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घर में घुस कर महिला अधिकारी का गला काट डाला, कर्नाटक के खनन विभाग में डिप्टी डायरेक्टर थीं प्रतिमा: फ़्लैट में पड़ा मिला शव

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में 37 साल (कई मीडिया रिपोर्ट्स में उम्र 45 साल बताया गया है) की एक वरिष्ठ महिला अफसर की चाकुओं से गोदकर हत्या कर दी गई है। यह घटना अधिकारी के घर में ही अंजाम दी गई है। केएस प्रतिमा नाम की यह महिला कर्नाटक सरकार के खनन और भूगर्भ विभाग में उपनिदेशक के पद पर कार्यरत थी। वह दोमंजिला किराए के मकान में अकेली थीं।

प्रतिमा की लाश बेंगलुरु स्थित सुब्रमण्यमपुर स्थित उनके आवास से बरामद की गई है। प्रतिमा विवाहित थीं और यहाँ वह पिछले आठ सालों से रह रही थीं। वह अकेले रहती थीं और उनके पति अपने मूल स्थान पर रहते थे। कुछ मीडिया रिपोर्ट में यह भी कहा जा रहा है कि घटना के समय उनके पति और बच्चे शिवमोगा गए हुए थे।

पड़ोसी सुरेश ने हिंदुस्तान टाइम्स को बताया, “वह वहाँ पिछले आठ साल से रह रही थीं। वह अपने बेटे के साथ रह रही थीं। यह किराए का मकान है। वह सभी के साथ अच्छा व्यवहार करती थी। किसी के साथ कोई समस्या नहीं थी।”

घटना के बारे में जानकारी प्रतिमा के भाई के जरिए मिली। प्रतिमा के भाई ने उन्हें शनिवार (4 नवंबर 2023) की रात को कई बार फोन किया, लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद अगली सुबह भाई ने आकर देखा तो घर में प्रतिमा की लाश पड़ी थी। प्रतिमा का गला रेता गया था। इसके बाद उन्होंने पुलिस को सूचना दी।

अभी तक सामने आई जानकारी के मुताबिक, प्रतिमा शनिवार की शाम 6 बजे तक अपने दफ्तर में काम कर रही थीं। इसके बाद वह अपने घर के लिए निकल गई थीं। उनके ड्राईवर ने बताया कि उसने रात 8 बजे उन्हें उनके आवास पर छोड़ा था। हत्यारों के बारे में अभी जानकारी नहीं मिली है।

हत्या का कारण भी अभी स्पष्ट नहीं हो पाया है। पुलिस का कहना है कि प्रथम दृष्ट्या ऐसा नहीं लगता कि हत्यारों का इरादा लूटपाट का था। उनके घर से कोई महंगा सामान भी गायब नहीं है। पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज करके जाँच शुरू कर दी है। पुलिस ने सबूत इकट्ठा करने के लिए मौके पर फोरेंसिक टीमें बुलाई हैं। उनके फोन की भी जाँच की जा रही है।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने कहा है कि उन्हें मामले की जानकारी हुई है और वह इसकी जाँच कराएँगे। उन्होंने मामले में कड़ी कार्रवाई का भी भरोसा दिया है। वहीं सिटीजन्स मूवमेंट बेंगलुरु नाम के एक अकाउंट ने एक्स (पहले ट्विटर) पर इस मामले में एक दावा करके सनसनी मचा दी है।

इस अकाउंट का दावा है कि प्रतिमा ने इससे पहले खनन माफिया के विरुद्ध आवाज उठाई थी। इसको लेकर उन्हें धमकी भी मिली थीं। इस अकाउंट ने अवैध खनन और भूमाफिया को लेकर कुछ और सनसनीखेज जानकारियाँ साझा की हैं। हालाँकि, इन सूचनाओं की पुष्टि ऑपइंडिया नहीं करता।

4 महीने से शवगृह के बाहर मालिक का इंतजार कर रहा कुत्ता, केरल के इस अस्पताल में दोहराया जा रहा जापान का 100 साल पुराना इतिहास: वीडियो देख इमोशनल हुए लोग

केरल में एक कुत्ता पिछले 4 महीने से एक अस्पताल के शवगृह के बाहर इंतजार कर रहा है। कन्नूर जिले का ये वीडियो सोशल मीडिया में भी चर्चा का विषय बन रहा है। असल में कुत्ते के मालिक को मौत के बाद इस मॉर्चरी में ले जाया गया था, जिसके बाद से उसका ये पालतू कुत्ता लगातार अपने मालिक का इंतजार कर रहा है। डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल के बाहर का ये नजारा देख कर हर कोई इमोशनल है। अस्पताल के कर्मचारी विकास कुमार ने पुष्टि की है कि 4 महीने पहले मरीज यहाँ आया था और साथ में कुत्ता भी था।

हालाँकि, मरीज की इलाज के दौरान ही मौत हो गई। इसके बाद उसके शव को मॉर्चरी में ले जाया गया। इस कुत्ते ने ये देख लिया। अब उसे लगता है कि उसका मालिक अंदर ही है। इसके बाद वो उस जगह को छोड़ने के लिए तैयार ही नहीं है और अपने मालिक के लौटने का इंतजार कर रहा है। शायद उसे ये नहीं पता है कि उसका मालिक अब नहीं नहीं लौटेगा। बता दें कि इसी तरह की वफादारी की एक कहानी जापान के टोक्यो से 1920s से भी सामने आई थी जो खासी लोकप्रिय है।

वहाँ हचिको (Hachiko) नाम का एक कुत्ता शिबुया स्टेशन के बाहर कई दिनों तक अपने मालिक के लौटने का इंतजार करता रहा। उसके भी मालिक की मौत हो गई थी, जिसका उसे पता नहीं था। जापान में उस स्टेशन के बाहर उस कुत्ते की मूर्ति भी लगाई गई थी, जहाँ लोग आज भी तस्वीरें क्लिक करवाने के लिए जुटते हैं। जापान में कई फ़िल्में भी उस पर बन चुकी हैं और उसे वफादारी के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। अब केरल के उस कुत्ते की चर्चा है।

कुछ दिनों तक तो उसने खाना-पीना भी छोड़ दिया था, लेकिन फिर वो वहाँ आने-जाने वालों द्वारा दिए जाने वाले बिस्किट खाने लगा। असल में मॉर्चरी से शवों को दूसरे दरवाजे से निकाला जाता है। उक्त कुत्ता अंदर नहीं घुस सकता और उसने वो नहीं देखा है, इसीलिए वो उम्मीद में है कि जिस रास्ते से उसके मालिक का शव ले जाया गया उधर से ही वो वापस लौट आएगा। उक्त कुत्ता दिन में अन्य डिपार्टमेंट्स का भी चक्कर लगाता है, लेकिन रात को वापस शवगृह के पास लौट आता है।

9 साल में 7 योजना, देश-विदेश में अनेक लाभ: प्रधानमंत्री मोदी की सरकार न सिर्फ योजना लाती है बल्कि उसे जमीन पर उतारती भी है, विकसित भी करती है

भारत धीमे-धीमे लोकसभा चुनावों की तरफ बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार के दस वर्ष पूरे होने को हैं। अब वह समय आ गया है कि बीते 9.5 वर्षों में इस सरकार ने अलग-अलग फ्रंट पर कैसा प्रदर्शन किया है, उसका मूल्यांकन किया जाए।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार 2014 में सत्ता के आने के बाद से ही कई फ्लैगशिप योजनाएँ लाई है। इन योजनाओं के जरिए 1947 से 2014 तक ना हल की जा सकी जाने वाली मूलभूत समस्याओं को हल करने का प्रयास किया गया है। यह प्रयास कितना सफल है, यह आँकड़े और इनके लाभार्थी बताते हैं।

2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने से पहले की सरकारें देश के लोगों को साफ़ पानी, पक्का आवास, गैस सिलेंडर, बैंक खाता, बिजली और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएँ तक नहीं उपलब्ध करवा सकी थीं। उन्होंने सबसे पहले इन समस्याओं को हल करने का निर्णय लिया। योजनावार तरीके से जानते हैं कि इनका क्या असर रहा है।

प्रधानमंत्री आवास योजना

एक पक्का घर किसी भी परिवार की सबसे बड़ी और मूलभूत आवश्यकता होती है। वर्ष 2014 से पहले देश के करोड़ों लोग कच्चे घरों या फिर किराए के घरों में रहने को मजबूर थे। अभी तक कोई भी सरकार उन्हें एक पक्की छत मुहैया नहीं करवा पाई थी। इस समस्या से लड़ने के लिए मोदी सरकार ने जून 2015 में प्रधानमंत्री आवास योजना शुरू की।

इस योजना के तहत शहरी क्षेत्रों में लाभार्थियों को ₹2.5 लाख और ग्रामीण क्षेत्रों में ₹1.2 लाख रूपए घर का निर्माण करवाने के लिए दिए जाते हैं। इस योजना के तहत लाभार्थियों का सर्वे करके उनका चयन किया जाया जाता है।

आवास योजना की लाभार्थी
अपने प्रधानमंत्री आवास के सामने खड़ी एक लाभार्थी महिला

उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार, प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) के तहत अब तक 1.18 करोड़ घरों के निर्माण को मंजूरी दी जा चुकी है। इनमें से 77.5 लाख घरों का निर्माण भी हो चुका चुका है। सरकार इसके लिए ₹1.53 लाख करोड़ दे चुकी है।

वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में इस योजना के तहत 2.94 करोड़ घरों को मंजूरी दी जा चुकी है जिसमें से 2.48 करोड़ घ बन भी गए हैं। इसके लिए केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों के साथ मिलकर ₹2.6 लाख करोड़ की धनराशि दी है।

दोनों योजनाओं को मिलाकर मोदी सरकार के 9 वर्षों में देश भर में अब तक कुल 3.25 करोड़ घरों का निर्माण हो चुका है। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले की रहने वाली सुनीता इस योजना की लाभार्थी हैं। सुनीता एक मंदिर के बाहर फूल बेच कर जीवनयापन करती हैं।

सुनीता अवधी में कहती हैं, “भैया हम पक्का घर दसन साल नाई बनवाय पउतेन, मोदी सरकार घर दिहिस है। तब बनि पावा है। (हम तो दस सालों तक पक्का घर नहीं बनवा पाते, हमें मोदी सरकार ने घर दिया है।)”

प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना

देश के करोड़ों घरों को 2014 से पहले गैस सिलेंडर नहीं दिया जा सका था। इससे करोड़ों घरों में महिलाएँ चूल्हे पर धुएँ में खाना बनाने को मजबूर थीं। इससे जहाँ उनके स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता ही था, जलावन के लिए लकड़ी कटान और आग लगने जैसे खतरों से भी उन्हें दो चार होना पड़ता था। इसके अलावा प्रदूषण भी होता था।

इस समस्या से लड़ने के लिए 1 मई 2016 को उज्ज्वला स्कीम की शुरुआत की गई। इसके अंतर्गत गरीब परिवारों को मुफ्त एलपीजी कनेक्शन दिए गए। उन्हें इसके साथ गैस चूल्हे भी उपलब्ध करवाए गए। इस योजना के चालू होने से पहले देश के मात्र 62.1% घरों में ही एलपीजी कनेक्शन था।

उज्ज्वला योजना के तहत जलापूर्ति

योजना के चालू होने के बाद 99.8% घरों में स्वच्छ ईंधन पहुँच चुका है। इस योजना के तहत उज्ज्वला के पहले फेज में देश में 8 करोड़ कनेक्शन बांटे गए जबकि दूसरे फेज में 1.6 अतिरिक्त कनेक्शन भी बांटे गए हैं।

जिन सुनीता को पक्के घर का लाभ मोदी सरकार में मिला है, वह इस उज्ज्वला योजना का लाभ भी पाई हैं। इस योजना के विषय में वह कहती हैं, “पहिले लकड़ी लाइ केरे खाना बनाईत रहन, बरसात मैहा बड़ी समस्या होती रहय, सब लकड़ी भीगी होती रहय तौ चूल्हा जलति नाइ रहय, अब कोई समस्या नाई है। (पहले लकड़ी लाकर खाना बनाना पड़ता था, बरसात में बड़ी समस्या होती थी क्योंकि लकड़ियाँ भीगी होती थीं, अब कोई समस्या नहीं है।)” वह अपनी जिंदगी में आए इस बदलाव के लिए प्रधानमंत्री को आशीर्वाद देती हैं।

जलजीवन मिशन – हर घर नल से जल

मोदी सरकार के सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी कि उसको वह काम भी करने पड़ रहे थे जो पिछले 7 दशकों में कबके हो जाने चाहिए थे। उसे साफ़ पानी घर घर पहुँचाने जैसी समस्या को हल करना पड़ रहा था।

इस समस्या से लड़ने के लिए वर्ष 2019 में जल जीवन मिशन की शुरुआत की गई। इसके तहत सरकार ने लक्ष्य रखा कि देश के एक-एक घर में नल के माध्यम से साफ़ पानी पहुँचाया जाएगा चाहे वह घर उत्तर प्रदेश के तराई मैदान में स्थित हो या फिर तमिलनाडु की नीलगिरी पहाड़ियों के बीच कहीं।

इस योजना के चालू किए जाने से पहले देश के मात्र 16.82% (3.23 करोड़) घरों तक नल से जल पहुँचता था। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों के मात्र 1.9% घरों में ही नल से जल पहुँचता था।

नल जल योजना के तहत जलापूर्ति

इस योजना को चालू हुए अब 4 वर्ष से अधिक हो चुके हैं। अब देश के 70.17% घरों में नल से जल पहुँच रहा है। अब देश के 13.5 करोड़ घरों में नल से जल पहुँच रहा है। सरकार योजना की शुरुआत होने के बाद से अब तक ₹1.52 लाख करोड़ राज्यों को दे चुकी है। हालाँकि, पश्चिम बंगाल और राजस्थान जैसे कुछ राज्य इस योजना को अब भी ढंग से लागू नहीं कर पा रहे

इस योजना के लाभार्थी बलराम बताते हैं, “पहले नगर पंचायत के सार्वजनिक नल पर पानी लेने जाना पड़ता था जहाँ एक-दो घंटे के लिए ही आपूर्ति होती थी। ठंड में भी सुबह-सुबह 5-6 बजे उठकर पानी भरना पड़ता था। कभी-कभार देर हो जाती थी तो पानी हैण्डपंप से भरना पड़ता था जिसमें आर्सेनिक होता था। अब घर में ही पानी आता है।”

प्रधानमंत्री जन धन योजना

देश में 2014 से पहले विकास के लिए दिए जाने वाले पैसेज में लीकेज बहुत बड़ी समस्या थी। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने एक सार्वजनिक भाषण में स्वीकार किया था कि यदि केंद्र सरकार दिल्ली से ₹1 भेजती है तो लाभार्थी तक मात्र 15 पैसे ही पहुँच पाते हैं।

दशकों तक इस समस्या को नहीं सुलझाया जा सका था। इसके अतिरिक्त, देश में बड़ी आबादी ऐसी थी जिसका बैंकिंग सिस्टम से कोई परिचय ही नहीं था। ना ही इनके पास कोई बैंक खाता था और ना ही इन्हें बैंकों में कोई तरजीह दी जाती थी। सरकार यदि इन्हें कोई लाभ देना भी चाहती तो वह ऐसा करने में विफल होती थी।

इन दोनों समस्याओं को हल करने के लिए मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री जन धन योजना को सत्ता में आने के मात्र तीन महीने के भीतर 28 अगस्त 2014 को लॉन्च किया। इसके तहत देश के हर घर में कम से एक खाता हो, ऐसा लक्ष्य रखा गया। कैम्प लगाए गए, नई शाखाएँ खोली गईं।

यह योजना इतनी सफल रही कि इसके अंतर्गत 50.8 करोड़ खाते खोले जा चुके हैं। इन खातों के माध्यम से सरकार अब तक ₹32 लाख करोड़ लाभार्थियों को भेज चुकी है। इस पैसे में एक रूपए का भी लीकेज नहीं है।

PMJDY योजना

जन धन योजना का लाभ केवल योजना क्रियान्वन तक सीमित नहीं है। इस योजना से सरकार ने सार्वजनिक बीमा योजना जन ज्योति को जोड़ा है। यह खाते प्रधानमंत्री मुद्रा योजना को सफल बनाने, रुपे (Rupay) कार्ड को बढ़ाने और डिजिटल इंडिया में तेजी लाने में बड़े सहायक रहे हैं।

जन धन योजना की लाभार्थी सुनीता भी हैं, जिन्हें उज्ज्वला और आवास योजना का लाभ मिला है। वह अपने खाते में अब छोटी बचत जमा करती हैं। वह कभी ₹200 तो कभी ₹500 बचा कर अपने खाते में जन सुविधा केंद्र के माध्यम से जमा करती हैं। उनका कहना है कि इन छोटी बचतों से उन्हें अपनी दो बेटियों ममता और सरिता की शादी करने में बड़ी सहायता मिली है।

प्रधानमंत्री मुद्रा योजना

देश में जनधन योजना की सफलता के साथ ही यह रास्ता भी खुल गया कि अब उद्यमियों को आगे बढ़ाया जाए। सरकार ने छोटे उद्यमियों को आसान कर्ज देने के लिए मुद्रा योजना अप्रैल 2015 में चालू की गई थी। समस्या यह थी कि छोटे उद्यमियों को बैंक कर्ज नहीं देते थे क्योंकि उनके पास कभी कागज नहीं होते थे तो कभी बैंक उन्हें यह कह कर मना कर देता था कि कर्ज के एवज में देने के लिए उनके पास कोई गारंटी नहीं है।

इस योजना में इन समस्याओं को हल करके इसके तहत ₹50,000 रूपए से लेकर ₹50 लाख तक के कर्ज आसानी से देना चालू किए। इससे देश भर छोटे कारोबारियों को बड़ी सहायता मिली है। मुद्रा योजना से अब तक ₹23.2 लाख करोड़ के कर्ज 40 करोड़ से अधिक लाभार्थियों को दिए जा चुके हैं। इस योजना में सबसे बड़ी बात यह है कि इसकी 70% लाभार्थी महिलाएँ हैं।

रोड और रेल में क्रान्ति

वर्ष 2014 में मोदी सरकार के आने के समय देश की सड़कों की हालत कोई ख़ास अच्छी नहीं थी। रेलवे को एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश मजदूर ले जाने के साधन की हैसियत देकर छोड़ दिया गया था। ना ही कोई नई तकनीक थी ना ही कोई प्लान था।

मोदी सरकार की रेलवे के क्षेत्र में सबसे बड़ी उपलब्धि देश के रेलवे का 90% से अधिक बिजलीकरण है। वर्ष 2014 में मोदी सरकार आने से पहले आजादी के बाद 67 वर्षों में मात्र 21,413 रेलवे लाइनों का बिजलीकरण किया गया था। यह मात्र 9 वर्षों में ही दोगुने से अधिक बढ़ कर 59,818 किलोमीटर हो चुका है।

रेलवे बिजलीकरण
(BG चित्र साभार: @Trainwalebhaiya/X)

इस बिजलीकरण से रेलवे के डीजल का खर्चा बचा है और साथ ही प्रदूषण को भी रोकने में मदद मिली है। इसके अलावा रेलवे ने पुराने ICF डिब्बों को बदल कर LHB कोच अपनी ट्रेनों में लगाए हैं। यह अधिक सुरक्षित और आरामदायक हैं।

भारतवासियों को अच्छी सुविधाएँ देने के लिए रेलवे ने वन्दे भारत जैसी रेलगाड़ियाँ चलाई हैं जिनकी संख्या लगातार बढाई जा रही है। जहाँ कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा वर्ष 1988 में चलाई गई शताब्दी रेलगाड़ियाँ 29 वर्षों में मात्र 21 की संख्या में चल सकीं वहीं 2019 में चलाई गई वन्दे भारत की संख्या 68 हो चुकी है।

रेलवे नेटवर्क की बात की जाए तो वर्ष 2014 में देश का कुल रेल नेटवर्क 65,808 किलोमीटर था जो कि अब 68,043 किलोमीटर हो चुका है। बाकी पहले से स्थापित नेटवर्क में पटरियों की क्षमता बढ़ा कर उस ओअर तेज रेलगाड़ियाँ चलाने के लिए अपग्रेड किया गया है। इसके अतिरिक्त, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर भी इस क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि है।

सड़कों के क्षेत्र में मोदी सरकार की सफलता की प्रशंसा उनके विरोधी भी करते हैं। वर्ष 2013-14 में देश में नेशनल हाइवे की कुल लम्बाई 91,287 किलोमीटर थी जो कि अब बढ़ कर 1.45 लाख किलोमीटर से अधिक हो चुकी है। यह लगभग 59% की वृद्धि है।

हाइवे निर्माण
दिल्ली मुंबई एक्सप्रेसवे (BG चित्र साभार: @reeteshraj777/X)

इसके अलावा 2013-14 में मात्र 18,371 किलोमीटर नेशनल हाइवे ही फोरलेन थे जो कि अब बढ़ कर 45,000 किलोमीटर हो चुके हैं। मोदी सरकार आने के पहले जहाँ एक दिन में औसतन 10-12 किलोमीटर सड़क का निर्माण होता था वहीं यह 2021-22 में बढ़ कर 35 किलोमीटर हो चुका है।

साथ ही, पूरे देश में नए एक्सप्रेसवे भी बन रहे हैं। जहाँ 2014 से पहले उँगलियों पर एक्सप्रेसवे गिने जा सकते थे वहीं अब इनकी लम्बाई हजारों किलोमीटर में पहुँच चुकी है। उत्तर प्रदेश में अभी भी कई नए एक्सप्रेसवे का निर्माण चल रहा है।

IMEEC परियोजना

ऐसा नहीं है मोदी सरकार भारत के भीतर ही योजनाओं को तेजी से लागू कर रही है। वह ऐसी योजनाओं को भी तेजी से पूरा कर रही है जो कि विदेशों में है लकिन जिनसे भारत के हित जुड़े हैं। ऐसी ही एक परियोजना IMEEC (भारत मध्य पूर्व आर्थिक कॉरिडोर) पर भारत ने काम करना चालू कर दिया है।

यह योजना काफी महात्वाकांक्षी है और ₹3.5 लाख करोड़ की है। इसके तहत भारत मध्य पूर्व यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEEC) के तहत भारतीय बंदरगाहों से शिप से संयुक्त अरब अमीरात के फुजैरा तक माल ट्रांसपोर्ट किया जाएगा।

इसके बाद वहाँ से कंटेनरों को ट्रेन के जरिए इजरायल में हाइफा तक ले जाना है। हाइफा से, कंटेनर इटली, फ्रांस, यूके और अमेरिका के साथ यूरोप तक जाएँगे। इस परियोजना के अंतर्गत भारत में बंदरगाहों को रेल लिंक से जोड़ने वाले काम पर भारत ने पहले ही काम चालू कर दिया हैं।

सबसे बड़ी बात यह है कि यह योजनाएँ सिर्फ दिल्ली की गुलाबी ठंड का लाभ ले रहे अफसरों की मेजों पर फाइलों के गट्ठरों में शामिल नहीं है। ना ही योजनाएं पूर्ववर्ती सरकार में बेल्जियम से लाए गए अर्थशास्त्रियों की हॉटटॉक के लिए बनी हैं। यह सभी योजनाएँ अपना असर जमीन पर दिखा रही हैं।

मोदी सरकार की देश से लेकर विदेश तक की इन योजनाओं में सबसे अच्छी बात उनका लाभार्थियों तक पहुँचना है। यदि 2024 का लोकसभा चुनाव इस बात पर लड़ा जाए कि मनमोहन सिंह सरकार ने अपने 10 वर्षों के कार्यकाल में क्या किया था और मोदी सरकार ने क्या किया है, तो निश्चित ही इसमें प्रधानमंत्री मोदी उनसे कहीं मीलों आगे होंगे।

‘नदी से समुद्र तक, फिलिस्तीन आजाद होगा…’: इजरायल के विनाश और गाजा के पक्ष में पोस्ट करना गाजी को पड़ गया भारी, जर्मनी ने फुटबॉल टीम से निकाला

जर्मनी का प्रसिद्ध फुटबॉल क्लब मेन्ज़ (German soccer club Mainz) ने हमास पर इज़रायल की कार्रवाई के विरोध में गाजा के समर्थन में सोशल मीडिया पोस्ट करने पर डच फॉरवर्ड अनवर अल गाजी को क्लब से हटा दिया। मेन्ज ने शुक्रवार (3 नवंबर 2023) को गाजी के साथ हुए अनुबंध को समाप्त कर दिया। इस पोस्ट को लेकर गाजी को एक बार सस्पेंड भी किया गया था।

मेन्ज़ ने शुक्रवार को घोषणा की कि उसने अनवर अल गाजी का अनुबंध समाप्त कर दिया गया है और तुरंत प्रभाव से बर्खास्त कर दिया गया है। मेन्ज ने कहा कि गाजी को उनकी सोशल मीडिया पोस्ट के लिए हटाया गया है। वहीं, जर्मन अभियोजकों ने कहा कि डच खिलाड़ी पर इंस्टाग्राम के माध्यम से नफरत फैलाने के साथ-साथ आपराधिक कृत्यों को नजरअंदाज करके सार्वजनिक शांति को भंग करने का संदेह है।

गाजी ने आतंकी संगठन हमास के नारे नदी से समुद्र तक, फिलिस्तीन आजाद होगा (from the river to the sea, Palestine will be free) लिखते हुए इंस्टाग्राम पर कई पोस्ट किए थे। बताते चलें कि हमास और उसके सहयोगी इजरायल के विनाश के लिए इस नारे का उपयोग करते हैं, क्योंकि इजरायल और फिलिस्तीन जॉर्डन नदी और भूमध्यसागर के बीच स्थित है।

मेन्ज क्लब द्वारा अनुबंध खत्म करने और अल गाजी को हटाने की घोषणा के बाद उन्होंने एक सोशल मीडिया पोस्ट लिखा। अपने सोशल मीडिया पोस्ट में गाजी ने लिखा, “जो सही है उसके लिए खड़े रहें, भले ही इसके लिए अकेले खड़े रहना पड़े। गाजा में निर्दोष और कमजोर लोगों पर ढाए जा रहे नारकीय जुल्म की तुलना में मेरी आजीविका का नुकसान कुछ भी नहीं है।”

इसके पहले अल गाजी ने इजरायल हमास विवाद को लेकर 17 अक्टूबर को एक विवादास्पद सोशल मीडिया पोस्ट किया था। हालाँकि, उन्होंने पोस्ट को बाद में डिलीट भी कर दिया था। इस तरह की अनुशासनहीनता को देखते हुए उन्हें निलंबित कर दिया गया था। क्लब के आयोजनों को देखते हुए 30 अक्टूबर को ही उनका निलंबन हटाया गया था।

मेन्ज़ ने कहा कि प्रबंधन के साथ बातचीत के बाद 28 साल के गाज़ी ने कहा था कि उन्हें सोशल मीडिया पोस्ट प्रकाशित करने को लेकर अफसोस है और इसके नकारात्मक प्रभावों को लेकर भी उन्हें पछतावा है। क्लब ने कहा कि खिलाड़ी ने यह भी कहा कि वह इज़रायल के अस्तित्व के अधिकार पर सवाल नहीं उठा रहा है।

हालाँकि, अनवर गाजी ने बुधवार (1 नवंबर 2023) को एक बार फिर इजरायल और हमास को लेकर विवादास्पद डालकर जता दिया कि पिछली बार उन्होंने मेन्ज प्रशासन से जो भी कहा था, वह झूठ था। गाजी ने लिखा, “मुझे अपनी स्थिति पर कोई पछतावा नहीं है। मैंने जो कहा था, उससे मैं खुद को अलग नहीं कर रहा हूँ। मैं आज और हमेशा, अपनी आखिरी साँस तक मानवता और उत्पीड़ितों खिलाफ खड़ा रहूँगा।”

अनवर गाजी पहले पीएसवी आइंडहोवन, एस्टन विला और एवर्टन के लिए खेलते थे। इस साल सितंबर महीने में एक फ्री एजेंट के रूप में मेन्ज़ में शामिल हुए थे। वे टीम में विकल्प के रूप में तीन बार प्रदर्शन किया। उनका आखिरी प्रदर्शन बुंडेसलीगा में था।

केदारनाथ में मोदी-मोदी के नारों से जनता ने किया राहुल गाँधी का स्वागत, 5 राज्यों में चुनाव के बीच अचानक मंदिर क्यों पहुँचे पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष?

कॉन्ग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी रविवार (5 नवंबर, 2023) को उत्तराखंड स्थित केदारनाथ धाम पहुँचे, जहाँ जनता ने उनका स्वागत मोदी-मोदी के नारों से किया। वीडियो में देखा जा सकता है कि राहुल गाँधी जैसे ही वहाँ पहुँचते हैं, चारों तरफ से लोग मोदी-मोदी के नारे लगाना शुरू कर देते हैं। भाजपा के IT सेल के राष्ट्रीय प्रभारी अमित मालवीय ने भी ‘न्यूज़ तक’ चैनल का वीडियो शेयर किया, जिसमें उत्तराखंड में राहुल गाँधी का स्वागत मोदी-मोदी नारों से हो रहा है।

बता दें कि उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार चल रही है और लगातार दूसरी बार पार्टी ने वहाँ बहुमत पाया है, ऐसे में कॉन्ग्रेस की हालत वहाँ खस्ताहाल है। अभी 5 राज्यों मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में चुनाव प्रचार जोरों पर है और इन सभी में कॉन्ग्रेस मुख्य मुकाबले में है, ऐसे में राहुल गाँधी का अचानक पहाड़ों के बीच पहुँच जाना हैरत भरा है। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में तो कॉन्ग्रेस सत्ता में है, वहीं तेलंगाना और मध्य प्रदेश में वो मुख्य विपक्षी दल है।

राहुल गाँधी ने केदारनाथ मंदिर में भी पूजा-अर्चना की और सोशल मीडिया पर तस्वीरें शेयर करते हुए लिखा कि उन्होंने यहाँ दर्शन प्राप्त किया और आराधना की। साथ ही उन्होंने ‘हर हर महादेव’ भी लिखा। एयरपोर्ट पर पहुँचते ही पार्टी के नेताओं ने उनका स्वागत किया। पार्टी नेताओं का कहना है कि मंदिर में दर्शन कर वहाँ 3 दिनों का प्रवास और फिर वापस दिल्ली लौटने का प्लान है। गढ़वाल गेस्ट हाउस को उनके रुकने के लिए बुक किया गया है।

ये पहली बार है जब राहुल गाँधी केदारनाथ में 3 दिनों तक रुकेंगे। इससे पहले वो पंजाब के अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर भी पहुँचे थे और वहाँ जूते-चप्पल साफ़ कर के सेवा की थी। पंजाब में भी AAP के हाथों कॉन्ग्रेस की बुरी हार हुई है। अब राहुल गाँधी के सरप्राइज विजिट, वो भी चुनावों के बीच, चर्चा का विषय बन रहा है। हिन्दू त्योहारों पर भी वो कभी देवी-देवताओं की तस्वीरें नहीं डालते हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या कॉन्ग्रेस हिन्दुओं की भावनाओं को भुनाना चाहती है?

मातृत्व और बच्चों की देखभाल के लिए महिला सैनिकों को भी अधिकारियों की तरह छुट्टियाँ, ‘अग्निवीर’ में भी यही सुविधाएँ: रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने दी मंजूरी

सुरक्षा बलों में महिला अधिकारियों की तरह ही महिला सैनिकों को भी अब मातृत्व, बच्चों की देखभाल और बच्चे गोद लेने के लिए छुट्टियाँ और अन्य सुविधाएँ समान रूप से मिलेंगी। दरअसल, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने महिला सैनिकों, नाविकों और वायु योद्धाओं को उनके समकक्ष अधिकारी के समान मातृत्व, बच्चों की देखभाल और बच्चे को गोद लेने की छुट्टी देने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। मोदी सरकार द्वारा यह पहल सेना में महिला और पुरुषों की समान सहभागिता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से दी गई हैं। 

रक्षा मंत्रालय ने रविवार (5 नवंबर, 2023) को कहा कि यह निर्णय सशस्त्र बलों में सभी महिलाओं की समावेशी भागीदारी है, चाहे उनकी रैंक कुछ भी हो। प्रस्ताव में कहा गया है कि इस उपाय से सेना में महिलाओं के लिए काम की स्थिति में सुधार होगा क्योंकि इससे उन्हें अपने पेशेवर और पारिवारिक जीवन को बेहतर तरीके से संतुलित करने में मदद मिलेगी

मंत्रालय ने कहा, “नियम जारी होने के साथ ही सेना में सभी महिलाओं के लिए ऐसी छुट्टी का नियम समान रूप से लागू होगा, चाहे वह अधिकारी हो या किसी अन्य रैंक पर।” बता दें कि अग्निवीर महिलाओं को भी यही सुविधाएँ मिलेंगी।

अभी सेना में, महिला अधिकारियों को प्रत्येक बच्चे के लिए पूरे वेतन के साथ 180 दिनों का मातृत्व अवकाश मिलता है। यह सुविधा अधिकतम दो बच्चों के लिए लागू होती है। अधिकारियों के अनुसार,  महिला अधिकारियों को कुल सेवा करियर में 360 दिनों की चाइल्डकैअर छुट्टी दी जाती है। उन्होंने बताया कि एक वर्ष से कम उम्र के बच्चे को गोद लेने की वैध तिथि के बाद 180 दिनों की बाल गोद लेने की छुट्टी दी जाती है।

वहीं रक्षा मंत्रालय ने एक बयान में कहा, “छुट्टी नियमों का विस्तार सशस्त्र बलों से संबंधित महिलाओं के काम के हालत को बेहतर बनाएगा और उन्हें सामाजिक और प्रोफेशनल जीवन में संतुलन बनाने में मदद मिलेगी।”

मंत्रालय ने कहा कि नारी शक्ति (महिला शक्ति) के उपयोग के प्रति नरेंद्र मोदी सरकार की प्रतिबद्धता के अनुरूप, तीनों सेनाओं ने महिलाओं को सैनिकों, नाविकों और वायु योद्धाओं के रूप में शामिल करके एक आदर्श बदलाव की शुरुआत की है।

मंत्रालय ने इस बात पर ख़ुशी व्यक्त की कि दुनिया के सबसे ऊँचे युद्धक्षेत्र सियाचिन में सक्रिय रूप से तैनात होने से लेकर युद्धपोतों पर तैनात होने के साथ-साथ वायु सेना में भी, भारतीय महिलाएँ अब सशस्त्र बलों में लगभग हर क्षेत्र में बाधाओं को तोड़ रही हैं। इसी कड़ी में 2019 में, भारतीय सेना में सैन्य पुलिस कोर में सैनिकों के रूप में महिलाओं की भर्ती एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हुई है। 

पाकिस्तान में फ़ौज और एयरफोर्स बेस ही नहीं, पुलिस पर भी हमला: धमाके में 5 की गई जान, वीडियो में दिखा मंजर

पाकिस्तान से लगातार बम धमाकों की खबरें आ रही हैं। हाल में वहाँ एक मोटरसाइकल में बम प्लांट करके धमाका किया गया। ये ब्लास्ट पुलिस वाहन के नजदीक बाइक खड़ी करके हुआ। इसमें 5 लोगों की जान चली गई जबकि 20 लोग घायल हो गए।

ये धमाका खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के डेरा इस्माइल खान शहर में शुक्रवार (3 नवंबर 2023) को हुआ। पुलिस अधिकारी गुल शेर खान ने इस बात की पुष्टि की कि डेरा इस्माइल खान में बम धमाका हुआ। इसमें मरने वाले सारे स्थानीय थे। इस धमाके को बिजी स्टॉप (भीड़-भाड़) वाले इलाके पर किया गया था। जिसके कारण आसपास की जनता के साथ पुलिस वाले भी चोटिल हुए थे।

एपी न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार पुलिस अधिकारी बिलाल फैजी ने बताया कि उन्होंने घायलों को नजदीकी अस्पतालों में भर्ती कराया, जहाँ 3 की हालत बेहद गंभीर बनी रही। पुलिस वाहन के आगे मोटरबाइक लगाकर इस धमाके को अंजाम दिया गया।

खबर की मानें तो घटना को लेकर किसी समूह ने शुरुआत में जिम्मेदारी नहीं ली थी। लेकिन संदेह पाकिस्तानी तालिबान पर ही था। दरअसल, नवंबर 2022 में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान और पाकिस्तान सरकार के बीच सीजफायर का समझौता खत्म हुआ था। इसके बाद से PAK फौज पर हमले की घटनाएँ बढ़ीं। जिसके कारण पाकिस्तान के कई फौजियों की जान गई।

शुक्रवार को पाकिस्तानी फौज पर भी बलूचसिस्तान में बड़ा हमला होने की खबर आई थी। इस हमले में मुल्क के 14 फौजियों की जान चली गई थी। ये अटैक पाकिस्तानी सेना पर होने वाला इस साल का सबसे बड़ा हमला था। मीडिया में बताया गया कि घटना तब हुई जब पसनी से ग्वादर जा रही दो गाड़ियों पर हमला किया गया। इसके बाद शनिवार को भी पाकिस्तान एयर फोर्स बेस पर अटैक किया गया।

‘…उन्होंने कई ऐसे फैसले लिए जो मुझे पसंद नहीं आए’: युवराज सिंह बोले – MS धोनी मेरे करीबी दोस्त नहीं, वर्ल्ड कप से पहले कहा था – चयनकर्ता तुम्हारे नाम पर नहीं सोच रहे

युवराज सिंह T20 में एक ओवर में 6 छक्के मार चुके हैं और 2011 के वनडे वर्ल्ड कप में भी अपने ऑलराउंड परफॉर्मेंस की वजह से जाने गए। वहीं महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी में भारत ने कई बड़े ICC टूर्नामेंट्स अपने नाम किया। एक समय इन दोनों की जोड़ी को साथ बल्लेबाजी करते हुए देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ती थी। वहीं अब युवराज सिंह ने कह दिया है कि MS धोनी से कभी उनकी करीबी दोस्ती नहीं रही। हालाँकि, जब वो साथ खेलते थे तब दोनों के बीच अच्छी-खासी केमिस्ट्री देखने को मिलती थी। हालाँकि, युवराज के पिता योगराज हमेशा धोनी पर हमलावर रहे हैं।

युवराज सिंह और MS धोनी भले ही 2 विश्व कप की जीतों में साथ रहे हों, लेकिन अब पूर्व क्रिकेट ऑलराउंडर ने कह दिया है कि पूर्व कप्तान उनके करीबी दोस्त नहीं हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि उन दोनों की लाइफस्टाइल भी काफी अलग है। उन्होंने कहा, “मैं और माही करीबी दोस्त नहीं हूँ। हमारी लाइफस्टाइल एकदम अलग-अलग है। उनकी लाइफस्टाइल मेरे उलट है। हम सिर्फ क्रिकेट की वजह से दोस्त बने थे। ज़रूरी नहीं है कि जो टीम में आपके साथ हैं वो मैदान से बाहर भी आपके अच्छे दोस्त हों।”

युवराज सिंह ने ये भी कहा कि सभी की लाइफस्टाइल और स्किल सेट अलग-अलग होते हैं। उन्होंने युट्यूबर रणवीर अलहाबादिया के साथ बात करते हुए ये बातें कहीं। उन्होंने कहा कि जब भी वो और एमएस धोनी मैदान पर गए, तब-तब उन्होंने देश के लिए शत प्रतिशत से अधिक देने की कोशिश की। उन्होंने याद दिलाया कि वो उप-कप्तान हुआ करते थे और धोनी कप्तान। युवराज सिंह ने कहा कि ऐसे में दोनों के बीच निर्णयों को लेकर मतभेद होना स्वभाविक है।

युवराज सिंह ने कहा कि MS धोनी ने कुछ ऐसे निर्णय लिए जो उन्हें पसंद नहीं आए। हालाँकि, उन्होंने कहा कि कई बार उन्होंने भी कई ऐसे फैसले लिए जो धोनी को पसंद नहीं आए। उन्होंने दावा किया कि ये हर टीम में होता है। उन्होंने बताया कि करियर के अंतिम दौर में उन्हें जब कुछ समझ नहीं आ रहा था तब उन्होंने धोनी से सलाह ली, जिन्होंने बताया कि चयनकर्ताओं का पैनल उन्हें विकल्प के रूप में नहीं देख रहा है। उन्होंने कहा कि इसके बाद करियर को लेकर तस्वीर तस्वीर साफ़ हुई।

युवराज सिंह का कहना है कि ये 2019 में हुए वर्ल्ड कप के पहले की बात है। उन्होंने कहा कि एक तरह के लोग एक तरह के लोगों के साथ दोस्ती करते हैं। वहीं टीम में कुछ लोग ईगो साथ लेकर आते हैं, कुछ नहीं। उन्होंने याद किया कि जब धोनी चोटिल थे तो वो उनके लिए रनर भी बने। उन्होंने याद किया कि एक बार वो 90s में थे तो रनर के रूप में उन्होंने डाइव किया, ताकि वो शतक पूरा करने के लिए धोनी को स्ट्राइक दिला सकें। इसी तरह उन्होंने याद दिलाया कि नीदरलैंड्स के खिलाफ वो 48 पर थे, तब धोनी ने 2 डॉट बॉल खेल कर उन्हें स्ट्राइक दी, ताकि वो फिफ्टी पूरा कर सकें।

‘जनजातीय समाज की बेटियाँ और जमीन- दोनों बांग्लादेशी घुसपैठियों के निशाने पर’: NIA से दखल की माँग, भाजपा ने CM हेमंत सोरेन को बताया साजिश का सूत्रधार

झारखंड भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने कहा है कि प्रदेश में जनजातीय लोगों के अस्तित्व को खत्म करने की साजिश रचा जा रहा है। संथाल क्षेत्र का विशेष तौर पर नाम लेते हुए उन्होंने बांग्लादेशी घुसपैठियों द्वारा जनजातीय महिलाओं से निकाह करने और उनकी जमीनें हड़पने का आरोप लगाया है। रविवार (5 नवंबर 2023) को अपने X हैंडल से केंद्रीय जाँच एजेंसी (NIA) और गृह मंत्रालय को टैग करते हुए मरांडी ने इस साजिश का सूत्रधार मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को बताया।

बाबूलाल मरांडी ने अपने ट्वीट में कहा, “जिस प्रकार से घुसपैठियों को जाली दस्तावेज, आधार और वोटर कार्ड उपलब्ध कराए जा रहे हैं, यह हेमंत सरकार की मौन स्वीकृति के बिना संभव नहीं है।” हेमंत सोरेन पर मुस्लिम वोटबैंक की राजनीति का आरोप लगाते हुए बाबूलाल ने आरोप लगाया कि जनजातीय अस्मिता के नाम पर वोट माँगने वाले हेमंत सोरेन झारखंड में उनकी पहचान मिटाने में लगे हुए हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने ट्वीट के साथ दैनिक भास्कर की एक पेपर कटिंग भी अटैच की है। इस अख़बार की कटिंग में ख़ुफ़िया विभाग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया है कि संथाल में बांग्लादेशी घुसपैठिए न सिर्फ आधार और वोटर कार्ड बनवा रहे, बल्कि उन्होंने जमीनें भी खरीद ली हैं।

बांग्लादेशी घुसपैठियों ने जो जमीनें खरीदीं हैं, उनमें से कई जमीनें जनजातीय लोगों की हैं। अखबार की रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि जहाँ घुसपैठिए कानूनी अड़चनों के चलते जमीनें नहीं खरीद पा रहे हैं, वहाँ वो अपनी असल पहचान छिपाकर जनजातीय महिलाओं से निकाह कर रहे हैं।

बाबूलाल मरांडी द्वारा शेयर की गई पेपर कटिंग में बंगलादेशी घुसपैठियों को आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बताते हुए हुए प्रशासन से उनके सत्यापन और कार्रवाई की अपेक्षा की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रीय गृहमंत्रालय ने 30 साल पहले ही संथाल क्षेत्र के कुछ जिलों में 25 हजार बांग्लादेशी घुसपैठिए चिन्हित किए थे। इन सभी के नाम वोटर लिस्ट में भी जुड़ गए थे, जिन्हें बाद में हटवाया गया था।

जनजातीय लोगों की जमीन हड़पे जाने का आरोप लगाते हुए पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने इस सिस्टम में CM हेमंत सोरेन और उनके राजनैतिक सगे-संबंधियों को शामिल बताया है। अंत में NIA और केंद्रीय गृह मंत्रालय को टैग करते हुए उन्होंने झारखंड के मुख्यमंत्री को नकारा नेता बताया और मामले का संज्ञान लेकर कार्रवाई माँग की।

चंदनकियारी से भाजपा विधायक और नेता प्रतिपक्ष अमर कुमार ने इसे संथाल क्षेत्र की डेमोग्राफी बदलने की साजिश करार दिया है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार द्वारा अपनाई गई मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के चलते जनजातीय बच्चियाँ बलि चढ़ रही हैं। भाजपा MLA ने राज्य में अपराध और तस्करी को अपने चरम पर बताया है।

दफ्तर में लाश डालने वाले थैले, ब्रिटेन पुलिस ‘सूअर’ और ‘हराम’: जिन इस्लामी कट्टरपंथियों के गुण गाता है BBC, उन्होंने ही हजारों की संख्या में किया हमला

UK का सरकारी मीडिया संस्थान BBC अक्सर इस्लामी कट्टरपंथियों और आतंकियों के महिमामंडन के लिए जाना जाता रहा है। अब यही इस्लामी कट्टरपंथी BBC के दफ्तरों के बाहर पहुँच कर हंगामा करने में लगे हुए हैं। न सिर्फ लंदन, बल्कि स्कॉटलैंड में भी सैकड़ों लोग बीबीसी के दफ्तर के बाहर पोस्टर-बैनर लेकर जुटे। स्कॉटलैंड के ग्लासगो के पैसिफिक क़्वे स्थित बीबीसी के दफ्तर के बाहर अफरातफरी का माहौल रहा। इसी तरह एडिनबर्ग रेलवे स्टेशन पर भी कट्टरपंथियों का कब्ज़ा रहा।’

सबसे पहले ग्लासगो के सेन्ट्रल रेलवे स्टेशन पर हमास समर्थकों ने कब्ज़ा जमाया। उसके बाद भीड़ बीबीसी के ब्रॉडकास्टिंग स्टूडियो की तरफ बढ़ चली। प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री ऋषि सुनक की सरकार पर ‘नरसंहार करने वालों के समर्थन’ का आरोप लगाया। उन्होंने फिलिस्तीन को मुक्त करने और युद्ध विराम के लिए नारेबाजी की। साथ ही उन्होंने इजरायल को भी ‘आतंकी देश’ करार दिया। इजरायल ने गाज़ा में जमीनी हमले भी तेज़ कर दिए हैं और अंदर तक सेना घुस चुकी है।

इसके साथ ही हमास समर्थक भीड़ बीबीसी के दफ्तर के बाहर कई बॉडी बैग्स भी छोड़ गई। बता दें कि लाशों को रखने के लिए इन बैग्स का इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रदर्शन में महिलाओं और बच्चों का खूब इस्तेमाल किया गया। प्रदर्शनकारियों की संख्या 300 से अधिक बताई जा रही है। प्रदर्शनकारी झंडों के साथ-साथ फेस मास्क और स्कार्फ भी बड़ी संख्या में लेकर आए थे। उन्होंने ‘इंतिफाद’ (विद्रोह) की नारेबाजी भी की। ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और किंग्स कॉलेज के ‘नरसंहार में शामिल’ होने का आरोप लगाया गया।

इसी तरह लंदन में भी ऑक्सफोर्ड सर्कस और बीबीसी के दफ्तर के बाहर हजारों की भीड़ जुटी। प्रदर्शनकारियों में शामिल एक महिला ने तो ब्रिटेन की पुलिस को ही ‘सूअर’ बता दिया। उसने कहा कि पुलिस ‘हराम’ है। यहाँ तक कि प्रदर्शनकारियों ने 7 अक्टूबर को इजरायल में हुए नरसंहार के लिए भी इजरायली सरकार को ही दोषी ठहरा दिया। इसी तरह ट्राफलगर स्क्वायर पर बच्चों के नकली पुतले डाल कर विरोध प्रदर्शन किया गया। वहाँ जमा हुई भीड़ में से 11 को गिरफ्तार भी किया गया।

याद दिला दें कि ये वही BBC है, जो इस्लामी कट्टरपंथियों का गुणगान करता है और हिन्दू घृणा फैलाता है। बीबीसी की प्रधानमंत्री मोदी के विरोध रिपोर्टिंग खासतौर से गुजरात दंगों के डॉक्यूमेंट्री झूठ से भरे हुए थे। इसी तरह, बीबीसी द्वारा रिपोर्ट की गई लीसेस्टर हिंसा भी उतनी ही झूठी थी। उन्होंने ‘हिंदुत्व’ शब्द को इस तरह पेश करने की कोशिश की जैसे कि यह कुछ नकारात्मक हो। लेस्टर में भड़की हिंसा के बाद बीबीसी ने इस्लामी कट्टरपंथियों और दंगाइयों को क्लीन-चिट दी थी।