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बांग्लादेश में HIV का एपिसेंटर बना रोहिंग्या कैंप, देशभर में रिकॉर्ड संख्या में बढ़े केस: जानें कैसे प्रवासी मजदूर से ट्रांसजेंडर तक AIDS विरोधी अभियान के लिए बने मुसीबत

बांग्लादेश में HIV संक्रमण के मामलों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इससे स्वास्थ्य विशेषज्ञों और मानवीय संगठनों में गंभीर चिंता पैदा हो गई है। विश्व एड्स दिवस (1 दिसंबर) पर जारी सरकारी आँकड़ों के अनुसार, नवंबर 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच 1,891 नए मामले दर्ज किए गए। यह हाल के वर्षों में दर्ज हुई सबसे बड़ी वार्षिक वृद्धि है। पिछले वर्ष से तुलना करें तो यह संख्या 453 अधिक है।

इन नए मामलों में 217 संक्रमण अकेले कॉक्स बाजार स्थित रोहिंग्या शरणार्थी कैंपों में मिले और विशेषज्ञ ‘गंभीर रूप से चिंताजनक’ बता रहे हैं। यह इसलिए भी जोखिम की बात है कि विस्थापित आबादी पहले से ही संवेदनशील और जोखिमग्रस्त मानी जाती है।

बांग्लादेश में AIDS के आँकड़े

रिपोर्ट्स के मुताबिक, बांग्लादेश में HIV का पहला मामला 1989 में सामने आया था। इस साल तक HIV पॉजिटिव मामलों की कुल संख्या 14,313 थी। इनमें से 2,666 की मौत हो गई है। स्वास्थ्य अधिकारियों का मानना है कि HIV से संभावित रूप से संक्रमित लगभग 18% लोग अपनी स्वास्थ्य स्थिति से अनजान हैं यानी उन्हें संक्रमण का अंदाजा ही नहीं है। ऐसे मामलो की संख्या करीब 17,480 है।

बांग्लादेश के स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (DGHS) के तहत चलते वाले राष्ट्रीय एड्स और यौन संचारित रोग नियंत्रण कार्यक्रम की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में AIDS के 1,438 नए मामले और 195 मौतें दर्ज हुई थीं जबकि 2023 में संक्रमण के 1,276 मामले और 266 मौतें हुईं। हालाँकि, आधिकारिक रूप से जिन मरीजों की पहचान की गई है, उनकी संख्या काफी कम है।

नए आँकड़ों से पता चलता है कि पिछले एक साल में 14.21 लाख लोगों ने HIV टेस्ट कराया जो पिछले वर्ष की तुलना में 1.91 लाख कम है। इसके अलावा, इसी अवधि के दौरान स्वास्थ्य जाँच के तहत 10.72 लाख लोगों का HIV टेस्ट किया गया जो पिछले वर्ष की तुलना में 10.34 लाख अधिक है।

अस्पतालों की कमी और स्वास्थ्य सुविधाओं का संकट

रिपोर्ट्स के मुताबिक, बांग्लादेश में HIV रोगियों के लिए केवल एक ही विशेष अस्पताल, ढाका स्थित मोहाखाली संक्रामक रोग अस्पताल है। और यहाँ भी HIV/AIDS मरीजों के लिए सिर्फ 40 बेड उपलब्ध हैं। ये बेड लगभग पूरे साल भरे रहते हैं, जिसके चलते कई मरीजों को फर्श पर इलाज करवाना पड़ता है।

सर्जरी की ज़रूरत वाले मरीजों को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है और डॉक्टरों का कहना है कि बुनियादी ढाँचे की कमी मरीजों की जान पर खतरा बन रही है। कार्यक्रम के निदेशक डॉ. एम. खैरुज्जमान के अनुसार इसकी जाँच के लिए टेस्टिंग किटों की भी कमी है। साथ ही, इलाज करने के लिए प्रशिक्षित कर्मियों की भी जरूरत है।

प्रवासी श्रमिक और सामाजिक कलंक का डर

इन सबके अलावा HIV/AIDS से जुड़ा कलंक भी एक बड़ी बाधा है। बड़ी संख्या में लोग समाज में बदनामी के डर से इसकी जाँच तक कराने या फिर इलाज कराने से बचते हैं। बांग्लादेश में रहने वाले प्रवासी श्रमिकों को भी HIV का बड़ा वाहक माना जाता है। मध्य पूर्वी देशों से लौटने वाले कई श्रमिक HIV के साथ लौटते हैं और अंतत: बांग्लादेश में HIV के मामलों में बढ़ोतरी की वजह बनते हैं।

बांग्लादेश में ‘खास आबादी’ के कारण बढ़ रहे HIV के केस

बांग्लादेश में नैशनल AIDS/STD कंट्रोल प्रोग्राम की डिप्टी डायरेक्टर जुबैदा नसरीन देश में बढ़ते मामलों के लिए ‘खास आबादी’ में की गई टेस्टिंग को जिम्मेदारी बताती हैं। इस खास आबादी में ‘ड्रग्स लेने वाले लोग, महिला और पुरुष सेक्स वर्कर और ट्रांसजेंडर लोग’ शामिल हैं। नवंबर-अक्टूबर के दौरान इस आबादी के 1.17 लाख लोगों का टेस्ट किया गया जो पिछले साल से करीब 20,000 अधिक है।

बांग्लादेश में नई अंतरिम सरकार के बाद भी दिक्कतें बढ़ी हैं। अधिकारियों ने कहा कि पिछले साल मध्य में सरकारी प्रोग्राम के खत्म होने से खास आबादी के बीच कंडोम, सुई और सिरिंज बांटने जैसी बचाव सेवाओं में रुकावट आई है।

डेटा के मुताबिक, नए मामलों में 56% मुख्य आबादी के, 12% माइग्रेंट, 11% रोहिंग्या और बाकी आम लोग थे। इनमें भी 81% पुरुष, 18% महिलाएँ और 1% ट्रांसजेंडर थे। आँकड़ों को और गहराई से देखने पर पता चलता है कि इनमें भी शादीशुदा लोगों की संख्या अधिक थी। 52% शादीशुदा और 42% सिंगल थे जबकि अन्य लोग विधवा या तलाकशुदा थे।

बांग्लादेश में नहीं कम हो रहे HIV के मामले

बांग्लादेश के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी देश में HIV इन्फेक्शन और मौतों को लेकर परेशान हैं। 2010 से दुनिया भर में HIV इन्फेक्शन में 40% और AIDS से जुड़ी मौतों में 56% की कमी आई है। हालाँकि, बांग्लादेश के लिए इस सफलता को दोहराना अभी भी चुनौती ही बना हुआ है। हाल के वर्षों में टेस्टिंग बढ़ी है लेकिन सरकार के रोकथाम के उपाय अभी भी बढ़ती मौतों की संख्या में दिखाई देने वाली तेजी को कम नहीं कर पा रहे हैं।

DGHS अब डेडिकेटेड सेंटर्स पर HIV मरीजों के लिए टेस्टिंग जारी रखने और दवा देने के लिए विदेशी डोनर्स पर निर्भर है। हालाँकि, यहाँ भी फंडिंग की कमी के कारण 25 जिले इन सेवाओं की कवरेज से बाहर हैं। बांग्लादेश में HIV के केसों की संख्या बढ़ती जा रही है लेकिन इनके लिए बचाव की सेवाओं की भारी कमी है और इसके चलते हेल्थ एक्सपर्ट्स में चिंता बढ़ गई है।

बांग्लादेश ने 2030 तक AIDS को खत्म करने का टारगेट रखा है लेकिन जिस तरह मामलों में कमी की जगह बढ़ोतरी हो रही है इस लक्ष्य का हासिल होना लगभग नामुमकिन ही लग रहा है। इसके उलट डर है कि प्रिवेंटिव सर्विस के लिए कम फंडिंग से पॉजिटिविटी रेट और बढ़ सकता है।

मोटापा कम करने वाली दवाइयों से आ रहे आत्महत्या के खयाल, भारत में रिकॉर्ड बिक्री वाली दवा भी बन रही मुसीबत: ऑस्ट्रेलिया की चेतावनी और WHO की गाइडलाइंस के बीच भारत के लिए क्या हैं चुनौतियाँ?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने हाल में GLP-1 ड्रग्स जैसे- सेमाग्लूटाइड, लिराग्लूटाइड, टिरजेपाटाइड/Mounjaro आदि को मोटापे के लंबी अवधि के इलाज के लिए एक बड़ा ‘ब्रेकथ्रू’ मानते हुए पहली वैश्विक गाइडलाइन जारी की, लेकिन इसे ‘कंडीशनल’ यानी सावधानी के साथ लागू करने की सिफारिश भी दी है।

ऑस्ट्रेलिया में इन दवाओं की एक तरफ भारी डिमांड और शॉर्टेज है तो दूसरी तरफ रेगुलेटर ने इन दवाओं से मानसिक स्वास्थ्य और सुयसाइडल थॉट्स से जुड़े संभावित जोखिम को लेकर चेतावनी जारी की है। भारत में Mounjaro के अक्टूबर में हुए रिकॉर्ड सेल के बीच यही मुद्दे भविष्य की बड़ी पॉलिसी और पब्लिक-हेल्थ बहस को जन्म दे रहे हैं।

WHO ने गाइडलाइंस में किन बातों को किया शामिल

WHO की पहली GLP-1 गाइडलाइन में कहा गया है कि इन्हें वयस्कों में मोटापे के लंबे इलाज के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। हालाँकि गर्भवती महिलाओं को इससे बाहर रखा गया है और फैसले को ‘कंडीशनल’ रखा गया है, क्योंकि लंबे समय की सुरक्षा, कीमत और हेल्थ सिस्टम की तैयारी पर डेटा सीमित है।

Mounjaro असल में एक इंजेक्शन है। यह एक प्री-फिल्ड इंजेक्शन पेन के रूप में आता है। इसे डॉक्टर की सलाह पर लिया जा सकता है। इसका उपयोग टाइप-2 मधुमेह वाले लोगों में शुगर को नियंत्रित करने और वजन प्रबंधन के लिए किया जाता है। खुराक के लिहाज से इसे हर सप्ताह एक बार इंजेक्शन के रूप में लिया जाता है।

गाइडलाइन यह भी जोर देती है कि ये दवाएँ इकलौती ‘मैजिक शॉट’ नहीं हैं, बल्कि इनके साथ इंटेंसिव बिहेवियरल थेरेपी जैसे डाइट, एक्सरसाइज और काउंसिलिंग आदि को अनिवार्य हिस्से के तौर पर जोड़ी जानी चाहिए, ताकि वजन घटने के साथ जीवनशैली में स्थायी बदलाव भी हों।

गाइडलाइंस में WHO ने मोटापे को ‘क्रॉनिक, रिलैप्सिंग डिजीज’ मानते हुए देशों से कहा है कि वे एक पूरा ‘obesity ecosystem’ बनाएँ। इसमें पब्लिक हेल्थ नीतियाँ, प्रिवेंशन, शुरुआती स्क्रीनिंग और जरूरतमंदों के लिए दीर्घकालिक, सस्ते इलाज तक पहुँच शामिल हो।

क्या कहते हैं आधिकारिक आँकड़े?

दुनिया में एक अरब से ज्यादा लोग मोटापे से प्रभावित हैं और 2024 में मोटापे के कारण 37 लाख से अधिक मौतों से जुड़ा माना गया, ऐसे में WHO की नजर में GLP-1 दवाएँ एक बड़े पब्लिक-हेल्थ टूल की तरह हैं, लेकिन इन तक असमान पहुँच से हेल्थ इक्विटी और भी बिगड़ सकती है।​

भारत जैसे देशों के लिए यह चुनौती दोहरी है। एक ओर शहरी और मिडिल-क्लास आबादी में तेजी से मोटापा और मेटाबॉलिक सिंड्रोम बढ़ रहा है। दूसरी ओर, पब्लिक हेल्थ बजट और इंफ्रास्ट्रक्चर की सीमाएँ महँगी इंजेक्टेबल थेरेपी को वैश्विक बनाने में बाधा बनती हैं।

WHO की नीति क्या कहती है

WHO के मुताबिक GLP-1 थेरेपीज को तीन चर्णों वाली व्यापक नीति का हिस्सा होना चाहिए। इसमें पहला, ऐसा वातावरण बनाना जहाँ अस्वस्थ खाद्य विकल्प और सिडेंटरी लाइफस्टाइल को पॉलिसी स्तर पर प्रोत्साहन न दिया जाए।

दूसरा, हाई-रिस्क आबादी की शुरुआती स्क्रीनिंग और टारगेटेड इंटरवेंशन किए जाएँ और तीसरा, जिन लोगों को मोटापा है, उनके लिए लाइफ-लॉन्ग, पर्सन-सेंट्रिक केयर की व्यवस्था की जानी शामिल है।

WHO ने यह भी चेतावनी दी है कि अगर मूल्य, सप्लाई और हेल्थ सिस्टम की तैयारी पर ध्यान नहीं दिया गया तो GLP-1 ड्रग्स सिर्फ अमीर देशों और अमीर वर्गों के लिए ही उपलब्ध रहेंगे। इससे हेल्थ इक्विटी और ज्यादा खराब हो सकती है।​

ऑस्ट्रेलिया में GLP-1 का क्या पड़ा असर?

ऑस्ट्रेलिया में अचानक बढ़ी डिमांड ने Ozempic और दूसरे GLP-1 इंजेक्शनों की सप्लाई चेन को बुरी तरह झकझोर दिया। खासकर तब जब इन्हें डायबिटीज के बजाय वजन घटाने के लिए बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाने लगा।

ऑस्ट्रेलिया में Ozempic (सेमाग्लूटाइड) जैसी दवाओं की कमी पिछले कुछ साल से गंभीर मुद्दा रही है। रेगुलेटर TGA ने इसे ग्लोबल डिमांड और मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी की सीमाओं से जुड़ा बताया है, और Mounjaro तथा Trulicity जैसे विकल्पों पर भी आपूर्ति का दबाव ( सप्लाई प्रेशर) बताया है।​

वजन घटाने के लिए हाई-प्रोफाइल सोशल मीडिया प्रचार ने डायबिटीज मरीजों के लिए जरूरी डोज की उपलब्धता को प्रभावित किया। इससे डॉक्टरों पर ऑल्टरनेट ड्रग्स प्रिस्क्राइब करने और क्लिनिकल प्रायोरिटी तय करने का दबाव भी बढ़ा।​

नवंबर 2025 में TGA ने पूरे GLP-1 RA क्लास (Ozempic, Wegovy, Saxenda, Trulicity, Mounjaro आदि) पर नई सेफ्टी अलर्ट जारी किए। इनमें गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल साइड इफेक्ट्स और पैंक्रीटाइटिस के साथ आत्महत्या के खयाल या बिहेवियर के जोखिम को लेकर चेतावनी को प्रमुख माना गया है ताकि डॉक्टर और मरीज दोनों हाई-रिस्क केस को पहचान कर समय पर दवा रोक सकें।​

मानसिक स्वास्थ्य के मोर्चे पर अब भी खोज जारी

वैज्ञानिकों की ओर से किए गए शोध के अनुसार, कुछ डेटा में GLP-1 लेने वालों में डिप्रेशन या आत्महत्या-संबंधी घटनाओं का जोखिम हल्का बढ़ा दिखता है। हालाँकि यह अब तक साफ नहीं है कि दवा इसका सीधा कारण है या फिर मोटापे, तेजी से वजन घटने, बॉडी-इमेज प्रेशर और पहले से मौजूद मानसिक बीमारियों का मिला-जुला असर है।

इसी के कारण WHO और रेगुलेटर्स दवाओं को बैन करने के बजाय ‘कड़े मॉनिटरिंग मोड’ में रखना चाह रहे हैं। इसका मतलब है कि प्रिस्क्रिप्शन से पहले मानसिक स्वास्थ्य का बेसलाइन असेसमेंट और उपचार के शुरुआती महीनों में मूड, एंग्जायटी और आत्महत्या के खयालों की सक्रिय स्क्रीनिंग की जाए।​

क्या पड़ रहा है GLP-1 दवा का मानसिक स्वास्थ्य पर असर

अभी तक की मनोवैज्ञानिक रिसर्च यह बताती है कि GLP-1 ड्रग्स लेने वाले मोटापे से ग्रस्त लोगों में अवसाद या सुसाइड-रिलेटेड इवेंट्स का जोखिम कुछ स्तर पर बढ़ा हुआ दिखा है। हालाँकि इसके कारण और असर (कैजुअलिटी) पर अब तक कोई ठोस बातें सामने नहीं आ सकी हैं।

WHO और रेगुलेटर्स का मानना है कि जैसे-जैसे लाखों लोग ये दवाएँ ले रहे हैं, वैसे वैसे ही दुर्लभ लेकिन गंभीर न्यूरोसाइकेट्रिक साइड इफेक्ट्स की निगरानी भी जरूरी हो गई है। ऐसे में इन दवाओं पर तुरंत बैन लगाने के बजाय लेबल पर वार्निंग्स और फार्माकोविजिलेंस रिपोर्टिंग को मजबूत किया जा रहा है।​

क्लिनिकल प्रैक्टिस में विशेषज्ञ दो स्तर पर सावधानी की बात कहते हैं। पहली, प्रिस्क्रिप्शन से पहले मरीज का मानसिक स्वास्थ्य इतिहास जाँचना जिसमें डिप्रेशन, पुरानी सुसाइडल आइडिएशन, सब्स्टेंस यूज के बारे में पूरी जानकारी शामिल हो। दूसरी, थेरेपी के शुरुआती महीनों में मूड, एंजायटी, इरिटेबिलिटी और सेल्फ-हार्म थॉट्स की सक्रिय स्क्रीनिंग की जाए और जरूरत पड़ने पर दवा रोकी जाए।

भारत में Mounjaro की बिक्री और इससे जुड़ी चुनौती

अक्टूबर 2025 में Eli Lilly की GLP-1 दवा Mounjaro (टिरजेपाटाइड) भारत में ‘वैल्यू टर्म्स’ में सबसे ज्यादा बिक्री वाली दवा बन गई। एक महीने में लगभग 1 अरब रुपये की बिक्री हुई और रिपोर्टों के मुताबिक इसकी खपत Wegovy की तुलना में डोज वॉल्यूम में कई गुना अधिक रही।​

देश GLP-1 ट्रेंड का एक बड़ा बाजार बन चुका है और मोटापा उपचार का यह मॉडल तेजी से मेनस्ट्रीम हो रहा है। भारतीय GLP-1 बाजार 2025 तक लगभग 27 प्रतिशत वार्षिक दर से बढ़कर 6.06 अरब रुपये के आसपास पहुँच चुका है। 2030 तक ये 34 प्रतिशत से ज्यादा की कंपाउंड ग्रोथ की संभावना जताई जा रही है। इससे पता लगता है कि ये सिर्फ ‘फैड’ नहीं, बल्कि स्ट्रक्चरल ट्रेंड बन चुका है।​

Eli Lilly कंपनी ने भारत में करीब 1 अरब डॉलर का निवेश किया। हैदराबाद में मैन्युफैक्चरिंग और क्वालिटी हब बनाकर कंपनियाँ सप्लाई शॉर्टेज से सीख लेकर लोकल प्रोडक्शन और कॉस्ट कंट्रोल के जरिए इस माँग को स्थिर करने की कोशिश कर रही हैं।

हालाँकि इसे लेकर चुनौतियाँ भी हैं। ये चुनौती तीन स्तरों पर है- पहली, इसकी कीमत काफी अधिक है और इंश्योरेंस कवरेज सीमित है। इससे इलाज शहरी और समृद्ध वर्ग तक ही सिमट जाता है।

दूसरी चुनौती, अगर ऑस्ट्रेलिया के जैसा ‘कॉस्मेटिक वेट लॉस’ का ट्रेंड बढ़ा तो डायबिटीज और गंभीर मोटापे वाले मरीजों के लिए भविष्य में आपूर्ति संकट पैदा हो सकता है।

इसके अलावा तीसरी चुनौती ये है कि मानसिक स्वास्थ्य पर इसका असर पड़ेगा। डिप्रेशन, बॉडी-इमेज डिस्ट्रेस और आत्महत्या की सोच से जुड़े केस बढ़े तो पहले से दबाव में चल रही मानसिक स्वास्थ्य प्रणाली के लिए यह बड़ा बोझ बन सकता है।​

भारत के रेगुलेटर और नीति नियानकों के लिए सवाल यह नहीं है कि GLP-1 ड्रग्स ‘चमत्कार’ हैं या ‘खतरा’, बल्कि यह है कि इन्हें किस फ्रेमवर्क के तहत अपनाया जाए। कठोर इंडिकेशन, लॉन्ग-टर्म फॉलो-अप, मानसिक स्वास्थ्य मॉनिटरिंग और कीमत-सप्लाई पर स्पष्ट पब्लिक-इंटरेस्ट पॉलिसी के साथ या फिर मार्केटिंग और सोशल मीडिया ट्रेंड्स के भरोसे जैसे कई बिंदुओं पर फ्रेमवर्क करना पड़ेगा।

मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना जरूरी

मोटापा कम करने की दवा की भारी माँग के बीच इस बात पर गौर करना जरूरी है कि भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली में मानसिक स्वास्थ्य संसाधन पहले से ही काफी सीमित हैं। ऐसे में अगर GLP-1 के उपयोग के साथ मूड में बदलाव, बॉडी-इमेज डिस्ट्रेस या सुसाइडल आइडिएशन जैसे केस बढ़ते हैं, तो इंटरडिसिप्लिनरी केयर मॉडल यानी एंडोक्राइनोलॉजिस्ट, साइकियाट्रिस्ट और काउंसलर की संयुक्त टीम की आवश्यकता बढ़ जाएगी।

रिसर्च में ये भी सामने आया है कि कुछ मरीज तेजी से वजन घटने के साथ सोशल प्रेशर, बॉडी-डिस्मॉर्फिक टेंडेंसी और रिबाउंड वेट गेन के डर से भी मानसिक तनाव अनुभव करते हैं। ये असल में बायोलॉजिकल साइड इफेक्ट के बजाय कॉम्प्लेक्स साइकोसोशल डायनेमिक्स की ओर इशारा करते हैं।

WHO की नई गाइडलाइन असल में भारत जैसे देशों को यह संकेत देती है कि अगर मोटापा और उससे जुड़े रोगों को गंभीरता से लेना है तो GLP-1 जैसी दवाएँ जरूरी टूल तो हो सकती हैं, लेकिन असली काम हेल्थ इक्विटी सुनिश्चित करने, हेल्थ सिस्टम को तैयार करने और मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा के मजबूत ढाँचे खड़े करने में है।

अगर आत्महत्या के खयाल दिल में तेजी से घर करते हैं या आगे के शोध में इस चेतावनी के व्यापक असर सामने आते हैं तो भारत के लिए दवा की आपूर्ति के साथ ही साइकियाट्रिक साइड-इफेक्ट के मुद्दे से भी दो- चार होना पड़ेगा।

बंगाल में वक्फ और SIR पर नरमी, ममता बनर्जी की दलीय राजनीति या वोट बैंक पैंतरा?

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल-ही में अपनी पॉलिसी में बदलाव दिखाया है। वह वक्फ संशोधन कानून (Waqf Amendment Act) और वोटर लिस्ट पुनरीक्षण (SIR) जैसे संवेदनशील मसलों पर नरम रुख अपना रही हैं।

यह नरमी केवल विचारधारा या प्रशासनिक विवेक का नहीं, बल्कि स्पष्ट चुनावी रणनीति प्रतीत होती है। 2026 की विधानसभा चुनावी तैयारी के मद्देनज़र बंगाल के मुस्लिम वोटरों को संतुष्ट करने और धर्म-आधारित वोट बैंक को सुरक्षित रखने का यह कदम है जिसकी मंशा और असर दोनों पर हमें विचार करना चाहिए। 

पहले जब वक्फ संशोधन कानून आया, तो ममता ने इसे ‘मुसलमानों के अधिकारों पर हमला’ करार दिया। उन्होंने कहा कि यह विधेयक एक धर्म विशेष के खिलाफ है, एक एंटी-फेडरल और एंटी-सेक्युलर साजिश है।

मसले की संवेदनशीलता को देखते हुए, वक्फ संपत्तियों के नियंत्रण और प्रबंधन में पारदर्शिता लाना कानून का उद्देश्य था। हालाँकि, इस बिल के विरोध ने हिंसा और सांप्रदायिक अस्थिरता को जन्म दिया मुर्शिदाबाद व मालदा जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में हिंदुओं की दुकानों पर हमले हुए थे।

फिर भी, चुनाव से पहले ममता ने अचानक कहा कि वक्फ कानून पश्चिम बंगाल में लागू नहीं किया जाएगा। यह अचानक नरमी बिल्कुल उसी तरह जैसे वोटर लिस्ट पुनरीक्षण (SIR) पर उनकी भाषा बदली।

पहले उन्होंने SIR की मुखर आलोचना की थी, और इसका लक्ष्य ‘छुपे हुए’ नागरिकता रजिस्टर (NRC) लाना माना था। पर अब वही सरकार राज्य में SIR को आगे बढ़ा रही है और मतदाता सूची में संशोधन कराने में जुटी है। 

यह बदलाव सहज या विचार-परिवर्तन प्रतीत नहीं होता बल्कि स्पष्ट राजनीतिक गणना जैसा नजर आता है। बंगाल में कम से कम 27% मुस्लिम मतदाता हैं और कम-से-कम 100 सीटें ऐसी हैं जहाँ बिना मुस्लिम वोटों के जीतना मुमकिन नहीं।

चुनाव के पहले ऐसे महत्वपूर्ण फैसलों के माध्यम से ममता बनर्जी साफ संदेश दे रही हैं कि वे अपनी ‘मुस्लिम मददगार’ वोट-बैंक को अहमियत दे रही हैं और साथ ही, अपनी पार्टी के लिए असुरक्षित हिंदू मतदाताओं को भी अस्थिरता की चिंता में छोड़ रही हैं।

लेकिन सवाल उठता है- क्या यह ‘सौहार्द’ है या सत्ता बचाने का समीकरण? वक्फ कानून के केस में पारदर्शिता और जवाबदेही लाने का प्रयास था जिससे अवैध कब्जे, संपत्ति के दुरुपयोग और धार्मिक निधियों के भ्रष्ट प्रयोग को रोका जा सके।

इधर किसी भी तथ्य-आधारित बीच-बचाव के बजाय, राजनीतिक समीकरण के चलते कानून को ठेंगा दिखाना, राज्य प्रशासन की जवाबदेही और संवैधानिक धर्म-निरपेक्षता दोनों के लिए खतरनाक precedent हो सकता है।

साथ ही, SIR वोटर लिस्ट पुनरीक्षण प्रक्रिया, जिसपर पहले यह आरोप लगाया जाता था कि यह ‘छुपा NRC’ है, अब उसी प्रक्रिया को प्रोत्साहित करना, खासकर ऐसी आबादी वाले जिलों में जहाँ पिछले 50 सालों से अवैध प्रवास और अव्यवस्थित वोटर नामांकन को लेकर विवाद रहे हैं, यह साफ संकेत है कि वोट बैंक बदलने की कोशिश हो रही है।

बिना पूरी पारदर्शिता, सुनियोजित जनगणना और नागरिकता व दस्तावेजों की सत्य-जाँच के, यह प्रक्रिया तर्कसंगत लोकतंत्र के लिए खतरा बन सकती है।

इसमें सबसे महत्वपूर्ण, बंगाल जैसे राज्य में, जहाँ विभाजनकारी ताकतों का दायरा हमेशा रहा है, अल्पसंख्यकों के नाम पर वोट बैंक और धर्मनिरपेक्षता दोनों का इस्तेमाल करना- यह रणनीति कहीं न कहीं सामाजिक सामंजस्य और असली हिन्दू–बंगाली पहचान को तहस-नहस कर रही है।

चुनावों से पहले कोई भी जनाधार वाला नेता नहीं चाहेगा कि उसके कोर वोटर्स उससे खफा हो जाएँ और ममता बनर्जी ने ठीक वही किया है। हमारे देश के लिए यह चिंता की बात है कि लोकतंत्र मात्र वोटों तक सीमित न रह जाए उसकी आत्मा यानी संविधान, नागरिकता, एकता और धर्म-निरपेक्षता की रक्षा पहले हो।

हालाँकि जब राजनीतिक फायदे के लिए संवेदनशील मसलों पर नरमी, कानून की अवहेलना और वोट बैंक की राजनीति हो, तो इससे सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता को घात हो सकता है।

इसलिए बंगाल में वक्फ कानून और SIR के प्रति ममता बनर्जी के बदलते रुख को केवल चुनावी जुगाड़ नहीं, बल्कि राजनैतिक सोची हुई चाल समझना चाहिए जो कि यदि रुकी नहीं गई, तो आने वाले दिनों में कई तरह की विभाजनात्मक राजनीति और सामाजिक अस्थिरता की जड़ बन सकती है।

साउथ कोरिया में 1.20 लाख ‘होम कैमरे’ हैक, अश्लील कंटेंट बनाकर करोड़ों में बेचा: जानें हैकर्स ने कैसे IP में लगाई सेंध और कैसे खुद को ऑनलाइन अटैक से बचाएँ?

साइबर सुरक्षा आज के दौर की सबसे बड़ी चुनौती है। हाल ही में साउथ कोरिया में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहाँ हैकर्स ने घरों और व्यवसायों में लगे 1,20,000 से अधिक इंटरनेट प्रोटोकॉल (IP) कैमरों को हैक कर लिया। हैकर्स ने इन कैमरों की फुटेज का इस्तेमाल करके अश्लील सामग्री बनाई और उसे एक विदेशी वेबसाइट पर बेचकर करोड़ों रुपए कमाए। यह घटना दिखाती है कि कैसे हमारी छोटी सी लापरवाही हमारी निजता (प्राइवेसी) और सुरक्षा पर भारी पड़ सकती है। इस मामले में पुलिस ने चार मुख्य आरोपितों को गिरफ्तार किया है और वेबसाइट को बंद करने की कार्रवाई कर रही है।

क्या है मामला और कैसे हुई हैकिंग?

यह पूरा मामला IP कैमरों (इंटरनेट प्रोटोकॉल कैमरे), जिन्हें आमतौर पर ‘होम कैम’ कहा जाता है, की सुरक्षा में मौजूद बड़ी कमियों से जुड़ा है। IP कैमरे, सुरक्षा के लिए इस्तेमाल होने वाले पुराने CCTV कैमरों का एक सस्ता और नया विकल्प हैं। इनकी खासियत यह है कि ये सीधे आपके इंटरनेट नेटवर्क से जुड़े होते हैं, जिससे आप दुनिया के किसी भी कोने से अपने मोबाइल फोन पर अपने घर, बच्चों या पालतू जानवरों पर नजर रख सकते हैं। साउथ कोरिया में चार लोगों ने इसी सुविधा का गलत फायदा उठाया। पुलिस ने उन्हें 1 लाख 20 हजार से ज्यादा IP कैमरों को हैक करने के आरोप में गिरफ्तार किया है।

इन हैक किए गए कैमरों की फुटेज निजी घरों, मनोरंजन स्थलों (कराओके रूम), व्यायामशालाओं (पिलेट्स स्टूडियो) और यहाँ तक कि डॉक्टरों के निजी क्लीनिकों जैसे संवेदनशील स्थानों से ली गई थी। हैकर्स ने इन निजी फुटेज को चुराया और उनका इस्तेमाल करके यौन शोषण से जुड़ी आपत्तिजनक सामग्री तैयार की। उन्होंने यह सामग्री एक विदेशी एडल्ट वेबसाइट पर बेच दी, जिससे उन्हें बड़ी कमाई हुई।

उदाहरण के लिए, एक आरोपित ने अकेले 63,000 कैमरे हैक करके 545 वीडियो बेचे और करीब ₹21 लाख की कमाई की। दूसरे आरोपित ने भी 70,000 कैमरे हैक करके लगभग ₹11 लाख कमाए। चौंकाने वाली बात यह है कि पिछले एक साल में उस अवैध वेबसाइट पर डाले गए वीडियो में से 62% इन्हीं दो आरोपितों ने बेचे थे, जिससे पता चलता है कि यह कितनी बड़े पैमाने पर किया गया अपराध था।

हैकिंग कैसे हुई?

IP कैमरों को हैक करने के लिए अपराधियों ने कोई बहुत बड़ी तकनीकी चालाकी नहीं दिखाई, बल्कि उन्होंने एक आम गलती का फायदा उठाया। इन कैमरों को हैक करने का मुख्य कारण था कमजोर और पहले से सेट किए गए पासवर्ड (डिफ़ॉल्ट पासवर्ड)। जब कोई नया IP कैमरा खरीदकर लगाता है, तो वह अक्सर ‘123456’, ‘0000’ या ‘ABCD’ जैसे बहुत ही आसान पासवर्ड के साथ आता है। बहुत से लोग इन डिफॉल्ट पासवर्ड को बदलना भूल जाते हैं और हैकर्स इन्हीं सरल पासवर्ड को निशाना बनाते हैं क्योंकि वे आसानी से अनुमान लगाए जा सकते हैं।

इसके अलावा, हैकिंग की दूसरी वजह यह थी कि बहुत से सस्ते या पुराने कैमरों के सॉफ्टवेयर में सुरक्षा की कमियाँ (Security Holes) होती हैं। अगर कैमरे के सॉफ्टवेयर को समय पर अपडेट नहीं किया जाए, तो ये कमियाँ खुली रह जाती हैं। हैकर्स इंटरनेट पर ऐसे सभी कैमरों को स्कैन करते हैं जिनकी सुरक्षा कमजोर है। एक बार उन्हें कमजोर पासवर्ड या सॉफ्टवेयर की खामी वाला कैमरा मिल जाता है तो वे रिमोट हैकिंग (दूर बैठे) के जरिए कहीं से भी कैमरे के पूरे सिस्टम तक पहुँच बना लेते हैं और उसकी लाइव फुटेज को रिकॉर्ड कर लेते हैं।

पुलिस ने बताया कि इस मामले में पकड़े गए चारों अपराधी किसी एक बड़े गिरोह का हिस्सा नहीं थे, बल्कि वे अलग-अलग काम कर रहे थे। हालाँकि, उन सभी का तरीका और लक्ष्य एक ही था- कमजोर सुरक्षा वाले IP कैमरों को निशाना बनाना और अवैध फुटेज बेचकर पैसा कमाना। यह साफ दिखाता है कि हमारी छोटी सी लापरवाही (पासवर्ड न बदलना) हैकर्स के लिए कितनी बड़ी कमाई का जरिया बन सकती है।

यौन शोषण और हैकिंग से खुद को कैसे बचा सकते हैं?

IP कैमरों की हैकिंग और यौन शोषण जैसे साइबर अपराधों से खुद को बचाना बहुत मुश्किल नहीं है, इसके लिए बस थोड़ी सी सावधानी और जागरूकता दिखानी होगी। आपको अपनी ऑनलाइन आदतों में कुछ बदलाव लाने होंगे ताकि अपराधी आपकी सुरक्षा में सेंध न लगा सकें।

IP कैमरा हैकिंग से बचाव के आसान तरीके- अपनी सुरक्षा को और पक्का करने के लिए, आपको हर छह महीने में अपना पासवर्ड बदलते रहना चाहिए और एक ही पासवर्ड का इस्तेमाल अलग-अलग डिवाइस या अकाउंट के लिए कभी न करें। अगर आपके कैमरे के ऐप या वेबसाइट में टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन (MFA) की सुविधा है, तो उसे हमेशा ऑन रखें। इससे लॉगिन के लिए पासवर्ड के साथ-साथ आपके मोबाइल पर आया एक कोड भी डालना जरूरी होगा।

कैमरे को सुरक्षित रखने के लिए, उसके मैन्युफैक्चरर द्वारा जारी किए गए सॉफ्टवेयर अपडेट को समय पर इंस्टॉल करें, क्योंकि ये अपडेट सुरक्षा की कमियों को दूर करते हैं। इसके अलावा, अपने वाई-फाई राउटर का पासवर्ड भी जटिल रखें और WPA2 या WPA3 एन्क्रिप्शन का उपयोग करें। हमेशा भरोसेमंद और हाई-क्वालिटी ब्रांड के कैमरे ही खरीदें जो मजबूत सुरक्षा सुविधाएँ, जैसे एन्क्रिप्शन, देते हों। अंत में, अगर आपको लगे कि आपका कैमरा अपने आप हिल रहा है या ज़ूम हो रहा है (जिसे संदिग्ध गतिविधि कहते हैं), तो तुरंत अलर्ट हो जाएँ, पासवर्ड बदलें और कैमरा इंटरनेट से डिसकनेक्ट कर दें।

यौन शोषण और सेक्सटॉर्शन से खुद को बचाना- यौन शोषण और सेक्सटॉर्शन (ब्लैकमेलिंग) जैसे खतरों से बचने के लिए, आपको अपनी ऑनलाइन आदतों में बहुत सावधानी बरतनी होगी। किसी भी अनजान व्यक्ति से, खासकर डेटिंग ऐप्स या सोशल मीडिया पर, अपनी संवेदनशील तस्वीरें या वीडियो कभी भी साझा न करें। अपनी निजी फुटेज को क्लाउड स्टोरेज (जैसे गूगल ड्राइव) पर या इंटरनेट से जुड़े डिवाइस पर बिना मजबूत सिक्योरिटी के स्टोर न करें।

अगर कोई अजनबी आपको वीडियो कॉल करता है या संदिग्ध व्यवहार करता है तो उसमें शामिल होने से बचें, क्योंकि साइबर अपराधी अक्सर पहले आपका वीडियो रिकॉर्ड करते हैं और फिर आपको ब्लैकमेल करते हैं। अगर आप ब्लैकमेल के शिकार हो जाते हैं तो डरकर कभी भी पैसे न दें, क्योंकि इससे ब्लैकमेलिंग रुकती नहीं, बल्कि और बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में, तुरंत अपने नजदीकी पुलिस स्टेशन के साइबर सेल में जाकर रिपोर्ट करें। माता-पिता के लिए यह जरूरी है कि वे अपने बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षा, निजता के महत्व और आपत्तिजनक सामग्री से दूर रहने के बारे में सही जानकारी दें, ताकि वे खुद को सुरक्षित रख सकें।

जागरूकता के लिए साइबर सुरक्षा वेबसाइट और हेल्पलाइन

साइबर अपराधों से बचाव के लिए जागरूकता सबसे बड़ा और ज़रूरी हथियार है। भारत सरकार ने लोगों को जागरूक करने और उनकी मदद करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। ऐसी ही कुछ वेबसाइटें और हेल्पलाइन यहाँ दी गई हैं।

सबसे पहले है साइबर दोस्त (Cyber Dost)। यह भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा चलाई गई एक पहल है, जिसका मुख्य काम लोगों को साइबर सुरक्षा के बारे में जागरूक करना है। ‘साइबर दोस्त’ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लगातार साइबर सुरक्षा से जुड़े छोटे-छोटे टिप्स, सलाह और नई खतरों के बारे में चेतावनियाँ साझा करता रहता है, ताकि लोग ऑनलाइन फ्रॉड से बच सकें।

दूसरा महत्वपूर्ण साधन है भारत सरकार का आधिकारिक पोर्टल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल (cybercrime.gov.in)। अगर आपके साथ कोई भी ऑनलाइन धोखाधड़ी, यौन शोषण, या किसी भी तरह का साइबर अपराध होता है तो आप इस पोर्टल पर जाकर तुरंत अपनी शिकायत दर्ज कर सकते हैं। यह पोर्टल सीधे पुलिस से जुड़ा हुआ है।

इसके अलावा, डिजिटल सेक्स क्राइम पीड़ित सहायता केंद्र (Digital Sex Crime Victim Support Center) विशेष रूप से डिजिटल यौन अपराधों के शिकार लोगों के लिए बनाया गया है। यह केंद्र पीड़ितों को भावनात्मक परामर्श (काउंसलिंग) देता है, उनकी आपत्तिजनक ऑनलाइन सामग्री को हटाने या ब्लॉक करने में मदद करता है और उन्हें जरूरी कानूनी सहायता भी देता है। ये सभी संसाधन मिलकर यह सुनिश्चित करते हैं कि नागरिक साइबर दुनिया में सुरक्षित रहें और जरूरत पड़ने पर उन्हें तुरंत मदद मिल सके।

निजता पर बढ़ता हमला

साउथ कोरिया में IP कैमरों की यह बड़ी हैकिंग सिर्फ एक चोरी या अपराध की घटना नहीं है, बल्कि यह एक बहुत बड़ी चेतावनी है कि इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) के इस दौर में हमारी निजी ज़िंदगी (प्राइवेसी) कितनी खतरे में है। यह घटना साफ तौर पर दिखाती है कि जिन कैमरों और उपकरणों को हम अपने घर की सुरक्षा के लिए लगाते हैं, वे ही हमारी सबसे बड़ी कमजोरी बन सकते हैं और हमारी निजी फुटेज को बाहर लीक कर सकते हैं।

सभी स्मार्टफोन्स में संचार साथी ऐप, साइबर अपराध रोकना मकसद-जरूरत न हो तो कर सकते हैं डिलीट: जानें- इससे क्या होगा फायदा

भारत सरकार ने साइबर सुरक्षा को मजबूत करने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। दूरसंचार मंत्रालय ने शुक्रवार (28 नवंबर 2025) को एक आदेश जारी किया, जिसमें सभी नए स्मार्टफोन्स पर ‘संचार साथी’ ऐप को प्रीलोड करने का निर्देश दिया गया है। हालाँकि केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा है कि जो लोग ये ऐप नहीं रखना चाहते, वो इसे डिलीट कर सकते हैं। ये वैकल्पिक है।

आदेश के मुताबिक, एप्पल, सैमसंग, वीवो, ओप्पो और शाओमी जैसी प्रमुख कंपनियों को 90 दिनों के अंदर यह सुनिश्चित करना होगा। सप्लाई चेन में पहले से मौजूद डिवाइसेज पर ओटीए (ओवर-द-एयर) अपडेट के जरिए ऐप पुश किया जाएगा। यह पहली बार है जब भारत में किसी सरकारी ऐप को हर डिवाइस पर अनिवार्य किया गया है, हालाँकि यूजर चाहे तो इसे बंद कर सकता है या डिलीट कर सकता है।

संचार साथी ऐप की क्या है खासियत?

संचार साथी ऐप जनवरी 2024 में लॉन्च हुआ था और अब तक 50 लाख से ज्यादा डाउनलोड हो चुके हैं। यह ऐप यूजर्स को फ्रॉड कॉल्स रिपोर्ट करने, चोरी या खोए हुए फोन को आईएमईआई नंबर से ब्लॉक करने, डिवाइस की वैधता जाँचने और फर्जी सिम कनेक्शन्स काटने जैसे कई काम करता है। एक केंद्रीय रजिस्ट्री के जरिए यह सभी टेलीकॉम नेटवर्क पर काम करता है।

सरकार के आँकड़ों के मुताबिक, इस ऐप ने 7 लाख से ज्यादा खोए फोन रिकवर कराए हैं, जिसमें अक्टूबर में अकेले 50,000 फोन शामिल हैं। साथ ही, 3.7 करोड़ चोरी के फोन ब्लॉक किए गए और 30 मिलियन फर्जी कनेक्शन बंद हुए।

इस फैसले से साइबर सुरक्षा के लिहाज से बड़ा फायदा होगा। भारत में 1.2 अरब से ज्यादा मोबाइल सब्सक्राइबर्स हैं और साइबर क्राइम में तेजी से इजाफा हो रहा है। डुप्लीकेट या स्पूफ्ड आईएमईआई नंबर्स से स्कैम और नेटवर्क दुरुपयोग आम हो गया है। ऐप से यूजर्स को फोन ट्रैकिंग, पुलिस को डिवाइस ट्रेस करने में मदद मिलेगी और ब्लैक मार्केट में नकली फोनों की बिक्री रुकेगी।

साइबर सुरक्षा के लिए बेहद अहम, चोरियों पर लगेगी लगाम

विशेषज्ञों का कहना है कि यह कदम साइबर थ्रेट्स को रोकने में मील का पत्थर साबित होगा। काउंटरपॉइंट रिसर्च के डायरेक्टर तरुण पाठक ने कहा, “यह ऐप साइबर अपराधों को रोकने के लिए जरूरी है, लेकिन कंपनियों की ओर से चुनौतियाँ जरूर मिलेंगी।”

फोन खोने या चोरी की स्थिति में यह ऐप बेहद सहायक साबित होगा। यूजर ऐप के जरिए तुरंत आईएमईआई ब्लॉक कर सकता है, जिससे चोर फोन का इस्तेमाल न कर सके। केंद्रीय डेटाबेस से ट्रैकिंग आसान हो जाती है और पुलिस को लोकेशन ट्रेस करने में मदद मिलती है। सरकार का दावा है कि इससे नुकसान कम होगा और यूजर्स की सुरक्षा बढ़ेगी।

कुछ कंपनियाँ कर सकती हैं सरकार के फैसले का विरोध

हालाँकि, यह फैसला कई कंपनियों को नागवार गुजर रहा है। भारत में 4.5% स्मार्टफोन मार्केट शेयर रखने वाली एप्पल ने पहले ही सरकारी एंटी-स्पैम ऐप के लिए असहमति जताई थी। एप्पल की पॉलिसी में सेल से पहले किसी थर्ड-पार्टी ऐप इंस्टॉल करना मना है।

सूत्रों के मुताबिक, एप्पल ऐसी माँगों को हमेशा ठुकराती रही है। काउंटरपॉइंट के तरुण पाठक ने रॉयटर्स को बताया, “एप्पल मध्य मार्ग तलाशेगी, जैसे यूजर्स को इंस्टॉल के लिए नोटिफाई करना।” सैमसंग, वीवो, ओप्पो और शाओमी भी चुप्पी साधे हुए हैं, लेकिन इनका विरोध प्राइवेसी और यूजर चॉइस पर केंद्रित है।

प्राइवेसी एडवोकेट्स ने भी कड़ी आलोचना की है। टेक्नोलॉजी वकील मिशी चौधरी ने कहा, “सरकार यूजर कंसेंट को खत्म कर रही है। यह यूजर चॉइस को नजरअंदाज करता है।” हालाँकि अब सरकार की सफाई के बाद ये तय हो गया है कि यूजर चाहे तो इस ऐप को हटा भी सकता है।

वैसे, एंड्रॉयड स्मार्टफोन्स में पहले से ही गूगल की तरफ से ‘Find My Device’ जैसे ऐप हैं, लेकिन इन तक सरकार की पहुँच नहीं थी, जिसका साइबर क्रिमिनल फायदा उठाते रहे हैं, क्योंकि ये ऐप फैक्ट्री री-सेट मारने के साथ ही गायब भी हो जाता है। ऐसे में इस ऐप का फायदा ग्राहकों को नहीं मिल पाता।

रूस में मैक्स मैसेंजर ऐप किया जा चुका है अनिवार्य

रूस में अगस्त 2025 में मैक्स मैसेंजर ऐप को अनिवार्य करने पर भी इसी तरह विरोध हुआ था। आलोचक कहते हैं कि बिना पब्लिक कंसल्टेशन के यह सर्विलांस का खतरा बढ़ा सकता है। लेकिन सरकार का तर्क है कि साइबर खतरे इतने गंभीर हैं कि यह कदम जरूरी है।

सिम-वॉट्सऐप को लेकर जारी डायरेक्शन के बाद ये कितना अहम कदम

यह फैसला हाल के सिम बाइंडिंग और वॉट्सऐप पर डायरेक्शन के बाद आया है, जो यूजर वेरिफिकेशन को मजबूत कर रहा है। सिम को बायोमेट्रिक से लिंक करने के बाद यह ऐप अगला कदम है, जो डिवाइस लेवल पर सुरक्षा लाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह वैश्विक ट्रेंड का हिस्सा है, जहाँ रूस के बाद भारत भी स्टेट ऐप्स को पुश कर रहा है। दूरसंचार मंत्रालय ने कहा, “यह टेलीकॉम साइबर सिक्योरिटी को बचाने के लिए अनिवार्य है।”

बता दें कि अब वॉट्सऐप अपने फोन से दूसरी किसी जगह चलाने के लिए हर 6 घंटे में लॉगिन करने की जरूरत पड़ेगी। अब तक डेस्कटॉप पर लॉगिन करने के बाद बार-बार लॉगिन करने की जरूरत नहीं पड़ती थी और बिना सिम-नंबर के भी लंबे समय तक वॉट्सऐप का इस्तेमाल लैपटॉप-डेस्कटॉप पर किया जा सकता था। लेकिन इसका फायदा साइबर अपराधी उठाने लगे थे, जिसके बाद सरकार ने इस पर रोक लगा दी है।

कुल मिलाकर देखा जाएगा तो सरकार के आदेश के बाद सभी स्मार्टफोन में मौजूद संचार साथी ऐप से साइबर फ्रॉड कम होंगे, लेकिन प्राइवेसी बहस तेज हो गई है। बहरहाल, कंपनियाँ 90 दिनों में सरकार के आदेश का अनुपालन करेंगी या कोर्ट जाएँगी, यह देखना दिलचस्प होगा।

क्या है J&K का रूबिया सईद अपहरण कांड जिसमें 35 साल बाद शफत अहमद को CBI ने दबोचा, आतंकी यासीन मलिक का था मददगार

केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने सोमवार (01 दिसंबर 2025) को 1989 के रूबिया सईद अपहरण कांड में नई गिरफ्तारी की है। CBI ने 35 साल बाद इस केस में श्रीनगर के हवाल इलाके से शफत अहमद शुंगलू को धर दबोचा। पहले शुंगलू को निशात पुलिस स्टेशन ले जाया गया, फिर सीबीआई (CBI) ने हिरासत में ले लिया। अधिकारियों का कहना है कि पूछताछ से कई राज खुल सकते हैं।

रूबिया अपहरण केस क्या था, जिसने हिला दिया था पूरा देश

शफत अहमद शुंगलू की ताजा गिरफ्तारी रूबिया सईद अपहरण कांड की जाँच को नई जान दे रही है, जो कश्मीर के आतंकवाद के इतिहास का एक काला अध्याय है। 8 दिसंबर 1989 को तब के गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रूबिया को जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के आतंकियों ने अगवा कर लिया था।

लाल डीड अस्पताल में डॉक्टर रूबिया बस से घर लौट रही थीं जब बंदूक की नोक पर उन्हें किडनैप कर लिया गया। यह खबर दिल्ली पहुँचते ही हड़कंप मच गया। पूरे देश में सन्नाटा छा गया, क्योंकि यह पहली बार था जब आतंकी केंद्र सरकार के मंत्री के घर तक सेंध लगा बैठे।

अपहरण के पीछे साफ मकसद था- जेल में बंद अपने साथियों को रिहा कराना। आतंकियों ने शर्त रखी: रूबिया की जान चाहिए तो पाँच खूँखार सदस्यों को छोड़ो। सरकार मुश्किल में फँस गई। एक तरफ मंत्री की बेटी की जिंदगी, दूसरी तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा। कई दिनों तक पर्दे के पीछे बातचीत चली।

आखिरकार 13 दिसंबर को वीपी सिंह सरकार झुक गई। पाँच आतंकियों को रिहा किया गया, बदले में रूबिया घर लौट आईं। लेकिन इस सौदे ने कश्मीर का चेहरा हमेशा के लिए बदल दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि इसी घटना ने आतंकियों के हौसले बुलंद कर दिए।

यासीन मलिक था अपहरण केस का मास्टरमाइंड, खुद रूबिया ने की थी पहचान

इस सौदे के केंद्र में था जेकेएलएफ का चीफ यासीन मलिक। मलिक पर अपहरण का मास्टरमाइंड होने का आरोप है। सीबीआई की चार्जशीट के मुताबिक, दिसंबर 1989 के पहले हफ्ते में मलिक और उसके साथियों ने साजिश रची। रूबिया को निशाना बनाकर सरकार को ब्लैकमेल करने का प्लान था।

मलिक ने खुद को अपहरण की योजना का सूत्रधार बताया। 2022 में रूबिया ने टाडा कोर्ट में मलिक समेत चार आरोपितों की पहचान की। उन्होंने कहा, “यही वो लोग थे जिन्होंने मुझे अगवा किया।” रूबिया का यह बयान केस को मजबूत करने वाला साबित हुआ। “

यासीन मलिक की भूमिका सिर्फ अपहरण तक सीमित नहीं थी। वह जेकेएलएफ का चेहरा था, जो पाकिस्तान समर्थित आतंक को कश्मीर में फैला रहा था। मलिक ने अपहरण को एक राजनीतिक हथियार बनाया। रिहाई के बाद रिहा हुए आतंकी जैसे अली मोहम्मद मीर, मोहम्मद यासिन फतेह और इकबाल अहमद गंदरू ने जेकेएलएफ को नई ताकत दी। मलिक ने इन्हें हथियारों से लैस किया और हमलों की साजिशें रचीं।

मलिक की गिरफ्तारी के बाद दोबारा खुली फाइल

साल 2019 में मलिक की गिरफ्तारी के बाद सीबीआई ने पुरानी फाइलें खोलीं। जनवरी 2024 में मलिक समेत 10 के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई। इसमें अपहरण, साजिश और बंधक बनाने के आरोप हैं। अब उम्रकैद की सजा काट रहे आतंकी मलिक ने कभी अपराध नहीं माना, लेकिन गवाहों के बयानों ने उसे आखिरकार न्याय के कटघरे में खड़ा कर दिया।

रूबिया अपहरण केस के बाद कश्मीर में हिंदुओं पर हुआ जुल्म

इस अपहरण ने कश्मीर में आतंकवाद को तेजी से बढ़ावा दिया। पहले कश्मीर में अलगाववाद था, लेकिन 1989 के बाद यह हिंसा का सैलाब बन गया। रिहा हुए आतंकियों ने नई भर्तियाँ कीं, हथियारों का जखीरा बढ़ाया। विशेषज्ञ कहते हैं कि इस सौदे ने आतंकियों को संदेश दिया- सरकार झुक सकती है। नतीजा? 1990 में कश्मीरी पंडितों का पलायन शुरू हो गया।

जेकेएलएफ ने हिंदू परिवारों पर हमले किए, हजारों घर जलाए। मलिक पर कश्मीरी पंडितों के नरसंहार का भी आरोप है। सरकार ने 2019 में जेकेएलएफ को आतंकी संगठन घोषित किया। गृह मंत्रालय ने कहा, “यह संगठन 1989 के पंडित जेनोसाइड, आईएएफ अधिकारियों की हत्या और रूबिया अपहरण के लिए जिम्मेदार है।”

कश्मीर में आई अपहरण की बाढ़, हर तरफ आतंकी ही आतंकी

अपहरण के बाद किडनैपिंग की होड़ लग गई। 1991 में आईएएस अधिकारी ए.के. भट्टाचार्य का बेटा अपहरण हुआ। 1992 में वीसी चिल्टन का बेटा। ये सभी जेकेएलएफ की साजिशें थीं। मलिक ने इनसे फंडिंग और हथियार जुटाए। कश्मीर घाटी में ग्रेनेड हमले, सड़क किनारे बम विस्फोट आम हो गए। 1989 से 1990 के बीच आतंकी घटनाएं दोगुनी हो गईं।

पीआईबी के अनुसार, 1989 में 200 से ज्यादा हमले हुए, जो 1990 में 1000 पार कर गए। मलिक की रणनीति थी- हाई-प्रोफाइल टारगेट चुनो, सरकार को मजबूर करो। इसने अलगाववाद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ले जाकर पाकिस्तान को मजबूत किया।

कश्मीर में आतंकवाद के बढ़ने की वजह सिर्फ अपहरण नहीं, बल्कि मलिक जैसी साजिशें थीं। 1989 के बाद जेकेएलएफ ने आईएएफ के चार अधिकारियों की हत्या की। मलिक पर यह केस भी चल रहा है। एनआईए ने 2019 में मलिक को टेरर फंडिंग में उम्रकैद दी। ओपन मैगजीन के अनुसार, मलिक ने अपहरण से कश्मीर को ‘कॉन्सपिरेटर’ बना दिया।

इस अपहरण कांड के बाद बढ़ा था कश्मीर में आतंकवाद

सीबीआई की यह कार्रवाई दिखाती है कि कानून कभी सोता नहीं। शुंगलू की पूछताछ से बाकी फरार जैसे अली मोहम्मद मीर तक पहुँच बन सकती है। मलिक की साजिश ने कश्मीर को आग में झोंक दिया, लेकिन अब न्याय की बारी है। कश्मीर के इतिहासकार कहते हैं कि अपहरण ने ‘अलगाववाद से आतंकवाद’ का रास्ता खोला। 1990 में 1 लाख पंडित बेघर हुए। जेकेएलएफ ने 1000 से ज्यादा हमले किए। मलिक ने पाकिस्तान से ट्रेनिंग ली, हथियार मँगवाए।

बहरहाल, ताजा गिरफ्तारी से केस में नया मोड़ आ गया है। शफत अहमद शुंगलू पर अपहरण में सहयोग का आरोप है। एक चश्मदीद गवाह ने कहा, “मैंने 1989 के बाद सोपोर में शुंगलू को देखा।” कुछ आरोपित धारा 164 के तहत जुर्म कबूल कर चुके हैं। वहीं, सीबीआई इस केस को टाडा कोर्ट में चला रही है। जिसमें जनवरी 2021 में कोर्ट ने मलिक समेत 10 के खिलाफ आरोप तय किए थे। अब अगली सुनवाई में शुंगलू की भूमिका खुल सकती है।

सियासत का रंगमंच बना संसद, SIR पर विपक्ष का शोर शराबा: लोकतांत्रिक चिंता कम और राजनीतिक रणनीति ज्यादा

1 दिसंबर 2025 को लोकसभा और राज्यसभा का शीतकालीन सत्र शुरू हुआ। उम्मीद थी कि सत्र की शुरुआत जनहित, विकास और आवश्यक कानूनों पर गंभीर चर्चा से होगी, लेकिन शुरुआत होते ही सदन शोर-शराबे में डूब गया।

इस हंगामे का केंद्र था SIR यानी Special Intensive Revision, जो वोटर-लिस्ट के पुनरीक्षण की प्रक्रिया है। विपक्ष का आरोप है कि SIR में गड़बड़ी हुई है और यह लोकतांत्रिक अधिकारों से छेड़छाड़ का मामला है, इसलिए इसे संसद में उठाया जाना चाहिए। दूसरी ओर, केंद्र सरकार का कहना है कि SIR एक प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसे चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत किया जाता है, इसलिए यह संसद में चर्चा का विषय नहीं हो सकता।

असल सवाल यह है कि अगर SIR इतना ही गंभीर मुद्दा था, तो विपक्ष ने इसे पहले क्यों नहीं उठाया? क्यों हमेशा की तरह वही सियासी नाटक, वही टकराव ठीक उस दिन शुरू होता है जब संसद सत्र खुलता है? यह लोकतांत्रिक चिंता कम और राजनीतिक रणनीति ज्यादा लगती है। विपक्ष अक्सर सत्र से पहले जिस तैयारी का दावा करता है। वह हर बार सदन में हंगामे के रूप में सामने आती है।

विपक्ष के पास मुद्दों की कमी नहीं है। SIR, दिल्ली ब्लास्ट, प्रदूषण, महँगाई और बेरोजगारी जैसे विषय सूची में शामिल हैं। लेकिन, क्या ये मुद्दे वास्तव में जनता के लाभ के लिए उठाए जा रहे हैं, या सिर्फ राजनीतिक विरोध जताने के हथियार बन चुके हैं? विपक्ष का रवैया बताता है कि वह ‘जनहित’ से ज्यादा ‘राजनीतिक संदेश’ देने में दिलचस्पी रखता है। उद्देश्य यह नहीं कि सरकार से जवाब लिया जाए, बल्कि यह दिखाना कि सरकार जनता के खिलाफ काम कर रही है, चाहे तथ्य कुछ भी हों।

सत्ता पक्ष भी पीछे नहीं रहता। वह विपक्ष के हर आरोप को ‘हंगामा करने की आदत’ और ‘पुरानी पराजयों की बौखलाहट’ बता कर उसे खारिज कर देता है। लोकतंत्र केवल सत्ता पक्ष की सफाई या विपक्ष के आक्रोश का मंच नहीं है। यह देश के लिए वास्तविक समाधान खोजने की जगह है। जब सदन बार-बार ठप होता है, तो आम जनता का नुकसान होता है, किसी पार्टी का नहीं।

इस सत्र में सरकार कई अहम बिल लाने वाली है। एटॉमिक एनर्जी में सुधार, कॉर्पोरेट कानूनों में बदलाव, उच्च शिक्षा में सुधार और अन्य विकास संबंधी प्रस्ताव। ये ऐसे मुद्दे हैं, जो सीधे तौर पर देश की प्रगति से जुड़े हुए हैं। लेकिन अगर सदन SIR पर हंगामे में ही फंस गया, तो इन कानूनों पर चर्चा का क्या होगा? संसद का समय सीमित होता है, लेकिन सियासत की भूख असीमित।

विपक्ष की भूमिका केवल आलोचना करना नहीं है। लोकतंत्र में विपक्ष की असली ताकत उसकी रचनात्मकता, तर्क, और जनता की वास्तविक आवाज़ उठाने की क्षमता में होती है। लेकिन जब हर मुद्दे पर हंगामा किया जाए, हर चर्चा को शोर में बदल दिया जाए, और हर सत्र को लड़ाई का मैदान बना दिया जाए, तो यह लोकतांत्रिक संस्कृति को कमजोर करता है। विपक्ष का काम सरकार को जवाबदेह बनाना है, न कि सदन को बंधक बनाना।

SIR पर विपक्ष के सवाल गलत नहीं हैं। वोटर-लिस्ट की शुचिता महत्वपूर्ण है। लेकिन तरीका भी महत्वपूर्ण होता है। क्या संसद में हंगामा ही एकमात्र तरीका है? क्या अदालतें, चुनाव आयोग, संसदीय समितियां या आधिकारिक शिकायतें पर्याप्त नहीं? जवाब है हैं, लेकिन राजनीति में शोर, कैमरे और सुर्खियाँ अक्सर समाधान से ज्यादा आकर्षक लगते हैं।

सत्ता पक्ष की भी जिम्मेदारी है कि वह विपक्ष की आशंकाओं को पूरी तरह नजरअंदाज न करे। लोकतंत्र में संवाद ही रास्ता है। लेकिन संवाद तभी संभव है, जब दोनों पक्ष तैयार हों और दुर्भाग्य से यह तैयारी अक्सर दिखाई नहीं देती।

इस शीतकालीन सत्र की शुरुआत ने फिर साबित कर दिया कि हमारी संसद अब विचारों का मंच कम और सियासत का रंगमंच ज्यादा बन गई है। यहाँ नाटक है, स्क्रिप्ट है, अभिनेता हैं  बस गायब है जनता का हित। अगर सरकार और विपक्ष दोनों यह नहीं समझेंगे कि संसद राष्ट्रहित के लिए है, पार्टीहित के लिए नहीं, तो हर सत्र इसी तरह हंगामे में बीतेगा और विकास पीछे छूटता जाएगा।

भारत की जनता अब यह नाटक रोज-रोज देखने की आदी हो चुकी है। लेकिन आदी होना समाधान नहीं है। असली सवाल है क्या हमारा लोकतंत्र केवल सियासी प्रदर्शन का मंच बनता जाएगा, या कभी वास्तविक जनहित की राजनीति भी इसमें जगह पाएगी?

यह सत्र उस सवाल का जवाब देगा अगर सदन चलने दिया गया तो।

भोपाल में मुस्लिम गर्लफ्रेंड के परिवार ने हिंदू लड़के को जबरन कबूल कराया इस्लाम, शुभम को नाम दिया अमान खान: 3 साल बाद केस दर्ज, पढ़ें- FIR की Exclusive डिटेल्स

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में जबरन धर्म परिवर्तन का एक परेशान करने वाला मामला सामने आया है। एक हिंदू युवक जिसका नाम शुभम गोस्वामी है, उसे 2022 में एक मुस्लिम लड़की से प्यार हो गया था। इसके बाद उसे इस्लाम कबूल करने के लिए मजबूर किया गया और उसने मुस्लिम पहचान ‘अमान खान’ दी गई। शुभम ने अब कहा है कि वह हिंदू धर्म में वापस लौटना चाहता है। इसके लिए वह एक जन शिकायत कार्यक्रम के दौरान मंत्री विश्वास कैलाश सारंग से भी मिला है।

शुभम ने उस मुस्लिम लड़की के परिवार द्वारा की गई जबरदस्ती, धार्मिक दबाव और धमकी की डरावनी कहानी सुनाई, जिस लड़की के साथ उसके कभी रिश्ते थे।

मीडिया से बात करते हुए सारंग ने कहा कि शुभम की बातें सुनना दिल दहला देने वाली थी। उन्होंने आश्वासन दिया कि राज्य सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि शुभम को उचित घर वापसी के जरिए अपनी पहचान वापस हासिल करने की इजाजत मिले। मंत्री ने कहा कि यह मामला दिखाता है कि राज्य के लिए जबरन धार्मिक परिवर्तन के खिलाफ कानून बनाना क्यों जरूरी है।

शुभम पर सिर्फ धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डाला गया ही नहीं, बल्कि उसे ऐसी स्थिति में धकेल दिया गया जहाँ उसकी पहचान, सामाजिक स्थिति और मानसिक स्वास्थ्य को व्यवस्थित तरीके से तोड़ा गया। जिस परिवार ने शुभम को निशाना बनाया, उसने उसके खिलाफ झूठे केस दर्ज कराए, उसे इस्लाम कबूल करने के लिए मजबूर किया और यहाँ तक कि समाज में खुद को कैसे पेश करना है, उस पर भी नियंत्रण रखा।

ऑपइंडिया ने इस मामले से जुड़े एफआईआर और कोर्ट दस्तावेजों को हासिल किया है, जिसमें से चौंकाने वाली बातें निकल कर सामने आई हैं।

जबरन इस्लाम कबूल कराया, जमात भेजा और गोमांस खिलाया

शुभम गोस्वामी अपने 2 दोस्तों के साथ 20 नवंबर 2025 को जहाँगीराबाद पुलिस स्टेशन पहुँचा। वहाँ उसने अब्दुल नईम, उसके बेटे अब्दुल नदीम और उसकी बीवी शामा के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। उसकी शिकायत के आधार पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 3(5) और 251(2) तथा मध्य प्रदेश धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2021 की धारा 3 और 5 के तहत एफआईआर दर्ज की गई।

सोर्स -मध्य प्रदेश पुलिस

अपनी शिकायत में शुभम ने कहा कि वह हिंदू ब्राह्मण है और 2022 के अंत में एक मुस्लिम लड़की के साथ उसके रिश्ते हो गए। उसने कहा कि यह रिश्ता लड़की के परिवार को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होंने उसके खिलाफ अपहरण और बलात्कार के आरोपों के तहत केस दर्ज कराया, जिसमें पॉक्सो एक्ट के प्रावधान भी शामिल थे।

चूँकि केस गंभीर धाराओं के तहत दर्ज हुआ था, इसलिए उसे गिरफ्तार कर लिया गया और वह लगभग चार महीने जेल में रहा। आखिरकार उसे जमानत पर रिहा किया गया लेकिन इस मामले में आपराधिक कार्रवाई जारी है और अगली सुनवाई भोपाल जिला कोर्ट में 22 दिसंबर 2025 को निर्धारित है।

उसने जोर देकर कहा कि भले ही उनके दबाव में उसने इस्लाम कबूल कर लिया और लड़की से शादी करने पर राजी हो गया, लेकिन POCSO केस कभी वापस नहीं लिया गया और वह अभी भी भोपाल की कोर्ट में चल रहा है।

शुभम को इस्लाम कबूल करने के लिए कैसे मजबूर किया गया

एफआईआर में शुभम ने बताया कि जेल से रिहा होने के बाद उसके परिवार ने उसे एक हिंदू लड़की से शादी कराने का फैसला किया और इसके लिए तैयारियाँ शुरू हो गईं। लेकिन इल्मा ने उससे संपर्क किया और कहा कि उसने उसकी जिंदगी बर्बाद कर दी है और उसे उससे शादी करनी ही होगी। एक कोर्ट की पेशी के दौरान वह उसके अब्बू-अम्मी अब्दुल नईम और शमा से मिला, जिन्होंने कहा कि बलात्कार का केस तभी वापस लिया जाएगा जब वह पूरी तरह हिंदू धर्म छोड़ दे और इस्लाम कबूल कर ले।

एफआईआर की कॉपी

शुभम ने शुरुआत में विरोध किया लेकिन अगले दो महीनों तक नईम और उसके बेटे अब्दुल नदीम ने उसे बार-बार धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डाला। आखिरकार वह टूट गया और मार्च 2023 में आम वाली मस्जिद में इस्लाम कबूल कर लिया।

धर्म परिवर्तन के बाद उसे तुरंत रायसेन में तीन दिनों की जमात में भेज दिया गया। उसके बाद उसे नियमित रूप से मस्जिद में नमाज पढ़ने और इस्लामी धार्मिक गतिविधियों में हिस्सा लेने के निर्देश दिए जाते रहे। जब उसने लड़की के अम्मी-अब्बू से पूछा कि अब तो उसे लड़की से शादी करने की इजाजत मिल जानी चाहिए, तो उसे कर्नाटक में 130 दिनों की जमात भेज दिया गया। उस दौरान शुभम को गोमांस खाने के लिए मजबूर किया गया।

शुभम गोस्वामी ने कहा कि उसने लगभग तीन साल परिवार से दूर एक मुस्लिम इलाके में अमान खान की पहचान के साथ गुजारे। इस दौरान सहन की गई भावनात्मक, सामाजिक और आर्थिक परेशानियों ने उसे मानसिक रूप से थका दिया।

मुस्लिम बनाने के बाद भी इल्मा से नहीं कराया निकाह, वापस हिंदू न बने- दी धमकियाँ

शुभम गोस्वामी ने कहा कि इस्लाम कबूल करने के बाद उसने लड़की के परिवार से बार-बार अनुरोध किया कि वे अपना वादा निभाएँ और उसे लड़की से शादी करने दें। इसके बजाय उन्होंने मामला बार-बार टालते रहे और बाद में कहा कि वे उसे किसी दूसरी मुस्लिम महिला से निकाह करा देंगे।

एफआईआर की कॉपी

शुभन ने जब जिद की कि वह तो सिर्फ उसी लड़की से शादी करेगा जिसके साथ उसके रिश्ते थे, तो परिवार ने उसे धमकियाँ देनी शुरू कर दीं। उसने कहा कि उन्होंने चेतावनी दी कि अगर वह हिंदू धर्म में वापस लौटने की कोशिश करेगा या अपने समाज के लोगों से संपर्क करेगा, तो वे उसे और उसके रिश्तेदारों को मार देंगे।

शुभम के खिलाफ लंबित केस को लगातार उसके दबाव में इस्तेमाल किया जाता रहा, जिससे वह उनके प्रभाव में बना रहा।

लड़की के परिवार के सदस्यों को कोर्ट ने नहीं दी जमानत

नईम, नदीम और शमा के खिलाफ दर्ज एफआईआर के बाद इस तिकड़ी को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया गया। उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। उनके बचाव में भोपाल जिला कोर्ट में जमानत याचिका दाखिल की गई जो 24 नवंबर 2025 को जस्टिस पंकज कुमार जैन ने खारिज कर दी।

अपने आदेश में कोर्ट ने नोट किया कि आरोपितों के खिलाफ लगे आरोप गंभीर प्रकृति के हैं। जाँच की शुरुआत में पाई गई जानकारियों से पता चलता है कि आरोपितों की जबरन शुभम को इस्लाम कबूल कराने में प्रथम दृष्टया भूमिका थी।

कोर्ट ने देखा कि यह मामला ऐसे कार्यों से जुड़ा है जो अपनी प्रकृति से सामाजिक सद्भाव को प्रभावित कर सकते हैं, क्योंकि आरोप सीधे धार्मिक जबरदस्ती और हिंदू धर्म अपनाने से रोकने के लिए दी गई धमकियों से जुड़े हैं। जज ने कहा कि हिंदू बनने की कोशिश में शुभम और उसके परिवार को मारने की धमकी के आरोप काफी गंभीर हैं। इन्हें हल्के में नहीं ले सकते।

भोपाल जिला कोर्ट के फैसले की कॉपी

जज ने देखा कि सांप्रदायिक संवेदनशीलताओं को देखते हुए इस मामले में शांति और सामाजिक स्थिरता को बिगाड़ने की संभावना है। यह भी नोट किया गया कि जाँच अभी चल रही है और इस चरण में आरोपितों को रिहा करने से गवाहों के साथ हस्तक्षेप या सबूतों से छेड़छाड़ हो सकती है। इन आधारों पर कोर्ट ने जमानत देना उचित नहीं समझा।

बर्बाद कर देने वाले 3 साल

उन तीन सालों के दौरान जब शुभम ‘अमान खान’ के रूप में रहा, उसे उसकी पहचान, कम्युनिटी और स्थिरता से दूर कर दिया गया। उसने अपनी नौकरी खो दी, परिवार ने उसे छोड़ दिया और वह लगातार डर में जीता रहा कि उसके खिलाफ केस फिर से इस्तेमाल हो सकता है।

शुभम ने अपनी पीड़िता जाहिर करते हुए बताया कि एक मुस्लिम पड़ोस में रहना, रोजाना मस्जिदों में जाना और ऐसी मजहबी प्रथाओं का पालन करना पड़ता था, जिसे उसने अपनी मर्जी से नहीं चुना था। शुभम ने कहा है कि वो जल्द घर वापसी कर सनातन में लौट आएगा और अपनी असली पहचान हासिल करेगा।

ये रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

पाकिस्तान में शहबाज VS मुनीर: फील्ड मार्शल को ना बनाना पड़े CDF इसलिए विदेश भाग गए प्रधानमंत्री, क्या संवैधानिक संकट के बीच टूट जाएगी PAK फौज की रीढ़?

पाकिस्तान में नवनिर्मित चीफ ऑफ डिफेन्स फोर्सेज (CDF) पद को लेकर संवैधानिक संकट और राजनीतिक अविश्वास तेजी से बढ़ता जा रहा है। इस मुद्दे की जड़ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ द्वारा फील्ड मार्शल असीम मुनीर की CDF पद के लिए अनिवार्य नियुक्ति नोटिफिकेशन पर हस्ताक्षर न करना है, जिससे शीर्ष सैन्य नेतृत्व की नई नियुक्ति सवालों के घेरे में आ गए है।

नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजरी बोर्ड के पूर्व सदस्य तिलक देवेशर के अनुसार, पीएम शरीफ जानबूझकर देश से बाहर हैं ताकि वे उन्हें इस नियुक्ति आदेश पर हस्ताक्षर न करें। ANI से बातचीत में उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री पहले बहरीन गए और फिर लंदन पहुंच गए जिससे इस अंदेशे को और बल मिला कि वो फैसले से बचने की कोशिश कर रहे हैं।

पाकिस्तान की मीडिया ने दावा किया है कि शनिवार को पाकिस्तान लौटने वाले शरीफ ने लंदन में मेडिकल जाँच के बाद ब्रिटेन का अपना दौरा बढ़ा लिया है। पाक मीडिया के मुताबिक, पहले उनका चार दिवसीय निजी दौरा रविवार को पूरा करके पाकिस्तान लौटने का कार्यक्रम था लेकिन अब वे सोमवार दोपहर लंदन से इस्लामाबाद के लिए रवाना होंगे।

29 नवंबर को मुनीर का तीन वर्षीय कार्यकाल समाप्त हो चुका है और नए पद के तहत पाँच वर्ष की मियाद तय करने के लिए आधिकारिक नोटिफिकेशन की जरूरत थी। इस बीच फौज के भीतर भी शीर्ष पदों को लेकर खींचतान की खबरें आ रही हैं।

रक्षा मंत्री ने किया सब सही होने का दावा

हालाँकि, पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने फौज और सरकार के बीच समन्वय होने के संकेत दिए हैं। रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि रक्षा बलों के CDF की नियुक्ति संबंधी अधिसूचना उचित समय पर जारी की जाएगी और इसके लिए प्रक्रिया शुरू हो गई है। आसिफ ने कहा, “प्रक्रिया शुरू हो गई है। प्रधानमंत्री जल्द ही लौट रहे हैं। अधिसूचना उचित समय पर जारी की जाएगी।”

पाकिस्तान में संवैधानिक संकट

29 नवंबर की अहम समय-सीमा निकल चुकी है लेकिन पाकिस्तान सरकार अब तक देश के पहले (CDF) की नियुक्ति का नोटिफिकेशन जारी नहीं कर सकी है। यह वही नई दोहरी जिम्मेदारी वाला पद है, जिसे 27वें संविधान संशोधन के तहत बनाया गया था और जिसके साथ ही चेयरमैन ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी (CJCSC) का पद 27 नवंबर को खत्म हो गया था।

माना जा रहा था कि CJCSC पद की समाप्ति के साथ ही CDF का नोटिफिकेशन जारी हो जाएगा। इसलिए क्योंकि 29 नवंबर ही वह तारीख थी जब माना जा रहा था कि फील्ड मार्शल मुनीर के आर्मी चीफ के कार्यकाल के तीन साल पूरे हो रहे हैं। इसी वजह से कानूनी हलकों में यह बहस उठी कि अगर नया आदेश नहीं आया, तो क्या उनकी मौजूदा जिम्मेदारी खत्म मानी जा सकती है?

2024 में पाकिस्तान आर्मी एक्ट में किए गए बदलाव ने फौज के प्रमुखों का कार्यकाल तीन साल से बढ़ाकर पाँच साल कर दिया। कानून में जो क्लॉज जोड़ा गया था उसमें यह माना गया कि यह संशोधन हमेशा से ही कानून का हिस्सा माना जाएगा। यानि कई कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, कार्यकाल जारी रखने के लिए सरकार के किसी नए नोटिफिकेशन की जरूरत नहीं थी।

हालाँकि, यह बात लगभग तय मानी जा रही है कि CDF एक नया पद है और इसकी नियुक्ति बिना सरकारी नोटिफिकेशन के संभव नहीं। कानून के मुताबिक अब पाँच साल तक फौज के प्रमुख और CDF दोनों भूमिकाएँ एक ही व्यक्ति निभाएगा। यानी फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को औपचारिक रूप से नया आदेश जारी कर CDF नामित करना होगा।

अब इस पर सरकारी चुप्पी को राजनीतिक असहमति के रूप में देखा जा रहा है। चर्चा में बताया जा रहा है कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि CDF/COAS के पाँच साल का कार्यकाल किस तारीख से गिना जाए। नवंबर 2022 यानी जब आसिम मुनीर ने कमान संभाली या नवंबर 2025 जिसे इस नए कानून के बाद की तारीख से जोड़ा जा रहा है।

CJCSC पद हटने के बाद अब नेशनल स्ट्रेटेजिक कमांड के नए प्रमुख की नियुक्ति भी लंबित है। यह परमाणु नियंत्रण-संबंधी जिम्मेदारी संभालेगा जो पहले CJCSC के पास मौजूद थी। अब माना जा रहा है कि यह नियुक्ति शायद तभी होगी जब CDF का नोटिफिकेशन जारी किया जाएगा।

वहीं, नेशनल कमांड अथॉरिटी (NCA) कानून में भी बदलाव जरूरी है ताकि नए ढाँचे में CDF और NSC कमांडर की स्थिति स्पष्ट हो सके। बड़ा सवाल यह भी है कि आगे वायुसेना और नौसेना प्रमुखों को NCA में कितनी भूमिका मिलेगी और क्या रणनीतिक कमान उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर हो जाएगी।

फौज के भीतर ही बढ़ेगा बवाल

अगर यह नोटिफिकेशन आता है तो CDF की भूमिका सँभालने के बाद फील्ड मार्शल मुनीर सभी सर्विस ब्रांच को सीधे उनके कमांड में रखेंगे। इसका सीधा अर्थ है कि पूरे मिलिट्री स्ट्रक्चर पर आर्मी का पूरा दबदबा होगा। इस बात की पूरी संभावना है कि इसके बाद फौज के भीतर ही गुस्सा बढ़े या कई सर्विस के बीच दुश्मनी सामने आए। यह बदलाव टॉप मिलिट्री लीडर्स को खास अधिकार और सुरक्षा देकर डेमोक्रेटिक जवाबदेही को भी कमजोर कर रहा है।

काशी तमिल संगमम 4.0 के लिए तैयार बनारस, हजारों साल पुराने उत्तर-दक्षिण के रिश्तों को मोदी सरकार में मिला ‘नया जीवन’: जानें तमिलनाडु के ‘शिवकाशी’ का इतिहास

दुनिया की सबसे प्राचीन नगरी वाराणसी और सबसे पुरानी भाषा तमिल का अद्भुत संगम ‘काशी तमिल संगमम्’ के चौथे संस्करण का आयोजन करने के लिए वाराणसी पूरी तरह तैयार है।

एक ओर पूरे भारत को अपने आप में समेटे हमारी सांस्कृतिक राजधानी कही जाने वाली काशी है तो दूसरी ओर भारत की प्राचीनता और गौरव का केंद्र हमारा तमिलनाडु और तमिल संस्कृति है। ये संगम गंगा-यमुना के संगम जितना ही पवित्र है। सदियों पुरानी इस रिश्ते को पीएम मोदी ने नया मंच दिया और देश के दो महान संस्कृति के संगम की परिकल्पना की।

‘मन की बात’ में पीएम मोदी ने की अपील

काशी तमिल संगमम् में जनता से पीएम मोदी ने बड़ी संख्या में शामिल होने की अपील की। उन्होंने कहा कि विश्व की सबसे पुरानी भाषा तमिल और दुनिया के सबसे प्राचीन शहरों में एक वाराणसी का अद्भुत संगम है।

काशी तमिल संगमम् 2 दिसंबर से काशी नमो घाट पर शुरू हो रहा है। यह एक ऐसा मंच है जहाँ तमिल भाषा से प्रेम करने वाले पहुँचते हैं। इस आयोजन से वाराणसी के लोगों को भी नया अनुभव मिलता है।

पीएम मोदी ने कहा कि ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की भावना को मजबूत करने वाला यह कार्यक्रम दरअसल देश की एकता और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने का मार्ग है।

तमिल और काशी का ऐतिहासिक संबंध रहा है

तमिल भाषा साहित्य में काशी और बाबा विश्वनाथ के प्रति अगाध श्रद्धा देखी जा सकती है। तमिल राजा काशी की यात्रा पर आया करते थे। 2300 साल पहले भी तमिलनाडु के नगर ग्रामों की गलियाँ काशी का बखाने करने वाले गीतों से गूँजा करती थीं।

कहा जाता है कि प्रथम तमिल संगम मदुरै में हुआ था जो पाण्ड्य राजाओं की राजधानी थी और उस समय अगस्त्य, शिव, मुरुगवेल आदि विद्वानों ने इसमें हिस्सा लिया था। इसके बाद जो द्वितीय संगम हुआ उसका केंद्र कपातपुरम में था। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में भारतीय प्राच्य इतिहास के प्रोफेसर रह चुके डॉक्टर विशुद्घानंद पाठक के मुताबिक, कपातपुरम का संगम ही इतिहास का सबसे बड़ा संगम था और उसमें उत्तर और दक्षिण के विद्वानों ने संगति की थी।

तमिल भाषा तो इतनी समृद्ध है कि इस भाषा में ‘अगटिटयम अगस्त्यम’ नामक एक व्याकरण ग्रन्थ का उल्लेख मिलता है, जिसका रचना काल ईसा पूर्व का है।

15वीं शताब्दी में दक्षिण के राजा पराक्रम पांड्या भगवान शिव का एक मंदिर बनाना चाहते थे और काशी जाकर वे शिवलिंग लेकर आए थे। वहाँ से लौटते समय वे रास्ते में एक पेड़ के नीचे विश्राम करने के लिये रुके और फिर जब उन्होंने यात्रा हेतु आगे बढ़ने की कोशिश की तो शिवलिंग ले जा रही गाय ने आगे बढ़ने से बिल्कुल मना कर दिया।

पराक्रम पंड्या ने इसे भगवान की इच्छा समझा और शिवलिंग को वहीं स्थापित कर दिया। इसे बाद में शिवकाशी नाम दिया गया। तमिलनाडु के जो भक्त काशी नहीं जा सकते थे, उनके लिये पांड्यों ने काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था, जो आज दक्षिण-पश्चिमी तमिलनाडु में तेनकाशी के नाम से जाना जाता है। ये तमिलनाडु और केरल से सटे सीमा पर मौजूद है।

2022 में हुआ पहला संगमम्

काशी तमिल संगमम् की शुरुआत 2022 में हुई। उस वक्त करीब 10 हजार तमिल प्रतिनिधि काशी पहुँचे थे। 19 नवंबर 2022 को इसकी औपचारिक शुरुआत पीएम मोदी ने की थी। उन्होंने दुनिया के सबसे प्राचीन भाषा तमिल को लेकर कहा था कि दुनिया जिसका गुणगान करती है, हम उसके गौरवगान में पीछे रह जाते हैं।

2023 में हुआ दूसरा संगमम्

दिसंबर 2023 में वाराणसी के नमो घाट पर दूसरा तमिल काशी संगमम् का आयोजन किया गया। इस सांस्कृतिक उत्सव के महत्व को बताते हुए पीएम मोदी ने कहा कि तमिल संगमम का मकसद तमिलनाडु और काशी, देश की दो सबसे जरूरी और पुरानी शिक्षा की जगहों के बीच सदियों पुराने रिश्तों को सेलिब्रेट करना, उन्हें पक्का करना और फिर से खोजना है। इस मौके पर वाराणसी तमिल संगमम् ट्रेन को हरी झंडी दिखाई और थिरुक्कुरल, मणिमेकलाई और दूसरे क्लासिक तमिल साहित्य के मल्टी लैंग्वेज और ब्रेल ट्रांसलेशन लॉन्च किया गया।

2025 में तीसरा संगमम्

15 फरवरी से 24 फरवरी को नमो घाट पर तीसरा काशी तमिल संगमम् का आयोजन किया गया। इसका मकसद दोनों प्राचीन सभ्यताओं का उत्सव मना और उसे मजबूत करना है। मंच काशी और तमिल के विद्वानों, विद्यार्थियों, दार्शनिकों, व्यापारियों, कारीगरों, कलाकारों को एक साथ आने और अपने अनुभवों को साझा करने का अवसर प्रदान करता है।

दिसंबर 2025 में ही काशी तमिल संगमम् 4 का आयोजन किया गया है। इसका आयोजन भारत सरकार का शिक्षा मंत्रालय और बीएचयू कर रहा है। 2 दिसंबर से 16 दिसंबर तक इस समागम में 10 हजार से ज्यादा तमिल प्रतिमिधियों के पहुँचने का अनुमान है।

काशी तमिल संगमग इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वाराणसी में काशी विश्वनाथ विराजमान हैं तो तमिलनाडु के रामेश्वरम में भगवान रामेश्वरम। दोनों जगह शिवमय है। दोनों ही जगहों पर संगीत, साहित्य और कला का अद्भुत संगम है।