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पाकिस्तान में शहबाज VS मुनीर: फील्ड मार्शल को ना बनाना पड़े CDF इसलिए विदेश भाग गए प्रधानमंत्री, क्या संवैधानिक संकट के बीच टूट जाएगी PAK फौज की रीढ़?

पाकिस्तान में नवनिर्मित चीफ ऑफ डिफेन्स फोर्सेज (CDF) पद को लेकर संवैधानिक संकट और राजनीतिक अविश्वास तेजी से बढ़ता जा रहा है। इस मुद्दे की जड़ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ द्वारा फील्ड मार्शल असीम मुनीर की CDF पद के लिए अनिवार्य नियुक्ति नोटिफिकेशन पर हस्ताक्षर न करना है, जिससे शीर्ष सैन्य नेतृत्व की नई नियुक्ति सवालों के घेरे में आ गए है।

नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजरी बोर्ड के पूर्व सदस्य तिलक देवेशर के अनुसार, पीएम शरीफ जानबूझकर देश से बाहर हैं ताकि वे उन्हें इस नियुक्ति आदेश पर हस्ताक्षर न करें। ANI से बातचीत में उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री पहले बहरीन गए और फिर लंदन पहुंच गए जिससे इस अंदेशे को और बल मिला कि वो फैसले से बचने की कोशिश कर रहे हैं।

पाकिस्तान की मीडिया ने दावा किया है कि शनिवार को पाकिस्तान लौटने वाले शरीफ ने लंदन में मेडिकल जाँच के बाद ब्रिटेन का अपना दौरा बढ़ा लिया है। पाक मीडिया के मुताबिक, पहले उनका चार दिवसीय निजी दौरा रविवार को पूरा करके पाकिस्तान लौटने का कार्यक्रम था लेकिन अब वे सोमवार दोपहर लंदन से इस्लामाबाद के लिए रवाना होंगे।

29 नवंबर को मुनीर का तीन वर्षीय कार्यकाल समाप्त हो चुका है और नए पद के तहत पाँच वर्ष की मियाद तय करने के लिए आधिकारिक नोटिफिकेशन की जरूरत थी। इस बीच फौज के भीतर भी शीर्ष पदों को लेकर खींचतान की खबरें आ रही हैं।

रक्षा मंत्री ने किया सब सही होने का दावा

हालाँकि, पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने फौज और सरकार के बीच समन्वय होने के संकेत दिए हैं। रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने कहा कि रक्षा बलों के CDF की नियुक्ति संबंधी अधिसूचना उचित समय पर जारी की जाएगी और इसके लिए प्रक्रिया शुरू हो गई है। आसिफ ने कहा, “प्रक्रिया शुरू हो गई है। प्रधानमंत्री जल्द ही लौट रहे हैं। अधिसूचना उचित समय पर जारी की जाएगी।”

पाकिस्तान में संवैधानिक संकट

29 नवंबर की अहम समय-सीमा निकल चुकी है लेकिन पाकिस्तान सरकार अब तक देश के पहले (CDF) की नियुक्ति का नोटिफिकेशन जारी नहीं कर सकी है। यह वही नई दोहरी जिम्मेदारी वाला पद है, जिसे 27वें संविधान संशोधन के तहत बनाया गया था और जिसके साथ ही चेयरमैन ज्वाइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ कमेटी (CJCSC) का पद 27 नवंबर को खत्म हो गया था।

माना जा रहा था कि CJCSC पद की समाप्ति के साथ ही CDF का नोटिफिकेशन जारी हो जाएगा। इसलिए क्योंकि 29 नवंबर ही वह तारीख थी जब माना जा रहा था कि फील्ड मार्शल मुनीर के आर्मी चीफ के कार्यकाल के तीन साल पूरे हो रहे हैं। इसी वजह से कानूनी हलकों में यह बहस उठी कि अगर नया आदेश नहीं आया, तो क्या उनकी मौजूदा जिम्मेदारी खत्म मानी जा सकती है?

2024 में पाकिस्तान आर्मी एक्ट में किए गए बदलाव ने फौज के प्रमुखों का कार्यकाल तीन साल से बढ़ाकर पाँच साल कर दिया। कानून में जो क्लॉज जोड़ा गया था उसमें यह माना गया कि यह संशोधन हमेशा से ही कानून का हिस्सा माना जाएगा। यानि कई कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, कार्यकाल जारी रखने के लिए सरकार के किसी नए नोटिफिकेशन की जरूरत नहीं थी।

हालाँकि, यह बात लगभग तय मानी जा रही है कि CDF एक नया पद है और इसकी नियुक्ति बिना सरकारी नोटिफिकेशन के संभव नहीं। कानून के मुताबिक अब पाँच साल तक फौज के प्रमुख और CDF दोनों भूमिकाएँ एक ही व्यक्ति निभाएगा। यानी फील्ड मार्शल आसिम मुनीर को औपचारिक रूप से नया आदेश जारी कर CDF नामित करना होगा।

अब इस पर सरकारी चुप्पी को राजनीतिक असहमति के रूप में देखा जा रहा है। चर्चा में बताया जा रहा है कि सबसे बड़ा सवाल यह है कि CDF/COAS के पाँच साल का कार्यकाल किस तारीख से गिना जाए। नवंबर 2022 यानी जब आसिम मुनीर ने कमान संभाली या नवंबर 2025 जिसे इस नए कानून के बाद की तारीख से जोड़ा जा रहा है।

CJCSC पद हटने के बाद अब नेशनल स्ट्रेटेजिक कमांड के नए प्रमुख की नियुक्ति भी लंबित है। यह परमाणु नियंत्रण-संबंधी जिम्मेदारी संभालेगा जो पहले CJCSC के पास मौजूद थी। अब माना जा रहा है कि यह नियुक्ति शायद तभी होगी जब CDF का नोटिफिकेशन जारी किया जाएगा।

वहीं, नेशनल कमांड अथॉरिटी (NCA) कानून में भी बदलाव जरूरी है ताकि नए ढाँचे में CDF और NSC कमांडर की स्थिति स्पष्ट हो सके। बड़ा सवाल यह भी है कि आगे वायुसेना और नौसेना प्रमुखों को NCA में कितनी भूमिका मिलेगी और क्या रणनीतिक कमान उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर हो जाएगी।

फौज के भीतर ही बढ़ेगा बवाल

अगर यह नोटिफिकेशन आता है तो CDF की भूमिका सँभालने के बाद फील्ड मार्शल मुनीर सभी सर्विस ब्रांच को सीधे उनके कमांड में रखेंगे। इसका सीधा अर्थ है कि पूरे मिलिट्री स्ट्रक्चर पर आर्मी का पूरा दबदबा होगा। इस बात की पूरी संभावना है कि इसके बाद फौज के भीतर ही गुस्सा बढ़े या कई सर्विस के बीच दुश्मनी सामने आए। यह बदलाव टॉप मिलिट्री लीडर्स को खास अधिकार और सुरक्षा देकर डेमोक्रेटिक जवाबदेही को भी कमजोर कर रहा है।

काशी तमिल संगमम 4.0 के लिए तैयार बनारस, हजारों साल पुराने उत्तर-दक्षिण के रिश्तों को मोदी सरकार में मिला ‘नया जीवन’: जानें तमिलनाडु के ‘शिवकाशी’ का इतिहास

दुनिया की सबसे प्राचीन नगरी वाराणसी और सबसे पुरानी भाषा तमिल का अद्भुत संगम ‘काशी तमिल संगमम्’ के चौथे संस्करण का आयोजन करने के लिए वाराणसी पूरी तरह तैयार है।

एक ओर पूरे भारत को अपने आप में समेटे हमारी सांस्कृतिक राजधानी कही जाने वाली काशी है तो दूसरी ओर भारत की प्राचीनता और गौरव का केंद्र हमारा तमिलनाडु और तमिल संस्कृति है। ये संगम गंगा-यमुना के संगम जितना ही पवित्र है। सदियों पुरानी इस रिश्ते को पीएम मोदी ने नया मंच दिया और देश के दो महान संस्कृति के संगम की परिकल्पना की।

‘मन की बात’ में पीएम मोदी ने की अपील

काशी तमिल संगमम् में जनता से पीएम मोदी ने बड़ी संख्या में शामिल होने की अपील की। उन्होंने कहा कि विश्व की सबसे पुरानी भाषा तमिल और दुनिया के सबसे प्राचीन शहरों में एक वाराणसी का अद्भुत संगम है।

काशी तमिल संगमम् 2 दिसंबर से काशी नमो घाट पर शुरू हो रहा है। यह एक ऐसा मंच है जहाँ तमिल भाषा से प्रेम करने वाले पहुँचते हैं। इस आयोजन से वाराणसी के लोगों को भी नया अनुभव मिलता है।

पीएम मोदी ने कहा कि ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की भावना को मजबूत करने वाला यह कार्यक्रम दरअसल देश की एकता और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने का मार्ग है।

तमिल और काशी का ऐतिहासिक संबंध रहा है

तमिल भाषा साहित्य में काशी और बाबा विश्वनाथ के प्रति अगाध श्रद्धा देखी जा सकती है। तमिल राजा काशी की यात्रा पर आया करते थे। 2300 साल पहले भी तमिलनाडु के नगर ग्रामों की गलियाँ काशी का बखाने करने वाले गीतों से गूँजा करती थीं।

कहा जाता है कि प्रथम तमिल संगम मदुरै में हुआ था जो पाण्ड्य राजाओं की राजधानी थी और उस समय अगस्त्य, शिव, मुरुगवेल आदि विद्वानों ने इसमें हिस्सा लिया था। इसके बाद जो द्वितीय संगम हुआ उसका केंद्र कपातपुरम में था। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में भारतीय प्राच्य इतिहास के प्रोफेसर रह चुके डॉक्टर विशुद्घानंद पाठक के मुताबिक, कपातपुरम का संगम ही इतिहास का सबसे बड़ा संगम था और उसमें उत्तर और दक्षिण के विद्वानों ने संगति की थी।

तमिल भाषा तो इतनी समृद्ध है कि इस भाषा में ‘अगटिटयम अगस्त्यम’ नामक एक व्याकरण ग्रन्थ का उल्लेख मिलता है, जिसका रचना काल ईसा पूर्व का है।

15वीं शताब्दी में दक्षिण के राजा पराक्रम पांड्या भगवान शिव का एक मंदिर बनाना चाहते थे और काशी जाकर वे शिवलिंग लेकर आए थे। वहाँ से लौटते समय वे रास्ते में एक पेड़ के नीचे विश्राम करने के लिये रुके और फिर जब उन्होंने यात्रा हेतु आगे बढ़ने की कोशिश की तो शिवलिंग ले जा रही गाय ने आगे बढ़ने से बिल्कुल मना कर दिया।

पराक्रम पंड्या ने इसे भगवान की इच्छा समझा और शिवलिंग को वहीं स्थापित कर दिया। इसे बाद में शिवकाशी नाम दिया गया। तमिलनाडु के जो भक्त काशी नहीं जा सकते थे, उनके लिये पांड्यों ने काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था, जो आज दक्षिण-पश्चिमी तमिलनाडु में तेनकाशी के नाम से जाना जाता है। ये तमिलनाडु और केरल से सटे सीमा पर मौजूद है।

2022 में हुआ पहला संगमम्

काशी तमिल संगमम् की शुरुआत 2022 में हुई। उस वक्त करीब 10 हजार तमिल प्रतिनिधि काशी पहुँचे थे। 19 नवंबर 2022 को इसकी औपचारिक शुरुआत पीएम मोदी ने की थी। उन्होंने दुनिया के सबसे प्राचीन भाषा तमिल को लेकर कहा था कि दुनिया जिसका गुणगान करती है, हम उसके गौरवगान में पीछे रह जाते हैं।

2023 में हुआ दूसरा संगमम्

दिसंबर 2023 में वाराणसी के नमो घाट पर दूसरा तमिल काशी संगमम् का आयोजन किया गया। इस सांस्कृतिक उत्सव के महत्व को बताते हुए पीएम मोदी ने कहा कि तमिल संगमम का मकसद तमिलनाडु और काशी, देश की दो सबसे जरूरी और पुरानी शिक्षा की जगहों के बीच सदियों पुराने रिश्तों को सेलिब्रेट करना, उन्हें पक्का करना और फिर से खोजना है। इस मौके पर वाराणसी तमिल संगमम् ट्रेन को हरी झंडी दिखाई और थिरुक्कुरल, मणिमेकलाई और दूसरे क्लासिक तमिल साहित्य के मल्टी लैंग्वेज और ब्रेल ट्रांसलेशन लॉन्च किया गया।

2025 में तीसरा संगमम्

15 फरवरी से 24 फरवरी को नमो घाट पर तीसरा काशी तमिल संगमम् का आयोजन किया गया। इसका मकसद दोनों प्राचीन सभ्यताओं का उत्सव मना और उसे मजबूत करना है। मंच काशी और तमिल के विद्वानों, विद्यार्थियों, दार्शनिकों, व्यापारियों, कारीगरों, कलाकारों को एक साथ आने और अपने अनुभवों को साझा करने का अवसर प्रदान करता है।

दिसंबर 2025 में ही काशी तमिल संगमम् 4 का आयोजन किया गया है। इसका आयोजन भारत सरकार का शिक्षा मंत्रालय और बीएचयू कर रहा है। 2 दिसंबर से 16 दिसंबर तक इस समागम में 10 हजार से ज्यादा तमिल प्रतिमिधियों के पहुँचने का अनुमान है।

काशी तमिल संगमग इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वाराणसी में काशी विश्वनाथ विराजमान हैं तो तमिलनाडु के रामेश्वरम में भगवान रामेश्वरम। दोनों जगह शिवमय है। दोनों ही जगहों पर संगीत, साहित्य और कला का अद्भुत संगम है।

‘हेल्थ सिक्योरिटी से नेशनल सिक्योरिटी सेस बिल 2025’ लाएगी सरकार: तंबाकू उत्पादों पर 70% सेस के साथ अब तक का सबसे सख्त टैक्स ढाँचा, जानें इससे क्या बदलेगा?

केंद्र सरकार गुटखा और पान मसाला उद्योग पर सख्ती बढ़ाने जा रही है। इसके लिए ‘हेल्थ सिक्योरिटी से नेशनल सिक्योरिटी सेस बिल 2025’ लाया जा रहा है, जिसका उद्देश्य स्वास्थ्य और सुरक्षा पर अतिरिक्त फंड जुटाना है। संसद का शीतकालीन सत्र आज यानी सोमवार (1 दिसंबर 2025) से शुरू हुआ है, जिसमें वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण यह बिल लोकसभा में पेश करेंगी।

नए बिल में तंबाकू उत्पादों पर 40% GST के अलावा 70% या उससे अधिक सेस लगाने का प्रावधान है। वहीं, सिगरेट पर अलग से प्रति 1000 स्टिक पर 2,700 रुपए से लेकर 11,000 रुपए तक विशेष सेस लगाया जाएगा, जो उनकी लंबाई पर निर्भर होगा।

सरकार का मानना है कि ओवरऑल सेस व्यवस्था को बदलने का यह कदम जरूरी है, ताकि आने वाले समय में कंपेंसेशन सेस खत्म होने के बाद भी टैक्स राजस्व में कमी न आए।

क्या कहता है बिल और क्यों लाया गया?

सरकार का मानना है कि गुटखा, पान मसाला और तंबाकू उत्पादों के कारण होने वाली बीमारियों और उससे जुड़े राष्ट्रीय स्वास्थ्य खर्च में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। इसी चुनौती से निपटने और सुरक्षा-संबंधी जरूरतों के लिए अतिरिक्त राजस्व जुटाने के उद्देश्य से इस बिल को शीतकालीन सत्र में पेश किए जाने की तैयारी है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण यह बिल लोकसभा में पेश करेंगी।

सरकार का दावा है कि यह कदम तंबाकू नियंत्रण की दिशा में अब तक की सबसे सख्त वित्तीय नीति हो सकती है, जिसके जरिए न केवल स्वास्थ्य जोखिम कम होंगे बल्कि सुरक्षा ढाँचे को मजबूत करने के लिए भी धन उपलब्ध होगा।

सेस कैसे लगेगा और क्या बदलेगा?

इस बिल के तहत सेस मौजूदा GST व्यवस्था में बदलाव के साथ लागू किया जाएगा। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब टैक्स उत्पादन की वास्तविक मात्रा पर नहीं बल्कि मशीन की अधिकतम उत्पादन क्षमता पर आधारित होगा।

यानि चाहे फैक्ट्री कम उत्पादन करे या अधिक, भुगतान मशीन की क्षमता के आधार पर करना होगा। इसका अर्थ है कि टैक्स चोरी या कम उत्पादन दिखाकर बच निकलने की संभावना लगभग खत्म हो जाएगी।

हाथ से बनने वाले पान मसाला और गुटखे पर भी पहले की तरह मात्रा आधारित टैक्स के बजाय हर महीने एक निश्चित राशि का सेस देना अनिवार्य होगा। यह मॉडल पहले बीड़ी उद्योग में लागू किया गया था और अब इसे इस सेक्टर में लागू किया जा रहा है।

नियम, सजा और छूट के प्रावधान

नए कानून में सभी निर्माताओं के लिए अनिवार्य रजिस्ट्रेशन की शर्त रखी गई है। हर कंपनी को मासिक रिटर्न दाखिल करना होगा, जिसमें उत्पादन क्षमता और सेस भुगतान का ब्यौरा दर्ज रहेगा। सरकारी अधिकारी कभी भी फैक्ट्री का निरीक्षण, जाँच या ऑडिट कर सकेंगे ताकि नियमों का पालन सुनिश्चित हो सके।

यदि कोई निर्माता नियमों का उल्लंघन करता है, गलत जानकारी देता है या टैक्स चोरी करता है, तो उस पर 5 साल तक की जेल और भारी जुर्माना लगाया जा सकता है। इसके बावजूद कंपनियों को अपीलीय अधिकारियों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी अपील का अधिकार दिया जाएगा

बिल में एक राहत का प्रावधान भी शामिल किया गया है। यदि कोई मशीन या उत्पादन यूनिट लगातार 15 दिन या उससे अधिक बंद रहती है, तो उस अवधि के लिए सेस में छूट दी जाएगी। इससे मौसमी या छोटे उत्पादकों को कुछ राहत मिल सकती है।

इसके अलावा, सरकार के पास जरूरत पड़ने पर इस सेस को दोगुना करने का अधिकार भी होगा, जो आने वाले समय में इस उद्योग की लागत को और भारी बना सकता है।

उद्योग, बाजार और उपभोक्ताओं पर असर

विशेषज्ञों का मानना है कि इस बिल का सबसे सीधा असर गुटखा और पान मसाला उद्योग की लागत पर पड़ेगा। छोटे निर्माताओं के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो सकता है और कई स्थानीय यूनिटें बंद होने की संभावना है। बड़े ब्रांड शायद इस बढ़े हुए खर्च को कीमतों में बढ़ोतरी के रूप में ग्राहकों पर डाल देंगे।

हालाँकि, सरकार को उम्मीद है कि कीमत बढ़ने से इन उत्पादों की खपत घटेगी, जिससे जन स्वास्थ्य को फायदा होगा। साथ ही, सेस से जुटाई गई राशि राष्ट्रीय सुरक्षा परियोजनाओं और स्वास्थ्य योजनाओं पर खर्च की जाएगी, जो इसे दोहरे फायदे वाला कदम बनाती है।

निष्कर्ष

‘हेल्थ सिक्योरिटी से नेशनल सिक्योरिटी सेस बिल 2025’ तंबाकू उत्पाद उद्योग पर सरकार का अब तक का सबसे गंभीर वित्तीय हस्तक्षेप माना जा रहा है। यह केवल राजस्व जुटाने का तरीका नहीं बल्कि एक हेल्थ-केयर नीति है। इसके जरिए उपभोग पर नियंत्रण, पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देगी।

हालाँकि, इससे उद्योग पर आर्थिक दबाव बढ़ेगा और छोटे निर्माताओं के लिए चुनौतियाँ बढ़ेंगी लेकिन लंबे समय में यह कदम स्वास्थ्य-हानिकारक उत्पादों की उपलब्धता और खपत में कमी ला सकता है।

मोदी सरकार ने ईसाई प्रचारक फ्रैंकलिन ग्राहम को वीजा देने से किया इंकार, जानिए उनके पिता के धर्मांतरण मिशन और नेहरू-गाँधी परिवार से संबंधों के बारे में

गृह मंत्रालय ने अमेरिकी क्रिश्चियन ईवेंजेलिस्ट फ्रैंकलिन ग्रैहम को वीजा देने से मना कर दिया है। वह रविवार (30 नवंबर 2025) को नगालैंड के कोहिमा में एक क्रिश्चियन कार्यक्रम में शामिल होने वाले थे।

अब उनकी यात्रा रद्द हो गई है, लेकिन कार्यक्रम आयोजित करने वाली संस्था ने कहा है कि इवेंट पहले की तरह जारी रहेगा। सरकार ने वीजा रद्द करने का कारण सार्वजनिक नहीं किया है, लेकिन माना जा रहा है कि भारत में फ्रैंकलिन ग्रैहम की पुरानी गतिविधियाँ, जिनमें उनकी संस्था ईसाई चैरिटी संगठन के जरिए किए जाने वाले धर्म परिवर्तन से जुड़े अभियान शामिल है, इस फैसले की वजह हो सकते हैं।

फ्रैंकलिन ग्राहम का भारत में लंबा इतिहास

पिछले कई दशकों में फ्रैंकलिन कई बार भारत आ चुके हैं। उनकी संस्था समैरिटंस पर्स देश में लंबे समय से धर्म परिवर्तन से जुड़ी गतिविधियों में शामिल रही है। यह संगठन मदद, राहत, भोजन वितरण और दूसरी सामग्री को सुसमाचार (ईसाई प्रचार) के साधन के रूप में इस्तेमाल करता रहा है।
1980 के दशक में इस संगठन ने भारत में एक हजार चर्च बनाने की योजना भी घोषित की थी और अपने अलग–अलग मिशन कार्यक्रमों के जरिए उसी दिशा में काम जारी रखा।

फ्रैंकलिन के पिता बिली ग्रैहम, 1950 के दशक में पहली बार भारत आए थे और उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से उनकी मुलाकात भी हुई थी। उनका गाँधी परिवार से भी जुड़ाव माना जाता है।

इन पुराने संबंधों को इसलिए याद किया जा रहा है क्योंकि नागालैंड प्रदेश कॉन्ग्रेस समिति ने केंद्र सरकार द्वारा फ्रैंकलिन को वीजा न देने के फैसले की खुले तौर पर आलोचना की है।

संस्थाओं ने वीजा न देने पर सरकार पर सवाल उठाए

नागालैंड संयुक्त क्रिश्चियन फोरम (NJCF), नेशनल पीपल्स पार्टी (NPP), चाखेसांग पब्लिक ऑर्गेनाइजेशन (CPO), नागालैंड प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी (NPCC) और कई अन्य संगठनों ने फ्रैंकलिन ग्रैहम की यात्रा रद्द होने और वीजा न मिलने पर निराशा जताई है।

NJCF ने ही यह कार्यक्रम आयोजित किया था जिसमें फ्रैंकलिन को शामिल होना था। वीजा विवाद के बावजूद NJCF ने साफ कहा कि कार्यक्रम पहले की तरह होगा और कोहिमा बैपटिस्ट पादरी संघ (Kohima Baptist Pastors’ Fellowship) के साथ मिलकर रविवार (30 नवंबर 2025) को इंदिरा गाँधी स्टेडियम में यह कार्यक्रम आयोजित किया गया। NJCF ने इसे एकता और उपासना का मौका बताया।

NPP ने भी केंद्र सरकार के फैसले पर चिंता जताई। पार्टी का कहना था कि स्थानीय चर्चों ने बड़े स्तर पर तैयारी की थी और हजारों ईसाई फ्रैंकलिन की यात्रा का इंतजार कर रहे थे। NPP ने कहा कि नागालैंड में ईसाई धर्म कोई औपचारिक पहचान नहीं बल्कि समाज और नैतिकता की रीढ़ है।

उनके मुताबिक, वीजा रद्द होने से भावनाएँ आहत हुई हैं और इससे यह सवाल उठता है कि ईसाई अल्पसंख्यकों के साथ कैसा व्यवहार किया जा रहा है। पार्टी ने यह भी चेतावनी दी कि ऐसे फैसले बार-बार होने से अल्पसंख्यकों का लोकतांत्रिक संस्थानों पर भरोसा कमजोर हो सकता है।

CPO ने बयान जारी कर वीजा न देने को ईसाई समुदाय पर सीधी चोट बताया। इसके नेताओं वियूझू केहो और चेपेत्सो कोजा ने कहा कि यह फैसला उन लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँचाता है जो महीनों से प्रार्थना कर इस कार्यक्रम की तैयारी कर रहे थे।

CPO ने इस कार्यक्रम को नवीनीकरण और आध्यात्मिक जागृति के मौके के तौर पर देखा था। उन्होंने वीजा रद्द किए जाने को केंद्र द्वारा नागाओं के प्रति लंबे समय से चल रहे उपेक्षात्मक रवैये से जोड़ा और 1929 में नागा क्लब द्वारा साइमन कमीशन को दिए गए ज्ञापन का भी जिक्र किया।

उनका कहना था कि इस फैसले से भरोसे की कमी और पुराने घाव फिर उभर आए हैं और नागाओं के भविष्य को लेकर स्व-निर्णय के अधिकार का सम्मान होना चाहिए। CPO ने केंद्र से आग्रह किया कि नागालैंड की पहचान से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता और पारदर्शिता से काम लिया जाए।

NPCC ने भी वीजा न देने की कड़ी निंदा की और इसे भेदभावपूर्ण और ईसाई समुदाय का अपमान बताया। कॉन्ग्रेस ने कहा कि यह कदम BJP-RSS के धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति असहिष्णु रवैये को दिखाता है। NPCC ने सत्ताधारी गठबंधन की साथी पार्टी NPF पर भी आरोप लगाया कि उन्होंने अपने ही लोगों की चिंता पर चुप्पी साध ली और उनका पक्ष नहीं लिया।

फ्रैंकलिन ग्राहम ने हिंदू धर्म का मजाक उड़ाया

USA Today को 2010 में दिए एक इंटरव्यू में फ्रैंकलिन ग्रैहम ने हिंदू धर्म का मजाक उड़ाया था। उन्होंने कहा था कि “100 हाथों वाला कोई हाथी मेरे लिए कुछ नहीं कर सकता। उनके 9,000 देवता मुझे मुक्ति नहीं दिला सकते।”

उन्होंने यह भी कहा था कि “अगर हम सोचते हैं कि एक बड़ा कुंभाया जैसा मेल-मिलाप कर हाथ पकड़ लें तो दुनिया बेहतर हो जाएगी, ऐसा होने वाला नहीं है।” उनके ये बयान हिंदू आस्था को सीधी अवहेलना थे। उन्होंने भारत की प्राचीन और समृद्ध धार्मिक परंपरा को तिरस्कारपूर्ण ढंग से छोटे रूपों में पेश किया।

100 हाथों वाले हाथी जैसे वाक्य और 9,000 देवता का जिक्र करके उन्होंने सिर्फ मतभेद नहीं जताया, बल्कि हिंदू देवी-देवताओं का उपहास किया और कहा कि इनका कोई मूल्य या शक्ति नहीं है।

ग्रैहम की सोच कट्टर ईसाई प्रचारवादी विचार पर आधारित थी, जिसमें माना जाता है कि मुक्ति सिर्फ ईसाई धर्म से ही संभव है और बाकी सभी धार्मिक मार्ग गलत या बेकार हैं।
जब उन्होंने कुंभाया जैसी एकता और मेल-जोल की अवधारणा का मजाक उड़ाया, तो यह धर्मों के बीच आपसी सम्मान और सौहार्द को भी खारिज करने जैसा था।

हिंदू धर्म पर उनका तंज उसी मिशनरी मानसिकता को दर्शाता है जो लंबे समय से भारत को निशाना बनाती रही है, एक ऐसी मानसिकता जो भारत की सभ्यता और परंपराओं को कमतर दिखाती है और धर्मातरण को आध्यात्मिक चिंता का नाम देकर आगे बढ़ाती है।

भारत में 1,000 चर्च बनाने का मिशन

फ्रैंकलिन 1984 में भारत आए थे ताकि एक चर्च की आधारशिला रख सकें। जनवरी 2020 में समैरिटन पर्स की वेबसाइट पर छपी एक रिपोर्ट में संगठन ने यह बात खुले तौर पर बताया और गर्व से दिखाया कि उसने भारत में अब तक 1,012 चर्च और 12 बाइबल स्कूल स्थापित किए हैं।

संगठन ने हिंदुओं को ईसाई धर्म की ओर आकर्षित करने के लिए वही पुराना तरीका अपनाया- बुनियादी सुविधाएँ, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ देकर लोगों तक पहुँचना। रिपोर्ट में यह भी लिखा था कि उनके ज्यादातर चर्चों में एक कुआँ बनाया गया, ताकि आसपास के हिंदू वहाँ आकर साफ पानी ले सकें।

रिपोर्ट के अनुसार, इस पानी के बहाने ईसाई प्रचार करने का मौका मिलता था। उन्होंने बाइबल के एक प्रसंग का हवाला देते हुए कहा कि जैसे यीशु ने एक सामरी स्त्री से कहा था, “यह पानी पीने वाला फिर प्यासा होगा, लेकिन जो पानी मैं देता हूँ उसे कभी प्यास नहीं लगेगी। वह पानी उसे अनन्त जीवन का स्रोत बना देगा।” रिपोर्ट में बताया गया कि पानी उपलब्ध कराना एक तरीका था ताकि लोगों को ईसाई संदेश सुनाया जा सके।

कोविड महामारी का इस्तेमाल लोगों को बदलने के लिए एक टूल के तौर पर करना

जैसा कई ईसाई प्रचारक करते हैं, फ्रैंकलिन ने भी महामारी के दौरान दावा किया कि सिर्फ ईसाई ईश्वर ही लोगों को इस बीमारी से बचा सकता है। मई 2020 में, जब भारत में कोविड तेजी से फैल रहा था,  बिली ग्राहम इवेंजेलिस्टिक एसोसिएशन ने 2010 का एक पुराना वीडियो फिर से जारी किया यह वही समय था जब फ्रैंकलिन भारत में एक धर्मांतरण कार्यक्रम में शामिल होने आया था।

इस पोस्ट में संगठन ने लिखा, “जब COVID भारत में हजारों जानें ले रहा है, हमारे साथ प्रार्थना करें कि भारत के लोग जीवित उद्धारकर्ता को जान सकें। यह वीडियो फ्रैंकलिन ग्रैहम की 2010 की भारत यात्रा का है।” यानी महामारी की त्रासदी के बीच भी उन्होंने धर्मातरण से जुड़े संदेश फैलाने की कोशिश की और भारत को सीधे निशाना बनाया।

जब भारत अप्रैल 2021 में कोविड-19 की दूसरी लहर चल रही थी, फ्रैंकलिन के संगठन समैरिटंस पर्स ने दावा किया कि उसने 1,000 परिवारों को राशन दिया, एक स्थानीय क्लिनिक को कोविड देखभाल में मदद की और कुछ अन्य राहत कार्य किए।

हालाँकि, यह स्पष्ट नहीं है कि भारत में उन्होंने ये मदद किस माध्यम या किस चैनल से पहुँचाई, यानी राहत सामग्री वास्तव में किस तरह और कहाँ बाँटी गई इसकी कोई साफ जानकारी नहीं मिली।

बिली ग्राहम का भारत दौरा और कांग्रेस से उनके संबंध

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2025 की शुरुआत में USAID बंद करने के फैसले से भारत में सक्रिय कई धर्मातरण नेटवर्क पर बड़ा असर पड़ा। उसी दौरान OpIndia ने World Vision International पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की।

यह संगठन हर साल USAID से मिलने वाले सैकड़ों करोड़ रुपए को मानवीय सहायता बताकर भारत भेजता था, लेकिन असल में यह हिंदुओं खासकर बच्चों और महिलाओं को ईसाई धर्म अपनाने के लिए प्रेरित करता था।

वर्ल्ड विजन एक कट्टर ईसाई संगठन है, जो 1951 में भारत में स्थापित हुआ। अगले 70 सालों में इसे लगातार करोड़ों रुपए मिलते रहे और यह देश में धर्मातरण को बढ़ावा देता रहा। 2024 में मोदी सरकार ने इसका FCRA लाइसेंस रद्द किया, जिससे इसकी गतिविधियों पर बड़ी रोक लगी।

इस संगठन की स्थापना बॉब पियर्स ने की थी। 1950 के दशक में वह भारत आए और 1960 तक छह चाइल्ड केयर प्रोजेक्ट शुरू कर चुके थे। 1953 की उनकी एक चिट्ठी में स्पष्ट लिखा है कि वे कोलकाता में हिंदुओं और सिखों का धर्मातरण कर रहे थे। 1956-57 में भी उन्होंने भारतीय छात्रों को टारगेट करते हुए प्रचार किया।

इसी दौरान बॉब पियर्स और प्रसिद्ध अमेरिकी ईसाई प्रचारक बिली ग्रैहम ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मुलाकात की। फ्रैंकलिन ग्रैहम के पिता बिली ग्रैहम अमेरिका के सबसे प्रभावशाली प्रचारकों में शामिल थे और कई अमेरिकी राष्ट्रपतियों के बेहद करीबी थे।

उनका मानना था कि दुनिया में आशा सिर्फ ईसा मसीह के माध्यम से ही मिल सकती है। वे कई देशों में प्रचार करते थे और अक्सर अमेरिकी विदेश नीति के साथ तालमेल में काम करते थे।

बिली ग्रैहम की पहली भारत यात्रा 1956 में हुई थी। उनकी वेबसाइट के अनुसार उन्होंने मुंबई, चेन्नई, कोट्टायम, पलमकोट्टई, दिल्ली और कोलकाता में बड़े स्तर पर क्रूसेड यानी प्रचार कार्यक्रम की योजना बनाई थी।

यह समय वह था जब भारत कम्युनिस्ट देशों के करीब जा रहा था, जिससे अमेरिका चिंतित था। इसलिए भारत आने से पहले ग्रैहम ने अमेरिकी विदेश विभाग से विशेष ब्रीफिंग भी ली। राष्ट्रपति आइजनहावर ने उन्हें शुभकामनाएँ दीं और विदेश मंत्री डलेस ने निर्देश दिए कि वे भारत में अमेरिकी हितों को आगे बढ़ाएँ।

‘Billy Graham- His Life and Influence’ नामक पुस्तक में लिखा है कि यह पहला अवसर था जब अमेरिकी सरकार ने बिली ग्रैहम के धार्मिक अभियानों का उपयोग अपनी विदेश नीति को मजबूत करने के लिए किया।

बाद में भी कई बार ग्रैहम अमेरिकी राष्ट्रपतियों के अनौपचारिक दूत बनकर काम करते रहे और ऐसे नेताओं से मिले जिनसे अमेरिका सीधे संपर्क नहीं कर सकता था। इस पुस्तक में यह भी बताया गया है कि भारत में अमेरिकी राजदूत जॉन शेर्मन कूपर ने नेहरू पर जोर दिया कि वे बिली ग्रैहम से मिलें।

मुलाकात में शुरू में नेहरू रुचि नहीं ले रहे थे। लेकिन जैसे ही ग्रैहम ने बातचीत को ईसाई धर्म की ओर मोड़ा, नेहरू तुरंत सतर्क हो गए और सवाल पूछने लगे। सबसे महत्वपूर्ण खुलासा यह था कि नेहरू ने ग्रैहम से कहा कि उन्हें ईसाई मिशनरियों से कोई आपत्ति नहीं, बशर्ते वे राजनीति से दूर रहें।

यह मुलाकात कई स्रोतों में दर्ज है, बिली ग्रैहम की आत्मकथा ‘Just As I Am’ और बॉब पियर्स की जीवनी ‘This One Thing I Do’ दोनों से यह स्पष्ट होता है कि पियर्स और ग्रैहम एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे और भारत में उनका उद्देश्य केवल धर्मप्रचार नहीं, बल्कि अमेरिकी प्रभाव को बढ़ाना भी था।

इंडिया रिविजिटेड- इंदिरा गाँधी ने जवाहरलाल नेहरू की विरासत को आगे बढ़ाया

प्रसिद्ध अमेरिकी प्रचारक डॉ बिली ग्राहम 1972 में भारत लौटे। द हिन्दू ने 24 नवंबर 1972 को रिपोर्ट किया कि डॉ ग्राहम ने आशा व्यक्त की कि उनका यह दौरा भारत और अमेरिका के बीच संबंधों को मजबूत करने में मदद करेगा।

कोहिमा से एयरपोर्ट पर मीडिया से बातचीत में उनसे पूछा गया कि क्या वे राष्ट्रपति निक्सन का कोई संदेश प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के लिए लाए हैं। उन्होंने उत्तर दिया, “मुझे खेद है, मैं इसका जवाब नहीं दे सकता।” डॉ ग्राहम, जो राष्ट्रपति निक्सन के करीबी मित्र हैं, श्रीमती गाँधी से मिलने वाले थे।

उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि भारतीय सरकार ने उन्हें नागालैंड यात्रा की विशेष अनुमति दी और कहा, मैं इसके लिए आभारी हूँ। नई दिल्ली में अपने प्रवास के दौरान, वे राष्ट्रपति श्री वी वी गिरी से भी मिलने वाले थे।

पहले, कलकत्ता एयरपोर्ट पर, उन्होंने बताया कि भारत आने से पहले उन्होंने राष्ट्रपति निक्सन से दो बार मुलाकात की थी और कहा, “मैं भारत से प्रेम करता हूँ और चाहता हूँ कि अमेरिका और भारत बहुत घनिष्ठ मित्र बनें। यह आवश्यक है क्योंकि हमें अपने पारस्परिक हितों के लिए एक-दूसरे की जरूरत है।”

द हिन्दू की रिपोर्ट में डॉ ग्राहम को मुख्य रूप से एक ईसाई पादरी और अमेरिकी राष्ट्रपति के करीबी मित्र के रूप में दिखाया गया, जो भारत दौरे पर केवल द्विपक्षीय संबंध सुधारने और नागालैंड जाने आए हैं।

हालाँकि उनकी आत्मकथा में बाद में खुलासा हुआ कि 1972 के उनके इस दौरे में उनके श्रीमती गाँधी के साथ मिलने और उनकी यात्रा के रणनीतिक पहलुओं जैसी कई और महत्वपूर्ण बातें भी शामिल थीं।

बिली ग्राहम ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि उनका इंदिरा गाँधी से मिलने का उद्देश्य केवल धर्म प्रचार नहीं था, बल्कि अमेरिकी सरकार के एक विशेष निर्देश का पालन करना भी था। उन्होंने लिखा कि “राष्ट्रपति निक्सन ने, न्यू दिल्ली में अमेरिकी कौंसुल की रिक्वेस्ट पर, मुझसे व्यक्तिगत रूप से अनुरोध किया कि मैं प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से मुलाकात करूँ और यह जानूँ कि उन्हें अमेरिका से किस प्रकार का राजदूत चाहिए। मुझे हर छोटी-छोटी बात पर ध्यान देने को कहा गया, उनके हाथों की गति, चेहरे के भाव, आँखों का इजहार। उन्होंने कहा कि जब तुम इंटरव्यू खत्म कर लोगे तो अमेरिकी दूतावास जाओ और अपनी रिपोर्ट मुझे सुनाओ।”

ग्राहम ने इंदिरा गाँधी से यह प्रश्न पूछा। उन्होंने बताया कि वे ऐसे व्यक्ति को राजदूत बनाना चाहती हैं जो अर्थशास्त्र को समझता हो, राष्ट्रपति तक पहुँच रखता हो और कॉन्ग्रेस में प्रभावशाली हो। यह जानकारी ग्राहम ने राष्ट्रपति निक्सन को रिपोर्ट की। बाद में, डैनियल पैट्रिक मोइनिहन को अमेरिका का राजदूत नियुक्त किया गया। ग्राहम को कभी यह पता नहीं चला कि उनकी रिपोर्ट ने राष्ट्रपति के निर्णय को प्रभावित किया या नहीं।

ग्राहम की आत्मकथा से ये बात साफ है की है कि वे भारत में किसी अलग उद्देश्य से आए थे, लेकिन अमेरिकी सरकार का निर्देश उन्हें इंदिरा गाँधी से मिलने और उनकी शैली, व्यवहार और झलक का अवलोकन करने का था। यह भी जाहिर होता है कि बिली ग्राहम अमेरिकी प्रशासन के इतने करीब थे कि वे उनकी कुछ निर्णय प्रक्रियाओं पर असर डाल सकते थे।

हालाँकि, यह अमेरिकी सरकार का निर्देश मुख्य उद्देश्य नहीं था। उनके वास्तविक उद्देश्य के रूप में, ग्राहम नागालैंड में धर्म प्रचार करने के लिए आए थे। उन्होंने लिखा: “हमारा भारत जाने का उद्देश्य नागालैंड में प्रचार करना था, जो भारत के उत्तर-पूर्वी कोने में, बर्मा की सीमा के पास, जंगलों और पहाड़ियों से घिरा एक अलग क्षेत्र है। यहाँ दर्जनभर अलग-अलग जनजातियाँ रहती थीं, जिनकी अपनी भाषाएँ थीं और अक्सर वे पुरानी शिकार-संस्कृति से जुड़ी थीं।”

ग्राहम ने उल्लेख किया कि 1972 के अंत में, यह लगभग चमत्कार जैसा था कि इंदिरा गाँधी सरकार ने उन्हें नागालैंड यात्रा की अनुमति दी, क्योंकि उस समय राजनीतिक अस्थिरता के कारण विदेशी नागरिकों को इस राज्य में यात्रा की अनुमति नहीं मिल रही थी।

बिली ग्राहम की नागालैंड यात्रा और वहाँ की अनुमति मिलने का तरीका भी बहुत दिलचस्प है। वे लिखते हैं, “यह अनुमति नागालैंड के रेवरेन्ड लॉन्गरी आओ और अन्य चर्च नेताओं की एक प्रतिनिधिमंडल की अपील के जवाब में मिली थी। (उनकी सहायता में एक प्रतिभाशाली युवा भारतीय पादरी रॉबर्ट कनविल थे, जो नॉर्थ ईस्ट इंडिया क्रिश्चियन काउंसिल के प्रमुख थे और जिन्हें वर्ल्ड काउंसिल ऑफ चर्चेज के लिए युवा प्रचार का निदेशक बनने के लिए आमंत्रित किया गया था, बाद में वे हमारी टीम में प्रचारक के रूप में शामिल हुए और भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में भी अपना धर्मकार्य करते रहे)।”

यहाँ यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि वर्ल्ड काउंसिल ऑफ चर्चेज (WCC) क्या है। हमारी पिछली रिपोर्ट में हमने USAID द्वारा वित्तपोषित World Vision के बारे में लिखा था। हमने यह भी जाँचा कि World Vision, जो कि बॉब पियर्स द्वारा स्थापित एक ईसाई प्रचार संगठन है, उसका विश्वसनीय साझेदार WCC था।

WCC अपने शब्दों में स्वयं कहती है कि यह चर्चों का एक समुदाय है जो यीशु मसीह को भगवान और उद्धारकर्ता के रूप में मानते हैं और एक विश्वास व एक युकेरिस्टिक समुदाय के रूप में एकता की दिशा में कार्यरत हैं। यह ईसाई एकता की दिशा में प्रयास करता है ताकि दुनिया विश्वास कर सके (यूहन्ना 17:21)।

WCC को दुनिया के कई देशों की सरकारें वित्तीय सहायता देती हैं और जर्मनी की NGO ब्रेड फॉर द वर्ल्ड से भी महत्वपूर्ण धन मिलता है। ब्रेड फॉर द वर्ल्ड के कई कनेक्शन भारत विरोधी NGO, अर्बन नक्सली, जिहादी और हर्ष मंडर जैसे विवादित तत्वों से हैं।

वापस बिली ग्राहम की नागालैंड यात्रा पर आते हैं। ग्राहम लिखते हैं कि जब वे नागालैंड पहुँचे, तो उन्हें अमेरिकी कौंसुल ने स्वागत किया, जो मदर टेरेसा का अच्छा मित्र था। रोचक रूप से, बॉब पियर्स की किताब के अनुसार, NGO (World Vision) मदर टेरेसा को भी पैसा देती थी।

ग्राहम लिखते हैं कि नागालैंड पहुँचने पर उन्होंने लोगों से हाथ मिलाना शुरू किया, तभी पुलिस ने उन्हें रोककर कार में बैठा दिया क्योंकि उन्हें लगा कि उनकी सुरक्षा खतरे में है। इसके बाद, वे उस स्थान पर पहुँचे जहाँ उन्होंने 90,000 से अधिक लोगों को उपदेश दिया।

इसके बाद उन्हें सरकारी आवास में ठहराया गया। “उसके बाद हमें एक सरकारी भवन में रात बिताने के लिए ले जाया गया। नागालैंड के मुख्यमंत्री ने हमारे लिए एक डिनर का इंतजाम किया। उस डिनर में अगले दिन के कार्यक्रम पर चर्चा हुई।”

बिली ग्राहम की वेबसाइट के अनुसार, 20-22 नवंबर 1972 के दौरान उनके क्रूसेड में 5 लाख लोग शामिल हुए। इस भीड़ में कई अलग-अलग जनजातियाँ थीं, जिनके लिए अलग-अलग दुभाषिया मौजूद थे। ग्राहम ने उपस्थित लोगों के जनजातीय परिधान, चेहरे पर पेंट और हाथ में भाले जैसे विवरण नोट किए और उन्हें प्लेटफ़ॉर्म से भगवान के प्रेम का संदेश दिया।

इंदिरा गाँधी सरकार ने उन्हें केवल पुलिस सुरक्षा और सरकारी आवास प्रदान ही नहीं किया, बल्कि मुख्यमंत्री ने उनके धर्म प्रचार का मनोरंजन किया। इसके अलवा, इंदिरा गाँधी ने उनके लिए हेलीकॉप्टर की व्यवस्था की और कहा कि वे व्यक्तिगत रूप से इस यात्रा पर ध्यान देंगी।

ग्राहम लिखते हैं, “श्रीमती गाँधी ने मुझे बताया कि वे इस यात्रा पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देंगी और कुछ विशेष खतरों से आगाह किया। उन्होंने दो हेलीकॉप्टर हमारे लिए मीटिंग खत्म होने पर भेजने का आदेश दिया।”

इंदिरा गाँधी सरकार ने उन्हें केवल पुलिस सुरक्षा और सरकारी आवास प्रदान ही नहीं किया, बल्कि मुख्यमंत्री ने उनके धर्म प्रचार का मनोरंजन किया। इसके अलावा, इंदिरा गाँधी ने उनके लिए हेलीकॉप्टर की व्यवस्था की और कहा कि वे व्यक्तिगत रूप से इस यात्रा पर ध्यान देंगी।

ग्राहम लिखते हैं, “श्रीमती गाँधी ने मुझे बताया कि वे इस यात्रा पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देंगी और कुछ विशेष खतरों से आगाह किया। उन्होंने दो हेलीकॉप्टर हमारे लिए मीटिंग खत्म होने पर भेजने का आदेश दिया।”

बिली ग्राहम की लिखी बातों से कुछ महत्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट होते हैं:

  1. इंदिरा गाँधी बिली ग्राहम की नागालैंड यात्रा को बेहद करीब से मॉनिटर कर रही थीं।
  2. नागालैंड में अस्थिरता के कारण जब विदेशी नागरिकों को अनुमति नहीं दी जा रही थी, तब भी इंदिरा गाँधी ने विशेष तौर पर बिली ग्राहम को परमिट दिया।
  3. यह अनुमति ‘वर्ल्ड काउंसिल ऑफ चर्चेज’ से जुड़े एक पादरी के अनुरोध पर दी गई थी।
  4. इंदिरा गाँधी ने उन्हें पुलिस सुरक्षा, सरकारी आवास और यात्रा के लिए निजी हेलीकॉप्टर तक उपलब्ध कराए।
  5. उन्होंने बिली ग्राहम को जो लाखों गैर-ईसाइयों (मुख्यतः हिंदुओं) का धर्मांतरण कर रहे थे, अस्थिरता के समय भी नागालैंड में सक्रिय धर्म-प्रचार करने की हर संभव सुविधा दी।
  6. बिली ग्राहम अमेरिकी सरकार के अत्यंत करीबी थे और विदेशी नीति के लक्ष्यों को आगे बढ़ाने के लिए इंदिरा गाँधी जैसे राष्ट्र प्रमुखों से मिलकर, उनकी गतिविधियों की रिपोर्ट अमेरिकी सरकार को भेजते थे।
  7. यह स्थापित है कि नागालैंड को ईसाई-बहुल राज्य बनाने में बिली ग्राहम ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यदि फ्रैंकलिन ग्राहम की यात्रा होती, तो यह उत्तर-पूर्व में जारी धर्मातरण नेटवर्क- विशेषकर संवेदनशील जनजातीय समुदायों पर और अधिक प्रभाव डालता।

चूँकि यह स्थापित है कि बिली ग्राहम ने व्यापक ईसाई प्रचार के माध्यम से नागालैंड को एक ईसाई-बहुल राज्य बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, इसलिए फ्रैंकलिन ग्राहम की प्रस्तावित यात्रा उत्तर-पूर्व में सक्रिय धर्मातरण नेटवर्क को और मज़बूत करती।

यह यात्रा विशेष रूप से उन जनजातीय समुदायों को प्रभावित कर सकती थी, जो पहले से ही ऐसे संगठित मिशनरी प्रभाव के प्रति अधिक संवेदनशील माने जाते हैं।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)

आम मुस्लिमों को जिहाद के नाम पर भड़काकर कुर्बान करो, खुद तकरीर करते रहो: ‘सीने पर गोली खाएँगे’ वाला प्रयोग खुद से ही क्यों नहीं शुरू करते मदनी साहब?

जमीअत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने शनिवार (29 सितंबर 2025) को भोपाल में आयोजित कार्यक्रम में कहा है कि जब-जब जुल्म होगा, तब-तब जिहाद होगा। इसके बाद से ही देश में इस बयान को लेकर बहस शुरू हो गई है, हिंदू और सेक्युलर दलों और नेताओं को तो छोड़ दीजिए कई मौलानाओं को भी मदनी का बयान भड़काने वाला लग रहा है।

बात सिर्फ जिहाद को लेकर बयान तक ही नहीं रुकी, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की निष्पक्षता पर सवाल उठाए और वंदे मातरम जैसे राष्ट्रीय प्रतीक को मुसलमानों के खिलाफ बताते हुए यह इशारा दिया कि जो समुदाय इसके दबाव में झुक जाए वह ‘मुर्दा कौम’ कहलाएगा।

एक तरफ जिहाद की परिभाषा, दूसरी ओर सर्वोच्च न्यायपालिका पर उंगली उठाना और राष्ट्रगीत को ‘धर्म बनाम पहचान’ की बहस में खड़ा करना एक बड़ा संदेश देता है। संदेश साफ है कि मदनी अपने बयान के जरिए केवल व्यवस्था को लेकर नाराजगी नहीं जता रहे बल्कि मुस्लिम समाज में गुस्सा और असुरक्षा की भावना को उकसाने का भी प्रयास कर रहे हैं।

जमीअत के प्रमुख का भड़काऊ संदेश

जमीअत उलेमा-ए-हिंद ने X पर मदनी का बयान शेयर किया है। मदनी कहते हैं, “गोली खाएँगे तो सीने पर खाएँगे, पीठ पर नहीं। और अगर हमारा जनाजा निकला, तो जमीअत उलमा-ए-हिंद के झंडे में ही निकलेगा – इंशाअल्लाह।”

जमीअत के पोस्ट में लिखा है, “हमारे बुजुर्गों ने जेलों को आबाद किया, फांसी के फंदों को चूमा और कौम के लिए अपनी जानें कुर्बान कीं। अगर उन्होंने जुल्म के सामने सर नहीं झुकाया, तो हम कैसे उस तसल्सुल को छोड़ दें? डरेंगे नहीं – कभी नहीं। चाहे हालात जैसे भी हों, मुकाबला करेंगे – इंशाअल्लाह।”

अब इस बयान के मायने और असर को समझने की कोशिश करते हैं। ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के चीफ मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने मदनी के बयान को ‘समाज को बाँटने वाला और मुस्लिमों को भड़काने वाला’ बताया है। बात सही भी है। जब कोई ऐसा नेता, जिसके पीछे बड़ी संख्या में लोग हों ‘जिहाद’ जैसा शब्द सार्वजनिक मंच से बोलता है तो उसका अर्थ सिर्फ ‘अन्याय के खिलाफ संघर्ष’ तक सीमित नहीं रहता।

इस शब्द का भावनात्मक और ऐतिहासिक संदर्भ इसे कहीं अधिक उग्र बना देता है। आम मुस्लिम युवक यदि इसे मजहबी संदेश समझ ले तो परिणाम केवल वैचारिक असहमति नहीं रहेगा बल्कि वह टकराव का रूप ले लेगा और यही चिंता का विषय भी है। क्या आम मुस्लिमों को लगता है कि अगर गोली की नौबत आएगी तो महमूद मदनी या उनके परिवार के लोग आगे आएँगे। जाहिर है वो ऐसा नहीं करेंगे लेकिन तकरीर कर लोगों को भड़काने का काम करते रहेंगे।

मदनी के बयान का दूसरा पहलू सुप्रीम कोर्ट पर उनकी टिप्पणी है। यह देश का सर्वोच्च न्यायिक स्तंभ है, जिसके ऊपर जनता का भरोसा ही लोकतंत्र की नींव है। यदि मुस्लिमों का एक बड़ा नेता यह कहता है कि न्यायपालिका संविधान की रक्षा नहीं कर रही या सत्ता के दबाव में काम कर रही है तो यह केवल असहमति नहीं बल्कि अविश्वास फैलाने का प्रयास है।

एक साधारण नागरिक कानून में भरोसा रखता है क्योंकि उसे लगता है कि अंतिम न्यायालय उसके अधिकारों की रक्षा करेगा। परंतु जब नेतृत्व के मंच से कहा जाए कि यह संस्थान न्याय नहीं दे रहा तो इस संदेश से भीड़ के भीतर यह सोच आ जाती है कि न्याय पाने की उम्मीद न्यायालय में नहीं बल्कि टकराव और प्रतिरोध में है। यही प्रतिशोध की भावना टकराव की वजह बन सकती है।

वंदे मातरम को लेकर उनका बयान सच में चिंता बढ़ाने वाला है। वंदे मातरम कोई पार्टी का नारा नहीं बल्कि आजादी की लड़ाई की याद है और भारत की पहचान है। इसे मानने या न मानने को ‘जिंदा कौम’ और ‘मुर्दा कौम’ जैसे शब्दों में बाँटना गलत दिशा में ले जाता है। इससे ऐसा लगता है कि जो इसके खिलाफ बोलता है वही असली नायक है और जो इसे सम्मान देता है वो जैसे दबा हुआ या कमजोर है।

मदनी लगातार मुसलमानों को यह संदेश दे रहे हैं कि वे हमेशा उत्पीड़ित हैं और उन्हें संघर्ष के लिए तैयार रहना चाहिए। सीधी सी बात है कि अगर मुसलमान खुद को उत्पीड़ित समझेंगे तो वे दूसरे समाज को दुश्मन की तरह देखना शुरू कर देंगे और मदनी के बयान की टोन से लगता है कि वो यही करना भी चाहते हैं।

विश्व हिंदू परिषद के प्रवक्ता विनोद बंसल ने मुस्लिमों से अपील की है कि वे मदनी जैसे मौलानाओं से दूरी बना लें। बंसल ने कहा, “मदनी जैसे कट्टरपंथी मौलानाओं से मुस्लिम युवाओं को तुरंत दूरी बना लेनी चाहिए क्योंकि यही लोग अपनी तकरीरों से एक दिन उन्हें RDX बाँधकर ब्लास्ट करने के लिए मजबूर कर देंगे।”

मदनी इससे पहले भी विवादों में घिरे रहे हैं। UCC के खिलाफ बयानबाजी हो, चाहे इस्लामोफोबिया के खिलाफ कानून लाने की बात हो या वक्फ एक्ट को लेकर हल्ला बोल हो, मदनी ने हर बार उकसाने वाले बयान दिए हैं। अब फिर वही कोशिश मदनी कर रहे हैं, उनके बयान का विरोध होगा और किसी भी प्रतिक्रिया पर मुस्लिमों के कट्टरपंथी तबके को मौका मिल जाएगा कि वो सड़कों पर आ जाए।

एक मजहबी नेता का काम होता है लोगों को जोड़ना, ना कि समाज में दरार डालना। लोकतंत्र में हम न्याय प्रणाली, संविधान और धर्म से जुड़े मुद्दों पर सवाल पूछ सकते है और यह सभी का हक है। लेकिन अगर वास्तव में सवाल हैं तो वो ऐसे होने चाहिए जो समाधान ढूँढें, ना कि सांप्रदायिक तनाव को और युवाओं को भड़काने का काम करें।

मदनी की बातों को सुने तो लगता है कि वो समाज को किसी भी तरह के समाधान के बजाय टकराव की और ले जाना चाहते हैं। उनकी भाषा से ऐसा लगता है कि जैसे मुस्लिम समाज हर तरफ से खतरे में है और बचने का रास्ता सिर्फ ‘जिहाद’ ही है। इस तरह का सोच धीरे-धीरे समाज में दूरी और नफरत बढ़ाता है। मुस्लिम समाज को भी यह समझने की जरूरत है कि मदनी जैसे लोग असल में आग में घी डाल रहे हैं जो इसमें उनके समाज के लोगों के झुलसने का ही खतरा है।

‘सौभाग्य’ नहीं, ‘संगठित रणनीति’: 8.2% की शानदार GDP ग्रोथ से भारत की अर्थव्यवस्था ने दुनिया को फिर दिखाया अपना दम

भारत की विकास गाथा एक बार फिर वैश्विक मंच पर ध्वनि-गर्जना कर रही है। जिस समय दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ धीमी पड़ने लगी हैं, उसी समय भारत ने 2025-26 की दूसरी तिमाही (Q2) में 8.2 % की रफ्तार से बढ़कर यह सिद्ध कर दिया है कि उसकी आर्थिक नींव न केवल मजबूत है बल्कि निरंतर व्यापक होती जा रही है। यह सिर्फ एक आर्थिक आँकड़ा नहीं यह आत्मविश्वास, स्थिरता और सुधारवादी नीतियों की सफलता का प्रमाण है।

NSO के नवीनतम आँकड़े विशेषज्ञों की सभी भविष्यवाणियों से ऊपर निकले हैं। 7-7.5% की अपेक्षाओं के बीच 8.2% की यह छलांग बताती है कि भारत की विकास कथा अब ‘सौभाग्य’ नहीं बल्कि ‘संगठित रणनीति’ का परिणाम है। घरेलू खपत, सेवा क्षेत्र की निरंतर मजबूती और मैन्युफैक्चरिंग की नई ऊर्जा ने मिलकर अर्थव्यवस्था को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया है।

सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इस ग्रोथ का ईंधन आम भारतीयों का विश्वास है। निजी खपत में 7.9% की वृद्धि दिखाती है कि परिवार, व्यापारी और उपभोक्ता अर्थव्यवस्था के भविष्य को लेकर अधिक आश्वस्त हैं। जब नागरिक आश्वस्त होते हैं, तब ही अर्थव्यवस्था गति पकड़ती है।

मैन्युफैक्चरिंग और निर्माण क्षेत्र की 9% और 7% के आस-पास की ऊँची वृद्धि बताती है कि Make in India और उत्पादक-क्षमता आधारित नीतियाँ अब जमीन पर परिणाम दे रही हैं। यह संयोग नहीं हो सकता कि वैश्विक मंदी की आशंकाओं के बीच भी भारत का औद्योगिक उत्पादन मजबूत खड़ा है यह उसी आत्मनिर्भर दृष्टि की पराकाष्ठा है, जिसे पिछले कुछ वर्षों में लगातार दिशा दी गई है।

सेवा-क्षेत्र, जो पहले से ही भारत की ताकत रहा है, इस तिमाही में 10% से अधिक की वृद्धि लेकर आया है। वित्तीय सेवाएँ, रियल एस्टेट और प्रोफेशनल सेवाओं के तेजी से बढ़ने का अर्थ है कि शहरों में ही नहीं बल्कि पूरे देश में आर्थिक गतिविधियों की तेज लय बनी हुई है।

GST संरचना में हाल के महीनों में किए गए सुधार, खासकर दरों में की गई आवश्यक कटौती ने बाजार को राहत दी है और उपभोग को बढ़ावा दिया है। इन उपायों का व्यापक प्रभाव आगामी तिमाहियों में और स्पष्ट दिखेगा।

जीवन स्तर में सुधार, सरकारी योजनाओं की बेहतर डिलीवरी और डिजिटल अर्थव्यवस्था के प्रसार ने भी उत्पादन और उपभोग दोनों को मजबूत किया है। आज भारत दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था ही नहीं बल्कि सबसे ‘चपल’ और ‘नवाचार-समर्थ’ अर्थव्यवस्थाओं में से एक भी है।

अब यह भी सच है कि राजकोषीय घाटे में बढ़त जैसी कुछ चुनौतियाँ सामने हैं लेकिन सकारात्मक दृष्टिकोण से देखें तो यह सरकार की सक्रिय पूंजीगत गतिविधियों और कल्याणकारी कार्यक्रमों का भी परिणाम है। यदि विकास की रफ्तार बनी रहती है, तो यह घाटा दीर्घकाल में स्वतः संतुलित होता है।

वैश्विक अनिश्चितताओं जैसे अमेरिका-यूरोप में माँग की गिरावट, भू-राजनीतिक तनाव, तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच भारत का यह प्रदर्शन वाकई उल्लेखनीय है। यह बताता है कि हमारी अर्थव्यवस्था बाहरी झटकों के खिलाफ अधिक लचीली (resilient) और संतुलित संरचना की ओर बढ़ रही है।

8.2% का यह आँकड़ा केवल एक तिमाही के उत्सव की वजह नहीं है यह उस भारत की झलक है जो आत्मविश्वास से भरा है, जो दुनिया की उभरती आर्थिक धुरी बनने की तैयारी कर रहा है और जिसकी विकास-यात्रा अब ठोस नींव पर आधारित है।

भारत की क्षमता अब केवल भविष्य की चीज नहीं यह वर्तमान में दिख रही, महसूस की जा सकने वाली वास्तविकता बन चुकी है। इस तिमाही का प्रदर्शन उसी सकारात्मक परिवर्तन की दिशा में एक और सशक्त कदम है।

हम अवसरों के मोड़ पर खड़े हैं जहाँ से भारत न सिर्फ नई ऊँचाइयाँ छू सकता है बल्कि वैश्विक आर्थिक परिदृश्य को भी पुनर्परिभाषित कर सकता है।

अमेरिकी टैरिफ का भारत ने निकाला तोड़, निर्यात के लिए यूरोप-एशिया में मिले नए बाजार: सी फूड से लेकर ज्वैलरी तक के एक्सपोर्ट में आया उछाल

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के थोपे गए भारी भरकम 50 फीसटी टैरिफ 27 अगस्त से लागू हो चुके हैं। इसको लेकर दुनियभर की निगाहें भारत की ओर थी। विशेषज्ञ भी मान रहे थे कि भारत के निर्यात पर इसका जबरदस्त असर पड़ेगा, लेकिन शुरुआती 3 महीने में भारतीय कंपनियों ने कमाल कर दिया है।

कई सेक्टर जैसे झींगा और सी फूड, जेम्स और ज्वेलरी, ऑटो सेक्टर और बिजली से जुड़े सामान अब यूरोप, चीन, जापान, थाइलेंड और यूएई जैसे नए देशों में बिक रहे हैं। दरअसल इस सामानों से जुड़ी कंपनियाँ अपने शिपमेंट का कुछ हिस्सा दूसरे एशियाई और यूरोपियन मार्केट में भेजने में कामयाब रही हैं।

दूसरी तरफ केन्द्र सरकार ने भी पूरा जोर लगा दिया है। सरकार ने इन कंपनियों को 45 हजार करोड़ की मदद की है। रूस और यूरोप का बाजार उनके लिए खुल गया है।

इसका असर ये हुआ है कि भारत की ग्रोथ रेट वित्त वर्ष 2025-26 की पहली छमाही (अप्रैल-सितंबर) में 8% की वृद्धि दर्ज की है, जबकि दूसरी तिमाही में इसके 8.2% की वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। इससे कहा जा सकता है कि भारत 2030 तक तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

सी फूड को मिला दूसरा बाजार

भारत की सी फ़ूड इंडस्ट्री लगातार अपनी ग्लोबल मौजूदगी बढ़ा रही है। इसकी अमेरिका पर निर्भरता कम हुई है। ट्रंप प्रशासन के भारी टैरिफ के असर को कम करने के लिए एक्सपोर्टर अब नए मार्केट पर फोकस कर रहे हैं।

टैरिफ के असर को कम करने के लिए सरकार ने डायवर्सिफिकेशन पर जोर दिया। खासकर मरीन प्रोडक्ट्स में। टैरिफ बढ़ने के बाद यूरोपीय यूनियन के देश भारत का दूसरा सबसे बड़ा सी फूड मार्केट बन गया है। एक्सपोर्ट की जाने वाली भारतीय मरीन यूनिट्स की संख्या 25 फीसदी बढ़ गई है। 102 नई यूनिट्स को मंजूरी मिली है, साथ ही पुरानी 502 यूनिट्स को भी हरी झंडी दे दी गई है। इनकी मंजूरियाँ कई सालों से अटकी हुई थीं।

केयरएज रेटिंग्स के मुताबिक, FY26 के पहले पाँच महीनों में भारत का झींगा एक्सपोर्ट अच्छा परफॉर्म कर रहा है। एक्सपोर्ट वैल्यू साल-दर-साल 18 परसेंट बढ़कर $2.43 बिलियन यानी 2175 करोड़ हो गया है।

यह ग्रोथ काफी हद तक नॉन-US मार्केट में तेज बढ़ोतरी की वजह से हुई। इन इलाकों से एक्सपोर्ट वैल्यू 30 परसेंट बढ़ गई, जिससे साफ पता चलता है कि भारतीय एक्सपोर्टर अलग-अलग ग्लोबल मार्केट तलाश रहे हैं। अमेरिका को छोड़कर दूसरे ग्लोबल बाजार में FY24-25 में 51 फीसदी हिस्सा था, जो FY25-26 के पहले 5 महीनों में बढ़कर 57 फीसदी हो गया है।

चीन सी फूड का टॉप नॉन-US खरीदार के रूप में सामने आया है। यहाँ 16 परसेंट ज्यादा समुद्री फुड निर्यात की गई। सबसे बड़े रीप्रोसेसिंग सेंटरों में एक जापान को सी फूड का निर्यात स्थिर रहा वहीं वियतनाम में निर्यात दोगुना हो गया। दरअसल वियतनाम एक री-एक्सपोर्ट हब के तौर पर उभरा है।

यूरोपियन यूनियन में मजबूत डिमांड और भारतीय एक्सपोर्टर्स द्वारा सहुलियत दिए जाने से बेल्जियम को दोगुना सी फूड निर्यात हुआ है और यह $0.14 बिलियन यानी करीब 125 करोड़ पहुँच गया।

कुल मिलाकर FY26 के पहले पाँच महीनों में बढ़ी हुई एक्सपोर्ट वैल्यू का 86 परसेंट नॉन-US मार्केट से आया है।

टैरिफ बढ़ने के बाद अमेरिका में कम हुआ निर्यात

पारंपरिक रूप से भारत का सबसे बड़ा झींगा बाज़ार रहे अमेरिका में स्थिति थोड़ी अलग है। FY25- 26 की शुरुआत से, US मार्केट में आने वाले भारतीय झींगे पर कई टैक्स लगे हैं, जिसमें मौजूदा एंटी-डंपिंग और काउंटरवेलिंग ड्यूटी के अलावा ज्यादा रेसिप्रोकल ड्यूटी भी शामिल है। अप्रैल और अगस्त 2025 के बीच, भारत का असरदार टैरिफ रेट लगभग 18 परसेंट था, जो कॉम्पिटिटर इक्वाडोर और इंडोनेशिया के 13-14 परसेंट से ज्यादा था।

अगस्त के बाद, भारत का टैरिफ का बोझ बढ़कर 58 परसेंट हो गया। भारत के प्रतिस्पर्धा वाले देश इक्वाडोर और इंडोनेशिया के लिए टैरिफ 18-49 परसेंट के बीच था। इससे US रिटेल और फूड सर्विस चैनल में भारत की कीमत की पहुँच कम हो गई है, जबकि प्रतियोगी सप्लायर को बढ़त मिली है।

जेम्स और ज्वेलरी को मिला बाजार

कॉमर्स और इंडस्ट्री मिनिस्ट्री के मुताबिक, सितंबर में US को जेम्स और ज्वेलरी का एक्सपोर्ट कुल 76 % गिरा है, लेकिन कुल निर्यात सिर्फ 1.5 फीसदी गिरा। यूएई को 79 फीसदी से ज्यादा निर्यात किया गया। वहीं हांगकांग को 11 फीसदी और बेल्जियम को 8 फीसदी ज्यादा निर्यात किया गया। इससे जेम्स एंड ज्वैलरी के क्षेत्र में पड़ने वाला जबरदस्त झटका काफी कम हो गया।

ऑटो पार्टस का बाजार संभला

ऑटो कंपोनेंट्स में भी ऐसा ही पैटर्न देखने को मिला। सितंबर में US को 12 परसेंट कम निर्यात किया जा सका। इसकी भरपाई जर्मनी, यूएई और थाईलैंड ने कर दी। इन देशों में कुल ऑटो कंपोनेंट एक्सपोर्ट 8 परसेंट बढ़ गए हैं।

संघर्ष करने वाले सेक्टर में सूती कपड़े, जूते, स्पोर्ट्स के सामान और कालीन

अमेरिकी टैरिफ से लड़ने में कई ऐसे सेक्टर हैं, जिन्हें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। इनमें कॉटन टेक्सटाइल उद्योग, स्पोर्ट्स इंडस्ट्री, कालीन उद्योग और लेदर उद्योग शामिल हैं। चीन और ASEAN इकॉनमी से कड़े कॉम्पिटिशन और छोटी यूनिट्स की कमजोर आर्थिक स्थिति की वजह से इन उद्योगों को संघर्ष करना पड़ रहा है।

स्पोर्ट्स के सामान का करीब 40 फीसदी हिस्सा अमेरिका को निर्यात किया जाता था। इस क्षेत्र में दूसरा विकल्प अभी तक नहीं मिल पाया है। अमेरिका में ज्यादा टैरिफ की वजह से अक्टूबर में कुल निर्यात 6 फीसदी कम हो गया।

सूती कपड़ा उद्योग, जो पहले से ही वियतनाम और बांग्लादेश से कड़ी टक्कर के बीच बहुत मुश्किल से अपनी स्थिति बना पा रहा था, उसे भी काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। इन सामानों को UAE, स्पेन, इटली और सऊदी अरब पहले से ज्यादा निर्यात किया गया। US जाने वाले सामानों में 25 फीसदी की गिरावट के बाद सितंबर 2025 में इस कैटेगरी में कुल 6 फीसदी निर्यात गिर गया।

जूता उद्योग में भी ऐसी ही कमी आई है। US के एक्सपोर्ट में भारी गिरावट के बाद कुल एक्सपोर्ट में 10 फीसदी की गिरावट आई। इसके बावजूद जिन क्षेत्रों ने अपने निर्यात को

अब बिना एक्टिव सिम के बंद होंगे वॉट्सऐप और टेलीग्राम जैसे मैसेजिंग ऐप, DoT ने साइबर फ्रॉड से बचने के लिए बनाए कड़े नियम: जानें SIM-Binding सिस्टम कितना फायदेमंद?

भारत सरकार ने साइबर फ्रॉड रोकने के लिए कड़ा कदम उठाया है। अब WhatsApp, Telegram, Signal, Snapchat, ShareChat, JioChat, Arattai और Josh जैसे मैसेजिंग ऐप्स सिर्फ तभी चलेंगे जब फोन में उसी नंबर की एक्टिव सिम लगी हो। इसके अलावा वेब लॉगिन भी समय-समय पर री-वेरिफाई होगा। दूरसंचार विभाग (DoT) द्वारा यह नियम टेलीकम्युनिकेशन साइबरसिक्योरिटी अमेंडमेंट रूल्स 2025 (Telecommunication Cybersecurity Amendment Rules 2025) के तहत लागू किया है।

पूरी तरह बदल जाएगा ऐप चलाने का तरीका

सरकार के नए आदेश के बाद अब देश के करोड़ों ऐप यूजरों को अपनी आदतें बदलनी होंगी। पहले मैसेजिंग ऐप्स सिर्फ इंस्टॉलेशन के समय मोबाइल नंबर माँगती थीं और बाद में चाहें सिम स्लॉट में हो या नहीं, ऐप चलता रहता था। लाखों लोग टैबलेट, सेकेंडरी फोन या सिर्फ वाई-फाई से बिना सिम के WhatsApp और Telegram चला लेते थे लेकिन अब ऐसा नहीं होगा।

अब यह ऐप तभी खुलेगा जब फोन में वही सिम लगी हो जिससे ऐप रजिस्टर हुआ है और वह सिम एक्टिव और नेटवर्क में हो। अगर सिम बंद है, नंबर ब्लॉक है या फोन में नहीं लगा, तो ऐप खुलना बंद हो जाएगा। सरकार का कहना है कि इससे फेक नंबरों और विदेश से चल रहे धोखाधड़ी वाले अकाउंट को रोका जा सकेगा।

क्यों लिया गया यह फैसला?

पिछले कुछ समय में भारत में साइबर धोखाधड़ी तेजी से बढ़ी है। कई ठग विदेशी नंबर, ऑनलाइन VIP कॉल और बिना सिम वाले ऐप अकाउंट का इस्तेमाल करके लोगों को फँसा रहे थे। क्योंकि ऐप सिम हटाने के बाद भी चलती रहती थी, इसलिए यूजर की पहचान ट्रैक करना बहुत मुश्किल हो जाता था।

ठग एक नंबर से धोखाधड़ी करते और तुरंत सिम या डिवाइस बदल देते। इस लूपहोल का इस्तेमाल आतंकवादी नेटवर्क, स्कैमर्स, फर्जी कस्टमर केयर एजेंट और डेटा चोरी करने वाले गिरोह कर रहे थे। इसलिए सरकार ने अब साफ कर दिया है कि ऐसी कोई सुविधा नहीं मिलेगी जो ठगों को छुपने का मौका दे।

नए नियम कैसे करेंगे काम: SIM-Binding और ऑटो लॉगआउट सिस्टम

अब मैसेजिंग ऐप्स पर वह सिस्टम लागू होगा जो फिलहाल बैंकिंग और UPI ऐप्स में इस्तेमाल होता है, यानी SIM-Binding। मतलब ऐप को लगातार यह जाँचना होगा कि फोन में वही सिम लगी है या नहीं। अगर ऐप को 24×7 नेटवर्क में वही सिम डिटेक्ट नहीं हुई तो ऐप बंद हो जाएगी और दोबारा वेरिफिकेशन करना होगा।

यही नहीं, जिन यूजर्स के पास WhatsApp Web या Telegram Web खुले रहते थे, अब उनके लिए बड़ा बदलाव है। हर 6 घंटे में वेब सेशन अपने आप लॉगआउट हो जाएगा और दोबारा QR कोड स्कैन करना पड़ेगा। इससे अगर कोई अपराधी आपका वेब लॉगिन चुरा ले, तो भी नुकसान लंबे समय तक नहीं हो पाएगा।

कंपनियों के लिए जरूरी कदम: 120 दिनों में देनी होगी रिपोर्ट

सरकार ने इस आदेश को टेलीकम्यूनिकेशन साइबरसिक्योरिटी अमेंडमेंट रूल्स 2025 के तहत लागू किया है। अब WhatsApp, Telegram, Signal, Snapchat, JioChat, ShareChat, Josh जैसे सभी प्लेटफॉर्म Telecommunication Identifier User Entities (TIUE) की श्रेणी में आ गए हैं।

इन सभी कंपनियों को 90 दिन में SIM-Binding सिस्टम लागू करना होगा और 120 दिन में लिखित रिपोर्ट जमा करनी होगी कि नियम लागू हो चुका है।

अगर कंपनियाँ पालन नहीं करतीं तो उन पर टेलीकम्यूनिकेशन एक्ट 2023, आईटी रूल्स और साइबरसिक्योरिटी लॉज (Cybersecurity laws) के तहत कड़ी कार्रवाई होगी। पहली बार ऐसा हुआ है कि मैसेजिंग ऐप्स को टेलीकॉम स्तर की सख्त निगरानी में लाया गया है।

आम लोगों पर असर: क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स

इस नियम के बाद अधिकांश सामान्य यूजर को शुरुआत में ज्यादा परेशानी नहीं होगी, खासकर जिन्हें हमेशा अपने नंबर वाले फोन में ऐप चलाने की आदत है। लेकिन जिन यूजर्स का फोन खराब है, जिनके पास दूसरा फोन है, टैबलेट है, या जिन्होंने बिना सिम वाले डिवाइस में ऐप चलाने की आदत बना रखी थी, अब उन्हें बदलाव करना पड़ेगा।

वेब यूजर्स के लिए बार-बार लॉगिन करना थोड़ी झुँझलाहट पैदा करेगा। हालाँकि, एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इससे फर्जी अकाउंट, नकली लिंक, स्पैम और डरावने फ्रॉड संदेशों में कमी आएगी। आम यूजर सुरक्षित महसूस करेगा और सरकार को लगता है कि डिजिटल सुरक्षा बढ़ेगी।

वहीं, कई साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट इस बात से सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि ठग फर्जी या उधार लिए गए डॉक्यूमेंट से आसानी से नया सिम कार्ड ले सकते हैं, इसलिए यह उपाय बहुत ज्यादा फायदा नहीं देगा बल्कि सिर्फ सीमित सुरक्षा ही प्रदान करेगा।

दूसरी तरफ टेलीकॉम सेक्टर इस फैसले का समर्थन कर रहा है। उनका कहना है कि मोबाइल नंबर भारत में सबसे भरोसेमंद डिजिटल पहचान हैं और यह नियम मौजूदा वेरिफिकेशन सिस्टम को और मजबूत बनाकर साइबर सुरक्षा और पहचान की जिम्मेदारी को बढ़ाएगा।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि वॉट्सऐप, टेलीग्राम जैसे ऐप्स इसे कैसे लागू करेंगे। अगर यह नियम पूरी तरह लागू हुआ, तो लाखों यूजर्स को ब्राउजर पर लॉगिन रहने की सुविधा खोनी पड़ सकती है और अगर उनका सिम बंद या इनएक्टिव हो गया, तो वे अपने पसंदीदा मैसेजिंग ऐप्स का एक्सेस भी खो सकते हैं।

यानि, यह कदम सुरक्षा तो बढ़ाएगा लेकिन इसके साथ यूजर की सुविधा और प्राइवेसी पर असर पड़ने की चिंता भी बनी हुई है। यह फैसला सिर्फ तकनीकी बदलाव नहीं बल्कि डिजिटल सुरक्षा की दिशा में ऐतिहासिक कदम है। इससे भले उपयोग में थोड़ी दिक्कत बढ़े लेकिन साइबर अपराधों पर बड़ी रोक लगाने की उम्मीद जताई जा रही है।

भारत की 75% आबादी भूकंप से हाई रिस्क में, कभी भी डोल सकती है धरती: BIS नक्शे में पूरा हिमालय VI जोन में, जानें- ये बात परेशान करने वाली क्यों है?

भारत में भूकंप का खतरा अब पहले से कहीं ज्यादा गंभीर हो गया है। ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) द्वारा जारी किए गए नए सीस्मिक जोनेशन मैप ने पूरे देश को हिला दिया है। इस नक्शे के मुताबिक, हिमालय की पूरी श्रृंखला कश्मीर से अरुणाचल प्रदेश तक अब सबसे ऊँचे खतरे वाले जोन VI में आ गई है।

यह बदलाव इतना बड़ा है कि देश का 61 फीसदी इलाका मध्यम से उच्च जोखिम वाले जोन III से VI में चला गया है, जबकि 75 फीसदी आबादी ऐसे क्षेत्रों में रहती है जहाँ भूकंप का असर जानलेवा साबित हो सकता है। पुराने नक्शे में हिमालय को जोन IV और V में बाँटा गया था, लेकिन नई रिसर्च ने साफ कर दिया कि यहाँ 200 साल से प्लेट्स लॉक हैं, यानी तनाव जमा हो रहा है और अगला बड़ा झटका 8.0 या उससे ज्यादा तीव्रता का हो सकता है।

यह नक्शा ‘IS 1893 (Part 1): 2025’ कोड का हिस्सा है, जो जनवरी 2025 से पूरे देश में लागू हो चुका है। इसका मकसद नई इमारतों, पुलों और हाईवे को भूकंप-रोधी बनाना है, ताकि जान-माल का नुकसान कम हो।

सीस्मिक जोनेशन मैप क्या है?

सरल शब्दों में समझें तो यह देश को भूकंप के खतरे के आधार पर चार मुख्य जोनों में बाँटता है- जोन II (कम खतरा), जोन III (मध्यम), जोन IV (उच्च) और जोन V (बहुत उच्च) और अब नया जोन VI (अल्ट्रा-हाई) जोड़ा गया है। यह मैप पीक ग्राउंड एक्सेलरेशन (PGA) पर आधारित है, जो जमीन के हिलने की तीव्रता को ग्रेविटी (g) के प्रतिशत में मापता है।

उदाहरण के लिए, 2.5 फीसदी संभावना के साथ 50 साल में जोन II में PGA 0.10g से कम होता है, जबकि जोन VI में यह 0.45g या इससे ज्यादा हो सकता है। पुराना नक्शा 2002 का था, जिसे 2016 में थोड़ा अपडेट किया गया, लेकिन वह ऐतिहासिक डेटा पर निर्भर था।

नया मैप प्रोबेबिलिस्टिक सीस्मिक हेजर्ड असेसमेंट (PSHA) तरीके से बना है, जो GPS डेटा, सैटेलाइट इमेजरी, सक्रिय फॉल्ट्स और लाखों सिमुलेशन का इस्तेमाल करता है। यह जापान और न्यूजीलैंड जैसे देशों का मानक है, जो खतरे की सटीक भविष्यवाणी करता है।

BIS द्वारा जारी जोन वाइज मैप
BIS द्वारा जारी जोन वाइज मैप

धरती पर भूकंप क्यों आते हैं?

पृथ्वी चार परतों से बनी है: सबसे अंदरूनी इनर कोर (ठोस लोहा-निकल), उसके बाहर आउटर कोर (तरल धातु), फिर मेंटल (अर्ध-तरल चट्टानें) और सबसे ऊपरी क्रस्ट (पतली ठोस परत, औसतन 30-50 किमी मोटी)। क्रस्ट में ही टेक्टोनिक प्लेट्स तैरती हैं-ये विशाल चट्टानी टुकड़े हैं जो मेंटल की गर्मी से धीरे-धीरे हिलती रहती हैं। जब ये प्लेट्स आपस में टकराती हैं, अलग होती हैं या फिसलती हैं, तो ऊर्जा रिलीज होती है, जो भूकंप का रूप ले लेती है।

दुनिया में 15 बड़ी प्लेट्स हैं, और भारत इंडियन प्लेट पर है, जो उत्तर की ओर यूरेशियन प्लेट से टकरा रही है-हर साल करीब 5 सेंटीमीटर की रफ्तार से। यही टक्कर 4.6 अरब साल पहले पृथ्वी के बनने के बाद हिमालय जैसे पहाड़ पैदा करने वाली ताकत है।

भारत की भूगर्भीय स्थिति इसे भूकंप-प्रवण बनाती है। लगभग 50 मिलियन साल पहले इंडियन प्लेट ने एशियन प्लेट से जोरदार टक्कर ली, जिससे हिमालय उभरा – दुनिया का सबसे ऊँचा पर्वत श्रृंखला। लेकिन यह प्रक्रिया आज भी जारी है: प्लेट्स नीचे धंस रही हैं (सबडक्शन), जिससे फॉल्ट लाइन्स जैसे मेन फ्रंटल थ्रस्ट (MFT), मेन बाउंड्री थ्रस्ट (MBT) और मेन सेंट्रल थ्रस्ट (MCT) पर तनाव बढ़ रहा है।

हिमालय युवा पर्वत है, इसलिए चट्टानें अभी भी ढलान-तोड़ रही हैं। सेंट्रल हिमालय में कई सेगमेंट्स 200-300 साल से लॉक हैं। इसका मतलब है कि प्लेट्स हिल नहीं पा रही, तनाव जमा हो रहा। जब ये लॉक खुलेगा, तो मैग्निट्यूड 8+ का भूकंप आ सकता है, जो नेपाल से उत्तराखंड तक फैल सकता है।

पुराने नक्शे में क्या कमियाँ थीं

हिमालय को जोन IV (PGA 0.16-0.24g) और V (0.24g से ऊपर) में बाँटा गया था, लेकिन यह टेक्टोनिक एकरूपता को नजरअंदाज करता था। नया मैप PSHA से बना, जो ऐतिहासिक डेटा के अलावा फॉल्ट-विशिष्ट विश्लेषण करता है। अब 59 फीसदी से बढ़कर 61 फीसदी इलाका जोन III-VI में है। बाउंड्री टाउन्स को अब हाई रिस्क जोन में डाल दिया गया, जैसे देहरादुन के पास मोहंद, जहाँ रप्चर प्रोपगेशन दक्षिण की ओर फैल सकता है।

भूकंप को लेकर 5 जोन बनाए गए

जोन II: कम खतरा (PGA <0.10g)-यहाँ भूकंप दुर्लभ और हल्के होते हैं। मुख्यतः दक्षिण भारत जैसे तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और केरल का आंतरिक हिस्सा। जोखिम: मामूली हिलाव, लेकिन पुरानी इमारतें प्रभावित हो सकती हैं। नया मैप यहाँ मामूली बदलाव लाया, क्योंकि पेनिनसुलर इंडिया स्थिर है-इंट्राप्लेट क्वेक्स संभव, लेकिन कम।

जोन III: मध्यम खतरा (PGA 0.10-0.16g)-मध्यम तीव्रता के झटके, 5-6 मैग्निट्यूड तक। गुजरात, महाराष्ट्र के कुछ हिस्से, पूर्वोत्तर के बाहरी इलाके। जोखिम: इमारतों में दरारें, लेकिन मजबूत संरचनाएँ सुरक्षित। 75 फीसदी आबादी यहीं या ऊँचे जोन्स में रहती है, इसलिए जागरूकता जरूरी।

जोन IV: उच्च खतरा (PGA 0.16-0.24g)—मजबूत झटके, 6-7 मैग्निट्यूड। दिल्ली-एनसीआर, बिहार के मैदान, पश्चिम बंगाल। जोखिम: पुरानी बिल्डिंग्स ढह सकती हैं, लैंडस्लाइड्स। नया मैप ने यहां रिफाइनमेंट किया, खासकर गंगा प्लains में।

जोन V: बहुत उच्च खतरा (PGA 0.24-0.36g)—तीव्र भूकंप, 7+ मैग्निट्यूड। पूर्वोत्तर (असम, मेघालय), अंडमान-निकोबार। जोखिम: व्यापक तबाही, सुनामी संभावना। लेकिन हिमालय के कुछ हिस्से अब VI में शिफ्ट हो गए।

जोन VI: अल्ट्रा-हाई (PGA >0.36g, संभावित 0.45g+)—सबसे घातक, 8+ मैग्निट्यूड। पूरा हिमालयन आर्क अब यहाँ।

वाडिया इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर विनीत गहलौत कहते हैं, “पुराना नक्शा लॉक सेगमेंट्स को ठीक से नहीं समझता था, जहाँ 200 साल से तनाव जमा है।” जोखिम: भारी हिलाव, लिक्विफैक्शन (मिट्टी गलना), लैंडस्लाइड्स, फॉल्ट रप्चर। देहरादून, हरिद्वार जैसे मैदानी इलाके भी प्रभावित।

हिमालय में यह बदलाव क्यों?

इंडियन प्लेट उत्तर की ओर धंस रही है, लेकिन सेंट्रल सेगमेंट्स लॉक हैं। गहलौत के अनुसार, “ये सेगमेंट्स तनाव जमा कर रहे हैं, अगला बड़ा भूकंप नेपाल से उत्तराखंड तक फैल सकता है।” PSHA ने लाखों सिमुलेशन से साबित किया कि रप्चर प्रोपगेशन दक्षिण की ओर फैलेगा, गंगा के मैदानी इलाकों को हिला देगा।

भूकंप कैसे मापे जाते हैं?

रिक्टर स्केल (ML) 1935 का पुराना तरीका है, जो सिस्मोग्राफ से अम्प्लिट्यूड मापता है, लेकिन बड़े भूकंप (>7) में सैचुरेट हो जाता है। अब मोमेंट मैग्निट्यूड (Mw) इस्तेमाल होता है-यह फॉल्ट स्लिप, एरिया और रिगिडिटी से ऊर्जा की गणना करता है, सटीक अनुमान देता है। उदाहरण: 2001 भुज के भूकंप की तीव्रता- ML 6.9 थी, लेकिन Mw 7.7। इसकी वजह से तबाही ज्यादा हुई।

निर्माण कार्यों में होंगे महत्वपूर्ण बदलाव

नया कोड सभी नई बिल्डिंग्स को जोन-विशिष्ट डिजाइन अनिवार्य करता है। जोन VI में डक्टाइल स्टील, एनर्जी डिसिपेशन डिवाइसेस (जैसे डैम्पर्स) लगानी होंगी। नॉन-स्ट्रक्चरल पार्ट्स (लाइट्स, AC) 1% ड्रिफ्ट पर एंकर लगाती होगी, तो पुरानी इमारतों के लिए रेट्रोफिटिंग- फाउंडेशन स्ट्रेंग्थनिंग, बीम कॉलम जॉइंट्स लगाने होंगे। इसके अलावा हाईवे, डैम, मेट्रो पर सख्ती बरतते हुए सॉफ्ट सॉइल पर पाइल फाउंडेशन करना होगा।

बहरहाल, कल्पना करिए कि हिमालय की वो ऊँची चोटियाँ, जहाँ हम घूमने जाते हैं, वही अब भूकंप के सबसे बड़े खतरे की चपेट में हैं। BIS का नया मैप आया है, जो कहता है कि कश्मीर से अरुणाचल तक पूरा हिमालय जोन VI में आ गया, मतलब अल्ट्रा हाई रिस्क। और डरावनी बात? देश की 75% आबादी ऐसे इलाकों में रहती है जहाँ झटका जानलेवा साबित हो सकता है। देहरादून-हरिद्वार जैसे मैदानी इलाके भी लिक्विफैक्शन से गल सकते हैं, लैंडस्लाइड्स हो सकते हैं। हालाँकि प्रकृति की मार को इंसान की समझदारी से रोका जा सकता है।

अमेरिका में तीसरी दुनिया के लोगों की नो-एंट्री, डोनाल्ड ट्रंप ने लगाया स्थाई बैन: जानें- इस थर्ड वर्ल्ड में शामिल हैं कौन से देश, जिन्हें US में माना जा रहा अनवॉन्टेड

थैंक्सगिविंग की शाम गुरुवार (27 नवंबर 2025) को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया हैंडल Truth पर एक पोस्ट किया। इसमें उन्होंने प्रवासियों पर बड़े पैमाने पर कार्रवाई की घोषणा करने का संकेत दिया।

ट्रंप का ये बयान उस घटना के तुरंत बाद आया जिसमें व्हाइट हाउस के पास एक अफगान नागरिक रहमानुल्लाह लाकनवाल ने दो नेशनल गार्ड सैनिकों पर गोली चलाई थी। बताया जाता है कि वह बाइडेन प्रशासन के एक रीसेटलमेंट प्रोग्राम के तहत अमेरिका आया था।

अपनी पोस्ट में ट्रंप ने लिखा कि वह थर्ड वर्ल्ड देशों से आने वाले माइग्रेशन को स्थायी रूप से रोक देंगे ताकि अमेरिकी सिस्टम को ठीक होने का समय मिल सके। उन्होंने कहा कि बाइडेन सरकार के दौरान जो लाखों लोग अमेरिका में दाखिल हुए हैं, उन्हें वापस भेजा जाएगा और जो लोग अमेरिका के लिए फायदेमंद नहीं हैं या देश से प्यार नहीं करते, वे यहाँ नहीं रह पाएँगे।

ट्रंप के अनुसार, गैर-नागरिकों को अब कोई सरकारी लाभ या सुविधा नहीं मिलेगी, और अगर कोई प्रवासी अमेरिका की शांति को बिगाड़ता है या देश के मूल्यों के खिलाफ जाता है, तो उसकी नागरिकता भी छीनकर उसे डिपोर्ट किया जा सकता है।

ट्रंप के अनुसार, कोई भी विदेशी नागरिक जो सरकार पर बोझ है, सुरक्षा के लिए खतरा है या पश्चिमी सभ्यता के मूल्यों के अनुरूप नहीं है, उसे अमेरिका में रहने का अधिकार नहीं होना चाहिए। उनके इस बयान को आने वाली इमिग्रेशन नीति में बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है।

तीसरी दुनिया का देश क्या है?

‘थर्ड वर्ल्ड’ शब्द की शुरुआत शीत युद्ध (Cold War) के समय हुई थी, जब 1950 के दशक में अमेरिका और सोवियत संघ (USSR) के बीच भारी राजनीतिक और वैचारिक टकराव था और इस मुकाबले ने दुनिया को तीन हिस्सों में बाँट दिया था।

पहला हिस्सा फर्स्ट वर्ल्ड कहलाता था, जिसमें अमेरिका, NATO और उनके सहयोगी देश थे, जैसे जापान और पश्चिमी यूरोपीय राष्ट्र। दूसरा हिस्सा सेकंड वर्ल्ड था, जिसमें सोवियत संघ, ईस्ट जर्मनी और क्यूबा जैसे देश आते थे, यानी वे देश जो USSR के पक्ष में थे।

बाकी बचा समूह तीसरा माना गया और उसे थर्ड वर्ल्ड कहा गया। इसमें भारत, चीन और एशिया-अफ्रीका के वे नए स्वतंत्र देश थे जिन्होंने अमेरिका या USSR किसी भी पक्ष में शामिल होने से इंकार किया और खुद को गुटनिरपेक्ष (Non-Aligned) कहा।

इस शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले फ्रांसीसी जनसांख्यिकी विशेषज्ञ अल्फ्रेड सौवी (Alfred Sauvy) ने किया था। उन्होंने इसे फ्रांस की क्रांति के समय के थर्ड एस्टेट से जोड़कर बताया था। उनके अनुसार, ये समूह गरीब, अनदेखा और शोषित माना जाता था। उसी भाव से उन्होंने कहा कि ये देश भी शक्तिशाली ताकतों के बीच अनदेखे हैं।

लेकिन समय के साथ जब शीत युद्ध खत्म हुआ, तो इस शब्द का असली राजनीतिक मतलब धीरे-धीरे खत्म हो गया और मीडिया तथा बुद्धिजीवियों ने इसे एक नए अर्थ में गरीब, पिछड़े, संघर्षरत और कम आय वाले देशों के लिए इस्तेमाल करना शुरू किया।

कम औद्योगिकरण, कमजोर शासन व्यवस्था, राजनीतिक अस्थिरता, गरीबी और विकास की कमी इन देशों की पहचान बन गई। इस कारण ‘थर्ड वर्ल्ड’ शब्द धीरे-धीरे अपमानजनक और पुराने जमाने का माना जाने लगा। इसीलिए आज अधिकतर संस्थाएँ और विशेषज्ञ इसकी जगह नए शब्दों का इस्तेमाल करते हैं जैसे, ग्लोबल नॉर्थ बनाम ग्लोबल साउथ, हाई-इनकम, मिडिल-इनकम और लो-इनकम देश।

संयुक्त राष्ट्र (UN) अब ‘थर्ड वर्ल्ड’ शब्द का उपयोग नहीं करता। उसकी अपनी एक सूची है- Least Developed Countries (LDC), जिसमें दुनिया के 46 सबसे गरीब और संघर्षरत देशों के नाम हैं।

हालाँकि समय के साथ कई देशों ने तेज विकास और मजबूत अर्थव्यवस्था के कारण इस ‘थर्ड वर्ल्ड’ वाली पहचान से बाहर निकलने में सफलता पाई है। चीन, भारत, सिंगापुर, साउथ कोरिया और इंडोनेशिया जैसे देश अब तेजी से विकसित माने जाते हैं और उनकी वैश्विक स्थिति पहले से कहीं बेहतर है।

हालाँकि आज भी कई देश अत्यधिक गरीबी, युद्ध, राजनीतिक अस्थिरता और मानवीय संकट में फँसे हुए हैं जैसे, सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक, नाइजर, चाड, मलावी, बुरुंडी, हैती, सोमालिया, अफगानिस्तान, यमन और साउथ सूडान। दुनिया में इन्हें अब भी अस्थिर, गरीब और संघर्षग्रस्त देशों के रूप में देखा जाता है।

नवीनतम घोषणापत्र 2017 के ‘मुस्लिम प्रतिबंध’ से किस प्रकार भिन्न है? 

यह घोषणा अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पहले वाले रुख का ही विस्तार है, जहाँ उन्होंने ‘उच्च-जोखिम वाले देशों’ से बड़े पैमाने पर यात्रा प्रतिबंध लगाया था। उन देशों में अफगानिस्तान, सोमालिया, वेनेजुएला और यमन जैसे देश शामिल थे। उस समय इस कदम को लेफ्ट मीडिया ने ‘मुस्लिम बैन’ कहा था, हालाँकि इसमें वेनेजुएला जैसे गैर-मुस्लिम देश भी शामिल थे।

लेकिन इस बार ट्रंप सिर्फ ट्रैवल बैन की बात नहीं कर रहे। अब उनका लक्ष्य इन थर्ड वर्ल्ड देशों से आने वाले हर तरह के इमिग्रेशन को पूरी तरह रोकने का है। इसका मतलब है कि अब वीजा, असाइलम, रिफ्यूजी रीसेटलमेंट, परिवार वाले को बुलाना हर तरह की इमिग्रेशन प्रोसेस अनिश्चित समय के लिए बंद हो सकती है।

ट्रंप ने अपनी Truth पोस्ट में ‘Reverse Migration’ का जिक्र भी किया है। इसका मतलब है कि गैर-नागरिकों की बड़े स्तर पर वापसी (deportation) और जो लोग नागरिकता पाने की प्रक्रिया में हैं, उस प्रक्रिया को रोक देना। हाल ही में ट्रंप ने सोमाली समुदाय को निशाना बनाते हुए कहा, “सोमालियों ने हमें बहुत परेशानी दी है और वे हमें बहुत महँगे पड़ते हैं। हम सोमालिया को आखिर क्यों पैसा दे रहे हैं?”

अपनी बातों और बयानबाजी में ट्रंप साफ कर रहे हैं कि वे सिर्फ ऐसे लोगों को अमेरिका आने देना चाहते हैं जो मूल्यों में संगत हों और अमेरिका के लिए काम के हों। उनके अनुसार दुश्मन मानसिकता वाले, कम-शिक्षित और कम-क्षमता वाले लोगों का बड़े पैमाने पर अमेरिका आना देश पर बोझ है। यह रुख उनके Make America Great Again (MAGA) एजेंडा के अनुरूप है।

क्या यह प्रतिबंध वास्तव में प्रभावी हो सकता है?

अल्पकालिक कदम जैसे यात्रा प्रतिबंध लगाना, वीजा प्रोसेसिंग रोकना और जाँच सख्त करना तुरंत असर दिखा सकते हैं। USCIS पहले ही उन देशों के नागरिकों के ग्रीन कार्ड की समीक्षा शुरू कर चुका है जिन्हें ‘चिंताजनक देश’ कहा जा रहा है। 2017 में ट्रंप सरकार द्वारा लगाए गए ट्रैवल बैन को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी दी थी, इसलिए इस बार भी USCIS के कदमों के सफल होने की संभावना ज्यादा है।

फिलहाल जिन देशों को ‘चिंताजनक देश’ की सूची में रखा गया है, वे हैं- अफगानिस्तान, बुरुंडी, चाड, कांगो गणराज्य, क्यूबा, म्यांमार, इक्वेटोरियल गिनी, इरीट्रिया, हैती, ईरान, लाओस, लीबिया, सिएरा लियोन, सोमालिया, सूडान, टोगो, तुर्कमेनिस्तान, वेनेज़ुएला और यमन।

डिपोर्टेशन, Immigration and Customs Enforcement (ICE) की फंडिंग बढ़ाना, और वीजा रिजेक्ट करना, ये सब मिलकर इन देशों से आने वाले अधिकांश नए या संभावित प्रवासियों को रोक सकते हैं। USCIS के निदेशक जोसेफ बी एडलो ने भी पोस्ट किया है कि राष्ट्रपति के आदेश पर उन्होंने ‘चिंताजनक देशों के हर प्रवासी के हर ग्रीन कार्ड की पूरी और सख्त दोबारा जाँच’ का निर्देश दिया है।

हालाँकि लंबी अवधि में, नागरिकता रद्द करना और पहले से रह रहे ग्रीन कार्ड होल्डर्स को वापस भेजना सरकार के लिए चुनौती बन सकता है। इस तरह के कदमों पर भेदभाव के आरोप लग सकते हैं और मुकदमे भी हो सकते हैं। इसके अलावा, परिवारों को अलग करना और शरणार्थियों को वापस भेजना राजनीतिक विवाद और कानूनी रुकावटें पैदा कर सकता है।

सबसे बड़ी बात यह है कि बड़े पैमाने पर डिपोर्टेशन करना बहुत महँगा होता है। हिरासत, व्यवस्था, विमान या जहाजों से निर्वासन, ये सब करने के लिए भारी पैसे और बहुत से कर्मचारियों की आवश्यकता होती है।

अमेरिका में सोमाली समुदाय: धोखाधड़ी की योजनाएँ और बहुत कुछ 

पिछले कुछ दिनों में डोनाल्ड ट्रंप ने खुले तौर पर सोमालिया और अमेरिका में रहने वाली सोमाली प्रवासी कम्युनिटी पर बयान दिए हैं, खासकर मिनेसोटा की सोमाली आबादी पर। मिनेसोटा में अमेरिका की सबसे बड़ी सोमाली कम्युनिटी रहती है, जिसकी संख्या लगभग 80,000 से 1 लाख के बीच मानी जाती है।

इनमें से बहुत से लोग 1990 के दशक में सोमालिया के गृहयुद्ध और अल-शबाब आतंकवाद के कारण शरणार्थी के तौर पर अमेरिका आए थे।

हाल ही में एक बड़े घोटाले का खुलासा हुआ है। अमेरिकी अभियोजकों ने दर्जनों लोगों पर आरोप लगाए हैं कि उन्होंने सरकारी योजनाओं, जैसे बच्चे पोषण योजना, ऑटिज्म सहायता, हाउसिंग और कोविड राहत से लगभग 250 से 300 मिलियन डॉलर की धोखाधड़ी की है।

जिन लोगों पर आरोप लगे हैं, उनमें कई सोमाली प्रवासी भी शामिल हैं। रिपोर्टों में दावा किया गया है कि इस धोखाधड़ी का कुछ हिस्सा सोमालिया भेजा गया और संभव है कि यह पैसा या तो वसूली के जरिए या सीधी फंडिंग के रूप में आतंकवादी संगठन अल-शबाब तक भी पहुँचा हो।

इसी पृष्ठभूमि में पिछले हफ्ते ट्रंप ने घोषणा की कि वह तुरंत 700 से अधिक सोमाली नागरिकों की Temporary Protected Status (TPS) समाप्त कर रहे हैं। इनमें से लगभग 430 लोग केवल मिनेसोटा से हैं। इस फैसले को मिनेसोटा के गवर्नर टिम वॉल्ज और कॉन्ग्रेस सदस्य इल्हान ओमर, जो खुद सोमालिया से आई प्रवासी हैं, उन्होंने अवैध और भेदभावपूर्ण बताया है।

सोमालिया ट्रंप की इमिग्रेशन नीतियों में पहले से ही विवाद का केंद्र रहा है। इससे पहले उनके प्रशासन ने सोमालिया को उन देशों की सूची में डाला था, जिन पर यात्रा प्रतिबंध था। इसे उस समय  ‘मुस्लिम बैन’ कहा गया था, क्योंकि यह प्रतिबंध ISIS और अल-शबाब जैसे संगठनों से जुड़ी सुरक्षा चिंताओं के आधार पर लगाया गया था।

अमेरिका में लाखों सोमाली लोग कैसे आ गए?

सोमालिया कई दशकों से दुनिया के सबसे पिछड़े देशों में गिना जाता है। इसके पीछे कई वजहें हैं। असल में, वह लगभग हर उस समस्या से जूझता है जो किसी देश को पूरी तरह असफल बना सकती है।

यह देश प्राकृतिक रूप से नहीं बना था, बल्कि विदेशी शक्तियों ने नक्शे पर सीधी रेखाएँ खींचकर अलग-अलग कबीलों को एक देश में जोड़ दिया। इनमें न साझा संस्कृति थी, न अर्थव्यवस्था और न ही कोई राजनीतिक एकता।

1991 में जब सोमालिया के तानाशाह सियाद बर्रे का शासन खत्म हुआ, तब तक हालत पहले से ही खराब थी। देश में इस्लाम और कम्युनिज्म के मिले-जुले एक असफल शासन मॉडल ने सेना, सरकार और संस्थानों को पूरी तरह खत्म कर दिया था।

उनके हटते ही कबीलों में लड़ाइयाँ शुरू हो गईं और देश अराजकता में डूब गया। इसी अव्यवस्था से अल-शबाब जैसे आतंकी संगठन उभरे, जो आज भी सोमालिया के लगभग आधे हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं।

लगातार सूखे, अकाल और लड़ाइयों ने पशुपालन और खेती, जो सोमालिया की मुख्य अर्थव्यवस्था थी, उसे लगभग नष्ट कर दिया। शिक्षित लोग पहले ही देश छोड़ चुके थे और आज स्थिति यह है कि वहाँ की अधिकांश आबादी सिर्फ मानवीय सहायता पर जिंदा है।

आज अमेरिका में लगभग 2.5 लाख सोमाली प्रवासी रह रहे हैं। इसमें उनके अमेरिका में पैदा हुए बच्चे शामिल नहीं हैं। 1990 के दशक में गृहयुद्ध और अकाल के बाद, संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी कार्यक्रमों के तहत सोमालियों को अमेरिका लाया जाने लगा। सबसे पहले महिलाओं, अल्पसंख्यक समुदायों और उन लोगों को प्राथमिकता मिली जिन्होंने अमेरिकी सरकार या सहायता संस्थाओं के लिए काम किया था।

कुछ साल बाद, जो सोमाली पहले आ चुके थे उन्होंने अपने परिवारों को भी बुलाना शुरू कर दिया। ईसाई मिशनरी संगठनों ने भी हजारों सोमालियों की मदद की।

ओबामा प्रशासन (2008–2016) के दौरान P-3 ‘परिवार पुनर्मिलन’ कार्यक्रम के तहत बड़ी संख्या में सोमालियों को प्रवेश मिला। बाद में यह रिपोर्ट भी सामने आई कि कई मामलों में DNA टेस्ट में धोखाधड़ी हुई थी, लेकिन फिर भी उस दौरान लगभग 12,000 सोमाली प्रति वर्ष अमेरिका में आ रहे थे और उनमें से ज्यादातर वहीं रह गए।

बाइडन प्रशासन द्वारा शरणार्थी सीमा बढ़ाने के बाद एक नया प्रवासी समूह आया। अनुमान है कि केवल इसी सरकार के दौरान 30,000–40,000 सोमाली और अमेरिका पहुँचे। आज मिनियापोलिस और सेंट पॉल (Minnesota) दुनिया में सोमालिया के बाहर सबसे बड़ा सोमाली समुदाय हैं।

ट्रंप ने प्रवासियों को लेकर लिए कई फैसले

डोनाल्ड ट्रंप ने कई बार कहा है कि कुछ प्रवासी समुदाय अमेरिका में अपराध बढ़ा रहे हैं, संसाधनों पर बोझ हैं और कानून व्यवस्था बिगाड़ रहे हैं। उनके समर्थकों में यह चिंता काफी लोकप्रिय है।

पहले वह H-1B वीजा रोकने की बात भी करते थे, जिससे भारत के पेशेवर प्रभावित हो सकते थे, लेकिन उस पर अब वह नरम हो चुके हैं। अब उनका ध्यान उन देशों से आने वाले अकुशल और उच्च-जोखिम प्रवासियों को रोकने पर है, और इस फैसले को अमेरिका में काफी समर्थन मिल सकता है।

सोमालिया एक ऐसा देश है जहाँ राजनीतिक अस्थिरता, आतंकवाद, गरीबी और अकाल ने एक पूरी पीढ़ी को तबाह कर दिया है। वहीं अमेरिका में बसे सोमालियों के बढ़ते प्रभाव और संख्या ने अब अमेरिकी राजनीति में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है, खासतौर पर ट्रंप की इमिग्रेशन नीतियों के संदर्भ में।

यह रिपोर्ट अंग्रेजी में संघमित्रा ने लिखी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।