आज वेनेजुएला की तस्वीरें देखकर यह यकीन करना मुश्किल होता है कि यही देश कभी दुनिया के सबसे अमीर देशों में गिना जाता था। जिस देश के पास पृथ्वी का सबसे बड़ा कच्चे तेल का भंडार है, वहाँ लोग खाने के लिए लाइन में खड़े हैं, अस्पतालों में दवाएँ नहीं हैं और लाखों लोग जान जोखिम में डालकर देश छोड़ चुके हैं। यह तबाही किसी युद्ध, विदेशी कब्जे या प्राकृतिक आपदा का नतीजा नहीं है। यह एक ऐसी आर्थिक और राजनीतिक विफलता है, जिसे आधुनिक इतिहास में बिना युद्ध के ‘सबसे बड़ा आर्थिक पतन’ माना जा सकता है।
वेनेजुएला की कहानी यह समझने का मौका देती है कि कैसे वामपंथी विचारधारा, लोकलुभावन राजनीति और मुफ्तखोरी पर आधारित नीतियाँ किसी भी देश को अंदर से खोखला कर सकती हैं, चाहे उसके पास कितनी ही प्राकृतिक संपदा क्यों न हो। कभी यहाँ के लोग वीकेंड पर शॉपिंग करने के लिए प्लेन से सीधे मियामी जाते थे। यहीं नहीं वेनेजुएला को दुनिया के सबसे महँगे स्कॉच व्हिस्की और शैंपेन के सबसे बड़े खरीदार में से एक माना जाता था।
जब वेनेजुएला था लैटिन अमेरिका का सबसे अमीर देश
बीसवीं सदी के मध्य तक वेनेजुएला विकास और समृद्धि का प्रतीक था। 1950 के दशक में जब यूरोप और एशिया के कई देश दूसरे विश्व युद्ध के बाद दोबारा खड़े होने की कोशिश कर रहे थे, तब वेनेजुएला तेल की बदौलत आर्थिक ऊँचाइयों को छू रहा था।
1952 तक यह देश दुनिया का चौथा सबसे अमीर राष्ट्र बन चुका था। कराकस की सड़कों पर अमेरिकी और यूरोपीय शहरों जैसी चमक दिखती थी। आधुनिक इमारतें, शानदार इंफ्रास्ट्रक्चर और बेहतरीन जीवनशैली आम बात थी।
उस दौर में वेनेजुएला की प्रति व्यक्ति आय कई विकसित यूरोपीय देशों से ज्यादा थी। देश में यह धारणा बनने लगी थी कि तेल एक ऐसा वरदान है जो कभी खत्म नहीं होगा। यही सोच आगे चलकर सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई।
तेल की दौलत और भविष्य को नजरअंदाज करने की आदत
1960 के दशक में वेनेजुएला ने वैश्विक तेल राजनीति में अपनी ताकत दिखाई और सऊदी अरब व ईरान जैसे देशों के साथ मिलकर OPEC की स्थापना में अहम भूमिका निभाई। 1970 के दशक में जब दुनिया तेल संकट से जूझ रही थी और कीमतें रिकॉर्ड ऊँचाई पर थीं, तब वेनेजुएला के खजाने में डॉलर की बाढ़ आ गई।
इसी दौर में वेनेजुएला ने एक गंभीर गलती कर दी। उसने यह मान लिया कि तेल ही उसकी तकदीर है और बाकी आर्थिक क्षेत्रों पर ध्यान देना जरूरी नहीं है। खेती, मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात आधारित उद्योग धीरे-धीरे हाशिए पर चले गए। देश आयात पर निर्भर होता गया। पैसे की भरमार थी तो खाने से लेकर रोजमर्रा की जरूरतों तक के लिए विदेशी सामान मँगाया जाने लगा।
तेल की आसान कमाई ने मेहनत और सुधार की जरूरत को खत्म कर दिया। यही वह स्थिति थी जिसे अर्थशास्त्र में ‘डच डिजीज’ कहा जाता है, जहाँ एक सेक्टर इतना हावी हो जाता है कि पूरी अर्थव्यवस्था असंतुलित हो जाती है।
1999 के बाद का मोड़: वामपंथ और लोकलुभावन राजनीति
1999 में ह्यूगो चावेज के सत्ता में आने के साथ ही वेनेजुएला की राजनीति और अर्थव्यवस्था ने एक नया मोड़ लिया। चावेज ने समाजवादी और वामपंथी मॉडल को अपनाया और खुद को गरीबों का रक्षक घोषित किया। तेल से होने वाली कमाई को उन्होंने सामाजिक योजनाओं और सब्सिडी में झोंक दिया।
पेट्रोल इतना सस्ता कर दिया गया कि वह लगभग मुफ्त हो गया। बिजली और दूसरी सेवाओं पर भारी सब्सिडी दी गई। शुरुआत में इन नीतियों से गरीबी में कमी आई और चावेज बेहद लोकप्रिय हो गए। लेकिन यह लोकप्रियता टिकाऊ विकास पर नहीं बल्कि मुफ्त सुविधाओं पर आधारित थी।
सबसे बड़ी समस्या यह थी कि सरकार ने अच्छे समय में बुरे समय के लिए कोई तैयारी नहीं की। तेल की कमाई को बचाने या निवेश करने के बजाय उसे तुरंत खर्च कर दिया गया। यह रेवड़ी पॉलिटिक्स थी, जिसमें वर्तमान की लोकप्रियता के लिए भविष्य को गिरवी रख दिया गया।
निजी सेक्टर से दुश्मनी और संस्थागत तबाही
चावेज और बाद में निकोलस मादुरो की सरकारों ने निजी उद्योग और बाजार को शोषण का प्रतीक बताया। हजारों कंपनियों और लाखों हेक्टेयर जमीन का राष्ट्रीयकरण किया गया। कई बार यह सब बिना किसी मुआवजे के हुआ। इससे निवेशकों का भरोसा पूरी तरह टूट गया।
सरकार ने कीमतों और मुनाफे पर नियंत्रण लगाया। रोजमर्रा के सामान की कीमतें सरकारी आदेश से तय होने लगीं। नतीजा यह हुआ कि कंपनियों के लिए लागत निकालना मुश्किल हो गया। उत्पादन घटा, बाजार में सामान की कमी हुई और ब्लैक मार्केट फलने-फूलने लगा।
निजी सेक्टर के कमजोर होने से रोजगार खत्म हुए और देश की उत्पादन क्षमता लगभग ठप हो गई। वेनेजुएला, जो कभी कई कृषि उत्पादों का निर्यातक था, अब आयात पर पूरी तरह निर्भर हो गया।
PDVSA: जब राजनीति ने विशेषज्ञता को कुचल दिया
वेनेजुएला की सरकारी तेल कंपनी PDVSA कभी दुनिया की सबसे कुशल तेल कंपनियों में गिनी जाती थी। लेकिन वामपंथी शासन में इसे भी राजनीतिक नियंत्रण में ले लिया गया। अनुभवी इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों को हटाकर राजनीतिक रूप से वफादार लोगों को नियुक्त किया गया।
तेल उद्योग में जरूरी निवेश और मेंटेनेंस को नजरअंदाज किया गया। इसका असर धीरे-धीरे दिखने लगा। उत्पादन गिरता चला गया और इंफ्रास्ट्रक्चर जर्जर होता गया। जिस देश की पहचान तेल थी, वही तेल निकालने की क्षमता खोने लगा।
तेल की कीमत गिरी और ढह गई झूठी समृद्धि
2014 में जब वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें अचानक गिर गईं, तब वेनेजुएला पूरी तरह असुरक्षित था। जिन देशों ने अच्छे समय में बचत की थी, वे इस झटके को झेल पाए। वहीं वेनेजुएला ने सब पैसा उड़ा दिया था और ऊपर से भारी कर्ज भी ले रखा था।
इस संकट से उबरने के लिए सरकार को सुधार करने चाहिए थे लेकिन उसने इसके बजाय आसान और खतरनाक रास्ता चुना। घाटा पूरा करने के लिए केंद्रीय बैंक से नोट छपवाए जाने लगे। इससे मुद्रा की कीमत तेजी से गिरने लगी।
हाइपरइन्फ्लेशन: जब पैसा खो बैठा अपनी कीमत
नोट छापने का नतीजा हाइपरइन्फ्लेशन (बहुत तेजी से बढ़ती महँगाई) के रूप में सामने आया। कीमतें इतनी तेजी से बढ़ने लगीं कि लोगों की सैलरी और बचत बेकार हो गई। एक समय ऐसा आया जब लोग सामान खरीदने के लिए नोट गिनते नहीं थे, बल्कि तौलते थे। मध्यम वर्ग पूरी तरह तबाह हो गया। गरीबी इतनी बढ़ी कि लाखों लोग देश छोड़कर पड़ोसी देशों की ओर पलायन करने लगे। यह आधुनिक इतिहास का सबसे बड़ा शांतिपूर्ण पलायन बन गया।
अमेरिकी प्रतिबंध और पहले से टूटी अर्थव्यवस्था: दुनिया को बड़ा सबक
2019 के बाद अमेरिका ने वेनेजुएला और उसकी तेल कंपनी पर सख्त प्रतिबंध लगाए। इससे हालात और बिगड़े, जब वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था को संभालने जाने की जरूरत थी तब अमेरिकी ने उसे और गर्त में पहुँचाने का काम किया। यानी पहले से गिरे वेनेजुएला को एक और लात अमेरिका ने मार दी।
वेनेजुएला आज अपनी 80 प्रतिशत से ज्यादा अर्थव्यवस्था खो चुका है। यह कहानी बताती है कि प्राकृतिक संसाधन किसी देश को अमीर नहीं बनाते, बल्कि सही नीतियाँ और मजबूत संस्थाएँ बनाती हैं। वामपंथी लोकलुभावन वाद और रेवड़ी पॉलिटिक्स अल्पकाल में लोकप्रिय हो सकती हैं लेकिन लंबी अवधि में देश को बर्बाद कर देती हैं। वेनेजुएला की त्रासदी एक चेतावनी है कि अगर नीति, अनुशासन और संस्थागत संतुलन खत्म हो जाए, तो समृद्ध से समृद्ध देश भी भूखा हो सकता है।


