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संसद में स्प्रे करने वाले लौंडे का लाठी से नहीं हुआ ‘स्वागत’ इसलिए छटपटा रहे हैं RJD के ‘लठैत’: कुटाई पर लिबरल प्रलाप ‘दुख’ नहीं, ‘दर्द’ है उनका

जब टीवी एलीट माना जाता था, तब उस पर एक प्रचार आता था। जिसमें उस दौर के बुजुर्ग अभिनेता अशोक कुमार और शम्मी कपूर यह समझाते नजर आते थे कि ‘स्वागत मतलब पान पराग’ होता है। उसी दौर में बिहार में एक मसीहा उभर रहा था, जिसे आमलोगों का नेता माना जाता था। यह दूसरी बात है कि बाद में वह ‘चाराखोर’ निकला और लोगों को यह भी पता चला कि उसके लिए ‘स्वागत’ का मतलब लाठी होता है।

जाहिर है कि जिनकी ट्रेनिंग ही लाठी वाले चरवाहा विद्यालय में हुई हो वे झोंटा पकड़कर खींचने, मुक्का मारने, जूतियाने… को तो ‘स्वागत’ नहीं ही मानेंगे। इसलिए लोकसभा में 13 दिसम्बर 2023 को कूदकर स्प्रे मारने वाले लौंडे की सांसदों वाली कुटाई कुछ लोगों को रास नहीं आई है। लेकिन यह उनका दुख नहीं (जैसा कुछ लोग समझ रहे हैं), बल्कि दर्द है।

जब ‘दर्द’ गहरा हो और पिटने वाला लौंडा ‘अपना’ हो तो लाठी बगैर उसका ‘स्वागत’ लोकतंत्र की सेहत के लिए खराब हो ही जाता है। यही कारण है कि बिहार को 15 साल तक जंगलराज के चरमसुख का भोग कराने वाली राष्ट्रीय जनता दल (RJD) को इस ‘स्वागत’ से ज्वर हो गया है। राजद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष (यदि वहाँ ऐसे किसी पद की औकात हो) शिवानन्द तिवारी ने कहा है कि वह यह मान नहीं सकते कि वह युवक संसद में हिंसा फैलाने के लिए कूदा था। उनका विचार है कि यह ‘छोटी-मोटी घटना’ है।

छोटी-मोटी घटना वाली उनकी बात में दम है, क्योंकि तेजाब से युवकों को नहलाने वाले शहाबुद्दीन को उनकी ही पार्टी उस लोकसभा में भेजा करती थी, जिसमें 13 दिसंबर को स्प्रे वाली घटना हुई है। वहीं राजद के बुद्धिजीवी होने का दावा करने वाले (यह दावा सिद्ध नहीं किया जा सकता) प्रोफेसर मनोज झा का कहना है कि सांसदों पर हमला करने आए युवकों की पिटाई ‘असंसदीय’ है और सांसदों की छवि (अगर उनकी छवि पहले से कुछ अच्छी है तो) को बिगाड़ता है।

भले प्रोफेसर झा स्वयंभू बुद्धिजीवी हों लेकिन उनकी यह बात मूर्खतापूर्ण लगती है।अपने ऊपर हमले से बचने के लिए प्रतिक्रिया करने का अधिकार देश का संविधान भी इस देश के लोगों को देता है। जाहिर है सांसदों ने संविधान का पालन किया है। (इसके लिए वह बधाई के पात्र हैं)

सांसदों ने अगर उस युवक को नियंत्रित करने के लिए पकड़ा और अपनी तथा सदन में मौजूद लोगों की जान बचाने के लिए उसे एकाध हाथ लगाए तो यह आत्मरक्षा ही कहा जाएगा। (नहीं भी कहोगे तो क्या कर लोगे?)

क्या प्रोफ़ेसर झा इस बात की गारंटी ले सकते हैं कि अगर उस युवक को पकड़ कर मारा ना गया होता तो वह किसी सांसद को नुकसान नहीं पहुँचाता?

वह बात अलग है कि उनकी पार्टी के मालिक यादव परिवार के छोटे बेटे (कम से कम कागजों के अनुसार) और बिहार के वन एवं पर्यावरण मंत्री (अगर उन्हें यह होने में कोई रूचि है) तेजप्रताप यादव ने एक बार एक दलित पत्रकार (जो कि वह व्यक्ति खुद को बताता है) को 2 मिनट बात करने (इसे कूटने के लिए पढ़ा जाए) के लिए ऐसा बुलाया था कि उसे अपनी जान बचाकर भागना पड़ा था। इसका वीडियो भी राजद समर्थकों ने खूब चटखारे लेकर शेयर किया था।

मेरे एक बॉस बताते हैं कि 1990 के आसपास लालू यादव के मुख्यमंत्री रहते हुए कोर्ट के आदेशानुसार हाईस्कूल शिक्षक भर्ती की दरख्वास्त लेकर गए थे और लालू यादव ने उनका ‘स्वागत’ करने के लिए लाठी मँगाई थी। इसके पीछे लालू का तर्क था कि कोई भूमिहार (यह एक जाति होती है और लालू की पार्टी के अनुसार यह होना एक अपराध है) कैसे शिक्षक की नौकरी माँगने उनके द्वार पर आ सकता है। लाठी से स्वागत का लालू मोह ऐसा है कि राजद ‘तेल पिलावन लाठी घुमावन रैला’ भी कर चुका है।

जब पार्टी की ‘विशेषज्ञता’ इतने आले दर्जे की हो तो उसके ‘लठैतों’ का हाथ से कुटाई पर पीड़ा छलक जाना तो बनता ही है। पीड़ा से कराह उठना इनके ‘मानस पुत्रों’ का भी बनता है। उन्होंने भी निराश नहीं किया है।

यही कारण है कि हाल ही में एक राष्ट्रीय चैनल से एंकर की नौकरी छोड़ कर लाल सलाम को मजबूत करने के लिए यूट्यूब पर लाल माइक को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे एक ‘पत्रकार’ को सांसदों की आत्मरक्षा का प्रयास ‘पैथेटिक’ यानी बहुत ही अशोभनीय लगा है। लाल माइक वाले महोदय का कहना है कि सांसदों को कानून को अपने हाथों में नहीं लेना चाहिए था।

हालाँकि, एंकर जी कुछ चूक गए हैं क्योंकि कुछ सांसदों ने पिटाई के दौरान कानून को पैरों में भी लिया था और संभवतः उस युवक को लातें भी पड़ी थी। यह वही महोदय हैं जिनके चैनल में काम करते समय इनके एक वरिष्ठ (जो इनसे पहले यूट्यूबर हो लिए) ने दिल्ली दंगों में पुलिस पर फायरिंग करने वाले शाहरुख की बन्दूक को बटुआ (इसे बटुआ ही पढ़ें) बता दिया था।

इन सबके अलावा कम्युनिस्ट पत्रकार इस बात से चिंतित हो गए हैं कि उनकी विरोध-प्रदर्शन की विधा को कोई और लौंडे-लपाड़ी लूट ले गए और सरकार के खिलाफ बोलने का तमगा भी कुछ एक हलकों में हासिल कर लिया। इसलिए सत्यहिंदी (असल में वह असत्यहिंदी है) पर एक रिटायर्ड (टायर्ड भी) पत्रकार ने कहा कि यह हमारे ही लोग थे।

वैसे उनकी बात पर विश्वास करना कुछ ख़ास कठिन नहीं है, क्योंकि 2001 की 13 दिसंबर को ही संसद पर हुए आतंकी हमले का मास्टरमाइंड अफजल गुरु भी कम्युनिस्टों के लिए अपना (अब्बा पढ़े) ही था। रिटायर्ड पत्रकार का कहना है, “पार्लियामेंट में अपने लोग गए थे, बस गलत तरीके से गए, लेकिन किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया।”

कम्युनिस्ट पत्रकार यह देख कर खुद हैरान था कि अन्य कम्युनिस्टों की तरह संसद में गलत तरीके से जाना वाला कोई व्यक्ति नुकसान कैसे नहीं पहुँचा पाया। क्योंकि इससे पहले जितने भी कम्युनिस्ट बंगाल में चुनावी हिंसा के बाद संसद पहुँचे थे वह देश को कुछ ना कुछ नुकसान पहुँचाने में अवश्य सफल रहे हैं।

खैर, अब खबर यह है कि इस मामले में 6 लोग गिरफ्तार हुए हैं। दिल्ली पुलिस ने उनके साथ ‘अशोभनीय’ या ‘असंसदीय’ व्यवहार किया या नहीं, अभी स्पष्ट नहीं है। इन सब पर UAPA भी लगाया गया है। इससे भी कम्युनिस्टों को दर्द हो सकता है।

अयोध्या राम मंदिर के मुख्य पुजारी कौन? जिन मोहित पांडेय की मीडिया में चर्चा उनकी नियुक्ति से श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का इनकार

अयोध्या में बन रहे भव्य एवं दिव्य राम मंदिर में 22 जनवरी, 2024 को प्राण प्रतिष्ठा होनी है। इसी बीच मीडिया में खबर चलने लगी कि उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के रहने वाले मोहित पांडेय को राम मंदिर का मुख्य पुजारी चुन लिया गया है। कई मीडिया संस्थानों ने चलाया कि 3000 पुजारियों के आवेदन स्वीकार किए गए थे, जिनमें से अंत में 50 को चुना गया और उनमें मोहित पांडेय का नाम है और उन्हें मुख्य पुजारी चुना गया है। वो दूधेश्वर वेद विद्यापीठ के छात्र रहे हैं।

इसी बीच ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र’ ट्रस्ट के सदस्य कामेश्वर चौपाल ने एक फेसबुक पोस्ट के जरिए इन खबरों को गलत बताया है। उन्होंने साफ़ कहा कि अयोध्या स्थित श्री रामजन्मभूमि मंदिर हेतु किसी भी मुख्य पुजारी की नियुक्ति नहीं की गई है। साथ ही उन्होंने अपील की कि कृपया भ्रामक ख़बरों पर ध्यान ना दें। कामेश्वर चौपाल ने ऑपइंडिया से बात करते हुए भी कहा कि राम मंदिर के पुजारी सत्येंद्र दास ही हैं और कोई नया पुरोहित नहीं चुना गया है।

उन्होंने बताया कि किसी मुख्य पुजारी की नियुक्ति नहीं हुई है। बकौल कामेश्वर चौपाल, इंटरव्यू के बाद 21 लोगों का चयन किया गया है। हालाँकि, उन्हें अभी 6 महीने की ट्रेनिंग दी जानी है। उसके बाद योग्यता के आधार पर निर्णय लिया जाएगा। कामेश्वर चौपाल ने कहा कि ये बात सत्य है कि सत्येंद्र दास बुजुर्ग हैं, लेकिन अभी वो ही मुख्य पुजारी का दायित्व निभा रहे हैं और उनके उत्तराधिकारी के रूप में किसी का नाम तय नहीं हुआ है।

‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र’ ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने भी मोहित पांडेय को मुख्य पुजारी बनाए जाने की खबरों पर ऑपइंडिया को प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि मीडिया और सोशल मीडिया का क्या है, वो तो कोई भी नाम लेकर चलाते रहते हैं, किसी का नाम चला सकते हैं। उन्होंने कहा कि जिसका जो मन हो नाम चला दे।

बता दें कि सत्येंद्र दास पिछले 32 वर्षों से राम मंदिर के मुख्य पुजारी हैं। वहीं रामलला की पूजा करते आ रहे हैं। 1992 के दिसंबर में बाबरी ढाँचे के विध्वंस से 9 महीने पहले उनकी नियुक्ति की गई थी। उन्होंने स्वयं बताया था कि पूजा करते हुए उन्हें लगता था कि एक न एक दिन रामलला का मंदिर बनेगा। बता दें कि प्राण-प्रतिष्ठा से पहले तक रामलला टेंट में ही रहेंगे जहाँ वो वर्षों से हैं। सत्येंद्र दास को नियुक्ति के समय मात्र 100 रुपए का वेतन मिलता था, जिसे बाद में 13,000 रुपए कर दिया गया।

सत्येंद्र जैन पेशे से शिक्षक रहे हैं और इसी नौकरी से वो घर चलाते रहे। BJP सांसद रहे विनय कटियार और VHP प्रमुख रहे अशोक सिंघल ने उनका नाम तय किया था। उनके हिन्दू नेताओं से अच्छे संबंध थे। 1949 में जिन बैरागियों ने राम जन्मभूमि में रामलला की प्रतिमा स्थापित की थी, उनमें वो भी शामिल थे। 1958 में उन्होंने घर छोड़ा, 1975 में आचार्य की डिग्री ली और इसके अगले ही वर्ष वो संस्कृत के अध्यापक हो गए। बाबरी विध्वंस के समय भी वो रामलला के पास ही थे और प्रतिमा को लेकर थोड़ी दूर चले गए थे।

मातृ भाषा पर बल, प्राचीन भाषाओं का ज्ञान, खेल-खेल में गणित: अब ‘5+3+3+4’ पैटर्न पर पढ़ेगा आपका बच्चा, जानिए क्या है NEP 2020

देश के नौनिहालों का भविष्य सँवारने के लिए केंद्र की मोदी सरकार नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लेकर आई है। भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में आने वाले बड़े बदलाव पर और केंद्र सरकार की सोच पर केंद्रीय शिक्षा और कौशल विकास मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपनी राय जाहिर की।

आजतक के ‘एजेंडा आजतक’ कार्यक्रम के सेशन ‘भारतीयता का पाठ’ की शुरुआत पर केंद्रीय मंत्री प्रधान ने कहा कि पीएम मोदी ने ‘अमृत काल’ में आह्वान किया है कि वो 2047 तक भारत को एक विकसित देश बनाकर रहेंगे।

उन्होंने आगे कहा, “हमारे सामने और कोई विकल्प नहीं है। यह महज अकेले भारत की जरूरत नहीं है बल्कि यह दुनिया की जरूरत है कि भारत जैसी एक संतुलित सभ्यता, दुनिया के विकास का केंद्र बिंदु बने।”

केंद्रीय मंत्री प्रधान ने आगे कहा, “इसके लिए हमें विकसित, आत्मनिर्भर और स्वावलंबी होना पड़ेगा तब जाकर दुनिया में सही संतुलन रहेगा ये भारत की सभ्यता की सीख है। ये तभी संभव होगा जब सभी रचनाओं के केंद्र में सही शिक्षा होगी।”

उन्होंने कहा, “शिक्षा सही होगी, शिक्षा की उपज सही निकलेगी और दिशा सही होगी तो जिस अपेक्षित समाज और विकसित देश की हम कल्पना कर रहे हैं हम उसी दिशा में जा सकेंगे।” उन्होंने कहा कि इस दिशा में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत अब 10+2+3 को हम 5+3+3+4 में बदला है।

उन्होंने कहा कि 34 साल बाद भारत में शिक्षा का रूप बदलने की कोशिश की गई है। इसके लिए पीएम मोदी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 लाए जिसमें संविधान सभा की तर्ज पर बहुत बड़े विमर्श के बाद सभी अनुभव को समेटते हुए एक मसौदा पेश किया गया। इसके कई रूप हैं जिससे हमें कई उपलब्धियाँ हासिल होंगी।

उन्होंने आगे कहा पहले पढ़ाई पहली कक्षा से शुरू होती थी। इसमें 1 से 12वीं कक्षा तक की व्यवस्था थी। ये 12 साल की व्यवस्था थी। इसे अब हमने बदलकर 15 साल (5+3+3+4) किया है।

शिक्षा मंत्री ने कहा कि बच्चे का तीन से आठ साल की उम्र में 85 फीसदी मानसिक विकास हो जाता है। इस हिसाब देश की शिक्षा में नई चीजों को व्यवस्थित तरीके से सिखाने की प्रक्रिया को तीन साल की उम्र से शुरू किया गया है।

नई शिक्षा नीति 2020

आप भी इस नई शिक्षा नीति के इस 15 साल के (5+3+3+4) फॉर्मेट को जानना चाहते हैं और ये जानना चाहते है इससे छात्रों, उनके अभिभावकों और परिवार की जिंदगी में क्या बदलाव आएगा तो उसे यहाँ समझे…।

करीब दो लाख लोगों के सुझाव लेने के बाद नई शिक्षा नीति 2020 तैयार की गई। इसके बाद ही पीएम मोदी की सरकार ने इस पर मोहर लगाई और तीन साल पहले मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इसका ऐलान किया। नई शिक्षा नीति 2020 की घोषणा के साथ ही मानव संसाधन मंत्रालय का नाम बदलकर शिक्षा मंत्रालय कर दिया गया। इस नीति से देश में स्कूली और उच्च शिक्षा में परिवर्तनकारी सुधारों की अपेक्षा की गई है। नई शिक्षा नीति 2020 अंतरिक्ष वैज्ञानिक के कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता वाली समिति की रिपोर्ट पर आधारित है।

दरअसल पिछली राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 की जगह नई शिक्षा नीति लाई गई है। शिक्षा नीति 1986 में साल 1992 में संशोधन किया गया था।

इस नई शिक्षा नीति के उद्देश्यों के तहत साल 2030 तक स्कूली शिक्षा में 100% GER यानी सकल नामांकन अनुपात के साथ-साथ पूर्व-विद्यालय से माध्यमिक स्तर तक शिक्षा को सरल साधारण और सामान्य बनाने का लक्ष्य रखा गया है।

इतना ही नहीं नई शिक्षा नीति के तहत केंद्र व राज्य सरकार के सहयोग से शिक्षा क्षेत्र पर जीडीपी के 6 फीसदी हिस्से के सार्वजनिक व्यय का लक्ष्य रखा गया है। इसके तहत स्कूली शिक्षा में 5 + 3 + 3 + 4 डिज़ाइन वाले शैक्षिक संरचना का प्रस्ताव किया गया।

5+3+3+4 फार्मेट क्या है

इस 5 + 3 + 3 + 4 डिज़ाइन वाले शैक्षणिक फॉर्मेट में 3 से 18 साल की उम्र के बच्चों और किशोरों को शामिल किया गया है। इस फॉर्मेट में 5+ से मतलब 5 साल तक पढ़ाई फाउंडेशनल स्टेज में कराए जाने से है। इस स्टेज में प्री प्राईमरी के तीन साल और पहली और दूसरी कक्षा की पढ़ाई शामिल है।

3 साल की उम्र से छात्र बाल वाटिका या प्री-स्कूल में रहेंगे। इसके तहत बच्चों को बगैर किसी किताबी ज्ञान के खिलौनों, कहानियों, मैजिक, गीत, डांस से शिक्षा दी जाएगी।

इसके बाद प्राथमिक स्कूल में कक्षा 1 और 2 की पढ़ाई होगी। इसका पाठ्यक्रम NCERT ने तैयार किया है। इससे बच्चों की शिक्षा की नींव को मजबूती मिलेगी। इसे लेकर शिक्षा मंत्री प्रधान का कहना है कि बच्चों के प्ले स्कूलों को फॉर्मल रूप देना बाकी है।

इस वजह से राष्ट्रीय शिक्षा नीति की सिफारिश पर NCF बनी और उनका लर्निंग और टीचिंग लर्निंग मैटेरियल भी आ गया है, जिसे जादुई पिटारा नाम दिया गया है। उन्होंने आगे कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में गणित और भाषा से बच्चों का परिचय खेल-खेल में शुरू करवाया जाएगा।

उनका कहना है कि इससे बच्चों में क्रिटिकल थिंकिंग यानी आलोचनात्मक सोच और समस्या का समाधान करने की सोच को विकसित होने में मदद मिलेगी। देशभर में इसे लागू करना शुरू कर दिया गया है। आने वाले 3-4 सालों में फायदा देखने को मिलेगा।

इसके बाद की +3 स्टेज में बच्चा कक्षा 3 से लेकर कक्षा 5 की पढ़ाई करेगा और उसके बाद की दूसरी +3 स्टेज में कक्षा 6 से लेकर 8वीं तक की पढ़ाई करेगा। इसके बाद बच्चा +4 स्टेज में 9वीं, 10वीं, 11वीं और 12वीं तक की पढ़ाई करेगा। इस स्टेज में दो बार बोर्ड परीक्षा होगी।

दरअसल NEP-2020 में कक्षा-5 तक की शिक्षा में मातृ भाषा, स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा को पढ़ाई के लिए अपनाने पर बल दिया गया है। इसके साथ ही इस नीति में मातृ भाषा को कक्षा-8 और आगे की शिक्षा के लिए प्राथमिकता देने का सुझाव भी दिया गया है।

स्कूली और उच्च शिक्षा में छात्रों के लिए संस्कृत और अन्य प्राचीन भारतीय भाषाओं का विकल्प उपलब्ध होगा, लेकिन किसी भी छात्र पर भाषा के चुनाव की कोई बाध्यता नहीं होगी।

काशी के बाद अब मथुरा की बारी, हाईकोर्ट ने शाही ईदगाह ढाँचे के सर्वे का दिया आदेश: श्रीकृष्ण जन्मभूमि की मुक्ति की राह में बड़ा फैसला

मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर स्थित शाही ईदगाह के सर्वे के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुमति दे दी है। कोर्ट ने इस सम्बन्ध में दायर याचिका को मंज़ूरी देते हुए इस पूरे परिसर की जाँच के लिए एक एडवोकेट कमिश्नर की नियुक्ति की माँग को माना है। इसी की देखरेख में सर्वे पूरा होगा।

यह याचिका हिन्दू पक्ष की तरफ से श्रीकृष्ण विराजमान और वकील विष्णु शंकर जैन समेत 7 लोगों द्वारा लगाई गई थी। इस मामले में पूरे परिसर की वैज्ञानिक सुनवाई की याचिका स्वीकार होने की जानकारी हिन्दू पक्ष के वकील विष्णु शंकर जैन ने दी है।

विष्णु शंकर जैन ने कहा, “इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हमारी याचिका को स्वीकार कर लिया है जिसमें हमने माँग की थी कि इस पूरे परिसर का एक एडवोकेट कमिश्नर द्वारा सर्वे करवाया जाए। इसकी बाकी चीजें 18 दिसम्बर को तय की जाएँगी। कोर्ट ने शाही ईदगाह मस्जिद पक्ष की दलीलों को अस्वीकार कर दिया है। हमारी माँग थी कि शाही मस्जिद के भीतर हिन्दू मंदिर के कई चिह्न हैं। इन सबकी असली स्थिति जानने के लिए एक सर्वे की आवश्यकता है। कोर्ट ने इस माँग को स्वीकार कर लिया है। यह एक ऐतिहासिक निर्णय है।”

हिन्दू पक्ष का कहना है कि मथुरा में स्थित श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर के बराबर में बनी शाही ईदगाह वाला ढाँचा जबरन वही बना दिया गया जहाँ भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था। इस जगह पर कब्जा करके ढाँचा बनाया गया है। यहाँ अभी भी कई ऐसे सबूत हैं जो कि यह सिद्ध करते हैं कि यहाँ पहले एक मंदिर हुआ करता था।

हिन्दू पक्ष का दावा है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म राजा कंस के कारागार में हुआ था और यह जन्मस्थान शाही ईदगाह के वर्तमान ढाँचे के ठीक नीचे है। सन् 1670 में मुगल आक्रांता औरंगज़ेब ने मथुरा पर हमला कर दिया था और केशवदेव मंदिर को ध्वस्त करके उसके ऊपर शाही ईदगाह ढाँचा बनवा दिया था और इसे मस्जिद कहने लगे। मथुरा का मुद्दा नया नहीं है।

अदालत में इस मामले में याचिकाएँ दाखिल की गई हैं और उन पर सुनवाई होती रही है। 13.37 एकड़ जमीन पर दावा करते हुए हिन्दू यहाँ से शाही ईदगाह ढाँचे को हटाने की माँग करते रहे हैं। 1935 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वाराणसी के हिन्दू राजा को भूमि के अधिकार सौंपे थे।

‘आप ई-मेल भेजिए… मैं देख लूँगा’ : महुआ मोइत्रा की याचिका पर CJI करेंगे गौर, TMC सांसद ने कहा- मुझे सदन में बोलने नहीं दिया गया

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया डीवाई चंद्रचूड़ ने बुधवार (13 दिसंबर 2023) को तृणमूल कॉन्ग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा को आश्वासन दिया है कि वह कैश फॉर क्वेरी मामले में लोकसभा से उनके निष्कासन के खिलाफ उनकी याचिका की लिस्टिंग पर गौर करेंगे।

वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने मोइत्रा की ओर से इस मामले को अर्जेंट लिस्टिंग में रखने की गुहार लगाई थी। ऐसे में मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “ये मामला शायद लिस्ट नहीं हुआ होगा… अगर कोई ईमेल भेजा गया होता, तो मैं उसे तुरंत देख लेता। कृपया भेज दें।”

बता दें कि इससे पहले सिंघवी ने जस्टिस संजय किशन कौल के सामने इस याचिका को रखा था जिन्होंने इसे सीजेआई के समक्ष रखने की सलाह दी। उन्होंने कहा था कि इस मामले को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को देखने दो, अभी इस स्तर पर ये सब निर्णय नहीं लिया जा सकता। इसके बाद मोइत्रा के मामले को वकील मनु सिंघवी ने सीजेआई के पास रखा।

टीएमसी सांसद ने सुप्रीम कोर्ट में अपने निष्कासन के खिलाफ सुनवाई की माँग की है। उन्होंने कहा कि उन्हें सदन के अंदर चर्चा के दौरान बोलने का मौका नहीं मिला। इसके अलावा उन्होंने अपने ऊपर लगे आरोपों को लेकर भी कहा कि उनके खिलाफ लगे सारे आरोप सिर्फ दो लोगों की गवाहियाँ पर आधारित हैं जिनमें से एक उनका पुराना साथी है जिसने दुर्भावना से उनपर इल्जाम लगाए।

मोइत्रा के मुताबिक, जो लिखित गवाहियों उनके खिलाफ दी गईं वो भौतिक दृष्टि से विरोधाभासी भी हैं। उन्होंने कहा कि उनसे जिरह करने का अधिकार छीन लिया गया।

बता दें कि महुआ मोइत्रा के खिलाफ एथिक्स कमेटी ने अपनी रिपोर्ट पिछले महीने दी थी। इसमें उनके विरुद्ध कैश फॉर क्वेरी मामले में जाँच होकर कहा गया था कि महुआ 2019 से 2023 के बीच में चार बार दुबई गईं, जिसके बाद उनका संसद का लॉग-इन कई बार एक्सेस किया गया।

ऑस्ट्रेलिया के उस्मान ख्वाजा ने इजरायल के विरोध में पहना जूता, ICC ने लगाया बैन तो काला बैंड पहन कर उतरे खेलने: कहा – गाजा मेरे दिल के करीब है

ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेटर उस्मान ख्वाजा खुल कर इजरायल पर हमला करने वाले गाजा के समर्थन में आ गए हैं। उस्मान ख्वाजा ने इससे पहले पाकिस्तान के खिलाफ होने वाले टेस्ट मैच से पहले अपने जूते पर एक सन्देश लिखा था जो कि गाजा से सम्बंधित था। उस्मान ख्वाजा ऑस्ट्रेलिया के लिए ओपनिंग करते हैं। 36 वर्षीय उस्मान ख्वाजा मूल रूप से पाकिस्तानी हैं। उनका जन्म 1986 में पाकिस्तान में हुआ था।

उस्मान ख्वाजा ने पाकिस्तान से होने वाले टेस्ट से पहले प्रैक्टिस सेशन के दौरान अपने जूते के निचले हिस्से पर कई रंगों से लिखा था, “सभी जिंदगियाँ बराबर हैं। (All Lives Are Equal) और आजादी लोगों का अधिकार है। (Freedom is Human Right)” उस्मान के जूतों पर लिखा यह सन्देश गाजा से सम्बंधित था। उस्मान इजरायल का गाजा के आतंकियों पर बमबारी विरोध कर रहे थे जो कि गाजा से इजरायल पर हुए आतंकी हमले के बाद चालू हुई थी।

उनकी यह जूते पहने फोटो वायरल हुई थी। इसके बाद क्रिकेट की प्रशासक संस्था अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट काउंसिल (ICC) के अधिकारियों ने ख्वाजा को बताया था कि वह इन जूतों को पहन कर प्रैक्टिस या फिर आगामी टेस्ट मैच में नहीं जा सकते। यह उनके नियमों के विरुद्ध है।

दरअसल, ICC खिलाड़ियों के कपड़े, जूते या अन्य माध्यम से फील्ड पर खेलने के दौरान कोई सन्देश नहीं प्रसारित कर सकते जो राजनीतिक, धार्मिक या नस्लीय हो। ख्वाजा के जूतों पर लिखी बाद राजनीतिक श्रेणी में आती है। ख्वाजा ने ICC के इस फैसले पर अपना विरोध जताया है।

36 वर्षीय ख्वाजा ने इसके पश्चात एक वीडियो सोशल मीडिया पर जारी किया है, जिस्मने उन्होंने ICC से लड़ने की बात कही है। उन्होंने इस फैसले को लेकर मतभेद प्रकट किया। उन्होंने 2 मिनट लम्बे इस वीडियो में कहा, “मैं ज्यादा नहीं कहूँगा, मुझे जरूरत नहीं है। लेकिन मैं जो भी लोग मेरे जूतों पर लिखे सन्देश से आहत हुए हैं, उनको प्रश्न पूछना चाहिए कि क्या सबके लिए जीवन बराबर नहीं है या आज़ादी सबके लिए नहीं है।”

आगे उन्होंने जूते पर लिखी बातों के ऊपर कहा, “मेरे जूतों पर लिखा सन्देश राजनीतिक नहीं है। मैं यहाँ किसी का पक्ष नहीं ले रहा हूँ। मेरे लिए लोगों की जिन्दगी बराबर है। एक यहूदी की जिन्दगी मुस्लिम के बराबर है और हिन्दू के भी। मैं उनकी आवाज उठा रहा हूँ जो बोल नहीं सकते। गाजा मेरे दिल के करीब है।”

इसके बाद उन्होंने कहा, “ICC ने मुझे कहा है कि मैं वह जूते नहीं पहन सकता क्योंकि उनके दिशानिर्देशों के अंतर्गत यह एक राजनीतिक सन्देश है। मुझे नहीं लगता यह है। यह एक मानवीय अपील है। मैं उनके फैसले का सम्मान करता हूँ लेकिन मैं लडूँगा।”

इसके बाद 14 दिसम्बर, 2023 को पाकिस्तान के खिलाफ चालू हुए पहले टेस्ट के दौरान बैटिंग के लिए उतरे ख्वाजा अपनी बाँह पर एक काला बैंड बाँध कर उतरे। इस पर अभी ICC का कोई निर्णय नहीं आया है। उनका यह बैंड भी गाजा में आतंकियों के खिलाफ इजरायल की कार्रवाई को लेकर सन्देश था। उस्मान ख्वाजा इससे पहले भी गाजा को लेकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करते रहे हैं।

हालाँकि यह कोई पहली बार नहीं है कि मुस्लिम खिलाड़ियों ने क्रिकेट में गाजा जैसे मुद्दों को लाने का प्रयास किया हो। इससे पहले इंग्लैंड के क्रिकेटर मोईन अली भी गाज़ा को समर्थन करने वाले बैंड पहनने से रोके गए थे। यह वर्ष 2014 में हुआ था। गाजा मुद्दे के अलावा पाकिस्तानी खिलाड़ियों के फील्ड पर नमाज पढ़ने को लेकर भी प्रश्न उठाए जाते रहे हैं।

2 शब्द की जगह 3 शब्द लिखवाया सरदार पटेल ने… वो कदम, जिसके कारण अनुच्छेद 370 हटाया जा सका

आर्टिकल 370 और 35-ए अब पूरी तरह सदा-सदा के लिए इतिहास की बातें हैं। सुप्रीम कोर्ट की पाँच सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने की प्रक्रिया को सही करार दिया है। कोर्ट के मुताबिक अनुच्छेद 370 हटाने का केंद्र सरकार का फैसला संवैधानिक तौर पर सही है। यह फैसला J&K के एकीकरण के लिए था। अपना निर्णय सुनाते हुए कोर्ट ने माना:

  • जम्मू-कश्मीर राज्य की कोई आंतरिक संप्रभुता नहीं थी और भारतीय संविधान को जम्मू-कश्मीर राज्य में लागू करने के लिए राज्य सरकार की सहमति की आवश्यकता नहीं थी।
  • अनुच्छेद 370 एक अस्थायी प्रावधान था।
  • विलय पत्र और उद्घोषणा (दिनांक 25 नवंबर 1949) पर हस्ताक्षर के बाद जम्मू-कश्मीर संप्रभुता का कोई तत्व बरकरार नहीं रखता है।
  • अनुच्छेद 370 (3) के तहत राष्ट्रपति द्वारा शक्ति का प्रयोग भारतीय संविधान को उसकी संपूर्णता में लागू करना था।
  • यह कदम केवल देश के बाकी हिस्सों के साथ जम्मू-कश्मीर राज्य के संवैधानिक एकीकरण की प्रक्रिया को पूरा करने के लिए था।

सुप्रीम कोर्ट ने मानवाधिकार उल्लंघनों की जाँच के लिए सत्य एवं सुलह आयोग के गठन की भी सिफारिश की है। लद्दाख और जम्मू कश्मीर को अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने को लेकर भी जजों ने टिप्पणी की है। 370 पर फैसला सुनाते हुए सीजेआई ने कहा कि भारत की संसद को यह अधिकार है कि वह जम्मू कश्मीर और लद्दाख को अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेश बना सके। अनुच्छेद 3(A) के मद्देनजर लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के फैसले की वैधता को बरकरार रखते हैं। यह अनुच्छेद भारत की संसद को किसी भी राज्य से एक क्षेत्र को अलग करके केंद्र शासित प्रदेश बनाने की अनुमति देता है।

अनुच्छेद 370 की माँग शेख ने उठाई, प्रधानमंत्री नेहरू का मिला समर्थन

अनुच्छेद 370 से जम्मू कश्मीर को पूरी तरह आजादी मिल गई है। जम्मू-कश्मीर पर इसे थोपने का षड्यंत्र शेख अब्दुल्ला और नेहरू ने किया था। अनुच्छेद 370 को लागू करने के लिए शेख अब्दुल्ला ने सबसे पहले माँग की थी। उन्होंने इस मामले में 3 जनवरी 1949 को सरदार पटेल को एक पत्र लिखा। सरदार पटेल ने इसे मानने से साफ इनकार कर दिया। जब सरदार पटेल के सामने शेख अब्दुल्ला की नहीं चली तो उन्होंने यही प्रस्ताव पंडित नेहरू के सामने रखा।

शेख अब्दुल्ला की जम्मू-कश्मीर को विभाजित करने का षड्यंत्र

शेख अब्दुल्ला ने 14 अप्रैल 1949 को स्कॉट्समैन के पत्रकार माइकल डेविडसन को इंटरव्यू देकर जम्मू-कश्मीर के विभाजन की माँग की। इसके बाद पंडित नेहरू ने सरदार पटेल पर शेख की बातों को मानने का दबाव बनाया लेकिन जब सरदार पटेल असरदार बने रहे तो मई 1949 में पंडित नेहरू जम्मू कश्मीर चले गए और शेख अब्दुल्ला के साथ कई सारे समझौते किए। इसकी भनक तक सरदार पटेल को नहीं लगी।

नेहरू ने सरदार पटेल को पत्र लिख दबाव बनाने का कार्य किया

जब सरदार पटेल को भनक लगे बिना ही तैयार कर दिया 370 का ड्राफ्ट

अनुच्छेद 370 को लेकर ड्राफ्ट गोपालस्वामी आयंगर और शेख अब्दुल्ला ने मिलकर तैयार किया लेकिन जब इसके बारे में सरदार बल्लभ भाई पटेल को बताया गया तो उन्होंने इसे मानने से साफ इनकार कर दिया। सरदार पटेल के हस्तक्षेप के बाद इसका एक नया मसौदा तैयार किया गया, लेकिन उसे शेख ने मानने से इनकार कर दिया। इसके बाद आयंगर ने कुछ परिवर्तनों के साथ इसे फिर से शेख को भेजा, लेकिन इस बार सरदार पटेल ने इसे मानने से इनकार कर दिया।

शेख की अंतरिम सरकार को दिया जाना था सारा पावर, सरदार पटेल ने जताई थी आपत्ति

इसमें आखिरी परिवर्तन कर 17 अक्टूबर 1949 को संविधान सभा में पेश किया गया। शेख ने इसका विरोध किया और आयंगर को पत्र लिखकर संविधान सभा से इस्तीफा देने की धमकी दी। हालाँकि, सरदार पटेल के आगे किसी की नहीं चली। 370 के पहले ड्राफ्ट में सारी शक्तियाँ शेख के पास थीं, जिसे बदलवा कर पटेल ने शेख अब्दुल्ला की अंतरिम सरकार की जगह यूनियन ऑफ इंडिया जोड़ दिया।

अंतरिम सरकार की जगह यूनियन ऑफ इंडिया जोड़ा गया
अंतरिम सरकार की जगह यूनियन ऑफ इंडिया वाला ड्राफ्ट

सरदार पटेल का यही वो कदम था, जिसके कारण अनुच्छेद 370 हटाया जा सका। ये तथ्य सभी जानते हैं कि पंडित नेहरू के अहंकार और जिद के कारण जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय में देरी हुई थी जबकि महराजा हरि सिंह हमेशा से जम्मू-कश्मीर का विलय भारत में चाहते थे।

सरदार पटेल का सपना अब साकार हो गया है। आर्टिकल 370 को जम्मू-कश्मीर से हटाने के केंद्र सरकार के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने भी मुहर लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का देशभर में स्वागत हो रहा है।

अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद से जम्मू-कश्मीर वासियों को एक देश में एक विधान, एक प्रधान, एक निशान का सपना साकार हो गया है। डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की माँग पूरी हो गई है। यही नहीं जम्मू कश्मीर में देश के बाकी राज्यों की तरह समान अधिकार भी मिल रहे हैं… नया जम्मू कश्मीर चहुँमुखी विकास के पथ पर लगातार अग्रसर है। पाकिस्तान समेत किसी को भी ये भ्रम नहीं होना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर किसका है? जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग था, अभिन्न अंग है और अभिन्न अंग रहेगा।

सुप्रीम कोर्ट में ‘मनचाहे जज’ के सामने सुनवाई चाहते थे सत्येंद्र जैन, CJI चन्द्रचूड़ का इनकार: कहा- क्या करना है यह मैं नहीं कह सकता

सुप्रीम कोर्ट में मनचाहे जज के सामने सुनवाई की आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता सत्येंद्र जैन की अपील मुख्य न्यायाधीश (CJI) डीवाई चंद्रचूड़ ने ठुकरा दी है। सीजेआई ने कहा है कि वे किसी को जज को यह निर्देश दे सकते कि उन्हें क्या करना है।

दिल्ली की केजरीवाल सरकार में मंत्री रहे जैन मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में अभी मेडिकल ग्राउंड पर जमानत पर हैं। सुप्रीम कोर्ट में उनकी स्थायी जमानत को लेकर याचिका लंबित है। इसको लेकर ही उन्होंने सीजेआई से गुहार लगाई थी।

सत्येन्द्र जैन के वकील और कॉन्ग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने सत्येन्द्र जैन मामले की सुनवाई कर रही बेंच को बदलने की याचिका लगाई थी। उनकी इस याचिका को स्वीकार करने से चीफ जस्टिस डीवाई चन्द्रचूड़ ने इनकार कर दिया।

जानकारी के अनुसार, सिंघवी ने एक मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस चन्द्रचूड़ ने से कहा, “यह मामला पहले जस्टिस एएम बोपन्ना के सामने लंबित था, उन्होंने इस मामले को 2.5 घंटे तक सुना था। अब यह मामला जस्टिस बेला एम त्रिवेदी के सामने लगाया गया है।”

सिंघवी का कहना था कि जो जज इस मामले की सुनवाई पहले कर चुके हैं, उनके सामने ही दोबारा इस मामले को लगाया जाए। सिंघवी का दावा था कि इस मामले की पूरी सुनवाई जस्टिस बोपन्ना कर चुके हैं, इसलिए उन्हें ही इस मामले का निर्णय भी सुनाना चाहिए।

इस पर चीफ जस्टिस डीवाई चन्द्रचूड़ ने कहा, “मैं दूसरे जज के सामने लगे मामले को नियंत्रित नहीं करूँगा। जिसके सामने यह मामला लंबित है वही इस मामले पर आगे कोई कदम उठाएँगे। ” इस पर सिंघवी ने चीफ जस्टिस से इस मामले के दस्तावेज देखने की बात कही। इससे भी उन्होंने इनकार कर दिया।

दिल्ली की केजरीवाल सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे सत्येन्द्र जैन पर अपनी फर्जी कम्पनियों के जरिए हवाला का कारोबार चलाने का आरोप है। इसके अलावा उनके ऊपर इस काले धन को सफ़ेद करने और इससे जमीन खरीदने जैसे आरोप भी हैं। उनका दिल्ली शराब घोटाले में भी नाम आया था।

सत्येन्द्र जैन को मई 2023 में स्वास्थ्य आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने 6 सप्ताह की जमानत दी थी। इसके बाद से लगातार उनकी जमानत की अवधि बढ़ती रही है। सत्येन्द्र जैन ने इस बीच स्थायी जमानत की याचिका सुप्रीम कोर्ट के सामने लगाई थी।

हालाँकि यह कोई पहली बार नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट के वकील अपनी मर्जी के जज के सामने अपना मामला रखवाना चाहते हों। दुष्यंत दवे और प्रशांत भूषण जैसे वकील भी यही कर चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट लगातार कहता आया है कि वह ऐसे प्रयासों को सफल नहीं होने देगा।

सवाल: सैफ के साथ सेक्स सीन कैसे किया, करीना कपूर का जवाब: दिक्कत नहीं हुई, हम पहले से ही… चर्चा में ‘कुर्बान’ का ‘प्राइवेट ऑडिशन’

बॉलीवुड अभिनेत्री करीना कपूर खान ने हाल में एक शो के दौरान अपने और सैफ अली खान के बीच रिकॉर्ड हुए सेक्स सीन पर बात की। उन्होंने नेटफ्लिक्स के राउंडटेबल डिस्कशन के दौरान कुर्बान फिल्म के सीन पर बात करते हुए बताया कि वो लोग तो उससे पहले से ही डेट कर रहे थे।

दरअसल, शो के दौरान सिद्धार्थ मल्होत्रा ने उनसे कुर्बान फिल्म में जो सैफ अली खान और करीना कपूर खान का सेक्स सीन था, उसपर सवाल किया। इसके बाद एक्ट्रेस ने जवाब देते हुए कहा, “हम उससे पहले से एक दूसरे को डेट कर रहे थे। हमने ऑडिशन दिया तो वो भी ठीक था। कोई परेशानी नहीं थी।”

आप करीना के इस जवाब को वीडियो के 38:00 सेकेंड के बाद सुन सकते हैं। उनकी यह बात सुन काजोल ने उनका मजाक भी उड़ाया कि वो उनका प्राइवेट ऑडिशन था। यहाँ काजोल की बात सुनकर सबको हँसी भी आई।

बता दें कि करीना कपूर ने सैफ अली खान से 2012 में शादी की थी। इससे पहले दोनों एक साथ लिव-इन में रहते थे। 5 साल एक दूसरे के साथ रहकर करीना और सैफ अली खान ने इसलिए शादी की, क्योंकि उन्हें बच्चे चाहिए थे। साल 2016 में उनके पहला बच्चा तैमूर अली खान हुआ। इसके बाद 2021 में जेह अली खान हुआ।

डर्टी मैगजीन को दिए इंटरव्यू में एक बार करीना कपूर ने कहा था- “अब आप शादी इसलिए करते हो न क्योंकि आपको बच्चे चाहिए। मेरा मतलब है आप उसके बिना भी साथ में राह सकते हैं। मैं और सैफ शादी से पहले 5 साल लिव इन में रहे। हमने शादी इसलिए की क्योंकि हमको बच्चे चाहिए थी।”

एक्ट्रेस ने मैग्जीन में अपने पेरेंटिंग स्टाइल की भी चर्चा की थी। उन्होंने कहा था कि वह अपनी जिंदगी अपने बच्चों के आगे ही जीना चाहती हैं और अपने बच्चों के साथ सब कुछ करना चाहती हैं। उनका मानना है कि अगर वो लोग खुश रहेंगे तभी उनके बच्चे भी खुश रह पाएँगे।

अस्मत बनी नेहा सिंह, मुस्लिम शिक्षिका ने हलाला के डर से की ‘घर वापसी’: महाकाल का आशीर्वाद लेकर बोली- इस्लाम में औरतों की इज्जत नहीं

बरेली के एक प्राइवेट स्कूल की 33 साल की शिक्षिका नेहा असमत ने इस्लाम में हलाला और ‘तीन तलाक’ के डर से हिंदू धर्म अपना लिया है। अब नेहा सिंह बन चुकी इस टीचर का कहना है कि उसने अपनी मर्जी से हिंदू धर्म अपनाया है। वो भगवान शंकर को अपना आराध्य मानती हैं।

उन्होंने इस बात का ऐलान किया कि उज्जैन के महाकाल के दरबार में आशीर्वाद लेकर उन्होंने हिंदू धर्म अपना लिया। दरअसल, इस टीचर के परिवार ने उनके साथी शिक्षक मोहित सिंह पर उन्हें अगवा करने का शक जताते हुए सोमवार (11 नवंबर, 2023) को बारादरी थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। अब इस टीचर ने अपनी और अपने साथी मोहित को जान का खतरा बताकर बरेली एसएसपी, डीएम और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से सुरक्षा की गुहार लगाई है। जानकारी के मुताबिक, नेहा की अम्मी रानी बेगम ने सोमवार को बारादरी थाने में नेहा के अपहरण की रिपोर्ट कराई थी।

इस रिपोर्ट के आधार पर बारादरी पुलिस नेहा की तलाश कर रही थी। इस दौरान नेहा का उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर का फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इस दौरान नेहा सिंह बन चुकी टीचर ने बरेली SSP के दफ्तर में अपनी सुरक्षा के लिए पत्र लिखा है।

इस पत्र के मुताबिक, उसने लिखा है कि वो बरेली के मुस्लिम बाहुल्य इलाके फाइक एनक्लेव की रहने वाली है। शुरू से ही उनका सनातन धर्म के लिए झुकाव था। उन्होंने बरेली कॉलेज से ग्रेजुएशन किया है और उसके बाद बीएड कर रही हैं और इसके साथ ही स्कूल में पढ़ा रही हैं। नेहा सिंह के मुताबिक, वो पढ़ी-लिखी और नौकरीपेशा है और खुद अच्छा-बुरा सब समझती हैं। उनके मुताबिक, बीज विकास निगम में लेखाकार रहे अब्बा असमत अली की मौत हो चुकी है।

मुस्लिम शिक्षिका नेहा असमत का पुलिस को दिया शिकायत पत्र (फोटो साभार: दैनिक भास्कर )

उनका आरोप है कि इसके बाद से ही उनकी अम्मी रानी बेगम के साथ मिलकर उनकी बहन गजाला, शबाना, बहनोई डॉ आसिफ और तनवीर अहमद उनका निकाह एक ऐसे अधेड़ शख्स से कराने की साजिश रच रहे हैं जो अपनी बीवी से तलाक लेने के बाद उसका हलाला करा चुका है। टीचर नेहा के मुताबिक, उन्हें यह शादी पसंद नहीं थी और परिवार ने अधिक दबाव बनाया तो उन्होंने घर छोड़ दिया। नेहा ने पुलिस को दी गई अपनी शिकायत में अपने धर्म परिवर्तन का प्रमाणपत्र नत्थी किया है लेकिन इसमें अपनी शादी का जिक्र नहीं किया है।

उन्होंने ये भी साफ किया कि उनके परिवारवालों की संजयनगर के रहने वाले मोहित सिंह के खिलाफ अपहरण की रिपोर्ट झूठी है। जबकि उन्होंने खुद की मर्जी से घर छोड़ा और बगैर किसी दबाव के सनातन धर्म अपनाया है।

नेहा का कहना है कि उनके परिवार से उन्हें, मोहित और उसके परिवार को भी जान का खतरा है। वो उनका कत्ल करा सकते हैं। उन्होंने कहा है कि उनके और मोहित के साथ कुछ भी अनहोनी हुई तो इसके लिए उनका मुस्लिम परिवार जिम्मेदार होगा।