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बुर्का हटाने पर बवाल, न पहनने पर सीधे हत्या: इस्लामी कट्टरपंथियों को नहीं है मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों से सरोकार, वरना ‘ताहिरा’ के मर्डर पर क्यों चुप होती जमात?

भारत में बुर्के और हिजाब को लेकर छिड़ी ताजा बहस ने एक बार फिर समाज के दोहरेपन को उजागर कर दिया है। एक तरफ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा एक महिला डॉक्टर का हिजाब हटाने पर बवाल मचा है, जहाँ पाकिस्तानी डॉन से लेकर देश के तमाम इस्लामी संगठन इसे ‘सम्मान’ की लड़ाई बताकर धमकी दे रहे हैं। लेकिन विडंबना देखिए, ठीक इसी समय उत्तर प्रदेश के शामली से एक रूहँकपा देने वाली खबर आती है, जहाँ एक शौहर ने अपनी बीवी और दो मासूम बच्चों को सिर्फ इसलिए मार डाला क्योंकि महिला बिना बुर्के के अपने मायके चली गई थी।

हैरानी की बात यह है कि नीतीश कुमार के मुद्दे पर आसमान सिर पर उठाने वाले कट्टरपंथी और ‘नारीवादी’ सुर, शामली की उस बेगुनाह माँ और बच्चों की मौत पर पूरी तरह खामोश हैं। यह दोहरा रवैया साफ करता है कि इस देश में मुस्लिम महिलाओं के ‘अधिकार’ क्या होंगे, यह वो खुद नहीं बल्कि कट्टरपंथी जमात तय करती है। जहाँ ईरान जैसे देशों में महिलाएँ हिजाब की बंदिशों से आजादी के लिए जान दे रही हैं, वहीं भारत में बेंगलुरु से लेकर पटना तक, उसी हिजाब को ‘अनिवार्यता’ बनाने के लिए छात्राओं को मोहरा बनाकर सड़कों पर उतारा जा रहा है।

चुनिंदा नारीवाद: जब ‘एजेंडा’ देखकर बदल जाती है संवेदना

भारत में बुर्का विवाद पर होने वाली चर्चा अक्सर ‘सुविधाजनक राजनीति’ की भेंट चढ़ जाती है। यहाँ खुद को नारीवादी (Feminist) और उदारवादी कहने वाले लोगों का एक ऐसा वर्ग है, जिसका रुख घटना के पात्रों को देखकर बदल जाता है। जब नीतीश कुमार जैसे नेता किसी महिला का हिजाब खींचते हैं, तो यही लोग इसे ‘अस्मिता’ और ‘सम्मान’ की लड़ाई बना देते हैं। बॉलीवुड हस्तियाँ वीडियो जारी कर इसे इस्लाम का अपमान बताती हैं और मुख्यमंत्री से इस्तीफे की माँग करती हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के शामली जैसे मामले में ये ‘प्रगतिशील’ स्वर अचानक खामोश हो जाते हैं।

यह मौन बहुत खतरनाक है। यह दर्शाता है कि इन लोगों के लिए ‘महिला अधिकार’ केवल एक राजनीतिक हथियार है। जब कट्टरपंथ की वजह से किसी मुस्लिम महिला की जान जाती है, तो ये लोग इसे ‘मजहबी मामला’ कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं, लेकिन जब किसी गैर-मुस्लिम नेता से गलती होती है, तो इसे ‘सांप्रदायिक एजेंडा’ बना दिया जाता है। शामली की घटना, जहाँ शौहर फारुख ने अपनी बीवी ताहिरा और दो मासूम बेटियों की हत्या कर उन्हें सेफ्टी टैंक में दबा दिया क्योंकि बीवी बुर्का नहीं पहनी थी।

इसके साथ ही, बुर्के की आड़ में कट्टरपंथी सोच एक ऐसा समाज रच रही है जहाँ महिलाओं की पहचान केवल उनके पहनावे तक सीमित कर दी गई है। कट्टरपंथी तत्व बुर्के को ‘सुरक्षा’ का नाम देते हैं, लेकिन हकीकत में यह नियंत्रण का एक माध्यम है। बुर्के की आड़ में कई बार ऐसी आपराधिक घटनाओं को अंजाम दिया जाता है जहाँ अपराधी की पहचान करना नामुमकिन हो जाता है। चाहे वह मतदान केंद्रों पर फर्जी वोटिंग की कोशिश हो या संदिग्ध गतिविधियों में शामिल होना, बुर्का एक सुरक्षा कवच के बजाय एक ढाल की तरह इस्तेमाल होने लगा है। जब तक समाज इस कट्टरपंथी सोच और नारीवाद के दोहरे मापदंडों को नहीं पहचानेगा, तब तक नुसरत परवीन जैसी महिलाएँ राजनीति का मोहरा बनती रहेंगी और शामली जैसी महिलाएँ कट्टरपंथ की भेंट चढ़ती रहेंगी।

दुनिया में क्यों बढ़ रही है बुर्का बैन की माँग?

दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बुर्का और नकाब को लेकर बहस तेज होती जा रही है। भारत में इसे कई बार महिला अधिकार और पसंद से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन कई विकसित देशों में इसे बिल्कुल अलग नजरिए से देखा जा रहा है। वहाँ बुर्का को महिलाओं पर दबाव का प्रतीक और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा माना जा रहा है। यही वजह है कि यूरोप और अन्य देशों में बुर्का बैन की माँग लगातार बढ़ रही है।

यूरोप में बुर्का पर रोक की लहर- यूरोप के कई देशों ने बीते कुछ सालों में बुर्का और नकाब पर सख्त कदम उठाए हैं। हाल ही में स्वीडन की उप प्रधानमंत्री एब्बा बुश ने सार्वजनिक जगहों पर बुर्का और नकाब पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की बात कही। उन्होंने साफ कहा कि यह महिलाओं के लिए एक तरह का उत्पीड़न है, जिसे सहन नहीं किया जाना चाहिए।

फ्रांस 2011 में ऐसा पहला देश बना, जिसने सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा ढकने वाले कपड़ों पर पूरी तरह रोक लगा दी। इसके बाद बेल्जियम, ऑस्ट्रिया, डेनमार्क और नीदरलैंड जैसे देशों ने भी इसी तरह के कानून बनाए। इन देशों का कहना है कि खुले समाज में लोगों को एक-दूसरे को पहचानने का अधिकार होना चाहिए।

बुर्का बैन के पीछे सबसे बड़ा कारण सुरक्षा को बताया गया। यूरोपीय देशों की सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि चेहरा ढकने से किसी व्यक्ति की पहचान करना मुश्किल हो जाता है। इससे अपराध और आतंकी गतिविधियों को छिपने का मौका मिल सकता है।

इसी वजह से चीन के शिंजियांग प्रांत और श्रीलंका जैसे देशों ने भी बम धमाकों और आतंकी हमलों के बाद सार्वजनिक जगहों पर लंबी दाढ़ी और बुर्का पहनने पर पाबंदी लगाई। सरकारों का कहना है कि सुरक्षा के मामले में कोई समझौता नहीं किया जा सकता।

यूरोप में बुर्का को केवल सुरक्षा का मुद्दा नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे लैंगिक असमानता से भी जोड़ा जा रहा है। कई देशों का तर्क है कि बुर्का महिलाओं को समाज से अलग-थलग कर देता है और उन्हें मुख्यधारा से दूर कर देता है।

यूरोपीय नेताओं का कहना है कि अगर कोई महिला समाज का हिस्सा बनना चाहती है, तो उसे पूरी तरह ढका हुआ नहीं रहना चाहिए। उनके अनुसार, चेहरा छिपाने से संवाद, पढ़ाई, नौकरी और सामाजिक मेल-जोल में रुकावट आती है।

पुर्तगाल की संसद ने हाल ही में बुर्का बैन से जुड़े एक बिल को मंजूरी दी है। इस कानून के तहत सार्वजनिक स्थानों पर नकाब पहनने पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है। दूसरे यूरोपीय देशों में भी इसी तरह के नियम लागू हैं, जहाँ बार-बार नियम तोड़ने पर जुर्माने के साथ सजा का प्रावधान है। इन देशों का साफ कहना है कि मजहब निजी मामला है, लेकिन सार्वजनिक जगहों पर नियम सभी के लिए एक जैसे होने चाहिए।

ऑस्ट्रेलिया में भी सांसद पॉलिन हैनसन संसद में बुर्का पहनकर पहुँचीं, ताकि यह दिखा सकें कि चेहरा ढककर किसी सार्वजनिक जगह पर जाना सुरक्षा के लिए कितना जोखिम भरा हो सकता है। उनका कहना है कि अगर आम लोग चेहरा ढककर हर जगह जा सकते हैं, तो सुरक्षा व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है। इस कदम पर उनकी आलोचना भी हुई, लेकिन मुद्दे को लेकर बहस भी हुई।

पश्चिमी देशों का मानना है कि खुले और आधुनिक समाज में पहचान छिपाने की परंपरा को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। उनके लिए यह सिर्फ कपड़ों का मुद्दा नहीं, बल्कि समानता, सुरक्षा और सामाजिक मेल-जोल से जुड़ा सवाल है। यही वजह है कि दुनिया के कई हिस्सों में बुर्का बैन की माँग लगातार तेज होती जा रही है।

क्या वाकई इस्लाम में बुर्का या हिजाब अनिवार्य है?

बुर्का या हिजाब को लेकर दुनिया दो धड़ों में बँटी हुई है। कट्टरपंथी सोच इसे इस्लाम का अभिन्न हिस्सा और महिलाओं के लिए ‘अनिवार्य’ (Mandatory) बताती है, लेकिन यदि गहराई से कुरान और इस्लामी सामग्रियों का लिखित विश्लेषण करेंगे, तो तस्वीर कुछ अलग नजर आती है।

कुरान इस्लाम की बेवसाइट के ट्रू इस्लाम में जानकारी दी गई है। इसका टाइटल ‘बुर्का- इस्लामी या सांस्कृतिक?’। कुरान में ‘हिजाब’ शब्द का जिक्र सात बार आया है। लेकिन इसका इस्तेमाल महिलाओं के पहनावे या ड्रेस कोड के संदर्भ में नहीं किया गया है। वहाँ हिजाब का अर्थ एक ‘पर्दा’ या ‘अवरोध’ (Barrier) है, जो दो चीजों के बीच अलगाव पैदा करता है। कुरान की आयत 24:31 और 33:59 शालीनता (Modesty) की बात करती हैं। आयत 24:31 महिलाओं को अपना ‘सीना’ (जयब) ढकने का निर्देश देती है, न कि चेहरे या बालों को पूरी तरह ढँकने का।

बुर्का-हिजाब पर कुरान व इस्लामी इतिहास क्या कहता है?

इस्लामी विद्वानों का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि चेहरे को पूरी तरह ढकना (नकाब या बुर्का) एक मजहबी उर्फ यानि सांस्कृतिक परंपरा है, जो समय के साथ मजहबी रंग में रंग गई। यदि चेहरा ढकना अनिवार्य होता, तो कुरान की वह आयत बेमानी हो जाती जो पुरुषों को अपनी निगाहें नीची रखने और महिलाओं की ‘सुंदरता’ से आकर्षित न होने की सलाह देती है।

चेहरा ढका होने पर सुंदरता और आकर्षण का सवाल ही पैदा नहीं होता। आज के दौर में सऊदी अरब जैसे देशों में भी ‘अबाया’ (ढीला वस्त्र) अनिवार्य नहीं रहा, जबकि तालिबान शासित अफगानिस्तान में बुर्का न पहनना मौत को दावत देने जैसा है। यह विरोधाभास साबित करता है कि बुर्का पहनना मजहब से ज्यादा उस देश की सत्ता और वहां के कट्टरपंथियों की सनक पर निर्भर करता है।

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में संविधान हर नागरिक को अपनी पसंद के कपड़े पहनने और धर्म का पालन करने की आजादी देता है, लेकिन जब यह ‘पसंद’ दबाव में बदल जाती है, तो वह शोषण बन जाती है।

मजहब, अधिकार और असुरक्षा की त्रिवेणी

नीतीश कुमार का मामला हो या शामली का हत्याकांड, केंद्र में ‘बुर्का’ ही है। समस्या बुर्के के कपड़े में नहीं, बल्कि उसे पहनने या न पहनने के पीछे छिपे ‘दबाव’ में है। यदि कोई महिला अपनी स्वेच्छा से इसे पहनती है, तो वह उसका अधिकार है, लेकिन यदि इसे न पहनने पर उसे नौकरी छोड़ने पर मजबूर किया जाए या उसकी जान ले ली जाए, तो यह मजहब नहीं, बल्कि अपराध है।

भारत में इस मुद्दे पर हो रही चर्चा में सबसे बड़ी कमी ‘ईमानदारी’ की है। हम एक तरफ तो आधुनिक भारत का सपना देखते हैं, लेकिन दूसरी तरफ सात साल की बच्चियों को बुर्के में लपेटकर उनकी मानसिक आजादी को कुचलने वाली सोच पर चुप रहते हैं। पाकिस्तान के डॉन द्वारा दी गई धमकी यह बताती है कि यह मुद्दा केवल आस्था का नहीं बल्कि वर्चस्व का है। यदि हम दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि किसी भी महिला की पहचान उसकी योग्यता और उसके चेहरे से होनी चाहिए, न कि उस कपड़े के टुकड़े से जो उसे समाज से अलग करता है। अंततः, आजादी केवल कपड़े पहनने की नहीं, बल्कि बिना डरे जीने की होनी चाहिए।

महाराष्ट्र के यवतमाल में जन्म प्रमाणपत्र घोटाला, छोटे से गाँव में बने 27000+ सर्टिफिकेट: बांग्लादेशी-रोहिंग्या कनेक्शन की SIT जाँच की माँग

महाराष्ट्र के यवतमाल जिले के ग्रामीण इलाके में जन्म पंजीकरण से जुड़ा एक बड़ा घोटाला सामने आया है। जिले की अरनी तहसील की शेंदुरसानी ग्राम पंचायत में सिर्फ तीन महीनों (सितंबर से नवंबर) के भीतर सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (CRS) में 1,500 की आबादी वाले गाँव में 27,397 जन्म दर्ज किए गए।

यह गंभीर अनियमितता 24 नवंबर 2025 को सामने आई। इसके बाद जिला स्वास्थ्य अधिकारी (DHO) की शिकायत पर मंगलवार (16 दिसंबर 2025) को यवतमाल सिटी पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज की गई।

FIR में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318(4), 337, 336(3), 304(2) और IT एक्ट की धारा 65 व 66 के तहत दर्ज की गई है। पुलिस निरीक्षक नंदकिशोर काले ने बताया कि शेंदुरसानी गाँव में जन्म पंजीकरण में गड़बड़ी की शिकायत मिली है और मामले की जाँच शुरू कर दी गई है।

पूर्व भाजपा सांसद किरिट सोमैया ने बुधवार (17 दिसंबर 2025) को गाँव का दौरा किया और इस मामले की गहन जाँच की माँग की। मीडिया से बातचीत में उन्होंने अंदाजा लगाया की ग्राम पंचायत के कंप्यूटर ऑपरेटर की लॉग-इन ID और पासवर्ड का किसी ने गलत इस्तेमाल किया हो सकता है, जिसके जरिए जन्म पंजीकरण में इतनी बड़ी गड़बड़ी की गई।

एक्स पर एक पोस्ट में उन्होंने कहा कि शक है कि हजारों बांग्लादेशी इसके फायदेमंद हैं। उन्होंने इस मामले में SIT जाँच की माँग की है।

उन्होंने बताया कि रिकॉर्ड में दर्ज ज्यादातर नाम पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और आसपास के राज्यों के लोगों के हैं। किरिट सोमैया ने कहा, “मैंने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से बात की है और इन सभी फर्जी जन्म पंजीकरण प्रविष्टियों को रद्द करने की माँग की है।” उन्होंने यह भी बताया कि शेंदुरसानी ग्राम पंचायत की CRS ID (MH18241RE) मुंबई में मैप पाई गई है, जिससे साइबर धोखाधड़ी की आशंका और भी मजबूत हो गई है।

राज्य सरकार के निर्देश पर मंगलवर (16 दिसंबर 2025) को ग्राम पंचायत में अवैध और देरी से किए गए जन्म-मृत्यु पंजीकरण के जाँच अभियान को शुरू किया गया। इस दौरान अरनी के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने पाया कि सितंबर से नवंबर 2025 के बीच CRS सॉफ्टवेयर में 27,397 जन्म और 7 मृत्यु के रिकॉर्ड दर्ज किए गए हैं, जो गाँव की वास्तविक आबादी के मुकाबले बिल्कुल असामान्य और संदिग्ध थे।

इसके बाद जिला स्वास्थ्य अधिकारी (DHO) ने इस गड़बड़ी की जानकारी जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) मंदर पाटकी को दी। CEO ने मामले की जाँच के लिए पंचायत विभाग के उप मुख्य कार्यकारी अधिकारी की अध्यक्षता में एक जाँच समिति गठित की। समिति ने गाँव में मौके पर जाकर जाँच की, जिसमें सामने आया कि 27,397 जन्म और 7 मृत्यु के रिकॉर्ड ग्राम पंचायत के अधिकार क्षेत्र से बाहर के हैं और इन्हें बहुत ही संदिग्ध माना गया।

इसके बाद पुणे के उप स्वास्थ्य सेवा संचालक द्वारा तकनीकी जाँच शुरू की गई। राज्य के लॉग-इन सिस्टम के माध्यम से की गई इस जाँच में सामने आया कि शेंदुरसानी ग्राम पंचायत की CRS ID मुंबई से मैप की गई थी। इसके बाद मामला नई दिल्ली स्थित भारत के अतिरिक्त रजिस्ट्रार जनरल कार्यालय और राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) को भेजा गया।

इन दोनों संस्थानों की जाँच में यह निष्कर्ष निकला कि यह मामला साइबर धोखाधड़ी का है। यह जानकारी 11 दिसंबर 2025 को पुणे के उप स्वास्थ्य सेवा संचालक को दी गई, जिन्होंने आगे चलकर इसकी सूचना जिला परिषद (जिला परिषद प्रशासन) को दी।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अदिति ने अंग्रेजी में लिखी है जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)

‘थिरुपरनकुंड्रम दीपम’ की परंपरा तोड़ने में जुटी तमिलनाडु की DMK सरकार, कोर्ट के आदेश को भी दिखा चुकी है ठेंगा: खुद को अपमानित पा रहे सनातनियों में गुस्सा

मद्रास हाई कोर्ट ने हिंदुओं को पूजा के लिए दीए जलाने की इजाज़त देने के अपने आदेशों का पालन न करने पर तमिलनाडु सरकार को फटकार लगाई है। कोर्ट ने अवमानना ​​याचिका को भी स्वीकार कर लिया है।

हिंदू श्रद्धालुओं के एक समूह ने बुधवार (17 दिसंबर 2025) को मद्रास हाईकोर्ट में कहा कि तमिलनाडु के हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त (HR&CE) विभाग के आयुक्त का हिंदू धर्म के प्रति ‘तिरस्कार और अवमानना’ वाला रवैया है।

ये टिप्पणी तमिलनाडु सरकार और मदुरै जिला प्रशासन द्वारा दायर एक अपील की सुनवाई के दौरान की गई। यह अपील एकल जज के उस आदेश के खिलाफ थी, जिसमें थिरुपरकुंड्रम पहाड़ी पर कार्तिगई दीपम (दीपक) जलाने की अनुमति दी गई थी। इसी पहाड़ी पर अरुलमिगु सुब्रमणिया स्वामी मंदिर और सिकंदर बदूशा दरगाह दोनों स्थित हैं।

सरकार की अपील उस आदेश को चुनौती देती है, जो जस्टिस जीआर स्वामीनाथन ने 4 दिसंबर 2025 को अवमानना याचिका पर सुनाते हुए दिया था। उस आदेश में उन्होंने मदुरै जिला प्रशासन द्वारा जारी निषेधाज्ञा को रद्द कर दिया था, जिसके जरिए हिंदू श्रद्धालुओं को थिरुपरकुंड्रम पहाड़ी पर कार्तिगई दीपम जलाने से रोका गया था।

इस अपील पर जस्टिस जी जयचंद्रन और जस्टिस केके रामकृष्णन की डिवीजन बेंच ने सुनवाई की। इसके अलावा कुछ अन्य अपीलें भी कोर्ट में दायर की गईं, जिनमें 9 दिसंबर 2025 को जस्टिस स्वामीनाथन द्वारा दिए गए एक अन्य आदेश को चुनौती दी गई है। उस आदेश में उन्होंने अवमानना मामले में मुख्य सचिव, एडीजीपी और डीसीपी को पेश होने का निर्देश दिया था, साथ ही केंद्रीय गृह सचिव को भी पक्षकार बनाने को कहा था।

जस्टिस जीआर स्वामीनाथन ने अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि दीपथून (जहाँ दीपक जलाया जाता है) उस क्षेत्र में नहीं है, जो मुस्लिमों का है। इसलिए वहाँ कार्तिगई दीपम जलाने से मुस्लिमों के अधिकारों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। इसी आधार पर उन्होंने दीपक जलाने की अनुमति दी थी।

आयुक्त ने किया हिन्दू धर्म का अपमान

हिंदू भक्त की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एस श्रीराम ने हाई कोर्ट में कहा कि हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्त (HR&CE) विभाग के आयुक्त ने पहले यह टिप्पणी की थी कि भगवान मुरुगन की दो पत्नियाँ होने के बावजूद थिरुपरनकुंद्रम में दो दीपक नहीं जलाए जा सकते।

इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए श्रीराम ने कहा कि उनकी आस्था और उनके भगवानों पर भरोसे का विषय आयुक्त द्वारा उपहास और तिरस्कार का कारण बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह उनके धर्म का अपमान है और उन्होंने कोर्ट से आग्रह किया कि ऐसे आयुक्त के पास उन्हें न भेजें, जिनके मन में उनकी आस्था के प्रति सम्मान नहीं बल्कि अपमान है।

वहीं, एक अन्य हिंदू भक्त की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता केपीएस पलनिवेल ने भी दलील दी कि पहाड़ी पर दूसरा दीपक जलाने पर आपत्ति करने का अधिकार अधिकारियों को नहीं है। उन्होंने कहा कि दीप प्रज्वलन एक आवश्यक धार्मिक परंपरा है और इसे पहाड़ी की चोटी पर ही किया जाना चाहिए। यह नहीं कहा जा सकता कि पहले से एक दीपक जल रहा है, इसलिए दूसरा क्यों जलाया जाए। दीपम का धर्म में अपना विशेष महत्व और स्थान है।

पलनिवेल ने आगे बताया कि दीपक जलाने के कई धार्मिक और व्यावहारिक कारण हैं। पहला, यह ईश्वर का प्रतीक और स्वरूप माना जाता है। दूसरा, इससे पूरे गाँव के लोग दूर से इसे देख सकते हैं। तीसरा, पुराने समय में जब बिजली नहीं थी, तब प्रकाश का विशेष महत्व था। उन्होंने यह भी कहा कि पहाड़ों की एक से अधिक चोटियाँ हो सकती हैं और कई पहाड़ दोहरी चोटियों वाले होते हैं। इस पहाड़ी पर भी दो चोटियाँ हैं।

उन्होंने समझाया कि दीपक जलाने के लिए सबसे उपयुक्त स्थान वह चोटी होती, जिस पर दरगाह स्थित है। लेकिन किसी कारणवश मंदिर अपनी सबसे ऊँची चोटी खो चुका है, इसलिए उसके बाद वाली दूसरी ऊँची चोटी को दीप प्रज्वलन के लिए चुना गया। इसी संदर्भ में उन्होंने कार्तिगई दीपम के धार्मिक महत्व को कोर्ट के सामने विस्तार से रखा।

राज्य चाहता है कि हिंदू अपने अधिकारों का त्याग करके सह-अस्तित्व में रहें: हिंदू श्रद्धालु

सीनियर एडवोकेट एस श्रीराम ने कोर्ट से कहा कि राज्य सरकार की यह दलील स्वीकार नहीं की जानी चाहिए कि भक्तों को कोर्ट जाने के बजाय HR&CE (हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्त) विभाग के पास जाकर विवाद सुलझाना चाहिए। श्रीराम ने कहा, “मुझे नहीं लगता कि अधिकारियों के सामने मेरे अधिकार सुरक्षित हैं। वहाँ मुझे और कितना अपमान और तिरस्कार झेलना पड़ेगा?”

उन्होंने साफ कहा कि इस मामले में मध्यस्थता (मेडिएशन) का कोई मतलब नहीं है। उनका तर्क था कि अब तक जितनी भी शांति बैठकों या समझौता बैठकों का आयोजन हुआ है, हर बार मंदिर को ही पीछे हटना पड़ा है और अपने अधिकार छोड़ने पड़े हैं।

उन्होंने इसकी तुलना मानसिक प्रताड़ना से करते हुए कहा कि यह ऐसा है जैसे पहले चोट पहुँचाई जाए और फिर दर्द में ही समझौते की बात की जाए। श्रीराम ने कहा कि हर बार समाधान के नाम पर हिंदुओं को ही अपने अधिकारों में कटौती करनी पड़ी है।

सीनियर एडवोकेट ने राज्य सरकार पर हिंदुओं के प्रति पक्षपात का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि राज्य सह-अस्तित्व की बात तो करता है, लेकिन इसकी कीमत हिंदुओं से उनके अधिकार छोड़ने के रूप में चुकाने को कहा जा रहा है। श्रीराम ने कहा, “राज्य का रवैया यह है कि अपने अधिकारों का दावा मत करो, पीछे हटते रहो और किसी तरह साथ रहते रहो। जबकि राज्य का कर्तव्य है कि वह संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मेरे धार्मिक अधिकारों की रक्षा करे और पूरी तरह निष्पक्ष और तटस्थ रहे।”

उन्होंने यह भी कहा कि वह सह-अस्तित्व के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन सह-अस्तित्व का मतलब अधिकारों का समर्पण नहीं हो सकता। श्रीराम ने आगे कहा कि मंदिर के अधिकारों पर अतिक्रमण करने की कोशिशें पहले से हो रही हैं और यह सिर्फ आशंका नहीं है।

उन्होंने बताया कि दूसरी ओर से पहाड़ी को ‘सिकंदर हिल’ कहा जा रहा है, वहाँ पशु बलि की माँग की जा रही है और मंदिर की दीवारों को नुकसान पहुँचाया गया है। उन्होंने कहा कि धर्म का कोई रंग नहीं होना चाहिए, लेकिन एक त्योहार के दौरान पहाड़ियों को हरे रंग से रंग दिया गया। उनके अनुसार, ये सभी घटनाएँ मंदिर और हिंदू धार्मिक अधिकारों पर सीधा हमला हैं।

राज्य द्वारा पहाड़ी का स्वरूप बदलने का प्रयास: हिंदू श्रद्धालु

सीनियर एडवोकेट एस श्रीराम ने जस्टिस स्वामीनाथन द्वारा दिए गए आदेश का बचाव करते हुए कहा कि यह फैसला पूरी तरह से तर्क और कारणों पर आधारित है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू श्रद्धालुओं के वैध अधिकारों को बरकरार रखने के कारण ही जस्टिस स्वामीनाथन के खिलाफ डीएमके के नेतृत्व वाले पूरे INDI गठबंधन ने महाभियोग प्रस्ताव शुरू किया है।

श्रीराम ने इस आरोप को सिरे से खारिज किया कि जस्टिस स्वामीनाथन का आदेश मनमर्जी या खयाली सोच पर आधारित था। उन्होंने कहा, “यह एक सुविचारित और कारणों से भरा हुआ आदेश है। अगर कहीं मनमानी है, तो वह अपीलकर्ताओं के पक्ष में है, जो एक पक्ष के प्रति आँख मूँदकर झुके हुए हैं और दूसरे पक्ष का खुलकर स्वागत कर रहे हैं।”

उन्होंने आगे कहा कि यही पक्षपात मंदिर प्रशासन और ट्रस्ट बोर्ड तक पहुँच गया है, जो इस मुद्दे पर बोलने से इनकार कर रहे हैं, जबकि कार्यकारी अधिकारी राज्य सरकार की लाइन पर ही काम कर रहा है।

Places of Worship Act को लेकर राज्य की दलील का जवाब देते हुए श्रीराम ने कहा कि हिंदुओं पर धार्मिक स्वरूप बदलने का आरोप गलत है। उन्होंने स्पष्ट किया, “अगर कोई इस पहाड़ी के धार्मिक स्वरूप को बदल रहा है, तो वह राज्य है। यह स्थान हमेशा से हिंदू श्रद्धालुओं के लिए दीपथून (दीप स्तंभ) रहा है।”

राज्य यह साबित नहीं कर सका कि पत्थर का स्तंभ दीपथून नहीं है: हिंदू श्रद्धालु

हाई कोर्ट में एक अन्य हिंदू भक्त की ओर से पेश होते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता वल्लीअपन ने कहा कि तिरुपरंकुंड्रम पहाड़ी के शीर्ष पर कार्तिगई दीपम जलाना हिंदुओं की एक अनिवार्य धार्मिक परंपरा है। उन्होंने कहा कि कार्तिगई के दिन पहाड़ी पर दीप जलाने के पीछे गहरा धार्मिक आस्था है।

वल्लीअपन ने कोर्ट में कहा, “इस दीप के माध्यम से हमें भगवान के ज्योति स्वरूप के दर्शन होते हैं, जिसे हर कोई देख सकता है। पहाड़ी के ऊपर अग्नि (दीप) जलाने का विशेष धार्मिक महत्व है। हम इसे स्वयं भगवान का रूप मानते हैं, इसलिए इसे पहाड़ी के शीर्ष पर जलाया जाता है।”

उन्होंने यह भी बताया कि राज्य सरकार यह साबित करने के लिए कोई भी दस्तावेज पेश नहीं कर सकी कि जिस स्तंभ पर दीप जलाया जाता है, वह दीपस्तंभ (दीपथून) नहीं है। मुस्लिम पक्ष की दलील का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि कल यह तर्क दिया गया कि पूरी पहाड़ी हमारी है, लेकिन यह दावा सही नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पूरी पहाड़ी देवस्थानम की है, केवल कुछ हिस्से इससे अलग हैं।

इस मामले में अधिवक्ता कृष्णवल्ली ने राज्य सरकार की मंशा पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि राज्य बार-बार इस मुद्दे को कोर्ट के बाहर सुलझाने पर जोर क्यों दे रहा है, जबकि मुस्लिम पक्ष को कोर्ट में सुनवाई पर कोई आपत्ति नहीं है।

उन्होंने सवाल उठाया कि जब भी कोई हिंदू या आम नागरिक कोर्ट आता है ताकि पूजा सही तरीके, सही स्थान और सही समय पर हो सके, तो देवस्थानम और HR&CE विभाग यह क्यों कहते हैं कि मामले को HR&CE के पास भेजा जाए।

यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में अदिति ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

परमाणु उर्जा से जुड़े Shanti Bill से स्वास्थ्य-कृषि-ऊर्जा सेक्टर में क्रांतिकारी बदलाव, प्राइवेट सेक्टर को भी मिलेगा मौका: सरकार ने सुरक्षा को लेकर किए हैं इंतजाम, समझिए- इसमें आपका क्या फायदा

परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में निजी भागीदारी की अनुमति देने वाला SHANTI बिल 2025 कई मायने में ऐतिहासिक है। इससे भारत के परमाणु ढाँचे में मूलभूत बदलाव देखने को मिलेगा। इसका फायदा हेल्थ सेक्टर से लेकर कृषि तक में दिखेगा। इससे न सिर्फ निजी कंपनियाँ परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में आएँगी, बल्कि ये लंबे समय से चली आ रही निवेशकों के कानूनी बाधाओं को भी दूर करेगा।

नया कानून उस दायित्व व्यवस्था में सुधार करेगा, जिसने देश में उदारीकरण के बावजूद कंपनियों के निवेश को सीमित कर रखा है। परमाणु ऊर्जा काफी संवेदनशील क्षेत्र है, इसलिए अब तक सरकार का पूर्ण नियंत्रण इस क्षेत्र पर रहा है। अब ऐसी कंपनियाँ लगेंगी जिसमें सार्वजनिक क्षेत्र के साथ निजी क्षेत्र मिलकर उपक्रम लगाएँगे, हालाँकि सरकार ने साफ कर दिया है कि बेहद संवेदनशील पदार्थों पर अभी भी सरकार का पूर्ण नियंत्रण होगा।

क्या है SHANTI बिल

परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 और परमाणु संयंत्रों से होने वाले नुकसान के लिए सिविल दायित्‍व अधिनियम 2010 की जगह SHANTI बिल 2025 यानी भारत के ट्रांसफॉर्म के लिए नाभिकीय ऊर्जा का संधारणीय दोहन और अभिवर्द्धन विधेयक, 2025 (Sustainable Harnessing and Advancement of Nuclear Energy for Transforming India (SHANTI) Bill, 2025) को लाया गया है। परमाणु ऊर्जा विनियामक बोर्ड (AERB) को बिल के माध्यम से सांविधिक दर्जा (Statutory Status) प्रदान किया गया है। इससे यह संस्था रेडिएशन और परमाणु ऊर्जा के सुरक्षित उपयोग को सुनिश्चित कर सकेगी।

इस कानून के लागू होने के बाद निजी क्षेत्र की एंट्री परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में हो जाएगी। हालाँकि, सरकार ने सदन में साफ किया है कि ये बिल पुराने बिल के उद्देश्यों को और मजबूत करना है। इस बिल के माध्यम से परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड को वैधानिक दर्ज दिया गया है, ताकि इसे और प्रभावी बनाया जा सके। सरकार निजी क्षेत्र को यूँ ही नहीं एंट्री करने देगी। सरकार का साफ कहना है कि निजी संस्थानों का संवेदनशील पदार्थों पर कोई नियंत्रण नहीं होगा। सरकार सुरक्षा संबंधी मानदंड तय करेगी। रेडियोएक्टिव पदार्थ, ईधन और हेवी वाटर पर सरकार की निगरानी होगी।

परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 और सिविल दायित्‍व अधिनियम 2010 को निवेश की राह में रोड़ा माना जाता रहा है। खास कर आपूर्तिकर्ताओं पर दायित्वों को लेकर। इसकी वजह से विश्वस्तर के उद्योग भारत में आने में हिचकिचा रहे हैं। इसको देखते हुए भी बिल में आपूर्तिकर्ताओं के दायित्वों को साफ किया गया है।

क्या मुआवजे को कम किया जा रहा है, सुरक्षा मापदंड क्या हैं

विपक्ष ने आरोप लगाया कि इस कानून से मुआवजे को कम किया जा रहा है। साथ ही विपक्ष कह रहा है कि आपूर्तिकर्ता के उत्तरदायित्व का प्रावधान इसमें नहीं है और यह संवेदनशील क्षेत्र में निजी कॉरपोरेट समूहों के लिए रास्ता खोलने वाला है।

इसका जवाब देते हुए केन्द्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह ने कहा कि इस विधेयक से पीड़ितों को मिलने वाले मुआवजे को कम नहीं किया गया है। उन्होंन स्पष्ट किया कि रिएक्टर की क्षमता के मुताबिक इसके मालिक के दायित्व को तय किया गया है, ताकि छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर जैसी नई तकनीकों को प्रोत्साहित किया जा सके। इसके तहत दायित्व सीमा 100 करोड़ से 3000 करोड़ रुपए तक होगी।

प्रभावितों को पूरा मुआवजा सुनिश्चित किया जा सके। इसके लिए संचालक का दायित्व, सरकार के परमाणु दायित्व फंड और दूसरे मुआवजे से जुड़ी संधि में भारत की भागीदारी से अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय मुआवजा भी मिलेगा। कानून में संचालक की लापरवाही के लिए सजा के प्रावधान भी लागू रहेंगे। अगर क्षतिपूर्ति राशि रिएक्टर का संचालक पूरा नहीं कर पा रहा है, तो बाकी बचा पैसा केन्द्र सरकार देगी।

विधेयक में परमाणु संचालन से संबंधित विवादों के समाधान के लिए एक परमाणु ऊर्जा निवारण सलाहकार परिषद की स्थापना का भी प्रस्ताव है। नियम तोड़ने के लिए जुर्माना मामूली उल्लंघनों के लिए 5 लाख रुपए से लेकर गंभीर अपराधों के लिए 1 करोड़ रुपए तक है। सभी ऑपरेटरों, चाहे वे सार्वजनिक हों या निजी, उन्हें सरकार से लाइसेंस और एईआरबी से सुरक्षा मंजूरी प्राप्त करना जरूरी होगा।

‘नो-फॉल्ट दायित्व’ की पहले की व्यवस्था जारी रहेगी। इसका अर्थ यह है कि दुर्घटना या क्षति के लिए लापरवाही साबित हुए बिना भी दुर्घटना के लिए ऑपरेटर ही जिम्मेदार होगा। ये अनिवार्य किया गया है कि ऑपरेटर दायित्व राशि के बराबर का बीमा कराएगा।

नया विधेयक के मुताबिक, भारत में हुई किसी परमाणु दुर्घटना से यदि किसी अन्य देश के क्षेत्र में भी नुकसान होता है, तो कुछ शर्तों के साथ वहाँ हुए नुकसान के लिए भी क्षतिपूर्ति का प्रावधान किया गया है।

परमाणु ऊर्जा दूसरे ऊर्जा के विकल्पों मसलन कोयला, जल की तुलना में ज्यादा सुरक्षित माने जाते हैं। परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को कई स्वतंत्र सुरक्षा लेयर के साथ डिजाइन किया जाता है, ताकि एक भी विफलता बड़ी दुर्घटना का कारण न बन सके।

क्या निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित कर सार्वजनिक क्षेत्र को कमजोर किया जा रहा है?

विपक्ष ने सदन में बिल का विरोध करते हुए कहा है कि सरकार सार्वजनिक उपक्रमों की दुश्मन है और एक के बाद एक सार्वजनिक क्षेत्र को निजी हाथों में सौंपती जा रही है। परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र को भी अब निजी हाथों में सौंपने की तैयारी है। इस आरोप को केन्द्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने सदन में खारिज करते हुए कहा कि इस कानून से सार्वजनिक क्षेत्र की क्षमता में कमी नहीं आएगा।

दरअसल सरकार ने पिछले एक दशक में परमाणु ऊर्जा विभाग के बजट में लगभग 170 प्रतिशत की वृद्धि की है। भारत के समकक्ष देशों की तुलना में ऊर्जा क्षेत्र में परमाणु ऊर्जा का योगदान अभी भी कम है। ऐसे में कोयला, पानी, हवा से प्राप्त होने वाली बिजली के अलावा परमाणु ऊर्जा को प्रोत्साहित करना बेहद जरूरी है, ताकि डेटा प्रोसेसिंग, स्वास्थ्य सेवा और उद्योग जैसे क्षेत्रों की बढ़ती माँग को पूरा किया जा सके।

केन्द्रीय मंत्री के मुताबिक, यह विधेयक राष्ट्रीय सुरक्षा या जनहित से समझौता किए बिना, संसाधन संबंधी बाधाओं को दूर करने, परियोजनाओं के निर्माण की अवधि को कम करने और 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु क्षमता के राष्ट्रीय लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जिम्मेदार निजी और संयुक्त उद्यम की भागीदारी को संभव बनाता है। इसका मकसद 2070 तक नेट-जीरो लक्ष्य और 2047 तक परमाणु ऊर्जा क्षमता को वर्तमान लगभग 8.2 गीगावाट से बढ़ाकर 100 गीगावाट करना है।

जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण को कम करने में कैसे है सहायक

इस विधेयक में पहली बार परमाणु क्षति की परिभाषा में पर्यावरण और आर्थिक नुकसान को शामिल किया गया है। शांति बिल 2025 का उद्देश्य स्वच्छ और विश्वसनीय ऊर्जा के लिए एक अनुकूल वातावरण तैयार करना है और साथ ही परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग के प्रति लंबे समय से चली आ रही प्रतिबद्धता को भी कायम रखना है। छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों और अनुसंधान और नवाचार को भी प्रोत्साहित करना इसका मकसद है।

नया कानून भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं के अनुरूप भी है, क्योंकि ये बहुत ही कम कार्बन उत्सर्जन वाला ऊर्जा स्रोत है। इससे स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा मिलेगा। यह विधेयक स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टरों जैसी विकसित प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देता है, जो कोयले के उपयोग को रोकने में मददगार है। इतना ही नहीं उद्योगपतियों को कार्बन उत्सर्जन टैक्स से भी बचाता है। दरअसल कोयले से चलने वाले पावर प्लांट के विपरीत न्यूक्लियर रिएक्टर चलते समय वायु प्रदूषण नहीं करते हैं और ये कार्बन डाइऑक्साइड नहीं बनाते हैं।

हालाँकि, यूरेनियम की माइनिंग और रिफाइनिंग और रिएक्टर फ्यूल बनाने के प्रोसेस में बहुत ज़्यादा एनर्जी लगती है। न्यूक्लियर पावर प्लांट में भी बहुत ज़्यादा मेटल और कंक्रीट होता है, जिसे बनाने के लिए बहुत ज़्यादा एनर्जी लगती है। अगर यूरेनियम ओर की माइनिंग और रिफाइनिंग के लिए कोयले का इस्तेमाल किया जाता है, या अगर न्यूक्लियर पावर प्लांट बनाते समय कोयले का इस्तेमाल किया जाता है, तो उन फ्यूल को जलाने से होने वाला एमिशन न्यूक्लियर पावर प्लांट से बनने वाली बिजली से जुड़ा हो सकता है।

न्यूक्लियर एनर्जी से रेडियोएक्टिव कचरा निकलता है

न्यूक्लियर पावर से जुड़ी एक बड़ी समस्या रेडियोएक्टिव कचरे का बनना है, जैसे यूरेनियम मिल टेलिंग्स, रिएक्टर फ्यूल और दूसरे रेडियोएक्टिव कचरे। ये इंसानों के लिए बेहद खतरनाक होते हैं। इसलिए इसकी हैंडलिंग, ट्रांसपोर्टेशन, स्टोरेज और डिस्पोजल को सरकार कंट्रोल करती है।

रेडियोएक्टिव तत्वों की क्षमता को पहले कम किया जाता है, फिर इसे डिस्पोज किया जाता है। इसके लिए रेडियोएक्टिव कचरे को लो-लेवल कचरे या हाई-लेवल कचरे में बाँटा जाता है। दोनों का तरीका अलग-अलग होता है। हालाँकि इन कचरों की तुलना अगर कोयले या दूसरे बिजली बनाने के संसाधनों से की जाए तो ये काफी कम हैं। इसलिए विकसित देश न्यूक्लियर एनर्जी पर लगातार निर्भरता बढ़ा रहे हैं।

परमाणु ऊर्जा एक स्वच्छ और साफ-सुथरा बिजली का स्रोत है, जो दिन-रात और 24 घंटे उपलब्ध रह सकता है। परमाणु ऊर्जा का उत्सर्जन हाइड्रो और पवन ऊर्जा की तरह है। इसलिए परमाणु ऊर्जा 2070 तक नेट जीरो के संकल्प को पूरा करने में ये अहम भूमिका निभाएगा।

कृषि और फूड प्रोसेसिंग के क्षेत्र में इस्तेमाल

एटोमिक ऊर्जा का इस्तेमाल कृषि से लेकर फूड तकनीक में तेजी से होने लगा है। भारत में ही रेडिएशन का इस्तेमाल कर 72 तरह की नई फसलें, जिनमें सरसों, सोयाबीन, सनफ्लावर जैसी तिलहन और उरद, मूँग समेत कई दालें, चावल जूट और केले शामिल हैं, पैदा की गई हैं।

इसके अलावा फूड रेडिएशन पर आधारित फूड संरक्षण तकनीक से कोल्ड स्टोरेज समेत कई काम कम खर्च पर और आसानी से किसानों को उपलब्ध हो सकती हैं। इससे न सिर्फ अनाज, मसालों की उम्र बढ़ जाएगी, बल्कि उन्हें रेडिएशन के माध्यम से कीटों और कीड़ों से भी मुक्ति मिल जाएगी। इसका फायदा एग्रीकल्चर सेक्टर में दूरगामी पड़ेगा। इससे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा को मजबूत करने, कृषि लागत को कम करने, किसानों की आय में सुधार लाने और वैश्विक कृषि व्यापार में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाने में मदद मिलेगी।

हेल्थ सेक्टर को होगा फायदा

इस विधेयक को व्यापक संदर्भ में देखने की जरूरत है। हेल्थ सेक्टर में इसका काफी महत्व है खास कर कैंसर के इलाज में, इसमें रेडिएशन का इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा शोध विकास और नवाचार के क्षेत्र को प्रोत्साहन मिलेगा। इसके अलावा कृषि और उद्योग से जुड़े अनुसंधान में आयोनाइजिंग रेडिएशन (ionising radiation) का इस्तेमाल कर कई आयाम जोड़े जा सकते हैं।

Bhabha Atomic Research Centre (BARC) ने न्यूक्लियर एनर्जी के माध्यम से पानी की बाढ़ वाले इलाके में कम खर्च पर सफाई करने की तकनीक कई राज्यों में इस्तेमाल की है। इसके व्यापक इस्तेमाल से बाढ़ वाले इलाके में फैलने वाली बीमारी से निजात मिलेगी। पानी की सफाई से बैक्टीरिया वायरस तो पानी से अलग होंगे ही मिट्टी और दूसरे पदार्थ भी अलग हो जाएँगे। यहाँ तक कि पानी के खारेपन को दूर करने के लिए इसका इस्तेमाल गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में हो रहा है।

प्राइवेट पूँजी निवेश और हाई तकनीक के साथ साथ वैश्विक साझेदारी जरूरी है। इसलिए लगातार सरकार इस कोशिश में लगी है कि ज्यादा से ज्यादा पूँजी निवेश को आमंत्रित किया जा सके। हमारे देश में रिलायंस इंडस्ट्री, टाटा पावर और अडानी पावर इस क्षेत्र में आगे आए हैं। विदेशी कंपनियाँ भी दिलचस्पी दिखा रही हैं।

विकसित भारत के संकल्प को पूरा करने के लिए परमाणु ऊर्जा की अपार संभावना की ओर देश को बढ़ना ही होगा। इसमें निजी क्षेत्र की भागीदारी आवश्यक है। परमाणु ऊर्जा सिर्फ बिजली पैदा नहीं करता बल्कि इससे हेल्थ सेक्टर, दूसरे उद्योग, एक्सपोर्ट, कृषि और खाद्य प्रसंस्करण को भी फायदा होता है। इन क्षेत्रों के विकास और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लिए ये कानून मील का पत्थर साबित होगा।

भारत-ओमान के बीच CEPA व्यापार समझौता, टैरिफ हटने से ट्रेड को मिलेगी मजबूती: समझें- ऐसी साझेदारियों से देश को कैसे मजबूत बना रही मोदी सरकार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओमान यात्रा ने भारत और ओमान के बीच सदियों पुराने रिश्तों को नई ऊँचाई दी है। गुरुवार (18 दिसंबर 2025) को मस्कट में ऐतिहासिक समझौते के तहत भारत और ओमान ने व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (सीईपीए) पर हस्ताक्षर किए।

भारत-ओमान के बीच CEPA समझौता न केवल दोनों देशों के बीच व्यापार को बढ़ावा देगा, बल्कि भारत की वैश्विक आर्थिक रणनीति को मजबूत बनाएगा। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे ‘हमारे साझा भविष्य का ब्लूप्रिंट’ करार दिया, जो आने वाले दशकों तक दोनों देशों के संबंधों को आकार देगा।

यह समझौता ओमान का दूसरे देश के साथ दूसरा मुक्त व्यापार समझौता है और लगभग 20 वर्षों बाद उनका पहला ऐसा समझौता है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि इससे वस्त्र, खाद्य प्रसंस्करण, ऑटोमोबाइल, रत्न-आभूषण, कृषि रसायन, नवीकरणीय ऊर्जा और ऑटो पार्ट्स जैसे क्षेत्रों में अपार संभावनाएँ खुलेंगी।

भारत-ओमान व्यापार वर्तमान में लगभग 10.5 अरब डॉलर (949.0 अरब रुपए) का है, जिसमें भारत का निर्यात 4.1 अरब डॉलर (370.6 अरब रुपए) और आयात 6.6 अरब डॉलर (596.5 अरब रुपए) है। ऊर्जा और उर्वरक आयात प्रमुख हैं, लेकिन यह समझौता निर्यात को बढ़ाकर व्यापार संतुलन सुधारने में मदद करेगा। ओमान के वाणिज्य मंत्री कैस अल यूसुफ ने बताया कि भारत ओमान का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन चुका है और भारतीय निवेश 5 अरब डॉलर (451.9 अरब रुपए) से अधिक हो गया है।

पीएम मोदी की यह यात्रा दोनों देशों के 70 वर्षों के राजनयिक संबंधों की वर्षगाँठ पर हुई, जो भारत की जी-20 अध्यक्षता के दौरान ओमान को विशेष अतिथि बनाने के फैसले को और मजबूत करती है। आइए, इस समझौते को विस्तार से समझते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी की ओमान यात्रा और समझौते पर हस्ताक्षर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 18 दिसंबर 2025 को मस्कट पहुँचे, जहाँ ओमान के सुल्तान हैथम बिन तारिक ने उनका स्वागत किया। यह यात्रा भारत की तीन देशों की यात्रा का आखिरी चरण है और सीईपीए पर हस्ताक्षर का मुख्य आकर्षण रहा। हस्ताक्षर समारोह में प्रधानमंत्री मोदी और सुल्तान के अलावा वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल तथा ओमानी समकक्ष कैस अल यूसुफ मौजूद रहे।

पीएम मोदी ने मस्कट बिजनेस समिट में कहा, “यह समझौता हमें 21वीं सदी में नई ऊर्जा और विश्वास देगा।” उन्होंने ऐतिहासिक समुद्री संबंधों का जिक्र किया, जैसे लोथल बंदरगाह के माध्यम से हुए व्यापार के बारे में। पीएम मोदी ने ओमान की रणनीतिक स्थिति को खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी), पूर्वी यूरोप, मध्य एशिया और अफ्रीका के लिए द्वार बताया। उनकी इस यात्रा के दौरान पॉवर, इन्फ्रा जैसे सहयोग के चार स्तंभों पर चर्चा हुई।

भारतीय कंपनियों ने ओमान के सोहर और सलाला मुक्त व्यापार क्षेत्रों में 7.5 अरब डॉलर (677.8 अरब रुपए) से अधिक निवेश किया है, जो 6,000 से ज्यादा संयुक्त उद्यमों का आधार है।

यह समझौता नवंबर 2023 में शुरू हुई वार्ताओं का परिणाम है और कुछ महीनों में लागू होगा। इससे पहले कैबिनेट ने 12 दिसंबर को इसे मंजूरी दी थी। ओमान ने पाँच वर्षीय मल्टीपल एंट्री ‘इंडिया बिजनेस कार्ड’ वीजा जारी करने का वादा किया है, जो निवेश वाली कंपनियों के अधिकारियों के लिए 15 दिनों में मिलेगा। तेल-गैस और बंदरगाह परियोजनाओं के लिए वर्क परमिट 10 दिनों में जारी होंगे।

भारत-ओमान सीईपीए (CEPA) समझौता क्या है?

भारत-ओमान के बीच सीईपीए यानी व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता एक व्यापार समझौता (Trade Agreement) है, जो वस्तुओं, सेवाओं और निवेश को कवर करता है। यह सीमा शुल्क, गैर-शुल्क बाधाओं को कम या समाप्त करता है, जिससे व्यापार आसान होता है। ओमान में वर्तमान में कुछ उत्पादों पर 100 प्रतिशत तक शुल्क है, जो भारत के औद्योगिक निर्यात को प्रभावित करता है। यह समझौता 95 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर बिना किसी चार्ज के लेन-देन को तय करेगा।

भारत और ओमान के बीच यह समझौता बौद्धिक संपदा, सरकारी खरीद, डिजिटल व्यापार, मूल नियम, सीमा शुल्क सहयोग, स्वच्छता और पादप संगरोध उपाय, तकनीकी व्यापार बाधाएँ, विवाद निपटान और छोटे-मध्यम उद्यमों के समर्थन जैसे मुद्दों को शामिल करता है। भारत दवाओं के लिए तेज मँजूरी चाहता है, जो यूएसएफडीए या यूके एमएचआरए जैसी एजेंसियों से पास हो चुकी हों। ओमान के लिए यह 20 वर्षों बाद पहला ऐसा समझौता है, जो उनकी अर्थव्यवस्था को विविधीकृत करेगा।

भारत -ओमान के बीच CEPA समझौता, प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI Grok)

सीईपीए वैश्विक आर्थिक पुनर्संरचना के समय आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती और व्यापार विविधीकरण को बढ़ावा देगा। ओमान का बाजार छोटा है (जनसंख्या 50 लाख, जीडीपी 115 अरब डॉलर (10,393.7 अरब रुपए)), लेकिन इसकी भौगोलिक स्थिति इसे महत्वपूर्ण बनाती है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) के अनुसार, यह भारतीय निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाएगा।

CEPA से भारत को क्या फायदा होगा

यह समझौता भारत को कई स्तरों पर फायदा पहुँचाएगा। सबसे पहले तो इससे भारत के एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी होगी। इसमें भारत पेट्रोलियम, मशीनरी, चावल, लोहा-इस्पात जैसे उत्पादों का एक्सपोर्ट बढ़ा पाएगा। CPEA की वजह से इन पर लगने वाला भारी टैक्स खत्म होगा, जिसके भारत का एक्सपोर्ट 404 अरब डॉलर तक पहुँच जाएगा। इसके साथ ही कपड़े, जूते, ऑटोमोबाइल, रत्न-आभूषण, नवीकरणीय ऊर्जा और ऑटो पार्ट्स के क्षेत्र में भी नए रास्ते खुलेंगे।

निवेश में होगा फायदा: भारतीय कंपनियाँ ओमान के ग्रीन इस्पात, ग्रीन अमोनिया, एल्यूमीनियम और लॉजिस्टिक्स में निवेश बढ़ा सकेंगी। साल 2020 से भारत का ओमान में निवेश तीन गुना होकर 5 अरब डॉलर पहुँचा चुका है। भारत में भी ओमान का निवेश बढ़ेगा, जो भारत के लिए भी अत्यंत लाभकारी साबित होगा।

सर्विस सेक्टर में फायदा: भारत-ओमान समझौते से सर्विस सेक्टर को भी फायदा होगा। इसके साथ ही स्वास्थ्य, शिक्षा में सहयोग बढ़ेगा।

ऊर्जा सुरक्षा: ओमान से कच्चा तेल, एलएनजी और उर्वरक सस्ते मिलेंगे, जो भारत की कृषि, रसायन, सीमेंट और बिजली क्षेत्रों के लिए जरूरी हैं।

रोजगार: ईपीसी ठेकेदारों के लिए तेज वीजा से हजारों नौकरियाँ पैदा होंगी। जीटीआरआई के अनुसार, गुणवत्ता सुधार से निर्यात स्थायी रूप से बढ़ेगा। कुल मिलाकर यह व्यापार घाटे को कम कर 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करने में मदद करेगा।

भारत ने किन अन्य देशों के साथ ऐसे समझौते किए हैं?

भारत ने 2025 तक 14 मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) और 6 अधिमान्य व्यापार समझौते (पीटीए) साइन किए हैं। ये किसानों, व्यापारियों और निर्यातकों के लिए फलदायी साबित हो रहे हैं। भारत के लिए सबसे पहले अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली NDA सरकार ने श्रीलंका के साथ इस तरह का समझौता किया था।

हालाँकि बीते कुछ समय में मोदी सरकार ने कई बड़े देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (मुक्त व्यापार समझौता) किए हैं। इनमें मॉरीशस (2021) के साथ समझौते ने भऊारत के लिए अफ्रीका के लिए द्वार खोल दिए। फिर पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत और यूएई के बीच 2022 में CEPA समझौता हुई, जिसके तहत UAE ने 90 प्रतिशत भारतीय निर्यात पर टैक्स बेहद कम कर दिया और आज दोनों देशों के बीच व्यापार पहले के मुकाबले कई गुना बढ़ चुका है।

पीएम मोदी के नेतृत्व में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच 2022 में ही ईसीटीए समझौता हुआ, जिसके बाद से भारत के ऑस्ट्रलिया को होने वाले एक्सपोर्ट पर टैक्स काफी कम हो गया।

यहीं नहीं, भारत ने ईएफटीए टीईपीए (2024, 2025 से प्रभावी) के तहत स्विट्जरलैंड, नॉर्वे आदि के साथ ऐसे ही समझौते किए हैं, तो यूके के साथ इसी साल हुए सीईटीए समझौते ने भारत के एक्सपोर्ट की 90 प्रतिशत चीजों पर से टैक्स बेहद कम या लगभग खत्म कर दिया। इन समझौते से भारत के न सिर्फ विदेश संबंध मजबूत हुए, बल्कि भारत के उत्पादन के लिए बड़े बाजार भी मिले हैं।

किन देशों के साथ समझौते पाइपलाइन में हैं?

2025 में भारत 10 से अधिक एफटीए पर तेजी से काम कर रहा है। यूरोपीय संघ के साथ एफटीए वार्ता 2022 से फिर शुरू हुई, जिसके 14 दौर पूरे हो चुके हैं। इसी माह यानी दिसंबर 2025 तक भारत और ईयू के बीच व्यापार समझौता हो जाने की उम्मीद है, जिसके बाद दोनों पक्षों में 250 अरब डॉलर तक व्यापार बढ़ जाएगा।

भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौता (बीटीए) चल रहा है, जिसमें खाद्य उत्पादों पर शुल्क छूट शामिल। अभी फ्री ट्रेड एग्रीमेंट व अन्य चीजों पर बातचीत हो रही है।

भारत इस समय पेरू, चिली, न्यूजीलैंड, इजराइल के साथ दिसंबर 2025 में फ्री ट्रेड एग्रीमेंट जैसे समझौते को पूरा करने पर जोर लगा रहा है, जिसके कम से कम 4 चरण पूरे हो चुके हैं। इसी क्रम में कतर के साथ भी समझौते पर बातचीत हो रही है, तो यूएई के साथ समझौते को विस्तार भी दिया जा रहा है। भारत और कनाडा के बीच FTA थम सी गई थी, लेकिन कनाडा में सरकार बदलने के बाद फिर से इस दिशा में तेजी से काम हो रहा है।

वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल की मानें तो मौजूदा समय में भारत कम से कम 50 देशों के साथ ऐसे समझौतों को लेकर बातचीत कर रहा है, जो भारतीय उत्पादों के लिए वैश्विक बाजार के दरवाजे को और बड़ा खोल देगा। ये समझौते 2026 तक भारत को वैश्विक व्यापार में मजबूत बनाएँगे।

वैश्विक मंचों पर भारत की ताकत बढ़ाने में योगदान

भारत और ओमान के बीच यह समझौता भारत की वैश्विक ताकत को कई गुना बढ़ाएगा। अमेरिका के टैरिफ और यूरोपीय संघ के कार्बन टैक्स के बीच खाड़ी में मजबूत उपस्थिति सुनिश्चित करेगा। ओमान के माध्यम से जीसीसी, अफ्रीका और मध्य एशिया तक पहुँच बढ़ेगी, जो भारत को ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा देगी।

रणनीतिक रूप से ये समझौता बेहद महत्वपूर्ण है। इसके बल पर भारत मिडिल ईस्ट में अपनी पैठ बढ़ाता नजर आ रहा है। नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारत जिन व्यापार समझौतों को अंजाम दे रहा है, वो समझौते विकसित भारत 2047 के विजन को पूरा करने में महत्वपूर्ण कड़ी साबित होंगे, क्योंकि ऐसे समझौतों से न सिर्फ भारत की जीडीपी वृद्धि 7-8 प्रतिशत तक रहेगी, बल्कि यह जी-20 जैसे मंचों पर भारत की नेतृत्व भूमिका को मजबूत करेगा।

पत्रकार की गिरफ्तारी या बिजली-पानी की माँग… जानिए POK में सड़कों पर उतरकर लोग क्यों कर रहे बवाल, शहबाज सरकार का विद्रोह करने की खुली धमकी

पाकिस्तान की शहबाज शरीफ सरकार के खिलाफ पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) में जनता सड़कों पर उतरी है। सरकार के खिलाफ यह विद्रोह अचानक नहीं, बल्कि लंबे समय से आम सुविधाओं से त्रस्त लोगों का गुस्सा है, जिन्हें बिजली, पानी और इंटरनेट सेवा तक नहीं मिल पा रहा है। रावलकोट समेत पूरे पुंछ डिवीजन में ये प्रदर्शन पिछले एक हफ्ते से जारी है। जम्मू-कश्मीर ज्वाइंट आवामी एक्शन कमेटी (JKJAAC) ने ‘शटर डाउन हड़ताल‘ का ऐलान किया।

इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने दुकानें बंद कर दी, सड़के जाम कर दी और बड़े पैमाने में रैलियाँ निकाली। रैलियों में शहबाज शरीफ सरकार के खिलाफ ‘जब तक जनता तंग रहेगी, जंग रहेगी’, पानी चोरों और ‘बिजली चोरों’ जैसे नारे लगाए गए। इसके अलावा लोगों ने पत्रकार सोहराब बरकत की रिहाई की भी माँग की। प्रदर्शनकारियों ने सरकार को अल्टीमेटम तक दे दिया कि अगर माँगे पूरी नहीं हुईं तो आंदोलन और तेज होगा।

POK में प्रदर्शनकारियों की माँगे क्या हैं?

प्रदर्शन की वजह बुनियादी सुविधाओं में भारी कमी है। आम लोगों को कई-कई दिनों तक बिजली नहीं मिलती, इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क बार-बार बंद कर दिया जाता है और साफ पानी जैसी जरूरी चीजों के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उनके इलाके के प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल तो किया जाता है, लेकिन बदले में उन्हें कुछ नहीं मिलता। क्षेत्र में बेरोजगारी और महँगाई भी पुराना मुद्दा है।

प्रदर्शनकारियों की माँग बिजली और पानी को लेकर है। बिजली, जो पाकिस्तान पर कहर बनकर बरपी बाढ़ के चलते प्रभावित है। बाढ़ के चलते क्षेत्र में बिजली के खंभे गिर गए, जिनको अब तक शहबाज शरीफ सरकार ठीक नहीं कर सकी है। वहीं भारत के साथ सिंधु जल समझौता खत्म होने के बाद से ही पाकिस्तान पानी की बूँद-बूँद के लिए तरस रहा है। इसके अलावा प्रदर्शनकारी एक स्थानीय पत्रकार सोहराब बरकत की रिहाई की भी माँग कर रहे हैं।

प्रदर्शनकारियों की पाकिस्तानी सरकार को चेतावनी

व्यापारियों, ट्रांसपोर्टरों, वकीलों और नागरिक समाज कार्यकर्ताओं के गठबंधन जम्मू-कश्मीर संयुक्त अवामी एक्शन कमेटी (JKJAAC) ने प्रदर्शनों का नेतृत्व किया है। संगठन ने ही पाकिस्तानी सरकार को साफ चेतावनी देते हुए कहा कि अगर माँगे पूरी नहीं हुई तो आंदोलन और तेज होगा।

रैलियों में घोषणा की गई कि दो मुख्य रास्ते बंद कर दिए जाएँगे। इनमें एक रास्ता ब्रीड स्टेशन की ओर जाने वाला और दूसरा शाहराह ए गाजी मिल्लत की ओर जाने वाला रास्ता है। संगठन ने आम लोगों से भी विरोध प्रदर्शन में जुड़ने की अपील की है।

चेतावनी से सीधे तौर पर पाकिस्तानी प्रशासन को बड़ा झटका लगा। जन आक्रोश को देखते हुए पाकिस्तान ने भारी संख्या में पुलिस सेना और अर्धसैनिक बल तैनात कर दिए हैं। यह साफ है कि POK की आवाज अब पाकिस्तान की प्रशासन को डराने का दम रखती है।

कौन और कहाँ है सोहराब बरकत?

सोहराब बरकत पाकिस्तानी मीडिया आउटलेट सियासत (Siasat) में कार्यरत पत्रकार है। इसके अलावा वह एक यूट्यूब चैनल के होस्ट भी हैं। बरकत को 26 नवंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में जाते समय इस्लामाबाद एयरपोर्ट से हिरासत में लिया गया था।

पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पत्रकार सोहराब बरकत पर पाकिस्तान की राष्ट्रीय साइबर अपराध जाँच एजेंसी (NCCIA) ने सरकारी संस्थानों पर अपमानजनक टिप्पणी करने और गलत सूचना फैलाने का आरोप लगाया है। NCCIA ने 05 अगस्त 2025 को बरकत पर इन आरोपों में मामला दर्ज किया था।

पत्रकार बरकत के वकील साद रसूल के मुताबिक, यह टिपप्णी विपक्षी दल पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ की सदस्य सनम जावेद ने बरकत के साथ एक इंटरव्यू में की थी, जो सियासत के यूट्यूब चैनल पर प्रकाशित हुआ था। अमेरिकी के संगठन पत्रकारों की सुरक्षा के लिए समिति (CPJ) ने बरकत की हिरासत को पाकिस्तानी अधिकारियों की मीडिया पर प्रताड़ना का उदाहरण बताया है।

POK में प्रदर्शन से पाकिस्तानी सरकार की असफलता?

POK में यह प्रदर्शन कोई नई बात नहीं है। तीन महीने में दूसरी बार POK के लोगों का सरकार के खिलाफ विद्रोह सामने आया है। अक्टूबर 2025 में ही हजारों लोगों ने 38 माँगों के साथ सड़कों पर उतरे थे, लेकिन माँगों को मानने के बजाए पाकिस्तानी प्रशासन ने हिंसा चुनी। पाकिस्तानी रेंजर्स ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ चलाईं। इसमें 12 लोगों की मौत हुई थी।

POK में फैली ये अशांति पाकिस्तान में शहबाज शरीफ नेतृत्व वाली सरकार की कमजोरी और पाकिस्तानी प्रशासन की असफलता को उजागर करती है। ये वही पाकिस्तान है, जो दावा करता है कि वह भारत के खिलाफ कश्मीरियों के अधिकारों की रक्षा करता है, लेकिन POK के लोग जिस परेशानियों से जूझ रहे हैं, उसे देखकर सरकार के दावे खोखले साबित होते हैं।

क्षेत्र के लोग दशकों से चले आ रहे शोषण, भ्रष्टाचार और तानाशाही जैसे हालातों से अब पूरी तरह थक चुके हैं और आवाज बुलंद कर रहे हैं। बावजूद पाकिस्तानी सरकार कोई ठोस सुधार या समाधान करने को तैयार नजर नहीं आ रही है। अगर हालात ऐसे ही बने रहे तो POK में तनाव और बढ़ सकता है।

कंधा टूटा, सिर में चोट आई और हड्डियों में भी फ्रैक्चर: मुंबई में आवारा कुत्ता भगाने पर भोलानाथ को अहमद शेख और साथियों ने किया घायल, पढ़ें- FIR में क्या लिखा है

मुंबई के घाटकोपर में मंगलवार (16 दिसंबर 2025) की देर रात घर लौट रहे एक शख्स और उसके रिश्तेदारों पर जानलेवा हमला हो गया। हैरानी की बात यह है कि विवाद सिर्फ एक भौंकते हुए आवारा कुत्ते को भगाने को लेकर शुरू हुआ था। इस हमले में शालिग्राम भोलानाथ यादव नाम के शख्स का कँधा टूट गया है और सिर में गंभीर चोटें आई हैं, जिसके लिए उन्हें टांके लगवाने पड़े।

पंतनगर पुलिस स्टेशन की सीमा में हुए इस हमले को इलाके के ही तीन लोगों ने अंजाम दिया। इस मामले में दर्ज की गई FIR की कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है।

उस रात आखिर हुआ क्या था?

यह पूरी घटना मंगलवार (16 दिसंबर 2025) की रात (तड़के) करीब 2:30 बजे की है। मुंबई के घाटकोपर ईस्ट स्थित रमाबाई कॉलोनी के श्रावस्ती बुद्ध विहार के पास यह सब हुआ। शिकायतकर्ता शालिग्राम यादव अपना काम खत्म करने और खाना खाने के बाद अपने भतीजे आकाश यादव और एक रिश्तेदार राजन यादव के साथ पैदल घर लौट रहे थे।

यादव के मुताबिक, रास्ते में उनका भतीजा आकाश बाथरूम जाने के लिए रुका, तभी वहाँ मौजूद एक आवारा कुत्ता उस पर जोर-जोर से भौंकने लगा। कुत्ते को डराकर भगाने के लिए आकाश ने अपनी चप्पल उठाई, हालाँकि उसने कुत्ते को मारा नहीं था। पास ही अलाव (आग) ताप रहे तीन लोगों ने इस पर ऐतराज जताया और आकाश पर कुत्ते को मारने का आरोप लगाते हुए झगड़ा शुरू कर दिया।

उन तीनों ने समझाने की कोशिश की कि उन्होंने कुत्ते को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया है और वे शांति से वहाँ से आगे बढ़ गए। लेकिन आरोप है कि उन तीन लोगों ने पीछा करके उन्हें बीच रास्ते में रोक लिया और उनके साथ बुरी तरह मारपीट की।

क्या कहती है FIR?

ऑपइंडिया ने इस मामले में शालिग्राम भोलानाथ यादव की शिकायत पर पंतनगर पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई FIR की कॉपी हासिल की है। यह मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की विभिन्न धाराओं 115(2), 118(1), 118(2), 3(5) और 352 (जैसे मारपीट और चोट पहुँचाना) के तहत दर्ज किया गया है।

स्रोत: महाराष्ट्र पुलिस

FIR के मुताबिक, हमला करने वाले तीनों आरोपितों की पहचान इमरान अहमद शेख, संपत भागीरथ सुतार और ऋतिक संजय चंद्रमोरे के रूप में हुई है। ये तीनों रमाबाई कॉलोनी के ही रहने वाले हैं। शिकायतकर्ता शालिग्राम ने बताया कि सबसे पहले ऋतिक ने उनके सिर पर लकड़ी के फट्टे से वार किया, जिससे खून बहने लगा। इसके बाद इमरान ने उसी फट्टे से उनके बाएँ कंधे, पैर और पीठ पर ताबड़तोड़ हमला किया, जिससे उन्हें गंभीर चोटें आईं।

स्रोत: महाराष्ट्र पुलिस

यही नहीं, तीसरे आरोपित संपत ने आकाश और राजन के साथ लात-घूंसों से मारपीट की। वारदात को अंजाम देने के बाद तीनों आरोपित मौके से भाग निकले। घायल शालिग्राम को इलाज के लिए राजावाड़ी अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने बताया कि उनके बाएँ कंधे में फ्रैक्चर (हड्डी टूट गई) है और सिर के घाव भरने के लिए कई टाँके लगाने पड़े हैं।

स्रोत: महाराष्ट्र पुलिस

हमले के बाद डर और असुरक्षा का माहौल

अपने बयान में शालिग्राम यादव ने बताया कि वे इस इलाके में पिछले 25 साल से रह रहे हैं, लेकिन आज से पहले उनके साथ कभी ऐसा कुछ नहीं हुआ। उन्होंने अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर गहरा डर जताया है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या अब मोहल्ले के लोगों को खुद को बचाने का भी हक नहीं है, खासकर तब जब कोई आवारा कुत्ता उन पर हमला करने की कोशिश करे?

फिलहाल, पुलिस इस मामले की आगे की जाँच कर रही है।

यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

कोर्ट की फीस भरो, फिर डालो जितने मर्जी केस: वक्फ बोर्ड को गुजरात HC ने दिया झटका, 150 अर्जी खारिज करके जानिए क्या दिया फैसला

गुजरात हाई कोर्ट ने वक्फ बोर्ड को लेकर ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि वक्फ बोर्ड अब अदालत के शुल्क का भुगतान किए बिना मामले दायर नहीं कर सकते हैं। एक हफ्ते तल चली सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने वक्फ निकायों द्वारा दायर लगभग 150 याचिकाओं को खारिज कर दिया।

यह फैसला गुजरात के इतिहास में वक्फ मामलों की सबसे बड़ी सामूहिक अस्वीकृतियों में से एक है और इस लंबे समय से चली आ रही धारणा का अंत करता है कि कोर्ट और ट्रिब्युनलों में अपील करते समय वक्फों को विशेष छूट प्राप्त थी, जबकि दूसरी ओर मंदिरों और अन्य धार्मिक संस्थानों के कोर्ट फीस देते थे।

वक्फ की 150 याचिकाओं को किया खारिज

गुजरात हाई कोर्ट के जस्टिस जेसी दोशी ने यह फैसला वक्फ बोर्ड की ओर 150 याचिकाओं को खारिज कर सुनाया है। इन याचिकाओं में किराएदारों या कथित अतिक्रमणकारियों से वक्फ संपत्तियों का कब्जा वापस लेने और उससे जुड़े अन्य लाभ (जैसे मुनाफा) की माँग की गई थी।

याचिकाकर्ताओं में सुन्नी मुस्लिम ईदगाह मस्जिद ट्रस्ट, वडोदरा सहेर मस्जिद सभा ट्रस्ट और अहमदाबाद की सरखेज रोजा कमेटी जैसे वक्फ ट्रस्टों ने गुजरात राज्य वक्फ ट्रिब्युनल के आदेशों को चुनौती दी थी। इन आदेशों में कहा गया था कि किसी भी विवाद की सुनवाई से पहले अदालत शुल्क (कोर्ट फीस) जमा करना जरूरी है।

हाई कोर्ट ने कहा कि वक्फ ट्रस्टों ने ट्रिब्युनल के सामने ऐसी राहते माँगी थीं, जिनमें दोनों पक्षों के बीच विवाद था और जिनका फैसला करने के लिए उनके अधिकारों और जिम्मेदारियों का कानूनी तौर पर निर्धारण करना जरूरी थी। इसलिए ये मामले साधारण आवेदन नहीं, बल्कि पूरे विवाद वाले मुकदमे की तरह थे।

कोर्ट ने साफ कहा कि वक्फ अधिनियम की धारा 83 के तहत दायर आवेदन न्यायिक कार्यवाही होते हैं। ये मुकदमे का रूप लेते हैं, इसलिए इन पर गुजरात न्यायालय शुल्क अधिनियम, 2004 लागू होता है। इस कारण कोर्ट फीस देना अनिवार्य है।

हाई कोर्ट का वक्फ ट्रिब्युनल आदेशों में दखल से इनकार

गुजरात हाई कोर्ट ने कहा कि वक्फ ट्रिब्युनल ने जो पहला आदेश दिया था, उसमें मुकदमे की कीमत (Valuation) को अदालत शुल्क और क्षेत्राधिकार के हिसाब से ठीक करने का निर्देश दिया गया था। इस आदेश को वक्फ संस्थानों ने किसी भी उच्च अदालत में समय पर चुनौती नहीं दी। बाद में जब कोर्ट ने अदालत शुल्क न देने के कारण वाद (Plaint) खारिज कर दिया, तब इस पर आपत्ति उठाई गई।

हाई कोर्ट ने कहा कि जब पहले आदेश को सही समय पर चुनौती ही नहीं दी गई, तो अब दूसरे आदेश को केवल इस आधार पर गलत नहीं ठहराया जा सकता कि पर्याप्त कोर्ट फीस नहीं दी गई थी। कोर्ट ने साफ कहा कि उसे निचली अदालत के आदेशों में कोई गंभीर कानूनी गलती, अधिकार क्षेत्र से जुड़ी कमी या कानून की गलती नजर नहीं आती, जिसकी वजह से दोबारा हस्तक्षेप किया जाए। इसी आधार पर अदालत ने सभी याचिकाएँ खारिज कर दीं।

फीस जरूरी, केवल ‘आवेदन’ कहने से नियम नहीं बदलते: कोर्ट

हालाँकि, वक्फ संस्थानों की ओर से वकील ने यह दलील दी कि वक्फ अधिनियम में अदालत शुल्क देने को लेकर कोई साफ प्रावधान नहीं है, इसके तहत दायर किसी भी आवेदन पर कोर्ट फीस नहीं देनी होती। लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

कोर्ट ने कहा कि गुजरात न्यायालय शुल्क अधिनियम, 2004 की धारा 1(5) साफ बताती है कि राज्य के सभी न्यायालयों और सार्वजनिक कार्यालयों में लगने वाली फीस इसी कानून के तहत तय होगी, जब तक किसी खास कानून में अलग से कोर्ट फीस को लेकर प्रावधान न किया गया हो।

कोर्ट ने यह भी कहा कि गुजरात न्यायालय शुल्क अधिनियम की धारा 4 के अनुसार, जब तक तय कोर्ट फीस जमा नहीं की जाती, तब तक किसी भी अदालत में कोई दस्तावेज दाखिल, प्रदर्शित या रिकॉर्ड नहीं किया जा सकता और न ही कोई सार्वजनिक कार्यालय उन दस्तावेजों को स्वीकार कर सकता है।

हाई कोर्ट ने आगे बताया कि वक्फ ट्रिब्युनल को सिविल कोर्ट का दर्जा दिया गया है और उसे मुकदमे की सुनवाई, डिक्री या आदेश लागू करने के लिए सिविल कोर्ट जैसी सभी शक्तियाँ मिली हुई हैं। ऐसे में सिर्फ यह कह देना कि मामला ‘आवेदन’ के रूप में दायर हुआ है, उसे मुकदमे से अलग नहीं बनाता। जब तक उस आवेदन के जरिए पक्षों के अधिकारों और जिम्मेदारियों का फैसला माँगा जा रहा है, तो वह असल में मुकदमा जैसा ही माना जाएगा।

इसी कारण कोर्ट ने कहा कि यह कहना सही नहीं है कि वक्फ अधिनियम की धारा 83 के तहत होने वाली सभी कार्यवाहियों पर कोर्ट फीस बिल्कुल लागू नहीं होगी।

वक्फ मामलों में दशकों पुरानी गलतफहमी पर लगा विराम

पहले कुछ कानूनी प्रावधानों के तहत वक्फ संस्थानों को कोर्ट फीस से छूट मिलती थी। लेकिन अब यह छूट खत्म मानी जाएगी। गुजरात हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि मुस्लिम वक्फ ट्रस्टों को भी अन्य धार्मिक ट्रस्टों और चैरिटेबल संस्थाओं की तरह ही अदालत में मामला लड़ने के लिए तय कोर्ट फीस चुकानी होगी।

कई दशकों से छोटे दरगाह प्रबंधनों से लेकर बड़े मस्जिद बोर्डों तक यह मान्यता बनी हुई थी कि वक्फ से जुड़े विवादों पर कोर्ट फीस नहीं लगती, क्योंकि पुराने वक्फ कानून में कोर्ट फीस को लेकर कोई साफ उल्लेख नहीं था। लेकिन अब कोर्ट ने इस गलतफहमी को दूर कर दिया है।

देशभर में वक्फ बोर्ड पर बहस के बीच हाई कोर्ट का फैसला

यह फैसला ऐसे समय पर आया है जब देशभर में वक्फ प्रशासन को लेकर चर्चा चल रही है। इस साल की शुरुआत में संसद ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 पास किया था, जिसका उद्देश्य वक्फ की जमीन और संपत्तियों के प्रबंधन को ज्यादा आधुनिक और व्यवस्थित बनाना है। इस कानून को लेकर जहाँ कुछ लोगों ने सराहना की है, वहीं कुछ ने इसकी आलोचना भी की है।

फैसले के समर्थकों का कहना है कि नए बदलावों से कामकाज में पारदर्शिता आएगी और वक्फ संस्थानों का प्रशासन मजबूत होगा। वहीं सरकारी सूत्रों का मानना है कि हाई कोर्ट का यह आदेश कानून के सामने सभी को समान मानने की दिशा में एक अहम कदम है और इससे अदालतों की प्रक्रिया में चली आ रही पुरानी असमानता भी खत्म होगी।

गुजरात डिप्टी सीएम ने कोर्ट के फैसले को बताया ‘ऐतिहासिक’

गुजरात के डिप्टी सीएम हर्ष रमेश संघवी हाई कोर्ट के फैसले को ऐतिहासिक करार दिया है। डिप्टी सीएम ने कहा कि भारत में सभी धर्म एक समान हैं और कोर्ट ने सभी नागरिकों के लिए समान अधिकारों को सुनिश्चित किया है।

डिप्टी सीएम हर्ष संघवी ने कहा, “वक्फ कानून, जिसे कॉन्ग्रेस ने वोट बैंक की राजनीति के जरिए राजनीतिक लाभ के लिए पेश किया था। उसमें ऐसे प्रावधान थे जो वक्फ संपत्तियों और ट्रिब्युनल मामलों को कोर्ट फीस से छूट देते थे। वहीं मंदिरों, गुरुद्वारों और अन्य धार्मिक संस्थानों से संबंधित संपत्ति और ट्रिब्युनल मामलों पर कोर्ट फीस लगाया जाता था।”

मुस्लिम मुल्क में महादेव की आस्था: मस्कट के उस 125 साल पुराने शिव मंदिर की गाथा जिसे गुजराती व्यापारियों ने बनाया, जानिए क्या है इसके चमत्कारी कुएँ का रहस्य

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सफल इथियोपिया यात्रा के बाद ओमान की राजधानी मस्कट पहुँचे। इथियोपिया में रणनीतिक साझेदारी को नए आयाम देने के बाद, ओमान में उनका स्वागत किसी उत्सव से कम नहीं रहा। हाथों में तिरंगा लिए और ‘मोदी-मोदी’ के नारे लगाते हुए लोगों का हुजूम सड़कों पर उतरा।

ओमान की राजधानी मस्कट में एक ऐतिहासिक शिव मंदिर है, जिसकी चर्चा पहले भी हो चुकी है। यह मंदिर न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि अरब जगत में भारतीय विरासत की मजबूती का गवाह भी है।

125 साल पुराना इतिहास: गुजरात से ओमान तक का सफर

मस्कट के मुत्तरा क्षेत्र में स्थित ‘मोतीश्वर महादेव मंदिर’ खाड़ी क्षेत्र (गल्फ) के सबसे पुराने हिंदू मंदिरों में से एक माना जाता है। इस मंदिर की नींव आज से करीब 125 साल पहले 1900 के आसपास रखी गई थी। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, गुजरात के कच्छ इलाके के ‘भाटिया’ व्यापारिक समुदाय के लोग 1500 के दशक में ही व्यापार के सिलसिले में ओमान में बसने लगे थे। इन्हीं व्यापारियों ने अपनी आस्था को जीवित रखने के लिए इस भव्य मंदिर का निर्माण कराया था।

समय के साथ यह मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि ओमान में रह रहे भारतीय समुदाय का सबसे बड़ा संगम स्थल बन गया। 19वीं सदी में गुजराती व्यापारियों का प्रभाव इतना बढ़ गया था कि उनके सुल्तानों के साथ बेहद मधुर संबंध थे। इसी सौहार्द की विरासत को आगे बढ़ाते हुए 1999 में इस मंदिर का भव्य नवीनीकरण किया गया, जो आज अपनी पूरी आभा के साथ मस्कट के ‘अल आलम पैलेस’ के समीप स्थित है।

रेगिस्तान में चमत्कार: मंदिर के कुएँ का रहस्य

ओमान एक रेगिस्तानी देश है जहाँ बारिश बहुत कम होती है और पानी की किल्लत एक सामान्य बात है। लेकिन मोतीश्वर शिव मंदिर के साथ एक ऐसी मान्यता जुड़ी है जिसे भक्त महादेव का चमत्कार मानते हैं। मंदिर परिसर में एक प्राचीन कुआँ स्थित है, जो भीषण गर्मी और सूखे के बावजूद कभी खाली नहीं होता। रेगिस्तानी इलाका होने के बावजूद इस कुएँ में साल भर पर्याप्त जल रहता है।

स्थानीय लोग और श्रद्धालु इस कुएँ को बेहद पवित्र और चमत्कारी मानते हैं, क्योंकि इसके आसपास कहीं और पानी का कोई प्राकृतिक स्रोत नजर नहीं आता। महाशिवरात्रि जैसे बड़े त्योहारों पर जब 20 हजार से भी अधिक श्रद्धालु यहाँ एकत्रित होते हैं, तब भी यह कुआँ अपनी शीतलता से मंदिर की जीवंतता को बनाए रखता है। यह कुआँ भक्तों की आस्था को और अधिक दृढ़ बनाता है।

तीन देवताओं का वास: मंदिर की आध्यात्मिक संरचना

मोतीश्वर मंदिर परिसर में केवल एक नहीं, बल्कि तीन प्रमुख देवताओं के मंदिर स्थापित हैं। यहाँ ‘श्री आदि मोतीश्वर महादेव’, ‘श्री मोतीश्वर महादेव’ और ‘श्री हनुमान जी’ के अलग-अलग मंदिर हैं। मंदिर का संचालन पूरी तरह व्यवस्थित है, जहाँ मुख्य पुजारियों के साथ-साथ भारी संख्या में स्वयंसेवक अपनी सेवाएँ देते हैं। यह मंदिर खाड़ी देशों में सनातन धर्म की परंपराओं को अक्षुण्ण रखे हुए है।

यहाँ केवल शिवरात्रि ही नहीं, बल्कि वसंत पंचमी, रामनवमी, हनुमान जयंती और गणेश चतुर्थी जैसे त्योहार भी उसी उत्साह के साथ मनाए जाते हैं जैसे भारत में। मंदिर प्रशासन और ओमान सरकार के बीच का समन्वय यह दर्शाता है कि एक मुस्लिम बहुल देश होने के बावजूद ओमान ने भारतीय संस्कृति और धार्मिक स्वतंत्रता को कितना सम्मान दिया है।

अमरीन ने हुस्न को हथियार बना हिंदू व्यापारी को वीडियो कॉल पर फँसाया, ब्लैकमेल कर ऐठें लाखों: मेरठ पुलिस ने गिरोह को बेनकाब कर 4 पकड़े, पढ़ें FIR की डिटेल्स

उत्तर प्रदेश के मेरठ में पुलिस ने हनीट्रैप के जरिए ब्लैकमेलिंग और रंगदारी वसूली करने वाले एक संगठित गिरोह का खुलासा किया है। लिसाड़ी गेट थाना पुलिस ने इस मामले में अमरीन समेत दो महिलाओं और 2 अन्य आरोपितों को गिरफ्तार किया है। आरोप है कि इस गिरोह ने एक कपड़ा व्यापारी अरुण को अश्लील वीडियो वायरल करने की धमकी देकर उससे बड़ी रकम वसूली है।

प्रहलाद नगर निवासी अरुण द्वारा 14 दिसंबर 2025 को दर्ज कराई गई FIR में इस पूरे घटनाक्रम का सिलसिलेवार वर्णन किया गया है। अरुण ने FIR में अमरीन, शमीना, अतीक और आफताब को नामजद किया था जबकि एक अन्य आरोपित अज्ञात था। अरुण के साथ यह घटना 13 दिसंबर 2025 को हुई थी।

अरुण से रकम वसूलने से पहले अमरीन ने अरुण को वीडियो कॉल पर अपने जाल में फँसा लिया था। बातचीत के बहाने वह लगातार वीडियो कॉल पर जुड़ती रही और इसी दौरान अमरीन ने दोनों के बीच हुए अतरंग पलों को चुपचाप रिकॉर्ड कर लिया था।

कैसे अमरीन ने अरुण को फँसाया?

पीड़ित अरुण ने पुलिस को दी अपनी शिकायत में बताया है कि करीब 3-4 दिन पहले उनके मोबाइल फोन पर एक अज्ञात नंबर से कॉल आई। कॉल करने वाली युवती ने अपना नाम अमरीन बताया और बातचीत शुरू की। इसके बाद उसने वीडियो कॉल पर बात करनी शुरू कर दी और उसी दौरान वीडियो कॉल के स्क्रीनशॉट ले लिए।

13 दिसंबर 2025 को युवती ने यह कहकर अरुण को अपने घर बुलाया कि घर पर कोई नहीं है। शाम करीब 5:30 बजे अरुण बताए गए पते पर पहुँचा हैदर पब्लिक स्कूल वाली गली में स्थित है। जैसे ही वह घर के अंदर गए, वहाँ अमरीन की अम्मी शमीना, उसका चाचा अतीक, एक व्यक्ति आफताब (जिसे मुल्ला बताया गया) और एक अन्य व्यक्ति भी पहुँच गए।

FIR के मुताबिक, आरोपितों ने अरुण का वीडियो बनाना शुरू कर दिया और फोटो व वीडियो वायरल करने की धमकी देकर उसे डराया। पीड़ित का आरोप है कि इन लोगों ने उन्हें झूठे मुकदमे में फँसाकर जेल भिजवाने की धमकी दी और 5 लाख रुपए की रंगदारी माँगी। डर के कारण अरुण ने अपनी 10 ग्राम की सोने की चेन और 7,500 रुपए उन्हें दे दिए। इसके बावजूद आरोपितों ने एक लाख रुपए और देने की माँग की। ना देने पर फोटो-वीडियो वायरल करने की धमकी दी।

FIR का एक हिस्सा

FIR के मुताबिक, अरुण ने दोस्तों और घर से पैसे जुटाकर उसी शाम करीब 7:30 बजे आरोपितों को उनके घर जाकर एक लाख रुपए नकद दे दिए। इसके बाद भी उत्पीड़न नहीं रुका। आरोप है कि अगली सुबह अमरीन के चाचा अतीक ने एक अन्य मोबाइल नंबर से कॉल कर 50 हजार रुपए और माँगने शुरू कर दिए तथा रकम न देने पर जान से मरवाने की धमकी दी। लगातार मिल रही धमकियों से डरे पीड़ित ने लिसाड़ीगेट थाने पहुंचकर पूरे मामले की शिकायत दर्ज कराई है।

पुलिस ने आरोपितों को किया गिरफ्तार

मामले की संवेदनशीलता और गंभीरता को देखते हुए वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने तत्काल हस्तक्षेप करते हुए संबंधित थाने की टीम को त्वरित कार्रवाई के निर्देश दिए। निर्देश मिलते ही पुलिस ने योजनाबद्ध ढंग से कार्रवाई करते हुए विकासपुरी बिजली घर के पास से चारों नामजद आरोपितों अतीक, आफताब, शमीना और अमरीन को दबोच लिया।

पुलिस जाँच के दौरान पीड़ित द्वारा लगाए गए सभी आरोप प्रथम दृष्टया सही पाए गए जिसके बाद चारों को गिरफ्तार कर लिया गया। तलाशी के दौरान आरोपियों के कब्जे से 35 हजार रुपये नकद, एक सोने की चेन और चार मोबाइल फोन बरामद किए गए हैं, जिनका उपयोग कथित तौर पर पीड़ित को फँसाने, वीडियो बनाने और धमकाने में किया गया था।

जाँच में यह भी खुलासा हुआ है कि आरोपित किसी एक घटना को नहीं बल्कि संगठित गिरोह के रूप में इस तरह की वारदातों को अंजाम दे रहे थे और ब्लैकमेलिंग के जरिए लोगों से मोटी रकम वसूलते थे। पुलिस अब गिरोह के अन्य संभावित सदस्यों और पूर्व मामलों की भी पड़ताल कर रही है। फिलहाल सभी आरोपियों को न्यायालय में पेश करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है और मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई जारी है।