पंजाब में कबड्डी सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान है। गाँवों की चौपालों से लेकर अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों तक, यह खेल पंजाब की मिट्टी की ताकत और परंपरा का प्रतीक रहा है। लेकिन पिछले कुछ महीनों में कबड्डी के खिलाड़ियों के लिए पंजाब की धरती एक डरावने सपने की तरह सामने आ रहा है।
हालाँकि कबड्डी खिलाड़ी अब लगातार गैंगस्टरों के निशाने पर आ रहे हैं। बीते 3 महीनों में कई खिलाड़ियों की गैंगवार के तहत हत्या कर दी गई। सोमवार (15 दिसंबर 2025) को मोहाली के सोहाना इलाके में एक प्राइवेट कबड्डी टूर्नामेंट चल रहा था, तभी मोटरसाइकिल पर आए 2-3 हमलावरों ने खिलाड़ी राणा बलाचौरिया पर गोलियाँ चला दीं।
इससे पहले 4 नवंबर 2025 को समराला ब्लॉक में 23 वर्षीय कबड्डी के नेशनल प्लेयर गुरविंदर सिंह पर रात करीब 9 बजे चार नकाबपोश हमलावरों ने गोलियाँ चलाईं। उन्हें इलाज के लिए ले जाते समय रास्ते में मौत हो गई। लॉरेंस बिश्नोई गैंग ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए जिम्मेदारी ली।
31 अक्टूबर 2025 को लुधियाना के जगराओं में SSP ऑफिस के पास 25 वर्षीय कबड्डी खिलाड़ी तेजपाल सिंह को पहले पीटा गया, फिर गोली मारी गई। पुलिस ने इसे पुरानी रंजिश से जुड़ा मामला बताया।
इसके अलावा 14 मार्च 2022 को जालंधर में कबड्डी के अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी संदीप नंगल अंबियाँ को ओपन टूर्नामेंट के दौरान कई हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी। पूरी घटना कैमरे में भी कैद हुई।
विपक्ष ने भी आप सरकार को लिया आड़े हाथ
राणा बलाचौरिया की हत्या की घटना से जुड़ा वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इस वीडियो में गोलीबारी की आवाजें सुनी जा सकती हैं। यह स्थिति पंजाब सरकार की कानून‑व्यवस्था को तार-तार करने के साथ पंजाब के सामाजिक ढाँचे में गहराई तक घुस चुके अपराध का ताना‑बाना भी दिखाता है।
इस मामले पर नेताओं ने भी AAP सरकार को आड़े हाथों लिया है। भारतीय हॉकी टीम के पूर्व कप्तान और कॉन्ग्रेस नेता परगत सिंह ने भी मामले को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा कर प्रशासन पर सवाल उठाए हैं।
Under @BhagwantMann govt, Punjab’s law and order has hit a new low.
Firing during the Mohali Kabaddi Cup in Sohana, which claimed the life of player Rana Balachouria, exposes the complete collapse of governance. When gunshots ring out at public sports events, it’s a clear sign… pic.twitter.com/4vZ1HovN87
राणा बलाचौरिया की हत्या कर अपराधियों ने ये भी कहा कि ये उनका बदला है। इसमें पंजाबी गायक सिद्धू मूसेवाला का नाम भी सामने आया। बंबीहा गैंग ने सोशल मीडिया पर हत्या की जिम्मेदारी ली।
मामले में शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने इस हत्या के लिए सीधे तौर पर ‘आप’ सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। उनका कहना है कि यह पंजाब में कानून और व्यवस्था के पूरी तरह फेल होने का सबूत है।
पंजाब और गैंगस्टर्स का ‘कनेक्शन’
पंजाब में म्यूजिक इंडस्ट्री और गैंगस्टर नेटवर्क का गहरा कनेक्शन है। ये पंजाब सरकार के लिए न केवल एक चुनौती बल्कि इसके लिए अब तक सरकार की ओर से कोई कदम न उठा पाना एक करारा तमाचा भी है।
पंजाबी गायकों के बड़े शो, इवेंट्स और विदेशों में होने वाले कॉन्सर्ट्स में गैंगों की दखल लंबे समय से रही है। कई गायकों ने धमकियों और वसूली की शिकायतें की हैं। हालाँकि कुछ गानों में गैंगस्टरों के नाम और हिंसा का महिमामंडन भी होता है, जिससे अपराधियों को पॉप‑कल्चर में वैधता मिलती है। इसके कारण खिलाड़ियों और गायकों के लिए जोखिम भी बढ़ता है क्योंकि वे विरोधी गैंगों के लिए ‘हाई‑विजिबिलिटी टारगेट’ बन जाते हैं।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि पंजाब सरकार और प्रशासन इस पूरे संकट पर लगभग खामोश दिखाई देते हैं। दिनदहाड़े हत्याएँ, वायरल वीडियो, सोशल मीडिया पर गैंगों की धमकियों के बावजूद सरकार की ओर से कोई बड़ा बयान या ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई।
जाँच में पुलिस इंटेलिजेंस की नाकामी साफ दिखती है क्योंकि गैंगस्टर खुलेआम जिम्मेदारी ले रहे हैं और फिर भी गिरफ्तारी या रोकथाम की कोशिशें नाकाफी साबित होती है। इसके अलावा पंजाब में गैंगस्टर नेटवर्क अब लोकल के बजाय अंतररराष्ट्रीय भी अधिक हो गया है। कई गैंग विदेशों से ऑपरेट करते हैं। इसके चलते पुलिस के लिए चुनौती और बढ़ जाती है।
अपराध का ताना‑बाना अब आम लोगों के बीच भी बुना जा रहा है। सोशल मीडिया गैंगों का नया हथियार बन चुका है- धमकी, प्रचार, भर्ती, सब कुछ ऑनलाइन होता है। पंजाब में बेरोजगारी और नशे की समस्या ने युवाओं को और कमजोर बनाया है और गैंगस्टर इन्हीं कमजोरियों का फायदा उठाते हैं।
पंजाब सरकार को रणनीतिक कदम उठाने की जरूरत
जब खेल के मैदान में गोलियाँ चलें, जब खिलाड़ी सुरक्षा मांगें और जब सरकार चुप रहे तो यह सिर्फ कानून‑व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि राज्य की असुरक्षा का संकेत हैं। पंजाब अभी भी संभल सकता है, लेकिन इसके लिए सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति, पुलिस सुधार और सामाजिक जागरूकता की जरूरत है।
कबड्डी और संगीत दोनों में पैसा और पब्लिक इन्फ्लुएंस बहुत है, इसलिए गैंगों की दिलचस्पी भी बढ़ती जा रही है। इस स्थिति से निकलने के लिए पंजाब को एक मजबूत, बहुस्तरीय रणनीति की जरूरत है। स्पेशल एंटी‑गैंगस्टर टास्क फोर्स, इंटरनेशनल कोऑपरेशन, कबड्डी टूर्नामेंटों की सुरक्षा, सोशल मीडिया मॉनिटरिंग और खिलाड़ियों‑गायकों के लिए सुरक्षा प्रोटोकॉल जैसे कदम तुरंत उठाए जाने चाहिए।
अहमदाबाद के दानिलिमडा वार्ड में गाँव के कुएँ के सामने स्थित प्राचीन मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया। इन प्राचीन मंदिरों की जगह अवैध रूप से इमारत बना दिए जाने के आरोप लगे हैं और उन फ्लैट्स में मुस्लिम परिवार रह रहे हैं। इन फ्लैट्स के सामने मांसाहारी दुकानें भी हैं। स्थानीय हिंदू नागरिकों ने इस मामले की शिकायत अहमदाबाद महानगरपालिका से लेकर कलेक्टर कार्यालय तक की है। लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह इलाका ‘अशांत धारा’ के अंतर्गत आता है। इसके बावजूद प्राचीन मंदिर के ऊपर ही मुस्लिमों के लिए फ्लैट बनाने की अनुमति दे दी गई। यहाँ दो प्राचीन मंदिरों को तोड़कर फ्लैट बनाए गए हैं। इलाके में अब भी एक मंदिर मौजूद है और मुस्लिम उसके ऊपर बने फ्लैट पर रह रहे हैं।
हाल ही में विवाद को लेकर गाँधीनगर में शिकायत दर्ज कराई गई है, जिसके बाद मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने मामले पर संज्ञान लेते हुए जाँच के आदेश दिए हैं। स्थानीय हिंदू लोगों को आश्वासन दिया है कि सरकार तत्काल कार्रवाई करेगी और अवैध रूप से निर्मित फ्लैटों को ध्वस्त कर मंदिर मुक्त कराएगी। ऑपइंडिया की टीम भी मौके पर पहुँची और स्थानीय लोगों से बातचीत की।
यह भी सामने आया है कि साल 2016 में नगरपालिका ने प्राचीन जोगनी माता मंदिर की चोटी पर फ्लैट बनाने की अनुमति दी थी। साकिर अहमद नाम के एक बिल्डर ने इमारत बनाने की योजना नगर निगम को दी थी, जिसे MMC ने भी मंजूरी दे दी थी। इसके बावजूद स्थानीय हिंदुओं ने इसका कड़ा विरोध किया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। हालाँकि, अब सीएम भूपेंद्र पटेल ने मामले की जाँच के आदेश दिए हैं।
मंदिरों पर अवैध फ्लैट बनाने के खिलाफ सालों से लड़ रहे: स्थानीय हिंदू
ऑपइंडिया की टीम मौके पर पहुँची और मामले की जानकारी ली। टीम ने स्थानीय लोगों से भी बात की। अवैध रूप से निर्मित इमारत का नाम ‘कबीर हाइट्स’ है। इस इमारत में बने सभी फ्लैटों में मुस्लिम परिवार रहते हैं। एक स्थानीय व्यक्ति ने बताया कि मुख्यमंत्री का आदेश जनता की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए दिया गया है।
उन्होंने आगे बताया कि मंदिर के ऊपर बनी इस अवैध इमारत के खिलाफ वे सालों से संघर्ष कर रहे हैं। वे कहते हैं कि स्थानीय स्तर पर कई बार शिकायतें और ज्ञापन देने के बावजूद कोई समाधान नहीं निकला।
एक अन्य स्थानीय निवासी ने बताया कि कई साल पहले इस जगह पर एक कुआँ था, इसीलिए इस जगह को गाँवकूवा कहा जाता है। कुएँ पर माताजी का एक मंदिर था, लेकिन समय के साथ-साथ इस मंदिर पर गलत तरीके से निर्माण किया गया। उन्होंने माँग की कि इस निर्माण को पूरी तरह से हटा दिया जाए। दानिलिम्दा के बीजेपी अध्यक्ष ने भी इस विवाद पर ऑपइंडिया से बात की।
बीजेपी अध्यक्ष ने बताया कि इस क्षेत्र में लंबे समय से चर्चा, संघर्ष और याचिकाओं का दौर चल रहा था। स्थानीय लोगों ने भी कई जगहों पर याचिकाएँ दायार की थीं और अब इसे ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने जाँच के आदेश दिए हैं। उन्होंने आगे कहा कि मुख्यमंत्री के आदेश के बाद ऐसा लगता है कि स्थानीय हिंदुओं और मंदिर को न्याय जरूर मिलेगा। इस बीच स्थानीय लोगों ने भी भूपेंद्र पटेल सरकार के प्रति आभार व्यक्त किया है।
गौरतलब है कि पहले मंदिर का शिखर भवन दिखाई देता था, लेकिन अब काफी समय से भवन के बाहर बोर्ड लगा दिए गए हैं। इन बोर्ड के कारण शिखर ढक गया है। इसके अलावा वीडियो में यह भी देखा जा सकता है कि मंदिर की पहचान छिपाने के लिए जाल लगाने का प्रयास किया गया है।
(यह रिपोर्ट मूलरूप से गुजराती भाषा में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)
अयोध्या में राम मंदिर आंदोलन के सबसे बड़े चेहरों में से एक, पूर्व सांसद और वरिष्ठ संत डॉ रामविलास दास वेदांती का सोमवार (15 दिसंबर 2025) सुबह 77 साल की उम्र में निधन हो गया। मध्य प्रदेश के रीवा में रामकथा के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ी थी। वेदांती जी का पार्थिव शरीर अयोध्या लाया गया है, जहाँ उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए संतों, नेताओं और श्रद्धालुओं का हुजूम उमड़ पड़ा है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी उन्हें श्रद्धांजलि देंगे। डॉ वेदांती का निधन राम जन्मभूमि आंदोलन के एक युग का अंत माना जा रहा है, क्योंकि उन्होंने अपना पूरा जीवन राम मंदिर के लिए समर्पित कर दिया था और भव्य मंदिर निर्माण देखने के बाद ही उन्होंने दुनिया को अलविदा कहा।
बचपन में छोड़ा घर, बने अयोध्या के संत
डॉ रामविलास दास वेदांती जी का जन्म 7 अक्टूबर 1958 को मध्य प्रदेश के रीवा शहर में हुआ था। वह बचपन से ही बहुत धार्मिक थे और भगवान की भक्ति में उनका मन लगता था। जब वह सिर्फ 12 साल के थे, यानी बहुत छोटे थे, तभी उन्होंने फैसला कर लिया कि वह साधु बनेंगे। उन्होंने अपना घर-परिवार छोड़ दिया और सीधे भगवान राम की नगरी अयोध्या आ गए। एक तरह से, उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी राम जी के नाम कर दी।
अयोध्या पहुँचकर, वह हनुमानगढ़ी के बहुत मशहूर संत महंत अभिराम दास के शिष्य बन गए और उनके मार्गदर्शन में रहने लगे। वेदांती जी संस्कृत के बहुत बड़े जानकार (प्रकांड विद्वान) थे। अयोध्या में उनका एक अपना आश्रम ‘वशिष्ठ भवन’ था और वह अक्सर सरयू नदी के पास ‘हिंदू धाम’ नाम की जगह पर रहते थे।
राम मंदिर आंदोलन के बने प्रमुख योद्धा
1980 के आस-पास, जब देश में राम मंदिर बनाने का आंदोलन जोर पकड़ रहा था, तब वेदांती जी भी इसमें शामिल हो गए। वह अकेले नहीं थे, बल्कि उन्हें कई बड़े संतों का साथ मिला। इनमें महंत अवैद्यनाथ (जो आगे चलकर योगी आदित्यनाथ के गुरु बने), रामचंद्र परमहंस और अशोक सिंघल जैसे दिग्गज संत थे।
वेदांती जी बहुत जल्द इस आंदोलन का एक मुख्य चेहरा बन गए। वह सिर्फ अयोध्या में नहीं रुके, बल्कि देश के कोने-कोने में गए। उन्होंने लोगों से मिलकर राम मंदिर बनाने की बात की और जनता को जोड़ा। उनकी मेहनत और जोशीले भाषणों के कारण ही उन्हें पूरे देश में एक मजबूत पहचान मिली। वह उन संतों में से थे जिन्होंने राम मंदिर के सपने को सच करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दी थी।
डॉ रामविलास दास वेदांती जी राम मंदिर आंदोलन के एक बहुत ही बेबाक और तेज-तर्रार नेता थे। वह अपनी बात खुलकर और जोरदार तरीके से रखते थे। आंदोलन में उनकी बड़ी भूमिका के चलते ही उन्हें राम जन्मभूमि न्यास (ट्रस्ट जो मंदिर का काम देखता है) का सदस्य और बाद में कार्यकारी अध्यक्ष भी बनाया गया।
बाबरी ढाँचा विवाद और उनका दावा
साल 1992 में, जब 6 दिसंबर को बाबरी ढाँचा गिराया गया तो इस मामले में जिन बड़े नेताओं पर केस चला, उनमें वेदांती जी का नाम भी शामिल था। उन्होंने कोर्ट में और बाहर भी हमेशा यह कहा कि उन्होंने कोई गलती नहीं की।
उनका दावा था कि हमने किसी मस्जिद को नहीं तोड़ा, बल्कि जहाँ ढाँचा खड़ा था, वहाँ असल में बहुत पहले राजा विक्रमादित्य ने एक मंदिर बनवाया था। समय के साथ वह मंदिर खंडहर बन चुका था। वेदांती जी ने कहा कि उन्होंने और कारसेवकों ने मिलकर केवल उस पुराने खंडहर को हटाया था, ताकि उसकी जगह पर भव्य राम मंदिर बन सके।
वेदांती ने साफ कहा कि उनका मकसद वहाँ सिर्फ नया मंदिर बनाना था। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने उन्हें, लालकृष्ण आडवाणी और उमा भारती जैसे सभी बड़े नेताओं के साथ बरी कर दिया।
वेदांती जी राम मंदिर को लेकर बहुत उत्साहित थे। उनकी इच्छा थी कि अयोध्या में बनने वाला राम मंदिर इतना ऊँचा हो (करीब 1111 फुट) कि वह सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पड़ोसी देशों जैसे इस्लामाबाद या कोलंबो से भी दिखाई दे। उनका मानना था कि यह मंदिर दुनिया का सबसे भव्य और बड़ा मंदिर होना चाहिए।
संत से सियासत तक का सफर
राम मंदिर आंदोलन में वेदांती जी की पहचान इतनी मजबूत हो गई थी कि उन्होंने राजनीति में भी कदम रखा। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने उन्हें चुनाव लड़ने का मौका दिया।
पहली जीत (1996): वह सबसे पहले मछली शहर (जौनपुर और प्रतापगढ़ के हिस्सों वाली सीट) से लोकसभा चुनाव लड़े। राम मंदिर की वजह से लोगों ने उन्हें भरपूर प्यार दिया और वह चुनाव जीतकर सांसद बन गए, यानी दिल्ली में संसद पहुँच गए।
दूसरी जीत (1998): इसके बाद, उन्होंने प्रतापगढ़ सीट से चुनाव लड़ा। यह सीट ऐसी थी जहाँ बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं के खानदान का दबदबा रहता था, लेकिन वेदांती जी ने कॉन्ग्रेस की उम्मीदवार रत्ना सिंह को हरा दिया। उनकी यह जीत बहुत बड़ी मानी गई, क्योंकि उन्होंने पुरानी राजाओं वाली राजनीति को चुनौती दी थी। वेदांती जी हमेशा कहते थे कि वह अपनी ये जीतें भगवान राम के नाम पर मिली ‘राम लहर’ के कारण ही जीत पाए।
मंदिर का सपना पूरा होते देखा और फिर ली अंतिम सांस
जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया और अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण शुरू हुआ, तो डॉ वेदांती जी बहुत खुश थे। उन्होंने कहा था कि यह सब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कारण ही हो पाया है, जिन्होंने महंत अवैद्यनाथ और रामचंद्र परमहंस जैसे संतों के पुराने सपने को सच कर दिखाया।
वेदांती जी ने अपनी पूरी जिंदगी राम मंदिर के लिए लगा दी थी। यह देश के लिए एक बहुत बड़ी और भावुक बात है कि उन्होंने भव्य राम मंदिर को बनते हुए देख लिया। उनका निधन ऐसे समय में हुआ है, जब राम मंदिर का काम पूरा हो चुका है। इसीलिए, पूरे देश में लोग कह रहे हैं कि ‘वह राम मंदिर देखकर स्वर्ग सिधारे’, यानी उनकी सबसे बड़ी इच्छा पूरी हो गई और वह शांति से दुनिया छोड़कर चले गए।
दिल्ली के रामलीला मैदान में रविवार (14 दिसंबर 2025) को कॉन्ग्रेस की ‘वोट चोरी’ के खिलाफ आयोजित रैली से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक नारे लगाए गए। कॉन्ग्रेस ने नेता और कार्यकर्ताओं ने कैमरे के सामने, माइक पर चिल्लाते हुए खुलकर ‘मोदी, तेरी कब्र खुदेगी’ के नारे लगाए। कॉन्ग्रेस नेतृत्व से उम्मीद थी कि वो अपने नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करेगी और ऐसे नारे लगाने वालों पर सख्ती दिखाएगी लेकिन नतीजा वही हुआ ‘ढाक के तीन पात’।
बीजेपी ने संसद में यह मुद्दा उठाया और कॉन्ग्रेस से माफी की माँग की। प्रियंका गाँधी ने इस पर माफी या आलोचना तो छोड़िए लीपा-पोती ही करनी शुरू कर दी। उन्होंने कहा, “स्टेज से किसी ने भी ऐसी कोई बात नहीं कही। फिर हमें पता चला कि जनता में से किसी ने या किसी कार्यकर्ता ने वह बयान दिया था लेकिन यह साफ नहीं है कि वह कौन था। तो फिर, इस मामले को सदन में क्यों उठाया जा रहा है? वे (सत्ता पक्ष) नहीं चाहते कि सदन चले।”
"No one from the stage said anything like that.
Someone from the public or a worker made that statement.
कॉन्ग्रेस की जिस नेता को जानने से प्रियंका गाँधी इनकार कर रही हैं, जिस नेता के आपत्तिजनक बयान पर वो लीपा-पोती कर रही हैं वो कोई राह चलती महिला या आम कार्यकर्ता नहीं हैं। वो जयपुर महिला कॉन्ग्रेस की जिला अध्यक्ष मंजू लता मीणा हैं। मीणा अपने बयान पर अब भी कायम है और इस बयानबाजी को वो जनता का गुस्सा बता रही हैं। जनता का गुस्सा चुनावों में कितना दिख रहा है ये मीणा और कॉन्ग्रेस पार्टी दोनों को ही स्पष्ट नजर आ रहा होगा, अलग-अलग राज्यों के चुनावी नतीजे इस बात की तस्दीक करते हैं।
वापस लौटते हैं प्रियंका गाँधी पर, राजनीति में ‘शुचिता’ की झंडाबरदार प्रियंका गाँधी ने जिस तरह कॉन्ग्रेस की एक नेता के बयान पर स्पष्ट आलोचना करने से बचने का रवैया अपनाया, वह वाकई गंभीर सवाल खड़े करता है। लोकतंत्र में सत्ता की आलोचना करना, नीतियों का विरोध करना और सरकार से सवाल पूछना विपक्ष का अधिकार है या कहें तो कर्तव्य है। पर किसी निर्वाचित प्रधानमंत्री के लिए ‘कब्र खुदेगी’ जैसे नारे न केवल अमर्यादित हैं बल्कि ‘राजनीतिक हिंसा’ को उकसाने वाले भी हैं।
ऐसे में यदि किसी पार्टी की शीर्ष नेता इस नारेबाजी साफ शब्दों में विरोध जताने से बचती हैं, तो यह संदेश जाता है कि पार्टी भीतर ही भीतर ऐसी भाषा को स्वीकार करती है। खुद को लोकतांत्रिक मूल्यों की पैरोकार दिखाने वाली प्रियंका गाँधी का ऐसे नारों पर कड़ा विरोध ना जताने उनके मूल्यों को सिर्फ दिखावटी बना देता है। गलत का विरोध करना ही राजनीति का पहला नियम क्यों नहीं होना चाहिए? चाहे वो किसी भी खेमे से आए।
कॉन्ग्रेस और उसके नेता अक्सर भाजपा और PM मोदी पर असहिष्णुता, नफरत और विभाजनकारी राजनीति का आरोप लगाते हैं। यदि वही कॉन्ग्रेस अपने नेताओं के हिंसक या अपमानजनक नारों पर चुप्पी साध लेती है तो उसका नैतिक आधार खोखला प्रतीत होता है। जब शीर्ष नेतृत्व कठोर शब्दों की निंदा नहीं करता तो जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को यह संकेत जाता है कि ‘सब जायज है’ लेकिन लोकतंत्र में ‘सब जायज नहीं’ हो सकता है प्रियंका गाँधी जी।
प्रियंका गाँधी सदन में बीजेपी को घेरें, जनहित के मुद्दे उठाएँ सब जरूरी है लेकिन जब बात ऐसे आपत्तिजनक नारों की हो तो बिना किसी हिचक के उसका विरोध भी करें। चुने हुए प्रधानमंत्री की मौत की कामना करना और उस पर लीपा-पोती करना कतई जायज नहीं है। पार्टी के भीतर अनुशासन हो, मर्यादा हो उसके लिए प्रियंका गाँधी जैसे नेताओं को ही बात करनी होगी। चुप्पी कई बार सहमति बन जाती है और यह लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति होती है।
15 दिसंबर, 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जॉर्डन के लिए रवाना हुए, वे 16 दिसंबर से 17 दिसंबर तक इथियोपिया में रहेंगे। 17 दिसंबर से 18 दिसंबर तक ओमान में रहेंगे। उनका यह दौरा अफ्रीका के इंस्टीट्यूशनल कोर को वेस्ट एशिया के स्टेबिलिटी बेल्ट से जोड़ने के लिहाज से काफी अहम है।
व्यापार में मजबूती, ऊर्जा कॉरिडोर को सुरक्षित करना, पार्टनरशिप को बढ़ाना, और डायस्पोरा को जोड़ना है। इस दौरे का सामरिक महत्व काफी है। इसकी कई वजहें हैं- पहला भारत की एक अस्थिर क्षेत्र में राजनीतिक मतभेदों के बावजूद कोऑपरेटिव रिश्ते बनाना, दूसरा अफ्रीकी यूनियन की राजधानी में एक ‘ग्लोबल साउथ’ नैरेटिव बनाना और तीसरा लंबे समय से चली आ रही गल्फ पार्टनरशिप को नया मुकाम देना। व्यापार खास कर रक्षा क्षेत्र और ग्रीन एनर्जी एग्रीमेंट को आगे बढ़ाना है।
जॉर्डन: एक गेटवे स्टेट की यात्रा
जब मोदी 15 दिसंबर को अम्मान पहुँचेंगे, तो वे भारतीय समुदाय से मिलेंगे और किंग अब्दुल्ला II के साथ वन ऑन वन और डेलीगेशन-लेवल की बातचीत करेंगे। अगले दिन, वे किंग के साथ एक इंडिया-जॉर्डन बिज़नेस इवेंट में जाएँगे। क्राउन प्रिंस के साथ पेट्रा की ट्रिप (अगर मौसम ठीक रहा तो) जाएँगे।
यह कल्चरल डिप्लोमेसी है, जो 75 साल पुराने भारत और जॉर्डन के संबंध को मजबूत करेगा। यात्रा के दौरान पीएम मोदी जॉर्डन के राजा अब्दुल्ला द्वितीय के अलावा पीएम जाफर हसन और क्राउन प्रिंस अल हुसैन बिन अब्दुल्ला द्वितीय के साथ भी द्विपक्षीय बातचीत करेंगे। इससे राजनीतिक तौर पर रिश्ते और मजबूत होंगे। पीएम मोदी इस दौरान रक्षा क्षेत्र में साझेदारी पर जोर दे सकते हैं।
आतंकवाद के मुद्दे पर जॉर्डन भारत का समर्थन करता है। इसलिए ये यात्रा क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी काफी अहम है।
ये यात्रा भारत और जॉर्डन के बीच लंबे समय से चले आ रहे मैत्रीपूर्ण और सभ्यतागत संबंधों को और गहरा करने का ऐतिहासिक अवसर है। जॉर्डन भारत का तीसरा सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक है। इस यात्रा का मकसद निवेश, व्यापार को बढ़ाना है। खासतौर पर फर्टिलाइजर और फॉस्फेट की आपूर्ति बेहतर करना है ताकि भारत में फर्टिलाइजर की कमी को पूरा किया जा सके।
जॉर्डन में इंडियन कपड़ों की एंट्री की गुंजाइश ढूँढना बेहद जरूरी है। भारत में टैक्सटाइल इंडस्ट्री को मजबूती देना बेहद आवश्यक है। इससे जुड़ी नौकरियों और मैन्युफैक्चरिंग के लिए एक नए बाजार के रूप में भारत जॉर्डन को देख रहा है।
आज के दौर में कनेक्टिविटी तरक्की के लिए बेहद जरूरी है। जॉर्डन ई-वीजा मूव्स और वीजा ऑन अराइवल/टूरिस्ट फैसिलिटेशन के साथ ट्रैवल को आसान बना रहा है। रॉयल जॉर्डनियन ने अम्मान और मुंबई के बीच डायरेक्ट फ्लाइट्स शुरू की हैं और नई दिल्ली तक इसे विस्तारित करने की योजना है। ये काम ‘रूटीन टाइप’ लग सकते हैं, लेकिन डिप्लोमेसी में ये जरूरी हैं।
MEA ने खास तौर पर सहयोग का जिक्र है, जिसमें अकाबा प्रोसेस जैसे इनिशिएटिव में भारत का होना शामिल है, अप्रैल 2025 के पहलगाम टेरर अटैक के बाद किंग ने जिस तरह से आतंकवाद को लेकर भारत का समर्थन किया, उसकी चर्चा हुई थी। सुरक्षा के क्षेत्र में जॉर्डन का महत्व यह है कि यह एक प्रैक्टिकल रीजनल है जिसके पास पहले से काउंटर टेरर एंगेजमेंट है। यह इसलिए जरूरी है, क्योंकि जॉर्डन में रीजनल और इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म पर भारत के काउंटर टेररिज्म मैसेजिंग के लिए एक सहयोगी के तौर पर काम करने की क्षमता है, खासकर उन जगहों पर जहाँ भारत को खिलाफ नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की जाती है।
भौगोलिक तौर पर जॉर्डन के नजदीक इजराइल-फिलिस्तीन, सीरिया जैसे देश हैं, लेकिन यह इंडिया मिडिल ईस्ट यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) के आइडिया में एक संभावित लैंड-ब्रिज नोड भी है, जिसे आमतौर पर गल्फ के रास्ते भारत को यूरोप से जोड़ने और उत्तरी हिस्से में जॉर्डन से होते हुए आगे बढ़ने के तौर पर बताया जाता है। भारत को कॉरिडोर से जुड़ी सरकारों, खासकर उन सरकारों के साथ लगातार दो-तरफा बातचीत करके कॉरिडोर लॉजिक बनाए रखने से फ़ायदा होता है।
इथियोपिया: अफ्रीका की डिप्लोमैटिक राजधानी और भारत की ग्लोबल साउथ में साख
प्रधानमंत्री अबी अहमद ने मोदी को 16-17 दिसंबर को जॉर्डन से इथियोपिया के सरकारी दौरे पर आने का न्योता दिया था। MEA के मुताबिक, 2011 के बाद यह पहली बार है जब कोई भारतीय प्रधानमंत्री इथियोपिया की यात्रा पर जा रहे हैं। दोनों देशों के बीच बातचीत, भारतीय समुदाय के साथ बातचीत, और एक खास तौर पर हाई प्रोफ़ाइल इवेंट, इथियोपिया की संसद के जॉइंट सेशन में भाषण देना, जैसे कार्यक्रम तय हैं।
इथियोपिया अपनी संस्थागत अहमियत के साथ-साथ अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण रणनीतिक रूप से भी जरूरी है। अफ्रीकन यूनियन का हेडक्वार्टर अदीस अबाबा में है, और भारत का अपना नज़रिया है। अफ्रीका को ग्लोबल गवर्नेंस का को-आर्किटेक्ट मानता है। खासकर तब जब अफ्रीकन यूनियन 2023 में G20 में स्थाई तौर पर शामिल हो गया है।
MEA ब्रीफिंग में खास तौर पर कहा गया है कि इथियोपिया ने बड़े पैमाने पर इकोनॉमिक रिफॉर्म शुरू किए हैं, जिसमें बैंकिंग और कैपिटल मार्केट जैसे जरूरी सेक्टर खोलना शामिल है। भारत इथियोपिया के साथ डेवलपमेंट कोऑपरेशन और इकोनॉमिक एंगेजमेंट को मैच करने की कोशिश कर रहा है। इसके अलावा माइनिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, IT, मैन्युफैक्चरिंग और एग्रीकल्चर में भारत की भागीदारी हो सकती है, जिन सभी पर MEA स्टेट्स द्वारा चर्चा होने की उम्मीद है।
MEA के मुताबिक.इथियोपिया में काम कर रहे 175 से ज़्यादा इंडियन बिज़नेसमैन हैं। इसमें यह भी बताया गया है कि इंडिया दालें और बीन्स खरीदता है, जिनका बाइलेटरल कॉमर्स लगभग USD 550 मिलियन है। इंडिया से इथियोपिया को एक्सपोर्ट किए जाने वाले सामानों में दवाओं का हिस्सा लगभग 40% है। ये खास बातें इसलिए ज़रूरी हैं क्योंकि वे एक ऐसे रिश्ते को दिखाती हैं जो पहले से ही ‘रियल इकॉनमी’, हेल्थ सप्लाई चेन, फ़ूड सिक्योरिटी से जुड़ा है।
इंडिया एनर्जी और क्लाइमेट कोऑपरेशन के एरिया में भी लॉन्ग-टर्म सफलता हासिल कर सकता है। MEA की ब्रीफिंग में इथियोपिया में इंटरनेशनल सोलर अलायंस के शामिल होने, जिसमें अदीस अबाबा यूनिवर्सिटी में सोलर टेक्नोलॉजी एप्लीकेशन रिसोर्स सेंटर (STARC) बनाना और दूसरे सोलर इनिशिएटिव शामिल हैं, पर जोर दिया गया है। भारत का ‘टेक्नोलॉजी ट्रेनिंग और इंस्टीट्यूशन-बिल्डिंग’ मॉडल काफी फायदेमंद है। मौजूदा ग्लोबल क्लाइमेट फाइनेंस के मामले में जहाँ कई डेवलपिंग सरकारें बिना कर्ज़ के बोझ तले दबे हुए क्लीन एनर्जी ग्रोथ चाहती हैं। उनके लिए ये हेडलाइन बनाने वाले मेगा-प्रोजेक्ट्स से ज़्यादा आकर्षक हो सकता है।
आखिर में, लेकिन सबसे ज़रूरी बात, 1 जनवरी, 2024 को BRICS का फुल मेंबर बनने के बाद से इथियोपिया की जियोपॉलिटिकल लेवल बढ़ गई है, जिससे वह एक अहम ग्लोबल साउथ कोऑर्डिनेटिंग फ्रेमवर्क के अंदर आ गया है। भारत भी एक फाउंडिंग मेंबर के तौर पर इसमें शामिल है। इससे भारत को डेवलपमेंट फाइनेंस, पेमेंट आर्किटेक्चर डिस्कशन और गवर्नेंस रिफॉर्म पर साझेदारी करने का मौका मिलेगा। यह खासकर तब सच है जब भारत रिश्ते को ब्लॉक पॉलिटिक्स के बजाय पार्टनरशिप में सावधानी बरते।
ओमान: स्थिर खाड़ी पार्टनर, ट्रेड आर्किटेक्चर और एक डिफेंस सस्टेनेबिलिटी सबप्लॉट
सुल्तान हैथम बिन तारिक के आमंत्रण पर पीएम मोदी का आखिरी पड़ाव 17-18 दिसंबर को ओमान में होगा। MEA ने जोर देकर कहा कि फरवरी 2018 के बाद से यह पीएम मोदी का दूसरा दौरा है और यह डिप्लोमैटिक रिश्तों की 70वीं सालगिरह के मौके पर हो रहा है।
सुल्तान के साथ मीटिंग, बिज़नेस एग्जीक्यूटिव के साथ मीटिंग और इंडियन कम्युनिटी को स्पीच, ये सभी ओमान विज़िट का हिस्सा हैं। खबर है कि कई डॉक्यूमेंट्स पर हस्ताक्षर होने वाले हैं।
यात्रा का मुख्य फोकस व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते यानी इंडिया-ओमान कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (CEPA)को अंतिम रूप देना है। इस समझौते से व्यापार और निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि होने की उम्मीद है। यह टैरिफ शेड्यूल से कहीं ज्यादा होगा। यह एक पॉलिटिकली मॉडरेट और कमर्शियली इंटीग्रेटेड गल्फ देश में सर्विसेज़, इन्वेस्टमेंट और सप्लाई-चेन प्लानिंग के लिए एक स्टेबल फ्रेमवर्क सिक्योर करेगा।
खाड़ी क्षेत्र में ओमान भारत का सबसे पुराना रणनीतिक साझेदार है। यात्रा के दौरान ऊर्जा, रक्षा, सुरक्षा, कनेक्टिविटी और प्रौद्योगिकी जैसे अहम क्षेत्रों में सहयोग को और गहरा करने पर चर्चा होगी।
ये यात्रा पश्चिम एशिया और अफ्रीका में भारत की रणनीतिक उपस्थिति और साख को बढ़ाती है, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता को बढ़ावा मिलेगा।
ओमान की मैरीटाइम लोकेशन और डिफेंस एक्सेस इस देश की उपयोगिता बढ़ाती है। इंडियन नेवी के जहाजों को ऑपरेशन (एंटी-पायरेसी समेत) बढ़ाने और स्ट्रेटेजिक अलायंस को मज़बूत करने में मदद करने के लिए, दुक़म से जुड़े मिलिट्री कोऑपरेशन पर इंडिया-ओमान मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग का 2018 का एनेक्सर पार्लियामेंट में घोषित किया गया था। यह इसलिए जरूरी है, क्योंकि दुकम अरब सागर की तरफ होर्मुज स्ट्रेट के चोक-पॉइंट के बाहर होने की वजह से पश्चिमी हिंद महासागर में ऑपरेशनल फ्लेक्सिबिलिटी और लॉजिस्टिक डेप्थ देता है।
एयरक्राफ्ट सस्टेनेंस एक तीसरा अंडररेटेड स्ट्रैंड है जो बहुत टेक्निकल है फिर भी स्ट्रेटेजिक रूप से ज़रूरी है। पूछताछ के जवाब में, MEA ब्रीफिंग में कहा गया कि ओमान की एयर फोर्स ने अपने जगुआर एयरक्राफ्ट को रिटायर कर दिया है और रिप्लेसमेंट पार्ट्स ट्रांसफर करने के लिए तैयार है, जिनकी डिलीवरी अगले कुछ दिनों में होने की उम्मीद है। यह ‘हेडलाइन डिप्लोमेसी’ नहीं है, लेकिन यह सीधे तौर पर फ्लीट मेंटेनेंस और तैयारी में मदद करता है, यह इस बात का उदाहरण है कि कैसे इंडिया के गल्फ संबंध ज़्यादा से ज़्यादा हार्ड-पावर लॉजिस्टिक बन रहे हैं।
एनर्जी एक साफ़ पिलर बनी हुई है, MEA ब्रीफिंग में चल रहे हाइड्रोकार्बन सहयोग और इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि भारत ओमान से LNG, पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स और कच्चा तेल इंपोर्ट करता है। साथ ही ग्रीन एनर्जी और एनर्जी सिक्योरिटी ऑप्शन भी तलाश रहा है। खास बात यह है कि, कई गल्फ़ इकॉनमी की तरह, ओमान भी हाइड्रोकार्बन से ग्रीन फ्यूल और लॉजिस्टिक्स से होने वाली ग्रोथ में बदलाव को मैनेज कर रहा है। भारत को मौजूदा एनर्जी के लॉन्ग टर्म सप्लायर और भविष्य के बदलाव के लिए लॉन्ग टर्म पार्टनर के तौर पर अपनी जगह बनाने से फ़ायदा होता है।
ओमान में भारतीयों की बड़ी संख्या है। MEA के मुताबिक, ओमान में 675,000 से ज़्यादा भारतीय रहते हैं, जो एक ‘लिविंग ब्रिज’ की तरह काम करते हैं।
तीन देशों के दौरे का महत्व
जब जॉर्डन, इथियोपिया और ओमान को मिलाया जाता है, तो ये तीनों मिलकर ऐसा क्षेत्र बनाते हैं, जो ऐसे इलाकों में है, जहाँ भारत के हित सर्वाधिक हैं
ग्लोबल मार्केट और गवर्नेंस में अफ्रीका की बढ़त, और पश्चिम एशिया की स्थिरता भारत के ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ नैरेटिव को बढ़ाता है। जैसे डेवलपमेंट फंडिंग और सुधार एजेंडा के लिए अलग-अलग प्लेटफॉर्म, मरीन सिक्योरिटी के लिए अलग-अलग लॉजिस्टिक हब, और ट्रेड और फर्टिलाइजर के लिए अलग-अलग पार्टनर।
कनेक्टिविटी के मामले में, यह दौरा ऐसे समय में भारत के कॉरिडोर लॉजिक को सपोर्ट करता है, जब इंटरनेशनल ट्रेड चैनल बाधित और पॉलिटिकल हो गए हैं। IMEC के पीछे का आइडिया, जो भारत को खाड़ी और उससे आगे यूरोप से जोड़ता है और कभी-कभी इसे जॉर्डन से होकर जाते हुए दिखाया जाता है, यह दिखाता है कि भारत पारंपरिक रास्तों की जगह लेने के बजाय भरोसेमंद विकल्प बनाने की कोशिश कर रहा है।
ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर प्रदान करने वाली मनरेगा (MGNREGA) योजना अब खत्म होने जा रही है। केंद्र सरकार ने इसके बदले नया ग्रामीण रोजगार कानून लाने जा रही है। इसका नाम ‘विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) (VB-G RAM G) बिल, 2025’ रखा गया है, जिसे ‘राम जी’ नाम से भी जाना जा रहा है। सरकार इस विधेयक को मौजूदा शीतकालीन सत्र में मंगलवार (16 दिसंबर 2025) को पेश करने जा रही है।
मनरेगा से बेहतर है नया बिल
सरकार का नया ‘राम जी’ बिल मनरेगा योजना की तुलना में एक सुधार है, जो कमजोरियों को दूर करते हुए रोजगार, पारदर्शिता, योजना और जवाबदेही को बढ़ाता है। सरकार की यह योजना विकसित भारत 2047 का विजन है, जिससे ग्रामीण विकास का नया ढाँचा तैयार किया जाएगा।
बिल में रोजगार गारंटी को 100 दिन से बढ़ाकर 125 दिन कर दी जाएगी। बिल में पहली बार रोजगार गारंटी में रोक लगाने का प्रस्ताव है। इसके तहत एक वित्तीय वर्ष में कुल 60 दिनों की के लिए काम नहीं किया जाएगा, जिसमें बुवाई और कटाई के चरम कृषि मौसम शामिल हैं। जानए क्या-क्या है नए बिल में सुधार?
रोजगार की गारंटी: 100 दिन से 125 दिन हुई
मनरेगा के तहत ग्रामीण परिवारों को एक वित्तीय वर्ष में 100 दिनों के मजदूरी रोजगार की कानूनी गारंटी दी जाती थी। इसका मतलब यह था कि अगर कोई परिवार काम माँगता है तो सरकार को 100 दिन तक काम देना ही होगा, लेकिन इससे ज्यादा काम देने की बाध्यता नहीं थी। कई गरीब परिवारों के लिए यह अवधि सालभर की जरूरत के मुकाबले कम पड़ जाती थी।
लेकिन अब नए ‘राम जी’ बिल में सरकार ने रोजगार की गारंटी बढ़ाकर 125 दिन करने का प्रस्ताव रखा है। यह प्रस्ताव सरकार ने ग्रामीण परिवारों का भरोसा जीतने के लिए लाया है।
फंडिंग सिस्टम: केवल केंद्र नहीं राज्य सरकार भी जिम्मेदार
मनरेगा में ज्यादातर खर्च केंद्र सरकार उठाती थी। राज्यों को केवल मजदूरी और सामग्री से जुड़े कुछ हिस्से देने होते थे, लेकिन व्यवहार में राज्य अक्सर केंद्र पर निर्भर रहते थे। जब केंद्र से पैसा देर से आता था तो काम रुक जाता था और मजदूरी भुगतान भी अटक जाता था।
लेकिन ‘राम जी’ बिल में यह व्यवस्था बदलने की बात कही गई है। इसमें केंद्र और राज्य सरकार दोनों मिलकर फंडिंग साझा करेंगी, ताकि राज्यों की भी जवाबदेही बढ़े और वे काम शुरू करने में देरी न करें। सरकार का दावा है कि इससे ‘ऊपर से पैसा नहीं आया’ वाला बहाना कम होगा।
श्रम बजट की जगह अब ‘मानक आवंटन’
मनरेगा में हर साल ‘लेबर बजट’ (श्रम बजट) बनाया जाता था। लेकिन समस्या यह थी कि अगर जमीन पर माँग बढ़ गई और बजट खत्म हो गया तो नए काम रोक दिए जाते थे। पर नए ‘राम जी’ बिल में लेबर बजट की जगह ‘मानक आवंटन’ का प्रस्ताव है। यानी खर्च एक तय ढाँचे के तहत होगा।
सरकार का कहना है कि इससे अनियंत्रित खर्च, फर्जी माँग और गड़बड़ी पर लगाम लगेगी। यह भी साफतौर पर कहा गया है कि राज्यों को असीमित फंड नहीं मिलेगा।
कृषि मौसम में 60 दिनों का विराम
मनरेगा में खेती के मौसम और बिना मौसम के बीच कोई साफ अंतर नहीं रखा गया था। कई जगह शिकायत रहती थी कि सरकारी काम की वजह से खेतों में मजदूर नहीं मिलते, जिससे खेती प्रभावित होती है। इसी के समाधान के लिए ‘राम जी’ बिल में प्रस्ताव है कि कृषि के मौसम के दौरान करीब 60 दिनों तक रोजगार गारंटी में विराम रहेगा।
प्रस्ताव में कहा गया है कि उस समय किसानों और मजदूरों को खेती से खुद रोजगार मिल जाता है, इसीलिए सरकारी काम रोककर खेती को प्राथमिकता दी जाएगी।
निगरानी और जवाबदेही
मनरेगा में फर्जी जॉब कार्ड, अधूरे काम और भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं। निगरानी व्यवस्था कमजोर होने की वजह से कई बार पैसा खर्च तो हुआ, लेकिन जमीन पर नहीं दिखा। नए ‘राम जी’ बिल को एक ज्यादा अनुशासित और जवाबदेह ढाँचे के तौर पर पेश किया जा रहा है, जिसमें काम, समय और भुगतान पर सख्त निगरानी रखने की बात कही गई है। सरकार का कहना है कि इससे योजना पर लोगों का भरोसा बढ़ेगा।
ओडिशा में कॉन्ग्रेस की राजनीति इन दिनों परिवारवाद और पीढ़ीगत टकराव की आग में जल रही है। पूर्व विधायक मोहम्मद मोकीम और उनकी बेटी सोफिया फिरदौस एक तरफ हैं, तो दूसरी तरफ प्रदेश अध्यक्ष भक्त चरण दास और उनका बेटा सागर चरण दास। मोहम्मद मोकीम का सोनिया गाँधी को लिखा पत्र और उसके बाद पार्टी से निष्कासन ने इस जंग को सड़क पर ला दिया है।
सतह पर तो यह पार्टी को बचाने की कोशिश लगती है, लेकिन गहराई में राज्य की कमान हथियाने की होड़ साफ झलकती है। मोकीम ओडिशा में कॉन्ग्रेस के लिए मुस्लिम वोटबैंक के मजबूत स्तंभ हैं, जबकि भक्त चरस दास पिता-पुत्र आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में पैठ रखते हैं। यह लड़ाई न सिर्फ ओडिशा, बल्कि पूरे देश में कॉन्ग्रेस के आंतरिक कलह का आईना है, जहाँ युवा बनाम पुरानी लीडरशिप का मुद्दा बार-बार उभर रहा है।
भ्रष्टाचार के मामले में दोषी पाए जा चुके हैं मोकीम
मोहम्मद मोकीम का नाम ओडिशा की राजनीति में एक ऐसा चेहरा है, जो विवादों और वापसी की कहानियों से भरा पड़ा है। 3 जुलाई 1965 को कटक में जन्मे मोकीम का परिवार स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा रहा है। उनके पूर्वजों ने आजादी की लड़ाई लड़ी और यही विरासत मोकीम ने राजनीति में आगे बढ़ाई। वे लंबे समय से कॉन्ग्रेस के वफादार सिपाही रहे हैं।
साल 2019 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने बाराबाती-कटक सीट से कमाल कर दिया। यह सीट 35 साल बाद कॉन्ग्रेस के पास आई थी। मोकीम ने बीजेडी के दिग्गज को हराकर सबको चौंका दिया। उनकी जीत मुस्लिम और ओडिया समुदायों के बीच पुल का काम करती रही। लेकिन किस्मत ने करवट ली। 2022 में भ्रष्टाचार के एक मामले में ओडिशा हाईकोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराया। मामला राज्य सतर्कता विभाग का था, जिसमें उन्हें तीन साल की सजा मिली। इस वजह से वे 2024 के चुनाव नहीं लड़ सके।
उतार-चढ़ाव भरा रहा मोकीम का राजनीतिक सफर
मोकीम का राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव भरा रहा। 2022 के राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने पार्टी लाइन से हटकर एनडीए की द्रौपदी मुर्मू को वोट दिया, क्योंकि वे स्थानीय मानी जाती थीं। इसकी सजा मिली शो-कॉज नोटिस। फिर 2023 में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष निरंजन पत्तनायक की लीडरशिप पर सवाल उठाए तो 15 जुलाई 2025 को सस्पेंड कर दिए गए। लेकिन 2024 के चुनाव से ठीक पहले, जनवरी में सस्पेंशन रद्द हो गया।
निडर रही है मोकीम की शख्सियत
मोकीम की खासियत उनकी बेबाकी है। वे हमेशा पार्टी के अंदरूनी मुद्दों पर खुलकर बोलते रहे। ओडिशा के मुस्लिम समुदाय में उनकी पकड़ इतनी मजबूत है कि पार्टी को कई बार झुकना पड़ा। निष्कासन के बावजूद वे कहते हैं, “मैंने सच कहा, इसलिए सजा मिली। राहुल जी खुद कहते हैं ‘डरो मत’, तो मैंने हाईकमान को सच्चाई बताई।” उनका पत्र सोनिया को लिखा गया था, जिसमें उन्होंने पार्टी की हारों को आंतरिक फैसलों का नतीजा बताया। बिहार, दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र और कश्मीर की हारों का जिक्र करते हुए कहा, “ये हारें बाहरी दुश्मनों से नहीं, बल्कि गलत फैसलों से हुईं।”
बेटी सोफिया के कंधों पर मोकीम की विरासत संभालने की जिम्मेदारी
मोकीम की राजनीतिक विरासत अब उनकी बेटी सोफिया फिरदौस के कंधों पर है। 1992 में कटक में जन्मीं सोफिया मात्र 32 साल की हैं, लेकिन उन्होंने इतिहास रच दिया। 2024 के चुनाव में वे ओडिशा की पहली मुस्लिम महिला विधायक बनीं। बाराबाती-कटक से लड़ीं और बीजेपी के दिग्गज डॉ. पूर्ण चंद्र महापात्रा को 8,001 वोटों से हरा दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह जैसे बड़े नेताओं की रैलियों के बावजूद सोफिया की जीत ने कॉन्ग्रेस को जिंदा रखा।
बाराबाती-कटक सीट उनके अब्बू की थी और सोफिया ने इसे बखूबी संभाला। उनकी शिक्षा शानदार है। कालिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी (KIIT) से सिविल इंजीनियरिंग में बीटेक किया। 2022 में आईआईएम बैंगलोर से एग्जीक्यूटिव जनरल मैनेजमेंट प्रोग्राम पूरा किया। पढ़ाई के बाद वे रियल एस्टेट में कूद पड़ीं। 24 साल की उम्र में एक रियल एस्टेट कंपनी की डायरेक्टर बनीं। उनकी संपत्ति 3.64 करोड़ रुपए बताई जाती है।
सोफिया की सबसे बड़ी उपलब्धि कन्फेडरेशन ऑफ रियल एस्टेट डेवलपर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (क्रेडाई) के भुवनेश्वर चैप्टर की पहली महिला अध्यक्ष बनना है। वे कहती हैं, “महिलाएँ हर क्षेत्र में आगे आएँ, राजनीति में भी।” सोफिया की राजनीति में एंट्री पिता की सजा के बाद मजबूरी थी, लेकिन उन्होंने इसे अवसर बना लिया। मुस्लिम महिलाओं के लिए उनकी जीत प्रेरणा बनी। वे ओडिया-मुस्लिम समुदाय की आवाज हैं। सोफिया का फोकस विकास पर है। वे रियल एस्टेट से जुड़े मुद्दों पर बोलती हैं, जैसे किफायती आवास और इंफ्रास्ट्रक्चर। पिता की तरह बेबाक हैं, लेकिन ज्यादा सॉफ्ट इमेज।
बेटी के लिए बड़ी भूमिका की तलाश में मोकीम
मोकीम की नजरें बेटी के लिए बड़ी भूमिका पर हैं। वे युवा लीडरशिप के नाम पर सोफिया को आगे धकेलना चाहते हैं। पत्र में उन्होंने प्रियंका गाँधी को सेंट्रल लीडरशिप सौंपने की सिफारिश की और सचिन पायलट, डीके शिवकुमार, ए रेवंथ रेड्डी, शशि थरूर जैसे युवाओं को कोर टीम में शामिल करने को कहा। यह साफ है कि मोकीम परिवार की सियासी दुकान चलाने के लिए जगह तलाश रहे हैं।
भक्त चरण दास और उनके परिवार का पत्ता काटना चाहते हैं मोकीम
दूसरी तरफ भक्त चरण दास हैं, जिनकी जड़ें ओडिशा के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में गहरी हैं। 26 नवंबर 1958 को जन्मे दास का राजनीतिक सफर लंबा है। 1989 में जनता पार्टी से कालाहांडी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा। वीपी सिंह सरकार में डिप्टी मिनिस्टर स्पोर्ट्स एंड यूथ अफेयर्स बने, साथ ही रेलवे में मिनिस्टर ऑफ स्टेट।
भक्त चरण दास 15वीं लोकसभा में कालाहांडी से सांसद रहे। लेकिन हारों का सिलसिला भी जारी रहा है। वो तीन लगातार लोकसभा चुनाव हार चुके हैं, तो 2024 में नरला विधानसभा से लड़कर दूसरे नंबर पर रहे, हालाँकि वोट शेयर 12 फीसदी बढ़ा। फरवरी 2025 में उन्हें ओपीसीसी अध्यक्ष बनाया गया। दास का परिवार राजनीति में सक्रिय है। पत्नी सुंदा दास के साथ दो बेटे हैं- बड़ा क्रांति और छोटा सागर चरण दास। दास की संपत्ति 2.29 करोड़ है, और तीन क्रिमिनल केस लंबित हैं।
कोसल राज्य की माँग को मोकीम ने बनाया दास परिवार के खिलाफ मुद्दा
भक्त चरण दास की सबसे बड़ी कमजोरी उनकी पुरानी विचारधारा मानी जाती है। जेपी मूवमेंट में उन्होंने गाँधी परिवार की आलोचना की थी। कोसल राज्य की माँग का समर्थन किया, जो कॉन्ग्रेस की लाइन से अलग है। मोकीम ने पत्र में यही उठाया और कहा कि दास के बेटे सागर ने भी कोसल मूवमेंट को सपोर्ट किया, जिससे पार्टी में अशांति फैली।
दास की अगुवाई में कॉन्ग्रेस ने नुआपड़ा उपचुनाव में 83,000 वोटों की करारी हार झेली, जो उनके गढ़ का हिस्सा था। मोकीम ने इसे भरोसे की कमी का सबूत बताया। दास ने जवाब में मोकीम को बीजेपी का एजेंट कहा। बोले, “जो लीडरशिप को चुनौती दे, वो बीजेपी जॉइन कर ले।” यह जंग दो परिवारों की है- एक मुस्लिम वोट पर टिकी, दूसरी आदिवासी-ग्रामीण पर।
भक्त चरण दास के छोटे बेटे सागर चरण दास 33 साल के युवा हैं, लेकिन राजनीति में पिता की छाया में आगे बढ़ रहे हैं। हालाँकि वो भी साल 2024 से भवनिपतना विधानसभा से कॉन्ग्रेस विधायक हैं। सागर का फोकस स्थानीय मुद्दों पर है- सिंचाई, शिक्षा, रोजगार। वे सोशल मीडिया पर एक्टिव हैं, जहाँ कालाहांडी के विकास पर पोस्ट करते हैं। सागर की जीत ने पिता को मजबूती दी। लेकिन मोकीम का आरोप है कि सागर का कोसल राज्य का समर्थन पार्टी को नुकसान पहुँचा रहा। सागर चुप हैं, लेकिन पिता के साथ खड़े।
ओडिशा में डायनेस्टी पॉलिटिक्स का क्लासिक उदाहरण
यह डायनेस्टी पॉलिटिक्स का क्लासिक उदाहरण है, जहाँ बेटे विधायक बनकर परिवार की सियासत संभाल रहे। दास पिता-पुत्र की जोड़ी ओपीसीसी (ओडिशा प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी) को कंट्रोल करना चाहती है, जबकि मोकीम-सोफिया युवा चेहरे के बहाने जगह बनाना चाहते हैं।
मोकीम का 8 दिसंबर 2025 का पत्र सोनिया को लिखा गया, जिसमें पार्टी की हालत को ‘चिंताजनक, दिल टूटने वाली और असहनीय’ बताया। उन्होंने छह लगातार हारें गिनाईं- ओडिशा में तीन राष्ट्रीय। बिहार, दिल्ली आदि की हारों को ‘संगठनात्मक दूरी’ का नतीजा कहा। राष्ट्रीय स्तर पर खड़गे की उम्र पर तंज कसा- ’83 साल के खड़गे से युवा (65 फीसदी आबादी 35 से कम) नहीं जुड़ पाते।’
मोकीम की राहुल गाँधी से तीन साल मिलने की कोशिश नाकाम रही, इसे ‘भावनात्मक दूरी’ कहा। अपने पत्र में मोकीम ने युवा नेताओं के पलायन का जिक्र भी किया और ज्योतिरादित्य सिंधिया, जयवीर शेरगिल, मिलिंद देवड़ा, हिमंता बिस्वा सरमा जैसे नेताओं का नाम भी लिया, तो बीजेपी में जाकर अच्छा काम कर रहे हैं।
मोकीम ने अपने पत्र में कॉन्ग्रेस के संगठन सृजन अभियान को फेवरिटिज्म का अड्डा बताते हुए पार्टी में सुधार के लिए ‘ओपन हार्ट सर्जरी’ की माँग कर डाली। उन्होंने पारदर्शिता, मेरिट बेस्ड अपॉइंटमेंट, युवा सशक्तिकरण को पार्टी के लिए अहम बताते हुए प्रियंका गाँधी को लीडरशिप सौंपने की सिफारिश कर डाली। इसके साथ ही पत्र में उन्होंने ओडिशा की कॉन्ग्रेस लीडरशिप यानी सरत पत्तनायक और भक्त चरण दास की जमकर आलोचना भी की।
ओडिशा तक ही सीमित नहीं 2 गुटों की लड़ाई
कॉन्ग्रेस में यह जंग ओडिशा तक सीमित नहीं। पूरे देश में कॉन्ग्रेस आंतरिक कलह से जूझ रही है। कर्नाटक में सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार की जंग 2.5 साल फॉर्मूले पर अटकी है। सिद्धारमैया पूरा टर्म चाहते हैं, शिवकुमार सीएम बनने को बेताब हैं। हाईकमान पर दबाव है, क्योंकि गलत फैसला राजस्थान-छत्तीसगढ़ जैसी हार ला सकता है।
ऐसे ही राजस्थान में 2020 में अशोक गहलोत और सचिन पायलट की लड़ाई ने पार्टी को बर्बाद ही कर डाला। एक तरफ अशोक गहलोत ने पायलट को दबाया, तो इसका फायदा बीजेपी ने उठा लिया। इसी तरह छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव की सत्ता रोटेशन की जंग ने संगठन को कमजोर किया। 2023 चुनाव में हार मिली। मध्य प्रदेश में कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया का टकराव 2018 सरकार गिरा गया। इसमें सिंधिया 22 विधायकों के साथ बीजेपी चले गए।
पंजाब में नवजोत सिद्धू और अमरिंदर सिंह की पुरानी लड़ाई ने पार्टी को तोड़कर रख दिया था। साल 2022 में सिद्धू ने हाईकमान को खुला पत्र लिखा था, फिर भी चुनाव में कॉन्ग्रेस की हार हुई अब सिद्धू vs राजा वडिंग के बीच लड़ाई का दौर चल रहा है। वहीं, हिमाचल में सुखविंदर सिंह सुक्खू और विक्रमादित्य सिंह की खींचतान भी जगजाहिर है।
कॉन्ग्रेस का आंतरिक कलह उसकी सबसे बड़ी कमजोरी
ये उदाहरण दिखाते हैं कि कॉन्ग्रेस का आंतरिक कलह उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। जहाँ एक तरफ बीजेपी मजबूत लीडरशिप दिखाती है, वहीं कॉन्ग्रेस में गुटबाजी हाईकमान को कमजोर कर देती है। ओडिशा में मोकीम का पत्र उसी कड़ी का हिस्सा है। वे कहते हैं, “पार्टी को बचाना मेरा कर्तव्य है।” लेकिन असल में नजर राज्य लीडरशिप पर है।
मोकीम सोफिया को युवा चेहरा बनाकर दास की कुर्सी हिलाना चाहते हैं, तो वहीं दास पिता-पुत्र अपनी पकड़ मजबूत रखना चाहते हैं। यह डायनेस्टी पॉलिटिक्स है, जहाँ परिवार पहले, पार्टी बाद में। वैसे, पार्टी में युवा लीडरशिप की माँग तो सही है, लेकिन बहाने से सत्ता हथियाना गलत परिपाटी की ओर ले जाता है। ऐसे में कॉन्ग्रेस को अगर जीतना है, तो गुटबाजी खत्म करनी होगी। हाईकमान को पारदर्शी फैसले लेने होंगे, वरना ओडिशा जैसी हारें बढ़ेंगी।
अंत में, 15 दिसंबर 2025 को ओपीसीसी ने मोकीम को “एंटी-पार्टी एक्टिविटी” के लिए निष्कासित कर दिया। नोटिस में कहा गया, “एआईसीसी ने मोकीम को प्राइमरी मेंबरशिप से निकालने का प्रस्ताव मंजूर किया।” हालाँकि मोकीम की बेटी सोफिया विधायक हैं, तो उनकी वापसी का रास्ता खुला भी है। पहले भी वो पार्टी में वापसी कर चुके हैं। ऐसे में मोकीम का यह निष्कासन कलह का अंत नहीं, बल्कि शुरुआत लगता है।
बहराइच कोर्ट ने 11 दिसंबर 2025 को राम गोपाल मिश्रा की गोली मारकर हत्या करने वाले सरफराज को फाँसी की सजा दी है। हत्या करने में साथ देने वाले सरफराज के पिता अब्दुल हमीद और उसके दो भाई फहीम और तालिब समेत 9 लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है।
13 अक्टूबर 2024 को दुर्गा प्रतिमा विसर्जन जुलूस के दौरान हुई इस घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। यह फैसला फर्स्ट एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज पवन कुमार शर्मा ने सुनाया। फैसले में कोर्ट ने न सिर्फ आरोपितो के गुनाह या बेगुनाही को दर्ज किया, बल्कि बारी-बारी से यह भी बताया कि कैसे एक धार्मिक जुलूस पर हमला किया गया और उसे बहुत बेरहमी, आतंक और पूरे जिले में लंबे समय तक कानून-व्यवस्था के बिगड़ने की स्थिति में बदल दिया गया। ऑपइंडिया ने इस फैसले को पढ़ा है।
चूंकि राम गोपाल मिश्रा के छत से हरा झंडा फाड़ने के वीडियो थे, इसलिए इस्लामिक कट्टरपंथियों ने हत्या को सही ठहराया था। हालाँकि कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर बहस के लिए यह मान भी लिया जाए कि राम गोपाल ने अब्दुल हमीद के घर पर लगे धार्मिक झंडे को जबरन हटाया था, तो भी ऐसा काम आरोपितो को बेरहम और बर्बर हिंसा करने का कोई हक नहीं दे सकता।
फैसले में इस बात पर जोर दिया गया कि अब्दुल हामिद को दिया गया लाइसेंस वाला हथियार सिर्फ सेल्फ़-डिफेंस के लिए था, इसका इस्तेमाल करना साफ तौर पर कानून का उल्लंघन था। कोर्ट ने कहा कि कानूनी सिस्टम में ऐसी किसी भी मामले की शिकायत करने का रास्ता है, और किसी भी व्यक्ति या ग्रुप को लिंचिंग करके कानून अपने हाथ में लेने का हक नहीं देता है।
राम गोपाल मिश्रा शाम को दुर्गा प्रतिमा विसर्जन जुलूस देखने महाराजगंज बाजार गए थे। उनके साथ उनके भाई हरिमिलन मिश्रा और दूसरे रिश्तेदार और गाँव वाले भी थे। जुलूस में गाँव की कई मूर्तियां ट्रैक्टर और गाड़ियों पर रखी गई थीं और यह तय रास्ते से होते हुए बाजार से गुजरे।
जैसे ही जुलूस महाराजगंज में अब्दुल हमीद के घर के सामने पहुँचा, तो जुलूस के साथ बज रहे DJ के गानों पर एतराज जताया गया। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि इससे पहले गणेश चतुर्थी विसर्जन जुलूस को भी इसी जगह पर रोका गया था। हालाँकि घटना हिंसक नहीं हुई, क्योंकि स्थानीय लोगों के दखल के बाद जुलूस को आगे बढ़ने का रास्ता दे दिया। गवाहों के बयानों के मुताबिक, म्यूजिक बंद करने की माँग की गई थी। जब हिंदुओं ने DJ बंद करने से मना कर दिया, तो DJ का तार खींच दिया गया, जिससे तुरंत झगड़ा शुरू हो गया।
साभार- सेशंस कोर्ट
कोर्ट के मुताबिक, टकराव जल्द ही अफरा-तफरी में बदल गया। छत से जुलूस पर पत्थर, ईंटें और बोतलें फेंकी गईं। जुलूस में दहशत फैल गई, क्योंकि लोग सुरक्षित जगह की ओर भागे। जैसे ही इलाके में डर का माहौल बना, दुकानदारों ने जल्दी से अपनी दुकानें बंद कर दीं।
इस अफरा-तफरी के बीच राम गोपाल मिश्रा को ज़बरदस्ती पकड़कर अब्दुल हमीद के घर के अंदर घसीटा गया। कोर्ट के मुताबिक, कई चश्मदीदों ने बताया कि उन्हें अंदर खींचने के बाद दरवाजा बंद कर दिया गया था। कुछ देर बाद, घर के अंदर से गोलियों की आवाज सुनाई दी।
गवाहों के मुताबिक, एक के बाद एक कई राउंड गोलियाँ चलाई गईं। कोर्ट ने कहा कि इस बात पर कोई शक नहीं है कि फायरिंग घर के अंदर से हुई थी और राम गोपाल मिश्रा को पास से गोली मारी गई थी।
जब राम गोपाल मिश्रा को आखिरकार उनके रिश्तेदारों ने बाहर निकाला, तो वह गंभीर रूप से घायल थे। खास बात यह है कि जब राजन और किशन राम गोपाल को अब्दुल हमीद के घर से बाहर निकालने की कोशिश कर रहे थे, तो उन पर भी दो राउंड गोलियाँ चलाई गई।
राम गोपाल मिश्रा को बहराइच के जिला अस्पताल ले जाया गया। हालाँकि चोट की वजह से उनकी मौत हो गई। इस घटना से इलाके में बहुत ज्यादा डर फैल गया। कोर्ट ने कहा कि महाराजगंज बाजार में पूरी तरह से अफरा-तफरी मच गई। लोग इलाके से भाग गए। घर और दुकानें बंद हो गईं। गवाहों ने माहौल को डर और दहशत का बताया।
Source: Bahraich District Court
भाई हरि मिलन मिश्रा ने कराई थी FIR
इस मामले में FIR राम गोपाल मिश्रा के भाई हरि मिलन मिश्रा की शिकायत पर दर्ज की गई थी। उन्होंने पुलिस से संपर्क किया और एक ऑफिशियल शिकायत दर्ज कराई कि कैसे उनके भाई को अब्दुल हामिद के घर में घसीटा गया और गोली मार दी। अपनी शिकायत में उन्होंने हामिद, उसके बेटों और अन्य को हमलावर बताया। उन्होंने यह भी बताया कि मौके पर कुछ लोग मौजूद थे जिन्हें वह नहीं जानते थे।
ट्रायल के दौरान बचाव पक्ष ने बार-बार FIR की टाइमिंग पर शक जताने की कोशिश की और दावा किया कि यह ‘गलत समय पर’ की गई थी। घटना को ही मनगढ़ंत बताया। हालाँकि कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट का मानना था कि हालात को देखते हुए ये स्वाभाविक था कि हरिमिलन मिश्रा पहले अपने घायल भाई को अस्पताल ले गए, उसके बाद एफआईआर दर्ज कराई।
कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि इस घटना से जिले में अफरा-तफरी मच गई थी। बहराइच में कई दिनों तक इंटरनेट सर्विस बंद कर दी गई थीं। जिले के बाहर से RAF और PAC समेत और पुलिस फोर्स तैनात की गई थी। ऐसे में FIR के फॉर्मल रजिस्ट्रेशन में देरी होना भी था।
कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपित के खिलाफ पूरी जाँच और ट्रायल के दौरान एक जैसे रहे। बचाव पक्ष कथित देरी से पैदा होने वाला कोई भी बड़ा उलटफेर या हेरफेर दिखाने में नाकाम रहा।
राम गोपाल मिश्रा कौन थे ?
हालाँकि जजमेंट मुख्य रूप से केस के तथ्य पर आधारित हैं, लेकिन इसने राम गोपाल मिश्रा को सिर्फ एक आँकड़ा नहीं माना। सजा सुनाते समय कोर्ट ने कहा कि राम गोपाल की शादी घटना से कुछ महीने पहले ही हुई थी। उनकी अचानक और हिंसक मौत ने न सिर्फ एक जिंदगी खत्म कर दी, बल्कि एक पूरे परिवार को तोड़ दिया, जिससे उनकी पत्नी का भविष्य भी प्रभावित हुआ।
कोर्ट ने कहा कि जब राम गोपाल को घर के अंदर घसीटा गया तो वह बिना हथियार के और बेबस थे। जुलूस की अफरा-तफरी के दौरान बाहर जो भी हुआ हो, कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि एक बार जब वह घर के अंदर थे, तो पास से कई राउंड फायरिंग करने की घटना ने सारी हदें पार कर दी।
बचाव पक्ष की शुरुआती कहानी और वीडियो का जिक्र
बहस के दौरान, बचाव पक्ष ने एक अलग कहानी पेश करने की कोशिश की। उन्होंने उन वीडियो का जिक्र किया, जिनमें कथित तौर पर राम गोपाल मिश्रा को अफरा-तफरी के दौरान छत पर चढ़ते या झंडा फाड़ते हुए दिखाया गया था। ये बातें कोर्ट के सामने उकसावे या घटनाओं के एक अलग क्रम का सुझाव देने की कोशिश के तौर पर रखी गईं।
ट्रायल के दौरान बचाव पक्ष ने न सिर्फ हमलावरों की पहचानने, बल्कि राम गोपाल को कैसे मारा गया, इसको लेकर भी बड़ी संख्या में गवाहों से पूछताछ की। फैसलों में काफ़ी जगहों पर उन चश्मदीदों के बयानों को समीक्षा भी की गई, जो दुर्गा प्रतिमा विसर्जन जुलूस के दौरान मौजूद थे और घटना वाले दिन हिंसा को होते हुए देखा था।
हरिमिलन ने अपनी शपथ के साथ गवाही में कोर्ट को बताया कि वह, राम गोपाल, राजन और किशन समेत दूसरे रिश्तेदारों के साथ, मूर्ति विसर्जन देखने के लिए महाराजगंज बाजार गए थे। उसने साफ-साफ कहा कि जब जुलूस वहाँ पहुँचा, तो अब्दुल हमीद, उसके बेटे सरफ़राज़ उर्फ़ रिंकू और फ़हीम, और दूसरे लोग उनके घर के सामने मौजूद थे। उसने बताया कि कैसे राम गोपाल को जबरदस्ती घर के अंदर घसीटा गया।
हरिमिलन ने बताया कि जब उनके भाई को अंदर घसीटा गया, तो दरवाजा बंद कर दिया गया, और उन्होंने अंदर से कई राउंड गोलियों की आवाज सुनी। अचानक हुई गोलीबारी और फैली घबराहट के कारण वह और दूसरे लोग तुरंत बीच-बचाव नहीं कर पाए।
राम गोपाल के चचेरे भाई राजन मिश्रा ने हरिमिलन मिश्रा की गवाही की पुष्टि की। वह भी राम गोपाल को ज़िला अस्पताल ले गए थे, जहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।
इस मामले के एक और चश्मदीद अभिषेक मिश्रा ने सरकारी वकील के केस को और मजबूत किया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि उन्होंने राम गोपाल को जुलूस से घसीटते हुए देखा था और उन्हें घर के अंदर खींचने में कई आरोपित शामिल थे। उन्होंने आगे कहा कि जब राम गोपाल को बाहर लाया गया, तो उनके शरीर के ऊपरी हिस्से और सिर पर गोली लगने के निशान साफ दिख रहे थे।
मामले के एक और चश्मदीद गवाह शशिभूषण अवस्थी ने कोर्ट को बताया कि कैसे DJ का तार खींचा गया, जिससे झगड़ा शुरू हुआ। उन्होंने कोर्ट को बाज़ार में फैले डर के बारे में भी बताया। खास बात यह है कि उन्होंने गवाही दी कि हिंसा सिर्फ फायरिंग तक ही नहीं रुकी, बल्कि जिस तरह से राम गोपाल मिश्रा पर हमला हुआ, उससे पता चलता है कि बहुत ज्यादा क्रूरता हुई।
बचाव पक्ष ने दलील दी कि सभी चश्मदीद गवाह एकतरफा गवाह देने वाले थे, क्योंकि वे उसी गाँव के थे या मरने वाले राम गोपाल के रिश्तेदार थे। तय कानूनी सिद्धांतों पर भरोसा करते हुए, कोर्ट ने माना कि सिर्फ़ रिश्ता होने से कोई गवाह भरोसे के लायक नहीं हो जाता। कोर्ट ने कहा कि पब्लिक जुलूसों के दौरान होने वाली घटनाओं में, यह आम बात है कि वहाँ मौजूद और प्रभावित लोग रिश्तेदार या जान-पहचान वाले होंगे। मायने यह रखता है कि उनकी गवाही एक जैसी, भरोसेमंद और अलग सबूतों से सही है या नहीं।
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में बताया गया गोलियों से हुई मौत
शायद फैसले का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा मेडिकल सबूत था। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में हिंसा का ऐसा लेवल सामने आया जिसे कोर्ट ने बार-बार बेरहम, क्रूर और आत्मा को झकझोरने वाला बताया।
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के मुताबिक, राम गोपाल के शरीर पर बंदूक घुसने के चालीस घाव थे। ये सिर्फ़ एक जगह तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि शरीर के जरूरी हिस्सों में फैले हुए थे। छाती, गर्दन, चेहरे और ऊपरी अंगों पर अंदर घुसने के कई घावों के साथ-साथ बाहर निकलने के भी दो घाव थे। घावों के किनारों पर कालापन दिख रहा था, जिससे पता चलता है कि गोलियां पास से चलाई गई थीं। कोर्ट ने खास तौर पर कहा कि पास से गोली चलाने से गलती से या भटकी हुई गोलियों के लगने की कोई गुंजाइश नहीं रहती।
Source: Bahraich District Cour
मेडिकल जाँच में दोनों पैरों की उंगलियों पर गहरे जलने के निशान मिले। कोर्ट ने बताया कि पैर की उंगलियाँ इतनी जल गई थीं कि नाखून निकल आए थे। आँखों के ऊपर एक कटा हुआ घाव था, जो किसी सामान से हुआ था। अंदर से दोनों फेफड़े क्षतिग्रस्त पाए गए। इनमें कई गड्ढे थे, जिसमें लगभग 2.5 लीटर खून और थक्के थे। दिल में भी खून का थक्का जमा हुआ था। मौत गोली लगने से हुए शॉक और ब्लीडिंग से हुई थी।
कोर्ट ने देखा कि मेडिकल सबूतों ने बचाव पक्ष की इस बात को पूरी तरह से गलत साबित कर दिया कि राम गोपाल को शायद एक बार या अफरा-तफरी के दौरान गलती से गोली लगी होगी। इतने सारे घाव, पास से गोली लगने के निशान, और दूसरी चोटों से यह साबित हो गया कि हमला जानबूझकर किया गया था, लगातार किया गया था, और इसका मकसद मौत पक्की करना था।
बचाव पक्ष की दलीलें बनाम मेडिकल सच्चाई
बचाव पक्ष की एक मुख्य दलील यह थी कि पोस्टमॉर्टम में तलवार या धारदार हथियार से लगी चोटों का साफ तौर पर पता नहीं चला। कोर्ट ने इस दलील पर विचार करते हुए कहा कि कुछ खास तरह की चोटों का न होना
बचाव पक्ष का केस कमजोर नहीं करता, अगर मौत का कारण साफ तौर पर फायरआर्म से लगी चोटों से जुड़ा होता। कोर्ट ने आगे कहा कि भले ही कुछ चोटें किसी कुंद चीज या जलने से लगी हों, लेकिन कई गोलियों के घावों बिना किसी शक के मर्डर साबित करने के लिए काफी थे।
कोर्ट ने डिफेंस के उन दावों पर भी ध्यान दिया कि राम गोपाल छत पर चढ़ गया था या झंडे को हटा दिया था, जिससे किसी अनजान आदमी ने फायरिंग की। कोर्ट ने कहा कि ऐसी दलीलें अंदाज पर आधारित हैं और भरोसेमंद सबूतों का समर्थन नहीं करते हैं।
इससे भी जरूरी बात यह है कि कोर्ट ने माना कि जुलूस के दौरान अफरा-तफरी या उकसावे की बात मानकर भी, किसी बिना हथियार वाले व्यक्ति पर पास से कई राउंड फायरिंग करने को कोई भी वजह या सही नहीं ठहरा सकता।
कोर्ट मौत की सजा के नतीजे पर कैसे पहुँचा
राम गोपाल मिश्रा की हत्या के बाद पुलिस तुरंत एक्शन में आ गई। इस घटना ने न सिर्फ क्रिमिनल जाँच शुरू कर दी थी, बल्कि पूरे जिले में लॉ एंड ऑर्डर इमरजेंसी भी लगा दी थी। इंटरनेट सर्विस रोक दी गई थीं, और फोर्स बुलाई गई थी। पूरा जिला कई दिनों तक कानून व्यवस्था से जुड़ा रहा। इस बैकग्राउंड में, पुलिस ने FIR में नामजद आरोपितों की इंटेंसिव तलाश शुरू की।
जाँच के दौरान, पुलिस टीमों को खास इंटेलिजेंस इनपुट मिले, जिससे पता चला कि कुछ आरोपी नेपाल बॉर्डर की ओर भागने की कोशिश कर रहे थे। पुलिस ने जानकारी पर एक्शन लिया, और आरोपितों को पकड़ने के लिए लोकल पुलिस और SOG यूनिट्स समेत कई टीमें बनाई गईं।
17 अक्टूबर 2024 को ऑफिसर एक आइसक्रीम फैक्ट्री और उससे सटे एक आराम करने की जगह के पास के इलाके में पहुँचे। अब्दुल हामिद और उसके बेटों सरफराज, फहीम और तालिब समेत चार आरोपितों को पकड़ लिया गया। पूछताछ के दौरान, आरोपितों ने पुलिस को हत्या में इस्तेमाल हथियार के बारे में बताया, जो अब्दुल हमीद की लाइसेंसी 12-बोर SBBL गन थी। इसे नहर पुल के पास छिपाया गया था। जानकारी के आधार पर एक रिकवरी ऑपरेशन की योजना बनाई गई।
जब पुलिस सरफराज और तालिब को हथियार बरामद करने के लिए ले गई, तो उन्होंने भागने की कोशिश की। उन्होंने पुलिस वालों को धक्का दिया, छूट गए, और छिपे हुए हथियार से पुलिस टीम पर फायरिंग की। पुलिस ने खुद के बचाव में जवाबी कार्रवाई की, और उनके पैरों में गोली लगी। मौके से पुलिस ने गन, बैरल में फँसा एक फायर किया हुआ कारतूस, और एक जिंदा कारतूस बरामद किया।
कोर्ट ने कहा कि फोरेंसिक साइंस लैब ने बाद में कन्फर्म किया कि राम गोपाल मिश्रा के शरीर से मिली गोलियां उसी हथियार से चलाई गई थीं। फैसले के मुताबिक, इस रिकवरी ने आरोपितों को सीधे हत्या से जोड़ा और गोली के सोर्स के बारे में किसी भी शक को खत्म कर दिया।
कोर्ट का गैर-कानूनी जमावड़े और एक जैसे मकसद का आकलन
फैसले में कोर्ट ने समीक्षा किया कि क्या आरोपी ने गैर-कानूनी जमावड़े का हिस्सा बनकर काम किया और क्या मर्डर एक जैसे मकसद को पूरा करने के लिए किया गया था। कोर्ट ने कहा कि जुलूस पर एतराज, DJ का तार खींचना, पत्थरबाज़ी, राम गोपाल को घर के अंदर घसीटना, कई राउंड फायरिंग, और बाद में एक साथ भागने की कोशिशें, इन सबने घटनाओं का एक लगातार सिलसिला बनाया।
कोर्ट ने बचाव पक्ष की इस दलील को खारिज कर दिया कि यह घटना अचानक हुई थी या किसी एक व्यक्ति का अकेला काम था। कोर्ट ने माना कि सबूतों से पता चलता है कि कई आरोपितों ने मिलकर काम किया और हिस्सा लिया, भले ही हर किसी की सही भूमिका अलग-अलग थी।
आरोपी को सजा सुनाते हुए, कोर्ट ने माना कि हत्या के तरीके से मौत पक्की करने का ‘कोल्ड-ब्लडेड’ इरादा पता चलता है। जरूरी अंगों पर बार-बार गोली चलाना, क्रूरता के और काम, और जिस माहौल में हत्या की गई, इन सब बातों को देखते हुए कोर्ट इस नतीजे पर पहुँचा कि सरफराज का रोल ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ कैटेगरी में आता है और उसे मौत की सजा दी गई।
सजा के नियमों पर बात करते हुए कोर्ट ने सोशल ऑर्डर बनाए रखने में सजा के रोल पर क्लासिकल ज्यूरिसप्रूडेंशियल सोच का भी जिक्र किया। कोर्ट ने मनुस्मृति का जिक्र करते हुए इस बात पर जोर दिया कि सजा न्याय और सोशल बैलेंस बनाए रखने के लिए ज़रूरी है।
कोर्ट ने यह लाइन कोट की, ‘दंड शास्ति प्रजाः सर्वा दंड आवभाभिरक्षती। दंड सुपतेश जागर्ति, दंड धर्म विद्वरध॥’ इसका मतलब है “सजा सभी जीवों पर राज करती है; सजा ही उनकी रक्षा करती है; सज़ा तब जागती है जब सब सो रहे होते हैं, समझदार लोग सजा को ही कानून मानते हैं”।
कोर्ट का गैर-कानूनी जमावड़े और एक जैसे मकसद का आकलन
कोर्ट ने फैसले में इस बात की भी समीक्षा की कि क्या आरोपित ने गैर-कानूनी जमावड़े का हिस्सा बनकर काम किया और क्या मर्डर एक जैसे मकसद को पूरा करने के लिए किया गया था। कोर्ट ने कहा कि जुलूस पर एतराज़, DJ का तार खींचना, पत्थरबाज़ी, राम गोपाल को घर के अंदर घसीटना, कई राउंड फायरिंग, और बाद में एक साथ भागने की कोशिशें, इन सबने घटनाओं का एक लगातार सिलसिला बनाया।
कोर्ट ने बचाव पक्ष की इस दलील को खारिज कर दिया कि यह घटना अचानक हुई थी या किसी एक व्यक्ति का अकेला काम था। कोर्ट ने माना कि सबूतों से पता चलता है कि कई आरोपितों ने मिलकर काम किया और हिस्सा लिया, भले ही हर किसी की सही भूमिका अलग-अलग थी।
‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ मामला
आरोपी को सज़ा सुनाते हुए, कोर्ट ने माना कि हत्या के तरीके से मौत पक्की करने का “कोल्ड-ब्लडेड” इरादा पता चलता है। ज़रूरी अंगों पर बार-बार गोली चलाना, क्रूरता के और काम, और जिस माहौल में हत्या की गई, इन सब बातों को देखते हुए कोर्ट इस नतीजे पर पहुँचा कि सरफराज का रोल ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ कैटेगरी में आता है और उसे मौत की सजा दी गई।
कोर्ट ने मनुस्मृति का ज़िक्र करते हुए इस बात पर जोर दिया कि सजा न्याय और सोशल बैलेंस बनाए रखने के लिए जरूरी है।
कोर्ट ने यह लाइन कोट की, “दंड शास्ति प्रजाः सर्वा दंड आवभाभिरक्षती। दंड सुपतेश जागर्ति, दंड धर्म विद्वरध॥”, जिसका मतलब है ‘सजा सभी जीवों पर राज करती है; सज़ा ही उनकी रक्षा करती है; सजा तब जागती है जब सब सो रहे होते हैं, समझदार लोग सजा को ही कानून मानते हैं।’
कोर्ट ने आयत का हवाला देते हुए कहा कि सज़ा समाज को अनुशासित करती है, बेगुनाहों की रक्षा करती है, और तब भी रोकती है जब लोग कानून तोड़ने की कोशिश करते हैं। कोर्ट ने कहा कि मनुस्मृति में बताए गए सजा के कॉन्सेप्ट को बदला नहीं माना है, बल्कि इसे अराजकता और नैतिक पतन को रोकने के लिए शासन का एक जरूरी तरीका माना गया है।
बहराइच हिंसा के संदर्भ में, कोर्ट ने माना कि इतने क्रूर अपराध के लिए सही सज़ा न देने से न्याय व्यवस्था में लोगों का भरोसा कम होगा और हिंसा के और कामों को बढ़ावा मिलेगा।
कोर्ट का निर्देश और 10 लोगों को सजा
कोर्ट ने सरफराज को हत्या का दोषी पाया और उसे फाँसी की सज़ा सुनाई, जबकि अब्दुल हामिद और कई दूसरे आरोपितों को भारतीय न्याय संहिता और आर्म्स एक्ट के अलग-अलग नियमों के तहत उम्रकैद के साथ-साथ कड़ी सज़ा और जुर्माने की सज़ा सुनाई गई। कुछ आरोपितों को बरी कर दिया गया क्योंकि कोर्ट ने पाया कि उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं थे।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि सभी सजाएँ एक साथ चलेंगी और वारंट तैयार करने के आदेश जारी किए। मौत की सज़ा के मामले में, कोर्ट ने आदेश दिया कि रिकॉर्ड को कन्फर्मेशन के लिए हाई कोर्ट भेजा जाए, जैसा कि कानून के तहत जरूरी है।
मौत की सजा, उम्रकैद और सश्रम कारावास
सरफराज को मौत की सज़ा के साथ-साथ कुल आठ साल की सश्रम कारावास और 1,30,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। अब्दुल हामिद को 1,81,000 रुपये के जुर्माने के साथ उम्रकैद की सजा सुनाई गई। तालिब, फ़हीम, सैफ़ अली, जावेद ख़ान, मोहम्मद जिशान, शोएब ख़ान, ननकऊ और मारूफ़ अली को भी उम्रकैद और 1,50,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया।
कोर्ट ने माना कि भले ही उनकी भूमिकाएँ अलग-अलग थीं, लेकिन गैर-कानूनी तरीके से इकट्ठा होने में उनकी भागीदारी, जिसके कारण हत्या हुई, बिना किसी शक के साबित हुई। खुर्शीद, शकील अहमद और मोहम्मद अफ़ज़ल को बरी कर दिया गया, क्योंकि प्रॉसिक्यूशन क्राइम में उनकी भूमिका को बिना किसी शक के साबित नहीं कर सका। दोषी लोग लागू प्रोविज़न के तहत तब तक ज्यूडिशियल कस्टडी में रहेंगे जब तक इलाहाबाद हाई कोर्ट सज़ा को कन्फर्म या कम नहीं कर देता।
राम गोपाल मिश्रा के मर्डर केस में आया फ़ैसला इस बात की कड़ी याद दिलाता है कि उकसावा, भले ही उसे धार्मिक बताया जाए, किसी को भी मर्डर जैसा बड़ा कदम उठाने का हक नहीं दे सकता। कोर्ट ने साफ किया कि भले ही राम गोपाल मिश्रा ने बचाव पक्ष के आरोप के मुताबिक धार्मिक झंडा हटाया या छुआ हो।
ऐसे काम को कभी भी हत्या के लिए उकसावा नहीं माना जा सकता। फैसले में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि कानून ऐसे किसी भी काम के लिए साफ़ कानूनी उपाय देता है, न कि हिंसक बदले का लाइसेंस। सिर्फ़ ‘आत्मरक्षा’ के नाम पर लाइसेंसी बंदूक का गलत इस्तेमाल करके आरोपी ने हर कानूनी हद पार कर दी, और एक छोटे से झगड़े को गैर-कानूनी हत्या में बदल दिया।
(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है, इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
देशभर के मीडिया संस्थानों का संगठन प्रेस क्लब ऑफ इंडिया (PCI) को अपना नया अध्यक्ष मिल गया है। इतिहास में पहली बार PCI की महिला अध्यक्ष के तौर पर संगीता बरुआ पिशारोटी चुनी गई हैं। उन्होंने 1019 वोटों से जीत दर्ज की है। इससे पहले भी वे साल 2024 में PCI के उपाध्यक्ष के तौर पर चुनी गई थीं।
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संगीता बरुआ का पत्रकारिता करियर
संगीता बरुआ मूलरूप से असम के गुवाहाटी की रहने वाली हैं। असम के ही गोलाघाट से उन्होंने पढ़ाई पूरी की। फिर 1996 में यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया (UNI) से पत्रकारिता की यात्रा शुरू की। उन्होंने ‘द हिंदू’ जैसे कई अंग्रेजी अखबारों में रिपोर्टिंग भी की है। साल 2017 में रमनाथ गोयनका एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म अवार्ड भी जीता।
बाद में संगीता बरुआ वामपंथी पोर्टल ‘द वायर’ से बतौर ‘नेशनल अफेयर्स एडिटर’ जुड़ीं, जहाँ से उनकी पहचान एक सक्रिय और राष्ट्रीय स्तर की पत्रकार के रूप में बनी।
जब ‘द वायर’ में रहकर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर उठाए सवाल
प्रेस क्लब की नई अध्यक्ष संगीता बरुआ ने ‘द वायर’ से जुड़े रहते हुए उनके प्रोपेगेंडा में खूब हाथ बटाया। उनके लिखे गए कई आर्टिकल्स केंद्र और असम की बीजेपी सरकार के विरोधी-भाषी रहे हैं। उन्होंने अपने लेखों में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ नाम पर सवाल उठाने के साथ-साथ असम को मुस्लिम-विरोधी सरकार बताकर घेरने की खूब कोशिश की है।
संगीता बरुआ ने पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में शुरू हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के नाम पर आपत्ति जताई। उनके लेख– ‘ऑपरेशन सिंदूर’ नाम की बारीकी से जाँच क्यों जरूरी है? में साफतौर पर सरकार की नीयत पर शक खड़ा करने की कोशिश है।
द वायर का लेख
संगीता बरुआ लिखती हैं कि सैन्य ऑपरेशन का नाम अगर सांस्कृतिक या भावनात्मक है, तो वह अपनेआप में ‘राजनीतिक प्रोपेगेंडा’ बन जाता है। लेख में यह भी कहा गया कि महिलाओं अधिकारियों को प्रेस ब्रीफिंग में आगे रखना ‘रणनीति’ का हिस्सा था। यह तर्क अपने आप में महिला अधिकारियों की भूमिका को कमतर आंकने वाला और अपमानजनक है।
इसी तरह के एक लेख में संगीता बरुआ ने असम सरकार की कार्रवाई को मुस्लिम-विरोधी बताकर सवाल उठाया है। उनके लेख– ‘असम सरकार की हालिया कार्रवाइयाँ 1965 में राज्य में देखी गई मुस्लिम-विरोधी भावना के समान है’ में लोगों को सरकार के खिलाफ करता है और मौजूदा सरकार की कार्रवाई से डर पैदा करने की कोशिश करता है।
द वायर का लेख
संगीता बरुआ यह मानकर लिखती हैं कि अवैध घुसपैठ, भूमि अतिक्रमण और पहचान से जुड़े मुद्दों पर सरकारी कार्रवाई करना अपनेआप में सांप्रदायिक कदम है।
वामपंथी सोच और निष्पक्ष पत्रकारिता की मसीहा
नवनिर्वाचित अध्यक्ष संगीता बरुआ का नाम वामपंथी पोर्टल ‘द वायर’ से जुड़ा रहा है। उनके कई लेख और अपनाया गया नजरिया यह संकेत देता है कि उनकी सोच एकतरफा और वैचारिक रूप से पूर्वाग्रह से ग्रस्त रही है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की अध्यक्ष के रूप में सभी पत्रकारों की आवाज बन पाएँगी या फिर वही पुराना लेफ्ट-लिबर एजेंडा आगे बढ़ाया जाएगा। पत्रकारों के हितों की रक्षा करने के लिए अध्यक्ष का निष्पक्ष होना बेहद जरूरी है, न कि किसी खास विचारधारा का प्रवक्ता बनना।
ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में बीते रविवार (14 दिसंबर 2025) को पाकिस्तानी मूल के नवीद अकरम (24) और उसके अब्बू साजिद अकरम (50) ने यहूदियों को निशाना बनाते हुए गोलीबारी की और 16 लोगों की जान ले ली। मकसद, मकसद वही था जो अक्सर ऐसे आतंकियों का होता है, लोगों में दहशत फैलाना और दिखाना कि वो सबसे ताकतवर हैं।
जब भी कोई मजहबी उन्माद के नाम पर कत्लेआम करता है तो उसके नए नई-नई शब्दावलियाँ गढ़ दी जाती हैं। कभी उसे मानसिक बीमार बताया जाता है तो कभी पीड़ित तो कभी हेडमास्टर का बेटा। ऐसी ही कोशिश अब ‘द वायर’ की प्रोपेगेंडाबाज पत्रकार आरफा खानम शेरवानी ने शुरू की है। उसने इन आतंकियों को ‘इस्लाम के नाम का गलत इस्तेमाल’ करने वाला बताया है।
CAA विरोधी प्रदर्शनों के दौरान आरफा ने मुस्लिमों से कहा था, “हम अपनी विचारधारा से समझौता नहीं कर रहे बल्कि अपने तरीके और स्ट्रेटेजी बदल रहे हैं।” आरफा खानम की तकरीर सुनने के बाद मुस्लिमों ने अपनी ‘स्ट्रेटेजी’ कितनी बदली इसका कोई स्पष्ट उदाहरण नहीं है लेकिन इन लोगों के हमलों से मजहब को बचाने के लिए आरफा ने अपनी ‘स्ट्रेटेजी’ जरूर बदल ली है। अब वो ‘इस्लामिस्ट’ शब्द लेकर आई हैं।
सिडनी हमले के कुछ दी देर बाद आरफा ने ‘X’ पर एक पोस्ट किया। आरफा ने लिखा, “बोंडी बीच पर हुआ हमला एक शांतिपूर्ण यहूदी सभा को निशाना बनाकर किया गया इस्लामी (Islamist) आतंकी हमला है। इसमें कोई भ्रम या दो राय नहीं है। यह इंसानियत के खिलाफ नफरत से भरा एक कायर और बर्बर कृत्य है।”
The Bondi Beach attack is Islamist terrorist violence targeting a peaceful Jewish gathering. No ambiguity. A cowardly and barbaric act of hatred against humanity.
आरफा की इस बात पर उनकी विचारधारा के लोग ही भड़क गए। मोहम्मद जुनैद नाम के एक यूजर ने लिखा, “घटना निंदनीय है लेकिन इस्लाम का दहशतगर्दी से कोई वास्ता नहीं है। बहन Islamist हटाएगीं तो अच्छा रहेगा।” इस पर आरफा ने सफाई देते हुए कहा, “भाई गौर से पढ़िए ‘इस्लामिक’ नहीं ‘इस्लामिस्ट’ है। यानि इस्लाम के नाम का गलत इस्तेमाल। अरबी नाम वाले कुछ लोग धर्म को हाइजैक और बदनाम करना चाहते हैं अपने नापाक इरादों के लिए।”
भाई गौर से पढ़िये ‘इस्लामिक’ नहीं ‘इस्लामिस्ट’ है। यानि इस्लाम के नाम का ग़लत इस्तेमाल।अरबी नाम वाले कुछ लोग धर्म को हाइजैक और बदनाम करना चाहते हैं अपने नापाक इरादों के लिये।
एक अन्य X पोस्ट में आरफा ने लिखा, “गलत पढ़ रहे हैं। इस्लामिक नहीं इस्लामिस्ट। इतना ही फर्क है जितना जमीन और आसमान में।” इन सब चर्चाओं, नामों के जरिए असल कोशिश होती है उस विचार को छिपाने की जिससे प्रेरित होकर नवीद या साजिद जैसे शख्स आतंकी बनते हैं। क्या है उसकी विचारधारा, वो ISIS से प्रेरित था, ISIS यानी इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक ऐंड सीरिया। यह संगठन किसके नाम पर चलता है और क्या चाहता है, ये किसी से छिपा नहीं है। ISIS ‘खिलाफत’ स्थापित करना चहाता है और पूरी दुनिया में इस्लामी शासन चाहता है।
ISIS जैसे आतंकी समूहों की भरमार है, लश्कर-ए-तैयबा से लेकर जैश-ए-मोहम्मद और हरकत-उल-मुजाहिदीन तक दुनिया के इन तमाम आतंकी संगठनों के नाम भर का अर्थ ही अगर पता कर लिया जाए तो समझ आ जाएगा कि आतंक की असल विचारधारा कहाँ से आती है। अमेरिका में आतंकी हमला हो, दिल्ली में हो या सिडनी में हो, हर हमले के पीछे एक ही मजहबी विचार प्रेरित लोग क्यों मिलते हैं?
नए-नए शब्दों की आड़ में ‘आतंक के मजहब’ को वॉइटवॉश करने की कोशिशें लंबे समय तक चलती रही हैं। ‘इस्लामिक कट्टरता’ को नए शब्द गढ़ कर बचाने की आरफा जैसे ‘बौद्धिक जिहादियों’ की कोशिशें दुनिया देख रही है लेकिन सच क्या है ये किसी से छिपा नहीं है। ‘अल्लाह-हू-अकबर’ कहकर जब हमला किया जाता है तो उन आतंकियों की विचारधारा स्पष्ट नजर आती है।
हर आतंकी हमले का पैटर्न एक जैसा होता है। कोई भी आतंकी हमला आप उठाकर देखिए वही ट्रेनिंग, वही विचारधारा और वही ‘पाक जंग’ के नाम पर खुद को मिटाने को तैयार जिहादी आपको नजर आएँगे। यह आतंक किसी सामाजिक असमानता, गरीबी, भूख, रोजगार की कमी से नहीं बल्कि महजबी कट्टरता की फैक्ट्री से निकलता है, जहाँ युवाओं को यह सिखाया जाता है कि हिंसा ही खुदा की इबादत है और हत्या या मौत जन्नत का शॉर्टकट है।
दुनिया की तथाकथित उदार लॉबी वर्षों से नाम बदलकर सच ढकने में लगी रही। विचारधारा से जुड़े लोगों ने आतंकी संगठनों और आतंकियों को पैसे से लेकर संसाधन तक सब मुहैया कराए। कभी अच्छे आतंकवादी-बुरे आतंकवादी का नाम देकर तो कभी अपने वैचारिक एजेंडे के लिए जिहादी समर्थक चुप्पियाँ ओढ़े बैठे रहे और कट्टरता हर सीमा को पार कर अब दुनिया भर में खून-खराबा कर रही है।
अब समय आ गया है कि आतंक को बचाने के लिए किए जा रहे बौद्धिक पाखंड की परतें एक-एक कर उतारी जाएँ। आतंक को सिर्फ घटना नहीं बल्कि एक सोच, एक वैचारिक बीमारी के रूप में पहचाना जाए। जहाँ से वो पैदा हुआ है, उस विचार का नाम लेकर चुनौती दी जाए।
आरफा जैसे ‘बौद्धिक जिहादी’ जो कलम और नैरेटिव के सहारे ‘इस्लामी कट्टरता’ को जायज ठहराने की कोशिश करते हैं, उन्हें बेनकाब करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है। क्योंकि जब विचारों का जहर फैलाया जाता है तो उसकी कीमत निर्दोष लोग अपनी जान देकर चुकाते हैं। आतंक के खिलाफ लड़ाई तभी जीती जाएगी जब उसकी ‘मजहबी रीढ़’ तोड़ी जाएगी और उसे बचाने वालों को भी उसी कठघरे में खड़ा किया जाएगा, जहाँ आतंकवाद खड़ा है।