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‘मैं काशी में ही रहना चाहती हूँ’ : 260 साल पहले जब माँ दुर्गा ने बनारस छोड़ने से किया इनकार, 15 ग्वाले मिलकर भी नहीं हिला पाए मूर्ति; जानें बंगाली टोले की पौराणिक परंपरा, आज भी पूजी जाती है वही प्रतिमा

आज जहाँ अमेरिका, कनाडा, यूरोप जैसे देशों में रहने वाले भारतीय माँ दुर्गा की फाइबरग्लास की मूर्तियाँ मँगवाते हैं, जो विसर्जित नहीं होतीं, वहीं काशी की यह मूर्ति माँ के आदेश के कारण स्थायी है।

“ई ना हटत हौ!” यह शब्द 1767 की विजयादशमी के दिन वाराणसी के मदनपुरा इलाके के 15 मजबूत यादव ग्वालों ने थक-हार कर कहे थे। उस दिन हर साल की तरह बंगाली टोला के मुखोपाध्याय (अब मुखर्जी) परिवार ने अपने घर में स्थापित दुर्गा प्रतिमा को विसर्जन के लिए ले जाने की कोशिश की थी पर वह मिट्टी, भूसे, बाँस और जुट से बनी माँ दुर्गा की मूर्ति अपनी जगह से टस से मस नहीं हुई।

कई कोशिशों के बाद भी मूर्ति नहीं हिली तो कहा जाता है, उसी रात परिवार के मुखिया काली प्रसन्न मुखोपाध्याय के सपने में माँ दुर्गा आईं और बोलीं, “मैं शिव की नगरी काशी में ही रहना चाहती हूँ। मुझे विसर्जित मत करो।” यह स्वप्न केवल एक सपना नहीं, बल्कि माँ की आज्ञा मानी गई। तब से लेकर आज तक यानी लगभग 260 वर्षों से वही मूर्ति हर साल दुर्गा पूजा में पूजी जाती है, लेकिन विसर्जन नहीं किया जाता।

260 सालों से एक ही मूर्ति की पूजा

माँ की यह प्रतिमा वाराणसी के बंगाली टोला, मदनपुरा इलाके की पुरानी दुर्गा बाड़ी में स्थापित है। यहाँ की दुर्गा प्रतिमा करीब 6 फीट ऊँची है और साथ में हैं माँ लक्ष्मी, माँ सरस्वती, भगवान गणेश और कार्तिकेय। यह मूर्ति हर साल दुर्गा पूजा में पूजी जाती है, लेकिन कभी विसर्जित नहीं की जाती। मिट्टी, बाँस, पुआल और जूट से बनी यह मूर्ति आज भी वैसी ही है, जैसी 1767 में थी। हर साल बस हल्की-फुल्की मरम्मत की जाती है।

मुखोपाध्याय परिवार मूल रूप से पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के रहने वाले थे। एक पारिवारिक झगड़े के बाद, वे वाराणसी आकर बस गए, जहाँ पहले से ही बंगाली संस्कृति का गहरा असर था। काली प्रसन्न मुखोपाध्याय ने अपने घर पर बंगाल की परंपरा से दुर्गा पूजा शुरू की। उस समय (1700 के दशक में) दुर्गा पूजा बंगाल में भी घरेलू, पारिवारिक होती थी। भव्य पंडालों और सार्वजनिक आयोजनों की बात तब दूर थी।

हर साल की तरह, 1767 में भी गंगामाटी (गंगा की मिट्टी) से बनी मूर्ति बजरा नाव से बंगाल से वाराणसी लाई गई। पूरे नवरात्र में पूजा हुई, लेकिन विजयदशमी के दिन जब विसर्जन का समय आया, तो मूर्ति ने मानो खुद को जड़ कर लिया। जितनी भी ताकत लगाई गई, मूर्ति हिली नहीं। तब माँ दुर्गा के सपने के बाद, मूर्ति को वहीं रहने देने का निर्णय लिया गया। तभी से, इसी प्रतिमा की हर साल पूजा होती है, लेकिन विसर्जन नहीं होता।

यह मूर्ति केवल दुर्गा पूजा के नौ दिनों में ही नहीं, पूरे साल पूजी जाती है। हर दिन 20 मिनट की आरती होती है और दुर्गा पूजा में ये बढ़कर 45 मिनट की हो जाती है। दुर्गा पूजा के समय फल, मटर, मूँग, और पंचमी को 51 नारियल से बनी नारियल नारू (पहले 151 से बनती थी) का विशेष भोग लगता है।

यहाँ कोई भव्य पंडाल नहीं लगता, लेकिन रिश्ते, स्मृतियाँ और आस्था का संगम होता है। देशभर से लोग यहाँ आते हैं, खासकर वे लोग जिनकी जड़ें कभी बंगाली टोला में थीं। यह पूजा सिर्फ मुखर्जी परिवार की नहीं, बल्कि पूरे मोहल्ले और काशी की है।

यह मूर्ति भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा मान्यता प्राप्त मूर्ति है। प्रतिमा का चेहरा विशेष है, वह माँ दुर्गा को युवावस्था में दर्शाता है, जो बहुत दुर्लभ है।

आज जहाँ अमेरिका, कनाडा, यूरोप जैसे देशों में रहने वाले भारतीय माँ दुर्गा की फाइबरग्लास की मूर्तियाँ मँगवाते हैं जो विसर्जित नहीं होतीं, वहीं काशी की यह मूर्ति हर मायनों में अनोखी है। विदेशों में मूर्तियाँ दोबारा इस्तेमाल होती हैं सुविधा और खर्च के कारण। लेकिन काशी में यह मूर्ति माँ के आदेश के कारण स्थायी है।

मंदिर का रखरखाव और परिवार की भूमिका

परिवार के सदस्य मूर्ति को छू नहीं सकते, केवल पुजारी ही पूजन करते हैं। भट्टाचार्य परिवार पुजारी का कार्य करते हैं। वहीं दत्ता परिवार मूर्ति की सजावट और रंग-रोगन का कार्य करता है। इंद्रनील मुखर्जी, जो अब इस परंपरा को सँभाल रहे हैं, कहते हैं, “हमारे लिए यह मूर्ति माँ के रूप में यहीं काशी में हमेशा के लिए है। यह विसर्जन की नहीं, स्थायित्व की देवी हैं।”

जब देशभर में विजयादशमी पर माँ को विदा किया जाता है, “आश्चे बोछोर आबार होबे” (अगले साल फिर होगी), काशी की यह माँ हमेशा के लिए यहीं रह गईं। यह सिर्फ मूर्ति की बात नहीं, बल्कि विश्वास की नींव पर टिकी एक विरासत की कहानी है।

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सौम्या सिंह
सौम्या सिंह
ख़ुद को तराशने में मसरूफ़

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