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इंडियन नेवी को तीसरे एयरक्राफ्ट करियर की जरूरत, ‘सी डिनायल’ से ‘सी कंट्रोल’ में पिछड़ रहे हैं हम: जानें- क्या है समंदर में बादशाहत का ‘रूल ऑफ थ्री’ नियम

रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट के शुरू होते ही इस इलाके में चौबीसों घंटे परमानेंट नौसैनिक तैनाती की मजबूरी बढ़ जाएगी, जिसे केवल एक चलता-फिरता एयरक्राफ्ट करियर बैटल ग्रुप ही पूरा कर सकता है।

समंदर की रणनीति में एक शब्द बहुत मायने रखता है-‘सी कंट्रोल’ यानी समुद्र पर नियंत्रण। इसका सीधा सा मतलब है कि आप किसी समुद्री इलाके का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए इस तरह करें कि आपका दुश्मन वहाँ कदम रखने से भी डरे। इसके उलट एक दूसरा शब्द होता है- ‘सी डिनायल‘ यानी समुद्र में रास्ता रोकना, जो कि एक छोटा और रक्षात्मक तरीका है। इसमें आप सिर्फ दुश्मन के लिए उस इलाके को खतरनाक बना देते हैं। लेकिन अगर आपको सच में दबदबा बनाना है, तो आपको ‘सी कंट्रोल‘ चाहिए। इसके लिए आपको समंदर में लगातार मौजूदगी, मजबूत हवाई ताकत और दुश्मन को उसकी हरकतों का तुरंत जवाब देने की क्षमता की जरूरत होती है। सिर्फ खोखली धमकियों से काम नहीं चलता।

आजादी के बाद लंबे समय तक भारत हिंद महासागर को अपना एक सुरक्षित इलाका मानता रहा। इसके पीछे वजह भी थी कि इस महासागर का नाम भारत के नाम पर था, यहाँ के व्यापारिक रास्ते भारत के व्यापार को बढ़ाते थे और जब भी सुरक्षा की बात आती थी, तो छोटे द्वीप देश नई दिल्ली की तरफ देखते थे। यह सोच पूरी तरह गलत नहीं थी, लेकिन यह ताकत से ज्यादा हमारे भूगोल और उस वक्त किसी बड़े दुश्मन की गैर-मौजूदगी पर टिकी थी। अब वह शांत और आरामदायक दौर खत्म हो चुका है।

भारत के लिए 2030 से आगे की चुनौती, चीन और पाकिस्तान का घातक गठजोड़

हिंद महासागर में सुरक्षा के समीकरणों को सबसे ज्यादा चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (PLAN) ने बदला है। चीन आज तीन एयरक्राफ्ट करियर चला रहा है और 2035 तक उसकी योजना नौ एयरक्राफ्ट करियर तैनात करने की है। अपनी ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ (मोतियों की माला) रणनीति के तहत चीन ने जिबूती में अपना पहला विदेशी सैन्य अड्डा बनाने से लेकर श्रीलंका के हंबनटोटा और पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट तक अपनी पहुँच पक्की कर ली है। चीनी जासूसी जहाज, रिसर्च वेसल और पनडुब्बियाँ अब हिंद महासागर में इस कदर मँडरा रही हैं, जिसकी कल्पना एक दशक पहले नहीं की जा सकती थी।

साल 2030 तक चीन और पाकिस्तान की जुगलबंदी भारत के लिए एक बहुत बड़ी मुसीबत बनने वाली है। पाकिस्तान का ग्वादर पोर्ट चीन के लिए हिंद महासागर का एक पिछला दरवाजा बन चुका है। अगर कल को कोई टकराव होता है, तो भारत को एक साथ दो मोर्चों (टू-फ्रंट वॉर) पर लड़ना होगा। एक तरफ अरब सागर में पाकिस्तान और चीनी नौसेना का गठजोड़ होगा, तो दूसरी तरफ बंगाल की खाड़ी में चीन की सीधी चुनौती होगी। इस दोहरे संकट से निपटने के लिए भारत को अपनी समुद्री ताकत को दोगुना करना होगा, और इसके लिए तीसरा एयरक्राफ्ट करियर होना कोई लग्जरी नहीं, बल्कि बेहद जरूरी जरूरत है।

भारत ने इसके जवाब में पनडुब्बियों, युद्धपोतों और लंबी दूरी के पी-8आई समुद्री गश्ती विमानों में निवेश किया है। ‘क्वाड’ (QUAD) के जरिए अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ खुफिया जानकारी साझा करने के तंत्र को भी मजबूत किया गया है। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसी रीढ़ की कमी खल रही है जो इस मौजूदगी को असली ताकत में बदल सके और वह रीढ़ है एक तीसरा एयरक्राफ्ट करियर।

Rule of Three: क्यों दो एयरक्राफ्ट करियर काफी नहीं

दुनिया भर की नौसेनाओं की रणनीति में ‘रूल ऑफ थ्री’ (तीन का नियम) चलता है। इसका सीधा गणित यह है कि अगर आपके पास तीन एयरक्राफ्ट करियर होंगे, तब जाकर आप हर वक्त एक करियर को अरब सागर में और दूसरे को बंगाल की खाड़ी में तैनात रख पाएँगे। समंदर में जंग के जहाज हर समय तैयार नहीं रह सकते, उन्हें समय-समय पर मरम्मत, मेंटेनेंस और अपग्रेड की जरूरत होती है। जब एक जहाज यार्ड में मरम्मत के लिए जाता है, तो उसकी जगह लेने के लिए दूसरा जहाज तैयार होना चाहिए।

वर्तमान में भारत के पास दो एयरक्राफ्ट करियर हैं पहला आईएनएस विक्रमादित्य और दूसरा आईएनएस विक्रांत। इसका मतलब यह है कि किसी भी आम दिन पर भारत की प्रभावी ताकत डेढ़ करियर की ही होती है। अगर इनमें से एक भी मेंटेनेंस के लिए गया, तो पूरा एक समुद्री मोर्चा खाली हो जाएगा।

चिंता की बात यह भी है कि आईएनएस विक्रमादित्य का ढाँचा 1982 का है। भले ही इसका आधुनिकीकरण किया गया है, लेकिन 2035 के आसपास इसका एक बड़ा स्ट्रक्चरल ऑडिट होना है। इसके बाद यह 2052 तक सेवा दे पाएगा या 2037 में ही रिटायर हो जाएगा, इस पर सस्पेंस है। दूसरी ओर कोचीन शिपयार्ड द्वारा करीब 20,000 करोड़ रुपए की लागत से स्वदेशी रूप से बनाया गया आईएनएस विक्रांत ही हमारे भविष्य का इकलौता पक्का हिस्सा है।

ऐसे में सिर्फ एक भरोसेमंद करियर के दम पर भारत का हिंद महासागर का राजा बने रहने का दावा बहुत कमजोर नजर आता है। नए एयरक्राफ्ट करियर को बनने में कम से कम 10 से 12 साल का समय लगता है। इसलिए तीसरे करियर को लेकर जो फैसला हमें आज ले लेना चाहिए था, उसमें पहले ही देरी हो चुकी है।

निकोबार प्रोजेक्ट के बाद नेवी की परमानेंट तैनाती की मजबूरी

भारत सरकार इस समय अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में खासकर ग्रेट निकोबार में एक बहुत बड़ा रणनीतिक प्रोजेक्ट शुरू कर रही है। यहाँ एक इंटरनेशनल ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, मिलिट्री एयरपोर्ट और नौसैनिक अड्डा विकसित किया जा रहा है। जैसे ही यह निकोबार प्रोजेक्ट पूरी तरह ऑन होगा, वैसे ही इस पूरे इलाके में भारत को चौबीसों घंटे परमानेंट नौसैनिक तैनाती की जरूरत पड़ेगी।

निकोबार द्वीप समूह की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यह दुश्मन के गले की हड्डी बन सकता है। लेकिन केवल जमीन पर बेस बना देने से बात नहीं बनेगी। समंदर में घूमता हुआ एक एयरक्राफ्ट करियर जो हवाई ताकत और सुरक्षा का घेरा दे सकता है, उसकी बराबरी कोई जमीनी बेस नहीं कर सकता। निकोबार प्रोजेक्ट की सुरक्षा और वहाँ से पूरे इलाके पर नजर रखने के लिए एक डेडिकेटेड एयरक्राफ्ट करियर बैटल ग्रुप की मौजूदगी अनिवार्य हो जाएगी। यह भारत के ‘सी डिनायल’ के नजरिए को ‘सी कंट्रोल’ में बदल देगा।

मलक्का स्ट्रेट की चाबी यानी चीन की दुखती रग पर हाथ

दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक रास्ता मलक्का जलडमरूमध्य (Malacca Strait) है। चीन का लगभग 80 प्रतिशत तेल आयात इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है। इसे चीन की ‘मलक्का दुविधा’ (Malacca Dilemma) कहा जाता है, क्योंकि चीन को हमेशा यह डर सताता है कि किसी युद्ध की स्थिति में भारत या उसके सहयोगी इस रास्ते को बंद कर सकते हैं।

अगर भारत के पास तीसरा एयरक्राफ्ट करियर होता है, तो भारत मलक्का स्ट्रेट के ठीक मुहाने पर अपनी ऐसी ताकत तैनात कर सकता है जिसे हिलाना चीन के लिए नामुमकिन होगा। एक एयरक्राफ्ट करियर बैटल ग्रुप केवल एक लड़ाकू जहाज नहीं होता, बल्कि यह अपने साथ दर्जनों लड़ाकू विमान, पनडुब्बी-रोधी हेलीकॉप्टर और मिसाइल क्रूजर लेकर चलता है। मलक्का स्ट्रेट से निकलने वाले हर चीनी जहाज और पनडुब्बी पर भारत का पूरा कंट्रोल होगा। यह चीन के खिलाफ भारत का सबसे बड़ा तुरुप का पत्ता होगा, जिससे चीन कभी भी भारत पर सीधा हमला करने की हिम्मत नहीं कर पाएगा।

लाल सागर संकट के बाद भारत को महसूस हुई कमी

बता दें कि कुछ समय पहले हुए लाल सागर (Red Sea) संकट ने भारत को एक बहुत बड़ा सबक दिया है। जब 2023-24 में हूथी विद्रोहियों ने कमर्शियल जहाजों पर ड्रोन और मिसाइलों से हमले शुरू किए, तो पूरे वैश्विक व्यापार में हड़कंप मच गया। जहाजों को अफ्रीका के ‘केप ऑफ गुड होप’ से घूमकर जाना पड़ा, जिससे समय और ईंधन का खर्च बेहद बढ़ गया। भारतीय निर्यातकों और आयातकों को इसका भारी नुकसान उठाना पड़ा।

भारत का 90 प्रतिशत से अधिक व्यापार समंदर के रास्ते होता है और हम अपनी जरूरत का 83 से 88 प्रतिशत कच्चा तेल इन्हीं समुद्री रास्तों से मँगाते हैं। हॉरमुज की खाड़ी, अदन की खाड़ी और लाल सागर जैसे चोकपॉइंट्स भारत की आर्थिक सुरक्षा की जीवनरेखा हैं। जब लाल सागर में यह संकट आया, तो अमेरिका ने तुरंत अपने एयरक्राफ्ट करियर स्ट्राइक ग्रुप्स वहाँ तैनात कर दिए और व्यापारिक रास्तों को काफी हद तक सुरक्षित रखा।

भारत अपनी नौसैनिक क्षमता के बावजूद वहाँ कोई एयरक्राफ्ट करियर तैनात नहीं कर सका क्योंकि हमारे पास अतिरिक्त जहाज ही नहीं था। हमें अमेरिकी एयरक्राफ्ट करियर की छत्रछाया में रहना पड़ा। भारत जैसे महात्वाकांक्षी देश के लिए जो खुद को इस पूरे क्षेत्र का ‘नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर’ (सुरक्षा प्रदाता) कहता है, सुरक्षा के लिए दूसरों पर निर्भर रहना सही नहीं है।

पनडुब्बी Vs एयरक्राफ्ट करियर, क्या है इस बहस की हकीकत

कई रक्षा विशेषज्ञ यह तर्क देते हैं कि एयरक्राफ्ट करियर बहुत महंगे होते हैं और आज के जमाने में मिसाइलों और ड्रोनों के दौर में ये आसानी से निशाना बन सकते हैं। उनका कहना होता है कि भारत को करियर के बजाय पनडुब्बियों पर ज्यादा पैसा खर्च करना चाहिए। यह तर्क सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन व्यावहारिक रूप से अधूरा है।

पनडुब्बी और एयरक्राफ्ट करियर दो अलग-अलग काम करते हैं। पनडुब्बी का काम है छिपकर हमला करना और दुश्मन का रास्ता रोकना (सी डिनायल)। वह समंदर में भारत के दोस्तों को भरोसा नहीं दिला सकती और न ही खुलेआम अपनी ताकत का प्रदर्शन कर सकती है। इसके विपरीत, एक एयरक्राफ्ट करियर समंदर में भारत की जीती-जागती ताकत का प्रतीक होता है। यह सिर्फ एक हथियार नहीं, बल्कि कूटनीति का एक बहुत बड़ा जरिया है।

जब भारत का एक एयरक्राफ्ट करियर बैटल ग्रुप बंगाल की खाड़ी में सिंगापुर, जापान या ऑस्ट्रेलिया के जहाजों के साथ युद्धाभ्यास करता है, तो श्रीलंका, मालदीव, बांग्लादेश और मॉरीशस जैसे पड़ोसी देशों को एक साफ संदेश जाता है कि भारत उनकी सुरक्षा के लिए एक विश्वसनीय और सक्षम साथी है। चीन अपनी तीन एयरक्राफ्ट करियर्स के दम पर इन्हीं छोटे देशों को डराने और लुभाने की कोशिश कर रहा है। यह लड़ाई सिर्फ मिलिट्री की नहीं, बल्कि इस धारणा की भी है कि इस इलाके का असली चौधरी कौन है।

इसके अलावा एयरक्राफ्ट करियर केवल युद्ध के लिए नहीं होते। हिंद महासागर में जब भी कोई प्राकृतिक आपदा आती है, तो यह जहाज एक तैरते हुए अस्पताल और कमांड सेंटर के रूप में तब्दील हो सकता है। यह जितनी जल्दी मेडिकल टीमें, हेलीकॉप्टर और राहत सामग्री पहुँचा सकता है, उतनी तेजी से कोई और प्लेटफॉर्म काम नहीं कर सकता।

तीसरे एयरक्राफ्ट करियर से कोचीन शिपयार्ड की स्वदेशी ताकत को बचाना जरूरी

तीसरे एयरक्राफ्ट करियर की मांग के पीछे सिर्फ रणनीतिक ही नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ा आर्थिक और औद्योगिक कारण भी है। आईएनएस विक्रांत को बनाकर कोचीन शिपयार्ड ने भारत को दुनिया के उन चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा कर दिया है जो खुद का एयरक्राफ्ट करियर बना सकते हैं। इस लिस्ट में हमारे अलावा केवल अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, फ्रांस, इटली और चीन ही शामिल हैं।

लेकिन यह इंजीनियरिंग का हुनर, सप्लायर्स का नेटवर्क और कुशल कारीगरों की टीम अपने आप बची नहीं रहती। अगर कोचीन शिपयार्ड को तुरंत अगले एयरक्राफ्ट करियर का ऑर्डर नहीं मिला, तो यह पूरी चेन टूट जाएगी। जो काबिलियत हमने सालों की मेहनत और अरबों रुपए खर्च करके हासिल की है, वह खत्म हो जाएगी और भविष्य में जब हमें नया जहाज बनाना होगा, तो हमें फिर से शून्य से शुरुआत करनी पड़ेगी। इसलिए तीसरा करियर देश की आत्मनिर्भरता और रक्षा उद्योगों को जिंदा रखने के लिए एक जरूरी निवेश है।

अभी एयरक्राफ्ट करियर के मामले में कहाँ है देश?

भारतीय नौसेना के स्वर्णिम इतिहास से लेकर वर्तमान ताकत की रीढ़ बने चारों विमानवाहक पोतों (एयरक्राफ्ट करियर) की खासियतें, मारक क्षमता और उनकी खास बातें भी जानना अहम है।

आईएनएस विक्रमादित्य (INS Vikramaditya): वर्तमान में भारतीय नौसेना की सबसे बड़ी ताकत आईएनएस विक्रमादित्य है। मूल रूप से रूसी नौसेना के ‘एडमिरल गोर्शकोव’ को भारत ने बड़े स्तर पर मॉडिफाई करके नवंबर 2013 में बेड़े में शामिल किया था। लगभग 44,500 टन वजनी यह तैरता हुआ किला करीब 284 मीटर लंबा है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसका ‘शॉर्ट टेक-ऑफ बट अरेस्टेड रिकवरी’ (STOBAR) सिस्टम और स्की-जंप डेक है, जो लड़ाकू विमानों को कम दूरी में उड़ान भरने में मदद करता है।

यह विशाल पोत अपने साथ घातक मिग-29के (MiG-29K) लड़ाकू विमान, कामोव (Kamov) एंटी-सबमरीन हेलीकॉप्टर और चेतक हेलीकॉप्टर्स सहित करीब 30 से अधिक एयरक्राफ्ट ले जाने में सक्षम है। आधुनिक रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट और एंटी-मिसाइल डिफेंस सिस्टम से लैस विक्रमादित्य अरब सागर में भारत की सुरक्षा का सबसे मजबूत कवच है।

आईएनएस विक्रांत (INS Vikrant) यानी स्वदेशी आत्मनिर्भरता का गौरव: आईएनएस विक्रांत भारत के रक्षा इतिहास का सबसे गौरवशाली मील का पत्थर है। यह भारत में डिजाइन और निर्मित होने वाला पहला स्वदेशी एयरक्राफ्ट करियर (IAC-1) है, जिसे कोचीन शिपयार्ड ने बनाया और सितंबर 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को समर्पित किया। लगभग 45,000 टन विस्थापन क्षमता वाला यह अत्याधुनिक युद्धपोत करीब 262 मीटर लंबा है।

विक्रांत की ताकत इसकी स्वदेशी तकनीक है, जिसमें परिष्कृत ऑटोमेशन और एडवांस नेटवर्क सिस्टम शामिल हैं। यह युद्धपोत मिग-29के लड़ाकू विमानों के साथ-साथ अमेरिका से लिए गए खतरनाक एमएच-60आर (MH-60R) रोमियो हेलीकॉप्टर्स और स्वदेशी एएलएच (ALH) हेलीकॉप्टर्स को तैनात करता है। इसमें 2,200 से अधिक कंपार्टमेंट हैं, और इसकी टॉप स्पीड 28 नॉट (लगभग 52 किमी/घंटा) है। विक्रांत बंगाल की खाड़ी में भारत के ‘सी कंट्रोल’ का मुख्य जरिया है।

पहला आईएनएस विक्रांत (INS Vikrant – R11) यानी 1971 की जंग का महानायक: अतीत के पन्नों को पलटें तो भारत का पहला विमानवाहक पोत ‘आईएनएस विक्रांत (R11)’ देश की संप्रभुता का प्रतीक था। ब्रिटिश नौसेना के पूर्व ‘एचएमएस हरक्यूलिस’ को भारत ने 1957 में खरीदा और 1961 में इसे कमिशन किया गया। लगभग 21,000 टन वजनी इस छोटे लेकिन बेहद आक्रामक करियर की खासियत इसका स्टीम कैटापुल्ट सिस्टम था, जिससे विमानों को लॉन्च किया जाता था।

INS विक्रांत की असली ताकत और वीरता 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में देखने को मिली। विक्रांत पर तैनात सी-हॉक (Sea Hawk) लड़ाकू विमानों और एलिट (Alize) पनडुब्बी-रोधी विमानों ने तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) की समुद्री नाकेबंदी कर दी थी। विक्रांत के विमानों ने चिटगाँव और कॉक्स बाजार के बंदरगाहों पर बमबारी करके पाकिस्तानी फौज की कमर तोड़ दी थी, जिसने अंततः भारत को एक ऐतिहासिक जीत दिलाई। ये काफी समय पहले ही रिटायर्ड होकर तोड़ा जा चुका है। एक मशहूर 2 व्हीलर कंपनी ने इसके स्क्रैप को मिलाकर बाइक सीरीज ही लॉन्च कर दी थी, जो काफी लोकप्रिय भी हुआ है।

आईएनएस विराट (R22) यानी ग्रैंड ओल्ड लेडी ऑफ द सी: भारत का दूसरा ऐतिहासिक विमानवाहक पोत आईएनएस विराट था, जिसे नौसेना में बेहद सम्मान के साथ ‘ग्रैंड ओल्ड लेडी’ कहा जाता था। ब्रिटिश नौसेना के ‘एचएमएस हर्म्स’ को भारत ने 1987 में अपनी सेवा में शामिल किया था। लगभग 28,700 टन वजनी यह करियर अपनी वर्टिकल टेक-ऑफ क्षमता के लिए मशहूर था। इसकी सबसे बड़ी यूएसपी इस पर तैनात होने वाले ‘सी हैरियर’ (Sea Harrier) जंप-जेट लड़ाकू विमान थे, जो सीधे ऊपर की ओर उड़ान भर सकते थे और हवा में एक जगह रुक सकते थे।

INS विराट ने 1989 में श्रीलंका में ‘ऑपरेशन पवन’ और 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान ‘ऑपरेशन तलवार’ में महत्वपूर्ण रणनीतिक भूमिका निभाई थी। 30 साल तक भारतीय नौसेना और उससे पहले ब्रिटिश नौसेना में सेवा देने के बाद, यह दुनिया में सबसे लंबे समय तक काम करने वाला युद्धपोत बना और 2017 में इसे ससम्मान विदाई दी गई।

शान के लिए नहीं बल्कि सुरक्षा के लिए जरूरी है तीसरा एयरक्राफ्ट करियर?

बहरहाल आने वाले कुछ साल इस बात का फैसला करेंगे कि हिंद महासागर एक ऐसा इलाका रहेगा जहाँ भारत अपनी शर्तें तय करेगा, या फिर एक ऐसा समंदर बन जाएगा जहाँ भारत को दूसरों की शर्तों पर समझौता करना पड़ेगा।

साल 2030 तक चीन और पाकिस्तान की नौसैनिक जुगलबंदी भारत के लिए जो चक्रव्यूह रचने जा रही है, उसे भेदने का एकमात्र रास्ता हमारी नौसैनिक हवाई ताकत को बढ़ाना है। निकोबार प्रोजेक्ट की सफलता और मलक्का स्ट्रेट पर हमारी मजबूत पकड़ इस बात पर निर्भर करेगी कि हमारे पास समंदर में तैरते हुए कितने एयरफील्ड हैं।

तीसरे एयरक्राफ्ट करियर की माँग किसी शान-ओ-शौकत के लिए नहीं है। यह भारत की आर्थिक सुरक्षा, हमारे व्यापारिक रास्तों की रक्षा और समंदर में हमारी साख को बनाए रखने की एक अनिवार्य जरूरत है। हिंद महासागर में साख और सम्मान उसी का होता है जिसके पास 65,000 टन का मुड़ता हुआ रनवे और उस पर तैनात लड़ाकू विमानों की गर्जना होती है। भारत को यह फैसला अब बिना किसी देरी के एक मिशन मोड में लेना ही होगा।

वैसे, हम जिस तीसरे एयरक्राफ्ट करियर की बात कर रहे हैं, उसका नाम है INS विशाल, जो अभी तक नौकरशाही के चक्कर में कम से कम डेढ़ दशक से लटका हुआ है। उम्मीद है कि भारत सरकार इस दिशा में जल्द से जल्द फैसला लेकर इंडियन नेवी को ‘रूल ऑफ थ्री’ के तहत ‘सी डिनायल’ से ‘सी कंट्रोल’ की स्थिति में लाएगी।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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