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‘बिहार में नपुंसक सरकारें थीं’: ‘ग्राम रक्षा दल’ बना डाकुओं का सफाया करने वाले बद्री नारायण पांडे से सुनिए जंगलराज की कहानी, कहा- DM का ‘मिनी चंबल’ कहना अखर गया

बिहार के पश्चिम चंपारण जिले में आज अगर आप शाम को सड़क पर घूमें, तो लगेगा जैसे कोई शांत गाँव हो। लेकिन दो-तीन दशक पहले ये इलाका ‘मिनी चंबल’ कहलाता था। डाकुओं का राज था, जहाँ शाम पाँच बजे के बाद घर से निकलना मौत को न्योता देना था। अपहरण, लूट, हत्या और नरसंहार रोज की बात थी। लालू यादव के जंगलराज में ये सब चरम पर था।

लेकिन एक साधारण फौजी बद्री नरायन पांडे ने हिम्मत दिखाई। उन्होंने ग्राम रक्षा दल बनाया, जो न सिर्फ चंपारण को डाकुओं से आजाद करा गया, बल्कि पूरे देश में स्वयंरक्षा की मिसाल बन गया। छत्तीसगढ़ के सलवा जुडूम से लेकर जम्मू-कश्मीर के गाँव रक्षा दलों तक पांडे की ये कहानी आज भी प्रेरित कर रही है।

बद्री नरायन पांडे ने ऑपइंडिया के साथ बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि ये सब कैसे शुरू हुआ। लेकिन पहले आइए, उस काले दौर को समझें- जब बिहार जंगलराज का शिकार था। 1990 से 2005 तक लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी की सरकार में अपराध आसमान छू रहा था। आँकड़े झकझोर देने वाले हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस दौर में 32,000 से ज्यादा अपहरण हुए, 18,000 हत्याएँ हुईं और 59 बड़े नरसंहार हुए। पटना हाईकोर्ट ने 1997 में इसे आधिकारिक तौर पर ‘जंगलराज‘ करार दिया।

बिहार में जंगलराज का दौर और मिनी चंबल का खौफ

1990 का दशक बिहार के लिए अंधेरे का दौर था। उस समय लालू प्रसाद यादव की सरकार थी और बिहार में जंगलराज शब्द आम हो चुका था। पश्चिम चंपारण का बगहा क्षेत्र, जिसे लोग ‘मिनी चंबल’ कहते थे, डकैतों के आतंक का गढ़ बन चुका था। शाम 5 बजे के बाद लोग घरों से बाहर निकलने से डरते थे। अपहरण, लूट, हत्या और बलात्कार जैसी घटनाएँ रोजमर्रा की बात थीं। स्कूल-कॉलेज बंद हो गए थे, व्यापारी बाजार नहीं जाते थे और किसान अपने खेतों में जाने से कतराते थे। इस क्षेत्र में डकैतों का ऐसा खौफ था कि लोग अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं थे।

ऐसे ही जंगलराज का सबसे क्रूर चेहरा था 14 दिसंबर 1994 का नरकटिया नरसंहार। रामनगर प्रखंड के नरकटिया भुअरवा गाँव में डाकुओं ने 15 ग्रामीणों को बेरहमी से मार डाला। सशस्त्र डकैतों ने एक ही रात में गौरी शंकर महतो, जय राम महतो, रामविलास महतो, विश्राम महतो, धर्मराज महतो, भिखारी महतो, छेदी महतो, रौशन महतो, रोगाही महतो, नरसिंह महतो, भुवनेश्वर महतो, रुदल महतो, बलिराम महतो, सदाकत मियाँ और पांडू मुंडा समेत एक दर्जन से अधिक ग्रामीणों की निर्मम हत्या कर दी।

इस नरसंहार ने पूरे क्षेत्र में दहशत फैला दी। राधा यादव, रामचंद्र मल्लाह, अलाउद्दीन मियाँ, चुम्मन यादव, राजेंद्र चौधरी, किशोरी नुनियाँ, पत्थर चौहान और नेमा यादव जैसे कुख्यात डकैतों के गिरोह इस इलाके में आतंक का पर्याय बन चुके थे।

जंगलराज यानी लालू के शासन में अपराध का बोलबाला

लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के शासनकाल में बिहार में अपराध और राजनीति का गठजोड़ चरम पर था। पश्चिम चंपारण में डकैतों का ऐसा दबदबा था कि वे अपने दरबार लगाते थे, जहाँ राजनेता अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए माथा टेकने आते थे। डकैतों के सरगना जैसे भगड़ यादव, लच्छन यादव, बंसी यादव, हरिहर यादव, लालू यादव और सुरेश गोड न केवल अपराध करते थे, बल्कि स्थानीय राजनीति में भी दखल रखते थे। पुलिस और प्रशासन का इन पर कोई नियंत्रण नहीं था। सरकार की नाकामी के चलते आम लोग असहाय थे। बच्चे स्कूल नहीं जा पाते थे और माता-पिता हर पल उनकी सलामती की दुआ माँगते थे।

इसी दौर में पश्चिम चंपारण के डीएम ने इस क्षेत्र को ‘मिनी चंबल’ घोषित कर दिया था। जज तक को गोली मार दी जाती थी। 1986 में पुलिस ने ‘ऑपरेशन ब्लैक पैंथर’ शुरू किया, लेकिन यह भी नाकाम रहा। डकैतों का आतंक कम होने का नाम नहीं ले रहा था। ऐसे में आम लोगों ने हिम्मत जुटाई और अपने स्तर पर इस आतंक से लड़ने का फैसला किया।

बद्री नारायण पांडे ने की ग्राम रक्षा दल की शुरुआत

इस भयावह माहौल में एक साधारण व्यक्ति बद्री नारायण पांडे ने समाज को डकैतों के आतंक से मुक्त करने की ठानी। सेना के मेडिकल कोर से रिटायर्ड क्लर्क पांडे अपने गाँव सिसवा-बसंतपुर में डकैतों के खौफ को देख चुके थे। लोग सुबह 8 बजे से पहले दरवाजे नहीं खोलते थे और सूरज ढलते ही घरों में कैद हो जाते थे। पांडे ने इस स्थिति को बदलने का बीड़ा उठाया।

27 जुलाई 1990 को उन्होंने ग्राम रक्षा दल की स्थापना की। यह एक ऐसा संगठन था, जिसमें गाँव के हर उम्र और जाति के लोग शामिल हुए। पांडे ने शुरुआत में कुछ ग्रामीणों को इकट्ठा कर एक ‘शहीदी जत्था’ बनाया और सभी लाइसेंसी हथियारों को एकत्र किया। उन्होंने शपथ दिलाई कि वे गाँव की सुरक्षा के लिए अपनी जान की बाजी लगा देंगे। इस दल ने गाँव में चौकसी शुरू की। हर गाँव में चौकियाँ बनाई गईं, जहाँ बिना पहचान और सत्यापन के किसी को प्रवेश नहीं मिलता था। दिन में लोग हथियार चलाने की ट्रेनिंग लेते थे और रात में जागकर ड्यूटी देते थे। महिलाएँ और बच्चे भी खोजी मिशन में शामिल होते थे।

अभयानंद और जी. कृष्णैया का मिला सहयोग

इस मुहिम में पांडे को तत्कालीन पुलिस अधीक्षक अभयानंद और डीएम जी. कृष्णैया का साथ मिला। अभयानंद ने पांडे के प्रयासों को समझा और उन्हें नैतिक व लॉजिस्टिक समर्थन दिया। जी. कृष्णैया ने भी अपनी नौकरी की परवाह न करते हुए ग्रामीणों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी। दोनों अधिकारियों ने ग्राम रक्षा दल की बैठकों में हिस्सा लिया और उनका हौसला बढ़ाया। हालाँकि साल 1994 में गोपालगंज में डीएम के पद पर तैनात जी. कृष्णैया की हत्या कर दी गई, जो उस समय लालू यादव के गृह जिले में थे। उनकी हत्या ने पूरे बिहार में हड़कंप मचा दिया, लेकिन ग्राम रक्षा दल के हौसले को नहीं तोड़ सकी।

ग्राम रक्षा दल ने अनुशासित सेना की तरह किया काम

ग्राम रक्षा दल ने डकैतों से निपटने के लिए सैन्य शैली में काम किया। उन्होंने डकैतों के मुखबिरों और सहयोगियों को चिह्नित किया। कुछ को सुधारने की कोशिश की, और जो नहीं माने, उन्हें गाँव से निकाल दिया या सजा दी। पांडे ने डकैतों के गिरोह में सेंध लगाई और उनके सहयोगियों को अपने पक्ष में कर लिया। उन्हें मुख्यधारा में लाने का लालच दिया और उनके परिवारों को सुरक्षा का भरोसा दिलाया। इस तरह डकैतों की जासूसी शुरू हुई। ग्राम रक्षा दल को डकैतों के हथियारों और गोलियों की पूरी जानकारी रहती थी। जब डकैत हमला करते और उनकी गोलियां खत्म हो जातीं, तब ग्राम रक्षा दल जवाबी कार्रवाई करता और उन्हें मार गिराता या पकड़ लेता।

साल 1990 से 2002 तक यह सशस्त्र संघर्ष चला। इस दौरान ग्राम रक्षा दल ने मशीन गन, स्टेन गन जैसे हथियार छीने और उन्हें सरकार को सौंपा। उनके पास एक समय में 16,000 हथियार थे, जिनमें 9,500 लाइसेंसी थे। इस संगठन ने 375 से अधिक गाँवों में अपनी इकाइयाँ स्थापित कीं, जो पश्चिम चंपारण के 60% से अधिक क्षेत्र को कवर करती थीं। डकैतों को सोमेश्वर पहाड़ियों के जंगलों में खदेड़ दिया गया। इस मुहिम ने डकैतों को आत्मसमर्पण करने या भागने के लिए मजबूर कर दिया।

नरकटिया नरसंहार और ग्राम रक्षा दल का जवाब

नरकटिया नरसंहार के बाद जब डकैतों ने गाँव वालों से चावल, बकरी और महिलाओं की माँग की और मना करने पर 15 लोगों की हत्या कर दी, ग्राम रक्षा दल ने और सख्ती दिखाई। उन्होंने एक किलोमीटर लंबी मानव श्रृंखला बनाई, जिसमें महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे। इस एकजुटता ने डकैतों के हौसले पस्त कर दिए। 16 बच्चों के एक साथ अपहरण की घटना में ग्राम रक्षा दल ने त्वरित कार्रवाई कर उन्हें छुड़ा लिया।

राजनीतिक विरोध भी हुआ, घबराई हुई थी आरजेडी

ग्राम रक्षा दल की बढ़ती ताकत से सत्ताधारी राष्ट्रीय जनता दल (RJD) घबरा गया। उन्हें डर था कि बद्री नारायण पांडे अपनी राजनीतिक पार्टी बनाकर उनकी सत्ता को चुनौती देंगे। विधानसभा और लोकसभा में ग्राम रक्षा दल के खिलाफ आवाज उठी, लेकिन तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष ने सरकार को आड़े हाथों लिया और कहा कि जब सरकार लोगों की सुरक्षा में नाकाम है, तो आम लोग अपनी रक्षा के लिए कदम उठा रहे हैं। इस समर्थन ने ग्राम रक्षा दल को और मजबूती दी।

2002 तक पश्चिम चंपारण से डकैतों का लगभग सफाया हो चुका था। डकैतों ने आत्मसमर्पण किया और बगहा जैसे क्षेत्रों में शांति लौट आई। ग्राम रक्षा दल की इस सफलता ने छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम जैसे आंदोलन को प्रेरित किया। आज भी जम्मू-कश्मीर में ग्राम रक्षा दल जैसे संगठन आतंकवाद से लड़ने के लिए सरकार द्वारा तैनात किए गए हैं।

एसएन सुब्बाराव बने बद्री पांडे की प्रेरणा

बद्री पांडे की प्रेरणा का स्रोत यूथ प्रोजेक्ट बेंगलुरु में उनकी भागीदारी थी, जहाँ एस.एन. सुब्बाराव के नेतृत्व में युवाओं को सामाजिक कार्यों के लिए प्रेरित किया जाता था। पांडे ने इस प्रेरणा को अपने गाँव में लागू किया और समाज को एकजुट कर डकैतों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उनकी अगुवाई में ग्राम रक्षा दल ने न केवल डकैतों को हराया, बल्कि समाज में अनुशासन और एकता का नया माहौल बनाया।

अपराध मुक्ति की तरफ आज का पश्चिम चंपारण

साल 2005 में नीतीश कुमार की सरकार बनने के बाद बिहार में अपराध पर काफी हद तक लगाम लगी। कभी डकैतों का गढ़ रहे पश्चिम चंपारण के गोबरहिया थाना क्षेत्र आज अपराधमुक्त है। पिछले पाँच वर्षों में यहाँ हत्या, लूट, छीना-झपटी या महिला उत्पीड़न जैसे मामले न के बराबर हैं। गाँवों में ‘गुमस्ता’ नामक व्यक्ति विवादों का निपटारा करते हैं, जिससे मामले थाने तक नहीं पहुँचते।

1990 में ‘ग्राम रक्षा दल शहीदी जत्था’ की स्थापना कर चंपारण को डाकुओं के आतंक से मुक्त कराने वाले बद्री नारायण पांडे से सुनिए चंपारण के डकैती और लूट के अंधकार में डूबने की कहानी।

बद्री नारायण पांडे और उनके ग्राम रक्षा दल की कहानी बिहार के जंगलराज से जूझते हुए एक समाज की जीत की कहानी है। नरकटिया नरसंहार जैसे भयावह दौर से निकलकर पश्चिम चंपारण ने शांति और सुरक्षा की मिसाल कायम की। पांडे की हिम्मत, अभयानंद और जी. कृष्णैया जैसे अधिकारियों का सहयोग और ग्रामीणों की एकजुटता ने ‘मिनी चंबल’ को अपराधमुक्त क्षेत्र में बदल दिया। यह कहानी न केवल बिहार, बल्कि पूरे देश के लिए एक प्रेरणा है कि अगर समाज एकजुट हो जाए, तो कोई भी चुनौती असंभव नहीं है।

‘रिहान मेरी बिटिया को लेकर जबरदस्ती फरार हो गया’: रोती हुई माँ का वीडियो वायरल, अयोध्या में 18 साल की हिंदू युवती का अपहरण

उत्तर प्रदेश के अयोध्या में 18 साल की हिंदू युवती को मोहम्मद रिहान खान अगवा कर ले गया। युवती को लापता हुए तीन दिन हो गए हैं। युवती के परिजन ने पुलिस थाने में शिकायत भी दर्ज कराई है। वहीं सोशल मीडिया पर युवती की माँ का रोते हुए वीडियो भी वायरल हो रहा है।

वाडियो में युवती की माँ रोते हुए आपबीती सुना रही हैं। लाचार माँ आँसू रोकते हुए कहती हैं कि मोहम्मद रिहान उनके बेटी को जबरन घर से उठा कर ले गया है। वे कहती हैं कि 24 घंटे से ऊपर हो गए हैं लेकिन बेटी का कुछ पता नहीं लगा है। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से आरोपित के घर बुलडोजर चलाने की भी माँग की है।

युवती के पिता ने बताया कि पुलिस से अपहरण की शिकायत दर्ज कराई जा चुकी है, लेकिन पुलिस अभी तक उनकी बेटी की तलाश नहीं कर पाई है। पिता ने बताया कि उनकी बेटी संदिग्ध हालात में घर से गायब हो गई है। परिवार ने युवती को आसपास के इलाकों में काफी तलाशा लेकिन उसका कुछ पता नहीं लगा है।

पुलिस थाने में दर्ज FIR

बेटी के अपहरण मामले में परिजनों ने थाना कोतवाली रुदौली में शिकायत की है। ऑपइंडिया के पास FIR कॉपी मौजूद है। परिजनों ने पुलिस से शिकायत करते हुए बेटी को वापस लाने की माँग की है।

FIR के मुताबिक, सोहसा क्षेत्र के रहने वाली निर्मला पत्नी दुर्गा प्रसाद ने अपने बेटी राधा के अपहरण की शिकायत का आवेदन दिया है। परिजनों ने बताया कि 21 अक्टूबर 2025 की शाम करीब 7.30 बजे गाँव का ही रहने वाला मोहम्मद रिहान खान उनकी बेटी राधा को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया।

FIR कॉपी का स्क्रीनशॉट

परिजनों ने कहा कि अब तक बेटी घर नहीं लौटी है। परिजनों को डर है कि उनकी बेटी के साथ कुछ गलत न हो जाए। परिजनों ने गुहार लगाते हुए पुलिस से जल्द से जल्द बेटी को वापस लाने की माँग की है। साथ ही आरोपित के खिलाफ कार्रवाई की भी माँग की है।

पुलिस का बयान

परिजनों की तहरीर पर रुदौली पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के तहत धारा 87 में अभियोग पंजीकृत कर लिया है। ये धारा अपहरण, जबरन भगा ले जाने और शादी के लिए जबरदस्ती आदि अपराध में दर्ज की जाती है।

रुदौली पुलिस ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा है कि जैसे ही शिकायत मिली हमने तुरंत केस दर्ज कर लिया है और आरोपित को पकड़ने की कोशिश की जा रही है। पुलिस का कहना है कि जल्द ही आरोपित को गिरफ्तार कर लिया जाएगा।

धर्मस्थल पर प्रोपेगेंडा फैलाने का ईनाम! ‘द न्यूज मिनट’ की एडिटर धन्या राजेंद्रन को सोरोस समर्थित अवॉर्ड के लिए किया गया नॉमिनेट: जानें ‘रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स’ की भारत से घृणा की कहानी

दुनिया में लोकतांत्रिक सरकारों के तख्तापलट में शामिल जॉर्ज सोरोस से फंडिंग पाने वाली संस्था ने धन्या राजेंद्रन को अवॉर्ड के लिए नॉमिनेट किया है। आपको कर्नाटक के धर्मस्थल मामले में ‘द न्यूज मिनट’ (टीएनएम) की रिपोर्टिंग तो याद ही होगी, किस तरह धर्मस्थल को बदनाम करने के लिए एक के बाद एक कहानियों को ‘द न्यूज मिनट’ ने हवा दी थी। टीएनएम ने इस मामले में तथ्यों को देखने के बजाय धर्मस्थल के बारे में जहर उगला और अब उसे शायद उसका ईनाम भी मिल गया है।

टीएनएम की सह-संस्थापक और प्रधान संपादक धन्या राजेंद्रन को भारत की ओर से रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) इम्पैक्ट प्राइज ऑफ द ईयर 2025 के लिए नामित किया गया है। RSF ने नॉमिनेशन में लिखा है, ‘‘धन्या राजेंद्रन प्रेस की स्वतंत्रता के लिए एक व्यापक लड़ाई में शामिल हो गई हैं, जिस पर भारत सरकार प्रतिबंध लगाने की कोशिश कर रही है।” RSF ने टीएनएम को ‘गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता का मानक’ बताया है।


वो कहते हैं ना कि ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’। वही, हाल RSF और धन्या का है। RSF के नॉमिनेशन को पढ़कर लगता है कि दुनिया में दमन की सबसे बड़ी शिकार धन्या ही है। RSF ने लिखा, “उन्हें और उनकी टीम को उनके काम के कारण बार-बार मुकदमों का सामना करना पड़ा है और ऑनलाइन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है।” जिस संस्थान ने धन्या को अवॉर्ड के लिए नॉमिनेट किया है, वो खुद ‘दूध की धुली’ नहीं है। वो खुद जॉर्ज सोरोस से पैसा लेती है, वही सोरोस जो लोकतांत्रिक देशों की सरकारों में हस्तक्षेप करने के लिए कुख्यात है।

कर्नाटक धर्मस्थल को लेकर टीएनएम का प्रोपेगेंडा

जुलाई 2025 में कर्नाटक के धर्मस्थल मंदिर के पूर्व सफाई कर्मचारी सी.एन. चिन्नैया ने इस क्षेत्र में ‘सैकड़ों शवों’ को दफनाने का दावा किया था। सफाई कर्मचारी चिन्नैया ने घटना का वक्त 1995 से 2014 के बीच का बताया। बगैर सबूत के सिर्फ चिन्नैय की गवाही के आधार पर कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने जाँच के लिए एसआईटी का गठन कर दिया।

दो हफ्तों तक SIT के अधिकारी शवों की तलाश में जंगलों, नदी के किनारों और घाटों की खाक छानते रहे। लेकिन अंत में सब खाली हाथ रहे। कोर्ट में चिन्नैया ने माना कि उसने झूठ बोला था। चिन्नैया का ‘राज’ खुल गया और पता चला कि वो वास्तव में धर्मस्थल, उसके मंदिर ट्रस्ट और धर्माधिकारी वीरेंद्र हेगड़े को बदनाम करने की साजिश का एक मौहरा भर था।

टीएनएम जैसे प्रोपेगेंडा मीडिया ने इसे हाथों-हाथ लिया और इस विषय पर दर्जनों रिपोर्ट की गईं। टीएनएम ने बेबुनियाद आरोपों की खूब रिपोर्टिंग की और उनका विश्लेषण किया।

टीएनएम का हिंदू विरोधी प्रोपेगेंडा

धर्मस्थल मामले में तो टीएनएम की हिंदू विरोधी सोच उजागर हुई ही थी लेकिन यह कोई इकलौता या पहला मामला नहीं है। टीएनएम लंबे वक्त से हिंदुओं को निशाना बनाता रहा है। ये वही पोर्टल है जिसने सामूहिक दुष्कर्म के एक मामले में मुस्लिम आरोपित के नामों को हिंदू नामों से बदल दिया था। बाद में खुद टीएनएम को सच स्वीकार पड़ा तो उस पर खूब सवाल खड़े हुए। यह पोर्टल हमेशा उन खबरों को प्रमुखता से उठाता है जिनमें निशाना हिंदू संस्थान या समुदाय होते हैं।

टीएनएम की इस प्रवृत्ति की झलक ‘द केरल स्टोरी’ की कवरेज के दौरान भी देखने को मिली। फिल्म में उन महिलाओं की सच्ची गवाही दिखाई गई थी, जिन्हें प्रेम जाल में फँसाकर धर्मांतरण कराया गया और बाद में आईएसआईएस दुल्हनों के रूप में भेज दिया गया। लेकिन ‘द न्यूज मिनट’ ने इन दर्दनाक सच्चाइयों को नजरअंदाज कर फिल्म को ‘दुष्प्रचार’ बता दिया था। यानी जहाँ अपराधियों का संबंध इस्लाम से था वहाँ पीड़िताओं की आवाज को ही खारिज कर दिया गया।

देवभूमि उत्तराखंड में मस्जिदों और मदरसों द्वारा सरकारी जमीनों पर किए गए अवैध कब्जों के कई प्रमाण सामने आए। वन भूमि और यहाँ तक कि तीर्थ मार्गों पर भी मस्जिदें और मदरसे बन जाने के दस्तावेजी सबूत मिले तोड़फोड़ के दौरान राजनीतिक बहसें भी हुईं। लेकिन इन गंभीर खुलासों पर ‘द न्यूज मिनट’ पूरी तरह चुप रहा, न कोई खोजी रिपोर्ट, न कोई संपादकीय प्रतिक्रिया। वहीं, जब किसी हिंदू धार्मिक संस्था पर ऐसा आरोप लगता है, तो TNM तुरंत उसे ‘एक्सक्लूसिव रिपोर्ट’ बना देता है।

इसी तरह, लव जिहाद जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी TNM की चुप्पी साफ दिखाई देती है। जब यह पोर्टल कभी-कभार इन मामलों पर लिखता भी है, तो उसे ‘दक्षिणपंथी सोच’ या ‘कल्पित प्रचार’ बताकर खारिज कर देता है। यह रवैया उन हजारों महिलाओं के दर्द का अपमान है जो झूठे प्रेम के जाल में फँसकर धर्म परिवर्तन और शोषण की शिकार हुईं।

सोरोस के पैसे से होती हैं RSF की फंडिंग

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (रिपोर्टर्स सेंस फ्रंटियर्स या RSF) इससे पहले प्रोपेगैंडिस्ट यूट्यूबर रवीश कुमार को ‘इंडिपेनडेंस प्राइज’ दे चुका है और मोहम्मद जुबैर जैसे प्रोपगेंडा फैलाने वाले लोगों के समर्थन में खड़ा रहा है। RSF को जॉर्ज सोरोस, भारत विरोधी प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए कुख्यात Ford Foundation सहित पश्चिमी सरकारों और निजी संस्थाओं द्वारा भारी मात्रा में फंड दिया जाता है। RSF खुद भी भारत विरोध के लिए कुख्यात है और इसके प्रेस फ्रीडम इंडेक्स को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं।

SRF को फंड देने वालों में यूरोपीय आयोग MFA, AIDS, Front Line, Oak Foundation, NHRF TAPIEI, MOF Danida Taiwan, NED, Ford Foundation, OSF Core Support (जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी फाउंडेशन) प्रमुख हैं। NED एक अमेरिकी सरकारी संगठन है, जिसे अक्सर CIA की ‘सॉफ्ट ताकत’ या शांति से सत्ता बदलने वाले हथियार के रूप में जाना जाता है।

RSF (Reporters Without Borders) की भारत पर रिपोर्टिंग उसके राजनीतिक पक्षपात को उजागर करती है। इसके ‘इंडिया फैक्ट फाइल’ में मोदी समर्थकों को ‘भक्त’ कहा गया है, ‘गोदी मीडिया’ का मजाक उड़ाया गया है और प्रधानमंत्री पर ‘प्रेस स्वतंत्रता संकट’ का आरोप लगाया गया है।

RSF की रिपोर्ट्स में इसकी भारत से घृणा भी साफ नजर आती है। मई 2023 में RSF ने अपनी वार्षिक प्रेस स्वतंत्रता रिपोर्ट जारी की, जिसमें उसने भारत को 180 देशों में से 161वें स्थान पर रखा। RSF के अनुसार, 2022 से भारत 11 पायदान नीचे खिसक गया है। दिलचस्प बात यह है कि RSF के अनुसार, पाकिस्तान के प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में सुधार हुआ है। 2022 में 157वें स्थान से पाकिस्तान ने सूची में 150वां स्थान प्राप्त किया है।

RSF का नजरिया समझने के लिए जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी फाउंडेशन (OSF) को देखना होगा, जो Alt News, The Wire, The Quint और Scroll जैसे पोर्टलों को फंड करती है। इसका मकसद स्वतंत्र पत्रकारिता नहीं बल्कि भारत पर वैचारिक नियंत्रण है। इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि RSF, जो सोरोस की सोच को मानता है, अक्सर उन पत्रकारों को इनाम देता है जो ‘स्वतंत्रता की बोलने’ को देश-विरोधी काम और ‘प्रेस की स्वतंत्रता’ को सरकार की आलोचना से जोड़ते हैं।

लोगों ने भी उठाए सवाल

धन्या के नामांकन पर सोशल मीडिया पर भी सवाल उठाए गए हैं। व्यवसायी मोहनदास पई ने X पर एक पोस्ट कर सवाल उठाए हैं। पई ने X पर टीएनएम के एक पोस्ट पर लिखा, “बेहद शर्मनाक। (नामांकन) किसलिए? धर्मस्थल पर फर्जी कहानी गढ़ने के लिए? अति वामपंथी इकोसिस्टम काम कर रहा है!” उन्होंने लिखा, “पहले झूठी कहानी गढ़ो, फिर इकोसिस्टम ऐसे ‘पीत पत्रकारों’ को पुरस्कारों के लिए नामांकित करता है! अगर धन्या में जरा भी ईमानदारी और आत्मसम्मान है, तो धर्मस्थल से जुड़ी फर्जी कहानियों के लिए माफी माँगे।”

धर्मस्थल कांड ने जब दिखाया कि पत्रकारिता के नाम पर झूठ कितनी आसानी से फैलाया जा सकता है। RSF द्वारा धन्या राजेंद्रन का नामांकन इसका उदाहरण है। यह पत्रकारिता की ईमानदारी के लिए नहीं बल्कि विचारधारा के लिए काम करने का इनाम है।

कर्नाटक कॉन्ग्रेस में फिर बवाल, सिद्धारमैया के बेटे ने सतीश जारकीहोली को बताया पिता का उत्तराधिकारी, कहा- नहीं लड़ेंगे 2028 का चुनाव: टेंशन में आए डीके शिवकुमार

कर्नाटक की राजनीति में एक बार फिर हलचल मच गई है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के बेटे और एमएलसी यतींद्र सिद्धारमैया के एक बयान ने पूरे राज्य में सियासी तापमान बढ़ा दिया है। यतींद्र ने कहा कि उनके पिता अब राजनीति के आखिरी दौर में हैं और 2028 का चुनाव नहीं लड़ेंगे। इतना ही नहीं, यतींद्र ने यह भी कहा कि सिद्धारमैया की विरासत आगे लोक निर्माण मंत्री सतीश जारकीहोली को संभालनी चाहिए। इस बयान ने कॉन्ग्रेस में नए समीकरणों की चर्चा तेज कर दी है, खासकर तब जब डीके शिवकुमार पहले से ही सिद्धारमैया के बाद मुख्यमंत्री पद के सबसे बड़े दावेदार माने जाते हैं।

ढाई-ढाई साल की सीएम राजनीति और नई हलचल

कर्नाटक में कॉन्ग्रेस सरकार बनने के बाद से ही सत्ता में ‘ढाई-ढाई साल के मुख्यमंत्री’ फॉर्मूले की चर्चा चल रही है। माना जाता है कि सिद्धारमैया और डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार के बीच समझौता हुआ था कि दोनों आधा-आधा कार्यकाल संभालेंगे। लेकिन अब यतींद्र का बयान इस राजनीतिक समझौते पर नए सवाल खड़े कर रहा है।

राज्य की राजनीति पहले ही मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर दो खेमों में बँटी हुई थी। एक तरफ सिद्धारमैया का ‘आहिंदा गुट’ और दूसरी तरफ शिवकुमार का ‘वोक्कालिगा गुट’। यतींद्र के बयान ने इन दोनों गुटों के बीच तनाव और गहराने का संकेत दे दिया है।

सिद्धारमैया के बेटे ने क्या कहा?

यतींद्र सिद्धारमैया ने एक कार्यक्रम में कहा कि उनके पिता अब अपने राजनीतिक जीवन के आखिरी पड़ाव पर हैं और 2028 का चुनाव नहीं लड़ेंगे। यतींद्र ने कहा, “मेरे पिता को अब सतीश जारकीहोली जैसे नेताओं का मार्गदर्शन करना चाहिए। वे मजबूत विचारधारा और सामाजिक न्याय की राजनीति में यकीन रखते हैं।”

यतींद्र ने आगे कहा, “सतीश जारकीहोली में निश्चित रूप से मेरे पिता की जगह लेने की क्षमता है। वे अगले मुख्यमंत्री बन सकते हैं।” इस बयान ने ऐसा माहौल बना दिया जैसे सिद्धारमैया अपने उत्तराधिकारी का नाम खुद तय कर चुके हों, जिससे डीके शिवकुमार की दावेदारी पर सीधा असर पड़ सकता है।

कौन हैं सतीश जारकीहोली?

जानकारी के अनुसार, सतीश जारकीहोली इस समय कर्नाटक के लोक निर्माण मंत्री (PWD Minister) हैं। वे उत्तर कर्नाटक के बेलगावी जिले के यमकनमर्दी विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं। 63 वर्षीय जारकीहोली अनुसूचित जाति के वाल्मीकि समुदाय से आते हैं और लंबे समय से सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों के हक की लड़ाई लड़ते रहे हैं। वे मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के ‘आहिंदा’ (अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित) गठबंधन के मजबूत स्तंभ माने जाते हैं। इस गठबंधन की राजनीति ही सिद्धारमैया की सबसे बड़ी ताकत रही है।

जारकीहोली राजनीतिक रूप से बेहद प्रभावशाली परिवार से हैं। उनके भाई रमेश जारकीहोली पहले कॉन्ग्रेस में थे, लेकिन 2018 में बीजेपी में चले गए और मंत्री बने। वहीं, उनकी बेटी प्रियंका जारकीहोली कॉन्ग्रेस की सांसद हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि सिद्धारमैया गुट किसी ऐसे नेता को आगे बढ़ाना चाहता है जो उनकी विचारधारा और सामाजिक एजेंडे को आगे ले जा सके। जारकीहोली इस प्रोफाइल में पूरी तरह फिट बैठते हैं।

डीके शिवकुमार ने क्या कहा?

यतींद्र के बयान के बाद पत्रकारों ने जब डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार से सवाल किया, तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि मुख्यमंत्री बदलने का कोई सवाल ही नहीं है। शिवकुमार ने कहा, “सिद्धारमैया हमारे नेता हैं। वे पूरा कार्यकाल मुख्यमंत्री रहेंगे। पार्टी में नेतृत्व परिवर्तन को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई है। जो भी फैसला होगा, वह हाईकमान लेगा।”

शिवकुमार का यह बयान यह दिखाने की कोशिश थी कि वे आलाकमान के प्रति वफादार हैं और जल्दबाजी में कोई प्रतिक्रिया नहीं देना चाहते। हालाँकि, कॉन्ग्रेस के अंदर यह माना जा रहा है कि यतींद्र का बयान कहीं न कहीं शिवकुमार गुट के लिए ‘राजनीतिक चेतावनी’ की तरह है।

यतींद्र का बयान और फिर सफाई

बयान पर विवाद बढ़ने के बाद यतींद्र सिद्धारमैया ने सफाई दी। यतींद्र ने कहा कि उनका मतलब मुख्यमंत्री बदलने या किसी को हटाने से नहीं था। उन्होंने कहा, “नेतृत्व परिवर्तन की बात गलत है। मैंने सिर्फ इतना कहा था कि कॉन्ग्रेस को विचारधारा वाले नेताओं को आगे बढ़ाना चाहिए। मेरे पिता 2028 तक एक्टिव रहेंगे और पूरा कार्यकाल पूरा करेंगे।”

यतींद्र ने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री बदलने पर कोई चर्चा नहीं हुई है। अगर कभी बदलाव होता है तो वह फैसला पार्टी आलाकमान और विधायक मिलकर लेंगे। यतींद्र की यह सफाई तो आई, लेकिन तब तक राजनीतिक हलकों में यह चर्चा शुरू हो चुकी थी कि सिद्धारमैया गुट भविष्य की तैयारी कर रहा है।

क्यों बढ़ी डीके शिवकुमार की चिंता

डीके शिवकुमार लंबे समय से मुख्यमंत्री बनने की इच्छा रखते हैं। वे कर्नाटक के शक्तिशाली वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं और दक्षिण कर्नाटक में उनका मजबूत जनाधार है। कॉन्ग्रेस की सरकार बनने से पहले भी उन्होंने सिद्धारमैया को समर्थन देने में अहम भूमिका निभाई थी, लेकिन अब वे उम्मीद कर रहे थे कि 2025 के बाद उन्हें मौका मिलेगा। यतींद्र का यह बयान इस उम्मीद पर पानी फेरने जैसा है। सिद्धारमैया गुट का झुकाव किसी दलित नेता की ओर दिखाना यह संकेत है कि सत्ता का संतुलन बदल सकता है।

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अगर सिद्धारमैया जारकीहोली को आगे बढ़ाते हैं, तो वे अपने ‘आहिंदा वोट बैंक’ को मजबूत रखना चाहेंगे, जबकि शिवकुमार का आधार मुख्य रूप से दक्षिणी जिलों में सीमित है।

‘आहिंदा’ राजनीति और सिद्धारमैया की सोच

‘आहिंदा’ शब्द कन्नड़ के तीन शब्दों से बना है- अल्पसंख्यक (A), हिंदू पिछड़ा वर्ग (HI), और दलित (DA)। इस मॉडल की सोच सबसे पहले पूर्व मुख्यमंत्री देवराज उर्स ने दी थी, लेकिन इसे आधुनिक दौर में सिद्धारमैया ने मजबूत किया। उनकी राजनीति का फोकस सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता रहा है। सतीश जारकीहोली उसी राजनीतिक विचारधारा से आते हैं। वे लगातार सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय रहते हैं और सिद्धारमैया के करीबी नेताओं में शामिल हैं। इसलिए जब यतींद्र ने उन्हें ‘अगला मुख्यमंत्री’ बताया, तो इसे सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संकेत माना गया।

यतींद्र सिद्धारमैया का बयान भले ही ‘गलतफहमी’ के रूप में पेश किया गया हो, लेकिन इसने कॉन्ग्रेस के भीतर के समीकरणों को उजागर कर दिया है। कर्नाटक की सत्ता अब दो रास्तों पर खड़ी है- एक तरफ ‘आहिंदा राजनीति’ का चेहरा सतीश जारकीहोली और दूसरी तरफ ‘वोक्कालिगा शक्ति’ के प्रतीक डीके शिवकुमार। तय है कि आने वाले महीनों में कर्नाटक की राजनीति और भी दिलचस्प मोड़ लेने वाली है।

मजहब नहीं बल्कि प्रदर्शन की वजह से टीम इंडिया से बाहर हैं सरफराज-शमी, कॉन्ग्रेस नेता और असदुद्दीन ओवैसी फैला रहे कम्युनल जहर: राजनीति को क्रिकेट से दूर रखने में भलाई

रणजी ट्रॉफी चल रही है और क्रिकेट के मैदान पर तो सब कुछ ठीक चल रहा लगता है, लेकिन बाहर राजनीति ने फिर से हल्ला मचा दिया है। साउथ अफ्रीका ए के खिलाफ दो 4 दिवसीय मैचों के लिए इंडिया ए टीम का ऐलान हुआ, जिसमें ऋषभ पंत कप्तान बनाए गए। लेकिन मुंबई के बल्लेबाज सरफराज खान का नाम फिर से गायब था। इससे असदुद्दीन ओवैसी और कॉन्ग्रेस की शमा मोहम्मद जैसे नेता भड़क उठे।

ओवैसी ने पूछा कि सरफराज को क्यों नहीं चुना गया, तो शमा ने सीधे गौतम गंभीर पर निशाना साधा, कहते हुए कि क्या सरफराज का सरनेम ही उनकी चयन न होने की वजह है? ये लोग क्रिकेट को हिंदू-मुस्लिम का रंग दे रहे हैं, लेकिन हकीकत कुछ और है।

असल में सरफराज और मोहम्मद शमी जैसे खिलाड़ियों का हाल देखिए तो साफ है कि मैदान पर फॉर्म और फिटनेस ही सब कुछ तय करती है, न कि कोई साजिश। इस रिपोर्ट में हम पूरे मामले को खोलकर रखेंगे, ताकि आप समझ सकें कि ये सब राजनीतिक बकवास क्यों है।

सरफराज के न चुने जाने के पीछे हकीकत क्या है?

साउथ अफ्रीका-ए के खिलाफ दो 4 दिवसीय मैचों के लिए इंडिया-ए की टीम घोषित हुई। ऋषभ पंत कप्तान हैं, जो चोट से उबरकर लौटे हैं। साई सुदर्शन, केएल राहुल, मोहम्मद सिराज जैसे खिलाड़ी भी हैं। लेकिन सरफराज खान का नाम नहीं है, जिसके बाद शमा मोहम्मद और ओवैसी ने हंगामा शुरू किया। शमा ने गंभीर पर धार्मिक भेदभाव का इल्जाम लगाया, तो ओवैसी ने पूछा कि सरफराज को क्यों नहीं चुना।

लेकिन असल बात ये है कि रणजी ट्रॉफी में खेल रहे कई खिलाड़ियों को इंडिया ए से बाहर रखा गया है, ताकि वे घरेलू क्रिकेट पर फोकस करें। रजत पाटीदार, रुतुराज गायकवाड़ जैसे बल्लेबाज भी सिर्फ एक मैच के लिए चुने गए। सरफराज का बाहर होना कोई साजिश नहीं, बल्कि चयन समिति का रणजी और टेस्ट सीरीज की तैयारी को बैलेंस करने का फैसला है।

सरफराज का प्रदर्शन आया आड़े

सरफराज खान का घरेलू क्रिकेट में रिकॉर्ड शानदार है। 56 फर्स्ट क्लास मैचों में उनका औसत 65.19 है, जो गजब का है। पिछले साल इंग्लैंड के खिलाफ टेस्ट डेब्यू के बाद दूसरी ही सीरीज के पहले मैच में उन्होंने 150 रनों की पारी खेली। इस साल 17 किलो वजन घटाकर फिटनेस दिखाई। रणजी ट्रॉफी में जम्मू-कश्मीर के खिलाफ 42 और 32 रन बनाए, जिससे मुंबई हार से बची।

साभार: ESPNCricinfo

लेकिन बाकी प्रदर्शन देखें तो मिक्स्ड रिकॉर्ड है। इंग्लैंड लायंस के खिलाफ 92 रन बनाए, पर न्यूजीलैंड के खिलाफ आखिरी दो टेस्ट की चार पारियों में सिर्फ 21 रन (0, 1, 11, 9)। इंडियंस वर्सेज पीएम इलेवन में 1 रन। क्वाड्रिसेप्स इंजरी भी रही, जिसके चलते चयन समिति ने रणजी पर फोकस करने का फैसला लिया। ये कोई भेदभाव नहीं, बल्कि उनके फॉर्म और फिटनेस का सवाल है।

मोहम्मद शमी का हाल जान लीजिए

शमा और ओवैसी जैसे लोग मोहम्मद शमी को भी घसीटते हैं, कहते हैं कि मुस्लिम खिलाड़ियों को टारगेट किया जा रहा। लेकिन शमी का हाल देखिए। रणजी में बंगाल वर्सेज उत्तराखंड के मैच में 7 विकेट लिए, पर 6 लोअर ऑर्डर के (8-11 नंबर)। सिर्फ कप्तान कुनाल चंडेला (72 रन पर) का विकेट ऊपरी बल्लेबाज का था। दिलीप ट्रॉफी क्वार्टर फाइनल में नॉर्थ जोन के लिए खेले, 100 रन देकर 1 विकेट, दूसरी पारी में जीरो।

IPL 2025 के आखिरी तीन मैचों में सिर्फ 1 विकेट – गुजरात टाइटंस के खिलाफ 48 रन, कोई विकेट नहीं; चेन्नई के खिलाफ 28 रन, 1 विकेट; मुंबई इंडियंस के खिलाफ 28 रन, जीरो विकेट। कुल 9 IPL मैचों में 6 विकेट, इकोनॉमी 11.23। हैमस्ट्रिंग इंजरी भी रही।

मोहम्मद शमी के खेले 5 मैचों में उनका प्रदर्शन, साभार: ESPNCricinfo

शमी की उम्र 35 के करीब है, इंजरी हिस्ट्री लंबी है। जबकि ऑस्ट्रेलिया जैसे टफ दौरे के लिए चयन समिति को फिट और फॉर्म में खिलाड़ी चाहिए, तो शमी का बाहर होना प्रदर्शन की वजह से है, न कि मजहब की वजह से।

कॉन्ग्रेस प्रवक्ता शमा मोहम्मद की बकवास

कॉन्ग्रेस प्रवक्ता शमा मोहम्मद ने एक्स पर लिखा, “क्या सरफराज को उनके सरनेम की वजह से नहीं चुना गया? बस पूछ रही हूँ। हम जानते हैं कि गौतम गंभीर कहाँ खड़े हैं।”

ये सीधा गंभीर पर हमला था, जो पहले भाजपा सांसद रह चुके हैं। शमा ने इसे कम्युनल रंग देने की कोशिश की, जैसे गंभीर ने सरफराज को मजहब के आधार पर बाहर किया। लेकिन गंभीर चयन समिति के हेड नहीं, अजित अगरकर हैं। गंभीर तो ऑस्ट्रेलिया में वनडे सीरीज की कोचिंग में व्यस्त हैं।

शमा का ये बयान सिर्फ हेट फैलाने के लिए था। वो पहले भी रोहित शर्मा को ‘मोटा’ और ‘कमजोर कप्तान’ कहकर विवाद खड़ा कर चुकी हैं। तब सफाई दी, लेकिन अब फिर वही राग। शमा का ‘जस्ट आस्किंग’ दरअसल जहरीली सियासत है, जो क्रिकेट को वोट बैंक बनाती है। अगर सरनेम की बात होती, तो मोहम्मद सिराज, खलील अहमद कैसे खेल रहे? शमा को जवाब देना चाहिए कि सरफराज का डेब्यू रोहित की कप्तानी और भाजपा सरकार में ही क्यों हुआ?

ओवैसी का वही पुराना कम्युनल पैटर्न

AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी हमेशा मुस्लिम मुद्दों को उठाकर वोट बैंक बनाते हैं। सरफराज के चयन पर सवाल उठाकर उन्होंने फिर वही किया। एक्स पर लिखा, “सरफराज को इंडिया ए के लिए भी क्यों नहीं चुना गया?”

ओवैसी के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

वैसे जब हनुमा विहारी या रजत पाटीदार जैसे हिंदू खिलाड़ी बाहर होते हैं, तो ओवैसी चुप रहते हैं। ये सेलेक्टेड गुस्सा क्यों? सरफराज का फॉर्म मिक्स्ड है और रणजी में कंटीन्यूटी जरूरी है। ओवैसी को क्रिकेट की बारीकियाँ नहीं समझनी, बस हेडलाइंस चाहिए।

CAA से लेकर कश्मीर तक, हर मुद्दे को कम्युनल बनाना उनका पुराना खेल है। लेकिन क्रिकेट में मेरिट चलता है। सिराज का हालिया ऑस्ट्रेलिया वनडे में प्रदर्शन देखिए – शानदार। इसलिए वो इंडिया ए में हैं। ओवैसी को चाहिए कि सरफराज को सपोर्ट करें, उनके रन गिनें, न कि सियासत करें।

क्रिकेट में मेरिट चलती है, धर्म-मजहब नहीं

इंडिया-ए का सेलेक्शन रणजी और टेस्ट सीरीज की तैयारी को बैलेंस करने की है। चोट से लौटे ऋषभ पंत कप्तान हैं। केएल राहुल, ध्रुव जुरेल, सिराज जैसे सीनियर खिलाड़ी दूसरे मैच में खेलेंगे, ताकि टेस्ट सीरीज की प्रैक्टिस हो। रजत पाटीदार, रुतुराज गायकवाड़ जैसे खिलाड़ी रणजी में कप्तानी कर रहे, इसलिए एक मैच के लिए चुने गए।

सरफराज को रणजी में रन बनाने का मौका दिया गया, ताकि फॉर्म और फिटनेस बरकरार रहे। बीसीसीआई ने साफ किया कि उनके लिए दरवाजे बंद नहीं। अयुष म्हात्रे, हर्ष दुबे जैसे युवा खिलाड़ियों को मौका मिला, जो घरेलू क्रिकेट में शानदार हैं। ये सिलेक्शन मेरिट और स्ट्रैटजी पर आधारित है, न कि धर्म और मजहब पर।

शमा और ओवैसी का ड्रामा क्रिकेटरों को पहुँचा रहा नुकसान

शमा और ओवैसी का ये तमाशा क्रिकेट को नुकसान पहुँचा रहा। क्रिकेटर मेहनत करते हैं, रन बनाते हैं, विकेट लेते हैं, लेकिन ये नेता उन्हें सियासी पॉन बनाते हैं। सरफराज ने कभी शिकायत नहीं की, वो रणजी में रन ठोक रहे। शमी भी फोकस्ड हैं। लेकिन शमा और ओवैसी जैसे लोग बिना तथ्य जाँचे इल्जाम लगाते हैं।

भाजपा नेता शहजाद पूनावाला ने ट्वीट किया, “ये लोग क्रिकेट को भी बाँटना चाहते हैं। देश का पार्टिशन करके मन नहीं भरा?”

क्रिकेट का मैदान धर्म नहीं देखता, वहाँ बल्ला और गेंद चलती है। सरफराज अगर रन बनाते रहेंगे, तो कोई उन्हें रोक नहीं सकता। देश में बल्लेबाजों की भरमार है, लेकिन लगातार रन बनाकर सरफराज फिर से दरवाजा तोड़ देंगे। शमी को भी फिटनेस और कंसिस्टेंसी दिखानी होगी। लेकिन शमा मोहम्मद और ओवैसी जैसे लोग क्रिकेट को कम्युनल बनाकर खिलाड़ियों का नुकसान कर रहे।

चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में 3.96 करोड़ वोटर्स का डाटा वेबसाइट पर डाला, SIR के दौरान कटेंगे फर्जी नाम: विरोध में उतरी TMC तो BJP ने दिखाया आईना, कहा- घुसपैठियों की पहचान जरूरी

चुनाव आयोग ने देशभर में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया शुरू की है। प्रक्रिया की शुरुआत बिहार चुनाव 2025 से हुई। इसी कड़ी में अब पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले SIR प्रक्रिया जारी है। लेकिन प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक दलों का विरोध और तीखी बयानबाजी देखने को मिली है।

बंगाल में SIR का विरोध

बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को लेकर प्रदेश में तीव्र राजनीतिक विरोध और बयानबाजी का दौर जारी है। SIR पर सीएम ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर आरोप लगाया कि वह BJP के दबाव में काम कर रहा और SIR को NRC के समान लागू करने की साजिश कर रहा है।

सीएम ने दावा किया कि जैसे NRC में नागरिकों और घुसपैठियों की पहचान की गई थी, उसी तरह SIR के माध्यम से मतदाता सूची से कुछ लोगों को बाहर किया जा सकता है, खासकर उन समुदायों के मतदाता जिन्हें बीजेपी ‘अवैध’ मान सकती है।

इतना ही नहीं बंगाल में SIR का इस स्तर पर विरोध हुआ कि तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) ने 12 अक्टूबर 2025 को प्रदेशभर में 100 ‘बिजया सम्मिलनी’ कार्यक्रम आयोजित किए। ये कार्यक्रम विशेष रूप से मतदाता सूची की SIR प्रक्रिया के विरोध में थे, जिसे पार्टी ने बीजेपी की राजनीतिक साजिश के रूप में पेश किया। TMC नेताओं ने आरोप लगाया कि SIR के माध्यम से विशेष समुदायों के मतदाताओं को जानबूझकर सूची से हटाया जा रहा है, जिससे चुनावी ध्रुवीकरण की कोशिश की जा रही है।

हालाँकि इन सभी विवादों पर चुनाव आयोग स्पष्ट कर चुका है बंगाल में SIR के दौरान कोई भी वैध मतदाता सूची से बाहर नहीं होगा। यह आश्वासन राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज अधिकारी मनोज कुमार अग्रवाल ने दिया। उन्होंने कहा कि कानून के निर्धारित की प्रक्रिया की जाएगी

बंगाल SIR का डाटा

बंगाल में SIR के विरोध के बीच भी चुनाव आयोग इस प्रक्रिया को तेज करने में लगा हुआ है। चुनाव आयोग ने SIR के लिए अब तक 3.96 करोड़ डाटा अपलोड कर दिया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, शुरुआती डाटा में लगभग 3.48 करोड़ नाम साल 2002 के SIR डाटा से मेल खाते पाए गए हैं। यह कुल मतदाताओं का लगभग 44 से 45 प्रतिशत हिस्सा है जबकि राज्य में वर्तमान में कुल पंजीकृत मतदाता लगभग 7.6 करोड़ है।

कालिमपोंग, पश्चिम मिदनापुर, पुरूलिया, कोलकाता उत्तर, मालदा, आलीपुरदुआर, झारग्राम समेत सात जिलों में किए गए शुरुआती मिलान में यह देखा गया कि 51 प्रतिशत से 65 प्रतिशत नाम 2002 के SIR रिकॉर्ड से मेल खाते हैं। इसका मतलब यह है कि इन जिलों में आधे से अधिक मतदाता पुराने रिकॉर्ड से जुड़े हुए हैं। हालाँकि कुछ क्षेत्रों में और सुधार की आवश्यकता हो सकती है।

चुनाव आयोग ने इस डाटा को EC पोर्टल पर अपलोड किया है। हालाँकि जलपाईगुड़ी और दार्जिलिंग जिलो में प्राकृतिक आपदाओं के कारण इसमें देरी हुई है। इसके साथ ही बूथ स्तर पर BLO (बूथ लेवल ऑफिसर) ऐप के माध्यम से नामों की सत्यता की जाँच भी की जा रही है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची में दोहराव, फर्जी नाम और त्रुटियों की पहचान करना है ताकि आगामी विधानसभा चुनाव में मतदाता सूची पूरी तरह से अपडेट और पारदर्शी हो।

बंगाल में SIR क्यों जरूरी?

पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) जरूरी माना जा रहा है। खासकर राज्य में बढ़ते घुसपैठ के मामलों को देखते हुए। बंगाल में आए दिन घुसपैठ और अवैध मतदाता शामिल होने के मामले सामने आते रहते हैं।

ताजा मामला 22 अक्टूबर 2025 का है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने एक बड़े रैकेट का पर्दाफाश किया, जिसमें 400 बांग्लादेशी घुसपैठियों ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर भारतीय पासपोर्ट बनवाए थे। ऐसे कई मामले हर दूसरे दिन सामने आते हैं। बंगाल में SIR प्रकिया का विशेष कारण यही है।

जुलाई 2025 में भी बीजेपी नेता शुभेंदु अदिकारी ने आरोप लगाया था कि बंगाल में रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों को निवास प्रमाण पत्र दिए जा रहे हैं, जिससे उनकी पहचान मतदाता सूची में शामिल हो रही है।

बंगाल BJP का SIR को समर्थन

भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने बंगाल में SIR प्रक्रिया का खुलकर समर्थन किया है। बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा कि SIR पार्टी के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है और इसमें कोई भी लापरवाही 2026 के चुनावों में नुकसान पहुँचा सकती है।

वहीं सांसद और केंद्रीय मंत्री शांतनु ठाकुर ने SIR के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि इस प्रक्रिया के दौरान 1 से डेढ़ करोड़ अवैध मतदाताओं के नाम हटाए जा सकते हैं, जिनमें रोहिंग्या, घुसपैठिए और काल्पनिक मतदाता शामिल हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वास्तविक शरणार्थियों को नागरिकता मिलने पर उनका मतदान का अधिकार सुरक्षित रहेगा।

बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी ने SIR को आगामी चुनावों के ‘सेमीफाइनल’ के रूप में बताया। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर SIR समय पर पूरा नहीं हुआ तो राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की नौबत आ सकती है। उनका कहना है कि इस प्रक्रिया में 2.4 करोड़ अवैध मतदाताओं के नाम हटाए जा सकते हैं, जो चुनावी निष्पक्षता के लिए बेहद जरूरी हैं।

BJP प्रवक्ता कीया घोष ने TMC के मंत्रियों के विवादास्पद बयानों की आलोचना करते हुए कहा कि वे बयान राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति को बिगाड़ सकते हैं। उनका कहना है कि SIR जैसी प्रक्रिया के माध्यम से ही राज्य में अवैध मतदाता और घुसपैठियों की पहचान की जा सकती है, जिससे चुनाव निष्पक्ष और पारदर्शी होंगे।

CAA के खिलाफ प्रदर्शन करने वाली फ्रांसिस्का ओर्सिनी का डिपोर्टेशन कानूनी मामला, राजनीति से जोड़कर हल्ला मचा रहे लेफ्ट-लिबरल: कथित ‘विद्वान’ की विचारधारा भी जानिए

हिंदी भाषा पर काम करने वाली ब्रिटिश प्रोफेसर फ्रांसिस्का ओर्सिनी को 21 अक्टूबर 2025 को भारत में एंट्री नहीं मिली और दिल्ली के इंदिरा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से डिपोर्ट कर दिया गया, हालाँकि उनके पास 5 साल का वैध ई-वीजा था। भारत पहुँचते ही इमिग्रेशन अधिकारियों ने उन्हें रोका और कुछ घंटों में हॉन्गकॉन्ग भेज दिया।

इस घटना से कुछ वामपंथी अकादमिक और राजनीतिक हलकों में गुस्सा फैला। कई लोगों ने बिना कारण बताए सरकार की आलोचना की और इसे ‘अकादमिक विरोधी’ कदम बताया। लेकिन सरकार ने साफ किया कि मार्च 2025 में ही ओर्सिनी को वीजा नियम तोड़ने के लिए ब्लैकलिस्ट किया गया था। डिपोर्टेशन कानूनी कार्रवाई थी, विचारधारा से इसका कोई लेना-देना नहीं। फिर भी उनकी भारत और हिंदू धर्म के बारे में विचारधारा की जाँच जरूरी है।

सरकार ने की कानूनी कार्रवाई, विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं

गृह मंत्रालय ने बताया कि ओर्सिनी पहले टूरिस्ट वीजा पर भारत आई थीं और उन्होंने अनधिकृत अकादमिक काम किया, जो वीजा नियमों का उल्लंघन है। भारत के नियमों के मुताबिक, टूरिस्ट वीजा पर कोई पेशेवर काम, शोध या अकादमिक गतिविधि की इजाजत नहीं है। अधिकारियों ने पुष्टि की कि इस उल्लंघन की वजह से उन्हें ब्लैकलिस्ट किया गया। सिस्टम ने ऑटोमेटिक तरीके से उनकी एंट्री रोक दी, चाहे वीजा वैध हो या न हो, क्योंकि उनकी एंट्री ब्लैकलिस्टेड की जा चुकी थी।

मंत्रालय ने साफ किया कि यह कोई टारगेटेड कार्रवाई नहीं थी। इसमें कोई ‘राजनीतिक साजिश’ या नीति में बदलाव नहीं था, जैसा कि वामपंथी मीडिया और लोग दावा कर रहे हैं। यह सामान्य वीजा नियम लागू करना था, जो हर विदेशी नागरिक पर लागू होता है, चाहे उनका पेशा या विचारधारा कुछ भी हो। ओर्सिनी ने इन नियमों को नजरअंदाज किया, जिसके कारण उनकी एंट्री रोकी गई।

ऑपइंडिया की रिसर्च में पता चला कि ओर्सिनी की हिंदू विरोधी और भारत सरकार विरोधी विचारधारा का लंबा इतिहास है। फिर भी मार्च तक उन्हें भारत आने की अनुमति थी, जो दिखाता है कि प्रतिबंध का कोई वैचारिक कारण नहीं था।

CAA विरोध, कश्मीर पर सरकार की आलोचना और अकादमिक रुख

फ्रांसिस्का ओर्सिनी को गैर-राजनीतिक विद्वान के रूप में पेश किया जा रहा है, जो वो नहीं हैं। उन्होंने CAA विरोधी प्रदर्शनों में भारतीय पुलिस की कार्रवाई की निंदा की और सरकार पर सांप्रदायिकता का आरोप लगाया। वह हमेशा भारत की नीतियों और शासन की आलोचना करने वाली लेफ्ट-लिबरल विचारधारा के साथ रहीं।

कश्मीर पर उनके विचारों की बात करें तो, मार्च 2016 में वह 150 से ज्यादा हस्ताक्षरकर्ताओं में थीं, जिन्होंने नक्सल समर्थक प्रोफेसर निवेदिता मेनन की तथाकथित ‘बदनामी’ के खिलाफ खुला पत्र साइन किया। उस समय मेनन को JNU में कश्मीर के राजनीतिक दर्जे पर सवाल उठाने के लिए मीडिया में हंगामा हुआ था।

ओर्सिनी ने इस पत्र पर हस्ताक्षर किए और मेनन को ‘राष्ट्र-विरोधी’ कहने वाली ‘दक्षिणपंथी मीडिया मुहिम’ की निंदा की। इस पत्र में कश्मीर पर चर्चा की अकादमिक स्वतंत्रता का समर्थन किया गया और JNU प्रशासन से मेनन के बोलने के अधिकार की रक्षा करने को कहा गया।

एक्टिविज्म के अलावा ओर्सिनी ने अपनी लेखनी में बार-बार वैचारिक झुकाव दिखाया। उदाहरण के लिए, साल 2002 के एक लेख में उन्होंने रामायण और महाभारत को ‘नैतिकता-रहित’ ग्रंथ बताया और आधुनिक उदारवादी साहित्य से उनकी तुलना की। उन्होंने नाराजगी जताई कि उस समय भारत में भगवान राम की आलोचना मुश्किल थी। उस समय केंद्र में NDA की भाजपा सरकार थी।

‘ए मल्टीलिंगुअल नेशन’ किताब में अपने अध्याय ‘ना तुर्क ना हिंदू’ में ओर्सिनी ने भाषाविदों पर भाषाओं को सांप्रदायिक बनाने का आरोप लगाया। उन्होंने एक काल्पनिक सिद्धांत पर हंगामा मचाया, लेकिन खुद वही किया जिसके खिलाफ वह चेतावनी दे रही थीं-यानी ‘हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान’ का भूत बनाकर इसे ऐतिहासिक आलोचना के रूप में पेश किया।

ओर्सिनी ने लिखा, “आधुनिक भाषा विचारधाराएँ मानती हैं कि भाषाएँ खास समुदायों की होती हैं, चाहे वे जातीय, क्षेत्रीय या धार्मिक हों। बेनेडिक्ट एंडरसन ने हमें सिखाया (1991) कि ये काल्पनिक समुदाय अतीत, वर्तमान और भविष्य में प्रक्षेपित होते हैं। उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी की शुरुआत में ‘हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान’ नारे ने हिंदी (नागरी लिपि में) को उत्तर भारत के हिंदुओं की भाषा के रूप में शुरू से पेश किया, समकालीन हिंदुओं से इसे अपनाने को कहा और दावा किया कि हिंदी सभी भारतीयों, खासकर हिंदुओं की राष्ट्रीय भाषा बनेगी।”

लेख में उन्होंने आगे कहा, “इस आधुनिक कल्पना ने स्क्रिप्ट-भाषा-समुदाय का एक सिलसिला बनाया, जबकि लंबे समय से बहु-लिपीय और बहुभाषी परंपराएँ थीं, जहाँ भाषाएँ एक से ज्यादा लिपियों में लिखी जाती थीं और लोग एक से ज्यादा भाषाएँ सीखकर बहुभाषी सामाजिक दुनिया में काम कर लेते थे।” उन्होंने हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान नारे को जटिल, बहुल भाषाई वास्तविकताओं को राष्ट्रवादी ढाँचे में ढालने की कोशिश बताया।

लिबरल्स की नौटंकी पुराने पैटर्न पर ही, कुछ नया नहीं

जैसे ही ओर्सिनी का डिपोर्टेशन खबरों में आया, हमेशा की तरह बिना तथ्यों के पड़ताल के ही लोग भड़क उठे। किसी ने भी कानूनी हकीकत पर बात नहीं की, ओर्सिनी ने वीजा नियम तोड़े और उनके साथ वही हुआ जो किसी और के साथ होता।

‘द वायर’ के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन ने सवाल उठाया कि पिछली यात्रा में शोध करने के लिए उन्हें क्यों डिपोर्ट किया गया। उन्होंने कहा कि हिंदी की प्रोफेसर होने के नाते वह हिंदी में लोगों से बात कर सकती हैं या हिंदी विद्वानों से मिल सकती हैं। वह वीजा उल्लंघन को छिपा रहे थे और यह नहीं बताया कि ओर्सिनी टूरिस्ट वीजा पर आई थीं न कि वर्क वीजा पर, जो शोध के लिए जरूरी था।

सोर्स-एक्स

पत्रकार कुणाल पुरोहित ने इसे ‘राष्ट्रीय शर्म’ बताया और कहा कि ओर्सिनी ने हिंदी भाषा के लिए उस छोटे सोच वाले सिस्टम से ज्यादा किया, जो उन्हें खतरा मानता है।

राजदीप सरदेसाई ने लिखा, “विडंबना: एक सरकार जो हिंदी को बढ़ावा देने का दावा करती है, उसने एक प्रमुख विद्वान को डिपोर्ट किया, जिसने जीवन भर हिंदी पर शोध किया!”

रामचंद्र गुहा ने तो सरकार को ‘असुरक्षित, पागल और बेवकूफ’ करार दे दिया।

प्रोपेगेंडा फैलाने वाली पूर्व पत्रकार और टीएमसी सांसद सागरिका घोष ने लिखा, “हैरान करने वाला और दुखद। फ्रांसिस्का ओर्सिनी दक्षिण एशियाई साहित्य और हिंदी की विश्व प्रसिद्ध विद्वान हैं, जिन्हें वैध वीजा के बावजूद डिपोर्ट किया गया। नरेंद्र मोदी का संकीर्ण और पिछड़ा शासन भारत की खुले दिमाग वाली विद्वता और उत्कृष्टता को नष्ट कर रहा है।”

ये प्रतिक्रियाएँ अकादमिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि एक नैरेटिव को बढ़ावा देने के लिए हैं। यह नैरेटिव हर इमिग्रेशन जाँच और कानून लागू करने को दमन का कृत्य बताता है। गुस्सा चुनिंदा है, तथ्यों को नजरअंदाज किया गया, और मकसद साफ है-यानी अलग-थलग घटनाओं को हथियार बनाकर उस सरकार को बदनाम करना, जिसका वे राजनीतिक विरोध करते हैं।

पहला मामला नहीं, और भी लोगों को नहीं मिली भारत में एंट्री

ओर्सिनी अकेली विदेशी विद्वान नहीं हैं, जिन्हें वीजा दुरुपयोग या भारत विरोधी रुख के लिए परिणाम भुगतना पड़ा। हाल के वर्षों में फिलिपो ओसेला और निताशा कौल को भी नियम तोड़ने के कारण भारत में प्रवेश नहीं मिला। इन सभी मामलों में कानूनी प्रक्रिया का पालन हुआ। फिर भी हर बार इसे असहमति के खिलाफ अभियान के रूप में पेश किया जाता है।

किसी भी संप्रभु देश की तरह भारत भी अपने इमिग्रेशन नियम लागू करने का पूरा हक रखता है। उसे उन लोगों को स्वतः प्रवेश देने की जरूरत नहीं जो नियम तोड़ते हैं, चाहे वे संस्कृत ग्रंथों को गलत अर्थ दे या हिंदी साहित्य पर पेपर प्रकाशित करें। ओर्सिनी का ‘प्रतिष्ठित विद्वान’ होना उन्हें वीजा नियम तोड़ने, गलत तरीके से प्रवेश करने और फिर पीड़ित बनने का अधिकार नहीं देता।

भावनाओं से ज्यादा मायने रखते हैं तथ्य

फ्रांसिस्का ओर्सिनी को CAA की आलोचना या हिंदू ग्रंथों पर उनके अकादमिक विचारों के कारण नहीं डिपोर्ट किया गया। उन्हें इसलिए डिपोर्ट किया गया क्योंकि उन्होंने कथित तौर पर वीजा नियम तोड़े, बस इतना ही। इसके बाद जो लिबरल गुस्सा दिखा, वह तथ्यों पर नहीं, बल्कि प्रशासनिक फैसलों को राजनीतिक रंग देने की जिद पर आधारित था। अंत में यह भारतीय सरकार नहीं, बल्कि इसके आलोचक हैं, जो कानूनी प्रक्रिया को एक वैचारिक तमाशा बनाकर कमजोर कर रहे हैं।

असल सवाल यह नहीं कि ओर्सिनी को क्यों डिपोर्ट किया गया। सवाल यह है कि उनके समर्थक क्यों सोचते हैं कि उन्हें बाकी सभी की तरह कानूनी मानकों पर नहीं परखा जाना चाहिए।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अनुराग ने अंग्रेजी में लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

भावनगर में समीर-रियाज-असलम ने दिवाली पर पटाखे फोड़ने पर 2 हिंदू भाइयों पर किया जानलेवा हमला, चाकू और तलवार से बनाया निशाना: गुजरात पुलिस ने दो को दबोचा

गुजरात के भावनगर में दिवाली के दिन दो हिंदू भाइयों पर मुस्लिम युवकों द्वारा जानलेवा हमला किए जाने का मामला सामने आया है। बोरतलाव पुलिस स्टेशन में समीर, रियाज और असलम के खिलाफ मामला दर्ज कर आगे की कार्रवाई शुरू कर दी गई है। पुलिस ने इस मामले में दो लोगों को गिरफ्तार भी किया है।

ऑपइंडिया के पास मौजूद इस मामले की FIR कॉपी के मुताबिक, यह पूरी घटना कुंभारवाड़ा इलाके में मढिया रोड मोहम्मदी मस्जिद के पास माफनगर में हुई। शिकायत के अनुसार, शिकायतकर्ता को 19 अक्टूबर को उसके एक दोस्त ने बताया कि दो-तीन मुस्लिम युवक गली के नुक्कड़ पर उसके छोटे भाई को पटाखे फोड़ने को लेकर गालियाँ दे रहे हैं। इसके बाद जब शिकायतकर्ता वहाँ पहुँचा, तो आरोपियों ने उसके साथ भी मारपीट शुरू कर दी।

शिकायत में आगे कहा गया है कि आरोपित रियाज पठान, समीर हुसैन सैयद और असलम पठान हाथों में पाइप, तलवार और पाइप लिए खड़े थे। आरोप है कि असलम पठान ने शिकायतकर्ता को गालियाँ देनी शुरू कर दीं जिसके बाद जब शिकायतकर्ता ने उन्हें गालियाँ देने से मना किया, तो रियाज पठान नाम के आरोपित ने उनके सिर पर पाइप से वार किया। शिकायत में आगे कहा गया है कि समीर और असलम नाम के आरोपियों ने भी उन्हें पाइप से पीटना शुरू कर दिया।

इसके बाद, शिकायतकर्ता चिल्लाया और उसका भाई उसे बचाने दौड़ा लेकिन आरोपितों ने उसे भी पीटना शुरू कर दिया। आरोप है कि समीर नाम का एक और आरोपित हाथ में तलवार लेकर वहाँ पहुँचा और उसने शिकायतकर्ता के भाई के सिर पर तलवार मार दी। इसके बाद विवाद बढ़ने पर शिकायतकर्ता के दोस्त मौके पर पहुँच गए और दोनों शिकायतकर्ताओं को बचा लिया गया। शिकायतकर्ता और उसके भाई का अभी अस्पताल में इलाज चल रहा है।

मुस्लिम आरोपित ने पटाखे फोड़ने पर जताई थी आपत्ति- FIR

FIR में पूरी घटना का कारण भी बताया गया है। शिकायत में कहा गया है कि रात करीब 11:15 बजे शिकायतकर्ता का छोटा भाई पटाखे फोड़ रहा था। जिसके बाद आरोपित समीर ने पटाखे फोड़ने से मना कर दिया और दोनों के बीच बहस हो गई। इसके बाद शिकायतकर्ता समीर को समझाने पहुँचा और इस दौरान आरोपित ने मारपीट भी की। फिलहाल पुलिस ने इस मामले में FIR दर्ज कर ली है और आगे की कार्रवाई कर रही है।

पुलिस ने हमले में शामिल ‘कॉन्ग्रेस नेता’ के खिलाफ मामला दर्ज नहीं किया: शिकायतकर्ता का दावा

ऑपइंडिया से बातचीत में शिकायतकर्ता ने पूरी घटना का ब्यौरा दिया है। शिकायतकर्ता ने बार-बार दावा किया कि यह घटना दिवाली के त्योहार पर पटाखे फोड़ने की अनुमति न देने के मुद्दे पर हुई। उसने यह भी कहा कि शुरुआत में मोहम्मदी मस्जिद के आसपास 10-15 लोग थे और फिर 40-45 मुस्लिम लोग हथियारों के साथ इकट्ठा हो गए और उसे पीटना शुरू कर दिया।

शिकायतकर्ता ने पुलिस पर पक्षपात का आरोप लगाया है और दावा किया है कि जिन आरोपियों के नाम उसने पुलिस शिकायत और बयान में बताए हैं, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है। दावा किया गया है कि सभी मुख्य आरोपियों ने ही हमला किया था लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की है। शिकायतकर्ता ने यह भी कहा है कि हमले में शामिल खतीजा खातून नाम की एक महिला स्थानीय कॉन्ग्रेस नेता है और उस इलाके में कॉन्ग्रेस के कार्यक्रम का प्रबंधन करती है।

हालाँकि, बोरतलाव पुलिस स्टेशन के PI डाभी ने ऑपइंडिया से बातचीत में इन सभी आरोपों का खंडन किया और स्पष्ट किया कि एफआईआर दर्ज करते समय शिकायतकर्ता के हस्ताक्षर लिए गए थे और उस दौरान शिकायतकर्ता ने इन नामों का जिक्र नहीं किया था। पुलिस ने यह भी कहा है कि अगर शिकायतकर्ता आरोपियों के नाम बताती है तो पुलिस को कार्रवाई करने में कोई आपत्ति नहीं है।

गौरतलब है कि पुलिस ने इस मामले में दो अलग-अलग शिकायतें दर्ज की हैं। पहली FIR शिकायतकर्ता द्वारा मुस्लिम व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज कराई गई थी, जिसमें कहा गया है कि दिवाली के त्योहार पर पटाखे न फोड़ने देने को लेकर मुस्लिमों से झगड़ा हुआ। इसके अलावा, दूसरी शिकायत मुस्लिम युवकों द्वारा घटना के शिकायतकर्ताओं के खिलाफ दर्ज की गई है, जिसमें कहा गया है कि शिकायतकर्ताओं द्वारा पटाखे फोड़ने और गाली-गलौज को लेकर बहस हुई थी।

पुलिस ने रियाज पठान, असलम पठान, समीर हुसैन सैयद और समीर के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 117(2), 118(1), 115(2), 352, 54 और गुजरात पुलिस अधिनियम की धारा 135 के तहत मामला दर्ज किया है। पुलिस ने बताया है कि इस मामले में असलम पठान और समीर सैयद नाम के दो आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है और इस मामले में कार्रवाई अभी भी जारी है।

‘मोदी के भारत में सबके लिए जगह नहीं’: जोहरान ममदानी ने फिर से हिंदुओं के खिलाफ उगली आग, कुछ दिन पहले दिखा था ‘आतंकी मौलाना’ के साथ

न्यूयॉर्क सिटी मेयर पद के उम्मीदवार और हिंदू विरोधी विचारधारा रखने वाले जोहरान ममदानी एक बार फिर चर्चा में हैं। ममदानी अब वह चुनाव जीतने के लिए भारतीय-अमेरिकी वोटरों को लुभाने के लिए दाँव खेल रहे हैं। दिवाली के मौके पर ममदानी ने हिंदू समुदाय से मुलाकात की और पहले दिए अपने विवादित बयानों पर सफाई दी। एक दिन पहले ही वह एक विवादित मौलवी के साथ भी ममदानी ने तस्वीर डाली थी, जिस पर आतंकी गतिविधियों से जुड़े होने का आरोप था। ममदानी आखिर कैसे नेता हैं और अपने हिंदू विरोधी बयानों के बावजूद वह चुनाव जीतने के लिए क्या-क्या तरीके अपना रहे हैं, आइए जानते हैं।

चुनावी जीत के लिए ममदानी के हथकंडे

ममदानी को लगता है कि हिंदू-अमेरिकी वोट निर्णायक हो सकता है, इसलिए वह मंदिर-मंदिर जाकर अपने बयानों पर सफाई दे रहे हैं। ममदानी ने एक बार फिर पीएम मोदी पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी और उनकी पार्टी बीजेपी का यह नजरिया है कि देश में ‘केवल कुछ खास तरह के भारतीयों के लिए ही जगह है।’

ममदानी ने खुद को ‘बहुलवादी’ बताया। उन्होंने कहा कि वह ऐसे भारत में बड़े हुए हैं जहाँ सभी धर्मों के लोग साथ रहते थे। वह अपने पुराने हिंदू विरोधी बयानों को बहुलवाद के पक्ष में उठाया गया कदम बता रहे हैं। ममदानी ने यह भी कहा कि भले ही बहुत से लोग पीएम मोदी को लेकर उनसे असहमत हों, फिर भी मेयर बनने के बाद वह सभी का समान रूप से प्रतिनिधित्व करेंगे। यह बयान भारतीय-अमेरिकी वोटरों को शांत करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है, जो हिंदू विरोधी बयानबाजी करने पर ममदानी पर भड़के थे।

ममदानी हाल ही में इमाम सिराज वहाज से मिले थे। वहाज पर 1993 के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर बम धमाके के साजिशकर्ताओं से जुड़े होने का आरोप है। इस मुलाकात के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और कई नेताओं ने ममदानी की कड़ी आलोचना की थी।

पुराने विवाद, जो बताते हैं उनकी सोच

मेयर चुनाव से पहले ममदानी का एक पुराना वीडियो सामने आया था, जिसमें उन्होंने 2002 के गुजरात दंगों को लेकर पीएम मोदी पर निशाना साधा था और उन्हें ‘युद्ध अपराधी’ बताया था। एक और पुराने वीडियो में ममदानी ने आरोप लगाया था कि गुजरात से मुस्लिमों को ‘मिटा’ दिया गया, और ‘अब लोगों को लगता ही नहीं कि हम मौजूद हैं।’ ममदानी ने एक कार्यक्रम में पीएम मोदी की तुलना इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से करते हुए दोनों को ‘युद्ध अपराधी’ कहा था।

इसके अलावा, ममदानी ने अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन को ‘मस्जिद के विध्वंस का उत्सव’ और ‘उत्पीड़न का हथियार’ बताया था। यह बयान करोड़ों हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला था।

सच नहीं बोल पा रहे ममदानी

जोहरान ममदानी के भारत पर दिए गए बयान सिर्फ झूठ नहीं हैं, बल्कि उनकी रणनीति का हिस्सा हैं। उनका दावा है कि गुजरात के मुसलमान ‘गुजरात छोड़ चुके हैं,’ जबकि वहाँ आज भी 50 लाख से ज्यादा मुस्लिम है। ममदानी ऐसा क्यों कहते हैं? यही कारण है कि वह मोदी विरोधी कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए झूठ फैलाते हैं, फूट डालने का खेल खेलते हैं और अपने कट्टरपंथ को साफ करने की कोशिश करते हैं।

ममदानी का खेल सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। वे BDS (बॉयकॉट, डिवेस्टमेंट, और सैंक्शन्स) की आलोचना करने से बचते हैं, आतंकी समूहों की तारीफ करते हैं और ‘इंतिफ़ादा’ को ग्लोबलाइज करने की बात करते हैं, जो न्यू यॉर्क में यहूदी समुदाय के लिए खतरनाक हो सकता है।

ममदानी का विजन खासतौर पर भारत में अफरा-तफरी फैलाना और विदेशों में तोड़फोड़ करने का है। इस सच को झुठलाया नहीं जा सकता कि मोदी एक राष्ट्र का नेतृत्व कर रहे हैं और बेहतरीन लीडर के रूप में साबित हो रहे है, लेकिन ममदानी सच बोलने की बजाय बस भ्रम और विवाद फैलाने में व्यस्त हैं।

डाटा ने लिबरल प्रोपेगेंडा को फिर किया धुआँ-धुआँ, बताया- दिवाली से नहीं प्रदूषित हुई दिल्ली की हवा: हर साल की तरह इस बार भी पराली जलाने से AQI बिगड़ा

दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) सालों से दिवाली के दौरान ‘बेहद खराब’ और ‘गंभीर’ श्रेणियों के बीच रहा, चाहे पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबंध हो, सीमित अनुमति हो या इस साल की तरह ‘ग्रीन पटाखों’ की इजाजत हो।

लिबरल्स और प्रोपेगेंडा फैलाने वालों के लिए दिवाली ‘मजाक का पर्व’ बन गया है। हर साल वे हिंदुओं पर पटाखे जलाने का दोष लगाते हैं, कहते हैं कि इससे हवा की गुणवत्ता खराब होती है।

फूड शो से मशहूर हुए रॉकी सिंह नाम के यूजर ने लिखा, “दिल्ली में कल हवा का प्रदूषण खतरनाक स्तर पर था।”

फोटोग्राफर अतुल कासबेकर ने लिखा, “धर्म के नाम पर उत्तर भारत के लोग अपनी सेहत को जानबूझकर नष्ट कर रहे हैं।”

एक्स यूजर द प्रोटागोनिस्ट ने लिखा, “तुम सब बेवकूफों ने जिंदगी दूभर कर दी। जानकारी के लिए बता दूँ, भारत में दमा से होने वाली वैश्विक मौतों का लगभग 46% हिस्सा है और हर साल भारत में करीब 2 लाख लोग दमा से मरते हैं।” इसके साथ ही उसने अस्थमा इनहेलर की एक तस्वीर भी शेयर की।

एक्स यूजर जतिन गुप्ता ने लिखा, “दिल्ली मूर्खों और बेवकूफों से भरा शहर है। हवा अब साँस लेने लायक नहीं रही क्योंकि कुछ नासमझ लोग सोचते हैं कि पटाखे जलाना=दिवाली। बस बेवकूफी। साफ-साफ बेवकूफी।”

पटाखों पर प्रतिबंध के बावजूद AQI में कोई बदलाव नहीं: दिल्ली AQI डेटा

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के 21 अक्टूबर के बुलेटिन के अनुसार, दिल्ली का AQI 351 था, जबकि 20 अक्टूबर को यह 345 था। ऑपइंडिया ने 2021 से लेकर दिवाली के एक दिन पहले और अगले दिन के डेटा की जाँच की।

साल 2024 में दिवाली 31 अक्टूबर को मनाई गई। उस दिन AQI 328 था और अगले दिन यानी 1 नवंबर को AQI 339 था, जैसा कि CPCB के डेटा में है।

साल 2023 में दिवाली 12 नवंबर को मनाई गई। उस दिन AQI 218 था और अगले दिन यानी 13 नवंबर को AQI 358 था।

साल 2022 में दिवाली 24 अक्टूबर को मनाई गई। उस दिन AQI 312 था और अगले दिन यानी 25 अक्टूबर को AQI 302 था।

साल 2021 में दिवाली 4 नवंबर को मनाई गई। उस दिन AQI 382 था और अगले दिन यानी 5 नवंबर को AQI 462 था।

प्रतिबंधों में बदलाव के बावजूद डेटा में कोई खास सुधार नहीं दिखता, जो बताता है कि दिल्ली की जहरीली हवा के लिए दिवाली उत्सव से ज्यादा अन्य कारक जिम्मेदार हैं।

भाजपा ने AAP शासित पंजाब पर हवा खराब करने का आरोप लगाया

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने 21 अक्टूबर 2025 को आम आदमी पार्टी (AAP) की पंजाब सरकार पर आरोप लगाया कि उसने पराली जलाने की अनियंत्रित घटनाओं से दिल्ली के प्रदूषण को और बढ़ाया। भाजपा के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने एक्स पर पोस्ट किया कि पंजाब के किसान दिवाली के दौरान अपनी पराली जलाते हैं ताकि इसे पटाखों का धुआँ समझा जाए और पुलिस कार्रवाई से बचा जाए।

मालवीय ने लिखा, “दिल्ली-एनसीआर की खराब हवा की गुणवत्ता के लिए दीपावली को दोष मत दो।” उन्होंने कहा कि AAP पराली जलाने को प्रोत्साहन देकर हिंदू पर्व को बदनाम कर रही है।

पराली जलाने के बारे में डेटा क्या कहता है?

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के CREAMS डेटा के अनुसार, पिछले कुछ दिनों में पराली जलाने की घटनाएँ काफी बढ़ी हैं। 21 अक्टूबर को 268 पराली जलाने की घटनाएँ दर्ज की गईं, जिनमें से 62 पंजाब से और 103 उत्तर प्रदेश से थीं।

इसी तरह 20 अक्टूबर को 217 घटनाएँ थीं, जिनमें 45 पंजाब से और 77 उत्तर प्रदेश से थीं। 19 अक्टूबर को पंजाब में 67 और उत्तर प्रदेश में 12 घटनाएँ थीं। साफ है कि पराली जलाने की घटनाएँ बढ़ी हैं और पंजाब के अलावा उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के किसानों ने भी हवा के प्रदूषण में बड़ा योगदान दिया है।

खास बात यह है कि पराली जलाने का पीक सीजन अभी शुरू हुआ है और अगर राज्य नियमों को लागू करने में नाकाम रहे तो आने वाले दिनों में स्थिति और खराब होगी।

हालाँकि इस साल पंजाब में उत्तर प्रदेश की तुलना में पराली जलाने की घटनाएँ कम हैं, लेकिन पिछले साल के डेटा से पता चलता है कि पंजाब इस मामले में शीर्ष राज्य था। इसके अलावा ‘पराली जलाने का सीजन’ अभी शुरू हुआ है और आने वाले दिनों में पंजाब उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों को पीछे छोड़ सकता है।

‘ग्रीन दिवाली’ का मिथक और AQI स्तरों में कोई बदलाव नहीं

सालों से डेटा साफ तस्वीर पेश करता है। जब कोर्ट ने पटाखों पर पाबंदी लगाई और दिल्ली ने ‘ग्रीन दिवाली’ को बढ़ावा दिया, तब भी प्रदूषण के स्तर में कोई खास बदलाव नहीं आया। AQI के आँकड़ों में बहुत कम अंतर दिखता है।

विशेषज्ञों ने बताया कि दिवाली का समय पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने के पीक सीजन के साथ मेल खाता है। फसल के अवशेषों की आग अक्टूबर और नवंबर में कम हवा की गति और तापमान उलटने की स्थिति के साथ मिलकर, प्रदूषकों को वातावरण में फंसाती है, जिससे दिल्ली की हवा और खराब होती है। दिवाली से पहले भी AQI ‘खराब’ श्रेणी में रहता है, जो दिखाता है कि शहर का प्रदूषण संकट सिर्फ पटाखों की वजह से नहीं है।

सोशल मीडिया पर सैकड़ों नहीं बल्कि हजारों संदेश हिंदुओं और दिवाली को खराब हवा की गुणवत्ता के लिए दोषी ठहराते हैं। लेकिन डेटा एक अलग कहानी कहता है। हिंदू पर्व को प्रदूषण के लिए दोष देने के बजाय राष्ट्रीय राजधानी में बढ़ते वायु प्रदूषण और हवा की गुणवत्ता गिरने के असली कारण की जाँच जरूरी है। दिल्ली सरकार ने 24 से 26 अक्टूबर के बीच क्लाउड सीडिंग करके प्रदूषण कम करने की योजना बनाई है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या आर्टिफिशियल बारिश उत्तर भारत में बढ़ती पराली जलाने की घटनाओं के बीच प्रदूषण को कम करने में मदद करेगी।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अनुराग ने अंग्रेजी में लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें