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वेनेजुएला पर अमेरिकी घेराबंदी, नार्को की आड़ में तेल का बड़ा खेल: समझें- भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा कितना असर

दुनिया की सबसे बड़ी तेल संपदा वाले देशों में से एक वेनेजुएला फिर से अमेरिकी निशाने पर है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 16 दिसंबर 2025 को एक बड़ा ऐलान किया कि सभी सैंक्शंस वाले तेल टैंकरों पर ‘संपूर्ण ब्लॉकेड‘। इसका मतलब साफ है कि वेनेजुएला में तेल लेने या बेचने वाले जहाजों को रोक देना।

डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के शासन को ‘फॉरेन टेररिस्ट ऑर्गनाइजेशन’ करार दिया। इन सबके लिए ट्रंप ने बहाना बनाया है नार्को-टेररिज्म, ड्रग्स और ह्यूमन ट्रैफिकिंग को। लेकिन सच्चाई क्या है, वो कम ही लोग समझ पा रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि ये सब तेल के खेल की आड़ है। वेनेजुएला के पास दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार हैं। ये भंडार करीब 303 अरब बैरल के हैं। वहीं, अमेरिका की पुरानी रिफाइनरियाँ इसी हेवी क्रूड ऑयल के संशोधन के लिए बनी थी, जो फिलहाल ठप हैं। ऐसे में ट्रंप का असली मकसद मादुरो को हटाकर तेल पर कंट्रोल हासिल करना लगता है, ताकि वो अमेरिकी अर्थव्यवस्था को गति दे सकें।

हालाँकि अमेरिका की यह घेराबंदी सिर्फ वेनेजुएला को नहीं, पूरी दुनिया को हिला सकती है। सप्लाई चेन के बाधित होने से तेल कीमतें बढ़ेंगी। खासकर भारत जैसे आयातक देशों पर असर पड़ेगा। भारत 85% तेल बाहर से लाता है। वेनेजुएला से सस्ता हेवी क्रूड मिलना बंद होने से डीजल महँगा होगा, ट्रांसपोर्ट कॉस्ट बढ़ेगी, महँगाई चढ़ेगी।

बता दें कि ट्रंप ने मार्च 2025 में वेनेजुएला तेल खरीदने वाले देशों पर 25% टैरिफ भी लगा दिया था। जिससे भारत की रिलायंस जैसी कंपनियों ने वेनेजुएलन तेल से तौबा कर लिया था। कुछ ऐसा ही हाल ट्रंप ने रूसी तेल को लेकर किया है, ऐसे में भारतीय कंपनियों को नुकसान ही नुकसान होता दिख रहा है।

वैसे, ट्रंप ने वेनेजुएला की घेरेबंदी का बहाना जिन ड्रग्स को बताया है, वो आँकड़ों पर तो कहीं टिकता ही नहीं दिखता, क्योंकि वेनेजुएला ड्रग्स का ट्रांजिट पॉइंट तो है, लेकिन US तक पहुँचने वाले कोकीन का सिर्फ 5-8% हिस्सा ही होकर यहाँ से गुजरता है। जबकि ड्रग्स के अमेरिका में पहुँचने का मुख्य जमीनी रास्ता मैक्सिको है।

बहरहाल, इन सारी चर्चाओं के बीच आइए समझते हैं, तेल के उस खेल को, जिसके लिए डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका को एक और जंग में ढकेलने के लिए तैयार खड़े दिख रहे हैं।

वेनेजुएला का तेल खजाना: दुनिया का सबसे बड़ा, लेकिन उत्पादन क्यों गिरा?

वेनेजुएला को ‘तेल का सौदा’ कहते हैं। यहाँ दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडार हैं- 303.3 अरब बैरल। यह सऊदी अरब (297 अरब) से भी ज्यादा है। ज्यादातर तेल ओरिनोको बेल्ट में है, जो एक्स्ट्रा-हेवी क्रूड से भरा है। यह तेल गाढ़ा, चिपचिपा और सल्फर युक्त होता है। इसे निकालना मुश्किल और महँगा है। लेकिन इसकी माँग भी ज्यादा होती है, क्योंकि इस भारी तेल को रिफाइन करने पर इससे डीजल, एस्फाल्ट और हेवी इंडस्ट्री के फ्यूल बनते हैं। भंडारों के हिसाब से वेनेजुएला और रूस दुनिया के करीब 67% हेवी ग्रेड के तेल का भंडार रखते हैं।

अब वेनेजुएला के तेल उत्पादन की बात करें तो उत्पादन के मामले में वेनेजुएला की हालत खराब है। साल 2000 में 3.2 मिलियन बैरल प्रति दिन (bpd) तेल का उत्पादन करने वाला वेनेजुएला नवंबर 2025 में सिर्फ 860,000 bpd तेल ही निकाल पाया था। ऐसा इसलिए, क्योंकि ह्यूगो चावेज और मादुरो के शासन में PDVSA (स्टेट ऑयल कंपनी) का बुरा हाल हो गया था।

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के मुताबिक, वेनेजुएला का अक्टूबर में 1.01 मिलियन bpd था, लेकिन गिरावट जारी है। अगर सैंक्शंस हट जाएँ तो 1-2 साल में तेल का उत्पादन 2 मिलियन bpd तक पहुँच सकता है। लेकिन ट्रंप की नई घेराबंदी से फिलहाल ये गिरावट की ओर ही जा रही है।

अमेरिकी रिफाइनरियाँ वेनेजुएला के तेल पर ही बनीं, अब क्यों परेशान?

अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक है, लेकिन आयात भी खूब करता है। अमेरिका की गल्फ कोस्ट की रिफाइनरियाँ जिनकी अमेरिकी क्षमता की कुल 40% तक कैपेसिटी है, वो हेवी क्रूड के लिए डिजाइन की गईं थी। ये रिफायनरियाँ 1970-80 के दशक में मैक्सिको, कनाडा और वेनेजुएला के हेवी तेल के हिसाब से बनीं थी। खासकर वेनेजुएला का मेरेय ब्लेंड (सुपर-हेवी) के लिए ये परफेक्ट फिट हैं। लेकिन वेनेजुएला से तेल के इंपोर्ट पर रोक लगने की वजह से ये फैक्ट्रियाँ लगभग ठप हैं। अभी ये कुल 15-17% ही उत्पादन कर पा रही हैं।

अब डोनाल्ड ट्रंप की ब्लॉकेड से US को भी नुकसान होना तय है। हेवी क्रूड की कमी से डीजल प्राइस बढ़ेंगे। रिफाइनरियाँ लाइट क्रूड (शेल ऑयल) पर कम प्रॉफिट कमाती हैं। EIA के मुताबिक, US ने 2001 में 1.3 मिलियन bpd वेनेजुएला से लिया, अब 100,000 से कम। कनाडा से ज्यादा आयात होगा, लेकिन पाइपलाइन लिमिट्स हैं। विशेषज्ञ कहते हैं, US ‘स्टक’ है, एनवायरनमेंटल रेगुलेशंस से नई रिफाइनरियाँ नहीं बनीं। ऐसे में ट्रंप तेल तो चाहते हैं, लेकिन बहाने से।

ट्रंप के बहाने नार्को-टेररिज्म में वेनेजुएला का रोल कितना बड़ा?

ट्रंप का मुख्य आरोप है: मादुरो नार्को-टेररिस्ट हैं, वो कार्टेल डे लॉस सोल्स चला रहे रहे हैं। US ने इसे टेररिस्ट ग्रुप घोषित कर दिया है। UNODC के मुताबिक, US-बाउंड कोकीन का सिर्फ 5% वेनेजुएला रूट से आता है, जबकि 80% ईस्टर्न पैसिफिक (कोलंबिया-इक्वाडोर) से और मैक्सिको के रास्ते आता है। वहीं, फैंटेनिल चीन से मैक्सिको के रास्ते अमेरिका में जाता है।

सैंक्शंस के नीचे तेल का काला बाजार, कैसे व्यापार करता है वेनेजुएला?

यहाँ ये समझना अहम है कि अमेरिका ने वेनेजुएला को साल 2017 से ज्यादा ही टारगेट पर रखा है। सरकारी कंपनी PDVSA पर इसी साल बैन लगाया गया था, तो अमेरिकी लोगों के वेनेजुएला से कारोबार पर साल 2019 में रोक लगा दी गई। हालाँकि वेनेजुएला उनकी कोशिशों से रुका नहीं, बल्कि शैडो फ्लीट्स के जरिए अपना कारोबार करता रहा। लेकिन पूरी नाकाबंदी से इस पर काफी हद तक लगाम लग जाएगी। वेनेजुएला न तो कच्चा तेल अवैध तरीके से बाहर भेज सकेगा और न ही रूक से नेफ्था जैसे उत्पाद खरीद सकेगा, जो रिफायनिंग के लिए बेहद जरूरी उत्पाद है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर छाएगा संकट

वैसे तो दुनिया भर में तेल सप्लाई में वेनेजुएला का हिस्सा महज 1% ही है, लेकिन वो अधिकतर हेवी क्रूड का उत्पादन करता है। हैवी क्रूड की कमी से इसे बाय-प्रोडक्ट्स की कीमतें बढ़ेंगी। हवाई जहाजों में इस्तेमाल होने वाले ईंधन की सप्लाई में दिक्कत आएगी, तो मिडल डिस्टिलेट (डीजल) का मार्केट भी टाइट हो जाएगा। रूस-ईरान पर बैन की वजह से दुनिया पहले से ही परेशान है और अब वेनेजुएला की घेरेबंदी इस वैश्विक समस्या को और ज्यादा बढ़ा देगी।

भारत की अर्थव्यवस्था पर सीधा वार

भारत तीसरा सबसे बड़ा तेल खरीदार है। साल 2023-24 में भारत ने वेनेजुएला से 254,000 bpd लिया था। मुख्य रूप से रिलायंस और नायरा एनर्जी वेनेजुएलन तेल को प्रोसेस करते हैं। लेकिन ट्रंप के 25% टैरिफ से फरवरी 2025 में ये खरीदी 93,000 bpd तक गिर गई थी। इसकी सप्लाई रूस से बढ़ी थी, लेकिन रूस पर भी बैन के चलते अब दिक्कतें अपना असली असर दिखाएँगी

इस वजह से भारत में डीजल 10-15 प्रतिशत महँगा हो सकता है। इसकी वजह से ट्रांसपोर्ट और कृषि क्षेत्र पर भी व्यापक असर पड़ सकता है। नतीजे जीडीपी पर नकारात्मक असर के तौर पर दिख सकते हैं। यही नहीं, भारत में महँगाई भी 6-7 प्रतिशत तक बढ़ सकती है।

तेल का खेल कब होगा खत्म?

अमेरिका द्वारा वेनेजुएला की घेरेबंदी तेल के लालच में है। वैश्विक सप्लाई चेन से उन्हें कोई मतलब नहीं दिखता। वो सिर्फ अमेरिका की जेब भरना चाहते हैं और वेनेजुएलन तेल भंडारों पर कब्जे की नीयत बनाए बैठे हैं। ऐसे में ग्लोबल साउथ को एकजुट होकर अमेरिकी प्रेशर के मुकाबले के लिए तैयार होना पड़ेगा, क्योंकि वेनेजुएला पर संकट आएगा तो नुकसान ग्लोबल साउथ को ज्यादा होगा।

जवाहरलाल नेहरू के 51 बक्से पेपर्स को लेकर फिर हुआ विवाद, कॉन्ग्रेस ने की झूठ फैलाने की कोशिश तो सरकार ने खोली पोल: जानें सोनिया गाँधी के पास मौजूद इन दस्तावेजों में दफन है क्या राज?

देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के ’51 बक्से पत्रों’ को लेकर एक बार फिर राजनीति गर्मा गई है। सोनिया गाँधी के पास मौजूद नेहरू-एडविना समेत कई हस्तियों के पत्रों के कॉन्टेंट को लेकर अक्सर चर्चा होती है। प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) लंबे वक्त से इन पत्रों को माँग रहा है लेकिन कॉन्ग्रेस इनकी मौजूदगी से इनकार करती रही है। अब कॉन्ग्रेस ने लोकसभा में नेहरू के पत्रों से जुड़े सरकार के एक जवाब के बाद खुद की ‘जीत’ की डुगडुगी बजाकर बीजेपी पर आरोप लगा दिया। लेकिन कॉन्ग्रेस की यह खुशी ज्यादा देर नहीं टिकी और केंद्र सरकार ने सारा सच सामने रखते हुए कॉन्ग्रेस की खुशी पर पानी फेर दिया। अब इस मामले को सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं।

कैसे शुरु हुआ विवाद?

हालिया विवाद की शुरुआत हुई 15 दिसंबर 2025 को लोकसभा में बीजेपी सांसद संबित पात्रा द्वारा पूछे गए एक सवाल से। संबित ने संस्कृति मंत्रालय से पूछा कि ‘क्या वर्ष 2025 में पीएमएमएल के वार्षिक निरीक्षण के दौरान भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से संबंधित कतिपय दस्तावेज संग्रहालय से गायब पाए गए हैं। इसके जबाव में संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने बताया कि ‘निरीक्षण के दौरान संग्रहालय से जवाहरलाल नेहरू से संबंधित कोई दस्तावेज गायब नहीं पाया गया है’।

कॉन्ग्रेस का ‘मनगढ़ंत’ नैरेटिव: ‘गायब’ शब्द के सहारे बचने की कोशिश

कॉन्ग्रेस ने लोकसभा में संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत द्वारा दिए गए एक लिखित उत्तर को अपनी ढाल बनाया है। बस, इसी एक शब्द ‘गायब’ को पकड़कर कॉन्ग्रेस ने ढिंढोरा पीटना शुरू कर दिया कि भाजपा का प्रोपेगेंडा धराशायी हो गया।

कॉन्ग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने X पर (ट्वीट) पोस्ट कर पूछा, “कल आखिरकार लोकसभा में सच्चाई सामने आ ही गई। क्या अब माफी माँगी जाएगी?”

संस्कृति मंत्रालय का ‘पोस्ट वार’: कॉन्ग्रेस को दिखाया आईना

कॉन्ग्रेस के शोर के बीच संस्कृति मंत्रालय ने सिलसिलेवार पोस्ट के जरिए दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया। मंत्रालय ने बताया कि 29 अप्रैल 2008 को सोनिया गाँधी के प्रतिनिधि एमवी राजन ने बकायदा पत्र लिखकर माँग की थी कि सोनिया गाँधी पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सभी निजी पारिवारिक पत्र और नोट्स वापस लेना चाहती हैं।

इसके बाद, 5 मई 2008 को 51 कार्टन (बक्से) भरकर नेहरू पेपर्स सोनिया गाँधी के आवास पर भेज दिए गए थे। मंत्रालय ने यह भी लिखा कि PMML पेपर्स को वापस पाने के लिए सोनिया गाँधी के ऑफिस के साथ लगातार संपर्क में है।

मंत्रालय ने दो तारीख ’28 जनवरी 2025 और 3 जुलाई 2025′ को बताते हुए लिखा कि नेहरू पेपर्स PMML से ‘गायब’ नहीं हैं क्योंकि उनकी लोकेशन (whereabouts) का पता है- वे सोनिया गाँधी के पास हैं।

मंत्रालय का सबसे कड़ा प्रहार यह था कि ये दस्तावेज भारत के प्रथम प्रधानमंत्री से संबंधित हैं और राष्ट्र की ‘दस्तावेजी विरासत’ हैं, न कि किसी की ‘निजी संपत्ति’ (Private Property)। इनका PMML की कस्टडी में होना और नागरिकों एवं विद्वानों के लिए उपलब्ध होना शोध की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इन 51 बक्सों में आखिर क्या है?

विवाद की सबसे बड़ी जड़ वे दस्तावेज हैं जो इन 51 बक्सों के भीतर कैद हैं। PMML के रिकॉर्ड बताते हैं कि इन कागजातों में नेहरू जी द्वारा विभिन्न महान हस्तियों को लिखे गए पत्र और नोट्स शामिल हैं। संबित पात्रा ने ट्वीट कर पूछा कि आखिर एडविना माउंटबेटन को लिखे गए उन पत्रों में ऐसा क्या है जिसे ‘सेंसर’ करने की जरूरत पड़ गई? एडविना के अलावा, इन बक्सों में जयप्रकाश नारायण, अल्बर्ट आइंस्टीन, अरुणा आसफ अली, विजयलक्ष्मी पंडित और बाबू जगजीवन राम के साथ हुए पत्राचार भी शामिल हैं।

इतिहासकारों का मानना है कि इन पत्रों में देश के विभाजन, तत्कालीन कूटनीति और नेहरू के व्यक्तिगत विचारों के ऐसे पहलू हो सकते हैं जो कॉन्ग्रेस के बनाए ‘महिमा मंडित’ इतिहास को चुनौती दे सकें। अहमदाबाद के इतिहासकार रिजवान कादरी ने पत्र लिखकर इन पत्रों तक पहुँच माँगी। उनका कहना है कि गाँधी जी और पटेल के रिकॉर्ड तो व्यवस्थित हैं, लेकिन नेहरू के रिकॉर्ड का एक बड़ा हिस्सा (जो सोनिया गाँधी के पास है) शोध के लिए उपलब्ध नहीं है। क्या कॉन्ग्रेस डरती है कि अगर ये 51 बक्से सार्वजनिक हुए, तो नेहरू की वह छवि धूमिल हो जाएगी जो दशकों से पेश की जाती रही है?

पहले भी हुआ है विवाद: क्या इतिहास पर किसी एक परिवार का एकाधिकार है?

नेहरू के दस्तावेजों पर कब्जे का विवाद कोई नया नहीं है। 1971 के बाद इंदिरा गाँधी ने ये कागजात नेहरू मेमोरियल को सौंपे थे, लेकिन एक शर्त के साथ। शर्त यह थी कि इंदिरा गाँधी ही इन दस्तावेजों की ‘मालकिन’ रहेंगी और उनकी अनुमति के बिना कोई भी शोधकर्ता इन्हें देख नहीं पाएगा।

1984 में इंदिरा गाँधी की मृत्यु के बाद सोनिया गाँधी इन दस्तावेजों की ‘ट्रस्टी-गार्जियन’ बन गईं। PMML सोसाइटी अब इस पर कानूनी राय ले रही है कि क्या कोई दान की गई चीज इस तरह वापस ली जा सकती है और क्या राष्ट्रीय इतिहास के दस्तावेजों पर किसी परिवार का मालिकाना हक हो सकता है।

हाल ही में ‘द नेहरू आर्काइव‘ के नाम से एक डिजिटल प्रोजेक्ट शुरू किया गया है, जिसमें नेहरू के 104 खंडों के कार्यों को ऑनलाइन किया गया है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक सोनिया गाँधी के पास रखे 51 बक्से वापस नहीं आते, तब तक यह आर्काइव अधूरा रहेगा। भाजपा का तर्क है कि कॉन्ग्रेस ने हमेशा इतिहास को ‘कंट्रोल’ करने की कोशिश की है।

नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय (NMML) का नाम बदलकर प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) करने पर भी कॉन्ग्रेस ने खूब विरोध किया था, क्योंकि वे नेहरू को केवल एक परिवार तक सीमित रखना चाहते हैं, जबकि सरकार उन्हें देश के सभी प्रधानमंत्रियों की विरासत का हिस्सा मानती है।

माफी किसे माँगनी चाहिए?

कॉन्ग्रेस ने ‘गायब’ शब्द के पीछे छिपकर जिस तरह भाजपा से माफी की माँग की है, वह ‘चोरी और ऊपर से सीनाजोरी’ जैसा मामला है। सरकार के जवाब ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दस्तावेज चोरी नहीं हुए, बल्कि सोनिया गाँधी ने उन्हें ‘होल्ड’ कर रखा है। अब सवाल यह उठता है कि क्या देश के पहले प्रधानमंत्री के पत्र किसी निजी अलमारी में बंद होने चाहिए या राष्ट्रीय पुस्तकालय में?

अगर कॉन्ग्रेस पारदर्शी है, तो उसे ये 51 बक्से तुरंत वापस करने चाहिए। माफी भाजपा को नहीं, बल्कि कॉन्ग्रेस को माँगनी चाहिए जिसने 2008 में राष्ट्रीय महत्व के दस्तावेजों को एक निजी आवास की संपत्ति बना दिया।

राजस्थान के हनुमानगढ़ में एथेनॉल फैक्ट्री का विरोध, किसान महापंचायत से उभरा नया संकट: राजनीति और पर्यावरण का टकराव

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में किसानों का आक्रोश सड़कों पर उतर आया है। एशिया की सबसे बड़ी एथेनॉल फैक्ट्री के खिलाफ जिले के जंक्शन धान मंडी में बुधवार (17 दिसंबर 2025) को हुई महापंचायत ने पूरे इलाके को हिला दिया। हजारों किसान ट्रैक्टरों पर सवार होकर इकट्ठा हुए, नारे लगाए और अपनी माँगें दोहराईं। इस दौरान ‘फैक्ट्री बंद करो, किसान बचाओ’ के नारे गूंजते रहे।

अच्छी बात ये रही कि महापंचायत शांतिपूर्ण रही, लेकिन हवा में तनाव की गंध साफ महसूस हो रही थी। किसान चिल्ला रहे थे कि ये फैक्ट्री उनकी जमीन, पानी और आने वाली नस्लों को तबाह कर देगी। दूसरी तरफ प्रशासन ने इंटरनेट सेवा चौथे दिन भी बंद रखी, धारा 144 लगा दी और भारी पुलिस बल तैनात कर दिया।

सवाल ये उठ रहा है कि क्या ये सिर्फ स्थानीय किसानों का दर्द है, या राजनीति और बाहरी ताकतें इसे भड़का रही हैं? खासकर पंजाब से आए किसान जत्थों ने आंदोलन को हवा दी है, जो इसे 2020-21 के बड़े किसान आंदोलन की याद दिला रहा है।

एथेनॉल फैक्ट्री है विवाद की जड़, 2023 की मंजूरी से शुरू हुई जंग

हनुमानगढ़ का टिब्बी इलाका हमेशा से हरा-भरा रहा है।किसान साल भर मेहनत करते हैं, ताकि बाजार में अच्छी कीमत मिले। लेकिन 2023 में जब तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने चंडीगढ़ की ड्यून एथेनॉल प्राइवेट लिमिटेड को 450 करोड़ रुपये की इस बड़ी प्रोजेक्ट की मंजूरी दी, तो किसानों के चेहरे पर काली परत चढ़ गई।

कंपनी का प्लान था कि राठीखेड़ा गाँव में ये फैक्ट्री बनेगी, जो चावल के भूसे से एथेनॉल बनाएगी। कंपनी वाले कहते थे कि इससे नौकरियाँ मिलेंगी, किसानों को भूसा बेचने का अच्छा दाम मिलेगा और पर्यावरण को भी फायदा होगा – क्योंकि एथेनॉल पेट्रोल का साफ विकल्प है।

लेकिन किसानों को ये सपना झूठा लगा। हनुमानगढ़ पहले से सूखे की मार झेल रहा है। यहाँ का भूजल स्तर 100 फीट से भी नीचे चला गया है। किसान कुओं पर निर्भर हैं, लेकिन बिजली की कटौती और पानी की कमी से पहले ही परेशान हैं। फैक्ट्री को रोज 50-60 लाख लीटर पानी चाहिएगा, जो नहरों और भूजल से ही आएगा। इससे खेत सूख जाएँगे, फसलें मरेंगी। ऊपर से प्रदूषण का डर।

किसान कहते हैं कि फैक्ट्री से निकलने वाली हवा में जहर घुलेगा। मीथेनॉल और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी चीजें, जो साँस की बीमारियाँ और कैंसर का खतरा बढ़ाएँगी। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने तो मंजूरी दे दी, लेकिन किसानों का आरोप है कि पर्यावरण जांच (EIA) में गड़बड़ी हुई। लोकल लोग कहते हैं, “कागजों पर सब साफ था, लेकिन जमीन पर असर देखा नहीं गया।”

विरोध की शुरुआत 10 दिसंबर को हुई। टिब्बी में एक छोटी महापंचायत बुलाई गई। वहाँ से उत्तेजित किसान फैक्ट्री साइट पर पहुँच गए। गुस्से में तोड़फोड़ हुई- मशीनें तोड़ीं, गाड़ियाँ जलाईं। पुलिस ने लाठीचार्ज किया, 16 किसान घायल हो गए और 40 को गिरफ्तार कर लिया। इलाके में तनाव फैल गया।

हनुमानगढ़ में एथेनॉल फैक्ट्री के विरोध में किसान महापंचायत, प्रशासन ने बनाई कमेटी
हनुमानगढ़ में एथेनॉल फैक्ट्री के विरोध में किसान महापंचायत, प्रशासन ने बनाई कमेटी, प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI Grok)

हालाँकि किसान संघर्ष समिति ने हार नहीं मानी। 12 दिसंबर को प्रशासन से बात हुई। सहमति बनी कि एक जाँच कमेटी बनेगी, जो किसानों की आपत्तियों को देखेगी। तब तक निर्माण रुकेगा। लेकिन संयुक्त किसान मोर्चा ने इसे ‘समझौता नहीं, धोखा’ बताया। उन्होंने कहा, “हमारी माँग पूरी तरह फैक्ट्री बंद करना है, आधी-अधूरी जाँच से काम नहीं चलेगा।” इसी गुस्से ने 17 दिसंबर की बड़ी महापंचायत को जन्म दिया था।

महापंचायत का माहौल: शांति से भरा तनाव, हजारों की भीड़

17 दिसंबर का दिन हनुमानगढ़ के लिए यादगार बन गया। जंक्शन धान मंडी में दोपहर 12 बजे महापंचायत शुरू हुई। सुबह से ही ट्रैक्टरों की कतारें लग गईं, लेकिन प्रशासन ने ट्रैक्टर लाने पर रोक लगाकर सख्ती बरती।

माहौल तनावपूर्ण था। इंटरनेट चौथे दिन भी बंद था, ताकि अफवाहें न फैलें। धारा 144 लागू थी, ड्रोन आसमान में घूम रहे थे। पुलिस की फौज तैनात थी, जिला कलेक्टर खुशाल यादव खुद मौजूद थे। लेकिन किसान शांत रहे। कोई हिंसा नहीं हुई।

पूर्व विधायक बलवान पूनिया (कम्युनिस्ट पार्टी) ने मंच से कहा, “सरकार ने एमओयू साइन किया, लेकिन किसानों से पूछा नहीं। हम एमओयू रद्द होने तक पीछे नहीं हटेंगे।” पंजाब से आए एक जत्थे के नेता ने चेतावनी दी, “अगर फैक्ट्री बनी तो पूरे पंजाब के किसान सड़कों पर उतरेंगे। ये राजस्थान का मुद्दा नहीं, देश का है।” लेकिन स्थानीय किसान कहते हैं, “ये बाहरी लोग आग भड़का रहे हैं। हम तो बस अपनी जमीन बचाना चाहते हैं।”

किसानों ने रखी 3 मुख्य माँग

महापंचायत के दौरान प्रशासन के अधिकारी भी वहाँ थे। बातचीत हुई। किसानों ने तीन मुख्य माँगें रखीं – फैक्ट्री का एमओयू रद्द हो, आंदोलन के दौरान दर्ज मुकदमे वापस लिए जाएँ और जाँच कमेटी निष्पक्ष बने। प्रशासन ने वादा किया कि राज्य सरकार को पत्र लिखा जाएगा। हालाँकि किसानों ने 20 दिन का समय दिया है और कहा है कि 7 जनवरी को संगरिया में अगली महापंचायत की जाएगी। अगर मांगें पूरी न हुईं, तो आंदोलन और तेज होगा। एक किसान ने बताया, “हम शांतिपूर्ण लड़ेंगे, लेकिन हारेंगे नहीं। सरकार को पता चलना चाहिए कि किसान जिंदा है।”

कॉन्ग्रेस का राजनीतिक खेल दिखा साफ

इस आंदोलन में राजनीति का रंग साफ झलक रहा है। 2023 में जब कॉन्ग्रेस सत्ता में थी, तो इस प्रोजेक्ट को हरी झंडी दी गई। अब विपक्ष में बैठी कॉन्ग्रेस वाले ही सबसे जोर-शोर से विरोध कर रहे हैं। संगरिया के विधायक अभिमन्यु पूनिया ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “भाजपा सरकार कॉरपोरेट्स के गुलाम बनी हुई है। किसानों पर लाठियाँ चलाना उनकी पुरानी आदत है।”

FIR में भी कॉन्ग्रेस के सांसदों और विधायकों के नाम हैं। बलवान पूनिया ने 10 दिसंबर की तोड़फोड़ को ‘सरकारी साजिश’ बता दिया। विपक्ष का कहना है कि भाजपा बड़े उद्योगपतियों को फायदा पहुँचा रही है, जबकि किसान मर रहे हैं।

बाहरी जत्थे भड़का रहे आंदोलन, 2020 की यादें ताजा

आंदोलन को सबसे ज्यादा हवा पंजाब से आ रही है। पंजाब के किसान जत्थे भारतीय किसान यूनियन और संयुक्त मोर्चा के लोग बड़े जत्थों में पहुँचे। उन्होंने मंच से चेतावनी दी, “अगर राजस्थान में किसान हार गए, तो पंजाब में भी आग लग जाएगी।” एक पंजाबी किसान नेता ने कहा, “हमारी सीमाएँ जुड़ी हैं, दर्द एक है। फैक्ट्री बंद करो, वरना सीमा पार आंदोलन होगा।”

लेकिन स्थानीय लोग शक में हैं। एक बुजुर्ग ने बताया, “ये पंजाब वाले प्रोफेशनल प्रोटेस्टर्स लगते हैं। 2020-21 के दिल्ली आंदोलन में भी ऐसे ही आए थे। वे आग भड़काते हैं, फिर चले जाते हैं। हमारा नुकसान होता है।”

किसान एकता के नाम पर हनुमानगढ़ में अस्थिरता फैलाने की कोशिश

पंजाब से आने वाले जत्थों ने महापंचायत को रंग दे दिया। वे पुराने नारे दोहरा रहे थे – ‘किसान एकता जिंदाबाद’। राकेश टिकैत जैसे नेता पहुँचे, जिन्होंने कहा, “ये हनुमानगढ़ का मुद्दा नहीं, पूरे देश का किसान संघर्ष है।” लेकिन आलोचक कहते हैं कि ये बाहरी हस्तक्षेप आंदोलन को राष्ट्रीय बनाने की कोशिश है। पंजाब में पहले से किसान आंदोलन की यादें ताजा हैं। अब हनुमानगढ़ को उसी तरह भड़काने की साजिश लग रही है।

एक स्थानीय नेता ने कहा, “पंजाब वाले अपनी राजनीति चला रहे हैं। हमारी समस्या सुलझाओ, बिना बाहरी आग लगाए।” ये हस्तक्षेप आंदोलन को लंबा खींच सकता है, जिससे जिले की फसलें और बाजार प्रभावित होंगे।

प्रशासन ने बनाई कमेटी, फिलहाल थमा है बवाल

प्रशासन ने महापंचायत से पहले ही कमर कस ली थी। हालाँकि पर्यावरण विभाग ने पाँच सदस्यीय कमेटी बना दी है। इसके अध्यक्ष संभागीय आयुक्त होंगे और जिला कलेक्टर-विशेषज्ञ सदस्य होंगे। ये कमेटी भूजल, प्रदूषण और पानी की जाँच करेगी। रिपोर्ट आने तक काम रुका रहेगा।

हालाँकि एक किसान नेता ने कहा, “कमेटी ठीक है, लेकिन एमओयू रद्द न हुआ तो हम रुकेंगे नहीं। 20 दिन बाद फैसला लेंगे।” फिलहाल 7 जनवरी को संगरिया में अगली महापंचायत की प्लानिंग हो रही है। अगर माँगें पूरी न हुईं, तो आंदोलन तेज होगा। प्रशासन की ये सख्ती किसानों को चुप तो कर सकती है, लेकिन गुस्सा दबा नहीं सकती।

कुल मिलाकर हनुमानगढ़ का ये आंदोलन विकास और किसान के बीच जंग है। सरकार को चाहिए कि किसानों की आवाज सुने। उनकी समस्याओं का हल निकाला जाए। फैक्ट्री को लेकर किसानों की चिंता को दूर किया जाए। बहरहाल, अब सबकी निगाहें कमेटी की रिपोर्ट पर है।

इथियोपिया ही नहीं साल भर में 6 अफ्रीकी देशों में पहुँचे PM मोदी, चीन का प्रभाव कम कर भारत को ग्लोबल साउथ का लीडर बनाने पर फोकस: जानें क्यों हमारे लिए अहम है अफ्रीका महाद्वीप?

यह भारत के लिए बहुत गर्व का पल था जब इथियोपिया के प्रधानमंत्री डॉक्टर अबी अहमद ने वैश्विक नेता के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इथियोपिया का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, ‘ग्रेट ऑनर निशान ऑफ इथियोपिया’ से सम्मानित किया। इस सम्मान ने पीएम मोदी की दूरदर्शी नेतृत्व और दोनों देशों के बीच संबंधों को मजबूत करने की दिशा में अहम योगदान को मान्यता दी है।

यह सम्मान भारत के ग्लोबल पावरहाउस के तौर पर उभरने को दिखाता है और ग्लोबल साउथ के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के लिए पीएम मोदी को मिले भरोसे और पहचान को भी उजागर करता है।

इतना ही नहीं पीएम मोदी के भव्य डिनर का आयोजन किया गया, जिसमें वंदे मातरम् गाकर कलाकारों ने मंत्रमुग्ध कर दिया। पीएम मोदी ने इस दौरान दोनों हाथों को हवा में उठाकर तालियाँ बजाई और कलाकारों की हौसला अफजाई की।

पीएम मोदी का ये पहला इथियोपिया दौरा है। इससे भारत और इथियोपिया के बीच द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के साथ-साथ दोनों के गहरे भरोसे और सहयोग को नया आयाम मिलेगा। पीएम मोदी के दौरे में अक्सर अनौपचारिक बातचीत और व्यक्तिगत कैमेस्ट्री सुर्खियाँ बनती हैं। इस दौरे के दौरान भी ये देखा गया। इथियोपिया के पीएम अहमद का प्रोटोकॉल तोड़कर खुद गाड़ी चलाना और खास तरह का कॉफी पिलाना यह दिखाता है कि भारत अब अफ्रीका के लिए सिर्फ एक व्यापारिक भागीदार नहीं, बल्कि एक सच्चा दोस्त है।

पीएम मोदी के इस दौरे के दौरान व्यापार, निवेश, एग्रीकल्चर, डिजिटल, स्किल डेवलपमेंट, स्वास्थ्य सेवा, ऊर्जा, आतंकवाद विरोधी अभियान और साइबर सुरक्षा पर बातचीत होगी। भारत और इथियोपिया ने अगले 5 साल में द्विपक्षीय संबंधों को दोगुना करने का लक्ष्य रखा है। इथियोपिया भारत के लिए एफडीआई का अहम स्रोत है क्योंकि यहाँ 615 से ज्यादा भारतीय कंपनियाँ काम कर रही हैं।

पीएम मोदी ने इथियोपिया के संसद को संबोधित किया

प्रधानमंत्री मोदी ने इथियोपिया की संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए कहा, “भारत और इथियोपिया का जलवायु और भावना, दोनों में गर्मजोशी है। लगभग 2000 साल पहले, हमारे पूर्वजों ने समुद्र पार कर गहरे रिश्ते बनाए थे। हिंद महासागर के पार, व्यापारी मसालों और सोने के साथ यात्रा करते थे, लेकिन उन्होंने सिर्फ सामान का ही व्यापार नहीं किया, बल्कि उन्होंने विचारों और जीवन शैली का भी आदान-प्रदान किया।”

उन्होंने कहा कि अदीस और धोलेरा जैसे बंदरगाह सिर्फ व्यापार केंद्र नहीं थे, बल्कि सभ्यताओं के बीच पुल थे। आधुनिक समय में हमारे रिश्ते एक नए युग में प्रवेश करते हैं। 1941 में भारतीय सैनिकों ने इथियोपिया की आज़ादी के लिए इथियोपियाई लोगों के साथ मिलकर लड़ाई लड़ी।”

पीएम मोदी ने कहा, “भारत का राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ और इथियोपिया का राष्ट्रगान, दोनों हमारी ज़मीन को माँ कहते हैं। वे हमें अपनी विरासत, संस्कृति, सुंदरता पर गर्व करने और मातृभूमि की रक्षा करने के लिए प्रेरित करते हैं।”

2025 में पीएम मोदी ने की 5 अफ्रीकी देशों की यात्रा

पिछले 11 सालों में प्रधानमंत्री मोदी ने भारत-अफ्रीका संबंधों को काफी प्रमुखता दी और रणनीतिक साझेदारी को एक नए स्तर पर पहुँचाया। यहाँ तक कि पिछले 1 साल में पीएम मोदी ने 6 अफ्रीकी देशों की यात्रा की। इनमें इथियोपिया के अलावा दक्षिण अफ्रीका (नवंबर 2025), घाना (जुलाई 2025), नामीबिया (जुलाई 2025), मॉरीशस (मार्च 2025) और नाइजीरिया (नवंबर 2024) शामिल हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने मार्च 2015 में पहली बार मॉरीशस और सेशेल्स की यात्रा की। इसके अगले साल यानी जुलाई 2016 में वे मोजाम्बिक, तंजानिया, केन्या और दक्षिण अफ्रीका की यात्रा पर गए। हालाँकि नवंबर 2025 में उन्होंने दोबारा दक्षिण अफ्रीका की यात्रा की थी। ठीक दो साल बाद यानी जुलाई 2018 में वे रवांडा, युगांडा की यात्रा की। जुलाई 2025 में नामीबिया, घाना की यात्रा की थी।

उन्होंने अपनी यात्राओं के जरिए अफ्रीका के साथ इस जुड़ाव को और तेज़ किया है। इन यात्राओं ने पूरे अफ्रीका में राजनयिक और विकासात्मक संबंधों को नई जान दी है, जो उनके नेतृत्व में एक रणनीतिक पहुँच को दिखाता है।

2025 की इस पाँचवीँ अफ्रीका यात्रा ने भारत के अफ्रीका प्रथम नीति को स्पष्टता से उभारा है। भारत, अफ्रीकी देशों के साथ मिलकर ‘ग्लोबल साउथ’ की चिंताओं को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रमुखता से उठा रहा है।

अफ्रीकी संघ का मुख्यालय इथियोपिया में है। पीएम मोदी की ये यात्रा अफ्रीकी संघ को जी-20 में शामिल करने के भारत की कोशिशों और ब्रिक्स देशों में अच्छा तालमेल बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि ब्रिक्स का 2026 सम्मेलन की मेजबानी भारत करने वाला है।

G20 का अफ्रीकन यूनियन बना सदस्य

सितंबर 2023 में भारत की G20 समिट की मेज़बानी के दौरान सबसे यादगार पलों में से एक था, प्रधानमंत्री मोदी का अफ्रीकी यूनियन को G20 में स्थायी सदस्य के तौर पर शामिल होने का न्योता देना। उस वक्त एयू के चेयरपर्सन अजाली असौमानी थे। भारत की G20 अध्यक्षता के दौरान, 2023 में अफ्रीकी संघ को G20 का स्थायी सदस्य बनाया गया। इससे अफ्रीकी देशों के साथ भारत के गहरे होते संबंधों की एक बड़ी कूटनीतिक जीत माना जाता है।

अफ्रीकी यूनियन के फिलहाल 55 सदस्य देश हैं। अब यूरोपीय यूनियन की तरह अफ्रीकी यूनियन का महत्व है। इस कदम ने समावेशी वैश्विक शासन को बढ़ावा देने और दुनिया के मंच पर अफ्रीका की आवाज़ को मज़बूत करने के प्रति भारत के समर्पण को दिखाया था।

चीन का बढ़ता असर और लोन लेने के लिए मजबूर देश

अफ्रीकी देशों के साथ भारत के रिश्ते बहुत पुराने हैं, लेकिन दशकों की डिप्लोमैटिक बयानबाजी के बावजूद, ये रिश्ते अक्सर ठंडे ही रहे। पीएम मोदी की तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने भारत-अफ्रीका संबंधों में नई जान फूँकी है, उन्हें प्राथमिकता दी है और कई तरह की पार्टनरशिप को आगे बढ़ाया है। कई लोग इसे इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के प्रति भारत की कूटनीति के तौर पर देखते हैं।

अफ्रीकी महाद्वीपीय मुक्त व्यापार क्षेत्र यानी AfCFTA भारतीय निवेशकों को अफ्रीका के बड़े बाजार में व्यापक अवसर दे रहा है। दरअसल अफ्रीका भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। इसके साथ द्विपक्षीय व्यापार करीब 9 हजार करोड़ रुपए का है। यूरोपीय संघ और चीन दो सबसे बड़े व्यापार साझेदार हैं।

अफ्रीका में विकास की गति तेज हुई है। इससे उपभोक्ता बाजार का भी विस्तार हुआ है। निवेशक इसे एक अवसर के रूप में देख रहे हैं । भारत ने शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे द्विपक्षीय सहयोग के माध्यम से अफ्रीकी देशों में मानवीय जीवन में सुधार के लिए काफी सहयोग दिया है।

खास कर कोरोना के वक्त भारत ने कम से कम 25 अफ्रीकी देशों को टीके और आवश्यक चिकित्सा सामग्री उपलब्ध कराई थी, जिसकी अफ्रीकी देशों के साथ साथ पूरी दुनिया ने सराहना की थी।

अफ्रीका में भारत तकनीक विकास में भी मदद कर रहा है इसलिए आईआईटी कैंपस खोले गए हैं। पैन अफ्रीकी ई नेटवर्क चलाए जा रहे हैं। डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से अफ्रीका को डिजिटल तौर पर मजबूत बनाने में भारत लगा हुआ है।

अफ्रीका के गरीब देशों के संसाधनों पर चीन की गिद्ध नजर है। इन देशों में निवेश कर और लोन देकर चीन अपने ऋण जाल में उसे फँसा रहा है। ऐसे में भारत को एक तरफ इन देशों की मदद करनी है, दूसरी तरफ चीन के बढ़ते निवेश से प्रतिस्पर्धा भी करनी है। ये बड़ी चुनौती है। कई परियोजनाओं को पूरा करने में देरी हो रही है, जिससे आर्थिक बोझ बढ़ रहा है।

भारत ने नई दिल्ली में 2015 में तीसरे भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन की मेजबानी की थी। इसमें अफ्रीकी देशों की भागीदारी चार गुना से अधिक बढ़ गई, जो गहरे और अधिक व्यापक जुड़ाव की दिशा में एक बदलाव का संकेत है। लेकिन इसके बाद भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन की बैठक हर तीन वर्षों में होनी थी, वह 2015 के बाद नहीं हो पा रही है।

आयुर्वेद का अफ्रीका में बड़ी संभावना

केन्या के पूर्व प्रधानमंत्री रायला ओडिंगा ने 2022 में पीएम मोदी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा था कि आयुर्वेद ने उनकी बेटी की आँखों की रोशनी वापस लौटा दी। ओडिंगा ने पीएम मोदी को आयुर्वेद को अफ्रीका में लाने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने कहा कि स्वदेशी पौधों का उपयोग चिकित्सीय उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है और इससे अनगिनत लोगों को लाभ होगा।

पिछले एक दशक में भारत ने अफ्रीका के साथ अपनी विकास साझेदारी को काफी मजबूत किया है। करीब 43 अफ्रीकी देशों के 206 बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं में भारत ने 12.37 बिलियन डॉलर से अधिक का निवेश किया है। इसके अलावा अफ्रीकी युवाओं के लिए 50,000 स्कॉलरशिप भी दी हैं, जिनमें से 42,000 से ज्यादा का इस्तेमाल पहले ही किया जा चुका है।
पिछले 10 वर्षों में भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग (आईटीईसी) कार्यक्रम के माध्यम से लगभग 40,000 अफ्रीकियों ने भारत में प्रशिक्षण प्राप्त किया है।

भारत ने अपनी टेली-शिक्षा और टेलीमेडिसिन परियोजना के दूसरे चरण के तहत 2019 से अब तक 22 अफ्रीकी देशों के 15,000 से अधिक युवाओं को अलग-अलग तकनीकी डिग्री और डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के लिए छात्रवृत्ति दी है।

दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गाँधी द्वारा चलाए गए रंगभेदी निषेध आंदोलन की वजह से लोग आज भी भारत को महात्मा गाँधी के सत्य और अहिंसा के पुजारी के तौर पर देखते हैं। यहाँ से भारत-अफ्रीका एकजुटता की आध्यात्मिक सोच शुरू होती है। पीएम मोदी ने उस दृष्टिकोण को व्यावहारिक और प्रभावशाली नीतियों में परिवर्तित कर इसे भारत- अफ्रीका के बीच मजबूत आधारशिला में बदल दिया है।

पाकिस्तान की ‘खराब’ दवाएँ, मानवीय संकट से जूझती आधी आबादी और निर्वासितों की मार: जानें- दवाओं को मोहताज अफगानिस्तान का मददगार कैसे बन रहा भारत

तालिबान राज में अफगानिस्तान में आम लोगों के लिए हालात लगातार मुश्किल होते जा रहे हैं। पाकिस्तान के साथ जारी सीमा विवाद के बीच तालिबान सरकार द्वारा पाकिस्तानी दवाओं के आयात पर पूरी तरह रोक लगाए जाने से देश में बुनियादी दवाओं की भारी किल्लत पैदा हो गई है। लोग बहुत जरूरी दवाओं के लिए भी मारे-मारे घूम रहे हैं।

पाकिस्तान से धोखा खाए अफगानिस्तान को अब भारत का सहारा है। अफगान लोगों के लिए हमेशा कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहने वाले भारत पर भरोसा जताते हुए तालिबान के स्वास्थ्य मंत्री नूर जलाल जलाली मंगलवार (16 दिसंबर 2025) को नई दिल्ली पहुँचे हैं।

पाक से दवाओं के आयात पर अफगानिस्तान का बैन

कुछ ही दिन पहले की बात है जब काबुल में तालिबान-शासित सरकार के उप-प्रमुख और आर्थिक मामलों के प्रभारी अब्दुल गनी बरादर ने हाल ही में घोषणा की कि पाकिस्तान से आने वाली सभी दवाओं के आयात पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है। बरादर ने पाकिस्तानी दवाओं की गुणवत्ता को ‘खराब’ बताते हुए अफगान में आयात करने वालों को निर्देश दिया कि वे 3 महीने के भीतर पाकिस्तानी कंपनियों के साथ अपने सभी बकाया भुगतान निपटाएँ और वैकल्पिक देशों से दवाओं की आपूर्ति की व्यवस्था करें।

हालाँकि जमीनी हकीकत यह है कि नए आपूर्तिकर्ताओं की तलाश अफगानिस्तान के लिए बेहद कठिन साबित हो रही है। तालिबान सरकार में प्रशासनिक मामलों के महानिदेशक नूरुल्लाह नूरी के अनुसार, अफगानिस्तान में इस्तेमाल होने वाली 70% से अधिक दवाएँ अब तक पाकिस्तान से ही आयात की जाती रही हैं। ऐसे में अचानक लगाए गए प्रतिबंध का सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ रहा है जिन्हें अब साधारण दवाएँ भी आसानी से उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं।

अफगानिस्तान के चरमराए ‘हेल्थ सिस्टम’ पर दोहरा बोझ

पिछले कई दशकों से अफगानिस्तान अपनी जरूरत की दवाओं का केवल एक बेहद छोटा हिस्सा ही खुद तैयार कर पाता रहा है। देश में दवा निर्माण से जुड़ा बुनियादी ढाँचा कमजोर है, फार्मास्यूटिकल लैब्स की भारी कमी है, क्वालिटी कंट्रोल की प्रभावी व्यवस्था नहीं है और आपूर्ति श्रृंखला भी बार-बार बाधित होती रही है। ऐसी कई कमजोरियों के कारण अफगानिस्तान लंबे समय से दवाओं के आयात पर निर्भर बना हुआ है।

वर्तमान संकट से पहले भी अफगानिस्तान में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बेहद खराब मानी जाती थी। अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद हालात और ज्यादा बिगड़ गए। इसके बाद देश ने एक गंभीर मानवीय संकट का सामना किया, जिसे लगातार पड़ रहे सूखे, विनाशकारी बाढ़ और अर्थव्यवस्था के लगभग ठप हो जाने ने और गहरा कर दिया।

ईरान और पाकिस्तान से बीते कुछ महीनों में बड़ी संख्या में निर्वासित किए गए अफगानों के दबाव ने अफगानिस्तान की पहले से ही कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था को टूटने की कगार पर ला खड़ा किया है। लौटाए गए इन लोगों में सैकड़ों हजार ऐसे हैं जिन्हें तत्काल चिकित्सीय सहायता की जरूरत है लेकिन सीमित संसाधनों के चलते स्वास्थ्य तंत्र उनकी जरूरतें पूरी करने में असमर्थ दिख रहा है।

आँकड़ों के अनुसार, जनवरी से 13 अगस्त के बीच ईरान से लगभग 18.6 लाख अफगानों को वापस भेजा गया जबकि पाकिस्तान से 3.14 लाख से अधिक लोगों की वापसी हुई। इस तरह सिर्फ आठ महीनों के भीतर ही 20 लाख से ज्यादा अफगान नागरिक अपने देश लौटने को मजबूर हुए हैं। इनमें से अधिकतर लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं की जरूरत है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, देश की कुल 4.6 करोड़ आबादी में से करीब 2.29 करोड़ लोग यानी लगभग आधी आबादी को मानवीय सहायता की जरूरत है। 1.68 करोड़ लोगों को सहायता के लिए चिन्हित किया गया है, जिसके लिए करीब 2.42 अरब अमेरिकी डॉलर की आवश्यकता बताई गई है।

संयुक्त राष्ट्र के आँकड़े (फोटो साभार: UN)

इस बीच अफगानिस्तान में मानवीय सहायता अभियानों को धन की भारी कमी का सामना करना पड़ रहा है, जिससे हालात और ज्यादा चिंताजनक हो गए हैं। देश की स्वास्थ्य व्यवस्था पहले से ही बेहद कमजोर है और खासकर ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच असमान बनी हुई है। सीमित संसाधनों, इन्फ्रा की कमी और प्रशिक्षित कर्मियों के अभाव ने पूरे स्वास्थ्य तंत्र को टूटने कगार पर ला खड़ा किया है।

अफगानिस्तान में संक्रामक बीमारियों का बार-बार फैलना, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर समस्याएँ, कुपोषण और नॉन-कम्युनिकेबल डिजीज मृत्यु और बीमारियों की दर में इजाफा कर रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले समय में कई बीमारियों के फैलने का गंभीर खतरा बना हुआ है। इनमें एक्यूट वॉटर डायरिया, खसरा, पोलियो, क्रीमियन-कांगो हैमरेजिक फीवर (CCHF), डेंगू, कोविड-19, काली खांसी (पर्टुसिस) और मलेरिया जैसी बीमारियाँ शामिल हैं।

विशेषज्ञों और मानवीय संगठनों का कहना है कि यदि स्वास्थ्य और मानवीय सहायता के लिए तुरंत और पर्याप्त फंडिंग नहीं की गई तो अफगानिस्तान में बीमारियों, मौतों और मानसिक स्वास्थ्य संकट की स्थिति और भयावह हो सकती है। कमजोर स्वास्थ्य ढांचा और लगातार बढ़ती जरूरतें देश को एक लंबे और गहरे मानवीय संकट की ओर धकेल रही हैं।

अफगानिस्तान को ‘स्वस्थ’ रहने के लिए भारत से मदद की जरूरत

अफगान विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी, उद्योग-वाणिज्य मंत्री अल्हाज नूरुद्दीन अजीजी के बाद स्वास्थ्य मंत्री मौलवी नूर जलाल जलाली भारत आए हैं। यह दौरा स्वास्थ्य संकट से जूझते अफगानिस्तान को मदद के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। भारत लगातार अफगानिस्तान के स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की कोशिश में लगा है। इसी महीने की शुरुआत में भारत ने इन्फ्लुएंजा और मेनिन्जाइटिस के टीकों की 63,734 खुराकें अफगानिस्तान भेजी थीं।

इसके अलावा, बीते 28 नवंबर को भारत ने अफगानिस्तान की स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा करने के लिए 73 टन जीवन रक्षक दवाएँ, टीके और आवश्यक सामग्री भेजी थी। विदेश मंत्रालय ने ‘X’ पर लिखा था, “अफगानिस्तान के स्वास्थ्य सेवा प्रयासों को बढ़ावा देते हुए भारत ने तत्काल चिकित्सा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए 73 टन जीवन रक्षक दवाएँ, टीके और आवश्यक पूरक सामग्री काबुल भेजी हैं। अफगान जनता के प्रति भारत का अटूट समर्थन जारी है।”

पिछले अक्टूबर में जब अमीर खान मुत्ताकी भारत आए थे तब भी भारत ने अफगानिस्तान को स्वास्थ्य सेवाओं की मदद देने का एलान किया था। भारत ने काबुल में थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों और मरीजों के लिए एक विशेष केंद्र बनाने की घोषणा की थी। इसके साथ ही एक आधुनिक जाँच केंद्र (डायग्नोस्टिक सेंटर) बनाने, काबुल के इंदिरा गाँधी इंस्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हेल्थ में पुराने हीटिंग सिस्टम को बदले जाने की घोषणा की गई थी।

इसके अलावा भारत काबुल के बगरामी इलाके में 30 बेड का एक नया अस्पताल, कैंसर के इलाज के लिए एक ऑन्कोलॉजी सेंटर और गंभीर दुर्घटनाओं के इलाज के लिए एक ट्रॉमा सेंटर भी बनवा रहा है। साथ ही, देश के अलग-अलग इलाकों में माताओं और नवजात शिशुओं की देखभाल के लिए पक्तिका, खोस्त और पक्तिया प्रांतों में 5 मैटरनिटी हेल्थ क्लीनिक बनाए जाने की घोषणा भी की है। इस दौरे के समय भारत ने अफगानिस्तान को 20 एंबुलेंस भी भेंट की हैं ताकि मरीजों को समय पर अस्पताल पहुँचाया जा सके।

ऐसे समय में जब कई देश अफगानिस्तान को केवल राजनीतिक चश्मे से देख रहे हैं, भारत ने यह स्पष्ट कर दिया कि उसकी विदेश नीति का केंद्र सत्ता नहीं, बल्कि अफगान लोगों की पीड़ा है और इस मुश्किल घड़ी में भारत अफगानिस्तान के साथ खड़ा है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को व्यवहार में उतारकर सीमाओं, मतभेदों और वैश्विक राजनीति से ऊपर उठकर भारत अपने सदियों पुराने दोस्त के साथ मजबूती से खड़ा है।

सपा के लिए आतंकी थे ‘मासूम मुस्लिम’, CM योगी बने निर्दोष हिंदुओं का सुरक्षा कवच: कहानी ‘न्याय का शासन’ की

सत्ता का इस्तेमाल कैसे होगा, ये पूरी तरह उस इंसान की सोच पर निर्भर करता है जो कुर्सी पर बैठा है। कानून वही रहता है, सिस्टम वही रहता है लेकिन फैसले बदल जाते हैं। उत्तर प्रदेश में यही फर्क साफ दिखाई देता है। जब MY समीकरण वाली राजनीति हावी होती है तब फैसले तुष्टिकरण की तरफ झुकते हैं। जब वही कुर्सी भगवा पहनने वाले मुख्यमंत्री के हाथ में होती है तो जोर कानून-व्यवस्था और न्याय पर दिखाई देता है।

अब इसे सीधे-सीधे एक उदाहरण से समझिए। साल 2015 में दादरी में अखलाक की भीड़ द्वारा हत्या हो गई। उस वक्त यूपी में अखिलेश यादव की सरकार थी। क्या हुआ? करीब दो दर्जन हिंदू युवकों को पकड़कर जेल में डाल दिया गया। केस चलता रहा, सालों निकल गए लेकिन आज तक ये साफ नहीं हो पाया कि अखलाक को मारा किसने। बाद में ये भी सामने आया कि उसके घर में गौमांस पकाया गया था। इसके बावजूद जिन युवकों को पकड़ा गया, वे लगातार अदालतों के चक्कर काटते रहे। अब जाकर योगी सरकार ने उसी मामले में 18 हिंदू युवकों पर से मुकदमे हटाने के लिए कोर्ट में अर्जी दी है।

अब जरा 2012 की तरफ चलते हैं। अखिलेश यादव मुख्यमंत्री बने और समाजवादी पार्टी की असली सोच सामने आने लगी। पार्टी 2012 के चुनावी घोषणा-पत्र में कह चुकी थी कि आतंकवाद के मामलों में पकड़े गए ‘कथित मासूम मुस्लिम युवकों’ को छोड़ा जाएगा। बात सिर्फ छोड़ने तक ही नहीं थी, ऐसे लोगों को मुआवजा देने तक की बात सपा की सरकार ने की। हुआ भी यही, सरकार बनते ही अप्रैल 2012 में 19 मुस्लिम आरोपितों को रिहा करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई।

ये कोई छोटे-मोटे टटपुँजिये आतंकी नहीं थे, इनमें वलीउल्लाह जैसे दरिंदे शामिल थे। वही वलीउल्लाह जिसने 2006 में वाराणसी के संकटमोचन मंदिर में बम धमाका किया था। उस हमले में 7 लोग मारे गए थे और बाकी धमाकों को जोड़ दें तो कुल 18 लोगों की जान गई थी। जाँच एजेंसियों ने बताया कि वह बांग्लादेश के आतंकी संगठन हूजी से जुड़ा था और ट्रेनिंग लेकर भारत आया था। बाद में अदालत ने उसे फाँसी की सजा सुनाई। लेकिन उससे पहले समाजवादी सरकार उसे भी ‘मासूम’ मानकर छोड़ने की तैयारी में थी।

यही कहानी गोरखपुर सीरियल ब्लास्ट के आरोपी तारिक कासमी की थी। उसे भी मासूम बताकर रिहा करने की कोशिश हुई। वह जेल में ही मर गया जबकि कोर्ट ने उसे दोषी माना था। फिर नाम आया सितारा बेगम का जिसने पाकिस्तानी जासूस वकास अहमद को छिपने की जगह दी थी। उसे भी छोड़ने की बात चल रही थी। ऊपर से पार्टी नेताओं द्वारा सार्वजनिक मंचों से तुष्टिकरण के लिए बयान दिए जा रहे थे। कहा जा रहा था कि ‘मुसलमान बेटियाँ ही हमारी बेटियाँ हैं’। ऐसे में सवाल उठना लाजमी था कि सरकार की प्राथमिकता आखिर है क्या? सत्ता, कानून, न्याय या बस तुष्टिकरण।

हालात ऐसे हो गए कि अदालतों तक को अखिलेश सरकार को फटकार लगानी पड़ी। 2012 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ कहा कि ये तय करना सरकार का काम नहीं है कि कौन आतंकी है और कौन मासूम। अदालत ने तंज कसते हुए यहाँ तक कह दिया कि आज इन्हें छोड़ रहे हो, कल इन्हें पद्म भूषण भी दे दोगे। इसके बाद सरकार को पीछे हटना पड़ा।

अब दूसरी तरफ देखिए दादरी केस में फँसे हिंदू युवकों की हालत। किसी ने घर बेच दिया, किसी ने जमीन। परिवार के परिवार टूट गए। इसी केस में रवि नाम का एक युवक जेल में ही मारा गया। उसकी जमीन बिक गई, परिवार सड़क पर आ गया और पत्नी विधवा हो गई। रवि की माँ ने ऑपइंडिया को बताया कि उसके बेटे को जेल में भयानक यातनाएँ दी गईं। यहाँ तक आरोप लगा कि ये सब माफिया आजम खान के कहने पर हुआ। यानी एक तरफ आतंकी वलीउल्लाह को छोड़ने की कोशिश और दूसरी तरफ रवि की जान की कोई कीमत नहीं थी।

अब योगी सरकार ने इस मामले में कदम उठाया है। दस साल पुराने केस में 18 हिंदुओं पर से मुकदमे हटाने के लिए कोर्ट में अर्जी दी गई है। 18 दिसंबर को सुनवाई है। अगर अदालत ने अर्जी मान ली, तो ये 18 युवक सालों बाद सामान्य जिंदगी जी पाएँगे। उनके सिर से केस का बोझ हटेगा। फर्क साफ है कि योगी सरकार ने संवैधानिक तरीके से कोर्ट का रास्ता चुनकर हिंदुओं को न्याय दिलाने पर जोर दिया है जबकि अखिलेश यादव के दौर में सत्ता की प्राथमिकता आतंकवाद के मामलों में आरोपियों को ‘मासूम’ बताकर बचाने की दिखाई देती थी।

योगी आदित्यनाथ ने यह साफ कर दिया है कि सत्ता का मतलब तुष्टिकरण नहीं बल्कि जिम्मेदारी होता है। दशकों तक जिस प्रदेश में सरकारें वोट बैंक के दबाव में फैसले लेती रहीं, वहाँ योगी ने सत्ता की दिशा ही बदल दी। उनके शासन में प्राथमिकता किसी खास वर्ग को खुश करने की नहीं बल्कि कानून-व्यवस्था को मजबूत करने और न्याय को केंद्र में रखने की दिखाई देती है।

योगी आदित्यनाथ की सबसे बड़ी पहचान यही है कि उन्होंने सत्ता को अपराधियों और दबाव समूहों की ढाल बनने से रोका। पहले जहाँ सरकारें संवेदनशील मामलों में कदम उठाने से बचती थीं, वहीं योगी ने बिना झिझक साफ संदेश दिया कि कानून सबके लिए बराबर है। चाहे राजनीतिक दबाव हो या वोट की चिंता, योगी सरकार ने यह दिखाया कि राज्य चलाने के लिए ‘रीढ़ की हड्डी’ सीधी रखनी पड़ती है। ‘माफिया को मिट्टी में मिला देंगे’ जैसे संदेश उनकी न्याय के प्रति स्पष्ट सोच को दिखाते हैं।

आज योगी आदित्यनाथ का शासन इस बात का उदाहरण बन चुका है कि मजबूत इच्छाशक्ति और स्पष्ट नीयत हो तो सत्ता का इस्तेमाल सही दिशा में किया जा सकता है। यूपी में बदलाव केवल प्रशासनिक नहीं है, यह मानसिकता का बदलाव है। जहाँ तुष्टिकरण की जगह न्याय और डर की जगह भरोसा लेने लगा है।

सेवेंथ डे स्कूल में हिंदू स्टूडेंट की हत्या से मिशनरी स्कूल पर सरकार के कंट्रोल तक, ऑपइंडिया ने निभाई अहम भूमिका: पढ़ें- अहमदाबाद के सेवेंथ डे स्कूल विवाद की पूरी कहानी

अहमदाबाद के खोखरा मणिनगर में स्थित सेवंथ डे एडवेंटिस्ट स्कूल पिछले कुछ महीनों से विवादों में रहा है। यह स्कूल अमेरिका स्थित सेवंथ डे एडवेंटिस्ट चर्च के ग्लोबल शैक्षिक नेटवर्क का हिस्सा है, लेकिन प्रबंधन स्थानीय ट्रस्ट और संस्थाओं के जिम्मे था। अगस्त 2025 में स्कूल तब सुर्खियों में आया, जब एक मुस्लिम नाबालिग ने एक हिंदू छात्र की हत्या कर दी। इस घटना ने स्कूल प्रशासन की लापरवाही, धर्मांतरण और पुराने विवादों एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है।

इस पूरे मामले की जाँच के लिए समिति बनाई गई, जिसने अपनी रिपोर्ट DEO को सौंपी। इसके बाद सोमवार (15 दिसंबर 2025) को गुजरात सरकार ने स्कूल का प्नशासन अपने हाथों में ले लिया। अब ये स्कूल सरकार द्वारा संचालित होगा और DEO इसके प्रबंधन के लिए सरकार के प्रतिनिधि के रूप में जिम्मेदार होंगे। इसके साथ कई शर्तें और नियम भी लागू होंगे।

हिंदू छात्र की हत्या से स्कूल विवादों में घिरा

अहमदाबाद के इस स्कूल की क्षेत्र में अच्छी खासी पहचान थी, लेकिन 19 अगस्त 2025 को एक हिंदू छात्र की हत्या के बाद यह राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गया। घटना के अनुसार, कक्षा 8 का एक मुस्लिम नाबालिग छात्र कक्षा 10 के हिंदू छात्र पर हमला कर दिया।

इस हमले में थर्मोकोल कटर या किसी धारदार हथियार का इस्तेमाल हुआ। बताया गया कि हमला शुरू में एक मामूली विवाद के कारण हुआ, लेकिन इसमें पहले से चल रही साजिश के भी संकेत मिले।

घटना के बाद, खून से लथपथ घायल छात्र को स्कूल या स्टाफ द्वारा तुरंत अस्पताल नहीं ले जाया गया। बाद में परिवार और दोस्तों ने उसे रिक्शा में बैठाकर अस्पताल पहुँचाया, लेकिन 20 अगस्त को उसकी मौत हो गई।

इस मामले में स्कूल प्रशासन पर गंभीर आरोप लगे। स्कूल प्रशासन ने तुरंत एम्बुलेंस नहीं बुलवाई और बच्चे को अस्पताल नहीं ले गए। साथ ही, आरोप है कि उन्होंने खून के धब्बे मिटाकर सबूत नष्ट करने की भी कोशिश की।

आरोपित के इंस्टाग्राम चैट वायरल

घटना के तुरंत बाद, नाबालिग मुस्लिम आरोपित छात्र की इंस्टाग्राम चैट वायरल हो गई। इसमें उसने हत्या कबूल की और न तो कोई पछतावा दिखाया और न ही मौत का डर जताया। चैट में वह कह रहा था, ‘हाँ…तो…’ और ‘अब रुक जाओ…जो हो गया सो हो गया।’ उसके दोस्त ने उसे चैट डिलीट करने की सलाह दी।

पुलिस ने आरोपित को किशोर न्याय अधिनियम के तहत हिरासत में लिया और उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी। यह भी सामने आया कि वह कुख्यात अपराधी पाब्लो एस्कोबार को अपना आदर्श मानता है।

ऑपइंडिया ने मौके पर जाकर घटना की पूरी कवरेज की। मृतक के दादा और सहपाठियों ने बताया कि इससे पहले भी इसी सेवंथ डे स्कूल में मुस्लिम छात्रों द्वारा बदमाशी, धमकियाँ और भेड़-बकरियों को मांस खिलाने जैसी घटनाएँ हो चुकी थीं, लेकिन स्कूल ने शिकायतों को नजरअंदाज किया और कोई कार्रवाई नहीं की।

व्यापक विरोध प्रदर्शन और प्रारंभिक जाँच

घटना के बाद अभिभावक, सिंधी समुदाय और हिंदू संगठनों ने स्कूल के बाहर विरोध प्रदर्शन किया। इस दौरान तोड़फोड़ और कर्मचारियों पर हमलों की खबरें भी आईं। 23 अगस्त को जन आक्रोश वाली मंडल संघर्ष समिति ने स्कूल के सामने मृतक छात्र को श्रद्धांजलि दी, जिसमें विश्व हिंदू परिषद के हजारों नेता शामिल हुए।

समिति ने एक हेल्पलाइन नंबर भी जारी किया और अन्य पीड़ितों से शिकायत दर्ज कराने की अपील की। हिंदू संगठनों की माँग पर अहमदाबाद के कई इलाकों में इस घटना के विरोध में बंद भी रखा गया।

इस घटना के बाद स्कूल बंद कर दिया गया और छात्रों ने ऑनलाइन कक्षाएँ शुरू कीं। अभिभावकों ने स्कूल के विदेशी चर्च से संबंध और धर्मांतरण के आरोपों पर सवाल उठाए। जन आक्रोश वाली मंडल संघर्ष समिति ने स्कूल की मान्यता और पट्टा रद्द करने की माँग करते हुए DEO, महापौर और AMC को याचिका दी। इसी दौरान लगभग 160 छात्रों के अभिभावकों ने ट्रांसफर सर्टिफिकेट की माँग की।

जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) रोहित चौधरी ने स्कूल के प्रधानाचार्य जी इमैनुअल, प्रशासक मयूरिका पटेल और अन्य कर्मचारियों को गंभीर लापरवाही का दोषी मानते हुए बर्खास्त कर दिया।

DEO ने स्कूल को कई नोटिस जारी किए और भवन उपयोग की अनुमति, अल्पसंख्यक दर्जा प्रमाण पत्र और ट्रस्ट स्पष्टीकरण सहित जरूरी दस्तावेज माँगे। इसके अलावा, RTE के तहत एक जाँच समिति का गठन किया गया और उसे स्कूल की पूरी जाँच का जिम्मा सौंपा गया।

जाँच और कार्यवाही

जाँच अधिकारी ने स्कूल को कई नोटिस जारी किए और प्रिंसिपल जी इमैनुअल और प्रशासनिक प्रमुख मयूरिका पटेल समेत अन्य स्टाफ को निलंबित कर दिया। इसका कारण था कि उन्होंने घायल छात्र को लंबे समय तक बिना मदद के रहने दिया और जाँच में बाधा डाली। स्कूल ने जाँच अधिकारी के आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर की, लेकिन कोर्ट ने स्कूल को फटकार लगाई और जाँच में सहयोग करने का आदेश दिया।

RTE अधिनियम के तहत गठित जाँच समिति ने अक्टूबर 2025 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें स्कूल की गंभीर अनियमितताओं का खुलासा हुआ। रिपोर्ट के अनुसार, स्कूल गलत तरीके से चल रहा था।

कक्षाओं की संख्या बढ़ाने की अनुमति नहीं थी, ट्रस्ट में अस्पष्टता थी (ऐशलॉक ट्रस्ट, काउंसिल ऑफ सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट एजुकेशनल इंस्टीट्यूट और इंडिया फाइनेंशियल एसोसिएशन के बीच विसंगति), प्राथमिक अनुभाग के लिए अल्पसंख्यक दर्जा प्रमाण पत्र नहीं था और भवन उपयोग की अनुमति अधूरी थी। स्कूल दो शिफ्टों में चल रहा था, जबकि इसकी अनुमति नहीं थी।

इसके अलावा, AMC ने 2003 में स्कूल की जमीन 99 सालों के लिए पट्टे पर दी थी, लेकिन स्कूल का संचालन अलग संस्था द्वारा होने के कारण पट्टे की शर्तें उल्लंघन में थीं। इसी वजह से AMC ने पट्टा रद्द करने की प्रक्रिया शुरू की और स्कूल को नोटिस जारी किया।

विदेशी संबंध और अतीत के विवाद

ओपइंडिया की जाँच से स्कूल के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ सामने आई हैं। सेवेंथ-डे एडवेंटिस्ट हायर सेकेंडरी स्कूल अमेरिका के मैरीलैंड स्थित सेवेंथ-डे एडवेंटिस्ट चर्च द्वारा चलाया जाता है, जो विश्व स्तर पर 7,800 से अधिक स्कूल चलाता है और इसके मूल्य ईसाई धर्म पर आधारित हैं।

अहमदाबाद में स्कूल की शुरुआत 1979 में हुई थी और 2003 में इसे वर्तमान परिसर में स्थानांतरित किया गया। यह CISCE और गुजरात बोर्ड से संबद्ध है। स्कूल का नेतृत्व प्रिंसिपल जी इमैनुअल जैसे ईसाई व्यक्तित्व करते हैं, जबकि स्थानीय स्तर पर इसका प्रबंधन एशलॉक ट्रस्ट, काउंसिल ऑफ सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस और इंडिया फाइनेंशियल एसोसिएशन जैसी संस्थाओं द्वारा होता है, जिनमें कई अनियमितताएँ पाई गई हैं।

स्कूल पर धर्मांतरण के गंभीर आरोप भी लगे थे। अभिभावकों और स्थानीय लोगों ने बताया कि नैतिक विज्ञान की कक्षाओं में ईसाई धर्म का प्रचार किया जाता था और छात्रों को धर्मांतरण के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। आरोप यह भी था कि अभिभावकों से 2 लाख रुपए लेकर छात्रों को बिना परीक्षा पास किया जा रहा था। यह भी दावा किया गया कि स्कूल की जमीन पहले एक मंदिर की थी।

यह स्कूल पहले भी कई विवादों में रह चुका है। 2016 में, कक्षा 4 के एक छात्र को शिक्षक मूसा अदला ने बुरी तरह पीटा, जिससे बच्चा घायल हो गया और खून बहने लगा। इसके बाद शिक्षक को निलंबित कर दिया गया। 2024 में स्कूल ने DEO से अनुमति लिए बिना छात्रों को वाटर पार्क ले जाकर नियमों का उल्लंघन किया। हाल ही में आरोप लगे थे कि मुस्लिम छात्रों ने हिंदू छात्रों को पनीर बताकर मटन खिलाया, लेकिन इस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।

स्कूल को सरकार ने अपने नियंत्रण में लिया

अभिभावकों और स्थानीय लोगों की लगातार माँग थी कि स्कूल की विवादास्पद गतिविधियों के कारण सरकार इसका प्रबंधन अपने हाथ में ले। इन सभी जाँचों और अनियमितताओं को ध्यान में रखते हुए, गुजरात सरकार ने 15 दिसंबर 2025 को स्कूल का मैनेजमेंट अपने हाथ में ले लिया।

अहमदाबाद के DEO को स्कूल का प्रशासक बनाया गया है। नए प्रवेश पर रोक लगा दी गई है, लेकिन 10,000 से अधिक छात्रों के हितों को ध्यान में रखते हुए स्कूल को चलाया जा रहा है।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)







संथाल परगना में अब नहीं बसने देंगे ‘जमाई टोला’, डुगडुगी बजाकर जमीन नहीं बेचने का संकल्प ले रहे ST: जानिए बांग्लादेशी घुसपैठ से कैसे बदली डेमोग्राफी

झारखंड का संथाल परगना में जनजातीय समाज अपनी पहचान के लिए जागरूक हो गए हैं। सालों से दबे-दबे स्वर में कही जाने वाली बात अब खुले तौर पर सड़कों, गाँवों और बैठकों में गूँजने लगी है। संथाल परगना के जनजातीय समाज ने साफ शब्दों में यह ऐलान कर दिया है कि वे गैर समाज को अब न तो वे अपनी जमीन देंगे और न ही अपनी बेटियाँ सौंपेगे। जनजातीय समाज का यह संकल्प जमीन से उपजा हुआ जनआंदोलन है, जो साहिबगंज, पाकुड़, राजमहल, गोड्डा, दुमका और आसपास के इलाकों में तेजी से फैल रहा है।

जनजातीय समाज की जागरूकता

साहिबगंज इस पूरे अभियान का केंद्र बनकर उभरा है। ‘एभेन अखाड़ा जागवार बैसी’ संगठन के मुकेश सोरेन की अगुवाई में सकरीगली, छोटी भगियामारी, संताली टोला, मुस्लिम टोला, बिंद टोला महलदार टोला सहित अन्य गाँवों में ढोल-नगाड़े और डुगडुगी बजाकर लोगों को जागरूक किया जा रहा है। बैठकों में बुजुर्ग, युवा और महिलाएँ खुलकर अपनी बात रख रहे हैं।

समस्या है कि बांग्लादेशी घुसपैठिए सालों से उनके इलाकों में बसते जा रहे हैं। इसीलिए कई लोगों ने गैर जनजातीय समाज के हाथ अपनी जमीन नहीं बेचने की बात कही। कई
जनजातीय समाज के लोगों ने तालझारी थाने में आवेदन देकर इस तरह की गतिविधियों पर रोक लगाने का अनुरोध किया है। ग्रामीण उपायुक्त से मिलने की भी तैयारी कर रहे हैं।

जनजातीय समाज का बेटियों को नहीं सौंपने का संकल्प

बांग्लादेशी घुसपैठिए जनजातीय समाज की बेटियों को भी निशाना बनाकर जमीन हड़पने की साजिश रचते हैं। कई मामलों में जनजातीय बेटियों से शादी कर जमीन हड़पी गई और उन्हें मुस्लिम बना दिया गया। इसके विरोध में जनजातीय समाज ने फैसला लिया कि अब गैर समाज में बेटियों को नहीं सौंपा जाएगा यानी अब दूसरे समाज में बेटियों की शादी नहीं होने देंगे।

बांग्लादेशी घुसपैठियों के विरोध में जनजातीय समाज का अभियान

आइए जानते हैं कि आखिर जनजातीय समाज को गैर समाज के खिलाफ यह अभियान चलाने की जरूरत क्यों पढ़ी। ग्रामीणों का कहना है कि बांग्लादेशी नागरिक अवैध रूप से भारत में घुसकर उनके इलाके में बसते जा रहे हैं। पहले यह प्रक्रिया धीमी थी, लेकिन अब यह इतनी तेज हो चुकी है कि कई गाँवों में जनजातीय अपने ही क्षेत्र में हाशिए पर पहुँचते दिखाई दे रहे हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि ये बांग्लादेशी घुसपैठिए फर्जी आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर आईडी के सहारे ने सिर्फ सरकारी योजनाओं का लाभ ले रहे हैं, बल्कि जनजातीय जमीनों पर कब्जा भी किया हुआ है। मोतीहारना में मुस्लिमों ने जनजातीय की जमीन पर पूरी बस्ती बसा ली है।

डेमोग्राफी ही नहीं खेती भी छिनी, जनजातीयों को गुस्सा

जनजातीय समाज का गुस्सा इसलिए भी फूटा क्योंकि जमीन उनके लिए केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि उनकी पहचान उनकी संस्कृति और उनकी जीवन पद्धति का आधार है। संथाल परगना में CNT और SPT जैसे कानूनों का उद्देश्य ही यही था कि जनजातीय जमीन किसी गैर-जनजातीय के हाथ में न जाए।

इसके बावजूद जमीनों के ट्रांसफर हुए, नाम बदले गए और धीरे-धीरे पूरे गाँवों का सामाजिक स्वरूप बदलने लगा। जनजातीय समाज अब इसे केवल जमीन हड़पने का मामला नहीं, बल्कि सुनियोजित डेमोग्राफिक बदलाव के रूप में देख रहा है।

स्थिति की गंभीरता तब और स्पष्ट होती है जब अफीम की खेती जैसे मामलों का खुलासा सामने आता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, संथाल परगना के तमाम इलाकों में बांग्लादेशी घुसपैठियों ने अफीम की खेती की हुई हैं, जिसकी तस्करी भी होती है।

झारखंड हाई कोर्ट का रुख

इन तमात तथ्यों को देखते हुए साल 2024 में झारखंड हाई कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा। अदालत ने जनहित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दे चुकी है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों को चिन्हित कर कार्रवाई की जाए और रिपोर्ट पेश की जाए। हाई कोर्ट की सख्ती के बाद साहिबगंज के डिप्टी कलेक्टर ने जाँच समिति का गठन भी किया।

प्रशासनिक स्तर पर यह कदम महत्वपूर्ण माना गया, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि जाँच समितियाँ और आदेश तभी प्रभावी होंगे, जब जमीन पर ठोस कार्रवाई दिखाई देगी। यह मामला अब तक कोर्ट में लंबित है। यही कारण है कि जनजातीय समाज ने तय किया कि अगर प्रशासन नहीं जाएगा, तो उन्हें खुद खड़ा होना पड़ेगा।

विजय दिवस विशेष: जिनको पाकिस्तानी अत्याचार से मुक्ति दिलाकर भारत ने बनाया बांग्लादेश, वे अब जमात-ए-इस्लामी की कट्टरता के काले साये में

भारत के लिए 16 दिसंबर 2025 का दिन गर्व का दिन होता है। इसी दिन 1971 में भारतीय सेना ने पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर कर बांग्लादेश को आजादी दिलाई। लाखों भारतीय सैनिकों की बहादुरी और मुक्ति बहिनी के साथ मिलकर 13 दिन की जंग में 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों का समर्पण कराया। ढाका में जनरल नियाजी ने भारतीय कमांडर जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने हथियार डाले। यह जीत सिर्फ युद्ध की नहीं, मानवता की थी, जिसमें पाकिस्तानी फौज के अत्याचारों से बंगाली लोगों को मुक्ति मिली।

लेकिन 54 साल बाद अब बांग्लादेश फिर उन कट्टरपंथी ताकतों के चंगुल में फँसता दिख रहा है, जिन्होंने 1971 में पाकिस्तान का साथ दिया था। जमात-ए-इस्लामी.. जो तब बांग्लादेश के जन्म का विरोध कर रही थी, आज फिर सिर उठा चुकी है। भारत ने जिस देश को आजाद कराया, वहाँ हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले, मंदिर तोड़े जाना और इस्लामी चरमपंथ की वापसी को देखना बेहद दर्दनाक है।

…भारत ने दिलाई थी बंगभाषियों को आजादी

1971 की जंग की जड़ें गहरी थीं। पाकिस्तान में पश्चिमी हिस्से का पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) पर दबदबा था। बंगाली भाषा, संस्कृति को दबाया जा रहा था। 1970 के चुनाव में शेख मुजीबुर रहमान की अवामी लीग ने भारी जीत हासिल की, लेकिन पाकिस्तान ने सत्ता नहीं सौंपी। 25 मार्च 1971 को ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ शुरू हुआ- पाक फौज ने बंगालियों पर कहर बरपाया। लाखों मारे गए, महिलाओं पर अत्याचार हुए, करोड़ों शरणार्थी भारत आए।

भारत ने मुक्ति बहिनी को ट्रेनिंग दी, हथियार दिए। 3 दिसंबर को पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया, तो भारत ने पूरी ताकत से जवाब दिया। नौसेना, वायुसेना और थलसेना ने मिलकर पाक को हराया। 16 दिसंबर को दुनिया के इतिहास में सबसे बड़े सैन्य समर्पण को अंजाम दिया।

बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई में जमात की भूमिका पाकिस्तान परस्त

इस जंग में जमात-ए-इस्लामी की भूमिका काली थी। 1941 में मौलाना मौदूदी द्वारा स्थापित यह संगठन पाकिस्तान का समर्थक था। पूर्वी पाकिस्तान में गुलाम आजम के नेतृत्व में जमात ने बांग्लादेश की आजादी का विरोध किया। उन्होंने ‘पीस कमिटी’ बनाई, रजाकार, अल-बदर जैसे मिलिशिया गठित किए, जो पाक फौज के साथ मिलकर बंगाली राष्ट्रवादियों, हिंदुओं और बुद्धिजीवियों पर अत्याचार करते थे।

हत्याओं-बलात्कार-लूट में जमात के लोग इसमें शामिल थे। आजादी के बाद जमात बैन हो गई, गुलाम आजम पाकिस्तान भाग गए। लेकिन 1975 में मुजीब की हत्या के बाद सैन्य शासन में जमात फिर सक्रिय हुई। जिया-उर-रहमान ने उन्हें वापस बुलाया।

शेख हसीना की सरकार ने जमात की सख्ती, बदले में सत्ता से बेदखल

शेख हसीना की सरकार (2009-2024) ने जमात पर सख्ती की। इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल बनाया, जहाँ जमात के कई नेताओं को 1971 के अपराधों के लिए सजा हुई। मोतिउर रहमान निजामी को 2016 में फाँसी दी गई। अब्दुल कादिर मुल्ला, दिलावर हुसैन सईदी जैसे नेताओं को मौत की सजा मिली। जमात की रजिस्ट्रेशन 2013 में कैंसल कर दिया गया, क्योंकि जमात का चार्टर धर्म को लोकतंत्र से ऊपर रखता था। 2024 में हसीना ने जमात और उसकी स्टूडेंट विंग छात्र शिबिर को आतंकवादी घोषित कर बैन लगा दिया गया।

हसीना को सत्ता से बेदखल करने में आगे रहे जमात से जुड़े संगठन

लेकिन 2024 जुलाई-अगस्त में स्टूडेंट प्रोटेस्ट से हसीना की सरकार गिरा दी गई। इसमें छात्र शिबिर से जुड़े कथित छात्रों ने जमकर हिंसा की। हसीना की पार्टी के लोगों को निशाना बनाया, हिंदुओं पर अत्याचार किए और पूरे बांग्लादेश को सुलगा दिया।

शेख हसीना भारत भाग गईं। बांग्लादेश में मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी और अगस्त 2024 में ही छात्र शिबिर और जमात पर से बैन हटा दिया गया। यही नहीं, जून 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने जमात का रजिस्ट्रेशन भी बहाल कर दिया और इसी के साथ वो माहौल तैयार हो गया है, जब अगले चुनावों में जमात के लोग सत्ता में भी जाएँ।

शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद से असली रंग दिखा रहे जमात के लोग

शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद से बांग्लादेश में अराजकता है। 2024 अगस्त से हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़े हैं। बांग्लादेश में मंदिर तोड़े गए, घर जलाए गए, हिंदू परिवारों पर अत्याचार हो रहे हैं। सड़कों पर जमात के झंडे लहराते दिख रहे हैं, तो हिंसा में छात्र शिबिर के लोग शामिल पाए जा रहे हैं, इसके बावजूद उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही। उल्टे मोहम्मद यूनुस जैसा कट्टरपंथी इन हमलों का बचाव कर रहा है और कह रहा है कि ये हिंसा और हमले राजनीतिक हैं, सांप्रदायिक नहीं। इनके बारे में बढ़ा-चढ़ाकर बताया जा रहा है।

इस्लामी कट्टरपंथ की तरफ मुड़ चुका है बांग्लादेश

जमात की वापसी से बांग्लादेश की राजनीति इस्लामी कट्टरपंथ की तरफ मुड़ चुकी है। शेख हसीना ने जिस बांग्लादेश को सेकुलर बनाए रखने के लिए पूरी ताकत लगा दी, उस पूरे ढाँचे को ही ढहा दिया गया है। शेख हसीना की पार्टी तक को बैन कर दिया गया है, ताकि जमात जैसी कट्टरपंथी ताकतें सत्ता हासिल कर सकें और उदारवादी लोगों को खत्म कर सके।

हालाँकि अब जमात खुद को मॉडरेट बताती है, 1971 के लिए माफी माँगने की बात करती है, लेकिन उसकी बातें अस्पष्ट ही रही हैं। 54 साल बाद विजय दिवस पर सवाल उठता है-भारत ने जो आजादी दिलाई, क्या वह सुरक्षित है? कट्टरता की वापसी से अल्पसंख्यक डरे हुए हैं। जमात की रैलियाँ हो रही हैं।

बांग्लादेश निर्माण का एक चक्र हुआ पूरा

बांग्लादेश के हालात को देखते हुए साफ दिखने लगा है कि बांग्लादेश के इतिहास, वर्तमान और भविष्य का एक चक्र पूरा हो चला है। साल 1947 में जिस इस्लाम के लिए बांग्लादेश यानी पूर्वी पाकिस्तान का गठन हुआ था, वहाँ बीच के समय में बांग्ला पहचान से जोर जरूर पकड़ा था, लेकिन फिर से बांग्लादेश उसी इस्लामी कट्टरता की तरफ बढ़ गया है, जिसकी वजह से पूर्वी पाकिस्तान के तौर पर भारत से अलग हुआ था।

भले ही 1971 के बंग मुक्ति के बलिदानियों का सपना धर्मनिरपेक्ष, समावेशी बांग्लादेश था। लेकिन आज कट्टरपंथ सिर उठा रहा है। ये न सिर्फ बंग भाषियों के लिए भविष्य में चुनौतियाँ खड़ा करेगा, बल्कि भारत जैसे पड़ोसी देश के लिए भी पूर्वी सीमा पर सुरक्षा जैसे खतरे खड़े करेगा। ऐसे में जरूरत है कि भारत सतर्क रहे। यही नहीं, भारत को उन इस्लामी कट्टरपंथियों के फन भी तुरंत कुचलने के लिए तैयार रहना चाहिए, जो वो सपने में भी भारत पर बुरे नजर डालने का ख्याल न ला पाएँ।

क्रिसमस पर बड़े पैमाने पर धर्मांतरण कराने वाला था मिशनरी गिरोह, मिर्जापुर में 8 महिला-पादरी समेत 11 गिरफ्तार: पढ़ें- कैसे फेल हुआ 2000+ को ईसाई बनाने का खेल

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के देहात इलाके में दो साल से चल रहा एक सीक्रेट गेम का खुलासा हो गया। यहाँ के खरहरा गाँव के छोटे से चर्च में हिंदू परिवारों को ईसाई बनाने का काम चल रहा था। लेकिन स्थानीय युवक की समझदारी के चलते मिशनरी गैंग का पर्दाफाश हो गया।

मिर्जापुर में रविवार (14 दिसंबर 2025) को हुई पुलिस छापेमारी में चर्च के पादरी भोलानाथ पटेल समेत 11 लोग गिरफ्तार हुए हैं। ऑपइंडिया के पास इस पूरे मामले की FIR की कॉपी मौजूद है। जिसमें इस गंदे खेल के बारे में विस्तार से जानकारी दर्ज है।

सूत्रों के मुताबिक, 25 दिसंबर को क्रिसमस पर बड़े पैमाने पर धर्मांतरण की साजिश रची जा रही थी। लेकिन सवाल यह है कि आखिर यह सब कैसे शुरू हुआ? दो सालों में सैकड़ों परिवार क्यों फँसते चले गए? इस ग्राउंड रिपोर्ट में मिशनरी गिरोह के कारनामों को उजागर किया गया है।

किसान की सतर्कता से खुला धर्मांतरण का गंदा खेल

मिर्जापुर के इस इलाके में गंगा की लहरें विंध्याचल की पहाड़ियों से टकराती हैं। इलाके में गरीबी और बेरोजगारी फैली है। छोटे-छोटे गांवों में किसान, मजदूर और दिहाड़ी मजूर दिन-रात गुजारते हैं। यहीं के कुरकुठिया गाँव के रहने वाले आनंद दुबे (35 वर्ष) एक साधारण किसान हैं। उनके दो बच्चे हैं और पत्नी लंबे समय से बीमार है, जिसकी वजह से घर का खर्चा मुश्किल से चलता है।

आनंद ने मिशनरियों के खेल को बताते हुए कहा, “साहब, एक हफ्ते पहले एक आदमी आया था। नाम था भोलानाथ पटेल, खुद को पादरी बताता था। बोला, ‘भाई, तुम्हारी परेशानियाँ खत्म हो जाएँगी। जीसस भगवान के आश्रय में आ जाओ। पैसे देंगे, बच्चों की फ्री पढ़ाई कराएँगे, बीवी का इलाज मुफ्त में होगा। शादी-ब्याह में भी मदद करेंगे।’ मैंने सोचा, गरीब आदमी हूँ, क्या बिगड़ जाएगा। लेकिन जब रविवार को चर्च बुलाया, तो वहाँ का नजारा देखकर रोंगटे खड़े हो गए।”

2023 से जारी है खरहरा चर्च में धर्मांतरण का खेल

आनंद की यह कहानी कोई पहली नहीं है। दो साल पहले साल 2023 के आखिर से खरहरा चर्च में अनगिनत लोगों का धर्मांतरण कराया जा चुका है। बहुत सारे लोग लल्लू से जोसेफ जैसे नाम वाले हो चुके हैं। दिखने में खरहरा गाँव का चर्च पुराना लगता है, लेकिन अंदर से काफी सजा-धजा है। यहाँ आसपास के गाँवों कुरकुठिया, बढ़ौली, लेढ़ू, जसोहर पहाड़ी से लोग आते रहते हैं। किसी की तबियत ठीक नहीं रहती, तो कोई आर्थिक रूप से टूटा हुआ है और इन सबका फायदा उठाते हैं धर्मांतरण गिरोह, जो लोगों को छल-कपट से ईसाई बनाते हैं।

एक व्यक्ति ने नाम न छापने की शर्त पर ऑपइंडिया से कहा, “बहू की तबीयत खराब थी। डॉक्टरों ने कहा-ऑपरेशन के 50 हजार लगेंगे। पादरी साहब आए, बोले ‘चिंता मत करो, जीसस सब ठीक कर देंगे। बस, प्रार्थना में शामिल हो जाओ।’ हम गए, पानी छिड़क दिया, नाम बदल दिया। पैसा मिला भी लेकिन अब लगता है धोखा हुआ है।” उन्होंने कहा कि बेटे ने बताया कि वो घर वापसी भी नहीं कर सकते, क्योंकि पादरी और उनके लोगों ने ईसाई बनाते समय उनका वीडियो-फोटो लिया हुआ है।

पादरी भोलानाथ पटेल संभालता है धर्मांतरण का खेल

मिर्जापुर के इस छोटे से गाँव में धर्मांतरण का पूरा खेल संभालता है पादरी भोलानाथ पटेल। खुद मूल रूप से गाजीपुर जिले के रेवतीपुर थाना इलाके में आने वाले तिवला गाँव का है। वो रहता भी पहले लखनऊ में था, जहाँ वो सेंट जीसस स्कूल में पढ़ाता था। टीचर थे।

पुलिस ने जब भोलानाथ पटेल और उसकी पत्नी को गिरफ्तार किया, तो उसने खुद के ईसाई बनने की कहानी बताई। भोलानाथ ने बताया, “साल 2008 में मुझे किडनी की गंभीर बीमारी हुई थी। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था, लेकिन ईसाई प्रार्थना सभा में शामिल होने के बाद वे ‘चमत्कारिक’ तरीके से ठीक हो गए।”

ईसाई धर्मांचरण रैकेट का भंडाफोड़
ईसाई धर्मांतरण रैकेट का भंडाफोड़ (फोटो साभार: AI GROK)

भोलानाथ (पुलिस पूछताछ के दौरान) ने बताया, “मैंने जीसस का शुक्रिया अदा किया। उसी ने मुझे नई जिंदगी दी। तब से मैंने फैसला किया, दूसरों को भी यह रास्ता दिखाऊँगा।” इसके बाद भोलानाथ को लखनऊ के मिशनरी कार्यालय से खरहरा चर्च भेजा गया। यहाँ वो अपनी पत्नी माया पटेल के साथ रहने लगा। बीवी माया महिलाओं को धर्मांतरण के जाल में फँसाती, तो खुद भोला पुरुषों को।

सामाजिक बहिष्कार के शिकार हो चुके हैं ईसाई बने लोग

भोलानाथ के मुताबिक, “हम कोई जबरदस्ती नहीं करते। लोग खुद आते हैं। जीसस की कृपा से उनकी जिंदगी बदल जाती है।” लेकिन ग्रामीणों का कहना अलग है। विजय (नाम-परिवर्तित) ने कहा, “मैंने पहले धर्मांतरण किया था। शुरु में ये अच्छा लगता था। पैसे भी मिले, नौकरी भी लगी। लेकिन अब लगता है, हमारी पहचान ही छीन ली गई। गाँव वाले ताने मारते हैं।”

रविवार को हुआ धर्मांतरण गैंग का भंडाफोड़

14 दिसंबर 2025 को दोपहर करीब 12:45 बजे आनंद दुबे को चर्च बुलाया गया। वहाँ 35-40 ग्रामीण थे, ज्यादातर आर्थिक रूप से कमजोर। पादरी भोलानाथ ने कहा, “आज तुम जीसस भगवान के आश्रय में आओगे। सारी तकलीफें खत्म हो जाएँगी। जो ना मानेगा, उसके साथ बुरा होगा।”

पादरी ने आनंद पर पवित्र पानी छिड़का, नाम बदलकर ‘जोसेफ आनंद’ कर दिया। फिर ‘पवित्र डुबकी’ की रस्म शुरू की, लेकिन आनंद हल्ला मचाकर भाग निकले। सीधे थाने पहुँचे और तहरीर दी।

शिकायत पाने के बाद सक्रिय हुई पुलिस ने तुरंत छापेमारी की और भोलानाथ, माया, कृष्णकांत तिवारी, अंगनू प्रसाद, फूलपत्ती, निशा देवी, सुशीला देवी, हीरावती देवी, रेनू, लक्ष्मी और साधना समेत को 11 को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस को मौके से चार बाइबल, 10 कॉपी-किताबें, तीन स्मार्टफोन और एक की-पैड फोन मिले। लोगों के वीडियो और फोटो थे, जो धर्मांतरण की रस्मों के थे। इस मामले में पुलिस ने उत्तर प्रदेश धार्मिक विधि (संशोधन) अधिनियम 2021 की धारा 3 और 5(1) के तहत मामला दर्ज किया है।

ऑपइंडिया के पास उपलब्ध एफआईआर की कॉपी के मुताबिक, तहरीर में आनंद दुबे ने लिखा,”मेरी पत्नी को पुरानी बीमारी है। एक सप्ताह पूर्व आरोपी भोलानाथ पटेल उर्फ पादरी जीसस चर्च खरहरा आकर मेरे घर पर आया और बोला कि यदि आप ईसाई धर्म अपना लेंगे तो आर्थिक लाभ, बच्चों की फ्री शिक्षा, मेडिकल सुविधा आदि प्रदान की जाएगी। मैंने सहमति जताई। आज (14 दिसंबर 2025) को दोपहर लगभग 12:45 बजे मुझे चर्च बुलाया। वहाँ 35-40 ग्रामीण उपस्थित थे।”

एफआईआर की कॉपी

आनंद ने आगे लिखा है, “आरोपित भोलानाथ पटेल, माया पटेल, कृष्णकांत तिवारी, अंगनू प्रसाद, निशा देवी, सुशीला देवी, हीरावती देवी, रेनू, लक्ष्मी, साधना और फूलपत्ती मौजूद थे। उन्होंने कहा कि जीसस भगवान के आश्रय में आ जाओ, सारी पीड़ाएँ समाप्त हो जाएँगी। ना मानने पर दुर्भाग्य आएगा। उन्होंने मेरे ऊपर पवित्र जल छिड़का, नाम ‘जोसेफ आनंद’ रखा और पवित्र स्नान कराने का प्रयास किया। मैंने विरोध किया और भाग आया। यह अवैध धर्मांतरण है।”

एफआईआर की कॉपी

प्रशासन कर रहा कार्रवाई, पूछताछ जारी

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक सोमेन बर्मा ने बताया, “धर्म परिवर्तन के काम में लगे 11 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। आरोपी लोगों को प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन करा रहे थे। उनके पास से मजहबी पुस्तकें और मोबाइल फोन बरामद किए गए हैं। खुफिया सूचना थी कि 25 दिसंबर को बड़े स्तर पर धर्मांतरण होने वाला था। जाँच जारी है।”

देहात कोतवाल अमित मिश्रा ने खुलासा किया, “खरहरा चर्च में लगभग दो हजार लोगों का धर्मांतरण कराने की साजिश थी। स्थानीय और आसपास के गाँवों के भोले-भाले लोग निशाना बनाए जा रहे थे। पादरी भोलानाथ लखनऊ से फंडिंग लेता था। हम सख्ती से कार्रवाई करेंगे।”

साल 2023 से धर्मांतरण के 15 केस आ चुके हैं सामने

बीते 2 सालों में मिर्जापुर में ईसाई मिशनरी की सक्रियता ने स्थानीय प्रशासन को हिलाकर रख दिया है। 2023 से अब तक कम से कम 15 मामले दर्ज हो चुके हैं, जिनमें अवैध धर्मांतरण के आरोप लगे हैं। इनमें से 11 मामले युवतियों को बहला-फुसलाकर भगाने, फिर धर्म परिवर्तन कर शादी कराने के हैं। बाकी चार बड़े रैकेट से जुड़े हैं।

उदाहरण के तौर पर, विंध्याचल थाने में एक केस दर्ज हुआ, जिसमें भुजवा चौकी के विजय एम को गिरफ्तार किया गया। अहरौरा थाने में 30 सितंबर 2025 को देव सहायम डेनियर समेत पाँच गिरफ्तार हुए। लालगंज पुलिस ने जेम्स उर्फ रामदीन उर्फ राजू और उनकी पत्नी सरिता देवी को पकड़ा। इन मामलों में प्रलोभन का पैटर्न एक जैसा रहा- पैसे, नौकरी, शिक्षा।

इन 15 मामलों ने न सिर्फ परिवारों को तोड़ा है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी प्रभावित किया है। ग्रामीणों में डर का माहौल है। एक सामाजिक कार्यकर्ता, बजरंग दल के शांतनु तिवारी ने कहा, “ये मिशनरी गरीबी का फायदा उठाते हैं। हिंदू समाज जागे, तो ये रुकेंगे।” खरहरा की यह घटना एक चेतावनी है। गरीबों के सपनों पर डाका डालने वाले इस खेल को रोकना होगा, वरना और कितने आनंद दुबे फँसेंगे?