भारत सरकार ने साइबर सुरक्षा को मजबूत करने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। दूरसंचार मंत्रालय ने शुक्रवार (28 नवंबर 2025) को एक आदेश जारी किया, जिसमें सभी नए स्मार्टफोन्स पर ‘संचार साथी’ ऐप को प्रीलोड करने का निर्देश दिया गया है। हालाँकि केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा है कि जो लोग ये ऐप नहीं रखना चाहते, वो इसे डिलीट कर सकते हैं। ये वैकल्पिक है।
#WATCH | Delhi | "… If you don't want Sanchar Sathi, you can delete it. It is optional… It is our duty to introduce this app to everyone. Keeping it in their devices or not, is upto the user…," says Union Minister for Communications Jyotiraditya Scindia. pic.twitter.com/iXzxzfrQxt
आदेश के मुताबिक, एप्पल, सैमसंग, वीवो, ओप्पो और शाओमी जैसी प्रमुख कंपनियों को 90 दिनों के अंदर यह सुनिश्चित करना होगा। सप्लाई चेन में पहले से मौजूद डिवाइसेज पर ओटीए (ओवर-द-एयर) अपडेट के जरिए ऐप पुश किया जाएगा। यह पहली बार है जब भारत में किसी सरकारी ऐप को हर डिवाइस पर अनिवार्य किया गया है, हालाँकि यूजर चाहे तो इसे बंद कर सकता है या डिलीट कर सकता है।
.@DoT_India issues directions for pre-installation of Sanchar Saathi App in mobile handsets to verify the genuineness of mobile handsets
Pre-installed App must be Visible, Functional, and Enabled for users at first setup
Manufacturers must ensure the App is easily accessible…
संचार साथी ऐप जनवरी 2024 में लॉन्च हुआ था और अब तक 50 लाख से ज्यादा डाउनलोड हो चुके हैं। यह ऐप यूजर्स को फ्रॉड कॉल्स रिपोर्ट करने, चोरी या खोए हुए फोन को आईएमईआई नंबर से ब्लॉक करने, डिवाइस की वैधता जाँचने और फर्जी सिम कनेक्शन्स काटने जैसे कई काम करता है। एक केंद्रीय रजिस्ट्री के जरिए यह सभी टेलीकॉम नेटवर्क पर काम करता है।
सरकार के आँकड़ों के मुताबिक, इस ऐप ने 7 लाख से ज्यादा खोए फोन रिकवर कराए हैं, जिसमें अक्टूबर में अकेले 50,000 फोन शामिल हैं। साथ ही, 3.7 करोड़ चोरी के फोन ब्लॉक किए गए और 30 मिलियन फर्जी कनेक्शन बंद हुए।
इस फैसले से साइबर सुरक्षा के लिहाज से बड़ा फायदा होगा। भारत में 1.2 अरब से ज्यादा मोबाइल सब्सक्राइबर्स हैं और साइबर क्राइम में तेजी से इजाफा हो रहा है। डुप्लीकेट या स्पूफ्ड आईएमईआई नंबर्स से स्कैम और नेटवर्क दुरुपयोग आम हो गया है। ऐप से यूजर्स को फोन ट्रैकिंग, पुलिस को डिवाइस ट्रेस करने में मदद मिलेगी और ब्लैक मार्केट में नकली फोनों की बिक्री रुकेगी।
साइबर सुरक्षा के लिए बेहद अहम, चोरियों पर लगेगी लगाम
विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम साइबर थ्रेट्स को रोकने में मील का पत्थर साबित होगा। काउंटरपॉइंट रिसर्च के डायरेक्टर तरुण पाठक ने कहा, “यह ऐप साइबर अपराधों को रोकने के लिए जरूरी है, लेकिन कंपनियों की ओर से चुनौतियाँ जरूर मिलेंगी।”
फोन खोने या चोरी की स्थिति में यह ऐप बेहद सहायक साबित होगा। यूजर ऐप के जरिए तुरंत आईएमईआई ब्लॉक कर सकता है, जिससे चोर फोन का इस्तेमाल न कर सके। केंद्रीय डेटाबेस से ट्रैकिंग आसान हो जाती है और पुलिस को लोकेशन ट्रेस करने में मदद मिलती है। सरकार का दावा है कि इससे नुकसान कम होगा और यूजर्स की सुरक्षा बढ़ेगी।
कुछ कंपनियाँ कर सकती हैं सरकार के फैसले का विरोध
हालाँकि, यह फैसला कई कंपनियों को नागवार गुजर रहा है। भारत में 4.5% स्मार्टफोन मार्केट शेयर रखने वाली एप्पल ने पहले ही सरकारी एंटी-स्पैम ऐप के लिए असहमति जताई थी। एप्पल की पॉलिसी में सेल से पहले किसी थर्ड-पार्टी ऐप इंस्टॉल करना मना है।
सूत्रों के मुताबिक, एप्पल ऐसी माँगों को हमेशा ठुकराती रही है। काउंटरपॉइंट के तरुण पाठक ने रॉयटर्स को बताया, “एप्पल मध्य मार्ग तलाशेगी, जैसे यूजर्स को इंस्टॉल के लिए नोटिफाई करना।” सैमसंग, वीवो, ओप्पो और शाओमी भी चुप्पी साधे हुए हैं, लेकिन इनका विरोध प्राइवेसी और यूजर चॉइस पर केंद्रित है।
प्राइवेसी एडवोकेट्स ने भी कड़ी आलोचना की है। टेक्नोलॉजी वकील मिशी चौधरी ने कहा, “सरकार यूजर कंसेंट को खत्म कर रही है। यह यूजर चॉइस को नजरअंदाज करता है।” हालाँकि अब सरकार की सफाई के बाद ये तय हो गया है कि यूजर चाहे तो इस ऐप को हटा भी सकता है।
वैसे, एंड्रॉयड स्मार्टफोन्स में पहले से ही गूगल की तरफ से ‘Find My Device’ जैसे ऐप हैं, लेकिन इन तक सरकार की पहुँच नहीं थी, जिसका साइबर क्रिमिनल फायदा उठाते रहे हैं, क्योंकि ये ऐप फैक्ट्री री-सेट मारने के साथ ही गायब भी हो जाता है। ऐसे में इस ऐप का फायदा ग्राहकों को नहीं मिल पाता।
रूस में मैक्स मैसेंजर ऐप किया जा चुका है अनिवार्य
रूस में अगस्त 2025 में मैक्स मैसेंजर ऐप को अनिवार्य करने पर भी इसी तरह विरोध हुआ था। आलोचक कहते हैं कि बिना पब्लिक कंसल्टेशन के यह सर्विलांस का खतरा बढ़ा सकता है। लेकिन सरकार का तर्क है कि साइबर खतरे इतने गंभीर हैं कि यह कदम जरूरी है।
सिम-वॉट्सऐप को लेकर जारी डायरेक्शन के बाद ये कितना अहम कदम
यह फैसला हाल के सिम बाइंडिंग और वॉट्सऐप पर डायरेक्शन के बाद आया है, जो यूजर वेरिफिकेशन को मजबूत कर रहा है। सिम को बायोमेट्रिक से लिंक करने के बाद यह ऐप अगला कदम है, जो डिवाइस लेवल पर सुरक्षा लाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह वैश्विक ट्रेंड का हिस्सा है, जहाँ रूस के बाद भारत भी स्टेट ऐप्स को पुश कर रहा है। दूरसंचार मंत्रालय ने कहा, “यह टेलीकॉम साइबर सिक्योरिटी को बचाने के लिए अनिवार्य है।”
बता दें कि अब वॉट्सऐप अपने फोन से दूसरी किसी जगह चलाने के लिए हर 6 घंटे में लॉगिन करने की जरूरत पड़ेगी। अब तक डेस्कटॉप पर लॉगिन करने के बाद बार-बार लॉगिन करने की जरूरत नहीं पड़ती थी और बिना सिम-नंबर के भी लंबे समय तक वॉट्सऐप का इस्तेमाल लैपटॉप-डेस्कटॉप पर किया जा सकता था। लेकिन इसका फायदा साइबर अपराधी उठाने लगे थे, जिसके बाद सरकार ने इस पर रोक लगा दी है।
कुल मिलाकर देखा जाएगा तो सरकार के आदेश के बाद सभी स्मार्टफोन में मौजूद संचार साथी ऐप से साइबर फ्रॉड कम होंगे, लेकिन प्राइवेसी बहस तेज हो गई है। बहरहाल, कंपनियाँ 90 दिनों में सरकार के आदेश का अनुपालन करेंगी या कोर्ट जाएँगी, यह देखना दिलचस्प होगा।
केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने सोमवार (01 दिसंबर 2025) को 1989 के रूबिया सईद अपहरण कांड में नई गिरफ्तारी की है। CBI ने 35 साल बाद इस केस में श्रीनगर के हवाल इलाके से शफत अहमद शुंगलू को धर दबोचा। पहले शुंगलू को निशात पुलिस स्टेशन ले जाया गया, फिर सीबीआई (CBI) ने हिरासत में ले लिया। अधिकारियों का कहना है कि पूछताछ से कई राज खुल सकते हैं।
रूबिया अपहरण केस क्या था, जिसने हिला दिया था पूरा देश
शफत अहमद शुंगलू की ताजा गिरफ्तारी रूबिया सईद अपहरण कांड की जाँच को नई जान दे रही है, जो कश्मीर के आतंकवाद के इतिहास का एक काला अध्याय है। 8 दिसंबर 1989 को तब के गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रूबिया को जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के आतंकियों ने अगवा कर लिया था।
लाल डीड अस्पताल में डॉक्टर रूबिया बस से घर लौट रही थीं जब बंदूक की नोक पर उन्हें किडनैप कर लिया गया। यह खबर दिल्ली पहुँचते ही हड़कंप मच गया। पूरे देश में सन्नाटा छा गया, क्योंकि यह पहली बार था जब आतंकी केंद्र सरकार के मंत्री के घर तक सेंध लगा बैठे।
अपहरण के पीछे साफ मकसद था- जेल में बंद अपने साथियों को रिहा कराना। आतंकियों ने शर्त रखी: रूबिया की जान चाहिए तो पाँच खूँखार सदस्यों को छोड़ो। सरकार मुश्किल में फँस गई। एक तरफ मंत्री की बेटी की जिंदगी, दूसरी तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा। कई दिनों तक पर्दे के पीछे बातचीत चली।
आखिरकार 13 दिसंबर को वीपी सिंह सरकार झुक गई। पाँच आतंकियों को रिहा किया गया, बदले में रूबिया घर लौट आईं। लेकिन इस सौदे ने कश्मीर का चेहरा हमेशा के लिए बदल दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि इसी घटना ने आतंकियों के हौसले बुलंद कर दिए।
यासीन मलिक था अपहरण केस का मास्टरमाइंड, खुद रूबिया ने की थी पहचान
इस सौदे के केंद्र में था जेकेएलएफ का चीफ यासीन मलिक। मलिक पर अपहरण का मास्टरमाइंड होने का आरोप है। सीबीआई की चार्जशीट के मुताबिक, दिसंबर 1989 के पहले हफ्ते में मलिक और उसके साथियों ने साजिश रची। रूबिया को निशाना बनाकर सरकार को ब्लैकमेल करने का प्लान था।
मलिक ने खुद को अपहरण की योजना का सूत्रधार बताया। 2022 में रूबिया ने टाडा कोर्ट में मलिक समेत चार आरोपितों की पहचान की। उन्होंने कहा, “यही वो लोग थे जिन्होंने मुझे अगवा किया।” रूबिया का यह बयान केस को मजबूत करने वाला साबित हुआ। “
यासीन मलिक की भूमिका सिर्फ अपहरण तक सीमित नहीं थी। वह जेकेएलएफ का चेहरा था, जो पाकिस्तान समर्थित आतंक को कश्मीर में फैला रहा था। मलिक ने अपहरण को एक राजनीतिक हथियार बनाया। रिहाई के बाद रिहा हुए आतंकी जैसे अली मोहम्मद मीर, मोहम्मद यासिन फतेह और इकबाल अहमद गंदरू ने जेकेएलएफ को नई ताकत दी। मलिक ने इन्हें हथियारों से लैस किया और हमलों की साजिशें रचीं।
मलिक की गिरफ्तारी के बाद दोबारा खुली फाइल
साल 2019 में मलिक की गिरफ्तारी के बाद सीबीआई ने पुरानी फाइलें खोलीं। जनवरी 2024 में मलिक समेत 10 के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई। इसमें अपहरण, साजिश और बंधक बनाने के आरोप हैं। अब उम्रकैद की सजा काट रहे आतंकी मलिक ने कभी अपराध नहीं माना, लेकिन गवाहों के बयानों ने उसे आखिरकार न्याय के कटघरे में खड़ा कर दिया।
रूबिया अपहरण केस के बाद कश्मीर में हिंदुओं पर हुआ जुल्म
इस अपहरण ने कश्मीर में आतंकवाद को तेजी से बढ़ावा दिया। पहले कश्मीर में अलगाववाद था, लेकिन 1989 के बाद यह हिंसा का सैलाब बन गया। रिहा हुए आतंकियों ने नई भर्तियाँ कीं, हथियारों का जखीरा बढ़ाया। विशेषज्ञ कहते हैं कि इस सौदे ने आतंकियों को संदेश दिया- सरकार झुक सकती है। नतीजा? 1990 में कश्मीरी पंडितों का पलायन शुरू हो गया।
जेकेएलएफ ने हिंदू परिवारों पर हमले किए, हजारों घर जलाए। मलिक पर कश्मीरी पंडितों के नरसंहार का भी आरोप है। सरकार ने 2019 में जेकेएलएफ को आतंकी संगठन घोषित किया। गृह मंत्रालय ने कहा, “यह संगठन 1989 के पंडित जेनोसाइड, आईएएफ अधिकारियों की हत्या और रूबिया अपहरण के लिए जिम्मेदार है।”
कश्मीर में आई अपहरण की बाढ़, हर तरफ आतंकी ही आतंकी
अपहरण के बाद किडनैपिंग की होड़ लग गई। 1991 में आईएएस अधिकारी ए.के. भट्टाचार्य का बेटा अपहरण हुआ। 1992 में वीसी चिल्टन का बेटा। ये सभी जेकेएलएफ की साजिशें थीं। मलिक ने इनसे फंडिंग और हथियार जुटाए। कश्मीर घाटी में ग्रेनेड हमले, सड़क किनारे बम विस्फोट आम हो गए। 1989 से 1990 के बीच आतंकी घटनाएं दोगुनी हो गईं।
पीआईबी के अनुसार, 1989 में 200 से ज्यादा हमले हुए, जो 1990 में 1000 पार कर गए। मलिक की रणनीति थी- हाई-प्रोफाइल टारगेट चुनो, सरकार को मजबूर करो। इसने अलगाववाद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाकर पाकिस्तान को मजबूत किया।
कश्मीर में आतंकवाद के बढ़ने की वजह सिर्फ अपहरण नहीं, बल्कि मलिक जैसी साजिशें थीं। 1989 के बाद जेकेएलएफ ने आईएएफ के चार अधिकारियों की हत्या की। मलिक पर यह केस भी चल रहा है। एनआईए ने 2019 में मलिक को टेरर फंडिंग में उम्रकैद दी। ओपन मैगजीन के अनुसार, मलिक ने अपहरण से कश्मीर को ‘कॉन्सपिरेटर’ बना दिया।
इस अपहरण कांड के बाद बढ़ा था कश्मीर में आतंकवाद
सीबीआई की यह कार्रवाई दिखाती है कि कानून कभी सोता नहीं। शुंगलू की पूछताछ से बाकी फरार जैसे अली मोहम्मद मीर तक पहुँच बन सकती है। मलिक की साजिश ने कश्मीर को आग में झोंक दिया, लेकिन अब न्याय की बारी है। कश्मीर के इतिहासकार कहते हैं कि अपहरण ने ‘अलगाववाद से आतंकवाद’ का रास्ता खोला। 1990 में 1 लाख पंडित बेघर हुए। जेकेएलएफ ने 1000 से ज्यादा हमले किए। मलिक ने पाकिस्तान से ट्रेनिंग ली, हथियार मँगवाए।
बहरहाल, ताजा गिरफ्तारी से केस में नया मोड़ आ गया है। शफत अहमद शुंगलू पर अपहरण में सहयोग का आरोप है। एक चश्मदीद गवाह ने कहा, “मैंने 1989 के बाद सोपोर में शुंगलू को देखा।” कुछ आरोपित धारा 164 के तहत जुर्म कबूल कर चुके हैं। वहीं, सीबीआई इस केस को टाडा कोर्ट में चला रही है। जिसमें जनवरी 2021 में कोर्ट ने मलिक समेत 10 के खिलाफ आरोप तय किए थे। अब अगली सुनवाई में शुंगलू की भूमिका खुल सकती है।
1 दिसंबर 2025 को लोकसभा और राज्यसभा का शीतकालीन सत्र शुरू हुआ। उम्मीद थी कि सत्र की शुरुआत जनहित, विकास और आवश्यक कानूनों पर गंभीर चर्चा से होगी, लेकिन शुरुआत होते ही सदन शोर-शराबे में डूब गया।
इस हंगामे का केंद्र था SIR यानी Special Intensive Revision, जो वोटर-लिस्ट के पुनरीक्षण की प्रक्रिया है। विपक्ष का आरोप है कि SIR में गड़बड़ी हुई है और यह लोकतांत्रिक अधिकारों से छेड़छाड़ का मामला है, इसलिए इसे संसद में उठाया जाना चाहिए। दूसरी ओर, केंद्र सरकार का कहना है कि SIR एक प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसे चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत किया जाता है, इसलिए यह संसद में चर्चा का विषय नहीं हो सकता।
असल सवाल यह है कि अगर SIR इतना ही गंभीर मुद्दा था, तो विपक्ष ने इसे पहले क्यों नहीं उठाया? क्यों हमेशा की तरह वही सियासी नाटक, वही टकराव ठीक उस दिन शुरू होता है जब संसद सत्र खुलता है? यह लोकतांत्रिक चिंता कम और राजनीतिक रणनीति ज्यादा लगती है। विपक्ष अक्सर सत्र से पहले जिस तैयारी का दावा करता है। वह हर बार सदन में हंगामे के रूप में सामने आती है।
विपक्ष के पास मुद्दों की कमी नहीं है। SIR, दिल्ली ब्लास्ट, प्रदूषण, महँगाई और बेरोजगारी जैसे विषय सूची में शामिल हैं। लेकिन, क्या ये मुद्दे वास्तव में जनता के लाभ के लिए उठाए जा रहे हैं, या सिर्फ राजनीतिक विरोध जताने के हथियार बन चुके हैं? विपक्ष का रवैया बताता है कि वह ‘जनहित’ से ज्यादा ‘राजनीतिक संदेश’ देने में दिलचस्पी रखता है। उद्देश्य यह नहीं कि सरकार से जवाब लिया जाए, बल्कि यह दिखाना कि सरकार जनता के खिलाफ काम कर रही है, चाहे तथ्य कुछ भी हों।
सत्ता पक्ष भी पीछे नहीं रहता। वह विपक्ष के हर आरोप को ‘हंगामा करने की आदत’ और ‘पुरानी पराजयों की बौखलाहट’ बता कर उसे खारिज कर देता है। लोकतंत्र केवल सत्ता पक्ष की सफाई या विपक्ष के आक्रोश का मंच नहीं है। यह देश के लिए वास्तविक समाधान खोजने की जगह है। जब सदन बार-बार ठप होता है, तो आम जनता का नुकसान होता है, किसी पार्टी का नहीं।
इस सत्र में सरकार कई अहम बिल लाने वाली है। एटॉमिक एनर्जी में सुधार, कॉर्पोरेट कानूनों में बदलाव, उच्च शिक्षा में सुधार और अन्य विकास संबंधी प्रस्ताव। ये ऐसे मुद्दे हैं, जो सीधे तौर पर देश की प्रगति से जुड़े हुए हैं। लेकिन अगर सदन SIR पर हंगामे में ही फंस गया, तो इन कानूनों पर चर्चा का क्या होगा? संसद का समय सीमित होता है, लेकिन सियासत की भूख असीमित।
विपक्ष की भूमिका केवल आलोचना करना नहीं है। लोकतंत्र में विपक्ष की असली ताकत उसकी रचनात्मकता, तर्क, और जनता की वास्तविक आवाज़ उठाने की क्षमता में होती है। लेकिन जब हर मुद्दे पर हंगामा किया जाए, हर चर्चा को शोर में बदल दिया जाए, और हर सत्र को लड़ाई का मैदान बना दिया जाए, तो यह लोकतांत्रिक संस्कृति को कमजोर करता है। विपक्ष का काम सरकार को जवाबदेह बनाना है, न कि सदन को बंधक बनाना।
SIR पर विपक्ष के सवाल गलत नहीं हैं। वोटर-लिस्ट की शुचिता महत्वपूर्ण है। लेकिन तरीका भी महत्वपूर्ण होता है। क्या संसद में हंगामा ही एकमात्र तरीका है? क्या अदालतें, चुनाव आयोग, संसदीय समितियां या आधिकारिक शिकायतें पर्याप्त नहीं? जवाब है हैं, लेकिन राजनीति में शोर, कैमरे और सुर्खियाँ अक्सर समाधान से ज्यादा आकर्षक लगते हैं।
सत्ता पक्ष की भी जिम्मेदारी है कि वह विपक्ष की आशंकाओं को पूरी तरह नजरअंदाज न करे। लोकतंत्र में संवाद ही रास्ता है। लेकिन संवाद तभी संभव है, जब दोनों पक्ष तैयार हों और दुर्भाग्य से यह तैयारी अक्सर दिखाई नहीं देती।
इस शीतकालीन सत्र की शुरुआत ने फिर साबित कर दिया कि हमारी संसद अब विचारों का मंच कम और सियासत का रंगमंच ज्यादा बन गई है। यहाँ नाटक है, स्क्रिप्ट है, अभिनेता हैं बस गायब है जनता का हित। अगर सरकार और विपक्ष दोनों यह नहीं समझेंगे कि संसद राष्ट्रहित के लिए है, पार्टीहित के लिए नहीं, तो हर सत्र इसी तरह हंगामे में बीतेगा और विकास पीछे छूटता जाएगा।
भारत की जनता अब यह नाटक रोज-रोज देखने की आदी हो चुकी है। लेकिन आदी होना समाधान नहीं है। असली सवाल है क्या हमारा लोकतंत्र केवल सियासी प्रदर्शन का मंच बनता जाएगा, या कभी वास्तविक जनहित की राजनीति भी इसमें जगह पाएगी?
यह सत्र उस सवाल का जवाब देगा अगर सदन चलने दिया गया तो।
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में जबरन धर्म परिवर्तन का एक परेशान करने वाला मामला सामने आया है। एक हिंदू युवक जिसका नाम शुभम गोस्वामी है, उसे 2022 में एक मुस्लिम लड़की से प्यार हो गया था। इसके बाद उसे इस्लाम कबूल करने के लिए मजबूर किया गया और उसने मुस्लिम पहचान ‘अमान खान’ दी गई। शुभम ने अब कहा है कि वह हिंदू धर्म में वापस लौटना चाहता है। इसके लिए वह एक जन शिकायत कार्यक्रम के दौरान मंत्री विश्वास कैलाश सारंग से भी मिला है।
शुभम ने उस मुस्लिम लड़की के परिवार द्वारा की गई जबरदस्ती, धार्मिक दबाव और धमकी की डरावनी कहानी सुनाई, जिस लड़की के साथ उसके कभी रिश्ते थे।
मीडिया से बात करते हुए सारंग ने कहा कि शुभम की बातें सुनना दिल दहला देने वाली थी। उन्होंने आश्वासन दिया कि राज्य सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि शुभम को उचित घर वापसी के जरिए अपनी पहचान वापस हासिल करने की इजाजत मिले। मंत्री ने कहा कि यह मामला दिखाता है कि राज्य के लिए जबरन धार्मिक परिवर्तन के खिलाफ कानून बनाना क्यों जरूरी है।
'लव जिहाद से पीड़ित' हिन्दू युवक की कराएंगे घर-वापसी…
शुभम पर सिर्फ धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डाला गया ही नहीं, बल्कि उसे ऐसी स्थिति में धकेल दिया गया जहाँ उसकी पहचान, सामाजिक स्थिति और मानसिक स्वास्थ्य को व्यवस्थित तरीके से तोड़ा गया। जिस परिवार ने शुभम को निशाना बनाया, उसने उसके खिलाफ झूठे केस दर्ज कराए, उसे इस्लाम कबूल करने के लिए मजबूर किया और यहाँ तक कि समाज में खुद को कैसे पेश करना है, उस पर भी नियंत्रण रखा।
ऑपइंडिया ने इस मामले से जुड़े एफआईआर और कोर्ट दस्तावेजों को हासिल किया है, जिसमें से चौंकाने वाली बातें निकल कर सामने आई हैं।
जबरन इस्लाम कबूल कराया, जमात भेजा और गोमांस खिलाया
शुभम गोस्वामी अपने 2 दोस्तों के साथ 20 नवंबर 2025 को जहाँगीराबाद पुलिस स्टेशन पहुँचा। वहाँ उसने अब्दुल नईम, उसके बेटे अब्दुल नदीम और उसकी बीवी शामा के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। उसकी शिकायत के आधार पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 3(5) और 251(2) तथा मध्य प्रदेश धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2021 की धारा 3 और 5 के तहत एफआईआर दर्ज की गई।
सोर्स -मध्य प्रदेश पुलिस
अपनी शिकायत में शुभम ने कहा कि वह हिंदू ब्राह्मण है और 2022 के अंत में एक मुस्लिम लड़की के साथ उसके रिश्ते हो गए। उसने कहा कि यह रिश्ता लड़की के परिवार को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होंने उसके खिलाफ अपहरण और बलात्कार के आरोपों के तहत केस दर्ज कराया, जिसमें पॉक्सो एक्ट के प्रावधान भी शामिल थे।
चूँकि केस गंभीर धाराओं के तहत दर्ज हुआ था, इसलिए उसे गिरफ्तार कर लिया गया और वह लगभग चार महीने जेल में रहा। आखिरकार उसे जमानत पर रिहा किया गया लेकिन इस मामले में आपराधिक कार्रवाई जारी है और अगली सुनवाई भोपाल जिला कोर्ट में 22 दिसंबर 2025 को निर्धारित है।
उसने जोर देकर कहा कि भले ही उनके दबाव में उसने इस्लाम कबूल कर लिया और लड़की से शादी करने पर राजी हो गया, लेकिन POCSO केस कभी वापस नहीं लिया गया और वह अभी भी भोपाल की कोर्ट में चल रहा है।
शुभम को इस्लाम कबूल करने के लिए कैसे मजबूर किया गया
एफआईआर में शुभम ने बताया कि जेल से रिहा होने के बाद उसके परिवार ने उसे एक हिंदू लड़की से शादी कराने का फैसला किया और इसके लिए तैयारियाँ शुरू हो गईं। लेकिन इल्मा ने उससे संपर्क किया और कहा कि उसने उसकी जिंदगी बर्बाद कर दी है और उसे उससे शादी करनी ही होगी। एक कोर्ट की पेशी के दौरान वह उसके अब्बू-अम्मी अब्दुल नईम और शमा से मिला, जिन्होंने कहा कि बलात्कार का केस तभी वापस लिया जाएगा जब वह पूरी तरह हिंदू धर्म छोड़ दे और इस्लाम कबूल कर ले।
एफआईआर की कॉपी
शुभम ने शुरुआत में विरोध किया लेकिन अगले दो महीनों तक नईम और उसके बेटे अब्दुल नदीम ने उसे बार-बार धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डाला। आखिरकार वह टूट गया और मार्च 2023 में आम वाली मस्जिद में इस्लाम कबूल कर लिया।
धर्म परिवर्तन के बाद उसे तुरंत रायसेन में तीन दिनों की जमात में भेज दिया गया। उसके बाद उसे नियमित रूप से मस्जिद में नमाज पढ़ने और इस्लामी धार्मिक गतिविधियों में हिस्सा लेने के निर्देश दिए जाते रहे। जब उसने लड़की के अम्मी-अब्बू से पूछा कि अब तो उसे लड़की से शादी करने की इजाजत मिल जानी चाहिए, तो उसे कर्नाटक में 130 दिनों की जमात भेज दिया गया। उस दौरान शुभम को गोमांस खाने के लिए मजबूर किया गया।
शुभम गोस्वामी ने कहा कि उसने लगभग तीन साल परिवार से दूर एक मुस्लिम इलाके में अमान खान की पहचान के साथ गुजारे। इस दौरान सहन की गई भावनात्मक, सामाजिक और आर्थिक परेशानियों ने उसे मानसिक रूप से थका दिया।
मुस्लिम बनाने के बाद भी इल्मा से नहीं कराया निकाह, वापस हिंदू न बने- दी धमकियाँ
शुभम गोस्वामी ने कहा कि इस्लाम कबूल करने के बाद उसने लड़की के परिवार से बार-बार अनुरोध किया कि वे अपना वादा निभाएँ और उसे लड़की से शादी करने दें। इसके बजाय उन्होंने मामला बार-बार टालते रहे और बाद में कहा कि वे उसे किसी दूसरी मुस्लिम महिला से निकाह करा देंगे।
एफआईआर की कॉपी
शुभन ने जब जिद की कि वह तो सिर्फ उसी लड़की से शादी करेगा जिसके साथ उसके रिश्ते थे, तो परिवार ने उसे धमकियाँ देनी शुरू कर दीं। उसने कहा कि उन्होंने चेतावनी दी कि अगर वह हिंदू धर्म में वापस लौटने की कोशिश करेगा या अपने समाज के लोगों से संपर्क करेगा, तो वे उसे और उसके रिश्तेदारों को मार देंगे।
शुभम के खिलाफ लंबित केस को लगातार उसके दबाव में इस्तेमाल किया जाता रहा, जिससे वह उनके प्रभाव में बना रहा।
लड़की के परिवार के सदस्यों को कोर्ट ने नहीं दी जमानत
नईम, नदीम और शमा के खिलाफ दर्ज एफआईआर के बाद इस तिकड़ी को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया गया। उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। उनके बचाव में भोपाल जिला कोर्ट में जमानत याचिका दाखिल की गई जो 24 नवंबर 2025 को जस्टिस पंकज कुमार जैन ने खारिज कर दी।
अपने आदेश में कोर्ट ने नोट किया कि आरोपितों के खिलाफ लगे आरोप गंभीर प्रकृति के हैं। जाँच की शुरुआत में पाई गई जानकारियों से पता चलता है कि आरोपितों की जबरन शुभम को इस्लाम कबूल कराने में प्रथम दृष्टया भूमिका थी।
कोर्ट ने देखा कि यह मामला ऐसे कार्यों से जुड़ा है जो अपनी प्रकृति से सामाजिक सद्भाव को प्रभावित कर सकते हैं, क्योंकि आरोप सीधे धार्मिक जबरदस्ती और हिंदू धर्म अपनाने से रोकने के लिए दी गई धमकियों से जुड़े हैं। जज ने कहा कि हिंदू बनने की कोशिश में शुभम और उसके परिवार को मारने की धमकी के आरोप काफी गंभीर हैं। इन्हें हल्के में नहीं ले सकते।
भोपाल जिला कोर्ट के फैसले की कॉपी
जज ने देखा कि सांप्रदायिक संवेदनशीलताओं को देखते हुए इस मामले में शांति और सामाजिक स्थिरता को बिगाड़ने की संभावना है। यह भी नोट किया गया कि जाँच अभी चल रही है और इस चरण में आरोपितों को रिहा करने से गवाहों के साथ हस्तक्षेप या सबूतों से छेड़छाड़ हो सकती है। इन आधारों पर कोर्ट ने जमानत देना उचित नहीं समझा।
बर्बाद कर देने वाले 3 साल
उन तीन सालों के दौरान जब शुभम ‘अमान खान’ के रूप में रहा, उसे उसकी पहचान, कम्युनिटी और स्थिरता से दूर कर दिया गया। उसने अपनी नौकरी खो दी, परिवार ने उसे छोड़ दिया और वह लगातार डर में जीता रहा कि उसके खिलाफ केस फिर से इस्तेमाल हो सकता है।
शुभम ने अपनी पीड़िता जाहिर करते हुए बताया कि एक मुस्लिम पड़ोस में रहना, रोजाना मस्जिदों में जाना और ऐसी मजहबी प्रथाओं का पालन करना पड़ता था, जिसे उसने अपनी मर्जी से नहीं चुना था। शुभम ने कहा है कि वो जल्द घर वापसी कर सनातन में लौट आएगा और अपनी असली पहचान हासिल करेगा।
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पाकिस्तान में नवनिर्मित चीफ ऑफ डिफेन्स फोर्सेज (CDF) पद को लेकर संवैधानिक संकट और राजनीतिक अविश्वास तेजी से बढ़ता जा रहा है। इस मुद्दे की जड़ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ द्वारा फील्ड मार्शल असीम मुनीर की CDF पद के लिए अनिवार्य नियुक्ति नोटिफिकेशन पर हस्ताक्षर न करना है, जिससे शीर्ष सैन्य नेतृत्व की नई नियुक्ति सवालों के घेरे में आ गए है।
नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजरी बोर्ड के पूर्व सदस्य तिलक देवेशर के अनुसार, पीएम शरीफ जानबूझकर देश से बाहर हैं ताकि वे उन्हें इस नियुक्ति आदेश पर हस्ताक्षर न करें। ANI से बातचीत में उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री पहले बहरीन गए और फिर लंदन पहुंच गए जिससे इस अंदेशे को और बल मिला कि वो फैसले से बचने की कोशिश कर रहे हैं।
पाकिस्तान की मीडिया ने दावा किया है कि शनिवार को पाकिस्तान लौटने वाले शरीफ ने लंदन में मेडिकल जाँच के बाद ब्रिटेन का अपना दौरा बढ़ा लिया है। पाक मीडिया के मुताबिक, पहले उनका चार दिवसीय निजी दौरा रविवार को पूरा करके पाकिस्तान लौटने का कार्यक्रम था लेकिन अब वे सोमवार दोपहर लंदन से इस्लामाबाद के लिए रवाना होंगे।
29 नवंबर को मुनीर का तीन वर्षीय कार्यकाल समाप्त हो चुका है और नए पद के तहत पाँच वर्ष की मियाद तय करने के लिए आधिकारिक नोटिफिकेशन की जरूरत थी। इस बीच फौज के भीतर भी शीर्ष पदों को लेकर खींचतान की खबरें आ रही हैं।
रक्षा मंत्री ने किया सब सही होने का दावा
हालाँकि, पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने फौज और सरकार के बीच समन्वय होने के संकेत दिए हैं। रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि रक्षा बलों के CDF की नियुक्ति संबंधी अधिसूचना उचित समय पर जारी की जाएगी और इसके लिए प्रक्रिया शुरू हो गई है। आसिफ ने कहा, “प्रक्रिया शुरू हो गई है। प्रधानमंत्री जल्द ही लौट रहे हैं। अधिसूचना उचित समय पर जारी की जाएगी।”
There is unnecessary and irresponsible speculation about CDF notification. Please be informed that the process has been initiated. PM is returning shortly. Notification will be issued in due course of time. No room for any conjecturing. Period!
29 नवंबर की अहम समय-सीमा निकल चुकी है लेकिन पाकिस्तान सरकार अब तक देश के पहले (CDF) की नियुक्ति का नोटिफिकेशन जारी नहीं कर सकी है। यह वही नई दोहरी जिम्मेदारी वाला पद है, जिसे 27वें संविधान संशोधन के तहत बनाया गया था और जिसके साथ ही चेयरमैन ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी (CJCSC) का पद 27 नवंबर को खत्म हो गया था।
माना जा रहा था कि CJCSC पद की समाप्ति के साथ ही CDF का नोटिफिकेशन जारी हो जाएगा। इसलिए क्योंकि 29 नवंबर ही वह तारीख थी जब माना जा रहा था कि फील्ड मार्शल मुनीर के आर्मी चीफ के कार्यकाल के तीन साल पूरे हो रहे हैं। इसी वजह से कानूनी हलकों में यह बहस उठी कि अगर नया आदेश नहीं आया, तो क्या उनकी मौजूदा जिम्मेदारी खत्म मानी जा सकती है?
2024 में पाकिस्तान आर्मी एक्ट में किए गए बदलाव ने फौज के प्रमुखों का कार्यकाल तीन साल से बढ़ाकर पाँच साल कर दिया। कानून में जो क्लॉज जोड़ा गया था उसमें यह माना गया कि यह संशोधन हमेशा से ही कानून का हिस्सा माना जाएगा। यानि कई कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, कार्यकाल जारी रखने के लिए सरकार के किसी नए नोटिफिकेशन की जरूरत नहीं थी।
हालाँकि, यह बात लगभग तय मानी जा रही है कि CDF एक नया पद है और इसकी नियुक्ति बिना सरकारी नोटिफिकेशन के संभव नहीं। कानून के मुताबिक अब पाँच साल तक फौज के प्रमुख और CDF दोनों भूमिकाएँ एक ही व्यक्ति निभाएगा। यानी फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को औपचारिक रूप से नया आदेश जारी कर CDF नामित करना होगा।
अब इस पर सरकारी चुप्पी को राजनीतिक असहमति के रूप में देखा जा रहा है। चर्चा में बताया जा रहा है कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि CDF/COAS के पाँच साल का कार्यकाल किस तारीख से गिना जाए। नवंबर 2022 यानी जब आसिम मुनीर ने कमान संभाली या नवंबर 2025 जिसे इस नए कानून के बाद की तारीख से जोड़ा जा रहा है।
CJCSC पद हटने के बाद अब नेशनल स्ट्रेटेजिक कमांड के नए प्रमुख की नियुक्ति भी लंबित है। यह परमाणु नियंत्रण-संबंधी जिम्मेदारी संभालेगा जो पहले CJCSC के पास मौजूद थी। अब माना जा रहा है कि यह नियुक्ति शायद तभी होगी जब CDF का नोटिफिकेशन जारी किया जाएगा।
वहीं, नेशनल कमांड अथॉरिटी (NCA) कानून में भी बदलाव जरूरी है ताकि नए ढाँचे में CDF और NSC कमांडर की स्थिति स्पष्ट हो सके। बड़ा सवाल यह भी है कि आगे वायुसेना और नौसेना प्रमुखों को NCA में कितनी भूमिका मिलेगी और क्या रणनीतिक कमान उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर हो जाएगी।
फौज के भीतर ही बढ़ेगा बवाल
अगर यह नोटिफिकेशन आता है तो CDF की भूमिका सँभालने के बाद फील्ड मार्शल मुनीर सभी सर्विस ब्रांच को सीधे उनके कमांड में रखेंगे। इसका सीधा अर्थ है कि पूरे मिलिट्री स्ट्रक्चर पर आर्मी का पूरा दबदबा होगा। इस बात की पूरी संभावना है कि इसके बाद फौज के भीतर ही गुस्सा बढ़े या कई सर्विस के बीच दुश्मनी सामने आए। यह बदलाव टॉप मिलिट्री लीडर्स को खास अधिकार और सुरक्षा देकर डेमोक्रेटिक जवाबदेही को भी कमजोर कर रहा है।
दुनिया की सबसे प्राचीन नगरी वाराणसी और सबसे पुरानी भाषा तमिल का अद्भुत संगम ‘काशी तमिल संगमम्’ के चौथे संस्करण का आयोजन करने के लिए वाराणसी पूरी तरह तैयार है।
एक ओर पूरे भारत को अपने आप में समेटे हमारी सांस्कृतिक राजधानी कही जाने वाली काशी है तो दूसरी ओर भारत की प्राचीनता और गौरव का केंद्र हमारा तमिलनाडु और तमिल संस्कृति है। ये संगम गंगा-यमुना के संगम जितना ही पवित्र है। सदियों पुरानी इस रिश्ते को पीएम मोदी ने नया मंच दिया और देश के दो महान संस्कृति के संगम की परिकल्पना की।
उच्च शिक्षा विभाग के सचिव डॉ. विनीत जोशी (@Vineet_K26) ने बताया कि इस वर्ष काशी तमिल संगमम् 4.0 में तीन नई पहल होने जा रही हैं—पहली, तमिलनाडु के शिक्षक काशी आकर छात्रों को तमिल भाषा सिखाएंगे; दूसरी, काशी के छात्र तमिलनाडु जाकर तमिल सीखेंगे; और तीसरी, Sage Agasthya Vehicle… pic.twitter.com/Sy50Cz1Xyl
काशी तमिल संगमम् में जनता से पीएम मोदी ने बड़ी संख्या में शामिल होने की अपील की। उन्होंने कहा कि विश्व की सबसे पुरानी भाषा तमिल और दुनिया के सबसे प्राचीन शहरों में एक वाराणसी का अद्भुत संगम है।
काशी तमिल संगमम् 2 दिसंबर से काशी नमो घाट पर शुरू हो रहा है। यह एक ऐसा मंच है जहाँ तमिल भाषा से प्रेम करने वाले पहुँचते हैं। इस आयोजन से वाराणसी के लोगों को भी नया अनुभव मिलता है।
पीएम मोदी ने कहा कि ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की भावना को मजबूत करने वाला यह कार्यक्रम दरअसल देश की एकता और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने का मार्ग है।
2 दिसंबर से काशी के नमो घाट पर शुरू हो रहे काशी-तमिल संगमम की थीम बहुत ही रोचक है – Learn Tamil – तमिल करकलम्
तमिल भाषा साहित्य में काशी और बाबा विश्वनाथ के प्रति अगाध श्रद्धा देखी जा सकती है। तमिल राजा काशी की यात्रा पर आया करते थे। 2300 साल पहले भी तमिलनाडु के नगर ग्रामों की गलियाँ काशी का बखाने करने वाले गीतों से गूँजा करती थीं।
कहा जाता है कि प्रथम तमिल संगम मदुरै में हुआ था जो पाण्ड्य राजाओं की राजधानी थी और उस समय अगस्त्य, शिव, मुरुगवेल आदि विद्वानों ने इसमें हिस्सा लिया था। इसके बाद जो द्वितीय संगम हुआ उसका केंद्र कपातपुरम में था। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में भारतीय प्राच्य इतिहास के प्रोफेसर रह चुके डॉक्टर विशुद्घानंद पाठक के मुताबिक, कपातपुरम का संगम ही इतिहास का सबसे बड़ा संगम था और उसमें उत्तर और दक्षिण के विद्वानों ने संगति की थी।
तमिल भाषा तो इतनी समृद्ध है कि इस भाषा में ‘अगटिटयम अगस्त्यम’ नामक एक व्याकरण ग्रन्थ का उल्लेख मिलता है, जिसका रचना काल ईसा पूर्व का है।
15वीं शताब्दी में दक्षिण के राजा पराक्रम पांड्या भगवान शिव का एक मंदिर बनाना चाहते थे और काशी जाकर वे शिवलिंग लेकर आए थे। वहाँ से लौटते समय वे रास्ते में एक पेड़ के नीचे विश्राम करने के लिये रुके और फिर जब उन्होंने यात्रा हेतु आगे बढ़ने की कोशिश की तो शिवलिंग ले जा रही गाय ने आगे बढ़ने से बिल्कुल मना कर दिया।
पराक्रम पंड्या ने इसे भगवान की इच्छा समझा और शिवलिंग को वहीं स्थापित कर दिया। इसे बाद में शिवकाशी नाम दिया गया। तमिलनाडु के जो भक्त काशी नहीं जा सकते थे, उनके लिये पांड्यों ने काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था, जो आज दक्षिण-पश्चिमी तमिलनाडु में तेनकाशी के नाम से जाना जाता है। ये तमिलनाडु और केरल से सटे सीमा पर मौजूद है।
2022 में हुआ पहला संगमम्
काशी तमिल संगमम् की शुरुआत 2022 में हुई। उस वक्त करीब 10 हजार तमिल प्रतिनिधि काशी पहुँचे थे। 19 नवंबर 2022 को इसकी औपचारिक शुरुआत पीएम मोदी ने की थी। उन्होंने दुनिया के सबसे प्राचीन भाषा तमिल को लेकर कहा था कि दुनिया जिसका गुणगान करती है, हम उसके गौरवगान में पीछे रह जाते हैं।
2023 में हुआ दूसरा संगमम्
दिसंबर 2023 में वाराणसी के नमो घाट पर दूसरा तमिल काशी संगमम् का आयोजन किया गया। इस सांस्कृतिक उत्सव के महत्व को बताते हुए पीएम मोदी ने कहा कि तमिल संगमम का मकसद तमिलनाडु और काशी, देश की दो सबसे जरूरी और पुरानी शिक्षा की जगहों के बीच सदियों पुराने रिश्तों को सेलिब्रेट करना, उन्हें पक्का करना और फिर से खोजना है। इस मौके पर वाराणसी तमिल संगमम् ट्रेन को हरी झंडी दिखाई और थिरुक्कुरल, मणिमेकलाई और दूसरे क्लासिक तमिल साहित्य के मल्टी लैंग्वेज और ब्रेल ट्रांसलेशन लॉन्च किया गया।
2025 में तीसरा संगमम्
15 फरवरी से 24 फरवरी को नमो घाट पर तीसरा काशी तमिल संगमम् का आयोजन किया गया। इसका मकसद दोनों प्राचीन सभ्यताओं का उत्सव मना और उसे मजबूत करना है। मंच काशी और तमिल के विद्वानों, विद्यार्थियों, दार्शनिकों, व्यापारियों, कारीगरों, कलाकारों को एक साथ आने और अपने अनुभवों को साझा करने का अवसर प्रदान करता है।
दिसंबर 2025 में ही काशी तमिल संगमम् 4 का आयोजन किया गया है। इसका आयोजन भारत सरकार का शिक्षा मंत्रालय और बीएचयू कर रहा है। 2 दिसंबर से 16 दिसंबर तक इस समागम में 10 हजार से ज्यादा तमिल प्रतिमिधियों के पहुँचने का अनुमान है।
काशी तमिल संगमग इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वाराणसी में काशी विश्वनाथ विराजमान हैं तो तमिलनाडु के रामेश्वरम में भगवान रामेश्वरम। दोनों जगह शिवमय है। दोनों ही जगहों पर संगीत, साहित्य और कला का अद्भुत संगम है।
केंद्र सरकार गुटखा और पान मसाला उद्योग पर सख्ती बढ़ाने जा रही है। इसके लिए ‘हेल्थ सिक्योरिटी से नेशनल सिक्योरिटी सेस बिल 2025’ लाया जा रहा है, जिसका उद्देश्य स्वास्थ्य और सुरक्षा पर अतिरिक्त फंड जुटाना है। संसद का शीतकालीन सत्र आज यानी सोमवार (1 दिसंबर 2025) से शुरू हुआ है, जिसमें वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण यह बिल लोकसभा में पेश करेंगी।
नए बिल में तंबाकू उत्पादों पर 40% GST के अलावा 70% या उससे अधिक सेस लगाने का प्रावधान है। वहीं, सिगरेट पर अलग से प्रति 1000 स्टिक पर 2,700 रुपए से लेकर 11,000 रुपए तक विशेष सेस लगाया जाएगा, जो उनकी लंबाई पर निर्भर होगा।
सरकार का मानना है कि ओवरऑल सेस व्यवस्था को बदलने का यह कदम जरूरी है, ताकि आने वाले समय में कंपेंसेशन सेस खत्म होने के बाद भी टैक्स राजस्व में कमी न आए।
क्या कहता है बिल और क्यों लाया गया?
सरकार का मानना है कि गुटखा, पान मसाला और तंबाकू उत्पादों के कारण होने वाली बीमारियों और उससे जुड़े राष्ट्रीय स्वास्थ्य खर्च में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। इसी चुनौती से निपटने और सुरक्षा-संबंधी जरूरतों के लिए अतिरिक्त राजस्व जुटाने के उद्देश्य से इस बिल को शीतकालीन सत्र में पेश किए जाने की तैयारी है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण यह बिल लोकसभा में पेश करेंगी।
सरकार का दावा है कि यह कदम तंबाकू नियंत्रण की दिशा में अब तक की सबसे सख्त वित्तीय नीति हो सकती है, जिसके जरिए न केवल स्वास्थ्य जोखिम कम होंगे बल्कि सुरक्षा ढाँचे को मजबूत करने के लिए भी धन उपलब्ध होगा।
सेस कैसे लगेगा और क्या बदलेगा?
इस बिल के तहत सेस मौजूदा GST व्यवस्था में बदलाव के साथ लागू किया जाएगा। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब टैक्स उत्पादन की वास्तविक मात्रा पर नहीं बल्कि मशीन की अधिकतम उत्पादन क्षमता पर आधारित होगा।
यानि चाहे फैक्ट्री कम उत्पादन करे या अधिक, भुगतान मशीन की क्षमता के आधार पर करना होगा। इसका अर्थ है कि टैक्स चोरी या कम उत्पादन दिखाकर बच निकलने की संभावना लगभग खत्म हो जाएगी।
हाथ से बनने वाले पान मसाला और गुटखे पर भी पहले की तरह मात्रा आधारित टैक्स के बजाय हर महीने एक निश्चित राशि का सेस देना अनिवार्य होगा। यह मॉडल पहले बीड़ी उद्योग में लागू किया गया था और अब इसे इस सेक्टर में लागू किया जा रहा है।
नियम, सजा और छूट के प्रावधान
नए कानून में सभी निर्माताओं के लिए अनिवार्य रजिस्ट्रेशन की शर्त रखी गई है। हर कंपनी को मासिक रिटर्न दाखिल करना होगा, जिसमें उत्पादन क्षमता और सेस भुगतान का ब्यौरा दर्ज रहेगा। सरकारी अधिकारी कभी भी फैक्ट्री का निरीक्षण, जाँच या ऑडिट कर सकेंगे ताकि नियमों का पालन सुनिश्चित हो सके।
यदि कोई निर्माता नियमों का उल्लंघन करता है, गलत जानकारी देता है या टैक्स चोरी करता है, तो उस पर 5 साल तक की जेल और भारी जुर्माना लगाया जा सकता है। इसके बावजूद कंपनियों को अपीलीय अधिकारियों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी अपील का अधिकार दिया जाएगा
बिल में एक राहत का प्रावधान भी शामिल किया गया है। यदि कोई मशीन या उत्पादन यूनिट लगातार 15 दिन या उससे अधिक बंद रहती है, तो उस अवधि के लिए सेस में छूट दी जाएगी। इससे मौसमी या छोटे उत्पादकों को कुछ राहत मिल सकती है।
इसके अलावा, सरकार के पास जरूरत पड़ने पर इस सेस को दोगुना करने का अधिकार भी होगा, जो आने वाले समय में इस उद्योग की लागत को और भारी बना सकता है।
उद्योग, बाजार और उपभोक्ताओं पर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बिल का सबसे सीधा असर गुटखा और पान मसाला उद्योग की लागत पर पड़ेगा। छोटे निर्माताओं के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो सकता है और कई स्थानीय यूनिटें बंद होने की संभावना है। बड़े ब्रांड शायद इस बढ़े हुए खर्च को कीमतों में बढ़ोतरी के रूप में ग्राहकों पर डाल देंगे।
हालाँकि, सरकार को उम्मीद है कि कीमत बढ़ने से इन उत्पादों की खपत घटेगी, जिससे जन स्वास्थ्य को फायदा होगा। साथ ही, सेस से जुटाई गई राशि राष्ट्रीय सुरक्षा परियोजनाओं और स्वास्थ्य योजनाओं पर खर्च की जाएगी, जो इसे दोहरे फायदे वाला कदम बनाती है।
निष्कर्ष
‘हेल्थ सिक्योरिटी से नेशनल सिक्योरिटी सेस बिल 2025’ तंबाकू उत्पाद उद्योग पर सरकार का अब तक का सबसे गंभीर वित्तीय हस्तक्षेप माना जा रहा है। यह केवल राजस्व जुटाने का तरीका नहीं बल्कि एक हेल्थ-केयर नीति है। इसके जरिए उपभोग पर नियंत्रण, पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देगी।
हालाँकि, इससे उद्योग पर आर्थिक दबाव बढ़ेगा और छोटे निर्माताओं के लिए चुनौतियाँ बढ़ेंगी लेकिन लंबे समय में यह कदम स्वास्थ्य-हानिकारक उत्पादों की उपलब्धता और खपत में कमी ला सकता है।
गृह मंत्रालय ने अमेरिकी क्रिश्चियन ईवेंजेलिस्ट फ्रैंकलिन ग्रैहम को वीजा देने से मना कर दिया है। वह रविवार (30 नवंबर 2025) को नगालैंड के कोहिमा में एक क्रिश्चियन कार्यक्रम में शामिल होने वाले थे।
अब उनकी यात्रा रद्द हो गई है, लेकिन कार्यक्रम आयोजित करने वाली संस्था ने कहा है कि इवेंट पहले की तरह जारी रहेगा। सरकार ने वीजा रद्द करने का कारण सार्वजनिक नहीं किया है, लेकिन माना जा रहा है कि भारत में फ्रैंकलिन ग्रैहम की पुरानी गतिविधियाँ, जिनमें उनकी संस्था ईसाई चैरिटी संगठन के जरिए किए जाने वाले धर्म परिवर्तन से जुड़े अभियान शामिल है, इस फैसले की वजह हो सकते हैं।
फ्रैंकलिन ग्राहम का भारत में लंबा इतिहास
पिछले कई दशकों में फ्रैंकलिन कई बार भारत आ चुके हैं। उनकी संस्था समैरिटंस पर्स देश में लंबे समय से धर्म परिवर्तन से जुड़ी गतिविधियों में शामिल रही है। यह संगठन मदद, राहत, भोजन वितरण और दूसरी सामग्री को सुसमाचार (ईसाई प्रचार) के साधन के रूप में इस्तेमाल करता रहा है। 1980 के दशक में इस संगठन ने भारत में एक हजार चर्च बनाने की योजना भी घोषित की थी और अपने अलग–अलग मिशन कार्यक्रमों के जरिए उसी दिशा में काम जारी रखा।
फ्रैंकलिन के पिता बिली ग्रैहम, 1950 के दशक में पहली बार भारत आए थे और उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से उनकी मुलाकात भी हुई थी। उनका गाँधी परिवार से भी जुड़ाव माना जाता है।
इन पुराने संबंधों को इसलिए याद किया जा रहा है क्योंकि नागालैंड प्रदेश कॉन्ग्रेस समिति ने केंद्र सरकार द्वारा फ्रैंकलिन को वीजा न देने के फैसले की खुले तौर पर आलोचना की है।
संस्थाओं ने वीजा न देने पर सरकार पर सवाल उठाए
नागालैंड संयुक्त क्रिश्चियन फोरम (NJCF), नेशनल पीपल्स पार्टी (NPP), चाखेसांग पब्लिक ऑर्गेनाइजेशन (CPO), नागालैंड प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी (NPCC) और कई अन्य संगठनों ने फ्रैंकलिन ग्रैहम की यात्रा रद्द होने और वीजा न मिलने पर निराशा जताई है।
NJCF ने ही यह कार्यक्रम आयोजित किया था जिसमें फ्रैंकलिन को शामिल होना था। वीजा विवाद के बावजूद NJCF ने साफ कहा कि कार्यक्रम पहले की तरह होगा और कोहिमा बैपटिस्ट पादरी संघ (Kohima Baptist Pastors’ Fellowship) के साथ मिलकर रविवार (30 नवंबर 2025) को इंदिरा गाँधी स्टेडियम में यह कार्यक्रम आयोजित किया गया। NJCF ने इसे एकता और उपासना का मौका बताया।
NPP ने भी केंद्र सरकार के फैसले पर चिंता जताई। पार्टी का कहना था कि स्थानीय चर्चों ने बड़े स्तर पर तैयारी की थी और हजारों ईसाई फ्रैंकलिन की यात्रा का इंतजार कर रहे थे। NPP ने कहा कि नागालैंड में ईसाई धर्म कोई औपचारिक पहचान नहीं बल्कि समाज और नैतिकता की रीढ़ है।
उनके मुताबिक, वीजा रद्द होने से भावनाएँ आहत हुई हैं और इससे यह सवाल उठता है कि ईसाई अल्पसंख्यकों के साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा है। पार्टी ने यह भी चेतावनी दी कि ऐसे फैसले बार-बार होने से अल्पसंख्यकों का लोकतांत्रिक संस्थानों पर भरोसा कमजोर हो सकता है।
CPO ने बयान जारी कर वीजा न देने को ईसाई समुदाय पर सीधी चोट बताया। इसके नेताओं वियूझू केहो और चेपेत्सो कोजा ने कहा कि यह फैसला उन लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँचाता है जो महीनों से प्रार्थना कर इस कार्यक्रम की तैयारी कर रहे थे।
CPO ने इस कार्यक्रम को नवीनीकरण और आध्यात्मिक जागृति के मौके के तौर पर देखा था। उन्होंने वीजा रद्द किए जाने को केंद्र द्वारा नागाओं के प्रति लंबे समय से चल रहे उपेक्षात्मक रवैये से जोड़ा और 1929 में नागा क्लब द्वारा साइमन कमीशन को दिए गए ज्ञापन का भी जिक्र किया।
उनका कहना था कि इस फैसले से भरोसे की कमी और पुराने घाव फिर उभर आए हैं और नागाओं के भविष्य को लेकर स्व-निर्णय के अधिकार का सम्मान होना चाहिए। CPO ने केंद्र से आग्रह किया कि नागालैंड की पहचान से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता और पारदर्शिता से काम लिया जाए।
NPCC ने भी वीजा न देने की कड़ी निंदा की और इसे भेदभावपूर्ण और ईसाई समुदाय का अपमान बताया। कॉन्ग्रेस ने कहा कि यह कदम BJP-RSS के धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति असहिष्णु रवैये को दिखाता है। NPCC ने सत्ताधारी गठबंधन की साथी पार्टी NPF पर भी आरोप लगाया कि उन्होंने अपने ही लोगों की चिंता पर चुप्पी साध ली और उनका पक्ष नहीं लिया।
फ्रैंकलिन ग्राहम ने हिंदू धर्म का मजाक उड़ाया
USA Today को 2010 में दिए एक इंटरव्यू में फ्रैंकलिन ग्रैहम ने हिंदू धर्म का मजाक उड़ाया था। उन्होंने कहा था कि “100 हाथों वाला कोई हाथी मेरे लिए कुछ नहीं कर सकता। उनके 9,000 देवता मुझे मुक्ति नहीं दिला सकते।”
उन्होंने यह भी कहा था कि “अगर हम सोचते हैं कि एक बड़ा कुंभाया जैसा मेल-मिलाप कर हाथ पकड़ लें तो दुनिया बेहतर हो जाएगी, ऐसा होने वाला नहीं है।” उनके ये बयान हिंदू आस्था को सीधी अवहेलना थे। उन्होंने भारत की प्राचीन और समृद्ध धार्मिक परंपरा को तिरस्कारपूर्ण ढंग से छोटे रूपों में पेश किया।
100 हाथों वाले हाथी जैसे वाक्य और 9,000 देवता का जिक्र करके उन्होंने सिर्फ मतभेद नहीं जताया, बल्कि हिंदू देवी-देवताओं का उपहास किया और कहा कि इनका कोई मूल्य या शक्ति नहीं है।
ग्रैहम की सोच कट्टर ईसाई प्रचारवादी विचार पर आधारित थी, जिसमें माना जाता है कि मुक्ति सिर्फ ईसाई धर्म से ही संभव है और बाकी सभी धार्मिक मार्ग गलत या बेकार हैं। जब उन्होंने कुंभाया जैसी एकता और मेल-जोल की अवधारणा का मजाक उड़ाया, तो यह धर्मों के बीच आपसी सम्मान और सौहार्द को भी खारिज करने जैसा था।
हिंदू धर्म पर उनका तंज उसी मिशनरी मानसिकता को दर्शाता है जो लंबे समय से भारत को निशाना बनाती रही है, एक ऐसी मानसिकता जो भारत की सभ्यता और परंपराओं को कमतर दिखाती है और धर्मातरण को आध्यात्मिक चिंता का नाम देकर आगे बढ़ाती है।
भारत में 1,000 चर्च बनाने का मिशन
फ्रैंकलिन 1984 में भारत आए थे ताकि एक चर्च की आधारशिला रख सकें। जनवरी 2020 में समैरिटन पर्स की वेबसाइट पर छपी एक रिपोर्ट में संगठन ने यह बात खुले तौर पर बताया और गर्व से दिखाया कि उसने भारत में अब तक 1,012 चर्च और 12 बाइबल स्कूल स्थापित किए हैं।
संगठन ने हिंदुओं को ईसाई धर्म की ओर आकर्षित करने के लिए वही पुराना तरीका अपनाया- बुनियादी सुविधाएँ, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ देकर लोगों तक पहुँचना। रिपोर्ट में यह भी लिखा था कि उनके ज्यादातर चर्चों में एक कुआँ बनाया गया, ताकि आसपास के हिंदू वहाँ आकर साफ पानी ले सकें।
रिपोर्ट के अनुसार, इस पानी के बहाने ईसाई प्रचार करने का मौका मिलता था। उन्होंने बाइबल के एक प्रसंग का हवाला देते हुए कहा कि जैसे यीशु ने एक सामरी स्त्री से कहा था, “यह पानी पीने वाला फिर प्यासा होगा, लेकिन जो पानी मैं देता हूँ उसे कभी प्यास नहीं लगेगी। वह पानी उसे अनन्त जीवन का स्रोत बना देगा।” रिपोर्ट में बताया गया कि पानी उपलब्ध कराना एक तरीका था ताकि लोगों को ईसाई संदेश सुनाया जा सके।
कोविड महामारी का इस्तेमाल लोगों को बदलने के लिए एक टूल के तौर पर करना
जैसा कई ईसाई प्रचारक करते हैं, फ्रैंकलिन ने भी महामारी के दौरान दावा किया कि सिर्फ ईसाई ईश्वर ही लोगों को इस बीमारी से बचा सकता है। मई 2020 में, जब भारत में कोविड तेजी से फैल रहा था, बिली ग्राहम इवेंजेलिस्टिक एसोसिएशन ने 2010 का एक पुराना वीडियो फिर से जारी किया यह वही समय था जब फ्रैंकलिन भारत में एक धर्मांतरण कार्यक्रम में शामिल होने आया था।
इस पोस्ट में संगठन ने लिखा, “जब COVID भारत में हजारों जानें ले रहा है, हमारे साथ प्रार्थना करें कि भारत के लोग जीवित उद्धारकर्ता को जान सकें। यह वीडियो फ्रैंकलिन ग्रैहम की 2010 की भारत यात्रा का है।” यानी महामारी की त्रासदी के बीच भी उन्होंने धर्मातरण से जुड़े संदेश फैलाने की कोशिश की और भारत को सीधे निशाना बनाया।
जब भारत अप्रैल 2021 में कोविड-19 की दूसरी लहर चल रही थी, फ्रैंकलिन के संगठन समैरिटंस पर्स ने दावा किया कि उसने 1,000 परिवारों को राशन दिया, एक स्थानीय क्लिनिक को कोविड देखभाल में मदद की और कुछ अन्य राहत कार्य किए।
हालाँकि, यह स्पष्ट नहीं है कि भारत में उन्होंने ये मदद किस माध्यम या किस चैनल से पहुँचाई, यानी राहत सामग्री वास्तव में किस तरह और कहाँ बाँटी गई इसकी कोई साफ जानकारी नहीं मिली।
बिली ग्राहम का भारत दौरा और कांग्रेस से उनके संबंध
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2025 की शुरुआत में USAID बंद करने के फैसले से भारत में सक्रिय कई धर्मातरण नेटवर्क पर बड़ा असर पड़ा। उसी दौरान OpIndia ने World Vision International पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की।
यह संगठन हर साल USAID से मिलने वाले सैकड़ों करोड़ रुपए को मानवीय सहायता बताकर भारत भेजता था, लेकिन असल में यह हिंदुओं खासकर बच्चों और महिलाओं को ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित करता था।
वर्ल्ड विजन एक कट्टर ईसाई संगठन है, जो 1951 में भारत में स्थापित हुआ। अगले 70 सालों में इसे लगातार करोड़ों रुपए मिलते रहे और यह देश में धर्मातरण को बढ़ावा देता रहा। 2024 में मोदी सरकार ने इसका FCRA लाइसेंस रद्द किया, जिससे इसकी गतिविधियों पर बड़ी रोक लगी।
इस संगठन की स्थापना बॉब पियर्स ने की थी। 1950 के दशक में वह भारत आए और 1960 तक छह चाइल्ड केयर प्रोजेक्ट शुरू कर चुके थे। 1953 की उनकी एक चिट्ठी में स्पष्ट लिखा है कि वे कोलकाता में हिंदुओं और सिखों का धर्मातरण कर रहे थे। 1956-57 में भी उन्होंने भारतीय छात्रों को टारगेट करते हुए प्रचार किया।
इसी दौरान बॉब पियर्स और प्रसिद्ध अमेरिकी ईसाई प्रचारक बिली ग्रैहम ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मुलाकात की। फ्रैंकलिन ग्रैहम के पिता बिली ग्रैहम अमेरिका के सबसे प्रभावशाली प्रचारकों में शामिल थे और कई अमेरिकी राष्ट्रपतियों के बेहद करीबी थे।
उनका मानना था कि दुनिया में आशा सिर्फ ईसा मसीह के माध्यम से ही मिल सकती है। वे कई देशों में प्रचार करते थे और अक्सर अमेरिकी विदेश नीति के साथ तालमेल में काम करते थे।
बिली ग्रैहम की पहली भारत यात्रा 1956 में हुई थी। उनकी वेबसाइट के अनुसार उन्होंने मुंबई, चेन्नई, कोट्टायम, पलमकोट्टई, दिल्ली और कोलकाता में बड़े स्तर पर क्रूसेड यानी प्रचार कार्यक्रम की योजना बनाई थी।
यह समय वह था जब भारत कम्युनिस्ट देशों के करीब जा रहा था, जिससे अमेरिका चिंतित था। इसलिए भारत आने से पहले ग्रैहम ने अमेरिकी विदेश विभाग से विशेष ब्रीफिंग भी ली। राष्ट्रपति आइजनहावर ने उन्हें शुभकामनाएँ दीं और विदेश मंत्री डलेस ने निर्देश दिए कि वे भारत में अमेरिकी हितों को आगे बढ़ाएँ।
‘Billy Graham- His Life and Influence’ नामक पुस्तक में लिखा है कि यह पहला अवसर था जब अमेरिकी सरकार ने बिली ग्रैहम के धार्मिक अभियानों का उपयोग अपनी विदेश नीति को मजबूत करने के लिए किया।
बाद में भी कई बार ग्रैहम अमेरिकी राष्ट्रपतियों के अनौपचारिक दूत बनकर काम करते रहे और ऐसे नेताओं से मिले जिनसे अमेरिका सीधे संपर्क नहीं कर सकता था। इस पुस्तक में यह भी बताया गया है कि भारत में अमेरिकी राजदूत जॉन शेर्मन कूपर ने नेहरू पर जोर दिया कि वे बिली ग्रैहम से मिलें।
मुलाकात में शुरू में नेहरू रुचि नहीं ले रहे थे। लेकिन जैसे ही ग्रैहम ने बातचीत को ईसाई धर्म की ओर मोड़ा, नेहरू तुरंत सतर्क हो गए और सवाल पूछने लगे। सबसे महत्वपूर्ण खुलासा यह था कि नेहरू ने ग्रैहम से कहा कि उन्हें ईसाई मिशनरियों से कोई आपत्ति नहीं, बशर्ते वे राजनीति से दूर रहें।
यह मुलाकात कई स्रोतों में दर्ज है, बिली ग्रैहम की आत्मकथा ‘Just As I Am’ और बॉब पियर्स की जीवनी ‘This One Thing I Do’ दोनों से यह स्पष्ट होता है कि पियर्स और ग्रैहम एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे और भारत में उनका उद्देश्य केवल धर्मप्रचार नहीं, बल्कि अमेरिकी प्रभाव को बढ़ाना भी था।
इंडिया रिविजिटेड- इंदिरा गाँधी ने जवाहरलाल नेहरू की विरासत को आगे बढ़ाया
प्रसिद्ध अमेरिकी प्रचारक डॉ बिली ग्राहम 1972 में भारत लौटे। द हिन्दू ने 24 नवंबर 1972 को रिपोर्ट किया कि डॉ ग्राहम ने आशा व्यक्त की कि उनका यह दौरा भारत और अमेरिका के बीच संबंधों को मजबूत करने में मदद करेगा।
कोहिमा से एयरपोर्ट पर मीडिया से बातचीत में उनसे पूछा गया कि क्या वे राष्ट्रपति निक्सन का कोई संदेश प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के लिए लाए हैं। उन्होंने उत्तर दिया, “मुझे खेद है, मैं इसका जवाब नहीं दे सकता।” डॉ ग्राहम, जो राष्ट्रपति निक्सन के करीबी मित्र हैं, श्रीमती गाँधी से मिलने वाले थे।
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि भारतीय सरकार ने उन्हें नागालैंड यात्रा की विशेष अनुमति दी और कहा, मैं इसके लिए आभारी हूँ। नई दिल्ली में अपने प्रवास के दौरान, वे राष्ट्रपति श्री वी वी गिरी से भी मिलने वाले थे।
पहले, कलकत्ता एयरपोर्ट पर, उन्होंने बताया कि भारत आने से पहले उन्होंने राष्ट्रपति निक्सन से दो बार मुलाकात की थी और कहा, “मैं भारत से प्रेम करता हूँ और चाहता हूँ कि अमेरिका और भारत बहुत घनिष्ठ मित्र बनें। यह आवश्यक है क्योंकि हमें अपने पारस्परिक हितों के लिए एक-दूसरे की जरूरत है।”
द हिन्दू की रिपोर्ट में डॉ ग्राहम को मुख्य रूप से एक ईसाई पादरी और अमेरिकी राष्ट्रपति के करीबी मित्र के रूप में दिखाया गया, जो भारत दौरे पर केवल द्विपक्षीय संबंध सुधारने और नागालैंड जाने आए हैं।
हालाँकि उनकी आत्मकथा में बाद में खुलासा हुआ कि 1972 के उनके इस दौरे में उनके श्रीमती गाँधी के साथ मिलने और उनकी यात्रा के रणनीतिक पहलुओं जैसी कई और महत्वपूर्ण बातें भी शामिल थीं।
बिली ग्राहम ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि उनका इंदिरा गाँधी से मिलने का उद्देश्य केवल धर्म प्रचार नहीं था, बल्कि अमेरिकी सरकार के एक विशेष निर्देश का पालन करना भी था। उन्होंने लिखा कि “राष्ट्रपति निक्सन ने, न्यू दिल्ली में अमेरिकी कौंसुल की रिक्वेस्ट पर, मुझसे व्यक्तिगत रूप से अनुरोध किया कि मैं प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से मुलाकात करूँ और यह जानूँ कि उन्हें अमेरिका से किस प्रकार का राजदूत चाहिए। मुझे हर छोटी-छोटी बात पर ध्यान देने को कहा गया, उनके हाथों की गति, चेहरे के भाव, आँखों का इजहार। उन्होंने कहा कि जब तुम इंटरव्यू खत्म कर लोगे तो अमेरिकी दूतावास जाओ और अपनी रिपोर्ट मुझे सुनाओ।”
ग्राहम ने इंदिरा गाँधी से यह प्रश्न पूछा। उन्होंने बताया कि वे ऐसे व्यक्ति को राजदूत बनाना चाहती हैं जो अर्थशास्त्र को समझता हो, राष्ट्रपति तक पहुँच रखता हो और कॉन्ग्रेस में प्रभावशाली हो। यह जानकारी ग्राहम ने राष्ट्रपति निक्सन को रिपोर्ट की। बाद में, डैनियल पैट्रिक मोइनिहन को अमेरिका का राजदूत नियुक्त किया गया। ग्राहम को कभी यह पता नहीं चला कि उनकी रिपोर्ट ने राष्ट्रपति के निर्णय को प्रभावित किया या नहीं।
ग्राहम की आत्मकथा से ये बात साफ है की है कि वे भारत में किसी अलग उद्देश्य से आए थे, लेकिन अमेरिकी सरकार का निर्देश उन्हें इंदिरा गाँधी से मिलने और उनकी शैली, व्यवहार और झलक का अवलोकन करने का था। यह भी जाहिर होता है कि बिली ग्राहम अमेरिकी प्रशासन के इतने करीब थे कि वे उनकी कुछ निर्णय प्रक्रियाओं पर असर डाल सकते थे।
हालाँकि, यह अमेरिकी सरकार का निर्देश मुख्य उद्देश्य नहीं था। उनके वास्तविक उद्देश्य के रूप में, ग्राहम नागालैंड में धर्म प्रचार करने के लिए आए थे। उन्होंने लिखा: “हमारा भारत जाने का उद्देश्य नागालैंड में प्रचार करना था, जो भारत के उत्तर-पूर्वी कोने में, बर्मा की सीमा के पास, जंगलों और पहाड़ियों से घिरा एक अलग क्षेत्र है। यहाँ दर्जनभर अलग-अलग जनजातियाँ रहती थीं, जिनकी अपनी भाषाएँ थीं और अक्सर वे पुरानी शिकार-संस्कृति से जुड़ी थीं।”
ग्राहम ने उल्लेख किया कि 1972 के अंत में, यह लगभग चमत्कार जैसा था कि इंदिरा गाँधी सरकार ने उन्हें नागालैंड यात्रा की अनुमति दी, क्योंकि उस समय राजनीतिक अस्थिरता के कारण विदेशी नागरिकों को इस राज्य में यात्रा की अनुमति नहीं मिल रही थी।
बिली ग्राहम की नागालैंड यात्रा और वहाँ की अनुमति मिलने का तरीका भी बहुत दिलचस्प है। वे लिखते हैं, “यह अनुमति नागालैंड के रेवरेन्ड लॉन्गरी आओ और अन्य चर्च नेताओं की एक प्रतिनिधिमंडल की अपील के जवाब में मिली थी। (उनकी सहायता में एक प्रतिभाशाली युवा भारतीय पादरी रॉबर्ट कनविल थे, जो नॉर्थ ईस्ट इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल के प्रमुख थे और जिन्हें वर्ल्ड काउंसिल ऑफ चर्चेज के लिए युवा प्रचार का निदेशक बनने के लिए आमंत्रित किया गया था, बाद में वे हमारी टीम में प्रचारक के रूप में शामिल हुए और भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में भी अपना धर्मकार्य करते रहे)।”
यहाँ यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि वर्ल्ड काउंसिल ऑफ चर्चेज (WCC) क्या है। हमारी पिछली रिपोर्ट में हमने USAID द्वारा वित्तपोषित World Vision के बारे में लिखा था। हमने यह भी जाँचा कि World Vision, जो कि बॉब पियर्स द्वारा स्थापित एक ईसाई प्रचार संगठन है, उसका विश्वसनीय साझेदार WCC था।
WCC अपने शब्दों में स्वयं कहती है कि यह चर्चों का एक समुदाय है जो यीशु मसीह को भगवान और उद्धारकर्ता के रूप में मानते हैं और एक विश्वास व एक युकेरिस्टिक समुदाय के रूप में एकता की दिशा में कार्यरत हैं। यह ईसाई एकता की दिशा में प्रयास करता है ताकि दुनिया विश्वास कर सके (यूहन्ना 17:21)।
WCC को दुनिया के कई देशों की सरकारें वित्तीय सहायता देती हैं और जर्मनी की NGO ब्रेड फॉर द वर्ल्ड से भी महत्वपूर्ण धन मिलता है। ब्रेड फॉर द वर्ल्ड के कई कनेक्शन भारत विरोधी NGO, अर्बन नक्सली, जिहादी और हर्ष मंडर जैसे विवादित तत्वों से हैं।
वापस बिली ग्राहम की नागालैंड यात्रा पर आते हैं। ग्राहम लिखते हैं कि जब वे नागालैंड पहुँचे, तो उन्हें अमेरिकी कौंसुल ने स्वागत किया, जो मदर टेरेसा का अच्छा मित्र था। रोचक रूप से, बॉब पियर्स की किताब के अनुसार, NGO (World Vision) मदर टेरेसा को भी पैसा देती थी।
ग्राहम लिखते हैं कि नागालैंड पहुँचने पर उन्होंने लोगों से हाथ मिलाना शुरू किया, तभी पुलिस ने उन्हें रोककर कार में बैठा दिया क्योंकि उन्हें लगा कि उनकी सुरक्षा खतरे में है। इसके बाद, वे उस स्थान पर पहुँचे जहाँ उन्होंने 90,000 से अधिक लोगों को उपदेश दिया।
इसके बाद उन्हें सरकारी आवास में ठहराया गया। “उसके बाद हमें एक सरकारी भवन में रात बिताने के लिए ले जाया गया। नागालैंड के मुख्यमंत्री ने हमारे लिए एक डिनर का इंतजाम किया। उस डिनर में अगले दिन के कार्यक्रम पर चर्चा हुई।”
बिली ग्राहम की वेबसाइट के अनुसार, 20-22 नवंबर 1972 के दौरान उनके क्रूसेड में 5 लाख लोग शामिल हुए। इस भीड़ में कई अलग-अलग जनजातियाँ थीं, जिनके लिए अलग-अलग दुभाषिया मौजूद थे। ग्राहम ने उपस्थित लोगों के जनजातीय परिधान, चेहरे पर पेंट और हाथ में भाले जैसे विवरण नोट किए और उन्हें प्लेटफ़ॉर्म से भगवान के प्रेम का संदेश दिया।
इंदिरा गाँधी सरकार ने उन्हें केवल पुलिस सुरक्षा और सरकारी आवास प्रदान ही नहीं किया, बल्कि मुख्यमंत्री ने उनके धर्म प्रचार का मनोरंजन किया। इसके अलवा, इंदिरा गाँधी ने उनके लिए हेलीकॉप्टर की व्यवस्था की और कहा कि वे व्यक्तिगत रूप से इस यात्रा पर ध्यान देंगी।
ग्राहम लिखते हैं, “श्रीमती गाँधी ने मुझे बताया कि वे इस यात्रा पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देंगी और कुछ विशेष खतरों से आगाह किया। उन्होंने दो हेलीकॉप्टर हमारे लिए मीटिंग खत्म होने पर भेजने का आदेश दिया।”
इंदिरा गाँधी सरकार ने उन्हें केवल पुलिस सुरक्षा और सरकारी आवास प्रदान ही नहीं किया, बल्कि मुख्यमंत्री ने उनके धर्म प्रचार का मनोरंजन किया। इसके अलावा, इंदिरा गाँधी ने उनके लिए हेलीकॉप्टर की व्यवस्था की और कहा कि वे व्यक्तिगत रूप से इस यात्रा पर ध्यान देंगी।
ग्राहम लिखते हैं, “श्रीमती गाँधी ने मुझे बताया कि वे इस यात्रा पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देंगी और कुछ विशेष खतरों से आगाह किया। उन्होंने दो हेलीकॉप्टर हमारे लिए मीटिंग खत्म होने पर भेजने का आदेश दिया।”
बिली ग्राहम की लिखी बातों से कुछ महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट होते हैं:
इंदिरा गाँधी बिली ग्राहम की नागालैंड यात्रा को बेहद करीब से मॉनिटर कर रही थीं।
नागालैंड में अस्थिरता के कारण जब विदेशी नागरिकों को अनुमति नहीं दी जा रही थी, तब भी इंदिरा गाँधी ने विशेष तौर पर बिली ग्राहम को परमिट दिया।
यह अनुमति ‘वर्ल्ड काउंसिल ऑफ चर्चेज’ से जुड़े एक पादरी के अनुरोध पर दी गई थी।
इंदिरा गाँधी ने उन्हें पुलिस सुरक्षा, सरकारी आवास और यात्रा के लिए निजी हेलीकॉप्टर तक उपलब्ध कराए।
उन्होंने बिली ग्राहम को जो लाखों गैर-ईसाइयों (मुख्यतः हिंदुओं) का धर्मांतरण कर रहे थे, अस्थिरता के समय भी नागालैंड में सक्रिय धर्म-प्रचार करने की हर संभव सुविधा दी।
बिली ग्राहम अमेरिकी सरकार के अत्यंत करीबी थे और विदेशी नीति के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए इंदिरा गाँधी जैसे राष्ट्र प्रमुखों से मिलकर, उनकी गतिविधियों की रिपोर्ट अमेरिकी सरकार को भेजते थे।
यह स्थापित है कि नागालैंड को ईसाई-बहुल राज्य बनाने में बिली ग्राहम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यदि फ्रैंकलिन ग्राहम की यात्रा होती, तो यह उत्तर-पूर्व में जारी धर्मातरण नेटवर्क- विशेषकर संवेदनशील जनजातीय समुदायों पर और अधिक प्रभाव डालता।
चूँकि यह स्थापित है कि बिली ग्राहम ने व्यापक ईसाई प्रचार के माध्यम से नागालैंड को एक ईसाई-बहुल राज्य बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, इसलिए फ्रैंकलिन ग्राहम की प्रस्तावित यात्रा उत्तर-पूर्व में सक्रिय धर्मातरण नेटवर्क को और मज़बूत करती।
यह यात्रा विशेष रूप से उन जनजातीय समुदायों को प्रभावित कर सकती थी, जो पहले से ही ऐसे संगठित मिशनरी प्रभाव के प्रति अधिक संवेदनशील माने जाते हैं।
(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)
जमीअत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने शनिवार (29 सितंबर 2025) को भोपाल में आयोजित कार्यक्रम में कहा है कि जब-जब जुल्म होगा, तब-तब जिहाद होगा। इसके बाद से ही देश में इस बयान को लेकर बहस शुरू हो गई है, हिंदू और सेक्युलर दलों और नेताओं को तो छोड़ दीजिए कई मौलानाओं को भी मदनी का बयान भड़काने वाला लग रहा है।
बात सिर्फ जिहाद को लेकर बयान तक ही नहीं रुकी, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की निष्पक्षता पर सवाल उठाए और वंदे मातरम जैसे राष्ट्रीय प्रतीक को मुसलमानों के खिलाफ बताते हुए यह इशारा दिया कि जो समुदाय इसके दबाव में झुक जाए वह ‘मुर्दा कौम’ कहलाएगा।
एक तरफ जिहाद की परिभाषा, दूसरी ओर सर्वोच्च न्यायपालिका पर उंगली उठाना और राष्ट्रगीत को ‘धर्म बनाम पहचान’ की बहस में खड़ा करना एक बड़ा संदेश देता है। संदेश साफ है कि मदनी अपने बयान के जरिए केवल व्यवस्था को लेकर नाराजगी नहीं जता रहे बल्कि मुस्लिम समाज में गुस्सा और असुरक्षा की भावना को उकसाने का भी प्रयास कर रहे हैं।
जमीअत के प्रमुख का भड़काऊ संदेश
जमीअत उलेमा-ए-हिंद ने X पर मदनी का बयान शेयर किया है। मदनी कहते हैं, “गोली खाएँगे तो सीने पर खाएँगे, पीठ पर नहीं। और अगर हमारा जनाजा निकला, तो जमीअत उलमा-ए-हिंद के झंडे में ही निकलेगा – इंशाअल्लाह।”
जमीअत के पोस्ट में लिखा है, “हमारे बुजुर्गों ने जेलों को आबाद किया, फांसी के फंदों को चूमा और कौम के लिए अपनी जानें कुर्बान कीं। अगर उन्होंने जुल्म के सामने सर नहीं झुकाया, तो हम कैसे उस तसल्सुल को छोड़ दें? डरेंगे नहीं – कभी नहीं। चाहे हालात जैसे भी हों, मुकाबला करेंगे – इंशाअल्लाह।”
जब जब ज़ुल्म होगा, तब तब जेहाद होगा। हिम्मत, जुरअत और तसल्सुल का पैग़ाम
“गोली खाएँगे तो सीने पर खाएँगे, पीठ पर नहीं। और अगर हमारा जनाज़ा निकला, तो जमीअत उलमा-ए-हिंद के झंडे में ही निकलेगा — इंशाअल्लाह।”
जिन्हें अल्लाह ने जिम्मेदारी और ओहदा दिया है, उनकी जिम्मेदारी है कि वो…
अब इस बयान के मायने और असर को समझने की कोशिश करते हैं। ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के चीफ मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने मदनी के बयान को ‘समाज को बाँटने वाला और मुस्लिमों को भड़काने वाला’ बताया है। बात सही भी है। जब कोई ऐसा नेता, जिसके पीछे बड़ी संख्या में लोग हों ‘जिहाद’ जैसा शब्द सार्वजनिक मंच से बोलता है तो उसका अर्थ सिर्फ ‘अन्याय के खिलाफ संघर्ष’ तक सीमित नहीं रहता।
इस शब्द का भावनात्मक और ऐतिहासिक संदर्भ इसे कहीं अधिक उग्र बना देता है। आम मुस्लिम युवक यदि इसे मजहबी संदेश समझ ले तो परिणाम केवल वैचारिक असहमति नहीं रहेगा बल्कि वह टकराव का रूप ले लेगा और यही चिंता का विषय भी है। क्या आम मुस्लिमों को लगता है कि अगर गोली की नौबत आएगी तो महमूद मदनी या उनके परिवार के लोग आगे आएँगे। जाहिर है वो ऐसा नहीं करेंगे लेकिन तकरीर कर लोगों को भड़काने का काम करते रहेंगे।
मदनी के बयान का दूसरा पहलू सुप्रीम कोर्ट पर उनकी टिप्पणी है। यह देश का सर्वोच्च न्यायिक स्तंभ है, जिसके ऊपर जनता का भरोसा ही लोकतंत्र की नींव है। यदि मुस्लिमों का एक बड़ा नेता यह कहता है कि न्यायपालिका संविधान की रक्षा नहीं कर रही या सत्ता के दबाव में काम कर रही है तो यह केवल असहमति नहीं बल्कि अविश्वास फैलाने का प्रयास है।
एक साधारण नागरिक कानून में भरोसा रखता है क्योंकि उसे लगता है कि अंतिम न्यायालय उसके अधिकारों की रक्षा करेगा। परंतु जब नेतृत्व के मंच से कहा जाए कि यह संस्थान न्याय नहीं दे रहा तो इस संदेश से भीड़ के भीतर यह सोच आ जाती है कि न्याय पाने की उम्मीद न्यायालय में नहीं बल्कि टकराव और प्रतिरोध में है। यही प्रतिशोध की भावना टकराव की वजह बन सकती है।
वंदे मातरम को लेकर उनका बयान सच में चिंता बढ़ाने वाला है। वंदे मातरम कोई पार्टी का नारा नहीं बल्कि आजादी की लड़ाई की याद है और भारत की पहचान है। इसे मानने या न मानने को ‘जिंदा कौम’ और ‘मुर्दा कौम’ जैसे शब्दों में बाँटना गलत दिशा में ले जाता है। इससे ऐसा लगता है कि जो इसके खिलाफ बोलता है वही असली नायक है और जो इसे सम्मान देता है वो जैसे दबा हुआ या कमजोर है।
मदनी लगातार मुसलमानों को यह संदेश दे रहे हैं कि वे हमेशा उत्पीड़ित हैं और उन्हें संघर्ष के लिए तैयार रहना चाहिए। सीधी सी बात है कि अगर मुसलमान खुद को उत्पीड़ित समझेंगे तो वे दूसरे समाज को दुश्मन की तरह देखना शुरू कर देंगे और मदनी के बयान की टोन से लगता है कि वो यही करना भी चाहते हैं।
विश्व हिंदू परिषद के प्रवक्ता विनोद बंसल ने मुस्लिमों से अपील की है कि वे मदनी जैसे मौलानाओं से दूरी बना लें। बंसल ने कहा, “मदनी जैसे कट्टरपंथी मौलानाओं से मुस्लिम युवाओं को तुरंत दूरी बना लेनी चाहिए क्योंकि यही लोग अपनी तकरीरों से एक दिन उन्हें RDX बाँधकर ब्लास्ट करने के लिए मजबूर कर देंगे।”
मदनी इससे पहले भी विवादों में घिरे रहे हैं। UCC के खिलाफ बयानबाजी हो, चाहे इस्लामोफोबिया के खिलाफ कानून लाने की बात हो या वक्फ एक्ट को लेकर हल्ला बोल हो, मदनी ने हर बार उकसाने वाले बयान दिए हैं। अब फिर वही कोशिश मदनी कर रहे हैं, उनके बयान का विरोध होगा और किसी भी प्रतिक्रिया पर मुस्लिमों के कट्टरपंथी तबके को मौका मिल जाएगा कि वो सड़कों पर आ जाए।
एक मजहबी नेता का काम होता है लोगों को जोड़ना, ना कि समाज में दरार डालना। लोकतंत्र में हम न्याय प्रणाली, संविधान और धर्म से जुड़े मुद्दों पर सवाल पूछ सकते है और यह सभी का हक है। लेकिन अगर वास्तव में सवाल हैं तो वो ऐसे होने चाहिए जो समाधान ढूँढें, ना कि सांप्रदायिक तनाव को और युवाओं को भड़काने का काम करें।
मदनी की बातों को सुने तो लगता है कि वो समाज को किसी भी तरह के समाधान के बजाय टकराव की और ले जाना चाहते हैं। उनकी भाषा से ऐसा लगता है कि जैसे मुस्लिम समाज हर तरफ से खतरे में है और बचने का रास्ता सिर्फ ‘जिहाद’ ही है। इस तरह का सोच धीरे-धीरे समाज में दूरी और नफरत बढ़ाता है। मुस्लिम समाज को भी यह समझने की जरूरत है कि मदनी जैसे लोग असल में आग में घी डाल रहे हैं जो इसमें उनके समाज के लोगों के झुलसने का ही खतरा है।
भारत की विकास गाथा एक बार फिर वैश्विक मंच पर ध्वनि-गर्जना कर रही है। जिस समय दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ धीमी पड़ने लगी हैं, उसी समय भारत ने 2025-26 की दूसरी तिमाही (Q2) में 8.2 % की रफ्तार से बढ़कर यह सिद्ध कर दिया है कि उसकी आर्थिक नींव न केवल मजबूत है बल्कि निरंतर व्यापक होती जा रही है। यह सिर्फ एक आर्थिक आँकड़ा नहीं यह आत्मविश्वास, स्थिरता और सुधारवादी नीतियों की सफलता का प्रमाण है।
NSO के नवीनतम आँकड़े विशेषज्ञों की सभी भविष्यवाणियों से ऊपर निकले हैं। 7-7.5% की अपेक्षाओं के बीच 8.2% की यह छलांग बताती है कि भारत की विकास कथा अब ‘सौभाग्य’ नहीं बल्कि ‘संगठित रणनीति’ का परिणाम है। घरेलू खपत, सेवा क्षेत्र की निरंतर मजबूती और मैन्युफैक्चरिंग की नई ऊर्जा ने मिलकर अर्थव्यवस्था को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया है।
सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इस ग्रोथ का ईंधन आम भारतीयों का विश्वास है। निजी खपत में 7.9% की वृद्धि दिखाती है कि परिवार, व्यापारी और उपभोक्ता अर्थव्यवस्था के भविष्य को लेकर अधिक आश्वस्त हैं। जब नागरिक आश्वस्त होते हैं, तब ही अर्थव्यवस्था गति पकड़ती है।
मैन्युफैक्चरिंग और निर्माण क्षेत्र की 9% और 7% के आस-पास की ऊँची वृद्धि बताती है कि Make in India और उत्पादक-क्षमता आधारित नीतियाँ अब जमीन पर परिणाम दे रही हैं। यह संयोग नहीं हो सकता कि वैश्विक मंदी की आशंकाओं के बीच भी भारत का औद्योगिक उत्पादन मजबूत खड़ा है यह उसी आत्मनिर्भर दृष्टि की पराकाष्ठा है, जिसे पिछले कुछ वर्षों में लगातार दिशा दी गई है।
सेवा-क्षेत्र, जो पहले से ही भारत की ताकत रहा है, इस तिमाही में 10% से अधिक की वृद्धि लेकर आया है। वित्तीय सेवाएँ, रियल एस्टेट और प्रोफेशनल सेवाओं के तेजी से बढ़ने का अर्थ है कि शहरों में ही नहीं बल्कि पूरे देश में आर्थिक गतिविधियों की तेज लय बनी हुई है।
GST संरचना में हाल के महीनों में किए गए सुधार, खासकर दरों में की गई आवश्यक कटौती ने बाजार को राहत दी है और उपभोग को बढ़ावा दिया है। इन उपायों का व्यापक प्रभाव आगामी तिमाहियों में और स्पष्ट दिखेगा।
जीवन स्तर में सुधार, सरकारी योजनाओं की बेहतर डिलीवरी और डिजिटल अर्थव्यवस्था के प्रसार ने भी उत्पादन और उपभोग दोनों को मजबूत किया है। आज भारत दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था ही नहीं बल्कि सबसे ‘चपल’ और ‘नवाचार-समर्थ’ अर्थव्यवस्थाओं में से एक भी है।
अब यह भी सच है कि राजकोषीय घाटे में बढ़त जैसी कुछ चुनौतियाँ सामने हैं लेकिन सकारात्मक दृष्टिकोण से देखें तो यह सरकार की सक्रिय पूंजीगत गतिविधियों और कल्याणकारी कार्यक्रमों का भी परिणाम है। यदि विकास की रफ्तार बनी रहती है, तो यह घाटा दीर्घकाल में स्वतः संतुलित होता है।
वैश्विक अनिश्चितताओं जैसे अमेरिका-यूरोप में माँग की गिरावट, भू-राजनीतिक तनाव, तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच भारत का यह प्रदर्शन वाकई उल्लेखनीय है। यह बताता है कि हमारी अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों के खिलाफ अधिक लचीली (resilient) और संतुलित संरचना की ओर बढ़ रही है।
8.2% का यह आँकड़ा केवल एक तिमाही के उत्सव की वजह नहीं है यह उस भारत की झलक है जो आत्मविश्वास से भरा है, जो दुनिया की उभरती आर्थिक धुरी बनने की तैयारी कर रहा है और जिसकी विकास-यात्रा अब ठोस नींव पर आधारित है।
भारत की क्षमता अब केवल भविष्य की चीज नहीं यह वर्तमान में दिख रही, महसूस की जा सकने वाली वास्तविकता बन चुकी है। इस तिमाही का प्रदर्शन उसी सकारात्मक परिवर्तन की दिशा में एक और सशक्त कदम है।
हम अवसरों के मोड़ पर खड़े हैं जहाँ से भारत न सिर्फ नई ऊँचाइयाँ छू सकता है बल्कि वैश्विक आर्थिक परिदृश्य को भी पुनर्परिभाषित कर सकता है।