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जौहर यूनिवर्सिटी के फायदे के लिए बना ₹150 करोड़ का फ्लाईओवर, आजम खान ने कौड़ियों के भाव जमीनें हड़पीं: रामपुर के ग्रामीणों ने ऑपइंडिया से बयां किया दर्द, पढ़ें ग्राउंड रिपोर्ट

रामपुर विकास प्राधिकरण द्वारा जौहर यूनिवर्सिटी के 38 भवनों को अवैध बताए जाने के बाद आजम खान की चर्चा एक बार फिर लोगों की जुबान पर है। आजम खान पर सपा सरकार में मंत्री रहते हुए सरकारी धन के दुरुपयोग के आरोप लगते रहे हैं। इनमें एक आरोप है कि आजम खान ने व्यक्तिगत लाभ के लिए जौहर यूनिवर्सिटी तक करीब ₹150 करोड़ की लागत से फ्लाइओवर का निर्माण कराया था।  

यहाँ तक कि इसके लिए गाँव की गरीब किसानों और मजदूरों से आजम खान ने कम दामों में जमीन लेकर उनसे जबरन रजिस्ट्री कराईं थीं। इसी की सच्चाई जानने के लिए ऑपइंडिया के रिपोर्टर केशव मालान रामपुर के उस एकता तिराहे पर पहुँचे, जहाँ से शुरू हुआ 5 किलोमीटर लंबा फ्लाईओवर जौहर यूनिवर्सिटी के पिछले गेट पर जाकर समाप्त होता है। इसी एकता तिराहे से कुछ दूरी पर ही आजम खान का शहर में अपना पैतृक मकान है। यह बात अलग है कि इसी पैतृक मकान के सामने बनी रामपुर की जेल में वह कई वर्षों से बंद है।

बहरहाल, हम फ्लाईओवर से जौहर यूनिवर्सिटी तक पहुँचे। इस बीच हमने देखा कि फ्लाईओवर के दोनों और घने जंगल है और आम के बाग हैं, जिसे देखकर लगता है कि फ्लाइओवर के निर्माण के लिए हजारों बड़े पेड़ों को काटकर लाखों छोटे पेड़ों को कुचला गया होगा। रामपुर की व्यस्त सड़कों के उलट इस फ्लाईओवर पर सन्नाटा पसरा हुआ है। हैरानी इस बात की है कि यह फ्लाइओवर न तो किसी रेलवे लाइन को क्रॉस करता है न किसी नदी-नाले को और ना ही किसी सिक्स लाइन-फोर लाइन हाईवे या फिर ये किसी 2 लाइन रोड को भी क्रॉस नहीं करता।

यह फ्लाईओवर किसी बड़ी सड़क, गाँव या शहर को भी नहीं जोड़ता और न ही यह फ्लाईओवर रामपुर शहर के किसी ट्रैफिक को कंट्रोल करता है। इसके नीचे से सिर्फ दो छोटे लिंक रोड क्रॉस करते हैं, जो उन गाँवों को जाते हैं, जिन गाँवों के लोगों ने इस फ्लाईओवर के लिए आजम खान को अपनी जमीन दी थी। फ्लाईओवर पर खड़े एक व्यक्ति ने बताया कि इस फ्लाईओवर पर वाहनों की कोई भीड़ नहीं रहती है, बस यूनिवर्सिटी वाले छात्र ही यहाँ से होकर जाते हैं। इससे ज्यादातर लोगों को कोई फायदा नहीं है।

कौड़ियों के भाव ले ली हमारी जमीन: ग्रामीण

फ्लाइओवर से नीचे उतरने के बाद गाँव से पहले एक आम के बाग में काम कर रही कुछ महिलाओं से जब हमने आजम खान के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा हम उन्हें जानते तो हैं, लेकिन उन्हें कभी देखा नहीं है क्योंकि वह हमारे गाँव कभी नहीं आए। कमलेश नाम की महिला ने बताया कि हमारे पास सिर्फ चार बीघा ही जमीन थी। उसमें भी होकर पुल का निर्माण हो गया। अब वह किसी काम के लायक नहीं है। हमारी कीमती जमीन को कौड़ियों के भाव ले लिया गया। उन्होंने कहा कि हम अपनी जमीन नहीं देना चाहते थे, लेकिन हम गरीब लोग हैं। आखिर क्या करते?

उसी बाग में काम कर रहे भगवान दास बताते हैं कि इस पुल को जबरन बनाया गया था। हमने मजबूरी में अपनी जमीन दी। नहीं तो वह (आजम खान) हमें जेल में बंद करवा देते। उनसे फ्लाईओवर के निकलने से लाभ के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि इस फ्लाईओवर से हमें कोई लाभ नहीं हुआ। अगर फ्लाईओवर की जगह नीचे से रोड़ बनाया गया होता तो शायद हमारे गाँव, क्षेत्र का विकास होता और हमें वहाँ पर मकान, दुकान या फिर कोई व्यवसाय करने का मौका मिलता, लेकिन सच्चाई यही है कि आजम खान ने इसे सिर्फ अपने लाभ के लिए बनवाया था।

वह आगे कहते हैं कि उस समय आजम खान का लठ्ठ (दबदबा) चल रहा था, लेकिन अब उनकी दादागिरी बंद हो गई। उन्होंने जैसा किया वैसा ही वह भुगत रहे हैं। कुछ लोगों ने ऑफ कैमरा हमें बताया कि आजम खान ने इस फ्लाईओवर का निर्माण सिर्फ इसलिए कराया था, ताकि वह अपने घर से निकलकर बिना किसी जाम में फंसे सीधे ‘अपनी’ यूनिवर्सिटी तक पहुँच सकें।

जबरन कराई गई थी रजिस्ट्री: पीड़ित ग्रामीण

ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट टीम इस पुल के नीचे मौजूद किशनपुर गाँव पहुँची। फ्लाईओवर बनने से लाभ के बारे में पूछने पर दिनेश नाम के व्यक्ति कहते हैं कि हमारी जमीन तो इसमें नहीं गई, लेकिन इस फ्लाईओवर के बगल में हमारा मकान है। इसके बनने से हमें आज तक कोई लाभ नहीं हुआ बल्कि नुकसान ही हुआ है। नीचे रोड बनता तो शायद हमें कुछ इसका लाभ मिलता।

ग्रामीणों के मुताबिक, उस समय लोगों से कहा गया था कि पुल के नीचे भी रोड बनेगा, जिससे ग्रामीण खुश थे लेकिन आज तक ऐसा नहीं हो सका। उन्होंने यह बहुत गलत काम किया। इस बीच घूँघट लगाकर रास्ते से गुजर रहीं दो महिलाओं ने भी इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि उन्होंने कोई अच्छा काम नहीं किया।

गाँव के ही उम्मेद सिंह बताते हैं कि हमारी जमीन फ्लाईओवर के निर्माण में गई थी, लेकिन इससे हमें कोई लाभ नहीं मिला। हमसे जबरन रजिस्ट्री कराई गई थी। उन्होंने कहा कि कानूनगो और तहसीलदार घर पर आ गए थे। इसके बाद हमें रजिस्ट्री ‘करनी’ पड़ी। स्कूल को आजम खान ने अपनी यूनिवर्सिटी के लिए बनवाया था और इसमें निर्माण के नाम पर करोड़ों रुपए का घोटाला किया गया।

उम्मेद सिंह कहते हैं कि मैं उस समय ऑटो चलाता था। आरटीओ में मौजूद एक यादव समाज के अधिकारी हमसे मोटी रकम वसूलते थे। पूछने पर रहते थे कि इसका 40% पैसा हिस्सा जौहर यूनिवर्सिटी को जाता है। यह सब आजम खान के इशारे पर होता था। आजम खान ने सपा सरकार में हमारे ऊपर बहुत जुल्म किए हैं और हमेशा ही रामपुर की जनता को सताया है, लेकिन आज उनको किए की सजा मिल रही है। योगी सरकार में सभी सही काम हो रहा है।  

आपको बता दें कि रामपुर के जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े इस 5 किलोमीटर लंबे फ्लाईओवर का निर्माण साल 2013-14 में करीब ₹150 करोड़ की लागत से कराया गया था। ये फ्लाईओवर अपने निर्माण के समय से ही विवादों के घेरे में है। लोगों का साफ कहना है कि ये फ्लाईओवर सिर्फ और सिर्फ आजम खान की खुदगर्जी की वजह से बना, जिसका फायदा स्थानीय लोगों को शायद ही हुआ हो। उन्हें तो सिर्फ नुकसान हुआ, क्योंकि उनकी जमीनें भी कौड़ियों के दाम ले ली गई और उन्हें इसके इस्तेमाल का कुछ खास फायदा भी नहीं है, क्योंकि इसका इस्तेमाल भी सिर्फ यूनिवर्सिटी आने-जाने के लिए ही होता है।

नाबालिग हिंदू बच्ची को घर से भगा ले गया जुनैद, अब्बा-अम्मी भी दे रहे साथ: ऑपइंडिया से पीड़ित पिता बोले- तस्करी कर देगा, गोपालगंज का मामला

बिहार के गोपालगंज से एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है। यहाँ एक पिता ने UP के कुशीनगर के रहने वाले जुनैद अंसारी नामक युवक पर अपनी नाबालिग हिंदू बेटी का अपहरण करने का गंभीर आरोप लगाया है। पिता को यहाँ तक डर है कि जुनैद अंसारी उनकी बेटी के साथ जबरन निकाह कर सकता है और उसकी मानव तस्करी कर सकता है। पीड़ित पिता का आरोप है कि उनकी 16 वर्षीय बेटी पिछले कई दिनों से लापता है।

क्या है पूरा मामला?

ऑपइंडिया से बातचीत में पीड़ित पिता ने बताया कि उनकी बड़ी बहन की शादी जुनैद अंसारी के गाँव डुमरिया में हुई थी और वह उनका पड़ोसी था। इसके चलते उसका घर में आना-जाना शुरू हो गया था। पिता का कहना है कि उनकी बेटी भी अपनी बुआ के घर डुमरिया जाती थी और वहाँ उसकी जान-पहचान जुनैद से हो गई थी। वो बताते हैं कि 10 जुलाई 2026 की शाम करीब 7 बजे जुनैद अंसारी उनके घर आया था।

पिता ने आरोप लगाया है कि 11 जुलाई 2026 को सुबह जब वह जागे तो उनकी बेटी घर में नहीं थी। साथ ही, घर में रखे सोने-चाँदी के गहने और करीब 50000 रुपए भी गायब थे। परिजनों ने अपने स्तर पर काफी खोजबीन की लेकिन बेटी का कोई पता नहीं चला।

ऑपइंडिया से बातचीत में पीड़ित पिता ने बताया कि उनकी बहन से जानकारी मिली कि जुनैद अंसारी लगातार उनकी बेटी से मोबाइल पर बातचीत करता था। इसी के बाद परिवार को संदेह हुआ कि जुनैद अंसारी ने उनकी बेटी को बहला-फुसलाकर शादी या मानव तस्करी की नीयत से अगवा किया है।

आरोपित के घर पहुँचने पर क्या हुआ?

बातचीत में पीड़ित ने बताया कि वह अपनी बहन के साथ डुमरिया जाकर जुनैद अंसारी के अब्बू से मिले। शिकायत के अनुसार, पहले तो उसके परिवार ने यह स्वीकार किया कि जुनैद उनके घर आया था, लेकिन बाद में यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि उन्हें नहीं पता वह लड़की को कहाँ लेकर गया है। इसके बाद जुनैद के परिवार ने कहा, “बच्चों की बात है, गलती हो गई है। हम लोग उसको समझा बुझाकर बुलवाकर आपकी बेटी आपके हवाले कर देंगे।”

बातचीत में पीड़िता पिता का कहना है, “जुनैद अंसारी के परिवार ने 2 दिन का समय माँगा लेकिन वो लोग नहीं आए। 14 जुलाई को उन्होंने आने से मना कर दिया।” पीड़ित पिता का कहना है कि जुनैद अंसारी, उसकी अम्मी बेबी खातून और अब्बू बिस्मिल्लाह अंसारी ने मिलकर उनकी बेटी का शादी, मानव तस्करी या रेप करने की नीयत से अपहरण कर लिया है।

वहीं, ऑपइंडिया ने हिंदू नाबालिग के फूफेरे भाई से भी बातचीत की। फूफेरे भाई ने पूरा मामला बताया। उसने कहा कि नाबालिग लड़की पढ़ाई के लिए हमारे यहाँ रहती थी। उसी दौरान उसकी (युवती) पहचान जुनैद अंसारी से हुई। जुनैद अंसारी ने लड़की से बातचीत करने के लिए एक फोन भी दिया था। घर वालों को जब पता चला तो उन्होंने लड़की को समझाने की कोशिश की।

जब युवती नहीं मानी तो उसे उसके पिता के घर भेज दिया गया। फिर जुनैद अंसारी लड़की के पिता के घर पहुँच गया। वहाँ जाकर वे लड़की को भगा ले गया। फूफेरे भाई ने आगे बताया कि लड़की को गायब हुए एक हफ्ते से ज्यादा हो गया है। ना मीडिया ने इस मामले की अब तक सुध ली और पुलिस ने भी एक हफ्ते बाद जाकर FIR दर्ज की। फूफेरे भाई के अनुसार अभी तक बहन का कोई पता नहीं चला है।

पुलिस द्वारा दर्ज FIR में क्या?

FIR कॉपी के मुताबिक, पीड़ित पिता का कहना है कि पुलिस ने कई दिनों तक केस दर्ज नहीं किया और 22 जुलाई 2026 को अंतत: उनकी FIR दर्ज की गई है। पीड़ित पिता ने ऑपइंडिया को बताया कि गोपालपुर थाने की पुलिस भी जुनैद के घर गई थी लेकिन उसके परिवार ने पुलिस को भी अँधेरे में रखा। पहले तो उसका परिवार बेटी को वापस लाने की बात करता रहा और अंत में मुकर गया।

FIR कॉपी की प्रति

पुलिस ने इस मामले में BNS की धारा 137 और 96 के तहत केस दर्ज किया है। भारतीय न्याय संहिता की धारा 137 किडनैपिंग से संंबंधित है और ऐसे मामले में दोषी पाए जाने पर 7 साल की सजा और जुर्माना हो सकता है। वहीं, BNS की धारा 96 18 वर्ष से कम आयु के किसी बच्चे या बच्ची को बहला-फुसलाकर, डरा-धमकाकर एक जगह से ले जाने या ले जाने के लिए प्रेरित करने से जुड़ी है। इस अपराध के लिए 10 साल तक का कारावास और जुर्माना दोनों का प्रावधान है। इस मामले में पुलिस ने अभी तक POCSO नहीं लगाया है।

(ऑपइंडिया ने गोपालगंज पुलिस थाने में बात करने का प्रयास किया। लेकिन ना तो पुलिस थाने का कॉल लगा और ना ही SHO का नंबर लगा। जैसे ही इस मामले में किसी पुलिस अधिकारी से बातचीत होगी। रिपोर्ट को अपडेट कर दिया जाएगा।)

जहाँ पानी की हर बूँद कीमती, वहाँ मंदिर की नींव में डलवाया गया 40000 किलो घी: जानिए बीकानेर के भंडासर जैन मंदिर का रहस्य, जहाँ गर्मियों में फर्श से निकलती है चिकनाहट

रेगिस्तान की तपती धूप में जहाँ इंसान पानी की एक-एक बूँद सहेजकर रखता है, क्या आप सोच सकते हैं कि उसी मरुस्थल के बीच 500 साल पहले एक ऐसी इमारत खड़ी कर दी गई जिसकी नींव में पानी की जगह हजारों किलो शुद्ध देसी घी इस्तेमाल किया गया था।

पहली बार में यह बात किसी लोककथा या पौराणिक कहानी जैसी लगती है लेकिन राजस्थान के बीकानेर शहर में आज भी यह सच सीना ताने खड़ा है। यहाँ स्थित भांडाशाह जैन मंदिर (भंडासर जैन मंदिर) भारत की सबसे हैरान कर देने वाली ऐतिहासिक इमारतों में शामिल है।

कहा जाता है कि 15वीं सदी में जब बीकानेर पानी के संकट से जूझ रहा था, तब एक अमीर जैन व्यापारी ने 40,000 किलो शुद्ध घी से इस मंदिर का मसाला तैयार करवाया।

86 सालों की कड़ी मेहनत के बाद बनकर तैयार हुआ यह तीन मंजिला मंदिर सिर्फ इस अनोखी किंवदंती के लिए ही नहीं बल्कि अपनी जादुई उस्ता कला (राजस्थान की लोक कला), सोने की पत्ती से बनी पेंटिंग्स और तपती गर्मियों में पत्थरों से घी रिसने के अनसुलझे रहस्य के लिए भी पूरी दुनिया में जाना जाता है।

मंदिर का ऐतिहासिक सफर और निर्माण की अनूठी कहानी

इस अनोखे मंदिर का इतिहास करीब पाँच शताब्दियों पुराना है। बीकानेर शहर को बसाए जाने से लगभग दो दशक पहले, यानी पंद्रहवीं शताब्दी में इस मंदिर के निर्माण का सपना देखा गया था।

श्वेतांबर जैन परंपरा के तहत जैन धर्म के पाँचवें तीर्थंकर भगवान श्री सुमतिनाथ जी को समर्पित इस तीन मंजिला मंदिर की आधारशिला वर्ष 1468 में रखी गई थी। इस भव्य मंदिर का निर्माण बीकानेर के एक बहुत ही धनवान ओसवाल जैन व्यापारी सेठ भांडाशाह ने शुरू करवाया था, जो मुख्य रूप से देशी घी के बड़े कारोबारी थे।

उनके नाम पर ही आगे चलकर इस पावन स्थल का नाम भांडाशाह या भंडासर जैन मंदिर पड़ा। मंदिर के निर्माण में कई दशक का लंबा वक्त लगा। सेठ भांडाशाह के निधन के बाद इस अधूरे सपने को उनकी बेटी ने आगे बढ़ाया और सोलहवीं शताब्दी की शुरुआत में, यानी करीब 1514 से 1554 के बीच इसका कार्य संपन्न कराया।

इस तरह निर्माण कार्य पूरा होने में लगभग 86 साल का लंबा दौर बीता। शुरुआत में इस दिव्य मंदिर को सात मंजिलों तक ऊँचा बनाने का विचार था, लेकिन समय के साथ और परिस्थितियों के बदलाव के कारण इसे तीन मंजिला इमारत का रूप देकर पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित किया गया।

भंडासर जैन मंदिर (फोटो साभार: Etvbharat)

आज यह इमारत बीकानेर शहर के सबसे ऊँचे शिखरों वाले धार्मिक स्थलों में गिनी जाती है, जिसे भारत सरकार द्वारा एक अत्यंत महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक का दर्जा भी प्राप्त है।

नींव में 40 हजार किलो घी के इस्तेमाल की प्रसिद्ध किदवंती

इस मंदिर के निर्माण के पीछे सबसे प्रसिद्ध और रोचक बात इसकी नींव में पानी के बजाय शुद्ध देशी घी का उपयोग किया जाना है। माना जाता है कि जब इस विशाल मंदिर की नींव रखी जा रही थी, तब निर्माण सामग्री का मसाला तैयार करने के लिए पानी की जगह लगभग 40 हजार किलोग्राम शुद्ध देशी घी का इस्तेमाल किया गया था।

चूने, बजरी और अन्य पारंपरिक निर्माण सामग्रियाँ घी के साथ मिलाकर एक ऐसा मिश्रण तैयार किया गया, जिससे इसकी नींव को भरा गया। नींव में घी इस्तेमाल करने के पीछे मुख्य रूप से दो अलग-अलग कहानियाँ जनश्रुतियों में प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार, उस समय बीकानेर और आसपास के रेगिस्तानी इलाके में भयंकर सूखा पड़ा हुआ था।

ऐसे में जल संरक्षण को ध्यान में रखते हुए सेठ भांडाशाह ने पानी की जगह अपने विशाल भंडार से घी का प्रयोग करने का एक अभूतपूर्व निर्णय लिया। वहीं दूसरी बेहद दिलचस्प कहानी एक सामाजिक ताने और ठेकेदार की परीक्षा से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि एक बार जब सेठ अपनी दुकान में बैठे थे, तो घी के बर्तन में एक मक्खी गिरकर मर गई।

सेठ ने उस मक्खी को बाहर निकाला और उस पर लगे घी को अपने जूते पर रगड़कर मक्खी को फेंक दिया। पास ही बैठे मंदिर के ठेकेदार ने यह सब देख लिया। ठेकेदार ने सेठ की परीक्षा लेने के उद्देश्य से सलाह दी कि यदि मंदिर को सदियों तक बेहद मजबूत बनाए रखना है, तो इसके निर्माण की नींव में पानी की जगह घी मिलाना चाहिए।

सेठ भांडाशाह ने इस बात को एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया और तुरंत हजारों किलो घी का प्रबंध कर नींव में डलवाना शुरू कर दिया। ठेकेदार अपनी चाल पर शर्मिंदा हुआ और कहा कि वह तो केवल परीक्षा ले रहा था, लेकिन सेठ ने कहा कि जो घी भगवान के नाम पर समर्पित हो चुका है, उसका उपयोग अब केवल मंदिर की नींव में ही होगा।

भंडासर जैन मंदिर के फर्श पर गर्मी के मौसम में उभर आती है चिकनाई (फोटो साभार: Etvbharat)

नींव की बनावट का ढाँचा और फर्श से निकलते घी का अनोखा रहस्य

इस पौराणिक इमारत की नींव का ढाँचा केवल सतह तक सीमित नहीं है बल्कि इसके नीचे स्थापत्य कला का एक गहरा और विशाल तंत्र छुपा हुआ है। स्थानीय कहावतों और परंपराओं के अनुसार, इस मंदिर की नींव इतनी गहरी और विशाल बनाई गई है कि उसकी गहराई लगभग चार हाथियों की ऊँचाई के बराबर है।

पूरी पहाड़ी पर उस दौर में उपलब्ध चूने के पत्थरों और विशेष मिश्रण की परतें जमाकर इसे अत्यंत मजबूती के साथ तैयार किया गया था। इस नींव की सबसे बड़ी पहेली और चमत्कार यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं तथा पर्यटकों को गर्मियों के मौसम में देखने को मिलता है।

बीकानेर में जब भीषण गर्मी पड़ती है और पारा 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुँच जाता है, तब मंदिर की प्राचीन पत्थरों वाली ऊपरी सतह और फर्श पर अजीब सी चिकनाहट दिखाई देने लगती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो तपती धूप में जमीन के नीचे सदियों से जमा हुआ वह प्राचीन घी पिघलकर पत्थरों की दरारों से बाहर आ रहा हो।

फर्श की यह चिकनाहट आज भी लोगों को अचंभित कर देती है। स्थानीय निवासी और श्रद्धालु इसे स्पष्ट रूप से नींव में मिलाए गए 40 हजार किलो घी का ही असर मानते हैं। हालाँकि इतिहासकारों और वैज्ञानिकों का दृष्टिकोण इस मामले में थोड़ा व्यावहारिक है।

इतिहासकारों का मानना है कि लिखित सरकारी अभिलेखों में नींव में घी डाले जाने का कोई प्रत्यक्ष सबूत मौजूद नहीं है, लेकिन लोकपरंपराओं को लिखित प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। वैज्ञानिक रूप से भी फर्श से घी निकलने की बात पर कोई अंतिम या निर्णायक शोध पूरा नहीं हुआ है, फिर भी यह रहस्य मंदिर की पहचान का एक अविभाज्य अंग बन चुका है।

(फोटो साभार: Etvbharat)

उत्कृष्ट नक्काशी, उस्ता कला और मनमोहक आंतरिक कारीगरी

यदि नींव की कहानियों से हटकर मंदिर के भीतर कदम रखा जाए, तो यहाँ की वास्तुकला और कलात्मक सौंदर्य किसी का भी मन मोह लेता है। यह मंदिर केवल घी की कहानी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अपने जमाने की बेहतरीन स्थापत्य कला का एक जीवंत नमूना है।

मंदिर के निर्माण में जैसलमेर के प्रसिद्ध पीले पत्थरों, लाल बलुआ पत्थरों और कीमती इटैलियन मार्बल का बेहद संतुलित और नायाब उपयोग किया गया है। मंदिर का हर कोना, हर खंभा और हर दीवार किसी कुशल चित्रकार के कैनवास की तरह नजर आती है। इसकी तीन मंजिलों में चारों तरफ बेहद बारीक नक्काशी की गई है।

खंभों पर सुंदर फूलों के पैटर्न उकेरे गए हैं, जबकि छतों पर जटिल ज्यामितीय आकृतियाँ और बारीक शीशों का काम देखने को मिलता है, जो रोशनी पड़ते ही चमक उठते हैं। मंदिर की अंदरूनी छतों और दीवारों पर सोने की पत्तियों से बनाई गई पेंटिंग्स और भव्य चित्र बने हुए हैं।

मंदिर की अद्भुत सजावट में दिखाई देता है बीकानेर की सुप्रसिद्ध उस्ता कला के महान कारीगरों का अभूतपूर्व योगदान (फोटो साभार: Zee News)

इन चित्रों में जैन धर्म के सभी 24 तीर्थंकरों के जीवन चरित्र, धार्मिक कथाओं, तत्कालीन युद्धों और ऐतिहासिक घटनाओं का बड़ा ही सजीव चित्रण किया गया है। विशेष रूप से मंदिर के सबसे ऊँचे गुंबद में बने 16 चित्र तीर्थंकरों की पूरी जीवन यात्रा को खूबसूरती से बयां करते हैं।

इस अद्भुत सजावट में बीकानेर की सुप्रसिद्ध उस्ता कला के महान कारीगरों का अभूतपूर्व योगदान दिखाई देता है, जिनकी कला कभी राजमहलों की शान हुआ करती थी। दीवारों पर की गई यह बारीक नक्काशी, शीशे की जड़ाई और रंगों का संयोजन ऐसा प्रतीत कराता है मानो कोई प्राचीन चित्रित ग्रंथ अचानक जीवंत हो उठा हो।

बीकानेर का गौरव और वैश्विक पटल पर आकर्षण का केंद्र

अपनी इसी अनोखी नींव, अकल्पनीय कहानियों और बेजोड़ वास्तुकला के कारण भांडाशाह जैन मंदिर बीकानेर शहर की सांस्कृतिक पहचान का एक मुख्य प्रतीक बन गया है। ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो राव बीकाजी द्वारा बसाए गए बीकानेर शहर ने अपने सदियों लंबे सफर में स्थापत्य कला के कई बड़े मुकाम हासिल किए हैं।

इनमें प्रसिद्ध जूनागढ़ किला और रामपुरिया हवेलियाँ शामिल हैं लेकिन यह मंदिर अपनी प्राचीनता के कारण सबसे अलग चमकता है। मंदिर की तीसरी और सबसे ऊपरी मंजिल पर खड़े होकर देखने पर पूरे बीकानेर शहर का एक बेहद खूबसूरत और विहंगम नजारा साफ दिखाई देता है।

देश के अलग-अलग राज्यों से आने वाले लोग हों या फिर विदेशों से आने वाले सैलानी, हर कोई इस इमारत की भव्यता, ऊँचाई और इसके पीछे छिपी हजारों किलो घी की कहानी को जानकर हैरान रह जाता है। पर्यटक यहाँ आकर इसकी शानदार नक्काशी के सामने तस्वीरें खिंचवाना और इसकी बारीक कारीगरी को निहारना कभी नहीं भूलते।

भले ही नींव में घी होने की बात को कुछ लोग केवल एक पुरानी लोकपरंपरा मानते हों और कुछ इसे एक सच्चा ऐतिहासिक तथ्य लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस कहानी ने मंदिर को एक अमर पहचान दी है।

JNU छात्रों को बांग्लादेश की तर्ज पर उकसा रही जिहादन आरफा, राहुल गाँधी ने DU को धमकाया: जानिए कैसे छात्रों को हिंसा की तरफ ढकेल रहा इस्लामी-कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम

दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध प्रदर्शन में पिछले 4 दिनों से लगातार हिंसा की खबरें सामने आ रही हैं। इसी बीच दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) ने अपने छात्रों के लिए एडवाइजरी जारी की है। दोनों यूनिवर्सिटी ने सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला देते हुए कहा कि छात्र और शिक्षक जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शन में शामिल न हों और वहाँ जाने से भी बचें।

इससे पहले एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज (AIU) ने भी सभी यूनिवर्सिटी को एडवाइजरी भेजी, जिसमें छात्रों से पढ़ाई पर ध्यान देने और अपनी ऊर्जा किसी और दिशा में न लगाने की सलाह दी गई।

छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जारी की गई इन एडवाइजरी के बाद नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी और आरफा खानुम शेरवानी जैसे तथाकथित पत्रकारों को परेशानी हो गई। जहाँ राहुल गाँधी ने इन यूनिवर्सिटीज को छात्रों को रोकने के लिए धमकाया है, वहीं आरफा खानुम ने छात्रों को ‘वाइस चांसलर के इस्तीफे’ की माँग का नया एजेंडा सौंप दिया है।

यूनिवर्सिटीज की एडवाइजरी में क्या कहा गया?

JNU की एडवाइजरी में लिखा गया है कि यूनिवर्सिटी के सभी शिक्षकों, छात्रों और अन्य सदस्यों को जिम्मेदारी से काम लेना चाहिए और अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिए। एडवाइजरी में साफ कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के सार्वजनिक प्रदर्शनों को लेकर दिए गए निर्देशों के मुताबिक, सभी को जंतर-मंतर पर या उसके आसपास होने वाले जमावड़ों में शामिल होने या वहाँ जाने से बचना चाहिए।

साथ ही सोशल मीडिया पर भी जिम्मेदारी से व्यवहार करने की सलाह दी गई है। एडवाइजरी में यह भी लिखा है कि अगर कोई इन नियमों का उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई के साथ साथ यूनिवर्सिटी की आचार संहिता के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई भी हो सकती है। इसके अलावा छात्रों को शैक्षणिक जिम्मेदारी और जिम्मेदार नागरिकता के मूल्यों को बनाए रखने के लिए भी प्रोत्साहित किया गया है।

वहीं DU की एडवाइजरी में कहा गया कि छात्रों और शिक्षकों की सुरक्षा यूनिवर्सिटी के लिए बहुत मायने रखती है। एडवाइजरी में बताया गया है कि जंतर-मंतर पर होने वाली किसी भी गैरकानूनी सभा या प्रदर्शन में शामिल होना सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन माना जाएगा और इससे कानूनी कार्रवाई हो सकती है। साथ ही यह भी कहा गया है कि ऐसी गतिविधियाँ छात्रों की व्यक्तिगत सुरक्षा के साथ साथ उनकी पढ़ाई और आगे के करियर पर भी गंभीर असर डाल सकती हैं।

इसी वजह से सभी छात्रों से जंतर मंतर से दूर रहने और कानून का पालन करते हुए अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता देने की अपील की गई है। इसके अलावा DU ने छात्रों को यह भी सतर्क किया है कि सोशल मीडिया पर इस मामले को लेकर काफी फर्जी और भ्रामक जानकारी फैलाई जा रही है, इसलिए छात्रों को सावधान रहना चाहिए।

AIU ने भी अपनी एडवाइजरी में यही संदेश दोहराया है कि छात्रों को अपनी ऊर्जा पढ़ाई में लगानी चाहिए, न कि किसी और दिशा में भटकानी चाहिए।

राहुल गाँधी और आरफा खानुम को हुई दिक्कत

इन एडवाइजरी के सामने आते ही कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने यूनिवर्सिटी प्रशासन पर सीधा हमला बोला। उन्होंने धमकी देते हुए कहा कि छात्रों को उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल करने से रोकने की हिम्मत कैसे हो सकती है। उन्होंने आगे चेतावनी भरे लहजे में कहा कि जो लोग आज छात्रों को धमका रहे हैं, आने वाले समय में उन्हें भी इसका हिसाब देना होगा।

वहीं तथाकथित पत्रकार आरफा खानुम शेरवानी ने भी यूनिवर्सिटीज की एडवाइजरी का विरोध किया। आरफा ने छात्रों को उकसाते हुए कहा कि अब अपनी ‘इस्तीफे की सूची में एक और नाम जोड़ेंगे, और वह नाम है दिल्ली यूनिवर्सिटी के कुलपति का।”

एक तरफ यूनिवर्सिटी छात्रों को आगाह कर रही हैं कि प्रदर्शन में हो रही हिंसा और कानूनी कार्रवाई में पड़ने से उनका भविष्य खतरे में पड़ सकता है, पर दूसरी ओर राहुल गाँधी और आरफा खानुम को यह रास नहीं आ रहा है। क्योंकि अगर छात्रों ने यूनिवर्सिटी का आदेश पालन किया तो ये उनके मंसूबे पूरे नहीं करेगा। यह उसी प्रकार का मॉडल है, जो दो साल पहले बांग्लादेश में ‘छात्र आंदोलन’ के समय पर देखा गया था, जहाँ बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटी पर इस्तीफा देने का दबाव बनाया गया था।

बांग्लादेश में शिक्षकों से लिए गए थे जबरन इस्तीफे, हुई थी हिंसा

जब साल 2024 में बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार एक ‘छात्र आंदोलन’ के नाम पर गिराई गई थी, तब भी यही मॉडल सामने आया था। आंदोलन के नाम पर बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर, प्रिंसिपल और हेड टीचर को इस्तीफा माँगा गया था। और रिपोर्ट्स के मुताबिक, सैंकड़ों शिक्षकों को जबरन पद से इस्तीफा दिलावाया भी गया था।

ढाका ट्रिब्यून की रिपोर्ट के मुताबिक, UGC के चेयरमैन प्रोफेसर काजी शाहीदुल्लाह, नेशनल यूनिवर्सीट के वाइस चांसलर प्रोफेसर मशियुर रहमान, जगन्नाथ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ. सादेका हलीम, बांग्लादेश एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर एमदादुल हक चौधरी, कोमिला यूनिवर्सिी के कुलपति प्रोफेसर एएफएम अब्दुल मोईन ने इस्तीफा दे दिया था और यह सामने आया था कि इनमें से कई को जबरन हटने के लिए मजबूर किया गया था।

इसीलिए राहुल गाँधी और आरफा खानुम का यूनिवर्सिटी की एडवाइजरी का न सिर्फ विरोध करना, बल्कि धमकाया और छात्रों को VCs के इस्तीफे के लिए उकसाना एकदम उसी तरह से है, जैसे बांग्लादेश में हुआ था।

‘प्रतिरोध की राजनीति’ से ‘सड़क की लोकतांत्रिक राजनीति’ तक: योगेंद्र यादव, ये भीड़-तंत्र को सामान्यीकृत करने की खतरनाक कोशिश

कई वर्षों से योगेंद्र यादव खुद को लोकतंत्र, संवैधानिक व्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रताओं के प्रति प्रतिबद्ध एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में पेश करते रहे हैं। लेकिन उनके राजनीतिक हस्तक्षेप लगातार लोकतांत्रिक राजनीति की एक अलग ही अवधारणा को सामने रखते हैं।

यह ऐसी सोच है, जिसमें संसदीय प्रक्रियाओं से अधिक महत्व लगातार आंदोलनों को दिया जाता है, चुनावों से मिली वैधता से ऊपर सड़क पर होने वाली लामबंदी (Mobilization) को रखा जाता है और सरकारों को चुनौती देने तथा बदलने के लिए संविधान के सामान्य लोकतांत्रिक तरीकों के बजाय ‘प्रतिरोध की राजनीति’ को प्राथमिकता दी जाती है।

NEET पेपर लीक को लेकर हुए आंदोलन पर उनका हालिया लेख केवल एक विरोध प्रदर्शन के बारे में नहीं है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक व्यापक राजनीतिक रणनीति सामने आती दिखाई देती है। योगेंद्र यादव ने तर्क दिया है कि विपक्ष को चुनावी राजनीति से आगे बढ़कर ‘प्रतिरोध की राजनीति’ की ओर जाना चाहिए।

उन्होंने जंतर-मंतर पर हुए हिंसक आंदोलन को इस नई राजनीति के एक मॉडल के रूप में भी प्रस्तुत किया है।

(साभार: इंडियन एक्सप्रेस)

इस तर्क की गंभीरता से जाँच होनी चाहिए, खासकर 2026 में पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत के बाद।

पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत और उसके बाद शुभेंदु अधिकारी का राज्य के पहले BJP मुख्यमंत्री बनना केवल एक और विधानसभा चुनाव का परिणाम नहीं था। यह उस राजनीतिक धारणा के टूटने का संकेत था, जिसमें BJP के वैचारिक विरोधी पश्चिम बंगाल को भगवा दल के लिए आखिरी बड़ा राजनीतिक गढ़ मानते थे।

लंबे समय तक पश्चिम बंगाल को वामपंथी-उदारवादी राजनीति, क्षेत्रीय प्रतिरोध और BJP विरोधी वैचारिक एकजुटता का केंद्र बताया जाता रहा। ऐसे में राज्य में BJP की जीत ने सिर्फ चुनावी समीकरण ही नहीं बदले, बल्कि भारतीय राजनीति की मनोवैज्ञानिक तस्वीर भी बदल दी।

BJP विरोधी खेमे का लंबे समय से मानना था कि जैसे ही पार्टी की राजनीतिक रफ्तार कमजोर होगी, उसका सामाजिक गठबंधन बिखरेगा या कुछ मजबूत राज्य उसके विस्तार को रोक देंगे, वैसे ही उसे चुनाव में हराया जा सकेगा।

लेकिन BJP ने बार-बार यह दिखाया कि वह बदलते हालात के अनुसार खुद को ढाल सकती है, अपना जनाधार बढ़ा सकती है, राष्ट्रवाद को अपने मुख्य आधार के रूप में बनाए रख सकती है, सुशासन के मुद्दों को चुनावी समर्थन में बदल सकती है और उन इलाकों में भी अपनी जगह बना सकती है जिन्हें कभी उसके लिए पूरी तरह प्रतिकूल माना जाता था।

पश्चिम बंगाल के नतीजों ने इस पूरी बहस की दिशा बदल दी। ऐसे में कुछ कार्यकर्ताओं और वैचारिक समूहों के बीच लगातार सार्वजनिक आंदोलनों के प्रति बढ़ते उत्साह को केवल ‘लोकतांत्रिक असहमति’ के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसे चुनावी राजनीति की सीमाओं से पैदा हुई निराशा के रूप में भी समझा जा सकता है।

इसका यह मतलब नहीं है कि हर प्रदर्शनकारी या कार्यकर्ता की सोच एक जैसी है या फिर हर सार्वजनिक आंदोलन गलत है। लेकिन इससे एक अहम सवाल जरूर उठता है कि जब चुनावी राजनीति बार-बार मनचाहा राजनीतिक परिणाम देने में असफल रहती है और राजनीतिक आंदोलनों पर वही पुराने चेहरे हावी हो जाते हैं, तो क्या सड़क को निर्णायक राजनीतिक मैदान बनाने का आकर्षण बढ़ने लगता है? योगेंद्र यादव के हालिया बयान भी इसी तरह के बदलाव की ओर इशारा करते दिखाई देते हैं।

फिर से आ गया पेशेवर प्रदर्शनकारी

पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ हुए शायद ही किसी बड़े आंदोलन में ऐसा हुआ हो, जिसमें योगेंद्र यादव किसी न किसी रूप में सक्रिय भागीदार, टिप्पणीकार या वैचारिक समर्थक के तौर पर नजर न आए हों।

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ हुए प्रदर्शनों और शाहीन बाग धरने से लेकर किसान आंदोलन और अब परीक्षा में अनियमितताओं को लेकर CJP के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन तक, योगेंद्र यादव लगातार ऐसे आंदोलनों के साथ खड़े दिखाई दिए हैं, जिनका उद्देश्य मोदी सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाना रहा है।

सिर्फ इससे उन्हें अलोकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता। किसी भी सार्वजनिक बुद्धिजीवी को किसी मुद्दे या आंदोलन का समर्थन करने का अधिकार है। लेकिन एक पैटर्न लगातार दिखाई देता है, जिसे नजरअंदाज करना आसान नहीं है। सबसे बड़ी चिंता तब पैदा होती है, जब जनता के गुस्से को भड़काने और उन्हें हिंसा की ओर उकसाने की कोशिश की जाती है।

हाल ही में वायरल हुए एक वीडियो में योगेंद्र यादव कहते नजर आए कि लोकतंत्र संसद से नहीं, बल्कि सड़कों से चलेगा। इस बयान को कई लोगों ने हिंसक और टकराव वाली राजनीति को समर्थन देने वाला बताया।

यही राजनीतिक तरीका बार-बार सामने आता दिखाई देता है। किसी एक विशेष शिकायत को पूरे संस्थागत ढाँचे पर आरोप में बदल दिया जाता है। किसी सरकारी नीति पर मतभेद को लोकतंत्र के पूरी तरह विफल हो जाने का प्रमाण बताया जाता है। एक विरोध प्रदर्शन को चुनी हुई सरकार की वैधता पर नैतिक जनमत-संग्रह की तरह पेश किया जाता है।

और धीरे-धीरे जवाबदेही की भाषा की जगह हिंसा और टकराव की भाषा लेने लगती है। CJP का आंदोलन इसी बदलाव का ताजा उदाहरण माना जा सकता है।

NEET परीक्षा में हुई अनियमितताओं की निष्पक्ष और गंभीर जाँच होना जरूरी था। परीक्षा में गड़बड़ियों या पेपर लीक से प्रभावित छात्रों को न्याय मिलना चाहिए और प्रशासनिक लापरवाही से परेशान परिवारों के प्रति जवाबदेही तय होनी चाहिए। किसी भी सरकार को ऐसी चिंताओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

लेकिन प्रशासनिक सुधार की माँग करने और हर सार्वजनिक शिकायत को हिंसक सड़क आंदोलन में बदल देने के बीच एक स्पष्ट अंतर होता है। यह अंतर तब और महत्वपूर्ण हो जाता है, जब कुछ कार्यकर्ता जनता के गुस्से को केवल सुधार की माँग के रूप में नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक टकराव का आधार बनाने की कोशिश करने लगते हैं।

‘ऑक्युपाई इंडिया’ को खड़ा करना

अपने Indian Express के लेख में योगेंद्र यादव ने जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन को भारत का ‘ऑक्युपाई मोमेंट’ बताया। उन्होंने इस आंदोलन के बड़े पैमाने, इसमें शामिल विभिन्न वर्गों की भागीदारी और इसकी स्वतःस्फूर्त प्रकृति की सराहना करते हुए इसे ऐसा ‘स्वाभाविक जन आंदोलन’ कहा, जो पारंपरिक राजनीतिक दलों की व्यवस्था से अलग खड़ा हुआ।

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि विपक्ष को अब अपनी राजनीति का केंद्र चुनावों से आगे बढ़ाकर ‘प्रतिरोध की राजनीति’ की ओर ले जाना चाहिए।

यहाँ इस्तेमाल की गई भाषा महत्वपूर्ण है।

‘प्रतिरोध की राजनीति’ सुनने में तब तक सामान्य लग सकती है, जब इसका इस्तेमाल शांतिपूर्ण विरोध और लोकतांत्रिक असहमति के समर्थन में किया जाए। किसी भी लोकतंत्र में नागरिकों का अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना, विरोध करना और सरकार से जवाबदेही माँगना जरूरी होता है। लेकिन यही शब्द तब कहीं अधिक गंभीर अर्थ लेने लगते हैं, जब इनके जरिए यह संकेत दिया जाए कि प्रतिनिधिक लोकतंत्र और चुनावी राजनीति अब पर्याप्त नहीं रह गई है।

योगेंद्र यादव का तर्क इस धारणा पर आधारित है कि भारत उस दिशा में बढ़ रहा है, जिसे वह ‘चुनावी निरंकुशता’ (Electoral Autocracy) कहते हैं। इस सोच के अनुसार चुनाव तो होते रहते हैं, लेकिन चुनावी व्यवस्था को इस तरह पेश किया जाता है मानो वह अब वास्तविक लोकतांत्रिक बदलाव लाने में सक्षम नहीं रह गई हो।

इसका राजनीतिक संदेश साफ है।

अगर चुनावों को पर्याप्त नहीं माना जाएगा, तो फिर सड़क पर होने वाले आंदोलन नैतिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण माने जाने लगेंगे। वे केवल लोकतांत्रिक अधिकार नहीं रहेंगे, बल्कि राजनीति का एक वैकल्पिक मंच बन जाएँगे। संसद की भूमिका पीछे छूटने लगेगी, चुनावी जनादेश पर सवाल उठाए जाएंगे और सार्वजनिक प्रदर्शन ही राजनीतिक वैधता का नया आधार बनने लगेंगे।

यही वह बिंदु है, जहाँ खतरा पैदा होता है।

भारत ऐसा देश नहीं है, जहाँ चुनाव खत्म हो गए हों। यहां आज भी सरकारें चुनाव जीतती और हारती हैं। कई राज्यों में विपक्ष की सरकारें हैं। अदालतें सार्वजनिक विवादों में हस्तक्षेप करती हैं। संसद काम कर रही है और चुनावी मुकाबले लगातार होते रहते हैं। पश्चिम बंगाल में BJP की जीत भी, चाहे उसका राजनीतिक आँकलन कुछ भी हो, यह दिखाती है कि भारतीय राजनीति में चुनावों के जरिए बदलाव की पूरी संभावना बनी हुई है।

इसलिए सवाल यह नहीं है कि बीजेपी राजनीतिक रूप से मजबूत है या नहीं। वह है।

असल सवाल यह है कि इस राजनीतिक बढ़त का जवाब नए जनसमर्थन और चुनावी प्रतिस्पर्धा के जरिए दिया जाना चाहिए या फिर लगातार आंदोलनों की ऐसी स्थायी राजनीति के जरिए, जिसका उद्देश्य बैलट बॉक्स के बाहर चुनी हुई सरकार की वैधता को कमजोर करना हो।

बंगाल और हताशा की राजनीति

पश्चिम बंगाल का चुनाव परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उसने एक लंबे समय से बनी वैचारिक धारणा को झटका दिया है।

कई वर्षों तक BJP के आलोचक पश्चिम बंगाल को एक प्रतीकात्मक सीमा के रूप में देखते रहे। उनका मानना था कि यह ऐसा राज्य है, जहाँ हिंदुत्व की राजनीति चुनावी स्तर पर सीमित रहेगी, जहाँ की राजनीतिक संस्कृति भगवा दल के विस्तार को रोक देगी और जहाँ वामपंथी-उदारवादी विचारधारा की जड़ें सबसे मजबूत बनी रहेंगी।

लेकिन अब यह धारणा टूट चुकी है।

पश्चिम बंगाल में BJP की जीत ने केवल पार्टी को एक और राज्य नहीं दिया, बल्कि उन लोगों की सोच को भी बड़ा झटका दिया, जो मानते थे कि चुनावी राजनीति अंततः BJP के विस्तार की एक स्वाभाविक सीमा तय कर देगी। शुभेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री बनने के साथ BJP अब उस राजनीतिक क्षेत्र में पहुँच चुकी है, जिसे कभी उसके लिए लगभग असंभव माना जाता था।

बदले हुए इसी राजनीतिक माहौल में योगेंद्र यादव का ‘प्रतिरोध की राजनीति’ पर जोर और अधिक महत्वपूर्ण नजर आता है।

इसकी एक व्याख्या यह हो सकती है कि योगेंद्र यादव और उनके जैसे वैचारिक समूह अब यह महसूस करने लगे हैं कि पारंपरिक चुनावी राजनीति के जरिए BJP को हराना उनकी अपेक्षा से कहीं अधिक कठिन है। लगातार आलोचनाओं, सत्ता विरोधी माहौल की कोशिशों और राजनीतिक हमलों के बावजूद BJP ने अपना व्यापक जनसमर्थन बनाए रखा है और उन राज्यों में भी विस्तार किया है, जिन्हें कभी उसके लिए वैचारिक रूप से बंद माना जाता था।

ऐसे में CJP के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन को केवल परीक्षा में अनियमितताओं के खिलाफ छात्रों की प्रतिक्रिया के रूप में ही नहीं, बल्कि BJP विरोधी वैचारिक समूहों के लिए एक नए राजनीतिक मंच के रूप में भी देखा जा सकता है। ऐसा मंच, जिसकी नींव जन असंतोष, गुस्से, कैंपस आधारित लामबंदी, सोशल मीडिया पर वायरल अभियानों और बड़े पैमाने पर सार्वजनिक आंदोलनों पर टिकी हो।

इसका यह अर्थ नहीं है कि इस आंदोलन में शामिल हर छात्र या प्रतिभागी राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित है। कई छात्रों की चिंताएँ पूरी तरह वास्तविक और जायज हो सकती हैं। लेकिन जब प्रभावशाली वैचारिक समूह ऐसे आंदोलनों से जुड़ते हैं, तो वे केवल निष्पक्ष पर्यवेक्षक बनकर नहीं आते। वे अपने साथ राजनीतिक सोच, संगठनात्मक अनुभव और दीर्घकालिक रणनीतिक लक्ष्य भी लेकर आते हैं।

योगेंद्र यादव द्वारा इस आंदोलन का खुलकर समर्थन करना यह संकेत देता है कि वह इसे केवल परीक्षा सुधार के अभियान के रूप में नहीं देखते। उनकी नजर में यह भविष्य की राजनीति का एक संभावित मॉडल या खाका हो सकता है।

जब विरोध धीरे-धीरे ‘सड़क पर वीटो’ का रूप लेने लगता है

विरोध प्रदर्शन और ‘सड़क के जरिए वीटो’ (Street Veto) के बीच का अंतर केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि लोकतंत्र के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। एक विरोध प्रदर्शन सरकार से अपनी बात सुनने और उस पर विचार करने की मांग करता है। वहीं स्ट्रीट वीटो की सोच यह मानकर चलती है कि सरकार को सड़क पर जुटी भीड़ के दबाव के आगे झुकना ही होगा।

विरोध प्रदर्शन का उद्देश्य सरकार की नीतियों को प्रभावित करना हो सकता है, लेकिन स्ट्रीट वीटो का लक्ष्य लोकतांत्रिक संस्थाओं की वैधता पर सवाल खड़े करना होता है।

कोई भी विरोध प्रदर्शन तेज, असुविधाजनक या व्यापक हो सकता है, लेकिन यदि वह लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर रहता है तो वह लोकतंत्र का हिस्सा माना जाता है। स्ट्रीट वीटो की स्थिति तब पैदा होती है, जब कोई संगठित समूह यह दावा करने लगे कि संसद के बाहर उसकी मौजूदगी और उसका जनसमर्थन, संसद के भीतर मौजूद चुनावी जनादेश से अधिक वैध और महत्वपूर्ण है।

इसी वजह से योगेंद्र यादव का वह वायरल वीडियो चिंता का विषय माना जा रहा है, जिसमें वह कहते हैं कि लोकतंत्र संसद से नहीं, बल्कि सड़कों से चलेगा।

संसद कोई सामान्य संस्था नहीं है। यह जनता की संप्रभुता की संवैधानिक अभिव्यक्ति है। सांसदों को अपनी वैधता सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के जरिए मिले जनादेश से प्राप्त होती है। सरकारें जनता के वोट से चुनी जाती हैं, लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से जवाबदेह बनाई जाती हैं और चुनावों के जरिए ही बदली जाती हैं।

भारतीय संविधान शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से एकत्र होने तथा विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार देता है, लेकिन वह कानून बनाने या शासन चलाने का अधिकार उस समूह को नहीं देता, जो सबसे बड़ी या सबसे शोरगुल वाली भीड़ जुटा ले।

अगर संसद से ऊपर सड़क को रखा जाने लगे, तो लोकतांत्रिक राजनीति धीरे-धीरे टकराव और अवरोध की प्रतिस्पर्धा में बदल सकती है। तब चुनाव हारने वाला हर राजनीतिक दल या समूह मतपेटी के बजाय सड़क जाम, घेराव, दबाव और लगातार आंदोलनों के जरिए दूसरा जनादेश हासिल करने की कोशिश करेगा।

यह लोकतंत्र को मजबूत करने का रास्ता नहीं है। बल्कि यह उस संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करने का खतरा पैदा करता है, जिसके आधार पर लोकतंत्र कायम रहता है।

हिंसा के सवाल को नहीं किया जा सकता नजरअंदाज

यह चिंता इसलिए और गंभीर हो जाती है क्योंकि CJP का आंदोलन केवल भाषणों, तख्तियों और शांतिपूर्ण प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहा।

मीडिया रिपोर्ट्स और पुलिस के अनुसार, जंतर-मंतर के पास प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई, जिसमें पुलिसकर्मी भी घायल हुए। अधिकारियों का आरोप है कि प्रदर्शनकारियों ने पथराव किया और सुरक्षा बलों पर हमला किया, जबकि प्रदर्शनकारियों और विपक्ष ने इसके लिए पुलिस को जिम्मेदार ठहराया।

इन दोनों पक्षों के दावों की निष्पक्ष जाँच और जहाँ आवश्यक हो, न्यायिक प्रक्रिया के जरिए सत्य सामने आना चाहिए। लेकिन एक बात केवल इसलिए विवाद का विषय नहीं बननी चाहिए क्योंकि इस आंदोलन के इर्द-गिर्द राजनीति हो रही है। पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिंसा को लोकतांत्रिक प्रतिरोध कहकर उचित नहीं ठहराया जा सकता।

पथराव को संवैधानिक असहमति नहीं कहा जा सकता और सुरक्षा बलों पर हमला लोकतांत्रिक भागीदारी का विकल्प नहीं हो सकता। जो भी आंदोलन नैतिक आधार पर खुद को सही ठहराने का दावा करता है, उसे ऐसी हिंसक घटनाओं की बिना किसी शर्त के निंदा करनी चाहिए। यही कारण था कि महात्मा गाँधी हिंसक प्रदर्शनों के सख्त विरोधी थे।

हालाँकि आज जो लोग खुद को गाँधी की वैचारिक परंपरा का प्रतिनिधि बताते हैं, वे कई बार तथाकथित ‘शांतिपूर्ण प्रदर्शनों’ के दौरान हुई हिंसा की उतनी स्पष्ट आलोचना करते नजर नहीं आते। यहीं पर योगेंद्र यादव की भाषा और बयान महत्वपूर्ण हो जाते हैं। जब कोई सार्वजनिक बुद्धिजीवी लगातार किसी सरकार को तानाशाही प्रवृत्ति वाला, संसद को अपर्याप्त और ‘प्रतिरोध’ को लोकतंत्र का सबसे बड़ा माध्यम बताने लगे, तो ऐसा माहौल बन सकता है जिसमें टकराव और उग्रता राजनीतिक रूप से उचित या सार्थक दिखाई देने लगें।

हो सकता है कि वे सीधे तौर पर हिंसा का आह्वान न करें, लेकिन ऐसी भाषा, जो हर राजनीतिक विवाद को अत्याचार के खिलाफ लड़ाई के रूप में पेश करती है, लोगों को यह महसूस करा सकती है कि टकराव नैतिक रूप से उचित है। क्योंकि शब्द कभी भी शून्य में अस्तित्व नहीं रखते, उनके सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव भी होते हैं।

अंबेडकरवादी विरोधाभास

योगेंद्र यादव और उनके वैचारिक समर्थक अक्सर डॉ भीमराव आंबेडकर, संवैधानिक नैतिकता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा की बात करते हैं। लेकिन डॉ आंबेडकर की संवैधानिक सोच इस विचार पर आधारित नहीं थी कि भीड़ प्रतिनिधिक संस्थाओं की जगह ले ले।

इसके विपरीत, उनका स्पष्ट मानना था कि जब भारत ने राजनीतिक बदलाव के लिए संवैधानिक रास्ते अपना लिए हैं, तब नागरिकों और राजनीतिक दलों को सत्ता परिवर्तन के लिए संविधान से बाहर के तरीकों को सामान्य नहीं बनाना चाहिए। संविधान किसी भी सरकार को चुनौती देने के लिए कई लोकतांत्रिक और संवैधानिक रास्ते उपलब्ध कराता है।

नागरिक चुनाव में वोट दे सकते हैं। विपक्षी दल चुनाव लड़ सकते हैं। अदालतों में याचिकाएँ दायर की जा सकती हैं। संसद में कानूनों पर बहस हो सकती है। मीडिया सरकार की कार्यप्रणाली की जाँच और आलोचना कर सकता है। वहीं, शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन भी जनमत को प्रभावित करने का एक लोकतांत्रिक माध्यम है।

लेकिन इनमें से कोई भी संवैधानिक व्यवस्था यह नहीं कहती कि किसी निर्वाचित सरकार की वैधता को लगातार सड़क पर होने वाले आंदोलनों या भीड़ के दबाव के भरोसे रखा जाए।विडंबना यह है कि जो लोग खुद को संविधान का रक्षक बताते हैं, वही कई बार उसके सबसे मूल सिद्धांत को कमजोर करते हुए दिखाई देते हैं।

संविधान का मूल सिद्धांत यही है कि राजनीतिक सत्ता और उसकी वैधता संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से संचालित होनी चाहिए, न कि वैचारिक दबाव बनाने वाले ऐसे आंदोलनों के जरिए जिनका उद्देश्य शासन को प्रभावी ढंग से चलने से रोकना हो।

लोकतंत्र में विरोध जरूरी, लेकिन इसे विरोध के जरिए नहीं चलाया जा सकता

भारत को असहमति की जरूरत है। देश को ऐसे छात्र आंदोलन, नागरिक समाज संगठन, विपक्षी दल और सार्वजनिक बुद्धिजीवी चाहिए, जो सत्ता से सवाल पूछ सकें और सरकार को जवाबदेह बना सकें। लेकिन इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि लोकतांत्रिक दबाव और राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिश के बीच का अंतर स्पष्ट बना रहे।

पश्चिम बंगाल में BJP की जीत ने इस अंतर को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है।

इस जीत ने दिखाया कि BJP का राजनीतिक विस्तार अब केवल उसके पारंपरिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। साथ ही यह भी स्पष्ट हुआ कि उसके विरोधी लंबे समय तक इस उम्मीद पर निर्भर नहीं रह सकते कि चुनावी राजनीति अपने आप उनके पसंदीदा वैचारिक संतुलन को वापस ले आएगी।

संभव है कि यही कारण हो कि लगातार आंदोलनों की राजनीति कुछ वर्गों को अधिक आकर्षित करने लगी है। भारत के सामने चुनौती यह है कि चुनावी नतीजों से असंतोष कहीं चुनावी प्रक्रिया और लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति अविश्वास में न बदल जाए।

योगेंद्र यादव ‘प्रतिरोध की राजनीति’ को लोकतंत्र को मजबूत करने का माध्यम बताकर पेश कर सकते हैं। लेकिन जब इसे लगातार उग्र सड़क आंदोलनों के महिमामंडन, संसद के प्रति अविश्वास और हर सार्वजनिक शिकायत को सरकार की वैधता के संकट में बदलने की कोशिशों के साथ देखा जाता है, तो यह एक अलग तरह की राजनीति का रूप लेती दिखाई देती है।

ऐसी राजनीति, जो लोकतांत्रिक अधिकार का केंद्र जनता के वोट और चुनावी जनादेश से हटाकर सड़कों पर होने वाले राजनीतिक प्रदर्शनों की ओर ले जाने का प्रयास करती है।

यह एक बेहद जोखिम भरा विचार माना जा सकता है। योगेंद्र यादव के हस्तक्षेप का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह नहीं है कि वह विरोध प्रदर्शन के अधिकार का समर्थन करते हैं। शांतिपूर्ण विरोध किसी भी संवैधानिक लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा है।

असली चिंता यह है कि उनकी अवधारणा सड़क पर होने वाले आंदोलनों को केवल लोकतांत्रिक अधिकार तक सीमित नहीं रखती, बल्कि उन्हें राजनीतिक वैधता के समानांतर स्रोत के रूप में स्थापित करती दिखाई देती है। ‘प्रतिरोध की राजनीति’ की वकालत और यह कहना कि लोकतंत्र ‘संसद से नहीं, बल्कि सड़कों से चलेगा’, ऐसी राजनीतिक सोच को सामने रखता है, जो भारतीय गणराज्य की संवैधानिक व्यवस्था के साथ सहज मेल नहीं खाती।

भारतीय संविधान के अनुसार सर्वोच्च राजनीतिक अधिकार जनता में निहित है, जो चुनावों और प्रतिनिधिक संस्थाओं के माध्यम से लागू होता है। विरोध प्रदर्शन इसलिए संरक्षित है क्योंकि वह लोकतंत्र को मजबूत करता है, न कि इसलिए कि वह उन संस्थाओं की जगह ले सकता है, जिनके जरिए लोकतांत्रिक सत्ता संचालित होती है।

लोकतंत्र विरोध प्रदर्शनों को दबाने से मजबूत नहीं होता। वह तब मजबूत होता है, जब विरोध प्रदर्शन संविधान के दायरे में रहकर जनमत को प्रभावित करने का माध्यम बने, न कि जनता की संप्रभुता और चुनावी जनादेश का विकल्प।

सड़कों पर उठने वाली आवाज सुनी जानी चाहिए, लेकिन संप्रभुता का अंतिम स्रोत सड़क नहीं, बल्कि जनता का लोकतांत्रिक जनादेश और संविधान ही होना चाहिए।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

राहुल गाँधी का ‘पुलिस भी सरकार हटाना चाहती है’ दावा: क्या संस्थानों में अविश्वास फैलाकर रची जा रही है ‘सत्ता परिवर्तन’ की साजिश?

लोकसभा में विपक्ष के नेता और कॉन्ग्रेस सांसद राहुल गाँधी ने उन्हें प्रधानमंत्री आवास के पास प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए जाने के बाद दिल्ली पुलिस के जवानों को लेकर विवादित बयान दिया है। राहुल गाँधी ने कहा कि मंगलवार (21 जुलाई 2026) को जब उन्हें 7 लोक कल्याण मार्ग से हटाया जा रहा था तब सुरक्षा कर्मियों ने निजी तौर पर उनसे मौजूदा सरकार को हटाने की बात कही। राहुल गाँधी के मुताबिक, पुलिसकर्मियों ने उनके कान में कहा, “इनको हटाइए।”

राहुल गाँधी ने दावा किया कि इस दौरान उनकी पुलिसकर्मियों से अलग-अलग बातचीत हुई। उन्होंने कहा, “एक पुलिसकर्मी ने कहा कि मैं राजस्थान से हूँ, हम तो सिर्फ वर्दी पहने हुए हैं। दूसरे ने कहा कि मैं हरियाणा से हूँ, इन्हें हटाइए। यानी ऐसी भावना मौजूद है और सब सच्चाई जानते हैं।”

उन्होंने कहा कि पुलिसकर्मी अपने आदेश का पालन करने के लिए मजबूर हैं लेकिन उनमें से कई मौजूदा स्थिति से खुश नहीं हैं। राहुल गाँधी ने दावा किया, “उन्हें आदेश मानना पड़ता है, इसलिए वे अपना काम कर रहे हैं। लेकिन पुलिस भी जो हुआ है उससे खुश नहीं है। संवेदनशील पुलिसकर्मी मानते हैं कि यह देश के भविष्य के साथ अपराध है। वे इसमें अपने बच्चों का भविष्य भी देखते हैं।”

प्रदर्शन में अपनी मौजूदगी पर राहुल गाँधी ने कहा कि वह छात्रों के आंदोलन के साथ मजबूती से खड़े हैं। उन्होंने पुलिस के साथ हुई धक्का-मुक्की को मामूली बताते हुए कहा कि छात्रों के लिए खड़े होने की कीमत अगर ‘एक-दो मुक्के’ भी हैं तो यह बड़ी बात नहीं है।

यह घटना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास के बाहर प्रदर्शन के दौरान हुई। राहुल गाँधी के साथ प्रियंका गाँधी वाड्रा, मल्लिकार्जुन खरगे, केसी वेणुगोपाल और पवन खेड़ा समेत कई कॉन्ग्रेस नेता मौजूद थे। इस धरने की जानकारी अंतिम समय तक कॉन्ग्रेस के कई सांसदों को भी नहीं थी। रिपोर्ट्स के अनुसार, सुरक्षा एजेंसियों और एसपीजी को भनक न लगे इसलिए यह योजना राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी वाड्रा और केसी वेणुगोपाल ने बनाई थी।

संस्थानों में अविश्वास पैदा करने की कोशिश

राहुल गाँधी का पुलिस की कथित नाराजगी पर जोर देना देश के संस्थानों के भीतर विभाजन पैदा करने की कोशिश है। पुलिसकर्मियों के निजी तौर पर सरकार के खिलाफ होने का दावा करके उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि सुरक्षा बल और पुलिस मौजूदा सरकार से असंतुष्ट हैं।

राज्य संस्थानों के भीतर मतभेद पैदा करना व्यापक राजनीतिक रणनीति का एक तरीका माना जाता है। सुरक्षा बलों की निष्ठा पर सवाल खड़े करने से सरकारी व्यवस्था को कमजोर करने और बड़े स्तर पर अस्थिरता का माहौल बनाने की कोशिश की जाती है। इतिहास में भी सुरक्षा बलों का मनोबल गिराने या उन्हें मौजूदा सरकार के खिलाफ करने की कोशिश को शासन परिवर्तन की रणनीतियों का हिस्सा माना गया है। जब राज्य संस्थानों की एकजुटता कमजोर पड़ती है तो किसी देश की राजनीतिक व्यवस्था भी अस्थिर हो सकती है।

सैन्य तख्तापलट (Military coup) वह स्थिति होती है जब किसी देश की सेना अचानक और गैरकानूनी तरीके से सत्ता पर कब्जा कर नागरिक सरकार को हटा देती है। इसमें लोकतांत्रिक चुनाव या संवैधानिक प्रक्रिया के बजाय बल या बल की धमकी के जरिए शासन अपने हाथ में लिया जाता है। दक्षिण एशिया के कई देशों में ऐसे उदाहरण सामने आए हैं।

बांग्लादेश का मामला: अंदरूनी विश्वासघात की एक मिसाल

पड़ोसी देशों की हालिया राजनीतिक घटनाएँ दिखाती हैं कि राजनीतिक अस्थिरता और सरकारी संस्थानों के भीतर अविश्वास किस तरह सत्ता परिवर्तन का कारण बन सकता है। बांग्लादेश इसका एक बड़ा उदाहरण है जहाँ सेना के भीतर की परिस्थितियों ने सरकार गिरने में अहम भूमिका निभाई।

बांग्लादेश के राजनीतिक घटनाक्रम पर 15 नवंबर 2025 को प्रकाशित किताब ‘Inshallah Bangladesh: The Story of an Unfinished Revolution’ के बाद चर्चा तेज हुई। दीप हलदर, जयदीप मजूमदार और शहीदुल हसन खोखोन द्वारा लिखी गई इस किताब में बताया गया है कि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को कैसे सत्ता से हटाया गया। किताब में हसीना सरकार के पूर्व गृह मंत्री असदुज्जमान खान कमाल ने सरकार गिरने को लेकर कई दावे किए हैं।

दिल्ली में लेखकों से बातचीत के दौरान खान कमाल ने सत्ता परिवर्तन को ‘CIA की पूरी तरह से रची गई साजिश’ बताया, जिसे लंबे समय तक तैयार किया गया। उन्होंने दावा किया कि बांग्लादेश के सेना प्रमुख जनरल वाकर-उज-जमान ने इसमें अहम भूमिका निभाई। कमाल ने कहा, “हमें नहीं पता था कि सीआईए ने वाकर को अपने प्रभाव में ले लिया था।” उन्होंने यह भी कहा कि डायरेक्टरेट जनरल ऑफ फोर्सेज इंटेलिजेंस (DGFI) और नेशनल सिक्योरिटी इंटेलिजेंस (NSI) जैसी एजेंसियाँ प्रधानमंत्री को पहले से आगाह नहीं कर सकीं।

फोटो साभार: HINDU E SHOP

खान कमाल ने बांग्लादेश में विदेशी दिलचस्पी के दो प्रमुख कारण बताए। पहला, उनका दावा था कि वॉशिंगटन दक्षिण एशिया में एक साथ कई मजबूत नेताओं को सत्ता में देखना नहीं चाहता था। उन्होंने इसके उदाहरण के तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और शेख हसीना का नाम लिया। दूसरा कारण उन्होंने बंगाल की खाड़ी में म्यांमार के तट के पास स्थित सेंट मार्टिन द्वीप का रणनीतिक महत्व बताया। पद छोड़ने से पहले शेख हसीना ने सार्वजनिक रूप से दावा किया था कि उन पर राजनीतिक समर्थन के बदले सेंट मार्टिन द्वीप तक पहुँच देने का दबाव बनाया गया था, जिसे उन्होंने देश की संप्रभुता के खिलाफ बताते हुए ठुकरा दिया।

लेखकों ने यह भी लिखा कि देश के भीतर सक्रिय कट्टरपंथी समूहों ने बाहरी खुफिया एजेंसियों के साथ मिलकर काम किया। खान कमाल के मुताबिक, पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) ने जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश के साथ मिलकर जन आंदोलन को भड़काया। उन्होंने कहा कि विदेशी प्रशिक्षण प्राप्त लोगों द्वारा पुलिस को निशाना बनाए जाने की चेतावनी मिलने के बावजूद जनरल वाकर ने शेख हसीना को भरोसा दिलाया कि सेना बिना पुलिस की मदद के हालात संभाल लेगी।

4 अगस्त 2024 की शाम गोनोभबन में हुई उच्चस्तरीय सुरक्षा बैठक में खान कमाल ने सुझाव दिया कि पुलिस ढाका में प्रवेश के सभी रास्तों को अपने नियंत्रण में ले। लेकिन जनरल वाकर ने यह प्रस्ताव खारिज कर दिया। उनका कहना था कि जनता को पुलिस पर भरोसा नहीं है और सेना ही स्थिति संभालेगी। कमाल ने कहा, “उस शाम उन्होंने उन पर भरोसा किया।” लेकिन 5 अगस्त 2024 की सुबह तक सेना के सीधे दबाव में शेख हसीना को इस्तीफा देकर देश छोड़ना पड़ा।

म्यांमार संकट: संवैधानिक तख्तापलट और सैन्य शासन

म्यांमार दक्षिण एशिया का एक और उदाहरण है, जहाँ सेना ने सीधे हस्तक्षेप कर चुनी हुई नागरिक सरकार को सत्ता से हटा दिया। 1 फरवरी 2021 को म्यांमार की सेना (तातमदाव) ने सत्ता पर कब्जा कर लिया, लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को हटा दिया और उसके प्रमुख नेताओं को हिरासत में ले लिया।

1948 में स्वतंत्रता मिलने के बाद से म्यांमार की राजनीति पर सेना का गहरा प्रभाव रहा है। 1962 में पहला सैन्य तख्तापलट हुआ। हालाँकि, 2008 में नागरिक शासन की ओर बढ़ने के लिए नया संविधान लागू किया गया लेकिन उसमें सेना को व्यापक अधिकार दिए गए। संसद की 25 प्रतिशत सीटें सेना के लिए आरक्षित रखी गईं, 3 प्रमुख सुरक्षा मंत्रालयों का नियंत्रण सेना के पास रहा और आपातकाल की ऐसी व्यवस्था बनाई गई जिसे कई विश्लेषक पहले से मौजूद तख्तापलट की व्यवस्था मानते हैं। इसके तहत राष्ट्रीय संकट की स्थिति में सत्ता सेना को सौंपी जा सकती थी।

नवंबर 2020 के संसदीय चुनाव के बाद नागरिक सरकार और सेना के बीच तनाव बढ़ गया। आंग सान सू की की नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) को स्पष्ट बहुमत मिला जबकि सेना समर्थित यूनियन सॉलिडेरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी (USDP) को बड़ी हार का सामना करना पड़ा। इस हार के बाद वरिष्ठ जनरल मिन आंग ह्लाइंग के संसदीय प्रक्रिया से राष्ट्रपति बनने की संभावना खत्म हो गई। सेना ने बड़े पैमाने पर चुनावी गड़बड़ी का आरोप लगाया। हालाँकि, घरेलू और अंतरराष्ट्रीय चुनाव पर्यवेक्षकों ने इन आरोपों को खारिज कर दिया। इसके बावजूद सेना ने दोबारा चुनाव कराने और संसद की पहली बैठक टालने की माँग की।

जब सरकार ने 1 फरवरी 2021 को संसद की बैठक बुलाने का फैसला बरकरार रखा, तो सेना ने तुरंत तख्तापलट कर दिया। राष्ट्रपति विन म्यिंत, स्टेट काउंसलर आंग सान सू की और कई सांसदों को हिरासत में ले लिया गया। पूर्व सैन्य अधिकारी और उपराष्ट्रपति म्यिंत स्वे कार्यवाहक राष्ट्रपति बने और संविधान के अनुच्छेद 417 और 418 का इस्तेमाल करते हुए आपातकाल घोषित कर दिया। इसके साथ ही कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका की सभी शक्तियाँ वरिष्ठ जनरल मिन आंग ह्लाइंग को सौंप दी गईं।

इस सत्ता परिवर्तन के बाद पूरे देश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन, अशांति और हड़तालें शुरू हो गईं। इसके जवाब में नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट नाम की एक समानांतर सरकार बनाई गई और कई सशस्त्र प्रतिरोध समूह भी सामने आए। सत्ता बनाए रखने के लिए सेना की कार्रवाई ने म्यांमार को लंबे गृह संघर्ष में धकेल दिया, जिससे अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ और पूरे क्षेत्र में अस्थिरता फैल गई।

ऐतिहासिक उदाहरण: भारत में आपातकाल से पहले का दौर

भारत के राजनीतिक इतिहास में पुलिस और सशस्त्र बलों की निष्ठा को प्रभावित करने की कोशिशों जैसी बातें पूरी तरह नई नहीं हैं। 1975 में आपातकाल लागू होने से पहले भी इसी तरह की बातें सामने आई थीं।

25 जून 1975 को विपक्ष के नेता जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने दिल्ली के रामलीला मैदान में एक सभा को संबोधित किया। अपने करीब 80 मिनट के भाषण में जेपी ने पुलिस, सशस्त्र बलों और सरकारी अधिकारियों से कहा कि वे सरकार के उन आदेशों का पालन न करें जिन्हें वे ‘गैरकानूनी और अनैतिक’ मानते हैं। जेपी ने इसे अहिंसक सविनय अवज्ञा का हिस्सा बताते हुए कहा कि इसका उद्देश्य प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की तानाशाही प्रवृत्तियों के खिलाफ लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना है।

सभा में जेपी ने तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश एएन रे से भी अपील की कि वे इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ इंदिरा गाँधी की अपील की सुनवाई न करें, जिसमें उनके चुनाव को अमान्य ठहराया गया था। हालाँकि, उन्होंने कहा कि वह मुख्य न्यायाधीश की ईमानदारी पर सवाल नहीं उठा रहे हैं लेकिन उनका तर्क था कि क्योंकि एएन रे की नियुक्ति तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों को नजरअंदाज कर की गई थी, इसलिए जनता का भरोसा प्रभावित हो सकता है। लोकतंत्र पर खतरे की बात करते हुए जेपी ने कहा कि भारत न तो बांग्लादेश है और न ही पाकिस्तान, जहाँ मनमानी शासन को बिना विरोध स्वीकार कर लिया जाएगा।

इस रैली के बाद विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री के इस्तीफे की माँग को लेकर एक सप्ताह का सत्याग्रह शुरू किया और देशभर में आंदोलन चलाने के लिए लोक संघर्ष समिति (LSS) का गठन किया। बढ़ते राजनीतिक दबाव और सरकारी तंत्र से की जा रही अपीलों के बीच इंदिरा गाँधी के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने 25 जून 1975 की रात देशभर में आपातकाल लागू कर दिया। इसके बाद मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए और कई विपक्षी नेताओं को हिरासत में ले लिया गया।

मीडिया और ‘तख्तापलट’ की कहानी

मीडिया और राजनीतिक वर्ग द्वारा सेना की बगावत या तख्तापलट जैसी आशंकाओं को लेकर कहानी गढ़ने की प्रवृत्ति नई नहीं है। कॉन्ग्रेस के शासनकाल में भी सामान्य संस्थागत गतिविधियों को तख्तापलट की कोशिश बताने वाली खबरों का राजनीतिक और वैचारिक स्तर पर कड़ा विरोध हुआ था।

इसका एक प्रमुख उदाहरण पत्रकार शेखर गुप्ता का 2012 में द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित लेख था, जिसका शीर्षक था, ‘The January night Raisina Hill was spooked: Two key army units move towards Delhi without notifying govt’। इस रिपोर्ट में बिना सरकार को सूचना दिए सेना की दो प्रमुख टुकड़ियों के दिल्ली की ओर बढ़ने को संभावित तख्तापलट जैसी स्थिति के संकेत के रूप में पेश किया गया था।

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट

इस रिपोर्ट की उस समय खूब आलोचना हुई थी। सिर्फ तत्कालीन सरकार ने ही नहीं बल्कि कॉन्ग्रेस के कई आलोचकों ने भी इस कथित साजिश की कहानी को सनसनी फैलाने वाला बताया। उनका कहना था कि यह पाठकों का ध्यान खींचने के लिए गढ़ी गई कहानी थी। इसी वजह से कुछ लोगों ने मजाक में शेखर गुप्ता को ‘कूप्टा’ (Coupta) भी कहना शुरू कर दिया।

ऐसे गैर-जिम्मेदाराना ‘तख्तापलट’ वाले दावे सशस्त्र बलों की छवि को तो नुकसान पहुँचाते ही हैं साथ ही साथ लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता के भरोसे को कमजोर करते हैं। यह ऐतिहासिक उदाहरण दिखाता है कि सेना या पुलिस की कथित नाराजगी के आधार पर सत्ता परिवर्तन की कहानी गढ़ना लंबे समय से जिम्मेदार राजनीति या पत्रकारिता नहीं बल्कि सनसनी फैलाने का तरीका माना जाता रहा है।

इसी तरह, राहुल गाँधी का हालिया दावा कि पुलिसकर्मियों ने उनसे सरकार हटाने की बात कही वो भी इसी तरह की रणनीति का हिस्सा लगता है जिसमें सरकारी संस्थानों के भीतर असंतोष का संकेत देकर अस्थिरता की कहानी खड़ी करने की कोशिश हो रही है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ा जा सकता है)

सोनम वांगचुक ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग से बनाई दूरी, CJP में फूट के बाद क्या अब आंदोलन की उलटी गिनती हो गई है शुरू?

पेपर लीक को लेकर जंतर मंतर पर चल रहा कॉकरोच जनता पार्टी और इस मुद्दे को लेकर आमरण अनशन करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की माँग क्या अलग अलग हो गई है। ये हम नहीं कर रहे, बल्कि जंतर मंतर पर अभी भी डेरा जमाए कॉकरोच जनता पार्टी के बयान और गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में भर्ती सोनम वांगचुक के खुले पत्र से पता चलता है।

क्या है सोनम वांगचुक के खुले पत्र में

अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल कर सोनम वांगचुक ने अपने खुले पत्र में सरकार से माँग की है कि पेपर लीक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने वाले छात्रों के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई न की जाए, उनके खिलाफ दायर एफआईआर वापस ले ली जाए। नीट यूजी 2026 पेपर लीक की वजह से आत्महत्या करने वाले बच्चों के परिजनों को मुआवजा दी जाए।

पेपर लीक करने के मुद्दे पर जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए संसद में सार्थक चर्चा करना, अगर इन मुद्दों पर सरकार तैयार हो जाती है तो वे अनशन तोड़ने के लिए तैयार हैं यानी उनकी माँगों में कही भी शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे पर जोर नहीं है, जबकि सीजेपी का कहना है कि शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे से कम हमें कुछ नहीं चाहिए और वार्ता जंतर मंतर या किसी ‘न्यूट्र्ल जगह’ पर होनी चाहिए। इसी पर सरकार से वार्ता भी अटकी हुई है।

सीजेपी ने क्या माँग रखी है

कॉकरोच जनता पार्टी के नेता अभिजीत दीपके धमकी भरे लहजे में कहते हैं, “मोदी जी, मैं एक बार फिर आपसे रिक्वेस्ट करता हूँ कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा स्वीकार करें। नहीं तो, मामला सिर्फ धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक ही सीमित नहीं रहेगा, यह आपके इस्तीफे तक भी आएगा… याद रखें: भारत में कोई भी आपको चुनाव में वोट नहीं देगा…।” साफ है कि उनकी माँग शिक्षा मंत्री के इस्तीफे से शुरू होती है।

लेकिन सरकार सीजेपी के जंतर मंतर पर बातचीत करने और शिक्षा मंत्री के इस्तीफा वाली माँग को मानने वाली नहीं है। हालाँकि सरकार लगातार प्रदर्शनकारी कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं से बातचीत की अपील करती रही है। सरकार की तरफ से छात्रों और सोनम वांगचुक से बातचीत की अगुवाई करने वाले केन्द्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेन्द्र सिंह ने विनम्र निवेदन की है कि वार्ता के मेज पर ही समाधान निकाला जा सकता है। सरकार हर वक्त सभी मुद्दों पर बातचीत करने के लिए तैयार है। सरकार की तरफ से कोई ‘पूर्व शर्त’ भी नहीं रखी गई है।

धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे पर वांगचुक और सीजेपी एकमत नहीं

ये तो हुई सरकार की बात, लेकिन क्या शिक्षा मंत्री के इस्तीफा के मुद्दे पर सोनम वांगचुक और कॉकरोच जनता पार्टी के बीच मतभेद हो गया है। सोनम वांगचुक से लगातार दोनों केन्द्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेन्द्र सिंह अस्पताल जाकर वार्ता कर रहे हैं। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि वांगचुक जल्दी ही अपना अनशन तोड़ देंगे।

अगर वांगचुक भूख हड़ताल खत्म करते हैं तो छात्र आंदोलन का चेहरा कौन होगा? आखिर वांगचुक का चेहरा ही इस आंदोलन में सेलिब्रिटी को जोड़ने का जरिया रहा है। सोशल मीडिया पर भी वांगचुक के भूख हड़ताल पर जबरदस्त प्रतिक्रिया देखी गई। वांगचुक के अस्पताल जाते ही यह मंच पर कई चेहरे दिखने लगे।

निंहगों से लेकर योगेन्द्र यादव तक अपने अपने तरह से आंदोलन में कूदते नजर आए। संसद मार्च के दौरान हुआ हुडदंग और हिंसा भी इस आंदोलन का चेहरा बन गया। ऐसे में वांगचुक की भूख हड़ताल के खत्म होते ही इस आंदोलन के दिशाहीन होने की आशंका है।

छात्र आंदोलन के नेतृत्व को हाईजैक करने की कोशिश तो विपक्षी राजनीतिक पार्टियाँ भी कर रही है। इसी तरफ एक कदम आगे बढ़ते हुए लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी पीएम आवास के सामने धरना पर बैठ गए और अपनी माँगों को बदलते रहे। पहले उन्होंने संसद में चर्चा कराने की माँग रखी, जिसे सरकार के नुमाइंदे केन्द्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह ने तुरंत मान लिया। लेकिन तुरंत उन्होंने शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का मुद्दा जोड़ दिया।

शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की माँग कर रहे विपक्ष ने मानसून सत्र का पहला हफ्ता बर्बाद कर दिया। शिक्षा मंत्री पहले इस्तीफा दें, तब सदन में पेपर लीक पर चर्चा होगी। विपक्ष इस पर अड़ा हुआ है, वही सरकार पेपर लीक समेत हर मुद्दे पर सदन में पहले चर्चा करना चाहती है।

रवीश कुमार तुम ही पत्रकारों की पिटाई के जिम्मेदार हो, खुद ‘गोदी’ में बैठ करते रहे पत्रकारिता… अब चला रहे ‘गोदी मीडिया’ वाला प्रोपेगेंडा

कहावत है कि जब इंसान के सिर पर अहंकार का चश्मा चढ़ जाता है, तो उसे दूसरों का दर्द और अपनी भड़ास के बीच का अंतर दिखना बंद हो जाता है। खुद को लोकतंत्र का आखिरी पहरेदार और देश का सबसे बड़ा निष्पक्ष पत्रकार बताने वाला रवीश कुमार आज इसी मोड़ पर आकर खड़ा हो गया है।

वर्षों से ‘गोदी मीडिया-गोदी मीडिया’ का राग अलापकर खुद को दूध का धुला साबित करने वाले प्रोपेगेंडाई पत्रकार रवीश कुमार अब इस खोखले नैरेटिव के पीछे अपनी नफरती सोच को बिल्कुल छिपा नहीं पाए। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन के दौरान जब सड़कों पर गुंडों और उपद्रवियों ने महिला और पुरुष पत्रकारों को निशाना बनाया, दौड़ा-दौड़ाकर पीटा और उनके कपड़े तक फाड़ दिए, तब रवीश कुमार का ‘न्यायप्रिय’ जमीर पूरी तरह से सो गया।

उनकी यह चुप्पी और उसके बाद आया उकसाने वाला बयान साबित करता है कि उनके लिए साथी पत्रकारों की सुरक्षा कोई मायने नहीं रखती, बल्कि अपनी राजनीतिक खुन्नस निकालना और मोदी सरकार को किसी भी कीमत पर कटघरे में खड़ा करना ही उनका एकमात्र एजेंडा बन चुका है।

सड़क पर लहूलुहान होते पत्रकार और स्टूडियो में बैठ नफरत को जायज ठहराते रवीश

राजधानी की सड़कों पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का प्रदर्शन चल रहा था। प्रदर्शनकारियों का चोला ओढ़कर आए उपद्रवियों ने वहाँ मौजूद रिपोर्टरों और कैमरामैनों पर हमला कर दिया। 10 से 15 पत्रकारों के साथ सरेआम मारपीट और बदसलूकी की गई। हद तो तब हो गई जब खुद रवीश कुमार के पूर्व साथी रवीश रंजन शुक्ला को निशाना बनाया गया। कई युवा पत्रकारों के कपड़े फाड़े गए, उनके माइक तोड़ दिए गए और महिला पत्रकारों के साथ ऐसी अभद्रता की गई जिसे देखकर किसी भी संवेदनशील इंसान का सर शर्म से झुक जाए।

उपद्रवियों ने केवल मीडिया पर ही नहीं, बल्कि शांति व्यवस्था बनाए रखने में जुटी पुलिस पर भी पथराव किया। प्रधानमंत्री को खुलेआम गंदी-गंदी गालियाँ दी गईं और देश विरोधी माहौल बनाने का प्रयास किया गया। लेकिन इन सब गंभीर और शर्मनाक घटनाओं पर रवीश कुमार के मुँह से एक शब्द नहीं निकला।

पुलिस पर हमले पर मौन, पत्रकारों के लहूलुहान होने पर मौन, देश के प्रधानमंत्री को दी गई भद्दी गालियों पर मौन और देश की अखंडता को चुनौती देने वाली विदेशी ताकतों की घुसपैठ पर भी पूरी तरह मौन… इस पूरे घटनाक्रम में प्रोपेगेंडाई पत्रकार रवीश कुमार की भूमिका किसी मूकदर्शक की नहीं, बल्कि उस सोच के समर्थक की रही जो हिंसा को जायज ठहराती है। उन्होंने हिंसा की निंदा करने का महज एक औपचारिकता भरा ‘बैलेंसिंग एक्ट’ किया, लेकिन उसकी अगली ही लाइन में पत्रकारों पर हो रहे हमलों और मॉब लिंचिंग जैसी मानसिकता को सही ठहराने का कुतर्क गढ़ दिया।

‘गोदी मीडिया लोकतंत्र का हत्यारा है’: हिंसा का समर्थन

22 जुलाई को अपने आधिकारिक X (ट्विटर) हैंडल पर रवीश कुमार ने जो लिखा, वह सिर्फ एक विचार नहीं बल्कि सड़क पर घूम रही हिंसक भीड़ को उकसाने वाला एक खुला फरमान था। उन्होंने लिखा, “मूल बात क्या है? मूल बात है कि गोदी मीडिया लोकतंत्र का हत्यारा है। आप अगर-मगर के सहारे इससे नहीं बच सकते। कुछ अच्छे लोग हमेशा हैं, रहेंगे। उन्हें निशाना मत बनाइये, हिंसा और हुड़दंग नहीं होनी चाहिए। तब भी गोदी मीडिया की सच्चाई नहीं बदल जाएगी। जनता को हर दिन जागना होगा। आज इस मीडिया पर आप गर्व नहीं कर सकते। इसके न्यूज़ रूम के लोग भी शर्म से सहमे रहते हैं। अभी भी ज़रूरत है कि देश की हर पंचायत में पोस्टर लगना चाहिए कि गोदी मीडिया लोकतंत्र का हत्यारा है। हर पार्टी के दफ्तर के बाहर यह पोस्टर लिखा होना चाहिए। एयरपोर्ट पर स्पेस ख़रीद कर यह नारा लिखा जाना चाहिए। लोगों को अपनी कार के पीछे लिखना चाहिए। इस गोदी मीडिया ने लोकतंत्र के हर कोने में सड़न पैदा कर दी है। इसके कारण कुर्सी पर बैठा हर शख़्स ख़ुद को ख़ुदा समझ बैठा है। सांसद तक लूटे जा रहे हैं। विपक्षी पार्टियाँ लूट ली जा रही हैं। वोट का अधिकार छीना गया है। इसी मीडिया के सामने। इसलिए मूल बात है कि गोदी मीडिया लोकतंत्र का हत्यारा है।”

जरा इस बयान की भाषा और समय को समझिए। जब जमीन पर रिपोर्टिंग कर रहे युवा पत्रकारों को भीड़ पीट रही थी, तब रवीश कुमार लोगों से कह रहे थे कि पंचायतों से लेकर एयरपोर्ट्स तक और गाड़ियों के पीछे पोस्टर लगाओ कि ‘गोदी मीडिया लोकतंत्र का हत्यारा है’। क्या यह बयान उस उग्र भीड़ को थपकी देने जैसा नहीं है? जब आप किसी समूह को सरेआम ‘हत्यारा’ घोषित कर देंगे, तो सड़क पर उतरी उग्र भीड़ उस समूह के प्रतिनिधियों को सामने पाकर क्या करेगी? जाहिर है, वह उन पर हमला ही करेगी। रवीश कुमार यही चाहते हैं। वे एसी स्टूडियो में बैठकर नफरत का ऐसा माहौल बना रहे हैं जिससे ग्राउंड पर काम करने वाले रिपोर्टरों की लिंचिंग सुनिश्चित हो सके।

रवीश कुमार की नजर में निष्पक्षता की परिभाषा पूरी तरह सड़ चुकी है। उनके तय पैमानों के मुताबिक ‘सच्चा और ईमानदार पत्रकार’ सिर्फ वही है, जो उनके एजेंडे, उनकी राजनीतिक सोच और उनकी कुंठा का समर्थन करे।

अगर कोई ग्राउंड रिपोर्टर किसी आंदोलन या प्रदर्शन के भीतर छिपे हिंसक तत्वों को बेनकाब करता है, अगर कोई पत्रकार पुलिस पर पथराव करने वाले उपद्रवियों की फुटेज दिखाता है, या कोई मीडियाकर्मी भीड़ द्वारा खुद उस पर किए गए हमले की सच्चाई देश के सामने लाता है, तो रवीश कुमार जी के हिसाब से वह ‘गोदी मीडिया’ का दलाल बन जाता है। और चूँकि रवीश ने उसे ‘लोकतंत्र का हत्यारा’ घोषित कर दिया है, इसलिए सड़क पर घूम रही हिंसक भीड़ को उस पर हमला करने का नैतिक अधिकार मिल जाता है। यह सोच पत्रकारिता की नहीं, बल्कि चरमपंथी मानसिकता की प्रतीक है।

पत्रकार बिरादरी का फूटा गुस्सा: ‘आप उस हिंसक भीड़ के मसीहा हैं’

प्रोपेगेंडाई पत्रकार रवीश कुमार के इस गैर-जिम्मेदाराना, भड़काऊ और दोहरा चरित्र उजागर करने वाले रवैये से पूरी पत्रकार बिरादरी में गहरा आक्रोश फैल गया है। वरिष्ठ पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर रवीश कुमार को आईना दिखाते हुए उनकी नफरती पत्रकारिता की धज्जियाँ उड़ाई हैं।

वरिष्ठ पत्रकार सैयद सुहैल ने रवीश कुमार को टैग करते हुए सीधे शब्दों में लिखा, “पत्रकारों के खिलाफ इस भीड़ को हिंसा के लिए आप सालों से उकसा रहे हैं। मुबारक हो आप उस भीड़ के मसीहा हैं… जो सड़क पर पत्रकारों को पीट रही है। एन्जॉय कीजिये यही आप चाहते थे.. खुद की ईमानदारी की झूठी दुकान चलाने के लिए आपने पत्रकारों के खिलाफ लोगों को भड़काया है।”

वहीं, वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश शर्मा ने पत्रकारिता के गिरते स्तर और रवीश जैसे लोगों द्वारा फैलाई जा रही नफरत पर दुख जताते हुए लिखा, “मैंने पत्रकारिता में एकजुटता का वह दौर भी देखा है जब देश के किसी हिस्से में पत्रकारों पर हमला होने पर विरोध में सब साथ आ जाते थे। आशुतोष जी पर बीएसपी नेताओं के हमले के विरोध में प्रेस क्लब से नॉर्थ ब्लॉक तक मार्च किया गया था जिसमें प्रिंट और टीवी के उस समय के सारे दिग्गज संपादक शामिल थे। कुछ रिपोर्टर को एंट्री न मिलने पर सारे रिपोर्टर प्रेस कॉन्फ्रेंस का बायकॉट कर देते थे। यह एकजुटता थी। अब वह दौर है जब पत्रकार ही भीड़ को पत्रकारों की लिंचिंग के लिए उकसा रहे हैं।”

ABP न्यूज की वरिष्ठ पत्रकार चित्रा त्रिपाठी ने भी रवीश कुमार को आड़े हाथों लिया है। उन्होंने X पर रवीश के एक पोस्ट पर जवाब देते हुए लिखा, “ये व्यक्ति पत्रकारों के खिलाफ भीड़ को ‘लिचिंग’ के लिए भड़का रहा है। एक पॉलिटिकल पार्टी की राजनीतिक यात्रा में हिस्सा लेकर अपनी पत्रकारिता बेच देने वाला शख्स पत्रकारिता सिखाने में लगा हुआ है।”

चित्रा जिस यात्रा की बात कर रही हैं वो राहुल गाँधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ है। खुद को न्यूट्रल दिखाने को ढोंग करने वाले रवीश कुमार की असलियत बार-बार अलग-अलग रूप में सामने आती रही है। दिवंगत पत्रकार रोहित सरदाना की वो टिप्पणी भी याद करिए जो उन्होंने रवीश कुमार के लिए की थी।

रोहित ने कहा था, “वैसे भी कोई उसे देखता नहीं है और वह अपनी मनमानी करता रहता है और खुद को संतुष्ट करने के लिए दूसरे चैनलों को गोदी मीडिया कहता है।” उन्होंने कहा था, “अगर आप ध्यान से देखेंगे तो पाएँगे कि वह खुद किसी की गोद में बैठा है और दूसरे मीडिया को गोदी मीडिया कहकर अपनी ही नीची भावना को दूसरों पर थोप रहा है।”

पत्रकारों की ये टिप्पणियाँ यह साबित करने के लिए काफी हैं कि रवीश कुमार ने अपनी खोखली वाहवाही और निजी खुन्नस के चक्कर में पूरी पत्रकार बिरादरी की सुरक्षा को दाँव पर लगा दिया है।

यूट्यूब पर अपने आलीशान और AC स्टूडियो में बैठकर घंटों लंबे वीडियो ज्ञान देने वाले रवीश कुमार को अब ज़मीनी हकीकत का कोई अहसास नहीं रह गया है। वे भूल चुके हैं कि कड़कती धूप, बारिश और उग्र भीड़ के बीच जाकर रिपोर्टिंग करना क्या होता है। स्टूडियो के ठंडे और सुरक्षित माहौल में बैठकर प्रोपेगेंडा गढ़ना बहुत आसान होता है, लेकिन जब कोई युवा रिपोर्टर हाथ में माइक लेकर किसी उग्र भीड़ के बीच खड़ा होता है, तो उसकी जान हर पल जोखिम में होती है।

रवीश कुमार आज अहंकार की उस पराकाष्ठा पर हैं, जहाँ वे अपने से छोटे पत्रकारों, समकालीनों और अपने पुराने सहयोगियों के अस्तित्व और उनकी सुरक्षा को पूरी तरह नकार देते हैं। अपनी ‘महानता’ और ‘ईमानदारी’ का झूठा मुखौटा पहने रखने के लिए वे अपने ही साथियों की बलि चढ़ाने से भी नहीं हिचकते।

देश विरोधी एजेंडे और मौन का कड़वा सच

यह पहला मौका नहीं है जब रवीश कुमार का ऐसा संदिग्ध और चुनिंदा रुख सामने आया है। जब भी देश में किसी आंदोलन की आड़ में अराजकता फैलाई जाती है, जब भी विदेशी ताकतें भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने की कोशिश करती हैं, या जब भी देश की संवैधानिक संस्थाओं पर हमले होते हैं- रवीश कुमार हमेशा देशविरोधी या उपद्रवी तत्वों की ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं।

मोदी सरकार के प्रति अपनी नफरत में वे इतने अंधे हो चुके हैं कि उन्हें देश का हित-अहित दिखना बंद हो गया है। प्रधानमंत्री को दी जाने वाली गालियाँ उनके लिए ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ बन जाती हैं, और पत्रकारों पर होने वाले जानलेवा हमले ‘जनता का गुस्सा’। रवीश कुमार की यह मौकापरस्ती सिर्फ एक व्यक्ति का पतन नहीं है, बल्कि यह उस विचार का पतन है जो खुद को ‘पत्रकारिता’ कहकर जनता को गुमराह करता रहा है।

अगर रवीश कुमार में जरा सी भी पत्रकारिता की नैतिकता, बची हुई इंसानियत या आत्मसम्मान बाकी है, तो उन्हें अपने भीतर झांकना चाहिए। उन्हें यह समझना होगा कि नफरत की जिस फसल को वे इतने सालों से सींच रहे हैं, उसकी जद में कल कोई भी आ सकता है। दूसरों को लोकतंत्र का हत्यारा बताने से पहले रवीश को यह मान लेना चाहिए कि साथी पत्रकारों के खून से सने उपद्रवियों के हाथों को नैतिक समर्थन देकर वे खुद पत्रकारिता के सबसे बड़े हत्यारे बन चुके हैं।

CJP का मंच बना ‘मोदी विरोधी बैटलग्राउंड’… जानें- वामपंथी और विपक्षी दल कैसे कर रहे छात्रों के आंदोलन का इस्तेमाल, विदेशी फंडिंग और खालिस्तानी कनेक्शन पर भी सवाल

राजधानी दिल्ली का ऐतिहासिक जंतर-मंतर एक बार फिर तमाशे, उपद्रव और घिनौनी राजनीति का गवाह बन रहा है। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) नाम के शुरू हुए एक व्यंग के मंच और तथाकथित छात्र संगठन के बैनर तले जो कुछ भी पिछले दिनों से रचा जा रहा है, उसने देश के जागरूक नागरिकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

परीक्षा सुधारों, रोजगार और छात्रों के निष्पक्ष भविष्य की जिन माँगों को लेकर यह आंदोलन शुरू होने का दावा किया गया था, वह असली मुद्दा अब बहुत पीछे छूट चुका है।

आज जंतर-मंतर का मंच छात्रों की समस्याओं का समाधान खोजने की जगह विपक्षी दलों का ‘राजनीतिक लॉन्चपैड’ और ‘मोदी विरोधी बैटलग्राउंड’ बन गया है। लोकतंत्र में जनता द्वारा बार-बार खारिज की जा चुकी और अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन को वापस पाने की हताशा में झुलस रही कॉन्ग्रेस, आम आदमी पार्टी (AAP) और तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) जैसी पार्टियाँ इस मंच का इस्तेमाल केवल अपनी-अपनी राजनीति चमकाने के लिए कर रही हैं।

इतना ही नहीं, बांग्लादेश, कतर से लेकर खालिस्तानी आतंकी संगठन ‘सिख्स फॉर जस्टिस’ (SFJ) जैसे भारत विरोधी तत्वों का इस आंदोलन में दिलचस्पी लेना और वित्तीय सहायता फंडिंग का ऐलान करना यह साफ दिखाता है कि इस पूरे ड्रामे के तार कितने खतरनाक और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़े हुए हैं।

पृष्ठभूमि और ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का उभार: व्यंग्य से शुरू हुआ खेल अब अराजकता का औजार

शुरुआत में जिस ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को सोशल मीडिया पर एक मजाकिया या व्यंग्यात्मक ग्रुप की तरह पेश किया गया था, वह रातों-रात विरोध प्रदर्शन का चेहरा कैसे बन गई? इस संगठन के संस्थापक अभिजीत दीपके और उनके सहयोगियों ने जब NEET परीक्षा में गड़बड़ियों का मुद्दा उठाकर जंतर-मंतर पर धरना देना शुरू किया, तो पूरे देश के आम छात्रों को लगा कि शायद यह उनकी आवाज है। लेकिन महज कुछ ही दिनों में इस पूरे आंदोलन की दिशा मोड़ दी गई।

छात्रों के जायज सवालों को किनारे करके मंच से नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ भड़काऊ नारेबाजी, राजनीतिक भाषणबाजी और व्यवस्था को अपाहिज बनाने की धमकियाँ दी जाने लगीं। व्यंग्य का चोला पहनकर उतरी CJP दरअसल वामपंथी इकोसिस्टम और मोदी विरोधी लॉबी का ही नया अवतार बनकर उभरी है, जिसका मकसद केवल देश में अशांति और अस्थिरता का माहौल बनाना है।

जो छात्र केवल निष्पक्ष परीक्षाओं और रोजगार के अवसर तलाश रहे थे, उन्हें समझने ही नहीं दिया गया कि उनके पीछे से एक सुनियोजित राजनीतिक और विचारधारात्मक एजेंडा चलाया जा रहा है।

राजनीति चमकाने की होड़: कॉन्ग्रेस, आप, सपा और TMC ने छात्रों के मंच पर डाला डेरा

जैसे ही जंतर-मंतर पर भीड़ जुटने लगी, वैसे ही अपनी खोई साख तलाश रहे विपक्षी दलों ने इस मौके को भुनाने में जरा भी देर नहीं की। शिक्षा और छात्रों के हित का ढोंग रचने वाली राजनीतिक पार्टियों में इस बात की होड़ मच गई कि कौन जंतर-मंतर जाकर CJP का सबसे बड़ा हमदर्द दिखेगा।

कॉन्ग्रेस के राहुल गाँधी और उनके तमाम नेताओं ने संसद में काले कपड़े पहनने से लेकर सड़कों पर प्रदर्शन का नाटक करके इस मुद्दे को तुरंत भुनाने की कोशिश की और इसे अपनी डूबती नैया पार लगाने का जरिया बना लिया।

इसी होड़ में समाजवादी पार्टी भी पूरे तामझाम के साथ कूद पड़ी। मैनपुरी से सांसद डिंपल यादव खुद जंतर-मंतर पहुँचीं और CJP के प्रदर्शनकारियों के बीच बैठकर अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराई।

यही नहीं अखिलेश यादव और सपा के अन्य बड़े नेताओं से लेकर सपा छात्र सभा के कार्यकर्ताओं तक, पूरी पार्टी ने CJP के इस आंदोलन को खुला राजनीतिक और नैतिक समर्थन देने का ऐलान कर दिया।

जो समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में लगातार चुनावों में हार के बाद अपनी जमीन तलाश रही है, उसने छात्रों के इस मंच का इस्तेमाल केवल केंद्र की मोदी सरकार पर हमला बोलने और अपनी पार्टी का राजनीतिक कद चमकाने के लिए किया।

उधर भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल और उनके नेता खुद को चमकाने सीधे जंतर-मंतर के मंच पर पहुँच गए। जो आम आदमी पार्टी दिल्ली के युवाओं को रोजगार देने और अपनी प्रशासनिक विफलताओं को छिपाने में नाकाम रही, वही आज छात्रों के कंधे पर हाथ रखकर सरकार को घेरने की नाकाम कोशिश कर रही है।

वहीं दूसरी ओर बंगाल में चुनावी हिंसा पर मौन रहने वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी और महुआ मोइत्रा जैसी नेताओं ने भी इस मंच का पूरा इस्तेमाल अपनी राजनीति चमकाने के लिए किया।

इन तमाम राजनीतिक दलों के बड़े-बड़े चेहरों का अचानक जंतर-मंतर पर जमावड़ा होना यह साबित करता है कि इन्हें छात्रों के भविष्य की जरा भी चिंता नहीं है, बल्कि इन्हें केवल अपने चुनाव के लिए एक गरमा-गरम मुद्दा चाहिए।

भटक गया असली मुद्दा: छात्रों का दर्द पीछे छूटा, एजेंडा हावी हुआ

जो छात्र दूर-दराज के इलाकों से इस उम्मीद में दिल्ली आए थे कि उनकी परीक्षाओं की निष्पक्षता, NEET लीक मामलों और पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया पर सरकार से गंभीर संवाद होगा, वे आज खुद को पूरी तरह ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

राजनीतिक नेताओं की एंट्री होते ही पूरा ध्यान छात्रों की वास्तविक माँगों से हटकर अरविंद केजरीवाल के भाषणों, राहुल गाँधी के आरोपों और ममता बनर्जी के समर्थनों पर केंद्रित हो गया। मंच से अब परीक्षा प्रणाली में सुधार की नहीं, बल्कि केंद्र सरकार को उखाड़ फेंकने, संसद घेरने और प्रशासनिक व्यवस्था को ठप करने की धमकियाँ दी जा रही हैं।

वास्तविक और निर्दोष छात्र अब इस भीड़ में पूरी तरह गायब हो चुके हैं और उनकी जगह पेशेवर प्रदर्शनकारियों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के नए चेहरों ने ले ली है। छात्रों के कंधों को ढाल बनाकर अपने राजनीतिक मंसूबों को पूरा करना और असली मुद्दों को दबा देना ही इन राजनीतिक आकाओं का असली मकसद बन चुका है।

विदेश से फंडिंग और ऑनलाइन सप्लाई: कतर, बांग्लादेश और खालिस्तानी एंगल

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नाम पर चल रहे इस तथाकथित ‘गरीब और पीड़ित छात्र आंदोलन’ का असली चेहरा तब बेनकाब हुआ, जब इसके पीछे चल रहे संदिग्ध फंडिंग और सप्लाई नेटवर्क की परतें खुलीं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, जंतर-मंतर पर विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों के लिए बांग्लादेश और कतर जैसे अंतरराष्ट्रीय गंतव्यों के संदिग्ध खातों से भारी मात्रा में ऑनलाइन खाना और महंगे फूड डिलीवरी ऑर्डर्स भेजे गए। सवाल उठता है कि विदेशों में बैठे इन आकाओं को भारत के छात्रों के खाने-पीने की इतनी चिंता क्यों अचानक सताने लगी?

आंदोलन की देशविरोधी साँठगाँठ उस समय पूरी तरह उजागर हो गई जब अमेरिका में बैठे प्रतिबंधित खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू के संगठन ‘सिख्स फॉर जस्टिस’ (SFJ) ने CJP आंदोलनकारियों के लिए 1 मिलियन डॉलर की वित्तीय सहायता देने का खुला ऐलान कर दिया। यह सीधे तौर पर भारत में खालिस्तानी एजेंडे को घुसाने और युवाओं को भड़काकर हिंसा फैलाने की अंतर्राष्ट्रीय साजिश का हिस्सा है।

यह साबित करने के लिए काफी है कि यह आंदोलन केवल भारत के अंदर की राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत विरोधी वैश्विक ताकतें इसे ‘रिजीम चेंज’ (सत्ता परिवर्तन) की टूलकिट के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं।

 हिंसा, बैरिकेडिंग तोड़ना और पुलिस पर हमला: ‘बांग्लादेशी मॉडल’ की खतरनाक पुनरावृत्ति

जंतर-मंतर पर हो रही गतिविधियों की तुलना अगर आप पड़ोसी देश बांग्लादेश में हुए तख्तापलट से करेंगे, तो आपको एक जैसा पैटर्न साफ दिखाई देगा। बांग्लादेश में भी इसी तरह छात्रों के आंदोलन की आड़ में उग्र तत्वों ने हिंसा फैलाकर चुनी हुई सरकार को निशाना बनाया था और अराजकता पैदा की थी।

जंतर-मंतर पर CJP के उपद्रवियों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन का नकाब उतारकर जब ‘चलो संसद’ का आह्वान किया, तो दिल्ली पुलिस के लगाए बैरिकेड्स को तोड़ा गया और कानून-व्यवस्था में तैनात सुरक्षाबलों पर पत्थरबाजी और बोतलें फेंकी गईं।

इस हिंसा में उत्तरी दिल्ली के DCP, पंजाबी बाग के ACP समेत 118 से अधिक पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए। जब-जब पुलिस और प्रशासन स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कानून के मुताबिक कदम उठाते हैं, तब-तब यह पूरा राजनीतिक इकोसिस्टम ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने लगता है।

ऑन-ड्यूटी जवानों और महिला पुलिसकर्मियों का खून बहाने वाले उग्र तत्वों के बचाव में उतरना यह दिखाता है कि इस आंदोलन का उद्देश्य संवाद नहीं, बल्कि केवल हिंसा और टकराव है।

लाइमलाइट बटोरने की होड़: छात्रों के दर्द पर अभिनय करते फिल्मी कलाकार

राजनीतिक दलों के साथ-साथ इस आंदोलन में खुद को ‘क्रांतिकारी’ दिखाने और खोई हुई लाइमलाइट वापस पाने की होड़ फिल्मी गलियारों के कुछ चुनिंदा चेहरों में भी साफ देखी जा रही है।

स्वरा भास्कर, इमरान खान,हुमा कुरैशी, सोनाक्षी सिन्हा और प्रकाश राज जैसे अभिनेता, जिनका फिल्मी करियर लंबे समय से ढलान पर है या जो मुख्यधारा के सिनेमा से लगभग गायब हो चुके हैं, वे अब जंतर-मंतर के इस मंच को अपने पब्लिसिटी स्टंट का जरिया बना रहे हैं।

सोशल मीडिया पर लंबे-चौड़े ज्ञान देने वाले ये कलाकार अब छात्रों के हक की आड़ में अपनी ढहती साख को बचाने की नाकाम कोशिशों में जुटे हैं। प्रकाश राज और स्वरा भास्कर जैसे चेहरे, जो हर सरकारी नीति के विरोध में कूदने के लिए जाने जाते हैं, वे एक बार फिर ‘मोदी विरोध’ के अपने पुराने एजेंडे को चमकाने आ गए हैं।

वहीं लंबे समय से बड़े पर्दे से दूर इमरान खान और हाल ही में सुर्खियों में रहने की कोशिश कर रहीं सोनाक्षी सिन्हा जैसे लोग भी छात्रों की वास्तविक समस्याओं से दूर, केवल कैमरे के सामने अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर खुद को ‘जनता का मसीहा’ साबित करने का खेल खेल रहे हैं।

मोदी विरोध की आड़ में देश को अस्थिर करने का टूलकिट: युवाओं को होना होगा सावधान

शाहीन बाग से लेकर लाल किले पर हिंसा वाले किसान आंदोलन और अब जंतर-मंतर पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नाम से जारी यह प्रदर्शन सब एक ही सिक्के के पहलू हैं। जब-जब देश में मोदी सरकार के खिलाफ जनता का जनादेश नहीं मिलता, तब-तब ये हताश ताकतें सड़कों पर अराजकता का माहौल बनाकर देश को बंधक बनाने की रणनीति अपनाती हैं।

निजी स्वार्थों से प्रेरित राजनीतिक दल अपनी चमक खो चुकी राजनीति को चमकाने के लिए मासूम छात्रों को ह्यूमन शील्ड बना रहे हैं। देश का युवा अगर आज भी यह नहीं समझ पाया कि परीक्षा सुधार के नाम पर उसके कंधों का इस्तेमाल खालिस्तानी समर्थकों, विदेशी फंडिंग एजेंसियों और मोदी-विरोधी नेताओं द्वारा देश विरोधी मंसूबों को पूरा करने के लिए किया जा रहा है, तो यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण होगा।

देश के छात्रों को इस राजनीतिक टूलकिट से खुद को तुरंत अलग कर लेना चाहिए ताकि उनका भविष्य, उनकी मेहनत और देश की सुरक्षा तीनों सुरक्षित रह सकें।

पेपर लीक पर PM मोदी का बड़ा ऐलान, फास्ट ट्रैक कोर्ट में होगी सुनवाई

इन सब के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्पष्ट ऐलान किया है कि पेपर लीक के सभी मामलों में दोषियों को जल्द से जल्द और सख्त सजा दिलाने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट्स का गठन किया जाएगा।

PM मोदी ने सोशल मीडिया पर संदेश जारी कर कहा कि युवाओं का कल्याण और उनका भविष्य हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता है। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को इस दिशा में तुरंत आवश्यक कदम उठाने के निर्देश जारी कर दिए हैं। प्रधानमंत्री ने सख्त चेतावनी देते हुए कहा है कि युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी दोषी को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि देश के युवाओं का हित और उनका भविष्य सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। सरकार विद्यार्थियों के हितों की सुरक्षा के लिए लगातार फैसले ले रही है।

पीएम मोदी ने कहा कि पेपर लीक के मामलों में शामिल लोगों को जल्द से जल्द सख्त सजा दिलाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाएँगे। इससे मामलों का जल्दी निपटारा होगा और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होगी।

पीएम मोदी ने अपने संदेश में साफ कहा कि युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा। सरकार ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त रुख अपनाएगी।

उन्होंने आगे कहा कि संबंधित विभागों और अधिकारियों को आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए जा चुके हैं। सरकार चाहती है कि छात्रों का भरोसा परीक्षा व्यवस्था पर बना रहे।

मैदान में CM योगी, बूथ तक सक्रिय संगठन और भ्रम में विपक्ष… UP में BJP ऐसे कर रही 2027 में जीत की हैट्रिक लगाने की तैयारी

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने में करीब 9 महीने बाकी हैं लेकिन सत्तारूढ़ भाजपा ने अपनी संगठनात्मक मशीनरी को अभी से चुस्त-दुरुस्त करना शुरू कर दिया है। पिछले कुछ वर्षों में भाजपा की चुनावी रणनीति का सबसे बड़ा आधार उसका संगठन रहा है और इस बार भी पार्टी उसी मॉडल पर आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। हाल ही में प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर एक साथ आयोजित बूथ सम्मेलन इस बात का संकेत है कि भाजपा ने चुनावी मशीनरी को समय से पहले सक्रिय कर दिया है।

बूथ स्तर से शुरुआत

भाजपा ने 22 जुलाई को उत्तर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर एक साथ बूथ स्तरीय सम्मेलन आयोजित किए। पार्टी के अनुसार, यह प्रदेश में अब तक का सबसे बड़ा बूथ-स्तरीय संगठनात्मक अभियान था जिसमें राज्य के 1,77,516 मतदान केंद्रों को कवर किया गया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर में तो बरेली में डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और शाहजहाँपुर में ब्रजेश पाठक ने बूथ अध्यक्षों के सम्मेलन को संबोधित किया। पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेता भी अलग-अलग जिलों में पहुँचे हैं।

भाजपा के लिए बूथ केवल मतदान का केंद्र नहीं बल्कि पूरे चुनाव अभियान की सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। यही कारण है कि बूथ अध्यक्षों, शक्ति केंद्र प्रमुखों और मंडल स्तर के पदाधिकारियों को लगातार प्रशिक्षण, संवाद और समीक्षा बैठकों के माध्यम से सक्रिय किया जा रहा है। पार्टी का प्रयास है कि प्रत्येक बूथ पर ऐसा कार्यकर्ता तंत्र तैयार हो जो अपने क्षेत्र के मतदाताओं से लगातार संपर्क बनाए रखे, नए मतदाताओं तक पहुँचे और सरकार की योजनाओं की जानकारी लोगों तक पहुँचाए। भाजपा का संगठन वर्षों से इसी मॉडल पर काम करता आया है और 2027 के चुनाव में भी यही उसकी पहली प्राथमिकता दिखाई दे रही है।

कमजोर सीटों पर खास फोकस

पार्टी की रणनीति सिर्फ मजबूत इलाकों तक सीमित नहीं है। मीडिया रिपोर्ट्स की माने तों राष्ट्रीय स्तर पर तैयार किए जा रहे चुनावी खाके में प्रदेश की सभी 403 सीटों को 4 श्रेणियों में बाँटा गया है और खास नजर उन करीब 61 विधानसभा सीटों पर है जहाँ भाजपा पिछले तीन विधानसभा चुनावों 2012, 2017 और 2022 में जीत दर्ज नहीं कर सकी।

इन सीटों पर नए सिरे से बूथ प्रबंधन, जातीय समीकरण का आकलन, लाभार्थी संपर्क अभियान और संभावित उम्मीदवारों का सर्वे कराए जाने की योजना है। पार्टी का लक्ष्य इन कमजोर सीटों पर संगठन को बिल्कुल नए सिरे से खड़ा करना है ताकि लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने का रास्ता और पुख्ता हो सके।

कुछ दिनों पहले ही बदले थे क्षेत्रीय अध्यक्ष

पिछले कुछ महीनों में केवल बूथ सम्मेलन ही नहीं हुए बल्कि संगठन के भीतर भी बड़े बदलाव किए गए हैं। अभी करीब महीनेभर पहले ही भाजपा ने उत्तर प्रदेश में अपने सभी छह क्षेत्रीय अध्यक्ष बदल दिए थे। राजनीतिक दृष्टि से यह केवल पदों का परिवर्तन नहीं माना था बल्कि इसे सामाजिक समीकरणों और क्षेत्रीय संतुलन को ध्यान में रखते हुए संगठन को नए सिरे से खड़ा करने की कोशिश थी। पार्टी नेतृत्व चाहता है कि हर क्षेत्र में ऐसा नेतृत्व सामने आए जो स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ बेहतर तालमेल बनाकर चुनावी तैयारी को और मजबूत कर सके।

सरकार और संगठन साथ-साथ

यह भी गौर करने वाली बात है कि यह पूरी कवायद सिर्फ संगठन तक सीमित नहीं है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार प्रदेश के विभिन्न जिलों का दौरा कर विकास परियोजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास कर रहे हैं। CM योगी एक-एक दिन में कई शहरों को कवर कर रहे हैं। सैकड़ों करोड़ की सौगात दे रहे हैं। कुल मिलाकर कहें तो सरकार का कामकाज और संगठन का विस्तार दोनों मोर्चों पर एक साथ काम हो रहा है।

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार जिन विकास परियोजनाओं, एक्सप्रेसवे, मेडिकल कॉलेज, धार्मिक पर्यटन, निवेश, कानून-व्यवस्था और बुनियादी ढाँचे के कार्यों को आगे बढ़ा रही है और संगठन उन्हें लोगों तक पहुँचाने का काम कर रहा है। भाजपा यह मानकर चल रही है कि यदि सरकार के काम का संदेश सीधे मतदाता तक पहुँचेगा तो उसका राजनीतिक लाभ भी मिलेगा। इसलिए कार्यकर्ताओं को केवल राजनीतिक गतिविधियों तक सीमित नहीं रखा जा रहा बल्कि उन्हें लाभार्थियों से संपर्क और जनसंवाद की जिम्मेदारी भी दी जा रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि BJP अपने करीब 2.5 करोड़ प्राथमिक सदस्यों का एक डेटाबेस तैयार कर रही है और इसका मकसद हर एक वोटर तक पहुँचना है। इसके लिए प्रदेश पदाधिकारियों को जिलों में, जिला पदाधिकारियों को मंडलों में और मंडल स्तर के पदाधिकारियों को बूथों का दौरा कर सत्यापन रिपोर्ट प्रदेश कार्यालय भेजने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही वृक्षारोपण अभियान, डिजिटल प्रशिक्षण और कारगिल विजय दिवस जैसे आयोजनों के जरिए भी कार्यकर्ताओं को लगातार सक्रिय बनाए रखने की कोशिश हो रही है।

विदेश घूम रहे विपक्षी, नहीं मिल रहे मुद्दे

इन सबके बीच बड़ा सवाल विपक्ष की भूमिका को लेकर भी खड़ा होता है। क्योंकि चुनाव के बाद वोट चोरी से लेकर EVM हैकिंग जैसे आरोप राजनीतिक दल लगाते हैं तो आज वो दल क्या कर रहे हैं। एक तरफ भाजपा बूथ से लेकर मंडल और जिले तक पूरे संगठन को मैदान में उतार चुकी है तो वहीं दूसरी तरफ विपक्ष अभी तक प्रदेश में ठोस राजनीतिक एजेंडा ही तलाशता नजर आ रहा है।

समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव और कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी दोनों हाल ही में विदेश यात्राओं से छुट्टी मनाकर लौटे हैं और अब उनके पास कोई ऐसा मुद्दा नहीं नजर आ रहा है जिसके दम पर योगी सरकार को लगातार घेरा जा सके।

एक असलियत यह भी है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस समय विपक्ष के लिए सरकार को घेरना पहले जितना आसान नहीं दिख रहा। कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर भाजपा लगातार अपनी सख्त छवि पेश कर रही है। एक्सप्रेसवे, मेडिकल कॉलेज, निवेश, औद्योगिक परियोजनाएंँ धार्मिक पर्यटन और बुनियादी ढाँचे के विकास को सरकार अपनी उपलब्धियों के तौर पर सामने रख रही है।

भाजपा का संगठन इन्हीं उपलब्धियों को घर-घर तक पहुँचाने में लगा है। ऐसे में विपक्ष के पास फिलहाल ऐसा कोई बड़ा नैरेटिव नजर नहीं आता, जो इन दावों का प्रभावी राजनीतिक जवाब बन सके। केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस, सोशल मीडिया पोस्ट या सरकार विरोधी बयान चुनावी जमीन तैयार नहीं करते बल्कि उसके लिए बूथ स्तर तक सक्रिय संगठन और जनता के बीच लगातार मौजूदगी भी चाहिए। राजनीति में मैदान कभी खाली नहीं रहता… जो जमीन पर उतरता है, अक्सर बढ़त भी वही बना लेता है।