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न POK की फिक्र, न बलूचिस्तान की चिंता! दिन-रात बस भारत में ‘सत्तापलट’ के सपने देख रहा पाकिस्तान, जानिए CJP प्रदर्शन में कैसे दी जा रही पल-पल की अपडेट

चाहे पाकिस्तान के पास खाने के लिए रोटी हो या न हो, पीने के लिए पानी हो या न हो या बेशक साँस लेने के लिए ऑक्सीजन ही न हो… पर ‘आतंकी मुल्क’ कभी भारत के मामलों में दखल देने से बाज नहीं आता। खुद चारों ओर से दुश्मनों से घिरा हुआ है, लेकिन पाकिस्तान को बात भारत की आंतरिक राजनीति पर करनी है। मुल्क की मीडिया की तर्जी भी भारत ही है, वह अपने देश के मुद्दों पर बोलने से ज्यादा भारत की नकारात्मक छवि बनाने में तुली रहती है। हाल फिलहाल में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) प्रदर्शन के कवरेज में भी यही हुआ।

जंतर-मंतर पर चल रहे CJP के प्रदर्शन की कवरेज पाकिस्तान की मीडिया जितनी कर रही है, शायद उतनी भारत की मीडिया भी न कर पा रही हो। क्योंकि प्रदर्शन में देखा गया कि ‘कॉकरोचों’ ने अपनी मीडिया के साथ क्या बदसलूकी की। पर उसी समय पाकिस्तान की मीडिया में जब इस प्रदर्शन की वाहवाही हो रही है, भारत का नाम बदनाम किया जा रहा है, अपने मंसूबे पूरे करने के लिए मोदी को सत्ता से गिराने की साजिशें रची जा रही हैं… तब भारत की मीडिया को ‘गोदी मीडिया’ बोलने वाले इन ‘कॉकरोचों’ को शायद फर्क नहीं पड़ रहा।

गौरतलब है कि पिछले एक महीने से जंतर-मंतर पर CJP के नेतृत्व छात्र देश में NEET पेपर लीक और शिक्षा से जुड़े अन्य मुद्दों को लेकर बैठे हैं, शुरुआत में उनकी प्रमुख माँग शिक्षा मंत्री धर्मेंद प्रधान का इस्तीफा थी, जो अब बढ़कर पीएम मोदी के इस्तीफे तक पहुँच गई है। इसे बड़े स्तर पर ले जाने के लिए 20 जुलाई को CJP ने संसद मार्च का आह्वान किया था, इस मार्च से ठीक पहले प्रदर्शन में वामपंथी, आंदोलनजीवी, विपक्षी दल, हिंदू-विरोधी, दलिते-हितैषी, इस्लामी कट्टरपंथी जैसे सारे चेहरे देखने को मिले थे.. इन सबमें कॉमन यह था कि ये लोग मोदी सरकार के खिलाफ थे और नतीजा यह हुआ कि संसद मार्च के दौरान इनके समर्थकों ने सीजेपी के प्रदर्शन में हिंसा फैलाई।

पुलिसकर्मियों के साथ मारपीट की गई, पत्थर फेंके गए, लाठियाँ चलाई गईं, गालियाँ बकी गईं… जिसने शायद एक ‘असल छात्र’ को निराश किया और उसका इस प्रदर्शन से विश्वास हटा दिया। और अब यही अराजक तत्व पिछले तीन दिनों से सेंट्रल दिल्ली में रोजाना हिंसा फैला रहे हैं। बुधवार (22 जुलाई 2026) देर रात को ही इन हिंसक प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षाबलों को सड़कों पर घसीटा और भीड़ में हिंसा की। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि सरकार पहले ही CJP के नेतृत्व से बातचीत कर माँगों को पूरा करने का आश्वासन दे चुकी है और अब पीएम मोदी ने भी युवाओं से फास्ट-ट्रैक बनाने का वादा किया है। बावजूद, जंतर-मंतर से भीड़ हटने का नाम नहीं ले रही।

पाकिस्तानी के प्रमुख मीडिया संस्थान CJP प्रदर्शन की रख रहे पल-पल की अपडेट

पाकिस्तान के प्रमुख मीडिया संस्थानों में जंतर-मंतर पर चल रहे CJP के प्रदर्शन की पल-पल की अपडेट रख रही है। मीडिया चैनलों पर लंबी-लंबी डिबेट हो रही हैं, भारत की इकोनॉमी पर बात की जा रही है… विश्लेषकों को बिठाकर प्रदर्शन के मुद्दे पर भारत की मोदी सरकार को नीचा दिखाने की कोशिश की जा रही है।

तीखी और आक्रामक हेडलाइन के साथ प्रदर्शन की कवरेज की जा रही है। हैरानी की बात यह है कि कवरेज भी केवल एकतरफा नैरेटिव के साथ की जा रही है, जो आज देश में हर वामपंथी द्वारा गड़ा जा रहा है। केवल पुलिस का प्रदर्शनकारियों पर बर्बरता, प्रदर्शन में शामिल भारी जनसंख्या, मोदी-विरोधी पोस्टर दिखाए जा रहे हैं।

नीचे इस फोटो कोलाज में DAWN की CJP प्रदर्शन की कवरेज के स्क्रीनशॉट हैं। DAWN की कवरेज में भी वही एकतरफा नैरेटिव दिखाई दे रहा है। थंबनेल, हेडलाइन और फीचर फोटो का कमाल दिखाकर पाठक को पहली नजर में ही भारत के खिलाफ करने की कोशिश की गई है।

(फोटो साभार: Dawn)

DAWN की कुछ प्रमुख खबरों की हेडलाइंस:

  • ‘कॉकरोच’ आंदोलन के विरोध-प्रदर्शनों के बाद बढ़ते दबाव के बीच, भारत के शिक्षा मंत्री ने सुधार और बहस का किया वादा (Under soaring pressure after ‘cockraoch’ movement protests, India’s education minister promises reforms, debate)
  • ‘कॉकरोच’ आंदोलन से बढ़े दबाव के बीच शिक्षा मंत्री ने सुधार और व्यापक चर्चा का किया वादा (India protest give opposition a rare opening against Modi)
  • “दिल्ली में संसद घेराव, प्रदर्शनकारियों ने की मोदी के इस्तीफे की माँग” (Parliament siege in delhi, Protestors Demand Modi’s Resignation)
  • “क्या यह भारत की GenZ क्रांति है?” (Is this India’s GenZ revolution?)
  • “मोदी सरकार पर बढ़ते दबाव के बीच भारत में युवा आंदोलन ने पकड़ी रफ्तार” (India’s Youth Movement Intensifies As Pressure Mounts on Modi Government)
  • “खाने, आक्रोश और दूर बैठे समर्थकों के सहारे जिंदा है भारत का आंदोलन” (Food, fury and supporters and far keep India protest alive)

नीचे दिखाया गया है फोटो कोलाज भी पाकिस्तान के ही प्रमुख मीडिया संस्थान Geo News की खबरों के स्क्रीनशॉट से बनाया गया है। इनके थंबनेल, कवर फोटो और हेडलाइंस को देखें, तो ‘झुकी हुई मोदी सरकार’, ‘पुलिस का प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज’, ‘राहुल गाँधी का संघर्ष’, ‘प्रदर्शन में शामिल हुए वामपंथी’ ही दिखाई देंगे, जिससे दर्शक देखते ही यह निष्कर्ष निकालेगा कि भारत की ‘मोदी सरकार कितनी अत्याचारी’ है।

(साभार: Geo News)

Geo News की कुछ प्रमुख खबरों की हेडलाइंस

  • “भारतीय सुरक्षाबलों ने प्रदर्शनकारियों पर किया लाठीचार्ज” (Indian Security Forces Lathicharge Protestors)
  • “पूरे भारत में फैला छात्रों का विरोध-प्रदर्शन, नई दिल्ली धरना जारी” (Student Protests Spread Across India, Sit-in Continue in New Delhi)
  • “जंतर-मंतर पर CJP का विरोध प्रदर्शन: मोदी सरकार पर बढ़ता तनाव” (CJP Protest at Jantar Mantar: Modi Government Faces Growing Pressure)
  • “पुलिस कार्रवाई से बढ़ा गुस्सा, छात्र आंदोलन फैला; प्रदर्शनकारी पीएम मोदी के आवास तक पहुँचे” (Crackdown Ignites Anger: Student Protest Spread, Demonstrators Reach PM Modi’s Residence)
  • “खाने, आक्रोश और दूर बैठे समर्थकों के सहारे जिंदा है भारत का आंदोलन” (Food, fury and supporters and far keep India protest alive)
(साभार: ARY News)

ARY News की कुछ प्रमुख खबरों की हेडलाइंस:

  • “बढ़ते तनाव के बीच मोदी सरकार पर दबाव” (Modi Govenment Under Pressure Amid Rising Tensions)
  • “भारत में मोदी सरकार के खिलाफ प्रदर्शन जारी” (Protest against Modi government continues in India)
  • “भारत में युवाओं के नेतृत्व वाला आंदोलन तेज, मोदी पर बढ़ा दबाव” (India’s Youth-Led Protests intensify, Pressure Mounts on Modi)
  • “भारत में युवाओं के नेतृत्व वाला ‘कॉकरोच’ आंदोलन पुलिस की सख्ती के बावजूद जारी” (India’s Youth-Led Cockroach Movement Defies Police Crackdown)
  • “भारत का युवा आंदोलन पकड़ रहा रफ्तार, राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी” (Indian Youth Movement Gains Momentum, Political Unrest Intensifies)

सिर्फ यही कुछ प्रमुख संस्थान नहीं, बल्कि पाकिस्तान की स्थानीय मीडिया और यूट्यूब चैनल भी भारत के CJP प्रदर्शन पर नजरें गढ़ाए बैठे हैं। ये मीडिया बड़ी-बड़ी डिबेट कर घंटों-घंटों तक CJP प्रदर्शन पर बात कर रही है। पैनलिस्ट में भी कोई आम आदमी नहीं बैठा है, बल्कि देश के पूर्व राजनयिक से लेकर बड़े-बड़े प्रोफेसर तक भारत के खिलाफ बोलने के लिए अपना समय दे रहे हैं।

(साभार: Youtube)

पाकिस्तानी मीडिया में CJP प्रदर्शन की कवरेज के मायने

पाकिस्तान के प्रमुख मीडिया संस्थानों ने भारत में चल रहे CJP प्रदर्शन की कवरेज को प्राइम टाइम में जगह दी है। इससे साफ है कि उनके लिए पाकिस्तान की मीडिया भारत की आंतिरक राजनीति में खूब दखल देती है। इन कवरेज में यह नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की गई है कि ‘कॉकरोचों’ के आंदोलन के दबाव में भारत की मोदी सरकार झुकने को तैयार हो गई है, जबकि ऐसा नहीं हुआ है। सरकार ने ‘असल छात्रों’ की माँगों को ध्यान में रखते हुए कार्रवाई का आश्वासन दिया है। और यह वही नैरेटिव है जो 20 जुलाई को भी गढ़ा गया था, जब CJP के सौरव दास और आशुतोष रांका केंद्रीय मंत्री जेपी नेड्डा से मिलने पहुँचे थे।

मीडिया ने हेडलाइन का खेल करते हुए ही मोदी सरकार को इस छात्र आंदोलन का विलेन करार दिया है, जबकि सरकार ने हमेशा समाधान की बात की है। NEET पेपर लीक के बाद तुरंत RE-NEET की घोषणा कराई गई, और अब इस परीक्षा के रिजल्ट में साफ झलक रहा है कि असल छात्र दोबारा बिना गड़बड़ी के हुई NEET परीक्षा से खुश हैं, जबकि वामपंथी और विपक्षी दलों के विचारधारा से भड़के हुए छात्र के चेहरे में छिपे अराजक तत्व अब भी जंतर-मंतर पर ‘हिंसा के लिए उतारू’ हैं।

यह भी साफ हो गया है कि भारत में छोटे-से उथल-पुथल से पाकिस्तान कितना खुश हो रहा है। डिबेटों में भारक की इकोनॉमी पर चिंता जताई जा रही है, शिक्षा व्यवस्था पर बहसें हो रही हैं, पुलिस की प्रदर्शनकारियों पर बर्बरता पर संवेदनाएँ जताई जा रही हैं, भारत में बेरोजगारी की बातें हो रही हैं, और तो और यह बात तक हो रही है कि पीएम मोदी इसीलिए धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री के पद से नहीं हटा रहे हैं, क्योंकि ऐसा करने पर वे चुनाव हार जाएँगे।

निष्कर्ष: ‘कंगाल’ पाकिस्तान बना भारत का ‘हमदर्द’

असल विडंबना यह है कि जो पाकिस्तान की मीडिया भारत में एक छात्र आंदोलन पर घंटों को प्राइम टाइम में जगह दे रहा है, वही खुद अपने घर में नहीं झाँक रहा है। जब पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में पिछले महीने से जारी प्रदर्शनों में दर्जनों नागरिकों को शहबाज सरकार की पुलिस गोलियों से भून देती है, तब इस मीडिया के लिए वो डिबेट का विषय नहीं बनती।

पूरी दुनिया जानती है कि अब PoK में प्रदर्शनों में 58 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 1460 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया जा चुका है या वे लापता हैं। जो पाकिस्तानी मीडिया भारत के लिए एकतरफा खबरें चलाते हुए सिर्फ पुलिस का लाठीचार्ज को ‘अत्याचार’ बनाकर दिखाती है, उस मुल्क को PoK में प्रदर्शनकारियों पर तरस नहीं आता है क्या?

आर्थिक हालत की बात करें तो पाकिस्तान की हकीकत किसी से छिपी नहीं है। देश में करीब 40 प्रतिशत आबादी गरीबी में जी रही है, आर्थिक वृद्धि दर महज 3 प्रतिशत के आसपास सिमटी हुई है और लदभग एक तिहाई- बच्चे कुपोषण के चलते शारीरिक विकास में पिछड़ रहे हैं। यह वही मुल्क है जो 1958 से अब तक IMF से 24वां बेलआउट ले चुका है और कर्जों के चक्र से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं ढूँढ पा रहा है।

इस साल भी पाकिस्तान ने विदेशी कर्ज और रोलओवर के जरिए करीब 27.2 अरब डॉलर जुटाए, जिसमें से ज्यादातर हिस्सा नए कर्ज चुकाने में ही खप गया। यानी जो देश खुद अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पा रहा, वह भारत को आर्थिक नसीहत देने में जुटा है।

ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान में खूब शांति है, मुल्क की शहबाज सरकार के खिलाफ चारों ओर प्रदर्शन और विद्रोह जारी है। एक तरफ बलूचिस्तान में BLA लड़ाकों का उभार, दूसरी तरफ TTP के हमले, तीसरी तरफ PoK में जनता का गुस्सा, और अब विपक्ष भी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल चुका है। पर मीडिया यह दिखाने से परहेज करता है, क्योंकि असल में अपनी भीतर की आग से जनता का ध्यान भटकाने के लिए भारत को निशाना बनाता है।

वही मीडिया भारत में एक प्रदर्शन को ‘जनक्रांति’ बताने वाली पाकिस्तानी मीडिया अपने घर में उठ रही आवाजों को ‘देशद्रोही’ करार देकर कुचल देती है। यही दोहरा रवैया पाकिस्तान की असली पहचान है।

कुल मिलाकर, जो मुल्क खुद रोटी, पानी और आर्थिक स्थिरता के लिए मोहताज है, वह भारत का ‘हमदर्द’ बनने का स्वाँग रचकर असल में अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहा है। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक प्रदर्शन सरकार से बातचीत और सुधार तक पहुँच जाता है, जबकि पाकिस्तान में वही आवाजें गोलियों और गिरफ्तारियों में दब जाती हैं। यही फर्क है भारत और पाकिस्तान की सच्चाई में।

मस्जिद का किया बखान, हनुमान मंदिर पर हमले की छिपाई बात: CJP की हिंसक भीड़ को पनाह न मिलने पर राणा अय्यूब जैसों की निकली कुंठा, पढ़िए कैसे नफरत फैलाई

दिल्ली के जंतर-मंतर पर जून 2026 से जारी कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शन में भूख हड़ताल, सोशल मीडिया अभियान, राजनीति और खुलेआम हिंदू-विरोधी भावना दिख रही है। इस्लामी-वामपंथी ग्रुप हिंदुओं को खलनायक के तौर पर पेश करने में लगे हुए हैं। उनका दावा है कि 20 जुलाई को हुई हिंसा के दौरान मस्जिद- गुरुद्वारे ने तो सीजेपी प्रदर्शनकारियों को शरण देने के लिए अपने द्वार खोल दिए, लेकिन हनुमान मंदिर ने ऐसा नहीं किया।

यह दावा किया गया है कि गुरुद्वारा बंगला साहिब और उससे नजदीक मौजूद मस्जिद ने सीजेपी के प्रदर्शनकारियों को उस वक्त शरण दी, जब दिल्ली पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया था, लेकिन प्राचीन हनुमान मंदिर का दरवाजा बंद था। दरअसल मामला उस वक्त शुरू हुआ जब कई राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं सहित ‘प्रदर्शनकारियों’ ने पत्थर फेंके थे।

कई इस्लामी-वामपंथियों ने दावा किया कि कनॉट प्लेस के पास विरोध स्थल के नजदीक होने के बावजू प्राचीन हनुमान मंदिर ने सीजेपी के कोकरोचों को शरण नहीं दी।

‘पत्रकार’ नेहा दीक्षित ने X पर लिखा, “मध्य दिल्ली के गुरुद्वारे और मस्जिद ने घायल प्रदर्शनकारियों के लिए अपने द्वार खोल दिए। पास स्थित हनुमान मंदिर ने इसके बजाय अपने द्वार क्यों बंद कर दिए?”

क्राउडफंडिंग घोटाले के आरोपी इस्लामी-वामपंथी राणा अय्यूब ने दीक्षित के पोस्ट पर व्यंग्य करते हुए कहा कि ‘गलती से कोई दलित ना चला जाए’। ये जातिगत टिप्पणी थी

एक वीडियो में सीजेपी के कुछ प्रदर्शनकारियों ने दावा किया कि उन्हें प्रवेश करने से रोकने के लिए मंदिर के दरवाजे बंद कर दिए गए थे।

इस वीडियो पर कुख्यात इस्लामी समर्थक तरुण गौतम ने भी कमेंट किया। उसने लिखा, “घायल प्रदर्शनकारियों को देखकर पुजारियों ने मंदिर का द्वार बंद कर दिया, वहीं गुरुद्वारों ने न केवल छात्रों को अंदर आने दिया, बल्कि उनकी रक्षा की। उन्हें भोजन कराया और उन्हें आश्रय दिया।”

सोशल मीडिया पर इस तरह की कई पोस्ट भरी पड़ी हैं, जिनमें यह झूठी कहानी फैलाई जा रही है कि प्राचीन हनुमान मंदिर ने सीजेपी प्रदर्शनकारियों के लिए अपने दरवाजे बंद कर दिए, जबकि ‘धर्मनिरपेक्षता और मानवता के प्रतीक’ मस्जिद और गुरुद्वारों ने अपने द्वार खोल दिए।

इस्लामी-वामपंथियों ने हिंदू मंदिर के खिलाफ जम कर बयानबाजी की, लेकिन इन लोगों ने ‘असली वजह’ नहीं बताई। ऑपइंडिया ने जब जमीनी सच्चाई का पता लगाया तो एक अलग पहलू उजागर हुआ।

ऑपइंडिया से बातचीत में प्राचीन हनुमान मंदिर प्रशासन ने बताया कि मंदिर के द्वार दस मिनट के लिए बंद कर दिए गए थे, ताकि मंदिर के अंदर मौजूद श्रद्धालुओं को हिंसा से बचाया जा सके। इन इलाकों में ही पत्थरों से भरे बैग लाए गए थे, जिनका इस्तेमाल हिंदू मंदिर पर और उसके आसपास किया जा रहा था।

इसके अलावा, दिल्ली पुलिस के निर्देश पर मंदिर के द्वार बंद कर दिए गए थे। लेकिन, किसी को भी मंदिर में जाने से नहीं रोका गया था।

जबकि इस्लामी-वामपंथी हिंदू मंदिर को कॉकरोचों को शरण न देने के लिए निशाना बना रहे हैं, उनमें से किसी ने भी यह कहने की जुर्रत नहीं की कि इसी मंदिर और उसके आसपास के क्षेत्र पर नकाबपोश प्रदर्शनकारियों ने पथराव किया।

20 जुलाई को प्राचीन हनुमान मंदिर के आसपास सीजेपी समर्थकों ने पत्थरबाजी की और इसका भी वीडियो मौजूद हैं। ऐसे हालात में मंदिर प्रशासन अपने परिसर को उपद्रवी दंगाइयों के लिए खुला क्यों छोड़ेगा ताकि वे मंदिर पर हमला करें, तोड़फोड़ करें और निर्दोष लोगों को निशाना बनाएँ?

मंदिर अधिकारियों ने बुनियादी सुरक्षा और आत्मरक्षा के उपाय के तौर पर द्वार बंद कर दिए, क्योंकि परिसर पर और उसके आसपास भारी पथराव हो रहा था। हिंसक भीड़ को प्रवेश की अनुमति देना एक तरह से तोड़फोड़, अपवित्रता को बुलावा देने जैसा था। ऐसे में उन लोगों के जीवन भी खतरे में पड़ जाते जिनका विरोध प्रदर्शन से कोई लेना-देना नहीं था और वे मंदिर में पूजा करने पहुँचे थे।

हिंदू मंदिर में पत्थर फेंकने वालों या ‘विरोध’ के नाम पर पत्थर फेंकने वालों का समर्थन करने वालों को किसी भी हालत में जगह नहीं दी जानी चाहिए। ‘शांतिपूर्ण छात्र प्रदर्शन’ का पूरा मुखौटा उस क्षण धराशायी हो गया, जब सीजेपी के प्रदर्शनकारियों ने पत्थर फेंके और पुलिस पर हमला किया। इसकी वजह से हिंसा हुई और पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा और आँसू गैस के गोले दागने पड़े।

इस्लामी-वामपंथी गुट का पाखंड हिंदुओं को खलनायक के रूप में पेश करना और उन्हें दोषी ठहराना हास्यास्पद है। वे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, वैज्ञानिक सोच आदि के नाम पर हिंदुओं के खिलाफ हमेशा जहर उगलते हैं और हिंदू धर्म का उपहास करते हैं और मदद की उम्मीद भी करते हैं।

इस्लामी-वामपंथी जिन गुरुद्वारों और मस्जिदों को ‘अल्पसंख्यक धार्मिक स्थलों द्वारा दिखाई गई मानवता’ बताकर उनकी सराहना कर रहे हैं, उन पर कोई हमला नहीं हुआ। गुरुद्वारे या किसी मस्जिद पर या उसके आसपास पत्थर नहीं फेंके गए।

इसके अलावा, मुस्लिम का एक बड़ा हिस्सा भाजपा विरोधी है और मोदी सरकार के पतन की कामना करता है। वास्तव में, इस्लामी कट्टरपंथी खुलेआम कहते हैं कि ‘निजाम’ बदलेगा। अयोध्या राम मंदिर को ध्वस्त करके बाबरी मस्जिद का पुनर्निर्माण किया जाएगा। राम मंदिर को वे मोदी सरकार द्वारा निर्मित मानते हैं। यह आश्चर्य की बात नहीं है कि किसी मस्जिद ने उन लोगों को पनाह दी हो जो सड़कों पर उतरकर केंद्र सरकार का हिंसक विरोध कर रहे हैं।

इस्लामी-वामपंथियों को भी तलवारें लहराते निहंगों के सीजेपी विरोध प्रदर्शन में शामिल होने से कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन अगर बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने हथियारों के साथ जवाबी विरोध प्रदर्शन किया होता, तो हिंदू-विरोधी गुट उन्हें ‘भगवा आतंकवादी’ करार दे देता।

वामपंथी-लिबरल ग्रुप ने बड़ी चालाकी से प्राचीन हनुमान मंदिर पर और उसके आसपास पत्थरबाजी के बड़े मुद्दे से ध्यान हटाकर, उसी मंदिर पर निशाना साधना शुरू कर दिया, जिसमें प्रदर्शनकारियों को शरण नहीं दी गई थी।

चाहे वह बांग्लादेश हो, जहाँ सरकार विरोधी ‘छात्र विरोध प्रदर्शन’ हिंदुओं के खिलाफ इस्लामी हमले में परिणत हुए, या सीजेपी का ‘चलो संसद’ विरोध प्रदर्शन हो, किसी न किसी तरह हिंदू और हिंदू धर्म को ही निशाना बनाया जाता है।

सीजेपी का विरोध प्रदर्शन एनईटी पेपर लीक, परीक्षा अनियमितताओं और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर था। लेकिन सीजेपी की अगुवाई इस्लामी-वामपंथी ग्रुप ने की, जो हिंदू विरोधी नफरत फैलाने के लिए कुख्यात हैं।

अभिनेता प्रकाश राज सीजेपी के समर्थन में इस विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए। यूँ भी वो सनातन धर्म (हिंदू धर्म) को मिटाने की बात करते हैं। जेएनयू की पूर्व प्रोफेसर निवेदिता मेनन ने सीजेपी का समर्थन किया। उन्होंने ‘लव जिहाद’ और इससे पीड़ित हिंदुओं का मजाक उड़ाया था। ‘कॉमेडियन’ कुणाल कामरा ने सीजेपी के विरोध प्रदर्शन मंच से माता सीता के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की। बर्गर खाने को लेकर सीजेपी से निष्कासित सदस्य विजेता दहिया ने हिंदू विरोधी टिप्पणी की। दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिता नारायण ने ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ गाया और पाकिस्तानी कवि फैज अहमद फैज की इस्लामी वर्चस्ववादी और मूर्ति तोड़ने वालों को महिमामंडित करने वाली कविता ‘हम देखेंगे’ की तारीफ की। वहीं वामपंथी छात्र ग्रुप ‘आजादी-आजादी’ और ‘ब्राह्मणवाद से आजादी’ जैसे आपत्तिजनक नारे लगाए।

एक ओर जहाँ एक कॉकरोच ने अपमानजनक टिप्पणी करते हुए कहा, ‘राम मारे हुए हैं’, वहीं दूसरे ने कहा ‘राम मंदिर या जो भी बकवास हो…’।

एक सीजेपी प्रदर्शनकारी ने तो यहाँ तक ​​कह दिया कि ‘मुस्लिम हिंदुओं से एक लाख गुना बेहतर हैं’।

अब निष्कासित हो चुकी सीजेपी नेता विजेता दहिया से लेकर सीजेपी के कई भ्रष्ट नेताओं तक, सभी ने खुलेआम हिंदुओं और हिंदू धर्म के प्रति अपनी नफरत जाहिर की है। फिर भी मंदिरों से शरण की उम्मीद रखते हैं।

इसी बीच राणा अय्यूब जैसे ऑनलाइन इस्लामी-वामपंथियों ने चतुराई से जाति आधारित व्यंग्य कर हिन्दुओं को और बदनाम करने की कोशिश की। उसकी मंशा हिन्दुओं को जातियों में विभाजित करने की ही लगती है।

इससे साफ है कि वामपंथी उदारवादी उतने ही ‘धर्मनिरपेक्ष और सहिष्णु’ हैं, जितना कि सीजेपी का विरोध प्रदर्शन ‘गैर-राजनीतिक और शांतिपूर्ण’ है।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

चेहरे चमक गए, पर मुद्दे धुंधले पड़े: CJP की अंदरूनी लड़ाई ने आंदोलन की साख पर उठाए सवाल, छात्रों के टूटते भरोसे की कहानी

नीट पेपर लीक विवाद और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर जब ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के बैनर तले छात्र दिल्ली की सड़कों पर उतरे, तो यह आंदोलन कुछ ही दिनों में चर्चा का विषय बन गया। अभिजीत दिपके, सौरव दास, विजेता दहिया जैसे चेहरों और सोनम वांगचुक के अनशन से प्रभावित हो कई युवा जंतर-मंतर पहुँचने लगे।

लेकिन अब जब इस प्रदर्शन को चलते हुए करीब 25 दिन हो गए हैं तो वे छात्र खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं। पार्टी के भीतर आंतरिक कलह मच गई है, भरोसा टूट रहा है और नेता इन युवाओं को बस उकसाने में लगे हैं।

CJP में हुई पहली बड़ी टूट की शुरुआत एक वायरल वीडियो से हुई। पार्टी के मुख्य प्रवक्ता विजेता दहिया का एक वीडियो सामने आया जिसमें वे संसद मार्च के दौरान प्रदर्शन स्थल से हटकर बर्गर खाते नजर आए। यह वीडियो ठीक उसी वक्त वायरल हुआ, जब पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प चल रही थी और कई छात्र आँसू गैस व कथित लाठीचार्ज का सामना कर रहे थे। CJP ने इसे ‘असंवेदनशील आचरण’ बताते हुए विजेता दहिया को इस प्रदर्शन से अलग कर दिया।

अब यह आंदोलन छात्रों की समस्या से कहीं हटकर इन लोगों को खुद को चमकाने का मौका लग रहा था, तो ऐसे में अलग होने पर दहिया भी उखड़ गए। उन्होंने भी एक वीडियो जारी कर दिपके को आड़े हाथों लिया। दहिया ने अब अपनी वीडियो में कहा है कि उन्हें बर्गर खाने के लिए निकाल दिया गया लेकिन उन्होंने दिपके का कचौड़ी खाने पर बचाव किया था।

दहिया ने कहा, “अभी भी लोग कह रहे हैं कि अभिजीत ट्रक पर चढ़ गया, उस पर मैंने तेरा बचाव किया है कि थप्पड़ भी तो उसे ही लगा था। मेरे साथियों ने ही ‘बलि का बकरा’ बना दिया तो थोड़ा बुरा तो लगा।” दहिया बेशक इसे थोड़ा बुरा लगना बता रहे हैं लेकिन उनके वायरल वीडियो दिखा रहे हैं कि मामला ज्यादा गंभीर है।

दहिया ने एक चैनल से बातचीत में कहा, “अभिजीत को लगा कि नहीं विजेता आंदोलन के लिए सही है कि आप इस्तीफा दे तो। तो मैंने कहा कि देखो इस्तीफा तो मैं नहीं दूँगा, ऐसा करो कि तुम ही मुझे निकाल दो, फिर उन्होंने ऐसा ही किया।”

असल में जब कोई ऐसा आंदोलन अचानक बड़ा रूप ले लेता है, तो नेतृत्व, अनुशासन और जवाबदेही को लेकर भीतर ही भीतर टकराव शुरू हो जाता है। डिजिटल स्टारडम हासिल करना आसान है लेकिन जमीन पर संगठन और नैतिक जवाबदेही बनाए रखना कहीं ज्यादा मुश्किल परीक्षा साबित होती है। यही कारण है कि यह घटना केवल एक व्यक्ति को निकालने की खबर नहीं है बल्कि CJP के भीतर मौजूद महत्वाकांक्षाओं का पहला सार्वजनिक विस्फोट है।

जिस तरह इस आंदोलन में अरविंद केजरीवाल से लेकर वामपंथी पार्टियों, सपा और TMC के नेता पहुँचे हैं उससे साफ लग रहा है कि यह अब छात्रों का आंदोलन नहीं रहा है बल्कि एक राजनीतिक आंदोलन बन गया है। जो भीड़ ‘आम छात्रों’ के नाम पर जंतर-मंतर और संसद मार्च में जुटी उसमें सपा, AAP, आजाद समाज पार्टी के कार्यकर्ता और जेएनयू-डीयू-जामिया जैसे संस्थानों के वामपंथी छात्र संगठन भी बड़ी संख्या में शामिल थे। इसके बाद जो इस आंदोलन में बदलाव देख रहे थे वो भी निराश होने लगे हैं।

इनमें से कुछ छात्र जो असल में परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता, पेपर लीक पर जवाबदेही जैसे मुद्दों पर आए थे उन्हें अब दिखने लगा है कि चर्चा का केंद्र बिंदु धीरे-धीरे शिक्षा से हटकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप, नेताओं की मौजूदगी, प्रवक्ता के निष्कासन और हिंसा की घटनाओं पर सिमटता चला गया है।

वीरू भाई नामक एक युवक एक आंदोलन में लंबे समय तक सक्रिय था लेकिन अब उसने निराशा में खुद को इस आंदोलन से अलग कर लिया है। वीरू भाई का कहना है कि पुलिस के साथ झड़प के समय कोई भी बड़ा नेता आगे नहीं आया। आयोजकों ने खुद पीछे रहकर महिला प्रदर्शनकारियों को सबसे आगे धकेल दिया। इसी कारण भटके नौजवानों और युवाओं ने पहली बार आंदोलन में भाग लिया और अंत में उन्हें परेशानी का सामना खुद करना पड़ा।

उनका सीधा आरोप है कि खुद को गैर-राजनीतिक बताने वाली सीजेपी असल में आम आदमी पार्टी (AAP) की ‘बी-टीम’ की तरह काम कर रही है। उन्होंने आंदोलन में असामाजिक तत्वों के घुसने का भी दावा किया है। यह निराशा केवल वीरू की नहीं है, दर्जनों ऐसे वीरू हैं जिनके वीडियो सोशल मीडिया पर भरे पड़े हैं।

जब आंदोलन के भीतर से ही अनुशासनहीनता, आपसी अविश्वास और नेतृत्व को लेकर सवाल उठने लगें तो जमीन पर मौजूद आम प्रदर्शनकारी के मन में यह सवाल उठता ही है कि क्या यह नेतृत्व वाकई उनके मुद्दों के प्रति गंभीर है या यह वो सिर्फ अपनी डिजिटल लोकप्रियता की मौज ले रहे हैं।

किसी भी जन आंदोलन की सबसे बड़ी पूंजी उसकी नैतिक साख और उसका मूल उद्देश्य होता है। CJP के मामले में यह दोनों चीजें एक साथ खतरे में हैं। एक तरफ नेतृत्व के भीतर अनुशासन और जवाबदेही को लेकर उठे सवाल संगठन की आंतरिक मजबूती पर सवाल खड़ा करते हैं। दूसरी तरफ राजनीतिक दलों की सक्रिय भागीदारी और उससे जुड़े आरोप इस आंदोलन की ‘स्वतंत्र छात्र आंदोलन’ वाली पहचान को धुँधला कर दिया है।

सोशल मीडिया के दौर में किसी आंदोलन को रातों-रात लोकप्रियता और डिजिटल समर्थन मिल सकता है लेकिन उसे लंबे समय तक अनुशासित, केंद्रित और राजनीति से दूर रखना बहुत मुश्किल काम है। इन सबमें सबसे ज्यादा नुकसान उन आम छात्रों का हुआ है, जो ईमानदारी से अपने भविष्य और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की उम्मीद लेकर सड़कों पर उतरे थे।

ये बात सही है कि सिस्टम में खामियाँ हैं, पेपर लीक हुए हैं। और अगर परीक्षा प्रणाली में खामियाँ हैं तो उनका समाधान राजनीतिक टकराव से नहीं बल्कि सिस्टम में सुधारों से ही निकलेगा। वरना ऐसे आंदोलनों के नाम पर भीड़ इकट्ठा हो तो जाएगी लेकिन उसका फायदा नेता बस अपनी नेतागिरी के लिए उठाएँगे और आम जन केवल ठगे जाएँगे।

CJP प्रोपेगेंडा आपकी टाइमलाइन तक कैसे पहुँच रहा? समझिए Meta का एल्गोरिदम और मॉडरेशन कैसे साध रहे ग्लोबल लेफ्ट का नैरेटिव

पिछले कुछ दिनों में कई सोशल मीडिया यूजर्स ने शिकायत की है। उनका कहना है कि कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शनों से जुड़े वीडियो और पोस्ट जबरन उनके फीड पर दिखाए जा रहे हैं। यह कंटेंट उन लोगों को भी दिखाई दे रहा है जो CJP के अकाउंट्स को फॉलो नहीं करते हैं। ऐसे लोग जो इस तरह का राजनीतिक कंटेंट नहीं देखते या जिन्होंने हाल ही में अपने अकाउंट बनाए हैं, उन्हें भी ये पोस्ट दिख रहे हैं।

X (ट्विटर) की एक यूजर मोहिनी ने अपनी पोस्ट में इस बात को उठाया है। उन्होंने लिखा, “पिछले कुछ दिनों में मेटा के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर CJP के नैरेटिव को आगे बढ़ाने के लिए एल्गोरिदम के साथ चालाकी की गई है। खासतौर पर इंस्टाग्राम पर युवा पीढ़ी के बीच अराजकता और अशांति फैलाने के लिए एक स्पॉन्सर्ड कैंपेन चलाया जा रहा है।”

एक अन्य यूजर ‘ऑलवेज4राइट’ ने कहा, “इंस्टाग्राम पूरी तरह से हाईजैक हो चुका है। इस पर ज्यादातर पुलिस विरोधी और सरकार विरोधी बातों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसकी वजह से पुलिस के खिलाफ हिंसा का माहौल बन रहा है।”

‘अश्विनी’ नाम के X यूजर ने लिखा, “इंस्टाग्राम पर CJP प्रदर्शन के समर्थन वाले कंटेंट को जबरदस्ती आगे बढ़ाया जा रहा है।” उन्होंने सरकार से इस पर तुरंत कार्रवाई करने की माँग की।

वहीं ‘Shush’ नाम के एक और यूजर ने कहा, “इंस्टाग्राम ने CJP प्रदर्शनों के हक में एल्गोरिदम के जरिए पूरा प्रोपेगेंडा शुरू कर दिया है। भारत को नेपाल या बांग्लादेश जैसा बनाने की योजना चालू हो चुकी है। इसका बहुत गंभीरता से जवाब देने की जरूरत है।”

‘रिवोल्यूशनमोंक’ नाम के यूजर ने अपनी डिटेल्ड पोस्ट्स में पूरी बात समझाई है। उन्होंने बताया कि अगर लोग किसी CJP अकाउंट को फॉलो या लाइक नहीं भी करते, तब भी उनके फीड में ये रील्स लगातार आ रही हैं। उन्होंने लिखा, “इसकी वजह यह है कि CJP के पास राज्य स्तर के सोशल मीडिया कोऑर्डिनेटर्स का एक बड़ा नेटवर्क है। ये लोग इंस्टाग्राम इन्फ्लुएंसर्स के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।” उन्होंने आगे बताया कि 5,000 रुपए से शुरुआत करके पैसे देकर ऐसे पोस्ट करवाए जा रहे हैं।

अपनी अगली पोस्ट्स में उन्होंने कई इंस्टाग्राम अकाउंट्स के स्क्रीनशॉट्स भी शेयर किए। इन स्क्रीनशॉट्स में एक जैसा कंटेंट दिख रहा था, जिससे उनकी बात को बल मिलता है।

अब फेसबुक, इंस्टाग्राम और यहाँ तक कि X पर एक ही राजनीतिक नैरेटिव का बार-बार दिखना एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। सवाल यह है कि क्या यह कंटेंट सिर्फ इसलिए वायरल हो रहा है क्योंकि लोग इसे देखना चाहते हैं? या फिर सोशल मीडिया का एल्गोरिदम खुद इसे नए और अनजान लोगों तक जबरदस्ती पहुँचा रहा है?

इसका जवाब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के काम करने के तरीके में छुपा है। फेसबुक और इंस्टाग्राम सिर्फ वही पोस्ट नहीं दिखाते जिन्हें यूजर फॉलो करता है। मेटा खुद यह तय करता है कि कौन सा राजनीतिक कंटेंट लोगों को दिखाया जाए। वही तय करता है कि गैर-फॉलोअर्स को किसकी पोस्ट दिखेगी और कौन से इशारे यह बताने के लिए काफी हैं कि यूजर किसी राजनीतिक अभियान में दिलचस्पी रख रहा है।

कंपनी ने इन नियमों को कई बार बदला है। इससे भी अहम बात यह है कि खुद मेटा ने माना है कि वह अब सीधे और अप्रत्यक्ष इशारों के आधार पर ज्यादा राजनीतिक कंटेंट रिकमेंड कर रहा है। आसान शब्दों में कहें तो किसी पोस्ट को ‘लाइक’ करना एक सीधा इशारा है। वहीं किसी वीडियो को सिर्फ ‘रुककर देखना’ एक अप्रत्यक्ष इशारा माना जाता है।

इसी वजह से किसी यूजर के लिए CJP का समर्थक होना, उसके अकाउंट फॉलो करना या प्रदर्शन के बारे में खोजना जरूरी नहीं है। अगर कोई यूजर सिर्फ एक नाटकीय वीडियो देखने के लिए भी रुक जाता है, तो मेटा उसके फीड में वैसे ही कंटेंट की भरमार शुरू कर देता है।

मेटा ने खुद माना है कि वह यूजर्स को राजनीतिक कंटेंट रिकमेंड करता

साल 2021 में मेटा ने अपने प्लेटफॉर्म्स पर दिखने वाले राजनीतिक और नागरिक मामलों से जुड़े कंटेंट को कम करना शुरू किया था। बाद में उसने राजनीतिक पोस्ट की रैंकिंग तय करते समय कमेंट्स और शेयर्स को दी जाने वाली अहमियत भी घटा दी थी। कंपनी का कहना था कि यूजर्स नहीं चाहते कि उनके फीड पर राजनीतिक बातें छाई रहें।

जनवरी 2025 में यह स्थिति पूरी तरह बदल गई। मेटा ने ऐलान किया कि वह एक ‘ज्यादा पर्सनल तरीके’ से फेसबुक, इंस्टाग्राम और थ्रेड्स पर राजनीतिक कंटेंट को वापस लाना शुरू करेगा। उसने कहा कि पोस्ट को लाइक करने जैसे सीधे इशारों और किसी पोस्ट को सिर्फ देखने जैसे अप्रत्यक्ष इशारों के आधार पर कंटेंट की रैंकिंग होगी। मेटा ने यह भी कहा कि वह इन इशारों के आधार पर ज्यादा राजनीतिक कंटेंट रिकमेंड करेगा।

मेटा ने साल 2025 में जो कहा था, वह यह समझने के लिए बेहद जरूरी है कि CJP के वीडियो अनजान खातों तक कैसे और क्यों पहुँच रहे हैं।

हो सकता है कि कोई इंसान वीडियो इसलिए देखे क्योंकि उसमें पुलिस पर हमला हो रहा हो। दूसरा इंसान प्रदर्शनकारियों के बर्ताव से हैरान होकर उसे देख सकता है। कोई तीसरा इंसान यह जानने के लिए रुक सकता है कि घटना कहाँ हुई है। मेटा का सिस्टम यह सही-सही तय नहीं कर सकता कि हर इंसान ने वह क्लिप क्यों देखी। वह सिर्फ इतना दर्ज करता है कि उस कंटेंट ने यूजर का ध्यान खींचा है।

जैसे ही कोई यूजर रुकता है, वीडियो देखता है, कमेंट सेक्शन खोलता है या उस अकाउंट पर जाता है, प्लेटफॉर्म को कई इशारे मिल जाते हैं। इसके बाद वह यूजर को दूसरा प्रदर्शन वाला वीडियो दिखा सकता है। फिर उसी मुद्दे पर बात करने वाला कोई और अकाउंट भी सामने ला सकता है।

मेटा का अपना हेल्प सेंटर भी यही कहता है। इंस्टाग्राम पर सजेस्टेड पोस्ट्स यूजर की पुरानी एक्टिविटी, उसके कनेक्शंस, पोस्ट की जानकारी और शेयर करने वाले अकाउंट की लोकप्रियता देखकर चुनी जाती हैं। यह खास तौर पर यह भी देखता है कि दूसरे लोग उस पोस्ट के साथ कैसे जुड़ रहे हैं। यह सजेस्टेड कंटेंट आपके मेन फीड, एक्सप्लोर सेक्शन और रील्स में दिख सकता है।

आसान शब्दों में कहें तो, CJP के वायरल कंटेंट को लोगों के ढूँढने का इंतज़ार नहीं करना पड़ता। मेटा खुद इसे सीधे उनके सामने लाकर परोस देता है।

AI से बनाई गई तस्वीर

एल्गोरिदम यह नहीं समझता कि यूजर प्रदर्शन का समर्थन कर रहा है या उसकी निंदा कर रहा है

सोशल मीडिया कंपनियाँ अक्सर अपने रिकमेंडेशंस को यूजर की दिलचस्पी का एक निष्पक्ष जवाब मानती हैं। लेकिन यहाँ ‘दिलचस्पी’ की परिभाषा बहुत ज्यादा बड़ी और खतरनाक है। अगर कोई यूजर CJP के वीडियो पर गुस्से में कमेंट कर रहा है, तो वह भी एक कमेंट ही है। अगर कोई इंसान प्रदर्शनकारियों की निंदा करने के लिए क्लिप शेयर कर रहा है, तो वह भी शेयर ही कर रहा है। कोई व्यक्ति क्या हुआ यह समझने के लिए हिंसा का वीडियो बार-बार देख रहा है, तो वह भी उसका वॉच टाइम ही बढ़ा रहा है।

रिकमेंडेशन सिस्टम के लिए ये सभी काम यह दर्शाते हैं कि वह पोस्ट बाकी लोगों को दिखाने लायक और काम की है।

साल 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान एक रिसर्च की गई थी। इसमें फेसबुक और इंस्टाग्राम के एल्गोरिदम वाले फीड की जगह समय के हिसाब से (क्रोनोलॉजिकल) फीड दिया गया था। इससे यूजर्स का प्लेटफॉर्म पर बिताया जाने वाला समय और उनकी एक्टिविटी काफी कम हो गई। इसके साथ ही उनके सामने आने वाले राजनीतिक कंटेंट का तरीका भी पूरी तरह बदल गया। शोधकर्ताओं को राजनीतिक सोच में तो तुरंत कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखा, लेकिन उन्होंने यह साबित कर दिया कि एल्गोरिदम यह तय करता है कि यूजर्स क्या देखेंगे और वे प्लेटफॉर्म पर कैसा बर्ताव करेंगे।

20.8 करोड़ फेसबुक यूजर्स के डेटा पर की गई एक और स्टडी में भी बड़ी बात सामने आई। जैसे-जैसे शोधकर्ताओं ने देखा कि यूजर क्या देख सकता था, एल्गोरिदम ने उसे असल में क्या दिखाया और फिर उसने किस चीज पर क्लिक किया, वैसे-वैसे लोगों के बीच वैचारिक दूरी और बँटवारा बढ़ता चला गया।

मुद्दा एकदम साफ और सीधा है। मेटा का एल्गोरिदम सिर्फ राजनीतिक माहौल को दिखाता भर नहीं है। वह यह खुद तय करता है कि किस कंटेंट को ज्यादा से ज्यादा लोग देखेंगे और इस तरह वह पूरे माहौल को ही बदल देता है।

CJP का प्रोपेगेंडा भले ही उसके आयोजकों और समर्थकों से शुरू होता हो। लेकिन इस नाटक और उग्रता वाले वीडियो को शुरुआत में जैसे ही थोड़ा अटेंशन मिलता है, रिकमेंडेशन सिस्टम इसे पकड़ लेता है और बहुत बड़े दर्शक वर्ग तक पहुँचा देता है।

मेटा खुद एल्गोरिदम तैयार करता है और वह राजनीतिक नतीजों को बदल सकता है

‘एल्गोरिदम’ को एक ऐसी स्वतंत्र मशीन की तरह देखना गलत होगा जिस पर मेटा का कोई नियंत्रण नहीं है।

मेटा खुद यह तय करता है कि कौन से इशारे उसके लिए मायने रखते हैं। वही यह फैसला करता है कि कमेंट्स, शेयर्स, देखने का समय, नेगेटिव फीडबैक या सर्वे के जवाब राजनीतिक रिकमेंडेशंस को प्रभावित करेंगे या नहीं। इसके साथ ही वह यह भी तय करता है कि किस तरह का कंटेंट उन लोगों तक पहुँचना चाहिए जो मूल अकाउंट को फॉलो नहीं करते हैं।

साल 2022 में मेटा ने कहा था कि उसने वैश्विक स्तर पर राजनीतिक कंटेंट पर कमेंट्स और शेयर्स को दी जाने वाली अहमियत कम कर दी है। साल 2023 तक कंपनी ने कहा कि वह एंगेजमेंट पर आधारित रैंकिंग से हटने की कोशिश कर रही है। उसने उन सर्वे को ज्यादा अहमियत देने की बात कही जिनमें यूजर्स बताते हैं कि उनके लिए क्या जानकारीपूर्ण या अर्थपूर्ण है।

साल 2024 में मेटा ने इंस्टाग्राम और थ्रेड्स पर अनफॉलो किए गए अकाउंट्स से राजनीतिक कंटेंट के सीधे रिकमेंडेशन को सीमित कर दिया था। इसके बाद साल 2025 में उसने अपना फैसला बदल दिया और राजनीतिक रिकमेंडेशंस को ज्यादा पर्सनल बना दिया। वर्तमान में फेसबुक पर पॉलिटिकल-कंटेंट कंट्रोल डिफ़ॉल्ट रूप से चालू रहता है। यानी अगर कोई यूजर कम राजनीतिक कंटेंट देखना चाहता है, तो उसे खुद सेटिंग्स में जाकर इसे बदलना होगा।

ये सारे बदलाव साबित करते हैं कि राजनीतिक कंटेंट का ज्यादा दिखना सिर्फ लोगों की दिलचस्पी की वजह से नहीं है। यह पूरी तरह से कंपनी की अपनी नीतियों और फैसलों का नतीजा है।

मेटा को यह आदेश देने की जरूरत बिल्कुल नहीं है कि CJP को प्रमोट किया जाए। उसे बस इसके वीडियोज को रिकमेंडेशन के लायक राजनीतिक कंटेंट की कैटेगरी में डालना होता है। इसके बाद एंगेजमेंट के इशारे खुद-ब-खुद इन वीडियोज को अनजान लोगों के फीड में धकेल देते हैं।

पुलिस को हमलावर दिखाने वाले फुटेज को अपने आप ही ज्यादा फायदा क्यों मिलता है, ये है वजह

इस विवाद की एक और गहरी परत है। हिंसा की एक ही घटना को अलग-अलग तरीके से देखा जा सकता है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि हिंसा कौन कर रहा है और पोस्ट को कैसे पेश किया गया है।

अगर किसी वीडियो में पुलिस प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग करती दिखती है, तो उसे पुलिस की बर्बरता, नागरिक अधिकारों के हनन या सरकारी दमन के रूप में पेश किया जा सकता है। इसलिए ऐसे वीडियो को खबर के लिहाज से जरूरी मानकर आसानी से दिखाया जाता है।

दूसरी तरफ, अगर किसी फुटेज में प्रदर्शनकारी पुलिस पर हमला करते नजर आते हैं, तो उसे हिंसक कंटेंट की कैटेगरी में डाल दिया जाता है। अगर वीडियो में कोई अलगाववादी या चरमपंथी संगठन दिखता है, तो बात और ज्यादा बिगड़ जाती है। तब इसे किसी खतरनाक संगठन के समर्थन, महिमामंडन या प्रदर्शन के दायरे में मान लिया जाता है।

मेटा की ‘डेंजरस ऑर्गनाइजेशन एंड इंडिविजुअल्स’ पॉलिसी ऐसी घटनाओं की रिपोर्टिंग, निंदा और निष्पक्ष चर्चा की इजाजत देती है। इसके बावजूद, सही रिपोर्टिंग और महिमामंडन के बीच के फर्क को ऑटोमेटेड सिस्टम और मानव रिव्यूअर्स अक्सर गलत समझ बैठते हैं।

मेटा के ओवरसाइट बोर्ड ने ऐसा ही एक मामला देखा था। यह मामला तालिबान से जुड़ी उर्दू अखबार की एक रिपोर्ट का था। मेटा के सिस्टम ने उस पोस्ट को हटा दिया था। दो ह्यूमन रिव्यूअर्स ने भी इसे नियमों का उल्लंघन माना था। इसके बाद प्लेटफॉर्म ने पेज को स्ट्राइक दी और एडमिन के फीचर्स भी सीमित कर दिए।

इस केस को गलत तरीके से हटाई गई पोस्ट्स की जाँच करने वाले सिस्टम में भेजा गया था। लेकिन वहाँ इसकी कभी समीक्षा ही नहीं हो सकी। इसकी वजह यह थी कि उस लिस्ट के लिए मेटा के पास 50 से भी कम उर्दू भाषी रिव्यूअर्स थे। कंपनी ने इस पोस्ट को ज्यादा जरूरी भी नहीं माना था। मेटा ने इसे तब जाकर वापस रिस्टोर किया जब ओवरसाइट बोर्ड ने इस केस को खुद चुना। तब जाकर कंपनी ने माना कि वह खबर के लिहाज से सही रिपोर्टिंग थी।

यह उदाहरण इस दावे को पूरी तरह खारिज करता है कि संदर्भ से जुड़ी छूट हमेशा सही तरीके से लागू होती है। नियम भले ही आतंकवाद या राजनीतिक हिंसा पर पत्रकारिता की इजाजत देते हों। लेकिन उन नियमों को लागू करने वाली मशीनें और रिव्यूअर्स आतंकवादी के बजाय पत्रकार को ही सजा दे बैठते हैं।

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मेटा ने खुद माना है कि उसके सिस्टम ने सही और कानूनी राजनीतिक बयानों को भी सेंसर किया

कंपनी ने यह बात स्वीकार की है कि उसकी मॉडरेशन व्यवस्था न केवल अधूरी थी, बल्कि उसने अपनी सीमाओं को भी पार किया। जनवरी 2025 में मेटा ने कहा कि सामाजिक और राजनीतिक दबाव के चलते उसने बेहद जटिल सिस्टम बना लिए थे। उसने माना कि यह तरीका बहुत आगे निकल गया था। कंपनी के अनुसार, बहुत सारे बेकसूर कंटेंट को रोक दिया गया और कई निर्दोष यूजर्स पर गलत तरीके से नियम थोप दिए गए।

मेटा ने आगे यह खुलासा किया कि दिसंबर 2024 में उसने हर दिन लाखों कंटेंट हटाए। कंपनी का अनुमान है कि की गई हर दस में से एक या दो कार्रवाइयां गलत हो सकती हैं।

ये कोई छोटी-मोटी गलतियाँ नहीं हैं, खासकर तब जब रोज लाखों फैसले लिए जा रहे हों। अगर कंपनी के कम वाले अनुमान को भी देखें, तो भी इसका मतलब यह है कि बहुत सारे सही और जायज कंटेंट पर गलत कार्रवाई हुई।

मेटा ने यह भी माना कि थर्ड-पार्टी फैक्ट-चेकिंग की वजह से सही राजनीतिक बयानों पर भी अनुचित लेबल लग गए और उनकी पहुँच कम हो गई। कंपनी ने कहा कि यह प्रोग्राम अक्सर सेंसरशिप का जरिया बन गया, क्योंकि फैक्ट-चेकर्स ने काम के दौरान अपने पूर्वाग्रह और निजी नजरिए को शामिल कर लिया था।

इसीलिए, वैचारिक पक्षपात के आरोपों को कोई मनगढ़ंत कहानी बताकर खारिज नहीं किया जा सकता। मेटा का बचाव अब यह नहीं है कि गलत तरीके से पाबंदियाँ नहीं लगाई गईं। बल्कि उसका बचाव यह है कि वह अब इसे कम करने की कोशिश कर रहा है।

एल्गोरिदम अकेले काम नहीं करता। इंसान भी इस नैरेटिव को गढ़ने का काम करते हैं

सोशल मीडिया का यह पूरा सिस्टम सिर्फ ऑटोमेटेड मशीनों से नहीं चलता। मेटा ने साल 2024 में बताया था कि उसके पास फेसबुक, इंस्टाग्राम और थ्रेड्स पर काम करने वाले लगभग 15,000 कंटेंट रिव्यूअर्स हैं। ये लोग 80 से ज्यादा भाषाओं में काम करते हैं। इसके अलावा राजनीतिक फैसलों में पॉलिसी टीमें, इंजीनियर, कानूनी विभाग, पब्लिक-पॉलिसी अधिकारी और चुनाव विशेष ऑपरेशन्स सेंटर भी शामिल होते हैं।

इंसान ही यह तय करते हैं कि कोई पोस्ट हिंसा की निंदा कर रही है या उसका महिमामंडन कर रही है। वे ही यह फैसला करते हैं कि संदर्भ किसी पत्रकारिता का है, सामाजिक कार्यकर्ता का है, व्यंग्य (सटायर) का है या समर्थन का है। वे भारतीय भाषाओं में लिखे गए कैप्शन्स का मतलब भी निकालते हैं, जिनमें ऐसी राजनीतिक बातें हो सकती हैं जिन्हें देश से बाहर बैठे रिव्यूअर्स समझ ही नहीं पाते।

इस पूरी प्रक्रिया में हर स्तर पर पक्षपात आ सकता है। यह नियम (पॉलिसी) बनाते समय आ सकता है। यह किसी संगठन को खतरनाक संगठनों की सूची में डालते समय आ सकता है। यह तब आ सकता है जब कोई रिव्यूअर किसी रिपोर्ट के लहजे का गलत मतलब निकाल ले। या फिर यह तब भी आ सकता है जब संगठित यूजर्स अपने विरोधी विचार वाले कंटेंट को बार-बार रिपोर्ट करते हैं।

मेटा के अपने तालिबान वाले केस ने साफ दिखा दिया था कि दो इंसानी रिव्यूअर्स भी एक पूरी तरह से गलत फैसले को सही ठहरा सकते हैं। उसने यह भी दिखाया कि किसी भाषा के रिव्यूअर्स की कमी होने पर गलत तरीके से हटाई गई पोस्ट को ठीक करना कितना मुश्किल हो जाता है।

ऑपइंडिया (OpIndia) झेल चुका मेटा की इस भेदभाव भरी कार्रवाई

ऑपइंडिया के लिए पक्षपातपूर्ण कार्रवाई का यह सवाल सिर्फ किताबी या सैद्धांतिक नहीं है।

साल 2020 में ऑपइंडिया ने दिखाया था कि उसके फेसबुक पेज की रीच रोजाना करीब 20 लाख से घटकर लगभग 1.71 लाख रह गई थी। फेसबुक ने कंटेंट की क्वालिटी का हवाला दिया। उसने दावा किया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) यह तय करता है कि पोस्ट नियमों का उल्लंघन करती है या नहीं। हालाँकि, ऑपइंडिया के पेज से जो रिपोर्ट हटाई गई थी, वही रिपोर्ट उसी तस्वीर के साथ दूसरी वेबसाइट पर आसानी से उपलब्ध थी।

सितंबर 2024 में फेसबुक ने यूजर्स को विकिपीडिया पर बनी ऑपइंडिया की 187 पन्नों की रिपोर्ट शेयर करने से रोक दिया। प्लेटफॉर्म ने इसे स्पैम बता दिया। उसने ऑपइंडिया पर व्यूज पाने के लिए भ्रामक तरीके अपनाने का आरोप लगाया। जबकि उस रिपोर्ट में न तो पेज लाइक करने की शर्त थी, न कोई धोखा देने वाला पॉप-अप था और न ही कोई छिपा हुआ लिंक था।

मार्च 2026 में मेटा ने ऑपइंडिया का एक वीडियो हटाया। यह वीडियो BBC के उस दावे को चुनौती दे रहा था, जिसमें दिल्ली में मकान ढूँढ रही एक कश्मीरी पत्रकार के साथ कथित भेदभाव की बात कही गई थी। ऑपइंडिया के मुताबिक, फेसबुक पर अपलोड होते ही इस वीडियो को चंद सेकंडों के भीतर बैन कर दिया गया।

इसके अलावा, ऑपइंडिया द्वारा खालिस्तानी संगठनों, पंजाब के उग्रवाद और खालिस्तानी आतंकवादियों से जुड़ा कंटेंट पोस्ट करने पर उसे अक्सर ब्लॉक या डिलीट कर दिया जाता है।

इन सभी घटनाओं को अगर एक साथ मिलाकर देखें, तो साफ हो जाता है कि पोस्ट का हटाया जाना, रीच कम होना और रिकमेंडेशन में जाना राजनीति से अलग नहीं है। यही चीजें तय करती हैं कि कौन सी राजनीतिक बात जनता तक पहुँचेगी और कौन सी बात लोगों तक पहुँचने से पहले ही गायब कर दी जाएगी।

मेटा के ओवरसाइट बोर्ड पर उठते सवाल

मेटा के ओवरसाइट बोर्ड की निष्पक्षता पर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं। इस बोर्ड के राजनीतिक झुकाव को लेकर लोगों के मन में गहरी चिंताएँ हैं। ऑपइंडिया ने साल 2020 में एक बड़ा खुलासा किया था। एक जाँच से पता चला कि बोर्ड के 20 में से 18 सदस्य किसी न किसी तरह जॉर्ज सोरोस की संस्था से जुड़े थे। वे सोरोस के ‘ओपन सोसाइटी फाउंडेशंस’ द्वारा फंड किए गए संगठनों के साथ काम कर चुके थे। इसके अलावा, बोर्ड सदस्य तवक्कुल करमान का नाम भी विवादों में रहा है। उनके संबंध यमन की एक ऐसी पार्टी से पाए गए, जिसे मुस्लिम ब्रदरहुड का समर्थन हासिल था।

यह काफी चिंताजनक है कि जिस बोर्ड को अलग-अलग विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करने वाला बताया गया था, उसके ज्यादातर सदस्य एक ही छोटे लिबरल इंटरनेशनल नेटवर्क से जुड़े संस्थानों से चुने गए थे। यह मुद्दा तब और ज्यादा गंभीर हो जाता है जब यही बोर्ड यह तय करने में भूमिका निभाता है कि अलग-अलग देशों में राजनीतिक बयानों, राष्ट्रवाद, अलगाववाद, इस्लामी संगठनों और सरकारी कार्यवाहियों का क्या मतलब निकाला जाए।

यह बात हैरान करने वाली है कि जिस बोर्ड को निष्पक्ष और हर तरह की सोच का प्रतिनिधि बताया गया, उसके ज्यादातर सदस्य एक ही विचारधारा के नेटवर्क से आते हैं। वे सभी एक खास लिबरल सोच वाले अंतरराष्ट्रीय समूह का हिस्सा रहे हैं। मामला तब और गंभीर हो जाता है, जब यही लोग यह फैसला करते हैं कि किस देश में क्या सही है और क्या गलत। राष्ट्रवाद, अलगाववाद, कट्टरपंथी संगठनों और सरकारों के कदमों पर फैसला यही बोर्ड लेता है। इस वजह से इसकी निष्पक्षता पर सवाल उठना लाजमी है।

जुकरबर्ग का सच: सरकारी दबाव में हटाए गए पोस्ट

मेटा के मालिक मार्क जुकरबर्ग ने खुद एक बड़ा सच स्वीकार किया। अगस्त 2024 में अमरीकी संसद को लिखे एक खत में उन्होंने यह बात मानी। उन्होंने बताया कि अमरिकी सरकार के बड़े अधिकारियों ने कोविड के समय मेटा पर भारी दबाव बनाया था। वे चाहते थे कि महामारी से जुड़े पोस्ट हटा दिए जाएँ। इस चक्कर में हल्के-फुल्के मजाक और व्यंग्य वाले पोस्ट भी डिलीट करवा दिए गए। जुकरबर्ग ने माना कि ऐसा दबाव बनाना बिल्कुल गलत था। उन्हें इस बात का अफसोस है कि मेटा उस समय इसके खिलाफ खुलकर नहीं बोला।

जुकरबर्ग का यह कबूलनामा बहुत कुछ साफ कर देता है। इससे साबित होता है कि सरकारें और नेता इन सोशल मीडिया कंपनियों पर अपना दबाव बनाते हैं। मेटा जैसी बड़ी कंपनियाँ भी इस दबाव के आगे झुक जाती हैं और अपने फैसले बदल देती हैं। यह बात किसी बाहरी आलोचक ने नहीं, बल्कि खुद मेटा के मालिक ने कही है। ऐसे में यह मान लेना बेवकूफी होगी कि फेसबुक या इंस्टाग्राम पर पोस्ट का दिखना या गायब होना सिर्फ एक कंप्यूटर कोड का निष्पक्ष खेल है।

AI से बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीर

बिग टेक की असली ताकत: बिना कहे फैलाया जाने वाला एजेंडा

मेटा को CJP के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए उससे हाथ मिलाने की कोई जरूरत नहीं है। भले ही कंपनी ने इस प्रोपेगेंडा को फैलाने का कोई सीधा आदेश न दिया हो, लेकिन उसका सिस्टम ही कुछ ऐसा बना है। यह सिस्टम उन्हीं पोस्ट्स को आगे बढ़ाता है जो लोगों को रोककर रखती हैं। इसके नियम इतने उलझे हुए हैं कि पुलिस की सख्ती वाले वीडियो अधिकार की बात बताकर फैल जाते हैं। दूसरी तरफ प्रदर्शनकारियों की हिंसा वाले वीडियो पर रोक लग जाती है। CJP के वीडियो पर गुस्से में किया गया कमेंट भी उसकी रीच बढ़ाता है। उसे देखने में बिताया गया हर एक मिनट एल्गोरिदम को वैसा ही दूसरा वीडियो दिखाने के लिए उकसाता है।

मेटा भले ही इसे ‘यूजर की पसंद’ का नाम दे, लेकिन आम इंसान के लिए यह जबरदस्ती की परोसन ही है। अगर किसी ने यह कंटेंट माँगा ही नहीं, तो उसकी फीड में यह बार-बार क्यों आ रहा है? दरअसल, यही इन बड़ी टेक कंपनियों की असली और खतरनाक ताकत है। इन्हें किसी राजनीतिक दल या आंदोलन का खुलकर समर्थन करने की जरूरत नहीं होती। ये बस अपने सिस्टम से चुपचाप तय कर देती हैं कि किसे जनता की नजरों में बनाए रखना है और किसे पूरी तरह गायब कर देना है।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है, अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

हर दिन नई माँग, हर जवाब पर नई शर्त: राहुल गाँधी ने प्रोटेस्ट के नाम पर शुरू किया प्रोपेगेंडा, अपने ‘पेपर लीक’ इतिहास का दे पाओगे जवाब?

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने सरकार के सामने तीन माँगें रखी हैं। शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा, दिल्ली में छात्रों के साथ मारपीट के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई और जवाबदेही तय हो और पीएम मोदी छात्रों से माँगी माँगें। राहुल गाँधी के इन माँगों में अंतिम दोनों माँग 22 जुलाई 2026 के प्रेस कॉन्ग्रेस में जुड़ गए हैं।

इससे पहले जब वे 21 जुलाई को पीएम आवास के सामने धरने पर बैठे थे तो उन्होंने दो माँगे रखी थीं। संसद में पेपर लीक पर चर्चा करने की माँग तो सरकार ने तुरंत मान ली थी। इसके बाद फिर दूसरी शर्त उन्होंने धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे का जोड़ दिया था। इस पर आज भी अड़े दिखे। लेकिन संसद में पेपर लीक को लेकर उनकी माँग नई फेहरिस्त से गायब दिखी। हालाँकि जब उनसे पूछा गया कि संसद में चर्चा के लिए सरकार राजी है तो उन्होंने कहा कि किस अनुच्छेद के अंतर्गत चर्चा होगी, इस पर विवाद है।

उन्होंने ये भी कहा कि लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से पेपर लीक मुद्दे पर बात की थी, लेकिन स्पीकर ने कहा कि वे सरकार से पूछ कर बताएँगे, लेकिन वे अब तक नहीं बता पाए हैं। दरअसल संसद की कार्यवाही लगातार बाधित रही है। विपक्ष ने पेपर लीक पर सदन में चर्चा और स्थगन प्रस्ताव की माँग की है, साथ ही शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा माँगा है। छात्रों के साथ मारपीट का मुद्दा भी उठाया है। सरकार पहले से ही पेपर लीक पर चर्चा के लिए तैयार है लेकिन विपक्ष नियमों के तहत चर्चा न कर लगातार हंगामा कर रहा है और कार्यवाही बाधित कर रहा है। इसलिए विपक्ष को संजीदा होने की जरूरत है, ताकि सदन चल सके और चर्चा हो सके।

राहुल गाँधी चाहते हैं कि पेपर लीक और छात्रों के साथ मारपीट के लिए प्रधानमंत्री मोदी माफी माँगें। ये वही कॉन्ग्रेस है जो आज तक आपातकाल के दौरान नेताओं को जेलों में ठूसने और जनता के मूलभूत अधिकारों को छीनने के लिए माफी नहीं माँगी है।

आपातकाल लगाने वाली राहुल गाँधी की दादी इंदिरा गाँधी ही थीं, इसके लिए कॉन्ग्रेस या गाँधी परिवार ने कभी कुछ नहीं कहा। इतना ही नहीं इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद हुए सिख दंगों में जिस तरह से सिखों का कत्लेआम किया गया, उसके लिए राहुल गाँधी ने कभी माफी नहीं माँगी।

जनता पर व्यापक बर्बरता करने वाली कॉन्ग्रेस आज प्रधानमंत्री से माफी की उम्मीद करती है और वह भी उस आंदोलन के लिए जिसमें छात्रों के नाम पर मुँह पर रुमाल बाँधे पुलिसवालों पर हमला करने वाले अराजक तत्व मौजूद थे। इनलोगों ने छात्र आंदोलन को बदनाम ही किया है।

संसद सत्र जब शुरू हो रहा हो और संसद मार्च की इजाजत इन्हें कोई सरकार नहीं दे सकती। सत्र के दौरान पूरे देश के प्रतिनिधि या यूँ कहें कि पूरा लीडरशिप, चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, वहाँ मौजूद रहता है। ऐसे में इनकी सुरक्षा को ताक पर नहीं रखा जा सकता।

10 सालों में 156 पेपर लीक हुए- राहुल गाँधी

राहुल गाँधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि पिछले 10 सालों में 152 पेपर लीक हुए और इनमें से एक में भी सजा नहीं मिली। इससे करीब 7.5 करोड़ छात्र प्रभावित हुए। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोगों का ग्रुप देश की शिक्षा व्यवस्था को बर्बाद कर रहा है और छात्रों का भविष्य अधर में लटका हुआ है।

लेकिन 2014 से पहले 2004 तक की बात करें तो कॉन्ग्रेस के शासनकाल में राष्ट्रीय और राज्य स्तर की कई महत्वपूर्ण परीक्षाओं के पेपर लीक हुए थे। इस दौरान 2004 का CBSE PMT, 2006 का AIIMS PG और 2011 की AIEEE परीक्षा, 2009 में हरियाणा शिक्षक भर्ती पेपर लीक, 2011 में यूपीपीसीएस पेपर लीक, 2012 में 6 परीक्षाओं के पेपर लीक हुए उसमें एम्स एमबीबीएस, रेलवे ग्रुप डी, तमिलनाडु पीएससी शामिल थे लेकिन कोई जिम्मेदारी तय नहीं हुई।

आज NEET के माध्यम से सभी राज्यों और केन्द्र के मेडिकल कॉलेजों में एडमिशन होता है, लेकिन उस वक्त हर राज्य और केन्द्र की परीक्षा अलग अलग होती थी और इनके पेपर लीक होते थे। मध्य प्रदेश का बहुचर्चित व्यापम घोटाला भी 2008-2013 के बीच हुआ था। इतने घोटालों के बाद भी कभी किसी शिक्षा मंत्री ने इस्तीफा नहीं दिया। किसी प्रधानमंत्री ने देश से माफी नहीं माँगी और न ही छात्रों से माफी माँगी।

इतना ही नहीं अगर राहुल गाँधी को राजस्थान में पेपर लीक को लेकर प्रियंका गाँधी ने क्या कहा था, जब कॉन्ग्रेस की सरकार थी, उसे भी सुनना चाहिए। उन्होंने कहा कि पेपर लीक पूरे देश की समस्या है। राजस्थान में इसे रोकने की कोशिश की। सीएम गहलोत ने भी की लेकिन वे सफल नहीं हो पाए।

राहुल गाँधी ने पीएम आवास के सामने धरना देने और हिरासत में लिए जाने की घटना को दरकिनार करने की कोशिश की। हालाँकि उन्होंने इस दौरान उनके मुँह से खून निकलने का जिक्र किया। लेकिन ये नहीं बताया कि प्रधानमंत्री आवास के बाहर जाकर जमावड़ा लगाने की कोशिश क्या कॉन्ग्रेस के जमाने में कभी हुई थी। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का ये धरना क्या लोकतंत्र के मूल्यों के खिलाफ नहीं है?

कपड़े फाड़े, मारा-पीटा, महिला रिपोर्टरों से की बदसलूकी: CJP के ‘संसद चलो’ प्रदर्शन में हिंसक भीड़ ने पत्रकारों को चुन-चुनकर बनाया निशाना, पढ़ें हमले की 10+ घटनाएँ

जंतर-मंतर पर पिछले डेढ़ महीने से ‘छात्र हितों’ के नाम पर धरना देकर बैठे ‘कॉकरोचों’ का असली चेहरा 20 जुलाई 2026 के ‘संसद चलो’ प्रदर्शन के वक्त सामने आ गया। इस दौरान उपद्रवियों ने न केवल सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दी, बल्कि ग्राउंड जीरों पर सच दिखाने पहुँचे पत्रकारों को चुन-चुनकर निशाना भी बनाया।

कथित ‘प्रदर्शनकारियों’ में शायद इस बात का डर था कि जमीन पर मौजूद मीडियाकर्मी उनकी हकीकत देश के सामने ले आएँगे, इसलिए अपनी विचारधारा से अलग सवाल पूछने या तथ्यों पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को चुन-चुनकर निशाना बना लिया गया।

20 और 21 जुलाई से सोशल मीडिया पर लगातार ऐसे वीडियो सामने आ रहे हैं, जो CJP के प्रदर्शन में ग्राउंड रिपोर्टिंग करने गए पत्रकारों के साथ हुई बर्बरता को उजागर करते हैं। कहीं रिपोर्टरों को उग्र भीड़ बीच सड़क पर घेरकर धक्के दे रही है, तो कहीं उनके साथ मारपीट की जा रही है।

महिला पत्रकारों के साथ भी बदसलूकी और खींचतान की तस्वीरें सामने आई हैं। जो भी पत्रकार अपनी ड्यूटी निभाने वहाँ पहुँचा, उसे ‘गोदी मीडिया’ का टैग देकर डराने, रोकने और हाथापाई करने की कोशिश की गई- यहाँ तक कि उनके कपड़े फाड़े गए और चश्मे-कैमरे तक तोड़ दिए गए।

आइए आपको कम से कम ऐसी 10 घटनाओं के बारे में बताते हैं, जिनसे पता चले कि CJP प्रदर्शन के दौरान कवरेज करने गए पत्रकारों के साथ कैसे बर्बरता हुई।

ऑपइंडिया के अनुराग मिश्रा पर बार-बार हमले

ऑपइंडिया के निर्भीक पत्रकार अनुराग मिश्रा को इस प्रदर्शन की रिपोर्टिंग के दौरान बार-बार निशाना बनाया गया। 18 जुलाई को जब अनुराग जंतर-मंतर पर सामान्य सवाल पूछ रहे थे, तब भीड़ ने उन्हें घेरकर हाथापाई की। इसके बाद जब 20 जुलाई को ‘संसद चलो’ प्रदर्शन के दौरान उपद्रवियों ने उन्हें दोबारा निशाना बनाया और ‘गोदी मीडिया’ का कहकर, उन पर दोबारा हिंसक हमला किया।

Times Now के देव कोटक की शर्ट फाड़ी, चश्मा तोड़कर चेहरे पर मारा

टाइम्स नाऊ के रिपोर्टर देव कोटक पर हुआ हमला इस हिंसक भीड़ की क्रूरता को बयाँ करता है। अभिजीत दीपके का इंटरव्यू लेने जंतर-मंतर पहुँचे देव पर ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारों के बीच अचानक चारों तरफ से लात-घूँसे, मुक्के और बोतलें बरसाई गईं। धक्का देकर उन्हें जमीन पर गिरा दिया गया, उनकी शर्ट फाड़ दी गई और घड़ी व मोबाइल छीन लिया गया। जब देव ने चिल्लाकर कहा कि चश्मे को न छुआ जाए, उन्हें उसके बिना धुंधला दिखता है, तो उपद्रवियों ने उनका चश्मा छीनकर तोड़ दिया और उसी टूटे चश्मे से उनके मुँह पर वार किया।

एबीपी न्यूज के वरुण भसीन और मीडिया गाड़ियों पर पथराव

अनुराग और देव की तरह ही एबीपी न्यूज के रिपोर्टर वरुण भसीन के साथ भी बदसलूकी हुई। रिपोर्टिंग के दौरान प्रदर्शनकारियों के झुंड ने घेरकर नारेबाजी की। वरुण ने अपनी आपबीती में बताया कि आंदोलन में शामिल युवा पूरी तरह हिंसक हो चुके थे। वे न केवल पत्रकारों को डरा रहे थे, बल्कि मीडिया की गाड़ियों पर पथराव कर रहे थे और कैमरे तोड़ने की फिराक में थे। सामने आई वीडियो में भीड़ को उनका पीछा करते हुए, उनपर स्प्रे मारते हुए देखा जा सकता है।

ऑपइंडिया की रितिका चंडोला को निशाना बनाया

महिला पत्रकारों के साथ इस भीड़ का रवैया बेहद शर्मनाक रहा। ऑपइंडिया की महिला पत्रकार रितिका चंडोला ने जब ग्राउंड पर जाकर शिक्षा के नाम पर शुरू हुए इस प्रदर्शन में छिपी गंदी राजनीति और ‘ब्राह्मणवाद’ के खिलाफ लग रहे नारों पर सहजता से सवाल पूछे, तो जय भीम का नारेबाजी करने वाले आंदोलनकारी बौखला गए। तर्क का जवाब तर्क से देने के बजाय रितिका पर ‘गोदी मीडिया’ का टैग लगाकर उन्हें चुप कराने और डराने का प्रयास किया गया।

बैंक में छिपकर ज्योति मिश्रा ने बचाई जान, शेफाली निगम से भी बदसलूकी

टाइम्स नाऊ की ज्योति मिश्रा जब जनता की बात दिखाने पहुँचीं, तो उग्र भीड़ उनके पीछे पड़ गई। मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने भांप लिया कि अगर ज्योति का सिर दिखा तो भीड़ पत्थर मारकर उनकी जान ले सकती है।

ज्योति को अपनी जान बचाने के लिए एक पास के बैंक में शरण लेनी पड़ी। बैंक कर्मी के अनुसार, हमलावरों की संख्या एक हजार से अधिक थी, जिन्होंने बैंक के अंदर घुसकर हमला करने की कोशिश की।

इसी तरह शेफाली निगम को भी प्रदर्शनकारियों द्वारा बदसलूकी करने का मामला सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि भीड़ पीछे से आकर शेफाली को घेरती है और फिर पीछे से मारा जाता है।

2 महिला पत्रकारों के साथ खींचतान और छेड़छाड़

सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक और वीडियो में दो महिला पत्रकारों को भीड़ द्वारा घेरकर उनके साथ बदसलूकी हो रही है। दोनों पत्रकार भड़की हुई हैं। वह भीड़ से सवाल करती हैं, लेकिन उग्र भीड़ उन पर शारीरिक रूप से हावी होने लगती है और लोग उन्हें ज़बरदस्ती घसीटने लगते हैं। घटना की वीडियो हर जगह वायरल है।

NDTV पत्रकार को रिपोर्टिंग से रोका

प्रदर्शन के दौरान भीड़ इस कदर पत्रकारों पर हावी थी कि उन्होंने एनडीटीवी की महिला पत्रकार को भी बख्शा नहीं। लाइव कवरेज के दौरान भीड़ उनके पीछे खड़े होकर ‘गोदी मीडिया’ के नारे लगाती रही और उन्हें बोलने तक नहीं दिया। सोशल मीडिया पर इस हरकत को यह कहकर जायज ठहराया गया कि ‘एनडीटीवी को अडानी ने खरीद लिया है’।

NDTV के रवीश रंजन शुक्ला के साथ भी बदसलूकी

वरिष्ठ पत्रकार रवीश रंजन शुक्ला को भी इस उग्र भीड़ ने बख्शा नहीं। सोशल मीडिया पर आए वीडियो में दिखा कि रवीश सड़क पर बैठे हुए थे और चारों तरफ से भीड़ उन पर चीखते हुए ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारे लगा रही थी तथा उनसे तेज आवाज में ये पूछा जा रहा था कि इतने दिन से वो लोग प्रोटेस्ट कवर करने क्यों नहीं आ रहे थे।

सोशल मीडिया पर रवीश रंजन की वीडियो देख लोगों ने कहा कि ये सब सिर्फ इसलिए हुआ क्योंकि उनके हाथ में एनडीटीवी का माइक था, जिसे अडाणी ग्रुप खरीद चुका है।

न्यूज 24 के राजीव रंजन की रिपोर्टिंग में अड़ंगा

न्यूज 24 के जाने-माने रिपोर्टर राजीव रंजन को छात्रों ने घेरकर ‘गोदी मीडिया वापस जाओ’ के नारे लगाए और उनका मज़ाक उड़ाया। हालाँकि, राजीव पीछे नहीं हटे, उन्होंने अपने कैमरामैन के साथ डटकर खड़े रहकर पूरी घटना और भीड़ की गुंडागर्दी को कैमरे में कैद किया।

गौरतलब हो कि 10+ घटनाएँ केवल चंद मामले हैं जिनकी वीडियोज वायरल हुईं, वरना जैसा पैटर्न इन पत्रकारों के साथ किए गए दुर्व्यवहार के वक्त दिख रहा है, उससे साफ है कि वहाँ सवाल पूछने वाले हर पत्रकार से भीड़ ने ऐसा ही बर्ताव किया होगा।

खबर है कि बिहार के पटना में भी छात्रों के नाम पर प्रदर्शन करने उतरी हिंसक भीड़ ने पत्रकारों को निशाना बनाया है।

पत्रकारों पर हमले की घटना पर एडिटर्स गिल्ड की चुप्पी

दुखद और शर्मनाक बात यह है कि इन घटनाओं को लेकर वो ‘एडिटर्स गिल्ड’ और वामपंथी धड़ा दिन-रात एकदम मौन है, जो समय-समय पर ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ और मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर ढोल पीटता है, लेकिन इन घटनाओं पर उससे कुछ नहीं बोला जा रहा- शायद इनके लिए पत्रकारों का अर्थ सिर्फ वामपंथी ईकोसिस्टम है। (खबर लिखने तक एडिटर गिल्ड की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।)

आरफा खानुम शेरवानी जैसी तथाकथित पत्रकार इन हमलों की निंदा करने के बजाय पत्रकारों की ही निंदा पर उतर आई हैं और पत्रकारों के साथ हुई मारपीट को जायज ठहरा रही हैं। वहीं, द हिंदू की विजेता सिंह जैसे लोग नफरत का बचाव करते हुए उलटे पत्रकारों पर ही ‘घृणा फैलाने’ का आरोप मढ़ रहे हैं।

वामपंथियों की ये समस्या पुरानी है कि जब उनके अनुकूल बात नहीं होती तो वो ऐसा ही रवैया अपनाते हैं। इस बार सीजेपी प्रदर्शन में यही देखने को मिला। उन पत्रकारों को जमकर एंट्री दी गई जो सीजेपी नैरेटिव को आगे बढ़ाने वाले लग रहे थे। वहीं राष्ट्रवादी मुद्दों की बात करने वाले पत्रकार, इन्फ्लुएंसर को भगाने का, धमकाने का खूब काम हुआ। 20-21 जुलाई के बाद सामने आई आंदोलन की तस्वीरों ने साफ कर दिया है कि यह विरोध प्रदर्शन किसी हक की लड़ाई नहीं, बल्कि वामपंथी नफरत और अराजकता का प्रायोजित खेल है।

अध्यात्म का रचा ढोंग, सनातन का उठाया फायदा और अब हिंदू धर्म को बक रही गाली: जानिए कौन है ‘Mana’ उर्फ ओमाना, जो CJP प्रदर्शन में पुलिस पर हमले के लिए दे रही भड़काऊ बयान

ऋषिकेश की पवित्र गंगा नदी के किनारे ‘योगी’ और ‘एस्ट्रोलॉजर’ बनकर ज्ञान बाँटने वाली ओमाना (Mana) का असली चेहरा अब धीरे-धीरे लोगों के सामने आ रहा है। जो महिला कल तक यूट्यूब पर माता लक्ष्मी, सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति का गुणगान करके लाखों फॉलोअर्स और फेम बटोरती थी, आज वही सोशल मीडिया पर बैठकर ‘हिंदू धर्म में क्यों पैदा हुई’ का रो-रोकर नाटक कर रही है।

ओमाना ने एक Video जारी कर खुलकर कहा, “मुझे हिंदू होने पर शर्म आ रही है, हिंदू धर्म में पैदा होना मेरा बहुत बड़ा पाप था।” इतना ही नहीं, ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के हिंसक प्रदर्शन के दौरान ओमाना खुद सड़कों पर उतरकर पुलिस और प्रशासन के खिलाफ भड़काऊ बातें करती और लोगों को हिंसा के लिए उकसाती नजर आई है।

कौन है ओमाना: बिजनेस, फिल्म मेकिंग और अध्यात्म का घालमेल

ओमाना (Mana) खुद को एक मल्टी-डायमेंशनल पर्सनैलिटी, स्पिरिचुअल मेंटॉर और बिजनेसमैन बताती है। वह उत्तराखंड के ऋषिकेश में हिमालय की तलहटी में गंगा नदी के किनारे एक बड़ा मेडिटेशन सेंटर चलाती है। उसने अपनी लाइफस्टाइल को इस तरह पेश किया है जैसे वह गृहस्थ और साधक के बीच का संतुलन बनाकर जी रही हो।

पढ़ाई और करियर के मामले में ओमाना के पास डिग्रियों की लंबी सूची है। उसने बिजनेस कम्यूनिकेशन में काम किया, एमबीए (MBA) में गोल्ड मेडल हासिल किया और निफ्ट (NIFT) परीक्षा पास कर आर्किटेक्चरल डिजाइनिंग और रियल एस्टेट डेवलपमेंट का काम शुरू किया।

इसके बाद उसने अमेरिका के लॉस एंजिल्स स्थित मशहूर यूनिवर्सिटी UCLA से फिल्म मेकिंग और डायरेक्शन की पढ़ाई की। उसने एक्टिंग और कथक डांस में भी हाथ आजमाया और कोविड काल के दौरान एक हेल्थकेयर कंपनी चलाकर आरटी-पीसीआर (RT-PCR) किट के रेट घटाने का दावा किया।

ओमाना (Mana) ने अपने ज्ञान, फिल्म मेकिंग की कला और एक्टिंग का इस्तेमाल सोशल मीडिया पर अपनी ‘गुरु’ वाली इमेज बनाने के लिए किया। वह इंस्टाग्राम पर ‘aumanafoundation‘ हैंडल चलाती है, जहाँ उसके 4 लाख 8 हजार से ज्यादा फॉलोअर्स हैं। उसने अपने बायो में ‘जय माँ दुर्गा, जय माँ काली, जय भैरव बाबा’ लिख रखा है ताकि लोग उसे विशुद्ध सनातनी समझें।

इसके अलावा ओमाना के फेसबुक पर उसके 13 हजार से ज्यादा फॉलोअर्स हैं। यूट्यूब पर वह दो चैनल चलाती है- ‘MANA‘ (अंग्रेजी में 41.4K सब्सक्राइबर्स) और ‘Mana Hindi‘ (35.4K सब्सक्राइबर्स)। उसने ‘rulesofdharma.com’ वेबसाइट बनाई है और ‘Rules of Lakshmi: The Blueprint of Abundance’ नाम से ई-बुक भी बेची है। ओमाना के माता लक्ष्मी पर बनाए गए नियमों को देश के बड़े FM रेडियो चैनल 93.5 FM पर भी जगह मिली थी।

यूट्यूब पर हिंदू देवी-देवताओं का गुणगान करके बनाई पहचान

यूट्यूब पर ओमाना के दोनों चैनलों को खंगालने पर पता चलता है कि उसने अपनी पूरी पहचान सनातन धर्म का सहारा लेकर बनाई है। उसने माता लक्ष्मी से जुड़े पवित्र नियमों, धन-समृद्धि पाने के उपायों, वैदिक परंपराओं और भारतीय संस्कृति पर सैकड़ों वीडियो बनाए। उसने हर वीडियो में यही दिखाया कि वह भारत को फिर से समृद्ध और ज्ञानी बनाने के मिशन पर निकली है।

उसके पुराने Videos में वह पर्यावरण बचाने की बात करती थी और कहती थी, “मोदी जी आपको हमने नारायण के रूप में चुना है, हमें बड़ी सड़कें नहीं बल्कि पेड़ और पशु चाहिए।” उसने लोगों को आकर्षित करने के लिए खुद को एक सनातनी विजनरी के रूप में स्थापित किया और लोगों के बीच में अपनी गहरी पैठ बनाई।

अचानक बदला पैंतरा: रोते हुए वीडियो में कहा- ‘हिंदू होना बहुत बड़ा पाप है’

जैसे ही ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के प्रदर्शन में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव बढ़ा, ओमाना का असली एजेंडा बाहर आ गया। उसने कैमरे के सामने मगरमच्छ के आँसू बहाते हुए 4 मिनट से ज्यादा का एक ड्रामा वीडियो रिकॉर्ड किया। इस वीडियो में उसने सीधे सनातन धर्म और हिंदू समाज पर हमला बोला।

वीडियो में ओमाना कहती है, “हिंदू होना बहुत बुरा है। हिंदू देश में हिंदुओं के बच्चों को पीटा जा रहा है। मैं हिंदू नहीं हूँ, मुझसे बहुत बड़ा पाप हो गया जो मैं इस देश में हिंदू बनकर पैदा हुई। मैं सोचती थी कि भारत में पैदा होना मेरे अच्छे कर्मों का फल है, लेकिन अब मुझे शर्म आ रही है।” उसने लोगों को सलाह दी कि महिलाएँ बच्चों को जन्म न दें, क्योंकि भारत में रहना और पैदा होना पाप है।

CJP के प्रदर्शन में उग्र रूप: दिल्ली पुलिस के जवानों पर हमला करने के लिए उकसा रही

एक तरफ सोशल मीडिया पर ओमाना ‘अहिंसा और शांति’ का नाटक कर रही थी, तो दूसरी तरफ ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के प्रदर्शन में उसका हिंसक और उग्र रूप कैमरे में सामने आया। वह भीड़ के बीच खड़ी होकर गंदी-गंदी गालियाँ दे रही थी और प्रदर्शनकारियों को कानून-व्यवस्था तोड़ने के लिए उकसा रही थी।

सामने आए वीडियो में ओमाना खुलेआम चिल्लाती है, “ये क्या चल रहा है? हम इन्हें जान से मारने जा रहे हैं, वर्दी पहन ली तो क्या खुद को पुलिस समझेंगे? मैं तुमसे कह रही हूँ कि जाकर इन्हें मारो, इनके लोगों को जाकर पीटो!” ये है ओमाना की भाषा, जो प्रदर्शनकारियों को शांति का पाठ नहीं, बल्कि हिंसा करना सीखा रही है। किसी को जीवनदान देना नहीं, बल्कि पुलिस के परिवार पर हमला करना सीखा रही है, भाषा में शुद्धता नहीं, बल्कि जहर घोलने जैसे बू आ रही है। छात्रों के हाथों में पुस्तकें नहीं बल्कि लाठी-डंडों के सहारे आगे बढ़ना सीखा रही है। पढ़ लिखकर भविष्य को उज्जवल बनाने की सीख ना देकर, ओमाना अनपढ़ और अंगूठा छाप रहकर सत्ता पर कैसे कब्जा किया जाता है वो सीखा रही है। अपनी छवि चमकाने के लिए ओमाना कुछ भी कर सकती है…

ओमाना के दो चेहरों की तुलना करें तो उसका दोगलापन साफ दिखाई देता है। 11 जुलाई 2026 को अपने चैनल ‘4Mana Talks’ पर पोस्ट किए गए वीडियो में वह अध्यात्म का ज्ञान छाँटते हुए कहती है कि ‘ईश्वर का कोई धर्म नहीं होता, आध्यात्मिकता धर्म से परे है।’ लेकिन असल जिंदगी में वह सीधे हिंदू धर्म को कटघरे में खड़ा कर देती है।

ऋषिकेश में आश्रम चलाकर, तंत्र-मंत्र और एस्ट्रोलॉजी के नाम पर लोगों से पैसे कमाने वाली ओमाना अब अचानक देश और धर्म विरोधी ताकतों की जुबान बोलने लगी है। जब तक सनातन धर्म से फेम और डॉलर मिल रहे थे, तब तक वह ‘माँ दुर्गा और काली’ की भक्त बनी रही, लेकिन मौका मिलते ही उसने पूरे सनातन धर्म को गालियाँ देना शुरू कर दिया।

ड्रामा क्वीन ओमाना का पाखंड

अरे ओमाना मैडम… लॉस एंजिल्स (UCLA) से फिल्म मेकिंग और डायरेक्शन की पढ़ाई क्या इसीलिए करके आई थीं कि ऋषिकेश के पवित्र गंगा तट पर बैठकर ‘अध्यात्म का घटिया नाटक’ रच सकें? वाह रे आपका ढोंग! जब तक यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर माता लक्ष्मी के फर्जी नियम और एस्ट्रोलॉजी का चूर्ण बेचकर धंधा चमक रहा था, तब तक यह देश, यह सनातन धर्म और यहाँ के देवी-देवता आपके लिए बहुत महान थे। आपने अपनी पूरी दुकान ही ‘जय माँ दुर्गा’ और ‘जय माँ काली’ का बोर्ड लगाकर सजाई थी।

लेकिन जैसे ही जंतर-मंतर पर आपकी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के उपद्रवियों का भांडा फूटा, आपकी एक्टिंग का लेवल तो सीधे ऑस्कर के लायक हो गया। कैमरे के आगे बैठकर मगरमच्छ के आँसू बहाते हुए कहती हैं, “मुझे हिंदू होने पर शर्म आती है।” अरे मैडम, शर्म तो इस देश के लोगों को आ रही है कि उन्होंने आप जैसी बहरूपिया और ढोंगी महिला को सिर पर बिठाया।

एक तरफ कैमरे के सामने बैठकर ‘बेचारी माँ’ बनने की नौटंकी करती हो और कहती हो कि ‘मेरा दिल रो रहा है’, और दूसरी तरफ सड़कों पर उतरकर लफंगों की तरह गालियाँ बकती हो? खुलेआम भीड़ से कहती हो, “जाओ पुलिस वालों को मारो, इन्हें जान से मार दो!” क्या यही सिखाया है आपको UCLA के डायरेक्शन ने?

आपकी यह दोमुंही चाल अब पूरी तरह एक्सपोज हो चुकी है। एक तरफ अध्यात्म बेचकर नोट छापना और दूसरी तरफ मौका मिलते ही उसी हिंदू धर्म को गाली देना जिसने आपको पहचान दी… यह दोगलापन लोगों के सामने आ चुका है।

पंजाब फार्मेसी भर्ती परीक्षा में गड़बड़ी, पेन से स्कैन कर बाहर भेजे गए पेपर: उम्मीदवारों से ₹35 लाख तक वसूले, दिल्ली में हंगामा कर रही AAP ने साधी चुप्पी; जानें- कैसे खुला पूरा खेल

आम आदमी पार्टी के नेता नीट पेपर लीक मामले को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को हाईजैक करने की कोशिश में लगे हैं। संसद मार्च के दौरान पूर्व सीएम आतिशी सिंह, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह समेत कई नेता पुलिस की बैरिकेटिंग फाँद कर आंदोलनकारियों को उकसाते नजर आए। उसी आम आदमी पार्टी की पंजाब सरकार की नाक के नीचे सरकारी फार्मा अधिकारी की नियुक्ति के लिए हुई परीक्षा में हाई टेक चीटिंग हुई है। ये परीक्षा 19 जुलाई 2026 को फरीदकोट, कोटकपुरा और फिरोजपुर में आयोजित की गई थी।

आम आदमी पार्टी की पूर्व नेता और राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल ने सीएम भगवंत मान और तथाकथित ‘सुपर सीएम’ अरविंद केजरीवाल को चीटिंग को लेकर जमकर लताड़ा है। उन्होंने कहा कि केजरीवाल भारत को नेपाल बनाने में बिजी हैं और जेन जी को दिल्ली में उकसा रहे हैं। सोशल मीडिया एक्स पर उन्होंने वीडियो भी शेयर किया है।

उन्होंने कहा कि पंजाब में फार्मेसी अधिकारी भर्ती परीक्षा में बड़ा घोटाला सामने आया है, हजारों छात्रों का भविष्य बर्बाद हो रहा है। कई छात्र पेन कैमरा और ब्लूट्रूथ का इस्तेमाल करते पकड़े गए। लाखों रुपए लेकर बच्चों को परीक्षा पास कराई जा रही है।

उन्होंने आगे कहा कि इन युवकों को हमारी आवाज की जरूरत है क्योंकि न तो भगवंत मान इसे सुन पा रहे हैं और न ही अरविंद केजरीवाल। उन्होने कहा कि शिक्षा में इतना बड़ा घोटाला हुआ है, लेकिन जवाबदेही किसी की नहीं?

इस मामले में अब तक पैंतीस लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इनमें सात मुख्य साजिशकर्ता और 28 उम्मीदवार शामिल हैं। आरोप है कि इनलोगों ने पगड़ी, मोजे और अंडरवेयर के अंदर छोटे ब्लूटूथ उपकरण छिपा कर रखे थे और उनका इस्तेमाल कर रहे थे।

दरअसल ये पेपर लीक पारंपरिक तरीके से नहीं बल्कि हाईटेक तरीके से किया गया था। उम्मीदवारों ने हिडन पेन कैमरे, ब्लूट्रूथ और माइक्रो ईयरपीस का इस्तेमाल किया। पुलिस ने नकल के लिए कथित तौर पर इस्तेमाल किए गए 27 बैटरी से चलने वाले वायरलेस उपकरण भी उम्मीदवारों के पास से जब्त किए हैं।

पंजाब के फार्मेसी परीक्षा में संगठित नकल का मामला

यह परीक्षा पंजाब सरकार में फार्मासिस्ट और फार्मा अधिकारी की भर्ती के लिए आयोजित की गई थी। परीक्षा का आयोजन बाबा फरीद यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंस यानी BFUHS ने किया था। परीक्षा के पेपर लीक में अंतरराज्यीय रैकेट के होने का पता चला है। पुलिस ने पंजाब, हरियाणा और राजस्थान से इस गिरोह के सात प्रमुख सदस्यों को गिरफ्तार किया है। गिरोह के बाकी सदस्यों को पकड़ने के लिए छापेमारी की जा रही है। राज्य सरकार ने अब तक इस परीक्षा को रद्द नहीं किया है।

ये परीक्षा 25 परीक्षा केंद्रों पर आयोजित की गई थी। ये केंद्र तीन शहरों- फरीदकोट, कोटकपुरा और फिरोजपुर में थे। फार्मेसी अधिकारी के 454 पदों के लिए कुल 7000 उम्मीदवारों ने हिस्सा लिया था। यह परीक्षा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के कहने पर बीएफयूएचएस ने आयोजित किया था।

परीक्षा के दौरान विश्वविद्यालय ने फरीदकोट, कोटकापुरा और फिरोजपुर के 18 परीक्षा केंद्रों का निरीक्षण करने के लिए हवाई दस्ते तैनात किए। इन हवाई दस्तों ने ही इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का पता लगाया। कई उम्मीदवारों के पास एक जैसे उपकरण मिले। इससे अंदाज लगाया गया कि जरूर इसके पीछे संगठित धोखाधड़ी गिरोह संलिप्त है।पूरी परीक्षा 100 अंकों की है, जिसमे लिखित परीक्षा 90 और व्यावसायिक अनुभव के लिए 10 अंक निर्धारित हैं।

फिरोजपुर में पेन कैमरे से फोटो खींच व्हाट्सएप से भेजा भिवानी

जाँच में सामने आया है कि फिरोजपुर के एक सेंटर में परीक्षा दे रहे आयुष ने कथित तौर पर एक गुप्त पेन कैमरे से प्रश्न पत्र को स्कैन किया और व्हाट्सएप के जरिए हरियाणा के भिवानी में मौजूद अपने साथी साजन को भेजा। साजन ने कथित तौर पर प्रश्न के उत्तर तैयार करवाए और एक दूसरे सहयोगी दीपक को भेजा।

फरीदकोट के सोसाइटी नगर में गुरमीत सिंह के आवास को गिरोह ने अस्थाई नियंत्रण कक्ष बना रखा था, वहीं दीपक मौजूद था। वहाँ से मुख्य आरोपी मनजीत सिंह और दीपक ने कथित तौर पर वायरलेस के माध्यम से परीक्षा हॉल में मौजूद कई उम्मीदवारों को सारे सवालों के जवाब उपलब्ध कराए।

आरोप है कि यह गिरोह कॉरपोरेट स्तर की व्यवस्थाओं के साथ काम करता था और परीक्षा में सफलता की गारंटी देते हुए उम्मीदवारों से 35 लाख रुपए से लेकर 13 लाख रुपए तक की भारी रकम वसूलता था। कई उम्मीदवारों ने गिरोह के सदस्यों ने पोस्ट-डेटेड चेक ले रखा था।

पंजाब पुलिस ने अपने बयान में कहा है कि जाँच में प्रश्नपत्र लीक होने या किसी अधिकारी की संलिप्तता का कोई सबूत नहीं मिला है। बयान में कहा गया है, “परीक्षा शुरू होने के तुरंत बाद यह घटना घटी। प्रारंभिक जाँच में पता चला है कि इस धोखाधड़ी का मास्टरमाइंड फाजिल्का स्थित संत कबीर पॉलिटेक्निक कॉलेज का कर्मचारी गुरमीत सिंह था।”

बयान में आगे कहा गया है, “19 जुलाई को परीक्षा के दिन सुबह सुबह कई ऑपरेटिव फरीदकोट-कोटकापुरा रोड पर मौजूद एक होटल में जमा हुए और उन्होंने उम्मीदवारों को विशेष बैटरी से चलने वाले वायरलेस माइक्रो-डिवाइस दिए।”

फरीदकोट और फिरोजपुर में इन उपकरणों का इस्तेमाल करने के आरोप में कुल 28 उम्मीदवारों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से 27 के पास से एक जैसे वायरलेस बरामद किए गए।

हालाँकि परीक्षा में संलिप्तता के आरोप में अब तक किसी अधिकारी की गिरफ्तारी नहीं हुई है, लेकिन मामले पर आम आदमी पार्टी ने चुप्पी साध रखी है। इसका शिरोमणि अकील दल ने भी विरोध किया है। उन्होंने पंजाब अधीनस्थ सेवा चयन बोर्ड द्वारा आयोजित परीक्षाओं में धाँधली का भी आरोप लगाया और कहा कि भगवंत मान सरकार पेपर लीक पर एक्शन लेने और नकल गिरोह की लगाम कसने में नाकाम रही है।

पंजाब एकमात्र राज्य है जहाँ आम आदमी पार्टी की सरकार है। आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी ने अपनी पूरी ताकत यहाँ झोंक दी है। ऐसे में राज्य में हुए इस भर्ती घोटाले पर साधी गई चुप्पी पर स्वाति मालीवाल ने टिप्पणी की है, क्योंकि अरविंद केजरीवाल समेत पूरी पार्टी दिल्ली में खोई हुई अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं। यही वजह है कि पंजाब में पेपर लीक इन्हें दिखाई नहीं दे रहा है और नीट यूजी 2026 परीक्षा रद्द होने के बाद रिनीट होने और रिजल्ट आने के बाद भी ये छात्रों को उकसाने में लगे हुए हैं।

किसी को बेल मिली तो घर नहीं जा सका, कोई अब तक जेल में… संसद की सुरक्षा में सेंधमारी को सामान्य बनाना चाह रहे कॉकरोच, युवा समझें- भड़कावे में आने का क्या होता है अंजाम

किसी भी देश का भविष्य उसके युवाओं के कंधों पर टिका होता है। युवाओं की सोच, उनका जोश और उनकी वैचारिक शक्ति ही समाज को नई दिशा देती है। लेकिन जब इसी जोश को कुछ असमाजिक तत्व, अवसरवादी राजनीतिक दल और वामपंथी तंत्र अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करने लगते हैं, तो नतीजा केवल तबाही होता है।

आज युवाओं के मन में असंतोष का जहर इस कदर घोला जा रहा है कि वे कानून तोड़ने, संस्थाओं पर हमला करने और उपद्रव मचाने को ‘क्रांति’ समझने की भूल कर बैठते हैं। युवाओं को यह समझने की सख्त जरूरत है कि सोशल मीडिया के जरिए या सड़कों पर जो लोग उन्हें व्यवस्था के खिलाफ उकसाते हैं, वे वास्तव में उनका इस्तेमाल केवल मोहरे की तरह करते हैं।

संसद की सुरक्षा में हुई सेंधमारी से लेकर हाल ही में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के उग्र विरोध प्रदर्शनों तक, हर जगह यही पैटर्न देखने को मिल रहा है। जब तक युवा सड़कों पर नारा लगाते हैं, तब तक वे इन आकाओं के काम आते हैं। लेकिन जैसे ही उन पर पुलिस की लाठी गिरती है, जेल के दरवाजे खुलते हैं और भविष्य दांव पर लगता है, तब उकसाने वाले तमाम लोग गायब हो जाते हैं।

संसद की सुरक्षा में सेंध: एक साजिश जिसे सामान्य बनाने की हुई कोशिश

13 दिसंबर 2023 की तारीख देश के इतिहास में एक काले दिन की तरह दर्ज है। 2001 के संसद आतंकी हमले की 22वीं बरसी पर सागर शर्मा और मनोरंजन डी नाम के दो युवक मैसूर के सांसद से जारी पास के आधार पर लोकसभा की दर्शक दीर्घा में पहुँचे। दोपहर ठीक 1 बजकर 1 मिनट पर वे सदन के भीतर कूद गए। उन्होंने अपने जूतों में छिपाकर रखे स्मोक कनस्तर से पीला धुआँ फैलाया और नारेबाजी की। उसी समय संसद परिसर के बाहर नीलम आजाद और अमोल शिंदे ने भी रंगीन धुआँ छोड़कर उपद्रव किया।

जो युवा उकसावे में आकर यह सोचते हैं कि वे जेल जाकर रातों-रात हीरो बन जाएँगे, उन्हें अदालत की शर्तों और हकीकत को देखना चाहिए। जब दिल्ली हाई कोर्ट से नीलम आजाद को जमानत मिली, तो उस पर सख्त पाबंदियाँ लगाई गईं। कोर्ट का स्पष्ट आदेश था कि वह मीडिया या सोशल मीडिया पर कोई बयान नहीं दे सकती, जाँच एजेंसी के सामने नियमित पेश होगी और बिना अनुमति दिल्ली से बाहर नहीं जाएगी। 2 जुलाई 2025 को जाकर कोर्ट ने शर्तों में ढील दी और उसे अपने गृह जिले हरियाणा के जींद जाने की अनुमति मिली।

इस केस में उन पर गंभीर धाराएँ लगाईं गईं, UAPA सहित कई प्रावधानों के तहत मामला दर्ज हुआ, लंबी पूछताछ हुई, चार्जशीट दाखिल हुई और महीनों तक अदालतों में जमानत के लिए लड़ाई चलती रही। आज भी वह मामला पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। उस समय सोशल मीडिया पर क्रांति के गीत गाने वाले अधिकांश लोग अब उस बहस में दिखाई नहीं देते, लेकिन जिन युवाओं ने वह कदम उठाया, वे अब भी कानूनी प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं। यही लोकतंत्र की वास्तविकता है- नारे कुछ मिनट चलते हैं, मुकदमे कई वर्षों तक।

भाषण कोई देता है, भविष्य किसी और का बिगड़ता है

भारत में शायद ही कोई बड़ा आंदोलन ऐसा रहा हो जिसमें सबसे बड़ा कानूनी बोझ नेताओं ने उठाया हो। मंच से जोश भरे भाषण देने वाले नेता कैमरे बंद होने के बाद अपनी राजनीतिक यात्रा पर आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन जिस छात्र ने बैरिकेड पार किया, जिसने पुलिस से धक्का-मुक्की की या जिसने भावनाओं में आकर कानून की सीमा लांघ दी, वही FIR में नामित होता है। वही अदालतों के चक्कर लगाता है, वही नौकरी के इंटरव्यू में अपने खिलाफ दर्ज मामलों का जवाब देता है, वही वर्षों तक जमानत और सुनवाई के बीच उलझा रहता है।

राजनीति में यह पैटर्न नया नहीं है, लेकिन सोशल मीडिया के दौर में यह और खतरनाक हो गया है। अब किसी युवा को ‘क्रांतिकारी’ घोषित करने में कुछ मिनट लगते हैं, लेकिन जब वही युवा कानूनी संकट में फँसता है तो उसकी मदद के लिए न सोशल मीडिया की भीड़ आती है और न मंच से भाषण देने वाले नेता। अदालत में लाइक्स और रीट्वीट नहीं चलते, वहाँ केवल कानून चलता है।

लोकतंत्र विरोध की आजादी देता है, लेकिन संस्थाओं पर दबाव बनाने की छूट नहीं

सरकार की आलोचना लोकतंत्र का आधार है। शिक्षा, रोजगार, पेपर लीक, भ्रष्टाचार या किसी भी सार्वजनिक मुद्दे पर आंदोलन करना नागरिकों का अधिकार है। लेकिन संसद की ओर बढ़ना, प्रतिबंधित क्षेत्र को राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का मंच बना देना या यह संदेश देना कि संसद तक पहुँच जाना ही संघर्ष की अंतिम मंजिल है, लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है। संसद केवल सांसदों की इमारत नहीं, बल्कि भारत की सर्वोच्च विधायी संस्था है।

2001 के आतंकी हमले के बाद इसकी सुरक्षा व्यवस्था इसलिए कठोर बनाई गई थी क्योंकि यह केवल एक भवन नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न भी है। यदि आज किसी एक आंदोलन के लिए संसद की सुरक्षा को चुनौती देना सामान्य बना दिया जाएगा, तो कल दूसरा संगठन भी यही करेगा और परसों तीसरा भी। इसका परिणाम यह होगा कि हर प्रदर्शन को सुरक्षा एजेंसियाँ संभावित खतरे की तरह देखेंगी और अंत में नुकसान शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आंदोलनों का ही होगा।

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का प्रोटेस्ट: वही पुराना मोहरा बनाने का खेल

संसद की सेंधमारी का मामला हो या फिर सड़कों पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा किए जा रहे उग्र प्रदर्शन, युवाओं का इस्तेमाल करने का तरीका एक जैसा ही है। CJP के हालिया प्रदर्शनों में देखा गया कि कैसे युवाओं के हाथों में झंडे, डंडे, पत्थर थमाकर उन्हें पुलिस और आम जनता के सामने खड़ा कर दिया जाता है। प्रदर्शन के दौरान हिंसा होती है, पुलिसकर्मियों पर हमले किए जाते हैं और सरेआम कानून-व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं।

CJP के नेता पीछे बैठकर अपना राजनीतिक एजेंडा सेट करते हैं और आगे की पंक्ति में साधारण परिवारों के युवाओं को धकेल दिया जाता है। जब पुलिस की तरफ हिंसा को रोकने के लिए वाटर कैनन और लाठियाँ चलती हैं, तो चोट इन युवाओं को लगती है। CJP या किसी भी उग्र संगठन के बड़े नेता कभी जेल की सलाखों के पीछे सड़ने नहीं जाते। आज कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन की तस्वीरें सबके सामने है। युवाओं को भड़काने ये खेल कैसे चलता है, इसे भी आप आज (21 जुलाई 2026) के ही उदाहरण से समझिए।

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और AAP के संयोजक अरविंद केजरीवाल CJP के प्रदर्शन में पहुँचे थे। उन्होंने इन आंदोलनकारी छात्रों से जिस तरह बात की वो बताता है कि नेता इन छात्रों को किसी भी हद तक जाने के लिए उकसा रहे हैं। उन्होंने कहा, “अब इस्तीफा धर्मेंद्र प्रधान का नहीं मोदी का इस्तीफा होना चाहिए। पुलिस ने प्रेस रिलीज दी है कि जो लोग आंदोलन में आए थे उन पर केस करेंगे, मैं मोदी को चैलेंज करता हूँ केस करके दिखा तेरे मैं दम है तो। आप लोग केस से मत डरना। बड़े से बड़ा वकील खड़ा कर देंगे। आप लोगों को छुड़ा के ले आएँगे। अपना डर निकाल दो। जिस दिन डर निकल गया उस दिन कोई आपको जीतने से नहीं रोक सकता।”

क्या आपको वाकई लगता है कि अगर यही छात्र कल संसद में घुस जाएँ, वहाँ वितंडा करें तो ये नेता उनके लिए खड़े होंगे? केस तो छोड़िए, दिपके से लेकर सौरव दास और विजेता दहिया तक या इस आंदोलन के सहारे युवाओं को भड़काने की कोशिश करने वाले कितने नेता आपको पुलिस से भिड़ते दिखे?

जिसने युवाओं को भड़काया, आंदोलन के ना पर उकसाया और अपनी माँगों को पूरा करने के लिए जोश भरा, वो ही इस प्रदर्शन में कहीं दिखने को नहीं मिला। पुलिस से हाथापाई करते, हिंसा का शिकार होते और अपने भविष्य को बर्बाद करते केवल और केवल युवा ही दिखाई दे रहे हैं, जिन्हें ये भी मालूम नहीं है कि ये साजिश रचने वाले आराम से कुर्सी पर बैठकर, हाथ में चाय का गिलास लेते हुए आपकी इस दशा को देखकर ठहाके मारकर हँस रहे हैं।

ऐसा भी नहीं है कि युवा इन्हें नहीं समझ रहे हैं। जो छात्र या युवा इन तिलचट्टों के समर्थन के लिए जंतर-मंतर पहुँचे थे, उन्होंने इनके तौर-तरीकों को देखकर इन्हें जमकर खरी खोटी भी सुनाई है। इस युवा प्रदर्शनकारी को देखिए। ये इस बात से बेहद खफा है कि कुछ लोगों ने इस आंदोलन को VIP बना दिया है। एक युवती इनके VIP रवैया से नाराज होकर पूछ रही है, “किसने लाठियाँ खाई हैं, यहाँ पर इतने लोगों को लाठियाँ पड़ी हैं। वहाँ पर इतने लोगों को मार पड़ी है। लेकिन वो सब किसने किया है।”

युवाओं के लिए सबसे बड़ा सबक: आंदोलन खत्म हो जाते हैं, लेकिन केस साथ चलता है

हर पीढ़ी में ऐसे युवा होते हैं जो व्यवस्था बदलना चाहते हैं। यह लोकतंत्र के लिए अच्छी बात है। लेकिन उतना ही जरूरी यह समझना भी है कि व्यवस्था बदलने और कानून तोड़ने में अंतर होता है। यदि कोई नेता आपको यह विश्वास दिला रहा है कि संसद की ओर बढ़ना ही लोकतांत्रिक संघर्ष का सबसे बड़ा प्रतीक है, तो पहले उससे यह भी पूछिए कि यदि आपके खिलाफ FIR हुई, यदि आपकी पढ़ाई प्रभावित हुई, यदि सरकारी नौकरी का सपना खतरे में पड़ा या वर्षों तक अदालतों के चक्कर लगाने पड़े, तो क्या वह आपके साथ खड़ा रहेगा? भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि अधिकांश मामलों में इसका उत्तर ‘नहीं’ होता है।

आंदोलन नए आ जाते हैं, मुद्दे बदल जाते हैं, नेता नए भाषण देने लगते है लेकिन मुकदमे में फँसा युवा वहीं रह जाता है। इसलिए लोकतंत्र में सबसे बड़ा साहस बैरिकेड तोड़ना नहीं, बल्कि भावनाओं के बजाय विवेक से निर्णय लेना है। विरोध कीजिए, सवाल पूछिए, सरकार को कठघरे में खड़ा कीजिए, लेकिन किसी भी राजनीतिक रणनीति का मोहरा बनने से पहले यह जरूर सोचिए कि जब भीड़ छँट जाएगी और कैमरे चले जाएँगे, तब आपके साथ कौन खड़ा होगा। यही सवाल आज हर उस युवा को खुद से पूछना चाहिए, जिसे किसी भी मंच से संसद की ओर बढ़ने का आह्वान सुनाई देता है।

PM की हत्या की साजिश, संसद में घुसने का प्रयास और पुलिस पर पथराव: Insta रील से इतर समझें ‘कॉकरोचों’ का एजेंडा, कैसे ठगे गए असली छात्र

20 जुलाई 2026 का दिन दिल्ली के लिए सिर्फ एक और प्रदर्शन का दिन नहीं था, यह एक ऐसी लड़ाई थी जो एकतरफा पेश की गई। एक तरफ इंस्टाग्राम की रील्स और कुछ तथाकथित पत्रकारों के दावे थे, जो कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के ‘संसद चलो’ प्रदर्शन को पूरी तरह पुलिस के खिलाफ और प्रदर्शनकारियों को क्लीनचिट देने के प्रयास से गढ़े गए थे। दूसरी तरफ, प्रदर्शन में जो पत्थरबाजी, गाली-गलौज, तोड़फोड़, हिंसक नारेबाजी के पीछे की साजिश थी, उस पर बात करने को कोई तैयार ही नहीं है।

यह प्रदर्शन जितना सड़कों पर व्यापक था हुआ, उतना ही सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर भी लड़ा जा रहा था, जहाँ नैरेटिव गढ़े जा रहे थे और सच्चाई को दबाने की कोशिश हो रही थी। इसी दूसरे मोर्चे को समझने के लिए एक छोटा-सा प्रयोग ही काफी है।

20 जुलाई 2026 यानी ‘संसद मार्च’ की रात करीब तीन से चार घंटे तक सोशल मीडिया पर रील स्क्रॉल करने पर जब मेरे सामने सिर्फ एकरफा नैरेटिव का कंटेन्ट सामने आता रहा, तो मुझे भी हैरानी हुई। पुलिस की कार्रवाई दिखाई गई, छात्रों के चेहरे में छिपे ‘हिंसक भीड़’ को विक्टिम घोषित कर दिया गया और यहाँ तक कि मौके पर मची अफरा-तफरी का सारा ठीकरा सरकार पर फोड़ दिया गया। यह सिर्फ मेरी टाइमलाइन नहीं थी, मेरे दोस्तों के एल्गोरिदम का भी यही हाल था जहाँ हर कोई इस एकतरफा नैरेटिव को आगे शेयर करता जा रहा था।

लेकिन इसमें जो मिसिंग था, वो घायल पुलिसकर्मियों की तस्वीर, हिंसक भीड़ द्वारा तोड़ी गई पुलिस वैन और आम गाड़िया या मंदिर जैसे पवित्र स्थिल पर हुए पथराव, इनमें से कुछ भी उस एल्गोरिदम के कंटेन्ट में जगह नहीं बना पाया। यही वह पल था जब समझ आया कि देश के GenZ (जेन जी) को किस तरह एकतरफा कंटेन्ट परोसकर ब्रेनवॉश किया जा रहा था।

इसीलिए मेरी यह रिपोर्ट जरूरी हो जाती है, ताकि दोनों पहलू सामने आएँ और वह हकीकत भी सामने आए जो रील्स के एल्गोरिदम में जगह नहीं बना पाई।

पुलिस पर हमला नहीं होने का झूठा दावा, देखें भयानक तस्वीरें

सोशल मीडिया पर वैसे तो ऐसे कई तथाकथित पत्रकार और सोशल मीडिया अकाउंट्स थे, जो एकतरफा नैरेटिव चला रहे थे। लेकिन इन नैरेटिव को गढ़ने की PhD कर चुके लोग अब नए युवाओं को भी इस नैरेटिव का हिस्सा बनाने की साजिश में थे। इसी में पुराना नाम है, आल्ट न्यूज के ‘फैक्टचेकर’ मोहम्मद जुबैर का। जुबैर ने प्रदर्शन में पुलिस पर हिंसा होने से ही साफ इनकार कर डाला, यह कहते हुए कि इसके कोई सबूत नहीं हैं।

लेकिन बिना ज्यादा छानबीन किए जुबैर ने दिल्ली पुलिस की जानकारी को भी अनदेखा कर दिया, जिसमें शुरुआत में पहले 50 पुलिसकर्मी के घायल होने और बाद में सही आँकड़ा बताते हुए 118 से ज्यादा पुलिसकर्मियों के घायल होने की बात कही गई। खुद दिल्ली के पुलिस कमिश्वर अनुराग कुमार इन घायल जवानों का हाल जानने अस्पताल पहुँचे थे।

इस जानकारी की पुष्टि मौके से सामने आए तस्वीरों और वीडियो से भी हो जाती है, जिन्हें देख तथाकथित पत्रकारों ने आँखों पर पट्टी बाँध ली और ‘मेटा’ के एल्गोरिदम ने इसे बेहतर कंटेन्ट का हिस्सा ही नहीं माना। इन वीडियो में किसी का सिर फटा हुआ दिख रहा है, किसी की आँख तो किसी की नाक फोड़ दी गई है, कईय़ों के सिर पर पट्टी बँधी नजर आई, तो किसी की हालत इतनी बुरी थी कि उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया।

ANI की तस्वीर में दिल्ली पुलिस का एक सब-इंस्पेकटर CATS एंबुलेंस के पास खड़ाई दिखाई दे रहा है और अपनी घायल आँख पर कपड़ा दबाए हुआ खून रोकने की कोशिश कर रहा है। न्यूज एजेंसी ने ही दो तस्वीरें और पोस्ट की, जिसमें नाक और सिर पर पट्टी बाँधे दो पुलिस कॉन्सटेबल अपनी ड्यूटी कर रहे हैं।

IANS की एक और तस्वीर में सुरक्षाकर्मी और मेडिकल स्टाफ़ दिल्ली पुलिस के एक घायल अधिकारी को इलाज के लिए गाड़ी में ले जाते हुए दिख रहे हैं, जिससे झड़प के दौरान लगी चोटों की गंभीरता का पता चलता है।

ANI की एक और तस्वीर में दिल्ली पुलिस का एक अधिकारी विरोध-प्रदर्शन वाली जगह पर चलता हुआ दिख रहा है, जिसकी यूनिफॉर्म की शर्ट के सामने वाले हिस्से पर खून के साफ़ धब्बे लगे हैं। यह उन दावों को और गलत साबित करता है कि कोई भी पुलिसकर्मी घायल नहीं हुआ था।

(साभार: X- Akshit Singh)

एक वीडियो ऐसी भी सामने आई, जिसमें सैंकड़ों प्रदर्शनकारियों की भीड़ एक पुलिसकर्मी को खदेड़ते हुए जमीन पर गिराकर बेरहमी से पीटते हुए दिखी, जिससे भीड़ की हिंसा का सीधा सबूत मिलता है। वीडियो में हिंसक भीड़ को पुलिसकर्मी पर कुचले देखा जा सकता है। भीड़ में जितना जिसको मौका मिल रहा है, वह उस अकेले पुलिसकर्मी को मार रहा है।

इतना ही नहीं हिंसक भीड़ ने पुलिस की गाड़ियों में जमकर तोड़फोड़ की, कुछ प्रदर्शनकारी पुलिस वैन पर चढ़कर फोटो खिंचवाते और व्लॉग बनाते दिखे। सिर्फ पुलिस वैन ही नहीं, आम नागरिकों की गाड़ियों को भी निशाना बनाया गया।

ये ऐसे कुछ चुनिंदा वीडियोज हैं जो लोगों ने रिकॉर्ड किए हैं। लेकिन मौके पर जो बर्बरता पुलिस के साथ की गई, उसके बारे में खुलकर कोई नहीं बात कर रहा है। चिंता की बात यह है कि खुद इन पीड़ित पुलिसकर्मी ने अपने ऊपर बीती को किसी मीडिया के सामने शेयर नहीं किया, न ही सोशल मीडिया पर आपबीती के वीडियो शेयर किए, जबकि दूसरी तरफ प्रदर्शनकारियों के समर्थन में कई पाकिस्तानी अकाउंट्स लगातार पोस्ट किए जा रहे थे।

(साभार: X-Newspinch)

दिल्ली पुलिस ने शुरुआती जाँच में ही खुलासा किया कि सोशल मीडिया पर कई पाकिस्तानी अकाउंट्स से प्रदर्शन को लेकर भ्रामक जानकारी फैलाई जा रही थी। इनमें झूठा दावा किया जा रहा था कि सात प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई, जबकि 391 घायल और 250 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस अब इन विदेशी सोशल मीडिया अकाउंट्स की जाँच करेगी। वहीं पुलिस ने 70 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया है।

शांतिपूर्ण प्रदर्शन के नाम पर मंचित हिंसा

CJP के लीडर कहे जाने वाले अभिजीत दिपके के नेतृत्व में जंतर-मंतर पर 20 जून 2026 से प्रदर्शन शुरू किया गया था, और शुरू से ही यह दावा किया गया कि यह काफी ‘शांतिपूर्ण’ प्रदर्शन है और केवल ‘छात्रों के हित’ के लिए है। लेकिन एक महीने में सामने आईं इस प्रदर्शन की तस्वीरों में न तो कुछ ‘छात्रों के हित’ की कोई बात हुई, और ‘शांतिपूर्ण’ वाला टैग भी 20 जुलाई को मिट्टी में मिल गया।

‘संसद चलो’ मार्च में प्रदर्शनकारी हाथ में ईंट लेते चले तो कोई दीवार फाँदते दिखा, कोई पीएम मोदी को गाली दे रहा था, कोई झुंड में ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारे लगा रहा था। और इसी एजेंडे के साथ ‘नेपाल जैसे हालात‘ का नैरेटिव वायरल कर डराने की कोशिश की गई।

प्रदर्शन में शामिल हुए एक पत्रकारिता के छात्र ने मौके का मंजर बताया कि पत्थरबाजी सबसे पहले प्रदर्शनकारियों की तरफ से शुरू हुई और ‘असल छात्रों’ को भी पथराव करने के लिए उकसाया गया, हिंसक प्रदर्शनकारियों ने उनसे कहा- “हम हैं पीछे तुम पत्थर फेंको।” न्यूज पिंच की इस वीडियो में पत्रकार अभिनव पांडे भी बता रहे हैं कि पथराव प्रदर्शनकारियों की तरफ से हुआ और उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था।

प्रदर्शनकारियों ने दिल्ली के कनॉट प्लेस (CP) स्थित हनुमान मंदिर पर भी पथराव किया। इस वीडियो में मुँह पर रुमाल बाँधे भीड़ का झुँड आगे बढ़ रहा है और बैरिकेट पर चढ़कर उत्पात मचाता रहा है।

केवल यही नहीं, सामने आए वीडियो में संसद की ओर मार्च कर रहे प्रदर्शनकारी हाथों में ईंट लिए चल रहे थे। चंड़ीगढ़ के एक फन्नी खान नाम के लड़का भी इस प्रदर्शन में शामिल होने पहुँचा था, उसने वीडियो में हाथ में ईंट लेकर धमकी दे रहा था कि अगर उसे संसद में घुसने से रोका गया तो वह उसी ईंट से हमला करेगा।

वीडियो में उसकी आवाज लड़खड़ा रही थी, जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि वह नशे में था। नशे के बात करें, तो ऐसे और भी वीडियोज सामने आए जिसमें कई प्रदर्शनकारी नशे में गुस्सा दिखाते और धमकी देते दिखे। ऑपइंडिया के पत्रकार आशीष नौटियाल ने भी खुद इसे अनुभव किया, वह 20 जुलाई की पूरी रात जंतर-मंतर पर थे, उन्होंने बताया कि मौके पर 100 में से 90 प्रतिशत लोगों ने नशा कर रखा था, और वहाँ शराब की बुरी गँध आ रही थी।

और अगर बात ‘अहिंसक प्रदर्शनकारियों’ की करें, तो वे छात्रों के इस प्रदर्शन में ‘मोदी मुर्दाबाद’ और ‘केजरीवाल जिंदाबाद’, ‘उमर खालिद-शरजील इमाम जिंदाबाद’, ‘असम देश से अलग हो जाना चाहिए’ जैसी नारेबाजी करने में व्यस्त थे। जो ‘अहिंसा’ की कैटेगरी में हिंसा भड़काने का काम कहलाता है।

वहीं प्रदर्शन में मौजूद असली छात्र इस सुनियोजित हिंसा को समझ नहीं पा रहे थे। उनका सवाल था कि प्रदर्शन तो शिक्षा व्यवस्था ठीक करने को लेकर सरकार से जवाबदेही माँगना था, जो अब हिंसा में तब्दील हो चुका था। राजस्थान से आए एक युवा ने कहा, “हम NEET पेपर लीक पर अपनी आवाज उठाए थे, लेकिन यहाँ सब उल्टा है… चारों ओर विपक्षी दल के छात्र संगठन दिख रहे हैं… कोई BJP को गाली दे रहे है, कोई हिंदुओं को गाली दे रहा है… असली छात्र जो आ रहा है वह ठगा जा रहा है।”

वायरल व्हाट्सऐप चैट्स से खुली पोल

और यह कोई अचानक भड़की हिंसा नहीं थी, यह एक रात पहले से रची गई पूरी पटकथा का नतीजा थी। 20 जुलाई से एक रात पहले ही व्हाट्सऐप ग्रुप्स पर प्रदर्शन की बकायदा योजना बनाई जा चुकी थी और असली छात्रों को इसी योजना के जरिए सोशल मीडिया को हथियार बनाकर उकसाया गया। उन्हें कदम दर कदम बताया गया कि करना क्या, अगर पुलिस रोकने की कोशिश करे तो क्या करना है, अगर बैरिकेडिंग लगा दे तो क्या करना है, संसद का गेट बंद कर दे तो क्या करना है और अपने साथ क्या पहनना है से लेकर क्या चीजें लेकर आनी है, सबकुछ।

(साभार: X-vijaygajeraO)

सोशल मीडिया पर कुछ संदिग्ध अकाउंट्स तो लोगों को जंतर-मंतर आने का खर्चा तक देने को तैयार थे। और सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इन्हीं चैट्स में छात्रों को यह कहकर उकसाया गया कि ‘मरने-मारने को भी तैयार रहना’ यानी जिन छात्रों को NEET पेपर लीक जैसे वाजिब मुद्दे के नाम पर बुलाया गया था, उन्हें ही हिंसा के लिए मानसिक रूप से तैयार किया जा रहा था।

(फोटो साभार: Instagram-chalo_sansad)

वायरल व्हाट्सऐप चैट्स में लिखा गया था, “भाई किसी की मौत होती है तो सरकार पर ज्यादा प्रेशर आएगा।” यही वह सोची समझी साजिश थी जिसके चलते प्रदर्शन के दौरान 7 मौतों की झूठी खबरें फैलाई गई थीं, हालाँकि दिल्ली पुलिस ने बाद में इस दावे का खंडन कर इस साजिश को नाकाम कर दिया था।

वहीं जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) के वामपंथी छात्र संगठनों के व्हाट्सऐप ग्रुप्स में तो योजना बनाई गई कि अगर इंटरनेट जैम लगाया गया तो Briar और Bitchat जैसे ब्लूटुथ ऐप्स का इस्तेमाल किया जाएगा। छात्रों को बताया गया कि सुबह पुलिस यूनिवर्सिटी के गेट बंद कर सकती है, इसलिए रात दो-तीन बजे ही जंतर-मंतर पहुँचना होगा।

(साभार: X-vijaygajeraO)

पत्रकारों पर हमले और गोदी मीडिया का शोर

प्रदर्शन के दौरान एक पैटर्न यह भी सामने आया कि प्रदर्शनकारी सिर्फ उन्हीं पत्रकारों से बात कर रहे थे जो एक तयशुदा नैरेटिव के साथ ‘पत्रकारिता’ करते हैं। जो भी पत्रकार प्रदर्शनकारी से उनकी मर्जी के अलावा सवाल पूछ रहा था, तो उन्हें वह या तो अपनी हिंसा का शिकार बना रहे थे या फिर ‘गोदी मीडिया’ की नारेजाबी कर प्रताड़ित किया जा रहा था।

एबीपी न्यूज के रिपोर्टर वरुण भसीन भी हिंसक भीड़ के हमले का निशाना बने। भसीन को प्रदर्शनकारियों के झुंड ने घेर लिया और ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारे लगाए। भसीन ने आपबीती सुनाते हुए कहा कि प्रदर्शन कवर करने के दौरान उन्हें भीड़ में ऐसे कई युवा दिखे जो लगातार मीडिया की गाड़ियों पर हमला कर रहे थे, कैमरे तोड़ने की कोशिश कर रहे थे, और मीडिया पर पत्थर तक फेंके गए।

इन्हीं प्रदर्शनकारियों ने ऑपइंडिया के पत्रकार अनुराग मिश्रा को भी निशाना बनाया था, जब वह कवरेज करने जंतर-मंतर पहुँचे थे। प्रदर्शनकारियों ने उनके साथ धक्का-मुक्की की और ‘गोदी मीडिया हाय-हाय’ के नारेबाजी कर गाली-गलौज तक की।

अब यहीं से समझ लीजिए कि यह प्रदर्शन महिला के लिए कितना सुरक्षित रह जाएगा, और इस पर सवाल भी उठे जब PEEKTV की रिपोर्टर प्रियांशी के साथ भी यही हुआ, जब उन्होंने प्रदर्शनकारियों से लीडरशिप और आगे की रणनीति के बारे में सवाल पूछा तो भीड़ भड़क गई और उन पर मुद्दे से भटकाने का आरोप लगाते हुए वही ‘गोदी मीडिया’ की नारेबाजी करने लगी।

इन घटनाओं से यह भी साफ हो जाता है कि ऐसे माहौल में सिर्फ पुरुष ही नहीं महिला पत्रकारों के लिए प्रदर्शन की कवरेज करना कितना असुरक्षित हो चला था।

CJP के प्रदर्शन में AISF के झंडे, ‘जय भीम’ ने किया कब्जा

‘संसद चलो’ मार्च से एक दिन पहले ही ‘आंदोलनजीवी’ योगेंद्र यादव ने जंतर-मंतर पर CJP के मंच से ‘पंचशील‘ जारी किए थे। इनमें सबसे पहला था कि मार्च में सिर्फ तिरंगा झंडा लेकर आना है, लेकिन ग्राउंड पर इससे उलट देखा गया। ऑपइंडिया जब ग्राउंड पर पहुँचा तो प्रदर्शन में AISA, SFI और अन्य कम्युनिस्ट छात्र संगठनों के झंडे लहराए जा रहे थे।

इनमें भी सबसे ज्यादा जो झंडे फहराए जा रहे थे, वो चंद्रशेखर आजाद की ‘भीम आर्मी’ राजनीतिक दल के झंडे थे। ऑपइंडिया ने भी रिपोर्ट किया कि इस प्रदर्शन पर भीमा आर्मी के समर्थकों की भारी संख्या में भीड़ जुटी थी। वीडियोज भी सामने आए थे जिनमें चंद्रशेखर आजाद प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते दिखाई दे रहे थे।

यही नहीं प्रदर्शनकारियों में गैंगस्टर भी घुसे हुए थे। नॉर्थ ईस्ट दिल्ली का गैंगस्ट हाफी अफजल भी अपने साथ भारी संख्या में लोगों को लेकर प्रदर्शन में पहुँचा था और मौके पर ‘बीजेपी मुर्दाबाद’, ‘मोदी मुर्दाबाद’ और ‘जब-जब मोदी डरता है पुलिस को आगे करता है’ जैसे भड़काऊ नारे लगा रहा था।

निष्कर्ष

तो देखिए इस पूरे प्रदर्शन का निष्कर्ष क्या निकलकर आया है। 20 जुलाई को ‘संसद चलो’ प्रदर्शन को लेकर सोशल मीडिया, खासकर इंस्टाग्राम रील्स के जरिए जो एकतरफा तस्वीर गढ़ी गई, वह जमीनी हकीकत से मीलों दूर थी। इससे यह पता लगता है कि इस्टाग्राम कैसे युवाओं का ब्रेनवॉश कर रहा है। असली छात्र जो NEET पेपर लीक के मुद्दों पर आवाज उठाने पहुँचे थे, वे इस भीड़ में कहीं गुम हो गए, जबकि राजनीतिक दलों, वामपंथी छात्र संगठनों और उपद्रवियों ने प्रदर्शन को एक बिल्कुल अलग दिशा दे दी।

वहीं पुलिस पर हमले, मंदिर पर पथराव, पत्रकारों से बदसलूकी और हिंसा फैलाने की सुनियोजित साजिश के सबूत सामने आने के बावजूद एक बड़ा तबका इन तथ्यों को जानबूझकर नजरअंदाज करता रहा। यही वजह है कि दोनों पहलुओं को खुलकर सामने रखना जरूरी हो जाता है, ताकि जनता खुद तय कर सके कि उस दिन जंतर-मंतर की सड़कों पर हकीकत क्या थी।

वहीं प्रदर्शन का असली नेतृत्व की बात करें, तो वह मौके से ही गायब रहा। न तो अभिजीत दिपके की लीडरशिप दिखी, न सौरव दास, न आशुतोष रांका और न ही CJP के वॉलंटियर्स नजर आए। वहीं प्रदर्शन के वक्त प्रवक्ता विजेता दहिया को मेट्रो स्टेशन पर बर्गर खाते पकड़ा गया।

नतीजा यही निकलकर सामने आया कि महीने भर से ‘शांतिपूर्ण’ प्रदर्शन के नाम पर सिर्फ एक ढोंग चल रहा था, जब मौका मिला तो ‘कॉकरोचों’ के नाम पर हिंसकर भीड़ ने अपना असली रूप दिखा दिया। अब इसी भीड़ में एक-एक आदमी की पहचान दिल्ली पुलिस FRI तकनीक से करेगी।

और अपडेट यह है कि CJP अब भी जंतर-मंतर पर डेरा जमाए बैठी है। सरकार की तरफ से आश्वासन दिए जाने के बावजूद प्रदर्शनकारी जंतर-मंतर खाली करने को तैयार नहीं है। वहीं दूसरी ओर CJP के भीतर दरार भी अब खुलकर सामने आने लगी है। अभिजीत दिपके के नेतृत्व को लेकर कुछ लोग पहले से ही नाराज थे और अब प्रदर्शन छोड़कर बर्गर खाने वाले विजेता दहिया को भी प्रवक्ता के पद से हटा दिया गया।

कुल मिलाकर निष्कर्ष यही निकलता है कि इस पूरे प्रदर्शन में सबसे ज्यादा नुकसान उन आम छात्रों का हुआ जो शुरू से ईमानदारी के साथ CJP को सपोर्ट कर रहे थे।