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Sui Generis दिल्ली मतलब क्या? केंद्र शासित दिल्ली ही जनता के हक में क्यों? केजरीवाल और LG की लड़ाई में क्या कहता है संविधान

भारत सरकार ने दिल्ली के शासन की संवैधानिक योजना में विसंगति को दूर करने के लिए 19 मई 2023 को एक अध्यादेश जारी किया। यह विसंगति देश की राजधानी और एक केंद्र शासित प्रदेश के रूप में हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के फैसले से उत्पन्न हुआ था। भारत सरकार ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका भी दायर की है।

इस अध्यादेश को बाद में संसद द्वारा एक विधेयक के रूप में पेश किया जाएगा। इस अध्यादेश की उत्पत्ति संविधान पीठ के फैसले में ही हुई है, जो पैरा 164 ‘सी’ और ‘एफ’ पर अपने आदेश में समवर्ती और राज्य में सभी मामलों पर विधायी क्षमता देता है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के संबंध में यह रेखांकित करता है कि राज्य और समवर्ती सूची के संबंध में एनसीटीडी की कार्यकारी शक्ति संसद द्वारा अधिनियमित कानून द्वारा भारत संघ को प्रदत्त कार्यकारी शक्ति के अधीन होगी।

पैरा 164 ‘सी’ में कहा गया है, “एनसीटीडी की विधानसभा सूची-द्वितीय की स्पष्ट रूप से बहिष्कृत प्रविष्टियों को छोड़कर सूची-द्वितीय और सूची-तृतीय में प्रविष्टियों पर सक्षम है। सूची- I में प्रविष्टियों के अलावा, एनसीटीडी के संबंध में सूची- II और सूची- III में सभी मामलों पर संसद के पास विधायी शक्ति है…।”

पैरा 164 ‘एफ’ में है, “सूची-द्वितीय और सूची-तृतीय में प्रविष्टियों के संबंध में एनसीटीडी की कार्यकारी शक्ति संसद द्वारा अधिनियमित कानून द्वारा स्पष्ट रूप से संघ को प्रदान की गई कार्यकारी शक्ति के अधीन होगी।”

इनके अलावा, पैरा संविधान पीठ ने पैरा 95 में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है, “यदि संसद किसी भी विषय पर कार्यकारी शक्ति प्रदान करने वाला कानून बनाती है, जो एनसीटीडी के डोमेन के भीतर है, तो उपराज्यपाल की कार्यकारी शक्ति को इस हद तक संशोधित किया जाएगा, जैसा कि उस कानून में प्रदान किया गया। इसके अलावा, जीएनसीटीडी अधिनियम की धारा 49 के तहत उपराज्यपाल और मंत्रिपरिषद को विशिष्ट अवसरों पर राष्ट्रपति द्वारा जारी विशेष निर्देशों का पालन करना चाहिए।”

इस अध्यादेश को लाने में केंद्र सरकार ने दिल्ली, जो कि भारत की राजधानी और एक केंद्र शासित प्रदेश है, के शासन के संबंध में उसे भारतीय संविधान और सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ द्वार प्रदान किए गए अधिकारों का प्रयोग किया है।विधेयक/अध्यादेश उपरोक्त प्रस्तावों को प्रभावी करने का प्रयास करता है और निम्नलिखित बात को संबोधित करना चाहता है:

• सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ का निर्णय संविधान द्वारा परिकल्पित भारत के विचार पर चोट करता है और इसका उल्लंघन करते हुए बुनियादी संरचना सिद्धांत की धज्जियाँ उड़ाता है।

• भारत के संविधान का अनुच्छेद 1 भारत के क्षेत्र को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के रूप में परिभाषित करता है, और कुछ नहीं। यह केंद्र शासित प्रदेशों को पूरी तरह से संघ द्वारा शासित होने का प्रावधान करता है। संविधान पीठ का निर्णय भारत के संविधान के अनुच्छेद 1 की अवहेलना करता है, जिसमें दिल्ली के लिए एक विशेष ‘sui generis’ (एक अद्वितीय नई श्रेणी) श्रेणी सम्मिलित करता है।

• इस ‘सूई जेनेरिस’ – दिल्ली की नई और अनूठी स्थिति को परिभाषित करते हुए, अदालत ने एक नए वर्ग के क्षेत्र का निर्माण किया है, जो अब तक अस्तित्व में नहीं था और यह संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत है।

• अगर कोई इस बात से सहमत भी हो कि दिल्ली की स्थिति ‘सूई जेनेरिस’ है तो इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि यह एक केंद्र शासित प्रदेश बना हुआ है। केंद्र शासित प्रदेश (यूटी) के रूप में दिल्ली की यह स्थिति जानबूझकर संवैधानिक डिजाइन द्वारा है। केंद्र शासित प्रदेश और भारत की राजधानी के रूप में इसकी स्थिति, किसी अन्य इकाई के बजाय भारत संघ द्वारा शासन की माँग करती है।

• संविधान का अनुच्छेद 239AA, जो दिल्ली को एक विधानसभा प्रदान करता है, स्थानीय आकांक्षाओं को संबोधित करने के लिए था और यह किसी भी तरह से केंद्र सरकार के मौजूदा नियंत्रण पर स्थानीय सरकार को केंद्र शासित प्रदेश का नियंत्रण देने का इरादा नहीं था।

• संविधान का भाग XIV स्पष्ट रूप से ‘सेवाओं’ को संघ या राज्यों के अधिकार क्षेत्र में रखने का प्रावधान करता है न कि केंद्र शासित प्रदेशों के। दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश की सरकार को ‘सेवाओं’ का नियंत्रण देकर और दिल्ली को एक राज्य के रूप में मानते हुए संविधान पीठ का आदेश संविधान की मूल संरचना के विपरीत है। संविधान विशेष रूप से संघ और राज्यों के बीच शक्तियों के विभाजन का प्रावधान करता है। जहाँ तक केंद्र शासित प्रदेशों का संबंध है, यह संघ को विशेष अधिकार देता है।

• सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ का निर्णय स्पष्ट और प्रभावी रूप से उपराज्यपाल का अपमान करता है, संविधान के अनुच्छेद 239 द्वारा परिभाषित भारत के राष्ट्रपति के निहितार्थ है। राज्यों के राज्यपालों के विपरीत संविधान ने उपराज्यपाल को केंद्र शासित प्रदेशों के कार्यकारी प्रमुख और प्रशासक जानबूझकर बनाया किया। राज्यों के राज्यपालों के विपरीत, उपराज्यपाल को कार्यकारी शक्तियाँ देने में संविधान ने राज्यों के राज्यपालों को दी गई प्रतिरक्षा प्रदान नहीं की है। संघ की ओर से कार्यकारी शक्तियों को धारण करने के लिए उपराज्यपालों के लिए यह संवैधानिक डिजाइन था और इसलिए, राज्यपालों की तुलना में उसे अधिक ‘शक्तिशाली’ होना चाहिए। संविधान पीठ के फैसले ने उपराज्यपाल को राज्यपालों के साथ बराबरी करने के संविधान की भावना पर आघात किया है और उन्हें ‘सेवाओं’ के मामले में मंत्रिपरिषद की सहायता एवं सलाह के लिए बाध्य किया है, जो केवल संघ से संबंधित हो सकते हैं।

• संविधान पीठ का निर्णय विधायी प्राधिकरण के कार्यकारी प्राधिकरण के साथ सह-अस्तित्व के बुनियादी एवं समय परीक्षित सिद्धांत का भी उल्लंघन करता है। इसका अर्थ है कि सरकार के पास केवल उन मामलों और विषयों पर कार्यकारी शक्तियाँ होंगी, जिन पर वह कानून भी बना सकती है। संविधान पीठ का निर्णय, भारत की संसद को केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली से संबंधित ‘सेवाओं’ के मामले में कानून बनाने की शक्ति देता है। हालाँकि, यह विरोधाभासी और असंवैधानिक रूप से केंद्र सरकार से हटाकर केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली सरकार को ‘सेवाओं’ पर नियंत्रण की कार्यकारी शक्तियाँ भी देता है।

युवकों को पढ़ाया जा रहा कट्टरपंथ, हो रही स्टिकी बम की सप्लाई: G-20 बैठक से पहले NIA ने जम्मू-कश्मीर के 7 जिलों में मारी रेड, 20 दिन में 70 ठिकानों पर छापेमारी

कश्मीर के श्रीनगर में होने वाले G- 20 सम्मेलन से पहले राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने पुलवामा और हंदवाड़ा सहित कुल 7 जिलों में छापेमारी की है। यह छापेमारी आतंकी नेटवर्क से जुड़े लोगों के ठिकानों पर की गई है। जाँच एजेंसी को इनपुट मिले थे कि आतंकी संगठनों से जुड़े कुछ ओवर ग्राउंड संदिग्ध युवाओं को कट्टरपंथ का पाठ पढ़ा रहे हैं और उन्हें स्टिकी बम सप्लाई कर रहे हैं। NIA की यह कार्रवाई टेरर फंडिग से जुड़े लोगों पर भी है। यह छापा शनिवार (20 मई 2023) को पड़ा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक NIA ने दक्षिण कश्मीर के पुलवामा में कई गाँवों में एक साथ दबिश दी है। NIA को जमात ए इस्लामी से जुड़े उन लोगों की तलाश है जो घाटी में आतंकी गतिविधियों के लिए आने वाली फंडिंग में किसी न किसी रूप में शामिल हैं। NIA के साथ कश्मीर पुलिस बल और CRPF के जवान मौजूद हैं। बताया जा रहा है कि NIA की टीमें 15 अलग-अलग लोकेशन पर पहुँची हैं। ये लोकेशन अवंतीपुरा, पुँछ, अनंतनाग, श्रीनगर और कुपवाड़ा आदि स्थानों पर हैं। टेरर फंडिंग केस में NIA द्वारा पहले से ही FIR दर्ज है जिसमें पहले भी गिरफ्तारियाँ की गईं हैं।

हालाँकि इस छापेमारी में हुई गिरफ्तारी या बरामद सामान आदि की जानकारी अभी सार्वजानिक नहीं हुई है। बताते चलें कि जाँच और सुरक्षा एजेंसियाँ पिछले 20 दिनों में जम्मू और कश्मीर मिला कर कुल 70 जगहों पर छापेमारी कर चुकी हैं। इस कार्रवाई में आतंकी संगठनों से जुड़े कई ओवरग्राउंड और अंडरग्राउंड संदिग्ध पकड़े गए है। इसी के साथ NIA ने आतंकियों को की जाने वाली कई फंडिंग सोर्स को भी ट्रेस किया है।

गौरतलब है कि G 20 सम्मेलन के दौरान 22 से 24 मई 2023 के बीच एक मीटिंग कश्मीर के श्रीनगर में भी प्रस्तावित है। यह मीटिंग श्रीनगर के शेर ए कश्मीर इंटरनेशनल कांफ्रेस सेंटर में आयोजित होगी। इस मीटिंग में G 20 टूरिज़्म ग्रुप के लोग हिस्सेदारी करेंगे। इस आयोजन के लिए सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद किया गया है।

ईसाई रीति-रिवाज और पवित्र तेल से बना राजा: जो चले थे ‘ज्ञान का उजियारा’ देने… उनका लोकतंत्र आज अंधेरे में

अंग्रेज वर्षों से भारत को येन-केन प्रकारेण उपहास का पात्र बनाते रहते हैं। वे अक्सर हिंदू धार्मिक प्रथाओं-परम्पराओं, सामाजिक रीति-रिवाजों और अनुष्ठानों को लक्षित करते हुए टीका-टिप्पणी करते रहते हैं। वे उदारवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के प्रति भारतीयों की प्रतिबद्धता पर सवाल उठाते हुए भारत को शासन-प्रशासन के बारे में गाहे-बगाहे सलाह भी देते हैं। हालाँकि, वे शायद ही कभी अपने स्वयं के समाज की निष्पक्ष और निर्मम समीक्षा करते हैं।

हाल ही में 6 मई 2023 को सम्पन्न चार्ल्स तृतीय का राज्याभिषेक समारोह एक ऐसा ही प्रसंग है। इस समारोह में एक 74 वर्षीय व्यक्ति को औपचारिक रूप से राजा की पदवी प्रदान की गई। यह पद उसे वंशानुगत प्राप्त हुआ है। माँ से बेटे को हस्तांतरित यह पद ज्येष्ठाधिकार की सामंती परंपरा द्वारा वैधता और वर्चस्व प्राप्त करता है। यह मध्यकालीन परम्परा एक परिवार विशेष को यूनाइटेड किंगडम और अन्य राष्ट्रमंडल देशों का राज्य प्रमुख होने का वंशानुगत अधिकार प्रदान करती है। लोकतांत्रिक समाज में ऐसी मध्यकालीन व्यवस्था को वैधता प्रदान करना और उसका धूम-धड़ाके से प्रदर्शन करना हास्यास्पद और चिंतनीय है। उल्लेखनीय है कि नेपाल जैसे छोटे और अपेक्षाकृत छोटे और नवजात लोकतंत्र ने भी ऐसी सामंती व्यवस्था को विदाई दी है।

यह राज्याभिषेक समारोह सम्राट के शासन के दैवीय अधिकार को पुष्ट करता है, जोकि आधुनिक उदार लोकतंत्र के सिद्धांतों के प्रतिकूल है। एक उदार लोकतंत्र के भीतर एक वंशानुगत संवैधानिक राजतंत्र की उपस्थिति और महिमामंडन उसमें अंतर्निहित विरोधाभास का प्रकटन है। यह सामंती समारोह अपने आप में एक अनपेक्षित, अनावश्यक और अप्रासंगिक कार्यक्रम था। यह ईसाई पंथ के प्रतीकों और परम्पराओं से भी परिपूर्ण था। समारोह के दौरान, सिंहासनारूढ़ राजा ने इंग्लैंड के चर्च और उसके कानून को बनाए रखने की शपथ ली। पवित्र तेल से पादरी द्वारा राजा का अभिषेक किया गया।

‘क्राउन ऑफ सेंट एडवर्ड’ के रूप में जाना जाने वाला मुकुट कैंटरबरी के आर्कबिशप और इंग्लैंड के चर्च के धर्मगुरु जस्टिन वेल्बी द्वारा राजा को पहनाया गया। इस समारोह में तमाम पूर्व-शासित राज्यों को आमंत्रित किया गया था। इन राज्यों के प्रतिनिधियों ने समारोह में एकसाथ प्रण लिए, “मैं कसम खाता हूँ कि मैं आपकी महिमा के प्रति, और आपके उत्तराधिकारियों और उपाधिकारियों के प्रति सच्ची निष्ठा अदा करूँगा। हे भगवान, मेरी मदद करें।” मतलब सभी ने मध्यकालीन शैली में राजा और राजतन्त्र में अपनी आस्था और निष्ठा व्यक्त की।

ऐसी प्रथा आज के समय में अत्यंत बेतुकी है। इस अवसर पर अन्य धर्मों और राज्यों के प्रतिनिधियों से उपहार प्राप्त करना औपनिवेशिक मानसिकता को दर्शाता है। यह ईसाई धर्म के वर्चस्व और अन्य सभी धर्मों की दोयमता को भी प्रकट करता है। यह राज्याभिषेक ईसाई धर्म के अनुष्ठानों और राजा या राज्य-प्रमुख के अपने ईसाई विश्वासों का प्रकटन करता है।

जिस देश की अघोषित राष्ट्रीय विचारधारा धर्मनिरपेक्ष उदारवाद है, उस देश में पंथ विशेष को सार्वजनिक जीवन और राजकीय कार्यक्रमों में प्रदर्शित करना विरोधाभापूर्ण है। मत-पंथ और राज्य संवेदनशील विषय हैं, जिन्हें सावधानीपूर्वक अलग रखने की आवश्यकता होती है। मत-पंथ और राज्य को मिलाना आपत्तिजनक है और सामाजिक विभाजन, अलगाव और असहिष्णुता को जन्म दे सकता है।

यह वास्तव में हैरान करने वाला है कि रिकॉर्ड स्तर पर बेरोजगारी और जीवनयापन के गंभीर संकट से त्रस्त देश में करदाताओं ने दुनिया के सबसे धनी व्यक्तियों में से एक के राज्याभिषेक को वित्त पोषित किया। इस कार्यक्रम के व्यय का अनुमान $100 मिलियन से अधिक है। एक अनिर्वाचित, वंशानुगत राज्य प्रमुख पर इतना सार्वजनिक धन खर्च किया जा रहा है, यह अनैतिक और अकल्पनीय है। नि:संदेह, ब्रिटेन को अपने मध्यकालीन अतीत की धूमधाम के बजाय वर्तमान और भविष्य की आवश्यकताओं और चुनौतियों का संज्ञान लेकर उनके समाधान की दिशा में सक्रिय होना चाहिए।

तथाकथित शाही परिवार की लोकप्रियता हर बीतते दिन के साथ कम होती जा रही है। इसकी समकालीन शक्ति इसकी शानोशौकत और तमाशेबाजी में ही निहित है। लंदन की सड़कों पर भी यह भावना प्रदर्शित हुई, जहाँ प्रदर्शनकारियों ने “नॉट माय किंग” के नारे लगाए। शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को लंदन की सड़कों से केवल एक विपरीत विचार व्यक्त करने के लिए जबरन हटा दिया जाना निराशाजनक अनुभव था। उनके शांतिपूर्ण विरोध को दबाने के लिए नए सार्वजनिक व्यवस्था कानूनों का इस्तेमाल ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पश्चिमी समाज के उदारवादी दावों’ की कलई खोलता है।

यूनाइटेड किंग्डम अक्सर अन्य देशों की उनके प्रचारवादी और अधिनायकवादी दृष्टिकोण के लिए आलोचना करता है, लेकिन वह अपने आत्म-परीक्षण में प्रायः असमर्थ रहता है। “जो शीशे के घरों में रहते हैं, उन्हें दूसरों पर पत्थर नहीं फेंकने चाहिए” यह कहावत ब्रिटेन के तथाकथित संभ्रांत, उदार और धर्म-निरपेक्ष समाज के लिए सही सबक और संदेश है। निश्चय ही, कथनी और करनी का द्वैत उनकी नैतिक आभा को धूमिल करता है।

लंबे औपनिवेशिक अतीत और श्रेष्ठता-बोध के बावजूद ब्रिटेन भारत की समृद्ध और वैविध्यपूर्ण संस्कृति, विकसित लोकतंत्र और  राजतन्त्र की समूल समाप्ति से बहुत कुछ सीख सकता है। निर्वाचित नेताओं/शासकों की अवधारणा (गण-व्यवस्था) प्राचीन भारत की सामान्य विशेषता थी, जिसे बहुत बाद में शेष विश्व ने भी अपनाया। भारत का पूर्ण विकसित संसदीय लोकतंत्र प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की गारंटी देता है। शासन को जवाबदेह, संवेदनशील और पारदर्शी बनाता है। भारतीय लोकतंत्र किसी भी प्रकार के भेदभाव के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करता है (जैसा कि अनुच्छेद 15 में कहा गया है) और गणतंत्रवाद, कानून के समक्ष समानता, और मत-पंथ और राज्य के स्पष्ट अलगाव जैसे मूल्यों में आस्था रखते हुए उनका कार्यान्वयन भी करता है।

ये सिद्धांत भारतीय संविधान की आत्मा, आधुनिक भारतीय राज्य की नींव और भारतीय संस्कृति के सनातन मूल्य हैं। भारत के राष्ट्रपति “संविधान के संरक्षण, रक्षा और बचाव” की शपथ लेते हैं, जबकि ब्रिटिश सम्राट ” स्वधर्म की रक्षा” की शपथ लेते हैं। ब्रिटेन मध्यकालीन राजशाही के साथ-साथ लोकतांत्रिक प्रणाली का ‘कॉकटेल’ है। लोकतंत्र केवल एक राजनीतिक प्रणाली अथवा संरचना मात्र नहीं है; यह किसी भी राष्ट्र की आत्मा है। यह इस विश्वास पर आधारित है कि हर इंसान की जरूरतें और आकांक्षाएँ समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता, समानता की भावना और शोषणमुक्त दुनिया बनाने की इच्छा ने सरकार के लोकतांत्रिक स्वरूप को जन्म दिया।

भारतीय इतिहास में विभिन्न युगों के दौरान, नागरिक समाज की यह गहन विचारणा स्पष्ट रूप से दिखाई देती रही है, जिसने लंबी पराधीनता के बावजूद भारत को लोकतंत्र का पालना बनाया है। ब्रिटेन में मौजूद रॉयल्टी और नोबल्टी और हाउस ऑफ लॉर्ड्स और हाउस ऑफ कॉमन्स जैसे सामाजिक/राजनीतिक पदानुक्रम लोकतंत्र की भावना के विरुद्ध हैं। कुल मिलाकर, भारत का लोकतांत्रिक अनुभव ब्रिटेन को समावेशिता बढ़ाने, संवैधानिक मूल्यों/व्यवस्थाओं को दृढ़ करने, सांस्कृतिक बहुलता और विविधता का सम्मान करने की दिशा में मार्गदर्शक अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। भारत के लोकतांत्रिक सिद्धांतों और प्रथाओं से सीखकर ब्रिटेन अपनी खुद की लोकतांत्रिक व्यवस्था को और समृद्ध और सुदृढ़ कर सकता है।

चीन का कर्जा चुकाते-चुकाते पाकिस्तान कंगाली की कगार पर: रिपोर्ट में खुलासा, जानें कैसे दर्जन भर देशों पर ड्रैगन कर रहा अजगर की तरह कब्जा

चीन के कर्ज की जाल में फँसकर भारत के पड़ोसी देश श्रीलंका और पाकिस्तान आर्थिक रूप से कंगाल होने की हालत में पहुँच गए हैं और अराजकता झेल रहे हैं। हालाँकि, ये दोनों अकेले नहीं है। ऐसे लगभग एक दर्जन देश विदेशी ऋण के भार तले दबकर कराह रहे हैं और ध्वस्त होने के कगार पर आ पहुँचे हैं।

ये सारे देश गरीब हैं और अरबों डॉलर के विदेशी ऋण लिए हुए हैं। इन देशों में से अधिकांश को ऋण देने वाला कोई और नहीं, बल्कि चीन ही है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा ऋणदाता देश है। उसकी गलत ऋणनीति और भारी ब्याज दर के कारण ऋण लेने वाला देश दिवालिया होने के कगार पर पहुँच जाता है और फिर चीन शर्तों पर समझौते करता है। जैसा कि श्रीलंका में देखने को मिला।

श्रीलंका चीन के ऋण-जाल में फँसकर ऐसी स्थिति में जा पहुँचा कि उस ऋण का ब्याज चुकाने के लिए उसके पास पैसे नहीं बचे। वह दिवालिया हो गया। अंत में चीन ने उस पर दबाव डालकर हंबनटोटा बंदरगाह को 100 वर्षों की लीज पर ले लिया। यहाँ से चीन हिंद क्षेत्र में भारत सहित अन्य देशों की जासूसी एवं अन्य गतिविधियों को अंजाम देता है।

इस समय जिन दर्जन भर देशों पर चीन की मार पड़ी है, उनमें ज्यादातर गरीब और अफ्रीका से ताल्लुक रखने वाले देश हैं। वहीं, चीन से सबसे अधिक ऋण लेने वाले देशों में पाकिस्तान, केन्या, जाम्बिया, लाओस और मंगोलिया हैं। इन देशों को प्राप्त होने वाले राजस्व का अधिकांश हिस्सा ऋणों के भुगतान में चले जाते हैं। इसके कारण शिक्षा, अस्पताल, सड़क, बिजली, खाद्यान्न पर सरकार खर्च नहीं कर पाती।

अंतरराष्ट्रीय न्यूज एजेंसी एसोसिएटेड न्यूज के अनुसार, चीन जिन देशों को ऋण देता, उनसे ऋण की शर्तों को गोपनीय रखने का दबाव डालता है और खुद भी इसे कभी दुनिया के सामने नहीं आने देता। चीन ऋण माफ करने में भी कभी इच्छा जाहिर नहीं करता, बल्कि इसके लिए वह सौदेबाजी करता है। गोपनीयता को लेकर दूसरे मददगार देश सामने नहीं आ पाते।

कर्ज के जाल में फँसे कई देश अपने कुल विदेशी ऋण का आधा से अधिक अकेले चीन से लिए हुए हैं। पाकिस्तान में लाखों कपड़ा श्रमिकों को हटा दिया गया है, क्योंकि देश पर बहुत अधिक विदेशी कर्ज है और बिजली एवं मशीनों को चालू रखने का जोखिम वह नहीं उठा सकता है।

केन्या सरकार ने विदेशी ऋण का भुगतान करने के लिए हजारों कर्मचारियों की तनख्वाह रोक दी है, इस पैसे से ऋण का भुगतान किया जा सके। वहाँ के राष्ट्रपति के मुख्य आर्थिक सलाहकार ने पिछले महीने ट्वीट किया, ‘वेतन या डिफ़ॉल्ट? जो आप लेना चाहते हैं, लें’।

दक्षिण अफ्रीकी देश जाम्बिया का एक केस स्टडी में सामने आया कि वहाँ की सरकार ने पिछले दो दशकों में बाँधों, रेलवे और सड़कों के निर्माण के लिए चीन की सरकारी बैंकों से अरबों डॉलर उधार लिया। इससे ज़ाम्बिया की अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिला, लेकिन विदेशी ब्याज भुगतान भी बढ़ गया। इसके कारण सरकार के पास कम पैसे बचे और सरकार को स्वास्थ्य देखभाल, सामाजिक सेवाओं और बीज और उर्वरक के लिए किसानों को सब्सिडी पर खर्च में कटौती करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

ज़ाम्बिया के दिवालिया होने के कुछ महीनों बाद शोधकर्ताओं ने पाया कि उस पर चीनी राज्य के स्वामित्व वाले बैंकों का 6.6 बिलियन डॉलर (6.6 अरब डॉलर) का बकाया है, जो उस समय की तुलना में यह रकम दोगुना थी। इतना ही नहीं, यह रकम देश के कुल ऋण का लगभग एक तिहाई हिस्सा था।

एपी ने विश्लेषण में पाया कि दर्जन भर देशों में से 10 में विदेशी नकदी भंडार एक वर्ष में औसतन 25% कम हो गया। पाकिस्तान और कांगो का विदेशी मुद्रा भंडार 50% से अधिक तक खत्म हो चुका है। बेलआउट के बिना कई देशों के पास भोजन, ईंधन और अन्य आवश्यक आयातों के भुगतान के लिए विदेशी नकदी के केवल कुछ महीने के लिए बचे हैं। मंगोलिया के पास आठ महीने का समय बचा है। पाकिस्तान और इथियोपिया के पास लगभग दो महीने का।

विशेषज्ञों का अनुमान है कि जब तक चीन गरीब देशों को अपने ऋणों पर अपने रुख को नरम करना शुरू नहीं करता है, तब तक अधिक चूक और राजनीतिक उथल-पुथल की लहर चल सकती है। हार्वर्ड के अर्थशास्त्री केन रोगॉफ ने कहा, “दुनिया के कई हिस्सों में चीन अंदर तक पहुँच गया है। इसका भू-राजनीतिक स्थिरता पर दीर्घकालिक प्रभाव हो सकता है।”

चीन ने रोड एवं बेल्ट इनिशिएटिव (BRI) के लिए मैटेरियल आदि की आपूर्ति और उस काम को पूरा करने के लिए पैसे का इंतजाम करने के लिए ऋण देने में तेजी लाई थी। इस दौरान कई देशों ने चीन से खूब ऋण लिया। कुछ समय बाद इन देशों ने पाया कि वे ऋण के जाल में भयानक रूप से फँस चुके हैं।

उन्हें डर था कि पुराने ऋणों पर और अधिक ऋण लेने से वे क्रेडिट रेटिंग में नीचे चले जाएँगे और भविष्य में उधार लेना उनके लिए और अधिक महँगा हो जाएगा। इसके बाद चीन ने बुनियादी ढाँचे के विकास वाली शेल कंपनियाँ स्थापित कीं और इसके बदले ऋण दिया। इस दौरान ऋणग्रस्त देशों को अपने बहीखातों में नए ऋण को डालने से बचने की अनुमति मिली।

उदाहरण के लिए, ज़ाम्बिया में दो चीनी बैंकों से एक विशाल पनबिजली बाँध बनाने के लिए शेल कंपनी को 1.5 अरब डॉलर का ऋण दिया गया। इस ऋण को वर्षों तक देश के बहीखातों में दर्ज नहीं किया गया। ऋण लेने वाले देश चाड की स्थिति भी इससे अलग नहीं है।

इंडोनेशिया में रेलवे के निर्माण में मदद के लिए 4 अरब अमेरिकी डॉलर का चीनी ऋण भी कभी भी सार्वजनिक सरकारी खातों में नहीं आया। यह सब कुछ वर्षों बाद सामने आया, जब इंडोनेशियाई सरकार को 1.5 बजट डॉलर से अधिक के बजट से दो बार रेलमार्ग को उबारने के लिए मजबूर होना पड़ा।

इतना ही नहीं। चीनी शेल कंपनियों द्वारा बनाई गई परियोजनाओं की गुणवत्ता भी बेहद खराब रही है। युगांडा और इक्वाडोर में पनबिजली संयंत्रों में दरारें दिखाई दे रही हैं। पाकिस्तान में एक बिजली संयंत्र को इस डर से बंद करना पड़ा कि यह गिर सकता है। केन्या में खराब योजना और धन की कमी के कारण रेलवे का अंतिम प्रमुख हिस्सा नहीं बनाया जा सका।

जाँच में यह पाया गया कि चीन ऋण लेने वाले देशों के साथ समझौतों में ऐसे खंड शामिल करता था कि उधार लेने वाले देश गुप्त एस्क्रो खातों में को अमेरिकी डॉलर या अन्य विदेशी मुद्रा जमा करने के लिए बाध्य होंगे। इसके साथ ही यदि उन देशों ने ऋणों पर ब्याज देना बंद कर दिया तो बीजिंग उन पर छापा मार सकता है और उसे जब्त कर सकता है।

‘अल्लाह के खिलाफ छेड़ी जंग’ : ईरान के हिजाब विरोधी प्रदर्शन में शामिल हुए 3 लोगों को फाँसी, सजा देने से पहले किया गया टॉर्चर

ईरान में पिछले साल हुए हिजाब विरोधी प्रदर्शनों के आरोप में 3 लोगों को शुक्रवार (19 मई 2023) को फाँसी पर लटका दिया गया है। इनके नाम माजिद काजेमी, सालेह मीरहाशेमी और सईद याघौबी हैं। ईरान की न्याय व्यवस्था ने इन तीनों को अल्लाह के खिलाफ जंग छेड़ने का दोषी बताया है जिसे वहाँ की भाषा में ‘मोहारेबेह’ कहा जाता है। फाँसी चढ़े तीनों लोगों को नवम्बर 2022 में गिरफ्तार किया गया था और महज 2 महीने के अंदर ही इन्हें मौत की सजा मुकर्रर कर दी गई थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ईरानी न्यायपालिका की वेबसाइट मिज़ान पर इस सजा की पुष्टि की गई है। इस वेबसाइट के मुताबिक तीनों दोषियों द्वारा की गई गोलीबारी में ईरान के 3 सुरक्षाकर्मियों की मौत हो गई थी। गोलीबारी में मरने वालों में ईरानी पुलिस का एक अधिकारी और अर्धसैनिक बलों के 2 जवान शामिल थे। इसके अलावा इन तीनों पर ईरानी अभियोजन अधिकारियों ने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा होने और आंतरिक सुरक्षा से छेड़छाड़ जैसे आरोप भी तय किए थे। इन तीनों को महासा अमीनी की मौत के बाद हुए देश व्यापी प्रदर्शनों के दौरान ईरान के इस्फहान शहर से नवम्बर 2022 में पकड़ा गया था।

ईरानी अभियोजन का कहना है कि तीनों दोषियों ने अपने अपराध का खुद कबूलनामा किया था। इस बावत उन्होंने पर्याप्त सबूत भी होने क बात कही थी। हालाँकि दुनिया भर के मानवाधिकार संगठनों ने माजिद काजेमी, सालेह मीरहाशेमी और सईद याघौबी को फाँसी देने पर ईरान सरकार का विरोध किया है। एमीनेस्टी तो तो फाँसी दिए जाने से पहले तीनों को ईरानी सुरक्षा बलों द्वारा टॉर्चर किए जाने का भी आरोप लगाया है। फ़िलहाल ईरान पर इन अंतर्राष्ट्रीय अपीलों का कोई फर्क नहीं पड़ा।

गौरतलब है कि ईरान की राजधानी तेहरान में 13 सितंबर 2022 को एक कुर्द युवती महसा अमीनी को हिरासत में लिया गया था। जमीनी अपने परिवार के साथ तेहरान घूमने आई थी। उस पर हिजाब से सिर न ढँकने का आरोप लगाया तेहरान पुलिस ने लगाया। इसी हिरासत के दौरान 22 वर्षीया अमीनी की16 सितंबर 2022 को मौत हो गई थी। अमीनी के परिजनों ने पुलिस पर प्रताड़ना का आरोप लगाया था। महसा के कान से खून भी बहने की जानकारी सामने आई थी। इस मौत के बाद पूरे देश में हिसाब और सरकार विरोधी प्रदर्शन हुए थे। इन प्रदर्शनों के दौरान आम नागरिकों सहित कई प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई थी।

शबाना खातून को अभिषेक से प्यार… अब्बा नहीं माने तो रमजान में घर से भाग की शादी: अब जान को खतरा, बिहार पुलिस से माँग रही सुरक्षा

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले की एक मुस्लिम लड़की ने हिंदू लड़के से शादी की है। लड़की ने खुद को बालिग बताते हुए कट्टरपंथियों से अपनी जान और अपने पति की जान का खतरा बताया है। लड़की ने आगे भी अपने पति के साथ रहने की इच्छा जताई है। 42 दिन पहले वह अपना घर छोड़ कर प्रेमी के साथ चली गई थीं। इसके बाद लड़की के घर वालों ने उसके ससुराल में पति सहित 5 सदस्यों पर अपहरण का केस दर्ज करवाया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मामला मुजफ्फरपुर जिले के थानाक्षेत्र अहियापुर का है। यहाँ के शहबाजपुर की रहने वाली युवती का नाम शबाना खातून है। शबाना ने बताया कि वह अभिषेक से पिछले 4 वर्षों से परिचित थीं। दोनों पड़ोसी हैं और पहले से दोस्ती है। कुछ दिनों बाद दोनों ने शादी करने का फैसला किया। इस दौरान उसने अपने घर वालों को भी इस बात की जानकारी दी थी।

दोस्ती, प्यार और शादी करने की इच्छा बताने के बाद भी अभिषेक के हिन्दू होने की वजह से शबाना के अब्बा नूर मोहम्मद ने इस रिश्ते का विरोध किया। दोनों के मिलने-जुलने पर भी पाबन्दी लगा दी। आखिरकार रमजान के महीने में शबाना अपने प्रेमी अभिषेक के साथ दिल्ली चली गई।

शबाना के घर से जाते ही उसके परिजनों ने अहियापुर थाने में अभिषेक सहित उसके परिवार के 5 लोगों पर अपहरण की FIR दर्ज करवाई। पुलिस ने केस दर्ज कर के शबाना की तलाश जारी रखी। उधर दिल्ली में शबाना और अभिषेक ने कोर्ट मैरिज कर लिया। दोनों की शादी दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में हुई है।

घर से निकलने के लगभग 42 दिनों के बाद शबाना अपने पति अभिषेक के साथ मुजफ्फरपुर पहुँचीं। यहाँ वो सीधे पुलिस के पास गईं और खुद के बालिग होने के साथ अपनी शादी के सबूत दिए। पुलिस ने शबाना का बयान कोर्ट में दर्ज करवाया।

खुद को 21 साल की बताते हुए शबाना ने मीडिया से बात करते हुए अपनी, अपने पति व उनके परिवार वालो की जान को खतरा बताया और पुलिस से सुरक्षा की भी माँग की है। लड़की द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर डिप्टी SP राघव दयाल ने कहा कि शबाना बालिग हैं और अपनी मर्जी से कोर्ट मैरिज कर चुकी हैं। DSP के मुताबिक लड़की ने पुलिस के आगे दिए गए 161 के बयान में अभिषेक के साथ अपनी मर्जी से शादी करना और उन्हीं के साथ रहने की इच्छा जताई है।

‘बुर्का न पहनना वेश्यावृत्ति जैसा… इस्लाम अपनाओ तभी कबूल होगी नमाज’: हिन्दू पीड़ित लड़कियों की The Real Kerala Story

देश के विभिन्न हिस्सों में कई कट्टर इस्लामी संगठनों द्वारा जारी धर्मान्तरण की साजिश के शिकार कुछ पीड़ितों से ऑपइंडिया ने मंगलवार (16 मई 2023) को मुलाकात की। हमने अपनी पहली रिपोर्ट में केरल के कासरगोड की रहने वाले एक ब्राह्मण लड़की श्रुति से हुई बातचीत के अंश प्रकाशित किए थे। इस दौरान श्रुति ने बताया था कि साजिश से अनजान लोगों को इस्लाम कबूल करवाने के लिए एक बड़ा नेटवर्क एक्टिव है। ऑपइंडिया से अपने निजी अनुभव साझा करते हुए श्रुति ने बताया था कि उस दौरान वह खुद इतनी कट्टरपंथी हो चुकी थी कि अपनी बात का विरोध करने वाले या गैर इस्लामी व्यक्ति की हत्या करने में भी उसे जरा सा भी संकोच न होता।

इसी बातचीत में श्रुति ने आगे बताया कि उनके ब्रेनवाश के दौरान उन्हें न केवल अन्य धर्मों से नफरत बल्कि इस्लाम के लिए पूरी तरह समर्पित होना सिखाया गया। श्रुति के मुताबिक उन्हें यकीन दिलाया गया था कि उनका (मुस्लिमों का) पहनवा और जीवन शैली सबसे अच्छा है, जिससे बाकी सभी महिलाओं को अपना लेना चाहिए। इस ब्रेनवाश में ‘बुर्का न पहनना वेश्यावृत्ति’ जैसी बातें भी शामिल थीं। ये बातें मौलानाओं और श्रुति के मुस्लिम दोस्तों द्वारा कही गईं थीं।

श्रुति का कहना था कि उनसे मिलने वाले मौलानाओं या मुस्लिम दोस्त पूरी तरह इस्लाम में आने पर ही नमाज़ या रोजा कबूल होने की बात किया करते थे। श्रुति के अनुसार उन्हें बुर्का पहनने के लिए राजी करने के लिए कई कुतर्क दिए गए। इन कुतर्कों में गैर मर्दों द्वारा नंगी त्वचा देखना वेश्यावृत्ति जैसे बताना भी शामिल था। हालाँकि अब श्रुति इन बातों को उन मौलानाओं द्वारा की जाने वाली तार्किक हेरफेर मानती हैं। श्रुति ने यह भी बताया था कि ब्रेनवॉश के दौरान उनमें हीन भावना पैदा की जाती थी और माहौल ऐसा बना दिया जाता था कि उस बारे में कोई सोचे भी नहीं।

एक अन्य पीड़िता विशाली शेट्टी ने भी ऑपइंडिया से धर्मांतरण पर अपना अनुभव साझा किया। विशाली के मुताबिक उनका ब्रेनवाश उनके ऑफिस में हुआ था। यही उन्हें कट्टरपंथ का पाठ पढ़ाया गया और इस्लाम की तरफ आकर्षित किया गया। विशाली ने केरल में अपने करियर की शुरुआत की और बाद में बेंगलुरु की एक आईटी कंपनी में काम करने गईं थीं। यहीं उनके साथियों ने विशाली के धर्म के बारे में सवाल करना शुरू किया। शुरुआत में यह बातचीत सामान्य ज्ञान और आम बातचीत की तरह होती थी।

विशाली का कहना है कि उनके पास अपने दोस्तों द्वारा किए जाने वाले सवालों के जवाब नहीं थे। विशाली में धर्म के प्रति खाली जगह देख कर उनके दोस्तों ने उसमें इस्लाम की जानकारी भरनी शुरू कर दी थी। उस समय विशाली को लगता था कि जो उनके साथी कह रहे हैं, वो सही है। कहीं न कहीं विशाली को यह लगने लगा था कि जिस धर्म का पालन वो बचपन से करती आ रहीं हैं, उसमें कमी जरूर है। हालाँकि विशाली इस हद तक ब्रेनवाश नहीं हुई थीं कि वो नमाज़ पढ़ें या बुर्का पहने। विशाली का कहना है कि कुछ समय बाद उन्हें लगने लगा था कि उन्हें फँसाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि वो कट्टरपंथ की तमाम चालों को समझ गई और आख़िरकार फिर से सनातन धर्म में लौट आई।

पीड़िताओं का कहना है कि उनमें कट्टरपंथ भरने के दौरान इस सोच का बना दिया जाता है कि कोई भी अपनी ही आस्था की बुराई शुरू कर देता है। उन्होंने बताया कि सोच को धीमे जहर की तरह इस स्तर पर ला दिया जाता है कि उनके शिकार को बाकी लोगों से विरक्ति हो जाए। इस नेटवर्क की शिकार हुई श्रुति ने यह भी बताया कि धर्मान्तरण का ये काम पूरे देश में चल रहा है, जिसमें खासतौर पर दक्षिण भारत में इससे जुड़े लोग ज्यादा सक्रिय हैं।

धर्मान्तरण और लव जिहाद देश के लिए एक ज्वलंत समस्या की तरह है। श्रुति और विशाली ने जिस नेटवर्क को अपनी आपबीती में बताया है, उसे सुदीप्तो सेन की The Kerala Story में बहुत अच्छी तरह से दिखाया गया है। 5 मई 2023 को रिलीज हुई यह हिट फिल्म बॉक्स ऑफिस पर तमाम रिकॉर्ड तोड़ रही है। फिल्म में केरल के उन चरमपंथियों को दिखाया गया है जो प्रेमजाल में फँसा कर राज्य की महिलाएँ को ISIS में भर्ती करने के लिए काम कर रहे हैं। फिल्म में यह भी दिखाया गया है कि कई लड़कियाँ ऐसी भी हैं, जिन्होंने सीरिया जा कर ISIS आतंकवादियों से निकाह कर लिया। इन पीड़िताओं में हिन्दू के साथ ईसाई महिलाएँ भी हैं।

द केरल स्टोरी सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्म है। इसका ट्रेलर जारी होने के बाद से ही वामपंथी, कॉन्ग्रेसी और इस्लामी समूह एकजुट होकर फिल्म को झूठी साबित करने का प्रयास कर रहे हैं। पहले इन सभी ने फिल्म को सिनेमाघरों में चलने से रोकने की कोशिश की थी। हालाँकि इन विरोधों के बावजूद लोगों ने इस फिल्म को काफी पसंद किया है। इस फिल्म को देखने के बाद कई लोगों ने यह भी बताया कि उन्हें देश में चल रही इन तमाम बातों की जानकारी ही नहीं थी।

पहले भी ऑपइंडिया ने अनघा जयगोपाल और विशाली शेट्टी नाम की दो महिलाओं पर रिपोर्ट प्रकशित की थी। इन दोनों ने पहले धर्मान्तरण और बाद में सनातन धर्म में वापसी के अनुभव साझा किए। इसी अनुभव के आधार पर दोनों पीड़िताओं ने पुष्टि की है कि द केरल स्टोरी में वही दिखाया गया है जो दुनिया भर में सही रूपों में चल रहा है। ऑपइंडिया ने एक ऐसी ही हिन्दू महिला के बारे में लेख भी प्रकाशित किया था जिसने द केरल स्टोरी देखने के बाद कहा था कि फिल्म में दुनिया की सच्ची समस्या दिखाई गई है। तब महिला ने माना था कि वो अपने कॉलेज टाइम में भी इसी साजिश का शिकार हुईं थीं।

नोट: इंटरव्यू को अंग्रेजी में आप इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

त्रयम्बकेश्वर मंदिर मामले में मुस्लिमों के साथ उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना: भाजपा को कहा गोमूत्रधारी, मुस्लिम युवक धूप दिखाने वाले

नासिक के त्रयम्बकेश्वर मंदिर में मुस्लिम समाज के कुछ लोगों द्वारा चादर चढ़ाने की कोशिश के बाद भड़के विवाद पर शिवसेना (UBT) के प्रमुख उद्धव ठाकरे ने भाजपा पर निशाना साधा है। भाजपा को गोमूत्रधारी बताते हुए ठाकरे ने कहा कि हिन्दू धर्म को असली खतरा धूप दिखाने मुस्लिम युवकों से नहीं, बल्कि गोमूत्रधारियों से है।

अपने मुखपत्र ‘सामना’ में लिखे लेख में महाराष्ट्र की पार्टी ने लिखा, “भारतीय जनता पार्टी (BJP) को ऐसा लगता है कि वही दुनिया में हिंदुत्व की एकमात्र ठेकेदार है। ऐसे स्वघोषित ठेकेदारों ने अपने अधीन उप-ठेकेदारों की नियुक्ति करके हिंदुत्व के नाम पर जो कर्कश हंगामा खड़ा किया है, उसे देखकर दो हिंदू हृदय सम्राट वीर तात्याराव सावरकर और शिवसेना संस्थापक बालासाहेब ठाकरे भाजपा को श्राप दे रहे होंगे।”

अपने मुखपत्र में पार्टी ने लिखा, “भाजपा का हिंदुत्व गोमूत्रधारी है। त्रयम्बकेश्वर में हिंदुत्व के नाम पर दंगा भड़काकर उसका रिएक्शन पूरे महाराष्ट्र में फैलाने की योजना हिंदुत्व के उप-ठेकेदारों ने बनाई थी। इस तरह धूप दिखाने की प्रथा बहुत पुरानी है, लेकिन इस बार उप-ठेकेदारों ने इस घटना को भुनाया और ‘मंदिर में मुस्लिमों ने घुसने की कोशिश की, हिंदू धर्म संकट में है’ का हो-हल्ला मचाया।”

शिवसेना (UBT) ने आगे​ लिखा, “खुद को हिंदुत्ववादी आदि कहने वाले बचकाने संगठनों को मंदिर शुद्धीकरण का ठेका किसने दिया? जब तक हिंदुत्व के नाम पर कालाबाजारी की ये दुकानें बंद नहीं होंगी, तब तक हिंदुत्व का मजाक उड़ता रहेगा। हिंदू धर्म को असली खतरा गोमूत्र से शुद्धीकरण करने वालों से है। इन्हीं विचारधारा वाले लोगों के कारण देश गुलाम हुआ था।”

उद्धव ठाकरे की पार्टी ने अपने मुखपत्र में आगे लिखा, “गृहमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने त्रयम्बकेश्वर में धूप-महाआरती मामले की जाँच के लिए एक विशेष जाँच दल की घोषणा की है, लेकिन इस जाँच की कोई जरूरत नहीं थी। जो त्रयम्बकेश्वर में हुआ ही नहीं, उसकी जाँच क्यों?”

पूर्व हिंदुत्ववादी पार्टी ने ‘सामना’ में आगे कहा गया, “यह सब उल्टा तरीका है। इससे भी गंभीर बात यह है कि राज्य के गृहमंत्री उतावलेपन में ऐसा करें। जाँच करनी है तो गोमूत्र का बैरल लेकर त्रयम्बकेश्वर में हंगामा मचाने वाले हिंदुत्व के उप-ठेकेदारों की करनी चाहिए।

बता दें कि महाराष्ट्र के नासिक जिले में स्थित भगवान शंकर के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक त्रयम्बकेश्वर मंदिर में मुस्लिम समुदाय के कुछ युवकों ने 13 मई 2023 की शाम को चादर चढ़ाने की कोशिश की थी। इसके बाद से त्रयम्बकेश्वर मंदिर चर्चा में है। घटना के बाद मंदिर का शुद्धिकरण किया गया।

वहीं, स्थानीय मुस्लिमों का कहना था कि यह दशकों पुरानी परंपरा है, जिसका वे पालन करते आ रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि मंदिर के अंदर जाकर उन्होंने चादर चढ़ाने की कोशिश नहीं की थी, बल्कि सिर्फ दूर से ही धूप और चादर दिखा रहे थे। इसके लिए नजदीक में स्थित दरगाह के खादिम ने कान पकड़कर माफी भी माँगी है।

दो सप्ताह पहले भी उद्धव ठाकरे ने गोमूत्र को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर विवादित बयान दिया था। उन्होंने कहा था, “क्या हमारे देश को गोमूत्र छिड़कने से आजादी मिली थी? क्या ऐसा हुआ था कि गोमूत्र छिड़का गया और हमें आजादी मिली? ऐसा नहीं था, स्वतंत्रता सेनानियों ने बलिदान दिया था। तब कहीं जाकर हमें आजादी मिली थी।”

ज्ञानवापी परिसर में मिले शिवलिंग की कार्बन डेटिंग पर SC की रोक, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दी थी इजाजत

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (19 मई 2023) को वाराणसी के ज्ञानवापी परिसर में मिले शिवलिंग की कार्बन डेटिंग पर रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई तक यह रोक लगाई है। इसके पहले 12 मई 2023 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ज्ञानवापी परिसर में मिले शिवलिंग की वैज्ञानिक जाँच की अनुमति दे दी थी। हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अंजुमन इस्लामिया मस्जिद कमिटी (मस्जिद पक्ष) सुप्रीम कोर्ट पहुँची थी।

अंजुमन इस्लामिया मस्जिद कमिटी की याचिका पर चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने सुनवाई की। इस दौरान कमिटी की तरफ से पेश हुए वकील हुजेफा अहमदी ने कहा कि हाईकोर्ट में मस्जिद कमिटी की याचिका पर दिसंबर 2022 में ही फैसला सुरक्षित रखा गया। इसके बाद 11 मई 2023 को एएसआई अदालत में रिपोर्ट सौंपती है और 12 मई को हाईकोर्ट कार्बन डेटिंग कराने के ऑर्डर दे देती है। हुजेफा का कहना है कि अदालत ने उन्हें अपना पक्ष रखने के लिए समय नहीं दिया।

उत्तर प्रदेश राज्य सरकार और केंद्र सरकार की तरफ से अदालत में पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने वैज्ञानिक जाँच के दौरान शिवलिंग को नुकसान पहुँचने को लेकर चिंता व्यक्त की। हिंदू पक्ष के वकील विष्णु शंकर जैन ने अदालत के सामने कहा कि एएसआई ने अपने रिपोर्ट में कहा है कि उनकी जाँच से शिवलिंग को नुकसान नहीं पहुँचेगा। इसी आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शिवलिंग की कार्बन डेटिंग की इजाजत दी थी। उन्होंने कोर्ट से वह रिपोर्ट मँगवाने का अनुरोध भी किया।

एसजी तुषार मेहता ने अदालत से कहा कि सरकार को यह भी पता लगाने की आवश्यकता है कि क्या कार्बन डेटिंग के अलावा अन्य वैज्ञानिक परीक्षण किए जा सकते हैं। इस पर सीजेआई चंद्रचुड़ ने कहा कि कोर्ट ASI से रिपोर्ट मँगवाने के खिलाफ नहीं है लेकिन सरकार को अन्य विकल्पों और मुद्दों पर विचार करने के लिए समय देना चाहिए। सीजेआई ने कहा कि इन मामलों में सावधानी से चलने की जरूरत है।

मामले की सुनवाई कर रही तीन जजों की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दिया। इसके बाद मामले की सुनवाई 7 अगस्त तक के लिए टाल दी गई। 7 अगस्त तक कार्बन डेटिंग पर रोक जारी रहेगी। बता दें कि 12 मई को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वे (ASI) को शिवलिंग को बिना किसी तरह की क्षति पहुँचाए कार्बन डेटिंग कराने का आदेश दिया था।

PM मोदी G-7 में हिस्सा लेने परमाणु हमले के शिकार जापान के हिरोशिमा पहुँचे, 1974 के बाद यहाँ जाने वाले पहले भारतीय पीएम, पाक-चीन को लेकर कही बड़ी बात

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) प्रभावशाली देशों के समूह G-7 में हिस्सा लेने के लिए जापान के शहर हिरोशिमा पहुँच गए हैं। वहाँ उन्होंने भारतीय समुदाय के लोगों से बात की। पीएम मोदी पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जो 1974 में भारत द्वारा किए गए परमाणु परीक्षण के बाद एटम बम से कभी तबाह हुए शहर हिरोशिमा गए हैं।

जी-7 की बैठक हिरोशिमा शहर में ही आयोजित किया जा रहा है। पीएम मोदी हिरोशिमा में होटेल शेरेटन पहुँचे। वहाँ पर प्रवासी भारतीयों ने पीएम का स्वागत किया। उनके हाथों में तिरंगा था और ‘मोदी… मोदी…’ के नारे लगाए। इस दौरान पीएम मोदी ने उन लोगों के साथ बातचीत की।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी साल 1974 में पोखरण में किए गए परमाणु परीक्षण के बाद पहले ऐसे पीएम हैं, जो जापान के हिरोशिमा गए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पहले भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू साल 1957 में हिरोशिमा का दौरा किया था।

बता दें कि साल 1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिका द्वारा हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराया गया था। इसके बाद ये दोनों शहर पूरी तरह तबाह हो गए थे। विध्वंस का शिकार होने के बाद जापान परमाणु अस्त्र के प्रसार के खिलाफ काम करने लगा। इसी दौरान साल 1974 में इंदिरा गाँधी की सरकार ने पहला परमाणु परीक्षण किया था।

भारत द्वारा परमाणु बम परीक्षण का सीधा असर जापान के साथ रिश्तों पर पड़ा। पश्चिमी देशों के साथ-साथ पश्चिमी देश भारत के खिलाफ खड़े हो गए थे। साल 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने फिर से परीक्षण किया तो जापान ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए। इसके कारण देश का कोई पीएम हिरोशिमा नहीं जा सका।

हिरोशिमा पहुँचकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (19 मई 2023) को जापान की एक मीडिया हाउस निकेई एशिया को इंटरव्यू दिया। इसमें उन्होंने कहा कि भारत पड़ोसी देशों के साथ मधुर संबंध चाहता है। इसमें पड़ोसी देशों की जिम्मेदारी है कि वे आतंकवाद और दुश्मनी को भुलाकर मिलकर काम करें।

चीन को लेकर पीएम मोदी ने कहा कि भारत अपनी संप्रभुता और गरिमा की रक्षा करने के लिए कटिबद्ध और तैयार है। पीएम मोदी ने कहा, “चीन के साथ सामान्य द्विपक्षीय संबंधों के लिए सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति आवश्यक है। भारत-चीन संबंधों का भविष्य का विकास केवल आपसी सम्मान, संवेदनशीलता और हितों पर आधारित हो सकता है। इससे इस क्षेत्र को ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को लाभ होगा।”

इस दौरान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता के सवाल पर पीएम मोदी ने कहा कि अगर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को स्थायी बनने से दूर रखा जाता है तो उसकी विश्वसनीयता और फैसले लेने की क्षमता पर सवाल उठते रहेंगे।