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तमिल मैग्जीन, मशहूर डांसर और एक चिट्ठी… संसद भवन में लगने वाले ‘सेंगोल’ से इनका क्या है कनेक्शन

नए संसद भवन में लोकसभा स्पीकर की कुर्सी के पास लगने वाले ‘सेंगोल‘ पर रोज कोई न कोई नई जानकारी सामने आ रही है। इसी क्रम में ये पता चला है कि पीएम मोदी को स्वतंत्रता के इस प्रतीक के बारे में मशहूर डांसर पद्मा सुब्रमण्यम द्वारा पता चला था।

दरअसल, दो साल पहले साल 2021 में मशहूर डांसर पद्मा को सेंगोल के बारे में एक तमिल मैग्जीन ‘तुगलक’ के जरिए मालूम चला। इसके बाद उन्होंने उस मैग्जीन के आर्टिकल को तमिल से अंग्रेजी में अनुवाद करके पीएम मोदी को भेजा। उन्होंने चिट्ठी में पीएम मोदी से अपील की कि वह इसके बारे में स्वतंत्रता दिवस के मौके पर सभी देशवासियों को बताएँ।

वह कहती हैं कि सेंगोल सत्ता हस्तांतरण का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि जो आर्टिकल पढ़कर उन्हें सेंगोल के बारे में पता चला उसमें बताया गया था कि कैसे कांची महा स्वामी (चंद्रशेखरेंद्र सरस्वती) ने अपने शिष्य मेट्टू स्वामीगल को सेंगोल के बारे में बताया और फिर इसका जिक्र डॉ सुब्रमण्यम की एक पुस्तक में हुआ। उन्होंने इंडिया टुडे से बातचीत में इस सेंगोल की महत्वता के बारे में बताया।

वह बताती हैं कि तमिल संस्कृति में छत्र, राजदंड और सिंहासन ये तीन चीजें सत्ता हस्तांतरण के वक्त दी जाती हैं। इनमें सेंगोल न केवल ताकत का बल्कि न्याय का भी प्रतीक है। इसका महत्व हजारों वर्ष पुराना है। इसके बाद उन्होंने सेंगोल नेहरू को कैसे मिला…इस विषय पर बात की। उन्होंने कहा कि वह एक राष्ट्रवादी हैं और पीएमओ के समक्ष सेंगोल की जानकारी देकर उन्होंने रामायण की उस गिलहरी जैसे अपना फर्ज निभाया है।

बता दें कि पीएम मोदी के कार्यालय में पद्मा की ये चिट्ठी रिसीव होने के बाद सेंगोल की खोजबीन शुरू हुई। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने इंदिरा गाँधी नेशनल सेंटर फॉर आर्ट्स के विशेषज्ञों की मदद ली और राष्ट्री अभिलेखागार से लेकर उस वक्त तमाम अखबारों और डॉक्यूमेंट्स में इसके बारे में खँगाला गया। लेकिन इसका पता तब चला जब सूचना संग्रहालयों में भेजी गईं और जानकारी आई कि सेंगोल इलाहाबाद के म्यूजियम में रखा हुआ है।

जाँच में सामने आया कि ये सेंगोल को बंगलौर के फेमस वुम्मिडी बंगारू चेट्टी एंड सन्स ज्वैलर्स एंड डायमंड मर्चेंट्स ने तैयार किया था और 1947 में इसे बनाने में 15000 की लागत आई थी। आज जब सेंगोल की महत्वता पर हर जगह बात हो रही है तो डांसर कहती हैं कि लोकतंत्र के मंदिर में सेंगोल की स्थापना से उनका सपना पूरा हो रहा है। यह अपने अआप में खास है क्योंकि इसके बारे में किसी ऐतिहासिक किताब तक में जिक्र नहीं है।

जिस यूट्यूबर इरफान की मर्सिडीज की चपेट में आकर मरी पद्मावती, उसके चैनल पर तभी चल रहा बिरयानी का रिव्यू: नेटिजंस भड़के

तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई के पास YouTuber इरफान की मर्सिडीज कार की चपेट में आने से पद्मावती नाम की 52 साल की एक महिला की मौत हो गई। इरफान और उनका परिवार तंजावुर से चेन्नई लौट रहा था और उसकी कार की रफ्तार बहुत अधिक थी। इस दौरान सड़क पार कर रही पद्मावती के साथ मरिमलाई नगर में यह दुर्घटना हो गई है।

जिस वक्त यह हादसा हुआ, उस उस वक्त अजरूद्दीन नाम का ड्राइवर कार चला रहा था। कहा जा रहा है कि कार की रफ्तार बहुत तेज थी। कार की तेज स्पीड और महिला द्वारा अचानक सड़क पार करने के कारण ड्राइवर का संतुलन बिगड़ गया और उसने महिला को टक्कर मार दी। टक्कर लगते ही पद्मावती की घटना स्थल पर ही मौत हो गई।

घटना की सूचना पाकर पुलिस मौके पर पहुँची और शव को अपने कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। इस मामले में पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है। मृतक पद्मावती एसआरएम यूनिवर्सिटी में सुरक्षा गार्ड के पद पर कार्यरत कर रही थीं। घटना शुक्रवार (26 मई 2023) की बताई जा रही है।

मोहम्मद इरफान यूट्यूब पर फूड ब्लॉग चलाते हैं। इसमें खाने का रिव्यू पेश करते हैं। इसके साथ ही वे मशहूर हस्तियों का इंटरव्यू आदि यूट्यूब पर अपलोड करते हैं। मोहम्मद इरफान युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं और 3.64 मिलियन यानी 36.40 लाख सब्सक्राइबर हैं। मोहम्मद इरफान ने 26 मई 2023 को करीब शाम 6 बजे बिरयानी का रिव्यू अपने यूट्यूब चैनल पर अपलोड किया है।

‘जब्बार भाई बिरयानी इन दुबई’ शीर्षक से अपलोड इस रिव्यू में एक रेस्टोरेंट के बिरयानी का रिव्यू किया गया है। वीडियो के डिस्क्रिप्शन में लिखा है, ‘इस वीडियो में हमने अपनी हाल की दुबई यात्रा के दौरान जब्बार भाई बिरयानी को आजमाया और मैंने अपनी शादी के लिए एक इत्र खरीदा।’

कहा जा रहा है कि जिस वक्त यह घटना हुई, उस वक्त यह बिरयानी रिव्यू पेश किया जा रहा था। इसको लेकर नेटीजंस भड़के हुए हैं। बताते चलें कि मोहम्मद इरफान की कुछ दिन पहले ही निकाह हुई है। हाल ही में उनके परिवार को तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने एक स्वागत समारोह के लिए राजभवन में आमंत्रित भी किया था।

खाने में थूकने के बाद पैक कर रहा था मासूम, कुरैशी ब्रदर्स के सलाम चिकन रेस्टोरेंट का वीडियो वायरल: FIR के बाद इसे बंद करने की हो रही माँग

यूपी के गाजियाबाद स्थित एक रेस्टोरेंट में खाना पैक करने के दौरान उसमें थूकने का वीडियो सामने आया है। वायरल वीडियो में होटल का कर्मचारी खाना पैकिंग वाले पॉलिथिन पर थूकता नजर आ रहा है। इसको लेकर हिंदू युवा वाहिनी के कार्यकर्ताओं ने गुरुवार (25 मई 2023) की रात मुकदमा दर्ज कराया है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, मामला गाजियाबाद के लोनी इलाके में स्थित सलाम चिकन रेस्टोरेंट का है। वायरल वीडियो में नजर आ रहे शख्स का नाम मासूम है। बावर्ची मासूम के खिलाफ हिंदू युवा वाहिनी के पूर्व जिलामंत्री और कार्यकर्ता शुभम कुमार ने मुकदमा दर्ज कराया है। उन्होंने कहा कि अगर रेस्टोरेंट को बंद नहीं कराया गया तो इसका घेराव किया जाएगा।

शुभम कुमार का कहना है कि वायरल वीडियो में रेस्टोरेंट कर्मचारी मासूम खाना पैक करने वाले पॉलिथिन में थूक कर खाना पैक कर रहा है। होटल के कर्मचारियों पर न सिर्फ पैक खाने में, बल्कि खाना परोसने से पहले भी थूकने के आरोप लगाए जा रहे हैं।

सलाम चिकन रेस्टोरेंट के मालिक सलाम कुरैशी और अय्यूब कुरैशी हैं। युवा वाहिनी के कार्यकर्ता रेस्टोरेंट बंद करने की माँग कर रहे हैं। पुलिस का कहना है कि रेस्टोरेंट में काम करने वाले आरोपित मासूम के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया है। फिलहाल वीडियो की जाँच की जा रही है।

पुलिस का कहना है कि इस मामले की जाँच के आधार पर आगे कार्रवाई की जाएगी। वहीं होटल के मालिकों का कहना है कि कर्मचारी खाने में थूक नहीं रहा था, बल्कि प्लास्टिक खोलने के लिए फूँक मार रहा था। इसे ही खाने की पैकिंग में थूकना बताया जा रहा है।

बता दें गाजियाबाद में पहले भी इस तरह के मामले सामने आ चुके हैं। इस साल जनवरी में साहिबाबाद के तसीरुद्दीन को रोटी पर थूकने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। घटना तब सामने आई थी, जब मदीना होटल में काम करने वाले तसीरुद्दीन का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था। वायरल वीडियो में तसीरुद्दीन रोटियों को सेंकने के दौरान उस पर थूकता नजर आ रहा था।

‘द डायरी ऑफ वेस्ट बंगाल’ का ट्रेलर रिलीज होने के बाद राज्य पुलिस ने भेजा मेकर्स को नोटिस, डायरेक्टर बोले- मैं बंगाल गया तो वापस नहीं आ पाऊँगा

‘द डायरी ऑफ वेस्ट बंगाल’ का ट्रेलर रिलीज के बाद डायरेक्टर सनोज मिश्रा को कोलकाता पुलिस ने समन भेजा है। उनका कहना है कि इस फिल्म से प्रदेश सीएम की छवि धूमिल करने का प्रयास किया गया है। इस समन में पुलिस ने उन्हें पूछताछ के लिए 30 मई तक पेश होने के लिए कहा है।

इस संबंध में एक शिकायत एमहर्स्ट स्ट्रीट थाने में 11 मई 2023 को शिकायत दर्ज हुई थी। इसके बाद सनोज मिश्रा को सीआरपीसी की धारा 41 ए के तहत लीगल नोटिस भेजा गया। वहीं केस को आईपीसी की 120बी, 153ए, 501, 504, 505, 295ए, आईटी एक्ट की 66डी/88बी और सिनेमेटोग्राफी एक्ट की धारा 7 के तहत केस दर्ज किया गया है।

नोटिस में डायरेक्टर सनोज मिश्रा को कहा गया है कि 30 मई से पहले थाने के एडिशनल ऑफिसर इंचार्ज को मिलना होगा। डायरेक्टर ने इस लीगल नोटिस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ये फिल्म तथ्य आधारित है। उन्होंने यह चिंता भी जाहिर की कि हो सकता है कि बंगाल पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर ले और गिरफ्तार करके जेल में ही मार डाले। लेकिन वो बता देना चाहते हैं कि उनकी मंशा राज्य की छवि पर दाग लगाने की नहीं है।

वह बोले, “मैंने तथ्य आधारित फिल्म बनाई है। मैं प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से इस मामले पर संज्ञान लेने को कहता हूँ। पश्चिम बंगाल में हत्याएँ, रेप और हिंदुओं के पलायन के मामले बढ़ रहे हैं। मैंने पूरी रिसर्च की है। पूरी फिल्म तथ्यों पर हैं।”

उन्होंने कहा, “मैं एक बार पश्चिम बंगाल गया तो वापस नहीं आऊँगा। मैं झूठे केस में फँसाया जा रहा हूँ। उन्होंने मुझे ऐसी धाराओं में फँसाया है जैसे मैं कोई अपराधी या फिर आतंकी हूँ। हालाँकि, मैंने फिल्म के लिए सभी आवश्यक तैयारियाँ पूरी कर ली हैं, जो अगस्त तक रिलीज होगी। उन्होंने कहा, “मुझे देखना होगा कि ये फिल्म रिलीज हो।”

बता दें कि द डायरी ऑफ वेस्ट बंगाल फिल्म में रोहिंग्या मुस्लिमों और बांग्लादेशी कट्टरपंथियों का बंगाल में बढ़ता प्रभाव दिखाया गया है। फिल्म के ट्रेलर के बाद शिकायत इसलिए आई है क्योंकि इसमें दिखाया गया था कि ये अवैध घुसपैठ को राज्य सरकार का साथ है। इस ट्रेलर में 2013 की उस घटना का भी जिक्र है जब 200 हिंदुओं के घरों को जला दिया गया था। इसके अलावा ये भी दिखाया गया कि कैसे ममता बनर्जी राज्य में सीएए और एनआरसी लागू करने के खिलाफ हैं।

कर्नाटक के बाद तमिलनाडु ने किया गुजरात के AMUL ब्रांड का विरोध, CM स्टालिन की अमित शाह को चिट्ठी: जानें कैसे राजनीति के लिए क्षेत्रवाद की आग को दी जा रही हवा

गुजरात की मिल्क कॉपरेटिव सोसायटी अमूल (AMUL) का मामला कर्नाटक से होते हुए तमिलनाडु तक पहुँच गया है। यह व्यवसायिक से ज्यादा राजनीतिक नजर आ रहा है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2023 से ठीक पहले अमूल बनाम राज्य की नंदिनी (Nandini) को लेकर राजनीति हुई थी। अब इस राजनीति में तमिलनाडु भी कूद गया है।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एवं डीएमके के नेता एमके स्टालिन (MK Stalin) ने केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह को एक पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने कहा है कि अमूल को आविन के मिल्क शेड क्षेत्र से दूध खरीदने से रोकने का निर्देश दिया जाए। स्टालिन ने यह पत्र स्थानीय सहकारी क्षेत्र को बचाने के नाम पर लिखी है और अमूल का विरोध किया है। अमूल के विरोध की मुख्य वजह उसका गुजरात से होना है।

यही कारण है कि भाजपा और उसके नेताओं, खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) और केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह (Amit Shah) से विरोधी भाव रखने वाले लोग अब गुजरात के इस दूध उत्पाद का का भी विरोध करने लगे हैं। इसके लिए ये नेता स्थानीय बनाम गैर-स्थानीय की विभाजनकारी राजनीति को हवा दे रहे हैं। बंगाल में ममता बनर्जी, बिहार में जदयू और राजद, कर्नाटक में कॉन्ग्रेस एवं जेडीएस, तमिलनाडु में स्टालिन, महाराष्ट्र में MNS जैसे क्षेत्रीय नेता क्षेत्रवाद को अपनी राजनीति का केंद्र बनाकर रखा है।

केंद्रीय मंत्री अमित शाह को लिखे अपने पत्र में एमके स्टालिन ने लिखा, “अन्य राज्यों की मजबूत डेयरी सहकारी समितियों की तरह तमिलनाडु में भी सन 1981 से तीन स्तरीय डेयरी सहकारी प्रणाली प्रभावी ढंग से काम कर रही है। आविन हमारा सर्वोच्च सहकारी विपणन संघ है। आविन सहकारी के दायरे में 9,673 दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियाँ ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य कर रही हैं। वे लगभग 4.5 लाख सदस्यों से 35 LLPD दूध खरीदते हैं।”

स्टालिन ने आगे लिखा, “हाल ही में यह हमारे संज्ञान में आया है कि कैरा जिला सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ (अमूल) ने कृष्णागिरी जिले में चिलिंग सेंटर और एक प्रसंस्करण संयंत्र स्थापित करने के लिए अपने बहुराज्यीय सहकारी लाइसेंस का उपयोग किया है। यह हमारे राज्य के कृष्णागिरी, धर्मपुरी, वेल्लोर, रानीपेट, तिरुपथुर, कांचीपुरम और तिरुवल्लूर जिलों और उसके आसपास के FPO और SHG के माध्यम से दूध खरीद योजना बना रहा है। इस तरह की क्रॉस-प्रोक्योरमेंट ‘ऑपरेशन व्हाइट फ्लड’ की भावना के खिलाफ है और देश में दूध की कमी के मौजूदा परिदृश्य को देखते हुए उपभोक्ताओं के लिए मुश्किलें बढ़ाने वाला है।”

हिंदी का विरोध कर इसे क्षेत्रीय अस्मिता से जोड़ने वाले एमके स्टालिन अब आर्थिक क्षेत्र में भी इसे आजमा रहे हैं। इसी तहत उन्होंने Amul बनाम Aavin के जरिए अब स्थानीय बनाम गैर-स्थानीय की आग को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं। यही कारण है कि वे अमित शाह से राज्य में अमूल के ऑपरेशन को रोकने की माँग की है। इस तरह की माँग करके क्षेत्रीयता की आग भड़काकर अपनी राजनीति चमकाने वाले स्टालिन पहले नेता नहीं हैं।

महाराष्ट्र में राज ठाकरे

जब राज ठाकरे ने अपनी पार्टी ‘महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना’ (MNS) की शुरुआत की थी तो उन्होंने साफ कर दिया था कि उनका कार्यक्षेत्र ‘महाराष्ट्र’ पर केंद्रित होगा। मराठी वोटों को उनकी भूख ने धार्मिक मुद्दों को भी दरकिनार कर दिया, जिसको लेकर शिवसेना का निर्माण किया गया था। राज ठाकरे ने नासिक जिले में स्थित त्र्यंबकेश्वर मंदिर के हालिया विवाद में मराठी मुस्लिमों को लुभाने की कोशिश की।

त्र्यंबकेश्वर मंदिर में मुस्लिमों द्वारा लोबान दिखाने और चादर चढ़ाने की कोशिश का बचाव करते हुए राज ठाकरे ने कहा, “अगर यह सदियों पुरानी परंपरा है तो इस पर रोक लगाना बेमानी है। यह त्र्यंबकेश्वर के लोगों का मुद्दा है। महाराष्ट्र में सैकड़ों मंदिर और मस्जिद हैं, जहाँ इस तरह का आपसी समन्वय देखने को मिलेगा। हमारा धर्म इतना कमजोर नहीं है कि किसी दूसरे धर्म का व्यक्ति मंदिर में प्रवेश कर जाए तो वह भ्रष्ट हो जाए। मैं विभिन्न मस्जिदों में गया हूँ। हमारे कुछ मंदिरों में एक निश्चित जाति के लोगों को ही गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति है।”

राज ठाकरे दरअसल मराठी लोगों की राजनीति पर फोकस कर रहे हैं, जिनमें हिंदू और मुस्लिम दोनों शामिल हैं। यही कारण है कि त्र्यंबकेश्वर की घटना को वो आपसी सौहार्द्र बताकर मराठी मुस्लिमों को अपनी तरफ खींचने का प्रयास कर रहे हैं। कभी हिंदुत्व की वकालत करने वाले राज ठाकरे महाराष्ट्र के दंगों को नजरअंदाज करते हुए कहा, “मराठी मुस्लिम जहाँ भी रहते हैं, वहाँ कोई सांप्रदायिक तनाव नहीं है। यह मेरा अनुभव है। वे शांति से रहते हैं। कुछ लोग इस सद्भाव को भंग कर रहे हैं। एक हिंदू बहुल राज्य में हिंदू कैसे खतरे में हो सकता है?”

ये वही राज ठाकरे हैं, जिन्होंने MNS के गठन के शुरुआती दिनों में मराठी बनाम गैर-मराठी का मुद्दा जोर-शोर से उठाया था। उनकी पार्टी बिहार और उत्तर प्रदेश से मुंबई और आसपास के शहरों जैसे ठाणे, पुणे और नासिक में काम कर रहे लोगों की नौकरी छिनकर स्थानीय मराठी लोगों देने की बात करते थे। उनकी पार्टी के कार्यकर्ता यूपी-बिहार के लोगों से आए दिन मारपीट करते थे। वे कहते थे कि इन्हीं लोगों के कारण मुंबई आदि शहरों में अपराध बढ़ा है।

कर्नाटक में कॉन्ग्रेस और JDS

राष्ट्रीय पार्टी होने के बावजूद कॉन्ग्रेस कई मौकों पर स्थानीय बनाम गैर-स्थानीय राजनीति का खेल खेला है। कॉन्ग्रेस ने कर्नाटक में चुनावों से पहले अमूल बनाम Nandini दूध ब्रांड का खेल खेलकर कन्नड़ बनाम गुजरात की राजनीति करने की कोशिश की थी। उसने जनता दल सेक्युलर द्वारा किए जा रहे अमूल के विरोध का खूब साथ दिया। इसको लेकर कॉन्ग्रेस ने खूब फेक न्यूज फैलाए।

दरअसल, दिसंबर 2022 में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने अमूल और नंदिनी के बीच अधिक सहयोग अपील की थी। नंदिनी का स्वामित्व कर्नाटक मिल्क फेडरेशन (केएमएफ) के पास है। उन्होंने कहा था, “अमूल और केएमएफ मिलकर यह सुनिश्चित करने की दिशा में काम करेंगे कि राज्य के हर गाँव में एक प्राथमिक डेयरी हो। कर्नाटक में सहकारी डेयरी को बढ़ावा देने के लिए अमूल और केएमएफ को मिलकर काम करना होगा।”

इस बयान को इस तरह लोगों के सामने रखा गया कि अमूल जल्द ही नंदिनी को खरीद सकता है। इस तरह स्थानीय डेयरी ब्रांड नंदिनी को कर्नाटक की पहचान और संस्कृति से जोड़ दिया गया। इसको मुद्दा बनाकर राज्य में क्षेत्रवाद की खूब आग भड़काई गई। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने उस समय कन्नडिगों से अमूल ब्रांड का बहिष्कार करने की अपील की थी। वहीं, कॉन्ग्रेस नेता डीके शिवकुमार ने इसे एक बड़ी साजिश बताया था।

जनता दल (सेक्युलर) के नेता एचडी कुमारस्वामी ने तो यहाँ तक कह दिया, “अमूल को केंद्र सरकार के समर्थन से पिछले दरवाजे से कर्नाटक में स्थापित किया जा रहा है। अमूल कर्नाटक मिल्क फेडरेशन (केएमएफ) और किसानों का गला घोंट रहा है। कन्नड़ लोगों को अमूल के खिलाफ बगावत करनी चाहिए। हमारे लोगों और ग्राहकों को प्राथमिकता पर नंदिनी उत्पादों का उपयोग करना चाहिए और किसानों की आजीविका को बचाना चाहिए।”

बिहार में JDU और RJD

साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान नीतीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड), तेजस्वी यादव की राष्ट्रीय जनता दल और कॉन्ग्रेस ने भाजपा के खिलाफ महागठबंधन तैयार किया था। इन नेताओं ने अमित शाह और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी को ‘बाहरी’ बताते हुए बिहार के लोगों से महागठबंधन को वोट देने के लिए कहा था। नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव ने इस प्रोपेगेंडा को खूब फैलाया। यहाँ भी नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव की पीएम मोदी और अमित शाह के प्रति नफरत साफ दिखी।

बताते चलें नीतीश कुमार भाजपा के सहयोग से बिहार में सरकार का आनंद उठाते रहे हैं। हालाँकि, साल 2013 में उन्होंने NDA छोड़ दिया। उसके बाद साल 2017 में वे राजद और कॉन्ग्रेस से गठबंधन तोड़कर भाजपा के साथ आ मिले।हालांकि, मौका देखकर वे एक बार फिर साल 2022 में भाजपा से अलग होकर महागठबंधन का हिस्सा बन गए। वे अब भी गुजरात बनाम स्थानीय नेता का राग समय-समय पर अलापते रहते हैं।

बंगाल में ममता बनर्जी

क्षेत्रवाद की आग भड़काने में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी भी पीछे नहीं हैं। साल 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के दौरान उन्होंने कहा था, “गुजराती (नरेंद्र मोदी और अमित शाह) यूपी और बिहार से गुंडे लाकर बंगाल पर कब्जा करने की कोशिश कर रहे हैं।” हावड़ा की एक चुनावी रैली में उन्होंने यह भी कहा था कि वे बंगाल को गुजरात नहीं बनने देंगी।

इसी तरह साल वह 2019 में राज्य में हुई हिंसा के लिए उन्होंने ‘बाहरी लोगों’ को जिम्मेदार ठहराया है। इसी तरह के क्षेत्रवाद को उन्होंने साल 2021 के चुनावों के दौरान भी बढ़ावा दिया। उन्होंने बंगाली समुदाय के भीतर भय पैदा करने की खूब कोशिश की। उन्होंने यहाँ तक कहा कि बंगाल की संस्कृति और भाषा को दूसरे राज्यों के प्रवासियों द्वारा नुकसान पहुँचाया जा रहा है।

यूपी में अखिलेश यादव की सपा और राहुल गाँधी की कॉन्ग्रेस

साल 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव और कॉन्ग्रेस के राहुल गाँधी ने अपनी-अपनी विरासत को बचाने के लिए गठबंधन किया और इस गठबंधन को ‘यूपी के लड़के’ के रूप में प्रचारित किया। चूँकि उस दौरान राहुल गाँधी भी अमेठी से सांसद थे और अखिलेश यादव यूपी के मुख्यमंत्री थे तो दोनों को खुद को यूपी के स्थानीय के रूप में प्रचारित किया।

इन दोनों नेताओं ने सीधे तौर पर तो नहीं, लेकिन पीएम मोदी, अमित शाह को परोक्ष रूप स बाहरी साबित करने की खूब कोशिश की थी। चुनावी रैलियों के दौरान वे दोनों नेताओं को गुजराती कहते थे। अखिलेश यादव ने उन्हें ‘गुजरात के गधे’ कहा था। इसका करारा जवाब देते हुए नरेंद्र मोदी ने कहा कि उन्हें गधे से प्रेरणा लेने पर गर्व है, जो बिना किसी पूर्वाग्रह और अपनी परवाह किए दिन रात अपने मालिक की सेवा करता है। मोदी ने कहा था, “देश की जनता मालिक है। मैं उनके लिए अथक रूप से काम करता हूँ और आगे भी करता रहूँगा।”

इस तरह देश में क्षेत्रीय दल अपनी राजनीतिक स्वार्थ के लिए क्षेत्रीयता की आग को खूब हवा देते रहे हैं। चाहे वह पंजाब हो या केरल, हर जगह भाजपा से मुकाबला करने के लिए वाजिब मुद्दों के अभाव में इस तरह के मुद्दे उठाए जाते रहे हैं। एमके स्टालिन ने भी Amul बनाम Aavin के नाम पर केंद्र को पत्र लिखकर अपने राज्य में एक और मुद्दे को हवा देने की कोशिश की है।

‘दाढ़ी वाले पत्नी को उठा ले गए, 12 लोगों ने रेप कर बना दिया फातिमा’: पाकिस्तान में हिंदुओं पर अत्याचार ऐसा, नवजातों को छोड़कर आए भारत

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों खासकर हिंदुओं के साथ होने वाली प्रताड़ना छिपी हुई नहीं है। लगातार वहाँ नाबालिग हिंदू बच्चियों को अगवा करने, जबर्दस्ती उनका निकाह और धर्मांतरण करने की खबरें आती ही रहती है। इस प्रताड़ना से जान बचाकर आए हिंदू भारत के अलग-अलग हिस्सों में शरणार्थी बनकर जिंदगी जीने को मजबूर हैं। राजस्थान के जोधपुर और जैसलमेर में हाल में इन शरणार्थियों के घरों को प्रशासन ने उजाड़ दिया था। इन कार्रवाइयों ने एक बार इनके दर्द को चर्चा में ला दिया है।

इसी कड़ी में दैनिक भास्कर ने पाकिस्तान के कुछ हिंदू शरणार्थियों से बात की है। इन्होंने अपनी जो आपबीती बताई है वह रूह कँपा देने वाली है। किसी की पत्नी के साथ गैंगरेप हुआ था तो कुछ को अपने नवजात शिशुओं को सीमा पार ही छोड़कर आना पड़ा। यह भी पता चला है कि पाकिस्तान में रह रहे अपने रिश्तेदारों की सुरक्षा को देखते हुए वे अपना दर्द बयाँ करने से भी डरते हैं।

पाकिस्तान से भारत आए हिंदुओं का दर्द

भीलजी राणा, जो रहीमयार खान में मजदूरी करते थे। उन्होंने पाकिस्तान के हालातों पर बात करते हुए आपबीती बताई। उन्होंने कहा कि उनकी बीवी खेतों मजदूरी कर रही थी जब अचानक दाढ़ी वाले कुछ लोग आए और उनकी पत्नी -बेटी को अपने साथ ले गए। कुछ समय बाद जानकारी आई कि उनकी पत्नी को ले जाकर 12-12 लोगों ने गैंगरेप किया। उसके बाद उसका नाम बदलवाकर फातिमा कर दिया। बहुत मिन्नत पर बेटी को छोड़ा गया। इसलिए भीलजी अपनी बच्ची को लेकर हिंदुस्तान आ गए। अब उनके पास सिर्फ पत्नी का पासपोर्ट साइट फोटो बचा है। उन्हें नहीं पता कि उनकी पत्नी जिंदा है या मर गई।

इसी तरह एक हिंदू महिला भी जैसलमेर में रहती है जिसका पाकिस्तान में दुष्कर्म हुआ। उसके दिमाग पर इस घटना का ऐसा असर हुआ कि महिला ने अपनी बेटी भी पाकिस्तान में रिश्तेदार के पास छोड़ दी और भागकर भारत आ गई। वहीं वजीर नाम का युवक जहाँ 7 दिन के बच्चे को छोड़कर भारत दौड़ा तो विजय को 3 दिन के बच्चे को पाकिस्तान में छोड़कर जोधपुर आना पड़ा। पाकिस्तानी हिंदुओं का कहना है कि उस मुल्क के हालात ऐसे हैं कि लोग सिर्फ वीजा मिलने की तलाश में हैं। मौका मिले तो वो संपत्ति तो क्या अपने बच्चे भी यहीं छोड़ भाग जाएँ।

आगे पाकिस्तान में रहने वाले एक परिवार से बातचीत का भी रिपोर्ट में हवाला दिया गया है। परिवार का शख्श बताता है कि उनकी 9वीं कक्षा में पढ़ने वाली बेटी को दबंग पुलिकर्मी का बेटा कट्टरपंथियों की मदद से उठाकर ले गया। घरवाले कुछ नहीं कर पाए। उन्हें ये तक नहीं पता बेटी के साथ हुआ क्या है। पाकिस्तान से आए एक हिंदू भागचंद भील कहते हैं वो लोग इज्जत बचाने के लिए सैंकड़ों परिवार तो अपना दर्द लेकर सामने ही नहीं आते क्योंकि उन्हें डर रहता है कि कहीं यहाँ बोलने से पाकिस्तान में रहने वाले उनके रिश्तेदारों पर अत्याचार न बढ़ जाए।

लगातार भारत में शरण ले रहे पाकिस्तानी हिंदू

बता दें कि पाकिस्तान में कट्टरपंथियों के आतंक के कारण अल्पसंख्यक लगातार वहाँ से भारत आ रहे हैं। रिपोर्ट में सीमांत लोक संगठन की स्टडी का उल्लेख है जो बताती है कि 1971 से करीबन 7 लाख पाकिस्तानी विस्थापित होकर राजस्थान आए हैं। लेकिन अफसोस यहाँ भी उन्हें अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए रोज संघर्ष करना पड़ता है। कुछ समय पहले राजस्थान में पाकिस्तानी हिंदुओं के घर से छत छीन ली गई थी। हालाँकि काफी विवाद के बाद आईएएस टीना डाबी ने इस मामले पर सुनवाई की।

न फाति​हा-न दुआ, न कोई फूल चढ़ाने आया: 40वें पर अतीक और अशरफ की कब्र को चादर तक न मिली, माफिया बीवी अब भी फरार

कभी माफिया अतीक अहमद प्रयागराज में खौफ का पर्याय था। वह चाहता तो शहर ठहर जाता। वह चाहता तो पीछे-पीछे हुजूम चल पड़ता। लेकिन 40वें पर अतीक और उसके भाई अशरफ की कब्र पर सन्नाटा पसरा रहा। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार दोनों की कब्र पर फूल चढ़ाने और चादरपोशी की रिवाज तक निभाने कोई नहीं आया।

इस्लाम में मौत के 40वें दिन की खासी मान्यता है। मृतक के परिजन, रिश्तेदार कब्र पर आकर चादरपोशी करते हैं। फूले चढ़ाते हैं। फातिहा पढ़ते हैं। मृतक के रूह के सुकून के लिए दुआ माँगते हैं। लेकिन खबरों की मानें तो गुरुवार (25 मई 2023) को ऐसा कुछ अतीक और अशरफ की कब्र पर देखने को नहीं मिला। प्रयागराज के जिस कसारी-मसारी कब्रिस्तान में माफिया भाइयों को दफनाया गया है, वहाँ सन्नाटा पसरा रहा।

पहले कहा जा रहा था कि अतीक की बीवी शाइस्ता परवीन और अशरफ की बीवी जैनब चालीसवें की रस्म अदायगी के लिए कब्रिस्तान आ सकती हैं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। फरवरी में उमेश पाल की हत्या के बाद से ही शाइस्ता फरार है। यूपी पुलिस ने अब उसे भी माफिया घोषित कर दिया है। वह शौहर को दफनाए जाने के दिन भी कब्रिस्तान नहीं आई थी। हालाँकि बाद में कुछ मीडिया रिपोर्टों में यह दावा किया गया था कि वह उस दिन प्रयागराज में ही थी। लेकिन पुलिस के कड़े बंदोबस्त की वजह से कब्रिस्तान नहीं गई।

अतीक के दो बेटे जेल में बंद हैं। दो बेटे सुधार गृह में हैं। उमेश पाल की हत्या में आरोपित बेटा असद पुलिस एनकाउंटर में ढेर हो चुका है। असद के एनकाउंटर के बाद भी शाइस्ता सामने नहीं आई थी। अतीक अहमद के कई अन्य रिश्तेदार भी फरार हैं। माफिया भाइयों को दफनाने के दिन ससुर हारुन और बहनोई उस्मान अहमद कब्रिस्तान आए थे। लेकिन चालीसवें पर वे भी नहीं आए।

गौरतलब है कि अतीक अहमद और अशरफ की शूटरों ने मीडिया के सामने गोली मारकर हत्या कर दी थी। 15 अप्रैल 2023 को माफिया भाइयों को लेकर पुलिस प्रयागराज के कॉल्विन हॉस्पिटल आई थी। यहीं मीडिया से बात कर रहे माफिया भाइयों को गोलियों से भूनकर शूटर्स ने सरेंडर कर दिया था। तीनों शूटर्स भी मीडियाकर्मी ही बनकर आए थे।

खम्मन के झील में नहीं लगेगी NTR की प्रतिमा, हाई कोर्ट ने लगाई रोक: भगवान श्रीकृष्ण की तरह दिखाए जाने पर जताई गई थी आपत्ति

तेलंगाना हाई कोर्ट ने आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एनटी रामा राव (NTR) की प्रतिमा लगाने पर रोक लगा दी है। प्रतिमा खम्मम शहर के लक्काराम झील में स्थापित की जानी थी। प्रतिमा में एनटीआर को भगवान श्रीकृष्ण की तरह दिखाए जाने को लेकर कई लोगों ने आपत्ति जताई थी। आदिभटला, कलापीतम, भारतीय यादव संघम और श्रीकृष्ण जेएसी की ओर से याचिका दायर कर अदालत से प्रतिमा की स्थापना पर रोक की माँग की गई थी।

अभिनेता से नेता बने एनटी रामा राव की मूर्ति तेलुगू एसोसिएशन ऑफ नॉर्थ अमेरिका की मदद से एनटी रामा राव विग्रह एरपातु समिति द्वारा बनवाई गई है। लक्काराम झील के बीच इसकी स्थापना की इजाजत मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (KCR) ने भी दे दी थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील चालकानी वेंकट यादव ने अनुमति पर सवाल उठाते हुए इसे कानून का उल्लंघन बताया। उन्होंने कहा कि सरकार के प्रधान सचिव (I & CAD विभाग) द्वारा प्रतिमा निर्माण की अनुमति वाला मेमो जारी किया गया जो कि उनके अधिकार क्षेत्र में आता ही नहीं है।

यादव ने आगे कहा कि प्रमुख सचिव के मेमो ने सुप्रीम कोर्ट के 2013 में जारी आदेश और 2016 में जारी सर्कुलर की भी अवहेलना की है। याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि सार्वजनिक स्थानों पर मूर्तियों के निर्माण की इजाजत का फैसला जिला कलेक्टर की देखरेख में मूर्ति समिति द्वारा लिया जाता है। इसके अलावा याचिकाकर्ताओं ने प्रतिमा के भगवान श्रीकृष्ण जैसे दिखने पर भी सवाल उठाया।

याचिकाकर्ताओं की तरफ से कहा गया कि इससे उनकी धार्मिक भावनाएँ आहत होती हैं। इसमें कोई शक नहीं कि एनटीआर एक अच्छे कलाकार थे और सभी उन्हें बहुत पसंद करते हैं। हम चाहते हैं कि उनकी प्रतिमा भगवान की तरह नहीं, बल्कि अभिनेता की तरह ही नजर आए।

दलीलों को सुनने के बाद कोर्ट ने अगली सुनवाई तक प्रतिमा स्थापित करने पर रोक लगा दी है। अदालत ने राज्य सरकार से इस पर जवाब माँगा है। मामले की अगली सुनवाई 6 जून को होगी। बता दें 28 मई 2023 को एनटीआर का जन्म शताब्दी समारोह है।

मेरठ में वंदे मातरम् गाने से ओवैसी के पार्षदों ने किया इनकार, BJP सदस्यों ने खड़े होने को कहा तो मारपीट पर उतर आए AIMIM के प्रतिनिधि: Video वायरल

उत्तर प्रदेश के मेरठ (Meerut, UP) में निगम और नगर पंचायत का शपथ ग्रहण समारोह के दौरान वंदेमातरम् के गान का AIMIM (All India Majlis‑e‑Ittehadul Muslimeen) के सदस्यों ने विरोध किया। इसको लेकर भाजपा के सदस्यों के साथ उनकी जमकर हाथापाई हुई।

मेरठ के चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय स्थित नेताजी सुभाषचंद्र बोस ऑडिटोरियम में शुक्रवार (26 मई 2023) को शपथ ग्रहण का समारोह वंदेमातरम से शुरू हुआ। इस दौरान AIMIM के सदस्य अपनी सीट पर बैठे रहे। इसका विरोध करते हुए भाजपा के सदस्यों ने खड़े होने के लिए कहा तो वे भड़क गए।

इसके बाद भाजपा और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के नेताओं के बीच तूतू-मैंमैं और हाथापाई होने लगी। हालात को देखते हुए पुलिसकर्मी आगे आए और उन्होंने AIMIM एवं भाजपा के सदस्यों को बाहर निकाला। इसके बाद AIMIM के सदस्यों ने समारोह का बहिष्कार कर दिया और वहाँ से चले गए।

शपथ ग्रहण के दौरान मेरठ की कमिश्नर जे सेल्वा कुमारी मेयर और पार्षदों को शपथ दिलाने आई थीं। वह मंच पर बैठी हुई थीं। वहीं, जिलाधिकारी और एसपी ट्रैफिक पुलिस बल के साथ व्यवस्था सँभाले हुए थे। AIMIM के सदस्यों ने कहा कि वे राष्ट्रगान गा लेंगे, भारत हिंदुस्तान जिंदाबाद बोल देंगे, लेकिन वंदेमातरम नहीं गाएँगे।

AIMIM के सदस्यों ने तर्क दिया कि यह कार्यक्रम भाजपा का नहीं है। यह मेयर और पार्षदों का कार्यक्रम है। उन्होंने आरोप लगाया कि शपथ ग्रहण समारोह के दौरान भाजपा ने गुंडागर्दी की और वो भी जिलाधिकारी और पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में की।

वहीं, भाजपा के पार्षदों का कहना है कि ये लोग जिन्ना के मानने वाले लोग हैं… ओवैसी के लोग हैं… जो देश का बँटवारा चाहते हैं। उन्होंने कहा कि जो वंदेमातरम नहीं गाएगा, उस मुँहतोड़ जवाब दिया जाएगा।

देश के सबसे बड़े सेक्स कांड पर जुलाई में आ रही ‘अजमेर 92’: 100+ छात्राओं से हुआ था रेप-250 की बँटी थी न्यूड फोटो, 28 परिवार रातोंरात हो गए लापता

90 के दशक में अजमेर में हुए सेक्स और ब्लैकमेलिंग कांड पर बनीं ‘अजमेर 92’ इस साल जुलाई में रिलीज होने वाली है। यह घोषणा रिलायंस एंटरटेनमेंट ने की है। उन्होंने फिल्म का पोस्टर जारी कर बताया कि अजमेर 92 इस साल 14 जुलाई को आएगी।

पोस्टर में देख सकते हैं कि इस पर 28 परिवारों के लापता होने की बात, हत्याओं का जिक्र, 250 कॉलेज गर्ल्स की न्यूड फोटो बँटने की खबरें हाईलाइट है। इस फिल्म में करण वर्मा, सुमित सिंह, सायजी शिंदे और मनोज जोशी नजर आएँगे। फिल्म का निर्देशन पुष्पेंद्र सिंह ने किया है। वहीं इसके प्रोड्यूसर उमेश कुमार हैं।

सीरीज की शूटिंग दो साल पहले शुरू हुई थी। उस समय हिंदू संगठनों ने चेतावनी दी थी कि अगर इस फिल्म में तथ्यों से छेड़छाड़ हुई तो वो लोग आंदोलन करेंगे।

अजमेर 1992 कांड

बता दें कि अजमेर का ब्लैकमेलिंग कांड का खुलासा अप्रैल 1992 में हुआ था। इसे दुनिया के सामने लाने वाले पत्रकार संतोष कुमार थे। इस रेप और ब्लैकमेलिंग कांड की शिकार अधिकतर स्कूल और कॉलेज जाने वाली लड़कियाँ थीं। लोग कहते हैं कि इनमें से अधिकतर ने तो आत्महत्या कर ली।

जब ये केस सामने आया था, तब अजमेर कई दिनों तक बन्द रहा था। लोग सड़क पर उतर गए थे और प्रदर्शन चालू हो गए थे। जानी हुई बात है कि आरोपितों में से अधिकतर समुदाय विशेष से थे और पीड़िताओं में सामान्यतः हिन्दू ही थीं।

इस केस में 18 को आरोपित बनाया गया था। इनमें एक फारूक चिश्ती भी था जो कभी कॉन्ग्रेस का नेता हुआ करता था। इस मामले में 200 से भी अधिक पीड़िताएँ थीं लेकिन कुछ ने ही बयान दिया था। अफसोस, इनमें से शायद ही कोई अपने बयान पर कायम रही हों।

कहते हैं उस वक़्त अजमेर में 350 से भी अधिक पत्र-पत्रिका थी और इस सेक्स स्कैंडल के पीड़ितों का साथ देने के बजाए स्थानीय स्तर के कई मीडियाकर्मी उल्टा उनके परिवारों को ब्लैकमेल किया करते थे। आरोपितों को छोड़िए, इस पूरे मामले में समाज का कोई भी ऐसा प्रोफेशन शायद ही रहा हो, जिसने एकमत से इन पीड़िताओं के लिए आवाज़ उठाई हो।

आरोप यह भी है कि जिस लैब में फोटो निकाले गए, जिस टेक्नीशियन ने उसे प्रोसेस किया, जिन पत्रकारों को इसके बारे में पता था- उन सबने मिल कर अलग-अलग ब्लैकमेलिंग का धँधा चमकाया। पीड़ित लड़कियों और उनके परिवारों से सबने रकम ऐंठे। ऐसे में भला कोई न्याय की उम्मीद करे भी तो कैसे? कभी 29 पीड़ित महिलाओं ने बयान दिया था, आज गिन कर इनकी संख्या 2 है। सिस्टम ने हर तरफ से इन्हें तबाह किया।