देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवा, यूपीएससी (UPSC) की तैयारी कराने वाले कोचिंग संस्थान आज शिक्षा के मंदिर कम और ‘ब्रेनवॉशिंग’ के केंद्र ज्यादा नजर आ रहे हैं। हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के प्रोफेसर और ‘दृष्टि IAS’ के चर्चित मुखौटा रहे विजेंद्र सिंह चौहान का एक वीडियो सोशल मीडिया पर आग की तरह फैल रहा है। विजेंद्र चौहान ने दावा किया है कि ChatGPT जैसे आधुनिक तकनीक के एल्गोरिदम भी ‘जातिवादी’ हैं और सवर्णों का पक्ष लेते हैं।
विजेंद्र सिंह चौहान का यह केवल एक बयान नहीं है, बल्कि उस गहरे और जहरीले नैरेटिव का हिस्सा है, जिसके तहत भविष्य के नौकरशाहों के मन में हिंदू धर्म, सवर्ण समाज और भारतीय संस्कृति के प्रति नफरत भरी जा रही है। विजेंद्र चौहान, जो ‘कैजुअल’ ड्रेसिंग वाले बयान से वायरल होकर यूट्यूबर बने, अब उसी प्रभाव का इस्तेमाल समाज को बाँटने के लिए कर रहे हैं।
ChatGPT में भी ‘सवर्ण षड्यंत्र’: विजेंद्र चौहान का नया शिगूफा
विजेंद्र सिंह चौहान ने एक पुस्तक विमोचन के दौरान दावा किया कि ChatGPT (Generative Pre-trained Transformer) हिंदू समाज के सवर्णों द्वारा प्रशिक्षित किया गया है, इसका डेटा सवर्णों की तरफ झुका हुआ है क्योंकि इसे ट्रेन करने वाले लोग उसी वर्ग से आते हैं।
विजेंद्र सिंह चौहान ने इसे ‘एल्गोरिदम की लड़ाई’ करार दिया। चौहान का यह तर्क न केवल तकनीकी रूप से हास्यास्पद है, बल्कि समाज में अविश्वास पैदा करने वाला है। विजेंद्र सिंह चौहान के अनुसार, लड़ाई अब केवल मुख्यमंत्रियों या प्रधानमंत्रियों से नहीं, बल्कि मशीनों से भी है क्योंकि वे ‘न्याय’ नहीं कर सकतीं।
Professor & Educator Dr. Vijender Singh Chauhan Sparks Controversy Claiming ChatGPT Has Upper-Caste Bias.
A viral video clip featuring Dr. Vijender Singh Chauhan, a well-known UPSC mock interviewer, has ignited widespread debate on social media. In the clip, Dr. Chauhan argues… pic.twitter.com/zeIRHxHaLH
इस बयान पर सोशल मीडिया पर उनकी जमकर किरकिरी हुई। जानकारों का कहना है कि यह पूरी तरह से बेतुका और हास्यास्पद तर्क है, क्योंकि AI डेटा पर काम करता है न कि किसी की जाति पर। कुछ ने तंज कसते हुए कहा कि अब शायद ChatGPT में भी ‘आरक्षण’ की माँग की जाएगी। आलोचकों का मानना है कि यह सब केवल अपनी गिरती लोकप्रियता को बचाने और हिंदू समाज को जाति के नाम पर लड़ाने का एक सधा हुआ प्रोपेगेंडा है।
प्रसिद्ध पैरोडी अकाउंट ‘द स्किन डॉक्टर’ ने तंज कसते हुए लिखा कि सैम ऑल्टमैन (OpenAI के CEO) असल में बिहार के समस्तीपुर के ‘मैथिल ब्राह्मण’ हैं, जो दलितों का शोषण करने अमेरिका चले गए थे।
He is right.
ChatGPT’s founder Sam Altman’s family was actually Maithil Brahmins from Samastipur, Bihar.
When they realised the country was about to get independence and they would no longer be able to exploit Dalits, they moved to America and changed their surname to blend in… pic.twitter.com/xU29xB8mlT
व्यंग्य तो अपनी जगह है, लेकिन गंभीर सवाल यह है कि एक शिक्षक, जो हजारों UPSC अभ्यर्थियों का मार्गदर्शक है, वह तकनीक जैसी तटस्थ चीज में भी जाति का जहर क्यों घोल रहा है? क्या यह उनकी गिरती लोकप्रियता और सोशल मीडिया पर अप्रासंगिक होने की छटपटाहट है, या फिर हिंदू समाज को बाँटने का कोई बड़ा वैश्विक एजेंडा?
कोचिंग के ‘जहरीले’ टीचर: लादेन के मुरीद और राम-सीता के आलोचक
विजेंद्र चौहान अकेले नहीं हैं। UPSC कोचिंग की इस मंडी में कई ऐसे ‘सेलिब्रिटी’ शिक्षक हैं जो खुलेआम हिंदूफोबिया और इस्लामी महिमामंडन का खेल खेल रहे हैं। अवध प्रताप ओझा (ओझा सर) का उदाहरण सामने है, जिन्होंने वैश्विक आतंकी ओसामा बिन लादेन को ‘सपना देखने वाला’ और ‘महान उपलब्धि’ हासिल करने वाला बताया। ओझा सर ने इस्लाम को ‘रोशनी वाला मजहब’ करार दिया और दावा किया कि जब पूरी दुनिया में अँधेरा था, तब मोहम्मद साहब दीया लेकर खड़े थे। वे हिंदू धर्म की सती प्रथा पर प्रहार करते हैं लेकिन इस्लाम की कट्टरता पर मौन रहते हैं।
इसी कड़ी में विकास दिव्यकीर्ति (दृष्टि IAS) का नाम भी आता है, जिन्होंने माता सीता की तुलना ‘कुत्ते द्वारा चाटे गए घी’ से की थी। उन्होंने वाल्मीकि रामायण के संदर्भों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया और भगवान राम को ‘जातिवादी’ साबित करने की कोशिश की। यह वही पैटर्न है जिसके तहत Vision IAS की स्मृति शाह ने भक्ति आंदोलन को ‘लिबरल इस्लाम’ की देन बताया और कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार को जायज ठहराने की कोशिश की। ये शिक्षक क्लास में पढ़ाते समय धीरे-धीरे छात्रों के दिमाग में यह बात बिठा देते हैं कि हिंदू संस्कृति पिछड़ी और शोषक है, जबकि हमलावर और विदेशी विचारधाराएँ महान थीं।
इतिहास का ‘व्हाइटवॉश’ और मुगलों का फर्जी महिमामंडन
इन कोचिंग सेंटरों में इतिहास को इस तरह पेश किया जाता है जैसे मुगल काल ‘स्वर्ण युग’ था। औरंगजेब, जिसने हजारों मंदिर तुड़वाए, उसे इन क्लासों में ‘नैतिकता का प्रतीक’ बताया जाता है। Vision IAS के एक वीडियो में शिक्षक दावा करता है कि औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर इसलिए तुड़वाया क्योंकि वहाँ ‘अवैध गतिविधियाँ’ हो रही थीं।
शाहजहाँ, जिसे प्रेम का पुजारी बताया जाता है, उसके असली वहशीपन को छिपाया जाता है। इतिहास गवाह है कि शाहजहाँ के हरम में 8,000 से ज्यादा महिलाएँ यौन दासी (Sex Slaves) के रूप में रखी गई थीं, जिनमें बड़ी संख्या हिंदू महिलाओं की थी।
इतना ही नहीं, शाहजहाँ ने अपनी ही बेटी जहाँआरा के साथ शारीरिक संबंध बनाए और जब मौलवियों ने सवाल उठाया, तो उन्होंने ‘माली और पेड़’ का हवाला देकर इसे जायज ठहरा दिया। शाहजहाँ ने बनारस के 76 मंदिरों को ध्वस्त किया और हिंदुओं के सामूहिक नरसंहार किए, लेकिन वामपंथी प्रभाव वाले ये शिक्षक उसे एक ‘महान निर्माता’ के रूप में पेश करते हैं।
छात्रों को यह नहीं बताया जाता कि दिल्ली का रेड लाइट एरिया ‘जीबी रोड’ शाहजहाँ की हवस और उसके हरम से निकाली गई महिलाओं के कारण ही बसा था। इतिहास का यह अपराधीकरण केवल हिंदू धर्म को बदनाम करने के लिए किया जाता है।
भावी नौकरशाहों का ‘ब्रेनवॉश’: देश के लिए कितना बड़ा खतरा?
चिंता की बात यह है कि ये संस्थान केवल परीक्षा की तैयारी नहीं करा रहे, बल्कि एक विशेष विचारधारा के ‘सैनिक’ तैयार कर रहे हैं। जब एक अभ्यर्थी क्लास में स्मृति शाह जैसे शिक्षकों से सुनता है कि हिंदू जमींदारों ने मुस्लिम किसानों का शोषण किया, इसलिए कश्मीर में जो हुआ वह ‘क्लास डिस्टिंक्शन’ था, तो वह कश्मीरी हिंदुओं के दर्द के प्रति संवेदनहीन हो जाता है। जब वह विजेंद्र चौहान से सुनता है कि तकनीक भी जातिवादी है, तो वह पूरे सिस्टम को ही शंका की नजर से देखने लगता है।
ये कोचिंग संस्थान अब वैचारिक युद्ध के केंद्र बन चुके हैं जहाँ हिंदू आस्थाओं (नींबू-मिर्ची, नारियल फोड़ना) का मजाक उड़ाना ‘प्रगतिशीलता’ माना जाता है। वहीं दूसरी ओर, बुर्के और हिजाब को ‘सोशल प्राइड’ बताकर डिफेंड किया जाता है। यह ‘भूरी बाल साफ करो” (सवर्णों को खत्म करो) वाली लालू यादव की उस हिंसक राजनीति का नया और परिष्कृत रूप है, जिसे अब एयरकंडीशन्ड कमरों में बैठकर ‘मेंटर्स’ के जरिए फैलाया जा रहा है। अगर यह सिलसिला नहीं रुका, तो भविष्य में देश को ऐसे नौकरशाह मिलेंगे जो अपनी ही जड़ों और धर्म के प्रति घृणा से भरे होंगे।
विकिपीडिया के 25 साल पूरे होने वाले हैं। इस मौके पर ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने 18 जनवरी को विकिमीडिया फाउंडेशन की CEO मारियाना इस्कंदर का एक इंटरव्यू छापा है। इंटरव्यू में इस्कंदर ने प्लेटफॉर्म को निष्पक्ष, वॉलंटियरों द्वारा संचालित इनसाइक्लोपीडिया के तौर पर पेश किया। उसने कहा कि प्लेटफॉर्म पूरी तरह से तथ्यों की सटीकता और अलग-अलग विचारों को तरजीह देता है।
भारत में एंटी हिन्दू सोच को लेकर हो रही आलोचना का जवाब देते हुए, इस्कंदर ने प्लेटफॉर्म का बचाव किया। उन्होंने कहा कि प्लेटफॉर्म ‘भरोसेमंद सोर्स’ से जानकारी लेता है, उसकी पॉलिसी निष्पक्षता पर आधारित है। यहाँ आम सहमति से एडिटिंग किया जाता है।
हालाँकि, अगर विकिपीडिया की अपनी कार्यप्रणाली, एडिटिंग का इतिहास और दर्ज हस्तक्षेपों को ध्यान से देखा जाए तो एक बिल्कुल अलग तस्वीर सामने आती है। न्यूट्रल होने के विकिपीडिया के दावे आइडियोलॉजिकल स्रोतों की छँटनी, अलग राय रखने वाले एडिटर्स को किनारे करने और असहज या असुविधाजनक तथ्यों को बाहर रखने की वजह से सीमित हो जाते हैं, खासकर भारत से जुड़े मुद्दों पर। विकिपीडिया अपनी इस वैचारिक झुकाव को नीतियों, विशेषाधिकारों और ताकत के जरिए आसानी से कायम रख पाता है।
‘भरोसेमंद सोर्स’ बनाम सिस्टम असल में कैसे काम करता है
इस्कंदर ने इंटरव्यू में बार-बार दावा किया कि विकिपीडिया ‘भरोसेमंद सोर्स’ पर निर्भर है। उनके अनुसार, ऐसे सोर्स से जानकारी लेना प्लेटफॉर्म की क्रेडिबिलिटी की बुनियाद है। उन्होंने इस फ्रेमवर्क को एक न्यूट्रल सेफगार्ड के तौर पर पेश किया और तर्क दिया कि विकिपीडिया का कंटेंट ‘तथ्यपरक, निष्पक्ष और भरोसेमंद सोर्स पर आधारित’ है। उन्होंने आगे दावा किया कि कंटेंट को वॉलंटियर्स द्वारा ट्रांसपेरेंट तरीके से मॉडरेट किया जाता है। इस दौरान खुल कर बहस होती है और आम सहमति से गलतियों को ठीक किया जाता है।
(साभार-विकिपीडिया)
हालाँकि, इंटरव्यू लेने वाले ने प्लेटफॉर्म की उस बुनियादी खामी पर सवाल ही नहीं उठाया, जो इस पूरे दावे की जड़ में है। विकिपीडिया जिस चीज को ‘विश्वसनीय स्रोत’ मानता है, उसकी परिभाषा खुद वैचारिक रूप से न्यूट्रल नहीं है। यह एक बंद और खुद को ही संदर्भ मानने वाली व्यवस्था है, जिसमें चुनिंदा कुछ पब्लिकेशन को असमान रूप से ज्यादा महत्व दिया जाता है और इनमें से अधिकतर एक ही वैचारिक दिशा में झुके हुए हैं।
(स्रोत-विकिपीडिया)
असल में विकिपीडिया ज्यादातर लेफ्ट-लिबरल या तथाकथित ‘प्रगतिशील’ सोर्स को भरोसेमंद मानता है। लेफ्ट-लिबरल कहानी को चुनौती देने वालों को कम करके आंका जाता है। खास कर जो भारत से आते हैं या नॉन-लेफ्ट विचार को मानते हैं, उन्हें सिरे से खारिज कर दिया जाता है। विकिपीडिया अपने ‘भरोसेमंद सोर्स’ पेज पर कहता है ‘विकिपीडिया के आर्टिकल भरोसेमंद, पब्लिश सोर्स पर आधारित होने चाहिए, यह पक्का करते हुए कि उन सोर्स में आए सभी मेजॉरिटी और जरूरी माइनॉरिटी विचारों को कवर किया जाए।’
इसका मतलब है कि विकिपीडिया जिस भी सोर्स को ‘भरोसेमंद’ मानता है, वह सच बन जाता है, असली सच नहीं। यह आगे कहता है कि अगर जानकारी ‘भरोसेमंद सोर्स’ से नहीं मिलती है, तो विकिपीडिया को ‘उस टॉपिक पर कोई आर्टिकल नहीं देना चाहिए’। यह कोई थ्योरेटिकल चिंता नहीं है बल्कि राजनीतिक रूप से अहम पेजों पर देखा गया एक डॉक्यूमेंटेड पैटर्न है।
विकिपीडिया की सोर्सिंग पॉलिसी इस बात पर आधारित नहीं है कि कोई सोर्स फैक्ट्स पर आधारित जानकारी देता है या सबूतों पर आधारित। यह उन सोर्स पर आधारित है, जिन्हें वह अपने इकोसिस्टम में पहचानता और सहमति देता है। एक बार जब किसी पब्लिकेशन पर ‘भरोसेमंद नहीं’ या ‘आम तौर पर भरोसेमंद नहीं’ का लेबल लग जाता है, तो उसकी रिपोर्टिंग को असल फैक्ट्स की परवाह किए बिना बाहर कर दिया जाता है। इससे एक सर्कुलर अथॉरिटी लूप बनता है, यानी सोर्स भरोसेमंद हैं क्योंकि विकिपीडिया कहता है और विकिपीडिया न्यूट्रल है क्योंकि यह उन्हीं सोर्स पर निर्भर करता है।
दिलचस्प बात यह है कि द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के इंटरव्यू में इस सिस्टम को गलत जानकारी के खिलाफ बचाव के तौर पर बताया गया। हालाँकि, ये बात कहीं सामने नहीं आई कि यह फ्रेमवर्क आइडियोलॉजिकल फिल्टरिंग को ‘एडिटोरियल सावधानी’ के तौर पर पेश करने की इजाजत देता है। जब पॉलिसी लेवल पर सोर्स की पूरी कैटेगरी को बाहर कर दिया जाता है, तो निष्पक्षता संभव नहीं है। इसलिए नहीं कि एडिटर लापरवाह हैं, बल्कि इसलिए कि नियम खुद ही एक्सेप्टेबल फैक्ट्स की रेंज को छोटा कर देते हैं।
न्यूट्रल पॉइंट ऑफ व्यू, बनाम सोर्स
इंटरव्यू के दौरान, इस्कंदर ने पक्षपातपूर्ण रवैये के आरोप को देखते हुए बचाव के तौर पर ‘न्यूट्रल पॉइंट ऑफ व्यू’ पॉलिसी का जिक्र किया। उन्होंने दावा किया कि विकिपीडिया ‘जानकारी देता है, मनाने के लिए बाध्य नहीं करता’, यानी यह किसी खास आइडियोलॉजी को प्रमोट नहीं करता, बल्कि फैक्ट्स, पॉलिसी और भरोसेमंद सोर्सिंग के आस-पास बनी आम सहमति को दिखाता है।
विकिपीडिया पर न्यूट्रैलिटी का मतलब किसी कहानी के सभी पहलुओं को सामने रखना नहीं है। इसका मतलब है कि विकिपीडिया-अप्रूव्ड ‘भरोसेमंद सोर्स’ जो लिखते आ रहे हैं, उसे समराइज करना। यह आधारभूत फर्क है।
विकिपीडिया के ‘न्यूट्रल पॉइंट ऑफ़ व्यू’ पेज पर लिखा है, “विकिपीडिया पर सभी एनसाइक्लोपीडिया कंटेंट न्यूट्रल पॉइंट ऑफ व्यू (NPOV) से लिखा जाना चाहिए, जिसका मतलब है कि किसी टॉपिक पर भरोसेमंद सोर्स से पब्लिश किए गए सभी जरूरी विचारों को सही तरीके से, सही अनुपात में और जहाँ तक हो सके, बिना किसी एडिटोरियल भेदभाव के दिखाना।”
अगर ‘भरोसेमंद सोर्स’ के अलावा दूसरे सोर्स को भी इसमें शामिल होने का मौका मिलता, तो यह एक न्यूट्रल प्लेटफॉर्म हो सकता था। लेकिन जब विकिपीडिया के भरोसेमंद सोर्स एक ही विचारधारा लेफ़्ट-लीनिंग हो, तो कोई कैसे उम्मीद कर सकता है कि वह न्यूट्रल रहेगा?
यहीं से न्यूट्रल होने का दावा कमज़ोर पड़ने लगता है। जब वही आइडियोलॉजिकल इकोसिस्टम यह तय करता है कि कौन से सोर्स भरोसेमंद हैं, वे क्या पब्लिश करते हैं, और उनके नैरेटिव को कितना महत्व मिलता है, तो न्यूट्रल होना इंडिपेंडेंट होने के बजाय डेरिवेटिव हो जाता है। विकिपीडिया घटनाओं का सीधे मूल्यांकन नहीं करता है। यह अपने पसंदीदा सोर्स के वर्ल्डव्यू को दोहराता है, जबकि नतीजे को न्यूट्रल एनसाइक्लोपीडिक नॉलेज के तौर पर पेश करता है।
जबकि द टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने इस सिस्टम को एक ऑब्जेक्टिव सेफगार्ड के तौर पर पेश किया। असल में यह खास तरह के फ़िल्टर की तरह काम करता है। फैक्ट्स, रिबटल्स, और अल्टरनेटिव इंटरप्रिटेशन जो अप्रूव्ड सोर्स पाइपलाइन से नहीं गुज़रते, उन पर मेरिट के आधार पर बहस नहीं की जाती, उन्हें दहलीज पर ही बाहर कर दिया जाता है। एडिटर्स से यह नहीं पूछा जाता कि कौन-सा दावा सही है या काम का है, बल्कि यह पूछा जाता है कि क्या यह उस सोर्स से आया है जिसे विकिपीडिया पहले ही ठीक मान चुका है। इसका भारत में राजनीतिक और सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील विषयों पर सीधा असर पड़ता है।
घटनाओं को सोर्स के नजरिए से दिखाया जाता है, जिनमें से कई की सोच एक जैसी होती है। जब भारतीय संस्थान, सब्जेक्ट मैटर एक्सपर्ट्स, या सीधे तौर पर हिस्सा लेने वाले लोग कहानियों को सही करने या उनका संदर्भ बताने की कोशिश करते हैं, तो उनके इनपुट अक्सर रिजेक्ट कर दिए जाते हैं। इसकी वजह यह नहीं है कि वे गलत हैं, बल्कि इसलिए कि वे विकिपीडिया के कड़े सोर्सिंग क्राइटेरिया को पूरा नहीं करते।
इस्कंदर ने भारत में विकिपीडिया के बड़े कंट्रीब्यूटर बेस पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग तरह के लोगों की हिस्समेदारी से स्वाभाविक रूप से संतुलित और रिप्रेजेंटेटिव कंटेंट मिलता है। उन्होंने कहा कि पेज व्यू और एडिटर की हिस्सेदारी के मामले में भारत टॉप कंट्रीब्यूटर्स में से एक है। यह बात कहकर, उन्होंने पाठकों को भरोसा दिलाने की कोशिश की कि भारत से जुड़े विषय विदेश से नहीं, बल्कि लोकल हैं।
हालाँकि जवाब में जिस बात को नजरअंदाज किया गया, वह कहीं ज़्यादा असहज करने वाली सच्चाई है। भारतीय एडिटर्स के होने का मतलब यह नहीं है कि कवरेज अपने आप सही या देश भर में दिखाने वाली होगी। असल में, कई राजनीतिक और सांप्रदायिक रूप से सेंसिटिव इलाकों में इसका उल्टा असर हुआ है।
जब एडिटिंग पैटर्न, प्रशासनिक कामों और लंबे समय से चल रहे विवादों की जाँच की जाती है, तो पता चलता है कि भारत में रहने वाले विकिपीडिया एडिटर्स का एक वर्ग भारत सरकार, उसके संस्थानों और हिंदू सभ्यता और संस्कृति के खिलाफ राय रखता है। यह प्लेटफॉर्म पर ‘टॉक’ सेक्शन में होने वाली चर्चाओं में साफ दिखता है। ये राय सीधे तौर पर तय करती हैं कि कौन सी जानकारी शामिल की जाए, हटाई जाए, किस पर जोर दिया जाए या किसको खारिज किया जाए।
विकिपीडिया की प्रतिष्ठा लंबे समय से चलने और पॉलिटिकल जानकारी की वजह से है। जो एडिटर इसके मुश्किल नियमों को समझने में सालों लगाते हैं, विवादित पेजों पर उनका बहुत ज़्यादा असर दिखता है । भारत से जुड़े आर्टिकल्स में एडिटर्स का एक छोटा लेकिन मज़बूत ग्रुप सांप्रदायिक हिंसा, राष्ट्रीय सुरक्षा , मीडिया क्रेडिबिलिटी और पॉलिटिकल डेवलपमेंट जैसे टॉपिक पर नैरेटिव पर बहुत ज़्यादा कंट्रोल रखता है।
कई मामलों में, उनके पर्सनल आइडियोलॉजिकल झुकाव आर्टिकल्स में साफ तौर पर दिख जाते हैं। हालाँकि इन्हें नहीं बताना होता है, लेकिन सोर्स चुनने, फ्रेमिंग और चुनिंदा चूक में ये दिख जाते हैं।ब
टाइम्स ऑफ इंडिया ने एडिटर डाइवर्सिटी को मजबूती के तौर पर पेश करने की कोशिश की, लेकिन एडिटोरियल पावर कंसंट्रेशन को बताने में असफल रहा। सभी एडिटर एक जैसे नहीं होते। नए कंट्रीब्यूटर, खासकर जो अलग नजरिया रखते हैं या हावी नैरेटिव को चुनौती देने की कोशिश करते हैं, अक्सर खुद को उन अनुभवी एडिटर्स से कमतर पाते हैं जो एडिट्स को ब्लॉक करने, वापस लेने या बदनाम करने के लिए पॉलिटिकल भाषा का इस्तेमाल करने में माहिर होते हैं। बायस को ठीक करने के बजाय, कई मामलों में लोकल भागीदारी ने इसे और मजबूत कर दिया जाता है।
जो एडिटर विकिपीडिया की ग्लोबल कम्युनिटी की सोच से सहमत होते हैं, उनके लिए आम सहमति बनाना आसान होता है, जबकि अलग राय रखने वाले भारतीय लोगों को अलग-थलग कर दिया जाता है। उन्हें हतोत्साहित किया जाता है या आखिर में बाहर कर दिया जाता है। सिर्फ वही लोग यहाँ एक्टिव रहते हैं, जो एक छोटी सोच वाले दायरे में काम करने को तैयार रहते हैं।
‘आम सहमति’ पर जोर और पेज लॉक करने का नुस्खा
इस्कंदर ने मतभेद होने पर ‘आम सहमति’ को आदर्श स्थिति कहा। उन्होंने सुझाव दिया कि विकिपीडिया के आर्टिकल तभी बदलते हैं जब एडिटर सहमति पर पहुँचते हैं, और यह मिलकर किया जाने वाला प्रोसेस निष्पक्षता, सटीकता और संतुलन पक्का करता है। उनके अनुसार, अगर टेक्स्ट में किसी बदलाव पर आम सहमति नहीं बनती है, तो वह पास नहीं होता है और प्लेटफ़ॉर्म पर पब्लिश नहीं होता है, इस तरह कंटेंट को बचाया जाता है।
हालाँकि विकिपीडिया पर आम सहमति का तरीका ऐसे काम नहीं करता है। विकिपीडिया पर ऑपइंडिया के डॉजियर में इस प्रोसेस को डिटेल में बताया गया है और दिखाया गया है कि सिस्टम में भेदभाव कितनी गहराई तक जड़ें जमा चुकी हैं। खुली बहस को आसान बनाने के बजाय, आम सहमति अक्सर दूसरे विचारों का बाहर करने का रास्ता होता है।
जो एडिटर विकिपीडिया के ‘भरोसेमंद सोर्स’ वाले इकोसिस्टम से अलग सोर्स डालने की कोशिश करते हैं, उन्हें चेतावनी दी जाती है, वापस बुला लिया जाता है या ब्लॉक कर दिया जाता है। ऐसा इसलिए नहीं होता कि जानकारी साफ़ तौर पर गलत है, बल्कि इसलिए होता है क्योंकि यह अंदरूनी सोर्सिंग हायरार्की का उल्लंघन करती है।
दिल्ली दंगों से जुड़ी कवरेज में यह पैटर्न बार-बार देखा गया है, जहाँ एडिटर जो बिना मंज़ूरी वाले पब्लिकेशन या ऑफिशियल जवाबों से मटीरियल जोड़ने की कोशिश करते हैं, उन्हें सजा दी जाती है।
ऐसे मामलों में ‘आम सहमति’ सबूतों पर चर्चा करके नहीं बनती है। यह पहले से तय होती है। इसके अलावा पेज लॉकिंग विकिपीडिया पर एक बड़ा हथियार है। इसका इस्तेमाल ‘असंतुलन’ को ठीक करने के लिए किया जाता है। जब एडिटर कुछ खास फैक्ट्स या नजरियों को शामिल नहीं करते हैं, तो अक्सर आर्टिकल लॉक कर दिए जाते हैं। इसे वेरिफाई नहीं किया जाता कि ये भरोसे लायक है या नहीं।
ऑपइंडिया के डॉजियर में बताया गया है कि कैसे पेज लॉक करना विकिपीडिया के लेफ्ट-लिबरल सोच वाले एडिटर्स के लिए एक टूल बन गया है। उदाहरण के लिए, 2020 के दिल्ली दंगों का पेज भी लॉक है, जिसका मतलब है कि दुनिया भर के हजारों एडिटर्स के पास पेज को एडिट करने का कोई एक्सेस नहीं है। जैसा कि ऑपइंडिया के डॉजियर में बताया गया है, “एक्सटेंडेड कन्फर्म्ड प्रोटेक्शन (ECP) के तहत आर्टिकल्स को सिर्फ एक्सटेंडेड-कन्फर्म्ड अकाउंट्स ही एडिट कर सकते हैं, ऐसे अकाउंट्स जो कम से कम 30 दिनों से रजिस्टर्ड हैं और जिन्होंने कम से कम 500 एडिट किए हैं, या जिन्हें किसी एडमिनिस्ट्रेटर ने मैन्युअली एक्सटेंडेड-कन्फर्म्ड राइट्स दिए हैं।”
इसका असर यह है कि नए एडिटर और असहमति जताने वाले कंट्रीब्यूटर को पूरी तरह से बाहर कर दिया जाता है, जबकि अनुभवी एडिटर के एक छोटे ग्रुप को इस बात पर पूरा कंट्रोल मिल जाता है कि आर्टिकल को कैसे फ्रेम किया जाए और मेंटेन किया जाए।
OpIndia के डॉक्यूमेंटेशन में सबसे खास उदाहरणों में से एक दिल्ली दंगों में ताहिर हुसैन की भूमिका को शामिल करने का बार-बार विरोध है। कोर्ट की कार्रवाई, जांच के डेवलपमेंट और बड़े कवरेज के बावजूद, विकिपीडिया के आर्टिकल में इस पहलू को शामिल करने की कोशिशों में या तो देरी हुई, उन्हें कमज़ोर किया गया, या पूरी तरह से रिजेक्ट कर दिया गया। दूसरे सोर्स का हवाला देने वाले एडिटर को पलटवार और पॉलिसी-बेस्ड ऑब्जेक्शन का सामना करना पड़ा, जबकि आर्टिकल की कोर फ्रेमिंग वैसी ही रही।
दिल्ली दंगों पर विकिपीडिया आर्टिकल की पहली लाइन में ही पक्षपातपूर्ण रवैया देखा जा सकता है। इसमें लिखा है, “2020 के दिल्ली दंगे, या नॉर्थ ईस्ट दिल्ली दंगे, भारत के नॉर्थ ईस्ट दिल्ली में खून-खराबे, प्रॉपर्टी को नुकसान और दंगों की कई लहरें थीं, जो 23 फरवरी 2020 को शुरू हुईं और मुख्य रूप से हिंदुओं द्वारा मुसलमानों पर हमला करने की वजह से हुईं।” यहाँ तक कि कोर्ट ने भी साफ तौर पर कहा है कि दंगे हिंदू विरोधी थे।
(स्रोत- विकिपीडिया)
विकिपीडिया पर ऑपइंडिया के डॉजियर में बताया गया है कि कैसे प्लेटफॉर्म ने चालाकी से दिल्ली दंगों के पीछे हिंदुओं को दिखाया, जबकि असल में इसका उल्टा था। ऑपइंडिया डॉजियर के मुताबिक, विकिपीडिया ने 2020 के दिल्ली दंगों को सिस्टमैटिक तरीके से हिंदुओं को हमलावर के तौर पर दिखाया। जबकि जाँच के नतीजों, कोर्ट के ऑब्जर्वेशन और चश्मदीदों के बयान इसके उलट थे। विकिपीडिया आर्टिकल की पहली ही लाइन में कहा गया कि दंगे ‘मुख्य रूप से हिंदू भीड़ द्वारा मुसलमानों पर हमला करने की वजह से हुए थे’, जिससे एक ऐसा नैरेटिव टोन सेट हुआ जो पूरे पेज पर बना रहा।
(स्रोत-ऑपइंडिया का डोजियर)
डोजियर में बताया गया कि कैसे इस फ्रेमिंग में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा को कम से कम करते हुए मुस्लिम विक्टिम होने को चुनकर बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया। IB अधिकारी अंकित शर्मा और मजदूर दिलबर नेगी समेत हिंदुओं की बेरहमी से की गई हत्याओं को छोड़ दिया गया। देर से कवर किया गया या गोलमोल बातें की गई। यहाँ ‘खुली नालियों में मिली लाशें’ जैसे दावों को विदेशी मीडिया रिपोर्ट्स का इस्तेमाल करके बताया गया, जबकि यह एकमात्र डॉक्यूमेंटेड मामला हिंदू विक्टिम का था।
कोर्ट के रिकॉर्ड और पुलिस जाँच में सामने आया कि मुस्लिम भीड़ ने 23 फरवरी 2020 को पत्थरबाजी शुरू की थी, जिसमें पहली मौत पुलिस कांस्टेबल रतन लाल की हुई थी। इन नतीजों को बार-बार इस आधार पर खारिज कर दिया गया या विकिपीडिया से हटा दिया गया कि दिल्ली पुलिस एक ‘भरोसेमंद सोर्स नहीं’ है, जबकि लेफ्ट-विंग मीडिया की बातों को बिना किसी वैसी जाँच के मान लिया गया।
(स्रोत- ऑपइंडिया)
डोजियर में आगे दिखाया गया कि जब एडिटर्स ने कहानी को सही करने या हिंदू-विरोधी हिंसा वाले सबूत जोड़ने की कोशिश की, तो उन्हें रोक दिया गया। पेज को लंबे समय तक कन्फर्म प्रोटेक्शन में रखा गया, जिससे घटनाओं के गलत विश्लेषण को ‘आम सहमति’ के तौर पर दिखाया जा सके और उसमें सही सुधार को रोका जा सके।
इसी तरह, डोजियर में टेक फॉग जांच के रेफरेंस को पूरी तरह से खारिज किया था, भले ही इसे पब्लिक में काफी चर्चा मिली हो। इसे शामिल करने का विरोध करने वाले एडिटर्स ने सिर्फ इसकी क्रेडिबिलिटी पर ही सवाल नहीं उठाया। उन्होंने इसे पूरी तरह से बाहर करने के लिए विकिपीडिया के सोर्सिंग नियमों का इस्तेमाल किया, जिससे रीडर्स को यह भी नहीं पता चला कि ऐसे आरोप या जाँच हुए हैं। जब द वायर आर्टिकल को लेकर विकिपीडिया के एडिटर्स के बीच विवाद हुआ, तो ऑपइंडिया ने ट्रैक किया कि कैसे विकिपीडिया के लेफ्ट-विंग्ड एडिटर्स ने द वायर का बचाव करने के लिए दखल दिया, जिसे यहां चेक किया जा सकता है।
सबसे बड़ा खुलासा तब हुआ जब द वायर द्वारा पब्लिश एक आर्टिकल के जवाब में एक सीनियर इंडियन नेवी कमोडोर ने जवाब दिया। जैसा कि OpIndia के डॉजियर में बताया गया है, विकिपीडिया के एडिटर्स ने इस आधार पर जवाब मानने से मना कर दिया कि यह फर्स्ट-पर्सन सोर्स है और इसलिए भरोसे के स्टैंडर्ड पर खरा नहीं उतरता। उलझन साफ़ है।
(स्रोत-ऑपइंडिया)
संबंधित व्यक्ति का इंस्टीट्यूशनल तौर पर भरोसेमंद जवाब रिजेक्ट कर दिया गया, जबकि ओरिजिनल मीडिया रिपोर्ट को आर्टिकल में बिना किसी चुनौती के रखा गया। यह विकिपीडिया के आम सहमति मॉडल की सीमाओं को दिखाता है। फर्स्ट-पर्सन अथॉरिटी, भले ही वह किसी सीनियर मिलिट्री अधिकारी की हो, विकिपीडिया के भरोसेमंद फ्रेमवर्क में फिट नहीं हुआ।
फंडिंग और फॉर्मल प्रोजेक्ट्स की भूमिका
इंटरव्यू में एक और बात जो छूट गई, वह थी फंडिंग और फॉर्मल प्रोजेक्ट्स की भूमिका, जो यह तय करती है कि विकिपीडिया ‘भरोसेमंद सोर्स’ को कैसे डिफाइन और लागू करता है। जबकि इस्कंदर ने विकिपीडिया को आम सहमति से चलने वाला एक वॉलंटियर-ड्रिवन प्लेटफॉर्म बताया। लेकिन यह नहीं बताया कि एडिटोरियल हायरार्की और सोर्स प्रेफरेंस को कैसे तेजी से कोडिफाइड, स्टैंडर्डाइज्ड और टेक्नोलॉजिकली लागू किया जा रहा है।
ऐसा ही एक मामला, जैसा कि विकिपीडिया पर ऑपइंडिया के डोजियर में बताया गया है, न्यूज़लिंगर का है, जो एक भारतीय विकिपीडिया एडिटर हैं। खबर है कि उन्हें एक प्रोजेक्ट के लिए विकिमीडिया से जुड़ा ग्रांट मिला था। इसका मकसद सोर्स को कोड करना और एक क्रोम एक्सटेंशन बनाना था, ताकि एडिटर यह पहचान सकें कि कौन से पब्लिकेशन भरोसेमंद हैं और कौन से नहीं। ऊपर से देखने पर, यह एक टेक्निकल मदद लग सकती है जिसे एक जैसा बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया है। असल में, यह पहले से ही खराब सोर्सिंग इकोसिस्टम को और बेहतर बनाता है। न्यूज़लिंगर को पैसे कैसे मिले और उसने ‘भरोसेमंद सोर्स’ का इकोसिस्टम कैसे बनाया, इसकी जानकारी विकिपीडिया पर ऑपइंडिया के डॉजियर में देखी जा सकती है।
(स्रोत-ऑपइंडिया)
सब्जेक्टिव एडिटोरियल फैसलों को कोडेड टूल्स में अनुवाद करके, विकिपीडिया इनफॉर्मल बायस से स्ट्रक्चरल बायस की ओर बढ़ता है। एडिटर्स को यह बताने की जरूरत नहीं है कि किसी सोर्स पर भरोसा किया जाना चाहिए या नहीं। यह फैसला सिस्टम और गाइडलाइंस में पहले से लोड होता है। इससे एडिटोरियल समझदारी कम हो जाती है और पब्लिकेशन्स के एक तय ग्रुप का दबदबा और मजबूत हो जाता है, जिनमें से कई एक जैसी सोच रखते हैं।
ऐसे फैसलों का कंटेंट पर काफी असर पड़ता है। इस पर सवाल नहीं उठाया जाता, बल्कि इसे एक्सटेंशन, डॉक्यूमेंटेशन और ट्रेनिंग मटीरियल में शामिल कर दिया जाता है, तो अलग राय रखने वाले एडिटर्स को और भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। किसी स्टोरी को चुनौती देना सिर्फ एडिटर्स के साथ असहमति का मामला नहीं है, बल्कि प्लेटफॉर्म के फॉर्मल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए भी एक चुनौती है। इससे राजनीतिक मुद्दों पर बने पेज में सुधार करना और मुश्किल हो जाता है।
एंटी हिन्दू घटनाओं को कम करके आंका गया, पैटर्न के तौर पर डॉक्यूमेंट किया गया
टाइम्स ऑफ़ इंडिया के इंटरव्यू में हिन्दू विरोधी दंगों को लेकर कंटेंट पर कहा गया कि ‘भारत में कुछ कमेंटेटर्स’ इसकी आलोचना करते हैं। जबकि ‘हिंदू विरोधी’ शब्द के इस्तेमाल से दूरी बनाई गई है। इसके अलावा जो चीज गायब है, वह है आलोचना के सार के साथ कोई सीरियस जुड़ाव। मुद्दा यह नहीं है कि विकिपीडिया पर आरोप लगे हैं, बल्कि यह है कि ये आरोप कई आर्टिकल्स में और कई सालों से साफ़ और बार-बार होने वाले पैटर्न की ओर इशारा करते हैं।
उदाहरण के लिए, घाटी से कश्मीरी हिंदुओं के पलायन से जुड़े पेज पर, विकिपीडिया मोहिता भाटिया और अलेक्जेंडर इवांस जैसे स्कॉलर्स के कहने के आधार पर इसे नरसंहार कहने से साफ मना कर देता है। ऑपइंडिया ने दोनों स्कॉलर्स के हवाले से बताए गए सोर्स चेक किए और दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने अपनी किताब और आर्टिकल में क्रमशः “नरसंहार” का सिर्फ़ अस्पष्ट रूप से ज़िक्र किया। इवांस ने दावा किया कि उन्होंने जम्मू में कश्मीरी पंडितों का इंटरव्यू लिया था, जिन्होंने पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहराया था, “जो बताता है कि एथनिक क्लींजिंग या नरसंहार का शक गलत है”।
(स्रोत-ऑपइंडिया)
दूसरी तरफ, भाटिया ने लिखा, “जम्मू की मुख्य पॉलिटिक्स, जो ‘हिंदुओं’ को एक जैसा दिखाती है, पंडितों को भी बड़ी ‘हिंदू’ कैटेगरी में रखती है। यह अक्सर उनके माइग्रेशन को समझाने के लिए ‘जेनोसाइड’ या ‘एथनिक क्लींजिंग’ जैसे बहुत ही अग्रेसिव शब्दों का इस्तेमाल करती है और उन्हें कश्मीरी मुसलमानों के सामने खड़ा करती है। BJP ने अपने ‘हिंदू’ वोट बैंक को बढ़ाने के लिए पंडितों की तकलीफों का इस्तेमाल किया है और उन्हें ऐसे विक्टिम के तौर पर पेश किया है जिन्हें मिलिटेंट्स और कश्मीरी मुसलमानों ने अपने वतन से निकाल दिया है।”
एक और उदाहरण 2002 के गुजरात दंगे हैं, जिन्हें “स्कॉलर्स” के कहने के आधार पर ‘मुस्लिम विरोधी दंगा’ बताया गया है। दिलचस्प बात यह है कि जिन स्कॉलर का जिक्र किया गया है, उनमें से एक हर्ष मंदर हैं, जिनका नाम द वायर पर एक आर्टिकल में है। आर्टिकल में यह भी दावा किया गया है कि ट्रेन जलाने की घटना, जिसमें 58 हिंदू मारे गए थे, “असल में एक सुनियोजित ट्रिगर” थी।
(स्रोत-ऑपइंडिया)
यह सिर्फ शब्दों की दिक्कतों या कुछ एडिटर्स के कामों के बारे में नहीं है। यह पैटर्न आर्टिकल्स को कैसे फ्रेम किया जाता है, किस बात पर ज़ोर दिया जाता है और किस पर सवाल उठाए जाते हैं, इसमें दिखता है। हिंदू धार्मिक रीति-रिवाजों, संगठनों और सभ्यता के इतिहास पर अक्सर जाति, कट्टरपंथ या बहुसंख्यकवाद के नज़रिए से चर्चा की जाती है। ऐसी ही जांच अक्सर कहीं और नहीं होती या नरम पड़ जाती है। हिंदुओं के खिलाफ हिंसा को अक्सर कम करके आंका जाता है या फिर उसे नए तरीके से पेश किया जाता है, जबकि हिंदू ग्रुप्स के खिलाफ आरोपों को कड़ी भाषा और बड़े सोर्स के साथ हाईलाइट किया जाता है।
यह पक्षपातपूर्ण रवैया अचानक नहीं आया है। यह सीधे तौर पर पहले से बताए गए सिस्टम से आता है, भरोसेमंद सोर्स की एक छोटी परिभाषा, फर्स्ट-पर्सन या इंस्टीट्यूशनल जवाबों को नकारना, सेंसिटिव टॉपिक्स पर पेज लॉक करना, और एडिटोरियल कंट्रोल जो विचारधारा से जुड़े एडिटर्स के एक छोटे ग्रुप के बीच केंद्रित है। एक बार ये सिस्टम बन जाने के बाद, नतीजे पहले से पता होते हैं।
विकिपीडिया पर ऑपइंडिया के डॉजियर में कई ऐसे मामले दर्ज हैं जहां हिंदू नज़रिए, फैक्ट्स में सुधार या सफाई का विरोध किया गया या उन्हें बाहर रखा गया। इसलिए नहीं कि वे गलत थे, बल्कि इसलिए कि उन्होंने विकिपीडिया के पसंदीदा सोर्स के सपोर्टेड नैरेटिव को चुनौती दी। सुधार या रिव्यू करने के बजाय, ऐसी कोशिशों का अक्सर प्रोसेस से जुड़ी आपत्तियों, पॉलिसी के हवाले या सीधे खारिज कर दिया जाता था।
टाइम्स ऑफ़ इंडिया के इंटरव्यू में विकिपीडिया को एक ट्रांसपेरेंट, खुद को ठीक करने वाला प्लेटफॉर्म बताया गया जो न्यूट्रल पॉलिसी और अपनी मर्ज़ी से आम सहमति से चलता है, लेकिन इसकी सोच छोटी है। विकिपीडिया के सोर्सिंग नियम, न्यूट्रैलिटी का सिद्धांत और एडिटोरियल हायरार्की एक सिस्टम की नाकामी दिखाते हैं, न कि कोई अकेला भेदभाव।
भारत के हिन्दुओं के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित होने के आरोपों का जवाब देते हुए इस्कंदर ने इस बात पर जोर दिया कि विकिपीडिया विश्वस्त स्रोत (reliable sources) से जानकारी लेता है और सर्वसम्मति-आधारित संपादन का पालन करता है। लेकिन जब तक विकिपीडिया की आधारभूत संरचना में बदलाव नहीं किया जाता, तब तक निष्पक्षता सिर्फ कहने के लिए ही रह जाएगी।
विकिपीडिया पर ऑपइंडिया का डोजियर पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)
“नमाज 5 से 15 मिनट में खत्म हो जाती है। कोई शोर शराबा नहीं होता। कोई ढोल नहीं बजता, कोई पड़ोसियों को परेशानी नहीं होती। दुनिया की सबसे खामोश इबादतों में इस नमाज का नाम हैं।”
क्या आप इस बयान से सहमत हैं? अगर आप इस्लामी कट्टरपंथी सोच या एकतरफा नैरेटिव में यकीन रखने वालों में से हैं, तो शायद बिना सवाल किए मान भी गए होंगे। लेकिन सच जानना बहुत जरूरी है। और यह सच आरफा ‘बेगम’ आपको कभी नहीं बताएँगी, क्योंकि उन्होंने आँखों पर पट्टी बाँधी हुई है। ऊपर लिखी गई पंक्तियाँ भी आरफा के बयान की ही हैं, जिन्हें हर जगह मुस्लिम ‘पीड़ित’ दिखता है और ‘पत्रकारिता’ के नाम पर उन्हीं की हक की लड़ाई का ढोंग रचते हुए वे ‘सत्ता का कॉलर’ पकड़ने की धमकी देती फिरती हैं।
‘पत्रकारिता’ के इसी सफर में आरफा को अपने मतलब की खबर मिल जाती है, जिसके जरिए वह हमेशा की तरह ही सरकार को निशाना बना सके और अपने यूट्यूब चैनल की ‘व्यूअरशिप’ भी बढ़ा सकें। खबर बरेली की है, जहाँ एक खाली घर में नमाज पढ़ते कुछ लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया। अब इसी खबर को आधार बनाकर आरफा पूरे देश में अल्पसंख्यकों की आवाज बनने निकल पड़ती हैं।
घटना पर आरफा ने अपने यूट्यूब चैनल पर 10 मिनट की वीडियो पोस्ट की। वीडियो के ट्रेलर में ही आरफा ने ‘सत्ता का कॉलर’ पकड़ने वाले अपने इरादों को पूरा करने की कोशिश की।वीडियो शुरू ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीरों से होती है। जहाँ होटल में बैठकर आरफा खानुम प्रधानमंत्री मोदी के मंदिर दर्शनों की तस्वीरों को गिनती हैं। फिर कहती हैं- “अगर गिनने पर आऊँ कि प्रधानमंत्री ने अपने कार्यकाल में कितने मंदिरों में दर्शन किए, तो शायद सुबह से शाम हो जाए।”
यहीं वीडियो के दर्शक भटक जाते हैं, क्योंकि वह वीडियो की हेडलाइन पढ़कर इस उम्मीद से क्लिक करते हैं कि आरफा बरेली की घटना पर बात करेंगी। लेकिन उन्हें सामने मिलती हैं पीएम मोदी की तस्वीरें। आरफा के यूट्यूब स्ब्सक्राइबर्स, जिनमें से अधिकतर उनकी जैसी ही इस्लामी कट्टरपंथी सोच रखते हैं, यहाँ वह मन में सोचते हैं- “हम तो आरफा के मुँह से इस्लाम की दीन सुनने आए थे और यहाँ आरफा मंदिरों के दर्शन करा रही हैं।” ये बड़ा ही शॉकिंग मोमेंट हो गया होगा, उनके लिए।
खैर, आगे बढ़ते हैं। तो अब आरफा अपने पत्रकारिता के मंसूबे बताने लगती हैं, जो शायद अब तक पूरे देश को समझ आ चुके हैं। वही मंसूबे, जिनसे वह मुस्लिमों को पीड़ित दिखाते हुए ‘सत्ता का कॉलर’ पकड़ना चाहती हैं, लेकिन जब वही मुस्लिम मजहब के नाम पर ‘आतंकवादी’ बनता है तो इससे जुड़े सवाल उनके लिए ‘फनी‘ हो जाते हैं।
इसके बाद अब आती है असल मुद्दे की बारी। बरेली में नमाज पढ़ने पर पुलिस हिरासत वाला मामला। इस मुद्दे पर यूँ तो आरफा का रुख उनके ‘पत्रकारिता के मंसूबों’ से मेल खाता है। लेकिन यहाँ गौर करने वाली बात कुछ और है।
घटना पर सवाल उठाते-उठाते आरफा ‘नमाज’ को दुनिया की सबसे ‘खामोश इबादत’ में से एक घोषित कर देती हैं। अब यह भी एक ‘फनी’ मोमेंट ही है। क्योंकि शायद आरफा यहाँ ‘नमाज’ नाम के किसी व्यक्ति का जिक्र कर रही हैं और उस नमाज को कोई नोबेल पुरस्कार मिला है। क्योंकि इस्लाम मजहब में जो ‘नमाज’ होती है, उसका तो शांति से कोई लेना-देना है नहीं। और यह साबित भी हो चुका है, जब ऐसे मामले सामने आते हैं जिनमें जुमे की नमाज के बाद सांप्रदायिक हिंसा भड़काई गई।
और जब बात दुनिया के सबसे खामोश इबादत ‘नमाज’ की हो रही हो, तो जमीन पर जो हकीकतें सामने आती हैं, वे कतई वैसी नहीं दिखतीं जैसा आरफा अपने वीडियो में पेश करती हैं। याद करें इंदौर को वो वायरल वीडियो जहाँ मुस्लिम भीड़ ने जुमे की नमाज के बाद खुलेआम पूरे शहर को जलाने की धमकी दी। आरफा से सवाल है कि क्या ये विचार ‘खामोश इबादत’ करने के बाद आते हैं?
पूर्व बीजेपी नेता नुपुर शर्मा के ‘पैगंबर’ पर बयान के विरोध में देशभर में जगह-जगह दंगे हुए, उनमें से अधिकतर जुमे की नमाज के बाद ही भड़के थे। इन्हीं में गंगा नगरी प्रयागराज में जुमे की नमाज के बाद दंगे भड़के, पुलिस की गाड़ियों पर पथराव और आगजनी का वो मंजर। उत्तर प्रदेश के इतिहास में ‘काले पन्नों’ में दर्ज संभल हिंसा में भी जुमे की नमाज के बाद भीड़ जुटाई गई थी। और पिछले साल 2025 बरेली में ‘आई लव मोहम्मद’ विवाद पर हिंसा भी जुमे की नमाज के बाद ही भड़की थी।
ये तो कुछ गिने-चुने मामले हैं, लेकिन आए दिन मामले सामने आते हैं कि जुमे की नमाज के बाद मुस्लिम ने हिंदू की दुकान तोड़ी, सरकार के विरोध में प्रदर्शन भी जुमे की नमाज के बाद ही शुरू होते हैं। यहाँ कटाक्ष है कि इसी नमाज को आरफा दुनिया की सबसे ‘खामोश इबादत’ का तबका दे रही हैं।
सच तो यह है कि आरफा ‘बेगम’ का यह तरीका नया नहीं है। यह वही पुरानी स्क्रिप्ट है, जो वह हर बार दोहराती हैं। जहाँ भी किसी मुस्लिम का नाम जुड़ जाए, वहाँ आरफा को तुरंत जुल्म, नाइंसाफी और संविधान खतरे में दिखने लगता है। तब आरफा इस्लाम की दीन देने लग जाती है, नमाज को ‘खामोश इबादत’ कहने लग जाती हैं।
लेकिन जब वही मुस्लिम भीड़ बनकर सड़क पर उतरता है, पत्थर चलाता है, धर्मांतरण और लव जिहाद करता है और ‘शहादत’ के नाम पर आत्मघाती हमले करता है तब आरफा की आवाज कहीं गायब हो जाती है। उसे यह सवाल ‘मजाकिया’ लगने लगते हैं।
बरेली वाली घटना में भी आरफा को मुस्लिम नमाज पढ़ते दिखाई दे रहे हैं और पुलिस मानो विलन। जबकि इस फैक्ट को नजरअंदाज कर दिया गया कि पुलिस ने स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी की कार्रवाई सिर्फ घर में नमाज पढ़ने के कारण नहीं हुई, बल्कि एक खाली निजी घर के अंदर बिना प्रशासनिक अनुमति के सामूहिक रूप से ऐसा करने पर की गई।
यहाँ आरफा को नमाज से दिक्कत नहीं हुई, न ही उन्हें शांति से कोई लेना-देना है। आरफा को सिर्फ मौका चाहिए था- सरकार को घेरने का, प्रधानमंत्री पर तंज कसने का और अपने यूट्यूब चैनल की व्यूअरशिप बढ़ाने का। इसीलिए बरेली की घटना को उठाकर वह पूरे देश के मुस्लिमों को पीड़ित बताने निकल पड़ती हैं, लेकिन इंदौर, प्रयागराज, संभल और बरेली विवाद और हिंसा जैसे मामलों पर चुप रहती हैं या बात घुमा देती हैं। यही उनकी ‘पत्रकारिता’ है, जो सवाल पूछने की जगह ढाल बन जाती है।
और आखिर में, आरफा से एक सीधा सवाल- अगर नमाज इतनी ही ‘खामोश इबादत’ है, तो जुमे की नमाज के बाद हिंसा क्यों भड़कती हैं? क्या ये सब भी उसी ‘खामोश इबादत’ का हिस्सा है? साथ ही एक और हकीकत भी जान ही लो आरफा, आधा सच दिखाने से खुद को आवाज उठाने वाली ‘पत्रकार’ बताना बंद कर दो, क्योंकि तुम्हारे इस एजेंडो को देश पहचान चुका है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार (19 जनवरी 2026) को जब पालम एयरपोर्ट पर संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नहयान का स्वागत करने पहुँचे तो इसमें औपचारिकता से कहीं ज्यादा आत्मीयता दिख रही थी। भले ही UAE के राष्ट्रपति का यह दौरा 2 घंटे से भी कम का हो लेकिन इसका मायने कहीं ज्यादा बड़े हैं। प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति नहयान के स्वागत में जो पोस्ट लिखा उसमें उन्हें ‘भाई’ कहकर संबोधित किया गया था।
PM मोदी ने नहयान के समर्थन में अंग्रेजी के साथ-साथ अरबी में भी ‘X’ पर पोस्ट किया। PM मोदी ने लिखा, “मैं अपने भाई, संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नहयान का स्वागत करने एयरपोर्ट गया। उनका यह दौरा दिखताा है कि वह भारत-UAE की मजबूत दोस्ती को कितनी अहमियत देते हैं। हमारी बातचीत का मुझे बेसब्री से इंतजार है।”
Went to the airport to welcome my brother, His Highness Sheikh Mohamed bin Zayed Al Nahyan, President of the UAE. His visit illustrates the importance he attaches to a strong India-UAE friendship. Looking forward to our discussions.@MohamedBinZayedpic.twitter.com/Os3FRvVrBc
PM मोदी ने लोक कल्याण मार्ग स्थित अपने आवास पर UAE के अल नहयान और उनके परिवार का गर्मजोशी से स्वागत किया। उन्होंने UAE के राष्ट्रपति को गुजरात का पारंपरिक लकड़ी की नक्काशीदार झूला भेंट किया। यह झूला गुजरात के कई घरों का अहम हिस्सा होता है।
इसे सुंदर फूलों और पारंपरिक डिजाइनों से हाथ से तराशा गया है। गुजराती संस्कृति में झूला परिवार के साथ बैठकर बातचीत, अपनापन और पीढ़ियों के बीच जुड़ाव का प्रतीक माना जाता है। यह उपहार UAE द्वारा 2026 को ‘परिवार वर्ष’ घोषित किए जाने से भी गहराई से जुड़ता है।
इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी ने शेखा फातिमा बिंत मुबारक अल केतबी को चाँदी के डिब्बे में रखा हुआ पश्मीना शॉल भेंट किया है। यह पश्मीना शॉल बहुत ही बारीक ऊन से हाथ से बनाया जाता है, इसलिए यह हल्का, मुलायम और गर्म होता है। इसके साथ ही उन्हें कश्मीरी केसर भी दिया गया। कश्मीर घाटी में उगने वाला यह केसर अपने गहरे लाल रंग और खुशबू के लिए प्रसिद्ध है।
#WATCH | Delhi: Prime Minister Narendra Modi welcomed the President of the United Arab Emirates, Sheikh Mohamed bin Zayed Al Nahyan and his family at his residence at Lok Kalyan Marg.
PM Modi gifted the President of the UAE a Royal Carved Wooden Jhula (swing), a beautifully… pic.twitter.com/KGePrFmaMh
विदेश मंत्रालय ने अल नहयान के इस दौरे को लेकर बताया है कि UAE के राष्ट्रपति बनने के बाद यह उनकी भारत की तीसरी आधिकारिक यात्रा होगी जबकि पिछले दस वर्षों में यह उनका कुल पाँचवाँ भारत दौरा है। यह यात्रा हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच हुए संपर्कों से बने सकारात्मक माहौल को आगे बढ़ाएगी।
विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत और UAE के बीच रिश्ते बेहद सौहार्दपूर्ण, घनिष्ठ और बहुआयामी हैं। दोनों देशों के राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध काफी मजबूत हैं। भारत और UAE एक-दूसरे के प्रमुख व्यापार और निवेश साझेदारों में शामिल हैं।
इन संबंधों को व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA), स्थानीय मुद्रा में लेन-देन की व्यवस्था (LCS) और द्विपक्षीय निवेश संधि से और मजबूती मिली है। इसके अलावा, ऊर्जा के क्षेत्र में भी दोनों देशों के बीच मजबूत सहयोग है, जिसमें लंबे समय के ऊर्जा आपूर्ति समझौते शामिल हैं।
इस दौरे पर क्या हुई चर्चा?
विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने बताया कि व्यापार के मोर्चे पर, वर्ष 2022 में दोनों देशों के बीच समग्र आर्थिक साझेदारी समझौते (CEPA) पर हस्ताक्षर होने के बाद से द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर को पार कर चुका है। इसे देखते हुए दोनों नेताओं ने अपने लक्ष्य और बढ़ाने का फैसला किया है और अब वर्ष 2032 तक द्विपक्षीय व्यापार को 200 अरब डॉलर तक दोगुना करने का लक्ष्य रखा गया है।
विदेश सचिव ने कहा कि दोनों पक्षों ने उन्नत परमाणु तकनीकों में साझेदारी की संभावनाओं को तलाशने का निर्णय लिया है। इसमें बड़े परमाणु रिएक्टरों और स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMR) का विकास और तैनाती शामिल है। इसके अलावा उन्नत रिएक्टर प्रणालियों, परमाणु बिजली संयंत्रों के संचालन और रखरखाव तथा परमाणु सुरक्षा के क्षेत्र में भी सहयोग किया जाएगा।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को दोनों देशों के बीच सहयोग का एक प्रमुख क्षेत्र माना गया है। यह तय किया गया कि UAE की साझेदारी से भारत में एक सुपरकंप्यूटिंग क्लस्टर स्थापित किया जाएगा। साथ ही UAE भारत में डेटा सेंटर क्षमता बढ़ाने के लिए निवेश की संभावनाओं पर भी विचार करेगा।
यूएई फरवरी 2026 में भारत द्वारा आयोजित किए जाने वाले आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस समिट में उच्च स्तर पर भाग लेगा। दोनों देश डिजिटल या डेटा एम्बेसी (डिजिटल दूतावास) की स्थापना की संभावना पर भी विचार करेंगे। विदेश सचिव ने कहा कि इतनी कम अवधि की यात्रा के बावजूद यह एक बेहद शक्तिशाली और वरिष्ठ स्तर का प्रतिनिधिमंडल था।
इसके बाद दोनों नेता साथ-साथ प्रधानमंत्री आवास पहुँचे, जहाँ पहले सीमित और फिर विस्तृत स्तर पर बातचीत हुई। प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने भी आपस में चर्चा की। इस दौरान नेताओं की मौजूदगी में कई दस्तावेजों का आदान-प्रदान भी किया गया। इस यात्रा के महत्व को इस बात से समझा जा सकता है कि राष्ट्रपति के साथ जो प्रतिनिधिमंडल आया, उसमें अबू धाबी और दुबई दोनों शाही परिवारों के सदस्य और कई वरिष्ठ मंत्री व अधिकारी शामिल थे।
दौरे की टाइमिंग को लेकर चर्चा
इस दौरे को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा इसकी टाइमिंग की है। अल नहयान का यह दौरा भले ही कुछ घंटों का हो लेकिन इसकी अहमियत बहुत ज्यादा है। इसकी वजह यह है कि इस समय दुनिया की राजनीति काफी अस्थिर दौर से गुजर रही है। अमेरिका, चीन और रूस के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है जिससे अंतरराष्ट्रीय माहौल प्रभावित हो रहा है। वेनेजुएला और ग्रीनलैंड जैसे मुद्दों ने भी बड़ी ताकतों के बीच खींचतान को और तेज कर दिया है। वहीं, ईरान में हालात खराब हैं और इसका असर पूरे पश्चिम एशिया पर पड़ रहा है।
यूएई और सऊदी अरब के रिश्तों में तनाव की खबरें सामने आ रही हैं और इससे क्षेत्रीय संतुलन पर असर पड़ सकता है। ऐसे माहौल में शेख मोहम्मद बिन जायद का भारत आना एक अहम संदेश देता है। यह दिखाता है कि यूएई भारत को एक भरोसेमंद और स्थिर साझेदार मानता है और बदलते वैश्विक हालात के बीच भारत के साथ अपने रिश्तों को और मजबूत करना चाहता है।
भारत के लिए क्यों खास है UAE?
UAE आज भारत का सिर्फ एक मित्र देश नहीं बल्कि सबसे भरोसेमंद रणनीतिक साझेदारों में से एक है। खाड़ी क्षेत्र में भारत के हितों की रक्षा हो या वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की स्थिरता हर जगह UAE की भूमिका निर्णायक है। लाखों भारतीय प्रवासी UAE में काम करते हैं और वहाँ से आने वाला रेमिटेंस भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक मजबूत आधार है। ऐसे में दोनों देशों के बीच विश्वास का गहरा होना भारत की आर्थिक और सामाजिक स्थिरता से सीधे जुड़ा हुआ है।
गल्फ देशों में सबसे बड़ा व्यापार साझीदार
गल्फ देशों में भारत सबसे ज्यादा निर्यात UAE को करता है और यही वजह है कि UAE भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन चुका है। भारत और UAE के बीच सालाना कारोबार 6 लाख करोड़ रुपए से भी ज्यादा का है। वित्त वर्ष 2022–23 में भारत ने यूएई से करीब 4 लाख करोड़ रुपए का आयात किया था, जबकि यूएई ने भारत से लगभग 2 लाख करोड़ रुपए का सामान खरीदा।
दोनों देशों के बीच एक व्यापार समझौता भी हो चुका है। इसके तहत भारत यूएई को पेट्रोलियम उत्पाद, धातुएँ, कीमती पत्थर और आभूषण, खनिज, खाद्य पदार्थ जैसे अनाज, चीनी, फल-सब्जियां, चाय, मांस और सीफूड, साथ ही टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग मशीनरी और केमिकल्स का निर्यात करता है।
व्यापार और निवेश: रिश्तों की रीढ़
भारत और UAE के बीच व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) पहले ही दोनों देशों के व्यापार को नई रफ्तार दे चुका है। इस संक्षिप्त दौरे के दौरान होने वाली बातचीत का एक बड़ा फोकस निवेश बढ़ाने पर रहा है। भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल टेक्नोलॉजी, ग्रीन एनर्जी और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में UAE का निवेश भारत के विकास लक्ष्यों को गति दे सकता है। यह निवेश सिर्फ पैसे का लेन-देन नहीं बल्कि भरोसे का संकेत भी है।
ऊर्जा सुरक्षा और भविष्य की तैयारी
भारत जैसे देश के लिए ऊर्जा सुरक्षा सबसे बड़ा रणनीतिक मुद्दा है। तेल और गैस के पारंपरिक स्रोतों के साथ-साथ अब रिन्यूएबल एनर्जी और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाना भारत की प्राथमिकता है। UAE इस बदलाव में भारत का अहम भागीदार बन सकता है। शेख मोहम्मद का दौरा इसी दिशा में भविष्य की साझेदारी की नींव मजबूत करने वाला माना जा रहा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नोबेल शांति पुरस्कार पाने की हसरत कम नहीं हो रही। हालाँकि वेनेजुएला की विपक्षी नेता मचाडो ने अपना नोबेल पुरस्कार उन्हें ऑफर भी किया, लेकिन अंदर की ‘आह’ कम होने का नाम नहीं ले रही।
ट्रंप ने इसको लेकर नार्वे के प्रधानमंत्री को भी खत लिखा है और बताया है कि 8 युद्धों को रोकने के बावजूद आपने मुझे शांति पुरस्कार नहीं दिया। हालाँकि नॉर्वे के प्रधानमंत्री ने अपनी बात समझाते हुए ट्रंप से कहा था कि पुरस्कार नार्वे की सरकार नहीं बल्कि नोबेल कमेटी देती है, जो स्वतंत्र है।
पीबीएस की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोर को एक चिट्ठी लिखी है, जिसमें उन्होंने अपने नोबेल पुरस्कार नहीं मिलने का जिक्र किया है। उन्होंने कहा है कि अब उन्हें शांति के बारे में सोचने की कोई जरूरत महसूस नहीं है, क्योंकि उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिला।
NEW: @potus letter to @jonasgahrstore links @NobelPrize to Greenland, reiterates threats, and is forwarded by the NSC staff to multiple European ambassadors in Washington. I obtained the text from multiple officials:
इतना ही नहीं, उन्होंने नोबेल समिति को नॉर्वे सरकार से कनेक्ट करते हुए अपनी विदेश नीति को भी जोड़ा। उन्होंने लिखा कि 8 युद्धों को खत्म कराने के बावजूद आपने मुझे नोबेल पुरस्कार से नहीं नवाजा।
इस चिट्ठी को PBS न्यूज के पत्रकार निक शिफ्रिन ने एक्स पर शेयर किया है। इसमें उन्होंने दावा किया है कि ये खत उन्हें कई ऐसे अधिकारियों से मिली है, जो अपना नाम सार्वजनिक नहीं करना चाहते।
ट्रंप ने खत में ग्रीनलैंड और नोबेल नहीं मिलने को जोड़ा
राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने खत में लिखा, “प्रिय जोनास! यह देखते हुए कि आपके देश ने आठ युद्धों को रोकने के लिए मुझे नोबेल शांति पुरस्कार नहीं देने का फैसला किया है, इसलिए अब मुझे सिर्फ शांति के बारे में सोचने की कोई जरूरत महसूस नहीं होती। हालाँकि शांति हमेशा बनी रहेगी। अब मैं अमेरिका के लिए जो अच्छा और सही है, उसके बारे में सोच सकता हूँ।”
चिट्ठी में कहा गया है कि डेनमार्क कभी भी ग्रीनलैंड को रूस या चीन से नहीं बचा सकता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति आगे लिखते हैं, ” डेनमार्क के पास ‘मालिकाना हक’ नहीं है। कोई लिखित दस्तावेज नहीं हैं, बस इतना है कि सैकड़ों साल पहले वहाँ एक नाव उतरी थी, लेकिन हमारी नावें भी वहाँ उतरी थीं।”
उन्होंने कहा है कि अमेरिका ने NATO के बनने के बाद से संगठन के लिए किसी भी दूसरे देश की तुलना में अमेरिका ने ज्यादा काम किया है और अब NATO को यूनाइटेड स्टेट्स के लिए कुछ करना चाहिए। जब तक ग्रीनलैंड पर अमेरिका का पूरा कंट्रोल नहीं हो जाता, तब तक दुनिया सुरक्षित नहीं होगी।
नॉर्वे के पीएम ने ट्रंप को दिया जवाब
राष्ट्रपति ट्रंप के सवाल पर नॉर्वे के पीएम स्टोरे ने कहा कि नोबेल शांति पुरस्कार एक स्वतंत्र नोबेल कमेटी तय करती है। इससे नॉर्वेजियन सरकार का कोई लेना देना नहीं है। उन्होंने कहा कि आर्किटक क्षेत्र की सुरक्षा और स्थिरता को मजबूत करने के नाटो की जिम्मेदारी का वह समर्थन करते हैं, लेकिन ग्रीनलैंड को डेनमार्क का हिस्सा मानते हैं।
नॉर्वे के पीएम ने कहा कि उन्होंने राष्ट्रपति ट्रंप को बार-बार समझाया है कि नोबेल पुरस्कार देना सरकार के हाथ में नहीं है।
अमेरिका ने लगाया है 8 यूरोपीय देशों पर टैरिफ
अमेरिका 1 फरवरी से आयात किए जाने वाले सभी सामानों पर 10% टैरिफ लेगा, जो 1 जून से बढ़कर 25% हो जाएगा। ये टैरिफ तब तक लागू रहेगा जब तक अमेरिका और डेनमार्क में ग्रीनलैंड को लेकर कोई समझौता नहीं हो जाता।
ये टैरिफ ब्रिटेन, डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड और फिनलैंड पर लागू होगा। सोमवार 18 जनवरी 2026 को राष्ट्रपति ट्रंप ने एक बार फिर कहा कि डेनमार्क ने ग्रीनलैंड को रूस के खतरे से बचाने के लिए दिए गए चेतावनियों पर ध्यान नहीं दिया।
अमेरिका टैरिफ लगाए जाने पर नॉर्वे के पीएम ने कहा कि उन्होंने नॉर्वे, फिनलैंड समेत 8 देशों के खिलाफ अमेरिका द्वारा लगाए गए 10 फीसदी टैरिफ को लेकर विरोध दर्ज करा दिया है और समझाया कि ग्रीनलैंड पर नॉर्वे का रुख साफ है। ग्रीनलैंड डेनमार्क साम्राज्य का हिस्सा है और नॉर्वे इस मामले में डेनमार्क का पूरी तरह से समर्थन करता है।
ट्रम्प ने अपनी ट्रुथ सोशल मीडिया साइट पर लिखा: “NATO पिछले 20 सालों से डेनमार्क से कह रहा है कि ‘आपको ग्रीनलैंड को रूसी खतरे से बचाना’ होगा। लेकिन डेनमार्क इस पर कुछ नहीं कर पाया है। अब समय आ गया है, और यह किया जाएगा।”
डोनाल्ड ट्रम्प की टैरिफ की धमकियों का ब्रिटेन ने भी जवाब दिया है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री सर कीर स्टारमर ने 10 फीसदी टैरिफ लगाने को गलत करार दिया और कहा कि ग्रीनलैंड डेनमार्क का एक अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र है।
इस पर कब्जा करने की कोशिशों का ब्रिटेन हमेशा विरोध करेगा और इस मुद्दे पर नाटो के देशों पर टैरिफ लगाना बहुत ज्यादती है। ब्रिटेन अपने यूरोपीय मित्रों के साथ इस मुद्दे पर खड़ा रहेगा। सर कीर ने कहा कि कोई भी ‘हमारे मूल्यों को निर्देशित’ नहीं कर सकता।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रम्प लंबे समय से NATO को अनुचित मानते हैं। उनका मानना है कि अमेरिका इसमें सबसे ज्यादा पैसा और संसाधन खर्च करता है, जबकि यूरोपीय देश अपने जीडीपी का 2% रक्षा पर खर्च करने के लक्ष्य को पूरा नहीं करते।
पहले कार्यकाल में, उन्होंने NATO सहयोगियों से भुगतान बढ़ाने की मांग की और कहा कि अगर वे नहीं मानेंगे तो अमेरिका उनकी रक्षा नहीं करेगा। 2024 चुनाव अभियान में, ट्रम्प ने कहा कि वे रूस को उन NATO सदस्यों पर जो चाहे करने की अनुमति देंगे जो पर्याप्त खर्च नहीं करते।
ट्रम्प का मकसद ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति को बढ़ावा देना है। वे अमेरिकी करदाताओं के पैसे को विदेशी सुरक्षा पर कम खर्च करना चाहते हैं। साथ ही यूरोप को अपनी रक्षा खुद करने के लिए मजबूर करना चाहते हैं
अमेरिका राष्ट्रपति 10 महीनों में 8 युद्धों को खत्म करने की बात कही थी। यहाँ तक कि उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर को खत्म कराने का भी श्रेय लेने की कोशिश की। अब तक दर्जनों बार वह कह चुके हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच हुए जंग को उन्होंने रुकवाया था। हालाँकि भारत ये साफ कर चुका है कि पाकिस्तान के गिड़गिड़ाने पर भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को स्थगित किया। भारत ने साफ किया है कि किसी तीसरे देश का इसमें कोई योगदान नहीं है।
ऐसे ही 7 और युद्धों को खत्म कराने का दावा ट्रंप करते रहे हैं और इसके एवज में नोबेल शांति पुरस्कार चाहते रहे हैं। उनकी चाहत इस कदर है कि उन्होंने नॉर्वे के प्रधानमंत्री को खत भी लिख डाला और कह दिया कि अब शांति के लिए सोचने की जरूरत वे महसूस नहीं करते। ट्रंप की नजर में लगता है कि ‘दुनिया की शांति’ और ‘अमेरिकी नीति’ से बढ़कर नोबल पुरस्कार है, जिसके लिए उन्होंने हर हथकंडे अपनाए।
कर्नाटक के कॉन्ग्रेस विधायक प्रियांक खड़गे ने शनिवार (17 जनवरी 2026) को सोशल मीडिया पर वॉशिंगटन स्थित सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गेनाइज्ड हेट (CSOH) की एक रिपोर्ट को खूब शेयर किया। उन्होंने दावा किया कि 2025 में भारत में ज्यादातर तथाकथित हेट स्पीच की घटनाएँ भाजपा शासित राज्यों में हुईं और इनमें ज्यादातर निशाना अल्पसंख्यक समुदाय थे।
मल्लिकार्जुन खड़गे के बेटे ने सिर्फ रिपोर्ट शेयर नहीं की, बल्कि उसके नतीजों को पक्की सच्चाई की तरह पेश किया। रिपोर्ट के जरिए खड़गे ने भाजपा पर हमला बोला और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को भी निशाने पर लिया, कहा कि वे हेट स्पीच फैलाने वाले प्रमुख लोगों में से एक हैं।
A report by the Washington-based research group India Hate Lab found that 88% of documented anti-minority hate speech events in India in 2025 occurred in BJP-ruled states. Of the 1,318 hate speech events recorded, 98% targeted Muslims.
— Priyank Kharge / ಪ್ರಿಯಾಂಕ್ ಖರ್ಗೆ (@PriyankKharge) January 17, 2026
खड़गे के अलावा द क्विंट, ऑल्ट न्यूज और द वायर जैसे वामपंथी प्रोपेगेंडा वाले मीडिया संस्थान भी इस रिपोर्ट का फायदा उठाने में लग गए। द क्विंट ने CSOH की रिपोर्ट के आधार पर खबर छापी, जिसमें मुख्य रूप से ईसाई और मुस्लिम समुदाय के खिलाफ कथित हेट स्पीच की बात की गई। लेकिन रिपोर्ट में सिर्फ संख्या बताई गई, कोई उदाहरण नहीं दिया गया कि भारत हेट लैब ने किस बात को हेट स्पीच माना।
In 2025, on an average, four hate speech cases were reported every day. 2025 was a year which witnessed an increase in hate speech against Muslims and Christians, in newer forms, more intensity and magnitude. As per the new India Hate Lab report by @csohate showed how 1,164 hate… pic.twitter.com/RBfttbnpBd
रिपोर्ट का नाम था ‘हेट स्पीच इवेंट्स इन इंडिया’। इसमें दावा किया गया कि 2025 में पूरे देश में 1,318 मौके पर हेट स्पीच हुई। पिछले साल के मुकाबले इसमें तेज बढ़ोतरी बताई गई। रिपोर्ट में कहा गया कि हिंदू संगठनों, धार्मिक आयोजनों, राजनीतिक अभियानों और सामाजिक गतिविधियों से जुड़ी बातें नफरत के एक संगठित सिस्टम का हिस्सा हैं।
CSOH की ये बड़ी-बड़ी बातें विपक्षी पार्टियों और एक्टिविस्टों ने खूब दोहराईं। लेकिन इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया कि ये घटनाएँ कैसे चुनी गईं, कैसे परिभाषित की गईं या कैसे समझी गईं।
रिपोर्ट को ध्यान से पढ़ने पर इसकी विश्वसनीयता, मंशा और तरीके पर गंभीर सवाल उठते हैं। इसमें अच्छी तरह दर्ज अपराधों को ‘षड्यंत्र सिद्धांत’ कहा गया और धार्मिक आयोजन व ऐतिहासिक बातों को हेट स्पीच बता दिया गया। ये रिपोर्ट समाज की सच्चाई का निष्पक्ष अध्ययन कम और एक विचारधारा से प्रेरित अभ्यास ज्यादा लगती है, जिसका मकसद भारत के राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्श के एक पक्ष को अपराधी बनाना है।
इस तथाकथित हेट स्पीच रिसर्च में एक्टिविज्म को बताया गया नफरत फैलाने का तरीका
CSOH रिपोर्ट का आधार एक ऐसा तरीका है जो हेट स्पीच का विश्लेषण कम करता है और पहले से ही पक्षपाती नजरिए से उसे परिभाषित कर देता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हेट स्पीच की परिभाषा संयुक्त राष्ट्र की परिभाषा से ली गई है। इसमें किसी समूह के लिए अपमानजनक या भेदभावपूर्ण बात को हेट स्पीच माना गया है।
इस लंबी-चौड़ी परिभाषा से अपराध भड़काने, राजनीतिक बात, धार्मिक अभिव्यक्ति, ऐतिहासिक दावे और सामाजिक गतिविधि के बीच का फर्क मिट जाता है। इससे रिपोर्ट में बहुत सारी कानूनी और संवैधानिक रूप से सुरक्षित बातें भी शामिल हो गईं।
रिपोर्ट में ‘खतरनाक भाषण’ नाम से एक उपश्रेणी भी जोड़ी गई है। ये डेंजरस स्पीच प्रोजेक्ट से ली गई है, जिसमें कहा गया है कि कुछ बातें लोगों को हिंसा के लिए उकसा सकती हैं। लेकिन रिपोर्ट में ये नहीं दिखाया गया कि किसी खास भाषण से वाकई हिंसा हुई या होने वाली थी। सिर्फ बात को ही मंशा का सबूत मान लिया गया।
इस तरह का तरीका कानूनी मानकों को छोड़कर अनुमान पर चलता है। इसमें माना जाता है कि अगर कोई बात विचारधारा से प्रेरित लगती है तो वो खतरनाक है, भले ही हिंसा का कोई सबूत न हो।
रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंदू समुदाय का गुस्सा अपनी जगह से नहीं आता, बल्कि ‘नफरत बेचने वाले व्यापारियों’ की प्लानिंग से पैदा किया जाता है। इस तरह की बात से वैध शिकायतों, दर्ज अपराधों या जनसांख्यिकीय चिंताओं के लिए कोई जगह नहीं बचती। गुस्से को हमेशा बनावटी और पीड़ित होने की बात को हथियार बताया गया। और ये सिर्फ एक पक्ष के लिए किया गया।
पक्षपात और साफ दिखता है जब रिपोर्ट में हेट स्पीच के प्रकार गिनाए गए हैं- जैसे ‘जिहाद आधारित कॉन्सपिरेंसी थ्योरी’ फैलाना, आर्थिक-सामाजिक बहिष्कार की माँग, पूजा स्थलों से जुड़ी माँगें, बांग्लादेशी या रोहिंग्या घुसपैठ की बातें।
रिपोर्ट में ये नहीं देखा गया कि ये दावे दर्ज मामलों, कोर्ट केस, पुलिस रिकॉर्ड या सरकारी आँकड़ों पर आधारित हैं या नहीं। बल्कि शुरू में ही इन्हें षड्यंत्र और नफरत वाला बता दिया गया।
ये पहले से फैसला करना सबसे साफ ‘जिहाद’ वाली बातों में दिखता है। लव जिहाद, लैंड जिहाद, वोट जिहाद, पॉपुलेशन जिहाद, एजुकेशन जिहाद, इकोनॉमिक जिहाद, हलाल जिहाद जैसे शब्दों को पूरी तरह बेबुनियाद षड्यंत्र बताया गया। इसके लिए न तो पुलिस शिकायतें, FIR देखी गई और न ही पहले से चल रही जाँच या कोर्ट की टिप्पणियाँ देखी गईं।
रिपोर्ट में रबात प्लान ऑफ एक्शन का छह हिस्सों वाला टेस्ट इस्तेमाल करने का दावा है, जिसमें संदर्भ, वक्ता, मंशा, सामग्री, पहुँच और नुकसान की संभावना शामिल है। लेकिन ये पारदर्शी तरीके से लागू नहीं किया गया दिखता। मंशा कैसे तय की गई, हिंसा की संभावना कैसे जाँची गई, ये नहीं बताया गया। बल्कि मंशा और नुकसान वक्ता की पहचान और विषय से ही मान लिए गए।
आँकड़े जुटाने का तरीका भी एकदम सतही है। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि वो हिंदू दक्षिणपंथी समूहों और संबंधित राजनीतिक लोगों पर नजर रखते हैं। सोशल मीडिया स्क्रैपिंग, एक्टिविस्ट नेटवर्क और चुनी हुई मीडिया रिपोर्टों पर निर्भर हैं। इस्लामिस्ट समूहों, कट्टर मौलवियों या हिंदुओं के खिलाफ हिंसा करने वाले संगठनों पर वैसी नजर नहीं रखी गई। इस असमानता से एक पक्ष हमेशा निगरानी में रहता है, दूसरा बाहर।
रिपोर्ट एक्टिविस्ट और पत्रकारों के नेटवर्क से घटनाएँ जुटाती है और इसे व्यापक और सत्यापित बताती है। लेकिन इन नेटवर्क में विचारधारा का प्रभाव, पक्षपात या चुनिंदा रिपोर्टिंग कैसे रोकी गई, ये नहीं बताया। ये भी माना गया है कि डेटा पूरा नहीं है और कई घटनाओं का सत्यापित सबूत नहीं है। इससे तरीके की सख्ती पर सवाल उठते हैं।
रिपोर्ट हिंदुओं के खिलाफ अपराधों की मात्रा और प्रकृति को पूरी तरह नजरअंदाज करती है। हिंदूफोबिया ट्रैकर के आँकड़ों में 4,619 हिंदू-विरोधी अपराध दर्ज हैं, जिनमें 261 मौतें शामिल हैं। सिर्फ 2025 में 2,486 मामले दर्ज हुए, जिसमें 300 से ज्यादा लव जिहाद, 600 से ज्यादा हिंदुओं के खिलाफ हेट स्पीच, 750 से ज्यादा शिकारी धर्मांतरण या जबरन धर्म बदलवाने के मामले शामिल हैं। ये आँकड़े दिखाते हैं कि CSOH कुछ अपराधों को षड्यंत्र बता रही है और उनके खिलाफ प्रतिक्रिया को हेट स्पीच बना रही है।
CSOH ने कुछ अपराधों को झूठा बता दिया और उनके खिलाफ प्रतिरोध को अपने आप नफरत वाला मान लिया। इसका नतीजा ये हुआ कि एक्टिविज्म को तरीका बना दिया गया और रिपोर्ट निष्पक्ष अध्ययन नहीं, बल्कि एक चुनी हुई कहानी बन गई।
‘लव जिहाद’ को साजिश बताया, जबकि हकीकत में कई मामले दर्ज हैं
CSOH रिपोर्ट की सबसे बड़ी कमी है लव जिहाद को पूरी तरह खारिज करना। इसे ‘बेबुनियाद षड्यंत्र सिद्धांत’ कहा गया। रिपोर्ट ने न सिर्फ शब्द पर सवाल उठाया, बल्कि पूरी घटना को झूठा बता दिया। इसके लिए पुलिस शिकायतें, FIR, कोर्ट केस या मीडिया में आए मामलों को नहीं देखा गया।
सच्चाई समझने के लिए हिंदूफोबिया ट्रैकर के आँकड़े देखें तो साल 2025 में ही 300 से ज्यादा ‘रिलेशनशिप और यौन अपराधों’ के मामले दर्ज हुए, जिनमें ज्यादातर लव जिहाद के हैं। कुल 900 से ज्यादा मामले हो चुके हैं। इनमें पीड़ितों की गवाही, पुलिस कार्रवाई और चल रही जाँचें हैं, जिनका CSOH रिपोर्ट में कोई जिक्र नहीं।
लव जिहाद से मतलब उन मामलों से है जहाँ मुस्लिम पुरुष हिंदू लड़कियों को झूठा नाम बताकर या अपनी असली पहचान छिपाकर रिलेशनशिप या शादी में फंसाते हैं। फिर इस्लाम कबूल करने का दबाव डालते हैं। इसके लिए वो भावनात्मक शोषण, धमकी, परिवार से अलग करना या शादी का लालच देते हैं। जब धोखा, जबरदस्ती या धर्म बदलवाने का सबूत मिलता है तो ये अपराध बन जाता है और हर मामले को अलग-अलग तथ्यों, पीड़ित की गवाही, पुलिस जाँच और कोर्ट से देखा जाता है।
सभी हिंदू-मुस्लिम रिलेशनशिप को लव जिहाद नहीं कहा जाता। सिर्फ तब कहा जाता है जब मुस्लिम पुरुष अपनी पहचान छिपाकर हिंदू बनकर लड़की को फँसाता है। ऐसे मामले कई राज्यों में बढ़े हैं, जिससे विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे संगठन इसका विरोध कर रहे हैं।
CSOH ने तरीके के स्तर पर ही लव जिहाद को षड्यंत्र बता दिया। इससे इन मामलों की जाँच ही नहीं हुई। नतीजा ये कि दर्ज अपराधों के खिलाफ प्रतिक्रिया को हेट स्पीच बना दिया गया और अपराध खुद गायब कर दिए गए।
ये चुनिंदा अंधापन दिखाता है कि रिपोर्ट ने जमीन की सच्चाई की जगह विचारधारा को रखा और जटिल अपराधों को बस नाम देकर खारिज कर दिया।
उदाहरण के लिए दिसंबर 2025 में ही हिंदूफोबिया ट्रैकर ने 14 ऐसे मामले दर्ज किए। हर मामले में पहचान छिपाना, यौन शोषण और धर्म बदलवाने का दबाव था। ये पुलिस शिकायतों और जाँच से दर्ज हैं। दिसंबर के 14 में से 10 मामलों का संक्षिप्त विवरण ये है।
भोपाल, मध्य प्रदेश में एक हिंदू लड़की को जुहुर नाम के मुस्लिम व्यक्ति ने हिंदू बनकर धोखा दिया। 31 दिसंबर 2025 को न्यू ईयर मिलने के बहाने जंगल में ले जाकर बलात्कार किया। लड़की ने उसी रात पुलिस में शिकायत की, केस दर्ज हुआ और आरोपित गिरफ्तार हुआ।
बिजनौर, उत्तर प्रदेश में एक नाबालिग हिंदू लड़की को समीर उर्फ वसीम ने फेक प्रोफाइल से अमन बनकर सोशल मीडिया पर फंसाया। प्राइवेट चैट और फोटो से ब्लैकमेल कर यौन संबंध बनाने का दबाव डाला। आरोपित पकड़ा गया और पुलिस को सौंपा गया।
फतेहपुर, उत्तर प्रदेश में एक दलित हिंदू महिला का विशाल बनकर अदनान नाम के रेलवे कर्मचारी ने लंबे समय तक यौन शोषण और ब्लैकमेल किया। नशीला पदार्थ देकर बलात्कार किया, अश्लील वीडियो बनाए और धर्म बदलने व शादी का दबाव डाला। पुलिस ने FIR दर्ज की और आरोपित को गिरफ्तार किया।
पटना, बिहार में मोहम्मद रुस्तम ने सोनू बनकर गलत नंबर से संपर्क कर हिंदू लड़की को धोखा दिया। शादी का झांसा देकर यौन शोषण किया और अश्लील वीडियो बनाया। असली पहचान पता चलने पर वीडियो ऑनलाइन डाल दिया। पुलिस ने शिकायत पर आरोपित को गिरफ्तार किया।
उधम सिंह नगर, उत्तराखंड में दो मुस्लिम युवकों ने फेक पहचान से हिंदू लड़कियों को सोशल मीडिया पर फंसाया। सैलून चलाने वाले इन लोगों को 17 दिसंबर 2025 को विश्व हिंदू परिषद और बजरंग सेना ने पकड़कर पुलिस को सौंपा। जाँच चल रही है।
रतलाम, मध्य प्रदेश में कामरान खान ने कई फेक इंस्टाग्राम प्रोफाइल और कलावा पहनकर हिंदू बनकर कॉलेज की हिंदू लड़कियों को फंसाया। 15 दिसंबर 2025 को बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद की शिकायत पर पुलिस ने फोन जब्त किया और आरोपित को जेल भेजा।
खंडवा, मध्य प्रदेश में सलमान ने संजय बनकर दलित हिंदू महिला का बलात्कार किया, ब्लैकमेल किया और उसकी नाबालिग बेटी पर भी हमला किया। पुलिस ने बलात्कार, ब्लैकमेल, धर्मांतरण और SC-ST एक्ट के तहत केस दर्ज कर आरोपित को पकड़ा।
मंडावर, बिजनौर, उत्तर प्रदेश में फैजान मलिक ने सौरभ पाल बनकर हिंदू लड़की को फंसाया। असली पहचान पता चलने पर फोटो से ब्लैकमेल कर धर्म बदलने और शादी का दबाव डाला। पुलिस ने धोखाधड़ी, यौन शोषण और धमकी का केस दर्ज कर आरोपित को जेल भेजा।
नोएडा, उत्तर प्रदेश में हारून खान ने हिंदू बनकर कई हिंदू महिलाओं को फंसाया, अश्लील वीडियो से ब्लैकमेल किया और इस्लाम कबूल करने का दबाव डाला। पुलिस ने बिसरख थाने में केस दर्ज किया, आरोपित के खिलाफ पहले भी ऐसे मामले हैं।
खंडवा जिला, मध्य प्रदेश में शादीशुदा मेहरबान मुनीर ने पहचान छिपाकर हिंदू महिला को फंसाया, आपत्तिजनक वीडियो बनाए, मारपीट की और पत्नी के साथ वीडियो फैलाए जब उसने धर्म बदलने से इनकार किया। पुलिस ने बलात्कार, मारपीट, ब्लैकमेल, धर्मांतरण और IT एक्ट के तहत केस दर्ज कर आरोपित को हिरासत में लिया।
शौर्य दिवस, बाबरी विध्वंस की याद और ऐतिहासिक विवाद को तोड़-मरोड़ना
CSOH रिपोर्ट में बार-बार शौर्य दिवस यानी 6 दिसंबर 1992 को बाबरी ढाँचे के विध्वंस की याद को हेट स्पीच बताया गया। इस घटना पर गर्व या सार्वजनिक याद को हिंसा की माँग के साथ जोड़ दिया गया, जैसे ये संगठित नफरत हो।
इससे एक लंबे ऐतिहासिक और कानूनी विवाद को सिर्फ नैतिक आरोप बना दिया गया। रिपोर्ट में ये नजरअंदाज किया गया कि बाबरी ढाँचा दशकों से विवादित था और कोर्ट ने अंत में जगह हिंदुओं को दे दी। 500 साल की लड़ाई के बाद कानूनी तरीके से जगह वापस मिली और वहाँ भव्य राम मंदिर बना।
हिंदुओं के लिए शौर्य दिवस किसी समुदाय के खिलाफ हिंसा का जश्न नहीं है। ये सांस्कृतिक आत्मसम्मान का प्रतीक है। विध्वंस पर गर्व उस घटना की उनकी समझ से आता है, न कि आलोचकों की व्याख्या से।
ऐतिहासिक प्रतीक अलग-अलग लोगों के लिए अलग मतलब रखते हैं। जैसे ताजमहल को कुछ लोग प्यार का प्रतीक मानते हैं भले उसका इतिहास विवादित हो, वैसे ही हिंदू बाबरी विध्वंस को ऐतिहासिक दासता के प्रतीक को हटाने के रूप में देखते हैं।
शौर्य दिवस की याद को हेट स्पीच बताकर रिपोर्ट ने ऐतिहासिक व्याख्या को अपराध बना दिया। हिंदुओं को वही जगह नहीं दी जो दूसरों को अपने इतिहास की समझ बताने के लिए मिलती है। इससे साफ हुआ कि रिपोर्ट कानूनी या विद्वता के मानक से नहीं, बल्कि हिंदू दावे से असहज विचारधारा से चल रही है।
ईसाई मिशनरी धर्मांतरण का विरोध करने वाले हिंदुओं को निशाना बनाती है CSOH रिपोर्ट
CSOH रिपोर्ट में ईसाई मिशनरी गतिविधियों के विरोध को बार-बार हेट स्पीच बताया गया। इसमें कानूनी विरोध, दर्ज शिकायतों और अपराध भड़काने के बीच फर्क नहीं किया गया। जबरन या लालच से धर्मांतरण का विरोध करने वाले हिंदू समूहों को ईसाई-विरोधी नफरत फैलाने वाला दिखाया गया।
कई मामलों में जागरूकता अभियान, शांतिपूर्ण विरोध और शिकारी धर्मांतरण के खिलाफ चेतावनी को हेट स्पीच कहा गया, जबकि इनकी वजह को नजरअंदाज किया गया। रिपोर्ट में ये नहीं देखा गया कि धर्मांतरण स्वैच्छिक थे या कानूनी जाँच के दायरे में। बस विरोध को ही ईसाइयों के खिलाफ दुश्मनी मान लिया गया।
तरीके में ‘धर्मांतरण माफिया’ जैसे शब्द या जनसांख्यिकीय हेरफेर की चिंता को षड्यंत्र बताया गया। इससे मिशनरियों को पीड़ित और हिंदू समुदाय को हमलावर दिखाया गया, भले तथ्य कुछ और कहते हों।
रिपोर्ट में मिशनरी गतिविधियों पर वैसी जाँच नहीं की गई, जैसे विदेशी फंडिंग, लालच या राज्य के धर्मांतरण-विरोधी कानूनों का पालन को लेकर होना चाहिए था। इससे जटिल स्थानीय विवादों को एकतरफा कहानी बना दिया गया, जिसमें धर्मांतरण का विरोध करने वाले हिंदू हेट स्पीच के जरिए अपराधी बन गए और मूल शिकायतें गायब हो गईं।
दिसंबर में ही ऑपइंडिया ने कम से कम पाँच ऐसे मामले रिपोर्ट किए जहाँ जबरन या लालच से ईसाई धर्मांतरण के आरोप थे। इनमें पुलिस शिकायतें, स्थानीय विरोध और चल रही जांचें थीं। इससे साफ है कि मिशनरी गतिविधियों का विरोध हेट स्पीच नहीं कहा जा सकता बिना जमीनी तथ्यों को देखे।
फतेहपुर में पुलिस ने 28 दिसंबर को पास्टर डेविड ग्लैडविन और उसके बेटे को गिरफ्तार किया। आरोप था कि गरीब हिंदुओं को लालच और धमकी देकर धर्म बदलवाया। स्थानीय व्यक्ति की शिकायत पर उत्तर प्रदेश धर्मांतरण-विरोधी कानून और BNS के तहत FIR दर्ज हुई। शिकायत में हिंदू देवताओं के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियाँ, पैसे-नौकरी-शिक्षा का लालच और चुप रहने के लिए पैसे देने की बात थी।
नडियाद सेशन कोर्ट ने 20 दिसंबर को स्टीवन भानुभाई मेकवान और स्मितुल फिलिपभाई महिदा की जमानत खारिज की। गुजरात धर्म स्वतंत्रता कानून और भारतीय न्याय संहिता के तहत प्रथम दृष्टया केस बना। पुलिस ने आदिवासी और नाबालिगों को लालच देकर धर्म बदलवाने का आरोप लगाया। विदेशी फंडिंग, बार-बार कार्यक्रमों के डिजिटल सबूत और विदेशी संपर्क वाले भागे हुए आरोपित मिले।
श्री गंगानगर, राजस्थान में 18 दिसंबर को पुलिस ने छह लोगों को पकड़ा, जिनमें एक जर्मन जोड़ा था। किराए के मकान में अवैध चर्च चल रहा था, जहां पैसे, चमत्कारी इलाज का लालच और हिंदू देवताओं के खिलाफ गालियाँ देकर लोग जुटाए जा रहे थे। सीमा क्षेत्र में बिना अनुमति विदेशी मौजूद थे।
छत्तीसगढ़ के कोरबा में पास्टर बजरंग जायसवाल पर प्रार्थना सभा में धर्मांतरण का आरोप लगा। गरीब, बीमार लोगों को चमत्कार का लालच दिया गया। सरपंच ने शिकायत की, पुलिस ने केस दर्ज किया।
सोनभद्र, उत्तर प्रदेश में पास्टर रामू प्रजापति को पैसे देकर धर्म बदलवाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। भाजपा युवा मोर्चा और बजरंग दल ने विरोध किया। पुलिस ने धार्मिक सामग्री और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस जब्त किए।
रिपोर्ट के पीछे रकीब हमीद नाइक और हिंदुत्व वॉच का नेटवर्क
CSOH की स्थापना और संचालन रकीब हमीद नाइक करते हैं, जो इसके कार्यकारी निदेशक हैं। वो हिंदुत्व वॉच के भी संस्थापक हैं, जो भारत में मानवाधिकार उल्लंघन ट्रैक करने का दावा करता है, और इंडिया हेट लैब के भी जो अल्पसंख्यकों के खिलाफ ऑनलाइन-ऑफलाइन हेट स्पीच दर्ज करता है। CSOH की रिपोर्ट इंडिया हेट लैब के नतीजों पर आधारित है। जब विवेक अग्निहोत्री की फिल्म द कश्मीर फाइल्स आई थी, तब नाइक ने विक्टिम कार्ड खेला और कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार और पलायन को नकारा था।
नाइक बार्ड कॉलेज और कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, बर्कले से जुड़े बताए जाते हैं। न्यू यॉर्क टाइम्स, अल जजीरा, CNN, BBC, वॉशिंगटन पोस्ट जैसे मीडिया में उद्धृत होते हैं। इससे उनके दावे और आँकड़े वैश्विक विमर्श में फैलते हैं, बिना गहराई से जाँच के।
अमेरिका से चलने वाली हिंदुत्व वॉच पर एकतरफा और चुनिंदा चित्रण के लिए लगातार आलोचना होती है। ये हिंदू नेताओं को निशाना बनाती है, क्लिप वीडियो, बिना संदर्भ के बयान और भारी शब्दों से। टी राजा सिंह, काजल हिंदुस्तानी जैसे लोगों को बार-बार टारगेट किया गया।
जनवरी 2024 में हिंदुत्व वॉच का X अकाउंट भारत में रोका गया। डिसइन्फो लैब की रिपोर्ट के बाद ये कार्रवाई हुई, जिसमें पाकिस्तानी प्रोपेगैंडा नेटवर्क से लिंक मिले।
अकाउंट ‘अत्यधिक नफरत जैसे अस्पष्ट शब्द इस्तेमाल करता था और तथ्य, धार्मिक अभिव्यक्ति या राजनीतिक बात को भड़काऊ बता देता था। फिर भी इसे वामपंथी एक्टिविस्ट और फैक्ट चेकर खूब बढ़ावा देते थे, जो 2014 से मोदी सरकार के समय से भारत को नकारात्मक दिखाते आए हैं।
पूरी रिपोर्ट सिर्फ प्रोपेगेंडा
CSOH रिपोर्ट को प्रियांक खड़गे जैसे राजनीतिक लोग और द क्विंट, ऑल्ट न्यूज, द वायर जैसे मीडिया ने खूब उछाला। इसमें एक्टिविज्म को विश्लेषण और विचारधारा को सबूत बनाया गया। हेट स्पीच की चुनिंदा परिभाषा से दर्ज अपराध नजरअंदाज हुए और हिंदुओं की वैध प्रतिक्रिया को अपराध बता दिया गया। कानूनी बातें, ऐतिहासिक याद और जबरदस्ती के खिलाफ प्रतिरोध को नफरत बना दिया गया। असली पीड़ितों को गायब कर दिया गया। ये निष्पक्ष शोध नहीं, बल्कि पहले नतीजा तय करके आँकड़े जोड़ने वाली कहानी है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। अंग्रेजी रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
उत्तर प्रदेश के बरेली जिले से एक विवादित मामला सामने आया है, जहाँ पुलिस ने रविवार (18 जनवरी 2026) को एक निजी खाली घर में सामूहिक रूप से जुम्मे की नमाज अदा करने के आरोप में 12 मुस्लिम पुरुषों को हिरासत में लिया। यह घटना 16 जनवरी 2026 को बिशारतगंज थाना क्षेत्र के मोहम्मदगंज गाँव में हुई थी। मामले का खुलासा तब हुआ जब घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और पुलिस ने स्थानीय स्तर पर मिली सूचना के आधार पर कार्रवाई शुरू की।
इस कार्रवाई के बाद इंटरनेट पर बहस छिड़ गई है। एक तरफ जहाँ पुलिस इसे नियमों के उल्लंघन के तौर पर देख रही है, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स इसे आस्था पर प्रहार बता रहे हैं। उनका दावा है कि भाजपा शासित राज्य में बरेली पुलिस ने इन लोगों को केवल अपने मजहब का पालन करने के लिए ‘गिरफ्तार’ किया है। फिलहाल पुलिस मामले की जाँच कर रही है कि क्या नमाज के लिए पूर्व अनुमति ली गई थी या नहीं।
इस मामले पर कॉन्ग्रेस प्रवक्ता शमा मोहम्मद ने सवाल उठाते हुए दावा किया कि बरेली पुलिस ने 12 मुस्लिम पुरुषों को उनके ‘अपने’ घर में नमाज पढ़ने के लिए गिरफ्तार किया है। 18 जनवरी 2026 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर उन्होंने पुलिस से पूछा कि यह गिरफ्तारी किस आधार पर हुई और किस कानून का उल्लंघन हुआ? उन्होंने आगे तंज कसते हुए कहा कि क्या राज्य में अपराधी खत्म हो गए हैं जो पुलिस अब घरों के अंदर इबादत करने वाले नागरिकों को परेशान कर रही है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर एक यूजर ने इस दावे को और बढ़ाते हुए लिखा कि शिकायत मिलने पर 12 मुस्लिमों को एक निजी घर के अंदर नमाज पढ़ने के लिए जेल भेज दिया गया। यूजर ने विरोध जताते हुए लिखा कि इसमें न कोई हिंसा हुई और न ही कोई अपराध, यह सिर्फ उनकी आस्था का मामला था। उन्होंने आगे लिखा कि अगर अपने घर के अंदर इबादत करने पर भी आपको जेल जाना पड़ता है, तो यह सुशासन नहीं बल्कि उत्पीड़न है।
एक अन्य कट्टरपंथी और मुखर हिंदू-विरोधी यूजर करिश्मा अजीज ने इस मामले पर लिखा कि बरेली में 12 लोग एक खाली घर में नमाज पढ़ रहे थे, उनके पास न कोई हथियार था, न उन्होंने कोई नारेबाजी की और न ही कोई हिंसा हुई, फिर भी उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। करिश्मा अजीज ने आरोप लगाया कि हमारा मजहब अब घरों के अंदर भी अपराध माना जा रहा है, जबकि सड़कों पर तलवारें लहराना ‘संस्कृति’ कहलाता है। करिश्मा ने आगे दावा किया कि यहाँ अपराध कृत्य से नहीं बल्कि पहचान से तय होता है और FIR सबूतों के बजाय वायरल वीडियो के आधार पर होती है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि आज नमाज पर गिरफ्तारी हुई है, कल खामोश रहने पर भी FIR होगी और आप बस तमाशा देखते रहेंगे।
क्या बरेली पुलिस ने वाकई मुस्लिमों को गिरफ्तार किया?
सोशल मीडिया पर कट्टरपंथियों और वामपंथियों के ऐसे पोस्ट की बाढ़ आ गई है, जिनमें यह दावा किया जा रहा है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासन वाले उत्तर प्रदेश में मुस्लिमों को उनके मजहब का पालन करने के कारण निशाना बनाया जा रहा है और उनका उत्पीड़न हो रहा है। हालाँकि, यह दावा मुस्लिम ‘विक्टिमहुड’ (खुद को पीड़ित दिखाने) की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत अपनी मजहबी प्रभुता जमाने वाली कट्टरपंथी गतिविधियों को ‘पीड़ित होने’ के नैरेटिव के पीछे छिपा लिया जाता है।
बरेली पुलिस का पोस्ट
सोशल मीडिया पर किए जा रहे दावों के विपरीत, बरेली पुलिस ने 12 मुस्लिमों को गिरफ्तार नहीं किया है बल्कि उन्हें केवल हिरासत में लिया है। पुलिस ने स्पष्ट किया कि यह कार्रवाई सिर्फ घर में नमाज पढ़ने के कारण नहीं हुई, बल्कि एक खाली निजी घर के अंदर बिना प्रशासनिक अनुमति के सामूहिक रूप से ऐसा करने पर की गई। पुलिस के अनुसार, कुल 12 लोगों को हिरासत में लिया गया है, जबकि 3 अन्य मौके से फरार हो गए। पुलिस ने आगे बताया कि फरार लोगों की तलाश के लिए प्रयास जारी हैं और जल्द ही उन्हें भी ढूँढ लिया जाएगा।
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा वीडियो, जिसमें मुस्लिम पुरुषों को एक खाली घर के अंदर नमाज पढ़ते देखा जा सकता है, कथित तौर पर स्थानीय हिंदुओं द्वारा बनाया गया था, जिन्होंने ही पुलिस को वहाँ चल रही इस अवैध गतिविधि की सूचना दी थी।
इस मामले पर एसपी अंशिका वर्मा ने बताया कि आरोपित मुस्लिम पुरुषों को हिरासत में लेना एक एहतियाती कार्रवाई थी। यह कदम तब उठाया गया जब पुलिस को मोहम्मदगंज गाँव के स्थानीय लोगों से सूचना मिली कि पिछले कई हफ्तों से एक खाली घर का इस्तेमाल मदरसे के रूप में किया जा रहा था। स्थानीय ग्रामीणों ने शिकायत दर्ज कराई थी कि प्रशासन से बिना किसी अनुमति के उस घर में नियमित रूप से सामूहिक नमाज आयोजित की जा रही थी।
अधिकारी ने स्पष्ट किया कि बिना अनुमति के कोई भी नई धार्मिक गतिविधि या सभा आयोजित करना कानून का उल्लंघन है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस तरह की गतिविधियों को दोबारा दोहराया गया, तो सख्त कार्रवाई की जाएगी। टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) से बात करते हुए एसपी वर्मा ने कहा, “हमें सूचना मिली थी कि एक घर को अस्थायी मस्जिद और मदरसे में बदल दिया गया है, जो कि पूरी तरह अवैध था। इस मामले में शामिल लोगों को हिदायत दी गई है कि वे उचित सरकारी अनुमति के बिना भविष्य में ऐसी किसी भी गतिविधि को न दोहराएँ।”
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, यह घर हनीफ नामक व्यक्ति का है और इसका उपयोग अस्थायी रूप से जुम्मे की नमाज के लिए किया जा रहा था। वहीं, अन्य खबरों के मुताबिक यह घर रेशम खान का है, जिनके मियाँ हसीन खान की कुछ साल पहले मृत्यु हो चुकी है और रेशम अपने दो बच्चों के साथ दूसरे राज्य में काम करती हैं।
इस बीच, सोशल मीडिया पर कट्टरपंथियों और उनके समर्थकों ने यह नैरेटिव फैलाना शुरू कर दिया कि इन लोगों को सिर्फ नमाज पढ़ने के लिए ‘गिरफ्तार’ किया गया है, जबकि पुलिस ने स्पष्ट किया कि उन्हें बिना अनुमति के निजी घर में सामूहिक गतिविधि करने पर केवल हिरासत में लेकर पूछताछ की गई थी।
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी बताया गया है कि आरोपितों के खिलाफ शांति भंग करने से संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था। उन्हें 18 जनवरी 2026 को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जहाँ से उन्हें जमानत मिल गई है।
बरेली के पुलिस अधीक्षक (SP) अनुराग आर्य ने स्पष्ट किया कि 12 मुस्लिम पुरुषों को हिरासत में लेकर पूछताछ की गई, लेकिन उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया था। उन्होंने आगे बताया कि पुलिस ने इन सभी व्यक्तियों को भविष्य के लिए सख्त चेतावनी देकर छोड़ दिया है।
एक अन्य पुलिस अधिकारी ने बताया कि मामले की संवेदनशीलता और इलाके में तनाव की आशंका को देखते हुए पुलिस टीम तुरंत मौके पर पहुँची थी। वहाँ पहुँचकर पुलिस ने लोगों से बात की और स्थिति का जायजा लिया। भविष्य में किसी भी तरह की अशांति या कानून-व्यवस्था की समस्या को रोकने के लिए, सभी संबंधित व्यक्तियों को कड़े निर्देश दिए गए हैं कि वे आने वाले समय में उस निजी स्थान पर इस तरह की गतिविधियों को दोबारा न दोहराएँ।
कुल मिलाकर मामला यह है कि मुस्लिम पुरुष एक खाली घर के अंदर नमाज पढ़ रहे थे और कथित तौर पर प्रशासन की अनुमति के बिना उसे मस्जिद और मदरसे के रूप में इस्तेमाल कर रहे थे। ऐसे में सोशल मीडिया पर किया जा रहा यह दावा पूरी तरह गलत है कि उन्हें उनके ‘अपने घरों’ में नमाज पढ़ने के लिए गिरफ्तार किया गया है।
सच तो यह है कि न तो वे अपने घर में नमाज पढ़ रहे थे और न ही उन्हें गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने उन्हें केवल हिरासत में लिया और पूछताछ की। बाद में हिरासत में लिए गए सभी व्यक्तियों को भविष्य में ऐसी गतिविधियों को न दोहराने की सख्त चेतावनी देकर रिहा कर दिया गया।
(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में श्रद्धा पांडेय ने लिखी है। अंग्रेजी का आर्टिक्ल पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप ग्रीनलैंड इन दिनों अंतरराष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बना हुआ है। वजह है अमेरिका की द्वीप को खरीदने में दिलचस्पी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की इस बर्फीली जमीन पर नजर बार-बार खुलकर सामने आ रही है। ट्रंप ने ग्रीनलैंड को खरीदने के पीछे का सबसे अहम कारण अमेरिका के ‘गोल्डन डोम एयर डिफेंस सिस्टम’ को बताया है।
ग्रीनलैंड को लेकर उठे इस विवाद ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर गोल्डन डोम एयर डिफेंस सिस्टम क्या है, जिसे ट्रंप अमेरिका की सुरक्षा की रीढ़ बता रहे हैं? आखिर इस सिस्टम के लिए ग्रीनलैंड को ही क्यों चुना गया है, और क्या इसके बिना अमेरिका अपने हवाई क्षेत्र को पूरी तरह सुरक्षित नहीं कर सकता? इसके अलावा रूस और चीन की भूमिका? इन सभी सवालों के जवाब तलाशने के लिए जरूरी है कि गोल्डन डोम सिस्टम के बारे में विस्तार से समझते हुए ग्रीनलैंड की अहमियत के बारे में बात की जाए।
कब-कब डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड खरीदने को गोल्डन डिफेंस सिस्टम बताई वजह?
तो नए साल पर वेनेजुएला पर कब्जा करने के बाद जनवरी 2026 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपना अगला निशाना ग्रीनलैंड को बताया और खुली धमकियाँ देनी शुरू कर दीं। इन धमकियों में ट्रंप ने ग्रीनलैंड को बार-बार गोल्डन डोम एयर डिफेंस सिस्टम से जोड़ा और उसे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अनिवार्य बताया।
14 जनवरी 2026 सोशल मीडिया ‘ट्रुथ सोशल’ पर डोनाल्ड ट्रंप ने साफ शब्दों में लिखा, “अमेरिका को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड की जरूरत है। जो गोल्डन डोम एयर डिफेंस सिस्टम हम बना रहे हैं, उसके लिए ग्रीनलैंड ‘बेहद जरूरी’ है।” अपनी दिलचस्पी को NATO के लिए जरूरी बताते हुए ट्रंप ने कहा, “इस काम में NATO को अमेरिका का साथ देना चाहिए। अगर हमने ग्रीनलैंड नहीं लिया, तो रूस या चीन वहाँ पहुँच जाएँगे और ऐसा होने नहीं दिया जाएगा।”
डोनाल्ड ट्रंप के ट्वीट का स्क्रीनशॉट (फोटो साभार: X-Truth Social)
ग्रीनलैंड की खरीद पर NATO पर दबाव डालते हुए ट्रंप यह भी कह चुके हैं कि अमेरिका के बिना NATO कुछ नहीं है। ट्रंप ने कहा, “सैन्य तौर पर देखें तो अमेरिका की ताकत के बिना NATO कोई मजबूत या असरदार ताकत नहीं बन सकता। अपने पहले कार्यकाल में मैंने अमेरिकी सेना को मजबूत किया था और अब उसे और ऊँचे स्तर पर ले जा रहा हूँ। अमेरिका के बिना NATO न तो प्रभावी रह पाएगा और न ही किसी खतरे को रोक पाएगा।”
ट्रंप ने आगे कहा, “ग्रीनलैंड अगर अमेरिका के हाथ में होता है, तो NATO और ज्यादा मजबूत और असरदार बन जाता है। इससे कम कुछ भी मंजूर नहीं है।”
इसके बाद 17 जनवरी 2026 को ‘ग्रीनलैंड की खरीद’ पर समर्थन न देने वाले यूरोपीय देशों पर टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी। इस फैसले को भी उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा कदम बताया। ट्रंप ने कहा कि आधुनिक हथियार प्रणालियों और गोल्डन डोम एयर डिफेंस सिस्टम के दौर में ग्रीनलैंड की रणनीतिक अहमियत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ट्वीट का स्क्रीनशॉट (फोटो साभार: X- Truth Social)
ग्रीनलैंड के इस सौदे को 150 साल पुराना बताते हुए ट्रंप ने कहा, “अब गोल्डन डोम और आधुनिक हथियार प्रणालियों, हमले और रक्षा दोनों तरह की वजह से यह खरीदना और भी जरूरी हो गया है। सैकड़ों अरब डॉलर इस सुरक्षा कार्यक्रम पर खर्च किए जा रहे हैं, जिसमें कनाडा की सुरक्षा का भी ध्यान रखा गया है।”
गोल्डन डोम सिस्टम के लिए ग्रीनलैंड को महत्वपूर्ण बताते हुए ट्रंप आगे कहते हैं, “यह बहुत ही शानदार, लेकिन बहुत जटिल सिस्टम तभी अपनी पूरी क्षमता और दक्षता से काम कर पाएगा, जब ग्रीनलैंड भी इसमें शामिल हो। इसमें जमीन की सही स्थिति और दिशा बहुत मायने रखती है।”
क्या है गोल्डन डोम एयर डिफेंस सिस्टम?
तो अब जानना जरूरी है कि जिस ‘गोल्डन डोम एयर डिफेंस सिस्टम‘ के लिए डोनाल्ड ट्रंप ग्रीनलैंड को खरीदने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं, आखिर वह क्या है? जानकारी के अनुसार, गोल्डन डोम एयर डिफेंस सिस्टम अमेरिका की सबसे महत्वाकांक्षी और उन्नत मिसाइल रक्षा परियोजना है जो देश को भविष्य के हथियारों और मिसाइल खतरों से बचाने के लिए डिजाइन की जा रही है।
गोल्डन डोम को 20 मई 2025 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आधिकारिक रूप से लॉन्च किया था और उन्होंने बताया कि यह प्रोजेक्ट लगभग 175 अरब डॉलर (लगभग ₹14.52 लाख करोड़) की लागत से बनाया जाएगा। यह डिफेंस सिस्टम दुश्मन की मिसाइलों, हाइपरसोनिक हथियारों, ड्रोन और उन्नत हवाई खतरों को पहचानकर उन्हें उनके उड़ान के शुरुआती चरण में ही रोक देगा और जरूरत पढ़ने पर जवाबी कार्रवाई भी कर सकता है।
ट्रंप का कहना है कि यह सिस्टम अब तक की किसी भी रक्षा ढाल से कहीं अधिक व्यापक और तकनीकी रूप से उन्नत होगी और यह इजरायल के आयरन डोम (Iron Dome) जैसा है, लेकिन उससे कई गुना बड़ा और जटिल है।
गोल्डन डोम की खासियत क्या है?
गोल्डन डोम की सबसे बड़ी खासियत है कि मल्टी लेयर सुरक्षा और इंटरसेप्शन: यह एयर डिफेंस सिस्टम एक मल्टी-लेयर सुरक्षा कवच तैयार करेगा, जिसमें सैटेलाइन नेटवर्क, उच्च स्तरीय रडार सिस्टम और इंटरसेप्टर मिसाइलें शामिल होंगी। इसका मतलब यह है कि सिस्टम मिसाइल को उसके लॉन्च से पहले, उड़ान के बीच और लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही ट्रैक कर रोक सकता है।
ऐसा करने के लिए अंतरिक्ष में तैनात किए जाने वाले सैटेलाइट दुश्मन मिसाइलों का पता लगाएँगे और जमीन पर मौजूद सेंसर और इंटरसेप्टर सिस्टम उनके रास्ते को रोकेंगे। इसी तकनीक के जरिए अमेरिका अपेक्षा करता है कि वह बैलिस्टिक, हाइपरसोनिक, क्रूज और अन्य उन्नत मिसाइल खतरों को विफल कर सके।
एर्ली वार्निंग और सटीकता: गोल्डन डोम की ताकत इसका एर्ली वार्निंग सिस्टम है। इसका मतलब है कि जब भी कोई मिसाइल, ड्रोन या हाइपरसोनिक हथियार अमेरिका पर हमला करेगा, तो देश पहले ही आगाह हो जाएगा।
इसके अलावा यह सिस्टम बहुत सटीक लक्ष्य निर्धारण करता है। यह मिसाइल की गति, दिशा और दूरी को देखकर उसे हवा में ही मार सकता है। यही वजह है कि गोल्डन डोम न सिर्फ हमला रोकता है बल्कि जवाबी कार्रवाई की भी तैयारी करता है, जिससे अमेरिका की रक्षा और मजबूत हो जाती है।
गोल सुरक्षा कवच: गोल्डन डोम में ‘डोम’ शब्द इसीलिए है क्योंकि यह पूरे अमेरिका को एक गोल सुरक्षा ढाल की तरह घेर सकता है। इसका असर सिर्फ अमेरिका पर ही नहीं बल्कि कनाडा और उत्तरी गोलार्ध के रणनीतिक हिस्सों पर भी पड़ता है।
इस सिस्टम की वजह से दुश्मन के लिए हमला करना और खतरा पैदा करना मुश्किल हो जाता है। यानी गोल्डन डोम बहु-स्तरीय, तकनीकी रूप से उन्नत और व्यापक रक्षा प्रणाली है, जो अमेरिका को हर तरह के आधुनिक हथियारों और मिसाइल खतरों से सुरक्षित रखती है।
भविष्य में अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कितना जरूरी?
इस गोल्डन डोम एयर डिफेंस सिस्टम को ट्रंप ने भविष्य के युद्धों और मिसाइल खतरों से लड़ने वाला ‘नेक्स्ट जनरेशन शील्ड’ कहा है। इसका मतलब है कि यह ढाँचा न सिर्फ जमीन पर बल्कि अंतरिक्ष में भी आने वाले खतरों को पहचानने और रोकने की क्षमता रखता है।
पेंटागन के विशेषज्ञों के अनुसार, गोल्डन डोम में चार प्रमुख सुरक्षा स्तर होंगे- पहले खतरे की पहचान, फिर शुरुआती रोकथाम उसके बाद मध्य मार्ग में कार्रवाई और अंत में लक्ष्य को नष्ट करना। यानी मिसाइल को उसके किसी भी चरण में रोका जा सकता है।
यह परियोजना तकनीकी तौर पर इतनी जटिल है कि यह अमेरिका के मौजूदा रक्षा सिस्टम को भी नई ऊँचाइयों तक ले जाएगी। ट्रंप इसे ‘अभेद्य रक्षा कवच’ कहते हैं, यानी ऐसा सिस्टम जो दुश्मन के हमले को कामयाब नहीं होने देती। इस सिस्टम को साल 2029 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसमें और समय और संसाधन लग सकते हैं।
अगर इसके महत्व पर बात करें तो गोल्डन डोम सिस्टम सिर्फ मिसाइल रोकने का सिस्टम नहीं है। यह भविष्य के युद्ध की रणनीति और सुरक्षा के तरीके बदलने वाला ढाँचा भी है। इसका उद्देश्य सभी प्रकार के आधुनिक और परिष्कृत हथियारों से रक्षा करना है। चाहे वे पारंपरिक मिसाइल हों, हाइपरसोनिक हथियार हों या अंतरिक्ष से आने वाले खतरे हों। इसीलिए अमेरिका इसे मल्टी-डोमेन सुरक्षा कवच के रूप में विकसित कर रहा है, जो जमीन, हवा और अंतरिक्ष तीनों जगह काम कर सके।
गोल्डन डोम सिस्टम के लिए ग्रीनलैंड ही क्यों?
गोल्डन डोम जैसे उन्नत डिफेंस सिस्टम तभी पूरी तरह काम कर सकती है, जब इसे भौगोलिक रूप से सही जगह पर लॉन्च किया जाए। अमेरिका ने इसके लिए ग्रीनलैंड को चुना है, क्योंकि यह रूस और अमेरिका के बीच आर्कटिक इलाके के पास वाला क्षेत्र है।
इसका मतलब है कि अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्मन रूस अगर मिसाइल से हमला करेगा, तो अमेरिका को ग्रीनलैंड से ही चेतावनी मिल जाएगी। अगर गोल्डन डोम को कहीं और रखा जाए, तो मिसाइल या हाइपरसोनिक हथियारों के आने का समय कम हो जाएगा और खतरा बढ़ जाएगा।
इसी के साथ ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति सिर्फ जल्दी चेतावनी देने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ से अमेरिका अपने उत्तर और आर्कटिक क्षेत्र के हवाई रास्तों पर नजर रख सकता है। इस इलाके में हवाई और अंतरिक्ष दोनों खतरों की निगरानी करना आसान हो जाता है। यही वजह है कि ट्रंप ने बार-बार कहा कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है और गोल्डन डोम को धरातल पर लाने के लिए इसे हाथ से जाने नहीं दिया जा सकता है।
बिना ग्रीनलैंड के अमेरिका की सुरक्षा को खतरा?
अब सवाल यह उठता है कि क्या अमेरिका बिना ग्रीनलैंड के अपने हवाई क्षेत्र को पूरी तरह सुरक्षित नहीं रख सकता है? जवाब है- मुश्किल है। अमेरिका के पास बहुत सारे मिसाइल डिफेंस सिस्टम हैं जैसे THAAD और Aegis, जो दुश्मन की मिसाइलों को रोकने में मदद करते हैं।
लेकिन गोल्डन डोम की खासियत यह है कि यह सिर्फ हमला रोकने तक सीमित नहीं है। यह सिस्टम सबसे पहले चेतावनी देता है और कई स्तरों पर हमले को रोकता भी है। इसका मतलब है कि मिसाइल के प्रक्षेपण से लेकर उड़ान और लक्ष्य तक पहुँचने के हर चरण में इसे ट्रैक और नष्ट किया जा सकता है।
और इस गोल्डन डोम को सही जगह पर तैनात करना भी उतना ही जरूरी है, जिसके लिए ग्रीनलैंड से बेहतर जगह कोई और नहीं हो सकती है। यही वजह है कि अमेरिका गोल्डन डोम के बिना हवाई क्षेत्र की रक्षा नहीं कर सकता है, और इसीलिए ग्रीनलैंड भी उसके लिए जरूरी है।
गुजरात के ऐतिहासिक मोढेरा सूर्य मंदिर में 17 और 18 जनवरी 2026 को दो दिवसीय ‘उत्तरार्ध महोत्सव’ का आयोजन किया गया। यह उत्सव सूर्य पूजा और गुरु-शिष्य परंपरा को समर्पित है, जिसमें ओडिसी, भरतनाट्यम, कथक, मणिपुरी, कुचिपुड़ी, कथकली और सतरिया जैसे प्रमुख शास्त्रीय नृत्यों की प्रस्तुतियाँ हुई।
यह आयोजन केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। मोढेरा का सूर्य मंदिर भारतीय परंपरा का जीवंत प्रतीक है, जहाँ धर्म, विज्ञान, खगोल विज्ञान, समय की गणना और कला एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
उत्तरार्ध महोत्सव जैसे आयोजनों के माध्यम से मोढेरा केवल पर्यटन स्थल नहीं रहता, बल्कि सूर्य उपासना और ऋतु चक्रों पर आधारित उस भारतीय संस्कृति को आधुनिक रूप में प्रस्तुत करता है, जिसकी जड़ें वैदिक काल तक जाती हैं।
उत्तरार्द महोत्सव क्या है?
मोढेरा में आयोजित यह उत्सव भारत की उस प्राचीन परंपरा की याद दिलाता है, जिसमें सूर्य को जीवन, समय और ऋतुओं के चक्र का आधार माना गया है। इस आयोजन में भले ही शास्त्रीय नृत्य प्रस्तुतियाँ हों, लेकिन इसका असली महत्व सूर्य और समय की भारतीय समझ से जुड़ा हुआ है।
दरअसल, ‘उत्तरार्ध’ शब्द संस्कृत से लिया गया है। उत्तर का अर्थ है उत्तर दिशा और अर्ध का मतलब है आधा या मध्य भाग। उत्तरार्ध महोत्सव उत्तरायण के बाद, सूर्य के उत्तर दिशा में बढ़ते मार्ग के मध्य चरण में मनाया जाता है। यह समय शीत ऋतु के अंत का होता है, जब दिन धीरे-धीरे लंबे होने लगते हैं।
उत्तरायण के बाद सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है और उत्तर की ओर अपनी यात्रा शुरू करता है। जब यह यात्रा अपने मध्य या आधे हिस्से में पहुँचती है, उसी काल को उत्तरार्ध कहा जाता है। यह वह समय है जब ठंड कम होने लगती है, प्रकृति में नई ऊर्जा का संचार होता है और जीवन के नए अंकुर दिखाई देने लगते हैं।
भारतीय परंपरा में समय को हमेशा सूर्य की गति से जोड़ा गया है। दिन-रात, ऋतुएँ, महीने और वर्ष सब कुछ सूर्य की यात्रा पर आधारित रहा है। इसी कारण भारत के अधिकांश त्योहार, जैसे मकर संक्रांति और ऋतु परिवर्तन से जुड़े पर्व, सूर्य से जुड़े हुए हैं।
यह समझना जरूरी है कि ‘उत्तरार्ध महोत्सव’ किसी एक धार्मिक ग्रंथ में दर्ज विशेष पर्व नहीं है, बल्कि यह समय के उस शाश्वत चक्र का प्रतीक है, जिसमें सूर्य को ‘समय का स्वामी’ माना गया है। मोढेरा सूर्य मंदिर में आयोजित यह महोत्सव भी इसी सूर्य उपासना और काल-चक्र की भारतीय परंपरा को समर्पित है।
‘अयन’ क्या है? उत्तरायण-दक्षिणायन की परिभाषा
भारतीय पंचांग और धार्मिक परंपरा में सूर्य की गति को दो मुख्य भागों में समझा गया है, उत्तरायण और दक्षिणायन। सरल भाषा में कहें तो वर्ष के एक हिस्से में सूर्य उत्तर दिशा की ओर और दूसरे हिस्से में दक्षिण दिशा की ओर चलता है। इसी वजह से भारतीय परंपरा में उत्तरायण को बदलाव और शुभ शुरुआत का समय माना जाता है।
उत्तरायण का आध्यात्मिक महत्व महाभारत में भी दिखाई देता है। भीष्म पर्व के अनुसार, भीष्म पितामह ने अपनी इच्छा से उत्तरायण आने तक देह त्यागने की प्रतीक्षा की थी। यह कथा बताती है कि उस समय को आत्मिक दृष्टि से विशेष और पवित्र माना जाता था।
यह मान्यता दर्शाती है कि भारतीय संस्कृति में समय को केवल तिथियों या कैलेंडर के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि सूर्य की गति के साथ जुड़े उसके आध्यात्मिक अर्थ को भी गहराई से समझा गया है।
वैदिक काल से ही सूर्य पूजा का प्रचलन रहा है
सूर्य पूजा भारत में केवल एक आस्था नहीं, बल्कि वैदिक जीवन-पद्धति की एक मजबूत आधारशिला रही है। ऋग्वेद (ऋग्वेद 1.50.4) में सूर्य को प्रत्यक्ष देवता माना गया है, जो प्रकाश देता है, जीवन को चलायमान रखता है और सही मार्ग दिखाता है। वैदिक दृष्टि में सूर्य केवल भौतिक रोशनी का स्रोत नहीं है, बल्कि ब्रह्मांडीय व्यवस्था, सत्य और अनुशासन का प्रतीक भी है।
इसी कारण भारत में सूर्य का स्मरण केवल पूजा तक सीमित नहीं रहा। यह एक अनुशासित जीवनशैली का हिस्सा बना, जिसमें दैनिक दिनचर्या, ऋतुओं के अनुसार जीवन, धर्म और कर्म का संतुलन शामिल है। उपनिषदों में भी सूर्य को प्रकाश, जीवन और चेतना का प्रतीक माना गया है। यह निरंतर परंपरा बताती है कि भारतीय संस्कृति में धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि प्रकृति और जीवन के साथ सामंजस्य है।
पुराणों में सूर्य को आदित्य कहा गया है और नौ ग्रहों में इसे सबसे प्रमुख माना गया है। सूर्य को सिर्फ ऊष्मा या ऊर्जा का स्रोत नहीं, बल्कि धर्म का साक्षी, प्रत्यक्ष देवता और प्रकाश का आधार माना गया। इसी विश्वास के कारण भारत के अलग-अलग हिस्सों में सूर्य पूजा की परंपराएँ अलग रूपों में विकसित हुईं, कहीं अर्घ्य देने की परंपरा, कहीं उपवास, कहीं विशेष पूजा और कहीं सूर्य मंदिरों का निर्माण।
इसी सूर्य उपासना की परंपरा से मोढेरा में आयोजित होने वाला उत्तरार्ध महोत्सव भी जुड़ा है। उत्तरायण के बाद जब सूर्य उत्तर दिशा की ओर बढ़ते हुए शीत ऋतु के अंत का संकेत देता है और दिन लंबे होने लगते हैं, तब मोढेरा सूर्य मंदिर में यह उत्सव मनाया जाता है। इसका नाम किसी नई कल्पना से नहीं, बल्कि सूर्य की गति और ऋतु परिवर्तन के गहरे सांस्कृतिक अर्थ से प्रेरित है।
मोढेरा सूर्य मंदिर: धर्म और विज्ञान का संगम
मोढेरा का सूर्य मंदिर भारत की उस परंपरा का जीवंत उदाहरण है, जहाँ मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं थे, बल्कि खगोल विज्ञान और उत्कृष्ट स्थापत्य ज्ञान के केंद्र भी हुआ करते थे। ऐसे मंदिरों में दिशा, सूर्य का प्रकाश, समय और ऋतुओं का विशेष ध्यान रखा जाता था।
इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय सनातन परंपरा में आस्था और विज्ञान के बीच कोई टकराव नहीं था, बल्कि दोनों एक-दूसरे के पूरक थे। यही कारण है कि मोढेरा जैसे मंदिर आज भी केवल पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि पूरी सभ्यता का संदेश देते हैं।
वैदिक काल और रामायण-महाभारत में मोढेरा का उल्लेख अन्य नामों से मिलता है, लेकिन वर्तमान सूर्य मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में हुआ माना जाता है। यह मंदिर सोलंकी वंश के राजा भीमदेव प्रथम के शासनकाल में बना था।
राजा भीमदेव स्वयं को सूर्यवंशी मानते थे और यह पहचान केवल शासन तक सीमित नहीं थी, बल्कि मंदिर की वास्तुकला और धार्मिक भाव में भी साफ दिखाई देती है। मंदिर की दीवारों पर बारह आदित्यों की सुंदर नक्काशी की गई है, जो वैदिक परंपरा में सूर्य के बारह रूपों का प्रतीक हैं।
मंदिर की वास्तुकला का सबसे खास पहलू इसका खगोलीय संरेखण है। वसंत विषुव के दिन, जब दिन और रात बराबर होते हैं, सूर्य की पहली किरणें सीधे मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करती हैं और भगवान सूर्य के मुकुट पर पड़ती हैं।
इससे पूरा मंदिर प्रकाश से भर उठता है। यह उस समय के वैदिक खगोल विज्ञान और वैज्ञानिक समझ का अद्भुत उदाहरण है। मंदिर की दिशा, संरचना और सूर्य की गति के बीच यह सामंजस्य दिखाता है कि प्राचीन भारत में धर्म, विज्ञान और वास्तुकला को एक साथ जोड़ा गया था।
आज मोढेरा में आयोजित होने वाला उत्तरार्ध महोत्सव इसी परंपरा को आधुनिक समय से जोड़ता है। यह उत्सव सूर्य पूजा, जीवन चक्र और समय की भारतीय समझ को नए संदर्भ में प्रस्तुत करता है।
यह संदेश देता है कि भारतीय सभ्यता में समय केवल कैलेंडर तक सीमित नहीं, बल्कि संस्कृति का अहम हिस्सा है। मोढेरा सूर्य मंदिर और यहाँ होने वाला उत्तरार्ध महोत्सव इस जीवंत परंपरा की निरंतरता का प्रतीक हैं, जहाँ सूर्य उपासना, भारतीय कालगणना और शास्त्रीय कला एक साथ दिखाई देती हैं।
(यह रिपोर्ट मूल रूप से गुजराती में भार्गव राज्यगुरु ने लिखी है, मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)
ब्रुहनमुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनाव 2026 के नतीजे ठाकरे परिवार के लिए बेहद करारा झटका लेकर आए हैं। 227 सीटों वाली इस महानगरपालिका में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अकेले 89 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनने का गौरव हासिल किया। उद्धव ठाकरे की शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) 65 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही, जबकि एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना को 29 सीटें मिलीं। लेकिन इस पूरे चुनावी दंगल का सबसे बड़ा सवाल यही है कि उद्धव और राज ठाकरे की जोड़ी आखिर बहुमत से क्यों दूर रह गई? इसका सबसे सीधा जवाब है कॉन्ग्रेस का साथ न मिलना और सबसे पहले कॉन्ग्रेस का ही गठबंधन तोड़ना।
कॉन्ग्रेस की रणनीति ने डुबोई ठाकरे परिवार की लुटिया
इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम की सबसे पहली और सबसे बड़ी गलती कॉन्ग्रेस द्वारा गठबंधन तोड़ने का फैसला था। बीएमसी चुनाव से पहले महा विकास अघाड़ी (MVA) को फिर से एकजुट करने की कोशिशें चल रही थीं, लेकिन कॉन्ग्रेस ने साफ कर दिया कि वह इस चुनाव में अकेले उतरेगी। खासतौर पर कॉन्ग्रेस ने राज ठाकरे की मनसे के साथ किसी भी तरह के गठबंधन से इनकार कर दिया। कॉन्ग्रेस का तर्क था कि मनसे की राजनीति उत्तर भारतीयों और अल्पसंख्यकों के लिए असहज है और नगर निगम जैसे चुनाव में सामाजिक संतुलन बेहद जरूरी होता है।
कॉन्ग्रेस के इस फैसले का सीधा असर यह हुआ कि विपक्षी वोट पूरी तरह बँट गया। एक तरफ उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की जोड़ी, दूसरी तरफ अकेली कॉन्ग्रेस और सामने पहले से मजबूत बीजेपी-शिंदे महायुति। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर कॉन्ग्रेस शुरुआत में ही गठबंधन नहीं तोड़ती और एमवीए एकजुट रहता, तो मुकाबला बेहद करीबी हो सकता था। लेकिन अलग-अलग लड़ने के फैसले ने ठाकरे परिवार की चुनावी जमीन कमजोर कर दी।
साल 2017 में अलग थे चुनाव के नतीजे
अगर बीते इतिहास को देखें तो 2017 का बीएमसी चुनाव बेहद अलग तस्वीर दिखाता है। उस वक्त बीजेपी और शिवसेना साथ थे। शिवसेना ने 84 सीटें जीती थीं और बीजेपी को 82 सीटें मिली थीं। दोनों पार्टियों के बीच जबरदस्त टक्कर थी, लेकिन सत्ता ठाकरे परिवार के हाथ में ही रही। 2019 के विधानसभा चुनाव में भी एनडीए को बहुमत मिला, लेकिन उद्धव ठाकरे ने बीजेपी का साथ छोड़कर कॉन्ग्रेस और एनसीपी के साथ एमवीए सरकार बना ली।
साल 2022 तक चली एमवीए सरकार के बाद शिवसेना टूट गई। एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ा शिवसैनिक धड़ा अलग हो गया। इसके बाद उद्धव ठाकरे की राजनीतिक ताकत लगातार कमजोर होती चली गई। बीएमसी चुनाव इस कमजोरी की सबसे बड़ी परीक्षा थी। यह चुनाव यह भी साबित करता है कि उद्धव ठाकरे जब तक बीजेपी के साथ थे, तब तक उनकी सत्ता मजबूत थी। जैसे ही उन्होंने बीजेपी से दूरी बनाई, संगठन और वोट दोनों कमजोर होते चले गए।
शिवसैनिकों का स्वार्थ गठबंधन से दूर जाना भी रहा अहम
शिवसैनिक दशकों से कॉन्ग्रेस का विरोध करते आए हैं। ऐसे में उद्धव ठाकरे के लिए कॉन्ग्रेस के साथ वैचारिक तालमेल बनाना पहले से ही मुश्किल था। ऊपर से राज ठाकरे के साथ गठबंधन ने स्थिति और उलझा दी। राज ठाकरे के कट्टर मराठी और उत्तर भारतीय विरोधी बयानों ने मुस्लिम और गैर-मराठी वोटरों को उद्धव से दूर कर दिया। इसका सीधा फायदा बीजेपी को मिला, जो खुद को स्थिर और भरोसेमंद विकल्प के तौर पर पेश कर रही थी।
बीजेपी ने ठाकरे भाइयों की जुगलबंदी को ‘स्वार्थी गठजोड़’ करार दिया और जमीन पर इसका असर भी दिखा। शिवसेना (UBT) का संगठन भ्रम और श्रेय की लड़ाई में कमजोर पड़ा। ठाकरे विरासत को लेकर पार्टी के अंदर ही असमंजस बना रहा। वहीं, शिंदे गुट ने खुद को असली शिवसेना बताकर पारंपरिक शिवसैनिकों को अपनी ओर खींच लिया।
आँकड़ों में बीएमसी चुनाव के नतीजे
अब अगर बीएमसी चुनाव 2026 के फाइनल आँकड़ों पर नजर डालें, तो तस्वीर और साफ हो जाती है। कुल वोटों में बीजेपी को 11,79,273 वोट मिले, जो 45.22 फीसदी हैं। शिवसेना (उद्धव) को 7,17,736 वोट (27.52 फीसदी) और कॉन्ग्रेस को 2,42,646 वोट (4.44 फीसदी) मिले। यानी अगर उद्धव ठाकरे और कॉन्ग्रेस साथ होते, तो उनके संयुक्त वोट 9,60,382 हो जाते, जो बीजेपी के बेहद करीब पहुँचते।
सीटों के आँकड़े भी यही कहानी कहते हैं।
बीजेपी – 89 सीटें
शिवसेना (उद्धव) – 65 सीटें
शिवसेना (शिंदे) – 29 सीटें
कॉन्ग्रेस – 24 सीटें
मनसे – 6 सीटें
एनसीपी (अजित) – 3 सीटें
एआईएमआईएम – 8 सीटें
अगर सिर्फ गणित के लिहाज से देखें तो उद्धव ठाकरे, कॉन्ग्रेस और मनसे का गठबंधन 95 सीटों तक पहुँचता दिखता है। लेकिन असल खेल वोट ट्रांसफर का था, जहाँ गठबंधन होता तो 40–50 वार्डों में नतीजे पलट सकते थे।
बीएमसी चुनाव के नतीजे
कॉन्ग्रेस के वोटों ने छीनी शिवसेना-UBT से जीत
मुंबई के कई ऐसे वार्ड रहे, जहाँ हार-जीत का अंतर बेहद कम था। अंधेरी ईस्ट, गोरेगांव, मालाड जैसे इलाकों में कॉन्ग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक रहा है। इन इलाकों में उद्धव ठाकरे के उम्मीदवार सिर्फ इसलिए हार गए क्योंकि वोट बंँट गया। अगर कॉन्ग्रेस साथ होती, तो ये सीटें आसानी से ठाकरे खेमे में जा सकती थीं।
शिवसेना (UBT) कई ऐसे वार्डों में हारी, जहाँ कॉन्ग्रेस ने 3 से 6 हजार वोट काट लिए। ये वही वार्ड थे, जिन्हें दशकों से शिवसेना का गढ़ माना जाता रहा है। दादर, परेल जैसे इलाकों में भी यही ट्रेंड देखने को मिला। यहां महायुति को फायदा सिर्फ इसलिए मिला क्योंकि विपक्ष बंटा हुआ था।
कॉन्ग्रेस की 24 सीटें यह साबित करती हैं कि पार्टी अभी भी मुंबई में पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। लेकिन अकेले लड़ने का फैसला उसके लिए भी घाटे का सौदा साबित हुआ। अगर वह उद्धव ठाकरे के साथ जाती, तो उसकी सीटें भी 35–40 तक पहुँच सकती थीं और सत्ता की तस्वीर ही बदल जाती।
मनसे से गठबंधन ने उद्धव को किया बर्बाद
राज ठाकरे के साथ गठबंधन उद्धव ठाकरे की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल साबित हुई। मनसे का वोट शेयर सिर्फ 5 फीसदी के आसपास रहा और उसे केवल 6 सीटें मिलीं। इसके उलट, कॉन्ग्रेस के पास 4.44 फीसदी वोट और 24 सीटें थीं, जो कहीं ज्यादा असरदार थीं। उद्धव ठाकरे अगर मनसे की बजाय कॉन्ग्रेस को प्राथमिकता देते, तो मराठी वोट के साथ अल्पसंख्यक और सेकुलर वोट भी उनके साथ आता।
यहाँ यह कहना भी जरूरी है कि गलती सिर्फ उद्धव ठाकरे की नहीं थी। फैक्ट यह है कि सबसे पहले कॉन्ग्रेस ने ही ‘एकला चलो रे’ की नीति अपनाई। कॉन्ग्रेस नेतृत्व ने उद्धव ठाकरे को यह भरोसा नहीं दिलाया कि वह हर हाल में गठबंधन में रहेगी। इसी वजह से उद्धव ठाकरे ने मजबूरी में मनसे का रास्ता चुना।
कॉन्ग्रेस के पंजे ने दिखाया ठेंगा, तो ठह गया ठाकरे परिवार का किला
अगर एमवीए एकजुट रहता, तो बीएमसी में महायुति के लिए बहुमत पाना बेहद मुश्किल होता। आँकड़े बताते हैं कि विपक्ष की संयुक्त ताकत बीजेपी के बेहद करीब थी। लेकिन अलग-अलग लड़ने से यह ताकत बिखर गई और बीजेपी-शिंदे गठबंधन को सीधा फायदा मिल गया।
बीएमसी हारना उद्धव ठाकरे के लिए सिर्फ एक चुनावी हार नहीं, बल्कि राजनीतिक ताकत के केंद्र का छिन जाना है। बीएमसी से मिलने वाला आर्थिक और सांगठनिक बल ही शिवसेना की असली ताकत रहा है। 25 साल बाद यह किला हाथ से निकलना ठाकरे परिवार के लिए बड़ा झटका है।
वहीं, कॉन्ग्रेस के लिए यह नतीजा चेतावनी है। 24 सीटें यह दिखाती हैं कि पार्टी प्रासंगिक है, लेकिन अकेले लड़कर वह सत्ता तक नहीं पहुँच सकती। अगर वह गठबंधन की राजनीति को नहीं समझेगी, तो उसका असर आगे विधानसभा और लोकसभा चुनावों में भी दिख सकता है।
कुल मिलाकर बीएमसी चुनाव का नतीजा यही सिखाता है कि विपक्ष का बिखराव सत्ता पक्ष के लिए वरदान बन जाता है। कॉन्ग्रेस द्वारा सबसे पहले गठबंधन तोड़ना, उद्धव ठाकरे की मनसे के साथ गलत प्राथमिकता और शिंदे-बीजेपी की मजबूत जमीन… इन तीनों ने मिलकर ठाकरे परिवार की लुटिया डुबो दी।
उद्धव ठाकरे और कॉन्ग्रेस इस हार से लेंगे सबक?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उद्धव ठाकरे और कॉन्ग्रेस इस हार से सबक लेंगे? क्या एमवीए फिर से एकजुट होगा या विपक्ष ऐसे ही बिखरा रहेगा? अगर जवाब नहीं में रहा, तो आने वाले चुनावों में भी तस्वीर कुछ अलग नहीं होगी।
कुल मिलाकर बीएमसी चुनाव 2026 ने यह साबित कर दिया कि मुंबई जैसे जटिल शहर में ‘एकला चलो’ की नीति काम नहीं करती। वैसे भी, राजनीति में भावनाओं से ज्यादा गणित चलता है। और इस गणित में इस बार सबसे बड़ी गलती कॉन्ग्रेस की रही, जिसने सबसे पहले गठबंधन तोड़ा और ठाकरे परिवार की सबसे मजबूत सत्ता को इतिहास बना दिया। कॉन्ग्रेस ने न सिर्फ खुद को नुकसान पहुँचाया, बल्कि ठाकरे परिवार की राजनीतिक नाव भी डुबो दी। अब मुंबई की सत्ता पर महायुति का पूरा कब्जा है और विपक्ष को एकजुट होने की नई चुनौती मिल गई है।