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वीणा की नाद, माँ सरस्वती का आशीर्वाद और ज्ञान का प्रकाश: क्यों बसंत पंचमी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय चेतना का उत्सव है

भारतीय परंपरा में त्योहार केवल कैलेंडर की तारीख नहीं होते, बल्कि वे प्रकृति, जीवन और चेतना के साथ गहरे संवाद का माध्यम होते हैं। बसंत पंचमी ऐसा ही एक पर्व है, जो मौसम के बदलाव से कहीं आगे जाकर मनुष्य के भीतर नई ऊर्जा, नई संवेदनशीलता और नई दृष्टि का संचार करता है।

यह पर्व माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है और इसे माघ पंचमी या श्री पंचमी भी कहा जाता है। हिंदू चूँकि इस पर्व के बाद के समय को शुभ कार्यों, नई शिक्षा, गृह प्रवेश, व्यवसाय आरंभ और विद्यारंभ के लिए अत्यंत मंगलकारी मानते हैं इसलिए इसे ‘बसंत पंचमी’ के तौर पर भी जाना जाता है। यहाँ ‘बसंत’ का अर्थ सिर्फ ऋतु से नहीं, बल्कि इसका तात्पर्य जीवन में गति के आगमन से है।

बसंत पंचमी: ऋतु परिवर्तन नहीं, जीवन में गति का आगमन

बसंत पंचमी केवल ठंड के अंत और गर्मी की शुरुआत का संकेत नहीं है, बल्कि यह ठहराव से गति की ओर बढ़ने का पर्व है। शीत ऋतु को भारतीय दर्शन में निष्क्रियता और जड़ता का समय माना गया है, जबकि बसंत सक्रियता, सृजन और विस्तार का प्रतीक है।

प्रकृति के साथ-साथ मानव जीवन भी इस परिवर्तन से प्रभावित होता है। मन अधिक उत्साही होता है, भावनाएँ प्रबल होती हैं और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होता है। यही कारण है कि बसंत पंचमी को शुभ कार्यों, नई शिक्षा, गृह प्रवेश, व्यवसाय आरंभ और विद्यारंभ के लिए अत्यंत मंगलकारी माना गया है।

सृष्टि में वाणी और ज्ञान का अवतरण

पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की, तब संसार दृश्य रूप में तो मौजूद था, लेकिन उसमें ध्वनि, संवाद और अभिव्यक्ति का अभाव था। चारों ओर मौन और निस्तब्धता छाई हुई थी। इस अपूर्णता को देखकर ब्रह्मा संतुष्ट नहीं थे।

भगवान विष्णु की अनुमति से ब्रह्मा ने अपने कमंडल से जल छिड़का। जैसे ही जल धरती पर गिरा, उसमें कंपन उत्पन्न हुआ और एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई। यह शक्ति थीं माँ सरस्वती, जिनके हाथों में वीणा, पुस्तक, माला और वर मुद्रा थी।

जब देवी ने वीणा का नाद किया, तब सृष्टि को वाणी प्राप्त हुई। पशु-पक्षी, मनुष्य, जल और वायु, सबमें ध्वनि और चेतना का संचार हुआ। इसी दिन को बसंत पंचमी माना गया और इसे सरस्वती जयंती के रूप में प्रतिष्ठा मिली।

माँ सरस्वती: विद्या से आगे विवेक की अधिष्ठात्री

भारतीय संस्कृति में ज्ञान को केवल सूचना या डिग्री तक सीमित नहीं माना गया। माँ सरस्वती उस ज्ञान की प्रतीक हैं जो मनुष्य को अधिक शांत, अधिक विचारशील और अधिक संवेदनशील बनाता है। ऋग्वेद में सरस्वती को चेतना की प्रवाहमान धारा कहा गया है, जो मनुष्य की बुद्धि, प्रज्ञा और आचार का आधार बनती है।

इसी कारण इस दिन विद्यार्थी, शिक्षक, लेखक, कवि, कलाकार और संगीतकार विशेष रूप से माँ सरस्वती की आराधना करते हैं। परंपरागत रूप से बसंत पंचमी को बच्चों के विद्यारंभ के लिए सबसे शुभ माना गया है। आंध्र प्रदेश में तो इसे विद्यारंभ पर्व के नाम से जाना जाता है, जहाँ बच्चों को इसी दिन पहली बार अक्षर ज्ञान कराया जाता है।

होली का शुभारंभ और ब्रज की परंपराएँ

बसंत पंचमी के साथ ही ब्रज क्षेत्र में होली की औपचारिक शुरुआत हो जाती है। मंदिरों में ठाकुरजी को गुलाल अर्पित किया जाता है और रसिया, धमार और होरी का गायन शुरू हो जाता है। बरसाना की लट्ठमार होली, वृंदावन की रंगपंचमी, बनारस में बाबा विश्वनाथ से लेकर महाश्मशान तक खेली जाने वाली होली, ये सब परंपराएँ इस बात का प्रतीक हैं कि भारतीय संस्कृति में मृत्यु के बीच भी जीवन का उत्सव मनाया जाता है।

भारत के विविध रंगों में बसंत पंचमी

बसंत पंचमी पूरे भारत में अलग-अलग रूपों में मनाई जाती है। बंगाल में यह सरस्वती पूजा का प्रमुख पर्व है। बिहार और उड़ीसा में इसका गहरा संबंध कृषि अनुष्ठानों से है। राजस्थान, मथुरा और वृंदावन में सांस्कृतिक उत्सवों की धूम रहती है।

पंजाब में यह पर्व पतंगबाजी, सरसों के खेतों और लोकगीतों के साथ मनाया जाता है। विशेष रूप से पंजाब में बसंत पंचमी केवल धार्मिक नहीं, बल्कि लोकजीवन और खेती से जुड़ा बड़ा उत्सव है।

पश्चिम बंगाल में लश्कर के लिए भर्ती करने वाले आतंकी को 10 साल की सजा, NIA कोर्ट ने सैयद इरदीस को माना दोषी: साथी तानिया परवीन को सजा सुनाना बाकी, पढ़ें फैसले की अहम बातें

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) की एक विशेष अदालत ने 21 जनवरी को सैयद एम इदरीस को 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। चीफ जस्टिस सुकुमार राय ने यह फैसला सुनाया। इदरीस ने प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के लिए पश्चिम बंगाल में मुस्लिम युवाओं की भर्ती और उन्हें कट्टरपंथी बनाने की पाकिस्तान समर्थित साजिश में अपनी भूमिका स्वीकार कर ली थी। जेल की सजा के साथ-साथ अदालत ने उस पर कुल 70,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया है। इस सजा से संबंधित अदालती दस्तावेज ऑपइंडिया (OpIndia) के पास उपलब्ध हैं।

20 जनवरी को अदालत ने इदरीस द्वारा स्वेच्छा से जुर्म कबूल करने की याचिका को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया। यह मामला एनआईए (NIA) द्वारा साल 2020 में दर्ज की गई एक पुरानी आतंकी साजिश से जुड़ा है। अदालत ने इदरीस को 10 साल जेल की सजा सुनाई है। वहीं, इसी मामले में आरोपित तानिया परवीन और पाकिस्तान में मौजूद दो अन्य आरोपितों के खिलाफ सुनवाई अभी भी जारी है।

दोषी ठहराए जाने के बाद कोर्ट ने सजा सुनाई

मामले की सुनवाई पहले ही शुरू हो चुकी थी, लेकिन 20 जनवरी को इदरीस ने अदालत के सामने अपना जुर्म कबूल करने की इच्छा जताई। अदालत ने उसे जुर्म कबूल करने के कानूनी नतीजों के बारे में जानकारी दी। इसके बाद कोर्ट ने पाया कि इदरीस ने यह फैसला बिना किसी दबाव के, साफ तौर पर और कानूनी पहलुओं को अच्छी तरह समझकर लिया है।

अदालत ने सरकारी और बचाव पक्ष, दोनों की दलीलें सुनीं। कोर्ट ने कहा कि आरोपित पर लगे जुर्म बहुत गंभीर हैं, जिनमें आतंकवादी गतिविधियाँ और भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने की साजिश शामिल है। इन आरोपों को देखते हुए सख्त सजा देना जरूरी था। हालाँकि, अदालत ने गौर किया कि आरोपित ने अपने किए पर पछतावा जताया है, लेकिन कोर्ट ने साफ किया कि ऐसे मामलों में कड़ी सजा का उद्देश्य दूसरों को डराना और सुधार लाना ही होता है।

मामले की पृष्ठभूमि और FIR का विवरण

इदरीस के खिलाफ यह मामला 18 मार्च 2020 को पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के बादुरिया थाने में दर्ज एक एफआईआर (FIR) से शुरू हुआ था। वहाँ की पुलिस को खुफिया जानकारी मिली थी कि लश्कर-ए-तैयबा के कुछ लोग इंटरनेट के जरिए युवाओं को कट्टरपंथी बनाने और उन्हें गुमराह करने का काम कर रहे हैं।

पुलिस ने इस मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की कई गंभीर धाराओं के साथ-साथ आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) और आईटी एक्ट के तहत केस दर्ज किया था। इन धाराओं में भारत के खिलाफ साजिश रचने और धोखाधड़ी जैसे आरोप शामिल थे।

चूँकि यह मामला सीमा पार की आतंकी गतिविधियों और देश की सुरक्षा से जुड़ा था, इसलिए 3 अप्रैल 2020 को गृह मंत्रालय ने इसकी जाँच एनआईए (NIA) को सौंपने का आदेश दिया। इसके बाद एनआईए ने 5 अप्रैल 2020 को नए सिरे से केस दर्ज कर इस पूरे मामले की जाँच अपने हाथों में ले ली।

जाँचकर्ताओं द्वारा उजागर की गई LeT साजिश की प्रकृति

जांच में पता चला कि पश्चिम बंगाल में लश्कर-ए-तैयबा का एक गुप्त ग्रुप काम कर रहा था। इस ग्रुप में करीब 20 से 25 लोग शामिल थे। यह लोग पाकिस्तान में बैठे आकाओं के इशारे पर काम कर रहे थे। उनका मुख्य मकसद भारत की एकता, अखंडता और सुरक्षा को नुकसान पहुँचाना था।

इस साजिश के तहत सोशल मीडिया और मैसेजिंग ऐप्स का इस्तेमाल कट्टरपंथी विचारधारा फैलाने और जिहाद का महिमामंडन करने के लिए किया गया। अभियोजन पक्ष के अनुसार, इस मॉड्यूल का काम भोले-भाले युवाओं को पहचान कर उन्हें अपने साथ जोड़ना था। वे समाज में नफरत फैलाने और देश को तोड़ने वाले प्रोपेगेंडा का इस्तेमाल कर रहे थे, ताकि भारत में बड़ी आतंकी घटनाओं को अंजाम दिया जा सके।

दोषी ठहराए गए आरोपित को सौंपी गई भूमिका

जाँच एजेंसी के अनुसार, कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ का रहने वाला इदरीस इस साजिश में कोई मामूली सदस्य नहीं था। वह प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा (LeT) का एक सक्रिय कार्यकर्ता था, जो कम से कम 2014 या उससे भी पहले से इस बड़ी साजिश का हिस्सा रहा था।

सोर्स: कलकत्ता जिला अदालत

अदालत ने गौर किया कि इदरीस ने इंटरनेट और सोशल मीडिया के जरिए भारत और विदेशों में लोगों को लश्कर की गैरकानूनी गतिविधियों के लिए उकसाया, उन्हें सलाह दी और भड़काया। वह ऑनलाइन प्रोपेगेंडा फैलाने, आपसी तालमेल बिठाने और भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने के इरादे से युवाओं की भर्ती करने जैसे कामों में पूरी तरह शामिल पाया गया।

अभियोजन पक्ष ने यह साबित किया कि इदरीस ने आपराधिक बल के दम पर केंद्र और राज्य सरकारों को डराने की साजिश रची थी। उसने डिजिटल माध्यमों का सहारा लेकर आतंकी उद्देश्यों के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश की। इन्हीं गंभीर हरकतों की वजह से उस पर आईपीसी की धाराओं और सख्त आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) के तहत मुकदमा चलाया गया।

अन्य आरोपितों और पाकिस्तान स्थित हैंडलर्स से संबंध

जाँचकर्ताओं ने पाया कि इदरीस, तानिया परवीन के साथ मिलकर काम कर रहा था, जिसे पश्चिम बंगाल मॉड्यूल की मुख्य साजिशकर्ता माना गया है। वह जम्मू-कश्मीर के अल्ताफ अहमद राथर के संपर्क में भी था। मार्च 2020 में पश्चिम बंगाल पुलिस की एसटीएफ (STF) ने बादुरिया में छापेमारी के दौरान तानिया परवीन को गिरफ्तार किया था। उस समय उसके पास से जिहादी किताबें और कई अन्य आपत्तिजनक चीजें बरामद हुई थीं।

जाँच में यह भी पता चला कि तानिया परवीन एक कॉलेज छात्रा थी, जिसे पाकिस्तान में बैठे लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों ने इंटरनेट के जरिए कट्टरपंथी बनाया था। वह सोशल मीडिया पर ऐसे कई कट्टरपंथी समूहों से जुड़ी थी जो आतंकी विचारधारा फैलाते थे। स्थानीय युवाओं को आतंकी ग्रुप में भर्ती करने और सीमा पार बैठे आकाओं से संपर्क बनाए रखने में उसकी मुख्य भूमिका थी।

एनआईए (NIA) ने इस पूरी साजिश में पाकिस्तान में छिपे दो अन्य भगोड़ों की भी पहचान की है। इनके नाम आयशा (उर्फ आयशा बुरहान/आयशा सिद्दीकी/सैयद आयशा) और बिलाल (उर्फ बिलाल दुर्रानी) हैं।

दोष स्वीकार करना और अदालत का फैसला

मुकदमे की सुनवाई के दौरान, 20 जनवरी को इदरीस ने अदालत को बताया कि वह अपना जुर्म कबूल करना चाहता है। इस पर अदालत ने आरोपित से विस्तार से बात की और उसे जुर्म कबूल करने के कानूनी नतीजों के बारे में साफ-साफ समझाया।

जब अदालत को यह यकीन हो गया कि आरोपित बिना किसी दबाव के और पूरी समझ के साथ अपना गुनाह मान रहा है, तब कोर्ट ने उसकी याचिका स्वीकार कर ली। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अगर पूरी सावधानी बरती जाए, तो आरोप तय होने के बाद भी जुर्म कबूल करने की याचिका को मंजूर किया जा सकता है।

सजा सुनाने की सुनवाई और प्रस्तुतियाँ

21 जनवरी को सजा सुनाए जाने के दौरान, इदरीस ने अदालत को अपने परिवार के बारे में बताया, जिसमें उसकी पत्नी, बच्चा और बीमार माता-पिता शामिल हैं। उसने अपने किए पर पछतावा जताया और कम सजा देने की अपील की। इदरीस ने यह भी दावा किया कि वह अब समाज की मुख्यधारा में वापस लौटना चाहता है। बता दें कि जब इदरीस को कर्नाटक के उत्तर कन्नड़ से गिरफ्तार किया गया था, तब वह 28 साल का था और अपने भाई के साथ रहता था।

इदरीस के पछतावे को सुनने के बाद भी सरकारी वकील ने उसे कड़ी से कड़ी सजा देने की माँग की। उन्होंने तर्क दिया कि यह मामला आतंकी गतिविधियों से जुड़ा है, जिसका देश की सुरक्षा पर गहरा और बुरा असर पड़ता है। अदालत ने इदरीस और अभियोजन पक्ष, दोनों की बातों पर गौर किया। अंत में कोर्ट इस नतीजे पर पहुँचा कि भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने और एक प्रतिबंधित आतंकी संगठन का साथ देने जैसे गंभीर मामले में किसी भी तरह की ढिलाई या रियायत देना ठीक नहीं होगा।

अदालत द्वारा सुनाया गया विस्तृत फैसला

अदालत ने सैयद एम इदरीस को आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत 10 साल के सश्रम कारावास (कड़ी कैद) की सजा सुनाई और 10,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया। इसके साथ ही, उसे सख्त आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) की धाराओं के तहत 5 साल की जेल और 10,000 रुपए के अतिरिक्त जुर्माने की सजा दी गई है।

सोर्स:कलकत्ता जिला कोर्ट

ये सभी सजाएँ एक साथ चलेंगी, यानी उसे अधिकतम 10 साल जेल में बिताने होंगे। कानून के मुताबिक, जाँच और मुकदमे के दौरान इदरीस पहले ही जितना समय हिरासत में बिता चुका है, उसे उसकी कुल सजा की अवधि में से घटा दिया जाएगा।

बाकी आरोपितों के खिलाफ मुकदमे की स्थिति

भले ही इदरीस को उसके जुर्म कबूल करने के आधार पर दोषी ठहराकर सजा सुना दी गई है, लेकिन इस मामले में तानिया परवीन और अल्ताफ अहमद राथर के खिलाफ सुनवाई जारी रहेगी। ये दोनों आरोपित फिलहाल न्यायिक हिरासत में जेल में बंद हैं। इसके अलावा, एनआईए (NIA) ने इस साजिश में शामिल पाकिस्तान में छिपे भगोड़े आरोपितों, आयशा और बिलाल के खिलाफ रेड और ब्लू कॉर्नर नोटिस भी जारी करवा लिए हैं।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

ग्रामीण भारत में शिक्षा से 2 गुना ज्यादा तंबाकू-गुटखे पर खर्च, रिसर्च में सामने आई खौफनाक तस्वीर: ओडिशा की BJP सरकार ने लगाया बैन

तम्बाकू पर ओडिशा सरकार ने पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। इससे पहले महाराष्ट्र, तमिलनाडु, केरल, गोवा, गुजरात जैसे कई राज्यों में गुटखा, जर्दा और निकोटीन वाले तंबाकू उत्पादों के उत्पादन और बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया था। केन्द्र ने भी युवाओं में लोकप्रिय हो रहे ई सिगरेट पर बैन लगाया, सिगरेट पर स्वास्थ्य चेतावनियाँ लिखी। इसके बावजूद देश में गुटखा और तम्बाकू युक्त उत्पादों की बिक्री और सेवन में बेतहाशा वृद्धि हुई है।

भारत एक गुटका- नेशन बन चुका है। घरेलू इस्तेमाल को लेकर हाल में हुए एक सर्वे में बताया गया है कि गाँवों में गुटखा और दूसरे तम्बाकू वाले उत्पादों पर कुल इनकम का 4 फीसदी खर्च होता है, जबकि पढ़ाई पर 2.5 फीसदी खर्च किया जाता है।

ओडिशा सरकार ने लगाया प्रतिबंध

ओडिशा सरकार ने तंबाकू को लेकर बड़ा फैसला किया है। 22 जनवरी 2026 को ओडिशा सरकार ने बीड़ी, सिगरेट, गुटखा, खैनी और जर्दा समेत सभी तंबाकू वाले पदार्थों पर बैन लगा दिया है। इनके प्रोडक्शन, पैकेजिंग, डिस्ट्रीब्यूशन और बेचने पर भी राज्य में प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसका नोटिफिकेशन 21 जनवरी को आया था।

ओडिशा के स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक गुटखा, जर्दा और तंबाकू उत्पादों का सेवन कैंसर की सबसे बड़ी वजह है। इसके अलावा पान मसाला, धुआँ पत्ता, पान-सुपारी जैसे उत्पाद स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक हैं। इनसे मुँह, गले, पेट, किडनी, फेफड़े आदि के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। ओडिशा में करीब 25 % वयस्क तम्बाकू का इस्तेमाल करते हैं, जो देश के औसत से दोगुणा है।

गुटखा के सेवन में बेतहाशा बढ़ोतरी

नेशनल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस (NSO) ने अगस्त 2023 से जुलाई 2024 तक घरेलू खपत खर्च पर एक सर्वे किया। स्टडी की एक खास बात देश में गुटखा की खपत में बढ़ोतरी थी, इस बात पर EAC-PM (प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद) की सदस्य शमिका रवि और उनके साथी पार्थ प्रोतिम बर्मन ने भी इंडियन एक्सप्रेस के एक हालिया आर्टिकल पर चर्चा की।

नेशनल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस, मिनिस्ट्री ऑफ़ स्टैटिस्टिक्स एंड प्रोग्राम इम्प्लीमेंटेशन (MoSPI) का हिस्सा है। यह खाने और नॉन-फूड दोनों तरह के प्रोडक्ट्स पर डेटा इकट्ठा करता है और उसकी एनालिसिस करता है। जनवरी 2026 में पब्लिश हुए हालिया एनालिसिस ने इस बात पर जोर दिया गया है कि कैसे गुटखा का इस्तेमाल सभी राज्यों, खासकर देश के उत्तरी राज्यों में एक आम बात हो गई है। वहीं दक्षिणी राज्यों में इसका इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है।

द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, रवि और बर्मन ने बताया कि तंबाकू का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। निचले तबके के लोग इसकी वजह से और गरीब होते जा रहे हैं। यह सब तब हो रहा है जब राज्यों में सब्सिडी वाली हेल्थकेयर बढ़े हैं।

महँगाई के हिसाब से देखें तो 2011-12 और 2023-2024 के बीच तंबाकू पर प्रति व्यक्ति खर्च ग्रामीण इलाकों में 58% और शहरी इलाकों में 77% तक बढ़ गया है। अब तम्बाकू ग्रामीण इलाकों में महीने के प्रति व्यक्ति कंज्यूमर खर्च (MPCE) का लगभग 1.5% और शहरी इलाकों में 1% हिस्सा बन गया है। ये आंकड़े मामूली लग सकते हैं, लेकिन यह चिंता की बात है कि तंबाकू का इस्तेमाल करने वाले परिवारों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है।

ग्रामीण इलाकों से परेशान करने वाले आँकड़े

ग्रामीण भारत में तंबाकू इस्तेमाल करने वाले घरों की संख्या 9.9 करोड़ (कुल घरों का 59.3%) से बढ़कर 13.3 करोड़ (68.6%) हो गई है। महज एक दशक से भी कम समय में 33% की बढ़ोतरी हुई है।

रवि और बर्मन ने बताया कि शहरी भारत में तम्बाकू इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या में बढ़ोतरी का आंकड़ा और भी चौंकाने वाला है। तंबाकू सेवन करने वाले परिवारों की संख्या 2.8 करोड़ (34.9%) से बढ़कर 4.7 करोड़ (45.6%) हो गई। परेशान करने वाली बात यह है कि तंबाकू का इस्तेमाल शहरी और ग्रामीण दोनों इलाकों में तेजी से बढ़ता जा रहा है। यह अब सिर्फ खास ग्रुप या आबादी तक ही सीमित नहीं है।

ग्रामीण इलाकों में सबसे बड़ा खुलासा गुटखा को लेकर हुआ है। यहाँ गुटखा खाने वाले परिवारों की संख्या 6 गुणा बढ़ी है। पहले यह 5.3% थी, जो बढ़कर अब 30.4% हो गया है। ग्रामीण इलाकों में तंबाकू पर होने वाले कुल खर्च का 41 फीसदी गुटखे पर ही होता है, जिससे यह सबसे बड़ा तंबाकू उत्पाद बन गया है।

दूसरी ओर, शहरी भारत भी इससे अछूता नहीं है. शहरों में सिगरेट सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला तंबाकू उत्पाद है, जिसे 18.1 फीसदी शहरी परिवार इस्तेमाल करते हैं। साथ ही अब करीब 16.8 फीसदी शहरी परिवार भी गुटखा खाते हैं, जो दिखाता है कि यह उत्पाद शहरों में कितनी तेजी से फैल रहा है।

सेंट्रल भारत में गुटखा का इस्तेमाल ज्यादा है

रवि और बर्मन ने बताया कि मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में देश के ग्रामीण औसत लगभग 30% से ज़्यादा गुटखा का इस्तेमाल होता है। मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में 60% गुटखा खाते हैं और उत्तर प्रदेश पहले ही 50% का आँकड़ा पार कर चुका है। दिक्कत यह है कि शहरी ट्रेंड भी अब ग्रामीण जैसे होने लगे हैं।

मध्य प्रदेश के लगभग आधे शहरी घरों में गुटखा खाया जाता है, जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान में यह आँकड़ा एक-तिहाई से भी ज़्यादा है। रिपोर्ट के मुताबिक, कई नॉर्थ-ईस्ट राज्यों में भी ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में गुटखा का इस्तेमाल नेशनल औसत से ज्यादा है। दक्षिणी भारत में इसका इस्तेमाल आम तौर पर कम होता है, लेकिन नतीजे परेशान करने वाले हैं। कर्नाटक में चार में से एक ग्रामीण परिवार गुटखा का इस्तेमाल करता है।

अलग-अलग वर्ग में सेवन का तरीका अलग

गरीब ग्रामीण परिवार अपने हर महीने के कुल खर्च का 1.7 फीसदी तंबाकू पर खर्च करते हैं, जबकि सबसे अमीर 20 फीसदी परिवार अपनी हर महीने के कुल खर्च का सिर्फ 1.2 फीसदी तंबाकू पर खर्च करते हैं। शहरी भारत में यह अंतर और भी गहरा है। यहाँ निचले वर्ग के 40 फीसदी परिवारों में आधे से ज्यादा तंबाकू का सेवन करते हैं, जबकि सबसे अमीर 20 फीसदी परिवारों में यह आँकड़ा 37 फीसदी से भी कम है।

तंबाकू का इस्तेमाल निचले तबके के घरों में ज्यादा आम है। इनकम डिस्ट्रीब्यूशन के सबसे निचले 40% हिस्से में 70% से ज्यादा ग्रामीण परिवार तंबाकू का इस्तेमाल करते हैं। यह प्रतिशत बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के 85% से ज्यादा है।

गुटखा सेहत और पैसे पर भारी

गुटखा खाने से न केवल पैसे खर्च होते हैं, बल्कि इससे गंभीर बीमारियाँ भी होती है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुमान के मुताबिक, तंबाकू से भारत में हर साल लगभग 13 लाख मौतें होती हैं। यह कैंसर, दिल की बीमारी, सांस की बीमारियों और हाइपरटेंशन जैसी नॉन-कम्युनिकेबल बीमारियाँ (NCDs) होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, देश में होने वाली सभी मौतों में से 63% के लिए NCDs जिम्मेदार हैं।

तम्बाकू के इस्तेमाल से हेल्थकेयर पर काफी असर पड़ा है। केन्द्र ने आयुष्मान भारत जैसी योजना को कमजोर परिवारों को मेडिकल खर्चों से बचाने के लिए बनाया था। अक्टूबर 2025 तक लगभग 12 करोड़ परिवारों को 42 करोड़ से ज्यादा आयुष्मान कार्ड मिल चुके थे। इस प्रोग्राम की वजह से परिवारों को मेडिकल खर्चों में लगभग 1.52 लाख करोड़ रुपये की बचत हुई।

FY 2015 और FY2022 के बीच सरकारी हेल्थ खर्च 29% से बढ़कर 48% हो गया।

जब कम इनकम वाले घरों में तंबाकू के बढ़ते इस्तेमाल से बीमारियों पर खर्च बढ़ गया है। इसकी वजह से देश को हेल्थकेयर पर ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है। ग्रामीण भारत में सबसे गरीब 40% घर अपने MPCE का सिर्फ 2.5% शिक्षा पर खर्च करते हैं, जबकि शराब, तंबाकू और नशीली चीजों पर 4% खर्च होता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि तंबाकू के इस्तेमाल में बिना किसी रोक-टोक के बढ़ोतरी, सरकार के सोशल प्रोटेक्शन और यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज के कमिटमेंट के साथ मेल नहीं खाती। HCES (हाउसहोल्ड कंजम्पशन एक्सपेंडिचर सर्वे) ने इसको लेकर चेतावनी भी दी है।

इस संवेदनशील मामले से निपटने के लिए सुझाव भी दिए गए हैं। इसमें कहा गया है कि सिर्फ चबाने वाले तंबाकू पर और टैक्स लगाना काफी नहीं होगा, भले ही सेंट्रल एक्साइज़ (अमेंडमेंट) बिल 2025 में इसकी माँग की गई हो। इसके लिए रेगुलेटरी कंट्रोल को मज़बूत करना ज़रूरी है और बॉलीवुड के बड़े सेलेब्रिटीज के ऐसे प्रचार पर रोक लगनी चाहिए, जो ‘चांदी की परत चढ़ी इलायची’ की आड़ में पान मसाला और गुटखा को प्रमोट करने के लिए सरोगेट एडवरटाइजिंग का इस्तेमाल कर रहे हैं।

(यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

286 किलो वजन, 08 फीट लंबाई, पंच धातु से निर्मित… क्या है ‘कोदंड’ जो अजानबाहु को किया समर्पित: जानिए इसके बारे में क्या कहते हैं धर्मग्रंथ

रामभक्तों के लिए बुधवार (22 जनवरी 2026) का दिन बहुत खास है। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा की दूसरी वर्षगांठ पर अयोध्या को एक अनमोल भेंट मिली है। ये भेंट है 286 किलोग्राम वजनी भव्य कोदंड। पंचधातु से बना यह धनुष ओडिशा से भव्य शोभायात्रा के साथ अयोध्या पहुँचा। मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने इसे विधि-विधान से स्वीकार किया। हजारों श्रद्धालु, संत-महात्मा और ट्रस्ट के पदाधिकारी मौजूद थे। हर कोई इसकी भव्यता और दिव्यता देखकर अभिभूत हो गया।

यह कोदंड सिर्फ एक धनुष नहीं है, बल्कि भगवान श्रीराम के शौर्य, धर्म और मर्यादा का प्रतीक है। यह आस्था, भारतीय शिल्पकला, राष्ट्रभक्ति और नारीशक्ति का अद्भुत मिलन है। ओडिशा के सनातन जागरण मंच ने इसे रामलला को समर्पित किया।

कोदंड क्या है और रामायण में इसका महत्व क्या है

कोदंड भगवान श्रीराम के धनुष का नाम है। वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास जी की रामचरितमानस में इसका बार-बार जिक्र मिलता है। श्रीराम को कोदंडधारी कहा जाता है, क्योंकि यह उनके बल, न्याय और अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक है।

उदाहरण के लिए, सीता स्वयंवर में श्रीराम ने शिव जी का भारी धनुष (जो कोदंड जैसा ही था) आसानी से उठाया और उसकी डोरी चढ़ाते ही वह टूट गया। इससे राजा जनक की पुत्री माता सीता का विवाह श्रीराम से हुआ। यह घटना बताती है कि श्रीराम कितने बलशाली और मर्यादित थे। परशुराम जी भी गुस्से में आए, लेकिन श्रीराम ने शांतिपूर्वक उनका क्रोध शांत किया।

तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में श्रीराम के सौंदर्य का वर्णन करते हुए लिखा है-

“कोदंड कठिन चढ़ाइ सिर जट जूट बाँधत सोह क्यों।
मरकत सयल पर लरत दामिनि कोटि सों जुग भुजग ज्यों॥”

अर्थात, कठिन कोदंड को चढ़ाए हुए, सिर पर जटाजूट बाँधे श्रीराम कितने सुंदर लगते हैं, जैसे हरे पर्वत पर लाखों बिजलियाँ और साँप लहरा रहे हों। यह दोहा श्रीराम के वीर और सुंदर रूप को दिखाता है।

एक और प्रसिद्ध मंत्र राम रक्षा स्तोत्र से है-

“चारु कोदंडं चारु चापं चारु शरं चारु सायकं।
चारुं चारुं चारु रूपं चारु चारु नमो नमः॥”

यह स्तोत्र रोजाना पढ़ने से रक्षा और शक्ति मिलती है। कोदंड यहाँ श्रीराम के दिव्य हथियार के रूप में आता है।

इस कोदंड की विशेषताएँ और निर्माण

यह कोदंड सोना, चाँदी, एल्युमिनियम, जस्ता और लोहे जैसी पाँच धातुओं से बना है। इसका वजन 286 किलो है और लंबाई-मजबूती देखते ही बनती है। सबसे खास बात यह है कि इस पर भारतीय सेना की वीर गाथाएँ उकेरी गई हैं। कारगिल युद्ध के बलिदानियों और अन्य युद्धों के चित्र बने हैं। इससे यह धनुष सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति का भी प्रतीक बन गया है। श्रीराम का कोदंड अधर्म का नाश करता था, वैसे ही आज की सेना देश की रक्षा करती है।

निर्माण की कहानी भी प्रेरणादायक है। तमिलनाडु के कांचीपुरम में 48 महिला कारीगरों ने आठ महीने तक दिन-रात मेहनत की। ये महिलाएं पारंपरिक शिल्पकला की जानकार हैं। उनकी साधना और समर्पण से यह धनुष तैयार हुआ। यह नारीशक्ति की मिसाल है कि कैसे महिलाएं बड़ी से बड़ी चुनौती पूरा कर सकती हैं।

भव्य शोभायात्रा का सफर

यह कोदंड 3 जनवरी 2026 को ओडिशा के राउरकेला से रवाना हुआ। सनातन जागरण मंच के संतोष कुमार विश्वाल ने बताया कि शोभायात्रा ओडिशा के सभी 30 जिलों से गुजरी। रास्ते में जगह-जगह श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा की, ढोल-नगाड़े बजाए और ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाए। यह यात्रा सिर्फ धार्मिक नहीं थी, बल्कि सनातन संस्कृति और राष्ट्रीय एकता का संदेश लेकर चली।

19 जनवरी 2026 को कोदंड पुरी पहुँचा। वहाँ भगवान जगन्नाथ के मंदिर में दर्शन हुए। जगन्नाथ जी के आशीर्वाद के बाद यात्रा आगे बढ़ी। हर जगह भक्तों का उत्साह देखने लायक था। लोग दूर-दूर से आते और कोदंड को छूकर आशीर्वाद लेते।

अयोध्या में आगमन और समर्पण

बुधवार (22 जनवरी 2026) को कोदंड अयोध्या पहुँचा। राम मंदिर परिसर में हजारों लोग इकट्ठा हुए। चंपत राय जी ने इसे रामलला को अर्पित किया। संतों ने मंत्रोच्चार किया और पूजा-अर्चना हुई। यह दिन प्राण-प्रतिष्ठा की दूसरी वर्षगाँठ का भी था, इसलिए उत्सव दोगुना हो गया।

इस कोदंड का गहरा संदेश

यह कोदंड हमें कई बातें सिखाता है। पहला- भक्ति और समर्पण से कितना बड़ा काम हो सकता है। दूसरा- महिलाओं की शक्ति, 48 कारीगरों ने दिखाया कि नारीशक्ति क्या होती है। तीसरा- राष्ट्रभक्ति, सेना की गाथाएँ बताती हैं कि श्रीराम का शौर्य आज भी जीवित है। चौथा- एकता, ओडिशा से तमिलनाडु तक इसमें पूरे देश का योगदान दिख रहा है।

रामचरितमानस में तुलसीदास जी कहते हैं: “राम नाम जपना सब सुखों का मूल है।”

ऐसे आयोजन हमें राम नाम की महिमा याद दिलाते हैं।

प्रभु श्रीराम का यह कोदंड अयोध्या पहुँचकर रामभक्तों के दिलों को छू गया। यह बताता है कि राम राज केवल अतीत नहीं, बल्कि आज भी प्रेरणा है। धर्म की जीत, शौर्य की रक्षा और शिल्प की सुंदरता का यह संगम पूरे देश में नई उमंग भर रहा है।

कट्टरपंथी वर्कआउट के बहाने बना रहे हिंदू लड़कियों को निशाना, पहचान छिपाकर करते हैं लव जिहाद: जानें मुस्लिम ट्रेनर्स को जिम के बाहर रखना क्यों है जरुरी?

कुछ साल पहले तक जिम को सिर्फ शरीर बनाने, आत्मविश्वास बढ़ाने और स्वस्थ रहने की जगह माना जाता था। माता-पिता निश्चिंत होकर अपनी बेटियों को जिम भेजते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि यह एक सुरक्षित, प्रोफेशनल माहौल है। लेकिन धीरे-धीरे देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी घटनाएँ सामने आने लगीं, जिनमें जिम का नाम शोषण, धोखे, ब्लैकमेलिंग, धर्मांतरण और लव जिहाद के आरोपों से जुड़ने लगा।

मुस्लिम ट्रेनर हिंदू लड़कियों को हिंदू नामों से फँसाते और बाद में उन पर धर्मांतरण का दबाव डालते और ना मानने पर उनकी फोटो को एडिट कर अश्लील सामाग्री तैयार कर ब्लैकमेल करते। आगे कुछ ऐसी ही घटनाओं की जानकारी दी गई है, ताकि यह समझना आसान हो कि हिंदु बहन-बेटियों की सुरक्षा के लिए इन जिहादियों और कट्टरपंथियो का एक साधारण से जिम से भी दूर रहना किस तरह से आवश्यक है।

जिम की आड़ में धर्मांतरण और ब्लैकमेलिंग का नेटवर्क

सबसे नए मामले में उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में धर्म परिवर्तन और नमाज पढ़ने का दबाव डालकर युवतियों के शोषण की घटना है, जहाँ जिम की आड़ में यह पूरा नेटवर्क चलाए जाने का आरोप है। पुलिस ने इस मामले में मो शेख अली आलम, फैजल खान, जहीर खान और शादाब को गिरफ्तार किया। बाद में पुलिस ने आरोपित जिम मालिक/ट्रेनर फरीद को एनकाउंटर के बाद गिरफ्तार किया।

पीड़ित युवतियों के अनुसार, शहर के अलग-अलग इलाकों में संचालित KGN और आयरन फायर नामक जिमों में वे व्यायाम के लिए जाती थीं। यहाँ जिम संचालक और ट्रेनर पहले उनसे दोस्ती करते, फिर प्रेम जाल में फँसाकर धीरे-धीरे धर्म परिवर्तन और नमाज पढ़ने का दबाव बनाने लगते थे।

आरोप है कि युवतियों के निजी फोटो और वीडियो बनाए गए, जिनके जरिए उन्हें ब्लैकमेल कर मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित किया गया। विरोध करने पर बदनाम करने और नुकसान पहुँचाने की धमकियाँ दी जाती थीं। पुलिस जाँच में सामने आया है कि आरोपित युवतियों से अलग-अलग मौकों पर पैसे भी वसूलते थे।

पीड़िताओं की तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर पुलिस ने पाँच जिमों को सील भी कर दिया है।

बरेली के एयू फिटनेस में ‘जिम जिहाद’ का मामला

बरेली में सामने आए जिम ट्रेनर से जुड़े मामले में महिला के भाई ने गंभीर और सनसनीखेज आरोप लगाए थे, जिनको लेकर इलाके में तनाव की स्थिति बनी थी। यह पूरा मामला उस समय उजागर हुआ था, जब एक विवाहित महिला अपने पति और पाँच साल के बेटे को छोड़कर जिम में काम के दौरान बने संबंधों के चलते जिम ट्रेनर शोएब के साथ रहने लगी थी।

महिला के भाई का आरोप था कि उसकी बहन को जिम ट्रेनर शोएब ने योजनाबद्ध तरीके से फँसाया था। भाई के अनुसार, एयू फिटनेस जिम में ‘जिम जिहाद’ चलाया जा रहा था, जहाँ मुस्लिम ट्रेनरों के जरिए हिंदू लड़कियों को प्रेम जाल में फँसाया जाता था और बाद में उन पर धर्मांतरण का दबाव बनाया जाता था।

भाई ने दावा किया था कि उसकी बहन भी इसी साजिश का शिकार हुई थी और उसे परिवार से तोड़ने की कोशिश की जा रही थी। उसने यह भी आरोप लगाया था कि जब वह अपनी बहन को समझाने और वापस पति व बच्चे के पास भेजने के लिए जिम पहुँचा था, तो शोएब और उसके साथियों ने उसे घेर लिया था।

उसके साथ बेरहमी से मारपीट की गई थी और उसे अधमरी हालत में छोड़ दिया गया था। परिवार ने आरोप लगाया था कि शोएब और उसके साथ जुड़े लोग कट्टरपंथी सोच रखते थे और पूरे परिवार को जान से मारने की धमकी दे रहे थे।

घटना के बाद महिला की माँ हिंदूवादी संगठन के कार्यकर्ताओं के साथ मौके पर पहुँची थीं और जिम के बाहर प्रदर्शन किया गया था। अंत में भाई की तहरीर पर पुलिस ने जिम ट्रेनर शोएब और जिम मालिक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर हिरासत में लिया था।

होटल में पकड़ा गया जिम ट्रेनर, पहचान छिपाने के आरोप

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में जिम ट्रेनर और युवती के होटल में पकड़े जाने का मामला सामने आया था। आरोप लगा कि युवक ने अपनी असली पहचान छिपाकर युवती से दोस्ती की थी। पकड़ा गया मजहर खान नाम का ये युवक जिम ट्रेनर था। अपनी पहचान छिपाकर हिंदू युवती को हबीबगंज इलाके के एक होटल में लेकर पहुँचा था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, होटल में मजहर की जगह उसने अपना नाम बंटी बताया था। खबर हिंदू संगठनों को लगी तो बड़ी संख्या में कार्यकर्ता होटल पहुँच गए। युवक को पकड़कर उसकी पिटाई कर दी। इसी बीच सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुँची और युवक को पकड़कर अपने साथ थाने लेकर आई।

आरोपित मजहर, विशाल फिटनेस सेंटर में जिम ट्रेनर था। उसने अपना नाम बंटी बताकर युवती से दोस्ती बढ़ाई थी। दोनों की मुलाकात जिम में ही हुई थी। दोस्ती बढ़ने के बाद मजहर युवती को लेकर होटल गया था।

जिम ट्रेनर अमन खान करता था बैड टच

मध्य प्रदेश के जबलपुर की एक जिम में लव जिहाद और धर्मांतरण की कोशिश का मामला सामने आया। मामला आधारताल थाना क्षेत्र में स्थित साईं फिटनेस जिम का था। यहाँ रिसेप्शनिस्ट की जॉब करने वाली 21 वर्षीय युवती ने जिम के ट्रेनर के खिलाफ केस दर्ज करवाया।

युवती का आरोप था कि आरोपित अपना नाम अमन राज बताता था जबकि उसका असली नाम अमन खान था। शिकायत के अनुसार, अमन जिम में आने वाली युवतियों से बैड टच करता था और धर्मांतरण के लिए उनका ब्रेन वॉश करता था।

युवती ने आरोप लगाया कि आरोपित उसे भी बैड टच करते हुए टॉर्चर करता था, युवती हिन्दू टाईगर फोर्स नाम के संगठन के कार्यकर्ताओं के साथ आधारताल पहुँची थी जिसकी शिकायत पर पुलिस ने अमन खान पर FIR दर्ज की। पुलिस ने साईं फिटनेस जिम पहुँचकर भी जाँच की और जिम ट्रेनर अमन खान को गिरफ्तार कर लिया।

जिम ट्रेनर और युवती के साथ पकड़े जाने पर विवाद, हिंदू संगठनों ने लगाए गंभीर आरोप

मध्य प्रदेश के इंदौर के भंवरकुआँ इलाके में एक जिम ट्रेनर को युवती के साथ घूमते हुए बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने पकड़ा और उसकी पिटाई कर उसे थाने ले जाया गया। मामले में जिम ट्रेनर के खिलाफ प्रतिबंधात्मक धाराओं में कार्रवाई की और उसे जेल भी भेज दिया गया। आरोपित ट्रेनर का नाम शादाब मंसूरी था, जो पेशे से एक जिम ट्रेनर था।

बजरंग दल के जिला संयोजक विजय कलखोर ने दावा किया कि शादाब का पहले से निकाह हो चुका है और उसके दो बच्चे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि शादाब जिम में आने वाली हिंदू युवतियों से नजदीकियाँ बढ़ाकर उन्हें इस्तेमाल करता और बाद में धोखा देकर निकल लेता था।

जिमों पर छापे, विरोध और राजनीतिक बयान

लगातार बढ़ते मामलों को देखते हुए मध्य प्रदेश में जिमों को लेकर बड़े स्तर पर विवाद भी खड़ा हुआ था। कुछ जिमों में मुस्लिम ट्रेनरों की मौजूदगी को लेकर सवाल उठाए गए। हिंदू संगठनों ने छापे मारे और प्रशासन से कार्रवाई की माँग की।

हिंदू संगठन बजरंग दल के कार्यकर्ता भोपाल के उस जिम में पहुँचे जहाँ हिंदू लड़कियों को मुस्लिम ट्रेनर ट्रेनिंग दे रहे थे। बजरंग दल का दावा था कि भोपाल में जिम ‘लव जिहाद’ का अड्डा बन गया है। मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद आलोक शर्मा ने भी कथित ‘लव जिहाद’ का मुद्दा उठाया।

बजरंग दल से जुड़े कमल पिपरिया ने मीडिया से बातचीत में कहा, “भोपाल में जिम ‘लव जिहाद’ का अड्डा बना हुआ है। हिंदू लड़कियों-महिलाओं को मुस्लिम युवक नाम बदलकर ट्रेनिंग दे रहे हैं। सवाल यह है कि नाम बदलकर क्यों ट्रेनिंग दिया जा रहा है। साथ ही लड़कियों के लिए महिला स्टाफ क्यों नहीं रखा गया है? हमारी प्रशासन से माँग है कि सख्त कार्रवाई की जाए। साथ ही यहाँ पर 90 फीसदी हिंदू महिलाओं के लिए ट्रेनर भी हिंदू ही होना चाहिए।”

भोपाल में एक जिम में पुलिस टीम के साथ पहुँचे सब-इंस्पेक्टर (SI) ने कथित तौर पर कर्मचारियों से कहा कि यहाँ न कोई मुस्लिम ट्रेनिंग देने आएगा और न ही लेने। पुलिस टीम के साथ बजरंग दल के कार्यकर्ता भी मौजूद थे। बजरंग दल से जुड़े प्रशांत सिंह पटेल ने कहा कि जो 90 फीसदी हिंदू लड़कियाँ जिम में आती हैं उन्हें ट्रेनिंग देने के लिए कोई भी महिला ट्रेनर नहीं है।

संचालक से माँग की गई की वह महिलाओं के लिए महिला ट्रेनर की नियुक्ति करें। भारतीय जनता पार्टी के विधायक रामेश्वर शर्मा ने कहा कि हम सभी का एक ही मत है कि भोपाल में लव जिहाद करने वाले पकड़े जा रहे हैं। उन पर सख्ती से कार्रवाई होनी चाहिए। प्रशासन को इस बात की गुत्थी सुलझानी चाहिए कि कौन इन्हें पनाह दे रहा है।

इसके साथ ही साथ उन्होंने हिंदू समाज से अपील की कि वह इस बात पर ध्यान दें कि घर के बेटी किस जिम में जा रही हैं और कौन उन्हें ट्रेनिंग दे रहा है। उन्होंने कहा कि अगर अभी भी इस पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो हो सकता है कि ‘लव जिहाद’ की कड़ी में अगला नंबर आपका हो।

इसके अलावा बीजेपी सांसद अलोक शर्मा ने भी कहा कि मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व में लव जिहाद की अनुमति नहीं दी जाएगी। अगर कोई ऐसा करता है तो कठोर से कठोर कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि भोपाल में कई जिम है जिसकी लिस्ट तैयार की जा रही है। इन जिम में ट्रेनर मुस्लिम समुदाय के हैं। प्रशासन को जिम संचालक के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।

BJP विधायक ने कहा- मुस्लिम लड़कियाँ भी ना हों जिम में ट्रेनर

ऐसे मामलों में बढ़ोतरी को देखते हुए कई अन्य राजनीतिक नेताओं के बयान भी सामने आए, जिनमें महिलाओं से सतर्क रहने और जिम चुनते समय ट्रेनरों की जानकारी रखने की अपील की गई। BJP के विधायक रामेश्वर शर्मा ने हिंदू महिलाओं से अपील की कि वे मुस्लिम ट्रेनर से सावधान रहें।

उन्होंने हिंदू महिलाओं से हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए कहा, “सभी बहन-भाइयों से, बेटियों से प्रार्थना करता हूँ कि इस बात का ध्यान रखो, सावधान रहो। आप यह देखो कि जिस जिम में ट्रेनिंग ले रहे हो उसका अपराधिक रिकॉर्ड क्या है?” 

शर्मा ने आगे कहा कि मुस्लिम लड़कियाँ भी ट्रेनर के तौर पर सही नहीं हैं। उन्होंने केरल फाइल्स फिल्म का उदाहरण देते हुए कहा कि मुस्लिम बेटियाँ भी हिंदू लड़कियों को झाँसे में लेकर मुस्लिम लड़कों से दोस्ती करवाती हैं।

एक जैसी घटनाएँ, एक जैसी कहानी, फिर क्यों ना हो मुस्लिम ट्रेनर्स को जिम से दूर रखने की माँग

इन सभी मामलों को जोड़कर देखें तो घटनाएँ अलग-अलग शहरों की हैं, लेकिन तरीका एक जैसा है। जिम में ट्रेनर और ट्रेनी के बीच भरोसे का रिश्ता बनता है। ट्रेनर की भूमिका मार्गदर्शक की होती है, जिससे युवतियाँ जल्दी प्रभावित होती हैं।

इसी भरोसे का गलत फायदा उठाकर कट्टरपंथी भोली-भाली मासूम हिंदू लड़कियों को निशाना बनाते हैं और अंत में कभी उनको नमाज पढ़ने के लिए मजबूर किया जाता है तो कभी सीधे धर्मांतरण के लिए। ऐसे में यह सोचना और इस तरह की माँग करना अपने आप में बेहद जरुरी हो जाता है कि जिम से मुस्लिम ट्रेनर्स को बाहर किया जाए।

सायमा के लिए ‘CRPF’ लिखकर मुस्लिम नाम छिपाना सही, पर आतंकी का वीडियो सामने आना ‘निंदनीय’: एजेंडाधारी वामी-कामी ‘गैंग’ की मानसिकता समझिए

हाल ही में ग्रेटर नोएडा से एक रूह कँपा देने वाला मामला सामने आया है। CRPF जवान तारिक अनवर और उसकी बेगम रिम्पा खातून ने रिश्तेदारी में 10 साल की बच्ची के साथ बेरहमी से मारपीट की। इतना प्रताड़ित किया कि उसकी पसलियाँ टूट गईं, दाँत टूट गए, पूरे शरीर पर जख्म हैं। आज वह बच्ची अस्पताल में वेंटिलेटर पर जिंदगी के लिए लड़ रही है। यहाँ सवाल इंसानियत का है, बच्ची के साथ हुए जुल्म का है और न्याय का है।

लेकिन इस जघन्य अपराध पर रेडियो मिर्ची RJ सायमा की टिप्पणी ने इसे एजेंडा बना दिया। सायमा ने मामले को इंसानियत के नजरिए से देखने के बजाए अपने तयशुदा एजेंडे के तहत पेश किया। सायमा ने सिर्फ ‘CRPF’ को फोकस में रखा और आरोपित का नाम छिपा लिया। और अंत में ‘जय हिंद’ जोड़ दिया।

RJ सायमा का ट्वीट (फोटो साभार: X)

यही RJ सायमा की असली पहचान है। वो हर मामले को इंसान नहीं, पहचान के चश्में से देखती हैं। अगर आरोपित मुस्लिम हो तो नाम छिपाओ। शब्द तौलो। और अपने नैरेटिव के अनुसार तोड़-मरोड़कर सामने रख दो। जिससे अपराधी नहीं, बल्कि वर्दी बदनाम हो और सरकार घेरे में आए।

सायमा ने यहाँ भी यही किया। मुस्लिम नाम छिपाकर ‘CRPF’ को उछाला और वर्दी को कठघरे में लाया गया। सायमा के लिए अपराध मैटर नहीं करता। मैटर करता है अपराधी की पहचान। और फिर आता है सबसे घिनौना हिस्सा- टिप्पणी के आखिर में ‘जय हिंद’। यह कोई देशभक्ति दिखाने को लिए तो यहाँ नहीं ही लिखा गया है, बल्कि यह सेना को ‘मॉक’ करने के इरादे से जरूर लिखा प्रतीत हो रहा है।

RJ सायमा के पुराने बयानों को देखें तो यह तस्वीर और साफ होती है। हिजाब पर सवाल हो, तो ‘इस्लाम में जबरदस्ती नहीं‘ की लाइन तैयार रहती है। कुरान पर आलोचना हो, तो तुरंत उसे गलत समझ और इस्लामोफोबिया बता दिया जाता है। लेकिन जब बात देश की सुरक्षा संस्था से जुड़ी CRPF की हो, तो वही संतुलन गायब हो जाता है। वहाँ पूरी वर्दी को दोषी ठहराने में देर नहीं लगती।

यह सवाल इसलिए भी जरूरी है क्योंकि सेना, पुलिस और अर्धसैनिक बल किसी धर्म के नहीं होते। वे देश के होते हैं। अगर किसी वर्दी वाले ने अपराध किया है, तो उस व्यक्ति पर कार्रवाई होनी चाहिए, न कि पूरी वर्दी को कठघरे में खड़ा करने की साजिश। लेकिन जब ऐसे मामलों में आरोपित की पहचान धुँधली रखी जाए और सेना को टारगेट किया जाए, तो शक होना लाजमी है।

निष्कर्ष साफ है। RJ सायमा को न बच्ची से मतलब है, न इंसाफ से। उन्हें सिर्फ मौका चाहिए। मौका सेना को कठघरे में खड़ा करने का। मौका अपने तयशुदा एजेंडे को आगे बढ़ाने का। अगर यह मामला किसी आम मुस्लिम व्यक्ति का होता और उसमें पुलिस या सेना का नाम नहीं जुड़ा होता, तो सायमा शायद चुप रहतीं। जैसे वो लाल किले के पास फिदायीन हमला करने वाले उमर नबी के मामले में रही थीं। उमर नबी का वीडियो लीक होना उन्हें नामंजूर था, जिसमें वह खुद इस्लाम में फिदायीन बनने को अच्छा बता रहा था। तब एक आतंकी की पहचान उजागर होना सायमा के लिए निंदनीय था।

लेकिन अब जैसे ही सायमा देश की सुरक्षा संस्था CRPF दिखा, तो उनका ट्वीट तैयार हो गया। साथ में लिखा गया- जय हिंद। इसमें भी शब्द चुने गए। नाम गायब किया गया। और अपने एजेंडा के मुताबिक परोसा गया।

यह वही पुरानी चाल है। पहले अपराध को पहचान की आड़ में छुपाओ। फिर देश की सुरक्षा करने वाली वर्दियों को बदनाम करो। और अंत में ‘जय हिंद’ लिखकर खुद को बचा लो। यह सीधा-सीधा जहर है, जो हर बार अलग मुद्दे के बहाने परोसा जाता है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार एक मासूम बच्ची वेंटिलेटर पर है और सायमा का एजेंडा यहाँ भी ऑन ही है।

देश अब यह समझने लगा है कि कौन इंसाफ की बात कर रहा है और कौन इंसाफ का इस्तेमाल कर रहा है। RJ सायमा जैसे लोगों का पर्दाफास होना जरूरी है, क्योंकि ये लोग अपराधी से ज्यादा खतरनाक होते हैं। अपराधी एक होता है, लेकिन ऐसे लोग पूरे सिस्टम को शक के घेरे में डाल देते हैं। वर्दी को बदनाम करते हैं और फिर उसी वर्दी के नाम पर ‘जय हिंद’ लिखकर इंसाफ का ढोंग करते हैं।

सेंट्रल रजिस्ट्रेशन सिस्टम में बड़ी सेंध, 2 महीने में बने 1 लाख फर्जी जन्म प्रमाण पत्र: बीजेपी नेता किरीट सोमैया ने किया बड़ा दावा

बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद किरीट सोमैया ने मंगलवार (20 जनवरी 2026) को सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (CRS) पोर्टल में एक बहुत बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा किया है। सोमैया ने दावा किया कि नवंबर और दिसंबर 2025 के दौरान, महज दो महीनों के भीतर इस पोर्टल के जरिए एक लाख से भी ज्यादा फर्जी जन्म प्रमाण पत्र (बर्थ सर्टिफिकेट) जारी किए गए हैं।

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए सोमैया ने कहा कि यह घोटाला सिर्फ भ्रष्टाचार का साधारण मामला नहीं है। उन्होंने इस पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि इतनी बड़ी तादाद में फर्जी दस्तावेज तैयार करना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है। उनके अनुसार, सरकारी सिस्टम में सेंधमारी कर इस तरह के फर्जीवाड़े को अंजाम देना बेहद चौंकाने वाला है।

किरीट सोमैया ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार के CRS पोर्टल को हैक करके और सरकारी रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ कर इस बड़े घोटाले को अंजाम दिया गया है। उन्होंने कुछ बेहद हैरान करने वाले आँकड़े पेश करते हुए बताया कि महाराष्ट्र के जलगाँव, पारोला और यवतमाल के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के रायबरेली और अलीगढ़ जिलों में बड़ी गड़बड़ियाँ मिली हैं।

किरीट सोमैया के मुताबिक, कई ऐसे गाँव हैं जिनकी कुल आबादी तो केवल 1,000 से 1,500 के बीच है, लेकिन वहाँ के रिकॉर्ड में 10,000 से लेकर 27,000 तक जन्म पंजीकरण (बर्थ रजिस्ट्रेशन) पाए गए हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से लगभग 99 प्रतिशत रजिस्ट्रेशन 20 से 60 साल की उम्र के लोगों के लिए किए गए हैं, जो इस पूरे मामले को बेहद संदेहास्पद और गंभीर बनाता है।

अंतरराज्यीय गिरोह का पर्दाफाश, कई गिरफ्तारियाँ

किरीट सोमैया के अनुसार, इस मामले की जाँच में अब तक एक अंतरराज्यीय गिरोह से जुड़े आठ लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इस घोटाले का मुख्य आरोपित अवधेश कुमार दुबे बताया जा रहा है, जिसने कथित तौर पर कंप्यूटर सिस्टम का इस्तेमाल कर सरकारी एंट्रीज़ में हेरफेर की और फर्जी रिकॉर्ड तैयार किए।

सोमैया ने बताया कि उन्होंने इस गंभीर विषय पर महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक (DGP) सदानंद दाते से मुलाकात की है और अब वे इस मामले को नई दिल्ली में केंद्र सरकार के पास ले जाने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने गंभीर आरोप लगाया कि इन फर्जी जन्म प्रमाण पत्रों का इस्तेमाल घुसपैठियों को भारतीय पहचान पत्र दिलाने और उन्हें ‘वैध नागरिक’ बनाने के लिए किया जा रहा था।

मुंबई में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों पर एक्शन: फुटपाथों से हटाए गए हॉकर

किरीट सोमैया ने कथित सर्टिफिकेट घोटाले को अवैध घुसपैठ से जोड़ते हुए दावा किया कि मुंबई की सड़कों पर हजारों बांग्लादेशी नागरिक बिना किसी कानूनी अनुमति के हॉकर (फेरीवाले) के रूप में काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि मुंबई पुलिस कमिश्नर और नगर निगम कमिश्नर के सहयोग से एक कड़ा अभियान चलाया गया, जिसके तहत मुलुंड रेलवे स्टेशन क्षेत्र सहित कई इलाकों से अतिक्रमण हटा दिया गया है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सोमैया ने शिव सेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे पर भी राजनीतिक हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन निर्वाचन क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी बहुत ज्यादा है, वहाँ वोटर्स ने MIM का समर्थन किया, जबकि जिन क्षेत्रों में 15 से 20 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं, वहाँ समर्थन ठाकरे की पार्टी की ओर झुक गया। सोमैया ने दावा किया कि जो राजनीतिक नेता अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करते हैं, वे ही इस कानूनी कार्रवाई में बाधा डालने की कोशिश कर रहे हैं।

उन्होंने आगे ज़ोर देते हुए कहा कि मुंबई के तथाकथित ‘हरियालीकरण’ (ग्रीनिंग) की वकालत करने वालों को 2026 में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में भाजपा की ओर से ‘मुँहतोड़ जवाब’ मिलेगा।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से इंग्लिश में जिनित जैन ने लिखी है। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

छोटे उद्योगों को मिलेगा लाभ, युवाओं के लिए बढ़ेगा रोजगार: मोदी सरकार ने अब SIDBI के लिए मंजूर किया ₹5000 करोड़ का फंड, जानिए कैसे मजबूत होगा MSME सेक्टर

केंद्र सरकार ने MSME सेक्टर को और मजबूत बनाने के लिए एक बड़ा फैसला लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार (21 जनवरी 2026) को भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक यानी SIDBI को 5,000 करोड़ रुपए की इक्विटी सहायता देने को मंजूरी दे दी। इस कदम का मकसद SIDBI की वित्तीय स्थिति को मजबूत करना और इसके जरिए देशभर के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों तक आसान और सस्ता कर्ज पहुँचाना है, ताकि रोजगार के नए मौके पैदा हो सकें।

इस फैसले की जानकारी खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा की। पीएम मोदी ने लिखा कि SIDBI को इक्विटी सपोर्ट देने का कैबिनेट का यह फैसला अनगिनत MSME को फायदा पहुँचाएगा और ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में मदद करेगा।

सरकार की ओर से मंजूर की गई यह 5,000 करोड़ रुपए की इक्विटी पूंजी वित्तीय सेवा विभाग (DFS) के जरिए SIDBI में लगाई जाएगी। यह निवेश एक साथ नहीं, बल्कि तीन चरणों में किया जाएगा। वित्त वर्ष 2025–26 में पहले चरण में 3,000 करोड़ रुपए, जबकि 2026–27 और 2027–28 में अगले दो चरणों में 1,000–1,000 करोड़ रुपए का निवेश होगा। यह पूंजी SIDBI की बुक वैल्यू के आधार पर डाली जाएगी, जिससे बैंक की इक्विटी मजबूत होगी और भविष्य की जरूरतों को पूरा किया जा सकेगा।

MSME सेक्टर को सीधा फायदा, दायरा होगा बड़ा

इस इक्विटी सपोर्ट का सबसे बड़ा फायदा MSME सेक्टर को मिलने वाला है। आने वाले वर्षों में SIDBI से वित्तीय सहायता पाने वाले MSME की संख्या में अच्छी-खासी बढ़ोतरी होने की उम्मीद है। अभी जहाँ यह संख्या करीब साढ़े सात करोड़ के आसपास है, वहीं 2027–28 तक इसमें करीब 25 लाख से ज्यादा नए MSME जुड़ सकते हैं। इससे छोटे उद्यमियों तक औपचारिक बैंकिंग और फाइनेंस की पहुँच और मजबूत होगी।

रोजगार सृजन को मिलेगी रफ्तार

MSME सेक्टर पहले ही देश में रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत माना जाता है। आँकड़ों के मुताबिक, एक MSME औसतन चार से पाँच लोगों को रोजगार देता है। इसी आधार पर अनुमान है कि जब करीब 25.74 लाख नए MSME लाभार्थी जुड़ेंगे, तो इससे लगभग 1.12 करोड़ नए रोजगार पैदा हो सकते हैं। यानी यह फैसला लाखों युवाओं के लिए नौकरी के नए दरवाजे खोल सकता है।

SIDBI की बैलेंस शीट और CRAR होगी मजबूत

आने वाले समय में SIDBI का कर्ज पोर्टफोलियो तेजी से बढ़ने वाला है, खासकर निर्देशित ऋण, डिजिटल लोन और स्टार्टअप्स को दिए जाने वाले उद्यम ऋण के चलते। इससे जोखिम-भारित परिसंपत्तियों में भी इजाफा होगा। ऐसे में पूंजी-जोखिम भारित परिसंपत्ति अनुपात यानी CRAR को मजबूत बनाए रखना जरूरी है। अतिरिक्त इक्विटी पूंजी SIDBI को इस चुनौती से निपटने में मदद करेगी।

बेहतर क्रेडिट रेटिंग, MSME को सस्ता कर्ज

इस फैसले से SIDBI की क्रेडिट रेटिंग मजबूत होगी, जिससे उसे बाजार से कम ब्याज दर पर फंड जुटाने में आसानी होगी। इसका सीधा फायदा MSME को मिलेगा, क्योंकि उन्हें भी कम ब्याज पर कर्ज मिल सकेगा। सरकार का मानना है कि चरणबद्ध इक्विटी निवेश से SIDBI अगले तीन वर्षों तक दबाव वाले हालात में भी अपने पूंजी अनुपात को सुरक्षित स्तर से ऊपर बनाए रख सकेगा।

कुल मिलाकर, SIDBI को दी गई यह 5,000 करोड़ रुपए की इक्विटी मदद सरकार की उस बड़ी रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत MSME सेक्टर को देश की आर्थिक ग्रोथ की मजबूत रीढ़ बनाया जा रहा है। यह फैसला न सिर्फ उद्योगों को ताकत देगा, बल्कि रोजगार सृजन के जरिए ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को भी नई गति देगा।

‘अब उपद्रव नहीं, यहाँ उत्सव होते हैं’: UP दिवस से पहले CM योगी ने जनता के नाम लिखी ‘पाती’, कहा- 6 करोड़ लोगों को निकाला गरीबी से बाहर

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गुरुवार (22 जनवरी 2025) को प्रदेश की जनता के नाम ‘योगी की पाती’ शीर्षक के साथ भावनात्मक पत्र लिखा। इस पत्र के माध्यम से मुख्यमंत्री ने बीते वर्षों में उत्तर प्रदेश में आए व्यापक बदलावों, सरकार की नीतियों, विकास की उपलब्धियों और भविष्य के संकल्पों को विस्तार से साझा किया।

उन्होंने प्रदेश की उस यात्रा का वर्णन किया, जिसमें उत्तर प्रदेश ने एक समय की बीमारू राज्य की छवि को पीछे छोड़ते हुए आज देश के विकास के प्रमुख ग्रोथ इंजन के रूप में अपनी पहचान बनाई है। पत्र में सुशासन, कानून व्यवस्था, आर्थिक प्रगति, सामाजिक सशक्तिकरण और सांस्कृतिक पुनर्जागरण जैसे विषय प्रमुख रूप से उभरकर सामने आते हैं।

सुशासन और कानून व्यवस्था से बदली प्रदेश की तस्वीर

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने पत्र में सबसे पहले प्रदेश में स्थापित कानून और सुशासन की चर्चा की। उन्होंने लिखा कि दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति और स्पष्ट नीतियों के चलते उत्तर प्रदेश में कानून का राज स्थापित हुआ है। पहले जहाँ माफिया और अपराधियों को सत्ता का संरक्षण मिलता था, वहीं अब उनके अवैध साम्राज्यों पर कठोर कार्रवाई की गई है।

उन्होंने लिखा कि बेहतर कानून व्यवस्था के कारण प्रदेश में निवेश का माहौल बदला है। जो निवेशक पहले उत्तर प्रदेश से दूरी बनाते थे, वे अब यहाँ निवेश के लिए उत्सुक हैं। सरकार की पारदर्शी नीतियों और सुरक्षा के भरोसे ने प्रदेश को उद्योग और व्यापार के लिए आकर्षक गंतव्य बना दिया है।

आर्थिक विकास, कृषि और रोजगार की नई दिशा

‘योगी की पाती’ में सीएम ने आर्थिक प्रगति और रोजगार सृजन को विशेष स्थान दिया है। मुख्यमंत्री ने बताया कि कृषि क्षेत्र में उत्तर प्रदेश देश की खाद्य और आय सुरक्षा का मजबूत आधार बना है। ‘बीज से बाजार तक’ की व्यवस्था और सीधे बैंक खातों में भुगतान (DBT) से किसानों की आमदनी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

औद्योगिक विकास के चलते प्रदेश में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं। लेबर रिफॉर्म, डी-रेगुलेशन, एमएसएमई को बढ़ावा, कौशल विकास, स्टार्टअप संस्कृति और ODOP (वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट) जैसी योजनाओं ने स्थानीय उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाई है। बेरोजगारी की समस्या के समाधान की दिशा में प्रदेश तेजी से आगे बढ़ रहा है।

सामाजिक सशक्तिकरण और सांस्कृतिक पुनर्जागरण

मुख्यमंत्री ने पत्र में समाज के हर वर्ग के सशक्तिकरण पर भी जोर दिया। महिलाओं की श्रमबल में भागीदारी बढ़ने, बेटियों के जन्म से विवाह तक आर्थिक सहायता, निराश्रित महिलाओं, वृद्धों और दिव्यांगजनों के लिए पेंशन योजनाओं का उल्लेख किया गया।

स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार और हेल्थ-टेक के जरिए सुविधाएँ आमजन तक पहुँची हैं। जल, थल और नभ कनेक्टिविटी के विकास से व्यापार, पर्यटन और निवेश को नई गति मिली है। साथ ही अयोध्या, काशी, मथुरा से लेकर संभल तक सांस्कृतिक चेतना और परंपराओं का पुनर्जागरण हो रहा है।

मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि जीरो पॉवर्टी के लक्ष्य के साथ करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला गया है। उन्होंने लिखा, “हमने जीरो पॉवटी लक्ष्य के साथ 6 करोड़ से अधिक लोगों को गरीबी से बाहर निकाला है। डबल इंजन सरकार ने प्रदेश को ‘बॉटलनेक से ब्रेक’, ‘रेवेन्यू डेफिसिट से रेवेन्यू सरप्लस’ एवं ‘उपद्रव से उत्सव की ओर अग्रसर किया है।”

अंत में उन्होंने 24 जनवरी को मनाए जाने वाले उत्तर प्रदेश दिवस के अवसर पर विकसित उत्तर प्रदेश के संकल्प को दोहराते हुए प्रदेशवासियों को शुभकामनाएँ दीं।

बता दें कि साल 2026 में उत्तर प्रदेश 77 साल पूरे होने का जश्न मनाएगा। 24 जनवरी 1950 को संयुक्त प्रांत का नाम अधिकारिक तौर पर बदलकर ‘उत्तर प्रदेश’ कर दिया गया था। इस दिन को प्रदेशवासी ‘उत्तर प्रदेश दिवस’ के रूप में मनाते हैं। पहली बार इसे आधिकारिक रूप से प्रदेश में BJP सरकार आने के बाद जनवरी 2018 में मनाया गया था।

‘इसको बताना है… अंजाम क्या होता है’: उमेश कोल्हे की हत्या में यूसुफ खान को जमानत देने से बॉम्बे HC का इनकार, कहा- समाज को आतंकित करना चाहते थे

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मंगलवार (20 जनवरी 2026) को अमरावती के केमिस्ट उमेश कोल्हे की हत्या के मामले में आरोपित पशु चिकित्सक यूसुफ खान को जमानत देने से इनकार कर दिया। उमेश कोल्हे की 2022 में हत्या इसलिए की गई थी क्योंकि उन्होंने बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा के समर्थन में वॉट्सऐप पर एक संदेश भेजा था। जमानत खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि पहली नजर में यह मामला सिर्फ हत्या का नहीं बल्कि एक आतंकी गिरोह बनाने का है। अदालत के अनुसार, नूपुर शर्मा के बयान को लेकर आरोपियों ने अपने मजहब का अपमान मानते हुए बदला लेने की साजिश रची और आम लोगों में डर फैलाने के मकसद से यह हत्या की गई।

जस्टिस ए.एस. गडकरी और जस्टिस श्याम सी. चांडक की पीठ ने कहा कि NIA द्वारा पेश सबूत यह दिखाते हैं कि यह न तो साधारण आपराधिक साजिश थी और न ही कोई अकेली हिंसक घटना। हत्या की योजना, तरीका और मंशा समाज की व्यवस्था और सामूहिक चेतना को झकझोरने वाली है। इसी वजह से UAPA कानून के तहत आरोपित को जेल में रखना सही ठहराया गया।

यूसुफ खान के वकील ने दलील दी कि यह मामला सिर्फ व्यापारिक विवाद का है लेकिन अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पूरे घटनाक्रम को देखें तो आरोपित ने जानबूझकर उकसाया, पीड़ित की पहचान उजागर की और ऐसी घटनाओं की कड़ी में शामिल रहा, जिसका अंत एक निर्मम हत्या में हुआ ताकि समाज में डर का संदेश दिया जा सके।

उमेश कोल्हे की हत्या की पृष्ठभूमि

उमेश कोल्हे, महाराष्ट्र के अमरावती में दवाइयों की दुकान चलाते थे। 21 जून 2022 की रात दुकान बंद कर घर लौटते समय उनकी हत्या कर दी गई। यह हत्या नूपुर शर्मा के बयान को लेकर हुई हिंसा की पृष्ठभूमि में हुई थी। कोल्हे ने 14 जून 2022 को एक व्हाट्सएप ग्रुप में नूपुर शर्मा के समर्थन में फोटो और संदेश साझा किया था। ऐसे ही पोस्ट करने वाले कई लोगों को माफी मांगने के लिए मजबूर किया गया लेकिन कोल्हे को जानबूझकर निशाना बनाया गया। अभियोजन के अनुसार यह हत्या अचानक नहीं बल्कि सोच-समझकर की गई साजिश का नतीजा थी।

यूसुफ खान की भूमिका और ‘व्यापारिक रंजिश’ वाली दलील क्यों हुई खारिज

कोर्ट ने यूसुफ खान को इस हत्या की छोटी कड़ी या संयोगवश जुड़ा व्यक्ति नहीं माना। यूसुफ खान एक पशु चिकित्सक है और उमेश कोल्हे को पहले से जानता था। वह नियमित रूप से कोल्हे की दुकान से दवाइयाँ खरीदता था। दोनों एक वॉट्सऐप ग्रुप ‘ब्लैक फ्रीडम’ के सदस्य थे, जिसमें वेटरनरी केमिस्ट और मेडिकल प्रतिनिधि थे। इस ग्रुप में यूसुफ खान अकेला मुस्लिम सदस्य था।

कोर्ट ने कहा कि खान नूपुर शर्मा के समर्थन में कोल्हे की पोस्ट से आहत था। उसका दावा था कि वह सिर्फ कोल्हे के कारोबार का बहिष्कार कराना चाहता था। हालाँकि, हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के आधार पर इस दलील को अविश्वसनीय बताया।

कोर्ट ने कहा कि अगर मकसद सिर्फ व्यापार रोकना होता तो यह संदेश केवल ग्राहकों तक सीमित रहता। खान ने वह पोस्ट कई वॉट्सऐप ग्रुपों और ऐसे लोगों तक फैलाया जिनका कोल्हे से कोई कारोबारी संबंध नहीं था। इससे साफ पता चला कि उसका उद्देश्य आर्थिक दबाव नहीं बल्कि उकसाना और निशाना बनाना था।

कोर्ट ने यह भी कहा कि खान पढ़ा-लिखा और पेशेवर व्यक्ति था और उस समय के संवेदनशील माहौल को समझ सकता था। इसके बावजूद उसने हालात शांत करने के बजाय भड़काऊ संदेश फैलाया। यही बात जमानत के समय उसके खिलाफ गई।

वॉट्सऐप संदेश, मोबाइल नंबर में बदलाव और मंशा कैसे साबित हुई

कोर्ट के फैसले में यूसुफ खान द्वारा भेजे गए व्हाट्सएप संदेश को बेहद अहम माना गया। कोर्ट ने पाया कि उमेश कोल्हे की पोस्ट का स्क्रीनशॉट लेने से पहले खान ने जानबूझकर कोल्हे के मोबाइल नंबर में हेर-फेर की और नंबर दोबारा सेव किया ताकि उसकी पहचान और संपर्क जानकारी ज्यादा लोगों तक पहुँचे।

इसके बाद यूसुफ खान ने हिंदी में भड़काऊ संदेश लिखकर लोगों से कहा कि कोल्हे को ‘सबक’ सिखाया जाए। इस मेसेज में लिखा था, “अमित मेडिकल प्रभात ताकीज तहसील के सामने इसको बताना है कि जिन लोगों के भरोसे कमाई की उनसे ही दुश्मनी का अंजाम क्या होता है, इस मेसेज को ज्यादा से ज्यादा ग्रुप में सेंड करें।”

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि खान ने संदेश सिर्फ एक बार नहीं बल्कि कई प्लेटफॉर्म पर फैलाया और इसके तुरंत बाद एक अन्य आरोपित (आरोपित नंबर-5) से मुलाकात की। अदालत के अनुसार, यह घटनाक्रम उकसावे से साजिश तक की साफ कड़ी दिखाता है, न कि कोई भावनात्मक या अचानक की गई हरकत।

फोन रिकॉर्ड, बैठकें और पर्दे के पीछे की भूमिका पर अदालत की टिप्पणी

कोर्ट ने जमानत खारिज करते हुए यूसुफ खान और आरोपित नंबर-5 के बीच हुई फोन बातचीत को अहम माना। रिकॉर्ड के अनुसार, हत्या से पहले और बाद में दोनों के बीच 25 फोन कॉल हुए। गवाहों के बयान और लोकेशन डेटा के साथ इन कॉल्स को साजिश में शामिल होने का मजबूत सबूत माना गया।

अभियोजन ने कहा कि आरोपित नंबर-5, खान और अन्य आरोपियों के बीच कड़ी की तरह काम कर रहा था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि साजिश में शामिल होने के लिए हर बैठक में मौजूद रहना जरूरी नहीं होता।

कोर्ट ने यह भी पाया कि 9 जून 2022 को खान की लोकेशन रोशन हॉल के पास थी, जहाँ नूपुर शर्मा के बयान के खिलाफ FIR को लेकर बैठक हुई थी। इसके बाद उसकी लगातार बातचीत और सह-आरोपितों से संपर्क से यह साबित हुआ कि वह शुरू से ही योजना का हिस्सा था। अदालत ने कहा कि खान ने भड़काऊ संदेश फैलाने के बाद खुद को हत्या की सीधी कार्रवाई से दूर रखा लेकिन पर्दे के पीछे रहकर साजिश को आगे बढ़ा रहा था।

अदालत ने साजिश को कैसे समझा और UAPA क्यों लगा

अदालत ने इस साजिश को अलग-अलग घटनाओं के बजाय पूरी घटनाक्रम की कड़ी के रूप में समझा। अभियोजन के अनुसार, यूसुफ खान का भड़काऊ संदेश इस साजिश की शुरुआत था। इसके बाद उसने आरोपित नंबर-5 से मुलाकात की, जो कोल्हे की पोस्ट से नाराज था। फिर आरोपित नंबर-5 अन्य आरोपितों से गौसिया हॉल में मिला जहाँ उमेश कोल्हे की सोशल मीडिया पोस्ट पर विस्तार से चर्चा हुई है।

कोर्ट ने बताया कि 19 जून 2022 को हुई बैठक में यह तय किया गया कि कोल्हे को उनके धर्म का अपमान करने की ‘सजा’ के तौर पर मारा जाएगा और हत्या का तरीका भी तय हुआ। 20 जून को पहली कोशिश नाकाम रही क्योंकि दुकान बंद थी। 21 जून की रात रेकी के बाद कोल्हे पर गर्दन पर चाकू से हमला कर हत्या कर दी गई।

हाईकोर्ट ने कहा कि साजिश को सीधे सबूतों से नहीं बल्कि व्यवहार, बातचीत और हालात से साबित किया जा सकता है। खान के मामले में रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से साजिश में उसकी सहमति साफ दिखती है।

कोर्ट ने आरोपियों को ‘आतंकी गिरोह’ बताते हुए कहा कि यह हत्या निजी बदले के लिए नहीं बल्कि समाज में डर फैलाने के लिए की गई थी। अदालत ने माना कि यह संदेश देना मकसद था कि कुछ विचारों का समर्थन करने पर हिंसक अंजाम भुगतना पड़ेगा। इसी वजह से UAPA की धाराएँ लागू की गईं और जमानत से इनकार किया गया।

यूसुफ खान की जमानत खारिज करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने साफ संदेश दिया कि विचारधारा से प्रेरित हिंसा, चाहे वह डिजिटल उकसावे से ही क्यों न शुरू हुई हो उसे हल्के में नहीं लिया जाएगा। अदालत ने कहा कि बोलने की आजादी को ‘सजा’ देने और पूरे समाज को डराने के लिए की गई लक्षित हत्याओं को निजी रंजिश या व्यापारिक विवाद बताकर कमजोर नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि साजिश हर चरण में दिखने वाली नहीं होती। कोई व्यक्ति अंतिम वार से दूर रहकर भी चुपचाप और सोच-समझकर भूमिका निभा सकता है और तब भी उसकी आपराधिक जिम्मेदारी बनी रहती है। अदालत ने कहा कि जब हिंसा का मकसद केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि समाज में डर फैलाना और दूसरों की आवाज दबाना हो, तो UAPA लागू होता है। खान की जमानत खारिज करना सजा नहीं बल्कि अपराध की गंभीरता और शुरुआती सबूतों का कानूनी नतीजा है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है विस्तार से पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)