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मंदिरों को लूट कर जिहाद की फंडिंग की साजिश का पर्दाफाश: केरल में पनप रहा था ISIS मॉड्यूल, NIA ने नबील अहमद को दबोचा

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने केरल में नए ISIS मॉड्यूल का भंडाफोड़ करते हुए एक आतंकी को गिरफ्तार किया है। आरोपित की पहचान नबील अहमद के रूप में हुई है। वो टेलीग्राम के माध्यम से केरल में आईएस के लिए भर्तियाँ कर रहा था, इसके लिए उसने ‘पेट लवर्स’ नाम का ग्रुप बनाया था। एनआईए ने जिस नबील अहमद को गिरफ्तार किया है, वो त्रिशूर जिले का रहने वाला है।

एनआईए की जाँच में पता चला है कि नबील ने केरल में आईएस का नया समूह बनाया था और वो युवाओं को आतंकी संगठन में भर्ती करने की कोशिश कर रहा था। उसके निशाने पर ईसाई मजहब का एक पादरी भी था। यही नहीं, उसने त्रिशूर और पलक्कड़ जिलों में मंदिरों को लूटने की योजना बनाई थी, ताकि वो अपने मकसद के लिए फंडिंग कर सके।

कतर में बैठे आईएस आतंकियों के संपर्क में था नबील

एनआईए ने बताया है कि नबील कतर में आईएस आतंकियों से कॉन्टैक्ट में था। उन्हीं आतंकियों की मदद से उसने केरल में आतंकी नेटवर्क खड़ा करने की कोशिश में पूरी ताकत झोंक रखी थी। एनआईए ने कहा है कि वो इस मामले में और भी गिरफ्तारियाँ करने वाली है।

त्रिशूर का अशरफ भी हो चुका है गिरफ्तार

बता दें कि इस्लामिक स्टेट में शामिल होने के लिए पैसे के लिए डकैती करने के मामले में एनआईए ने पहले त्रिशूर के मूल निवासी अशरफ को गिरफ्तार किया था। उनके समूह को हाल ही में केंद्रीय एजेंसियों द्वारा केरल में डकैती और सोने की तस्करी में लिप्त पाया गया था। पलक्कड़ से 30 लाख रुपए लूटने के बाद अशरफ और उसका गैंग सत्यमंगलम जंगल में एक घर में छिप गया था। संदिग्ध को कोच्चि एनआईए टीम ने जंगल के अंदर से पकड़ लिया।

मोनू मानेसर को ले गई राजस्थान पुलिस, गिरफ़्तारी के बाद हरियाणा पुलिस ने सौंप दिया

हरियाणा ने पुलिस ने गोरक्षक मोनू मानेसर को राजस्थान पुलिस को सौंप दिया है। राजस्थान पुलिस ने कोर्ट से मोनू मानेसर की रिमांड माँगी थी। इसे कोर्ट ने मंजूरी दे दी। इससे पहले मंगलवार (12 सितंबर, 2023) को हरियाणा की नूहं पुलिस ने मोनू को गिरफ्तार किया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नूहं पुलिस ने मोनू मानेसर को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया था। इसके बाद रिमांड की माँग की थी। लेकिन कोर्ट ने उसे 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया था। पुलिस उसे भौंडसी जेल लेकर जा रही थी। लेकिन इसी दौरान राजस्थान पुलिस भी कोर्ट पहुँच गई। जहाँ कोर्ट ने राजस्थान पुलिस को मोनू मानेसर की ट्रांजिट रिमांड दे दी। इसके बाद हरियाणा पुलिस ने उसे राजस्थान पुलिस को सौंप दिया।

किस मामले में हुई थी गिरफ्तारी

नूहं साइबर क्राइम पुलिस ने मोनू मानेसर को फेसबुक पर भड़काऊ पोस्ट लिखने के मामले में गिरफ्तार किया था। आरोप है कि मोनू मानेसर नामक फेसबुक पेज से 26 अगस्त को एक पोस्ट शेयर की गई थी। इस पोस्ट में लिखा था, “परिणाम की चिंता हम नहीं करते, वार एक ही होगा, पर आखिर होगा। मोनू मानेसर।”

इस मामले में सोशल मीडिया सेल के सिपाही मनोज कुमार ने नूहं साइबर क्राइम थाने में शिकायत की थी। पुलिस की जाँच में सामने आया था कि मोनू मानेसर के नाम पर रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर से ही यह पोस्ट की गई थी। पुलिस ने गिरफ्तारी के समय मोनू के पास से 45 बोर की पिस्टल और 3 कारतूस बरामद किए हैं। पुलिस ने मोनू के खिलाफ धारा 153, 153A, 295A, 504, 109 IPC व आर्म्स एक्ट के तहत केस दर्ज किया है।
राजस्थान पुलिस को क्यों मिली रिमांड

दरअसल, मोनू मानेसर पर राजस्थान के भिवानी में हुए  नासिर-जुनैद हत्याकांड में शामिल होने का आरोप है। फरवरी 2023 में नासिर और जुनैद नाम के 2 युवकों के एक वाहन में जले हुए शव मिले थे। इस केस में मोनू मानेसर सहित कुछ और लोगों को नामजद किया गया था। मोनू मानेसर के अलावा हरियाणा में गोरक्षा से जुड़े कुछ लोगों को इस मामले में गिरफ्तार किया गया था।

लगभग 8 माह से भूमिगत चल रहे मोनू मानेसर के मुद्दे पर राजस्थान और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों में आरोप-प्रत्यारोप भी. देखने को मिला था। वहीं राजस्थान के DGP उमेश मिश्रा ने नासिर-जुनैद हत्याकांड में मोनू मानेसर की सीधी भूमिका से इंकार कर दिया था। हालाँकि उन्होंने इस केस में मोनू की परोक्ष भूमिका की जाँच जारी होने की बात कही थी।

Cow Vigilante Monu Manesar Arrested in Gurugram Handed Over to Rajasthan Police

जिस भोजशाला को मुस्लिम बताते हैं मस्जिद, दावा – वहाँ प्रकट हुई माँ वाग्देवी की प्रतिमा: प्रशासन ने बताया शरारती तत्वों की करतूत, कभी हुआ करता था विद्या का केंद्र

मध्य प्रदेश का धार जिला अपनी भोजशाला के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन अब यह भोजशाला विवादों में है। दरअसल, यहाँ माँ वाग्देवी की प्रतिमा के प्रकट होने का दावा किया जा रहा है। वहीं प्रशासन ने इस दावे को नकारते हुए प्रतिमा हटा दी है। भोजशाला का मामला कोर्ट भी पहुँच चुका है।

क्या है ताजा मामला

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 9 सितंबर की रात सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हुआ। वीडियो में एक प्रतिमा दिखाई दे रही थी। इसको लेकर दावा किया जा रहा है कि यह प्रतिमा माँ वाग्देवी की है और यहाँ प्रकट हुई है। यह भी दावा किया जा रहा है कि उसी रात व्हाट्सएप्प पर भी प्रतिमा प्रकट होने को लेकर मैसेज वायरल हुआ था।

प्रतिमा प्रकट होने का वीडियो वायरल होने के बाद प्रशासन ने सुबह करीब 4 बजे भोजशाला से यह प्रतिमा हटाकर किसी गुप्त स्थान पर रखवा दी। साथ ही भोजशाला को बंद कराकर वहाँ की सुरक्षा चाक-चौबंद करा दी गई। एसपी इंद्रजीत बाकलवार ने इसे शरारती तत्वों की साजिश बताया है। साथ ही कहा कि भोजशाला की सुरक्षा के लिए लगाई गई तार को काटकर कुछ लोगों ने यहाँ प्रतिमा रखी है। सीसीटीवी फुटेज के आधार पर मामले की जाँच की जा रही है। उन्होंने सोशल मीडिया पर भ्रामक खबर फैलाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की भी बात कही है।

‘अमर उजाला’ ने अपनी रिपोर्ट में हिंदू संगठनों के हवाले से लिखा है कि उनका कहना है कि जिस तरह से अयोध्या के राम मंदिर में रामलला प्रकट हुए थे। ठीक उसी तरह यहाँ माँ वाग्देवी की प्रतिमा प्रकट हुई है। ‘भोज उत्सव समिति’ के संयोजक अशोक जैन का कहना है कि प्रशासन ने जो मूर्ति हटाई है उसे वापस स्थापित की जाए। माँ वाग्देवी प्रकट हुईं हैं, यहाँ उनकी विधिवत पूजा की जाएगी। मूर्ति अगर वापस स्थापित नहीं की गई तो उग्र आंदोलन होगा।

क्या है विवाद की जड़

हिंदू संगठन इस भोजशाला को माँ वागेश्वरी यानी माँ सरस्वती का मंदिर मानते हैं। हिंदुओं का कहना है कि धार के राजा ने यहाँ कुछ मुस्लिमों को नमाज पढ़ने की इजाजत दी थी। वहीं मुस्लिम इसे भोजशाला-कमाल-मौलाना मस्जिद कहते हैं। उनका दावा है कि वह यहाँ सालों से नमाज पढ़ते आ रहे हैं। बताया जाता है कि साल 1909 में धार रियासत ने इसे संरक्षित इमारत घोषित किया था। यह भोजशाला आमतौर पर शुक्रवार के शुक्रवार ही खुलती थी। इसके बाद साल 1935 में तत्कालीन राजा ने यहाँ मुस्लिमों को शुक्रवार को नमाज पढ़ने की अनुमति दे दी।

साल 1995 में हिंदू संगठनों ने नमाज पढ़ने का विरोध किया। इसके बाद यहाँ प्रत्येक मंगलवार को माँ वागेश्वरी की पूजा करने की भी अनुमति दे दी गई। हालाँकि 12 मई, 1997 को तत्कालीन कलेक्टर ने न केवल भोजशाला में लोगों के आने पर प्रतिबंध लगा दिया बल्कि मंगलवार को होने वाली पूजा पर भी रोक लगा दी। हालाँकि, बसंत पंचमी को मंदिर खुलता था और हिंदू पूजा करते थे। दिलचस्प बात यह है कि हिंदुओं की पूजा पर तो रोक थी। लेकिन शुक्रवार को होने वाली नमाज पर रोक नहीं लगाई गई थी। हालाँकि विरोध के बाद 31 जुलाई, 1997 को पूजा पर लगा प्रतिबंध हटा दिया गया।

प्रतिबंध लगने और हटने का यह सिलसिला यहीं नहीं थमा। साल 1998 में पुरातत्व विभाग ने यहाँ किसी के भी प्रवेश को प्रतिबंधित कर दिया। लेकिन 2003 में यह प्रतिबंध फिर हटा दिया गया। मंगलवार की पूजा और शुक्रवार की नमाज के साथ ही यहाँ हर साल बसंत पंचमी पर पूजा चली आ रही थी। लेकिन साल 2013 और 2016 में बसंत पंचमी और शुक्रवार एक ही दिन पड़ने के चलते तनाव का माहौल बन गया था।

भोजशाला का इतिहास

परमार राजवंश के शासक राजा भोज ने धार में एक महाविद्यालय की स्थापना की थी जिसे बाद में भोजशाला के रूप में जाना जाने लगा। राजा भोज माता सरस्वती के महान उपासक थे और संभवतः यही कारण था कि उनकी रुचि शिक्षा एवं साहित्य में बहुत ज्यादा थी। राजा भोज ने ही सन् 1034 में भोजशाला के रूप में एक भव्य पाठशाला का निर्माण किया और यहाँ माता सरस्वती की एक प्रतिमा स्थापित की। इसे तब सरस्वती सदन कहा था। भोजशाला को माता सरस्वती का प्राकट्य स्थान भी माना जाता है।

भोजशाला मंदिर से प्राप्त कई शिलालेख 11वीं से 13वीं शताब्दी के हैं। इन शिलालेखों में संस्कृत में व्याकरण के विषय में वर्णन किया गया है। इसके अलावा कुछ शिलालेखों में राजा भोज के बाद शासन सँभालने वाले राजाओं की स्तुति की गई। कुछ ऐसे भी शिलालेख भी हैं जिनमें शास्त्रीय संस्कृत में नाटकीय रचनाएँ उत्कीर्णित हैं। माता सरस्वती के इस मंदिर को कवि मदन ने अपनी रचनाओं में वर्णित किया था। यहाँ प्राप्त हुई माता सरस्वती की मूल प्रतिमा वर्तमान में लन्दन के संग्रहालय में है।

माता सरस्वती का मंदिर होने के साथ भोजशाला भारत के सबसे बड़े विश्वविद्यालयों में से एक था। इसके आलावा यह स्थान विश्व का प्रथम संस्कृत अध्ययन केंद्र भी था। इस विश्वविद्यालय में देश-विदेश के हजारों विद्वान आध्यात्म, राजनीति, आयुर्वेद, व्याकरण, ज्योतिष, कला, नाट्य, संगीत, योग, दर्शन आदि विषयों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए आते थे। इसके अतिरिक्त इस शिक्षा केंद्र में वायुयान, जलयान तथा कई अन्य स्वचालित (ऑटोमैटिक) यंत्रों के विषय में भी अध्ययन किया जाता था।

इस्लामिक आक्रमण

ऐतिहासिक तथ्यों के मुताबिक, सन् 1305 में मुस्लिम आक्रांता अलाउद्दीन खिलजी ने भोजशाला पर आक्रमण किया और उसे नष्ट कर दिया। बाद में सन् 1401 में दिलावर खां ने भोजशाला के एक भाग में मस्जिद का निर्माण करा दिया। अंततः सन् 1514 में महमूद शाह खिलजी ने भोजशाला के शेष बचे हिस्से पर मस्जिद का निर्माण करा दिया। समय के साथ यहाँ विवाद बढ़ता गया और अंग्रेजी हुकूमत के दौरान भोजशाला को संरक्षित स्मारक घोषित कर दिया गया।

हिन्दू जनजागृति समिति की एक रिपोर्ट के अनुसार सन् 1305 में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय भोजशाला के शिक्षकों और विद्यार्थियों ने भी खिलजी की इस्लामिक सेना का विरोध किया था। खिलजी द्वारा लगभग 1,200 छात्र-शिक्षकों को बंदी बनाकर उनसे इस्लाम कबूल करने के लिए कहा गया लेकिन इन सभी ने इस्लाम स्वीकार करने से मना कर दिया। इसके बाद इन विद्वानों की हत्या कर दी गई थी और उनके शव को भोजशाला के ही विशाल हवन कुंड में फेंक दिया गया था। इस तरह एक और हिन्दू मंदिर इस्लामिक कट्टरपंथ की भेंट चढ़ गया।

इसके बाद 1875 में इस भोजशाला में खुदाई हुई थी। इस खुदाई में माँ वागेश्वरी की प्रतिमा निकली थी। अंग्रेजी आक्रांता इस प्रतिमा को ब्रिटेन ले गए। अब यह प्रतिमा लंदन स्थित संग्रहालय में रखी हुई है। भोजशाला मुक्ति आंदोलन इस भोजशाला को मुस्लिमों से मुक्त कराने के साथ ही लंदन में रखी प्रतिमा को वापस लाने की माँग करता रहा है। इसको लेकर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच में याचिका भी दायर की गई है। याचिका में पूरे भोजशाला परिसर की फोटो और वीडियोग्राफी कराकर यहाँ नमाज बंद कराने की माँग की गई है।

लालू यादव के खिलाफ घूस लेकर रेलवेे में नौकरी देने का चलेगा मामला, गृह मंत्रालय ने दी मंजूरी: तेजस्वी-मीसा और राबड़ी भी आरोपित

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने लैंड फॉर जॉब मामले में लालू यादव के खिलाफ केस चलाने की अनुमति दे दी। केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने मंगलवार (12 सितंबर 2023) को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट को इस बारे में जानकारी दी। इसके साथ ही यह भी बताया कि इस मामले में वह नई चार्जशीट दाखिल करेगी।

लैंड फॉर जॉब स्कैम में लालू यादव पर आरोप है कि उन्होंने रेल मंत्री रहते हुए रेलवे में नौकरी देने के बदले कई लोगों से जमीन ली थी या बेहद कम कीमत पर उनसे खरीदी थी। आरोप है कि इस घोटाले में लालू यादव के परिवार के दूसरे सदस्यों और अन्य लोगों ने भी भूमिका निभाई।

लालू परिवार पर आई आँच

सीबीआई ने अपनी नई चार्जशीट में लालू यादव के अलावा उनके बेटे तेजस्वी यादव, पत्नी राबड़ी देवी और बेटी मीसा भारती को भी आरोपित बना सकती है। हालाँकि इसके बारे में अभी कोर्ट को कोई सूचना नहीं दी गई है।

एजेंसी ने 18 मई 2022 को लालू प्रसाद और उनकी पत्नी, दो बेटियों और अज्ञात सरकारी अधिकारियों और निजी व्यक्तियों सहित 15 अन्य के खिलाफ मामला दर्ज किया था। लैंड फॉर जॉब घोटाला 2004 से 2009 के बीच का है। इस दौरान लालू यादव केंद्रीय रेल मंत्री थे।

21 सितंबर को अगली सुनवाई

सीबीआई ने कोर्ट से कहा है कि लालू यादव के खिलाफ मंजूरी मिलने के बाद अब रेलवे के तीन अन्य आरोपितों को लेकर मंजूरी का इंतजार कर रही है। ये मंजूरी एक सप्ताह के भीतर मिल सकती है। इसके बाद कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 21 सितंबर की तारीख तय की है।

कई संपत्तियाँ ईडी कर चुकी है जब्त

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने जुलाई में कहा था कि उसने कथित भूमि मामले में उनके खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग जांच के तहत लालू प्रसाद के परिवार – उनकी पत्नी राबड़ी देवी और बेटी मीसा भारती – और उनसे जुड़ी कंपनियों की 6 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति जब्त की है।

यूट्यूबर ने किया हिन्दू धर्म का अपमान तो खिलखिला कर हँस पड़ी RJ सायमा, फिर विरोध करने वालों पर ही लगा दिया घृणा फैलाने का आरोप

रेडियो जॉकी सायमा (RJ Sayema) यूट्यूबर श्याम मीरा सिंह का एक हिन्दूफोबिक ट्वीट शेयर करने के बाद विवादों में घिर गई हैं। मंगलवार (12 सितंबर 2023) को अपनी इस हरकत के बाद सायमा ने बेशर्मी से उसे छिपाने की भी कोशिश की। हालाँकि, इसी दौरान Sarvin (सरविन) नाम के एक एक्स (पूर्व ट्विटर) यूजर ने सायमा को आईना दिखा दिया और उन्हें हिंदूफोबिया का समर्थन करने वालों में टॉप पर बताया।

दरअसल, सायमा ने ट्वीट को हँसी की इमोजी के साथ Quote (कोट) किया था, जिसमें श्याम मीरा सिंह ने हिन्दुओं का मजाक बनाया था। श्याम मीरा सिंह ने रिपब्लिक टीवी की एंकर श्वेता सिंह की आस्था पर हमला करते हुए लिखा था कि भगवान कृष्ण की 16 पत्नियाँ थीं और द्रौपदी के 5 पति थे।

इसके साथ ही अंत में उसने सवाल किया, “आप किस तरह की हिंदू हैं?” श्याम मीरा सिंह ने श्वेता पर कई लोगों की पत्नी होने जैसे संकेत किए। इस ट्वीट पर सायमा हँसी की इमोजी लगाकर श्याम मीरा सिंह की भद्दी टिप्पणी का समर्थन करती दिखीं।

ये वही सायमा हैं, जो दूसरे लोगों को नफरत और पूर्वाग्रह से दूर रहने का लेक्चर देती रही रहती हैं। हालाँकि, जब यूजर सरविन ने सायमा को आईना दिखाया, तब वो अपने ही ट्वीट को बड़ी बेशर्मी से फर्जी बताने लगीं।

अपने बचाव में सायमा ने लिखा, “अगर आपको मेरी सोच के बारे में पता करना है तो मेरे सारे ट्वीट्स देखने चाहिए। एडिटेड और फर्जी ट्वीट पर न जाएँ। कुछ लोग उन आवाजों को बदनाम करने के लिए नियुक्त हैं, जो उन्हें परेशान करती हैं। अपनी आँखें खोलो। आसपास की सच्चाई देखो। आप का दिन शुभ हो।”

@_sayema का ट्विटर स्क्रीनशॉट

कई अन्य नेटिज़न्स द्वारा उनके झूठ का पर्दाफाश किए जाने के बावजूद सायमा यूजर सरविन पर ही हमलावर रहीं। उन्होंने सरविन पर अपने ट्वीट को काट-छाँट कर शेयर करने का आरोप लगाना जारी रखा।

सायमा ने आगे कहा, “नफरत करने वालों को इसलिए नियुक्त किया गया है कि वो झूठ को अपने तरीके से पेश करें। मुझे खुशी है कि मैंने जल्द ही सफाई पेश कर दी थी। श्याम के ट्वीट की अंतिम लाइन क्यों डिलीट की गई? तुम अपने घृणित मंसूबों को छिपा नहीं पाओगे।”

सायमा अपने कुतर्क से लोगों को यह संदेश देने की कोशिश करती रहीं कि वो श्याम मीरा सिंह द्वारा हिन्दू धर्म के अपमान पर नहीं, बल्कि उनके ट्वीट की अंतिम लाइन ‘पूछता है भारत’ पर हँसी थीं।

सायमा की इस सफाई पर अभिषेक नाम के एक यूजर ने लिखा, “समझाने की कोई आवश्यकता नहीं है मोहतरमा, निश्चिन्त रहिये। आप पूरी तरह सुरक्षित हैं, क्योंकि मेरे धर्म में सर तन से जुदा जैसे आतंकी कार्य नहीं होते। हम इंसान हैं। राक्षस नहीं।”

इसी बीच इस्लामी भीड़ को उकसाने वाला एक अन्य प्रोपेगेंडा आउटलेट ‘टीम साथ’ भी विचित्र तर्क के साथ सायमा के बचाव में उतरा। टीम साथ ने सायमा के ट्वीट से अंतिम लाइन क्रॉप करने को लक्षित उत्पीड़न करार दे दिया। टीम साथ के मुताबिक, समस्या सायमा के पूरे ट्वीट नहीं, बल्कि सरविन द्वारा क्रॉप की गई अंतिम लाइन में है।

असलियत यह है कि क्रॉप की गई अंतिम लाइन से ये कतई साबित नहीं होता कि श्याम मीरा सिंह का ट्वीट हिन्दू विरोधी था और सायमा ने उस आपत्तिजनक ट्वीट का समर्थन किया। हालाँकि, सच सामने आने पर सायमा के वामपंथी और इस्लामी समर्थक उनके बचाव में अजीब और बेतुके तर्क गढ़ रहे हैं।

वॉर है ये, और हम सब सोल्जर्स… ‘द वैक्सीन वॉर’ के ट्रेलर में नाना पाटेकर के डायलॉग्स ने हिला डाला, वामपंथी नैरेटिव ‘India can’t do it’ की खुलेगी पोल

विवेक अग्निहोत्री की अगली फिल्म ‘द वैक्सीन वॉर’ का ट्रेलर रिलीज हो गया है। विवेक अग्निहोत्री ‘द ताशकंद फाइल्स’ (2019) और ‘द कश्मीर फाइल्स’ (2022) जैसी फिल्मों के लिए जाने जाते हैं। ‘द वैक्सीन वॉर’ में नाना पाटेकर, पल्लवी जोशी और राइमा सेन मुख्य भूमिकाओं में हैं। इसमें दिखाया जाएगा कि कि कैसे तमाम अड़चनों के बावजूद भारत कोरोना वायरस की स्वदेशी वैक्सीन तैयार करने में सफल रहा। ‘The Vaccine War’ गुरुवार (28 सितंबर, 2023) को सिनेमाघरों में दस्तक दे रही है।

इससे पहले अमेरिका के कई शहरों में इसकी स्पेशल स्क्रीनिंग रखी गई थी। हर जगह इसे तारीफ़ मिली और भारतीय समाज के लोगों ने गर्वित और भावुक होकर अपनी प्रतिक्रियाएँ दी। ट्रेलर की शुरुआत में ही नाना पाटेकर फोन पर पल्लवी जोशी से कहते हैं, “मैंने सुना है, आपके साइंटिस्ट्स के पास 1 लाख रुपए भी नहीं थे।” इस पर पल्लवी जोशी जवाब देती हैं, “मेरे नहीं सर, भारत के साइंटिस्ट्स।” इसमें नाना पाटेकर वैक्सीन बनाने वाली टीम का नेतृत्व करते हुए दिखाई दे रहे हैं।

साथ ही दिखाया गया है कि टीम में कई महिला वैज्ञानिक होती हैं। बताया जाता है कि वैक्सीन निर्माण को राष्ट्रीय सुरक्षा के कारण गुप्त रखा गया है। ट्रेलर आगे बढ़ता है और मीडिया में भारत को लेकर चल रही नकारात्मक बातें दिखाई जाती हैं। राइमा सेन को टीवी पर बोलते हुए दिखाया गया है कि विशेषज्ञों की मानें तो भारत का मेडिकल सिस्टम 130 करोड़ लोगों की जान बचाने में समर्थ नहीं है। वो कहती हैं, “India can’t do it.” फिर इस नैरेटिव पर सवाल खड़ा किया गया है।

ट्रेलर के एक दृश्य में नाना पाटेकर कहते हैं कि हमें ये लड़ाई नहीं लड़नी, हमारी लड़ाई वायरस के साथ है। फिल्म में ‘भारत एक खोज’ (1988-89) के थीम सॉन्ग ‘सृष्टि से पहले सत् नहीं था, असत् भी नहीं’ का अच्छा इस्तेमाल किया गया है। इसे ऋग्वेद के नासदीय सूक्त का अनुवाद कर के रचा गया था। महिला वैज्ञानिकों को एक-दूसरे को ढाँढस बँधाते हुए दिखाया गया है। एक दृश्य में नाना पाटेकर कहते हैं, “वॉर है ये, और हम सब सोल्जर्स”। साथ ही वो अर्जुन की तरह मछली की आँख पर नजर रखने की सलाह देते हैं।

फिल्म में अनुपम खेर भी हैं। फिल्म का एक डायलॉग रोचक है जो ट्रेलर में दिखाया गया है, “एक राजा था। जो भी कर लो, मरता ही नहीं था। उस राजा की जान एक तोते की गर्दन में अटकी थी। गर्दन मरोड़ दी और राजा मर गया। हमारे राजा की जान इस वैक्सीन में अटकी है।” इस डायलॉग के सहारे वामपंथी नैरेटिव पर वार किया गया है। ‘द वैक्सीन वॉर’ का ट्रेलर देख कर लगता है कि ये एक इमोशनल फिल्म होने वाली है, जिसमें भारत की महिला वैज्ञानिकों का सामर्थ्य दिखाया जाएगा।

पहली बार महासागर की इतनी गहराई में उतरेगा इंसान: ‘चंद्रयान 3’ और ‘आदित्य L1’ के बाद अब ‘मत्स्य 6000’, ‘टाइटैनिक’ वाले हादसे से भी लिया सबक

चंद्रयान मिशन के जरिए चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पहुँचने वाला भारत दुनिया का पहला देश बन चुका है। वहीं, आदित्य एल-1 सूर्य मिशन पर रवाना हो चुका है। ऐसे में अब भारत की नजर महासागर की गहराइयों में झंडे गाड़ने की है। इसके लिए समुद्रयान मिशन के तहत मानवयुक्त सबमर्सिबल ‘मत्स्य 6000′ के परीक्षण की तैयारी जोर-शोर से चल रही है।

चेन्नई के राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान (NIOT) में ‘मत्स्य 6000’ सबमर्सिबल का निर्माण किया जा रहा है। ये भारत का पहला मानवयुक्त गहरा महासागर मिशन है। इसके जरिए गहरे समुद्र के संसाधनों और जैव विविधता का मूल्यांकन एवं अध्ययन करने के लिए ये पनडुब्बी महासागर में उतरेगी।

यह पहनडुब्बी समुद्र में 6 किलोमीटर की गहराई में 3 लोगों को लेकर जाएगी। ये मिशन डीप ओशन मिशन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘ब्लू इकोनॉमी’ के तहत आता है। यह इकोनॉमी देश की आर्थिक वृद्धि, आजीविका और नौकरियों में सुधार और महासागर पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को संरक्षित करते हुए समुद्री संसाधनों के सतत इस्तेमाल को बढ़ावा देती है।

‘मत्स्य 6000’ सबमर्सिबल के समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को बगैर कोई नुकसान पहुँचाए अपने काम को अंजाम देगी। इस मिशन की जानकारी पृथ्वी विज्ञान मंत्री किरेन रिजेजू ने अपने एक्स हैंडल पर शेयर की है। सागर की गहराइयों के राज जानने के इस मिशन पर हम यहाँ बात करेंगे।

क्या है ‘मत्स्य 6000’

एनआईओटी (NIOT) की बनाई पूरी तरह से स्वदेशी ‘मत्स्य 6000’ सबमर्सिबल 80 मिमी मोटी टाइटेनियम मिश्र धातु से बनी है। यह समुद्र तल से 600 गुना अधिक दबाव झेलने में सक्षम होगी। इतना ही नहीं, इसमें लगातार 12 से 16 घंटे तक काम करने की क्षमता होगी। इसके साथ ही इसमें 96 घंटे तक ऑक्सीजन की आपूर्ति होती रहेगी।

एनआईओटी के वैज्ञानिकों ने इसके डिजाइन, मैटेरियल, टेस्टिंग सर्टिफिकेशन, अतिरेकता (Redundancy) और मानक संचालन प्रक्रिया जाँच पूरी कर ली है। संभवतः 2024 की शुरुआत में बंगाल की खाड़ी में इसका परीक्षण किया जाएगा।

पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने 2023 की शुरुआत में कहा था कि समुद्रयान परियोजना 2026 तक तैयार होने की संभावना है। केंद्र ने पाँच वर्षों के लिए 4,077 करोड़ रुपए के कुल बजट पर गहरे महासागर मिशन को मंजूरी दी थी। तीन वर्षों (2021-2024) के लिए पहले चरण की अनुमानित लागत 2,823.4 करोड़ रुपए है।

समुद्री की गहराई में ये पनडुब्बी निकल, कोबाल्ट, मैगनीज और गैस हाइड्रेट्स खोजने के साथ ही जलीय उष्मा में रसायन संश्लेषी जैव विविधता और समुद्र में कम तापमान वाली मीथेन के रिसाव का पता लगाएगी। अभी तक केवल यूएस, रूस, जापान, फ्रांस और चीन ही मानवयुक्त सबमर्सिबल यानी पनडुब्बी विकसित की है।

एनआईओटी के निदेशक जीए रामदास के मुताबिक, “सतह को छोड़कर, हमारे पास हर चीज़ के लिए अतिरेक है। कभी दोगुना, कभी तिगुना अतिरेक। इसे एक आधिकारिक समुद्री परीक्षण से प्रमाणित किया जाएगा और हम इसे साबित करने के लिए डीएनवी-जीएल इस्तेमाल किया है।”

उनका कहना है, “हम मानक संचालन प्रक्रिया का भी पालन करेंगे जैसे कि जहाज से सबमर्सिबल को तैनात करना, जो पानी के नीचे वाहन के साथ आसान संचार के लिए सबमर्सिबल के ठीक ऊपर की सतह पर रहेगा।”

टाइटन सबमर्सिबल हादसे से लिया सबक

इस साल की शुरुआत में टाइटन सबमर्सिबल हादसे के बाद वैज्ञानिक ‘मत्स्या 6000’ सबमर्सिबल के डिजाइन पर दोबारा विचार कर रहे हैं। इस हादसे में सबमर्सिबल कंपनी के सीईओ समेत सभी पाँच यात्रियों की मौत हो गई थी।

एनआईओटी के निदेशक रामदास ने इस साल की शुरुआत में अंग्रेजी अखबार हिंदू को बताया था, “जब हम योजना का खाका तैयार कर रहे थे तो हमारे सबमर्सिबल के लिए कार्बन फाइबर का इस्तेमाल करने का प्रस्ताव था, लेकिन हमने आखिरकार इसे दृढ़ता से खारिज कर दिया और टाइटेनियम पर जोर दिया।”

उन्होंने आगे कहा, “कार्बन फाइबर मजबूत है, लेकिन फ्रैक्चर-प्रतिरोधी नहीं है। इतनी गहराई पर टाइटेनियम के अलावा किसी भी चीज़ की सिफारिश नहीं की जा सकती है।” उन्होंने बताया कि विश्व स्तर पर सभी रिसर्च मिशन टाइटेनियम पर निर्भर हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि मत्स्य 6000 में सिंटैक्टिक फोम भी है। यह तैरने की योग्यता रखने वाला उपकरण है जो समुद्र के ऊपरी सतह तक पहुँच जाएगा और इस तरह से पनडुब्बी को खोजने में मदद करेगा, भले ही वह फिर से सतह पर न आ सके।

उनके मुताबिक, मत्स्य 6000 में अल्ट्रा शॉर्ट बेसलाइन एकॉस्टिक पोजिशनिंग सिस्टम (यूएसबीएल) की सुविधा होगी। इससे ट्रांसपोंडर ले जाने वाली मदरशिप को जानकारी भेजने और सबमर्सिबल को प्रतिक्रिया देने की मंजूरी मिल जाएगी।

इससे मदरशिप को पता चल जाएगा कि सबमर्सिबल कहाँ है। दरअसल एयर नेविगेशन या रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिफिकेशन में ट्रांसपोंडर एक ऐसा डिवाइस है, जो पूछे जाने वाले सिग्नल की प्रतिक्रिया में पहचाना जाने वाला एक सिग्नल भेजता है।

जारी हैं अहम कोशिशें

पृथ्वी विज्ञान मंत्री किरेन रिजिजू ने जून 2023 में कहा था कि सबमर्सिबल पर काम तय कार्यक्रम के मुताबिक चल रहा है और यह जल्द ही तैयार हो जाएगा। उन्होंने कहा था, “समुद्रयान में मानवयुक्त और मानवरहित अन्वेषण शामिल हैं। ये पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय का शुरू किया गया एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रयास है। मानवरहित मिशन 7,000 मीटर से आगे चला गया है, जबकि मानवयुक्त मिशन के लिए सबमर्सिबल निर्माणाधीन है।”

उन्होंने एनआईओटी में विश्व महासागर दिवस समारोह के दौरान कहा था, “मैं अपने वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के साथ निर्माण की प्रगति की निगरानी करूँगा। मुझे उम्मीद है कि हम इसे समय पर पूरा कर लेंगे।” उन्होंने ये भी कहा था कि भारत को समुद्र की खोज में महत्वपूर्ण और नेतृत्वकारी भूमिका निभानी होगी और संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र के लिए टिकाऊ तरीके से संसाधन विकसित करने होंगे।

केंद्रीय मंत्री रिजेजू ने कहा था, “अंतरिक्ष अन्वेषण की तरह हमें समुद्र में गहराई तक जाने और अनुसंधान करने की जरूरत है। हमें बहुत गहराई तक जाने और भारत को गौरवान्वित करने के लिए तैयार रहना चाहिए। समुद्री जीवन और जमीन पर जीवन सीधे जुड़े हुए हैं।” उन्होंने ये भी कहा था कि इस पहल से एक मजबूत सकारात्मक संदेश जाएगा कि सरकार जमीन के साथ-साथ समुद्र में भी जीवन को लेकर चिंतित है।

‘G20 पर सरकार ने खर्च कर डाले ₹4000 करोड़’: TV पर बैठ कर प्रोपेगंडा फैला रहे थे राजदीप सरदेसाई, ‘शेरपा’ ने लताड़ कर कहा – फेक न्यूज़ के आधार पर मत करो बकवास

G20 के सफल आयोजन से पूरी दुनिया में भारत का डंका बजा है, लेकिन कॉन्ग्रेस और उसके नेता भारत का नाम धूमिल करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे। कॉन्ग्रेस और उसके नेता सोशल मीडिया पर दावा कर रहे थे कि मोदी सरकार ने जी-20 के आयोजन के लिए आवंटित बजट से कई गुना ज्यादा पैसा खर्च कर दिया। कॉन्ग्रेस के लोग बाकायदा वीडियो और तस्वीरों के जरिए ये दावा कर रहे थे। इस प्रोपेगेंडा को आगे बढ़ाने का काम कर रहे थे ‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार राजदीप सरदेसाई, लेकिन उनका दाँव तब उल्टा पड़ गया, जब उन्होंने लाइव इंटरव्यू में इस फेक न्यूज के सहारे जी-20 के शेरपा अमिताभ कांत को घेरने की कोशिश की।

लाइव शो में राजदीप सरदेसाई की बोलती हुई बंद

राजदीप सरदेसाई ने इंटरव्यू के दौरान उनसे सोशल मीडिया का हवाला देते हुए सवाल पूछा कि क्या ये दावा सही है कि भारत सरकार ने बजट से कई गुना ज्यादा पैसे जी-20 के आयोजन में खर्च कर दिए? उनके इस दावे को जी-20 के शेरपा अमिताभ कांत ने पूरी तरह से खारिज कर दिया। उन्होंने इन दावों को फेक न्यूज बताया और राजदीप सरदेसाई को फेक न्यूज के चक्कर में न पड़ने की सलाह भी दी।

अमिताभ कांत ने बताया कि भारत सरकार ने जी-20 के आयोजन के लिए आबंटित पैसों में से कुछ हिस्सा बचा भी लिया है। उन्होंने कहा कि 4100 करोड़ छोड़िए, बल्कि जो बजट सरकार ने जारी किया था, उसमें से भी काफी पैसा बचा लिया गया है। इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि कैसे अमिताभ कांत ने फर्जी दावों की हवा निकाल दी और राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकार की बोलती बंद कर दी। नीचे संलग्न किए गए वीडियो में आप 15 मिनट के बाद इस चर्चा को देख सकते हैं।

अमिताभ कांत ने कहा, “जो आँकड़े चलाए जा रहे हैं, उससे काफी कम बजट प्रस्तावित किया गया था। वास्तविक बात ये है कि जितना बजट अलॉट किया गया था, उससे कम ही खर्च किए गए हैं। अभी तक खर्च का कोई आधिकारिक आँकड़ा जारी नहीं किया गया है। अभी भी लॉजिस्टिक्स विभाग आँकड़ों को इकट्ठे करने में जुटी है। जब आँकड़े सार्वजनिक हो जाएँगे, तब सभी को पता चल जाएगा कि कितना खर्च हुआ है।”

पीआईबी ने भी किया फैक्ट चेक

फैक्ट चेक में कॉन्ग्रेसी दावे की धज्जियाँ उड़ चुकी हैं। जी हाँ, फैक्ट चेक में ये बात सामने आई है कि कॉन्ग्रेस पार्टी और उसके नेताओं की ओर से किया जा रहा दावा न सिर्फ भ्रामक है, बल्कि फैक्चुअली गलत भी है।

पीआईबी ने टीएमसी सांसद संकेत गोखले के ट्वीट को कोट करते हुए लिखा, “जिन ट्वीट्स में जी-20 के आवंटित बजट से 300 प्रतिशत ज्यादा खर्च की बात की जा रही है, वो दावे पूरी तरह से गलत हैं।” आगे लिखा गया है, “जिस राशि की बात हो रही है, तो आईटीपीओ और अन्य स्थाई निर्माण कार्यों पर खर्च किए गए हैं, न कि सिर्फ जी-20 समिट पर।”

क्या दावा कर रही थी कॉन्ग्रेस?

कॉन्ग्रेस और उसके गठबंधन I.N.D.I. Alliance के नेता लगातार दावा कर रहे थे कि जी-20 के आयोजन में सरकार ने आबंटित बजट से 300 प्रतिशत ज्यादा पैसे खर्च किए हैं। टीएमसी के नेता और राज्यसभा सांसद संकेत गोखले ने दावा किया कि मोदी सरकार ने 990 करोड़ के आवंटित बजट की जगह जी-20 के आयोजन में 4100 करोड़ रुपए खर्च किए हैं, जो कि वास्तविक बजट से 3100 करोड़ यानी 300 प्रतिशत ज्यादा है।

कॉन्ग्रेस पार्टी ने अपने आधिकारिक एक्स (पूर्व में ट्विटर) हैंडल पर लिखा, “G-20 के लिए- मोदी सरकार का बजट था 990 करोड़ रुपए। मोदी सरकार ने उड़ा दिए 4100 करोड़ रुपए। जनता की मेहनत की कमाई, अपनी छवि चमकाने में उड़ाई”

भारत की अध्यक्षता में जी-20 शिखर सम्मेलन का सफल आयोजन

बता दें कि जी-20 की अध्यक्षता भारत के पास है। भारत की अध्यक्षता में अलग-अलग मुद्दों पर बीते 10 माह में 58 शहरों में 200 से अधिक बैठकें हुईं। इन बैठकों का आयोजन कश्मीर से लेकर अरुणाचल प्रदेश, तमिलनाडु से लेकर गुजरात, मुंबई से लेकर उत्तराखंड तक किया गया। इसके अलावा देश में इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार पर काफी खर्च किया गया। भारत सरकार ने दिल्ली के प्रगति मैदान में ‘भारत मंडपम’ नाम से बड़ा आयोजन स्थल भी बनाया, जिसका इस्तेमाल आने वाले कई दशकों तक अन्य कामों में किया जाएगा।

भारत की अध्यक्षता में हुए जी-20 शिखर सम्मेलन में सभी मुद्दों पर एक राय सभी देशों में बनी, जिसे नई दिल्ली घोषणापत्र नाम दिया गया है। पूरी दुनिया में भारत के आयोजन की तारीफ की गई, लेकिन भारत के कुछ विपक्षी राजनीतिक दल इस मुद्दे पर भी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने से बाज नहीं आए। इसी क्रम में कभी उन्होंने इस आयोजन को भारत की जगह भाजपा का आयोजन बता दिया, तो किसी ने आवंटित बजट से कई गुना ज्यादा खर्च का आरोप लगाया। हालाँकि असलियत क्या है, ये सामने आ चुका है।

मिस्र में छात्राओं के बुर्का पहनने पर रोक, अभिभावक भी नहीं डाल सकेंगे दबाव: मानवता के प्रति योगदान को देख अमेरिका में नवंबर ‘हिंदू विरासत माह’ घोषित

मिस्र सरकार ने स्कूल में नकाब, बुर्का आदि पहनने पर रोक लगा दी है। अब स्कूल में लड़कियों को बाल ढँकने की अनुमति तो होगी, लेकिन वो अपना चेहरा ढँककर स्कूल नहीं आ सकतीं। वहीं, अमेरिका के फ्लोरिडा प्रांत ने नवंबर को ‘हिंदू विरासत माह’ घोषित किया है। यह फैसला हिंदुओं के योगदान को पहचानने के लिए किया गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मिस्र के शिक्षा मंत्री रेडा हेगाजी ने नकाब पहनने के फैसले को लेकर कहा कि स्कूल के लिए नया ड्रेस कोड जारी किया जा रहा है। इसके तहत 30 सितंबर से शुरू होने वाले नए शैक्षणिक वर्ष में लड़कियाँ नकाब पहनकर स्कूल नहीं आ सकतीं। उन्हें अपने बाल ढँकने यानि हेड स्कॉर्फ पहनने की अनुमति होगी, लेकिन चेहरा साफ दिखना चाहिए।

शिक्षा मंत्री रेडा हेगाजी ने यह भी कहा कि ऐसे मॉडल या चित्रों पर भी प्रतिबंध लगाया जा रहा है, जो बालों को कवर करने को बढ़ावा देते हों। उन्होंने कहा कि शिक्षा विभाग की अनुमति के बिना ऐसे कोई भी मॉडल या चित्र को नहीं लगाया जाएगा।

उन्होंने स्कूली छात्राओं के माता-पिता की जिम्मेदारी पर जोर देते हुए कहा कि यह महत्वपूर्ण है कि अभिभावकों को अपनी बेटी के च्वॉइस के बारे में पता होना चाहिए। लड़की अगर हिजाब पहनती हो तो यह उसकी इच्छा से ही हो। इसके लिए उस पर किसी प्रकार का दबाव नहीं बनाया जाए।

शिक्षा मंत्रालय ने कहा कि स्कूल बोर्ड छात्र एवं छात्राओं के यूनीफॉर्म के कलर को लेकर ट्रस्टी, छात्रों के माता-पिता और शिक्षकों मिलकर फैसला लेगा। इसमें स्कूल शिक्षा मंत्रालय भी सहयोग करेगा। इसका उद्देश्य छात्रों के बीच स्कूल में एकरूपता लाना है।

बयान में आगे कहा गया है, “अरबी भाषा, धार्मिक शिक्षा और सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक शिक्षा के शिक्षकों की भूमिका हर आयु वर्ग की छात्राओं को इसके लिए मनोवैज्ञानिक रूप से तैयार करना होगा।” शिक्षा मंत्रालय ने शिक्षा निदेशालय को इस संबंध में सभी अभिभावकों को जानकारी देने के लिए कहा है।

गौरतलब है इससे पहले ऑस्ट्रिया, बोस्निया, हर्जेगोविना, कनाडा, फ्रांस, कजाकिस्तान, कोसोवो, किर्गिस्तान, रूस और उजबेकिस्तान जैसे कई देश स्कूलों और कॉलेजों में हिजाब/नकाब पहनने पर प्रतिबंध लगा चुके हैं।

नवंबर ‘हिंदू विरासत माह’ घोषित

दूसरी तरफ अमेरिका के फ्लोरिडा में रहने वाले हिंदुओं को बड़ा तोहफा मिला है। फ्लोरिडा की ब्रोवार्ड काउंटी ने नवंबर को ‘हिंदू विरासत माह’ घोषित किया है। ब्रोवार्ड काउंटी ने योग, आयुर्वेद, ध्यान, भोजन, संगीत, कला समेत अन्य बहुत सारी चीजों को हिंदू धर्म के योगदान के रूप में मान्यता देने का प्रस्ताव पारित किया।

प्रस्ताव में हिंदू दर्शन की भी बात की गई है, जिसने राष्ट्रपति जॉन ऐडम्स, मार्टिन लूथर किंग जैसे सैकड़ों अमेरिकियों को प्रभावित किया। दरअसल, अमेरिका में रहने वाले हिंदुओं के संगठन (CoHNA) ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर इसकी जानकारी शेयर की है। CoHNA हिंदुओं का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों का एक संगठन है।

नवंबर को ‘हिंदू विरासत माह’ घोषित करने के प्रस्ताव में कहा गया है, “हिंदू धर्म दुनिया के सबसे बड़े और सबसे पुराने धर्मों में से एक है। दुनिया भर के 100 से अधिक देशों में 1.20 अरब से अधिक हिंदू रहते हैं। इनकी अलग-अलग परंपराएँ हैं। इन्हें सनातन धर्म भी कहा जाता है, जिसमें स्वीकृति, आपसी सम्मान, स्वतंत्रता और शांति महत्वपूर्ण है।”

इस प्रस्ताव में हिंदू धर्म में दिवाली के महत्व का भी जिक्र किया गया है। साथ ही कहा गया कि यह त्योहार बुराई पर अच्छाई और अज्ञानता पर ज्ञान की जीत का प्रतीक है। यह शांति, खुशी और नई शुरुआत का त्योहार है। यह लगभग 5000 वर्ष से हिंदू और विश्व के विभिन्न संस्कृतियों में इसे माना जा रहा है।

इस प्रस्ताव में हिंदुओं के योगदान के बारे में बताते हुए कहा गया है, “फ्लोरिडा का स्कूल बोर्ड ब्रोवार्ड काउंटी में हिंदुओं के महत्व और मूल्यवान योगदान को पहचानने और उसका उत्सव मनाने के लिए नवंबर को हिंदू विरासत माह घोषित करता है।”

बता दें कि CoHNA ने एक याचिका दायर कर ब्रोवार्ड काउंटी में दिवाली पर स्कूलों की छुट्टी घोषित करने की माँग की थी। इसके बाद यह फैसला लिया गया। इससे पहले जॉर्जिया भी अक्टूबर को ‘हिंदू विरासत माह’ घोषित कर चुका है।

सनातन है तो भारत है, उसकी छाया में ही सब सुरक्षित हैं… जहाँ कम हुआ सनातन का प्रभाव वहाँ बँध गया सेकुलरिज्म का बोरिया-बिस्तर

सनातन धर्म के विरुद्ध विपक्षी नेताओं के बयानों की गाली-गलौज भरी बौछारें देखकर पुरानी हिन्दी फिल्म का चर्चित गीत ‘अच्छों को बुरा साबित करना दुनिया की पुरानी आदत है’ याद आता है। दुनिया की यह आदत रही होगी किन्तु भारतवर्ष की सनातन संस्कृति में उसकी मूलभूत विशेषता सहिष्णुता के कारण यह आदत कभी नहीं रही।

गुलामी के काले दिनों में अंग्रेजों ने भारतवर्ष के धर्म, संस्कृति, शिक्षा आदि समस्त अस्मिता सूचक महान संदर्भों के विरुद्ध षड्यन्त्रपूर्वक विष उगलना प्रारम्भ किया। उनके इसी विष को यहाँ के कम्युनिस्टों ने शिक्षा, साहित्य और कला के धरातल पर स्वतंत्र भारत में निरन्तर फैलाया और आज यही जहर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए विपक्ष के कुछ नेता उगल रहे हैं।

सनातन धर्म, समानता के खिलाफ है, वह कुष्ठ रोग की तरह है, उसे डेंगू-मलेरिया और कोरोना की तरह मिटाना होगा- आदि अपमान सूचक वाक्य देश की फिजा में गूँजकर देश-विदेश में बसे एक अरब से अधिक सनातनी हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करके उनकी सहिष्णुता का खुला मजाक उड़ा रहे हैं। उन्हें समर्थन देने वाले इसे अभिव्यक्ति की आजादी कह रहे हैं और इसका समर्थन कर रहे हैं।

यदि स्वयं को चर्चा में लाने और मीडिया में छाने के लिए ऐसी अनर्गल बयानबाजी अभिव्यक्ति की आजादी है तो इस पर कठोर प्रतिबंध लगाए जाने पर विचार करना आज की बड़ी आवश्यकता बन गई है, क्योंकि ऐसे बयानों से विपक्ष को सत्ता मिले या न मिले किन्तु सामाजिक समन्वय, सद्भाव और सहयोग अवश्य क्षत-विक्षत होगा। समाज में संघर्ष बढ़ेगा। इसलिए ऐसे नफरत भरे बयानों पर नियंत्रण अनिवार्य है।

सनातन भारतवर्ष का अपना धर्म है। उसके सिद्धान्त शाश्वत हैं और न केवल भारतवर्ष के लिए अपितु समस्त विश्व के कल्याण के लिए संकल्पित हैं। हजारों वर्ष पूर्व सनातन धर्म ने ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का उदार भाव व्यक्त किया और आज भी वह अपने धार्मिक अनुष्ठानों की समापन वेला में ‘विश्व का कल्याण हो, प्राणियों में सद्भावना हो‘ – जैसे उद्घोष गुंजित कर अपनी मूल्य चेतना को स्वर देता है। प्रकृति के साथ उसकी गहरी रागात्मकता है जो नदी, सागर, पर्वत, वन, बादल, भूमि, वायु आदि में देवत्व का दर्शन कराती है और प्राकृतिक पर्यावरण की शुद्धता के लिए आवश्यक वातावरण का निर्माण करती है।

सनातन धर्म के अद्वैत दर्शन ने मनुष्य के साथ-साथ जीवमात्र में परम सत्ता का दर्शन देकर पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों तक की रक्षा का प्रावधान किया है। सनातन धर्म का प्रतिनिधि ग्रंथ श्रीमद्भगवदगीता ब्राह्मण, गाय हाथी, कुत्ता, चाण्डाल सब में एक ही ईश्वर की उपस्थिति निर्देशित कर जीवमात्र की समानता का शंखनाद करता है। वैदिक युग से लेकर आज तक उसका प्रवाह निर्बाध रहा है।

शास्त्र और शस्त्र सनातन धर्म की दो सशक्त भुजाएँ हैं। राम, कृष्ण और शिव उसके प्रतीक आदर्श हैं। भारत में हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक फैले छोटे-बड़े करोड़ों मंदिर, चैरे, चबूतरे उसके ऊर्जा केन्द्र हैं और असंख्य साधु-संन्यासी उसके संरक्षक हैं। उसे मिटाने की बात करना दिन में सपने देखने जैसा है।

सनातनी धर्म की रक्षा के लिए प्राणों की बाजी लगाने में अग्रणी हैं। शकों और हूणों जैसे बर्बर आक्रान्ताओं पर विजय प्राप्त करने वाला सनातन धर्म गजनवी, गोरी, तैमूर, औरंगजेब, नादिरशाह और अहमदशाह अब्दाली जैसे आक्रान्ताओं से टकराकर भी नहीं टूटा। ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ आए पादरियों के कुचक्र और प्रलोभन उसे लुभा न सके। हजारों वर्ष के संघर्ष के बाद भी उसकी विजय-पताका सबसे ऊँची है। शिकागो के सर्वधर्म सम्मेलन में स्वामी विवेकानन्द के व्याख्यान की सर्वस्वीकृति उसकी साक्षी है।

सनातन दूर्वा है। उसमें दूर्वा की तरह झुककर पैरों तले रौंदे जाने पर भी अपने अस्तित्व को बचा ले जाने की अद्भुत क्षमता है। विधर्मी आक्रमणों और कुटिल षड्यंत्रों की कड़ी धूप में सूख जाने पर भी वह अवसर पाकर हरी हो उठती है।

सनातन अमरवेल है। उसे अपने विस्तार के लिए कभी राजसिंहासन का सहारा नहीं लेना पड़ा। वह राजपुत्रों और राजवंशों से पोषण पाकर नहीं फैली। उसे अपने प्रसार के लिए आक्रमणकारी सैनिकों और सेवा का आडम्बर रचते प्रलोभनकारी व्यापारियों का सहारा नहीं लेना पड़ा। सनातन धर्म की अमरवेल अपने उदार चिन्तन और मानवीय मूल्यों के कारण बिना आश्रय के ही फल-फूल रही है। विश्व में प्रतिष्ठित हो रहे नए मंदिर इसके प्रमाण हैं। सऊदी अरब जैसे इस्लामिक देश में मंदिर निर्माण सनातन की नई प्रतिष्ठा है। इस्कॉन द्वारा स्थापित कृष्ण मंदिरों की बढ़ती संख्या सनातन धर्म की अमर बेल का नूतन विकास है।

सनातन धर्म अक्षयवट है, जिसकी छाया में मनुष्यता सुरक्षित है। उसकी जड़ें जितनी गहरी हैं, उसका विस्तार आकाश में भी उतना ही अपार है। उसके आदर्श काल्पनिक नहीं, यथार्थपरक हैं। वह जड़ अथवा स्थिर नहीं है, गतिमान और परिवर्तनशील है। उसमें अपने अंदर समय के साथ आने वाली विकृतियों को स्वयं दूर करने की अद्भुत क्षमता है। गति, परिवर्तन, परिष्करण, संशोधन उसके मूलतत्व हैं। इसलिए वह चिर पुरातन और नित नवीन है। उसकी पृष्ठभूमि में विराट इतिहास है और उसके समक्ष अनन्त भविष्य। सनातन मनुष्य की रचनात्मक प्रज्ञा का अक्षय प्रवाह है। नकारात्मक नारों का भ्रामक प्रचार उसे रोक नहीं सकता।

विगत शताब्दियों में परतंत्रता जनित प्रभावों के कारण सनातन में आई छुआछूत, पर्दा, बालविवाह, आदि विकृतियों पर विजय पाने की ओर सनातन का विजय-रथ निरन्तर अग्रसर है। सनातन को कोसकर समाज में जहर घोलने वाले इन तथाकथित बुद्धिजीवियों, समाज सुधारकों और नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि अब से लगभग पंद्रह सौ वर्ष पूर्व सम्राट हर्षवर्धन के समय में भारत भ्रमण पर आने वाले विदेशी चीनी यात्री हवेनसांग ने भारतीय समाज की जिस सुख, शान्ति, समृद्धि का उल्लेख किया है, वह सनातन चिन्तन परम्परा की ही देन है।

भारत सोने की चिड़िया सनातन व्यवस्था की छाया में ही रहा। अयोध्या नरेश सत्यवादी हरिश्चन्द्र को काशी के डोम ने खरीदा था, इस संदर्भ से भी प्राचीन भारत में सनातन व्यवस्था में दलित समझे जाने वाले वर्ग की आर्थिक स्थिति का अनुमान करना चाहिए। लगभग सौ वर्ष पूर्व सवर्ण वर्ग में जन्मे महर्षि दयानन्द ने आर्य समाज की स्थापना कर सनातन धर्म में संशोधन करते हुए अस्पृश्यता के अभिशाप को दूर करने की दिशा में देशव्यापी सार्थक प्रयत्न किए।

कथित ऊँची जातियों में जन्म लेने वाले वीर सावरकर, महात्मा गाँधी, डॉ. हेडगेवार, प. श्रीराम शर्मा आचार्य आदि ने सनातन में आए सामाजिक भेदभाव को दूर करने के लिए गंभीर प्रयत्न किए, जिनका शुभ परिणाम स्वतंत्र भारत में धार्मिक, सामाजिक और संवैधानिक धरातल पर आज सबके सामने हैं। मंदिरों के द्वार सबके लिए खुले हैं। आज चाय की गुमठियों, होटलों और चाट के ठेलों पर खाने-पीने का सामान बनाने वालों की जाति नहीं पूछी जाती। सामाजिक समरसता के इन प्रयत्नजनित सकारात्मक परिवर्तनों ने सनातन को नई शक्ति दी है। जिन गाँवों-कस्बों में अभी भी हठपूर्वक छुआछूत जैसे अपराध यदि कुछ लोग कर रहे हैं तो उनके विरुद्ध कठोर कानूनी कार्यवाहियाँ हो रही हैं। जितना घना अँधेरा कल तक था, उतना आज नहीं है। जो आज बचा है वह कल नहीं रहेगा।

इस आशा और विश्वास के साथ सनातन समाज आगे बढ़ रहा है। उसने तुलसीदास के उस रामराज्य की स्थापना को चुना है, जिसमें चारों वर्णों के लोग राजघाट पर साथ-साथ स्नान करते हैं;

राजघाट सब विधि सुंदर वर।
मज्जहिं तहाँ बरन चारिउ नर।।

किंतु सामाजिक समरसता के इस राजघाट का निर्माण दलित और सवर्ण की राजनीति करने वाले कुछ नेताओं को रास नहीं आ रहा है। वह उनकी आँख की किरकिरी बन रहा है, क्योंकि इसके कारण उन्हें सत्ता स्वयं से छिटकती दिख रही है। उनकी बौखलाहट बढ़ रही है और वे वाणी का विवेक और संयम खोकर स्वयं को ही कोस रहे हैं। सनातन को कोसने वालों का मूल भी सनातन में ही है, क्योंकि सनातन ही भारत की पहचान है। संसार के अन्य देश भारत की सनातन सांस्कृतिक विरासत यहाँ के मठों, मंदिरों, धर्म ग्रंथों, पर्व-उत्सवों, राम-कृष्ण आदि महापुरुषों से ही जानते हैं।

सनातन है तो भारत है। सनातन नहीं तो भारत नहीं, भारत की पहचान नहीं। सनातन की छाया में ही भारत में अन्य धर्म सुरक्षित रह सकते हैं। विगत सात दशकों का इतिहास साक्षी है कि पाकिस्तान और बंगलादेश में सनातन के अल्पमत में आते ही वहाँ अन्य धर्मों के अनुयायी सुरक्षित नहीं रहे। अफगानिस्तान में सनातन पूरी तरह निर्मूल हुआ है तो वहाँ बौद्ध, जैन और सिख आदि भी नहीं बचे हैं। जिस धर्म-निरपेक्षता और सर्वधर्म समभाव की दुहाई हमारे विपक्षी नेता देते हैं उसकी सुरक्षा सनातन की पुष्टि में ही है, उसके निर्मूलन में नहीं।

(लेखक डाॅ. कृष्णगोपाल मिश्र, शासकीय नर्मदा महाविद्यालय, नर्मदापुरम्, मध्य प्रदेश में हिन्दी के विभागाध्यक्ष हैं)