Home Blog Page 16

‘हर हिंदू घर में है संभावित हत्यारा-बलात्कारी’: वामपंथी अपूर्वानंद ने हिंदुओं के खिलाफ फिर उगला जहर, मुस्लिमों को बताया पीड़ित

प्रोपेगेंडाई पत्रकार आशुतोष के यूट्यूब चैनल ‘सत्य हिंदी’ पर हाल ही में एक लाइव चर्चा प्रसारित हुई। इस चर्चा के दौरान पत्रकार मुकेश कुमार और वामपंथी विचारक अपूर्वानंद ने हिंदू समाज, उनके रीति-रिवाजों और हिंदू संगठनों को लेकर बेहद गंभीर और विवादित बयान दिए।

‘बात बोलेगी’ नाम के इस शो में देश की सांप्रदायिक स्थिति पर बात हो रही थी, लेकिन धीरे-धीरे पूरी बातचीत का रुख हिंदू समाज की आलोचना की तरफ मुड़ गया। चर्चा के दौरान अपूर्वानंद ने भारत में होने वाली हर तरह की हिंसा के लिए सीधे तौर पर हिंदुओं को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की।

उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), हिंदू त्योहारों, देश की पुलिस, अदालतों और मुख्यधारा की मीडिया पर भी कई आपत्तिजनक टिप्पणियाँ कीं। उन्होंने पूरे हिंदू समाज को हिंसक, जातिवादी और मुस्लिम-विरोधी मानसिकता से ग्रसित बताने का प्रयास किया।

इस बातचीत का सबसे विवादित हिस्सा वह था जब अपूर्वानंद ने सामान्य हिंदू परिवारों को लेकर एक बड़ा दावा कर दिया। उन्होंने कहा कि आज हर हिंदू घर के अंदर एक संभावित हत्यारा या संभावित बलात्कारी छिपा हुआ है। इस बयान के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएँ देखने को मिल रही हैं और लोग इसे समाज में नफरत फैलाने वाला बयान बता रहे हैं।

हिंदुओं के कथित सामूहिक कट्टरपंथीकरण पर बात करते हुए अपूर्वानंद ने कहा, “भारत में हिंदुओं का बड़े पैमाने पर कट्टरपंथीकरण हो रहा है… ऐसी स्थिति बन गई है कि अब हर घर में इस तरह का एक हिंदू मौजूद है, जो एक संभावित हत्यारा है।”

इसके बाद भी वह नहीं रुके। उन्होंने आगे कहा, “अगर यह हिंदू संभावित हत्यारा नहीं है, तो वह संभावित बलात्कारी है। और यदि वह सीधे तौर पर बलात्कार नहीं कर रहा है, तो वह अपनी कल्पनाओं में या आभासी रूप से बलात्कार कर रहा है।”

अपूर्वानंद ने हिंदू परिवारों को लेकर की गई अपनी इन व्यापक टिप्पणियों को कुछ वर्ष पहले विवादों में रहे ‘सुल्ली डील्स’ और ‘बुल्ली बाई’ मामलों से जोड़ने की कोशिश की। उन्होंने दावा किया कि इन घटनाओं से यह संकेत मिलता है कि मुस्लिम महिलाओं के प्रति अपमानजनक रवैया और मुसलमानों के खिलाफ हिंसा को अब हिंदू परिवारों में सामान्य या स्वीकार्य मान लिया गया है।

उन्होंने आगे यह भी आरोप लगाया कि मुसलमानों के साथ बलात्कार और उनकी हत्या जैसी घटनाओं को हिंदू समाज के एक हिस्से में उचित ठहराया जा रहा है। इस दौरान उन्होंने पूरे हिंदू समाज और हिंदू परिवारों को लेकर व्यापक निष्कर्ष प्रस्तुत किए।

यह भ्रामक निष्कर्ष है कि यदि इसी प्रकार की भाषा किसी अन्य धार्मिक समुदाय के लिए इस्तेमाल की जाती, तो उसे तत्काल घृणा भाषण (हेट स्पीच), सामूहिक बदनाम करने और अमानवीयकरण के रूप में देखा जाता। लेकिन हिंदुओं के संदर्भ में की गई इन टिप्पणियों को चर्चा के दौरान शैक्षणिक विश्लेषण या बौद्धिक विमर्श के रूप में प्रस्तुत किया गया।

हिंदुओं को हमलावर और मुसलमानों को बताया पीड़ित

कार्यक्रम की शुरुआत से ही यह दावा किया गया कि देशभर में हर दिन सैकड़ों ऐसी घटनाएँ हो रही हैं, जिनमें मुसलमानों को पीटा जाता है, उनके साथ दुर्व्यवहार किया जाता है और उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित किया जाता है। चर्चा के दौरान यह भी कहा गया कि इस कथित उत्पीड़न का शिकार केवल पुरुष ही नहीं, बल्कि बच्चे, महिलाएँ और बुजुर्ग भी बन रहे हैं।

अपूर्वानंद ने दावा किया कि मुसलमान अब कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। उनके अनुसार, सड़कें, मोहल्ले, स्कूल, कॉलेज, बाजार, ट्रेनें और बसें तक मुसलमानों के लिए असुरक्षित हो चुकी हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि हिंदुओं के नाम पर नफरत फैलाने और हिंसा करने वाले लोग बिना किसी भय के कहीं भी पहुँच जाते हैं और हत्या जैसी घटनाओं को भी अंजाम देते हैं।

बातचीत के दौरान यह भी कहा गया कि ‘लव जिहाद’, धर्मांतरण, घुसपैठ, गौ-रक्षा, खान-पान की आदतों, जीवनशैली और धार्मिक त्योहारों जैसे मुद्दों के नाम पर हिंसा को उचित ठहराया जा रहा है। साथ ही यह आरोप भी लगाया गया कि ऐसे तत्वों को सरकार, प्रशासन और पुलिस का संरक्षण प्राप्त है।

अपूर्वानंद ने आगे दावा किया कि मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक के नेता कथित रूप से भड़काऊ भाषणों, बुलडोजर कार्रवाई और धमकियों के जरिए हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मुख्यधारा की मीडिया ने अपने प्राइम-टाइम कार्यक्रमों और बहसों के माध्यम से इस माहौल को मजबूत किया है।

पूरी बातचीत के दौरान यह स्पष्ट दिखाई दिया कि चर्चा का केंद्र हिंदू समाज, हिंदू संगठनों और हिंदुत्व से जुड़े विचारों को कठघरे में खड़ा करना था, जबकि मुसलमानों को एक संगठित और कथित रूप से कट्टर हिंदू तंत्र के पीड़ित के रूप में प्रस्तुत किया गया।

हिंदुओं पर सामूहिक रूप से चलाया गया मुकदमा

बातचीत के दौरान अपूर्वानंद ने दावा किया कि हिंदुओं की मूल प्रवृत्तियाँ स्वभावतः हिंसक, अश्लील और अभद्र हैं। चर्चा का मुख्य उद्देश्य यह दिखाना था कि हिंदू धर्म की रक्षा का दायित्व कथित तौर पर आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के हाथों में चला गया है और धार्मिक नेतृत्व से जुड़े कई लोग भी हिंसक गतिविधियों में संलिप्त दिखाई देते हैं।

अपूर्वानंद ने यह भी दावा किया कि ये कथित प्रवृत्तियाँ लंबे समय तक दबे रूप में मौजूद थीं, लेकिन वर्तमान राजनीतिक और धार्मिक नेतृत्व द्वारा हिंदुओं को जिस प्रकार उकसाया जा रहा है, उसके कारण अब वे अधिक खुलकर सामने आने लगी हैं। उनके अनुसार, राजनीतिक और धार्मिक विमर्श ने हिंदू समाज के भीतर मौजूद इन कथित रुझानों को सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्ति का अवसर प्रदान किया है।

पूरी चर्चा के दौरान अपूर्वानंद ने हिंदू समाज के चरित्र, धार्मिक नेतृत्व और हिंदुत्व से जुड़े संगठनों को लेकर व्यापक और विवादास्पद दावे किए, जिनमें हिंदुओं को सामूहिक रूप से हिंसा, कट्टरता और सामाजिक वैमनस्य से जोड़ने का प्रयास दिखाई दिया।

’33 करोड़ देवताओं’ के बहाने हिंदू बहुलवाद का उड़ाया गया मजाक

बातचीत के दौरान अपूर्वानंद ने दावा किया कि केवल 33 करोड़ देवी-देवताओं की पूजा करने से हिंदू सहिष्णु नहीं हो जाते, क्योंकि हिंदू धर्म न तो एकरूप (मोनोलिथिक) है और न ही किसी एक धर्मग्रंथ पर आधारित है। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदू स्वभाव से कठोर, जातिवादी और विभाजित समाज में विश्वास रखने वाले होते हैं।

उनका यह कहना है कि हिंदू बहुलतावाद (प्लूरलिज्म) की एक सतही और भ्रामक व्याख्या है। हिंदू परंपरा में प्रचलित 33 करोड़ देवी-देवताओं की अवधारणा को अक्सर गलत तरीके से समझा जाता है।

वैदिक और उपनिषदकालीन संदर्भों में इसका अर्थ 33 प्रकार के देवताओं या 33 देव शक्तियों से है, न कि 33 करोड़ अलग-अलग देवताओं की पूजा से। पारंपरिक व्याख्या के अनुसार इनमें आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, इंद्र और प्रजापति शामिल हैं।

हिंदू बहुलतावाद देवी-देवताओं की संख्या पर आधारित नहीं है, बल्कि इस विचार पर आधारित है कि परम सत्य या ईश्वर तक अनेक रूपों, नामों, मार्गों और परंपराओं के माध्यम से पहुँचा जा सकता है।

ऐसे में इस अवधारणा को केवल 33 करोड़ देवी-देवताओं तक सीमित करके हिंदुओं को असहिष्णु बताना, उनके के अनुसार, गंभीर अकादमिक विश्लेषण नहीं बल्कि वैचारिक टिप्पणी अधिक प्रतीत होता है।

इसी क्रम में अपूर्वानंद ने यह दावा भी किया कि हिंदू धर्म में सेवा की कोई अवधारणा नहीं है। उनका कहना है कि यह दावा न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत है, बल्कि हिंदू धर्मग्रंथों, परंपराओं और सामाजिक व्यवहार की अनदेखी भी करता है।

भगवद्गीता में लोकसंग्रह अर्थात समाज और विश्व के कल्याण को कर्म का महत्वपूर्ण उद्देश्य बताया गया है। वहीं सर्वभूतहित यानी सभी प्राणियों के कल्याण की अवधारणा भी हिंदू चिंतन का केंद्रीय तत्व मानी जाती है।

हिंदू परंपराएँ दान, करुणा, अहिंसा, अन्नदान, गौसेवा, अतिथि सत्कार, मंदिरों में सामुदायिक भोजन, धर्मशालाओं, यात्रियों की सेवा और जरूरतमंदों की सहायता जैसे मूल्यों पर विशेष बल देती रही हैं।

इतिहास में अन्नक्षेत्र, धर्मशालाएँ, गौशालाएँ, मठ, अखाड़े और तीर्थयात्रियों की सहायता की व्यवस्थाएँ लंबे समय से हिंदू समाज का हिस्सा रही हैं। आज भी देशभर के अनेक मंदिर निःशुल्क भोजन, चिकित्सा शिविर, शैक्षणिक संस्थान, गौशालाएँ और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान राहत कार्य संचालित करते हैं। ऐसे में हिंदू धर्म में सेवा की कोई अवधारणा नहीं है, यह दावा ऐतिहासिक और धार्मिक साक्ष्यों से मेल नहीं खाता।

अपूर्वानंद ने एक अन्य दावा करते हुए कहा कि हिंदू धर्म में ‘पड़ोसी धर्म’ या पड़ोसी के प्रति कर्तव्य की अवधारणा नहीं है। उनके अनुसार यह निष्कर्ष भी हिंदू दर्शन को अब्राहमिक धार्मिक शब्दावली के सीमित ढाँचे में देखने का परिणाम है।

हिंदू परंपरा भले ही लव थाइ नेबर जैसी शब्दावली का प्रयोग न करती हो, लेकिन उसमें इससे भी व्यापक अवधारणाएँ मौजूद हैं। अतिथि देवो भव, वसुधैव कुटुम्बकम्, सर्वभूतहित, अहिंसा, दया, दान, मैत्री और करुणा जैसे सिद्धांत समाज और समस्त सृष्टि के प्रति उत्तरदायित्व का संदेश देते हैं।

तैत्तिरीय उपनिषद में माता, पिता, गुरु और अतिथि को देवतुल्य मानने की शिक्षा दी गई है। वहीं महाभारत, पुराणों और अन्य धार्मिक ग्रंथों में अतिथियों का सम्मान, यात्रियों की सहायता, भूखों को भोजन, प्यासों को पानी और समाज के कमजोर वर्गों की मदद को धर्म का हिस्सा बताया गया है।

उनका कहना है कि हिंदू नैतिकता केवल पड़ोसी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि अतिथि, अजनबी, पशु-पक्षी, प्रकृति, पूर्वजों और समस्त जीवों तक अपने दायित्व का विस्तार करती है। इसलिए हिंदू धर्म में पड़ोसी के प्रति कर्तव्य का कोई विचार नहीं है, यह आलोचना नहीं बल्कि तथ्यात्मक रूप से भ्रामक निष्कर्ष प्रतीत होती है।

वर्ण के कारण हिंदू समाज को स्वाभाविक रूप से हिंसक बताया

बातचीत के दौरान अपूर्वानंद ने वर्ण व्यवस्था का उल्लेख करते हुए हिंदू धर्म और हिंदू समाज को हिंसा से जोड़ने का प्रयास किया। उन्होंने दावा किया कि हिंदू समाज मूल रूप से वर्ण व्यवस्था में विश्वास रखने वाला समाज है।

उनका कहना था कि हिंदू समाज और हिंदू धर्मग्रंथों का अध्ययन करने वाले कई विद्वान मानते हैं कि यदि वर्ण व्यवस्था को हटा दिया जाए, तो हिंदू धर्म की मूल संरचना ही समाप्त हो जाएगी।

अपूर्वानंद ने तर्क दिया कि जो समाज पदानुक्रम, ऊँच-नीच और अस्पृश्यता में विश्वास करता है, वह स्वाभाविक रूप से हिंसक होता है। उनके अनुसार, किसी व्यक्ति को सामाजिक रूप से दूर रखना या उसे बराबरी का दर्जा न देना ‘छिपी हुई हिंसा’ है, जबकि किसी की जान लेना ‘प्रत्यक्ष हिंसा’ का रूप है।

उन्होंने आगे कहा कि यदि किसी ब्राह्मण को यह लगता था कि किसी व्यक्ति ने उसे अपवित्र कर दिया है, तो उस व्यक्ति की हत्या तक की जा सकती थी। साथ ही उन्होंने यह भी दावा किया कि ऐसी प्रवृत्तियाँ कथित तौर पर हमारे भीतर पहले से मौजूद रही हैं।

इस बिंदु पर चर्चा केवल सामाजिक बुराइयों या जातिगत अन्याय की आलोचना तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरे हिंदू समाज और उसकी सभ्यतागत संरचना पर सवाल उठाने की दिशा में बढ़ती दिखाई दी।

हिंदू समाज की आलोचना केवल जाति-आधारित भेदभाव के संदर्भ में नहीं की गई, बल्कि उसे संरचनात्मक रूप से हिंसक तथा बहिष्कार और दमन की प्रवृत्ति वाला समाज बताने का प्रयास किया गया।

बाद में अपूर्वानंद ने कहा कि यह समस्या केवल ब्राह्मणों या तथाकथित उच्च जातियों तक सीमित नहीं है। उन्होंने दावा किया कि पिछड़ी जातियों, दलितों, वाल्मीकि समुदाय, यादवों और आदिवासी समुदायों के कुछ लोग भी मुसलमानों के खिलाफ हिंसा की घटनाओं में शामिल रहे हैं। उनके अनुसार, मुसलमानों के प्रति वैमनस्य या घृणा की भावना हिंदू समाज की लगभग सभी जातियों में किसी न किसी रूप में मौजूद है।

उन्होंने कहा कि इस प्रकार की दलील पहले ‘ब्राह्मणवाद’ की आलोचना से शुरू होती है, लेकिन धीरे-धीरे उसका दायरा बढ़ाकर सभी हिंदू जाति समूहों तक पहुँचा दिया जाता है।

उनके अनुसार, चर्चा का निष्कर्ष किसी एक वर्ग या समूह की हिंसक प्रवृत्तियों की आलोचना नहीं था, बल्कि पूरे हिंदू समाज को एक ऐसी सामाजिक संरचना के रूप में चित्रित करना था, जो कथित रूप से हिंसा, भेदभाव और वैमनस्य से ग्रस्त है।

RSS पर पुरानी सोच को संगठित हिंसा में बदलने का आरोप

अपूर्वानंद ने बातचीत के दौरान दावा किया कि हिंदुओं के मन में मुसलमानों के प्रति पूर्वाग्रह पहले से मौजूद थे, लेकिन अतीत में हिंदू और मुसलमान साथ रहते थे क्योंकि उन पूर्वाग्रहों को लगातार भड़काने और उन्हें हिंसा में बदलने वाली कोई संगठित शक्ति सक्रिय नहीं थी।

इसके बाद उन्होंने हिंदू महासभा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विनायक दामोदर सावरकर के लेखन, एम एस गोलवलकर, के बी हेडगेवार और श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम लेते हुए उन्हें उस कथित सक्रिय शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया। उनके अनुसार, इस संगठित वैचारिक धारा ने हिंदुओं के भीतर मौजूद पूर्वाग्रहों को उकसाने और उन्हें सक्रिय हिंसा में बदलने का काम किया।

अपूर्वानंद ने आगे दावा किया कि भारत में पहले सांप्रदायिक हिंसा प्रायः छिटपुट या अवसर विशेष पर होने वाली घटनाओं तक सीमित रहती थी। उन्होंने उदाहरण के तौर पर ताजिया जुलूसों या रामनवमी के आसपास होने वाले हिंदू-मुस्लिम दंगों का उल्लेख किया। हालाँकि उनके अनुसार वर्तमान समय में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि समाज के एक हिस्से ने हिंसा को न केवल उचित बल्कि स्वीकार्य और निर्लज्जता के साथ समर्थित मानना शुरू कर दिया है।

उन्होंने कहा कि सावरकर, हिंदू महासभा और RSS से जुड़ी विचारधारा, जो पहले मुख्यधारा के विमर्श का हिस्सा नहीं मानी जाती थी, अब प्रभावी और प्रमुख विचारधारा बन गई है। उनके अनुसार, इसका परिणाम यह हुआ है कि हिंसा अब केवल कभी-कभार होने वाली घटना नहीं रही, बल्कि लोगों के व्यवहार, भाषा और दैनिक गतिविधियों में भी दिखाई देने लगी है।

बातचीत के अंत में अपूर्वानंद ने यह दावा किया कि समाज के कथित अपराधीकरण को बढ़ावा देना RSS की सबसे बड़ी सफलता रही है। उनका कहना है कि इस प्रकार के दावों के माध्यम से हिंदुत्व से जुड़े संगठनों, नेताओं और विचारकों को सामाजिक हिंसा तथा सांप्रदायिक तनाव के लिए सामूहिक रूप से जिम्मेदार ठहराने का प्रयास किया गया।

बजरंग दल को आतंकवादी जैसा बताया गया, RSS इकोसिस्टम पर लगाया गया आरोप

बातचीत के दौरान मुकेश कुमार ने अपूर्वानंद से पूछा कि क्या बजरंग दल को एक आतंकवादी संगठन कहा जा सकता है। इसके जवाब में अपूर्वानंद ने कहा कि वह इस आकलन से सहमत हैं और बजरंग दल को एक संगठित समूह बताया।

इसके बाद उन्होंने दावा किया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने ऐसा वातावरण तैयार किया है, जिसमें अनेक संगठन विकसित हो सके हैं। उन्होंने इसकी तुलना एक ऐसे पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) से की, जहाँ विशेष प्रकार के पौधे स्वाभाविक रूप से उगते हैं। उनके अनुसार, RSS द्वारा निर्मित इसी वातावरण में घृणा और वैमनस्य (द्वेष) की राजनीति पनपती है।

अपूर्वानंद ने इस संदर्भ में बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद (VHP), विद्या भारती, सरस्वती शिशु मंदिर, राम सेना, रुद्र सेना, हिंदू वाहिनी और अन्य संगठनों का उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि इनमें से कुछ संगठनों का RSS से प्रत्यक्ष और औपचारिक संबंध भले न हो, लेकिन वे कथित रूप से उसी प्रकार का कार्य करते हैं और समान वैचारिक दिशा में सक्रिय हैं।

चर्चा के दौरान अपूर्वानंद का तर्क यह था कि इन संगठनों को अलग-अलग इकाइयों के रूप में देखने के बजाय एक व्यापक वैचारिक ढाँचे के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, चाहे किसी संगठन का RSS  से औपचारिक संबंध हो या न हो, वे सभी एक ऐसे वातावरण में कार्य करते हैं जिसे उन्होंने RSS की विचारधारा से प्रभावित बताया।

इस तरह के तर्क में यदि किसी संगठन का RSS से प्रत्यक्ष संबंध हो तो उसकी गतिविधियों के लिए RSS को जिम्मेदार ठहराया जाता है और यदि ऐसा संबंध न भी हो, तो उसे एक व्यापक ‘इकोसिस्टम’ का हिस्सा बताकर अंततः आरोपों का केंद्र RSS को ही बनाया जाता है।

उनके अनुसार, इस दृष्टिकोण के तहत विभिन्न संगठनों की स्वतंत्र पहचान और कार्यप्रणाली के बीच के अंतर को नजरअंदाज कर दिया जाता है।

1984 के सिख विरोधी दंगों के लिए हिंदुओं को ठहराया गया दोषी, कॉन्ग्रेस की भूमिका को धकेला गया पीछे

बातचीत का एक सबसे विवादास्पद हिस्सा तब सामने आया जब मुकेश कुमार ने 1984 के सिख विरोधी दंगों का मुद्दा उठाया। इस पर अपूर्वानंद ने दावा किया कि उस हिंसा में सामान्य लोगों ने भी भाग लिया था।

उन्होंने कहा कि यदि दिल्ली में लगभग 4000 सिखों की हत्या हुई थी, तो यह भी सोचना चाहिए कि उन्हें मारने में कितने हजार लोग शामिल रहे होंगे। इसी क्रम में उन्होंने कहा, “वे सभी हिंदू थे। वे सभी हिंदू थे और कोई दूसरा नहीं था।”

अपूर्वानंद ने आगे कहा कि उस समय हिंसा में शामिल लोग आज डॉक्टर, शिक्षक, दुकानदार, दादा या बुजुर्ग नागरिक के रूप में समाज में मौजूद हो सकते हैं, लेकिन उनके हाथ खून से सने हुए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदू समाज ने कभी यह स्वीकार नहीं किया कि जिन सिखों को वह अपना रक्षक बताता है, उन्हीं सिखों को घेरकर मार डाला गया।

उन्होंने बताया की इस प्रकार की व्याख्या 1984 की त्रासदी को सांप्रदायिक दृष्टि से देखने का प्रयास करती है। उनके अनुसार, 1984 की हिंसा कोई अमूर्त ‘हिंदू बनाम सिख’ संघर्ष नहीं थी, बल्कि तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों में घटित एक संगठित हिंसक घटना थी, जो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद भड़की और उस समय सत्ता में रही कॉन्ग्रेस सरकार के दौर में हुई।

1984 के सिख विरोधी दंगों को लेकर वर्षों तक पीड़ितों, प्रत्यक्षदर्शियों और विभिन्न जाँच आयोगों ने कई कॉन्ग्रेस नेताओं पर आरोप लगाए। पूर्व कॉन्ग्रेस नेता सज्जन कुमार को एक मामले में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

वहीं जगदीश तीतलेर की भूमिका भी लंबे समय तक कानूनी और जाँच एजेंसियों की पड़ताल के दायरे में रही। ननवाती कमिशन ने भी अपनी रिपोर्ट में कुछ कॉन्ग्रेस नेताओं के खिलाफ विश्वसनीय साक्ष्यों का उल्लेख किया था।

उनके अनुसार, ऐसे में 1984 की हिंसा को केवल हिंदुओं द्वारा सिखों की हत्या के रूप में प्रस्तुत करना घटनाओं की राजनीतिक और प्रशासनिक पृष्ठभूमि को नजरअंदाज करता है।

उनका तर्क है कि इससे कॉन्ग्रेस नेतृत्व, राजनीतिक संरक्षण, प्रशासनिक विफलता और पुलिस की भूमिका पर से ध्यान हटाकर पूरे हिंदू समुदाय पर सामूहिक दोषारोपण करने की कोशिश होती है।

इस दृष्टिकोण के अनुसार, 1984 की हिंसा के पीड़ित सिख समुदाय के लोग थे, जबकि आरोपितों में राजनीतिक संरक्षण प्राप्त भीड़, स्थानीय तत्व और उस समय के सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े लोग शामिल थे।

उनका कहना है कि इसे एक राजनीतिक नरसंहार या पोग्रोम के बजाय पूरे हिंदू समाज के अपराध के रूप में चित्रित करना विश्लेषण नहीं, बल्कि वैचारिक निष्कर्ष थोपने का प्रयास माना जा सकता है।

मुसलमानों को हिंदुओं के आस-पास हमेशा असुरक्षित दिखाया गया

बातचीत के दौरान अपूर्वानंद ने दावा किया कि आज मुसलमान लगातार असुरक्षा और अनिश्चितता के माहौल में जी रहे हैं, क्योंकि उन्हें यह नहीं पता होता कि उनके आसपास मौजूद हिंदू व्यक्ति उनके साथ कैसा व्यवहार करेगा।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि ट्रेन में सफर कर रहा कोई मुसलमान यह नहीं जानता कि उसके बगल में बैठा व्यक्ति उसके टिफिन को देखकर कैसी प्रतिक्रिया देगा, अगले स्टेशन पर किसी को बुलाएगा या उसके खिलाफ हमला करवाने की कोशिश करेगा। उन्होंने यह भी दावा किया कि मुसलमानों के मन में यह आशंका तक रहती है कि कहीं कोई रेलवे सुरक्षा बल (RPF) का जवान सोते समय उन्हें गोली न मार दे।

अपूर्वानंद ने आगे कहा कि यदि कोई मुसलमान ट्रेन यात्रा के दौरान कोई राजनीतिक राय व्यक्त करता है, तो उसे इसके कारण हिंसा का सामना करना पड़ सकता है या उसकी जान भी जा सकती है। उनके अनुसार, मुसलमान आज घर से निकलते समय भी संदेह और आशंका के साथ निकलते हैं तथा वापस लौटते समय भी उसी मानसिक स्थिति में रहते हैं। उन्होंने कहा कि उनके सामने बैठा हिंदू व्यक्ति अच्छा भी हो सकता है, लेकिन ऐसा नहीं भी हो सकता है।

उन्होंने बताया कि इस प्रकार के दावे हिंदुओं को एक व्यापक और स्थायी खतरे के रूप में तथा मुसलमानों को हमेशा भय और असुरक्षा में जीने वाले समुदाय के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

उनके अनुसार, ऐसी टिप्पणियाँ व्यक्तिगत घटनाओं या अपराधों की चर्चा से आगे बढ़कर पूरे समुदायों के बारे में सामान्यीकृत निष्कर्ष निकालती हैं, जिससे सामाजिक विभाजन और अविश्वास की भावना को बल मिल सकता है।

बहराइच में हुई हत्या को सेल्फ डिफेंस के तौर पर किया गया पेश

बातचीत के दौरान अपूर्वानंद ने बहराइच हिंसा का भी उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि एक जुलूस के दौरान एक व्यक्ति मुस्लिम परिवार के घर में घुस गया, रेलिंग तोड़ दी और वहाँ लगा धार्मिक झंडा हटा दिया। इसके बाद उन्होंने कहा कि जाहिर तौर पर आत्मरक्षा में उस मुस्लिम परिवार या किसी अन्य व्यक्ति की ओर से गोली चलाई गई, जिसमें उसकी मौत हो गई।

यह संदर्भ बहराइच हिंसा के दौरान मारे गए राम गोपाल मिश्रा से जुड़ा था। उन्होंने कहा कि अपूर्वानंद ने घटना को जिस प्रकार दिखाया, उससे यह संदेश जाता है कि गोलीबारी आत्मरक्षा की स्वाभाविक या समझी जा सकने वाली प्रतिक्रिया थी।

उनके अनुसार, यह व्याख्या केवल नैतिक दृष्टि से ही विवादास्पद नहीं है, बल्कि मामले में बाद में आए न्यायिक फैसले से भी मेल नहीं खाती। राम गोपाल मिश्रा हत्याकांड में अदालत ने मुख्य आरोपित सरफराज उर्फ ​​रिंकू को मृत्युदंड और अन्य नौ दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। अदालत ने इस अपराध को गंभीर और जघन्य हत्या माना, न कि आत्मरक्षा के सामान्य मामले के रूप में देखा गया।

उनका तर्क है कि घटना को इस तरह प्रस्तुत करके, जिसमें गोली चलाने की कार्रवाई को आत्मरक्षा के रूप में सामान्य बनाने का प्रयास दिखाई देता है, अपूर्वानंद ने इसे अपने व्यापक तर्क के अनुरूप ढालने की कोशिश की।

उनके अनुसार, इस प्रस्तुति में हिंदू पक्ष को आक्रामक और मुस्लिम पक्ष को पीड़ित के रूप में दिखाया गया, जबकि घटना में मृतक एक हिंदू युवक था। उनका कहना है कि इस प्रकार की व्याख्या जटिल घटनाओं को पूर्वनिर्धारित वैचारिक ढाँचे में फिट करने के प्रयास जैसा प्रतीत होती है।

हिंदू त्योहारों को हिंसक प्रदर्शन के तौर पर दिखाया गया

बातचीत के दौरान अपूर्वानंद ने हिंदू धार्मिक आयोजनों और त्योहारों को लेकर भी तीखी टिप्पणियाँ कीं। उन्होंने दावा किया कि रामनवमी के अवसर पर 13-14 साल की आयु के बच्चे बड़ी संख्या में तलवारें लेकर मुस्लिम बस्तियों और घरों के सामने से गुजरते हैं तथा इसे अपना अधिकार समझते हैं।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कई स्थानों पर आयोजित होने वाले हिंदू जागरण अब देवी-देवताओं की महिमा का गायन करने के बजाय मुसलमानों और मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ आपत्तिजनक तथा भड़काऊ गीतों के मंच बन गए हैं। उनके अनुसार, ऐसे आयोजनों में धार्मिक भक्ति की जगह वैमनस्य और आक्रामकता ने ले ली है।

अपूर्वानंद ने इन घटनाओं और प्रवृत्तियों को समाज के चरम पतन का उदाहरण बताया। उनका तर्क था कि धार्मिक आयोजनों और सार्वजनिक उत्सवों का स्वरूप बदलकर अब ऐसे रूप में सामने आ रहा है, जो सामाजिक सौहार्द को कमजोर करता है और समुदायों के बीच तनाव को बढ़ाता है।

उन्होंने आगे बताया कि इस प्रकार की टिप्पणियाँ कुछ घटनाओं या आरोपों के आधार पर पूरे हिंदू धार्मिक और सांस्कृतिक परिदृश्य को सामान्यीकृत कर प्रस्तुत करती हैं।

उनके अनुसार, रामनवमी, जागरण और अन्य धार्मिक आयोजनों में करोड़ों लोग भाग लेते हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य धार्मिक आस्था, भक्ति और सांस्कृतिक परंपराओं का पालन होता है। ऐसे में कुछ विवादित घटनाओं को आधार बनाकर पूरे समुदाय या समस्त धार्मिक आयोजनों को नकारात्मक रूप में चित्रित करना एकतरफा निष्कर्ष माना जा सकता है।

ईसाइयों को भी हिंदुओं का शिकार बताया गया

बातचीत के दौरान ईसाई समुदाय को भी हिंदू समाज और मीडिया को पीड़ित बताने का प्रयास किया गया। अपूर्वानंद ने दावा किया कि भारत में ईसाइयों पर हर दिन हमले हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि पादरियों की पिटाई की जाती है, कब्रों को नुकसान पहुँचाया जाता है, जन्मदिन समारोहों पर हमले होते हैं और धार्मिक सभाओं में तोड़फोड़ की जाती है।

अपूर्वानंद ने यह भी तर्क दिया कि ईसाई संस्थानों पर धर्मांतरण के आरोप बेबुनियाद तरीके से लगाए जाते हैं। उनके अनुसार, कई पीढ़ियों से भारतीय छात्र मिशनरी स्कूलों में पढ़ते रहे हैं और ईसाई अस्पतालों की सेवाएँ लेते रहे हैं, लेकिन इससे वे ईसाई नहीं बन गए। इस आधार पर उन्होंने धर्मांतरण को लेकर उठाई जाने वाली चिंताओं पर सवाल खड़े किए।

हालाँकि उनका मानना है कि धर्मांतरण को लेकर सालों से उठती रही बहस और शिकायतों को नजरअंदाज करता है। अलग-अलग राज्यों में समय-समय पर ऐसे आरोप लगाए गए हैं कि कुछ मामलों में प्रलोभन, दबाव, धोखाधड़ी या अन्य तरीकों से धर्मांतरण कराने की कोशिश की गई। इन आरोपों के आधार पर कई FIR दर्ज हुई हैं और जाँच एजेंसियों ने संगठित धर्मांतरण नेटवर्क, विदेशी फंडिंग तथा कमजोर और वंचित समुदायों को लक्षित करने से जुड़े मामलों की जाँच भी की है।

उन्होंने बताया कि प्रत्येक आरोप की सत्यता और वैधता का अंतिम निर्णय अदालतों को करना है, लेकिन धर्मांतरण को लेकर मौजूद सभी चिंताओं को केवल हिंदू समाज की आशंका या पूर्वाग्रह बताकर खारिज कर देना एकतरफा दृष्टिकोण माना जा सकता है।

इसी संदर्भ में आलोचक हाल के सालों में चर्चित रहे कुछ मामलों और संगठनों का उल्लेख करते हैं, जिन पर हिंदुओं के धर्मांतरण को बढ़ावा देने के आरोप लगाए गए। उनके अनुसार, ऐसे मामलों की मौजूदगी यह दर्शाती है कि धर्मांतरण को लेकर चल रही बहस को पूरी तरह निराधार बताना सही नहीं है।

उन्होंने तर्क दिया कि इस विषय पर निष्पक्ष चर्चा के लिए सभी पक्षों के दावों, आरोपों और मौजूद जानकारियों की समान रूप से जाँच की जानी चाहिए, न कि किसी एक पक्ष को पूरी तरह निर्दोष और दूसरे को पूरी तरह दोषी मान लिया जाना चाहिए।

न्यायपालिका, पुलिस, नौकरशाही और सेना पर बहुसंख्यकों से नफ़रत करने का आरोप

बातचीत के अंतिम हिस्से में अपूर्वानंद ने दावा किया कि बहुसंख्यकवादी घृणा अब न्यायपालिका, नौकरशाही, पुलिस और सेना जैसी संस्थाओं तक पहुँच चुकी है। उनके अनुसार, हिंसा अब केवल सामाजिक स्तर तक सीमित नहीं रही, बल्कि संस्थागत स्वरूप धारण कर चुकी है।

अपने दावों के समर्थन में उन्होंने ऐसे मामलों का उल्लेख किया, जिनमें पुलिस या अदालतों पर कथित रूप से घृणास्पद भाषणों को यह कहकर उचित ठहराने का आरोप लगाया गया कि संबंधित व्यक्ति केवल हिंदू समाज को संगठित या प्रेरित करने का प्रयास कर रहे थे।

अपूर्वानंद ने कुछ न्यायिक टिप्पणियों, न्यायाधीशों के रुख और राम जन्मभूमि मामले के फैसले की भी आलोचना करते हुए उन्हें बहुसंख्यकवादी दृष्टिकोण से प्रभावित बताया।

उन्होंने कहा कि यदि मुसलमानों का सामना किसी भीड़ या किसी हिंदू संगठन से होता है, तो सैद्धांतिक रूप से उनके पास पुलिस, जिलाधिकारी (DM) या पुलिस अधीक्षक (SP) जैसे संस्थानों तक पहुँचने का विकल्प होता है। लेकिन यदि यही संस्थाएँ कथित रूप से मुसलमानों के खिलाफ पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने लगें, तो उनके पास न्याय पाने का कोई प्रभावी माध्यम नहीं बचता।

अपूर्वानंद ने यह भी दावा किया कि भारतीय पुलिस व्यवस्था में ऐतिहासिक रूप से मुसलमानों और ईसाइयों के प्रति पूर्वाग्रह मौजूद रहे हैं, लेकिन अब ये पूर्वाग्रह अधिक सक्रिय रूप में दिखाई दे रहे हैं क्योंकि उन्हें कथित तौर पर संरक्षण और प्रोत्साहन मिल रहा है।

उनके अनुसार इस प्रकार के दावों के माध्यम से चर्चा का दायरा केवल हिंदू समाज या कुछ संगठनों की आलोचना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि न्यायपालिका, प्रशासन, पुलिस और अन्य सरकारी संस्थाओं सहित पूरे राज्य तंत्र को मुसलमानों और ईसाइयों के प्रति पक्षपाती के रूप में दिखाने का प्रयास रहा है। उनके अनुसार, इस तरह की प्रस्तुति भारतीय लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर व्यापक प्रश्नचिह्न लगाने वाली थी।

अपूर्वानंद का हिंदू विरोधी भावनाओं का इतिहास रहा है

अपूर्वानंद का हिंदुत्व, हिंदू संगठनों और हिंदू प्रतीकों को लेकर विवादित टिप्पणियाँ करने का एक लंबा इतिहास रहा है। उनके आलोचक उन्हें दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों में आरोपित व्यक्तियों में भी गिनाते हैं और आरोप लगाते हैं कि उन्होंने समय-समय पर ऐसे बयान दिए हैं जिन्हें हिंदू विरोधी विमर्श का हिस्सा माना जाता है।

मई 2019 में वामपंथी झुकाव वाले समाचार पोर्टल द वायर में प्रकाशित एक लेख में अपूर्वानंद ने ‘जय श्री राम’ के नारे को गुंडागर्दी की अभिव्यक्ति बताया था। उस लेख में उन्होंने उस समय की पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के उस रुख का भी समर्थन किया था, जिसमें उन्होंने ‘जय श्री राम’ के नारों को अपने खिलाफ लगाए गए अपमानजनक नारों के रूप में दिखाया था।

इसी लेख में अपूर्वानंद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उकसाने वाला बताया था। उनका कहना है कि इस प्रकार की भाषा केवल प्रधानमंत्री की आलोचना तक सीमित नहीं थी, बल्कि देश के सर्वोच्च निर्वाचित पद की गरिमा पर भी टिप्पणी के रूप में देखी गई।

उन्होंने वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी को बहुरूपिया कहकर भी संबोधित किया था। अपूर्वानंद का तर्क था कि जय श्री राम के नारे का राजनीतिक इस्तेमाल भारतीय जनता पार्टी द्वारा हिंदुओं के बीच मुसलमानों के प्रति नफरत पैदा करने के लिए किया गया।

अप्रैल 2023 में भी अपूर्वानंद ने ‘गजवा-ए-हिंद’ को लेकर अपनी राय व्यक्त की थी। उन्होंने दावा किया था कि ‘गजवा-ए-हिंद’ की अवधारणा को हिंदुत्ववादी समूह अपनी हिंसा को सही ठहराने के लिए बार-बार सामने लाते हैं, जबकि उनके अनुसार भारतीय मुसलमानों के बीच इस विचार की कोई वास्तविक चर्चा नहीं होती।

उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव की एक पोस्ट को उद्धृत करते हुए लिखा था कि खालिस्तान और हिंदू राष्ट्र जैसे विचारों की चर्चा के बीच ‘गजवा-ए-हिंद’ को शामिल करना निराशाजनक है।

अपूर्वानंद ने प्रश्न उठाया था कि क्या किसी भारतीय संगठन या व्यक्ति ने ‘गजवा-ए-हिंद’ के लिए उसी तरह खुला आह्वान किया है, जैसा अन्य विचारों के संदर्भ में देखा गया है। उन्होंने कहा था कि ‘गजवा-ए-हिंद’ का उल्लेख मुख्यतः हिंदुत्ववादी समूहों द्वारा किया जाता है और उनके अनुसार आम मुसलमान इस विषय पर बात नहीं करते।

उन्होंने कहा है कि इन बयानों और लेखों से यह साफ होता है कि अपूर्वानंद लंबे समय से हिंदुत्व, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा और उनसे जुड़े प्रतीकों की आलोचना करते रहे हैं।

वहीं उनके समर्थकों का तर्क है कि वे राजनीतिक और वैचारिक आलोचना कर रहे होते हैं। इसी कारण उनके वक्तव्यों को लेकर सार्वजनिक और राजनीतिक चर्चा में लगातार विवाद बना रहता है।

आलोचना या सामूहिक बुराई?

जिसे अकादमिक आलोचना के रूप में दिखाया गया, उनके अनुसार वास्तव में हिंदुओं और पूरे हिंदू समाज को बदनाम करने का प्रयास था। उनका कहना है कि हर प्रश्न की रूपरेखा और अपूर्वानंद द्वारा दिए गए जवाबों की गंभीरता से जाँच होनी चाहिए और उन्हें कानूनी कसौटी पर भी परखा जाना चाहिए, विशेषकर वह दावा जिसमें कहा गया कि हर हिंदू घर में एक हत्यारा या बलात्कारी मौजूद है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

‘राख’ पहली नहीं: ‘तांडव’ में हिंदू देवताओं का मजाक, ‘दहाड़’ में लव जिहाद पर पर्दा, ‘पाताल लोक’ में हिंदू-सिखों की नकारात्मक छवि; लंबी है Prime Video के वैचारिक एजेंडे की कहानी

हाल के वर्षों में अमेजन प्राइम वीडियो (Amazon Prime Video) और कई अन्य OTT प्लेटफॉर्म लगातार रचनात्मक स्वतंत्रता (creative liberty) की आड़ में भारतीय कहानियों में हिंदू-विरोधी और विभाजनकारी रंग भरते रहे हैं। बॉलीवुड की उस पुरानी प्रवृत्ति को आगे बढ़ाते हुए जिसमें तिलक लगाने वाले, धार्मिक और ऊँची जाति के हिंदुओं को अक्सर खलनायक दिखाया जाता है, कई OTT शो वास्तविक घटनाओं को अलग नजरिए से पेश करते हैं।

OTT शोज भी वास्तविक घटनाओं को दलित पीड़ितता, मुस्लिमों की अच्छाई और हिंदुओं के उपहास वाले विकृत नजरिए से पेश करते हैं। Amazon Prime Video की नई ओरिजिनल सीरीज ‘राख’ (Raakh) को लेकर भी विरोध हो रहा है। इस पर 1978 के गीता और संजय चोपड़ा अपहरण व हत्या मामले जिसे रंगा-बिल्ला केस के नाम से जाना जाता है में झूठी जातिगत उत्पीड़न की कहानी जोड़ने का आरोप है।

प्रमुख किरदारों की जाति और धर्म बदले गए, ऊँची जाति के हिंदुओं की जगह दलित और मुस्लिम, असली सिख रंगा-बिल्ला को हिंदू राज्जो और बाबू बना दिया गया

12 जून 2026 को रिलीज हुई ‘राख’ एक 8 एपिसोड की क्राइम थ्रिलर सीरीज है। इसमें अभिनेता अली फजल, सोनाली बेंद्रे, आमिर बशीर और राकेश बेदी मुख्य भूमिकाओं में हैं। इस सीरीज को 1978 के वास्तविक रंगा-बिल्ला अपहरण और हत्या मामले से प्रेरित बताया गया है।

हालाँकि, इस शो में वास्तविक पुलिस अधिकारियों और पत्रकारों की जातियों, धर्मों और उनकी भूमिकाओं को बदलकर जबरन ‘भीम-मीम’ नैरेटिव फिट किया गया है।

Prime Video की इस सीरीज ने व्यवस्थित जातिगत उत्पीड़न ‘मुस्लिम ईमानदार हैं’ और ब्राह्मण हिंदू बुरे हैं’ जैसे नैरेटिव गढ़े हैं जबकि असल मामले के रिकॉर्ड में ऐसी कोई बात मौजूद नहीं है।

शो में अभिनेता अली फजल ने सब-इंस्पेक्टर जयप्रकाश जाटव नाम के एक दलित अधिकारी की भूमिका निभाई है। उसके घर में ज्योतिबा फुले और डॉ. बी.आर. आंबेडकर की तस्वीरें दिखाई गई हैं। रंगा-बिल्ला मामले या उस समय के वास्तविक सब-इंस्पेक्टर से इसका कोई संबंध नहीं है। सीरीज में SI जयप्रकाश जाटव को पुलिस विभाग में जातिगत भेदभाव झेलते हुए दिखाया गया है। उसके सेवानिवृत्त हवलदार पिता को भी जातिगत भेदभाव का शिकार दिखाया गया है। जाटव के पिता को ‘जय भीम’ के नारे लगाते हुए भी दिखाया गया है।

दिलचस्प बात यह है कि शो में जावेद मुर्तजा नाम का एक मुस्लिम अधिकारी जाटव के मुख्य सहयोगी के रूप में दिखाया गया है, जो अपने स्वभाव में फिल्म शोले के ‘ईमान का पक्का’ रहीम चाचा की याद दिलाता है। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने ध्यान दिलाया कि Amazon Prime Video की ओरिजिनल सीरीज ‘राख’ में एक आलसी हवलदार को मिश्रा ब्राह्मण के रूप में दिखाया गया है।

उम्मीद के मुताबिक ‘ईमानदार’ और ‘निडर’ पत्रकार का किरदार एक मुस्लिम महिला के रूप में दिखाया गया है। जबकि वास्तविक घटना में बाबूलाल नाम के एक व्यक्ति ने अपहृत भाई-बहन को बचाने की कोशिश की थी, शो में बाबूलाल के किरदार को सलीम बना दिया गया है।

और मुख्य खलनायकों को हिंदू पहचान दी गई है तथा उनके नाम बाबू और राज्जो रखे गए हैं। इनमें से एक को हरियाणवी और दूसरे को महाराष्ट्र का दिखाया गया है। जबकि वास्तविकता में हत्यारे कुलजीत सिंह और जसबीर सिंह नाम के सिख पुरुष थे।

रंगा-बिल्ला केस: 1978 के संजय और गीता चोपड़ा अपहरण-हत्या की कहानी

यहाँ रंगा-बिल्ला मामले के बारे में जानना जरूरी है, जिससे Amazon Prime Video की वेब सीरीज ‘राख’ को ‘कुछ हद तक प्रेरित’ बताया गया है। 26 अगस्त 1978 को नौसेना अधिकारी मदन मोहन चोपड़ा के बच्चे 16 वर्षीय गीता और 13 वर्षीय संजय ऑल इंडिया रेडियो के ‘युवा वाणी’ कार्यक्रम में भाग लेने के लिए घर से निकले थे।

रास्ते में भारी बारिश के कारण उन्होंने एक कार से लिफ्ट ली। बाद में लोगों ने दोनों को कार के अंदर अपहरणकर्ताओं से संघर्ष करते देखा। एक व्यक्ति ने पुलिस को सूचना भी दी लेकिन पुलिस ने कार का नंबर गलत दर्ज कर लिया।

इसी बीच गीता और संजय के माता-पिता को लगा कि बच्चे कार्यक्रम में पहुँच गए होंगे। जब वे ऑल इंडिया रेडियो पहुँचे तो पता चला कि दोनों वहाँ कभी पहुँचे ही नहीं। इसके बाद उनकी तलाश शुरू हुई।

दो दिन बाद एक ग्वाले को दोनों के शव मिले। जाँच के दौरान पुलिस को पता चला कि अपहरण और हत्या के पीछे जसबीर सिंह उर्फ बिल्ला और कुलजीत सिंह उर्फ रंगा थे। दोनों ने चोटों का इलाज भी नकली पहचान से कराया था। इसके बाद पूरे देश में आक्रोश फैल गया और बड़े पैमाने पर तलाश अभियान चलाया गया। 31 अगस्त 1978 को पुलिस को अपहरण में इस्तेमाल की गई फिएट कार भी बरामद हो गई।

सीरीज ‘राख’ में दिखाया गया है कि दलित पुलिस अधिकारी जयप्रकाश जाटव राज्जो और बाबू का पीछा करते हुए आगरा तक पहुँचता है। लेकिन वास्तविक मामले में रंगा और बिल्ला को किसी एक पुलिस अधिकारी ने नहीं पकड़ा था। असल में सेना के जवानों जिनमें लांस नायक गुरतेज सिंह और ए.वी. शेट्टी शामिल थे, ने आगरा के पास कालका मेल ट्रेन में दोनों को पहचान लिया था। बाद में 8 सितंबर 1978 को उन्हें दिल्ली पुलिस के हवाले कर दिया गया।

पुलिस हिरासत में रंगा बिल्ला (फोटो साभार: ABP न्यूज)

रंगा और बिल्ला को अदालत ने दोषी ठहराया और दोनों को फाँसी की सजा सुनाई गई। बाद में तिहाड़ जेल में उन्हें फाँसी दे दी गई। गीता चोपड़ा के साथ यौन उत्पीड़न का भी आरोप लगा था लेकिन पोस्टमॉर्टम में इसकी पुष्टि नहीं हो सकी थी।

एक क्राइम थ्रिलर में बेजा जाति जोड़ने पर विवाद, लोगों ने उठाए सवाल

‘राख’ में दलित सब-इंस्पेक्टर जयप्रकाश जाटव को मुख्य किरदार के रूप में दिखाया गया है जबकि असल में जाँच का नेतृत्व दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर वी.पी. गुप्ता ने किया था। उनकी टीम में सब-इंस्पेक्टर राम चंदर उनके मुख्य सहयोगी थे। लेकिन शो में SI राम चंदर की जगह SI जावेद मुर्तजा को दिखाया गया है।

इसी तरह, गीता और संजय चोपड़ा को बचाने की कोशिश करने वाला प्रत्यक्षदर्शी बाबूलाल नाम का एक हिंदू व्यक्ति था लेकिन शो में बाबूलाल की जगह सलीम नाम का एक मुस्लिम किरदार दिखाया गया है। वास्तविक रंगा-बिल्ला मामले को विस्तार से कवर करने वाली पत्रकार प्रभा दत्त नाम की एक हिंदू महिला थीं। हालाँकि, सीरीज में उनकी जगह निसार नाम की एक मुस्लिम पत्रकार को दिखाया गया है।

सोशल मीडिया पर कई लोगों ने वास्तविक घटनाओं से प्रेरित इस कहानी में जाति और धर्म आधारित वैचारिक रंग दिए जाने पर सवाल उठाए हैं।

राहुल त्यागी नाम के एक सोशल मीडिया उपयोगकर्ता ने लिखा, “इस सीरीज में अली फजल द्वारा निभाए गए मुख्य जाँच अधिकारी को एक दलित के रूप में दिखाया गया है जिसके पिता सेवानिवृत्त हवलदार हैं और उन्हें जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा था। उसका मुख्य सहयोगी एक मुस्लिम अधिकारी है जबकि आलसी हवलदार एक ब्राह्मण है और ईमानदार पत्रकार एक मुस्लिम महिला है। लेकिन वास्तविक मामले में मुख्य जाँच अधिकारी वी.पी. गुप्ता थे, उनके सहयोगी राम चंदर थे और पुलिस आयुक्त जे.एन. चतुर्वेदी थे। मुझे फिल्मों में जातिगत उत्पीड़न दिखाने से कोई समस्या नहीं है लेकिन समस्या तब है जब इसे प्रचार के लिए इस्तेमाल किया जाए।”

X यूजर ‘स्किन डॉक्टर’ ने लिखा, “…यह रचनात्मक स्वतंत्रता नहीं है। रचनात्मक स्वतंत्रता का उद्देश्य कहानी को बेहतर बनाना होता है, न कि किसी खास वैचारिक एजेंडे के अनुरूप ऐतिहासिक तथ्यों को बदलना। यह एक और उदाहरण है कि कैसे रचनात्मक स्वतंत्रता के नाम पर इतिहास को खुलेआम बदला जा सकता है।”

एक अन्य एक्स उपयोगकर्ता ने ‘राख’ के लेखकों अनुशा नंदकुमार और संदीप सकेत की आलोचना करते हुए कहा कि उन्होंने इस भयावह अपहरण और हत्या के मामले को ‘जातिगत मोड़’ दे दिया।

यूजर ने लिखा, “लेखकों ने अली फज़ल के किरदार को दलित पुलिस अधिकारी, उसके सहयोगी को मुस्लिम, ईमानदार पत्रकार को मुस्लिम महिला और आलसी हवलदार को ब्राह्मण के रूप में दिखाने का फैसला किया। यह सब ‘रचनात्मक स्वतंत्रता’ के नाम पर और कुछ खास वर्गों को खुश करने के लिए जानबूझकर किया गया लगता है। वामपंथी प्रोपेगेंडा इसी तरह काम करता है। एक बेहद महत्वपूर्ण और भयावह अपराध को जातिगत रंग दे दिया गया।”

हिंदुओं के खिलाफ इस्लामो-लेफ्टिस्ट एक्टिविज्म को बढ़ावा दे रहा Prime Video

अमेजन प्राइम वीडियो बार-बार ऐसा करता रहा है। इस ऑनलाइन स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म ने लगातार ऐसे लेखकों, निर्देशकों और अभिनेताओं को मंच दिया है जिनका झुकाव ऊँची जातियों के खिलाफ नैरेटिव की ओर रहा है। ‘राख’ ऐसा पहला शो नहीं है जिसमें बेवजह जाति या धर्म आधारित पीड़ितता की कहानी जोड़ी गई हो। यह भी पहली बार नहीं है जब किरदारों की पहचान बदलकर उत्पीड़क-पीड़ित का ढाँचा तैयार किया गया हो और खासकर ब्राह्मण, ठाकुर और बनिया जैसे तथाकथित ऊँची जाति के हिंदुओं को निशाना बनाया गया हो।

चाहे प्राइम वीडियो हो, नेटफ्लिक्स हो या अन्य बड़े OTT प्लेटफॉर्म इनमें से ज्यादातर अलग-अलग स्तर पर ऐसे कंटेंट ला रहे हैं। जिनमें हिंदू-विरोधी पूर्वाग्रह, मुस्लिम पीड़ितता और ‘भीम-मीम’ नैरेटिव देखने को मिलते हैं।

साल 2020 में ‘राख’ के निर्देशक प्रोसित रॉय ने प्राइम वीडियो की वेब सीरीज ‘पाताल लोक’ का भी आंशिक निर्देशन किया था। बॉलीवुड अभिनेत्री अनुष्का शर्मा द्वारा निर्मित इस शो को खुलकर हिंदू-विरोधी बताया गया था और इसमें सिखों को भी नकारात्मक रूप में दिखाया गया था। वेब सीरीज में ऐसे दृश्य शामिल थे, जिनमें सिखों द्वारा दलितों और पिछड़ी जातियों पर अत्याचार दिखाया गया था। इसके अलावा सिख समुदाय से जुड़े बलात्कार वाले आपत्तिजनक दृश्य भी शामिल थे।

इस शो में अभिनेता जयदीप अहलावत ने इंस्पेक्टर हाथीराम चौधरी की भूमिका निभाई है। एक एपिसोड में देखने को मिलता है कि इंस्पेक्टर चौधरी एक मेले में चल रहे भक्त प्रह्लाद के नाटक तक पहुँच जाता है। गुंडे उसका पीछा कर रहे होते हैं और उनसे बचने के लिए वह मंच पर चढ़ जाता है। संयोग से उसी समय भगवान विष्णु का अवतार नरसिंह खंभे को चीरकर राक्षस हिरण्यकश्यप के सामने प्रकट होता है। इंस्पेक्टर चौधरी भाग रहे नरसिंह का किरदार निभा रहे कलाकार को धक्का देता है, जिससे वह सीधे हिरण्यकश्यप के ऊपर जा गिरता है।

यह शो एक मुस्लिम, एक दलित, एक हिंदू और एक ट्रांसजेंडर चार अपराधियों की कहानी के इर्द-गिर्द घूमता था। शो के निर्माताओं ने अपराधियों के ‘मानवीय पक्ष’ को उभारा और उन्हें ऐसे बेबस लोगों के रूप में दिखाया जो केवल इसलिए परेशान हैं क्योंकि उन्हें ISI और पाकिस्तान से जुड़े मामलों में फँसाया जा रहा है।

मुस्लिम अपराधी कबीर अपनी धार्मिक पहचान छिपाता है। कबीर का पिता हाथीराम से कहता है कि उसके बड़े बेटे की हत्या इसलिए कर दी गई क्योंकि वह एक खास धर्म से था। उस दृश्य में भगवा झंडे लिए हिंदू उग्रवादी नरसंहार करते हुए दिखाई देते हैं। कबीर का पिता कहता है कि इसी कारण उसने अपने दूसरे बेटे को मुस्लिम तक नहीं बनने दिया लेकिन तुम लोगों ने उसे आतंकवादी बना दिया।

शो का खलनायक ‘त्यागी’ महादेव का कट्टर भक्त दिखाया गया है।

साल 2021 में प्राइम वीडियो ने ‘मुंबई डायरीज 26/11’ नाम का शो रिलीज किया। यह शो पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित इस्लामी आतंकी हमले के दौरान डॉक्टरों, नर्सों, वार्ड बॉय, सुरक्षा कर्मियों, पुलिसकर्मियों, पत्रकारों और अन्य फ्रंटलाइन वर्कर्स की कठिनाइयों पर केंद्रित था।

हालाँकि, यह शो धर्मनिरपेक्षता दिखाने में हद से आगे निकल गया। उस समय कई दर्शकों ने अभिनय की तारीफ की लेकिन भी दिखा कि ‘मुंबई डायरीज’ ने मुस्लिम किरदार डॉ अहान मिर्जा को सहिष्णु और उदार व्यक्ति के रूप में महिमामंडित किया जबकि हिंदू वार्ड ब्याय समर्थ को नफरत से भरा कट्टरपंथी दिखाया गया।

समर्थ को असभ्य, असहिष्णु और खुलकर सांप्रदायिक दिखाया गया है। वह कई मौकों पर गरीब मुस्लिम डॉक्टर के साथ दुर्व्यवहार भी करता है। पत्रकार मानसी का किरदार शो के निर्देशक के मुखपत्र जैसा दिखाई देता है और अंतिम एपिसोड में वह 26/11 हमलों के पीछे मौजूद इस्लामी जिहादी मानसिकता पर सफाई देते हुए एक लंबा संवाद तक बोलती है।

साल 2021 में प्राइम वीडियो ने एक और हिंदू-विरोधी शो ‘तांडव’ रिलीज किया। इस शो का निर्देशन अली अब्बास जफर ने किया था। 14 जनवरी 2021 को रिलीज हुई वेब सीरीज ‘तांडव’ में हिंदू-विरोधी कंटेंट और हिंदू देवी-देवताओं का मजाक उड़ाने वाले दृश्यों भर-भर के थे। उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में अमेजन इंडिया, निर्देशक, निर्माता और कलाकारों के खिलाफ कई FIR दर्ज की गईं।

सैफ अली खान और कुख्यात इस्लामो-वामपंथी मोहम्मद जीशान अय्यूब अभिनीत इस शो के पहले एपिसोड में अय्यूब को भगवान शिव का किरदार निभाते हुए और हाथ में त्रिशूल लिए दिखाया गया। मंच संचालक मजाकिया अंदाज में उसके सोशल मीडिया फॉलोअर्स का जिक्र करता है और कहता है कि उसे अपने फॉलोअर्स बढ़ाने के लिए ट्वीट करना चाहिए या तस्वीरें अपलोड करनी चाहिए। इसके बाद दर्शकों द्वारा ‘आजादी’ के नारे लगाए जाते हैं।

प्राइम वीडियो की सुपरहिट सीरीज ‘मिर्जापुर’ ने ससुर-बहू और देवर-भाभी के रिश्तों की पूरी मर्यादा को तार-तार कर दिया। इतना ही नहीं, अक्टूबर 2020 में यह भी सामने आया था कि मेवात में निकिता नाम की एक हिंदू लड़की को परेशान करने और इस्लाम में धर्मांतरण के लिए मजबूर करने वाले तौसीफ नाम के एक मुस्लिम युवक ने वेब सीरीज ‘मिर्जापुर’ देखने के बाद उसकी हत्या करने का फैसला किया था।

साल 2023 में प्राइम वीडियो ने सोनाक्षी सिन्हा, गुलशन देवैया, विजय वर्मा और वारिस अहमद जैदी अभिनीत वेब सीरीज ‘दहाड़’ रिलीज की। इस क्राइम थ्रिलर में दो कहानियाँ समानांतर रूप से चलती हैं। पहली कहानी एक ऊँची जाति की हिंदू लड़की रजनी की है, जो अल्ताफ नाम के एक मुस्लिम युवक के साथ भाग जाती है। दूसरी कहानी सायनाइड मोहन पर आधारित एक सीरियल किलर की है।

प्रेम और रेप जिहाद के अनगिनत पीड़ितों का मजाक उड़ाने जैसा प्रतीत होने वाली इस सीरीज में उस पैटर्न के अस्तित्व से इनकार किया गया जिसमें मुस्लिम पुरुषों पर हिंदू लड़कियों को इस्लाम में धर्मांतरित करने के लिए प्रेम और यौन संबंधों को हथियार बनाने तथा हिंदू आस्था का अपमान करने के आरोप लगते रहे हैं।

उस समय ऑपइंडिया के एक रिव्यू में बताया गया था कि सीरीज में राजपूतों को गुंडों के रूप में दिखाया गया, हिंदू संगठनों (बजरंग दल और ऐसे अन्य संगठनों) को नकारात्मक रूप में पेश किया गया, लव जिहाद को सामान्य दिखाया गया, जातिगत भेदभाव की काल्पनिक कहानियाँ जोड़ी गईं और मुख्य खलनायक के रूप में एक ऊँची जाति के हिंदू को चुना गया।

इससे पहले प्राइम वीडियो ने ‘शेरनी’ नाम की एक सीरीज रिलीज की थी। विद्या बालन अभिनीत यह वेब सीरीज वास्तविक घटनाओं पर आधारित थी। हालाँकि, ‘राख’ की तरह ही ‘शेरनी’ में भी हिंदू IFS अधिकारी के. आभारना को बदलकर विद्या बालन द्वारा निभाए गए ईसाई किरदार विन्सेंट के रूप में दिखाया गया। वहीं, वास्तविक जीवन के शिकारी असगर अली खान की जगह कलावा पहनने वाले रंजन राजहंस को दिखाया गया।

2020 में अमेजन प्राइम की तत्कालीन क्रिएटिव हेड अपर्णा पुरोहित को उनके वामपंथी झुकाव के लिए सोशल मीडिया पर घेरा गया था। उनके सोशल मीडिया पेज हिंदू-विरोधी प्रचार, प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के प्रति नफरत भरी पोस्टों से भरे हुए थे।

ये OTT प्लेटफॉर्म मनोरंजन को ब्रेनवॉश करने के औजारों में बदल रहे हैं, हिंदुओं को ‘गैसलाइ’ कर रहे हैं और एक विभाजनकारी एजेंडा आगे बढ़ा रहे हैं। ‘राख’ को भी प्राइम वीडियो के उसी तरीके की अगली कड़ी माना जा रहा है, जहाँ कहानी में तथ्यों से ज्यादा वैचारिक संदेशों को महत्व दिया गया है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

100 साल पुराने मंदिर के पास सरकारी जमीन पर चर्च बनाने का था प्लान, मद्रास HC ने लगाई रोक: धर्मांतरण की थी आशंका, पढ़ें- कोर्ट ने क्या कहा?

मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु के कोयंबटूर में एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कलापट्टी मेन रोड पर स्थित मरिअम्मन मंदिर के पास चर्च बनाने पर रोक लगा दी है। जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस वी लक्ष्मीनारायणन की बेंच ने यह अंतरिम आदेश दिया।

यह फैसला स्थानीय निवासी बालासुब्रमण्यम की याचिका पर आया है। उन्होंने जिला कलेक्टर और राजस्व विभागीय अधिकारी (RDO) के आदेश के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हाई कोर्ट ने मामले से जुड़े सभी सरकारी रिकॉर्ड्स की जाँच की। जाँच में पता चला कि जिस जमीन पर चर्च बनना था, वह कागजों में ‘सार्वजनिक सड़क’ दर्ज है।

कोर्ट ने नोट किया कि इस इलाके में ईसाई आबादी बहुत ही कम है। वहीं दूसरी तरफ वहाँ रहने वाली बहुसंख्यक हिंदू आबादी इस चर्च का कड़ा विरोध कर रही है। कोर्ट का मानना है कि 100 साल से भी पुराने हिंदू मंदिर के बिल्कुल पास बड़ा चर्च बनाना गलत इरादे की ओर इशारा करता है।

25 मई 2026 को दिए फैसले में जस्टिस स्वामीनाथन ने लिखा कि कोयंबटूर एक सांप्रदायिक रूप से बेहद संवेदनशील शहर है। यह शहर अतीत में बम धमाके और खूनी धार्मिक दंगे झेल चुका है। प्रस्तावित चर्च मंदिर से बिल्कुल थोड़ी ही दूरी पर बनाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और हमारा समाज विविधताओं से भरा है। इसलिए देश में धार्मिक सौहार्द और भाईचारा बनाए रखना बहुत जरूरी है।

मद्रास हाई कोर्ट के जजमेंट का स्क्रीनशॉट

जस्टिस स्वामीनाथन ने साफ किया कि संविधान सबको अपना धर्म मानने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है। लेकिन यह अधिकार देश की कानून व्यवस्था और शांति के दायरे में ही आता है। हालाँकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार को किसी भी विरोध के आगे घुटने नहीं टेकने चाहिए। अगर किसी का कानूनी अधिकार पूरी तरह सही है और विरोध बेबुनियाद है, तो सरकार को उस अधिकार को लागू कराने के लिए किसी भी हद तक जाना चाहिए।

मद्रास हाई कोर्ट के जजमेंट का स्क्रीनशॉट

जस्टिस स्वामीनाथन ने याचिकाकर्ता की एक और बात पर विचार किया। याचिकाकर्ता ने कहा था कि इस चर्च का इस्तेमाल धर्मांतरण (धर्म बदलने) की गतिविधियों के लिए हो सकता है। उनके वकील ने आशंका जताई कि नई इमारत धर्मांतरण का केंद्र बन सकती है। इस पर कोर्ट ने कहा कि हम एक धर्मनिरपेक्ष देश हैं। हमारा समाज विविधताओं से भरा हुआ है। इसलिए देश में धार्मिक सौहार्द और भाईचारा बनाए रखना बहुत जरूरी है। अगर किसी का धार्मिक अधिकार पूरी तरह कानूनन साबित होता है, तो उसे लागू कराना सरकार का कर्तव्य है।

मद्रास हाई कोर्ट के जजमेंट का स्क्रीनशॉट

याचिकाकर्ता ने लगाया कट्टरपंथी संगठनों को बढ़ावा मिलने का आरोप

याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट के सामने एक बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा कि राज्य में मुख्यमंत्री सी जोसफ विजय की सरकार आने के बाद से कुछ कट्टरपंथी संगठन काफी सक्रिय हो गए हैं। उनके हौसले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। याचिकाकर्ता ने राज्य के बदलते सामाजिक और धार्मिक माहौल को दिखाने के लिए कोर्ट के सामने कुछ उदाहरण भी रखे। उनका कहना है कि नई सरकार बनने के बाद से राज्य की स्थिति में काफी बदलाव आया है।

याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि विधानसभा के अध्यक्ष जेसीडी प्रभाकर खुद हजारों बाइबिल मुफ्त बाँटने का दावा करते हैं। उन्होंने विधानसभा के अपने उद्घाटन भाषण में भी बाइबिल की आयतों का जिक्र किया था। इसके अलावा याचिकाकर्ता ने विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन के एक बयान का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि जब उदयनिधि स्टालिन ने विधानसभा में सनातन धर्म को खत्म करने की बात कही, तो सत्ताधारी दल ने इस पर कोई आपत्ति नहीं जताई। सत्ता पक्ष के किसी भी नेता ने इस विवादित बयान की निंदा तक नहीं की।

गाँव में बेहद कम है ईसाई आबादी

जिस गाँव में चर्च बनाने का प्रस्ताव है, वहाँ ईसाई समुदाय की आबादी बहुत ही कम है। इस गाँव में कुल मिलाकर लगभग 1000 परिवार रहते हैं। इनमें से 950 परिवार हिंदू हैं और 15 परिवार मुस्लिम हैं। बाकी बचे परिवारों में से कुछ ही ईसाई मजहब से जुड़े हैं। जनवरी 2010 में जिला कलेक्टर ने मंदिर के पास चर्च बनाने की मंजूरी का एक आदेश जारी किया था। गाँव के हिंदू परिवारों ने इस फैसले का कड़ा विरोध किया। उन्होंने 2011 में जिला कलेक्टर के इस आदेश को कोयंबटूर की जिला मुंसिफ कोर्ट में चुनौती दी। यह दीवानी मामला (सिविल सूट) अदालत में आज भी लंबित है।

इस मामले के करीब 13 साल बाद कुछ निजी लोगों ने चर्च का निर्माण फिर से शुरू करने की कोशिश की। इसके लिए उन्होंने जरूरी आदेश भी हासिल कर लिए। लेकिन इस निर्माण के कारण इलाके में कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ गई। माहौल खराब होता देख जिला कलेक्टर ने उन्हें तुरंत काम रोकने का निर्देश दिया। इसके बाद साल 2024 में ‘चर्च ऑफ साउथ इंडिया’ (CSI) ने जिला कलेक्टर के इस रोक वाले आदेश के खिलाफ मद्रास हाई कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की।

अप्रैल 2026 में मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस एम दंडपाणि की सिंगल बेंच ने इस मामले पर सुनवाई की। अदालत ने मामले के गुण-दोष पर कोई भी अंतिम फैसला सुनाने से साफ इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि चूँकि निचली अदालत में पहले से ही एक सिविल सूट लंबित है, इसलिए अभी इस पर कोई फैसला नहीं लिया जा सकता। हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे निचली अदालत से सिविल सूट का फैसला आने के बाद ही नए सिरे से आवेदन करें। तब तक चर्च के निर्माण कार्य पर पूरी तरह रोक रहेगी।

मद्रास हाई कोर्ट ने पहले भी की थी धार्मिक अधिकारों की रक्षा

पिछले साल दिसंबर में मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने एक बड़ा फैसला सुनाया था। अदालत ने हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों की रक्षा की थी। कोर्ट ने डिंडीगुल के ‘मांडू कोविल’ और मदुरै की ‘तिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी’ पर स्थित दीपथून स्तंभ पर कार्तिकाई दीपम जलाने के अधिकार को सही ठहराया था।

इस मामले की सुनवाई हाई कोर्ट के सिंगल जज जस्टिस जीआर स्वामीनाथन ने की थी। उन्होंने डिंडीगुल और मदुरै के जिला प्रशासनों को कड़ी फटकार लगाई थी। जस्टिस स्वामीनाथन ने कहा था कि प्रशासन हिंदू भक्तों के लिए दीये जलाने की जरूरी व्यवस्था करने में पूरी तरह नाकाम रहा। कोर्ट ने साफ किया था कि प्रशासन को भक्तों के धार्मिक अधिकारों का सम्मान करना चाहिए।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

मेसी और रोनाल्डो: साँझ के सूरज अभी डूबे नहीं, यह खेल अभी बाकी है

कुछ रातें ऐसी होती हैं जब किसी स्टेडियम में बैठे हजारों दर्शक सिर्फ एक मैच नहीं देखते, वे अपने सामने एक किंवदंती को समय के विरुद्ध लड़ते हुए देखते हैं। और फिर ऐसी ही रातों की कहानियाँ पीढ़ियों तक सुनाई जाती हैं।

अमेरिका के कन्सास सिटी स्टेडियम में बीती रात कुछ ऐसा ही हुआ। 76,000 दर्शकों से खचाखच भरे इस मैदान पर विश्वविजेता अर्जेंटीना का सामना ग्रुप जे में अल्जीरिया से था। वह अल्जीरिया जो पिछले पच्चीस मैचों से अजेय चली आ रही थी। कागज पर यह एक कठिन मुकाबला था। लेकिन कभी-कभी फुटबॉल कागजों पर नहीं खेला जाता। क्योंकि जब मैदान पर लियोनेल मेसी मौजूद हों, तब हर आँकड़ा, हर संभावना और हर भविष्यवाणी अचानक छोटी पड़ जाती है।

और फिर, उस रात, दुनिया ने एक बार फिर जादू देखा।

पिछले विश्व कप की विजेता अर्जेंटीनी टीम का सामना ग्रुप जे की अपनी विरोधी टीम अल्जीरिया से था। वह अल्जीरिया जो अपने पिछले पच्चीस मैचों में अविजित थी। इस टूर्नामेंट में सदैव अमूमन धीमी रफ्तार से शुरुआत करने के लिए जाने जानी वाली ‘ला अल्बीसेलेस्त’ अपनी पारंपरिक सफेद-नीली धारियों वाली जर्सी में 4-3-3 की फॉर्मेशन के संग मैदान पर उतरी। गोलपोस्ट पर पिछले विश्व कप के नायक रहे एमिलियानो मार्तिनेज मौजूद थे। डिफेंस का नेतृत्व कर रहे थे रोमेरो। मिडफील्ड में, रौड्रिगो दी पॉल, मैक एलिस्टर व एंज़ो फरनान्देज़ की, पिछले विश्व कप की ही तिकड़ी थी। अटैकिंग लाइन में शुरुआती लाइन अप में थे कप्तान मेसी, लाऊतूरो मार्टीनेज़ व थिआगो अल्माडा। स्टार्टिंग लाइन अप में जगह पाते ही मेसी लगातार छह विश्व कप में अपने वतन के लिए मैदान में उतरने वाले पहले खिलाड़ी बन गए। यह राष्ट्रीय टीम के लिए उनका 200वाँ मैच भी होने जा रहा था।

यह मैच पूरी तरह से एक विशेष खिलाड़ी पर केंद्रित रहा। 39 वर्षीय विश्वविजेता लियोनेल आंद्रेस मेसी कूकुतीनी। यह उनके खेल के जादू का ही तो असर था कि गेंद पर 53% नियंत्रण रखने के पश्चात भी, पिछले पच्चीस मैचों से अविजित, अल्जीरिया की टीम आज मैदान पर कुछ भी न कर सकी। मेसी ने अपनी टीम के लिए तीन जरूरी गोल स्कोर किए। उनके तीन गोलों की ही बदौलत, अर्जेंटीना ग्रुप जे का यह मैच 3-0 से जीत गई।

यह बेहद काव्यात्मक ही तो था कि इस मैच से ठीक-ठीक बीस वर्ष पूर्व रोसारियो के कस्बे से निकले नन्हें जादूगर ‘ला पुल्गा’ ने, अठारह वर्ष की उम्र में, 2006 विश्व कप में अर्जेंटीना के लिए अपने सफर की शुरुआत की थी।

यह वही विश्व कप था जिसमें आज अल्जीरिया के लिए गोलपोस्ट पर खड़े लुका जिदान के पिता जिनेदिन जिदान ने अपने खेल से संपूर्ण विश्व को अपना दीवाना बना लिया था। इस हैट्रिक के साथ ही मेसी विश्व कप में हैट्रिक लगाने वाले सबसे उम्रदराज खिलाड़ी भी बन गए। साथ ही साथ मेसी विश्व कप के लगातार पांच मैचों में गोल स्कोर करने वाले पहले, और इकलौते, खिलाड़ी भी बन गए। क्रिस्टियानो रोनाल्डो के बाद वो दूसरे ऐसे खिलाड़ी भी बन गए जिन्होंने विश्व कप के पांच भिन्न-भिन्न संस्करणों में गोल स्कोर किया है।

फ्रांस का दबदबा और सेनेगल का प्रतिरोध

वहीं, पिछले संस्करण की उपविजेता, फ्रेंच टीम, का सामना अपने चिर प्रतिद्वंद्वी सेनेगल से था। फ्रेंच टीम के पास बेहतरीन युवा खिलाड़ियों का इतना बड़ा पूल है कि वो एक साथ विश्व कप में दो से तीन टीमों को उतार सकता है। ‘लेस ब्ल्यूज’ (फ्रांस) को इस मैच में कुछ पुराने हिसाब भी चुकाने थे।

फ्रेंच टीम कितनी घातक है इसका पता इसी बात से चल जाता है कि उसकी शुरूआती लाइन अप में अटैक की जिम्मेदारी ओलीसे, एमबाप्पे, डेंबेले व देस़िरे दोऊ पर थी। साथ ही साथ चेर्की, बार्कोला व थुर्रम जैसे घातक अटैकिंग खिलाड़ी बेंच पर अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। हालाँकि, सेनेगल के पास गोलपोस्ट पर एदुआर्द मेंडी, डिफेंस में कूलिबाली, अटैकिंग लाइन में सादियो माने व निकोलस जैक्सन मौजूद थे। यह सभी खिलाड़ी कई वर्षों तक इंग्लिश प्रीमियर लीग में खेलने का अनुभव रखते हैं।

न्यूयॉर्क के न्यूजर्सी स्टेडियम में मैच की शुरुआत होती है। दोनों ही टीमें जीत कर जरूरी अंक बटोरने की फिराक में थीं। फ्रेंच टीम शुरू से ही सेनेगल के गोलपोस्ट पर हमले करने के प्रयास कर रही थी। राबियो व डेंबेले बार-बार मिडफील्ड से गेंद को एमबाप्पे तक पहुंचाने के लिए प्रयासरत थे। हांलांकि, सेनेगल फ्रेंच टीम को गोल करने से रोके हुए थी। फलस्वरूप, मैच का पहला हाफ गोलरहित रहा।

लेकिन आगे कहानी बदलने वाली थी। मैच के छियासठवें मिनट में रियाल मैड्रिड के स्टार फुटबॉलर कीलियन एमबाप्पे गोल लगा कर फ्रांस को बढ़त दिला देते हैं। लेकिन सेनेगल संयम नहीं गंवाती और कैसे भी एक अंक लेने के प्रयास में रहती है। परन्तु अस्सीवें मिनट में फ्रेंच कोच देश्चैंप्स ओसमान डेंबेले को सब्स्टीट्यूट कर बारकोला को मैदान में भेजते हैं। कोच का बारकोला को अंदर भेजना तुरंत रंग लाता है। अपने पहले ही टच से बारकोला एक गोल स्कोर कर स्कोर को 2-0 कर देते हैं। आगे, हांलांकि, अंतिम क्षणों में दोनों ही टीमें एक-एक गोल दागती हैं। मैच का अंत 3-1 से फ्रांस के पक्ष में होता है।

अन्य मुकाबले: नॉर्वे और कोलंबिया की शानदार जीत

वहीं, अपनी वाइकिंग फोटोशूट को लेकर चर्चा में रही नॉर्वे का मुकाबला इराक़ से था। नॉर्वे इक ऐसी टीम है जो विश्व कप के इस संस्करण में एक डार्क हॉर्स साबित हो सकती है। उनकी अटैकिंग लाइन बेहद ही घातक है। नॉर्वे की अटैकिंग लाइन में एंटोनियो नूसा, अर्लिंग हालांड व सोरलोथ मौजूद हैं। वहीं मिडफील्ड में हैं चपल खिलाड़ी ओदेगार्द। ग्रुप आई के इस मुकाबले में अर्लिंग हालांड के दो गोलों की बदौलत नॉर्वे ने 4-1 से इराक को धो दिया। वहीं ग्रुप जे के एक अन्य मुकाबले में ऑस्ट्रिया ने 2-1 से जॉर्डन पर बढ़त बनाई।

मेसी के बाद अब निगाहें रोनाल्डो पर थीं

फिर, बीती रात, क्रिस्टियानो रोनाल्डो के नेतृत्व में एक टाइटल कंटेंडर के तौर पर पुर्तगाल कॉन्गो के विरुद्ध अपने अभियान की शुरुआत करने उतरी। निश्चित तौर पर मेसी की हैट्रिक के बाद क्रिस्टियानो भी जरूर कुछ बड़ा करना चाहते होंगे।

इस विश्व कप के सबसे घातक स्क्वाड के संग पुर्तगाल की टीम मैदान में उतरी। मैच शुरू हुआ। पुर्तगाल की रक्षापंक्ति में कैंसेलो व नूनो मेंडेस मौजूद थे। पुर्तगाल का मिडफील्ड तो खैर, फिलहाल, संपूर्ण जगत में सब से खास है। मिडफील्ड में मौजूद थे ब्रुनो फर्नानदेज़, विटिन्हा व चौबीस वर्षीय सनसनीखेज खिलाड़ी ज़ाओ नेवेज़। अटैक का दारोमदार था बर्नार्डो सिल्वा, क्रिस्टियानो व पेड्रो नेटो पर। वहीं बेंच पर लियाओ, फैलिक्स, दालो, ट्रिंकाओ, नूनेस व नेवेज़ जैसे अनुभवी खिलाड़ी मौजूद थे, जो जीत के लिए भूखे हैं।

कॉन्गो की टीम के पास यूं कोई बड़ा नाम तो नहीं था मगर वो एकजुट होकर इस दैत्य से लड़ने जा रहे थे। कोच देसाब्रे ने 5-3-2 की अति-रक्षात्मक फॉर्मेशन के साथ अपनी टीम को मैदान पर उतारा। एक अपेक्षाकृत छोटी टीम ऐसे टूर्नामेंट में अगर इतनी बड़ी टीम के विरुद्ध मुकाबला ड्रॉ कर के एक अंक भी ले ले तो वह जीत सरीखा ही है। जैसा हमने काबो-वर्दे को स्पेन के विरुद्ध करते देखा था।

लेकिन, मैच के छठवें ही मिनट में मैदान की बांई फ्लैंक से पेड्रो नेटो एक खूबसूरत क्रॉस विपक्षी गोलपोस्ट की ओर बढ़ाते हैं जिसको युवा ज़ाओ नेवेज़, पिछले दो वर्षो से सारी दुनिया में जिनकी तूती बोल रही है, एक बेहद शानदार हेडर लगा कर गोल में तब्दील कर देते हैं। पुर्तगाल को बढ़त मिल जाती है। लेकिन फिर, मैच के पहले हाफ के अंतिम क्षणों में, योआन विस्सा एक अच्छी जंप लेकर दाएं छोर से आए क्रॉस को हेडर से गोलपोस्ट के भीतर भेज ह्यूस्टन स्टेडियम में मौजूद तमाम पुर्तगाली समर्थकों का दिल तोड़ देते हैं। इस गोल के साथ ही पहले हाफ की समाप्ति पर स्कोर हो जाता है 1-1।

दूसरे हाफ में पुर्तगाल गोल लगाने के कई प्रयास करती है मगर मैच में पिचहत्तर प्रतिशत समय गेंद अपने काबू में रखने के बावजूद पुर्तगाल गेंद के संग कुछ चमत्कारी नहीं कर पाते। काबो-वर्दे की ही भांति, कॉन्गो अपने से काफी मजबूत टीम को जीत से वंचित रखने में सफल हो जाती है। तमाम चाहने वालों की आशाओं के उलट, क्रिस्टियानो कुछ खास नहीं कर पाते। 5.9 की रेटिंग के साथ वो इस मैच में बेअसर रहते हैं। खैर, वह बड़े खिलाड़ी हैं और आगे उनके दल को फिलहाल ग्रुप में और भी मैच खेलने हैं। लेकिन कॉन्गो ने जो किया, वो ऐतिहासिक है।

इंग्लैंड का ‘थ्री लायंस’ अवतार

उधर, डल्लास स्टेडियम में थॉमस टुकेल की इंग्लिश टीम का सामना था लुका मॉद्रिच की क्रोएशियाई टीम से। यह एक बेहद ही रोमांचक मैच था जो टूर्नामेंट के शुरुआती चरण में ही खेल प्रेमियों को देखने को मिलने वाला था। दोनों ही टीमें काफी अच्छी हैं। ज्ञात रहे कि दोनों ही टीमें रशिया में खेले गए 2018 विश्व कप के सेमीफाइनल में भी आमने सामने थीं, जहां क्रोएशिया ने इंग्लैंड को हराकर फाइनल में जगह बना ली थी। परन्तु उसके बाद भी चार दफा दोनों टीमें आपस में भिड़ चुकी हैं जहां इंग्लैंड कभी हारी नहीं।

इस दफा इंग्लैंड जहां टाइटल कंटेंडर हैं तो क्रोएशियाई टीम इक ऐसे दौर में है जब उसके कई महत्वपूर्ण खिलाड़ी या तो रिटायर हो चुके हैं या अपने करियर का सूर्यास्त देख रहे हैं। फ्रांस की ही भांति इंग्लैंड की टीम भी इतने खिलाड़ियों से लैस है कि टूर्नामेंट में आराम से दो टीमों को एकसाथ मैदान में उतारने का माद्दा रखती है।

खैर, रेफरी व्हिस्ल बजाते हैं। 4-2-3-1 की फॉर्मेशन के साथ मैदान में उतरी इंग्लिश टीम खेल के शुरुआती क्षणों से ही अटैक शुरू कर देती है। बारहवें मिनट में ही इंग्लैंड को एक पेनाल्टी मिलती है जिसपर थोड़ी कंट्रोवर्सी भी हुई। खैर, उसे गोल में तब्दील कर हैरी केन इंग्लैंड को मैच में बढ़त दिला देते हैं। क्रोएशियाई टीम अपना संयम नहीं खोते और मैच आगे बढ़ता है। फिर होता है एक कमाल। मैच के छत्तीसवें मिनट में क्रोएशियाई राइट आऊट बातूरीना एक झन्नाटेदार गोल लगाकर स्कोर बराबर कर देते हैं। लेकिन जवाबी हमला कर एक दफा फिर हैरी केन बयालिसवें मिनट में मिले कॉर्नर पर एक हेडर द्वारा गोल मार कर स्कोर 2-1 कर देते हैं।

इंग्लैंड के समर्थकों के जश्न पर तब ब्रेक लग जाता है जब साथी खिलाड़ी के संग बेहतरीन तालमेल के जरिए सेंट्रल फॉरवर्ड मूसा पहले हाफ का अंतिम अटैक कर एक गोल जड़ क्रोएशिया की एक दफा फिर मैच में वापसी करवा देते हैं। स्कोर हो जाता है 2-2। इसके साथ ही पहला हाफ समाप्त हो जाता है।

परन्तु, दूसरे हाफ के शुरू होते ही स्टार इंग्लिश मिडफील्डर ज्यूड बेलिंघम एक बेहतरीन अंदाज में अकेले ही गेंद को लेकर विपक्षी गोलपोस्ट की ओर बढ़ते हैं। बेहद करिश्माई अंदाज में गोल लगाकर वो स्कोर 3-1 कर देते हैं। फिर बेंच से मैदान पर आए सब्स्टीट्यूट मार्कस रैशफॉर्ड मैच के पिच्चासीवें मिनट में इंग्लैंड के लिए एक और बेहद खूबसूरत गोल स्कोर कर स्कोर को 4-1 कर देते हैं। ‘द थ्री लायन्स’ ने एक बेहद ही शानदार तरीके से सभी को बता दिया कि वो आ चुके हैं और कोई भी इस दफा उन्हें हल्के में लेने की ग़लती न करे। ‘दे आर गोइंग टू बी अ फोर्स, नो वन वुड लाइक टु मेस विद’।

आगे, टोरंटो में, ग्रुप एल में घाना के सामने थी पनामा की टीम, जहां यैरेंक्ई ने मैच के बिल्कुल ही अंतिम क्षणों में एक गोल स्कोर कर घाना को 1-0 से जीत दिलाई। वहीं उज़्बेकिस्तान बायर्न म्यूनिख के स्टार विंगर लूइस डियाज़ की कोलंबिया से मेक्सिको में टक्कर लेते नजर आई। कोलंबिया ने यह मुकाबला 3-1 से जीत कर ग्रुप में अपनी पकड़ मजबूत कर ली।

आगे, रात साढ़े नौ बजे दक्षिण अफ्रीका का सामना चेक रिपब्लिक से होगा। फिर भारतीय समयानुसार रात साढ़े बारह बजे लॉस एंजेलिस स्टेडियम में स्विट्जरलैंड की टक्कर बोस्निया एवं हर्ज़ेगोविना से होगी। वहीं वैंकूवर में कनाडा अपने घरेलू दर्शकों के सामने कतर के विरुद्ध मैदान में उतरेगा। और कल सुबह साढ़े छह बजे मैक्सिको का सामना दक्षिण कोरिया से होगा।

लेकिन इन तमाम मैचों और परिणामों के बीच, बीती रात की सबसे बड़ी कहानी एक बार फिर उसी खिलाड़ी के नाम रही, जिसने दो दशकों से इस खेल की कल्पना को जीवित रखा है। बीस वर्ष पहले जर्मनी में खेले गए विश्व कप में एक दुबला-पतला किशोर अर्जेंटीना की जर्सी पहनकर पहली बार दुनिया के सामने आया था। तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि वही खिलाड़ी आने वाले वर्षों में फुटबॉल के इतिहास की सबसे महान कथाओं में से एक लिखेगा।

आज, उनतालीस वर्ष की उम्र में, लियोनेल मेसी ने विश्व कप में अपने करियर की पहली हैट्रिक लगाई है। समय बदल गया। पीढ़ियाँ बदल गईं। उनके साथ खेलने वाले अधिकांश खिलाड़ी रिटायर हो चुके हैं। लेकिन जब गेंद उनके पैरों में आती है, तो दुनिया अब भी कुछ क्षणों के लिए रुक जाती है।

शायद यही महानता है। कुछ खिलाड़ी ट्रॉफियाँ जीतते हैं। कुछ रिकॉर्ड बनाते हैं। और कुछ ऐसे होते हैं जो खेल से कहीं बड़े हो जाते हैं। लियोनेल मेसी उन्हीं में से एक हैं। और शायद यही कारण है कि फुटबॉल सिर्फ एक खेल नहीं है। यह सपनों की वह भाषा है, जिसे दुनिया का हर बच्चा समझता है। यही इस खेल का जादू है।

RSS का रजिस्ट्रेशन क्यों नहीं और कैसे चलती है उसकी फंडिंग? विवाद के बीच समझिए पूरी व्यवस्था

ये वो सुझाव थे जो RSS के शुरुआती दिनों में संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार को संघ के काम के लिए पैसा जुटाने के लिए दिए जा रहे थे। उस समय तक हेडगेवार अक्सर अपनी जेब से पैसा खर्च करते या अपने मित्रों से सहयोग जुटा लेते। लेकिन जल्द ही उन्हें संघ की स्थायी व्यवस्था की जरूरत महसूस हुई और एक बैठक बुलाई गई। उसी बैठक में ये सुझाव दिए जा रहे थे।

तब एक विचार आया कि यदि संघ स्वयंसेवकों का संगठन है, तो उसकी जरूरतों की पूर्ति भी स्वयंसेवक खुद ही करें। पर सवाल था कि योगदान किसे दिया जाए और कितना दिया जाए? काफी विचार के बाद निर्णय हुआ कि हर स्वयंसेवक अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार योगदान देगा और वह योगदान किसी व्यक्ति को नहीं बल्कि संघ के आदर्श प्रतीक ‘भगवा ध्वज’ को समर्पित किया जाएगा।

केआर मलकानी अपनी किताब ‘The RSS Story’ में लिखते हैं कि इसी सोच से संघ में ‘गुरु दक्षिणा’ की परंपरा की शुरुआत हुई। 1928 में पहला गुरु दक्षिणा कार्यक्रम आयोजित हुआ। उस दिन कुल 84 रुपए इकट्ठा हुए। राशि भले ही छोटी थी लेकिन इसी ने उस परंपरा की नींव रखी जो आज भी संघ की आर्थिक व्यवस्था का आधार है।

केआर मलकानी की किताब

आज के संदर्भ में RSS की गुरु दक्षिणा की चर्चा इसलिए क्योंकि बीते कुछ दिनों से संघ के पंजीकरण और इसकी फंडिंग को लेकर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं। इस हालिया विवाद की शुरुआत कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के बेटे और कर्नाटक के मंत्री प्रियांक खरगे के एक पत्र के बाद हुई।

प्रियांक खरगे ने RSS के रजिस्ट्रेशन और फंडिंग पर पूछे सवाल

प्रियांक ने 13 जून 2026 को संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत के नाम एक पत्र लिखा। यह पत्र 15 जून 2026 को अपने X हैंडल पर भी शेयर किया। उन्होंने ‘X’ पर लिखा, “सबसे पहले RSS को 100 साल पूरे होने पर बधाई। एक ऐसा संगठन जो 60,000 से ज्यादा शाखाओं और करोड़ों स्वयंसेवकों का दावा करता है, उसे पारदर्शिता और संवैधानिक जवाबदेही का भी पालन करना चाहिए।”

प्रियांक ने लिखा, “RSS को अपनी कानूनी स्थिति, रजिस्ट्रेशन, पदाधिकारियों, फंडिंग, खर्च, टैक्स और सार्वजनिक गतिविधियों के लिए जरूरी मंजूरियों के बारे में साफ-साफ बताना चाहिए। अगर नागरिकों, मजदूरों, NGO, ट्रस्ट, मंदिरों और कंपनियों से रजिस्ट्रेशन कराने, जानकारी देने और कानून का पालन करने की उम्मीद की जाती है, तो RSS को इससे छूट क्यों मिलनी चाहिए?”

पत्र में प्रियांक ने मोहन भागवत से 8 सवाल पूछे हैं। पत्र में RSS की कानूनी स्थिति और संगठनात्मक ढाँचे, उसके पदाधिकारियों और अधिकृत प्रतिनिधियों के विवरण, दान, चंदे और अन्य आय के स्रोतों, खर्च और संपत्तियों के ब्योरे के अलावा यह जानकारी माँगी गई है कि वह कानून के अनुसार लागू करों का भुगतान करता है या नहीं।

क्यों नहीं पंजीकृत है RSS?

यह पहली बार नहीं है जब संघ के पंजीकरण को लेकर सवाल पूछा गया हो, RSS के बारे में अक्सर एक प्रश्न पूछा जाता है कि देश के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में शामिल होने के बावजूद इसका पंजीकरण क्यों नहीं है। इस सवाल का जवाब आज में नहीं बल्कि लगभग 100 वर्ष पुराने इतिहास में छिपा है। संघ की शुरुआत किसी कंपनी, ट्रस्ट, सोसायटी या औपचारिक संस्था की तरह नहीं हुई थी। वह मूल रूप से एक सामाजिक आंदोलन के रूप में शुरू हुआ था, जिसका उद्देश्य समाज का संगठन और चरित्र निर्माण था।

27 सितंबर 1925 को नागपुर के महल क्षेत्र के ‘सुक्रवारी’ स्थित अपने घर में दशहरे के दिन हेडगेवार ने कुछ युवाओं और वरिष्ठ साथियों की बैठक बुलाई। इसी बैठक में उन्होंने घोषणा की ‘हम आज संघ का उद्घाटन कर रहे हैं’। इसके साथ ही उस संगठन की शुरुआत हुई जिसे आगे चलकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नाम से जाना गया।

नागपुर में हेडगेवार की याद में बना भव्य स्मृति मंदिर

दिलचस्प बात यह है कि उस समय न तो कोई संविधान था, न सदस्यता फॉर्म, न पंजीकरण और न ही संगठन का कोई तय नाम। डॉ. हेडगेवार ने उस दिन उपस्थित लोगों से कहा था कि सभी को शारीरिक, बौद्धिक और हर प्रकार से स्वयं को प्रशिक्षित करना होगा ताकि वे अपने लक्ष्य प्राप्त करने में सक्षम बन सकें। शुरुआती दिनों में रविवार को ड्रिल, मार्च और अन्य शारीरिक गतिविधियाँ होती थीं जबकि गुरुवार और रविवार को राष्ट्रीय विषयों पर बौद्धिक चर्चा आयोजित की जाती थी।

संघ की शुरुआत इतनी स्वाभाविक और ऑर्गेनिक थी कि कई महीनों तक उसका कोई नाम तक नहीं था। संगठन पहले अस्तित्व में आया, नाम बाद में रखा गया। लगभग सात महीने बाद 17 अप्रैल 1926 को डॉ. हेडगेवार के घर पर एक बैठक हुई, जिसमें संगठन के नाम पर चर्चा की गई। उस बैठक में चार नाम प्रस्तावित किए गए थे- जरीपटका मंडल, भारत उद्धारक मंडल, हिंदू स्वयंसेवक संघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। अंततः ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ नाम को स्वीकार किया गया।

यही तथ्य संघ की प्रकृति को समझने की कुंजी है। RSS की परिकल्पना एक पारंपरिक संस्था के रूप में नहीं की गई थी। वह लोगों के चरित्र निर्माण, अनुशासन, संगठन और समाज सेवा के लिए चलाया जाने वाला एक स्वयंसेवी आंदोलन था। सदस्यता फॉर्म भरकर कोई औपचारिक सदस्य नहीं बनता था, न ही नियमित शुल्क देकर सदस्यता ली जाती थी। स्वयंसेवक शाखा में आते थे, प्रशिक्षण लेते थे और सामाजिक कार्यों में भागीदारी करते थे। इसीलिए संघ की संरचना आरंभ से ही एक सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन की रही, न कि किसी पंजीकृत संस्था की।

सीधे-सीधे कहें तो RSS का जन्म किसी कानूनी इकाई (Legal Entity) के रूप में नहीं हुआ था बल्कि समाज के भीतर एक विचार और संगठनात्मक प्रक्रिया के रूप में हुआ था। बाद के दशकों में संघ ने विभिन्न क्षेत्रों में काम करने के लिए अनेक स्वतंत्र संस्थाएँ, ट्रस्ट और संगठन विकसित किए जिनमें से कई अलग-अलग कानूनों के तहत पंजीकृत हैं। लेकिन मूल RSS स्वयं को एक स्वयंसेवी सामाजिक आंदोलन के रूप में देखता रहा।

हेडगेवार, अनुशीलन समिति और कॉन्ग्रेस से जुड़े रहे थे और अंग्रेजों की नजर उन पर रहती थी। ऐसे में आजादी से पहले से ही हेडगेवार ने संघ को 1860 के सोसायटी पंजीकरण अधिनियम के तहत पंजीकृत कराने से परहेज किया। ये अंग्रेजों की नजरों से बचकर एक सामाजिक संगठन खड़ा करने की एक सोची-समझी रणनीति थी। इससे संघ को स्थानीय शाखाओं, स्कूलों और स्वयंसेवकों के नेटवर्क के माध्यम से स्वाभाविक रूप से फैलने का अवसर मिला।

जिस कर्नाटक से आज यह विवाद फिर उठा है, उसी की राजधानी बेंगलुरु में 8-9 नवंबर 2025 को आयोजित RSS के एक कार्यक्र में मोहन भागवत ने पंजीकरण से जुड़े सवाल का जवाब दिया था।

भागवत ने कहा था, “आप जानते हैं कि RSS की स्थापना 1925 में हुई थी। तो क्या आप उम्मीद करते हैं कि उस समय हम उस ब्रिटिश सरकार के पास जाकर अपना पंजीकरण कराते, जिसके खिलाफ RSS संघर्ष कर रहा था? फिर स्वतंत्रता के बाद भी भारत के कानूनों ने पंजीकरण को अनिवार्य नहीं बनाया। हमारे देश के कानून अपंजीकृत व्यक्तियों के समूह (Body of Individuals) को भी कानूनी मान्यता देते हैं। इसी श्रेणी में हमें रखा गया है और हम एक मान्यता प्राप्त संगठन हैं।”

उन्होंने कहा, “आयकर विभाग ने एक समय हमसे आयकर देने को कहा था जिस पर कानूनी विवाद हुआ। उस मामले में अदालत ने माना कि RSS ‘बॉडी ऑफ इंडिविजुअल्स’ है। इसके बाद हमारे ‘गुरु दक्षिणा’ जैसे कार्यक्रम को आयकर से छूट मिलने का आधार भी स्पष्ट हुआ।”

भागवत ने कहा, “हम पर तीन बार प्रतिबंध लगाया गया। यदि हमारा कोई अस्तित्व ही नहीं होता तो सरकार किस पर प्रतिबंध लगाती? हर बार अदालतों और सरकारों ने मामले की समीक्षा की। प्रतिबंध हटाए गए और RSS को एक वैध संगठन के रूप में स्वीकार किया गया।”

जब आयकर विभाग और RSS का विवाद अदालत पहुँचा

RSS से जुड़े इस मामले में विवाद यह था कि संघ को उसके स्वयंसेवकों और अन्य लोगों से मिलने वाली गुरु दक्षिणा पर आयकर लगाया जा सकता है या नहीं। आयकर विभाग का कहना था कि यह राशि संघ की आय है और इस पर टैक्स लगना चाहिए। दूसरी ओर RSS का तर्क था कि स्वयंसेवकों द्वारा दी जाने वाली गुरु दक्षिणा संगठन के सदस्यों का स्वैच्छिक योगदान है और इसे सामान्य आय नहीं माना जा सकता।

मामला आयकर अपीलीय अधिकरण (ITAT) से होते हुए पटना हाई कोर्ट तक पहुँचा। अदालत के सामने यह भी रखा गया कि केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) ने 19 दिसंबर 1978 के एक पत्र में स्पष्ट किया था कि RSS को उसके सदस्यों से मिलने वाली गुरु दक्षिणा को ‘म्युचुअलिटी’ (पारस्परिकता) के सिद्धांत के आधार पर कर-मुक्त माना जाएगा।

पटना हाई कोर्ट ने फरवरी 1994 में RSS के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि संगठन के सदस्यों से प्राप्त गुरु दक्षिणा वास्तव में म्युचुअलिटी के सिद्धांत के अंतर्गत आती है और उस पर आयकर नहीं लगाया जा सकता। अदालत ने माना कि जब स्वयंसेवक ही संगठन को योगदान देते हैं और संगठन उन्हीं के लिए कार्य करता है, तो ऐसी राशि को सामान्य व्यापारिक या व्यावसायिक आय नहीं माना जा सकता।

हालाँकि अदालत ने अपने फैसले को केवल सदस्यों से प्राप्त गुरु दक्षिणा तक सीमित रखा और प्रश्न में से ‘भक्तों’ (devotees) शब्द हटाकर स्पष्ट किया कि उसका निर्णय केवल RSS के सदस्यों द्वारा दिए गए योगदान के संबंध में है। इस प्रकार अदालत ने आयकर विभाग की आपत्ति खारिज करते हुए RSS को राहत दी।

क्या होता है ‘बॉडी ऑफ इंडिविजुअल्स’?

‘बॉडी ऑफ इंडिविजुअल्स’ (BOI) क्या है, इसे समझने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि भारतीय कानून में हर संगठित समूह का कंपनी, ट्रस्ट या सोसायटी के रूप में पंजीकृत होना जरूरी नहीं है। आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 2(31) में ‘Person’ (व्यक्ति) की परिभाषा के भीतर न केवल व्यक्ति, कंपनी और फर्म को बल्कि ‘Association of Persons (AOP)’ और ‘Body of Individuals (BOI)’ को भी शामिल किया गया है। इसका अर्थ है कि कानून कुछ परिस्थितियों में ऐसे समूहों को भी एक मान्यता प्राप्त इकाई के रूप में स्वीकार करता है, जो किसी साझा उद्देश्य से कार्य कर रहे हों, भले ही वे किसी अलग कानूनी संस्था के रूप में पंजीकृत न हों।’

BOI मूल रूप से ऐसे व्यक्तियों के समूह को कहा जाता है जो किसी साझा उद्देश्य, गतिविधि या कार्य के लिए संगठित रूप से कार्य कर रहे हों। यह जरूरी नहीं कि उनका उद्देश्य लाभ कमाना ही हो। धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक या सामुदायिक गतिविधियों के लिए भी लोगों का समूह BOI की श्रेणी में आ सकता है। कोर्ट्स ने विभिन्न मामलों में कहा है कि BOI की पहचान उसके सदस्यों के साझा उद्देश्य और सामूहिक कार्य से होती है, न कि केवल उसके पंजीकरण से।

इस पूरी बहस को समझें तो एक बात साफ हो जाती है कि भारतीय कानून RSS को सोसायटी, ट्रस्ट या कंपनी के रूप में पंजीकृत होने के लिए बाध्य नहीं करता। संविधान संगठन बनाने का अधिकार देता है, आयकर कानून BOI जैसी श्रेणियों को मान्यता देता है और लगभग एक सदी से सरकारी तथा न्यायिक संस्थाओं ने RSS के अस्तित्व को स्वीकार किया है। इस तरह का वितंडा खड़ा करने की कोशिश केवल बेजा भ्रम पैदा करने के लिए ही है।

RSS और उसकी फंडिंग

जैसे हमने इस लेख की शुरुआत में ही बताया था कि संघ ने स्वयंसेवकों से ही दक्षिणा लेकर अपने आर्थिक लक्ष्यों की पूर्ति का लक्ष्य रखा था। संघ में वर्ष में एक बार गुरु पूर्णिमा के दिन स्वयंसेवक भगवा ध्वज को गुरु मानकर दक्षिणा देते हैं।

वाल्टर के एंडरसन और श्रीधर डी. दामले ने अपनी किताब ‘The Brotherhood in Saffron: The Rashtriya Swayamsevak Sangh and Hindu Revivalism’ में गुरु दक्षिणा को लेकर लिखा है।

उन्होंने लिखा, “गुरु दक्षिणा के अवसर पर स्वयंसेवक अपने ‘गुरु’ यानी भगवा ध्वज को दक्षिणा अर्पित करते हैं। संघ के अधिकांश फंड इसी दौरान एकत्र होते हैं। प्रत्येक स्वयंसेवक ध्वज के सामने जाकर प्रणाम करता है और ध्वज-दंड के आधार पर फूल अर्पित करता है। ध्वज के दोनों ओर हिंदू समाज के प्रेरणास्रोत महापुरुषों के चित्र लगाए जाते हैं।”

पुस्तक में लिखा है, “इसके बाद स्वयंसेवक अपनी दक्षिणा एक बंद और बिना नाम वाले लिफाफे में रखकर, फूलों के साथ एक थाली में अर्पित करता है और उसे भगवा ध्वज के समक्ष समर्पित करता है।”

वाल्टर के एंडरसन और श्रीधर डी. दामले की किताब

RSS के विचारक और राज्यसभा के सांसद रहे राकेश सिन्हा ने अपनी किताब ‘Builders of Modern India: Dr Keshav Baliram Hedgewar’ में संघ की वित्तीय आत्मनिर्भरता को महत्वपूर्ण बताया है।

उन्होंने लिखा, “गुरु दक्षिणा संघ में 1928 से चली आ रही है। संघ का मानना है कि किसी भी संगठन के स्वतंत्र और निष्पक्ष संचालन के लिए यह आवश्यक है कि वह ऐसे बाहरी प्रभावों पर निर्भर न हो, जो उसके कार्यकर्ताओं या नेतृत्व की सोच और निर्णयों को प्रभावित कर सकें। इसी कारण संघ ने अपनी आर्थिक व्यवस्था को स्वयंसेवकों के सहयोग पर आधारित रखा है, ताकि उसकी कार्यप्रणाली और निर्णय लेने की स्वतंत्रता बनी रहे।”

राकेश सिन्हा की किताब

संघ के विचारक रतन शारदा का मानना है कि गुरु दक्षिणा से संघ को नैतिक शक्ति मिलती है। अपनी किताब ‘RSS 360°- Demystifying Rashtriya Swayamsevak Sangh’ में रतन शारदा लिखते हैं, “यह शायद ऐसा संगठन है जहाँ सदस्य किसी गतिविधि में भाग लेने, प्रशिक्षण शिविरों, शीतकालीन शिविरों या सामाजिक कार्यों में शामिल होने का खर्च स्वयं अपनी जेब से उठाते हैं। किसी भी कार्यक्रम या गतिविधि के लिए स्वयंसेवक अपना खर्च खुद वहन करते हैं।”

वह लिखते हैं, “यदि कोई स्वयंसेवक किसी शिविर की फीस देने में सक्षम नहीं होता, तो दूसरा स्वयंसेवक उसकी सहायता कर देता है। कई बार यह सहायता इतनी सहजता से की जाती है कि समूह के अन्य लोगों को इसकी जानकारी भी नहीं होती।”

रतन शारदा ने लिखा, “गुरु दक्षिणा के बाद इस बात पर कोई चर्चा नहीं होती कि किसने कितना धन दिया। संगठन में अमीर और गरीब स्वयंसेवक के बीच इस आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता। न ही संगठन के पद किसी व्यक्ति की आर्थिक क्षमता या उसके द्वारा दी गई गुरु दक्षिणा के आधार पर दिए जाते हैं। इस प्रकार प्राप्त धनराशि स्थानीय शाखा के पास जमा की जाती है और उसका उपयोग विभिन्न गतिविधियों में किया जाता है। यह राशि अन्य सामाजिक कार्यों में भी लगाई जाती है। इसी धन से उस क्षेत्र में कार्य करने वाले प्रचारकों के खर्चों की व्यवस्था भी की जाती है।”

उन्होंने लिखा है, “इस प्रकार संघ स्वयं को पूरी तरह स्व-वित्तपोषित (Self-financed) संगठन मानता है। संघ का कहना है कि बाहरी आर्थिक सहायता या किसी प्रकार के उपकार पर निर्भर न रहने के कारण उसे स्वतंत्र रूप से कार्य करने की नैतिक शक्ति मिलती है और वह किसी दबाव या प्रताड़ना के सामने झुकने के लिए बाध्य नहीं होता।”

रतन शारदा की किताब

संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने फरवरी 2026 में मुंबई में आयोजित व्याख्यानमाला के दौरान RSS की फंडिंग को लेकर भी बात की थी। उन्होंने कहा था, “संघ चलाने के लिए स्वयंसेवक गुरु दक्षिणा करते हैं। सेवा चलाने के लिए समाज से सहयोग लेते हैं। लोगों को विश्वास नहीं होता कि इतने बड़े-बड़े कार्यक्रम संघ करता है। लेकिन हमको व्यय बहुत कम आता है क्योंकि जितना बचा सकते हैं उतना बचाने का हमारा रवैया रहता है।”

उन्होंने आगे कहा, “तो जैसे हम प्रवास करते हैं तो प्रवास में भोजन खरीदते नहीं है। घरों से मँगाते हैं। रुकेंगे, तो हम होटलों में नहीं रुकेंगे। कार्यालय है तो वहाँ रुकेंगे नहीं तो घरों में रुकेंगे। तो जो नॉर्मल बजट है सोसाइटी का उससे हमारा बजट बहुत कम रहता है।”

संघ के पदाधिकारी लगातार इस बात को कहते रहे हैं कि फंडिंग को लेकर या रजिस्ट्रेशन को लेकर किसी से कुछ छिपा नहीं है। संघ से जुड़े अधिकारियों का मानना है कि प्रियांक खरगे इस विवाद के जरिए केवल संघ के शताब्दी वर्ष के आयोजनों को डिरेल करने की कोशिश कर रहे हैं। संघ अपनी शुरुआत के बाद से ही खुले में रहकर काम कर रहा है, लाखों सेवा कार्य किया जा चुके हैं और चल रहे हैं।

संघ के समर्थक और आलोचक, दोनों अपनी-अपनी दृष्टि से RSS को देखते हैं। इस पूरे विवाद के बीच कुछ तथ्य ऐसे हैं जिन्हें नजरअंदाज करना मुश्किल है। RSS एक सदी से खुले तौर पर काम कर रहा है। उस पर 3 बार प्रतिबंध लगाए गए, उसकी गतिविधियों की जाँच हुई, उसके खिलाफ कानूनी चुनौतियाँ आईं लेकिन हर बार वह न्यायिक और संवैधानिक प्रक्रियाओं से होकर सामने आया। संघ की शाखाएँ, कार्यक्रम, पथ संचलन और सेवा गतिविधियाँ किसी गुप्त तरीके से नहीं बल्कि सार्वजनिक रूप से आयोजित होती हैं।

संघ के पंजीकरण और फंडिंग को लेकर सवाल उठाना गलत नहीं है। लेकिन उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि उन सवालों का जवाब तथ्यों, कानून और इतिहास के आधार पर खोजा जाए। भारतीय कानून हर सामाजिक संगठन को सोसायटी, ट्रस्ट या कंपनी के रूप में पंजीकृत होने के लिए बाध्य नहीं करता। इसी तरह अदालतें भी RSS के अस्तित्व, उसकी संरचना और उसकी गुरु दक्षिणा व्यवस्था पर पहले ही बात कर चुकी हैं।

ऐसे में बार-बार संघ पर सवाल उठाना और उसे रोकने की कोशिश करना बेकार का तर्क लगता है। अगर कोई कानूनी समस्या है तो उसके लिए कानूनी उपाय हैं वो कॉन्ग्रेस या अन्य विरोधी अपनाएँ लेकिन इस तरह के बेजा विवाद संघ की छवि पर प्रश्न खड़े करने से ज्यादा इन विवादों को जन्म देने वालों पर ही सवाल उठाते हैं।

‘फाइलों का पुलिंदा लेकर बैठा हूँ, कांप क्यों रहे हो?’: ओम प्रकाश राजभर का अखिलेश यादव पर सीधा प्रहार, खनन और रिवर फ्रंट घोटाले पर घेरा

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के प्रमुख और उत्तर प्रदेश सरकार के कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने समाजवादी पार्टी (सपा) और अखिलेश यादव के राम मंदिर को लेकर दिए गए बयानों पर निशाना साधा है। बीते कई दिनों से अखिलेश यादव राम मंदिर में चढ़ावे की रकम को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार पर हमला बोल रहे हैं।

उनके बयानों पर सच्चाई सामने लाने के लिए कैबिनेट मंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (ट्विटर) पर अखिलेश को उनके कार्यकाल में किए गए खनन घोटाले और गोमती रिवरफ्रंट घोटाले को लेकर धागे खोल दिए।

सुभासपा अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने सपा प्रमुख अखिलेश यादव को सीधे टैग करते हुए सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा की है, जिसमें उन्होंने सपा के शीर्ष नेतृत्व पर गंभीर घोटालों के पैसों को खपाने का आरोप लगाया है। राजभर ने लिखा, “खनन और गोमती रिवर फ्रंट का पैसा कहां खपा रहे हैं ये बात डिंपल, राम गोपाल यादव और अखिलेश यादव के अलावा ओम प्रकाश राजभर को भी पता है।”

राजभर यहीं नहीं रुके, उन्होंने अखिलेश यादव की राजनीतिक घबराहट पर तंज कसते हुए आगे लिखा, “एक खुलासे से आपकी ये हालत हो गई। फाइलों का पूरा पुलिंदा लेकर बैठा हूं। कांप क्यों रहे हो अखिलेश? आँख खोलते ही बलिया फोन मिला दिए न?”

असल में बलिया लोकसभा सीट समाजवादी पार्टी के मजबूत नेता सनातन पांडेय का गढ़ मानी जाती है। राजभर का यह तंज इस बात की ओर इशारा कर रहा था कि उनके खुलासे या दावों के बाद अखिलेश यादव को यह डर सताने लगा है कि सुभासपा उनके नेताओं को तोड़ रही है, या बलिया के सपा नेता राजभर/भाजपा के संपर्क में हैं।

‘लंका में राजनीतिक शॉर्ट सर्किट’ का दावा कर चुके हैं राजभर

राजभर का यह तीखा हमला उनके उस पिछले बयान के बाद आया है जिसमें उन्होंने दावा किया था कि सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर एक गोपनीय पत्र सौंपा है।

राजभर के मुताबिक, उस पत्र में सपा के कई बड़े नेताओं के नाम शामिल हैं जो जल्द ही भाजपा में शामिल हो सकते हैं। राजभर ने आगाह किया कि सपा बहुत जल्द महाराष्ट्र की शिवसेना-NCP और पश्चिम बंगाल की तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की तर्ज पर एक बड़ी टूट का गवाह बनने वाली है और अखिलेश यादव की ‘लंका में राजनीतिक शॉर्ट सर्किट’ होने वाला है।

जब समाजवादी पार्टी ने राजभर के बयानों को मनगढ़ंत बताया गया तो राजभर ने सीधे पुराने कार्यकाल के विवादित मुद्दों को हवा दे दी। उन्होंने सपा सरकार के दौरान हुए कथित खनन घोटाले और गोमती रिवर फ्रंट प्रोजेक्ट को सामने लाकर अखिलेश यादव, डिंपल यादव और रामगोपाल यादव को कटघरे में खड़ा कर दिया है।

राजभर का इशारा साफ है कि यदि उन्होंने इन फाइलों को सार्वजनिक किया, तो सपा के लिए मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी।

सपा की सफाई- मुद्दों से ध्यान भटकाने की हो रही साजिश

राजभर के इस सीधे और आक्रामक हमले पर समाजवादी पार्टी तोड़ निकालने का हरसंभव प्रयास कर रही है। सपा प्रवक्ताओं का कहना है कि ओम प्रकाश राजभर केवल सुर्खियों में बने रहने के लिए इस तरह की अनर्गल और आधारहीन बयानबाजी कर रहे हैं।

सपा का आरोप है कि राजभर बेरोजगारी, कानून व्यवस्था और पेपर लीक जैसे जनता से जुड़े असली मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए भाजपा के इशारे पर ‘माउथपीस’ की तरह काम कर रहे हैं। अखिलेश यादव ने भी पहले राजभर के दावों को खारिज करते हुए इसे केवल ‘टीआरपी और मनोरंजन’ की राजनीति करार दिया था।

उत्तर प्रदेश में आगामी राजनीतिक समीकरणों और उप-चुनावों की आहट के बीच राजभर का यह आक्रामक रूप बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अब देखना यह होगा कि अखिलेश यादव इस सीधे हमले का जवाब किस तरह देते हैं।

‘अब तेरी बारी… कन्हैयालाल जैसा हाल करेंगे’: उज्जैन के महामंडलेश्वर सुमनानंद गिरी के पीछे पड़ी इस्लामी जमात, जानिए कैसे कट्टरपंथियों ने पाकिस्तान के नारे को बना ली है अपनी पहचान

उज्जैन के मौन तीर्थ पीठ के पीठाधीश्वर और निरंजनी अखाड़े के महामंडलेश्वर डॉ. सुमनानंद गिरि महाराज को इस्लामी कट्टरपंथियों ने जान से मारने की धमकी दी है। डॉ. सुमनानंद महाराज को भेजे गए धमकी भरे पत्र में उदयपुर के चर्चित कन्हैया लाल हत्याकांड और हाल ही में दिल्ली में बकरीद पर ‘सूर्या की कुर्बानी’ जैसा अंजाम भुगतने की चेतावनी दी गई है। इन्हें भी ‘सर तन से जुदा’ कर मारा गया था। धमकी मिलने के बाद उज्जैन नगरी के संत समाज में नाराजगी है, वहीं पुलिस और सुरक्षा एजेंसियाँ मामले की जाँच में जुट गई हैं।

धमकी भरे पत्र में क्या लिखा?

महामंडलेश्वर डॉ. सुमनानंद गिरि को यह धमकी भरा पत्र मंगलवार (16 जून 2026) को डाक के माध्यम से मिला। पत्र प्रयागराज से भेजा गया बताया जा रहा है। पत्र में बेहद आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करते हुए लिखा गया है, “तू अपनी आदत से बाज नहीं आ रहा, तूने नबी की शान में गुस्ताखी की है।”

धमकी भरा पत्र (फोटो साभार: NDTV)

पत्र में इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा ‘सर तन से जुदा’ की चर्चित घटनाओं का हवाला देते हुए लिखा, “कन्हैया लाल दर्जी के कत्ल का वीडियो देखा। दिल्ली के बकरीद पर काफिर पिल्ले की कुर्बानी का वीडियो देख। अब तेरी बारी है। जहन्नुम में जाएगा तू।”

धमकी देने वाले ने पत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का भी जिक्र किया है। पत्र में लिखा गया है, “मोदी और मोहन, कोई बचा नहीं पाएगा। इंशाल्लाह। बच सको तो बचो।”

धमकी मिलने के बाद महामंडलेश्वर डॉ. सुमनानंद ने पुलिस प्रशासन को सूचना दी है। मामले की शिकायत दर्ज कर जाँच शुरू कर दी गई है। पुलिस पत्र भेजने वाले की पहचान करने और उसके नेटवर्क का पता लगाने का प्रयास कर रही है।

कई बार महामंडलेश्वर डॉ. सुमनानंद गिरि को मिली धमकियाँ, हुए हमले

यह पहला मौका नहीं है जब डॉ. सुमनानंद गिरि को निशाना बनाया गया हो। डॉ. सुमनानंद का कहना है कि यह हरकत पहली बार नहीं हुई है, इससे पहले भी चार बार धमकी भरे पत्र भेजे जा चुके है और यह पाँचवीं घटना है। उन्होंने बताया कि साल 2023 से उन्हें जान से मारने धमकियाँ मिल रही हैं। हिंसक मजहबी विचारधारा जैसे लव जिहाद, शरिया कानून और अन्य मुद्दों पर खुलकर बोलने के कारण वे कट्टरपंथी तत्वों के निशाने पर रहते हैं।

इससे पहले दिसंबर 2025 में एक उर्दू में लिखा धमकी भरा पत्र मिला था, जो उत्तर प्रदेश के प्रयागराज निवासी सगीर अहमद पिता रिजवान के पते से भेजा गया था। इस पत्र में लिखा था, “काफिर सुमन आनंद, तू बार-बार नबी की तौहीन करता है। नामुराद, तुम अच्छी तरह जानते हो कि गुस्ताख-ए-रसूल की एक सजा जिस्म से जिस्म को जुदा करना है। तुम बहुत मुनाफिक (पाखंडी) और बदतमीज आदमी हो। तुम्हारी जिंदगी हमारे रहम-ओ-करम पर है। खामोश सफर में तुम हमारी जमात को मुसलसल गुमराह कर रहे हो। हम तुम्हारे लिए कयामत का इंतजार नहीं करेंगे।” धमकी भरे पत्र में यह भी लिखा था कि राम मंदिर में एक दिन अजान गूँजेगी।

साल 2023 में भी ऐसी ही जान से मारने की धमकी डॉ. सुमनानंद गिरि महाराज को मिली थी। तब भी उर्दू में लिखे पत्र में महामंडलेश्वर का ‘सर तन से जुदा’ करने के बात कही गई थी। इसके अलावा फोन कॉल, सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से भी धमकियाँ मिल चुकी हैं। उन्होंने बताया कि पूर्व में भी उन पर उज्जैन और वडोदरा में हमले हो चुके हैं, लेकिन अब तक स्थायी सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध नहीं कराई गई है।

कैसे महामंडलेश्वर डॉ. सुमनानंद गिरि महाराज बने इस्लामी कट्टरपंथियों का निशाना?

दरअसल, महामंडलेश्वर डॉ. सुमनानंद गिरि अकसर मुस्लिम धर्म परिवर्तन, लव जिहाद, मजहबी कट्टरपंथ विरोधी और हिंदू-मुस्लिम से जुड़े मुद्दों पर खुलकर विचार रखते हैं। उज्जैन में अपने आश्रम में महामंडलेश्वर डॉ. सुमनानंद गिरि महाराज ने मुस्लिम लड़कियों को सनातन धर्म में घर वापसी कराई है। साथ ही, एक महीने पहले ही एक मुस्लिम लड़के को विधि-विधान से हिंदू धर्म में शामिल किया था।

2024 में मुस्लिम महिला फरहा ने अनिकेत चौबे से विवाह कर सनातन धर्म अपनाया था। इसके बाद फरहा की बेटी जारा ने भी घर वापसी कर ली थी। इसे भी विधि-विधान से महामंडलेश्वर डॉ. सुमनानंद गिरि महाराज के आश्रम में ही संपन्न कराया था। पिछले महीने मुस्लिम युवक सलमान खान ने स्वेच्छा से सनातन धर्म में घर वापसी की और अपना हिंदू नाम ‘शांतनु’ रख लिया। शांतनु को भी महामंडलेश्र के आश्रम से ही दीक्षा प्राप्त हुई। वह कई सालों से सनातन धर्म में घर वापसी की दीक्षा दे रहे हैं।

उनके कई बयान भी सामने आए, जिनको लेकर विवाद छिड़ा। 2024 में महामंडलेश्वर सुमनानंद गिरि ने प्रयागराज के महाकुंभ में मुस्लिमों के प्रवेश पर रोक लगाने की माँग की थी। उन्होंने कहा ता कि जब मुस्लिमों के हज में हिंदुओं को प्रवेश नहीं मिलता, तो कुंभ जैसे हिंदू धार्मिक आयोजनों में मुस्लिमों को भी नहीं आना चाहिए।

यही वजह है कि इस्लामी कट्टरपंथी उनसे चिढ़े रहते हैं और उन्हें आए दिन ‘सर तन से जुदा’ की धमकी देते रहते हैं।

भारत में आम बन चुकीं ‘सर तन से जुदा’ की धमकियाँ

डॉ. सुमनानंद गिरि को मिली ताजा धमकी कोई अकेली घटना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में देश में ‘सर तन से जुदा’ जैसे नारे और धमकियाँ बार-बार सामने आई हैं। इसकी जड़ें पाकिस्तान में देखी जाती हैं, जहाँ 2011 में पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर की उनके ही अंगरक्षक और आतंकी मुमताज कादरी ने हत्या कर दी थी। तासीर पर ईशनिंदा कानून की आलोचना करने का आरोप लगाया गया था। तब मुमताज कादरी को पाकिस्तान के एक मौलाना खादिम हुसैन रिजवी ने ‘शहीद’ और ‘गाजी’ की तरह पेश किया।

इसके बाद इस्लामी कट्टरपंथी समूहों द्वारा मजहबी अपमान आरोपों पर हिंसा और हत्या को उचित ठहराने के लिए ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सजा, सर तन से जुदा’ जैसे नारे बुलंद किए जाने लगे। धीरे-धीरे यह नारा पाकिस्तान से निकलकर दक्षिण एशिया के अन्य हिस्सों तक पहुँचा और भारत में भी कई मामलों में धमकियों, उकसावे और हिंसक घटनाओं के संदर्भ में सुनाई देने लगा।

भारत में पिछले कुछ वर्षों में ऐसी घटनाएँ लगातार सामने आई हैं। बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को भी ‘सर तन से जुदा’ की धमकियाँ मिल चुकी हैं। जब उत्तर प्रदेश के बरेली के फैज रजा और सलमान ने सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर सर तन से जुदा की धमकी दी। इस मामले में पुलिस ने कार्रवाई करते हुए दोनों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया था।

इसके अलावा उज्जैन में एक कथावाचक को लव जिहाद पर बोलने के लिए सोशल मीडिया पर ‘सर तन से जुदा’ की धमकी दी गई। मामला पुलिस तक पहुँचा और साइबर माध्यम से धमकी देने वालों की तलाश शुरू की गई। मध्य प्रदेश के इंदौर में विश्व हिंदू परिषद के नेता संतोष शर्मा को भी इसी तरह की धमकी मिली।

मध्य प्रदेश के इंदौर में विश्व हिंदू परिषद के नेता संतोष शर्मा को भी इसी तरह की धमकी मिली। आरोप था कि सोशल मीडिया पर उन्हें निशाना बनाते हुए सिर कलम करने की चेतावनी दी गई। मामला सामने आने के बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई और सुरक्षा को लेकर चिंता जताई गई।

राजस्थान के कोटा में भाजपा कार्यकर्ता को धमकी भरा पत्र मिला था। पत्र में ‘सर तन से जुदा’ की धमकी दी गई थी और गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी गई थी। अजमेर दरगाह से जुड़े एक मामले ने भी देशभर में सुर्खियाँ बटोरी थीं। दरगाह के सामने कुछ लोगों ने ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाने लगाए थे। यह मामला लंबे समय तक चर्चा में रहा और बाद में अदालत की कार्यवाही का विषय भी बना।

इन सभी घटनाओं के बीच सबसे भयावह और चर्चित मामला उदयपुर के कन्हैया लाल साहू की हत्या का रहा। 28 जून 2022 को राजस्थान के उदयपुर में दो इस्लामी कट्टरपंथी रफीक मोहम्मद और अब्दुल जफ्फार ने उन्हें उनकी दुकान में घुसकर धारदार हथियार से गला काटकर मार डाला था। हत्या के बाद आरोपितों ने हँसते हुए वीडियो जारी कर कहा था कि कन्हैयाय लाल को ‘गुस्ताख ए नबी की सजा में सर तन से जुदा’ की सजा मिली है।

यही कारण है कि जब डॉ. सुमनानंद गिरि जैसे संतों को कन्हैया लाल का उदाहरण देकर धमकी दी जाती है, तो उसे केवल एक सामान्य चेतावनी नहीं माना जाता। पिछले वर्षों की घटनाएँ बताती हैं कि मजहब के नाम पर हत्या करने से इस्लामी कट्टरपंथी बिल्कुल नहीं कतराते हैं। उनके लिए ऐसी धमकियों आम बन चुकी हैं, जो भारत को अगला पाकिस्तान समझ बैठे हैं।

कभी ईशनिंदा तो कभी बलात्कार, कभी धर्मांतरण तो कभी नरसंहार: पाकिस्तान में नहीं थम रहे हिंदू-सिखों पर अत्याचार, भारत में मुँह सिलकर बैठे हैं CAA का विरोध करने वाले वामपंथी

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के मर्दान शहर के एक गुरुद्वारे में घुस कर सिख दंपति जगन्नाथ और उनकी पत्नी अस्मा वंती की गोली मारकर हत्या कर दी गई। 17 जून 2026 को हुए इस हत्या ने एक बार फिर पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के हालत को बयाँ करता है। लेकिन इस हत्याकांड पर वामपंथी लिबरल ग्रुप मौन है। देश में सीएए के खिलाफ आवाज बुलंद करने वाले इस प्रोपेगेंडाबाजों के मुँह में अब जुबान नहीं है। ये तो ईरान- अमेरिका डील को ‘ईरान की जीत’ बताते नहीं थक रहे हैं।

पेशावर के नजदीक गुरुद्वारे के सेवादार दंपति की हत्या

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में दो हमलावरों ने एक गुरुद्वारे में घुसकर वहाँ की देखभाल करने वाले सिख दंपति की गोली मारकर हत्या कर दी। पति-पत्नी दोनों गुरुद्वारे की सेवा और देखरेख से जुड़े हुए थे। हत्या के बाद से गुरुद्वारे में लगा सीसीटीवी का फुटेज गायब है। प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार, हमलावर अज्ञात थे।

पुलिस मामले की जाँच की बात कर रही है, लेकिन घटना ने एक बार फिर पाकिस्तान में सिखों और दूसरे धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।घटना की शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने निंदा करते हुए हत्यारों को जल्द से जल्द गिरफ्तार करने और सजा देने की माँग की है। यह हमला पेशावर से लगभग 60 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में स्थित मर्दाना के बाबू मोहल्ला इलाके में हुआ।

मर्दाना के जिला पुलिस अधिकारी मसूद अहमद ने बताया कि पुलिस हमले के मकसद का पता लगाने और इसमें शामिल लोगों को खोजने के लिए काम कर रही है, लेकिन सीसीटीवी फुटेज गायब होने के बाद टारगेट किलिंग का अंदेशा जताया जा रहा है।

दरअसल हत्यारे किसी लूटपाट के लिए नहीं आए थे। ये लोग गुरुद्वारे में घुसकर दंपति पर ताबड़तोड़ गोलियाँ चलाई और फिर फरार हो गए। इसको लेकर स्थानीय अल्पसंख्यक समुदाय में डर का माहौल है। स्थानीय सिख समुदाय के लोगों का कहना है कि यह सिखों में डर का माहौल पैदा करने की एक और कोशिश है। इसलिए सुराग मिटाने की कोशिश की गई और डिजिटल सबूत मिटा दिए गए।

अल्पसंख्यकों पर लगातार हो रहे हमले

यह कोई पहली घटना नहीं है, जिसमें सिख दंपति को मारा गया है। पेशावर और खैबर पख्तूनख्वा क्षेत्र में सिख व्यापारियों और गुरुद्वारा सेवकों के टारगेट मर्डर का दौर काफी पुराना है। 2023 में पेशावर में एक सिख व्यक्ति की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। ऐसी घटनाओं की वजह से यहाँ सिखों की संख्या काफी कम हो गई है।

दरअसल पाकिस्तान में हिंदू, सिख, ईसाई जैसे अल्पसंख्यकों के साथ हिंसा, भेदभाव, जबरन धर्मांतरण और झूठे ईशनिंदा मामलों में फँसाना आम बात है। पाकिस्तान में अल्पसंख्यक सुरक्षित ही नहीं हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, हर साल 1200 से लेकर 5,000 तक हिंदू धार्मिक उत्पीड़न की वजह से पाकिस्तान छोड़ देते हैं, जिनमें से ज्यादातर सिंध के होते हैं।

2023 की जनगणना के अनुसार, पाकिस्तान में हिंदू आबादी करीब 3.9 मिलियन यानी 39 लाख बच गई है, जो कुल आबादी का करीब 1.61 प्रतिशत है। इनमें से ज्यादातर सिंध के ग्रामीण इलाकों में रहती है।

जून 2025 में सिंध प्रांत में ही एक हिन्दू परिवार पर अत्याचार के मामले ने सुर्खियाँ बटोरी। परिवार में चार हिंदू भाई-बहनों जिया बाई (22 साल), दिया बाई (20 साल), दिशा बाई (16 साल) और उनके चचेरे भाई हरजीत कुमार (13 साल) का अपहरण कर लिया गया। इन मासूम बच्चों को जबरन इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर किया गया। काफी विरोध प्रदर्शन के बाद प्रशासन ने चारों बच्चों को बरामद कर लिया। हालाँकि उनका अपहरण करने वाले आरोपितों को कोर्ट ने बरी कर दिया।

यही नहीं, कोर्ट ने 2 बालिग लड़कियों को सेफ हाउस भिजवा दिया, तो 2 नाबालिग बच्चों की कस्टडी के लिए माँ-बाप से ही 10-10 मिलियन पाकिस्तानी रूपए यानी 1-1 करोड़ पाकिस्तानी रुपए का बॉन्ड भरवाया, ताकि दोनों बच्चों की घर वापसी न कराई जा सके और वो इस्लाम की प्रैक्टिस करते रहें यानी हिंदू माँ-बाप अपने ही जबरन मुस्लिम बनाए गए बच्चों को इस्लामी तरीके से पालते रहें और इसकी गारंटी भी दें कि वो हिंदू नहीं बनेंगे। एक दूसरे मामले में एक हिन्दू व्यक्ति की इसलिए हत्या कर दी, क्योंकि उसने इस्लाम कबूल करने से मना कर दिया।

यहाँ अल्पसंख्यक महिलाओं की हालत तो और भी ज्यादा खराब है। जबरन धर्मांतरण कर निकाह का दबाव झेलने के साथ साथ हत्या के कई मामले सामने आए हैं। मानवाधिकारों की निगरानी करने वाली स्वतंत्र संस्था, पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (HRCP) के अनुसार, जनवरी और मई 2025 के बीच ‘सम्मान’ के नाम पर कम से कम 268 लोगों की हत्या कर दी गई, जिनमें 155 महिलाएँ थीं।

एक सवाल के जवाब में भारत सरकार ने भी संसद में बताया था कि पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र से हिंदू समुदाय के लोगों का पलायन हिंसा और भेदभाव के कारण जारी है। यहाँ अल्पसंख्यक समुदायों के विरुद्ध अत्याचार उत्पीड़न, धमकी, जबरन विवाह, जबरन धर्मांतरण, धार्मिक स्थलों पर तोड़फोड़ आदि के रूप में किए जाते हैं।

पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदायों के विरुद्ध हो रहे अत्याचारों की रिपोर्टों के आधार पर, भारत सरकार राजनयिक चैनलों के माध्यम से पाकिस्तान सरकार के समक्ष उठाती है। पाकिस्तान सरकार से आग्रह किया जाता है कि वह अल्पसंख्यक समुदायों सहित अपने नागरिकों के प्रति अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करे और सांप्रदायिक हिंसा और धार्मिक असहिष्णुता को खत्म करे। केंद्र सरकार ने बताया कि भारत ने 2021 से पाकिस्तान सरकार के सामने अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा के 334 बड़े मामलों को उठाया है।

इस्लाम कबूल करा जबरदस्ती किया जाता है निकाह

हिंदू और दूसरे अल्पसंख्यक लड़कियों के अपहरण, जबरन धर्मांतरण और कम उम्र में निकाह के मामले लगातार सामने आते रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने भी इस पर चिंता जताई है। पाकिस्तान के मानवाधिकार संगठनों ने 2025 में चेतावनी दी कि धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा, जबरन धर्मांतरण और नाबालिग लड़कियों के जबरन निकाह के मामलों में वृद्धि देखी गई है। इसको लेकर एक बुजुर्ग हिन्दू का वीडियो भी वायरल हुआ था जिसमें उन्होंने कहा था कि हमारे हजारों बहू-बेटियों को कट्टरपंथियों ने जबरन बना दिया मुस्लिम।

पाकिस्तान में हर साल करीब 1000 अल्पसंख्यक लड़कियों का अपहरण किया जाता है और उनका जबरन धर्मांतरण कराया जाता है। मूवमेंट फॉर सॉलिडैरिटी एंड पीस ने इसकी जानकारी देते हुए कहा है कि इन लड़कियों की उम्र करीब 12 से 25 साल के बीच होती है। स्थिति ये है कि पुलिस ऐसा मामलों में कार्रवाई नहीं करती।

एक दूसरे मानवाधिकार संस्था जुबली कैंपेन और ओपन डोर्स ने दावा किया है कि अल्पसंख्यक लड़कियों के अपहरण और धर्मांतरण के मामले दिन-प्रतिदिन बढ़ रहे हैं। 2024 में 10 साल और उससे ऊपर की कई लड़कियाँ का अपहरण किया गया था। IANS की रिपोर्ट के मुताबिक कई लड़कियाँ ऐसी त्रासदी झेलने के बाद मानसिक और शारीरिक रूप से बीमार हो गईं। कोर्ट अक्सर ऐसे मामले में आरोपित की ये दलीलें मान लेती है कि लड़की ने अपनी मर्जी से धर्मपरिवर्तन’ कर निकाह किया था।

सेंटर फॉर सोशल जस्टिस के अनुसार, अकेले 2024 में 47 हिंदू लड़कियों और महिलाओं का अपहरण किया गया और जबरदस्ती उनका धर्म परिवर्तन कराया गया। मानवाधिकार रिपोर्टों के अनुसार जबरन धर्मांतरण की शिकार महिलाओं और लड़कियों में लगभग 75 प्रतिशत हिंदू और 25 प्रतिशत ईसाई थीं। अधिकांश मामले सिंध प्रांत में दर्ज हुए।

संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुमान के मुताबिक, पाकिस्तान की 1.89 करोड़ महिलाओं और लड़कियों का निकाह 18 साल से पहले हुई थी, जिनमें से 46 लाख 15 साल से कम उम्र की थी। इनलोगों को प्रेगेंट होने के लिए मजबूर किया गया। धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों की महिलाओं को जबरन निकाह करने और धर्मांतरण के मामले यहाँ सबसे ज्यादा हैं।

ईशनिंदा के नाम पर अत्याचार

पाकिस्तान के सेंटर फॉर सोशल जस्टिस (CSJ) के अनुसार 2024 में कम से कम 344 लोगों पर ईशनिंदा के आरोप लगाए गए। इनमें अहमदी, हिंदू और ईसाई समुदाय के लोग ज्यादा हैं। ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ पाकिस्तान (HRCP) की हालिया रिपोर्ट ‘Streets of Fear: Freedom of Religion or Belief in 2024/25’ के मुताबिक, पाकिस्तान में धार्मिक स्वतंत्रता का स्तर अब तक के सबसे निचले पायदान पर है।

वर्ष 2024 और 2025 के दौरान 450 से अधिक लोगों को झूठे ईशनिंदा के मामलों में फँसाया गया। इस दौरान भीड़ ने उन्हें मार डाला। कई मामलों में जेलों में बंद किए जाने पर पुलिस की मिलीभगत से कई आरोपितों की हत्या कर दी गईं।

जुलाई 2016 में सिंध के घोटकी में एक हिंदू व्यक्ति पर ईशनिंदा का आरोप लगने से तनाव बढ़ गया और अगले ही दिन दो हिंदुओं को गोली मार दी गई।

दुनिया भर में आलोचना, लेकिन फर्क नहीं पड़ता

संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ, अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF), अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन और पाकिस्तान का अपना मानवाधिकार आयोग बार-बार अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, जबरन धर्मांतरण, ईशनिंदा कानूनों के दुरुपयोग और सांप्रदायिक हिंसा को लेकर चिंता जताते हैं।

हर बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की आलोचना होती है, रिपोर्टें जारी होती हैं, जाँच की माँग उठती है और सरकार निष्पक्ष जाँच का भरोसा देती है, लेकिन यहाँ न तो सरकार, न ही पुलिस और यहाँ तक कि कोर्ट पर भी भरोसा करना मुश्किल है। पुलिस मुस्लिम भीड़ के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लेती।

कट्टरपंथियों के धर्मांतरण कराने और अल्पसंख्यकों की बेटियों को उठा ले जाने का अंदरखाने समर्थन करती है। यही वजह है कि अल्पसंख्यकों की हत्या, हिंदू लड़कियों के अपहरण, ईसाइयों पर हमले के साथ-साथ शिया और अहमदियों के खिलाफ कार्रवाई जैसी घटनाएँ लगातार सामने आती रहती हैं।

वामपंथी-लिबरल ग्रुप का दोगलापन

मर्दान के गुरुद्वारे में सिख दंपति की हत्या केवल एक आपराधिक घटना नहीं है। यह उस व्यापक संकट की याद दिलाती है जिसमें पाकिस्तान के धार्मिक अल्पसंख्यक वर्षों से जी रहे हैं। कभी किसी हिंदू लड़की के अपहरण और धर्मांतरण की खबर आती है, कभी किसी सिख की हत्या।

इन घटनाओं को लेकर भारत में भी चयनात्मक रवैया अपनाया जाता है। फिलिस्तीन और गाजा हमला हो या ईरान युद्ध- इन पर मुखर रहने वाला वामपंथी लेबरल ग्रुप पाकिस्तान का नाम आते ही चुप्पी साध लेता है। हिन्दुओं पर बर्बरता हो या सिखों की हत्या इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता और जब बात पाकिस्तान की आती है तो कुछ कहना ही नहीं है।

अरे पाकिस्तान क्या इन्हें तो बांग्लादेश में हो रहे हिन्दुओं की हत्याओं पर भी बोलना गँवारा नहीं हुआ। शेख हसीना के हटने के बाद जिस तरह से हिन्दुओं के धार्मिक स्थलों पर हमले हुए, उनके घरों में आग लगा दिए गए, महिलाओं के साथ रेप हुए, वामपंथियों ने कोई विरोध नहीं जताया। फिलिस्तीन के पक्ष में विरोध प्रदर्शन कर सकते हैं, लेकिन पाकिस्तान-बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार का विरोध नहीं कर सकते।

अब तक के इतिहास में काफी कम मामले सामने आए होंगे जब वामपंथी- लिबरल ग्रुप ने पाकिस्तान में हिंदू, सिख, ईसाई या अहमदी समुदायों के खिलाफ होने वाले अत्याचारों पर अपना मुँह खोला हो। भारत में CAA का विरोध करने वाला राजनीतिक और सामाजिक ग्रुप भी पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों की दुर्दशा पर उतनी मुखरता नहीं दिखाते, जितना दूसरे मुद्दों पर दिखाते हैं।

CAA के खिलाफ शाहीन बाग में डेरा जमाए कट्टरपंथी-वामपंथी-लिबरल की जमात के लिए फ्री में लंगर लगाने वाले डीएस बिंद्रा को ही देख लीजिए। खुद सिख हैं, लेकिन पाकिस्तान में गुरुद्वारा सेवादार दंपति की हत्या पर जुबान नहीं खुली। डीएस बिंद्रा जैसे लोग जिनकी चिंता ये रहती है कि शाहीन बाग से लेकर हज पर गए मुस्लिमों के साथ क्या हो रहा है। इतना ही नहीं भारत के वामपंथी जो फिलीस्तीन की चिंता में सूऱ रहे हैं, ईरान के लिए रोने रोते हैं उन्हें भी इससे लेना-देना नहीं है कि पड़ोसी मुल्कों में कैसे अल्पसंख्यकों को, उनके धार्मिक स्थलों, उनके बच्चों को निशाना बनाया जाता है।

कुछ ऐसा ही हालत दूसरे वामपंथी- लिबरल गैंग के लोगों की है। यह ‘गैंग’ मानवाधिकारों के मुद्दे पर दोहरा मापदंड अपनाता है। जब पाकिस्तान या बांग्लादेश में हिंदुओं और सिखों पर अत्याचार होते हैं, या कश्मीर में बहुसंख्यक भीड़ जब हिन्दू अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हैं, तो यह धड़ा चुप रहता है, लेकिन भारत में किसी अल्पसंख्यक के साथ कोई सामान्य आपराधिक घटना भी हो जाए, तो ये उसे ‘अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संकट’ बना देते हैं। वामपंथी-लिबरल फिलीस्तीन या ईरान के मुद्दों पर तो बहुत मुखर रहता है, लेकिन CAA के तहत आने वाले पीड़ित शरणार्थियों का दर्द इन्हें नहीं दिखता।

क्या है राम मंदिर दान का पूरा विवाद: जानिए कैसे हुआ था उस ट्रस्ट का निर्माण जिसपर उठ रहे सवाल, किसके हाथ में है इसे संभालने की कमान

अयोध्या का राम मंदिर महज एक मंदिर नहीं है, बल्कि दुनियाभर के करोड़ों हिंदुओं के आस्था का केन्द्र भी है। यह सदियों पुराने संघर्ष, कानूनी लड़ाई और सामाजिक आंदोलन और हजारों हिन्दुओं के बलिदान का प्रतीक है। जनवरी 2024 में राम लला की प्रतिमा की स्थापना के बाद से ही लाखों लोग यहाँ दर्शन पूजन के लिए हर दिन आते हैं।

प्राण प्रतिष्ठा समारोह के बाद से मंदिर को भक्तों से जबरदस्त दान मिला है। लाखों लोग नकद, सोना, चाँदी, आभूषण और अन्य कीमती उपहार रामलला को चढ़ाते हैं। इसलिए रामलला के चढ़ावे में हेराफेरी, कीमती सामानों का गायब होना, अभिलेखों में कथित तौर पर हेराफेरी के दावे ने इसे राष्ट्रीय विवाद का विषय बना दिया।

हालाँकि राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और सनसनीखेज दावों के बीच यह भी सच्चाई है कि इसे यूपी सरकार नहीं चलाती और न ही वित्तीय मदद करती है। बल्कि यह श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा चलाया जाता है, जो एक स्वायत्त निकाय है।

राम मंदिर के दान विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

यह विवाद तब शुरू हुआ जब स्थानीय मीडिया रिपोर्टों में राम मंदिर को मिले दान में कथित अनियमितताओं को उजागर किया। यह मुद्दा 7 जून को तब राजनीतिक बन गया, जब समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए दावा किया कि करोड़ों रुपये के चढ़ावे का हिसाब नहीं मिल पा रहा है।

करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा मुद्दा बताते हुए अखिलेश यादव ने इस मामले पर चुप्पी साधे रहने पर सवाल उठाया और न्यायिक हस्तक्षेप की माँग की। अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन समारोह में शामिल न होने वाले अखिलेश यादव के लिए योगी आदित्यनाथ सरकार पर निशाना साधने के लिए यह एक राजनीतिक हथियार था।

आरोपों का सिलसिला बढ़ता चला गया

शुरुआत में खबर आई थी कि 5 करोड़ से 75 करोड़ रुपए तक की दान राशि का हिसाब नहीं मिल रहा है। बाद में कुछ खबरों में दावा किया गया कि कथित गड़बड़ी की रकम कहीं अधिक हो सकती है।

कई रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया कि गायब रकम 200 करोड़ रुपए से भी अधिक हो सकती है। इन आरोपों के कारण व्यापक जाँच की माँग उठी।

आरोपों की सच्चाई क्या है?

यह विवाद दान के प्रबंधन से जुड़ा हुआ है। रिपोर्ट्स के अनुसार, कुछ कैश काउंटिंग स्टाफ ने कथित तौर पर वाउचर में दान पेटियों से जमा की गई नकदी को कम करके बताया। श्रद्धालुओं द्वारा दान किए गए सोने, चाँदी और आभूषणों के प्रबंधन को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।

कई महीनों तक नकदी गिनने वाले क्षेत्रों से सीसीटीवी फुटेज कथित तौर पर हटाए जाने के आरोपों के बाद संदेह और भी बढ़ गया। इसके अलावा यह भी आरोप है कि अनियमितताओं से संबंधित शिकायतों को या तो नजरअंदाज कर दिया गया या उन पर पर्याप्त कार्रवाई नहीं की गई।

इन सभी दावों से इसका अंदाजा लगाया जा रहा है कि प्रबंधन से जुड़ा एक हिस्सा जरूर ‘गलत हाथों’ में था, इसलिए चिंता बढ़ गई है।

लीपापोती के आरोप लगे

इस विवाद के केंद्र में मौजूद व्यक्तियों में से एक महिपाल सिंह हैं, जिनकी पहचान मीडिया रिपोर्टों में मंदिर संचालन से जुड़े पूर्व लेखा प्रभारी के रूप में की गई है।

सिंह ने आरोप लगाया कि दान की चोरी काफी समय से हो रही थी और दावा किया कि इस संबंध में अंदरूनी स्तर पर चिंता जताई गई थीं।

उनके बयान के अनुसार, उन्होंने कथित अनियमितताओं के बारे में वरिष्ठ अधिकारियों को सूचित किया था, लेकिन इसके तुरंत बाद उन्हें उनके पद से हटा दिया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कई महीनों की सीसीटीवी फुटेज डिलीट कर दी गई है।

ये आरोप अभी तक साबित नहीं हुए हैं, लेकिन चंदा चोरी की आम धारणा को काफी हद तक मजबूत किया है, इसलिए गहन जाँच की जरूरत है।

लापता रामशिलाएँ और दशकों पुराने आरोप

यह विवाद तब और सुर्खियों में आ गया, जब धर्मसेना के संस्थापक संतोष दुबे ने बहुमूल्य रामशिलाओं के संबंध में सनसनीखेज आरोप लगाए।

दुबे के अनुसार, सोने, चाँदी, हीरे, माणिक और अन्य कीमती धातुओं से बनी लगभग 1250 रामशिलाएँ गायब हैं। इन्हें कथित तौर पर भारत और विदेशों में पूजा-अर्चना के बाद अयोध्या लाया गया था।

उन्होंने दावा किया कि राम मंदिर आंदोलन से जुड़े मूल्यवान दान और कीमती वस्तुओं के बारे में चिंताएं कई दशकों पुरानी हैं। दुबे ने यह भी आरोप लगाया कि राम मंदिर से जुड़ी कीमती वस्तुओं की चोरी 1989 से हो रही है। ये आरोप हैं और इसकी पुष्टि नहीं हुई है। इसकी जाँच की आवश्यकता है।

राम मंदिर में दान कैसे एकत्र किया जाता है

आरोपों को समझने के लिए वसूली प्रक्रिया को समझना महत्वपूर्ण है। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने दर्शन मार्ग के आसपास कई दान पेटियाँ या हुंडियाँ लगाई गई हैं। हर दिन हजारों श्रद्धालु इन बक्सों में नकद दान जमा करते हैं।

ट्रस्ट ने दान में दिए गए नकद को गिनने की प्रक्रिया में भारतीय स्टेट बैंक को शामिल किया। बाद में बैंक ने यह काम एक निजी एजेंसी को आउटसोर्स कर दिया।

इसका असर यह हुआ कि दान की पूरी प्रक्रिया में मंदिर के कर्मचारी, आउटसोर्स किए गए कैश काउंटर, पर्यवेक्षक, बैंकिंग टीमें शामिल हो गए।

फिलहाल आरोप इस बात पर केंद्रित हैं कि दान एकत्र होने के बाद क्या हुआ होगा, न कि इस बात पर कि दान की वस्तुएँ सीधे दान पेटियों से गायब हो गईं।

कई कर्मचारियों की संपत्ति अचानक बढ़ी

राम मंदिर चंदा चोरी विवाद का शायद सबसे अहम पहलू इससे जुड़े कई कर्मचारियों की संपत्ति में बेहिसाब इजाफा है।

खबरों के मुताबिक, दान प्रबंधन में शामिल कई कर्मचारी जाँच के दायरे में आ गए, जब जाँचकर्ताओं ने कथित तौर पर उनकी अपार संपत्ति का पता चला। यह उनके बताए गए आय के स्रोतों से कहीं ज्यादा थे।

रिपोर्ट्स से पता चलता है कि लगभग 18000 रुपए से 20000 रुपए प्रति माह कमाने वाले कर्मचारियों के पास आलीशान घर- कार हैं और उसने बिजनेस में निवेश किया है। खबरों के मुताबिक, दो कर्मचारियों ने 1.5 करोड़ रुपए और 40 लाख रुपए की जमीनें खरीदीं थी।

जाहिर है इन घटनाक्रमों ने इस संदेह को और मजबूत कर दिया कि कुछ व्यक्तियों को दान प्रबंधन में अनियमितताओं से फायदा मिला।

लवकुश मिश्रा की गिरफ्तारी और पैसों की बरामदगी

कैश गिनने वाले कर्मचारी लवकुश मिश्रा की गिरफ्तारी के बाद जाँच में तेजी आई। खबरों के मुताबिक, जाँचकर्ताओं ने उसके घर से करीब 10 लाख रुपए बरामद किए हैं।

मीडिया रिपोर्टों में आगे बताया गया कि कुछ नकदी कथित तौर पर गोबर के नीचे छिपाई गई थी। बताया जाता है कि आंतरिक ऑडिट और सीसीटीवी फुटेज की समीक्षा में मिश्रा के आचरण पर सवाल उठे थे। इसके बाद अधिकारियों ने उनकी जाँच शुरू की।

चंपत राय ने चंदे के गायब होने के आरोपों को खारिज किया

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने करोड़ों रुपए गायब होने के आरोपों का पुरजोर खंडन किया है। ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने कहा है कि इंटरनल ऑडिट में कोई वित्तीय अनियमितता नहीं पाई गई है।

ट्रस्ट ने लगातार यह दावा किया है कि उसका ऑडिट सिस्टम पारदर्शी है और इसमें कही घपला नहीं मिला है। इस मामले में महत्वपूर्ण बात यह है कि ट्रस्ट ने जाँच का विरोध नहीं किया, बल्कि ट्रस्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिल कर आरोपों की स्वतंत्र जाँच की माँग की।

आधिकारिक बयानों के अनुसार, ट्रस्ट ने तर्क दिया कि तथ्यों को स्थापित करने और राम मंदिर की छवि को नुकसान पहुँचाने के उद्देश्य से फैलाई जा रही गलत सूचनाओं का खंडन करने के लिए एक औपचारिक जाँच आवश्यक थी।

राम मंदिर चंदा विवाद को सीधे उत्तर प्रदेश सरकार से जोड़ना भ्रामक क्यों है?

जैसे-जैसे विवाद बढ़ता गया, विपक्षी नेताओं ने इसे उत्तर प्रदेश सरकार की विफलता के रूप में दिखाने का प्रयास किया जबकि राम मंदिर ट्रस्ट की कानूनी और संस्थागत संरचना से योगी सरकार का कोई लेना-देना नहीं है।

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा नहीं किया गया था। इसकी स्थापना फरवरी 2020 में सर्वोच्च न्यायालय के अयोध्या फैसले के बाद केंद्र सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के माध्यम से की गई थी। अधिग्रहित भूमि का स्वामित्व उस कानूनी ढाँचे के तहत सीधे ट्रस्ट को हस्तांतरित कर दिया गया था।

यह ट्रस्ट स्वतंत्र रूप से कार्य करता है और अपने मामलों का प्रबंधन खुद करता है। अध्यक्ष, महासचिव और कोषाध्यक्ष का चुनाव ट्रस्ट खुद करता है और वे लोग मंदिर प्रशासन, वित्त और दान पर नियंत्रण रखते हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार की भूमिका मुख्य रूप से कानून व्यवस्था, सुरक्षा, भीड़ प्रबंधन और प्रशासनिक समन्वय तक ही सीमित है। ट्रस्ट बोर्ड में राज्य के मनोनीत सदस्यों को मतदान का अधिकार नहीं है और वे वित्तीय निर्णयों को नियंत्रित नहीं करते हैं।

अयोध्या के जिला मजिस्ट्रेट भी प्रशासनिक मामलों में समन्वय का काम करते हैं। उनका दान का प्रबंधन करने या मंदिर के खातों की देखरेख करने से कोई मतलब नहीं है।

इसलिए चंदा चोरी भी साबित होने पर जवाबदेही राज्यसरकार पर नहीं आएगी। यह मंदिर प्रबंधन से जुड़े लोगों, खासकर दान संग्रह, गिनती, ऑडिट और निगरानी में शामिल लोगों पर होगी।

ट्रस्ट की जाँच की माँग के बाद एसआईटी गठित

ट्रस्ट के सदस्यों से मुलाकात और आरोपों की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एसआईटी का गठन किया। तीन सदस्यीय विशेष जाँच दल में प्रशासन, पुलिस और वित्त विभाग के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हैं।

गौरतलब है कि यह निर्णय ट्रस्ट के अनुरोध के बाद लिया गया, जिसमें आरोपों के पीछे की सच्चाई का पता लगाने के लिए एक स्वतंत्र जाँच की माँग की थी।

एसआईटी को वित्तीय अनियमितताओं के दावों की जाँच करने, उपलब्ध साक्ष्यों की जाँच करने और गलत काम के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों की पहचान करने के निर्देश दिए गए हैं।

इसके निष्कर्षों से यह पता चलने की उम्मीद है कि सचमुच गबन किया गया, कुछ लोग इसमें शामिल हैं या ट्रस्ट का बड़ा भाग इसमें लगा हुआ था। अभिलेखों की चोरी कैसे हुई और कौन-कौन इसके लिए जिम्मेदार् है अथवा पूरा मामला सिर्फ राजनीतिक है और कोई चोरी नहीं हुई।

जनहित याचिकाएँ, राजनीतिक दबाव और अधिक पारदर्शिता की माँग

यह विवाद कोर्ट तक भी पहुँच गया है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच के समक्ष दायर एक जनहित याचिका में मंदिर दान से संबंधित कथित अनियमितताओं की अदालत की निगरानी में सीबीआई जाँच की माँग की गई है।

इसी बीच, भाजपा नेताओं और राम मंदिर आंदोलन से जुड़े लोगों ने दान का दुरुपयोग करने के दोषी पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने पर जोर दिया है। इस मामले में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए दान, खर्च, संपत्ति और अभिलेखों के संबंध में सार्वजनिक जानकारी देने की भी माँग की है।

करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा मुद्दा

करोड़ों हिंदुओं के लिए यह मुद्दा ऑडिट और दान चोरी से जुड़ी अनियमितता से कहीं ज्यादा व्यापक है। राम मंदिर में किया गया हर दान भक्ति का प्रतीक है, करोड़ों हिन्दुओं की आस्था से जुड़ा हुआ है।

यह मंदिर पीढ़ियों की आस्था, त्याग और संघर्ष का परिणाम है। भगवान राम के नाम पर चढ़ाए गए दान का दुरुपयोग सिर्फ आर्थिक कदाचार नहीं है। यह देश-विदेश से आने वाले करोड़ों भक्तों की भावना से खिलवाड़ है। उनके साथ विश्वासघात है। इसलिए आरोपों में भी दम होना चाहिए, इसके सबूत होना भी उतना ही जरूरी है।

राम मंदिर के चंदे को लेकर हुए विवाद ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनके जवाब जरूरी है। लापता धनराशि, गायब कीमती सामान और हटाए गए सीसीटीवी फुटेज से जुड़े आरोपों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

एसआईटी की जाँच, गिरफ्तारियाँ और चल रही छानबीन से संकेत मिलता है कि अधिकारी इस मामले को गंभीरता से ले रहे हैं। हालाँकि, तथ्यों को राजनीतिक बयानबाजी से अलग करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट एक स्वायत्त संस्था है, जो अपने वित्त, दान और प्रशासन का प्रबंधन करती है। उत्तर प्रदेश सरकार की भूमिका मुख्य रूप से सुरक्षा और प्रशासनिक समन्वय तक सीमित है और मंदिर के खातों को नियंत्रित करने या दान के प्रबंधन से सरकार का लेना-देना नहीं है।

यदि आर्थिक गड़बड़ियाँ हुई है, तो दोषियों की पहचान करके उन्हें दंडित किया जाना चाहिए। यदि आरोप बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए हैं, तो सबूतों के माध्यम से यह भी स्पष्ट होना चाहिए।

राम मंदिर से जुड़े संवेदनशील मुद्दे पर काफी सावधानी बरतने की जरूरत है। यह हिंदू सभ्यता के सबसे महत्वपूर्ण पवित्र स्थलों में से एक है। यहाँ करोड़ों भक्तों के दान की पवित्रता और उनकी आस्था को बचाए रखने की जरूरत है।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

4500 साल पुरानी है मोहनजोदड़ो की ‘डांसिंग गर्ल’, जानिए- इसकी पूरी कहानी: ‘कपड़े’ पहनाने पर विवाद के बाद NCERT ने वापस लिया फैसला

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) की कक्षा 9 की नई किताब ‘मधुरिमा’ में सिंधु घाटी सभ्यता की प्रसिद्ध कांस्य प्रतिमा ‘डांसिंग गर्ल’ की तस्वीर में बदलाव किए जाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। किताब के पहले अध्याय ‘कला का इतिहास’ में इस प्रतिमा की ऐसी तस्वीर प्रकाशित की गई थी, जिसमें उसके नग्न धड़ को ढक दिया गया था।

तस्वीर में प्रतिमा के कंधों से नीचे के हिस्से को छिपाकर ऐसा दिखाया गया था कि मानो उसे कपड़े पहनाए गए हों। इससे प्रतिमा की मूल शारीरिक विशेषताएँ नहीं दिखाई दे रही थीं। दुनिया भर में इतिहास और पुरातत्व की किताबों में यह प्रतिमा अपने वास्तविक स्वरूप में दिखाई जाती है, इसलिए इस बदलाव की काफी आलोचना हुई।

NCERT will replace the modified "Dancing Girl" image in the class 9 textbook with the original version.
मूल तस्वीर (बाएँ) और NCERT की किताब में छपी एडिटेड तस्वीर (दाएँ) (फोटो साभार: Deccan Herald)

आलोचना और विरोध के बाद NCERT ने तुरंत फैसला लिया कि प्रतिमा की मूल तस्वीर को फिर से वापस लाया जाएगा। यह बदलाव वेबसाइट पर उपलब्ध डिजिटल संस्करण और अभी तक ना छपी किताबों में किया जाएगा। एक अधिकारी ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया कि अगले साल से छपने वाली हार्ड कॉपी में भी सही तस्वीर ही दिखाई देगी।

शिक्षा मंत्रालय ने भी सोमवार (15 जून 2026) को NCERT से इस मामले में स्पष्टीकरण माँगा था। एक सूत्र ने कहा, “जब यही तस्वीर कक्षा 6 की सामाजिक विज्ञान की किताब में पहले से मौजूद है, तो फिर कक्षा 9 की किताब में इसे बदलने का कोई मतलब नहीं बनता।” गौरतलब है कि पिछले लगभग 25 वर्षों से NCERT की किताबों में ‘डांसिंग गर्ल’ की मूल तस्वीर प्रकाशित होती रही है।

हड़प्पा सभ्यता का एक प्रमुख प्रतीक

करीब 4,500 साल पुरानी यह कांस्य प्रतिमा सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख नगर मोहनजोदड़ो से मिली थी। इसकी ऊँचाई लगभग 10.5 सेंटीमीटर (4.1 इंच) है। मोहनजोदड़ो हड़प्पा सभ्यता का एक महत्वपूर्ण शहर था, जो अपनी सुनियोजित नगर व्यवस्था, विशाल इमारतों और दुनिया की शुरुआती शहरी स्वच्छता प्रणालियों के लिए जाना जाता है।

माना जाता है कि यह प्रतिमा लगभग 2500 ईसा पूर्व की है। इसमें एक युवा लड़की को दिखाया गया है जिसने कई चूड़ियाँ, एक कंगन और तीन लटकनों वाला हार पहन रखा है। उसके बाल सजे हुए हैं और एक कंधे पर बंधे हुए दिखाई देते हैं। उसका एक हाथ कमर पर टिकी हुआ है, जबकि दूसरा नीचे की ओर है। उसकी मुद्रा आत्मविश्वास से भरी नजर आती है।

इस प्रतिमा की खोज 1926 में ब्रिटिश पुरातत्वविद् अर्नेस्ट मैके ने वर्तमान पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र में की थी। उन्होंने ही इसे ‘डांसिंग गर्ल’ नाम दिया था। मैके का मानना था कि यह प्रतिमा उन्हें उस दौर की नृत्यांगनाओं जैसी लगी जो औपनिवेशिक भारत में राजदरबारों में नृत्य प्रस्तुत करती थीं।

प्रतिमा का शरीर पतला है और उसके हाथ-पैर लंबे दिखाई देते हैं। उसका माथा ऊँचा, आँखें बड़ी, नाक चौड़ी और होंठ भरे हुए हैं। उसके दाहिने हाथ में चार चूड़ियाँ और बाएँ हाथ में लगभग 24-25 चूड़ियाँ दिखाई देती हैं। वह अपने दाहिने पैर पर हल्का झुककर खड़ी है और उसका सिर थोड़ा पीछे की ओर झुका हुआ है। उसका दाहिना हाथ कमर के पीछे मुट्ठी बनाकर रखा गया है जबकि बाएँ हाथ में ऐसा लगता है जैसे वह कोई पात्र पकड़े हुए हो।

ब्रिटिश पुरातत्वविद् मॉर्टिमर व्हीलर ने इस प्रतिमा के बारे में कहा था कि यह लगभग 15 साल की लड़की जैसी दिखती है, जो पूरी तरह आत्मविश्वास से भरी हुई है। उनके अनुसार दुनिया में उसके जैसी दूसरी कोई प्रतिमा नहीं है।

कला और तकनीक का अद्भुत नमूना

यह प्रतिमा सिर्फ एक कलाकृति नहीं बल्कि उस समय की तकनीकी प्रगति का भी प्रमाण मानी जाती है। सिंधु घाटी सभ्यता में अधिकतर मूर्तियाँ मिट्टी (टेराकोटा) से बनाई जाती थीं। कांस्य की ऐसी मूर्तियाँ बहुत कम मिली हैं।

हड़प्पा सभ्यता से मिली महिलाओं की अधिकांश मिट्टी की मूर्तियों में कमर के नीचे कोई वस्त्र या बेल्ट दिखाई देती है लेकिन ‘डांसिंग गर्ल’ पूरी तरह नग्न दिखाई देती है। यही बात इसे अन्य मूर्तियों से अलग बनाती है।

यह प्रतिमा कांस्य (ब्रॉन्ज) से बनी है जो ताँबा और टिन को मिलाकर तैयार किया जाता है। इससे पता चलता है कि उस समय के कारीगर धातुओं को मिलाकर मजबूत मिश्रधातु बनाने की तकनीक जानते थे। कई पुरातात्विक खोजों से यह भी पता चला है कि वे ताँबे में आर्सेनिक मिलाकर उसे और मजबूत बनाते थे।

सिंधु घाटी सभ्यता में तांबे और कांस्य का इस्तेमाल औजार, हथियार, गहने, घरेलू सामान और धार्मिक वस्तुएँ बनाने में किया जाता था। ‘डांसिंग गर्ल’ को बनाने के लिए ‘लॉस्ट-वैक्स कास्टिंग तकनीक’ का उपयोग किया गया था। यह आज भी इस्तेमाल की जाने वाली एक बेहद मुश्किल धातु ढलाई तकनीक है।

इस प्रक्रिया में पहले मोम से प्रतिमा का मॉडल बनाया जाता है। फिर उसे मिट्टी से ढक दिया जाता है और छोटे-छोटे छेद छोड़े जाते हैं। बाद में गर्म करने पर मोम पिघलकर बाहर निकल जाता है और उसकी जगह बने खाली हिस्से में पिघला हुआ कांस्य डाला जाता है। धातु ठंडी होने के बाद मिट्टी हटाई जाती है और अंतिम रूप दिया जाता है।

भारत के राष्ट्रीय संग्रहालय के अनुसार, “यह प्रतिमा दो महत्वपूर्ण बातों का प्रमाण है। पहली, सिंधु सभ्यता के लोग धातु मिश्रण और ढलाई जैसी उन्नत तकनीक जानते थे। दूसरी, उनके समाज में नृत्य और प्रदर्शन कला जैसी मनोरंजन की विकसित परंपराएँ मौजूद थीं।”

सभ्यता की विरासत को दिखाने वाली प्रतिमा

‘डांसिंग गर्ल’ को हड़प्पा सभ्यता की सबसे महत्वपूर्ण कलाकृतियों में गिना जाता है। पुरातत्वविदों के अनुसार यह उस दौर के लोगों की धातु विज्ञान, कला और शिल्प कौशल की उत्कृष्ट समझ को दर्शाती है।

प्रतिमा में दिखाई देने वाले गहने बताते हैं कि उस समय आभूषण निर्माण एक विकसित कला और उद्योग था। हड़प्पा सभ्यता के कई स्थलों से हजारों गहने, निर्माण उपकरण, अधूरे आभूषण और उनसे जुड़ा अन्य सामान मिला है। इससे पता चलता है कि गहना बनाना केवल घरेलू काम नहीं बल्कि एक बड़ा पेशा था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, यह प्रतिमा मोहनजोदड़ो के एक घर के अंदर मिली थी। इससे माना जाता है कि इसे पूजा के लिए नहीं बनाया गया था बल्कि यह किसी परिवार या व्यक्ति के उपयोग की वस्तु रही होगी। यह उस समय के लोगों की कलात्मक अभिव्यक्ति, सामाजिक पहचान और व्यक्तित्व को दर्शाती है।

दिलचस्प बात यह भी है कि कंधे से कलाई तक चूड़ियाँ पहनने की परंपरा आज भी उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ इलाकों में देखने को मिलती है। इससे संकेत मिलता है कि कुछ सांस्कृतिक परंपराएँ हजारों वर्षों से चली आ रही हैं।

भारत के विभाजन के बाद पाकिस्तान ने ‘डांसिंग गर्ल’ और ‘प्रिस्ट किंग’ नामक दूसरी प्रसिद्ध हड़प्पा कलाकृति दोनों पर दावा जताया था। लेकिन भारत केवल एक कलाकृति देने के लिए तैयार था।

बताया जाता है कि पाकिस्तानी अधिकारियों ने ‘प्रिस्ट किंग’ को चुना। इतिहासकार आशीष कुमार के अनुसार, पाकिस्तान में धार्मिक समूहों की प्रतिक्रिया के डर से नग्न किशोरी की प्रतिमा को लेने से परहेज किया गया था। उनके मुताबिक उस समय भी प्रतिमा की नग्नता को कुछ लोग अपनी नैतिक मान्यताओं के खिलाफ मानते थे।

आज ‘डांसिंग गर्ल’ भारत की राजधानी नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई है। यह प्रतिमा सिंधु घाटी सभ्यता की उत्कृष्ट कला, फैशन, शिल्प कौशल और रचनात्मक प्रतिभा का एक महत्वपूर्ण प्रतीक मानी जाती है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं)