जब नीतीश कुमार फिर से नई भूमिका में लौटे हैं, भाजपा निर्णायक वापसी की तैयारी में है और राजद अब भी अतीत की विरासत और वंशवाद से बाहर नहीं निकल पा रही है। बिहार की राजनीति इस बार फिर से किसी महाकाव्य जैसी लग रही है जिसमें कथानक पुराना है, पात्र वही हैं, पर गठबंधन और नारों के नाम पर मंच नए बना दिए गए हैं।
अक्तूबर-नवंबर 2025 में होने वाले विधानसभा चुनाव एक बार फिर यह तय करेंगे कि बिहार नई दिशा में बढ़ेगा या फिर पुराने राजनीतिक समीकरणों के दलदल में ही फँसा रहेगा।
2020 के विधानसभा चुनाव में एनडीए को 125 सीटों के साथ मामूली बहुमत मिला था, लेकिन तब से बिहार की राजनीति इतनी बार पलटी खा चुकी है कि जनता अब गिनती भूल चुकी है। अगस्त 2022 में नीतीश कुमार ने भाजपा का साथ छोड़कर राजद-कॉन्ग्रेस गठबंधन का दामन थामा था।
लेकिन जनवरी 2024 में उन्होंने एक बार फिर पलटी मारते हुए एनडीए में वापसी कर ली। यह उनका शायद चौथा बड़ा ‘यूटर्न’ था जिसने उन्हें भारतीय राजनीति का सबसे ‘लचीला’ नेता बना दिया है। उनका तर्क वही पुराना है ‘बिहार के विकास के लिए।’
लेकिन जनता अब इस जुमले को सुनसुनकर थक चुकी है। वास्तविक विकास के आँकड़े ठहरे हुए हैं, पर राजनीतिक बयानबाजी अब भी वही है।
भाजपा की चुनौती धैर्य की भी परीक्षा
भाजपा के लिए यह चुनाव सिर्फ बिहार की सरकार पाने का अवसर नहीं है, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक लड़ाई भी है। सवाल यह है कि क्या भाजपा बिहार में स्थायी रूप से वैकल्पिक नेतृत्व स्थापित कर सकती है, या फिर हमेशा किसी गठबंधन की ‘मजबूरी’ बनकर रह जाएगी?
नीतीश कुमार की वापसी भाजपा के लिए रणनीतिक मजबूरी थी। पार्टी जानती है कि कुर्मी-कोयरी और कुछ अन्य ओबीसी समूह अब भी जेडीयू के साथ हैं। लेकिन भाजपा का कार्यकर्ता वर्ग, जो वर्षों से नीतीश के ‘पलटी मॉडल’ से आहत रहा है, अब उत्साह खो चुका है।
इसलिए 2025 में भाजपा की रणनीति साफ है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और केंद्र की योजनाओं पर जोर, जबकि स्थानीय स्तर पर नीतीश की मशीनरी से जातीय समीकरण संभलेंगे। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की तरह बिहार भाजपा के लिए वह राज्य है जहाँ अब तक पार्टी को अकेले बहुमत नहीं मिला। बिहार का जनादेश हमेशा गठबंधन की आदत से बंधा रहा है जनता स्थिरता चाहती है,पर स्थिर नेतृत्व को पूरा भरोसा देने में अब भी हिचकती है।
राजद की उलझन – विरासत और नेतृत्व के बीच
राजद के लिए 2025 अस्तित्व का चुनाव है। तेजस्वी यादव, जिन्हें कभी ‘युवा विकल्प’ के रूप में प्रस्तुत किया गया था, अब वैचारिक अस्पष्टता और संगठनात्मक कमजोरी के शिकार दिखते हैं। उनका ‘माई’ (मुस्लिम–यादव) समीकरण अब 1990 के दशक जितना प्रभावी नहीं रहा। नई पीढ़ी के वोटर, जो विकास और रोजगार की भाषा समझते हैं, अब ‘सामाजिक न्याय’ की पुरानी कहानी से प्रभावित नहीं होते।
तेजस्वी ने खुद को प्रशासनिक रूप से सक्षम और आधुनिक नेता दिखाने की कोशिश की, लेकिन लालू यादव की
‘जंगलराज’ वाली छवि अब भी उनके सिर पर साया बनकर मौजूद है। 2005 के बाद जन्मे लाखों युवा मतदाता उस दौर को याद नहीं करते वे सिर्फ सुनते हैं कि तब बिहार में अराजकता और भय का वातावरण था।
राजद की कॉन्ग्रेस और वामदलों के साथ गठबंधन भी किसी वैचारिक सामंजस्य का नहीं, बल्कि राजनीतिक सुविधा का परिणाम है। उनका एकमात्र एजेंडा ‘भाजपा हटाओ’ है, पर ‘क्या लाओ’ इसका कोई उत्तर नहीं।
जाति समीकरण अब भी निर्णायक
बिहार की राजनीति चाहे कितनी भी बदलती दिखे, पर जाति समीकरण अब भी चुनाव परिणामों की रीढ़ है। भाजपा लगातार अति पिछड़े वर्गों (EBC) और दलितों को केंद्र की योजनाओं के माध्यम से जोड़ने की कोशिश कर रही है। प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला, हर घर जल, पीएम किसान इन योजनाओं ने बिहार के ग्रामीण मतदाता को भाजपा से सीधे जोड़ा है।
वहीं जेडीयू अब भी अपने पारंपरिक कुर्मी–कोयरी आधार पर निर्भर है, और राजद यादव मुस्लिम वर्ग में प्रभाव बनाए हुए है। कॉन्ग्रेस ऊपरी जातियों और मुसलमानों के सहारे जीवित है, पर प्रभाव सीमित।
चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) और उपेंद्र कुशवाहा के आरएलएसपी गुट जैसे छोटे दल कुछ सीटों पर असर डाल सकते हैं। चिराग की ‘बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ लाइन युवाओं को आकर्षित करती है, और भाजपा इसे एक ‘साइलेंट सैटेलाइट’ सहयोगी के रूप में इस्तेमाल कर सकती है जहाँ जेडीयू एंटी-इनकम्बेंसी झेल रही हो।
भाजपा की बड़ी बाजी – मोदी का चेहरा और वेलफेयर पॉलिटिक्स
भाजपा की 2025 रणनीति दो स्तंभों पर आधारित है मोदी का नेतृत्व और कल्याण योजनाओं की विश्वसनीयता। भाजपा इस चुनाव को ‘विकसित भारत, विकसित बिहार’ के नारे के साथ लड़ना चाहती है।
मोदी की रैलियों में संदेश साफ होगा ‘बिहार ने भारत को ताकत दी, लेकिन भारत ने बिहार को उसका हक कब दिया?’ इस भावनात्मक प्रश्न के साथ भाजपा बिहार को सिर्फ क्षेत्रीय मुद्दों से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आकांक्षा से जोड़ना चाहती है।
भाजपा का अभियान राष्ट्रवाद, विकास और आत्मसम्मान का मिश्रण है एक तरफ ‘लालू–नीतीश मॉडल’ की अस्थिरता, दूसरी तरफ मोदी युग की स्थिरता और डिलीवरी। यही विरोधाभास 2025 के चुनाव को रोचक बनाएगा।
जनादेश की थकान या निर्णायक मोड़?
बिहार की जनता इस बार जिस मनोस्थिति में है, उसे ‘जनादेश की थकान’ कहा जा सकता है। हर कुछ साल पर गठबंधन बदलने, नारे बदलने और “विकास” के अधूरे वादों ने मतदाताओं को संदेहग्रस्त बना दिया है।
क्या जनता एक बार फिर नीतीश कुमार की राजनीतिक कलाबाज़ियों को माफ करेगी?क्या भाजपा अब सचमुच बिहार में अकेली पहचान बनाना चाहेगी, या फिर समझौते के रास्ते पर चलेगी?
क्या राजद अपने सामाजिक आधार से आगे बढ़ पाएगा?
प्रारंभिक सर्वेक्षणों के मुताबिक़, एनडीए थोड़ा आगे है मुख्यतः मोदी फैक्टर के कारण। पर बिहार की राजनीति में आखिरी क्षणों का समीकरण हमेशा अप्रत्याशित रहा है। एक छोटा जातीय ध्रुवीकरण या स्थानीय असंतोष पूरा खेल पलट सकता है।
संभावना है कि नतीजे फिर से अधूरे बहुमत की ओर झुकें, जिससे ‘मजबूरी का गठबंधन’ एक बार फिर बने। और यही बिहार की सबसे बड़ी त्रासदी है जनता बदलाव चाहती है, पर परिवर्तन के जोखिम से अब भी डरती है।
अंत में
बिहार 2025 का चुनाव सिर्फ एक राजनीतिक मुकाबला नहीं, बल्कि धैर्य की परीक्षा है जनता के धैर्य की, भाजपा के धैर्य की और शायद नीतीश कुमार की भी। यह चुनाव यह तय करेगा कि क्या बिहार अब भी गठबंधन की अनिश्चितता में विश्वास रखता है,
या वह अब स्थायित्व और साफ़ नेतृत्व की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ाने को तैयार है। राजनीति में धैर्य एक गुण होता है, पर बिहार की जनता अब शायद धैर्य खोने लगी है।


