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हिंदुत्व और संघ परिवार को घेरने की साजिश, समर्थकों के बहाने निशाने पर PM मोदी: गोडसे के नाम पर ‘द प्रिंट’ के सहारे झूठ-प्रोपेगेंडा फैला रहे वीर सांघवी

पत्रकार वीर सांघवी ने 'द प्रिंट' में एक लेख लिखकर गोडसे के बहाने हिंदुत्व पर सवाल खड़े करने की कोशिश की। सांघवी ने अपने लेख में सीधे-सीधे आरोप लगाने के बजाय वामपंथियों की मूल विचारधारा की तरह संदेह का बीज बोने का महीन तरीका अपनाया है।

2 अक्टूबर को गाँधी जयंती थी, इसी दिन संयोग से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का शताब्दी वर्ष का उत्सव भी था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर संघ प्रमुख मोहन भागवत तक सबने गाँधी को याद किया। इसके उल्ट हमेशा की तरह कुछ लोगों के लिए यह दिन गाँधी के बहाने हिंदू धर्म और हिंदुत्व को कटघरे में खड़ा करने का बहाना बन गया।

पत्रकार वीर सांघवी ने ‘द प्रिंट’ में एक लेख लिखकर गोडसे के बहाने हिंदुत्व पर सवाल खड़े किए की। सांघवी ने अपने लेख में सीधे-सीधे आरोप लगाने के बजाय वामपंथियों की मूल विचारधारा की तरह संदेह का बीज बोने का तरीका अपनाया है।

द प्रिंट का लेख

सांघवी ने अपने लेख के शीर्षक में ही शब्दों से खेलने की कोशिश की है। उन्होंने लिखा, “क्यों मोदी के समर्थक ‘गर्वित हिंदू’ एमके गांधी से डरते हैं और उनके हत्यारे गोडसे का सम्मान करते हैं।” यानी जो प्रधानमंत्री गाँधी को अपना आदर्श मानकर चलते आए हैं, उनके विचार को आगे बढ़ाने की बात करते रहे हैं, समर्थकों के नाम पर किसी तरह उनको भी गाँधी के हत्यारे से जोड़ने की कोशिश की गई। जब इस लेख को पढ़ना शुरू करते हैं तो इसमें अगला निशाना ‘हिंदुत्व’ को बनाया गया है।

द प्रिंट’ की रिपोर्ट का एक हिस्सा

सांघवी का तर्क है कि ‘गोडसे की महिमा गाने की कोशिशें इसलिए बढ़ गई हैं क्योंकि देश में हिंदुत्व का असर बढ़ा है’।

सांघवी का यह तर्क बहुत सुविधाजनक तो है ही, साथ ही यह घृणित मानसिकता भी है। जब किसी विचार को तर्क की कसौटी पर ना कसा जा सके तो उसके लिए ‘रेडीमेड विलेन’ हिंदुत्व को जिम्मेदार ठहरा दिया जाए, यह एक विचारधारा की पुरानी आदत रही है।

पहली बात तो यह कि गाँधी की आलोचना या सवाल उठाना उनकी विरासत पर हमला कैसे हो सकता है? स्वतंत्रता से पहले ही सुभाष चंद्र बोस जैसे क्रांतिकारियों के विचार गाँधी से अलग थे तो क्या वे सुनियोजित हमला कर रहे थे?

अब आते हैं गोडसे पर, नाथूराम गोडसे की तारीफ करने वाले कितने लोग आपको मिलेंगे, ऐसे लोगों की संख्या बमुश्किल सैकड़ों में ही होगी। ऐसे में चंद लोगों को पूरी विचारधारा का प्रतीक बनाकर हिंदुत्व पर सवाल खड़ा कर देना कैसे ठीक हो सकता है?

क्या कभी सांघवी लिख पाएँगे कि दुनियाभर में आतंकवाद की घटनाएँ बढ़ रही हैं तो इसका जिम्मेदार कौन है? क्या सांघवी लिख पाएँगे कि भारत समेत दुनिया के बड़े हिस्से में धर्मांतरण का एक सुनियोजित षड्यंत्र चल रहा है तो इसका जिम्मेदार कौन है? नहीं। क्योंकि हिंदुत्व पर सवाल खड़ा करना आसान है वो भी बिना किसी तर्क के, बिना किसी ठोस सबूत के।

वह खुद अपने लेख में आगे कहते हैं कि ‘यह व्याख्या अपने साथ कई और सवाल खड़े कर देती है, जिनके तार्किक उत्तर मौजूद नहीं हैं‘। फिर भी वो खुलकर हिंदुत्व को इसका जिम्मेदार ठहरा देते हैं। इसमें उन्होंने आगे विभाजन के लिए गाँधी और कॉन्ग्रेस को लगभग क्लीन चिट देते हुए, वीडी सावरकर (वीर सावरकर) को इसका जिम्मेदार ठहरा दिया है।

द प्रिंट की रिपोर्ट का एक अंश

अपने लेख में पहले तो सांघवी ने यह साबित करने की कोशिश की है कि विभाजन से असल में ‘हिंदुत्ववादियों’ को फायदा हुआ है। आगे वो टू नेशन थ्योरी को लेकर कहते हैं कि दो-राष्ट्र सिद्धांत गाँधी ने नहीं दिया था बल्कि सावरकर ने इसे पेश किया है।

सांघवी जैसे लोग सावरकर की 1937 में दिए गए भाषण के बहाने उन्हें ‘टू नेशन थ्योरी’ का जनक साबित करने की कोशिश करते हैं लेकिन वो सर सैयद अहमद खान के 1876 के बयानों को भूल जाते हैं।

सैयद अहमद ने 1876 में कहा था, “मुझे अब पूरा यकीन हो गया है कि हिंदू और मुसलमान कभी एक राष्ट्र नहीं बन सकते क्योंकि उनका धर्म और जीवन-शैली एक-दूसरे से बिल्कुल अलग है।” सर मुहम्मद इकबाल 1930 में मुस्लिम लीग के अध्यक्ष बने और पहली बार सार्वजनिक रूप से एक स्वतंत्र, संप्रभु मुस्लिम देश की माँग की थी।

सावरकर के जिस बयान का हवाला दिया जाता है, उसमें भी सावरकर ने भारत में हिंदू-मुस्लिम एकता की बात कही था। हालाँकि, सावरकर पर सवाल उठाना आसान है और सांघवी जैसों को लगता है कि सावरकर के बहाने ही सही, हिंदुत्व को घेरा जा सकता है।

द प्रिंट की रिपोर्ट का एक अंश

सांघवी ने अपने लेख में कहा है कि संघ परिवार का एक हिस्सा गोडसे को ‘महिमामंडित’ करता है। गोडसे जो खुद RSS की आलोचना करता था, उसके नाम पर संघ परिवार को बदनाम करना का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है। संघ को गाँधी बताने की साजिश चलती रही है लेकिन हकीकत इससे अलग है।

गाँधी खुद संघ की शाखा में गए, गाँधी ने संघ के काम को लेकर प्रसन्नता व्यक्त की। संघ में हर रोज जिस महापुरुषों का स्मरण किया जाता है, उसमें गाँधी भी शामिल हैं। संघ के एकात्मता स्त्रोत में लिखा है, “दादाभाई गोपबन्धुः तिलको गान्धिरादृताः, रमणो मालवीयश्च श्रीसुब्रह्मण्यभारती।”

कितने और संगठन ऐसे हैं जो राजनीति और 2 अक्टूबर के अलावा भी गाँधी को याद करते हैं, गाँधी की जीवनदृष्टि का अनुसरण करने की बात करते हैं। संघ ऐसा संगठन है लेकिन कोशिश की जाती है कि कुछ लोगों के नाम के बहाने संघ के विचार को किसी भी तरह बदनाम कर दिया जाए।

सांघवी ने अपने लेख में आगे कुछ बातें लिखी है, जिनमें बताया है कि कैसे गोडसे ने RSS छोड़ दी थी आदि-आदि। लेकिन फिर भी उसी महीन विचार के जरिए संघ को बदनाम करने की भी कोशिश की है।

लेख को पढ़ने से स्पष्ट हो जाता है कि सांघवी के पास अपनी बात साबित करने के लिए तर्क नहीं है। फिर भी उन्होंने हिंदुत्व को निशाना बनाया, संघ परिवार को निशाना बनाया और इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम घसीटने की कोशिश की। यह उसी सोच का प्रतीक है कि लोगों के मन में किसी विचार को लेकर संदेह पैदा कर दिया जाए और धीरे-धीरे इसे पनपने दिया जाए ताकि यह संदेह का बीज ही आगे चलकर वटवृक्ष बन सके।

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शिव
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7 वर्षों से खबरों की तलाश में भटकता पत्रकार...

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