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286 किलो वजन, 08 फीट लंबाई, पंच धातु से निर्मित… क्या है ‘कोदंड’ जो अजानबाहु को किया समर्पित: जानिए इसके बारे में क्या कहते हैं धर्मग्रंथ

रामभक्तों के लिए बुधवार (22 जनवरी 2026) का दिन बहुत खास है। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा की दूसरी वर्षगांठ पर अयोध्या को एक अनमोल भेंट मिली है। ये भेंट है 286 किलोग्राम वजनी भव्य कोदंड। पंचधातु से बना यह धनुष ओडिशा से भव्य शोभायात्रा के साथ अयोध्या पहुँचा। मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने इसे विधि-विधान से स्वीकार किया। हजारों श्रद्धालु, संत-महात्मा और ट्रस्ट के पदाधिकारी मौजूद थे। हर कोई इसकी भव्यता और दिव्यता देखकर अभिभूत हो गया।

यह कोदंड सिर्फ एक धनुष नहीं है, बल्कि भगवान श्रीराम के शौर्य, धर्म और मर्यादा का प्रतीक है। यह आस्था, भारतीय शिल्पकला, राष्ट्रभक्ति और नारीशक्ति का अद्भुत मिलन है। ओडिशा के सनातन जागरण मंच ने इसे रामलला को समर्पित किया।

कोदंड क्या है और रामायण में इसका महत्व क्या है

कोदंड भगवान श्रीराम के धनुष का नाम है। वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास जी की रामचरितमानस में इसका बार-बार जिक्र मिलता है। श्रीराम को कोदंडधारी कहा जाता है, क्योंकि यह उनके बल, न्याय और अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक है।

उदाहरण के लिए, सीता स्वयंवर में श्रीराम ने शिव जी का भारी धनुष (जो कोदंड जैसा ही था) आसानी से उठाया और उसकी डोरी चढ़ाते ही वह टूट गया। इससे राजा जनक की पुत्री माता सीता का विवाह श्रीराम से हुआ। यह घटना बताती है कि श्रीराम कितने बलशाली और मर्यादित थे। परशुराम जी भी गुस्से में आए, लेकिन श्रीराम ने शांतिपूर्वक उनका क्रोध शांत किया।

तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में श्रीराम के सौंदर्य का वर्णन करते हुए लिखा है-

“कोदंड कठिन चढ़ाइ सिर जट जूट बाँधत सोह क्यों।
मरकत सयल पर लरत दामिनि कोटि सों जुग भुजग ज्यों॥”

अर्थात, कठिन कोदंड को चढ़ाए हुए, सिर पर जटाजूट बाँधे श्रीराम कितने सुंदर लगते हैं, जैसे हरे पर्वत पर लाखों बिजलियाँ और साँप लहरा रहे हों। यह दोहा श्रीराम के वीर और सुंदर रूप को दिखाता है।

एक और प्रसिद्ध मंत्र राम रक्षा स्तोत्र से है-

“चारु कोदंडं चारु चापं चारु शरं चारु सायकं।
चारुं चारुं चारु रूपं चारु चारु नमो नमः॥”

यह स्तोत्र रोजाना पढ़ने से रक्षा और शक्ति मिलती है। कोदंड यहाँ श्रीराम के दिव्य हथियार के रूप में आता है।

इस कोदंड की विशेषताएँ और निर्माण

यह कोदंड सोना, चाँदी, एल्युमिनियम, जस्ता और लोहे जैसी पाँच धातुओं से बना है। इसका वजन 286 किलो है और लंबाई-मजबूती देखते ही बनती है। सबसे खास बात यह है कि इस पर भारतीय सेना की वीर गाथाएँ उकेरी गई हैं। कारगिल युद्ध के बलिदानियों और अन्य युद्धों के चित्र बने हैं। इससे यह धनुष सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति का भी प्रतीक बन गया है। श्रीराम का कोदंड अधर्म का नाश करता था, वैसे ही आज की सेना देश की रक्षा करती है।

निर्माण की कहानी भी प्रेरणादायक है। तमिलनाडु के कांचीपुरम में 48 महिला कारीगरों ने आठ महीने तक दिन-रात मेहनत की। ये महिलाएं पारंपरिक शिल्पकला की जानकार हैं। उनकी साधना और समर्पण से यह धनुष तैयार हुआ। यह नारीशक्ति की मिसाल है कि कैसे महिलाएं बड़ी से बड़ी चुनौती पूरा कर सकती हैं।

भव्य शोभायात्रा का सफर

यह कोदंड 3 जनवरी 2026 को ओडिशा के राउरकेला से रवाना हुआ। सनातन जागरण मंच के संतोष कुमार विश्वाल ने बताया कि शोभायात्रा ओडिशा के सभी 30 जिलों से गुजरी। रास्ते में जगह-जगह श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा की, ढोल-नगाड़े बजाए और ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाए। यह यात्रा सिर्फ धार्मिक नहीं थी, बल्कि सनातन संस्कृति और राष्ट्रीय एकता का संदेश लेकर चली।

19 जनवरी 2026 को कोदंड पुरी पहुँचा। वहाँ भगवान जगन्नाथ के मंदिर में दर्शन हुए। जगन्नाथ जी के आशीर्वाद के बाद यात्रा आगे बढ़ी। हर जगह भक्तों का उत्साह देखने लायक था। लोग दूर-दूर से आते और कोदंड को छूकर आशीर्वाद लेते।

अयोध्या में आगमन और समर्पण

बुधवार (22 जनवरी 2026) को कोदंड अयोध्या पहुँचा। राम मंदिर परिसर में हजारों लोग इकट्ठा हुए। चंपत राय जी ने इसे रामलला को अर्पित किया। संतों ने मंत्रोच्चार किया और पूजा-अर्चना हुई। यह दिन प्राण-प्रतिष्ठा की दूसरी वर्षगाँठ का भी था, इसलिए उत्सव दोगुना हो गया।

इस कोदंड का गहरा संदेश

यह कोदंड हमें कई बातें सिखाता है। पहला- भक्ति और समर्पण से कितना बड़ा काम हो सकता है। दूसरा- महिलाओं की शक्ति, 48 कारीगरों ने दिखाया कि नारीशक्ति क्या होती है। तीसरा- राष्ट्रभक्ति, सेना की गाथाएँ बताती हैं कि श्रीराम का शौर्य आज भी जीवित है। चौथा- एकता, ओडिशा से तमिलनाडु तक इसमें पूरे देश का योगदान दिख रहा है।

रामचरितमानस में तुलसीदास जी कहते हैं: “राम नाम जपना सब सुखों का मूल है।”

ऐसे आयोजन हमें राम नाम की महिमा याद दिलाते हैं।

प्रभु श्रीराम का यह कोदंड अयोध्या पहुँचकर रामभक्तों के दिलों को छू गया। यह बताता है कि राम राज केवल अतीत नहीं, बल्कि आज भी प्रेरणा है। धर्म की जीत, शौर्य की रक्षा और शिल्प की सुंदरता का यह संगम पूरे देश में नई उमंग भर रहा है।

कट्टरपंथी वर्कआउट के बहाने बना रहे हिंदू लड़कियों को निशाना, पहचान छिपाकर करते हैं लव जिहाद: जानें मुस्लिम ट्रेनर्स को जिम के बाहर रखना क्यों है जरुरी?

कुछ साल पहले तक जिम को सिर्फ शरीर बनाने, आत्मविश्वास बढ़ाने और स्वस्थ रहने की जगह माना जाता था। माता-पिता निश्चिंत होकर अपनी बेटियों को जिम भेजते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि यह एक सुरक्षित, प्रोफेशनल माहौल है। लेकिन धीरे-धीरे देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी घटनाएँ सामने आने लगीं, जिनमें जिम का नाम शोषण, धोखे, ब्लैकमेलिंग, धर्मांतरण और लव जिहाद के आरोपों से जुड़ने लगा।

मुस्लिम ट्रेनर हिंदू लड़कियों को हिंदू नामों से फँसाते और बाद में उन पर धर्मांतरण का दबाव डालते और ना मानने पर उनकी फोटो को एडिट कर अश्लील सामाग्री तैयार कर ब्लैकमेल करते। आगे कुछ ऐसी ही घटनाओं की जानकारी दी गई है, ताकि यह समझना आसान हो कि हिंदु बहन-बेटियों की सुरक्षा के लिए इन जिहादियों और कट्टरपंथियो का एक साधारण से जिम से भी दूर रहना किस तरह से आवश्यक है।

जिम की आड़ में धर्मांतरण और ब्लैकमेलिंग का नेटवर्क

सबसे नए मामले में उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में धर्म परिवर्तन और नमाज पढ़ने का दबाव डालकर युवतियों के शोषण की घटना है, जहाँ जिम की आड़ में यह पूरा नेटवर्क चलाए जाने का आरोप है। पुलिस ने इस मामले में मो शेख अली आलम, फैजल खान, जहीर खान और शादाब को गिरफ्तार किया। बाद में पुलिस ने आरोपित जिम मालिक/ट्रेनर फरीद को एनकाउंटर के बाद गिरफ्तार किया।

पीड़ित युवतियों के अनुसार, शहर के अलग-अलग इलाकों में संचालित KGN और आयरन फायर नामक जिमों में वे व्यायाम के लिए जाती थीं। यहाँ जिम संचालक और ट्रेनर पहले उनसे दोस्ती करते, फिर प्रेम जाल में फँसाकर धीरे-धीरे धर्म परिवर्तन और नमाज पढ़ने का दबाव बनाने लगते थे।

आरोप है कि युवतियों के निजी फोटो और वीडियो बनाए गए, जिनके जरिए उन्हें ब्लैकमेल कर मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित किया गया। विरोध करने पर बदनाम करने और नुकसान पहुँचाने की धमकियाँ दी जाती थीं। पुलिस जाँच में सामने आया है कि आरोपित युवतियों से अलग-अलग मौकों पर पैसे भी वसूलते थे।

पीड़िताओं की तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर पुलिस ने पाँच जिमों को सील भी कर दिया है।

बरेली के एयू फिटनेस में ‘जिम जिहाद’ का मामला

बरेली में सामने आए जिम ट्रेनर से जुड़े मामले में महिला के भाई ने गंभीर और सनसनीखेज आरोप लगाए थे, जिनको लेकर इलाके में तनाव की स्थिति बनी थी। यह पूरा मामला उस समय उजागर हुआ था, जब एक विवाहित महिला अपने पति और पाँच साल के बेटे को छोड़कर जिम में काम के दौरान बने संबंधों के चलते जिम ट्रेनर शोएब के साथ रहने लगी थी।

महिला के भाई का आरोप था कि उसकी बहन को जिम ट्रेनर शोएब ने योजनाबद्ध तरीके से फँसाया था। भाई के अनुसार, एयू फिटनेस जिम में ‘जिम जिहाद’ चलाया जा रहा था, जहाँ मुस्लिम ट्रेनरों के जरिए हिंदू लड़कियों को प्रेम जाल में फँसाया जाता था और बाद में उन पर धर्मांतरण का दबाव बनाया जाता था।

भाई ने दावा किया था कि उसकी बहन भी इसी साजिश का शिकार हुई थी और उसे परिवार से तोड़ने की कोशिश की जा रही थी। उसने यह भी आरोप लगाया था कि जब वह अपनी बहन को समझाने और वापस पति व बच्चे के पास भेजने के लिए जिम पहुँचा था, तो शोएब और उसके साथियों ने उसे घेर लिया था।

उसके साथ बेरहमी से मारपीट की गई थी और उसे अधमरी हालत में छोड़ दिया गया था। परिवार ने आरोप लगाया था कि शोएब और उसके साथ जुड़े लोग कट्टरपंथी सोच रखते थे और पूरे परिवार को जान से मारने की धमकी दे रहे थे।

घटना के बाद महिला की माँ हिंदूवादी संगठन के कार्यकर्ताओं के साथ मौके पर पहुँची थीं और जिम के बाहर प्रदर्शन किया गया था। अंत में भाई की तहरीर पर पुलिस ने जिम ट्रेनर शोएब और जिम मालिक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर हिरासत में लिया था।

होटल में पकड़ा गया जिम ट्रेनर, पहचान छिपाने के आरोप

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में जिम ट्रेनर और युवती के होटल में पकड़े जाने का मामला सामने आया था। आरोप लगा कि युवक ने अपनी असली पहचान छिपाकर युवती से दोस्ती की थी। पकड़ा गया मजहर खान नाम का ये युवक जिम ट्रेनर था। अपनी पहचान छिपाकर हिंदू युवती को हबीबगंज इलाके के एक होटल में लेकर पहुँचा था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, होटल में मजहर की जगह उसने अपना नाम बंटी बताया था। खबर हिंदू संगठनों को लगी तो बड़ी संख्या में कार्यकर्ता होटल पहुँच गए। युवक को पकड़कर उसकी पिटाई कर दी। इसी बीच सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुँची और युवक को पकड़कर अपने साथ थाने लेकर आई।

आरोपित मजहर, विशाल फिटनेस सेंटर में जिम ट्रेनर था। उसने अपना नाम बंटी बताकर युवती से दोस्ती बढ़ाई थी। दोनों की मुलाकात जिम में ही हुई थी। दोस्ती बढ़ने के बाद मजहर युवती को लेकर होटल गया था।

जिम ट्रेनर अमन खान करता था बैड टच

मध्य प्रदेश के जबलपुर की एक जिम में लव जिहाद और धर्मांतरण की कोशिश का मामला सामने आया। मामला आधारताल थाना क्षेत्र में स्थित साईं फिटनेस जिम का था। यहाँ रिसेप्शनिस्ट की जॉब करने वाली 21 वर्षीय युवती ने जिम के ट्रेनर के खिलाफ केस दर्ज करवाया।

युवती का आरोप था कि आरोपित अपना नाम अमन राज बताता था जबकि उसका असली नाम अमन खान था। शिकायत के अनुसार, अमन जिम में आने वाली युवतियों से बैड टच करता था और धर्मांतरण के लिए उनका ब्रेन वॉश करता था।

युवती ने आरोप लगाया कि आरोपित उसे भी बैड टच करते हुए टॉर्चर करता था, युवती हिन्दू टाईगर फोर्स नाम के संगठन के कार्यकर्ताओं के साथ आधारताल पहुँची थी जिसकी शिकायत पर पुलिस ने अमन खान पर FIR दर्ज की। पुलिस ने साईं फिटनेस जिम पहुँचकर भी जाँच की और जिम ट्रेनर अमन खान को गिरफ्तार कर लिया।

जिम ट्रेनर और युवती के साथ पकड़े जाने पर विवाद, हिंदू संगठनों ने लगाए गंभीर आरोप

मध्य प्रदेश के इंदौर के भंवरकुआँ इलाके में एक जिम ट्रेनर को युवती के साथ घूमते हुए बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने पकड़ा और उसकी पिटाई कर उसे थाने ले जाया गया। मामले में जिम ट्रेनर के खिलाफ प्रतिबंधात्मक धाराओं में कार्रवाई की और उसे जेल भी भेज दिया गया। आरोपित ट्रेनर का नाम शादाब मंसूरी था, जो पेशे से एक जिम ट्रेनर था।

बजरंग दल के जिला संयोजक विजय कलखोर ने दावा किया कि शादाब का पहले से निकाह हो चुका है और उसके दो बच्चे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि शादाब जिम में आने वाली हिंदू युवतियों से नजदीकियाँ बढ़ाकर उन्हें इस्तेमाल करता और बाद में धोखा देकर निकल लेता था।

जिमों पर छापे, विरोध और राजनीतिक बयान

लगातार बढ़ते मामलों को देखते हुए मध्य प्रदेश में जिमों को लेकर बड़े स्तर पर विवाद भी खड़ा हुआ था। कुछ जिमों में मुस्लिम ट्रेनरों की मौजूदगी को लेकर सवाल उठाए गए। हिंदू संगठनों ने छापे मारे और प्रशासन से कार्रवाई की माँग की।

हिंदू संगठन बजरंग दल के कार्यकर्ता भोपाल के उस जिम में पहुँचे जहाँ हिंदू लड़कियों को मुस्लिम ट्रेनर ट्रेनिंग दे रहे थे। बजरंग दल का दावा था कि भोपाल में जिम ‘लव जिहाद’ का अड्डा बन गया है। मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद आलोक शर्मा ने भी कथित ‘लव जिहाद’ का मुद्दा उठाया।

बजरंग दल से जुड़े कमल पिपरिया ने मीडिया से बातचीत में कहा, “भोपाल में जिम ‘लव जिहाद’ का अड्डा बना हुआ है। हिंदू लड़कियों-महिलाओं को मुस्लिम युवक नाम बदलकर ट्रेनिंग दे रहे हैं। सवाल यह है कि नाम बदलकर क्यों ट्रेनिंग दिया जा रहा है। साथ ही लड़कियों के लिए महिला स्टाफ क्यों नहीं रखा गया है? हमारी प्रशासन से माँग है कि सख्त कार्रवाई की जाए। साथ ही यहाँ पर 90 फीसदी हिंदू महिलाओं के लिए ट्रेनर भी हिंदू ही होना चाहिए।”

भोपाल में एक जिम में पुलिस टीम के साथ पहुँचे सब-इंस्पेक्टर (SI) ने कथित तौर पर कर्मचारियों से कहा कि यहाँ न कोई मुस्लिम ट्रेनिंग देने आएगा और न ही लेने। पुलिस टीम के साथ बजरंग दल के कार्यकर्ता भी मौजूद थे। बजरंग दल से जुड़े प्रशांत सिंह पटेल ने कहा कि जो 90 फीसदी हिंदू लड़कियाँ जिम में आती हैं उन्हें ट्रेनिंग देने के लिए कोई भी महिला ट्रेनर नहीं है।

संचालक से माँग की गई की वह महिलाओं के लिए महिला ट्रेनर की नियुक्ति करें। भारतीय जनता पार्टी के विधायक रामेश्वर शर्मा ने कहा कि हम सभी का एक ही मत है कि भोपाल में लव जिहाद करने वाले पकड़े जा रहे हैं। उन पर सख्ती से कार्रवाई होनी चाहिए। प्रशासन को इस बात की गुत्थी सुलझानी चाहिए कि कौन इन्हें पनाह दे रहा है।

इसके साथ ही साथ उन्होंने हिंदू समाज से अपील की कि वह इस बात पर ध्यान दें कि घर के बेटी किस जिम में जा रही हैं और कौन उन्हें ट्रेनिंग दे रहा है। उन्होंने कहा कि अगर अभी भी इस पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो हो सकता है कि ‘लव जिहाद’ की कड़ी में अगला नंबर आपका हो।

इसके अलावा बीजेपी सांसद अलोक शर्मा ने भी कहा कि मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व में लव जिहाद की अनुमति नहीं दी जाएगी। अगर कोई ऐसा करता है तो कठोर से कठोर कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि भोपाल में कई जिम है जिसकी लिस्ट तैयार की जा रही है। इन जिम में ट्रेनर मुस्लिम समुदाय के हैं। प्रशासन को जिम संचालक के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए।

BJP विधायक ने कहा- मुस्लिम लड़कियाँ भी ना हों जिम में ट्रेनर

ऐसे मामलों में बढ़ोतरी को देखते हुए कई अन्य राजनीतिक नेताओं के बयान भी सामने आए, जिनमें महिलाओं से सतर्क रहने और जिम चुनते समय ट्रेनरों की जानकारी रखने की अपील की गई। BJP के विधायक रामेश्वर शर्मा ने हिंदू महिलाओं से अपील की कि वे मुस्लिम ट्रेनर से सावधान रहें।

उन्होंने हिंदू महिलाओं से हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए कहा, “सभी बहन-भाइयों से, बेटियों से प्रार्थना करता हूँ कि इस बात का ध्यान रखो, सावधान रहो। आप यह देखो कि जिस जिम में ट्रेनिंग ले रहे हो उसका अपराधिक रिकॉर्ड क्या है?” 

शर्मा ने आगे कहा कि मुस्लिम लड़कियाँ भी ट्रेनर के तौर पर सही नहीं हैं। उन्होंने केरल फाइल्स फिल्म का उदाहरण देते हुए कहा कि मुस्लिम बेटियाँ भी हिंदू लड़कियों को झाँसे में लेकर मुस्लिम लड़कों से दोस्ती करवाती हैं।

एक जैसी घटनाएँ, एक जैसी कहानी, फिर क्यों ना हो मुस्लिम ट्रेनर्स को जिम से दूर रखने की माँग

इन सभी मामलों को जोड़कर देखें तो घटनाएँ अलग-अलग शहरों की हैं, लेकिन तरीका एक जैसा है। जिम में ट्रेनर और ट्रेनी के बीच भरोसे का रिश्ता बनता है। ट्रेनर की भूमिका मार्गदर्शक की होती है, जिससे युवतियाँ जल्दी प्रभावित होती हैं।

इसी भरोसे का गलत फायदा उठाकर कट्टरपंथी भोली-भाली मासूम हिंदू लड़कियों को निशाना बनाते हैं और अंत में कभी उनको नमाज पढ़ने के लिए मजबूर किया जाता है तो कभी सीधे धर्मांतरण के लिए। ऐसे में यह सोचना और इस तरह की माँग करना अपने आप में बेहद जरुरी हो जाता है कि जिम से मुस्लिम ट्रेनर्स को बाहर किया जाए।

सायमा के लिए ‘CRPF’ लिखकर मुस्लिम नाम छिपाना सही, पर आतंकी का वीडियो सामने आना ‘निंदनीय’: एजेंडाधारी वामी-कामी ‘गैंग’ की मानसिकता समझिए

हाल ही में ग्रेटर नोएडा से एक रूह कँपा देने वाला मामला सामने आया है। CRPF जवान तारिक अनवर और उसकी बेगम रिम्पा खातून ने रिश्तेदारी में 10 साल की बच्ची के साथ बेरहमी से मारपीट की। इतना प्रताड़ित किया कि उसकी पसलियाँ टूट गईं, दाँत टूट गए, पूरे शरीर पर जख्म हैं। आज वह बच्ची अस्पताल में वेंटिलेटर पर जिंदगी के लिए लड़ रही है। यहाँ सवाल इंसानियत का है, बच्ची के साथ हुए जुल्म का है और न्याय का है।

लेकिन इस जघन्य अपराध पर रेडियो मिर्ची RJ सायमा की टिप्पणी ने इसे एजेंडा बना दिया। सायमा ने मामले को इंसानियत के नजरिए से देखने के बजाए अपने तयशुदा एजेंडे के तहत पेश किया। सायमा ने सिर्फ ‘CRPF’ को फोकस में रखा और आरोपित का नाम छिपा लिया। और अंत में ‘जय हिंद’ जोड़ दिया।

RJ सायमा का ट्वीट (फोटो साभार: X)

यही RJ सायमा की असली पहचान है। वो हर मामले को इंसान नहीं, पहचान के चश्में से देखती हैं। अगर आरोपित मुस्लिम हो तो नाम छिपाओ। शब्द तौलो। और अपने नैरेटिव के अनुसार तोड़-मरोड़कर सामने रख दो। जिससे अपराधी नहीं, बल्कि वर्दी बदनाम हो और सरकार घेरे में आए।

सायमा ने यहाँ भी यही किया। मुस्लिम नाम छिपाकर ‘CRPF’ को उछाला और वर्दी को कठघरे में लाया गया। सायमा के लिए अपराध मैटर नहीं करता। मैटर करता है अपराधी की पहचान। और फिर आता है सबसे घिनौना हिस्सा- टिप्पणी के आखिर में ‘जय हिंद’। यह कोई देशभक्ति दिखाने को लिए तो यहाँ नहीं ही लिखा गया है, बल्कि यह सेना को ‘मॉक’ करने के इरादे से जरूर लिखा प्रतीत हो रहा है।

RJ सायमा के पुराने बयानों को देखें तो यह तस्वीर और साफ होती है। हिजाब पर सवाल हो, तो ‘इस्लाम में जबरदस्ती नहीं‘ की लाइन तैयार रहती है। कुरान पर आलोचना हो, तो तुरंत उसे गलत समझ और इस्लामोफोबिया बता दिया जाता है। लेकिन जब बात देश की सुरक्षा संस्था से जुड़ी CRPF की हो, तो वही संतुलन गायब हो जाता है। वहाँ पूरी वर्दी को दोषी ठहराने में देर नहीं लगती।

यह सवाल इसलिए भी जरूरी है क्योंकि सेना, पुलिस और अर्धसैनिक बल किसी धर्म के नहीं होते। वे देश के होते हैं। अगर किसी वर्दी वाले ने अपराध किया है, तो उस व्यक्ति पर कार्रवाई होनी चाहिए, न कि पूरी वर्दी को कठघरे में खड़ा करने की साजिश। लेकिन जब ऐसे मामलों में आरोपित की पहचान धुँधली रखी जाए और सेना को टारगेट किया जाए, तो शक होना लाजमी है।

निष्कर्ष साफ है। RJ सायमा को न बच्ची से मतलब है, न इंसाफ से। उन्हें सिर्फ मौका चाहिए। मौका सेना को कठघरे में खड़ा करने का। मौका अपने तयशुदा एजेंडे को आगे बढ़ाने का। अगर यह मामला किसी आम मुस्लिम व्यक्ति का होता और उसमें पुलिस या सेना का नाम नहीं जुड़ा होता, तो सायमा शायद चुप रहतीं। जैसे वो लाल किले के पास फिदायीन हमला करने वाले उमर नबी के मामले में रही थीं। उमर नबी का वीडियो लीक होना उन्हें नामंजूर था, जिसमें वह खुद इस्लाम में फिदायीन बनने को अच्छा बता रहा था। तब एक आतंकी की पहचान उजागर होना सायमा के लिए निंदनीय था।

लेकिन अब जैसे ही सायमा देश की सुरक्षा संस्था CRPF दिखा, तो उनका ट्वीट तैयार हो गया। साथ में लिखा गया- जय हिंद। इसमें भी शब्द चुने गए। नाम गायब किया गया। और अपने एजेंडा के मुताबिक परोसा गया।

यह वही पुरानी चाल है। पहले अपराध को पहचान की आड़ में छुपाओ। फिर देश की सुरक्षा करने वाली वर्दियों को बदनाम करो। और अंत में ‘जय हिंद’ लिखकर खुद को बचा लो। यह सीधा-सीधा जहर है, जो हर बार अलग मुद्दे के बहाने परोसा जाता है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार एक मासूम बच्ची वेंटिलेटर पर है और सायमा का एजेंडा यहाँ भी ऑन ही है।

देश अब यह समझने लगा है कि कौन इंसाफ की बात कर रहा है और कौन इंसाफ का इस्तेमाल कर रहा है। RJ सायमा जैसे लोगों का पर्दाफास होना जरूरी है, क्योंकि ये लोग अपराधी से ज्यादा खतरनाक होते हैं। अपराधी एक होता है, लेकिन ऐसे लोग पूरे सिस्टम को शक के घेरे में डाल देते हैं। वर्दी को बदनाम करते हैं और फिर उसी वर्दी के नाम पर ‘जय हिंद’ लिखकर इंसाफ का ढोंग करते हैं।

सेंट्रल रजिस्ट्रेशन सिस्टम में बड़ी सेंध, 2 महीने में बने 1 लाख फर्जी जन्म प्रमाण पत्र: बीजेपी नेता किरीट सोमैया ने किया बड़ा दावा

बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद किरीट सोमैया ने मंगलवार (20 जनवरी 2026) को सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (CRS) पोर्टल में एक बहुत बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा किया है। सोमैया ने दावा किया कि नवंबर और दिसंबर 2025 के दौरान, महज दो महीनों के भीतर इस पोर्टल के जरिए एक लाख से भी ज्यादा फर्जी जन्म प्रमाण पत्र (बर्थ सर्टिफिकेट) जारी किए गए हैं।

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए सोमैया ने कहा कि यह घोटाला सिर्फ भ्रष्टाचार का साधारण मामला नहीं है। उन्होंने इस पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि इतनी बड़ी तादाद में फर्जी दस्तावेज तैयार करना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है। उनके अनुसार, सरकारी सिस्टम में सेंधमारी कर इस तरह के फर्जीवाड़े को अंजाम देना बेहद चौंकाने वाला है।

किरीट सोमैया ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार के CRS पोर्टल को हैक करके और सरकारी रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ कर इस बड़े घोटाले को अंजाम दिया गया है। उन्होंने कुछ बेहद हैरान करने वाले आँकड़े पेश करते हुए बताया कि महाराष्ट्र के जलगाँव, पारोला और यवतमाल के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के रायबरेली और अलीगढ़ जिलों में बड़ी गड़बड़ियाँ मिली हैं।

किरीट सोमैया के मुताबिक, कई ऐसे गाँव हैं जिनकी कुल आबादी तो केवल 1,000 से 1,500 के बीच है, लेकिन वहाँ के रिकॉर्ड में 10,000 से लेकर 27,000 तक जन्म पंजीकरण (बर्थ रजिस्ट्रेशन) पाए गए हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से लगभग 99 प्रतिशत रजिस्ट्रेशन 20 से 60 साल की उम्र के लोगों के लिए किए गए हैं, जो इस पूरे मामले को बेहद संदेहास्पद और गंभीर बनाता है।

अंतरराज्यीय गिरोह का पर्दाफाश, कई गिरफ्तारियाँ

किरीट सोमैया के अनुसार, इस मामले की जाँच में अब तक एक अंतरराज्यीय गिरोह से जुड़े आठ लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इस घोटाले का मुख्य आरोपित अवधेश कुमार दुबे बताया जा रहा है, जिसने कथित तौर पर कंप्यूटर सिस्टम का इस्तेमाल कर सरकारी एंट्रीज़ में हेरफेर की और फर्जी रिकॉर्ड तैयार किए।

सोमैया ने बताया कि उन्होंने इस गंभीर विषय पर महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक (DGP) सदानंद दाते से मुलाकात की है और अब वे इस मामले को नई दिल्ली में केंद्र सरकार के पास ले जाने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने गंभीर आरोप लगाया कि इन फर्जी जन्म प्रमाण पत्रों का इस्तेमाल घुसपैठियों को भारतीय पहचान पत्र दिलाने और उन्हें ‘वैध नागरिक’ बनाने के लिए किया जा रहा था।

मुंबई में अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों पर एक्शन: फुटपाथों से हटाए गए हॉकर

किरीट सोमैया ने कथित सर्टिफिकेट घोटाले को अवैध घुसपैठ से जोड़ते हुए दावा किया कि मुंबई की सड़कों पर हजारों बांग्लादेशी नागरिक बिना किसी कानूनी अनुमति के हॉकर (फेरीवाले) के रूप में काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि मुंबई पुलिस कमिश्नर और नगर निगम कमिश्नर के सहयोग से एक कड़ा अभियान चलाया गया, जिसके तहत मुलुंड रेलवे स्टेशन क्षेत्र सहित कई इलाकों से अतिक्रमण हटा दिया गया है।

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सोमैया ने शिव सेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे पर भी राजनीतिक हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन निर्वाचन क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी बहुत ज्यादा है, वहाँ वोटर्स ने MIM का समर्थन किया, जबकि जिन क्षेत्रों में 15 से 20 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं, वहाँ समर्थन ठाकरे की पार्टी की ओर झुक गया। सोमैया ने दावा किया कि जो राजनीतिक नेता अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करते हैं, वे ही इस कानूनी कार्रवाई में बाधा डालने की कोशिश कर रहे हैं।

उन्होंने आगे ज़ोर देते हुए कहा कि मुंबई के तथाकथित ‘हरियालीकरण’ (ग्रीनिंग) की वकालत करने वालों को 2026 में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में भाजपा की ओर से ‘मुँहतोड़ जवाब’ मिलेगा।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से इंग्लिश में जिनित जैन ने लिखी है। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

छोटे उद्योगों को मिलेगा लाभ, युवाओं के लिए बढ़ेगा रोजगार: मोदी सरकार ने अब SIDBI के लिए मंजूर किया ₹5000 करोड़ का फंड, जानिए कैसे मजबूत होगा MSME सेक्टर

केंद्र सरकार ने MSME सेक्टर को और मजबूत बनाने के लिए एक बड़ा फैसला लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार (21 जनवरी 2026) को भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक यानी SIDBI को 5,000 करोड़ रुपए की इक्विटी सहायता देने को मंजूरी दे दी। इस कदम का मकसद SIDBI की वित्तीय स्थिति को मजबूत करना और इसके जरिए देशभर के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों तक आसान और सस्ता कर्ज पहुँचाना है, ताकि रोजगार के नए मौके पैदा हो सकें।

इस फैसले की जानकारी खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा की। पीएम मोदी ने लिखा कि SIDBI को इक्विटी सपोर्ट देने का कैबिनेट का यह फैसला अनगिनत MSME को फायदा पहुँचाएगा और ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को आगे बढ़ाने में मदद करेगा।

सरकार की ओर से मंजूर की गई यह 5,000 करोड़ रुपए की इक्विटी पूंजी वित्तीय सेवा विभाग (DFS) के जरिए SIDBI में लगाई जाएगी। यह निवेश एक साथ नहीं, बल्कि तीन चरणों में किया जाएगा। वित्त वर्ष 2025–26 में पहले चरण में 3,000 करोड़ रुपए, जबकि 2026–27 और 2027–28 में अगले दो चरणों में 1,000–1,000 करोड़ रुपए का निवेश होगा। यह पूंजी SIDBI की बुक वैल्यू के आधार पर डाली जाएगी, जिससे बैंक की इक्विटी मजबूत होगी और भविष्य की जरूरतों को पूरा किया जा सकेगा।

MSME सेक्टर को सीधा फायदा, दायरा होगा बड़ा

इस इक्विटी सपोर्ट का सबसे बड़ा फायदा MSME सेक्टर को मिलने वाला है। आने वाले वर्षों में SIDBI से वित्तीय सहायता पाने वाले MSME की संख्या में अच्छी-खासी बढ़ोतरी होने की उम्मीद है। अभी जहाँ यह संख्या करीब साढ़े सात करोड़ के आसपास है, वहीं 2027–28 तक इसमें करीब 25 लाख से ज्यादा नए MSME जुड़ सकते हैं। इससे छोटे उद्यमियों तक औपचारिक बैंकिंग और फाइनेंस की पहुँच और मजबूत होगी।

रोजगार सृजन को मिलेगी रफ्तार

MSME सेक्टर पहले ही देश में रोजगार का सबसे बड़ा स्रोत माना जाता है। आँकड़ों के मुताबिक, एक MSME औसतन चार से पाँच लोगों को रोजगार देता है। इसी आधार पर अनुमान है कि जब करीब 25.74 लाख नए MSME लाभार्थी जुड़ेंगे, तो इससे लगभग 1.12 करोड़ नए रोजगार पैदा हो सकते हैं। यानी यह फैसला लाखों युवाओं के लिए नौकरी के नए दरवाजे खोल सकता है।

SIDBI की बैलेंस शीट और CRAR होगी मजबूत

आने वाले समय में SIDBI का कर्ज पोर्टफोलियो तेजी से बढ़ने वाला है, खासकर निर्देशित ऋण, डिजिटल लोन और स्टार्टअप्स को दिए जाने वाले उद्यम ऋण के चलते। इससे जोखिम-भारित परिसंपत्तियों में भी इजाफा होगा। ऐसे में पूंजी-जोखिम भारित परिसंपत्ति अनुपात यानी CRAR को मजबूत बनाए रखना जरूरी है। अतिरिक्त इक्विटी पूंजी SIDBI को इस चुनौती से निपटने में मदद करेगी।

बेहतर क्रेडिट रेटिंग, MSME को सस्ता कर्ज

इस फैसले से SIDBI की क्रेडिट रेटिंग मजबूत होगी, जिससे उसे बाजार से कम ब्याज दर पर फंड जुटाने में आसानी होगी। इसका सीधा फायदा MSME को मिलेगा, क्योंकि उन्हें भी कम ब्याज पर कर्ज मिल सकेगा। सरकार का मानना है कि चरणबद्ध इक्विटी निवेश से SIDBI अगले तीन वर्षों तक दबाव वाले हालात में भी अपने पूंजी अनुपात को सुरक्षित स्तर से ऊपर बनाए रख सकेगा।

कुल मिलाकर, SIDBI को दी गई यह 5,000 करोड़ रुपए की इक्विटी मदद सरकार की उस बड़ी रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत MSME सेक्टर को देश की आर्थिक ग्रोथ की मजबूत रीढ़ बनाया जा रहा है। यह फैसला न सिर्फ उद्योगों को ताकत देगा, बल्कि रोजगार सृजन के जरिए ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को भी नई गति देगा।

‘अब उपद्रव नहीं, यहाँ उत्सव होते हैं’: UP दिवस से पहले CM योगी ने जनता के नाम लिखी ‘पाती’, कहा- 6 करोड़ लोगों को निकाला गरीबी से बाहर

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गुरुवार (22 जनवरी 2025) को प्रदेश की जनता के नाम ‘योगी की पाती’ शीर्षक के साथ भावनात्मक पत्र लिखा। इस पत्र के माध्यम से मुख्यमंत्री ने बीते वर्षों में उत्तर प्रदेश में आए व्यापक बदलावों, सरकार की नीतियों, विकास की उपलब्धियों और भविष्य के संकल्पों को विस्तार से साझा किया।

उन्होंने प्रदेश की उस यात्रा का वर्णन किया, जिसमें उत्तर प्रदेश ने एक समय की बीमारू राज्य की छवि को पीछे छोड़ते हुए आज देश के विकास के प्रमुख ग्रोथ इंजन के रूप में अपनी पहचान बनाई है। पत्र में सुशासन, कानून व्यवस्था, आर्थिक प्रगति, सामाजिक सशक्तिकरण और सांस्कृतिक पुनर्जागरण जैसे विषय प्रमुख रूप से उभरकर सामने आते हैं।

सुशासन और कानून व्यवस्था से बदली प्रदेश की तस्वीर

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने पत्र में सबसे पहले प्रदेश में स्थापित कानून और सुशासन की चर्चा की। उन्होंने लिखा कि दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति और स्पष्ट नीतियों के चलते उत्तर प्रदेश में कानून का राज स्थापित हुआ है। पहले जहाँ माफिया और अपराधियों को सत्ता का संरक्षण मिलता था, वहीं अब उनके अवैध साम्राज्यों पर कठोर कार्रवाई की गई है।

उन्होंने लिखा कि बेहतर कानून व्यवस्था के कारण प्रदेश में निवेश का माहौल बदला है। जो निवेशक पहले उत्तर प्रदेश से दूरी बनाते थे, वे अब यहाँ निवेश के लिए उत्सुक हैं। सरकार की पारदर्शी नीतियों और सुरक्षा के भरोसे ने प्रदेश को उद्योग और व्यापार के लिए आकर्षक गंतव्य बना दिया है।

आर्थिक विकास, कृषि और रोजगार की नई दिशा

‘योगी की पाती’ में सीएम ने आर्थिक प्रगति और रोजगार सृजन को विशेष स्थान दिया है। मुख्यमंत्री ने बताया कि कृषि क्षेत्र में उत्तर प्रदेश देश की खाद्य और आय सुरक्षा का मजबूत आधार बना है। ‘बीज से बाजार तक’ की व्यवस्था और सीधे बैंक खातों में भुगतान (DBT) से किसानों की आमदनी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

औद्योगिक विकास के चलते प्रदेश में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं। लेबर रिफॉर्म, डी-रेगुलेशन, एमएसएमई को बढ़ावा, कौशल विकास, स्टार्टअप संस्कृति और ODOP (वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट) जैसी योजनाओं ने स्थानीय उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाई है। बेरोजगारी की समस्या के समाधान की दिशा में प्रदेश तेजी से आगे बढ़ रहा है।

सामाजिक सशक्तिकरण और सांस्कृतिक पुनर्जागरण

मुख्यमंत्री ने पत्र में समाज के हर वर्ग के सशक्तिकरण पर भी जोर दिया। महिलाओं की श्रमबल में भागीदारी बढ़ने, बेटियों के जन्म से विवाह तक आर्थिक सहायता, निराश्रित महिलाओं, वृद्धों और दिव्यांगजनों के लिए पेंशन योजनाओं का उल्लेख किया गया।

स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार और हेल्थ-टेक के जरिए सुविधाएँ आमजन तक पहुँची हैं। जल, थल और नभ कनेक्टिविटी के विकास से व्यापार, पर्यटन और निवेश को नई गति मिली है। साथ ही अयोध्या, काशी, मथुरा से लेकर संभल तक सांस्कृतिक चेतना और परंपराओं का पुनर्जागरण हो रहा है।

मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि जीरो पॉवर्टी के लक्ष्य के साथ करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला गया है। उन्होंने लिखा, “हमने जीरो पॉवटी लक्ष्य के साथ 6 करोड़ से अधिक लोगों को गरीबी से बाहर निकाला है। डबल इंजन सरकार ने प्रदेश को ‘बॉटलनेक से ब्रेक’, ‘रेवेन्यू डेफिसिट से रेवेन्यू सरप्लस’ एवं ‘उपद्रव से उत्सव की ओर अग्रसर किया है।”

अंत में उन्होंने 24 जनवरी को मनाए जाने वाले उत्तर प्रदेश दिवस के अवसर पर विकसित उत्तर प्रदेश के संकल्प को दोहराते हुए प्रदेशवासियों को शुभकामनाएँ दीं।

बता दें कि साल 2026 में उत्तर प्रदेश 77 साल पूरे होने का जश्न मनाएगा। 24 जनवरी 1950 को संयुक्त प्रांत का नाम अधिकारिक तौर पर बदलकर ‘उत्तर प्रदेश’ कर दिया गया था। इस दिन को प्रदेशवासी ‘उत्तर प्रदेश दिवस’ के रूप में मनाते हैं। पहली बार इसे आधिकारिक रूप से प्रदेश में BJP सरकार आने के बाद जनवरी 2018 में मनाया गया था।

‘इसको बताना है… अंजाम क्या होता है’: उमेश कोल्हे की हत्या में यूसुफ खान को जमानत देने से बॉम्बे HC का इनकार, कहा- समाज को आतंकित करना चाहते थे

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मंगलवार (20 जनवरी 2026) को अमरावती के केमिस्ट उमेश कोल्हे की हत्या के मामले में आरोपित पशु चिकित्सक यूसुफ खान को जमानत देने से इनकार कर दिया। उमेश कोल्हे की 2022 में हत्या इसलिए की गई थी क्योंकि उन्होंने बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा के समर्थन में वॉट्सऐप पर एक संदेश भेजा था। जमानत खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि पहली नजर में यह मामला सिर्फ हत्या का नहीं बल्कि एक आतंकी गिरोह बनाने का है। अदालत के अनुसार, नूपुर शर्मा के बयान को लेकर आरोपियों ने अपने मजहब का अपमान मानते हुए बदला लेने की साजिश रची और आम लोगों में डर फैलाने के मकसद से यह हत्या की गई।

जस्टिस ए.एस. गडकरी और जस्टिस श्याम सी. चांडक की पीठ ने कहा कि NIA द्वारा पेश सबूत यह दिखाते हैं कि यह न तो साधारण आपराधिक साजिश थी और न ही कोई अकेली हिंसक घटना। हत्या की योजना, तरीका और मंशा समाज की व्यवस्था और सामूहिक चेतना को झकझोरने वाली है। इसी वजह से UAPA कानून के तहत आरोपित को जेल में रखना सही ठहराया गया।

यूसुफ खान के वकील ने दलील दी कि यह मामला सिर्फ व्यापारिक विवाद का है लेकिन अदालत ने इस तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पूरे घटनाक्रम को देखें तो आरोपित ने जानबूझकर उकसाया, पीड़ित की पहचान उजागर की और ऐसी घटनाओं की कड़ी में शामिल रहा, जिसका अंत एक निर्मम हत्या में हुआ ताकि समाज में डर का संदेश दिया जा सके।

उमेश कोल्हे की हत्या की पृष्ठभूमि

उमेश कोल्हे, महाराष्ट्र के अमरावती में दवाइयों की दुकान चलाते थे। 21 जून 2022 की रात दुकान बंद कर घर लौटते समय उनकी हत्या कर दी गई। यह हत्या नूपुर शर्मा के बयान को लेकर हुई हिंसा की पृष्ठभूमि में हुई थी। कोल्हे ने 14 जून 2022 को एक व्हाट्सएप ग्रुप में नूपुर शर्मा के समर्थन में फोटो और संदेश साझा किया था। ऐसे ही पोस्ट करने वाले कई लोगों को माफी मांगने के लिए मजबूर किया गया लेकिन कोल्हे को जानबूझकर निशाना बनाया गया। अभियोजन के अनुसार यह हत्या अचानक नहीं बल्कि सोच-समझकर की गई साजिश का नतीजा थी।

यूसुफ खान की भूमिका और ‘व्यापारिक रंजिश’ वाली दलील क्यों हुई खारिज

कोर्ट ने यूसुफ खान को इस हत्या की छोटी कड़ी या संयोगवश जुड़ा व्यक्ति नहीं माना। यूसुफ खान एक पशु चिकित्सक है और उमेश कोल्हे को पहले से जानता था। वह नियमित रूप से कोल्हे की दुकान से दवाइयाँ खरीदता था। दोनों एक वॉट्सऐप ग्रुप ‘ब्लैक फ्रीडम’ के सदस्य थे, जिसमें वेटरनरी केमिस्ट और मेडिकल प्रतिनिधि थे। इस ग्रुप में यूसुफ खान अकेला मुस्लिम सदस्य था।

कोर्ट ने कहा कि खान नूपुर शर्मा के समर्थन में कोल्हे की पोस्ट से आहत था। उसका दावा था कि वह सिर्फ कोल्हे के कारोबार का बहिष्कार कराना चाहता था। हालाँकि, हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के आधार पर इस दलील को अविश्वसनीय बताया।

कोर्ट ने कहा कि अगर मकसद सिर्फ व्यापार रोकना होता तो यह संदेश केवल ग्राहकों तक सीमित रहता। खान ने वह पोस्ट कई वॉट्सऐप ग्रुपों और ऐसे लोगों तक फैलाया जिनका कोल्हे से कोई कारोबारी संबंध नहीं था। इससे साफ पता चला कि उसका उद्देश्य आर्थिक दबाव नहीं बल्कि उकसाना और निशाना बनाना था।

कोर्ट ने यह भी कहा कि खान पढ़ा-लिखा और पेशेवर व्यक्ति था और उस समय के संवेदनशील माहौल को समझ सकता था। इसके बावजूद उसने हालात शांत करने के बजाय भड़काऊ संदेश फैलाया। यही बात जमानत के समय उसके खिलाफ गई।

वॉट्सऐप संदेश, मोबाइल नंबर में बदलाव और मंशा कैसे साबित हुई

कोर्ट के फैसले में यूसुफ खान द्वारा भेजे गए व्हाट्सएप संदेश को बेहद अहम माना गया। कोर्ट ने पाया कि उमेश कोल्हे की पोस्ट का स्क्रीनशॉट लेने से पहले खान ने जानबूझकर कोल्हे के मोबाइल नंबर में हेर-फेर की और नंबर दोबारा सेव किया ताकि उसकी पहचान और संपर्क जानकारी ज्यादा लोगों तक पहुँचे।

इसके बाद यूसुफ खान ने हिंदी में भड़काऊ संदेश लिखकर लोगों से कहा कि कोल्हे को ‘सबक’ सिखाया जाए। इस मेसेज में लिखा था, “अमित मेडिकल प्रभात ताकीज तहसील के सामने इसको बताना है कि जिन लोगों के भरोसे कमाई की उनसे ही दुश्मनी का अंजाम क्या होता है, इस मेसेज को ज्यादा से ज्यादा ग्रुप में सेंड करें।”

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि खान ने संदेश सिर्फ एक बार नहीं बल्कि कई प्लेटफॉर्म पर फैलाया और इसके तुरंत बाद एक अन्य आरोपित (आरोपित नंबर-5) से मुलाकात की। अदालत के अनुसार, यह घटनाक्रम उकसावे से साजिश तक की साफ कड़ी दिखाता है, न कि कोई भावनात्मक या अचानक की गई हरकत।

फोन रिकॉर्ड, बैठकें और पर्दे के पीछे की भूमिका पर अदालत की टिप्पणी

कोर्ट ने जमानत खारिज करते हुए यूसुफ खान और आरोपित नंबर-5 के बीच हुई फोन बातचीत को अहम माना। रिकॉर्ड के अनुसार, हत्या से पहले और बाद में दोनों के बीच 25 फोन कॉल हुए। गवाहों के बयान और लोकेशन डेटा के साथ इन कॉल्स को साजिश में शामिल होने का मजबूत सबूत माना गया।

अभियोजन ने कहा कि आरोपित नंबर-5, खान और अन्य आरोपियों के बीच कड़ी की तरह काम कर रहा था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि साजिश में शामिल होने के लिए हर बैठक में मौजूद रहना जरूरी नहीं होता।

कोर्ट ने यह भी पाया कि 9 जून 2022 को खान की लोकेशन रोशन हॉल के पास थी, जहाँ नूपुर शर्मा के बयान के खिलाफ FIR को लेकर बैठक हुई थी। इसके बाद उसकी लगातार बातचीत और सह-आरोपितों से संपर्क से यह साबित हुआ कि वह शुरू से ही योजना का हिस्सा था। अदालत ने कहा कि खान ने भड़काऊ संदेश फैलाने के बाद खुद को हत्या की सीधी कार्रवाई से दूर रखा लेकिन पर्दे के पीछे रहकर साजिश को आगे बढ़ा रहा था।

अदालत ने साजिश को कैसे समझा और UAPA क्यों लगा

अदालत ने इस साजिश को अलग-अलग घटनाओं के बजाय पूरी घटनाक्रम की कड़ी के रूप में समझा। अभियोजन के अनुसार, यूसुफ खान का भड़काऊ संदेश इस साजिश की शुरुआत था। इसके बाद उसने आरोपित नंबर-5 से मुलाकात की, जो कोल्हे की पोस्ट से नाराज था। फिर आरोपित नंबर-5 अन्य आरोपितों से गौसिया हॉल में मिला जहाँ उमेश कोल्हे की सोशल मीडिया पोस्ट पर विस्तार से चर्चा हुई है।

कोर्ट ने बताया कि 19 जून 2022 को हुई बैठक में यह तय किया गया कि कोल्हे को उनके धर्म का अपमान करने की ‘सजा’ के तौर पर मारा जाएगा और हत्या का तरीका भी तय हुआ। 20 जून को पहली कोशिश नाकाम रही क्योंकि दुकान बंद थी। 21 जून की रात रेकी के बाद कोल्हे पर गर्दन पर चाकू से हमला कर हत्या कर दी गई।

हाईकोर्ट ने कहा कि साजिश को सीधे सबूतों से नहीं बल्कि व्यवहार, बातचीत और हालात से साबित किया जा सकता है। खान के मामले में रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से साजिश में उसकी सहमति साफ दिखती है।

कोर्ट ने आरोपियों को ‘आतंकी गिरोह’ बताते हुए कहा कि यह हत्या निजी बदले के लिए नहीं बल्कि समाज में डर फैलाने के लिए की गई थी। अदालत ने माना कि यह संदेश देना मकसद था कि कुछ विचारों का समर्थन करने पर हिंसक अंजाम भुगतना पड़ेगा। इसी वजह से UAPA की धाराएँ लागू की गईं और जमानत से इनकार किया गया।

यूसुफ खान की जमानत खारिज करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने साफ संदेश दिया कि विचारधारा से प्रेरित हिंसा, चाहे वह डिजिटल उकसावे से ही क्यों न शुरू हुई हो उसे हल्के में नहीं लिया जाएगा। अदालत ने कहा कि बोलने की आजादी को ‘सजा’ देने और पूरे समाज को डराने के लिए की गई लक्षित हत्याओं को निजी रंजिश या व्यापारिक विवाद बताकर कमजोर नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि साजिश हर चरण में दिखने वाली नहीं होती। कोई व्यक्ति अंतिम वार से दूर रहकर भी चुपचाप और सोच-समझकर भूमिका निभा सकता है और तब भी उसकी आपराधिक जिम्मेदारी बनी रहती है। अदालत ने कहा कि जब हिंसा का मकसद केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि समाज में डर फैलाना और दूसरों की आवाज दबाना हो, तो UAPA लागू होता है। खान की जमानत खारिज करना सजा नहीं बल्कि अपराध की गंभीरता और शुरुआती सबूतों का कानूनी नतीजा है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है विस्तार से पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

ये हरा-हरा देखने की तलब है या गजवा-ए-हिंद की चाह… सहर के ‘जहर’ के मायने समझते हैं क्या आप?

महाराष्ट्र में ठाणे जिले के मुंब्रा वार्ड में ‘हिजाब वाली’ सहर यूनुस शेख ने नगर निगम चुनाव जीता है। AIMIM के टिकट से नई पार्षद बनीं। 22 साल की सहर शेख ने जीत के बाद विक्टरी स्पीच दी, जो कोई आम भाषण तो बिल्कुल भी नहीं था। मंच से सहर शेख ने कहा कि पूरे मुंब्रा को ‘ग्रीन’ (हरा) रंग से रंगना है। सहर की इस स्पीच का वीडियो वायरल हो रहा है।

सोशल मीडिया में चर्चा पर बने हुए इस वायरल वीडियो में सहर शेख कहती है, “आने वाले 5 साल बाद भी जब चुनाव होंगे, तो उस चुनाव में भी विरोधियों को मुँहतोड़ जवाब देना है। पूरे मुंब्रा को ग्रीन कलर से ऐसे रंगना है कि इन लोगों को यहाँ से बुरी तरह से पछाड़कर भेजना है। हर एक उम्मीदवार सिर्फ AIMIM का आएगा।”

AIMIM पार्षद सहर शेख के इस बयान को लेकर जहाँ एक तरफ बहस छिड़ी हुई है। वहीं इस बयान के कई मायने भी निकाले जा रहे हैं। खासकर यहाँ ‘ग्रीन’ शब्द को किस संदर्भ में इस्तेमाल किया गया है, यह अब भी सवालों के घेरे में ही है। इस ग्रीन का मतलब क्या लोगों को इस्लाम से जोड़ना है, क्या यहाँ धर्म परिवर्तन की बात हो रही है? क्या मुंब्रा की नई पार्षद सिर्फ हरा-हरा देखना चाहती हैं? जवाब जानने के लिए लोग इसके क्या मायने निकाल रहे हैं, यह जानना जरूरी है।

सोशल मीडिया पर सहर शेख के ‘ग्रीन’ बयान पर प्रतिक्रिया

सहर शेख के इस बयान को सोशल मीडिया पर कुछ लोग हिंदुओं का नामोनिशान हटाने की चेतावनी बता रहे हैं, कोई मुंब्रा को मुस्लिम बहुल इलाका बनने पर चिंता व्यक्त कर रहा है, तो कोई यहाँ ‘ग्रीन’ का मतलब इस्लाम के ‘हरे’ रंग से जोड़कर देख रहा है।

इस बयान पर शिवसेना नेता शाइना एनसी ने कहा है, “सहर शेख युवा नेत्री हैं, वे मुंब्रा में कहती हैं कि वह मुंब्रा को हरा कर देंगी। आपको यह साफ करना चाहिए कि आप पर्यावरण की बात कर रही हैं, जहाँ आप हरा-भरा, साफ-सुथरा माहौल चाहती हैं। अगर ऐसा है, तो आपका बयान स्वीकार्य है। लेकिन अगर आप धर्म, जाति और संस्कृति के आधार पर लोगों को बांट रही हैं, तो यह बहुत दुख की बात है।”

एक्स यूजर हार्दिक कहते हैं, “डेमोग्राफी तेजी से बदल रही है। इनका एजेंडा बिल्कुल साफ है।” वे हिंदुओं को एकजुट होने के लिए कहते हैं, “असली खतरा हमे किससे है वे कोई नहीं देख पा रहा। हिंदुओं अपने धर्म, संस्कृति, धरोहर और विचारधारा का संरक्षण करना है तो समय रहते एक हो जाइए।”

एक और यूजर अभय प्रताप लिखते हैं, “मैडम साहिबा का एजेंडा एकदम से क्लियर है। नगरसेवक का चुनाव जीता है और पूरे क्षेत्र को हरा बना देना है। और ओवैसी के अनुसार एक हिजाबी PM बनेगी तो क्या करेगी?”

बाला नाम के एक्स यूजर ने कहा, “मिलिए 22 साल की AIMIM पार्षद सहर शेख से। ये वो ‘भटके हुए युवा’ नहीं है, इन्हें इस्लाम की अच्छी समझ है। दुख की बात है कि हिंदू अभी तक इस्लाम को नहीं जानते।”

एक और एक्स यूजर दीपा मुखर्जी कहती हैं, “अगर आपको हर चीज को हरा ही करना है, तो जाकर अपने बुजुर्गों की छोड़ी हुई विरासत- पाकिस्तान और बांग्लादेश को ही हरा कर दीजिए। वहाँ पहले से ही हर तरफ हरियाली फैली है, उसे और डुबो दीजिए। भारत को केसरिया ही रहने दीजिए। हमें आप लोगों की यहाँ जरा भी दखलअंदाजी नहीं चाहिए।”

ऑस अबाउट इंडियन नाम से एक्स यूजर कहते हैं, “मिस्टर ओवैसी एक हिजाब पहनने वाली प्रधानमंत्री चाहते थे। लेकिन हम पहले ही देख चुके हैं कि हिजाब पहनने वाली नेता स्थानीय पार्षद बनने पर कैसा व्यवहार करती हैं।”

लोगों की प्रतिक्रियाओं से साफ होता है कि सहर शेख के ‘ग्रीन’ के मायने कुछ भी हों, लेकिन लोग इसे कुछ सकारात्मक तरीके से तो देख नहीं ही रहे हैं। बल्कि यहाँ सहर शेख का मुंब्रा को ‘ग्रीन’ करने का मकसद जरूर जाहिर हो रहा है। सहर शेख ने यह बयान देकर AIMIM में तो अपनी जगह पक्की कर ली है, लेकिन इससे गैर-हिंदू लोग जरूर चिंता में पढ़ गए हैं। ऐसे में पार्टी के ‘नवाब’ असदुद्दीन ओवैसी देश में ‘हिजाब पहनने वाली’ प्रधानमंत्री बनने का ख्वाब देख रहे हैं।

सोशल मीडिया पर ‘ग्रीन’ कलर के मायने

सोशल मीडिया पर सहर शेख के ‘ग्रीन’ शब्द के जो मायने निकाले जा रहे हैं, वे अचानक से नहीं हैं। तमाम खबरें ऐसी आती रही हैं जब इस तरह के बयान देकर नफरत फैलाने के काम सरेआम हुए हैं और जब सवाल उठे तो कह दिया गया- कहने का मतलब कुछ और था।

आपको याद होगा असदुद्दीन ओवैसी के भाई अकबरुद्दीन ओवैसी ने खुलेआम 15 मिनट पुलिस हटाने की बात कही थी और तब उसने साफ कहा था, “हिंदुस्तान में हम 25 करोड़ हैं, तुम 100 करोड़ है ना, ठीक है तुम तो हमसे इतने ज्यादा हो, 15 मिनट पुलिस को हटा लो हम बता देंगे कि किसमें कितना दम है।”

आज ओवैसी ये बोल दें कि उनके भाई के इस बयान में 25 करोड़ का मतलब मुस्लिमों से नहीं था, तो क्या ये बातें बदल जाएँगी? क्या नहीं माना जाएगा कि ये सीधे तौर पर देश में रहने वाले 100 करोड़ हिंदुओं को धमकाने के लिए कहा गया था?

सहर शेख ने आज ओवैसी वाला जहर ही उगला है। बस बात ये है कि वो शब्द नहीं बदल पा रहीं, तो उसके मायने को तोड़-मरोड़ रही हैं। खुद को सेकुलर भी इसीलिए बताया जा रहै है क्योंकि लोग उस बयान का असल मतलब समझकर उनसे सवाल कर रहे हैं। वरना ‘ग्रीन’ रंग से उनकी मंशा क्या थी ये साफ उनके हाव-भाव में पता चल रहा है। अब वो इस हाव-भाव को छिपाने के लिए कुछ भी गढ़ें इससे जनता को क्या… उन्हें जरूरत है उस बयान को याद रखने की जो उन्होंने जीत के नशे में चूर होकर मंच से दिया है।

देखा जाए तो सहर मात्र 22 साल की युवती हैं, लेकिन उनके मुँह से निकला ये जहर हैरान करने वाला नहीं है। इसी सोशल मीडिया पर ऐसे तमाम वीडियो आपको वायरल होते हुए दिखेंगे, जहाँ छोटे-छोटे मुस्लिम बच्चों के मन में गजवा-ए-हिंद का मकसद भर दिया जाता है, वे सरेआम हिंदुस्तान को गाली देते हैं, पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हैं और इसी देश के बहुसंख्यकों को काफिर कहकर जहर उगलते हैं।

सहर शेख के ‘ग्रीन’ कलर के असल मायने

अब सहर शेख के विक्टरी स्पीच पर सवाल उठ रहे हैं तो उन्होंने सफाई दी है कि उन्होंने तो सिर्फ ‘ग्रीन’ शब्द का इस्तेमाल रंग के तौर पर किया था, लेकिन यहीं अगर कोई इस्लामी पैरोकार बैठा होगा तो ये निश्चित है कि उनके सामने ये मायने बदल जाएँगे। उसकी मजहबी सोच के अनुसार, इसके मायने मजहबी सोच का खुला ऐलान है।

भले ही सहर शेख समझा रही हैं कि वो सेकुलर है लेकिन ये इस्लामी पैरोकार लोग ग्रीन को इस्लामी पहचान से जोड़कर देख रहे हैं, और देख रहे हैं उस मुस्लिम पार्टी AIMIM की सोच से, जो आए दिन भड़काऊ बयान देकर कट्टरवादी पैदा करने में लगी रहती है। यहाँ ये लोग सहर शेख को सिर्फ अपना पार्षद मान रहे है, न कि पूरे मुंब्रा क्षेत्र का।

उधर, सहर शेख के इस बयान पर चिंता जाहिर करने वाले वह मुंब्रा के वह लोग हैं, जिन्होंने विकास के मुद्दे पर पार्षद चुना था। वे इस उम्मीद से वोट देने पहुँचे थे कि उनका पार्षद खराब सड़कें ठीक करवाएगा, पानी की समस्या सुलझाएगा, नगर में विकास होगा, लेकिन जीत के बाद स्पीच में उन्हें जरूर अपने नए पार्षद की स्पीच सुनकर मायूसी हाथ लगी होगी। जो मुंब्रा को विकास से नहीं, बल्कि ‘ग्रीन’ कलर की मजहबी सोच से रंगना चाहती हैं।

यह वही मानसिकता है, जो AIMIM की राजनीति की पहचान है। जहाँ असदुद्दीन ओवैसी मंच से भड़काऊ भाषण देने से नहीं चूकते, वहीं अब उनकी पार्टी में नए एडमिशन लेने वाले युवा भी उसी राह पर चल पड़े हैं। इससे साफ जाहिर है कि असदुद्दीन के लोकतंत्र और संविधान की बड़ी-बड़ी बातें करने का मतलब सिर्फ मजहब और एक ही सोच को आगे बढ़ाना है। और यही नतीजा है कि उनकी ‘हिजाब पहनने वाली’ सहर शेख पूरे शहर को ‘ग्रीन’ कलर में रंगना चाहती हैं।

खतरनाक सैन्य ठिकानों में तैनाती के लिए सेना ने FF BOT को बेड़े में किया शामिल, जानें- कितना अहम है यह स्वदेशी रोबोट जो बनेगा जवानों की ढाल

आग और तबाही के खतरनाक हालात में भी अपने जवानों की जान की कीमत से कोई समझौता न करते हुए भारतीय सेना ने एक ऐतिहासिक और निर्णायक कदम उठाया है। जवानों को सीधे आग के मोर्चे पर उतारने के बजाय अब तकनीक को आगे कर दिया गया है। इसी कड़ी में 13 जनवरी 2026 को सेना के डायरेक्टोरेट ऑफ कैपेबिलिटी डेवलपमेंट ने एक स्वदेशी कंपनी के साथ समझौता किया, जिसके तहत भारतीय सेना 18 अत्याधुनिक फायर फाइटिंग रोबोट (FF BOT) को अपने बेड़े में शामिल करने जा रही है।

इस सौदे की कुल कीमत 62 करोड़ रुपए तय की गई है। यह अहम फैसला ऐसे समय पर लिया गया है, जब सैन्य ठिकानों पर आग लगने की घटनाओं को लेकर खतरे और चिंताएँ लगातार बढ़ती जा रही हैं, खासकर गोला-बारूद और ईंधन भंडारण जैसे बेहद संवेदनशील और उच्च जोखिम वाले इलाकों में।

दिसंबर 2025 में विजय दिवस समारोह के दौरान आर्मी हाउस में FF BOT को सार्वजनिक रूप से पेश किया गया था। यह एक स्टैटिक डिस्प्ले था, जिसका उद्देश्य रोबोट की वास्तविक फायर फाइटिंग क्षमता का प्रदर्शन करना नहीं बल्कि उसके आधुनिक डिजाइन, प्रस्तावित भूमिका और ऑपरेशनल कॉन्सेप्ट को स्पष्ट करना था। इस दौरान सेना का जोर इस बात पर था कि किस तरह ऐसी अनमैन्ड तकनीकें बेहद खतरनाक परिस्थितियों में मानव उपस्थिति की जरूरत को कम कर सकती हैं और जवानों की सुरक्षा को कहीं अधिक मजबूत बना सकती हैं।

FF BOT क्या है और इसे क्यों माना जा रहा है खास?

FF BOT एक अनमैन्ड ग्राउंड फायर फाइटिंग सिस्टम है, जिसे खास तौर पर उन परिस्थितियों के लिए डिजाइन किया गया है, जहाँ इंसानों का जाना जानलेवा साबित हो सकता है। इस रोबोट को एक भारतीय स्टार्ट-अप एम्प्रेसा प्राइवेट लिमिटेड ने विकसित किया है।

इसका निर्माण रक्षा मंत्रालय की iDEX यानी Innovations for Defence Excellence पहल के तहत किया गया है, जिसका उद्देश्य रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी नवाचार और स्टार्ट-अप्स को बढ़ावा देना है। यह रोबोट उन हालात में काम करने में सक्षम है, जहाँ विस्फोट का खतरा हो, जहरीला धुआँ फैला हो, तापमान बेहद ज्यादा हो या इमारत के ढहने की आशंका हो।

ऐसे हालात में आमतौर पर फायर फाइटर्स को जान जोखिम में डालकर अंदर जाना पड़ता है लेकिन FF BOT की मौजूदगी इस खतरे को काफी हद तक कम कर देती है। हालाँकि, FF BOT को शुरुआत में भारतीय नौसेना के लिए iDEX फ्रेमवर्क के तहत विकसित किया गया था।

इसके सफल परीक्षणों के बाद अब भारतीय सेना ने भी इसे अपने बेड़े में शामिल करने का फैसला किया है। रक्षा मंत्रालय के नियमों के अनुसार, यदि किसी एक सेवा के लिए iDEX के तहत विकसित कोई सिस्टम सफलतापूर्वक परीक्षण पास कर लेता है, तो दूसरी सेवा भी उसे बिना नए विकास चरण के अपना सकती है।

FF BOT को सिंगल स्टेज कॉम्पोजिट ट्रायल के बाद मंजूरी दी गई। इस पूरे प्रोजेक्ट को आर्मी डिजाइन ब्यूरो का भी समर्थन मिला, जो यह दर्शाता है कि सेना स्वदेशी तकनीक और निजी क्षेत्र की भागीदारी को कितनी गंभीरता से ले रही है। यह कदम सीधे तौर पर मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत की सोच से जुड़ा हुआ है।

कहाँ और कैसे होगा FF BOT का इस्तेमाल?

सेना के अनुसार FF BOT को देश के अलग-अलग कैंटोनमेंट्स में तैनात किया जाएगा। खास तौर पर इन्हें गोला-बारूद डिपो, हथियार रखने के केंद्र, ईंधन और तेल के भंडार, सैन्य कारखानों और रिफाइनरी जैसे बेहद संवेदनशील और खतरनाक इलाकों में इस्तेमाल किया जाएगा।

इन जगहों पर अगर आग लगती है तो नुकसान सिर्फ इमारतों या सामान तक सीमित नहीं रहता बल्कि बड़े विस्फोट, सप्लाई सिस्टम के ठप होने और आसपास मौजूद दूसरी सैन्य इकाइयों के लिए भी गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। ऐसे हालात में FF BOT को सबसे पहले अंदर भेजा जाएगा ताकि वह आग की स्थिति को करीब से देख सके और शुरुआत में ही उसे काबू में लाने में मदद करे, जबकि फायर फाइटिंग में लगे जवान सुरक्षित दूरी पर रह सकेंगे।

FF BOT की तकनीकी क्षमताएँ

FF BOT को पूरी तरह रिमोट से ऑपरेट किया जाता है। यानी फायर फाइटर्स इसे खतरे वाले क्षेत्र के बाहर से नियंत्रित कर सकते हैं। इसमें लगे ऑप्टिकल और थर्मल कैमरे ऑपरेटर को लाइव वीडियो फीड भेजते हैं। थर्मल कैमरा खास तौर पर धुएँ के बीच छिपी आग, गर्म हिस्सों और हॉटस्पॉट की पहचान करने में मदद करता है, जो सामान्य आँखों से दिखाई नहीं देते।

इस लाइव और स्पष्ट जानकारी की वजह से फायर फाइटिंग टीम को हालात की बेहतर समझ मिलती है और वे तेजी से सही फैसले ले पाते हैं। कम दृश्यता और अत्यधिक जोखिम वाले माहौल में यह तकनीक बेहद अहम साबित होती है।

पहले भी हो चुका है FF BOT का इस्तेमाल

FF BOT सिर्फ कागजों या परीक्षण तक सीमित नहीं है। इसे पहले भी नागरिक क्षेत्र में आग बुझाने के अभियानों में इस्तेमाल किया जा चुका है। खास तौर पर विशाखापट्टनम रिफाइनरी में लगी भीषण आग के दौरान इस रोबोट की उपयोगिता सामने आई थी।

इस अनुभव ने यह साबित किया कि FF BOT न सिर्फ सैन्य ठिकानों के लिए बल्कि बड़े औद्योगिक हादसों और आपदा प्रबंधन में भी बेहद कारगर हो सकता है। अधिकारियों का कहना है कि भविष्य में इसे पावर स्टेशन, एयरपोर्ट और अन्य संवेदनशील स्थानों पर भी तैनात किया जा सकता है।

समझौते में क्या-क्या है शामिल और क्यों यह कदम है बेहद अहम?

सेना द्वारा किए गए इस समझौते में सिर्फ 18 रोबोट्स की खरीद ही नहीं बल्कि उनका लंबे समय तक रखरखाव भी शामिल है। इस कॉन्ट्रैक्ट के तहत दो साल की वारंटी और पाँच साल की व्यापक मेंटेनेंस सुविधा दी जाएगी। कुल मिलाकर सात साल तक ऑन-साइट सर्विस सपोर्ट सुनिश्चित किया गया है।

FF BOT की इंडक्शन प्रक्रिया अप्रैल के पहले सप्ताह से शुरू होने वाली है। FF BOT, iDEX SPRINT के DISC-7 के तहत पहला प्रोजेक्ट था, जिसे 2023 में Acceptance of Necessity मिली थी। यह दिखाता है कि कैसे एक भारतीय स्टार्ट-अप द्वारा विकसित तकनीक अब सीधे भारतीय सेना की जरूरतों को पूरा कर रही है।

सेना ने साफ किया है कि FF BOT का उद्देश्य मानव फायर फाइटर्स को हटाना नहीं, बल्कि उन्हें सबसे खतरनाक हालात से बचाना है। रोबोट पहले अंदर जाकर जोखिम उठाएगा, जिससे जवान सुरक्षित रहेंगे और प्रतिक्रिया तेज और प्रभावी होगी। FF BOT की खरीद भारतीय सेना के आधुनिकीकरण, स्वदेशीकरण और जवानों की सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

मदरसों-दरगाहों का नेटवर्क, मस्जिदों में अगवा कर ले जाते हैं हिंदू बच्चियाँ और मुस्लिमों से करवा देते हैं निकाह: पाकिस्तान में जबरन धर्मांतरण पर अदालत-पुलिस मौन

पाकिस्तान के सिंध प्रांत में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के खिलाफ संगठित और सुनियोजित अभियान चलाया जा रहा है। जहाँ नाबालिग लड़कियों का अपहरण किया जाता है, जबरन धर्मांतरण कराया जाता है और फिर निकाह के लिए मजबूर किया जाता है। भील, मेघवार और कोल्ही जैसे बेहद गरीब और सामाजिक रूप से हाशिए पर पड़े हिंदू समुदायों की लड़कियों को निशाना बनाया जाता है क्योंकि ऐसे परिवार न तो लंबी कानूनी लड़ाई लड़ सकते हैं और न ही मीडिया या सत्ता के गलियारों तक उनकी पहुँच होती है।

News18 की रिपोर्ट के मुताबिक, दरगाहों और मदरसों से जुड़े नेटवर्क के जरिए हिंदुओं को निशाना बनाया जा रहा है। पीर सरहिंदी दरगाह से जुड़े लोगों ने दावा किया है कि उनकी जगह पर अब तक करीब 1000 हिंदू लड़कियों का धर्मांतरण किया जा चुका है।

कैसे किया जा रहा है हिंदू युवतियों का उत्पीड़न?

इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत ज्यादातर या तो सीधे अपहरण से होती है या फिर डर और दबाव के जरिए। नाबालिग लड़कियों को शादी, नौकरी या आर्थिक सुरक्षा जैसे झूठे सपने दिखाए जाते हैं। कई बार उन्हें धमकाया जाता है और मजबूरी में घर छोड़ने को कहा जाता है। इसके तुरंत बाद लड़कियों को उनके अपने जिले से बाहर ले जाया जाता है। यह जल्दी किया गया स्थानांतरण इसलिए बहुत जरूरी होता है ताकि लड़की का संपर्क अपने परिवार से टूट जाए, वह किसी वकील या सामाजिक कार्यकर्ता तक न पहुँच सके और स्थानीय मीडिया की नजर भी इस मामले से दूर रहे।

धर्मांतरण आमतौर पर कुछ खास मस्जिदों, दरगाहों या मदरसों से जुड़े ठिकानों पर कराया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में कट्टरपंथी संगठनों से जुड़े नेटवर्क सक्रिय भूमिका निभाते हैं और सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ाया जाता है। इस तरीके का एक और गंभीर हिस्सा कागजात में हेरफेर है। फर्जी पहचान पत्र बनाए जाते हैं, जिनमें नाबालिग लड़कियों की उम्र बढ़ाकर उन्हें बालिग दिखाया जाता है।

इन बदले हुए दस्तावेजों का इस्तेमाल सिंध के बाल विवाह कानूनों से बचने के लिए किया जाता है। धर्मांतरण के सिर्फ तीन से चार दिन के भीतर ही लड़की की शादी करा दी जाती है, अक्सर किसी उम्रदराज व्यक्ति से या ऐसे आदमी से जिसकी पहले से शादी हो चुकी होती है। इस तरह पूरा मामला कानूनी दिखाने की कोशिश की जाती है जबकि असलियत में लड़की के पास कोई असली विकल्प नहीं होता है।

पाकिस्तान की अदालतें भी आरोपितों के साथ

अदालत की कार्यवाही इस समस्या को और गंभीर बना देती है। कई बार पीड़ित लड़कियों के बयान दबाव में दर्ज किए जाते हैं लेकिन इसके बावजूद पुलिस और अदालतें अक्सर ‘स्वेच्छा से धर्मांतरण’ के दावों को बिना गहराई से जाँचे ही सही मान लेती हैं। एक बार अदालत धर्मांतरण को मान्यता दे देती है तो उस फैसले को पलटना लगभग नामुमकिन हो जाता है। इसके साथ ही पीड़िता और उसके परिवार के लिए कानूनी रास्ते लगभग बंद हो जाते हैं।

पाकिस्तान में ऐसी व्यवस्था बना दी गई है जहाँ कानूनी खामियाँ हैं, सामाजिक कमजोरियाँ हैं और संस्थाएँ या तो उदासीनता हैं या कट्टरपंथी आरोपितों के पक्ष में ही खड़ी दिखती हैं। इसका नतीजा यह होता है कि अल्पसंख्यक लड़कियाँ एक ऐसे चक्र में फँस जाती हैं, जिससे बाहर निकलना बेहद मुश्किल होता है। इससे भी ज्यादा मुश्किल होता है इससे कानूनी रूप से चुनौती देना। ऐसे केसों की पाकिस्तान में भरमार है।

नाबालिग हिंदू लड़की का धर्मांतरण के बाद 7 बच्चों के अब्बू से निकाह

अक्टूबर 2025 में पाकिस्तान के सिंध प्रांत से ही एक हैरान करने वाली खबर सामने आई थी जहाँ एक 15 साल की नाबालिग हिंदू लड़की का 7 बच्चों के अब्बू से निकाह करा दिया गया था। लड़की मूक-बधिर थी और इसे इस्लाम कबूल कराया जा चुका था। लड़की के पिता ने आरोप लगाया कि उनकी मूक-बधिर बेटी कभी एक ड्रग तस्कर और 7 बच्चों के बाप से निकाह नहीं कर सकती है, उसे मजबूर किया गया है। पाकिस्तान में हिंदुओं और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए काम करने वाले शिव कच्छी ने कहा कि पुलिस ने परिजनों की अपहरण की शिकायत पर कार्रवाई नहीं की।

पढ़ना है तो मुस्लिम बनो: सिंध में हिंदुओं को धमकी

पाकिस्तान में कट्टरता का आलम ऐसा है कि हिंदू लड़कियों को पढ़ाई लिखाई करने के लिए भी स्कूलों के भीतर ही इस्लाम अपनाने का दबाव बनाया जा रहा था। दिसंबर 2025 में सिंध प्रांत में स्थित मीरपुर सकरो के एक सरकारी हाई स्कूल से यह घटना सामने आई थी।

नवंबर के अंत में कुछ हिंदू छात्राओं के माता-पिता ने बताया की स्कूल की प्रिंसिपल ने उनकी बेटियों से पढ़ाई जारी रखने के लिए इस्लाम अपनाने को कहा था। अभिभावकों का यह भी कहना है कि छात्राओं को कलमा पढ़ने के लिए मजबूर किया गया और उनके धर्म का मजाक उड़ाया गया। इंकार करने पर कुछ छात्राओं को स्कूल से घर भेज दिया गया।

12 साल में 14000 हिंदू लड़कियों का अपहरण-धर्मांतरण

सिंध के हिंदुओं की स्थिति इतनी भयावह है कि लोग किसी भी सूरत में पाकिस्तान छोड़ना चाहते थे। भारत का वीजा नहीं मिलने के कारण हिंदू समुदाय के कई लोगों द्वारा आत्महत्या किए जाने का भी मामला सामने आया था। 2023 में सिंध में गड़िया लुहार सहायता कमेटी के चेयरमैन मांजी लुहार उर्फ काका ने बताया था कि पिछले छह माह में उनके चार परिचित हिंदुओं ने आत्महत्या कर ली।

सामाजिक कार्यकर्ता रोशन भील का कहना है कि ऐसा हर परिवार अतीत भूलना चाहता है, पर ऐसा होता नहीं है। पाकिस्तान में पिछले 12 सालों में 14,000 हिंदू लड़कियों का अपहरण, जबरन धर्मांतरण और गैंगरेप की घटनाएँ सामने आई हैं।