रहे। सबसे पहला नियम यह है कि इस पूरी अवधि में तामसिक भोजन का पूरी तरह से त्याग कर देना चाहिए।
किसी भी व्यक्ति को प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा और बासी भोजन का सेवन बिल्कुल नहीं करना चाहिए। इसके अलावा महीनों के अनुसार भी कुछ खास चीजों का परहेज बताया गया है। जैसे सावन के महीने में हरी पत्तेदार सब्जियाँ, पालक या साग आदि खाने से बचना चाहिए, क्योंकि बारिश में इन पत्तों में सूक्ष्म जीव अत्यधिक पनपते हैं जो बीमारियों का कारण बनते हैं।
इसी तरह भाद्रपद के महीने में दही और दही से बने पदार्थों का सेवन वर्जित माना गया है, क्योंकि आयुर्वेद के अनुसार, इस मौसम में शरीर में वात दोष बढ़ता है और दही इसे और बिगाड़ सकता है। आश्विन के महीने में दूध का सेवन करने से बचने की सलाह दी जाती है, जबकि कार्तिक के महीने में मूली, बैंगन, उड़द और चने की दाल खाने से परहेज रखना चाहिए।
एक नियम यह भी है कि चातुर्मास के दौरान बिना किसी विशेष और अनिवार्य कारण के दूसरों के घर का अन्न ग्रहण करने से बचना चाहिए। सात्विक और सुपाच्य भोजन करने से हमारा स्वास्थ्य तो बेहतर होता ही है, साथ ही ध्यान और पूजा में भी मन लगता है।
मन, वाणी और शरीर का शोधन: चातुर्मास में कैसा हो आपका आचरण?
चातुर्मास मुख्य रूप से अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखने, संयम बरतने और आत्मचिंतन करने का समय है। इस दौरान जो साधक और व्रती नियम-धर्म का पालन करते हैं, उनके लिए आचरण संबंधी कई विशेष दिशा-निर्देश बनाए गए हैं। इन नियमों का पालन करने से अपार मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा की प्राप्ति होती है।
जो लोग चातुर्मास में विशेष व्रत, उपवास और साधना करते हैं, उन्हें शय्या त्याग का नियम अपनाना चाहिए। इसका अर्थ है कि उन्हें आरामदायक पलंग या गद्दे पर सोने के बजाय जमीन पर चटाई बिछाकर सोना चाहिए। इससे शरीर में अनुशासन आता है और अहंकार का नाश होता है।
इन चार महीनों तक ब्रह्मचर्य का पालन करना भी अत्यंत शुभ और जीवनदायी माना गया है। इसके अलावा सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इंसान को अपनी वाणी और अपने विचारों पर पूरा नियंत्रण रखना चाहिए। इस पवित्र समय में किसी पर भी अकारण गुस्सा करना, झूठ बोलना, किसी की बुराई करना या किसी का अपमान करना महापाप की श्रेणी में रखा गया है।
प्राचीन काल में वर्षा ऋतु में रास्ते खराब होने और नदियों के उफान पर होने के कारण साधु-संतों का भ्रमण करना संभव नहीं हो पाता था। इसलिए वे एक ही स्थान पर ठहरकर अपनी साधना करते थे और आम जनता को धर्मोपदेश देते थे।
आज भी उसी प्राचीन परंपरा का निर्वहन करते हुए लोगों को घरों और मंदिरों में रामायण, श्रीमद्भागवत कथा, भगवद्गीता का नियमित अध्ययन और सत्संग करना चाहिए, ताकि मन बुरे विचारों से दूर रहे।
अक्षय पुण्य की चाबी: छोटे-छोटे उपायों से बदलें अपना भाग्य
चातुर्मास का समय केवल परहेज करने या खाली बैठने का नहीं है, बल्कि यह अपने जीवन को एक नई और सकारात्मक दिशा देने का बेहतरीन अवसर है। इस दौरान किए गए छोटे-छोटे धार्मिक और परोपकारी कार्य भी मनुष्य को अक्षय पुण्य प्रदान करते हैं, जिनका फल जन्म-जन्मांतर तक मिलता है।
आपको इस अवधि में नियमित रूप से अपने इष्टदेव की आराधना करनी चाहिए और भगवान विष्णु तथा भगवान शिव के चमत्कारी मंत्रों का जाप करना चाहिए। इस समय आने वाले एकादशी, प्रदोष, शिवरात्रि, गणेश चतुर्थी और तीज आदि के व्रत पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ रखने चाहिए।
भगवान की पूजा के साथ-साथ सेवा और दान-पुण्य का इस अवधि में विशेष महत्व बताया गया है। आपको अपनी क्षमता के अनुसार भूखे को अन्न, प्यासे को जल, जरूरतमंदों को वस्त्र और मौसम के अनुसार ताज़े फलों का दान करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार, इस समय किए गए दान से जीवन के सभी पापों का नाश होता है और घर में सुख-समृद्धि आती है।
इसके अलावा अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने के लिए आपको नियमित रूप से योग, प्राणायाम और ध्यान का अभ्यास करना चाहिए।
जब आप एक सात्विक और अनुशासित जीवन शैली अपनाकर दूसरों की सेवा करते हैं और ईश्वर का ध्यान करते हैं, तो आपके भीतर एक नई आध्यात्मिक चेतना का विकास होता है। इसी चेतना और निस्वार्थ सेवा भाव के कारण मनुष्य सच्चे अर्थों में ईश्वरीय कृपा का पात्र बनता है।
चातुर्मास का यह लंबा समय ईश्वर की भक्ति, शरीर की शुद्धि और मन के संयम का एक बहुत ही दुर्लभ और अद्भुत संगम है, जिसे पूरी पवित्रता के साथ जीना चाहिए।
उत्तर प्रदेश के बदायूँ में बेटे के इलाज का दावा कर एक परिवार का भरोसा जीतने वाले मौलाना शाकिर हुसैन को अदालत ने एक महिला और उसकी नाबालिग बेटी को अगवा कर तीन महीने तक बंधक बनाकर रखने, महिला से बार-बार दुष्कर्म करने और दोनों पर जबरन धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने के मामले में दोषी ठहराया है। विशेष फास्ट ट्रैक कोर्ट (महिलाओं के विरुद्ध अपराध) की न्यायाधीश नेहा गर्ग ने दोषी को विभिन्न धाराओं में 10 वर्ष की सजा सुनाई है। यह बदायूँ में उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के तहत सजा का पहला मामला है।
अदालत ने 20 जुलाई 2026 को सुनाए गए अपने फैसले में शाकिर हुसैन को धर्मांतरण कानून के तहत 5 वर्ष के कठोर कारावास और ₹50,000 जुर्माने की सजा दी। इसके अलावा अपहरण, अवैध बंधक बनाकर रखने, दुष्कर्म और अन्य अपराधों में भी उसे दोषी ठहराया गया। दुष्कर्म के मामले में उसे 10 वर्ष के कठोर कारावास और ₹50,000 जुर्माने की सजा सुनाई गई। अदालत ने निर्देश दिया कि सभी सजाएँ साथ-साथ चलेंगी। जुर्माना अदा न करने पर अतिरिक्त कारावास भी भुगतना होगा।
क्या है पूरा मामला?
मामले के अनुसार, पीड़िता 21 मार्च 2025 की सुबह करीब 9 बजे अपनी 10 वर्षीय बेटी के साथ घर से निकली थीं। इसके बाद दोनों वापस नहीं लौटीं। परिवार ने कई दिनों तक दोनों की तलाश की लेकिन उनका कोई पता नहीं चला। इसके बाद 27 मार्च 2025 को पीड़िता के पति ने बिल्सी थाने में पत्नी और बेटी की गुमशुदगी दर्ज कराई। इसके बाद भी वह खुद दोनों की तलाश करते रहे।
तलाश के दौरान उन्हें शक हुआ कि गाँव गढ़ी रिसौली का रहने वाला शाकिर हुसैन मौलाना उनकी पत्नी और बेटी को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया है। इसी आधार पर उन्होंने पुलिस को तहरीर दी। इसके बाद 27 मई 2025 को शाकिर हुसैन के खिलाफ केस दर्ज किया गया।
पीड़िता और उनकी बेटी के अनुसार, परिवार का सबसे बड़ा बेटा राजकुमार मंदबुद्धि थ और उसके इलाज के लिए उन्होंने कई डॉक्टरों को दिखाया था लेकिन कोई खास फायदा नहीं हुआ।
इसी दौरान उन्हें जानकारी मिली कि रिसौली में शाकिर हुसैन नाम का एक मौलवी इलाज करता है। इसके बाद महिला अपने बेटे को लेकर उसके पास गईं। इलाज के बहाने शाकिर हुसैन का उनके घर आना-जाना शुरू हो गया और इसी दौरान उसने परिवार का विश्वास जीत लिया।
21 मार्च 2025 को जब पीड़िता अपनी बेटी के साथ मायके जाने के लिए निकलीं तब रास्ते में बिसौली मोड़ पर शाकिर हुसैन मिला। आरोप है कि उसने दोनों को बहला-फुसलाकर अपनी मोटरसाइकिल पर बैठाया और सीधे कासगंज जिले के सिढ़पुरा ले गया।
अभियोजन और पीड़िता के बयान के अनुसार, सिढ़पुरा पहुँचने के बाद शाकिर हुसैन ने माँ-बेटी को एक घर में बंद कर दिया। इसके बाद उसने पीड़िता पर मुस्लिम धर्म अपनाने का दबाव बनाना शुरू कर दिया। पीड़िता ने अदालत को बताया कि शाकिर ने कई बार उसके साथ रेप किया। जब उसने विरोध किया तो शाकिर ने उसकी बेटी को जान से मारने की धमकी दी।
पीड़िता के अनुसार, करीब तीन महीने तक दोनों को उसी घर में बंद रखा गया। इस दौरान उन्हें जबरन नमाज पढ़ाई जाती थी। बेटी को शाकिर को ‘अब्बू’ और माँ को ‘अम्मी’ कहने के लिए मजबूर किया जाता था। विरोध करने पर उनके साथ मारपीट तक की जाती थी।
पीड़िता ने यह भी बताया कि उसके हाथ पर उसका और उसके भाई का नाम गुदा हुआ था। शाकिर ने उस टैटू को मिटाने के लिए उस पर जहरीली दवा लगा दी और इससे हाथ की खाल उधड़ गई और वहाँ घाव हो गया। आरोपित लगातार उस पर निकाह करने का दबाव भी बनाता रहा। पीड़िता ने बताया कि जब भी शाकिर हुसैन घर से बाहर जाता था तो वह बाहर से ताला लगाकर जाता था ताकि माँ-बेटी वहाँ से भाग न सकें।
आखिरकार एक दिन वह माँ-बेटी को बस में बैठाकर कहीं और ले जा रहा था। इसी दौरान पुलिस दिखाई दी तो वह दोनों को छोड़कर मौके से भाग गया। इसके बाद पुलिस माँ-बेटी को अपने साथ थाने ले आई।
पुलिस जाँच में क्या सामने आया?
मामले की जाँच उपनिरीक्षक रामेहर सिंह ने की। उन्होंने वादी, पीड़िता और अन्य लोगों के बयान दर्ज किए। घटनास्थल का निरीक्षण किया गया और मेडिकल रिपोर्ट सहित अन्य साक्ष्य जुटाए गए। पीड़िता और उसकी बेटी के बयान धारा 164 सीआरपीसी के तहत दर्ज किए गए।
जांच के दौरान मामले में धारा 351(3), 127(4), 64(2)(m) बीएनएस और उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/5(3) भी जोड़ी गई। 27 जून 2025 को माँ-बेटी को बरामद कर उनका मेडिकल परीक्षण कराया गया। इसके अगले दिन यानी 28 जून 2025 को शाकिर हुसैन को गिरफ्तार कर लिया गया।
विवेचना पूरी होने के बाद चार्जशीट अदालत में दाखिल की गई। बाद में 2 सितंबर 2025 को अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय संख्या-2, बदायूँ ने मामले का संज्ञान लिया और इसे सत्र न्यायालय भेज दिया। 18 नवंबर 2025 को आरोपित के खिलाफ आरोप तय किए गए लेकिन उसने खुद को निर्दोष बताते हुए मुकदमे का सामना करने की बात कही।
मेडिकल जाँच में क्या मिला?
पीड़िता का मेडिकल करने वाली डॉक्टर ने अदालत को बताया कि पीड़िता के दाहिने हाथ पर कोहनी और कलाई के बीच लगभग 6×4 सेंटीमीटर का घाव था। मेडिकल जाँच में हाइमन अनुपस्थित मिला और योनि मार्ग से सफेद स्राव भी पाया गया।
DNA जाँच के लिए सैंपल लिए गए और गर्भावस्था की जाँच कराने की सलाह दी गई। बाद में यूपीटी (यूरिन प्रेगनेंसी टेस्ट) रिपोर्ट पॉजिटिव आई।
इसके बाद डॉ. इंद्रकांत वर्मा ने अल्ट्रासाउंड किया जिसमें पता चला कि पीड़िता करीब छह सप्ताह 5 दिन की गर्भवती थी। रिपोर्ट में यह भी दर्ज था कि भ्रूण में अभी धड़कन शुरू नहीं हुई थी। वहीं, नाबालिग बेटी के मेडिकल परीक्षण में हाइमन सुरक्षित मिला और उसके शरीर पर किसी तरह की चोट नहीं पाई गई।
अदालत ने क्या कहा?
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सभी गवाहों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद अदालत ने कहा कि पीड़िता, उसकी बेटी और वादी के बयानों में पूरी तरह समानता है। जिरह के दौरान भी ऐसा कोई विरोधाभास सामने नहीं आया जिससे उनकी बातों पर संदेह किया जा सके।
अदालत ने कहा कि यदि दुष्कर्म पीड़िता का बयान भरोसेमंद है तो केवल उसी के आधार पर भी दोषसिद्धि की जा सकती है और हर मामले में अतिरिक्त पुष्टि जरूरी नहीं होती। अदालत ने यह भी माना कि पीड़िता की गर्भावस्था की अवधि उसी समय से मेल खाती है, जब वह आरोपित की अवैध हिरासत में थी।
20 जुलाई 2026 को सजा के बिंदु पर सुनवाई हुई। अदालत ने शाकिर हुसैन को विभिन्न धाराओं में दोषी ठहराते हुए यह सजा सुनाई है। धारा 137(2) बीएनएस के तहत 5 वर्ष, धारा 87 बीएनएस के तहत 7 वर्ष, धारा 351(3) बीएनएस के तहत 5 वर्ष, धारा 127(4) बीएनएस के तहत 3 वर्ष, धारा 64(2)(m) बीएनएस (रेप) के तहत 10 वर्ष और उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/5(1) के तहत 5 वर्ष की सजा सुनाई गई है।
अदालत ने यह भी आदेश दिया कि यदि दोषी जुर्माना जमा नहीं करता है तो उसे अतिरिक्त साधारण कारावास भुगतना होगा। साथ ही, सभी सजाएँ एक साथ चलेंगी और जेल में पहले से बिताई गई अवधि को सजा में समायोजित किया जाएगा। अदालत ने दोषी को बदायूँ जेल भेजने के निर्देश दे दिए हैं।
भारतीय संविधान में नागरिकों को अपनी राय प्रकट करने की आजादी है?
NEET की परीक्षा देने वाले विद्यार्थी 10वीं कक्षा तक नागरिक शास्त्र की पढ़ाई करते हैं। यह ऐच्छिक विषय नहीं है, अनिवार्य होता है। इसमें मोटा-मोटी तौर पर नागरिकों के कर्तव्य-अधिकार, लोकतंत्र की परिभाषा, सरकार के कर्तव्य-अधिकार, सरकारी अंगों की मूलभूत बातें आदि-इत्यादि पढ़ाई जाती है। ऊपर के तमाम प्रश्नों का उत्तर पढ़ाई करके 10वीं पास किया कोई भी विद्यार्थी ‘हाँ’ में देगा।
इसी ‘हाँ’ के कारण NEET पेपर लीक मामले को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शन शुरू हुए। शुरुआती दिनों में जमीन पर संख्या दहाई से लेकर सैकड़ा तक रही होगी। लेकिन ऑनलाइन हलचल थी, इसको नकारा नहीं जा सकता। CJP मतलब कॉकरोच जनता पार्टी ने ऑनलाइन मुजस्समा गढ़ने में सफलता तो पाई थी। कुछ दिन ऐसे ही चला। विरोध-प्रदर्शन के दिन तो बढ़ रहे थे लेकिन जमीनी जोश थमा हुआ सा था। फिर एंट्री होती है सोनम वांगचुक की।
जंतर-मंतर की कॉन्क्रिट-तारकोल वाली जमीन को इसी सोनम वांगचुक की उपस्थिति से खाद-पानी मिलनी शुरू होती है। इस शख्स के जुड़ने से पहले क्या दिल्ली, क्या लखनऊ और जयपुर – हर जगह कॉकरोच जनता पार्टी के साथ कॉकरोच और पार्टी तो थी, नदारद थी तो जनता। भ्रम ही सही लेकिन सोनम वांगचुक की कायदे से गढ़ी गई छवि का फायदा कॉकरोच पार्टी को मिला। इस शख्स के आमरण अनशन ने विरोध-प्रदर्शन में जान फूँक दी। जैसे-जैसे दिन बीतते गए, जनता इससे खुद को कनेक्ट करती गई।
अब आते हैं मूल प्रश्न पर। आखिर यह विरोध-प्रदर्शन किया क्यों गया? क्योंकि NEET की परीक्षा का प्रश्न-पत्र लीक हो गया था। जिन विद्यार्थियों के पेपर अच्छे गए होंगे, निश्चित तौर पर वो और उनके सगे-संबंधी गुस्से में होंगे। मेरा तो मानना है कि सिर्फ सगे-संबंधी ही क्यों? तंत्र में अगर खामी है तो गुस्सा पूरे लोक को होना चाहिए, उससे जुड़े सवाल भी सामूहिक लोक स्तर पर पूछे जाने चाहिए। नागरिक शास्त्र की किताबों में भी यही पढ़ाया गया है। संविधान में ऐसा करने की आजादी भी दी गई है।
कॉकरोच पार्टी ने बिल्कुल सही किया। विद्यार्थियों के लिए सरकारी तंत्र सही से काम करे, सोनम वांगचुक ने कॉकरोच मंच से आमरण अनशन करके कुछ भी गलत नहीं किया। भारतीय नागरिकों को विरोध-प्रदर्शन करने के लिए किसी दूसरे देश से सीखने की आवश्यकता नहीं। सविनय अवज्ञा आंदोलन, असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह, दांडी मार्च – तमाम ऐसे उदाहरण हमारी ही धरा पर पुष्पित-पल्लवित हुए हैं।
जब किसी ने कुछ गलत ही नहीं किया, तो गलती हुई कहाँ? विरोध-प्रदर्शन NEET के परीक्षार्थियों के हित में की जा रही थी, फिर हिंसा-पत्थरबाजी-महिलाओं से बदसलूकी-अश्लील गालियाँ-नारेबाजी की खबरें क्यों?
कॉकरोच मंच पर आमरण अनशन कर रहे सोनम वांगचुक के रहते हुए विरोध-प्रदर्शन नियंत्रित था, दिशा-निर्देशित था। लेकिन उनके बिगड़ते स्वास्थ्य को देखते हुए जब उन्हें अस्पताल ले जाया गया तो चीजें धीरे-धीरे भीड़तंत्र में बदल गई। फिर शुरू हुआ भीड़ के राजनीतिकरण की प्रक्रिया। कॉकरोचों को पता ही नहीं चला कि कब उनके नीचे की जमीन पर बैटिंग कोई और कर रहा है, और वो भी उस खेल में शामिल हो गए।
सोनम वांगचुक को अस्पताल में एकांत मिला। वो सोच-समझ पा रहे थे। राजनीतिक कुचक्र से दूर थे। इसके विपरीत कॉकरोच जिस शोरगुल को अपनी जीत समझ रहे थे, वही उनका सबसे बड़ा मेंटल ब्लॉक था। दोनों की सोच का अंतर आप नीचे देख सकते हैं:
वांगचुक ने NEET परीक्षा-तंत्र को लीक-प्रूफ बनाने, पेपर लीक की घटना के कारण आत्महत्या किए बच्चों को उचित मुआवजा देने, जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण विरोध कर रहे छात्र-छात्राओं के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई या FIR नहीं आदि के आश्वासन पर अपना अनशन तोड़ा। उनको मनाने के लिए सिर्फ सरकार नहीं बल्कि अलग-अलग राजनीतिक दलों के लगभग 65 सांसद गए थे। यह है भारत का लोकतंत्र और इसमें विश्वास करने वालों की कहानी।
कॉकरोच जिसकी न कोई पार्टी है, न जनता का साथ है – उनका स्टैंड बहुत क्लियर है – शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा। सरकार NEET परीक्षार्थियों के हित के लिए चाहे जो भी फैसले ले, उन फैसलों पर आपके अगुआ रहे वांगचुक की सहमति भी आ गई है – लेकिन शिक्षा मंत्री का इस्तीफा लेकर रहेंगे। यह तंत्र को सही करने की माँग के बजाय जिद की बैटिंग है, जिसकी पिच तैयार की है राहुल गाँधी ने, आम आदमी पार्टी ने, अखिलेश यादव ने… और उन सबने, जिसे भारतीय लोकतंत्र पर विश्वास नहीं।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद घाटे में कौन रहेगा? राहुल गाँधी या केजरीवाल? समाजवादी पार्टी या कॉन्ग्रेस? या कॉकरोच पार्टी? सरकार का एक तंत्र इस विषय पर काम कर रहा होगा कि आने वाले समय में राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा को कैसे और लीकप्रूफ/व्यवस्थित बनाया जाए। लेकिन उसी समय सरकार का दूसरा तंत्र इस पर काम कर रहा होगा कि विरोध-प्रदर्शन के नाम पर किन-किन ने हिंसा की। जरा सोचिए, लंबे कानूनी पचड़ों में कौन फँसेगा?
1.लोकतंत्र सही से काम करे, इसके लिए मैं शांतिप्रिय और अहिंसक भीड़ जमा करूँगा, प्रेशर ग्रुप बनाऊँगा… ऐसा करके मैं शत-प्रतिशत सही भी हूँ। 2. लोकतंत्र को जो मैं कहूँ, वही करना होगा… मैं भीड़ भी जमा करूँगा, वो हिंसा करे या महिलाओं से बदसलूकी – मैं अपनी बात मनवा कर रहूँगा।
ऊपर के दोनों वाक्यों में धागे भर का फर्क है। धागे के इधर और उधर का फर्क हम सबको पता है।
रामपुर विकास प्राधिकरण द्वारा जौहर यूनिवर्सिटी के 38 भवनों को अवैध बताए जाने के बाद आजम खान की चर्चा एक बार फिर लोगों की जुबान पर है। आजम खान पर सपा सरकार में मंत्री रहते हुए सरकारी धन के दुरुपयोग के आरोप लगते रहे हैं। इनमें एक आरोप है कि आजम खान ने व्यक्तिगत लाभ के लिए जौहर यूनिवर्सिटी तक करीब ₹150 करोड़ की लागत से फ्लाइओवर का निर्माण कराया था।
यहाँ तक कि इसके लिए गाँव की गरीब किसानों और मजदूरों से आजम खान ने कम दामों में जमीन लेकर उनसे जबरन रजिस्ट्री कराईं थीं। इसी की सच्चाई जानने के लिए ऑपइंडिया के रिपोर्टर केशव मालान रामपुर के उस एकता तिराहे पर पहुँचे, जहाँ से शुरू हुआ 5 किलोमीटर लंबा फ्लाईओवर जौहर यूनिवर्सिटी के पिछले गेट पर जाकर समाप्त होता है। इसी एकता तिराहे से कुछ दूरी पर ही आजम खान का शहर में अपना पैतृक मकान है। यह बात अलग है कि इसी पैतृक मकान के सामने बनी रामपुर की जेल में वह कई वर्षों से बंद है।
बहरहाल, हम फ्लाईओवर से जौहर यूनिवर्सिटी तक पहुँचे। इस बीच हमने देखा कि फ्लाईओवर के दोनों और घने जंगल है और आम के बाग हैं, जिसे देखकर लगता है कि फ्लाइओवर के निर्माण के लिए हजारों बड़े पेड़ों को काटकर लाखों छोटे पेड़ों को कुचला गया होगा। रामपुर की व्यस्त सड़कों के उलट इस फ्लाईओवर पर सन्नाटा पसरा हुआ है। हैरानी इस बात की है कि यह फ्लाइओवर न तो किसी रेलवे लाइन को क्रॉस करता है न किसी नदी-नाले को और ना ही किसी सिक्स लाइन-फोर लाइन हाईवे या फिर ये किसी 2 लाइन रोड को भी क्रॉस नहीं करता।
यह फ्लाईओवर किसी बड़ी सड़क, गाँव या शहर को भी नहीं जोड़ता और न ही यह फ्लाईओवर रामपुर शहर के किसी ट्रैफिक को कंट्रोल करता है। इसके नीचे से सिर्फ दो छोटे लिंक रोड क्रॉस करते हैं, जो उन गाँवों को जाते हैं, जिन गाँवों के लोगों ने इस फ्लाईओवर के लिए आजम खान को अपनी जमीन दी थी। फ्लाईओवर पर खड़े एक व्यक्ति ने बताया कि इस फ्लाईओवर पर वाहनों की कोई भीड़ नहीं रहती है, बस यूनिवर्सिटी वाले छात्र ही यहाँ से होकर जाते हैं। इससे ज्यादातर लोगों को कोई फायदा नहीं है।
कौड़ियों के भाव ले ली हमारी जमीन: ग्रामीण
फ्लाइओवर से नीचे उतरने के बाद गाँव से पहले एक आम के बाग में काम कर रही कुछ महिलाओं से जब हमने आजम खान के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा हम उन्हें जानते तो हैं, लेकिन उन्हें कभी देखा नहीं है क्योंकि वह हमारे गाँव कभी नहीं आए। कमलेश नाम की महिला ने बताया कि हमारे पास सिर्फ चार बीघा ही जमीन थी। उसमें भी होकर पुल का निर्माण हो गया। अब वह किसी काम के लायक नहीं है। हमारी कीमती जमीन को कौड़ियों के भाव ले लिया गया। उन्होंने कहा कि हम अपनी जमीन नहीं देना चाहते थे, लेकिन हम गरीब लोग हैं। आखिर क्या करते?
उसी बाग में काम कर रहे भगवान दास बताते हैं कि इस पुल को जबरन बनाया गया था। हमने मजबूरी में अपनी जमीन दी। नहीं तो वह (आजम खान) हमें जेल में बंद करवा देते। उनसे फ्लाईओवर के निकलने से लाभ के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि इस फ्लाईओवर से हमें कोई लाभ नहीं हुआ। अगर फ्लाईओवर की जगह नीचे से रोड़ बनाया गया होता तो शायद हमारे गाँव, क्षेत्र का विकास होता और हमें वहाँ पर मकान, दुकान या फिर कोई व्यवसाय करने का मौका मिलता, लेकिन सच्चाई यही है कि आजम खान ने इसे सिर्फ अपने लाभ के लिए बनवाया था।
वह आगे कहते हैं कि उस समय आजम खान का लठ्ठ (दबदबा) चल रहा था, लेकिन अब उनकी दादागिरी बंद हो गई। उन्होंने जैसा किया वैसा ही वह भुगत रहे हैं। कुछ लोगों ने ऑफ कैमरा हमें बताया कि आजम खान ने इस फ्लाईओवर का निर्माण सिर्फ इसलिए कराया था, ताकि वह अपने घर से निकलकर बिना किसी जाम में फंसे सीधे ‘अपनी’ यूनिवर्सिटी तक पहुँच सकें।
जबरन कराई गई थी रजिस्ट्री: पीड़ित ग्रामीण
ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट टीम इस पुल के नीचे मौजूद किशनपुर गाँव पहुँची। फ्लाईओवर बनने से लाभ के बारे में पूछने पर दिनेश नाम के व्यक्ति कहते हैं कि हमारी जमीन तो इसमें नहीं गई, लेकिन इस फ्लाईओवर के बगल में हमारा मकान है। इसके बनने से हमें आज तक कोई लाभ नहीं हुआ बल्कि नुकसान ही हुआ है। नीचे रोड बनता तो शायद हमें कुछ इसका लाभ मिलता।
ग्रामीणों के मुताबिक, उस समय लोगों से कहा गया था कि पुल के नीचे भी रोड बनेगा, जिससे ग्रामीण खुश थे लेकिन आज तक ऐसा नहीं हो सका। उन्होंने यह बहुत गलत काम किया। इस बीच घूँघट लगाकर रास्ते से गुजर रहीं दो महिलाओं ने भी इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि उन्होंने कोई अच्छा काम नहीं किया।
गाँव के ही उम्मेद सिंह बताते हैं कि हमारी जमीन फ्लाईओवर के निर्माण में गई थी, लेकिन इससे हमें कोई लाभ नहीं मिला। हमसे जबरन रजिस्ट्री कराई गई थी। उन्होंने कहा कि कानूनगो और तहसीलदार घर पर आ गए थे। इसके बाद हमें रजिस्ट्री ‘करनी’ पड़ी। स्कूल को आजम खान ने अपनी यूनिवर्सिटी के लिए बनवाया था और इसमें निर्माण के नाम पर करोड़ों रुपए का घोटाला किया गया।
उम्मेद सिंह कहते हैं कि मैं उस समय ऑटो चलाता था। आरटीओ में मौजूद एक यादव समाज के अधिकारी हमसे मोटी रकम वसूलते थे। पूछने पर रहते थे कि इसका 40% पैसा हिस्सा जौहर यूनिवर्सिटी को जाता है। यह सब आजम खान के इशारे पर होता था। आजम खान ने सपा सरकार में हमारे ऊपर बहुत जुल्म किए हैं और हमेशा ही रामपुर की जनता को सताया है, लेकिन आज उनको किए की सजा मिल रही है। योगी सरकार में सभी सही काम हो रहा है।
आपको बता दें कि रामपुर के जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े इस 5 किलोमीटर लंबे फ्लाईओवर का निर्माण साल 2013-14 में करीब ₹150 करोड़ की लागत से कराया गया था। ये फ्लाईओवर अपने निर्माण के समय से ही विवादों के घेरे में है। लोगों का साफ कहना है कि ये फ्लाईओवर सिर्फ और सिर्फ आजम खान की खुदगर्जी की वजह से बना, जिसका फायदा स्थानीय लोगों को शायद ही हुआ हो। उन्हें तो सिर्फ नुकसान हुआ, क्योंकि उनकी जमीनें भी कौड़ियों के दाम ले ली गई और उन्हें इसके इस्तेमाल का कुछ खास फायदा भी नहीं है, क्योंकि इसका इस्तेमाल भी सिर्फ यूनिवर्सिटी आने-जाने के लिए ही होता है।
बिहार के गोपालगंज से एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है। यहाँ एक पिता ने UP के कुशीनगर के रहने वाले जुनैद अंसारी नामक युवक पर अपनी नाबालिग हिंदू बेटी का अपहरण करने का गंभीर आरोप लगाया है। पिता को यहाँ तक डर है कि जुनैद अंसारी उनकी बेटी के साथ जबरन निकाह कर सकता है और उसकी मानव तस्करी कर सकता है। पीड़ित पिता का आरोप है कि उनकी 16 वर्षीय बेटी पिछले कई दिनों से लापता है।
क्या है पूरा मामला?
ऑपइंडिया से बातचीत में पीड़ित पिता ने बताया कि उनकी बड़ी बहन की शादी जुनैद अंसारी के गाँव डुमरिया में हुई थी और वह उनका पड़ोसी था। इसके चलते उसका घर में आना-जाना शुरू हो गया था। पिता का कहना है कि उनकी बेटी भी अपनी बुआ के घर डुमरिया जाती थी और वहाँ उसकी जान-पहचान जुनैद से हो गई थी। वो बताते हैं कि 10 जुलाई 2026 की शाम करीब 7 बजे जुनैद अंसारी उनके घर आया था।
पिता ने आरोप लगाया है कि 11 जुलाई 2026 को सुबह जब वह जागे तो उनकी बेटी घर में नहीं थी। साथ ही, घर में रखे सोने-चाँदी के गहने और करीब 50000 रुपए भी गायब थे। परिजनों ने अपने स्तर पर काफी खोजबीन की लेकिन बेटी का कोई पता नहीं चला।
ऑपइंडिया से बातचीत में पीड़ित पिता ने बताया कि उनकी बहन से जानकारी मिली कि जुनैद अंसारी लगातार उनकी बेटी से मोबाइल पर बातचीत करता था। इसी के बाद परिवार को संदेह हुआ कि जुनैद अंसारी ने उनकी बेटी को बहला-फुसलाकर शादी या मानव तस्करी की नीयत से अगवा किया है।
आरोपित के घर पहुँचने पर क्या हुआ?
बातचीत में पीड़ित ने बताया कि वह अपनी बहन के साथ डुमरिया जाकर जुनैद अंसारी के अब्बू से मिले। शिकायत के अनुसार, पहले तो उसके परिवार ने यह स्वीकार किया कि जुनैद उनके घर आया था, लेकिन बाद में यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि उन्हें नहीं पता वह लड़की को कहाँ लेकर गया है। इसके बाद जुनैद के परिवार ने कहा, “बच्चों की बात है, गलती हो गई है। हम लोग उसको समझा बुझाकर बुलवाकर आपकी बेटी आपके हवाले कर देंगे।”
बातचीत में पीड़िता पिता का कहना है, “जुनैद अंसारी के परिवार ने 2 दिन का समय माँगा लेकिन वो लोग नहीं आए। 14 जुलाई को उन्होंने आने से मना कर दिया।” पीड़ित पिता का कहना है कि जुनैद अंसारी, उसकी अम्मी बेबी खातून और अब्बू बिस्मिल्लाह अंसारी ने मिलकर उनकी बेटी का शादी, मानव तस्करी या रेप करने की नीयत से अपहरण कर लिया है।
वहीं, ऑपइंडिया ने हिंदू नाबालिग के फूफेरे भाई से भी बातचीत की। फूफेरे भाई ने पूरा मामला बताया। उसने कहा कि नाबालिग लड़की पढ़ाई के लिए हमारे यहाँ रहती थी। उसी दौरान उसकी (युवती) पहचान जुनैद अंसारी से हुई। जुनैद अंसारी ने लड़की से बातचीत करने के लिए एक फोन भी दिया था। घर वालों को जब पता चला तो उन्होंने लड़की को समझाने की कोशिश की।
जब युवती नहीं मानी तो उसे उसके पिता के घर भेज दिया गया। फिर जुनैद अंसारी लड़की के पिता के घर पहुँच गया। वहाँ जाकर वे लड़की को भगा ले गया। फूफेरे भाई ने आगे बताया कि लड़की को गायब हुए एक हफ्ते से ज्यादा हो गया है। ना मीडिया ने इस मामले की अब तक सुध ली और पुलिस ने भी एक हफ्ते बाद जाकर FIR दर्ज की। फूफेरे भाई के अनुसार अभी तक बहन का कोई पता नहीं चला है।
पुलिस द्वारा दर्ज FIR में क्या?
FIR कॉपी के मुताबिक, पीड़ित पिता का कहना है कि पुलिस ने कई दिनों तक केस दर्ज नहीं किया और 22 जुलाई 2026 को अंतत: उनकी FIR दर्ज की गई है। पीड़ित पिता ने ऑपइंडिया को बताया कि गोपालपुर थाने की पुलिस भी जुनैद के घर गई थी लेकिन उसके परिवार ने पुलिस को भी अँधेरे में रखा। पहले तो उसका परिवार बेटी को वापस लाने की बात करता रहा और अंत में मुकर गया।
FIR कॉपी की प्रति
पुलिस ने इस मामले में BNS की धारा 137 और 96 के तहत केस दर्ज किया है। भारतीय न्याय संहिता की धारा 137 किडनैपिंग से संंबंधित है और ऐसे मामले में दोषी पाए जाने पर 7 साल की सजा और जुर्माना हो सकता है। वहीं, BNS की धारा 96 18 वर्ष से कम आयु के किसी बच्चे या बच्ची को बहला-फुसलाकर, डरा-धमकाकर एक जगह से ले जाने या ले जाने के लिए प्रेरित करने से जुड़ी है। इस अपराध के लिए 10 साल तक का कारावास और जुर्माना दोनों का प्रावधान है। इस मामले में पुलिस ने अभी तक POCSO नहीं लगाया है।
(ऑपइंडिया ने गोपालगंज पुलिस थाने में बात करने का प्रयास किया। लेकिन ना तो पुलिस थाने का कॉल लगा और ना ही SHO का नंबर लगा। जैसे ही इस मामले में किसी पुलिस अधिकारी से बातचीत होगी। रिपोर्ट को अपडेट कर दिया जाएगा।)
रेगिस्तान की तपती धूप में जहाँ इंसान पानी की एक-एक बूँद सहेजकर रखता है, क्या आप सोच सकते हैं कि उसी मरुस्थल के बीच 500 साल पहले एक ऐसी इमारत खड़ी कर दी गई जिसकी नींव में पानी की जगह हजारों किलो शुद्ध देसी घी इस्तेमाल किया गया था।
पहली बार में यह बात किसी लोककथा या पौराणिक कहानी जैसी लगती है लेकिन राजस्थान के बीकानेर शहर में आज भी यह सच सीना ताने खड़ा है। यहाँ स्थित भांडाशाह जैन मंदिर (भंडासर जैन मंदिर) भारत की सबसे हैरान कर देने वाली ऐतिहासिक इमारतों में शामिल है।
कहा जाता है कि 15वीं सदी में जब बीकानेर पानी के संकट से जूझ रहा था, तब एक अमीर जैन व्यापारी ने 40,000 किलो शुद्ध घी से इस मंदिर का मसाला तैयार करवाया।
86 सालों की कड़ी मेहनत के बाद बनकर तैयार हुआ यह तीन मंजिला मंदिर सिर्फ इस अनोखी किंवदंती के लिए ही नहीं बल्कि अपनी जादुई उस्ता कला (राजस्थान की लोक कला), सोने की पत्ती से बनी पेंटिंग्स और तपती गर्मियों में पत्थरों से घी रिसने के अनसुलझे रहस्य के लिए भी पूरी दुनिया में जाना जाता है।
मंदिर का ऐतिहासिक सफर और निर्माण की अनूठी कहानी
इस अनोखे मंदिर का इतिहास करीब पाँच शताब्दियों पुराना है। बीकानेर शहर को बसाए जाने से लगभग दो दशक पहले, यानी पंद्रहवीं शताब्दी में इस मंदिर के निर्माण का सपना देखा गया था।
श्वेतांबर जैन परंपरा के तहत जैन धर्म के पाँचवें तीर्थंकर भगवान श्री सुमतिनाथ जी को समर्पित इस तीन मंजिला मंदिर की आधारशिला वर्ष 1468 में रखी गई थी। इस भव्य मंदिर का निर्माण बीकानेर के एक बहुत ही धनवान ओसवाल जैन व्यापारी सेठ भांडाशाह ने शुरू करवाया था, जो मुख्य रूप से देशी घी के बड़े कारोबारी थे।
उनके नाम पर ही आगे चलकर इस पावन स्थल का नाम भांडाशाह या भंडासर जैन मंदिर पड़ा। मंदिर के निर्माण में कई दशक का लंबा वक्त लगा। सेठ भांडाशाह के निधन के बाद इस अधूरे सपने को उनकी बेटी ने आगे बढ़ाया और सोलहवीं शताब्दी की शुरुआत में, यानी करीब 1514 से 1554 के बीच इसका कार्य संपन्न कराया।
इस तरह निर्माण कार्य पूरा होने में लगभग 86 साल का लंबा दौर बीता। शुरुआत में इस दिव्य मंदिर को सात मंजिलों तक ऊँचा बनाने का विचार था, लेकिन समय के साथ और परिस्थितियों के बदलाव के कारण इसे तीन मंजिला इमारत का रूप देकर पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित किया गया।
भंडासर जैन मंदिर (फोटो साभार: Etvbharat)
आज यह इमारत बीकानेर शहर के सबसे ऊँचे शिखरों वाले धार्मिक स्थलों में गिनी जाती है, जिसे भारत सरकार द्वारा एक अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक का दर्जा भी प्राप्त है।
नींव में 40 हजार किलो घी के इस्तेमाल की प्रसिद्ध किदवंती
इस मंदिर के निर्माण के पीछे सबसे प्रसिद्ध और रोचक बात इसकी नींव में पानी के बजाय शुद्ध देशी घी का उपयोग किया जाना है। माना जाता है कि जब इस विशाल मंदिर की नींव रखी जा रही थी, तब निर्माण सामग्री का मसाला तैयार करने के लिए पानी की जगह लगभग 40 हजार किलोग्राम शुद्ध देशी घी का इस्तेमाल किया गया था।
चूने, बजरी और अन्य पारंपरिक निर्माण सामग्रियाँ घी के साथ मिलाकर एक ऐसा मिश्रण तैयार किया गया, जिससे इसकी नींव को भरा गया। नींव में घी इस्तेमाल करने के पीछे मुख्य रूप से दो अलग-अलग कहानियाँ जनश्रुतियों में प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार, उस समय बीकानेर और आसपास के रेगिस्तानी इलाके में भयंकर सूखा पड़ा हुआ था।
ऐसे में जल संरक्षण को ध्यान में रखते हुए सेठ भांडाशाह ने पानी की जगह अपने विशाल भंडार से घी का प्रयोग करने का एक अभूतपूर्व निर्णय लिया। वहीं दूसरी बेहद दिलचस्प कहानी एक सामाजिक ताने और ठेकेदार की परीक्षा से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि एक बार जब सेठ अपनी दुकान में बैठे थे, तो घी के बर्तन में एक मक्खी गिरकर मर गई।
सेठ ने उस मक्खी को बाहर निकाला और उस पर लगे घी को अपने जूते पर रगड़कर मक्खी को फेंक दिया। पास ही बैठे मंदिर के ठेकेदार ने यह सब देख लिया। ठेकेदार ने सेठ की परीक्षा लेने के उद्देश्य से सलाह दी कि यदि मंदिर को सदियों तक बेहद मजबूत बनाए रखना है, तो इसके निर्माण की नींव में पानी की जगह घी मिलाना चाहिए।
सेठ भांडाशाह ने इस बात को एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया और तुरंत हजारों किलो घी का प्रबंध कर नींव में डलवाना शुरू कर दिया। ठेकेदार अपनी चाल पर शर्मिंदा हुआ और कहा कि वह तो केवल परीक्षा ले रहा था, लेकिन सेठ ने कहा कि जो घी भगवान के नाम पर समर्पित हो चुका है, उसका उपयोग अब केवल मंदिर की नींव में ही होगा।
भंडासर जैन मंदिर के फर्श पर गर्मी के मौसम में उभर आती है चिकनाई (फोटो साभार: Etvbharat)
नींव की बनावट का ढाँचा और फर्श से निकलते घी का अनोखा रहस्य
इस पौराणिक इमारत की नींव का ढाँचा केवल सतह तक सीमित नहीं है बल्कि इसके नीचे स्थापत्य कला का एक गहरा और विशाल तंत्र छुपा हुआ है। स्थानीय कहावतों और परंपराओं के अनुसार, इस मंदिर की नींव इतनी गहरी और विशाल बनाई गई है कि उसकी गहराई लगभग चार हाथियों की ऊँचाई के बराबर है।
पूरी पहाड़ी पर उस दौर में उपलब्ध चूने के पत्थरों और विशेष मिश्रण की परतें जमाकर इसे अत्यंत मजबूती के साथ तैयार किया गया था। इस नींव की सबसे बड़ी पहेली और चमत्कार यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं तथा पर्यटकों को गर्मियों के मौसम में देखने को मिलता है।
बीकानेर में जब भीषण गर्मी पड़ती है और पारा 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुँच जाता है, तब मंदिर की प्राचीन पत्थरों वाली ऊपरी सतह और फर्श पर अजीब सी चिकनाहट दिखाई देने लगती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो तपती धूप में जमीन के नीचे सदियों से जमा हुआ वह प्राचीन घी पिघलकर पत्थरों की दरारों से बाहर आ रहा हो।
फर्श की यह चिकनाहट आज भी लोगों को अचंभित कर देती है। स्थानीय निवासी और श्रद्धालु इसे स्पष्ट रूप से नींव में मिलाए गए 40 हजार किलो घी का ही असर मानते हैं। हालाँकि इतिहासकारों और वैज्ञानिकों का दृष्टिकोण इस मामले में थोड़ा व्यावहारिक है।
इतिहासकारों का मानना है कि लिखित सरकारी अभिलेखों में नींव में घी डाले जाने का कोई प्रत्यक्ष सबूत मौजूद नहीं है, लेकिन लोकपरंपराओं को लिखित प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। वैज्ञानिक रूप से भी फर्श से घी निकलने की बात पर कोई अंतिम या निर्णायक शोध पूरा नहीं हुआ है, फिर भी यह रहस्य मंदिर की पहचान का एक अविभाज्य अंग बन चुका है।
(फोटो साभार: Etvbharat)
उत्कृष्ट नक्काशी, उस्ता कला और मनमोहक आंतरिक कारीगरी
यदि नींव की कहानियों से हटकर मंदिर के भीतर कदम रखा जाए, तो यहाँ की वास्तुकला और कलात्मक सौंदर्य किसी का भी मन मोह लेता है। यह मंदिर केवल घी की कहानी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अपने जमाने की बेहतरीन स्थापत्य कला का एक जीवंत नमूना है।
मंदिर के निर्माण में जैसलमेर के प्रसिद्ध पीले पत्थरों, लाल बलुआ पत्थरों और कीमती इटैलियन मार्बल का बेहद संतुलित और नायाब उपयोग किया गया है। मंदिर का हर कोना, हर खंभा और हर दीवार किसी कुशल चित्रकार के कैनवास की तरह नजर आती है। इसकी तीन मंजिलों में चारों तरफ बेहद बारीक नक्काशी की गई है।
खंभों पर सुंदर फूलों के पैटर्न उकेरे गए हैं, जबकि छतों पर जटिल ज्यामितीय आकृतियाँ और बारीक शीशों का काम देखने को मिलता है, जो रोशनी पड़ते ही चमक उठते हैं। मंदिर की अंदरूनी छतों और दीवारों पर सोने की पत्तियों से बनाई गई पेंटिंग्स और भव्य चित्र बने हुए हैं।
मंदिर की अद्भुत सजावट में दिखाई देता है बीकानेर की सुप्रसिद्ध उस्ता कला के महान कारीगरों का अभूतपूर्व योगदान (फोटो साभार: Zee News)
इन चित्रों में जैन धर्म के सभी 24 तीर्थंकरों के जीवन चरित्र, धार्मिक कथाओं, तत्कालीन युद्धों और ऐतिहासिक घटनाओं का बड़ा ही सजीव चित्रण किया गया है। विशेष रूप से मंदिर के सबसे ऊँचे गुंबद में बने 16 चित्र तीर्थंकरों की पूरी जीवन यात्रा को खूबसूरती से बयां करते हैं।
इस अद्भुत सजावट में बीकानेर की सुप्रसिद्ध उस्ता कला के महान कारीगरों का अभूतपूर्व योगदान दिखाई देता है, जिनकी कला कभी राजमहलों की शान हुआ करती थी। दीवारों पर की गई यह बारीक नक्काशी, शीशे की जड़ाई और रंगों का संयोजन ऐसा प्रतीत कराता है मानो कोई प्राचीन चित्रित ग्रंथ अचानक जीवंत हो उठा हो।
बीकानेर का गौरव और वैश्विक पटल पर आकर्षण का केंद्र
अपनी इसी अनोखी नींव, अकल्पनीय कहानियों और बेजोड़ वास्तुकला के कारण भांडाशाह जैन मंदिर बीकानेर शहर की सांस्कृतिक पहचान का एक मुख्य प्रतीक बन गया है। ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो राव बीकाजी द्वारा बसाए गए बीकानेर शहर ने अपने सदियों लंबे सफर में स्थापत्य कला के कई बड़े मुकाम हासिल किए हैं।
इनमें प्रसिद्ध जूनागढ़ किला और रामपुरिया हवेलियाँ शामिल हैं लेकिन यह मंदिर अपनी प्राचीनता के कारण सबसे अलग चमकता है। मंदिर की तीसरी और सबसे ऊपरी मंजिल पर खड़े होकर देखने पर पूरे बीकानेर शहर का एक बेहद खूबसूरत और विहंगम नजारा साफ दिखाई देता है।
देश के अलग-अलग राज्यों से आने वाले लोग हों या फिर विदेशों से आने वाले सैलानी, हर कोई इस इमारत की भव्यता, ऊँचाई और इसके पीछे छिपी हजारों किलो घी की कहानी को जानकर हैरान रह जाता है। पर्यटक यहाँ आकर इसकी शानदार नक्काशी के सामने तस्वीरें खिंचवाना और इसकी बारीक कारीगरी को निहारना कभी नहीं भूलते।
भले ही नींव में घी होने की बात को कुछ लोग केवल एक पुरानी लोकपरंपरा मानते हों और कुछ इसे एक सच्चा ऐतिहासिक तथ्य लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस कहानी ने मंदिर को एक अमर पहचान दी है।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध प्रदर्शन में पिछले 4 दिनों से लगातार हिंसा की खबरें सामने आ रही हैं। इसी बीच दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) ने अपने छात्रों के लिए एडवाइजरी जारी की है। दोनों यूनिवर्सिटी ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए कहा कि छात्र और शिक्षक जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शन में शामिल न हों और वहाँ जाने से भी बचें।
इससे पहले एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज (AIU) ने भी सभी यूनिवर्सिटी को एडवाइजरी भेजी, जिसमें छात्रों से पढ़ाई पर ध्यान देने और अपनी ऊर्जा किसी और दिशा में न लगाने की सलाह दी गई।
छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जारी की गई इन एडवाइजरी के बाद नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी और आरफा खानुम शेरवानी जैसे तथाकथित पत्रकारों को परेशानी हो गई। जहाँ राहुल गाँधी ने इन यूनिवर्सिटीज को छात्रों को रोकने के लिए धमकाया है, वहीं आरफा खानुम ने छात्रों को ‘वाइस चांसलर के इस्तीफे’ की माँग का नया एजेंडा सौंप दिया है।
यूनिवर्सिटीज की एडवाइजरी में क्या कहा गया?
JNU की एडवाइजरी में लिखा गया है कि यूनिवर्सिटी के सभी शिक्षकों, छात्रों और अन्य सदस्यों को जिम्मेदारी से काम लेना चाहिए और अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए। एडवाइजरी में साफ कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के सार्वजनिक प्रदर्शनों को लेकर दिए गए निर्देशों के मुताबिक, सभी को जंतर-मंतर पर या उसके आसपास होने वाले जमावड़ों में शामिल होने या वहाँ जाने से बचना चाहिए।
Dear students and faculty, your safety matters to us. Please note that any unlawful assemblies or demonstrations at Jantar Mantar, New Delhi, which are strictly regulated as per the directives of the Hon’ble Supreme Court of India, may invite legal action. Such activities can…
साथ ही सोशल मीडिया पर भी जिम्मेदारी से व्यवहार करने की सलाह दी गई है। एडवाइजरी में यह भी लिखा है कि अगर कोई इन नियमों का उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई के साथ साथ यूनिवर्सिटी की आचार संहिता के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई भी हो सकती है। इसके अलावा छात्रों को शैक्षणिक जिम्मेदारी और जिम्मेदार नागरिकता के मूल्यों को बनाए रखने के लिए भी प्रोत्साहित किया गया है।
वहीं DU की एडवाइजरी में कहा गया कि छात्रों और शिक्षकों की सुरक्षा यूनिवर्सिटी के लिए बहुत मायने रखती है। एडवाइजरी में बताया गया है कि जंतर-मंतर पर होने वाली किसी भी गैरकानूनी सभा या प्रदर्शन में शामिल होना सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन माना जाएगा और इससे कानूनी कार्रवाई हो सकती है। साथ ही यह भी कहा गया है कि ऐसी गतिविधियाँ छात्रों की व्यक्तिगत सुरक्षा के साथ साथ उनकी पढ़ाई और आगे के करियर पर भी गंभीर असर डाल सकती हैं।
Dear students and faculty, your safety matters to us. Please note that any unlawful assemblies or demonstrations at Jantar Mantar, New Delhi, which are strictly regulated as per the directives of the Hon’ble Supreme Court of India, may invite legal action. Such activities can…
इसी वजह से सभी छात्रों से जंतर मंतर से दूर रहने और कानून का पालन करते हुए अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता देने की अपील की गई है। इसके अलावा DU ने छात्रों को यह भी सतर्क किया है कि सोशल मीडिया पर इस मामले को लेकर काफी फर्जी और भ्रामक जानकारी फैलाई जा रही है, इसलिए छात्रों को सावधान रहना चाहिए।
AIU ने भी अपनी एडवाइजरी में यही संदेश दोहराया है कि छात्रों को अपनी ऊर्जा पढ़ाई में लगानी चाहिए, न कि किसी और दिशा में भटकानी चाहिए।
राहुल गाँधी और आरफा खानुम को हुई दिक्कत
इन एडवाइजरी के सामने आते ही कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने यूनिवर्सिटी प्रशासन पर सीधा हमला बोला। उन्होंने धमकी देते हुए कहा कि छात्रों को उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल करने से रोकने की हिम्मत कैसे हो सकती है। उन्होंने आगे चेतावनी भरे लहजे में कहा कि जो लोग आज छात्रों को धमका रहे हैं, आने वाले समय में उन्हें भी इसका हिसाब देना होगा।
वहीं तथाकथित पत्रकार आरफा खानुम शेरवानी ने भी यूनिवर्सिटीज की एडवाइजरी का विरोध किया। आरफा ने छात्रों को उकसाते हुए कहा कि अब अपनी ‘इस्तीफे की सूची में एक और नाम जोड़ेंगे, और वह नाम है दिल्ली यूनिवर्सिटी के कुलपति का।”
एक तरफ यूनिवर्सिटी छात्रों को आगाह कर रही हैं कि प्रदर्शन में हो रही हिंसा और कानूनी कार्रवाई में पड़ने से उनका भविष्य खतरे में पड़ सकता है, पर दूसरी ओर राहुल गाँधी और आरफा खानुम को यह रास नहीं आ रहा है। क्योंकि अगर छात्रों ने यूनिवर्सिटी का आदेश पालन किया तो ये उनके मंसूबे पूरे नहीं करेगा। यह उसी प्रकार का मॉडल है, जो दो साल पहले बांग्लादेश में ‘छात्र आंदोलन’ के समय पर देखा गया था, जहाँ बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटी पर इस्तीफा देने का दबाव बनाया गया था।
बांग्लादेश में शिक्षकों से लिए गए थे जबरन इस्तीफे, हुई थी हिंसा
जब साल 2024 में बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार एक ‘छात्र आंदोलन’ के नाम पर गिराई गई थी, तब भी यही मॉडल सामने आया था। आंदोलन के नाम पर बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर, प्रिंसिपल और हेड टीचर को इस्तीफा माँगा गया था। और रिपोर्ट्स के मुताबिक, सैंकड़ों शिक्षकों को जबरन पद से इस्तीफा दिलावाया भी गया था।
ढाका ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, UGC के चेयरमैन प्रोफेसर काजी शाहीदुल्लाह, नेशनल यूनिवर्सीट के वाइस चांसलर प्रोफेसर मशियुर रहमान, जगन्नाथ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. सादेका हलीम, बांग्लादेश एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर एमदादुल हक चौधरी, कोमिला यूनिवर्सिी के कुलपति प्रोफेसर एएफएम अब्दुल मोईन ने इस्तीफा दे दिया था और यह सामने आया था कि इनमें से कई को जबरन हटने के लिए मजबूर किया गया था।
इसीलिए राहुल गाँधी और आरफा खानुम का यूनिवर्सिटी की एडवाइजरी का न सिर्फ विरोध करना, बल्कि धमकाया और छात्रों को VCs के इस्तीफे के लिए उकसाना एकदम उसी तरह से है, जैसे बांग्लादेश में हुआ था।
कई वर्षों से योगेंद्र यादव खुद को लोकतंत्र, संवैधानिक व्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रताओं के प्रति प्रतिबद्ध एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में पेश करते रहे हैं। लेकिन उनके राजनीतिक हस्तक्षेप लगातार लोकतांत्रिक राजनीति की एक अलग ही अवधारणा को सामने रखते हैं।
यह ऐसी सोच है, जिसमें संसदीय प्रक्रियाओं से अधिक महत्व लगातार आंदोलनों को दिया जाता है, चुनावों से मिली वैधता से ऊपर सड़क पर होने वाली लामबंदी (Mobilization) को रखा जाता है और सरकारों को चुनौती देने तथा बदलने के लिए संविधान के सामान्य लोकतांत्रिक तरीकों के बजाय ‘प्रतिरोध की राजनीति’ को प्राथमिकता दी जाती है।
NEET पेपर लीक को लेकर हुए आंदोलन पर उनका हालिया लेख केवल एक विरोध प्रदर्शन के बारे में नहीं है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक व्यापक राजनीतिक रणनीति सामने आती दिखाई देती है। योगेंद्र यादव ने तर्क दिया है कि विपक्ष को चुनावी राजनीति से आगे बढ़कर ‘प्रतिरोध की राजनीति’ की ओर जाना चाहिए।
उन्होंने जंतर-मंतर पर हुए हिंसक आंदोलन को इस नई राजनीति के एक मॉडल के रूप में भी प्रस्तुत किया है।
(साभार: इंडियन एक्सप्रेस)
इस तर्क की गंभीरता से जाँच होनी चाहिए, खासकर 2026 में पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत के बाद।
पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत और उसके बाद शुभेंदु अधिकारी का राज्य के पहले BJP मुख्यमंत्री बनना केवल एक और विधानसभा चुनाव का परिणाम नहीं था। यह उस राजनीतिक धारणा के टूटने का संकेत था, जिसमें BJP के वैचारिक विरोधी पश्चिम बंगाल को भगवा दल के लिए आखिरी बड़ा राजनीतिक गढ़ मानते थे।
लंबे समय तक पश्चिम बंगाल को वामपंथी-उदारवादी राजनीति, क्षेत्रीय प्रतिरोध और BJP विरोधी वैचारिक एकजुटता का केंद्र बताया जाता रहा। ऐसे में राज्य में BJP की जीत ने सिर्फ चुनावी समीकरण ही नहीं बदले, बल्कि भारतीय राजनीति की मनोवैज्ञानिक तस्वीर भी बदल दी।
BJP विरोधी खेमे का लंबे समय से मानना था कि जैसे ही पार्टी की राजनीतिक रफ्तार कमजोर होगी, उसका सामाजिक गठबंधन बिखरेगा या कुछ मजबूत राज्य उसके विस्तार को रोक देंगे, वैसे ही उसे चुनाव में हराया जा सकेगा।
लेकिन BJP ने बार-बार यह दिखाया कि वह बदलते हालात के अनुसार खुद को ढाल सकती है, अपना जनाधार बढ़ा सकती है, राष्ट्रवाद को अपने मुख्य आधार के रूप में बनाए रख सकती है, सुशासन के मुद्दों को चुनावी समर्थन में बदल सकती है और उन इलाकों में भी अपनी जगह बना सकती है जिन्हें कभी उसके लिए पूरी तरह प्रतिकूल माना जाता था।
पश्चिम बंगाल के नतीजों ने इस पूरी बहस की दिशा बदल दी। ऐसे में कुछ कार्यकर्ताओं और वैचारिक समूहों के बीच लगातार सार्वजनिक आंदोलनों के प्रति बढ़ते उत्साह को केवल ‘लोकतांत्रिक असहमति’ के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसे चुनावी राजनीति की सीमाओं से पैदा हुई निराशा के रूप में भी समझा जा सकता है।
इसका यह मतलब नहीं है कि हर प्रदर्शनकारी या कार्यकर्ता की सोच एक जैसी है या फिर हर सार्वजनिक आंदोलन गलत है। लेकिन इससे एक अहम सवाल जरूर उठता है कि जब चुनावी राजनीति बार-बार मनचाहा राजनीतिक परिणाम देने में असफल रहती है और राजनीतिक आंदोलनों पर वही पुराने चेहरे हावी हो जाते हैं, तो क्या सड़क को निर्णायक राजनीतिक मैदान बनाने का आकर्षण बढ़ने लगता है? योगेंद्र यादव के हालिया बयान भी इसी तरह के बदलाव की ओर इशारा करते दिखाई देते हैं।
फिर से आ गया पेशेवर प्रदर्शनकारी
पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ हुए शायद ही किसी बड़े आंदोलन में ऐसा हुआ हो, जिसमें योगेंद्र यादव किसी न किसी रूप में सक्रिय भागीदार, टिप्पणीकार या वैचारिक समर्थक के तौर पर नजर न आए हों।
नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ हुए प्रदर्शनों और शाहीन बाग धरने से लेकर किसान आंदोलन और अब परीक्षा में अनियमितताओं को लेकर CJP के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन तक, योगेंद्र यादव लगातार ऐसे आंदोलनों के साथ खड़े दिखाई दिए हैं, जिनका उद्देश्य मोदी सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाना रहा है।
सिर्फ इससे उन्हें अलोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता। किसी भी सार्वजनिक बुद्धिजीवी को किसी मुद्दे या आंदोलन का समर्थन करने का अधिकार है। लेकिन एक पैटर्न लगातार दिखाई देता है, जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं है। सबसे बड़ी चिंता तब पैदा होती है, जब जनता के गुस्से को भड़काने और उन्हें हिंसा की ओर उकसाने की कोशिश की जाती है।
हाल ही में वायरल हुए एक वीडियो में योगेंद्र यादव कहते नजर आए कि लोकतंत्र संसद से नहीं, बल्कि सड़कों से चलेगा। इस बयान को कई लोगों ने हिंसक और टकराव वाली राजनीति को समर्थन देने वाला बताया।
“Democracy will run from the streets, not Parliament”
Yogendra Yadav is blatantly advocating for anarchy!
यही राजनीतिक तरीका बार-बार सामने आता दिखाई देता है। किसी एक विशेष शिकायत को पूरे संस्थागत ढाँचे पर आरोप में बदल दिया जाता है। किसी सरकारी नीति पर मतभेद को लोकतंत्र के पूरी तरह विफल हो जाने का प्रमाण बताया जाता है। एक विरोध प्रदर्शन को चुनी हुई सरकार की वैधता पर नैतिक जनमत-संग्रह की तरह पेश किया जाता है।
और धीरे-धीरे जवाबदेही की भाषा की जगह हिंसा और टकराव की भाषा लेने लगती है। CJP का आंदोलन इसी बदलाव का ताजा उदाहरण माना जा सकता है।
NEET परीक्षा में हुई अनियमितताओं की निष्पक्ष और गंभीर जाँच होना जरूरी था। परीक्षा में गड़बड़ियों या पेपर लीक से प्रभावित छात्रों को न्याय मिलना चाहिए और प्रशासनिक लापरवाही से परेशान परिवारों के प्रति जवाबदेही तय होनी चाहिए। किसी भी सरकार को ऐसी चिंताओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
लेकिन प्रशासनिक सुधार की माँग करने और हर सार्वजनिक शिकायत को हिंसक सड़क आंदोलन में बदल देने के बीच एक स्पष्ट अंतर होता है। यह अंतर तब और महत्वपूर्ण हो जाता है, जब कुछ कार्यकर्ता जनता के गुस्से को केवल सुधार की माँग के रूप में नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक टकराव का आधार बनाने की कोशिश करने लगते हैं।
‘ऑक्युपाई इंडिया’ को खड़ा करना
अपने Indian Express के लेख में योगेंद्र यादव ने जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन को भारत का ‘ऑक्युपाई मोमेंट’ बताया। उन्होंने इस आंदोलन के बड़े पैमाने, इसमें शामिल विभिन्न वर्गों की भागीदारी और इसकी स्वतःस्फूर्त प्रकृति की सराहना करते हुए इसे ऐसा ‘स्वाभाविक जन आंदोलन’ कहा, जो पारंपरिक राजनीतिक दलों की व्यवस्था से अलग खड़ा हुआ।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि विपक्ष को अब अपनी राजनीति का केंद्र चुनावों से आगे बढ़ाकर ‘प्रतिरोध की राजनीति’ की ओर ले जाना चाहिए।
यहाँ इस्तेमाल की गई भाषा महत्वपूर्ण है।
‘प्रतिरोध की राजनीति’ सुनने में तब तक सामान्य लग सकती है, जब इसका इस्तेमाल शांतिपूर्ण विरोध और लोकतांत्रिक असहमति के समर्थन में किया जाए। किसी भी लोकतंत्र में नागरिकों का अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना, विरोध करना और सरकार से जवाबदेही माँगना जरूरी होता है। लेकिन यही शब्द तब कहीं अधिक गंभीर अर्थ लेने लगते हैं, जब इनके जरिए यह संकेत दिया जाए कि प्रतिनिधिक लोकतंत्र और चुनावी राजनीति अब पर्याप्त नहीं रह गई है।
योगेंद्र यादव का तर्क इस धारणा पर आधारित है कि भारत उस दिशा में बढ़ रहा है, जिसे वह ‘चुनावी निरंकुशता’ (Electoral Autocracy) कहते हैं। इस सोच के अनुसार चुनाव तो होते रहते हैं, लेकिन चुनावी व्यवस्था को इस तरह पेश किया जाता है मानो वह अब वास्तविक लोकतांत्रिक बदलाव लाने में सक्षम नहीं रह गई हो।
इसका राजनीतिक संदेश साफ है।
अगर चुनावों को पर्याप्त नहीं माना जाएगा, तो फिर सड़क पर होने वाले आंदोलन नैतिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण माने जाने लगेंगे। वे केवल लोकतांत्रिक अधिकार नहीं रहेंगे, बल्कि राजनीति का एक वैकल्पिक मंच बन जाएँगे। संसद की भूमिका पीछे छूटने लगेगी, चुनावी जनादेश पर सवाल उठाए जाएंगे और सार्वजनिक प्रदर्शन ही राजनीतिक वैधता का नया आधार बनने लगेंगे।
यही वह बिंदु है, जहाँ खतरा पैदा होता है।
भारत ऐसा देश नहीं है, जहाँ चुनाव खत्म हो गए हों। यहां आज भी सरकारें चुनाव जीतती और हारती हैं। कई राज्यों में विपक्ष की सरकारें हैं। अदालतें सार्वजनिक विवादों में हस्तक्षेप करती हैं। संसद काम कर रही है और चुनावी मुकाबले लगातार होते रहते हैं। पश्चिम बंगाल में BJP की जीत भी, चाहे उसका राजनीतिक आँकलन कुछ भी हो, यह दिखाती है कि भारतीय राजनीति में चुनावों के जरिए बदलाव की पूरी संभावना बनी हुई है।
इसलिए सवाल यह नहीं है कि बीजेपी राजनीतिक रूप से मजबूत है या नहीं। वह है।
असल सवाल यह है कि इस राजनीतिक बढ़त का जवाब नए जनसमर्थन और चुनावी प्रतिस्पर्धा के जरिए दिया जाना चाहिए या फिर लगातार आंदोलनों की ऐसी स्थायी राजनीति के जरिए, जिसका उद्देश्य बैलट बॉक्स के बाहर चुनी हुई सरकार की वैधता को कमजोर करना हो।
बंगाल और हताशा की राजनीति
पश्चिम बंगाल का चुनाव परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उसने एक लंबे समय से बनी वैचारिक धारणा को झटका दिया है।
कई वर्षों तक BJP के आलोचक पश्चिम बंगाल को एक प्रतीकात्मक सीमा के रूप में देखते रहे। उनका मानना था कि यह ऐसा राज्य है, जहाँ हिंदुत्व की राजनीति चुनावी स्तर पर सीमित रहेगी, जहाँ की राजनीतिक संस्कृति भगवा दल के विस्तार को रोक देगी और जहाँ वामपंथी-उदारवादी विचारधारा की जड़ें सबसे मजबूत बनी रहेंगी।
लेकिन अब यह धारणा टूट चुकी है।
पश्चिम बंगाल में BJP की जीत ने केवल पार्टी को एक और राज्य नहीं दिया, बल्कि उन लोगों की सोच को भी बड़ा झटका दिया, जो मानते थे कि चुनावी राजनीति अंततः BJP के विस्तार की एक स्वाभाविक सीमा तय कर देगी। शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने के साथ BJP अब उस राजनीतिक क्षेत्र में पहुँच चुकी है, जिसे कभी उसके लिए लगभग असंभव माना जाता था।
बदले हुए इसी राजनीतिक माहौल में योगेंद्र यादव का ‘प्रतिरोध की राजनीति’ पर जोर और अधिक महत्वपूर्ण नजर आता है।
इसकी एक व्याख्या यह हो सकती है कि योगेंद्र यादव और उनके जैसे वैचारिक समूह अब यह महसूस करने लगे हैं कि पारंपरिक चुनावी राजनीति के जरिए BJP को हराना उनकी अपेक्षा से कहीं अधिक कठिन है। लगातार आलोचनाओं, सत्ता विरोधी माहौल की कोशिशों और राजनीतिक हमलों के बावजूद BJP ने अपना व्यापक जनसमर्थन बनाए रखा है और उन राज्यों में भी विस्तार किया है, जिन्हें कभी उसके लिए वैचारिक रूप से बंद माना जाता था।
ऐसे में CJP के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन को केवल परीक्षा में अनियमितताओं के खिलाफ छात्रों की प्रतिक्रिया के रूप में ही नहीं, बल्कि BJP विरोधी वैचारिक समूहों के लिए एक नए राजनीतिक मंच के रूप में भी देखा जा सकता है। ऐसा मंच, जिसकी नींव जन असंतोष, गुस्से, कैंपस आधारित लामबंदी, सोशल मीडिया पर वायरल अभियानों और बड़े पैमाने पर सार्वजनिक आंदोलनों पर टिकी हो।
इसका यह अर्थ नहीं है कि इस आंदोलन में शामिल हर छात्र या प्रतिभागी राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित है। कई छात्रों की चिंताएँ पूरी तरह वास्तविक और जायज हो सकती हैं। लेकिन जब प्रभावशाली वैचारिक समूह ऐसे आंदोलनों से जुड़ते हैं, तो वे केवल निष्पक्ष पर्यवेक्षक बनकर नहीं आते। वे अपने साथ राजनीतिक सोच, संगठनात्मक अनुभव और दीर्घकालिक रणनीतिक लक्ष्य भी लेकर आते हैं।
योगेंद्र यादव द्वारा इस आंदोलन का खुलकर समर्थन करना यह संकेत देता है कि वह इसे केवल परीक्षा सुधार के अभियान के रूप में नहीं देखते। उनकी नजर में यह भविष्य की राजनीति का एक संभावित मॉडल या खाका हो सकता है।
जब विरोध धीरे-धीरे ‘सड़क पर वीटो’ का रूप लेने लगता है
विरोध प्रदर्शन और ‘सड़क के जरिए वीटो’ (Street Veto) के बीच का अंतर केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। एक विरोध प्रदर्शन सरकार से अपनी बात सुनने और उस पर विचार करने की मांग करता है। वहीं स्ट्रीट वीटो की सोच यह मानकर चलती है कि सरकार को सड़क पर जुटी भीड़ के दबाव के आगे झुकना ही होगा।
विरोध प्रदर्शन का उद्देश्य सरकार की नीतियों को प्रभावित करना हो सकता है, लेकिन स्ट्रीट वीटो का लक्ष्य लोकतांत्रिक संस्थाओं की वैधता पर सवाल खड़े करना होता है।
कोई भी विरोध प्रदर्शन तेज, असुविधाजनक या व्यापक हो सकता है, लेकिन यदि वह लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर रहता है तो वह लोकतंत्र का हिस्सा माना जाता है। स्ट्रीट वीटो की स्थिति तब पैदा होती है, जब कोई संगठित समूह यह दावा करने लगे कि संसद के बाहर उसकी मौजूदगी और उसका जनसमर्थन, संसद के भीतर मौजूद चुनावी जनादेश से अधिक वैध और महत्वपूर्ण है।
इसी वजह से योगेंद्र यादव का वह वायरल वीडियो चिंता का विषय माना जा रहा है, जिसमें वह कहते हैं कि लोकतंत्र संसद से नहीं, बल्कि सड़कों से चलेगा।
संसद कोई सामान्य संस्था नहीं है। यह जनता की संप्रभुता की संवैधानिक अभिव्यक्ति है। सांसदों को अपनी वैधता सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के जरिए मिले जनादेश से प्राप्त होती है। सरकारें जनता के वोट से चुनी जाती हैं, लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से जवाबदेह बनाई जाती हैं और चुनावों के जरिए ही बदली जाती हैं।
भारतीय संविधान शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से एकत्र होने तथा विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार देता है, लेकिन वह कानून बनाने या शासन चलाने का अधिकार उस समूह को नहीं देता, जो सबसे बड़ी या सबसे शोरगुल वाली भीड़ जुटा ले।
अगर संसद से ऊपर सड़क को रखा जाने लगे, तो लोकतांत्रिक राजनीति धीरे-धीरे टकराव और अवरोध की प्रतिस्पर्धा में बदल सकती है। तब चुनाव हारने वाला हर राजनीतिक दल या समूह मतपेटी के बजाय सड़क जाम, घेराव, दबाव और लगातार आंदोलनों के जरिए दूसरा जनादेश हासिल करने की कोशिश करेगा।
यह लोकतंत्र को मजबूत करने का रास्ता नहीं है। बल्कि यह उस संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करने का खतरा पैदा करता है, जिसके आधार पर लोकतंत्र कायम रहता है।
हिंसा के सवाल को नहीं किया जा सकता नजरअंदाज
यह चिंता इसलिए और गंभीर हो जाती है क्योंकि CJP का आंदोलन केवल भाषणों, तख्तियों और शांतिपूर्ण प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा।
मीडिया रिपोर्ट्स और पुलिस के अनुसार, जंतर-मंतर के पास प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई, जिसमें पुलिसकर्मी भी घायल हुए। अधिकारियों का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने पथराव किया और सुरक्षा बलों पर हमला किया, जबकि प्रदर्शनकारियों और विपक्ष ने इसके लिए पुलिस को जिम्मेदार ठहराया।
इन दोनों पक्षों के दावों की निष्पक्ष जाँच और जहाँ आवश्यक हो, न्यायिक प्रक्रिया के जरिए सत्य सामने आना चाहिए। लेकिन एक बात केवल इसलिए विवाद का विषय नहीं बननी चाहिए क्योंकि इस आंदोलन के इर्द-गिर्द राजनीति हो रही है। पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा को लोकतांत्रिक प्रतिरोध कहकर उचित नहीं ठहराया जा सकता।
पथराव को संवैधानिक असहमति नहीं कहा जा सकता और सुरक्षा बलों पर हमला लोकतांत्रिक भागीदारी का विकल्प नहीं हो सकता। जो भी आंदोलन नैतिक आधार पर खुद को सही ठहराने का दावा करता है, उसे ऐसी हिंसक घटनाओं की बिना किसी शर्त के निंदा करनी चाहिए। यही कारण था कि महात्मा गाँधी हिंसक प्रदर्शनों के सख्त विरोधी थे।
हालाँकि आज जो लोग खुद को गाँधी की वैचारिक परंपरा का प्रतिनिधि बताते हैं, वे कई बार तथाकथित ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शनों’ के दौरान हुई हिंसा की उतनी स्पष्ट आलोचना करते नजर नहीं आते। यहीं पर योगेंद्र यादव की भाषा और बयान महत्वपूर्ण हो जाते हैं। जब कोई सार्वजनिक बुद्धिजीवी लगातार किसी सरकार को तानाशाही प्रवृत्ति वाला, संसद को अपर्याप्त और ‘प्रतिरोध’ को लोकतंत्र का सबसे बड़ा माध्यम बताने लगे, तो ऐसा माहौल बन सकता है जिसमें टकराव और उग्रता राजनीतिक रूप से उचित या सार्थक दिखाई देने लगें।
हो सकता है कि वे सीधे तौर पर हिंसा का आह्वान न करें, लेकिन ऐसी भाषा, जो हर राजनीतिक विवाद को अत्याचार के खिलाफ लड़ाई के रूप में पेश करती है, लोगों को यह महसूस करा सकती है कि टकराव नैतिक रूप से उचित है। क्योंकि शब्द कभी भी शून्य में अस्तित्व नहीं रखते, उनके सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव भी होते हैं।
अंबेडकरवादी विरोधाभास
योगेंद्र यादव और उनके वैचारिक समर्थक अक्सर डॉ भीमराव आंबेडकर, संवैधानिक नैतिकता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा की बात करते हैं। लेकिन डॉ आंबेडकर की संवैधानिक सोच इस विचार पर आधारित नहीं थी कि भीड़ प्रतिनिधिक संस्थाओं की जगह ले ले।
इसके विपरीत, उनका स्पष्ट मानना था कि जब भारत ने राजनीतिक बदलाव के लिए संवैधानिक रास्ते अपना लिए हैं, तब नागरिकों और राजनीतिक दलों को सत्ता परिवर्तन के लिए संविधान से बाहर के तरीकों को सामान्य नहीं बनाना चाहिए। संविधान किसी भी सरकार को चुनौती देने के लिए कई लोकतांत्रिक और संवैधानिक रास्ते उपलब्ध कराता है।
नागरिक चुनाव में वोट दे सकते हैं। विपक्षी दल चुनाव लड़ सकते हैं। अदालतों में याचिकाएँ दायर की जा सकती हैं। संसद में कानूनों पर बहस हो सकती है। मीडिया सरकार की कार्यप्रणाली की जाँच और आलोचना कर सकता है। वहीं, शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन भी जनमत को प्रभावित करने का एक लोकतांत्रिक माध्यम है।
लेकिन इनमें से कोई भी संवैधानिक व्यवस्था यह नहीं कहती कि किसी निर्वाचित सरकार की वैधता को लगातार सड़क पर होने वाले आंदोलनों या भीड़ के दबाव के भरोसे रखा जाए।विडंबना यह है कि जो लोग खुद को संविधान का रक्षक बताते हैं, वही कई बार उसके सबसे मूल सिद्धांत को कमजोर करते हुए दिखाई देते हैं।
संविधान का मूल सिद्धांत यही है कि राजनीतिक सत्ता और उसकी वैधता संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से संचालित होनी चाहिए, न कि वैचारिक दबाव बनाने वाले ऐसे आंदोलनों के जरिए जिनका उद्देश्य शासन को प्रभावी ढंग से चलने से रोकना हो।
लोकतंत्र में विरोध जरूरी, लेकिन इसे विरोध के जरिए नहीं चलाया जा सकता
भारत को असहमति की जरूरत है। देश को ऐसे छात्र आंदोलन, नागरिक समाज संगठन, विपक्षी दल और सार्वजनिक बुद्धिजीवी चाहिए, जो सत्ता से सवाल पूछ सकें और सरकार को जवाबदेह बना सकें। लेकिन इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि लोकतांत्रिक दबाव और राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिश के बीच का अंतर स्पष्ट बना रहे।
पश्चिम बंगाल में BJP की जीत ने इस अंतर को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है।
इस जीत ने दिखाया कि BJP का राजनीतिक विस्तार अब केवल उसके पारंपरिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। साथ ही यह भी स्पष्ट हुआ कि उसके विरोधी लंबे समय तक इस उम्मीद पर निर्भर नहीं रह सकते कि चुनावी राजनीति अपने आप उनके पसंदीदा वैचारिक संतुलन को वापस ले आएगी।
संभव है कि यही कारण हो कि लगातार आंदोलनों की राजनीति कुछ वर्गों को अधिक आकर्षित करने लगी है। भारत के सामने चुनौती यह है कि चुनावी नतीजों से असंतोष कहीं चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति अविश्वास में न बदल जाए।
योगेंद्र यादव ‘प्रतिरोध की राजनीति’ को लोकतंत्र को मजबूत करने का माध्यम बताकर पेश कर सकते हैं। लेकिन जब इसे लगातार उग्र सड़क आंदोलनों के महिमामंडन, संसद के प्रति अविश्वास और हर सार्वजनिक शिकायत को सरकार की वैधता के संकट में बदलने की कोशिशों के साथ देखा जाता है, तो यह एक अलग तरह की राजनीति का रूप लेती दिखाई देती है।
ऐसी राजनीति, जो लोकतांत्रिक अधिकार का केंद्र जनता के वोट और चुनावी जनादेश से हटाकर सड़कों पर होने वाले राजनीतिक प्रदर्शनों की ओर ले जाने का प्रयास करती है।
यह एक बेहद जोखिम भरा विचार माना जा सकता है। योगेंद्र यादव के हस्तक्षेप का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह नहीं है कि वह विरोध प्रदर्शन के अधिकार का समर्थन करते हैं। शांतिपूर्ण विरोध किसी भी संवैधानिक लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा है।
असली चिंता यह है कि उनकी अवधारणा सड़क पर होने वाले आंदोलनों को केवल लोकतांत्रिक अधिकार तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उन्हें राजनीतिक वैधता के समानांतर स्रोत के रूप में स्थापित करती दिखाई देती है। ‘प्रतिरोध की राजनीति’ की वकालत और यह कहना कि लोकतंत्र ‘संसद से नहीं, बल्कि सड़कों से चलेगा’, ऐसी राजनीतिक सोच को सामने रखता है, जो भारतीय गणराज्य की संवैधानिक व्यवस्था के साथ सहज मेल नहीं खाती।
भारतीय संविधान के अनुसार सर्वोच्च राजनीतिक अधिकार जनता में निहित है, जो चुनावों और प्रतिनिधिक संस्थाओं के माध्यम से लागू होता है। विरोध प्रदर्शन इसलिए संरक्षित है क्योंकि वह लोकतंत्र को मजबूत करता है, न कि इसलिए कि वह उन संस्थाओं की जगह ले सकता है, जिनके जरिए लोकतांत्रिक सत्ता संचालित होती है।
लोकतंत्र विरोध प्रदर्शनों को दबाने से मजबूत नहीं होता। वह तब मजबूत होता है, जब विरोध प्रदर्शन संविधान के दायरे में रहकर जनमत को प्रभावित करने का माध्यम बने, न कि जनता की संप्रभुता और चुनावी जनादेश का विकल्प।
सड़कों पर उठने वाली आवाज सुनी जानी चाहिए, लेकिन संप्रभुता का अंतिम स्रोत सड़क नहीं, बल्कि जनता का लोकतांत्रिक जनादेश और संविधान ही होना चाहिए।
(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)