मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल इस्लामी कट्टरपंथियों की हिंसा के चलते चर्चा में है। यहाँ मस्जिद के पास एकत्रित हुई इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने विरोध प्रदर्शन के नाम पर सड़क पर खूब उत्पात मचाया। उन्होंने न केवल पुलिस वाहनों को निशाना बनाया बल्कि सुरक्षाकर्मियों पर पथराव किया और ‘सर तन से जुदा’ जैसे कट्टरपंथी और उत्तेजक नारे भी लगाए।
ऐसी हिंसा के पीछे इस्लामी कट्टरपंथियों का तर्क था कि आखिर हिंदुओं ने क्यों उस मुस्लिम युवक को पीटा जो हिंदू युवती के साथ होटल में मिला था। इसी बात को आधार बताकर इतना बड़े स्तर पर उपद्रव हुआ। खैर, ये कुछ नया नहीं है। ये वही पैटर्न है जो हर बार हर हिंसा को अंजाम देने से पहले ये लोग इस्तेमाल करते हैं।
किसी एक बात को लेकर मुद्दा बनाना और फिर सड़कों पर उतरकर कानून अपने हाथ में लेना। इस बार भी यही हुआ। रही हिंदू संगठनों के मुस्लिम व्यक्ति को पीटने की बात तो वास्तव में, भोपाल में हिंदू संगठनों का आक्रोश अकारण नहीं है, इसके पीछे ‘लव जिहाद’ जैसे वे तमाम मामले हैं, जिनमें पहचान छिपाकर हिंदू युवतियों को प्रेम जाल में फँसाया जाता है।
इसके बाद अश्लील वीडियो या ब्लैकमेलिंग के जरिए उनका मानसिक व शारीरिक शोषण किया जाता है। सिर्फ भोपाल की बात करें तो पिछले कुछ ही महीनों में वहाँ से तमाम ऐसे केस सामने आए हैं। आइए आज इस रिपोर्ट में उन घटनाओं के बारे में जानें और समझें कि अगर हिंदू संगठनों ने किसी कट्टरपंथी को रंगे हाथों पकड़ कर अपना आक्रोश दिखाया भी तो उनके ऐसा करने के पीछे कौन सी घटनाएँ रही हैं।
हिंदू लड़कियों को नशा देकर दरिंदगी करता था भोपाल का ‘मुस्लिम गैंग’, फिर Video बनाकर करता था ब्लैकमेल
अप्रैल 2025 महीने में भोपाल के कोकता थाना क्षेत्र में स्थित एक निजी कॉलेज की हिंदू छात्राओं के साथ हुए एक भयानक अपराध का खुलासा हुआ था। यह गिरोह खासकर कॉलेज की हिंदू छात्राओं को निशाना बनाता था। मुस्लिम गैंग के आरोपित पहले हिंदू लड़कियों से दोस्ती करते और उन्हें अपने प्रेमजाल में फँसाते थे।
फिर लड़कियों को नशीले पदार्थ पिलाकर उनके साथ गैंगरेप किया जाता था। मुस्लिम गैंग के सदस्य पीड़िताओं का रेप करने के लिए उन्हें न केवल गांजा पिलाते थे, बल्कि गले पर छुरी रखकर, पोर्न दिखाकर उनका बलात्कार करते थे। मामले में पुलिस ने केस के मुख्य आरोपित फरहान खान सहित मोहम्मद साद, अरबाज, अयान, शाहरुख, जावेद उर्फ भय्यू, जोया, फैजान, मोहम्मद अली, अबरार खान, हामिद, अरशद और सिराज समेत कई अन्य को गिरफ्तार किया था।
पीड़िताओं पर जबरन धर्मांतरण और उसके बाद निकाह का भी दबाव डाला जाता था। इसके अलावा उन्हें बीफ खाने, रोजा रखने और बुर्का पहनने के लिए मजबूर किया जाता था। यह पूरा केस महीनों तक चर्चा में था और पीड़िताओं ने बेहद गंभीर खुलासे किए थे कि कैसे उनके साथ दरिंदगी और मारपीट कर इस्लामी कट्टरपंथी उन्हें हवस का शिकार बनाते थे।
शादी का झाँसा देकर भोपाल से ले गया केरल, धर्मांतरण का डाला दबाव: बैग में मिला- ‘मुसलमान कैसे बनें’ किताब
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की एक हिंदू युवती को शादी का झाँसा देकर बादशाह खान केरल ले गया। वहाँ उस पर इस्लामी धर्मांतरण और कलमा पढ़ने का दबाव बनाने लगा। पुलिस का दबाव बढ़ने पर बादशाह ने जब युवती को भोपाल भेजा तो उसके बैग से ‘मुसलमान कैसे बनें’ जैसी किताबें मिली। बाद में बादशाह खान को गिरफ्तार कर लिया गया।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पीड़िता भोपाल के अवधपुरी थाना क्षेत्र के अन्ना नगर इलाके में रहती थी। यहीं बादशाह उसका पड़ोसी था। बादशाह और पीड़िता में जान-पहचान हुई जो बाद में प्यार में बदल गई। कुछ दिनों के बाद लड़की का परिवार अवधपुरी क्षेत्र में शिफ्ट हो गया। यहाँ भी बादशाह लड़की से मिलने आया करता था।
यही से वो लड़की को केरल के कोझिकोड ले गया। वापस आकर पुलिस बयान में पीड़िता ने बताया कि केरल में बादशाह उस पर इस्लाम कबूलने का दबाव बनाने लगा था। वह उसे जबरन कलमा पढ़ने के लिए भी मजबूर किया करता था।
अल्तमश-आहत-आहान ने 3 नाबालिग हिंदू लड़कियों का ब्रेनवॉश कर किया निकाह, कई दिनों तक किया रेप
मध्य प्रदेश के अशोकनगर जिले से नाबालिग हिंदू लड़कियों के जबरन धर्मांतरण, निकाह और रेप का गंभीर मामला सामने आया था। पुलिस ने अल्तमश खान, आहान खान और आहत शेख के खिलाफ FIR दर्ज की। हिंदू पीड़िताओं के अनुसार, उन्हें प्रेम जाल में फँसाकर धर्म परिवर्तन कराया गया और उनके साथ 10 से 15 बार जबरन शारीरिक संबंध बनाए गए।
इन कट्टरपंथियों के चंगुल से किसी तरह निकलकर जब पीड़िताएँ अपने घर पहुँची तो परिजन उन्हें बुर्के में देख कर दंग रह गए। पूछने पर पूरे मामले का खुलासा हुआ। इस मामले में पुलिस ने ‘जस्सी किन्नर’ को भोपाल से गिरफ्तार किया था। जस्सी किन्नर ने ही नाबालिग लड़कियों को अल्तमश खान, आहान खान और आहत शेख से मिलवाया था।
हिन्दू लड़की, होटल का कमरा, 2 मुस्लिम लड़के… बजरंग दल ने दोनों की धुनाई कर पुलिस को सौंपा
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने दो मुस्लिम युवकों को हिन्दू लड़की के साथ पकड़ा। जिसके बाद होटल में जमकर हंगामा खड़ा हो गया। इतना ही नहीं बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने दोनों मुस्लिम लड़कों को होटल से नीचे लाकर बीच सड़क पर जमकर पीटा और पुलिस को सौंप दिया।
मामला भोपाल के एमपी नगर का था। पूछताछ करने पर दोनों मुस्लिम लड़कों ने कार्यकर्ताओं के साथ बहस करना शुरू कर दिया जिसके बाद गुस्साए बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने दोनों को बीच सड़क पर जमकर पीटा।
अयान खान ने दलित लड़की को फँसाया, अपहरण करके 10 दिनों तक किया रेप: पुलिस ने भोपाल से दबोचा
MP के दमोह में दलित लड़की को मुस्लिम लड़के ने 3 साल तक धोखे में रखा। जब राज खुला कि वह अयान खान है, तो लड़की ने रिश्ता तोड़ लिया। शातिर अयान खान ने पीड़िता का अपहरण कर लिया और उसे भोपाल ले जा कर कई दिनों तक यौन शोषण करता रहा।
दलित युवती दमोह से गायब हुई थी और उसे 10 दिनों बाद पुलिस ने भोपाल से बरामद किया। लड़की ने पुलिस को बताया कि अयान खान ने राज नाम रख कर उससे दोस्ती की और 3 साल तक अँधेरे में रखा। जब उसे असली नाम पता चला तो लड़की ने उससे बात बंद कर दी।
इसके बाद अयान उसके घर पहुँचा, बहाने से उसे बाहर बुलाया और जबरदस्ती कार में बिठाया और भोपाल ले गया। शिकायत के बाद पुलिस ने भोपाल जाकर अयान को गिरफ्तार किया।
हिन्दू लड़की से निकाह करने की साजिश में रफीक खान गिरफ्तार
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से लव जिहाद का एक मामला सामने आया था, जिसमें रफीक खान नाम का युवक अपनी पहचान छुपा कर एक हिन्दू युवती से शादी करने जा रहा था। इस बात की जानकारी मिलते ही हिन्दूवादी संगठनों ने युवक से पूछताछ कर जब उसका आधार कार्ड देखा, तो पता चला कि उसका आधार कार्ड भी नकली है।
पुलिस ने इस घटना की जानकारी मिलते ही आरोपित रफीक को गिरफ्तार कर लिया। रफीक ने लड़की को अपना नाम रवि यादव बताया था। रफीक खान ने रवि नाम से ही एक फर्जी पहचान पत्र (आधार कार्ड) भी बनवा रखा था। उसने पीड़िता को बहला-फुसलाकर प्रेम जाल में फँसा लिया था।
वह लड़की के घर आकर पूजा पाठ में भी शामिल होता था और मदद भी करता था जिसकी वजह से उन्हें कभी किसी तरह का संदेह नहीं हुआ। रफीक हिन्दू युवती के साथ भोपाल के कोलार स्थित मंदिर में शादी कर ही रहा था कि तभी रायसेन जिला स्थित मंडीदीप के हिन्दू संगठन को इस बात की सूचना मिली। इसके बाद पूरे मामले का खुलासा हुआ।
विरोध प्रदर्शन के नाम पर हर बार हिंसा करने उतरते हैं इस्लामी कट्टरपंथी
ये कुछ मामले आपके और हमारे सामने हैं, लेकिन कुल इतने ही मामले हो ये मानना गलत होगा। कई मामलों में तो परिवार ने लोक-लाज के डर से शायद शिकायत भी ना की हो और कुछ मामले ऐसे भी होंगे, जहाँ इस्लामी कट्टरपंथियों के चंगुल में अब भी कुछ हिंदू लड़कियाँ प्रताड़ित हो रही होंगी।
इतने सब के बावजूद अगर इन्हें रंगे हाथों पकड़ लिया जाता है तो अपने घटिया उद्देश्य में असफल हो जाने की कुढ़न ये ‘सर तन से जुदा’ के नारे लगाकर, तोड़ फोड़ कर और हिंसा फैलाकर निकालने उतर जाते हैं। कभी ये किसी सोशल मीडिया पोस्ट का हवाला देकर हिंसा करने लगते हैं तो कभी किसी और मुद्दे को अपना आधार बना लेते हैं।
11 अगस्त 2020 की रात पूर्वी बेंगलुरु में दंगे और आगजनी का भीषण नजारा देखने को मिला था। केजी हल्ली, डीजे हल्ली और पुल्केशी नगर इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए थे। 1000 से भी अधिक की इस्लामी कट्टरपंथी भीड़ ने स्थानीय विधायक अखंड श्रीनिवास मूर्ति के घर को घेर लिया था और तोड़फोड़ शुरू कर दी थी।
इस्लामी भीड़ का कहना था कि विधायक के रिश्तेदार ने पैगम्बर मुहम्मद को लेकर आपत्तिजनक पोस्ट किया है। उन्होंने आसपास कड़ी हिन्दुओं की कई गाड़ियाँ जला दी थीं। घटों तक यह दंगा फसाद चलता रहा था। उन्होंने विधायक की बहन के घर भी हमला किया था। इसके अलावा DJ हल्ली और HJ हल्ली पुलिस थानों को भी आग लगा दी थी।
इस मामले में बाद में हुई जाँच में सामने आया था कि इस्लामी भीड़ का यह दंगा पूर्व प्रायोजित था। इसी तरह पश्चिम बंगाल के कालियाचक में 3 जनवरी 2016 को हजारों लोग इकट्ठा हुए थे। यह भीड़ एक राजनीतिक व्यक्ति कमलेश तिवारी द्वारा की गई विवादित टिप्पणी के विरोध में जुटी थी।
शुरुआत में यह एक सामान्य विरोध प्रदर्शन था, लेकिन जल्द ही स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई। भीड़ का एक हिस्सा आक्रामक हो गया, बैरिकेड तोड़ दिए गए और पुलिस व सुरक्षा बलों के साथ झड़प शुरू हो गई। कुछ ही समय में यह विरोध प्रदर्शन पूरी तरह दंगे में बदल गया था।
ऐसे ही मध्य प्रदेश के रतलाम में इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने एक सोशल मीडिया पोस्ट के विरोध में जमकर हंगामा किया था। भीड़ ने चौकी को घेरने की कोशिश की। बाद में पूरी सड़क को जाम कर खूब नारेबाजी की गई। इस दौरान ‘सर तन से जुदा’ जैसे आपत्तिजनक नारे भी लगाए गए और जमकर बवाल काटा गया।
दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग ने हाल ही में पत्रकार करण थापर को दिए इंटरव्यू में भारत में मुसलमानों की स्थिति को लेकर गंभीर टिप्पणी की है। द वायर को दिए इंटरव्यू में नजीब जंग ने कहा कि देश में मुसलमानों की हालत बहुत गंभीर हो गई है और वे दूसरे दर्जे के नागरिक बनने के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं।
उनके इस बयान के बाद एक बार फिर वही पुरानी बहस शुरू हो गई है, जो 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से लगातार चलती रही है। थोड़े-थोड़े इंटरवल पर कोई न कोई बड़ा नेता, अभिनेता, प्रोफेसर या रिटायर्ड अधिकारी यह कहता फिरता है कि भारत में मुसलमानों असुरक्षित होते जा रहे हैं।
शब्द बदल जाते हैं, उदाहरण बदल जाते हैं, लेकिन मूल संदेश वही रहता है कि मुसलमान धीरे-धीरे भारत में अपनी जगह खो रहे हैं। लेकिन, अब जब मोदी सरकार का तीसरा कार्यकाल चल रहा है, तो एक बड़ा सवाल यह है कि क्या ये भविष्यवाणी सच में जमीन पर दिखाई देती है?
मुस्लिम प्रतिनिधित्व को लेकर नजीब जंग की चिंता
इंटरव्यू में नजीब जंग ने कहा कि आज मुसलमान खुद को मुख्यधारा से दूर महसूस कर रहे हैं। उनके मुताबिक समुदाय के भीतर यह भावना बढ़ रही है कि उनके साथ निष्पक्ष व्यवहार नहीं हो रहा और उन्हें देश की प्रगति से अलग किया जा रहा है। जंग ने कहा कि यह सिर्फ आम लोगों की भावना नहीं है, बल्कि राजनीति और संस्थानों में भी दिखाई देती है।
उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में, जहाँ मुस्लिम आबादी काफी बड़ी है, वहाँ हालिया चुनावों में बीजेपी ने मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतारे। उन्होंने यह भी कहा कि आजादी के बाद पहली बार केंद्र सरकार में कोई मुस्लिम कैबिनेट मंत्री नहीं है और संसद में बीजेपी का कोई मुस्लिम सांसद भी नहीं है।
जंग के मुताबिक, उच्च नौकरशाही, न्यायपालिका और बड़े संस्थानों में भी मुसलमानों की मौजूदगी पहले के मुकाबले कम हुई है। उनका कहना था कि जब लगभग 20 करोड़ की आबादी वाला समुदाय खुद को राजनीतिक रूप से महत्वहीन महसूस करने लगे, तो यह देश के सामाजिक संतुलन के लिए खतरनाक हो सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि सिर्फ समाज का उदारवादी वर्ग ही इस मुद्दे को लेकर खुलकर चिंता जाहिर करता दिखता है और इसे उन्होंने भारत के लिए विनाशकारी बताया। हालाँकि इस तर्क के आलोचक कहते हैं कि इस तरह की आशंकाएँ वर्षों से जताई जाती रही हैं।
लेकिन इसके बावजूद भारत के मुसलमान चुनाव लड़ रहे हैं, व्यापार कर रहे हैं, विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे हैं, सरकारी नौकरियों में हैं और खुले तौर पर अपने मजहब का पालन कर रहे हैं। उनका कहना है कि किसी एक पार्टी में राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम होना अपने आप में दूसरे दर्जे की नागरिकता साबित नहीं करता।
असहिष्णुता की बहस काफी पहले शुरू हो चुकी थी
नजीब जंग पहले व्यक्ति नहीं हैं, जिन्होंने मोदी सरकार के दौर में देश की दिशा को लेकर चिंता जताई हो। दरअसल यह बहस मोदी के प्रधानमंत्री बनने के एक साल के भीतर ही राष्ट्रीय मुद्दा बन गई थी। 2015 और फिर 2017 में कई बड़े नामों ने भारत में असहिष्णुता और मुसलमानों में असुरक्षा की भावना की बात कही थी।
इनमें सबसे बड़ा नाम पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का था। अगस्त 2017 में अपना कार्यकाल खत्म होने के करीब उन्होंने कहा था कि देश के कई मुसलमान बेचैन और असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा था कि उन्होंने यह मुद्दा प्रधानमंत्री मोदी और सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों के सामने उठाया था।
बॉलीवुड में भी मुस्लिमों पर बहस
हामिद अंसारी के बयान से पहले बॉलीवुड के कई बड़े चेहरे भी इस बहस का हिस्सा बन चुके थे। नवंबर 2015 में शाहरुख खान ने भारत में बढ़ती असहिष्णुता की बात कही थी। अपने 50वें जन्मदिन के आसपास दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि समाज में धार्मिक असहिष्णुता बढ़ रही है। उनका बयान तुरंत राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन गया।
इसके कुछ समय बाद अभिनेता आमिर खान ने रामनाथ गोयनका पत्रकारिता पुरस्कार समारोह में इससे भी ज्यादा बड़ा बयान दिया था। आमिर खान ने कहा था कि उनकी पत्नी और फिल्ममेकर किरण राव ने एक समय देश छोड़ने तक की बात कही थी, क्योंकि उन्हें माहौल को लेकर डर महसूस हो रहा था और बच्चों की सुरक्षा की चिंता थी।
आमिर ने कहा था कि उनकी पत्नी रोज अखबार पढ़कर तनाव महसूस करती थीं और समाज में बढ़ते तनाव से परेशान थीं। इस बयान पर जमकर चर्चा हुई। टीवी डिबेट और अखबारों में कई दिनों तक यही मुद्दा छाया रहा।
महत्वपूर्ण बात यह है कि ये चेतावनियाँ नई नहीं हैं। लगभग एक दशक पहले भी यही बातें कही गई थीं कि मुसलमान असुरक्षित हैं, लोकतंत्र खत्म हो रहा है और देश असहिष्णु बनता जा रहा है, लेकिन भारत की सामाजिक और राजनीतिक तस्वीर उन भविष्यवाणियों से काफी अलग रही।
बारह साल बाद क्या मुसलमान दूसरे दर्जे के नागरिक बन गए?
यहीं से बहस गंभीर हो जाती है। अगर सिर्फ राजनीतिक भाषणों और टीवी बहसों को देखा जाए, तो ऐसा लग सकता है कि भारत में मुसलमानों ने अपने सारे अधिकार खो दिए हैं, जबकि जमीन की सच्चाई कुछ और कहानी बताती है।
मुसलमान आज भी खुलकर चुनाव में वोट डालते हैं। मुस्लिम नेता और पार्टियाँ अलग-अलग राज्यों में चुनाव लड़ती और जीतती हैं। मुसलमान व्यापार कर रहे हैं, संपत्ति खरीद रहे हैं, बड़े विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे हैं और फिल्मों से लेकर खेल, नौकरशाही और कानून तक हर क्षेत्र में काम कर रहे हैं।
शाहरुख खान आज भी सुपरहिट फिल्में दे रहे हैं। आमिर खान भी अपने बच्चों के साथ भारत में ही रह रहे हैं, भले ही उनका अपनी पत्नी से तलाक हो चुका हो।
कुल मिलाकर भारत में आज भी मुस्लिम अभिनेता बॉलीवुड पर प्रभाव रखते हैं, मुस्लिम उद्योगपति हैं, मुस्लिम जज हैं, मुस्लिम पत्रकार हैं, मुस्लिम खिलाड़ी हैं और मुस्लिम सिविल सेवक भी हैं। देशभर में मस्जिदें सुरक्षित हैं, ईद-बकरीद राष्ट्रीय स्तर पर मनाई जाती है और इस्लामिक संस्थाएँ कानूनी रूप से काम कर रही हैं।
भारत के मुसलमान उसी तरह जीवन जी रहे हैं जैसे हिंदू, बौद्ध, जैन और ईसाई समुदाय के लोग जीते हैं। लेकिन जब प्रभावशाली लोग बार-बार यह कहते हैं कि मुसलमान जल्द ही दूसरे दर्जे के नागरिक बन जाएँगे, तो इससे समुदाय के भीतर डर और असुरक्षा की भावना बढ़ती है।
2014 के बाद से यह बात इतनी बार दोहराई गई कि कई लोगों के लिए यह एक राजनीतिक नारा बन गया। यह जमीन पर दिखने वाली वास्तविकता नहीं है। कई लोग यह भी तर्क देते हैं कि अगर सरकार सच में मुसलमानों को पूरी तरह हाशिए पर धकेलना चाहती हैं, तो वह मुस्लिम समुदाय के लिए योजनाएँ और कल्याणकारी कदम नहीं उठाती।
मुसलमानों को लेकर मोदी सरकार की पहल
दिलचस्प बात यह है कि जहाँ आलोचक मोदी सरकार पर मुसलमानों की अनदेखी का आरोप लगाते हैं, वहीं बीजेपी सरकार ने मुस्लिम समुदाय खासकर महिलाओं और गरीब वर्ग के लिए कई कदम भी उठाए हैं।
इसका सबसे बड़ा उदाहरण तीन तलाक के खिलाफ कानून था। मोदी सरकार ने इंस्टेंट ट्रिपल तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत पर रोक लगाने के लिए कानून बनाया। इस प्रथा में शौहर सिर्फ तीन बार तलाक बोलकर तुरंत अपनी बीवी को तलाक दे सकता था।
1 अगस्त 2019 को लागू हुए मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम के तहत इंस्टेंट ट्रिपल तलाक को अवैध और अमान्य घोषित किया गया। साथ ही इसे आपराधिक अपराध बनाया गया, जिसमें शौहर को तीन साल तक की जेल की सजा का प्रावधान रखा गया।
सरकार के समर्थकों ने इसे मुस्लिम महिलाओं के लिए बड़ा सामाजिक सुधार और लैंगिक न्याय बताया, हालाँकि कई कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों ने इसका विरोध भी किया था, फिर भी बीजेपी सरकार ने यह कानून लागू किया।
इसके अलावा 2025 में ईद से पहले बीजेपी ने सौगात-ए-मोदी अभियान भी शुरू किया था। इस कार्यक्रम के तहत देशभर में करीब 32 लाख गरीब मुस्लिम परिवारों को खाने-पीने और रोजमर्रा की जरूरतों का सामान देने का दावा किया गया।
इन किट्स में सेवइयाँ, खजूर, चीनी, ड्राई फ्रूट्स, कपड़े और ईद से जुड़ी दूसरी चीजें शामिल थीं। महिलाओं को सूट का कपड़ा और पुरुषों को कुर्ता-पायजामा दिया गया। बीजेपी ने इसे गरीब मुस्लिम परिवारों तक सीधे पहुँचने और ईद से पहले सहायता देने की कोशिश बताया।
सरकार समर्थक इसी आधार पर सवाल उठाते हैं कि अगर मुसलमानों को सच में दूसरे दर्जे का नागरिक बनाया जा रहा होता, तो क्या सरकार मुस्लिम महिलाओं और गरीब मुस्लिम परिवारों के लिए अलग योजनाओं पर इतना राजनीतिक और आर्थिक ध्यान देती?
बारह साल की चेतावनियाँ, लेकिन भारत अब भी वही लोकतंत्र
2014 से अब तक भारत में बार-बार यह कहा गया है कि मुसलमान समाज में अपनी जगह खोने वाले हैं। वामपंथी बुद्धिजीवियों पर आरोप लगता रहा है कि वे मुसलमानों के भीतर खतरे की भावना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं, ताकि बीजेपी को सांप्रदायिक पार्टी बताकर मुस्लिम वोट बैंक को अपने साथ बनाए रखा जा सके।
लेकिन पीएम मोदी के करीब 12 साल के शासन के बाद भी भारत के मुसलमानों के पास संवैधानिक अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता, वोट देने का अधिकार और सार्वजनिक जीवन में मौजूदगी बनी हुई है।
इससे कई लोग यह सवाल उठाते हैं कि जब एक दशक से ज्यादा समय तक बार-बार डर की वही भविष्यवाणियाँ दोहराई जाएँ और फिर भी वैसी स्थिति जमीन पर दिखाई न दे, तो क्या डर को एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया?
कई विश्लेषकों का मानना है कि शायद इसी वजह से कई वामपंथी दल और खुद को मुसलमानों का रक्षक बताने वाले राजनीतिक समूह हाल के वर्षों में चुनावों में कमजोर होते गए हैं। मुस्लिम मतदाता भी अब डर आधारित राजनीति से बाहर निकलकर अपने हितों को अलग नजरिए से देखने लगे हैं।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)
इजरायल के एनजीओ ‘द सिविल कमीशन’ ने ‘साइलेंस्ड नो मोर‘ यानी ‘अब और चुप नहीं’ नाम से एक रिपोर्ट जारी किया है। इसमें 7 अक्टूबर को योजनाबद्ध तरीके से हमास द्वारा रेप और यौन उत्पीड़न के सबूत दिए गए हैं। इसकी टैगलाइन ‘सेक्सुअल टेरर अनवील्ड: 7 अक्टूबर के अनकहे अत्याचार और कैद में बंधकों के खिलाफ’ है।
7 अक्टूबर 2023 इजरायल के इतिहास का सबसे खूनी दिवस था। उस दिन हमास ने नेतृत्व में फिलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद जैसे संगठनों ने इजरायल के मासूम बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं को अपना निशाना बनाया था। इस हमले में 1200 से ज्यादा लोग मारे गए। हमलावरों ने घरों, सड़कों, बस्तियों, सुरक्षा प्रतिष्ठानों और एक संगीत समारोह में आतंक मचाया। इस दौरान करीब 251 लोगों को अगवा कर गाजा ले जाया गया। घटना का वीडियो बनाकर पूरी दुनिया में इसको प्रसारित किया गया।
इस दौरान इजरायली नागरिकों के साथ अभूतपूर्व यौन हिंसा किया गया। इस दिल दहला देने वाली घटना के गवाहों ने जब दुनिया को जानकारी दी, तो लोग सन्न रह गए।
इजरायल की गैर लाभकारी संगठन ‘द सिविल कमीशन’ ने 12 मई 2026 को ‘साइलेंस्ड नो मोर’ यानी ‘अब और चुप नहीं’ शीर्षक से करीब 300 पेज की रिपोर्ट जारी की। रिपोर्ट का शीर्षक है ‘यौन आतंक का पर्दाफाश: 7 अक्टूबर की अनकही क्रूरताएँ और बंधकों के खिलाफ अत्याचार’।
यौन हिंसा, अपमान और क्रूरता की दास्ताँ
दो साल के रिसर्च के आधार पर आयोग ने जो निष्कर्ष निकाला, उसमें कहा गया है कि यौन और लिंग आधारित हिंसा सुनियोजित, व्यापक और अहम थी। हमास और उसके सहयोगियों ने हमले के दौरान कई जगहों पर और कई फेज में पीड़ितों के साथ यौन शोषण किया और उन्हें यातनाएँ दी। उनका अपहरण, स्थानांतरण किया गया और जेल में डाला गया। इन अपराधों में अत्यधिक क्रूरता और गंभीर मानवीय पीड़ा देखी गई, जिन्हें पीड़ितों को डराने और अपमानित करने के उद्देश्य से अंजाम दिया गया था।
हमले के चश्मदीदों और पीड़ितों के बयान, साक्षात्कार, तस्वीरें, वीडियो, सरकारी दस्तावेज और अन्य प्राथमिक सामग्रियों का उपयोग निष्कर्ष निकालने में किया गया। रिपोर्ट में कहा गया है, “आयोग द्वारा किए गए डेटा विश्लेषण से पता चलता है कि पीड़ित 52 अलग-अलग राष्ट्रीयताओं के थे, जो अपराधों के अंतर्राष्ट्रीय दायरे और उनके प्रभाव को रेखांकित करता है।” गाजा में हिरासत में लिए गए लोगों में विदेशी या दोहरी इजरायली और विदेशी नागरिकता वाले लोगों का एक बड़ा हिस्सा था।
इसमें कहा गया है कि सबूतों और सामग्रियों की तुलना और अपराधियों के तौर-तरीकों के विस्तृत विश्लेषण के आधार पर आयोग ने कई स्थानों पर की गई यौन और लिंग आधारित हिंसा की 13 पुनरावृत्तियों की पहचान की। इन पुनरावृत्तियों से पता चलता है कि ये अपराध एक व्यापक और सुनियोजित कार्यप्रणाली का हिस्सा थीं।
जाँच में यह भी पता चला कि आतंकवादियों ने हमले में खुद को दिखा कर और यौन उत्पीड़न को डिजिटल माध्यमों से प्रसार कर हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। उन्होंने हमले, अपमान और हत्या के फुटेज प्रसारित करने के लिए सोशल मीडिया और पीड़ितों की व्यक्तिगत ऑनलाइन प्रोफाइल का दुरुपयोग किया। परिवार के सदस्यों को अपनों की मृत्यु के बारे में सबसे पहले हमलावरों द्वारा कई बार साझा की गई तस्वीरों या वीडियो के माध्यम से पता चला।
आतंकवादियों ने गोप्रो और बॉडी-वियर कैमरे लगा रखे थे या यह सुनिश्चित किया था कि उनके कृत्यों को रिकॉर्ड किया जाए और सार्वजनिक किया जाए। रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया कि इसी वजह से सभी साइटों पर वीडियो में सशस्त्र समूहों और फिलिस्तीनी नागरिकों को हमलों का जश्न मनाते हुए, प्रसन्न और उत्साहित दिखाया गया। डिजिटल मीडिया के इस दुरुपयोग ने जघन्य क्राइम को मनोवैज्ञानिक युद्ध के हथियार में बदल दिया। इसका लक्ष्य न केवल पीड़ित थे, बल्कि उनके परिवार और पूरा समाज भी था।
पीड़ितों को गाजा पट्टी में घसीट कर ले जाने के बाद भी उन्हें दंडित करने, अपमानित करने और यौन हिंसा का शिकार बनाया गया। आतंक का यह एक सुनियोजित अभियान था। नवजात बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों को भी नहीं बख्शा गया। महिलाओं और पुरुषों को घोर अपमान और यौन हिंसा का सामना करना पड़ा। परिवारों को अलग कर दिया गया और बुनियादी चिकित्सा उपचार से वंचित कर दिया गया। दरअसल इन कैदियों के तन-मन पर लगे गहरे चोट का इस्तेमाल प्रचार और दबाव के हथियार के रूप में किया गया।
रिपोर्ट में इन कृत्यों को हमले का ‘केन्द्र’ बताया गया है। इसमें कहा गया है, “महिलाओं और लड़कियों, और कई मामलों में पुरुषों और लड़कों को बलात्कार, यौन यातना, अंग-भंग, जबरन नग्नता और शवों के अपमान का शिकार बनाया गया। माता-पिता की उनके बच्चों के सामने हत्या कर दी गई, भाई-बहनों पर एक-दूसरे के सामने हमला किया गया, पीड़ितों को निर्वस्त्र किया गया, उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया, उनका वीडियो बनाया गया और प्रदर्शित किया गया। ये आवेश में किए गए अपराध नहीं थे। ये सुनियोजित और योजनाबद्ध तरीके से किए गए थे ताकि यौन प्रकृति के अपराधों की क्रूरता को और भी बढ़ाया जा सके।”
परिजनों के सामने यौन उत्पीड़न, मृतकों को भी नहीं बख्शा- पीड़ित
रिपोर्ट में कहा गया है, “हमास और उसके सहयोगियों ने हमले की व्यापक रणनीति के एक अंतर्निहित हिस्से के रूप में जानबूझकर और व्यवस्थित रूप से यौन और लिंग आधारित हिंसा (एसजीबीवी) का इस्तेमाल किया। महिलाओं और बंधकों को निशाना बनाया। नाबालिगों को भी इस तरह की हिंसा और दुर्व्यवहार का शिकार बनाया गया।” जिहादियों ने लोगों को उनके परिवारों की उपस्थिति में हृदयविदारक रूप से यातना दी।
जांच में पता चला कि पीड़ितों को क्रूरता के इंतहा तक तड़पाया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, “पीड़ितों को जलाना, अंग-भंग करना, बलात्कार, बांधना, प्राइवेट पार्ट में जबरन वस्तुएँ डालना, चेहरे और प्राइवेट पार्ट पर गोली मारना, परिवार के सदस्यों के सामने हत्याएँ और दुर्व्यवहार करना और फाँसी देना शामिल थे। कई पीड़ितों को हथकड़ी लगाए हुए और बंधक के रूप में बरामद किया गया था। लंबे समय तक बंधक बनाए गए लोगों के खिलाफ यौन उत्पीड़न आम रहे। इन पीड़ितों में महिलाओं के साथ-साथ पुरुष भी शामिल थे।”
यातनाओं की वजह से जीवित बचे लोगों को गंभीर और दीर्घकालिक मनोवैज्ञानिक और शारीरिक क्षति पहुँची। शवों के पोस्टमार्टम में यौन शोषण, अपमान के सबूत मिले।
जाँच रिपोर्ट में कहा गया है कि पीड़ितों को हथकड़ी लगाना, बंधक बनाए हुए दिखाना, महिलाओं और बच्चों को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना और परेड कराना। माताओं और बच्चों का अपहरण। परिवार के सदस्यों की उपस्थिति में यौन हिंसा करना, उसका वीडियो बनाना और डिजिटल प्रसार करने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करना शामिल है। जबरन विवाह की धमकियाँ भी दी गई। लड़कों और पुरुषों के अंग-भंग करना, बलात्कार और यौन हिंसा के भी सबूत मिले।
एक ही परिवार के लोगों और खून के रिश्ते वाले पीड़ितों को जानबूझकर आपस में यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया गया। इसमें एक विशेष मामले का जिक्र जाँच रिपोर्ट में किया गया है। इसके अलावा परिवार के सदस्यों को एक-दूसरे की उपस्थिति में यौन उत्पीड़न या अपमानित किया गया। इससे पूरा परिवार आतंकित रहता था। यह प्रवृत्ति विशेष रूप से हमास की कैद के दौरान देखी गई।”
चरमपंथियों ने खुद को कैमरे पर रिकॉर्ड किया और महिलाओं, बच्चों और पूरे परिवारों को पीटते, अपमानित करते, अपहरण करते और उनकी हत्या करते हुए और शवों का अपमान करते हुए वीडियो अपलोड किए। उन्होंने महिलाओं और उनके शवों को युद्ध की लूट के रूप में प्रदर्शित किया। कुछ क्लिप में आतंकवादियों और गाजावासियों को जश्न मनाते हुए दिखाया गया।
इसके अलावा, फुटेज में बेरहमी से क्षत-विक्षत और जलाए गए शव दिखाए गए। रिपोर्ट में कहा गया है, “हमास और उसके सहयोगियों ने घायल महिलाओं, लड़कियों और बुजुर्ग महिलाओं के हिंसक रूप से अपमानित और अपहरण किए जाने के फुटेज भी प्रसारित किए। हमले का समय सुबह-सुबह होने के कारण इनमें से कई पीड़ितों को उनके रात के कपड़ों में ही ले जाया गया, जिससे वे ज्यादा कष्ट महसूस कर रहे थे।”
रिपोर्ट में नोवा संगीत समारोह में बचे एक व्यक्ति का बयान भी शामिल किया गया। उसने बताया कि उन लोगों ने एक महिला को वाहन से बाहर निकाला, उसके कपड़े जबरदस्ती उतार दिए और उसके साथ बलात्कार किया। उन्होंने उसे बार-बार चाकू मारा, जिससे उसकी मौत हो गई। उसकी मृत्यु के बाद भी उन्होंने उसके साथ बलात्कार करना जारी रखा। यह क्रूरता और हिंसा की भयावहता को दर्शाता है।
एक चश्मदीद राज कोहेन ने बताया, “मैंने उन्हें उसके साथ बलात्कार करते देखा। बलात्कार करते समय हमने उसकी चीखें सुनीं। फिर उन्होंने उसकी हत्या कर दी और उसके बेजान हो जाने के बाद भी उसके साथ दोबारा बलात्कार किया। मैंने उन्हें उसके साथ बलात्कार करते देखा।”
यहूदी राज्य को झकझोर देने वाला वह क्रूर हमला
शुरुआती हमलों में दो गर्भवती महिलाएँ, 28 वर्षीय नित्जान रहुम और 23 वर्षीय एस अबू-रशीद भी निशाना बनीं। अबू-रशीद तो बच गईं, लेकिन उनका बच्चा, रहुम और उनका अजन्मा बच्चा, तीनों ही मारे गए। हमले के तुरंत बाद यौन उत्पीड़न के बारे में गवाहों के बयान और विवरण सामने आए।
रिपोर्ट में बताया गया है, “शुरुआती दिनों से ही पीड़ितों, बचाव कर्मियों, चिकित्सा विशेषज्ञों और मुर्दाघर के कर्मचारियों की रिपोर्टों से संकेत मिल रहे थे कि इन हमलों में यौन हिंसा शामिल है। कई पीड़ित को मौत के बाद ही इन अपराधों से मुक्ति मिली। अनेक मामलों में, पीड़ितों की हत्या हमलों के दौरान या बाद में की गई, और उनके शव क्षत-विक्षत, अधजली अवस्था में बरामद किए गए। यह असाधारण क्रूरता से भरी यौन हिंसा के पैटर्न को दर्शाता है।”
रिपोर्ट में एक घटना के बारे में बताया गया है। इसमें कहा गया है, “22 वर्षीय शानी लूक एक पिकअप ट्रक के पीछे मुँह के बल लेटी हुई, आंशिक रूप से नग्न, घायल अवस्था में थी। उसे गाजा की सड़कों पर सशस्त्र अपराधियों ने उसी अवस्था में घुमाया। इस दौरान उसके शरीर पर थूकते और नारे लगाते हुए अपराधी देखे गए।”
हमले के बाद के महीनों में हमास ने अनगिनत वीडियो जारी किए । इनमें निर्दोष बंदी अपनी जान बचाने की गुहार लगाते या शव दिखाते नजर आए। उन्होंने कुछ मामलों में पीड़ितों के परिवार वालों से सीधे संपर्क किया, जिससे उनका दुख और बढ़ गया। इन कार्रवाइयों ने आतंकी हमले के प्रभाव को और बढ़ा दिया, जिससे दर्द और सदमा और भी गहरा गया।
शवों का अंतिम संस्कार करने वाले शेरोन लॉफर के मुताबिक, कई बार इन खूबसूरत युवतियों की आंखों में गोली मारी जाती थी, जिससे उनके चेहरे विकृत हो जाते थे। उनकी मौत इससे नहीं होती थी, बल्कि दिल में गोली लगने से होती थी।
रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र के अनुमान वाले रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। इसमें आतंकवादियों द्वारा किए गए यौन शोषण और हिंसा सहित अपराधों की गंभीरता को रेखांकित किया गया है। इसमें खुलासा किया गया है कि हमास को अगस्त 2025 में संयुक्त राष्ट्र महासचिव की ब्लैकलिस्ट में शामिल किया गया था, जिसमें उन पक्षों की पहचान की जाती है जिन पर सशस्त्र संघर्ष के दौरान व्यवस्थित बलात्कार और अन्य प्रकार की यौन हिंसा करने या उसके लिए जिम्मेदार होने के पक्के सबूत होते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है, “इस सूची में शामिल होने का मतलब यह है कि संयुक्त राष्ट्र ने भी 7 अक्टूबर के हमलों के दौरान और बंधकों के खिलाफ हमास द्वारा किए गए ऐसे उल्लंघनों के पर्याप्त सबूतों की पुष्टि की है।”
आयोग ने अपहरणकर्ताओं को पीड़ितों को नियंत्रित करने, नागरिक क्षेत्रों में घुसपैठ करने और हिब्रू भाषा में निर्देश जारी करने के तरीके बताने वाले विभिन्न सामरिक नियमावली, नोटबुक, चेकलिस्ट, नक्शे, किताबें और दूसरे संसाधनों की जाँच की। इन सामग्रियों में धार्मिक हिंसा और घृणा परोसा गया था।
रिपोर्ट में इस बात पर जोर डाला गया है कि “इन सामग्रियों में अरबी से हिब्रू में अनुवादित वाक्यांशों की सूचियाँ भी शामिल हैं, जिनमें आदेशात्मक और अपमानजनक निर्देश (उदाहरण के लिए पीड़ितों को अपनी पैंट उतारने या अपने कपड़े उतारने, लेट जाने, अपने पैर फैलाने का आदेश देना) शामिल हैं।”
रिपोर्ट के मुताबिक, “इन वैचारिक सामग्रियों में यहूदी लोगों और इजरायली नागरिकों, जिनमें महिलाएँ, बच्चे और बुजुर्ग शामिल हैं, के खिलाफ एक अंतर्निहित अमानवीय कथा शामिल थी, जिन्हें कुछ ग्रंथों और बयानों में हिंसा के वैध शिकार के रूप में दर्शाया गया था।” दरअसल हमास यहूदी समुदाय के खिलाफ हिंसा का समर्थन करता है।
इस नरसंहार और घृणित कृत्यों को न केवल फिल्माया गया, बल्कि धार्मिक अभिव्यक्तियों और जोश के साथ महिमामंडित भी किया गया।
इस्लामी आतंकवाद का भयंकर चेहरा
पीड़ितों और गवाहों ने इस्लामी आतंकवाद की कहानी बयान की। नोवा संगीत समारोह में मौजूद एक प्रत्यक्षदर्शी ने हमले के दौरान सात अन्य लोगों के साथ छिप कर जान बचाई। उसने बताया कि उसने अपने छिपने की जगह के पास तीन अलग-अलग स्थानों से बलात्कार की तीन घटनाओं को देखा।
उन्होंने चीखते-चिल्लाते पीड़ितों को एक-दूसरे को सौंप दिया और फिर उन्हें गोली मारकर हत्या कर दी और फिर जश्न मनाया। चश्मदीद के मुताबिक, “मुझे नहीं पता कि सामान्य बलात्कार क्या होता है, लेकिन वहाँ जो आवाजें सुनाई दे रही थीं, वे वैसी नहीं थीं। वहाँ हँसी-मज़ाक हो रहा था। चुटकुले चल रहे थे। वे एक-दूसरे को चुटकुले सुना रहे थे। यह सब मजे के लिए किया जा रहा था। वे जश्न मना रहे थे। वे सचमुच इस बात का जश्न मना रहे थे,”
उन्होंने आगे बताया, “एक और घटना यह थी कि मैंने किसी को चिल्लाते हुए सुना, ‘उसे मत छुओ, ऐसा मत करो,’ और फिर उन्होंने उसकी प्रेमिका के साथ उसकी आँखों के सामने बलात्कार किया।” इसके बाद उस जोड़े का भी वही हश्र हुआ।
उसने खुद के सुरक्षित बचने के बाद के मंजर को याद करते हुए कई बातें की, जो उसके साथ बचे एक और व्यक्ति ने पुष्टि की। उसने कहा, “वहाँ एक भी शव ऐसा नहीं था, जिसकी मौत सामान्य तरीके से हुई हो। हर एक शव को यातनाएँ दी गई थीं। लोगों को बाँधकर प्रताड़ित किया गया था। आप देख सकते हैं कि वे प्रतिक्रिया देने में असमर्थ थे। कुछ लोगों के सिर के पिछले हिस्से में गोली लगी थी और उन्हें बाँधा गया था। महिलाओं के हाथ पीछे बाँधे गए थे। और यह स्पष्ट था कि उनके साथ यौन दुर्व्यवहार किया गया था। उनके प्राइवेट पार्ट पर खून, घाव और कटे के निशान थे। एक महिला ऐसी थी, मानो उसका पूरा निचला शरीर फट गया हो।”
एक पुरुष ने भी ऐसा ही अनुभव साझा किया। उसके मुताबिक, कम से कम 5 कट्टरपंथियों ने उसके साथ रेप किया और यातनाएँ दीं। पॉलीग्राफ टेस्ट से इसकी पुष्टि हुई। उसने बताया, “हम पर हर तरह का अत्याचार किया गया। उन्होंने हमारे चेहरे पर थूका, हमें अपमानित किया, यहूदियों के बारे में अपशब्द कहे।
एक समय ऐसा आया जब मुझे सिर जमीन की ओर कर उल्टा खड़ा कर दिया गया। पहले तो मैंने विरोध किया, लेकिन फिर मेरे सिर पर इतनी जोर से मारी कि मुझे लगा जैसे मैं अपना आपा खो बैठा हूँ। जितना ज़्यादा मैंने विरोध किया, उतना ही ज़्यादा उन्होंने मुझे पीटा। उन्होंने मेरे प्राइवेट पार्ट को घायल कर दिया। मुझे बेल्ट से पीटा गया। वे मुझ पर हँसे भी। उनमें से एक ने चाकू निकाला और तरह-तरह की बातों पर हँसने लगा। मैंने उसे छोड़ने की भीख माँगी और कहा कि मुझे अकेला छोड़ दो। मुझे नहीं पता कि उन्होंने ऐसा करने से पहले क्या लिया था, वे जानवरों जैसे थे।”
गवाह ने बताया कि उसने अपने पीछे महिलाओं के सामूहिक बलात्कार की चीखें भी सुनीं। उसके सिर पर बंदूक तान दी और जान से मारने की धमकियाँ देने के साथ-साथ प्राइवेट पार्ट काटने की चेतावनी भी दी। यह अमानवीय व्यवहार तब तक जारी रहा जब तक वह बेहोश नहीं हो गया। उसके साथ क्या हुआ था, उसे नहीं पता।
एक अन्य प्रत्यक्षदर्शी ने बताया जो अपने एक दोस्त को बचाने की कोशिश कर रहा था। उसके मुताबिक, “मुझे जीप याद है, उसमें एक महिला का शव था जिसने काले रंग की पोशाक पहनी हुई थी। उसके गाल में गोली लगी थी और वह उसी स्थिति में जम गई थी। उसके कपड़े ऊपर उठी हुई थी और अंडरगार्मेट नहीं पहना था, इसलिए नहीं कि वह जल गया था, बल्कि उसे उतार दिया गया था। उसके पैर फैले हुए थे और प्राइवेट पार्ट खुले हुए थे। उसके पति का शव कार के दूसरी तरफ था, जाहिर तौर पर वह उसका पति ही था। मुझे उस समय यह पता नहीं था। एक और शव था जो राख में तब्दील हो चुका था। वह अब इंसान जैसा भी नहीं लग रहा था,”
एक अन्य व्यक्ति के मुताबिक, “उन्होंने लोगों को कारों से घसीटकर बाहर निकाला। उन्होंने शवों को बेहद क्रूरता से क्षत-विक्षत किया। उन्होंने हथियारों से लोगों को काटा। औजार उनके शरीरों में धँसे हुए थे। हम शायद 50 मीटर और आगे बढ़े। दोनों तरफ पेड़ थे। सब कुछ जल चुका था। शव सड़क के किनारे पड़े थे और था बहुत सारा सामान”।
रिपोर्ट में कहा गया है, “नोवा संगीत समारोह के कुछ बचे हुए कर्मचारियों ने महिला पीड़ितों को देखने की सूचना दी है जो नग्न या आंशिक रूप से नग्न अवस्था में थीं। कुछ मामलों में बिना अंडरवियर के भी थीं। पीड़ित महिलाएँ पैर फैलाकर लेटी हुई थीं और उनके गुप्तांगों पर चोटों के निशान थे।” शव आधे कटे हुए, बेरहमी से क्षत-विक्षत पाए गए और कुछ विशेष स्थानों पर उन्हें एक साथ ढेर करके जला दिया गया था।
एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया, “जले हुए शव, झुलसे हुए शव, क्षत-विक्षत शव पूरे इलाके में फैले हुए थे। जली हुई गाड़ियाँ इतनी बुरी तरह क्षतिग्रस्त थीं कि कल्पना भी नहीं की जा सकती,”
रिपोर्ट में आगे कहा गया है, “एक स्वयंसेवक ने नग्न नागरिकों के शवों की बरामदगी के मामलों का वर्णन किया, जिनमें एक महिला पीड़ित भी शामिल थी, जिसके शरीर पर गंभीर चोट के निशान थे। एक पुरुष पीड़ित नग्न अवस्था में मिला था जिसके शरीर पर लंबे समय तक पीड़ा और मृत्यु से पहले दुर्व्यवहार के संकेत थे।”
प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि आतंकवादियों ने किस तरह निर्दयतापूर्वक बंधकों को सताया, घायल किया और यातनाएँ दी। आयोग और विशेषज्ञों द्वारा कई वीडियो का विश्लेषण किया गया, जो उस दिन की क्रूरता को दर्शाते हैं। इनमें एक उदाहरण ऐसा मिला, जिसमें पीड़ितों को मारने से पहले उनके गुप्तांगों में हथियार डाले गए थे।
रिपोर्ट में इस बात पर ज़ोर दिया गया, “नोवा स्थल पर यौन हिंसा के सबूत, समीक्षा किए गए गवाहों के बयान और फोटो-वीडियों समेत दूसरे दस्तावेजों के आधार पर कहा जा सकता है कि महिलाओं को असाधारण रूप से क्रूर तरीकों से निशाना बनाया गया। इसमें अत्यधिक यौन हिंसा, अंग-भंग और क्रूरता शामिल है, जो दर्शाता है कि उन पर इसलिए हमला किया गया क्योंकि वे महिलाएं थीं और लिंग-आधारित हिंसा हमलों का अहम हिस्सा था। दस्तावेज यह भी दर्शाते हैं कि पुरुष पीड़ितों को भी यौन हिंसा और अंग-भंग का शिकार बनाया गया, जिसमें कपड़े उतारना और जननांगों को निशाना बनाना शामिल है। उन्हें नपुंसक बनाए गए और अपमानित किया गया।”
कुछ फिलिस्तीनियों ने असाधारण हिंसा में दिया आतंकियों का साथ
आयोग ने जो सबूत जमा किए और गवाहों के बयानों की समीक्षा की, उसमें यह बात भी सामने आया कि कई फिलिस्तीनी नागरिकों ने सशस्त्र आतंकवादियों के साथ किबुत्जिमों पर हमले में भाग लिया, जिससे नरसंहार और विनाश ज्यादा हुआ।
एक व्यक्ति ने 9 अक्टूबर को बे’एरी का दौरा करने के बाद बताया, “जब हम अंदर गए, तो वहाँ एक अस्पताल के बिस्तर पर एक शव था। मुझे समझ आया कि वह एक महिला थी। कमरे में चाकू, स्केलपेल, हथौड़ा, कुल्हाड़ी, स्क्रूड्राइवर, औजार और घरेलू उपकरण बिखरे पड़े थे। ये सभी चीजें शव में धंसी हुई थीं। शव पूरी तरह से क्षत-विक्षत था।”
रिपोर्ट के मुताबिक, “किबुत्ज में अन्य स्थानों की तरह ही, महिला पीड़ितों के शव कमर से नीचे पूरी तरह या आंशिक रूप से नग्न थे। उनके हाथ पीछे बंधे हुए थे और उन्हें गोली मारी गई थी। मिशन टीम ने प्रत्यक्षदर्शियों से जानकारी एकत्र की, जिन्होंने बताया कि उन्हें नग्न अवस्था में, हाथ पीछे बंधे हुए और सिर में गोली के घावों वाली महिलाओं के शव मिले थे,”
इसमें आगे कहा गया है, “हालाँकि इन पीड़ितों के खिलाफ यौन हिंसा की पुष्टि इस समय संभव नहीं है, लेकिन उपलब्ध परिस्थितिजन्य जानकारी, विशेष रूप से बार-बार मिलने वाली महिला पीड़ितों के नग्न अवस्था में, बंधे हुए और गोली मारे जाने की घटना, यह संकेत देती है कि यौन हिंसा, अमानवीय और अपमानजनक व्यवहार की गई थी।” लोगों को उनके निहत्थे परिवारों की उपस्थिति में या तो गोली मारकर हत्या कर दी गई या उनका अपहरण कर लिया गया।
संघर्ष में यौन हिंसा पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिनिधि ने कहा, “यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि किबुत्ज़ रीम में यौन हिंसा हुई, जिसमें बलात्कार भी शामिल है। इसमें किबुत्ज़ रीम के प्रवेश द्वार पर बम शेल्टर के बाहर एक महिला के साथ हुआ बलात्कार भी शामिल है, जिसकी पुष्टि गवाहों के बयानों और डिजिटल सामग्री से हुई है। संयुक्त राष्ट्र के जाँच आयोग (स्वतंत्र अंतर्राष्ट्रीय जांच आयोग) ने भी किबुत्ज में कई महिलाओं और पुरुषों के खिलाफ यौन हिंसा के मामलों को दर्ज किया है।”
इसके अलावा, हमास द्वारा किबुत्ज नाहल ओज पर हमले के बाद जारी किए गए वीडियो में एक युवा छात्र के साथ दुर्व्यवहार और उसके आंशिक रूप से नग्न शरीर को दर्शाया गया था।
लगातार आ रही भयावह दृश्यों ने रोंगटे खड़े किए
हालाँकि मुख्य निशाना इजरायल के नागरिक और यहूदी थे, फिर भी इजरायली सैन्य ठिकानों को भी निशाना बनाया गया।
रिपोर्ट में कहा गया है, “सैन्य ठिकानों पर हमले में हिंसा चरम पर दिखी। यौन यातना, शवों को जलाना और अपमानित करना, अंग-भंग करना, जननांगों को काटना और सिर धड़ से अलग करना शामिल है।” आयोग ने वीडियो रिकॉर्डिंग और अन्य सामग्री के माध्यम से भी इसकी पुष्टि की।
इसमें बताया गया, “अन्य हमला वाली जगहों की तरह, इन स्थानों पर भी यौन और लिंग आधारित हिंसा और पीड़ितों की हत्या कर दी गई। हालाँकि हमास के अपने दस्तावेजों से मिले साक्ष्य, बचे और रिहा किए गए बंधक, गवाहों के बयान से पता चलता है कि इन स्थलों पर पुरुषों और महिलाओं दोनों के खिलाफ यौन और लिंग आधारित हिंसा की घटनाएँ हुईं।”
गवाहों के बयानों के मुताबिक, प्रत्यक्षदर्शियों ने भयानक दृश्य देखे, जैसे कि महिला पीड़ितों के चेहरे जानबूझकर विकृत और क्षत-विक्षत किए गए थे, शरीर खून से लथपथ थे और महिलाओं के गुप्तांगों में गोलियां मारी गई थीं। रिपोर्ट में कहा गया है, “गवाहों ने मुर्दाघरों में महिला सैनिकों के शवों की स्थिति का भी वर्णन किया, उनके कपड़े और पैंट बुरी तरह फटे हुए थे और शवों पर ऐसे घाव थे, जो मृत्यु से पहले और मृत्यु के बाद दोनों ही समय अत्यधिक हिंसा के संकेत देते थे।”
इमारत के बाहर छिपी एक अधिकारी ने किसी के साथ बलात्कार होने की आवाज सुनने का दावा किया। बाद में बाहर आकर उसने एक महिला सैनिक का नग्न शरीर देखा और उसे ढँक दिया। उसने यह भी कहा कि उसने एक पुरुष का शव देखा जिसका गुप्तांग क्षत-विक्षत था।
संयुक्त राष्ट्र जाँच आयोग ने जो वीडियो जारी किया था, उसमें छह अपराधी एक दीवार के पास खड़े दिखाई दे रहे हैं। फर्श पर चार शव पड़े हैं। एक महिला का शव आंशिक रूप से धुंधला है और ऐसा प्रतीत होता है कि उसे सफेद चादर से ढका गया है। धुंधला होने के बावजूद, शरीर का निचला हिस्सा नग्न दिखाई देता है। एक अन्य वीडियो में अपराधी उसी महिला के ऊपर खड़े होकर ‘ईश्वर महान है’ चिल्ला रहे हैं।
रिपोर्ट में आगे कहा गया है, “उनकी फोरेंसिक समीक्षा हत्याओं के पैमाने और पीड़ितों पर किए गए अत्यधिक बर्बरता को रेखांकित करती है। कई शवों की स्थिति यौन विकृति के पैटर्न को बताती हैं साथ ही क्रूरता को उजागर करती है।”
दूसरी ओर गवाहों ने खुलासा किया, “महिला पीड़ित खून से लथपथ, फटे कपड़ों में या आंशिक रूप से नग्न अवस्था में, केवल खून से सने हुए अंडरवियर पहने हुए पहुंचीं,” उन्होंने आगे बताया कि “महिला सैनिकों को गुप्तांग, योनि या स्तन में गोली मारी गई थी। ऐसा प्रतीत होता है कि पीड़ितों के एक ग्रुप का सुनियोजित तरीके से जननांगों को निशाना बनाया गया।”
एक गवाह माना है कि उसने महिला कर्मियों के ऐसे शव देखे थे, जिन पर यौन हिंसा के सबूत थे। कई के गुप्तांगों पर घाव थे और उसने ऐसे शव का वर्णन किया जिन पर यौन शोषण के संकेत थे। इनमें हड्डियों के फ्रैक्चर, शरीर में डाली गई वस्तुएँ, साथ ही ऐसे शव जिनके जननांगों को काटकर अलग किए गए थे, शामिल थे।”
इसमें बताया गया है कि प्रारंभिक बचाव दल ने यह भी बताया कि महिलाओं के शव नग्न अवस्था में अलग-अलग कमरों में रखे गए थे, जिन पर शारीरिक शोषण और यौन हिंसा के निशान थे।”
संयुक्त राष्ट्र जांच आयोग ने भी गवाहों द्वारा बताई गई ऐसी ही घटनाओं को दर्ज किया। एक व्यक्ति ने बताया, “महिलाओं के साथ क्रूरता की गई थी और यह स्पष्ट था कि उनके साथ क्या हुआ था। जब हमने उन्हें पाया तो वे अलग-थलग थीं, उनके कपड़े उतार दिए गए थे और वे आत्मसमर्पण की स्थिति में थीं।”
पैथोलॉटिस्ट ने पाया कि जननांगों में आग लगाने के लिए ज्वलनशील पदार्थों का इस्तेमाल किया गया होगा, क्योंकि कई शवों, जिनमें अधिकतर महिलाएं थीं, के गुप्तांगों पर ‘जलने’ के सबूत थे।
अपहरण के बाद नाबालिग बंधकों को भी यौन शोषण सहना पड़ा
कमीशन की जाँच के मुताबिक, गाजा में बंधक बना कर रखे गए लोगों के साथ भयानक क्रूरता की गई थी। उनके साथ यौन हिंसा का घृणित रूप देखने को मिला। गवाहों के बयान , चिकित्सीय जाँच रिपोर्ट और रिसर्च से पता चलता है कि यौन हिंसा अपहरण के पहले दिन से लेकर उनकी रिहाई या हत्या तक, हर दिन किए गए।
7 अक्टूबर को अगवा किए गए और बाद में रिहा किए गए लगभग सभी बंधकों ने अपनी कैद के दौरान यौन और लिंग आधारित हिंसा की बात कही। बंधकों के बयानों से पता चला कि घरों, टनेल और अन्य ठिकानों पर, जहाँ इन्हें अक्सर रखा जाता था, वहाँ अत्याचार किए जाते थे और यौन उत्पीड़न होता था।
एक पीड़िता ने बताया, “वे मुझे एक कमरे में ले गए। कमरे के दरवाजे पर दो आदमी बंदूकें लिए खड़े थे। एक आदमी ने मेरे सारे कपड़े उतारना शुरू कर दिया। एक ने मेरे जूते उतारे, दूसरे ने मेरी बालियां उतारीं और तीसरे ने मेरे शरीर से गहने निकाल लिए। लगभग 15 लोग एक साथ मुझे छू रहे थे, जब तक कि उन्होंने मेरे सारे कपड़े नहीं काट दिए। और फिर मैं वहां नग्न पड़ी थी, पूरी तरह नग्न। ऐसा लगा जैसे मैं अपने शरीर से बाहर निकल गई हूँ, जैसे मैं सब कुछ ऊपर से देख रही हूँ।”
उसका अपहरणकर्ताओं ने बार-बार यौन उत्पीड़न किया। उसे बताया गया कि इजरायल में उसे मृत मान लिया गया है और वह अपना बाकी जीवन एक यौन दासी के रूप में बिताएगी। गाजा में 482 दिनों तक रहीं एक अन्य पीड़िता ने भी इसी तरह के दर्दनाक अनुभव का वर्णन किया। रिपोर्ट में बताया गया है, “उसने लंबे समय तक अकेली भूखे रहने और शारीरिक शोषण सहने की जानकारी दी। उसने बताया कि बार-बार हुए यौन उत्पीड़न और कैद की स्थितियों के कारण उसने कई बार आत्महत्या करने का प्रयास किया।”
रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है, “बंधक बनाए गए पुरुष सदस्यों को भी यौन हिंसा, यौन यातना और यौन अपमान का शिकार होना पड़ा।” इसमें आगे बताया गया है, “वापस लौटे एक ही परिवार के दो नाबालिग बंधकों ने बताया कि उन्हें एक-दूसरे के साथ यौन क्रियाएं करने के लिए मजबूर किया गया था। अपहरणकर्ताओं ने कथित तौर पर उन्हें अपने कपड़े उतारने के लिए मजबूर किया और फिर उनके गुप्तांगों को छुआ और कोड़े मारे।”
रिपोर्ट में आतंकवादियों द्वारा बंधकों के साथ की गई यौन हिंसा और दुर्व्यवहार की भयावह कहानियाँ थीं। उन्हें इतनी बुरी तरह पीटा गया कि वे बेहोश हो गए। इन भयानक कृत्यों को दस्तावेजों में दर्ज किया गया। रिपोर्ट में खुलासा हुआ, “लौट रहे कई बंधकों ने बताया कि कैद के दौरान उन्हें और अन्य कैदियों को रोने या आवाज निकालने की मनाही थी। कुछ मामलों में यौन शोषण किए जाने के बाद महिलाओं को मुस्कुराने और खुश दिखने के लिए कहा गया था।
यह रिपोर्ट हमले की 10000 से अधिक तस्वीरों और वीडियो क्लिप के साथ-साथ पीड़ितों, गवाहों, छुड़ाए गए बंधकों, विशेषज्ञों और परिवार के सदस्यों के साथ 430 से अधिक आधिकारिक और अनौपचारिक साक्षात्कारों, बयानों और मुलाकातों पर आधारित है। अमेरिकी तकनीकी कार्यकारी और समाजसेवी शेरिल सैंडबर्ग, जिन्होंने हमास के दरिंदों द्वारा किए गए यौन शोषण के बारे में दुनिया को बताया है और पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन, दोनों ने इस रिपोर्ट के निष्कर्षों का समर्थन किया है।
आयोग की अध्यक्ष कोचाव एल्कायम-लेवी ने जेरूसलम पोस्ट से बात करते हुए रिपोर्ट को लेकर कहा कि उन्होंने पीड़ितों की वीडियो रिकॉर्डिंग इसलिए की, ताकि दुनिया को पता चले कि क्या हो रहा है। हमें सब कुछ उजागर करना बेहद जरूरी लगा। यह असाधारण क्रूरता, यौन आतंक था, और मुझे लगता है कि इसका एक महत्वपूर्ण पहलू डिजिटल दस्तावेजीकरण था यानी अपराधों का महिमामंडन किया जाना।
कर्नाटक में सिद्धारमैया सरकार अब खुलकर इस्लामी तुष्टिकरण पर उतर आई है। इसके लिए कॉन्ग्रेसी सरकार ने साल 2022 के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें शिक्षण संस्थानों में हिजाब-बुर्का जैसे इस्लामी मजहबी पहनावे पर बैन लगा दिया गया था। इसकी जगह कॉन्ग्रेस सरकार ने चुपचाप वो फैसला लागू किया है, जिसमें कलावा, जनेऊ, माला, रुद्राक्ष पहनने की भी अनुमति देने की आड़ ली गई है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार ने साल 2022 के उस ऐतिहासिक फैसले को पलट दिया है, जिसने राज्य के शिक्षण संस्थानों में अनुशासन और एकरूपता लाने के लिए हिजाब और बुर्के जैसे मजहबी पहनावे पर प्रतिबंध लगाया था। सरकार ने बुधवार (13 मई 2026) को जारी अपने नए आदेश के जरिए ‘सीमित पारंपरिक और आस्था-आधारित पहचान चिह्नों’ के नाम पर स्कूलों और कॉलेजों में हिजाब की राह फिर से खोल दी है।
इस रिपोर्ट के माध्यम से हम आपको बताने की कोशिश कर रहे हैं कि कैसे यह फैसला केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि गिरते हुए वोटबैंक को बचाने के लिए की गई ‘राजनीतिक सौदेबाजी’ है। यह फैसला केवल एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा राजनीतिक गणित, गिरता हुआ वोटबैंक और तुष्टीकरण की वह पराकाष्ठा है, जिसने कर्नाटक के शैक्षणिक माहौल को एक बार फिर वैचारिक प्रयोगशाला बना दिया है।
साल 2022 का आदेश क्या था और क्यों जरूरी था?
दरअसल, फरवरी 2022 में बसवराज बोम्मई सरकार ने कर्नाटक शिक्षा अधिनियम के तहत स्पष्ट आदेश दिया था कि जहाँ यूनिफॉर्म निर्धारित है, वहाँ छात्रों को वही (यूनिफॉर्म) पहनना अनिवार्य है। कोई धार्मिक प्रतीक यूनिफॉर्म को बदल या प्रभावित नहीं कर सकता। उडुपी के सरकारी प्री-यूनिवर्सिटी गर्ल्स कॉलेज से शुरू हुआ हिजाब विवाद पूरे राज्य में फैल गया था। मुस्लिम छात्राएँ हिजाब पहनकर क्लास में घुसने की जिद पर अड़ी रहीं। विरोध प्रदर्शन हुए, स्कूल बंद हुए।
कर्नाटक हाई कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने भी साल 2022 में साफ कहा था कि हिजाब कोई जरूरी मजहबी प्रथा नहीं है। यह व्यक्तिगत विश्वास का मुद्दा है, लेकिन स्कूल-कॉलेज जैसे सार्वजनिक संस्थानों में यूनिफॉर्म और अनुशासन पहले आते हैं। कोर्ट ने कहा, शिक्षा संस्थान वैज्ञानिक सोच, समानता और जॉतिवाद-निरपेक्षता सिखाने का केंद्र हैं, धार्मिक पहचान का नहीं। मामला अब भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। फिर भी सिद्धारमैया सरकार ने बिना कोर्ट का इंतजार किए, चुपके से 2022 का आदेश वापस ले लिया। यह न्यायपालिका का मजाक है।
सीमित प्रतीकों की आड़ में कट्टरपंथ को न्योता
कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा जारी नए सर्कुलर के बिंदु संख्या 3 और 4 को अगर ध्यान से पढ़ा जाए, तो सिद्धारमैया सरकार की मंशा साफ हो जाती है। आदेश में कहा गया है कि छात्र ‘सीमित पारंपरिक और आस्था-आधारित प्रतीकों’ को निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ पहन सकते हैं। इसमें पेटा (पगड़ी), जनेऊ, शिवदारा, रुद्राक्ष और ‘सिर का कपड़ा’ (हिजाब) शामिल हैं।
पहली नजर में यह आदेश सर्वधर्म समभाव जैसा लग सकता है, लेकिन इसके पीछे की चालाकी को समझना जरूरी है। जनेऊ, रुद्राक्ष या कलावा जैसे प्रतीक सदियों से हिंदू छात्र पहनते आए हैं और ये कभी भी ‘यूनिफॉर्म’ के लिए बाधा नहीं बने। लेकिन इनकी आड़ लेकर हिजाब को स्कूलों में प्रवेश दिलाना सीधे तौर पर उस कट्टरपंथी एजेंडे को खाद-पानी देना है, जिसे 2022 में कोर्ट और तत्कालीन सरकार ने खारिज कर दिया था। यह सशक्तिकरण नहीं है, बल्कि कक्षाओं के भीतर धार्मिक पहचान का संस्थानीकरण (Institutionalization) है। स्कूल वह स्थान हैं जहाँ बच्चों के दिमाग मुक्त, जिज्ञासु और समान होने चाहिए, न कि ऐसी जगह जहाँ राजनीतिक दल वोटबैंक की खातिर अलगाववाद को बढ़ावा दें।
पहचान का संकट, जनेऊ बनाम हिजाब का तर्क
कॉन्ग्रेस सरकार ने इस आदेश को लागू करने के लिए जिस तर्क का सहारा लिया है, वह बेहद चालाकी भरा है। सरकार ने कहा है कि छात्रों को जनेऊ, कलावा, माला और रुद्राक्ष जैसे पारंपरिक चिह्न पहनने की अनुमति दी जाएगी और इसी की आड़ में हिजाब को भी शामिल कर लिया गया। लेकिन यहाँ एक बुनियादी फर्क है जिसे कॉन्ग्रेस सरकार ने जानबूझकर नजरअंदाज किया है।
जनेऊ, कलावा और रुद्राक्ष ऐसे धार्मिक प्रतीक हैं जो व्यक्ति की पहचान को कभी नहीं छिपाते। जनेऊ वस्त्रों के भीतर पहना जाता है, कलावा कलाई पर बंधा एक साधारण धागा होता है और रुद्राक्ष भी गले में कमीज के नीचे रहता है। इनसे न तो छात्र की पहचान संदिग्ध होती है और न ही कक्षा के अनुशासन में कोई बाधा आती है। इसके विपरीत, हिजाब और बुर्का सीधे तौर पर छात्र की पहचान को ढक लेते हैं।
दुनिया के कई विकसित और धर्मनिरपेक्ष देशों जैसे फ्रांस, बेल्जियम और ऑस्ट्रिया में सार्वजनिक स्थानों और स्कूलों में चेहरे को ढकने वाले पहनावे पर प्रतिबंध है। इसका कारण धार्मिक घृणा नहीं, बल्कि ‘सार्वजनिक सुरक्षा’ (Public Security) और ‘समानता’ है। लेकिन कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने इन वैश्विक मानकों और सुरक्षा चिंताओं को ताक पर रखकर केवल इस्लामी वोटबैंक को खुश करने के लिए यह कदम उठाया है।
जनेऊ और कलावा की आड़ में हिजाब का खेल
इस आदेश के बैकग्राउंड में अप्रैल 2026 की एक घटना के बारे में बताना जरूरी है। दरअसल, कॉन्ग्रेस सरकार ने अप्रैल 2026 में हुई उस घटना का हवाला दिया जिसमें एक हिंदू छात्र का जनेऊ उतरवा लिया गया था। असल में वह घटना ‘हिंदू घृणा’ का सीधा उदाहरण थी, क्योंकि जनेऊ एक पवित्र धागा है जो कपड़ों के नीचे रहता है।
लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार ने इस जन-आक्रोश का समाधान करने के बजाय, इसे एक अवसर की तरह इस्तेमाल किया। सरकार ने जनेऊ उतरवाने की घटना पर दिखावे का दुख जताया और फिर ‘समानता’ का ढोंग करते हुए हिजाब को भी अनुमति दे दी। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी की उंगली कटने पर मरहम लगाने के बहाने आप उसके दूसरे हाथ को ही काट दें। जनेऊ की आड़ में हिजाब को वैध करना कॉन्ग्रेस की उस ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ का सबसे बड़ा प्रमाण है, जिसमें हिंदुओं की भावनाओं को केवल तुष्टीकरण के मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
उस विवाद को ढाल बनाकर सरकार ने हिजाब को स्कूलों में प्रवेश दिला दिया, जो कि विशुद्ध रूप से इस्लामी कट्टरपंथियों को खुश करने की एक कोशिश है।
न्यायपालिका की अवमानना और वैधानिक संकट
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि हिजाब का मामला वर्तमान में भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के समक्ष लंबित है। इससे पहले, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से अपने फैसले में कहा था कि ‘हिजाब पहनना इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा (Essential Religious Practice) नहीं है’। जब मामला देश की सबसे बड़ी अदालत में विचाराधीन है, तो आखिर ऐसी क्या जल्दी थी कि सिद्धारमैया सरकार को मई 2026 में ही यह आदेश जारी करना पड़ा?
यह फैसला न केवल न्यायिक प्रक्रिया का मजाक उड़ाता है, बल्कि उस संवैधानिक गरिमा पर भी प्रहार करता है जिसका गुणगान राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस के नेता हर मंच से करते हैं। मुख्यमंत्री ने अदालती प्रक्रिया का इंतजार करने के बजाय अपनी कार्यकारी शक्तियों का दुरुपयोग कर ध्रुवीकरण का रास्ता चुना है। यह पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) द्वारा अपनाए गए उसी खतरनाक रास्ते की तरह है, जहाँ वोट के लिए संस्थानों की शुचिता को दाँव पर लगा दिया जाता है।
चुनावी हार का डर और तुष्टीकरण का सहारा
इस फैसले की टाइमिंग पर गौर करना बेहद जरूरी है। आगामी शनिवार, यानी 16 मई 2026 को बेंगलुरु में मुस्लिम संगठनों और एसडीपीआई (SDPI) की एक बहुत बड़ी रैली होने वाली है। यह रैली किसी और के खिलाफ नहीं, बल्कि कॉन्ग्रेस सरकार के ही खिलाफ आयोजित की गई है। दावणगेरे विधानसभा उपचुनाव में कॉन्ग्रेस की जो दुर्गति हुई, उसने पार्टी आलाकमान की नींद उड़ा दी है।
दरअसल, इस फैसले के पीछे का असली खेल ‘नंबर गेम’ है। दावणगेरे विधानसभा उपचुनाव में कॉन्ग्रेस को जो झटका लगा, उसने सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार की रातों की नींद हराम कर दी है। मुस्लिम बहुल क्षेत्र होने के बावजूद कॉन्ग्रेस उम्मीदवार समर्थ शमनूर मल्लिकार्जुन को मुस्लिम समुदाय का वह समर्थन नहीं मिला जिसकी पार्टी को उम्मीद थी।
वहाँ एसडीपीआई (SDPI) ने भारी सेंधमारी की, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि मुस्लिम मतदाता अब कॉन्ग्रेस को अपनी जागीर नहीं मान रहे हैं। मुस्लिम बहुल सीट होने के बावजूद कॉन्ग्रेस उम्मीदवार की मुश्किल से हुई जीत और एसडीपीआई को मिले भारी वोटों ने यह साफ कर दिया है कि कॉन्ग्रेस का पारंपरिक मुस्लिम वोटबैंक अब उसके हाथ से खिसक रहा है।
कॉन्ग्रेस के लिए सबसे बड़ा डर शनिवार (16 मई 2026) को होने वाली बेंगलुरु की विशाल रैली है। चूँकि अब कॉन्ग्रेस को डर है कि अगर यह रैली सफल हो गई, तो आगामी विधानसभा चुनाव में उसका ‘मुस्लिम वोटबैंक’ पूरी तरह बिखर जाएगा। इसी रैली की हवा निकालने के लिए और कट्टरपंथियों को यह संदेश देने के लिए कि ‘कॉन्ग्रेस उनकी सबसे बड़ी हितैषी है’, यह हिजाब वाला आदेश चुपचाप लागू किया गया। यह एक राजनीतिक ‘रिश्वत’ (Political Bribe) है जो छात्रों के भविष्य की कीमत पर दी गई है।
टीएमसी के बंगाल फॉर्मूले की राह पर कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार
कॉन्ग्रेस कर्नाटक को उसी रास्ते पर ले जा रही है जिस पर ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल को पहुँचाया है। तुष्टीकरण की यह राजनीति शुरू में तो फायदे का सौदा लगती है, लेकिन अंत में यह राज्य के सामाजिक ताने-बाने को नष्ट कर देती है। स्कूलों को धार्मिक पहचान का प्रदर्शन स्थल बनाकर कॉन्ग्रेस आने वाली पीढ़ी के मन में ‘हम’ और ‘वे’ की भावना पैदा कर रही है।
हिंदू छात्रों के प्रतीकों (जनेऊ, कलावा) का उपयोग केवल एक ‘शील्ड’ के रूप में किया जा रहा है ताकि कोई उन पर सीधा आरोप न लगा सके। लेकिन सच्चाई यह है कि हिंदू प्रतीकों को तो स्कूलों में हमेशा से हतोत्साहित किया गया है। सीईटी (CET) परीक्षा के दौरान जिस तरह जनेऊ उतरवाए गए, वह कॉन्ग्रेस की असली मानसिकता को दर्शाता है। एक तरफ हिंदू प्रतीकों के प्रति ‘असहिष्णुता’ और दूसरी तरफ हिजाब के लिए ‘असीम प्रेम’ यह विषमता कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि कॉन्ग्रेस की राजनीतिक वास्तुकला (Architecture) है।
क्या 2028 में उलट जाएगा दाँव?
कॉन्ग्रेस को उम्मीद है कि हिजाब की वापसी से वह 16 मई की रैली के प्रभाव को कम कर देगी और मुस्लिम मतदाताओं को फिर से रिझा लेगी। लेकिन यह दाँव उल्टा भी पड़ सकता है। कर्नाटक की जनता देख रही है कि किस तरह एक खास समुदाय को खुश करने के लिए शिक्षा के स्तर और स्कूलों के अनुशासन से समझौता किया जा रहा है।
अगर इस फैसले के खिलाफ राज्य का हिंदू समाज एकजुट होता है, तो 2028 के विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस के हाथ से कर्नाटक भी निकल जाएगा। जनता यह समझ रही है कि जो सरकार बच्चों की शिक्षा को राजनीति का मोहरा बना सकती है, वह राज्य का भला कभी नहीं कर सकती। ‘इव नम्मव’ (यह हमारा है) का नारा देने वाली सरकार ने असल में ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपना ली है।
कर्नाटक सरकार का यह आदेश समावेशिता के नाम पर समाज को बाँटने वाला कदम है। शिक्षा के अधिकार और धार्मिक पहचान के बीच संतुलन बनाने का दावा करने वाली कॉन्ग्रेस ने असल में तुष्टीकरण की वेदी पर ‘संवैधानिक समानता’ की बलि चढ़ा दी है। स्कूलों में हिजाब की वापसी केवल एक वस्त्र की वापसी नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता की वापसी है जो आधुनिक शिक्षा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बजाय मध्यकालीन पहचान को प्राथमिकता देती है। अब देखना यह है कि क्या कर्नाटक की जनता तुष्टीकरण की इस राजनीति को स्वीकार करेगी या 2028 में इसका निर्णायक जवाब देगी।
दिल्ली पुलिस ने बुधवार (13 मई 2026) रात सोशल मीडिया के जाने-माने इन्फ्लुएंसर डॉ नीलम सिंह उर्फ ‘The Skin Doctor’ को गिरफ्तार किया। बताया गया कि ये गिरफ्तारी करिश्मा कपूर के पूर्व पति और उद्योगपति संजय कपूर के निधन से संबंधित ऐसे पोस्ट को लेकर हुई, जिसके खिलाफ दिल्ली के वसंत कुंज थाने में संजय कपूर के परिवार की तरफ से शिकायत दर्ज कराई गई थी।
शिकायत पर कार्रवाई करते हुए दिल्ली पुलिस ने पहले डॉ. नीलम सिंह को तलब किया और पूछताछ के बाद गिरफ्तार कर लिया। उनकी गिरफ्तारी ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी। लोग उनकी रिहाई की माँग करने लगे। हालाँकि, कुछ देर बाद ही खबर आई कि The Skin Doctor को मजिस्ट्रेट ने 5 घंटे में बेल दे दी। मजिस्ट्रेट ने पुलिस को फटकारते हुए इसे केस को ‘निराधार और तुच्छ मामला’ भी कहा।
कौन है द स्किन डॉक्टर?
डॉ. नीलम सिंह वैसे तो त्वचा विशेषज्ञ हैं। लेकिन जाने वे एक्स समेत अन्य सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स पर ‘द स्किन डॉक्टर’ नाम से जाते हैं। उनके इस अकाउंट पर 9 लाख से ज्यादा फॉलोवर्स हैं, जिनमें से कुछ BJP के बड़े नेता भी शामिल हैं। उनके ज्यादातर पोस्ट BJP समर्थक और दक्षिणपंथी विचारधारा के होते हैं।
क्यों किया गिरफ्तार?
नीलम सिंह को उनके ‘द स्किन डॉक्टर’ अकाउंट पर संजय कपूर के निधन और उनके परिवार के खिलाफ किए गए कुछ पोस्ट को लेकर गिरफ्तार किया गया था। इन पोस्ट में नीलम सिंह ने संजय कपूर की संपत्ति और उनके मौत के पीछे सामने आए कारणों को लेकर सवाल किए थे। उनके ये पोस्ट ‘एक्स’ पर अब वायरल भी।
A prominent influencer, @theskindoctor13, was arrested by the Delhi Police today on a baseless and frivolous case. When the night magistrate gave him bail within 5 hours at 10 PM tonight, it was made clear by the honorable court that he did not do anything wrong.
एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक, सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर डॉ. नीलम सिह उर्फ द स्किन डॉक्टर को दिल्ली पुलिस ने कथित तौर पर संजय कपूर के परिवार के खिलाफ पोस्ट करने को लेकर गिरफ्तार किया गया। एजेंसी ने यह भी बताया कि नीलम सिंह के खिलाफ वसंत कुंज पुलिस थाने में संजय कपूर के परिवार की ओर से शिकायत दर्ज कराई थी।
A social media influencer (Dr Neelam Singh alias The Skin Doctor) has been arrested by Delhi Police for allegedly posting tweets against the Kapur family following the death of businessman Sunjay Kapur. According to sources, a complaint in the matter was lodged at Vasant Kunj…
इसी आधार पर पुलिस ने कानूनी कार्रवाई को आगे बढ़ाया और 13 मई 2026 देर रात उनको गिरफ्तार कर लिया गया। हालाँकि मामला जब कोर्ट पहुँचा तो पाँच घंटे में ही इन्फ्लुएंसर को बेल मिल गई।
वरिष्ठ वकील महेश जेठमलानी ने अपने पोस्ट में जानकारी दी कि जब ‘द स्किन डॉक्टर’ को कोर्ट में पेश किया गया तो 5 घंटे के भीतर ही उन्हें जमानत दे दी गई, इसका मतलब साफ है कि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया। उन्होंने यह भी बताया कि कैसे कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को फटकार लगाई और पूछा कि गिरफ्तारी करने के लिए उन पर किसने दबाव डाला था?
कौन है संजय कपूर?
संजय कपूर एक भारतीय-अमेरिकी उद्योगपति और सोना कॉमस्टार (Sona Comstar) के चेयरमैन थे, जो ऑटोमोटिव पार्ट्स बनाने वाली एक बड़ी कंपनी है। वे एक्ट्रेस करिश्मा कपूर के पूर्व पति के तौर पर भी जाने जाते थे, दंपति ने 2016 में तलाक ले लिया था। उनके दो बच्चे हैं।
12 जून 2025 को 53 वर्ष में संजय कपूर का लंदन में पोलो खेलते समय दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। मेडिकल रिपोर्ट्स में संजय कपूर की मौत को नैचरुल बताया गया। हालाँकि, ऐसे अस्पष्ट परिस्थितियों में बेटे संजय कपूर की मौत के बाद माँ रानी कपूर ने लंदन में कानूनी कार्रवाई की।
केरल विधानसभा चुनाव के नतीजे आए आज 11 दिन बीत चुके हैं लेकिन राज्य में सरकार गठन को लेकर तस्वीर अब तक साफ नहीं हो पाई है। चुनाव जीतने वाला कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) अभी तक मुख्यमंत्री के चेहरे पर अंतिम फैसला नहीं कर सका है।
आमतौर पर स्पष्ट जनादेश मिलने के बाद राजनीतिक दल तेजी से नेतृत्व तय कर लेते हैं ताकि जनता के बीच स्थिरता और आत्मविश्वास का संदेश जाए। लेकिन केरल में कॉन्ग्रेस की स्थिति अलग दिखाई दे रही है।
यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में लगातार यह सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है जिसके कारण कॉन्ग्रेस मुख्यमंत्री के नाम पर सहमति नहीं बना पा रही। इस लेख में हम आपको वो वजह बताने की कोशिश करेंगे जिसकी वजह से कॉन्ग्रेस इतने कन्फ्यूजन या कहें तो दबाव में है।
केरल की राजनीति में सामाजिक संतुलन और कॉन्ग्रेस की चुनौती
केरलम उन राज्यों में है जहाँ राजनीति सीधे सामाजिक समीकरणों से जुड़ी हुई है। यही सामाजिक समीकरण कॉन्ग्रेस का सिर दर्द बने हुए हैं। कॉन्ग्रेस और मुस्लिम लीग ने जो केरल चुनाव जीती है वो मुस्लिमों और ईसाइयों के दम पर जीता है। इसे आँकड़ों से भी समझने की कोशिश करते हैं।
अगर आँकड़ों की बात करें तो 140 सदस्यीय केरलम विधानसभा में इस बार कुल 35 मुस्लिम विधायक चुने गए हैं, जो लगभग 25 प्रतिशत है। इनमें सबसे ज्यादा हिस्सा UDF गठबंधन के पास है, जिसमें कॉन्ग्रेस और IUML मिलाकर कुल 30 मुस्लिम विधायक हैं, यानी करीब 85.7 प्रतिशत।
अकेले IUML के 22 और कॉन्ग्रेस के 8 विधायक इस आँकड़े में शामिल हैं। दूसरी तरफ LDF गठबंधन के पास कुल 5 मुस्लिम विधायक हैं, जिनमें CPI(M) के 4 और CPI का 1 विधायक शामिल है, यानी करीब 14.3 प्रतिशत।
अगर पार्टीवार देखें तो कॉन्ग्रेस के कुल 63 विधायकों में 8 मुस्लिम विधायक हैं, जो लगभग 12.7 प्रतिशत है। IUML के सभी 22 विधायक मुस्लिम हैं, जबकि CPI(M) के 4 और CPI का 1 विधायक मुस्लिम समुदाय से आते हैं।
यहाँ हिंदू आबादी लगभग 54 प्रतिशत, मुस्लिम आबादी करीब 26 प्रतिशत और ईसाई आबादी लगभग 18 प्रतिशत मानी जाती है। ये आँकड़े जनगणना और विभिन्न आधिकारिक रिपोर्ट्स के आधार पर सामने आते रहे हैं।
अब कॉन्ग्रेस के सामने इसी समीकरण को साधना सबसे बड़ी चुनौती है। यानी वो चुनाव मुस्लिम और ईसाइयों के दम पर जीती है तो ऐसे में ये गुट अपने समुदाय का मुख्यमंत्री होने को लेकर जोर लगा रहे हैं और कॉन्ग्रेस भी इनसे दबाव में है। लेकिन वो अंतिम फैसला नहीं ले पा रही है। क्योंकि अगर वो मुस्लिम मुख्यमंत्री चुनती है तो उसके लिए राज्य के सबसे बड़े समुदाय यानी हिंदुओं को साधना मुश्किल हो जाएगा।
वहीं, अगर वो हिंदू मुख्यमंत्री चुनती है, जो शायद वो चुने भी तो फिर अल्पसंख्यकों का भरोसा कॉन्ग्रेस से एक बार फिर उठता दिखेगा और वो भी फिर CPM की और जा सकते हैं। वोटों की इस लड़ाई में बीजेपी का एक अहम खिलाड़ी बनते जाना कॉन्ग्रेस की चुनौतियों को और बढ़ा रहा है।
बीजेपी की बढ़ती मौजूदगी ने कॉन्ग्रेस की चिंता बढ़ाई
कई सालों तक केरलम को ऐसा राज्य माना जाता रहा जहाँ बीजेपी चुनावी तौर पर सीमित प्रभाव वाली पार्टी थी। लेकिन पिछले एक दशक में तस्वीर धीरे-धीरे बदली है। बीजेपी का वोट शेयर लगातार बढ़ा है।
2019 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद के चुनावों में पार्टी ने कई सीटों पर अपनी मौजूदगी मजबूत की। भले ही सीटों के हिसाब से बीजेपी को बड़ी सफलता नहीं मिली हो, लेकिन वोट प्रतिशत और संगठनात्मक विस्तार ने बाकी दलों को सतर्क जरूर किया है।
इसके पीछे RSS की लंबे समय से चली आ रही जमीनी मौजूदगी को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। केरलम उन राज्यों में रहा है जहाँ RSS ने दशकों तक कैडर आधारित नेटवर्क तैयार किया।
यही नेटवर्क अब बीजेपी के राजनीतिक विस्तार में मददगार माना जाता है। बीजेपी फिलहाल सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं लड़ रही बल्कि वह खुद को कॉन्ग्रेस और वाम दलों के बीच तीसरे विकल्प से मुख्य विपक्षी ताकत में बदलने की कोशिश कर रही है।
यही कारण है कि कॉन्ग्रेस कोई ऐसा राजनीतिक संदेश नहीं देना चाहती जिससे बीजेपी को नए वोटरों के बीच जगह बनाने का मौका मिले। और ऐसे वक्त में कॉन्ग्रेस अगर किसी ईसाई या मुस्लिम चेहरे को आगे बढ़ाती है तो BJP का यह नैरेटिव और मजबूत होगा कि कॉन्ग्रेस हिंदुओं को प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व से ज्यादा कुछ नहीं देना चाहती। ये बीजेपी के विस्तार से लिए एक फर्टाइल जमीन तैयार करना होगा।
पश्चिम बंगाल का उदाहरण कॉन्ग्रेस को क्यों परेशान करता है
पश्चिम बंगाल में बीजेपी की बंपर विजय भी कॉन्ग्रेस को परेशान कर रही हैं। इसे पीछे एक खास वजह भी है, वो है 3 का आँकड़ा। इस चुनाव में बीजेपी ने केरल में 3 सीटें जीते हैं, ये उतनी ही सीटें हैं जितनी BJP ने 2016 के बंगाल चुनाव में जीती थीं। 10 सालों में BJP में अपनी तस्वीर पूरी तरह बदल दी है। इस बार बीजेपी ने बंगाल में 293 में से 207 सीटें जीती हैं।
कॉन्ग्रेस का CM चुनने का कन्फ्यूजन बीजेपी की बढ़ती ताकत से और अधिक गंभीर हो रहा है। कॉन्ग्रेस ऐसा कोई मौका BJP या वामपंथियों को नहीं देना चाहती है जिससे उसके लिए संकट आए लेकिन मौजूदा हालात में ऐसा होना लगभग असंभव है।
अब केरल में कॉन्ग्रेस के सामने एक तरफ पारंपरिक अल्पसंख्यक समर्थन को बनाए रखने की चुनौती है, दूसरी तरफ हिंदू वोटरों के बीच अपनी स्वीकार्यता मजबूत रखने की जरूरत है। इसके साथ बीजेपी का बढ़ता राजनीतिक विस्तार और बदलता चुनावी माहौल कॉन्ग्रेस की मुश्किल को और बढ़ा रहा है।
आने वाले समय में कॉन्ग्रेस किस चेहरे पर भरोसा करती है, यह सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन का फैसला नहीं होगा। यह तय करेगा कि पार्टी अपने पुराने सामाजिक गठबंधन को कितनी मजबूती से बचा पाती है और बदलती भारतीय राजनीति में खुद को किस तरह ढालती है। अगर देखा जाए तो कॉन्ग्रेस के सामने असली परीक्षा सिर्फ मुख्यमंत्री चुनने की नहीं बल्कि अपने पूरे सामाजिक गठबंधन को एकजुट बनाए रखने की है।
समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रवक्ता राजकुमार भाटी ने वामपंथियों के एक कार्यक्रम में ब्राह्मणों को वेश्याओं से भी बदतर बताया, खूब ठहाके लगे और वो खुद भी खिलखिलाकर हँसते दिखे। वीडियो वायरल हुआ तो चिंता वोट की हुई और फिर मासूम बनने का दिखावा करते हुए उन्होंने माफी माँग ली। अब उन्हें ब्राह्मणों की कितनी चिंता है, कितना सम्मान है, ये तो उस वीडियो और उसके रिएक्शन से साफ हो गया।
हाँ, इतना जरुर है कि सपा को और अखिलेश यादव को ब्राह्मण वोटों की तो चिंता है। फिर इसी चिंता में, या कहें तो डर में उन्हें माफी माँगने वाली वीडियो बनानी पड़ी। हालाँकि, यह माफी का वीडियो कितनी किस हद तक प्रोपेगेंडा है इसे आप हमारी इस रिपोर्ट में पढ़ सकते हैं। भाटी की इस वीडियो को अगर गहराई से समझें तो इसने सपा के उस एजेंडा को ध्वस्त कर दिया है जो पार्टी ब्राह्मण हितैषी बनने का ढोंग कर वर्षों से चला रही थी।
सपा और अखिलेश यादव लंबे समय से उत्तर प्रदेश में यह नैरेटिव गढ़ने का प्रयास कर रहे हैं कि योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली राज्य की सरकार ब्राह्मण विरोधी है और सपा ही ब्राह्मणों की हितैषी है। इसी नैरेटिव को आगे बढ़ाने के लिए पिछले कुछ वर्षों में सपा ने कई बार परशुराम जयंती से लेकर भगवान परशुराम की प्रतिमा और प्रबुद्ध या ब्राह्मण सम्मेलनों जैसे कार्यक्रमों का सहारा लिया। पार्टी ने यह संदेश देने की कोशिश की कि वह ब्राह्मण समाज की झंडाबरदार है। लेकिन राजकुमार भाटी के बयान ने इस पूरे दिखावे की परतें खोलकर रख दी हैं।
खुद सपा के ब्राह्मण नेता भी भाटी के इस बयान से नाराज हैं। सपा के एक और प्रवक्ता व पूर्व मंत्री पवन पांडे ने भाटी की इस टिप्पणी पर नाराजगी जताते हुए इसे ‘ दुर्भाग्यपूर्ण और अक्षम्य’ बताया है। पवन पांडे ने लिखा, “इस प्रकार की अमर्यादित बयानबाजी न केवल राजनीतिक मर्यादाओं का उल्लंघन है बल्कि समाज में वैमनस्य फैलाने का कार्य भी करती है।” उन्होंने लिखा, “मैं स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूँ कि ब्राह्मण समाज ने सदैव राष्ट्र, संस्कृति और समाज को दिशा देने का कार्य किया है, ऐसे समाज के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किए जा सकते।”
श्री राजकुमार भाटी जी द्वारा ब्राह्मण समाज पर की गई टिप्पणी अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण, निंदनीय अक्षम्य है। ब्राह्मण समाज पर उनकी इस दुर्भाग्यपूर्ण टिप्पणी की मैं कड़ी निंदा करता हूँ। किसी भी जाति, धर्म, संप्रदाय या मजहब के विरुद्ध इस प्रकार की अमर्यादित बयानबाज़ी न केवल राजनीतिक…
सपा के एक विधायक अमिताभ बाजपेई ने भी भाटी को खरी-खोटी सुनाई है। विधायक ने कहा, “भाटी बड़बोलापन कर गए, ऐसे कई नेता आते और जाते हैं!” पवन पांडे या विधायक अमिताभ की नाराजगी कोई इकलौती नहीं है, भाटी की इस टिप्पणी के खिलाफ देशभर में ब्राह्मण समाज गुस्से में है और उनके खिलाफ FIR तक कराई गई हैं। कल तक जो अलंकार अग्निहोत्री सपा और अखिलेश यादव के ‘ब्लू आइड बॉय’ थे वो आज भाटी के खिलाफ धरने पर बैठे हैं। अलंकार अग्निहोत्री अपने समर्थकों के साथ लखनऊ स्थित समाजवादी पार्टी कार्यालय के बाहर धरने पर बैठे और खूब हंगामा किया।
सपा के ये ब्राह्मण विरोधी चरित्र भी कोई आज का या नया नहीं है। ब्राह्मण नेता और ऊँचाहार से विधायक मनोज पांडे को योगी कैबिनेट में जगह मिली है। वो भी अखिलेश यादव के करीबी थे, उनके एक बड़े ब्राह्मण नेता के तौर पर देखा जाता था लेकिन वो अखिलेश यादव से सनातन का विरोध करने वाले स्वामी प्रसाद मौर्य पर भिड़ गए। अखिलेश ने अंत साथ दिया सनातन विरोधी स्वामी प्रसाद का और मनोज पांडे को सपा छोड़नी पड़ी। एक ब्राह्मण नेता को करीब 2 साल पहले अखिलेश का यही रुख था और पार्टी की यही पॉलिसी थी जो आज तक भी जारी है।
अखिलेश यादव के कथित ब्राह्मण प्रेम के इतिहास का एक खूनी सिरा कन्नौज के नीरज मिश्रा से भी जुड़ता है। नीरज ने कभी अखिलेश यादव से टक्कर ली और 24 घंटों के भीतर उनकी सिर कटी लाश मिली थी। नीरज के भाई मुनीष मिश्रा ने इसका आरोप अखिलेश यादव पर ही लगाया था। मुनीष ने बताया था कि उनके भाई का सिर काटकर ब्रीफकेस में रख के अखिलेश यादव के पास लखनऊ भेजा गया था।
अब जाहिर है कि राजकुमार भाटी के बयान ने एक बार फिर सपा का असली चेहरा तो दिखाया ही है और उसके साथ-साथ सपा में भी आपसी फूट शुरू हो गई है। सपा के पूर्व मंत्री-प्रवक्ता से लेकर विधायक तक उनके विरोध में आ गए हैं। अब हालत यह हो गई है कि सपा को सिर्फ जनता के गुस्से का ही नहीं बल्कि अपने ही नेताओं की नाराजगी का सामना भी करना पड़ रहा है।
बचपन का सपना और दो साल की मेहनत के बाद वक्त आया NEET की परीक्षा देने का, एक बच्ची पूरी तैयारी के साथ परीक्षा देती है और सकारात्मक सोच के साथ इंतजार करती है रिजल्ट का। रिजल्ट आता है और साथ ही आता है ‘पेपर लीक’ होने की खबर। दरअसल पेपर लीक ने उसकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया था। 720 में 600 नंबर लाने वालों को भी सरकारी मेडिकल कॉलेज मिलने की उम्मीद नहीं दिख रही थी। उसे तो 550 मार्क्स आए थे। वह घोर निराशा में चली गई। उसे एमबीबीएस से कम मंजूर नहीं था इसलिए उसने काउंसलिंग में जाना भी स्वीकार नहीं किया।
यह कहानी किसी और की नहीं, बल्कि मेरी बेटी की है। दो साल पहले NEET 2024 में भी पेपर लीक हुआ था। उसके तार देश के कोने-कोने से जुड़े मिले। आश्चर्य तो इस बात पर हुआ कि एक साथ 27 बच्चे टॉप कर गए थे, जिनका परीक्षा सेंटर एक था। लगभग एक जैसे रोल नंबर थे। इसे देख कर बेटी का रोना रुक नहीं रहा था। रियल कटऑफ मार्क्स यानी जिस नंबर में सरकारी कॉलेज मिल सकता है, वह नंबर ऐतिहासिक रूप से हाई था। पेरेंट्स के तौर पर बेटी को संभालना हमारी पहली जिम्मेदारी थी।
हमने उसके दोस्तों से बात की। सिर्फ एक दोस्त का नंबर 670 था, जिसकी उम्मीद थी कि उसे कोई सरकारी कॉलेज मिल जाएगा। बाकी सारे दोस्त काफी निराश और दुखी थे। बेटी के दर्द को मैंने महसूस किया। अपने मार्क्स पर उसे कोई शिकायत नहीं थी। शिकायत थी तो उस पेपर लीक से, जिसकी वजह से उसे सरकारी मेडिकल कॉलेज नहीं मिल सकते थे।
मैंने उसे विदेश में पढ़ने के लिए कहा, क्योंकि विदेश का खर्च भारत के प्राइवेट कॉलेज से कम पड़ता है, लेकिन उसने इनकार कर दिया और सीयूईटी के जरिए बायोटेक में एडमिशन ले लिया। यह उसका ‘प्लान बी’ नहीं था, लेकिन पेपर लीक की खबरों से वह इतना परेशान हो चुकी थी कि उसने फिर से NEET की परीक्षा नहीं देने का फैसला किया। उसके अंदर निराशा, गुस्सा और सिस्टम के प्रति अविश्वास भर गई थी। वह आज भी प्रतियोगी परीक्षाओं को ‘शक’ की नजर से देखती है।
मेडिकल में जाना उसका सपना था। उसने दो साल तक एलेन में कोचिंग ली और स्कूल में भी पढ़ाई की। दो साल बाद ये रिजल्ट होगा। अगर इसका अनुमान उसे होता तो शायद वह प्लानिंग पहले ही बदल लेती। NEET और मेडिकल का नाम भी अब वह नहीं सुनना चाहती।
मैंने उसका मनोबल टूटते हुए देखा। उसे संभालना काफी मुश्किल था। उसने कई दिनों तक खुद को चारदिवारी में बंद रखा। खाने-पीने से दूरी बना ली। मुझे लगा कि कई डिप्रेशन न चली जाए। मैंने चुपके से एक साइक्राटिस्ट से संपर्क किया। सारी बातें बताई तो उन्होंने कहा कि कोई बात नहीं दो चार दिनों में अगर नॉर्मल नहीं होती है, तो आप मेरे पास ले आना। भगवान का शुक्र है कि वह कुछ दिनों में सामान्य हो गई और जीवन में आगे बढ़ गई।
आज NEET 2026 पेपर लीक ने हमें दो साल पहले की बेबसी और लाचारी की याद दिला गई। हालाँकि इस बार NTA ने पेपर रद्द करने की घोषणा कर जल्द ही पेपर कराने की बात कह दी है। कई शिक्षण संस्थान रडार पर हैं। केरल से गुरुग्राम तक लोगों की गिरफ्तारी हो रही है। एक बार फिर NTA को रद्द करने की माँग उठ रही है। विपक्ष इस मुद्दे पर देश के Gen Z से सड़कों पर उतरने की अपील कर रहा है।
NTA सवालों के घेरे में है। देश की शिक्षा व्यवस्था पर एक और काला दाग लग गया है। दरअसल ‘पेपर लीक’ देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। छात्र-छात्राएँ खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहते हैं।
NEET 2024 में पेपर लीक की खबरों के बीच रिजल्ट आ गया था। बड़ी संख्या में स्टूडेंट्स सड़कों पर उतरे। सबका बस एक ही सवाल था कि सरकारी कॉलेज का कटऑफ इतना कैसे हो सकता है। जिस नंबर पर आराम से नामी-गिरानी सरकारी मेडिकल कॉलेज आसानी से मिल जाते थे, अब दूर-दराज के मेडिकल कॉलेज भी पहुँच से दूर हो गए थे। प्राइवेट कॉलेज में करोड़ों रुपए देकर मेडिकल की पढ़ाई करवाना ज्यादातर लोगों के बूते के बाहर था।
मामला सुप्रीम कोर्ट में गया। कोर्ट ने NTA को लताड़ा। सीबीआई जाँच हुई और कई खुलासे हुए। कोर्ट ने फैसला दिया कि सिर्फ उन जगहों पर फिर से परीक्षा होगी, जहाँ लीक के सबूत मिले। इसके बाद रिजल्ट रद्द कर फिर से रिजल्ट घोषित किया गया। इसका बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ा। ‘रियल कट ऑफ’ ऐतिहासिक था। छात्रों की बड़ी संख्या नाखुश थी। उनका कहना था कि आखिर नेट पर जब पेपर आ चुका है, तो ‘लीक क्षेत्रीय’ कैसे रह गई।
छात्रों को उम्मीद थी कि कोर्ट रिएग्जाम की बात करेगा, ताकि स्टूडेंट्स को फिर से एग्जाम देने का मौका मिले। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। रिएग्जाम की उम्मीद में कई कोचिंग संस्थानों ने छात्रों की पढ़ाई जारी रखी। छात्रों को भी उम्मीद थी कि उनके साथ ‘न्याय’ होगा और रिएग्जाम होगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कई छात्रों ने दूसरे कोर्स में एडमिशन ले लिया तो कई छात्र-छात्राओं ने फिर से एक साल तैयारी करने की बात कही। लेकिन मन में वही डर था कि क्या अगले साल पेपर लीक नहीं होगा?
ये सिर्फ NEET का मामला नहीं है। देश में दूसरी परीक्षाओं के पेपर भी लीक हुए हैं। यूजीसी-नेट परीक्षा 2024 को सरकार ने परीक्षा के अगले ही दिन रद्द कर दिया था। आरोप था कि प्रश्नपत्र डार्क वेब और मैसेजिंग नेटवर्क पर लीक हुआ।
उत्तर प्रदेश पुलिस कांस्टेबल भर्ती परीक्षा का पेपर लीक होने के बाद परीक्षा रद्द करनी पड़ी। इससे लगभग 48 लाख अभ्यर्थी प्रभावित हुए। मध्य प्रदेश का व्यापम घोटाला भारत के सबसे बड़े परीक्षा और भर्ती घोटालों में माना जाता है। इसमें मेडिकल एडमिशन, सरकारी नौकरियों और कई भर्ती परीक्षाओं में फर्जी उम्मीदवार, रिश्वत और पेपर लीक का नेटवर्क सामने आया।
राजस्थान शिक्षक भर्ती परीक्षा का पेपर लीक होने के बाद राज्यभर में विरोध प्रदर्शन हुए और कई गिरफ्तारियां हुईं। परीक्षा दोबारा आयोजित करनी पड़ी। CBSE के 10वीं गणित और 12वीं अर्थशास्त्र के पेपर लीक होने के बाद दोबारा परीक्षा लेनी पड़ी थी। इससे लाखों छात्र प्रभावित हुए। उत्तर प्रदेश शिक्षक पात्रता परीक्षा (UPTET) का पेपर व्हाट्सऐप पर वायरल होने के बाद परीक्षा रद्द कर दी गई थी।
बिहार टीईटी परीक्षा में पेपर लीक के आरोपों के बाद कई गिरफ्तारियां हुईं और परीक्षा प्रक्रिया सवालों में आई। राजस्थान पुलिस भर्ती परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होने के बाद राज्य सरकार को परीक्षा रद्द करनी पड़ी।
इन परीक्षाओं के पेपर लीक होने से यह पता चलता है कि पेपर लीक के नेक्सेस पूरे देश में फैले हुए हैं। हर परीक्षा पर उनकी नजर है। जरूरी है ऐसा सिस्टम विकसित करने की ताकि परीक्षा देते वक्त अभ्यर्थी ये मान कर दे कि उसके साथ अन्याय नहीं होगा। इसमें सबसे ज्यादा गरीब और ग्रामीण छात्र फँसते हैं। पूरा परिवार इस उम्मीद में होता है कि अभ्यर्थी इस बार पास कर नौकरी पा लेगा और उनकी माली हालत सुधर जाएगी। लेकिन परीक्षा का पेपर लीक होते ही उनकी उम्मीद टूट जाती है।
न सिर्फ अभ्यर्थी बल्कि पूरा परिवार घोर निराशा में चला जाता है। पार्टियाँ कुछ दिनों तक पेपर लीक का विरोध करती हैं और कोर्ट में भी मामला जाता है। लेकिन इस समस्या का हल नहीं निकलता। धीरे धीरे सब शांत हो जाते हैं। कुछ दिनों बाद फिर किसी दूसरे परीक्षा का पेपर लीक होता है। भारत की शिक्षा व्यवस्था की यह त्रासदी है।
18 और 19 अप्रैल को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने द टिमोथी इनिशिएटिव (टीटीआई) नामक ईसाई मिशनरी संगठन से जुड़े कई ठिकानों पर छापेमारी की । जाँच एजेंसी के मुताबिक, टीटीआई ने महज 6 महीनों में अलग-अलग राज्यों में विदेशी बैंकों के डेबिट कार्डों का इस्तेमाल करके 95 करोड़ रुपए निकाले।
इसमें छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से निकाले गए 6.5 करोड़ रुपए भी शामिल हैं। ऐसा करते हुए टीटीआई ने एफसीआरए नियमों का उल्लंघन किया। गौरतलब है कि यह संगठन एफसीआरए के तहत पंजीकृत नहीं है। इसका मतलब है कि कानूनी रूप से इस संगठन को विदेशी फंडिंग की अनुमति नहीं है।
शुरुआत में इसे ‘प्रोजेक्ट इंडिया’ के नाम से जाना जाता था। इसकी शुरुआत भारत में हुई थी। यह संगठन 2007 से भारत में सक्रिय है, लेकिन देश में इसका इतिहास 1992 से शुरू होता है। इसके संस्थापक डेविड नेल्म्स अपने सहयोगी के साथ भारत आए और ईसायत का प्रचार करने के लिए देशभर के गाँवों में चर्च स्थापित करने का फैसला किया। ऑप इंडिया टीटीआई के कामकाज पर रिपोर्टों की एक सीरीज प्रकाशित कर रहा है।
(स्रोत-टीटीआई)
हमारे रिसर्च के दौरान हमने पाया कि टीटीआई का न केवल भारत और दूसरे देशों में अपना नेटवर्क है, बल्कि यह अपने उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए अन्य चर्चों के साथ भी सहयोग करता है। अपनी पिछली रिपोर्ट में हमने बताया था टीटीआई की नियमावली, किस प्रकार चर्च संस्थापकों को हिंदू बहुल गाँवों में प्रवेश करने, हिंदुओं से संपर्क करने, संदेह से बचने और जातिगत नेताओं का इस्तेमाल कर देश में ईसाइयत का प्रचार करना था।
इस रिपोर्ट में हम टीटीआई की उत्पत्ति के इतिहास और अन्य चर्चों के साथ इसके कामकाज का पता लगाएँगे। टीटीआई का उद्देश्य हिंदुओं और दूसरे धर्म को माननेवालों को ईसाइयत में परिवर्तित करना था। इसका मकसद देश के हर गाँव में कम से कम एक चर्च स्थापित करना है। ईडी की कार्रवाई के बाद भारत में बहुत सारी सामग्री या तो ब्लॉक कर दी गई है या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से हटा दी गई है। हालाँकि अभी भी बहुत से सुराग हैं, जिनका पता लगाना अभी भी बाकी है।
(साभार- फेसबुक)
डेविड नेल्म्स की भारत यात्रा के सबूत
जनवरी 2023 में डैन बुरेल नामक ईसाई के प्रचारक ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक पर एक पोस्ट साझा किया। इसमें उन्होंने 1992 में टीटीआई के संस्थापक डेविड नेल्म्स के साथ भारत की अपनी यात्रा के बारे में बताया।
(साभार- टीटीआई ग्लोबल)
अपने पोस्ट में उन्होंने लिखा कि 1992 की भारत और थाईलैंड की यात्रा उनके जीवन को बदल देने वाली एक मिशन यात्रा थी। उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया कि 30 वर्षों से अधिक समय से वे और डेविड धर्मांतरण के कार्य में लगे हुए हैं। संभव है कि यही वह यात्रा हो जिसका उल्लेख टीटीआई की वेबसाइट पर किया गया है, जहाँ नेल्म्स भारत में केवल मंदिर और मस्जिदें देखकर ‘दुखी’ दिख रहे थे, क्योंकि वहाँ चर्च नहीं थे। वेबसाइट के अनुसार, इसी यात्रा से टीटीआई की स्थापना का विचार उनके मन में आया।
(बाएँ में डेविड नेल्म्स, साभार- फेसबुक)
यह पोस्ट डेविड की भारत यात्रा और धर्म परिवर्तन की गतिविधियों में उनकी भागीदारी का सबसे पुराना प्रमाण है। इस पोस्ट में डैन और डेविड दोनों की धुंधली तस्वीर थी, जिसे हमने एआई का इस्तेमाल करके स्पष्ट करने की कोशिश की है।
टीटीआई से जुड़े अहम सुराग
संगठन की वेबसाइट भारत में प्रतिबंधित है। इस वेबसाइट के मुताबिक, इसकी स्थापना 2007 में हुई थी। 2009 में टोनी आर्मर ने फेसबुक पर एक वीडियो साझा किया, जिसमें उसने डेविड नेल्म्स को टैग किया था और वीडियो का स्थान बेंगलुरु बताया था। वीडियो का शीर्षक था ‘इंडिया 2009’। वीडियो में दिखाई देने वाली पहली तस्वीर में संभावित भारतीय चर्च संस्थापक डेविड नेल्म्स के साथ खुशी-खुशी एक समूह तस्वीर के लिए बैठे हुए थे।
वीडियो में नेल्म्स और अन्य विदेशी एक उपनगरीय इलाके में घूमते हुए, कमजोर परिवारों से मिलते हुए और बच्चों के साथ काफी समय बिताते हुए दिखाई दिए। ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने धर्मांतरण के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए परिवारों के साथ मेलजोल बढ़ाया। इसके लिए पहले परिवार के बच्चों से दोस्ती की।
खास बात यह है कि अंत में टोनी आर्मर को कर्नाटक के उद्यमी यूबी भट के साथ देखा गया, जो IC814 इंडियन एयरलाइंस अपहरण के पीड़ितों में से एक थे। एक किताब में , टीटीआई ने चर्च संस्थापकों से कहा कि वे स्थानीय लोगों से मेलजोल बढ़ाने के लिए जातिगत नेताओं का इस्तेमाल करें ताकि उन्हें धर्म परिवर्तन कराया जा सके। ऐसा लगता है कि उन्होंने न केवल जातिगत नेताओं का इस्तेमाल किया, बल्कि प्रमुख हस्तियों का भी इस्तेमाल करने की कोशिश की। चाहे वे धर्म परिवर्तन में शामिल हों या नहीं, भारतीयों के बीच टीटीआई की प्रतिष्ठा स्थापित करने के लिए इस्तेमाल किया।
2013 में, डेविड नेल्म्स ने फेसबुक पर पोस्ट किया कि वह 11 से 18 सितंबर तक भारत में रहेंगे और लोगों को आमंत्रित किया कि वे आएँ और देखें कि टीटीआई ने भारत, नेपाल और पाकिस्तान में क्या काम किया है।
(साभार-फेसबुक)
जुलाई 2016 में डेविड ने फेसबुक के माध्यम से यह बताया कि वह भारत जाने वाला है।
डेविड ने जनवरी 2017 में फेसबुक पर एक तस्वीर पोस्ट की। इसका कैप्शन लिखा था, ‘अपने पंजाबी दोस्तों के साथ खूब मस्ती कर रहा हूँ!’ गौरतलब है कि पंजाब उन राज्यों में से शामिल है, जहाँ ईसाइयत का प्रचार तेजी से हुआ है। पंजाब में पिछले कुछ वर्षों में लाखों हिंदू और सिख अनुयायियों ने धर्मांतरण किया है।
फरवरी 2017 में डेविड नेल्म्स ने फेसबुक पर पोस्ट किया कि वह अमेरिका लौट आए हैं। उन्होंने यह भी लिखा कि ‘भारत/नेपाल दोनों ही शानदार रहे’। इससे इतना तो अंदाजा लगाया जा ही सकता है कि उन्होंने भारत और नेपाल का दौरा किया था।
डेविड के बेटे जेरेड नेल्म्स वर्तमान में टीटीआई के अध्यक्ष हैं। टीटीआई ने लिंक्डइन पर उनके बारे में एक पोस्ट किया था। पोस्ट में उल्लेख किया गया था कि जेरेड और उनकी पत्नी एम्बर करीब पाँच वर्षों तक भारत में मिशनरी के रूप में सेवा की। पोस्ट से यह संकेत मिलता है कि जेरेड भारत में चर्चों के निर्माण के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए पाँच वर्षों तक रहे।
डेविड नेल्म्स की भारत यात्राओं के बारे में सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी बहुत कम है। मुख्य रूप से कुछ फेसबुक पोस्ट, एक पुराना टैग किया हुआ वीडियो और कुछ ऐसे संदर्भ हैं जिन्हें सावधानीपूर्वक खोजबीन के बाद ही जोड़ा जा सकता है।
यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि टीटीआई की अधिकांश ऑनलाइन सामग्री भारत में बैन कर दी गई है या सार्वजनिक प्लेटफार्मों से हटा दी गई है। इसलिए, भले ही उपलब्ध रिकॉर्ड छोटा हो, फिर भी यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि भारत नेल्म्स के लिए एक बार की यात्रा नहीं थी, बल्कि टीटीआई की गतिविधियों का एक नियमित और महत्वपूर्ण हिस्सा था।
इन छोटी-छोटी जानकारियों के आधार पर ये पता चलता है कि डेविड नेल्म्स ने कुछ ही सालों के अंदर कई बार भारत का दौरा किया। उनका बेटा जेरेड नेल्म्स भारत में काफी वक्त तक रहा।
खुद टीटीआई ने कहा कि जेरेड और उनकी पत्नी एम्बर ने लगभग पाँच वर्षों तक भारत में मिशनरी के सदस्य के रूप में सेवा की। ये लोग लगातार 5 साल तक भारत में रहे या कई बार भारत आए और गए, यह पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है। लेकिन, इससे यह बात को पूरी तरह साफ है कि नेल्म्स परिवार मिशनरी कार्य को लेकर भारत में लंबे वक्त तक रहा है।
यह मामला तब और भी गंभीर हो जाता है, जब इसे टीटीआई के दावों को जोड़ कर देखा जाता है। अपने ‘किंगडम इम्पैक्ट’ दस्तावेज में उसने दावा किया है कि 2007 से अब तक भारत सहित 50 देशों में उसने 268750 से अधिक चर्च बना दिए हैं और 201954 विधवाओं और अनाथों सहित 2392427 लोगों को ईसाई धर्म में परिवर्तित किया है। अगली रिपोर्ट में हम यह पता लगाएँगे कि भारत में चर्चों ने पिछले कुछ सालों में टीटीआई की किस तरह मदद की।
(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच तनाव के चलते मिडिल ईस्ट में संकट बना हुआ है और अब इसका असर दुनिया भर में दिख रहा है। इसी बीच ईंधन संकट से निपटने और अर्थव्यवस्था में मजबूती बनाए रखने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों से पेट्रोल-डीजल और विदेशी मुद्रा बचाने की अपील की है। उन्होंने खुद इसकी पहल भी की है और अपने काफिले को 50% तक छोटा करने का निर्देश दिया है। कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी इस पर अमल किया है।
संकट के बीच सतर्कता बरतना किसी भी देश के लिए, लोगों के लिए सबसे जरूरी है लेकिन ये भी विपक्ष को नहीं पच रहा है। विपक्ष के नेता राहुल गाँधी से लेकर अन्य विपक्षी दलों के नेता पीएम मोदी की अपील के बाद यह माहौल बनाने में लगे हैं कि देश में सामान का संकट हो गया है। हालाँकि, यही वह झूठ है जिसे परोसने की कोशिश की जा रही है क्योंकि प्रधानमंत्री ने जो कहा-किया है वो सतर्कता बरतने की कोशिश है, ना कि भारत किसी संकट से घिर गया है।
आर्थिक इमरजेंसी की आहट?: भ्रम फैला रहा विपक्ष
विपक्ष ने PM मोदी की अपील के बाद ही इसे लेकर भ्रम फैलाना शुरू कर दिया है। राहुल गाँधी ने X पर लिखा, “मोदी जी ने कल जनता से त्याग माँगे – सोना मत खरीदो, विदेश मत जाओ, पेट्रोल कम जलाओ, खाद और खाने का तेल कम करो, मेट्रो में चलो, घर से काम करो। ये उपदेश नहीं – ये नाकामी के सबूत हैं।”
राहुल गाँधी ने लिखा, “12 साल में देश को इस मुक़ाम पर ला दिया है कि जनता को बताना पड़ रहा है – क्या खरीदे, क्या न खरीदे, कहाँ जाए, कहाँ न जाए। हर बार जिम्मेदारी जनता पर डाल देते हैं ताकि खुद जवाबदेही से बच निकलें।”
मोदी जी ने कल जनता से त्याग मांगे – सोना मत ख़रीदो, विदेश मत जाओ, पेट्रोल कम जलाओ, खाद और खाने का तेल कम करो, मेट्रो में चलो, घर से काम करो।
ये उपदेश नहीं – ये नाकामी के सबूत हैं।
12 साल में देश को इस मुक़ाम पर ला दिया है कि जनता को बताना पड़ रहा है – क्या ख़रीदे, क्या न…
अरविंद केजरीवाल ने भी ऐसा ही भ्रम फैलाने की कोशिश की है। केजरीवाल ने X पर लिखा, “पीएम ने देश के सभी नागरिकों को खाने-पीने में कटौती करने की सलाह दी है, घूमने-फिरने और विदेश यात्राओं में कटौती करने की सलाह दी है, तथा सोना और अन्य कीमती चीजें खरीदने में भी कटौती करने की सलाह दी है।”
उन्होंने आगे लिखा, “क्या यह आर्थिक इमरजेंसी की आहट है? क्या देश भारी आर्थिक संकट में फँस गया है? ऐसा तो देश में पहले कभी नहीं हुआ। प्रधानमंत्री जी को देश के सामने सच्चाई रखनी चाहिए। आखिर देश की असली आर्थिक हालत क्या है?”
पीएम ने देश के सभी नागरिकों को खाने-पीने में कटौती करने की सलाह दी है, घूमने-फिरने और विदेश यात्राओं में कटौती करने की सलाह दी है, तथा सोना और अन्य कीमती चीज़ें खरीदने में भी कटौती करने की सलाह दी है।
क्या यह आर्थिक इमरजेंसी की आहट है? क्या देश भारी आर्थिक संकट में फँस गया है?… https://t.co/WDM25AfzR3
राहुल गाँधी के करीबी और कॉन्ग्रेस के बड़े नेता केसी वेणुगोपाल ने भी यही किया। उन्होंने X पर लिखा, “ईरान-अमेरिका युद्ध को शुरू हुए 3 महीने हो चुके हैं और PM मोदी अब तक भारत की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने में पूरी तरह असमर्थ दिखाई दे रहे हैं।”
उन्होंने लिखा, “यह बेहद शर्मनाक, लापरवाही भरा और पूरी तरह से गलत है कि प्रधानमंत्री आम नागरिकों को परेशानियों की ओर धकेल रहे हैं, बजाय इसके कि वे वैश्विक संकट से अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए पहले से योजना बनाएँ। जब चुनाव और छोटे राजनीतिक हित ही प्रधानमंत्री की प्राथमिकता बन जाते हैं, तो उसका परिणाम एक संभावित आर्थिक संकट के रूप में सामने आता है।”
3 months into the Iran-US war and PM Modi is still clueless about ensuring India’s energy security.
It is shameless, reckless and downright immoral that the PM is pushing the common citizen into inconvenience, instead of building contingencies to ensure our economy is unaffected… https://t.co/LoTPH0huE0
भारत में नहीं है कोई कमी: पेट्रोलियम मंत्री ने दिखाया आईना
भारत सरकार ने साफ कर दिया है कि राहुल गाँधी और विपक्ष के अन्य नेता जो भ्रम फैलाने की कोशिश कर रहे हैं वो पूरी तरह झूठ है। केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने स्पष्ट किया है कि देश में किसी भी पेट्रोलियम उत्पाद की कमी नहीं है। उन्होंने X पर एक पोस्ट में लिखा, “भारत के पास 60 दिनों का कच्चा तेल, 60 दिनों की LNG और 45 दिनों का LPG भंडार उपलब्ध है।”
पुरी ने आगे लिखा, “पश्चिम एशिया में तनाव के बीच निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए भारत ने अपने दैनिक LPG उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि (35,000 टन से बढ़ाकर 54,000 टन) की है। इस दौरान कई सारे देशों में तेल के दाम व उपलब्धता को लेकर उतार-चढ़ाव आए लेकिन भारत में कोई असर नहीं पड़ा।”
पुरी ने चेताया, “कुछ लोगों ने कालाबाजारी की, अफवाह फैलाने की पूरी कोशिश की लेकिन PM मोदी के मार्गदर्शन में हमारे प्रयासों से देश में पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कहीं कोई कमी नई आई।” एक अन्य पोस्ट में पुरी ने बताया, “पश्चिम एशिया में तनाव के दौरान देश ने अपनी दैनिक एलपीजी उत्पादन में लगभग 55% की वृद्धि की है।”
देश में किसी भी पेट्रोलियम उत्पाद की कमी नहीं…
भारत के पास 60 दिनों का कच्चा तेल, 60 दिनों की LNG और 45 दिनों का एलपीजी भंडार उपलब्ध है।
पश्चिम एशिया में तनाव के बीच निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए भारत ने अपने दैनिक एलपीजी उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि (35,000 टन से… pic.twitter.com/RxRFQNd8Ca
हालाँकि, भारत में हालात सही दिख रहे हैं लेकिन दुनिया में संकट का असर दिख रहा है। भारत के पड़ोसी देशों में भी यह संकट नजर आने लगा है।
दुनिया भर में संकट से बिगड़ते हालात
मिडिल ईस्ट विवाद के केंद्र में रहे होर्मुज जलडमरूमध्य में रूकावट ने अप्रैल के अंत और मई की शुरुआत में ब्रेंट क्रूड तेल की कीमतों को कई वर्षों के उच्च स्तर तक पहुँचा दिया था और यह 100 डॉलर प्रति बैरल से भी ऊपर चला गया। इस जगह से वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 25% हिस्सा गुजरता है। इससे दुनिया भर में महँगाई बढ़ी और ऊर्जा की लागत में भारी उछाल आया।
द इंडियन मैट्रिक्स ने दावा किया है कि फरवरी 2026 से 11 मई 2026 के बीच US में तेल की कीमतें 59% बढ़ी हैं। वहीं, कनाडा में ये 43%, साउथ अफ्रीका में 31%, अर्जेंटीना में 30% कीमतें बढ़ी है। इसमें बताया गया है कि UK से लेकर चीन और रूस तक दुनियाभर में तेल की कीमतें बढ़ी हैं लेकिन भारत में ये स्थिर बनी हुई हैं।
इस तनाव के चलते भारत के पड़ोसी देशों में भी हालात बिगड़ रहे हैं। तेल और गैस की कीमतें तेजी से बढ़ीं और कई देशों में ईंधन की कमी और आर्थिक दबाव पैदा हुआ। इसका असर खासकर उन देशों पर पड़ा जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं।
मालदीव और श्रीलंका जैसे देशों की अर्थव्यवस्था पहले से ही पर्यटन और ऊर्जा आयात पर निर्भर थी लेकिन पर्यटन में गिरावट और बढ़ती ईंधन कीमतों ने उनकी स्थिति और खराब कर दी। मालदीव में पर्यटन लगभग 20% तक गिर गया और कर्ज चुकाने का दबाव बढ़ गया जिसके चलते उसने भारत से पेट्रोलियम आपूर्ति की माँग की है।
पाकिस्तान में ईंधन की भारी कमी और बढ़ती कीमतों के कारण सरकार को कई सख्त कदम उठाने पड़े। स्कूलों की छुट्टियाँ बढ़ाई गईं, सरकारी दफ्तरों में काम के घंटे कम किए गए, कई जगह बाजार जल्दी बंद करने के आदेश दिए गए और सार्वजनिक सेवाओं में भी कटौती करनी पड़ी।
बांग्लादेश ने भी ऊर्जा बचाने के लिए सख्त नियम लागू किए जैसे कार्यालय समय कम करना, बिजली की खपत घटाना, अनावश्यक यात्रा पर रोक लगाना और कई सार्वजनिक गतिविधियों को सीमित करना। उसने भी ऊर्जा आपूर्ति को लेकर भारत से मदद की माँग की।
श्रीलंका और नेपाल में भी इसी तरह की स्थिति बनी रही। श्रीलंका ने ऊर्जा बचाने के लिए कामकाजी दिनों में कटौती, बिजली और ईंधन पर प्रतिबंध लगाए और भारत से ईंधन सहायता ली है। नेपाल ने भी कामकाजी सप्ताहों को घटाया, ईंधन कोटा कम किया और भारत से LPG और अन्य ऊर्जा आपूर्ति बढ़ाने का अनुरोध किया है। यानि दुनियाभर में इस संकट का असर काफी समय से दिखाई दे रहा है। लेकिन भारत में स्थितियाँ फिलहाल बेहतर हैं।
भारत को सुरक्षित कर रहा दूरदर्शी नेतृत्व
भारत की स्थिति आज इसलिए मजबूत दिखाई दे रही है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में देश ने केवल तत्काल समस्याओं पर नहीं बल्कि भविष्य के खतरों को ध्यान में रखकर भी तैयारी की है। जब दुनिया के कई देश अचानक बढ़े ऊर्जा संकट से घबराकर सख्त प्रतिबंध लगाने लगे, तब भारत में न तो पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें दिखीं और न ही आम लोगों के बीच किसी बड़े डर का माहौल बना। इसकी सबसे बड़ी वजह यह रही कि भारत ने समय रहते ऊर्जा सुरक्षा, वैकल्पिक आपूर्ति और रणनीतिक भंडारण पर लगातार काम किया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने केवल एक देश पर निर्भर रहने की नीति से बाहर निकलकर कई देशों के साथ ऊर्जा संबंध मजबूत किए। यही कारण है कि वैश्विक तनाव बढ़ने के बावजूद भारत अपनी जरूरतों के हिसाब से तेल और गैस की आपूर्ति को संतुलित रखने में सफल रहा। सरकार ने संकट को हल्के में लेने के बजाय लोगों से सतर्कता बरतने की अपील की ताकि भविष्य में किसी भी बड़ी चुनौती का सामना बिना घबराहट के किया जा सके। यह अपील किसी डर या कमी का संकेत नहीं बल्कि जिम्मेदार नेतृत्व का उदाहरण मानी जा रही है।
दुनिया के कई देशों में सरकारों को अचानक स्कूल बंद करने पड़े, बाजारों के समय घटाने पड़े और ईंधन पर प्रतिबंध लगाने पड़े। लेकिन भारत में हालात नियंत्रण में बने रहे। इसका कारण केवल भंडार या आपूर्ति नहीं बल्कि वह भरोसा भी है जो सरकार ने लगातार व्यवस्था बनाए रखकर पैदा किया है। संकट के समय सबसे बड़ी चुनौती केवल संसाधनों की नहीं होती बल्कि लोगों के मन में भरोसा बनाए रखने की होती है। भारत इस मोर्चे पर मजबूत दिखाई दिया है।
आज जब विपक्ष सरकार पर सवाल उठा रहा है तब यह भी देखना जरूरी है कि दुनिया के दूसरे देशों में हालात कितने गंभीर हो चुके हैं। भारत में लोगों से संयम और सावधानी की अपील की गई है लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी सामान्य तरीके से चल रही है। यही अंतर बताता है कि दूरदर्शी तैयारी और समय पर लिए गए फैसले किसी भी संकट को कितना नियंत्रित कर सकते हैं। पीएम मोदी की अपील भी इन्हें दूरदर्शी फैसलों की कड़ी का एक हिस्सा है ताकि संकट के समय में भारत मजबूत बना रहे।