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बिहार में मोदी-नीतीश की प्रचंड सुनामी: महिला वोटरों से लेकर नौकरी-विकास तक, जानें वो 5 बड़े फैक्टर जिन्होंने NDA को फिर बना दिया ‘किंग’

यह जीत प्रधानमंत्री मोदी द्वारा 'जंगलराज' की यादें ताजा कर बनाए गए मजबूत नैरेटिव, नीतीश कुमार की जमीनी विश्वसनीयता और ₹10000 की सीधी सहायता पाकर 8% ज़्यादा वोट डालने वाली महिला मतदाताओं के अभूतपूर्व समर्थन का परिणाम है।

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के रुझानों ने इतिहास रच दिया है। मतगणना का हर राउंड यही बता रहा है कि बिहार की जनता ने ‘जंगलराज’ को पूरी तरह नकार दिया है और डबल इंजन के विकास पर मुहर लगा दी है। यह कोई साधारण जीत नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 5-फैक्टर रणनीति का परिणाम है, जिसने विरोधियों को चारों खाने चित कर दिया।

मोदी ने अपनी रैलियों में लालू-राबड़ी शासन के खौफनाक अतीत को सफलतापूर्वक जीवित किया, जिससे जनता को यह संदेश मिला कि उन्हें फिर से उस अंधकार की ओर नहीं लौटना है। यह जीत नीतीश कुमार के जमीनी विश्वास और केंद्र सरकार की जन-कल्याणकारी योजनाओं के सफल क्रियान्वयन का भी प्रमाण है, जिसने गरीब और युवाओं का भरोसा जीता। पाँच मजबूत फैक्टरों की बदौलत, NDA ने न सिर्फ एक बड़ी जीत हासिल की है, बल्कि बिहार की राजनीतिक दिशा को भी पूरी तरह से विकासोन्मुख बना दिया है।

मोदी बने X फैक्टर: ‘जंगलराज’ की याद ने पूरा चुनावी माहौल मोड़ा

इस चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार फिर बिहार के सबसे बड़े ‘नैरेटिव सेटर’ साबित हुए। उनकी रैलियों ने चुनाव का मुद्दा महँगाई, बेरोजगारी या स्थानीय नाराजगी से हटाकर सीधे कानून व्यवस्था के इतिहास पर ला खड़ा किया। मोदी ने लगातार जनता को ‘लालू-राबड़ी‘ शासन के उस काल की याद दिलाई जिसे बिहार की राजनीतिक भाषा में ‘जंगलराज‘ कहा जाता है।

शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा को टिकट देकर आरजेडी ने जैसे खुद विपक्ष के हाथ में हथियार दे दिया और मोदी ने इस मुद्दे को हर रैली में उछालकर लोगों की स्मृतियों को फिर जगा दिया। पुराने लोग इस दौर को आज भी डर और अव्यवस्था से जोड़ते हैं और आज की नई पीढ़ी को मोदी ने बार-बार यह कहकर प्रभावित किया, “अपने घर के बुजुर्गों से पूछो कि जंगलराज में क्या-क्या होता था।” यह भावनात्मक अपील अत्यंत प्रभावी साबित हुई।

मोदी ने सिर्फ भय की याद नहीं दिलाई, बल्कि उसकी तुलना डबल इंजन सरकार के विकास मॉडल से भी की। उन्होंने सड़क, बिजली, आवास, गैस, शौचालय, मुफ्त अनाज और किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं को जोड़कर यह संदेश दिया कि बिहार अब उस अंधकार से निकल चुका है और इसे फिर पीछे नहीं जाने देना चाहिए।

महिलाओं के प्रति मोदी की विशेष अपील, छठ पूजा के सम्मान का मुद्दा और सशस्त्र बलों के शौर्य- इन सभी को जोड़कर उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की कि एनडीए केवल सुरक्षा और विकास नहीं, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक पहचान का भी संरक्षक है। कुल मिलाकर, मोदी ने चुनाव का फोकस अपने नियंत्रण में लिया। इस चुनाव में वे निर्णायक ‘X फैक्टर’ साबित हुए।

नीतीश कुमार ने जमीन पर दिखाया दम: बीमार होने के बावजूद बारिश में भी सभाएँ कीं

20 साल सत्ता में रहने के बाद किसी भी नेता के लिए जनता के बीच उत्साह बनाए रखना आसान नहीं होता। लेकिन नीतीश कुमार ने इस चुनाव में दिखा दिया कि उनका जमीनी नेटवर्क और प्रशासनिक भरोसा आज भी उतना ही मजबूत है। बीमारी और उम्र की दिक्कतों के बावजूद वे लगातार दौरे करते रहे।

जब कई बड़े नेता बारिश के कारण सभाएँ स्थगित कर रहे थे, नीतीश कुमार कार से घंटों दूर-दराज के इलाकों में पहुँचते रहे और छोटी-बड़ी हर सभा में लोगों से संवाद करते रहे। इससे एक बहुत बड़ा संदेश गया कि ‘नीतीश थके नहीं हैं, रिटायर नहीं हुए हैं और काम छोड़ने को तैयार नहीं हैं।’

उनके इन दौरे सिर्फ राजनीतिक कार्यक्रम नहीं थे, बल्कि उस लंबे कार्यकाल का स्मरण थे जिसमें उन्होंने सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और प्रशासन को नई दिशा दी। लोगों में उनके प्रति स्वाभाविक भरोसा इस बार भी दिखाई दिया। दिलचस्प बात यह रही कि नीतीश के खिलाफ कोई बहुत बड़ी एंटी-इनकंबेंसी नहीं दिखी, जबकि यह भारतीय राजनीति में दुर्लभ है। इसका कारण उनका बीते 20 वर्षों का रिकॉर्ड है, विशेषकर शराबबंदी, महिला सशक्तिकरण, ग्रामीण सड़कों की क्रांति और प्रशासनिक सुधार।

युवाओं में बेरोजगारी को लेकर कुछ नाराजगी जरूर थी, पर प्रधानमंत्री मोदी और नीतीश कुमार ने मिलकर इसे बड़े वादों में बदल दिया, कौशल विकास, उद्योग लाने और पलायन रोकने जैसे मुद्दे उठाकर। नतीजा यह रहा कि ‘अनुभव + विश्वास’ के रूप में नीतीश की छवि NDA की जीत की रीढ़ बन गई।

महिलाओं ने खेल दिया पलट: 10,000 रुपए की सीधी सहायता और 8% ज्यादा महिला वोटिंग

2025 के बिहार चुनाव की सबसे प्रभावशाली बात महिलाओं की ऐतिहासिक मतदान भागीदारी रही। पहले चरण में पुरुषों के मुकाबले 8% अधिक महिलाओं ने वोट डाले। यह सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश था कि बिहार की महिलाएँ अब चुनाव का भविष्य तय कर रही हैं।

आपको बता दें, कि 10,000 रुपए की सीधी आर्थिक मदद इसके केंद्र में था, जो 1 करोड़ से अधिक जीविका समूह से जुड़ी महिलाओं के खातों में भेजी गई। यह लाभ पहली बार सीधे महिला मतदाता को मिला, बिना किसी बिचौलिये के।

इस आर्थिक सहायता के साथ 2 लाख रुपए तक आसान लोन का वादा, स्कूलों में साइकिल योजना, पोशाक योजना, सुरक्षा, स्वास्थ्य और स्व-सहायता समूहों की सफलता, इन सबने मिलकर महिलाओं को नीतीश के पक्ष में गोलबंद कर दिया। कई महिलाएँ जो पहले कभी वोट डालने नहीं आती थीं, इस बार वे बूथों पर लंबी कतारों में दिखाई दीं। यह बताता है कि महिलाओं के भीतर नीतीश सरकार के प्रति गहरा भरोसा और भावनात्मक जुड़ाव है।

इसके अलावा, पीएम मोदी ने भी महिलाओं को अपने संबोधनों के केंद्र में रखा। छठ पूजा के सम्मान, परिवारवाद की आलोचना और महिलाओं के लिए आर्थिक अवसर, इन सबकी बात करके उन्होंने महिला वोट को और सुदृढ़ किया। स्पष्ट है कि 2025 की जीत के मूल में महिलाओं की अभूतपूर्व भागीदारी सबसे निर्णायक फैक्टरों में से एक है।

नौकरी, विकास और जनकल्याण योजनाएँ: युवाओं और गरीबों का भरोसा NDA पर टिका

रोजगार हमेशा बिहार का केंद्रीय मुद्दा रहा है। इस बार भी युवा बेरोजगारी को लेकर असंतुष्ट थे, लेकिन NDA ने इसे अवसर में बदला। संकल्प पत्र में 1 करोड़ रोजगार का वादा मुख्य आकर्षण बना। प्रधानमंत्री मोदी ने इसे अपनी हर रैली में दोहराया और ‘बिहार में ही काम करेगा, बिहार का ही नाम करेगा’ जैसा नारा देकर युवाओं को यह संदेश दिया कि सरकार पलायन की समस्या को समझती है और उसका समाधान लाने की तैयारी में है।

दूसरी तरफ, गरीब और निम्न मध्यवर्गीय परिवारों में एनडीए की कल्याणकारी योजनाओं की पहुँच करोड़ों घरों तक बनी रही। मुफ्त अनाज योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना, शौचालय, गैस कनेक्शन, किसान सम्मान निधि, वृद्धावस्था पेंशन, बिजली–सड़क–पानी जैसी योजनाओं ने NDA के आधार को बहुत मजबूत बनाया। जिन लोगों को इन योजनाओं का लाभ मिला, उन्होंने मूक लाभार्थी यानि ‘silent beneficiary’ की भूमिका निभाई और बड़ी संख्या में एनडीए के पक्ष में वोट किया।

पहले चरण में रिकॉर्ड वोटिंग इसलिए भी हुई क्योंकि SIR के तहत फर्जी और निष्क्रिय नाम हटाए गए थे और 21 लाख नए मतदाता जुड़े थे। बाहर रहने वाले बिहारियों में यह डर भी था कि अगर वे वोट नहीं देंगे तो अगली सूची में उनका नाम कट सकता है। इस बार कई वर्षों से वोट न डालने वाले भी मतदान केंद्र पहुँचे। इसमें प्रशांत किशोर के जनसुराज अभियान का भी प्रभाव रहा। लेकिन अंतिम फैसला युवाओं ने रोजगार की उम्मीद और गरीबों ने कल्याणकारी योजनाओं के भरोसे पर किया और इन दोनों वर्गों ने मिलकर NDA को भारी समर्थन दिया।

विपक्ष का आउट-ऑफ-फोकस अभियान: राहुल की वेबफूकियाँ, तेजस्वी के अनर्गल वादे

इस चुनाव में विपक्ष का सबसे बड़ा नुकसान उसकी खुद की रणनीतिक कमजोरियों से हुआ। राहुल गाँधी ने चुनाव प्रचार की शुरुआत तो दमदार की, लेकिन जब प्रचार का पीक समय था, वे 57 दिनों तक बिहार से गायब रहे। विदेश यात्रा, दिल्ली में इमरती छानने की तस्वीरें और हरियाणा-UP के कार्यक्रमों में दिखना… इन सबने यह संदेश दिया कि वे बिहार चुनाव को गंभीरता से नहीं ले रहे।

विपक्ष ने SIR पर ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाया, लेकिन यह समझाने में असफल रहे कि इससे आम वोटर का क्या नुकसान हुआ। उल्टा, जिस फर्जी फोटो को उन्होंने हरियाणा का मतदाता बताकर ‘वोट चोरी’ का उदाहरण दिया था, वह ब्राजील की मॉडल निकली। इससे उनकी विश्वसनीयता को भारी चोट लगी।

दूसरी ओर तेजस्वी यादव के वादे अवास्तविक और अनियोजित लगे। 10 लाख नौकरियों का दावा, उद्योग के बिना रोजगार का फॉर्मूला और सीएम फेस की घोषणा को लेकर महागठबंधन में लंबी खींचतान… इन सबने जनता में यह धारणा बनाई कि विपक्ष खुद ही अपनी दिशा तय नहीं कर पा रहा, तो बिहार का भविष्य क्या है सही करेगा।

RJD और कॉन्ग्रेस की स्थानीय स्तर पर फूट की खबरें, कॉन्ग्रेस अध्यक्ष की सीट पर RJD उम्मीदवार खड़ा करना और दोनों दलों का एक-दूसरे को नुकसान पहुँचाने की कोशिश… इसने गठबंधन को कमजोर कर दिया। मतदाताओं का बिहार चुनाव के नतीजों से ये ही साफ संदेश मिलता है, “जो खुद बिखरा है, वह बिहार को क्या संभालेगा?” और यह सीधा लाभ एनडीए को मिला।

अब, 14 नवंबर 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों का रुझान यह साफ दिखा रहा हैं कि बिहार की जनता ने सोच-समझकर मतदान किया है। मोदी का प्रबल नैरेटिव, नीतीश की जमीनी विश्वसनीयता, महिलाओं की रिकॉर्ड वोटिंग, रोजगार-विकास की उम्मीद, और विपक्ष की रणनीतिक कमजोरियाँ… इन पाँच फैक्टरों ने मिलकर NDA को 198 सीटों की मजबूत बढ़त दिला दी है। यह जीत सिर्फ एक चुनाव जीत नहीं, बल्कि बिहार की बदलती राजनीतिक मानसिकता का संकेत है।

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