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सोशल मीडिया ही जिनकी दुनिया, उन्होंने नेपाल में पलट दी सत्ता: भारत में हर साल ₹72 लाख करोड़ कर डालते हैं खर्च, जानें Rizz-Brat-Delulu जैसे स्लैंग वाले GenZ के बारे में

नेपाल की सड़कों पर कुछ ऐसा नजारा देखने को मिला जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया। हजारों की संख्या में देश के युवा, जिन्हें GenZ यानी ‘जेनरेशन जेड’ कहते हैं, वो सरकार के खिलाफ उतर आए। वजह बनी सोशल मीडिया पर बैन और देश में भ्रष्टाचार।

ये आंदोलन इतना तेज हुआ कि देखते ही देखते नेपाल में तख्तापलट हो गया। अब सवाल उठता है कि भारत के GenZ क्या कर रहे हैं?

GenZ कौन हैं?

GenZ वे युवा हैं, जिनका जन्म 1997 से 2012 के बीच हुआ है। आज इनकी उम्र 12 से 27 साल के बीच है। भारत में इनकी संख्या करीब 37 करोड़ मानी जाती है, जो देश की आबादी का लगभग एक चौथाई हिस्सा है। यानी भारत का भविष्य GenZ के हाथों में ही है। कंपनियाँ, सरकारें और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स तक इन्हीं को ध्यान में रखकर अपनी नीतियाँ तय कर रहे हैं।

स्लैंग से मशहूर GenZ

भारत के GenZ की इंटरनेट पर अपनी भाषा है, जिसे स्लैंग के रूप में जाना जाता है। ये स्लैंग अब हर जगह छाए हुए हैं। अब ये स्लैंग सिर्फ व्हाट्सऐप के चैट्स तक सीमित नहीं है बल्कि बॉलीवुड के गानों और विज्ञापनों तक पहुँच गए हैं। कुछ स्लैंग का अर्थ समझते हैं:

rizz – मतलब किसी को इम्प्रेस करने की कला।
delulu– जब इंसान हकीकत छोड़कर ख्वाबों में जीने लगे।
brat– थोड़ा बागी, थोड़ा नखरीला अंदाज।

इसले अलावा skibidi, delulu, और tradwife जैसे कुछ स्लैंग तो कैम्ब्रिज डिक्शनरी तक में भी शामिल किए गए हैं। यह पीढ़ी अपने अलग बोलचाल और अंदाज से बाकी सबको प्रभावित कर रही है।

भारत में GenZ हर साल ₹72 लाख करोड़ करते है खर्च

GenZ न सिर्फ इंटरनेट पर बल्कि अर्थव्यवस्था में भी अपनी पकड़ मजबूत कर चुके हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत के GenZ हर साल 72 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च करते हैं। देश के कुल उपभोक्ता खर्च का करीब 43 प्रतिशत हिस्सा GenZ से ही आता है। वहीं अन्य रिपोर्ट बताती है कि GenZ अपनी कमाई का 30 प्रतिशत हिस्सा सेविंग में डालते हैं।

GenZ सबसे ज्यादा फैशन, डाइनिंग और मनोरंजन में खर्च कर रहे हैं। सर्वे के मुताबिक, उनका 50 प्रतिशत खर्च फुटवियर, 48 प्रतिशत डाइनिंग, 48 प्रतिशत बाहरी मनोरंजन और 47 प्रतिशत फैशन और लाफस्टाइल पर खर्च होता है। यही नहीं GenZ ट्रैवलर्स साल में दो से तीन बार ट्रिप पर भी जाते हैं, जिनमें 94 प्रतिशत युवा साल में एक बार तो जरूर ही ट्रैवल करते हैं।

Net Influencer की रिपोर्ट के अनुसार, 85 प्रतिशत GenZ सिर्फ वही ब्रांड खरीदते हैं जो उनके जीवन के सिद्धांतों से मेल खाते हों। उन्हें फालतू विज्ञापन पसंद नहीं है। यही वजह है कि कंपनियाँ अब GenZ की जीवनशैली को फोकस में रखते हुए अपने प्रोडक्ट ला रहे हैं। 15 प्रतिशत ब्रांड ने अपनी मार्केटिंग स्ट्रैटेजी को सिर्फ GenZ पर फोकस रखा है।

भारत को दुनिया का सबसे बड़ा GenZ मार्केट भी माना जा रहा है। आने वाले समय में उनका खर्च दोगुना होने का अनुमान है।

भारत की राजनीति में GenZ का दखल

भारत की राजनीति में GenZ का दखल अभी शुरुआती स्तर पर है। ये पीढ़ी शांतिपूर्ण लेकिन मजबूत राजनीतिक जागरूकता का अनुभव कर रही है। बड़ी संख्या में GenZ अब वोट डालने लायक उम्र में पहुँच चुके हैं लेकिन उनका जुड़ाव ज्यादातर सोशल मीडिया बहसों तक सीमित है।

CSPS लोकनीति सर्वे 2024 के मुताबिक, इस पीढ़ी की सबसे बड़ी चिंताएँ बेरोजगारी, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सामाजिक एकता है। 48 प्रतिशत GenZ मानते हैं कि बेरोजगारी बढ़ी है, वहीं 55 प्रतिशत GenZ को बढ़ते प्रदूषण की चिंता खल रही है।

सोशल मीडिया GenZ की पहली पसंद

भारत का GenZ दिन की शुरुआत से लेकर रात तक सोशल मीडिया से जुड़ा रहता है। Google और Kantar की रिपोर्ट के मुताबिक, 91 प्रतिशत GenZ न्यूज अपडेट के लिए सोशल मीडिया पर निर्भर रहते हैं। इनमें भी लगभग 88 प्रतिशत लोग यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर वीडियो के जरिए ही समाचार देखते हैं।

इस पीढ़ी के लिए सोशल मीडिया सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि असली पार्लियामेंट बन चुका है। ये सोशल मीडिया उनके लिए विवादों और ‘ऑनलाइन लफड़ा’ का अड्डा भी बन जाता है, जहाँ हर दिन कोई नया झगड़ा या ट्रेंड जन्म लेता है।

NDTV की रिपोर्ट बताती हैं कि भारत के GenZ बोर होना लगभग भूल चुके हैं। मोबाइल और इंटरनेट ने उन्हें हर पल व्यस्त कर दिया है लेकिन यही व्यस्तता उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भारी पड़ रही है। Frontline की रिपोर्ट के मुताबिक, चिंता और मानसिक दबाव इस पीढ़ी की बड़ी चुनौतियों में से एक है।

करियर के मामले में GenZ की सोच

काम और करियर के मामले में GenZ की सोच उनसे पहले वाली पीढ़ियों से अलग है। ये पीढ़ी काम और पढ़ाई के बीच में अक्सर अकेलेपन और थकान का अनुभव करती है। हालाँकि, करियर को लेकर इस पीढ़ी की सोच अलग है।

फोर्ब्स की एक रिपोर्ट बताती है कि यह पीढ़ी शादी, घर खरीदने और बड़ी जिम्मेदारियों जैसे जीवन के बड़े फैसलों को टाल रही है। रिपोर्ट में बताया गया कि करियर के चलते 50 प्रतिशत GenZ ने अपने निजी शौक छोड़ दिए, जो कि किसी भी अन्य पीढ़ी की तुलना में काफी ज्यादा है।

India Today की रिपोर्ट के मुताबिक, नौकरी की दुनिया में भी इन्हें सख्त नियम और बॉसगिरी पसंद नहीं। हाल ही में GenZ stare नाम का ट्रेंड चर्चा में आया था, जिसमें मैनेजर्स को इन युवाओं की खामोश घूरती नजरें असहज कर देती हैं। वे फ्लेक्सिबल कामकाज और फ्रीडम चाहते हैं, न कि सुबह 9 से शाम 5 तक दफ्तर की बंधी हुई दिनचर्या।

नेपाल में GenZ ने सोशल मीडिया बैन और भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़कों पर उतरकर सरकार को गिरा दिया। वहीं भारत में GenZ की दुनिया रील्स, मीम्स, ब्रांड्स और शॉपिंग के बीच ही अटकी है। लेकिन इस बात को इनकार नहीं किया जा सकता है कि उनके पास संख्या, ताकत और तकनीकी समझ किसी भी दूसरी पीढ़ी से अधिक है। अगर यही GenZ भारत की राजनीति और समाज में सक्रिय रूप से उतरें तो भारत की तस्वीरे बदल देंगे।

मॉरीशस के विकास में भारत ने बढ़ाया सहयोग का हाथ, 100 इलेक्ट्रिक बस-आर्थिक पैकेज देने की घोषणा: शिक्षा-उर्जा समेत कई अहम समझौते, PM मोदी ने बताया- परिवार

भारत दौरे पर आए मॉरीशस के प्रधानमंत्री नवीनचंद्र रामगुलाम के साथ प्रधानमंत्री मोदी ने वाराणसी में मुलाकात की। इस दौरान दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय वार्ता भी हुई और कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। इनमें 100 इलेक्ट्रिक बसों की आपूर्ति, ऊर्जा, शिक्षा समेत कई क्षेत्रों में साझेदारी शामिल हैं।

मॉरिशस को आर्थिक पैकेज देने की घोषणा भी की गई है। इससे मॉरीशस के बुनियादी ढाँचे को मजबूत करने और रोजगार के नए अवसर तलाशने में मदद मिलेगी। दोनों प्रधानमंत्री के बीच क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर भी बातचीत हुई।

सिर्फ साझीदार नहीं, परिवार हैं हम- पीएम मोदी

समझौतों से दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को और मजबूती मिलेगी। इस मौके पर पीएम मोदी ने कहा कि उन्हें गर्व है कि भारत और मॉरीशस सिर्फ साझेदार नहीं, बल्कि एक परिवार हैं। वहाँ की जीवन धारा में भारतीय रच बस गए हैं। मॉरीशस भारत की पड़ोसी पहले नीति और विजन महासागर का अहम महत्वपूर्ण स्तंभ है।

मार्च के मॉरीशस दौरे के दौरान पीएम मोदी राष्ट्रीय दिवस समारोह में शामिल हुए थे, उसको याद करते हुए उन्होंने कहा कि हमने अपने संबंधों को रणनीतिक साझेदारी का दर्जा दिया था। आज, हमने द्विपक्षीय सहयोग के सभी पहलुओं की विस्तार से समीक्षा की है।

चागोस समझौते के समापन पर प्रधानमंत्री रामगुलाम और मॉरीशस की जनता को बधाई देते हुए पीएम मोदी ने कहा कि भारत ने हमेशा से मॉरीशस के उपनिवेशवाद का विरोध और उसकी संप्रभुता को पूर्ण मान्यता देने का समर्थन करता रहा है और मॉरीशस के साथ मजबूती से खड़ा रहा है। मॉरीशस के विकास में भागीदार बनना भारत के लिए गर्व की बात है।

पीएम मोदी ने कहा कि आईआईटी मद्रास और भारतीय वृक्षारोपण प्रबंधन संस्थान ने मॉरीशस विश्वविद्यालय के साथ समझौते किए हैं। इससे अनुसंधान, शिक्षा और इनोवेशन को मदद मिलेगी। भारत मॉरीशस के विशेष आर्थिक क्षेत्र की सुरक्षा और समुद्री क्षमता को मजबूत करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। मॉरीशस के तट रक्षक जहाज को भारत में रिफिट किया जा रहा है। उनके 120 अधिकारियों को भी भारत में प्रशिक्षित किया जा रहा है।

मॉरीशस के विकास में भारत मददगार- रामगुलाम

समझौते के बाद मॉरीशस के प्रधानमंत्री डॉ. नवीनचंद्र रामगुलाम ने कहा, “भारत मॉरीशस की प्रगति और विकास की यात्रा में उसके साथ रहा है। हमने राष्ट्रीय विकास के प्रमुख क्षेत्रों में भारत की उदार सहायता और विशेषज्ञता का लाभ उठाया है, जिसमें स्वास्थ्य, शिक्षा, क्षमता निर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा, बुनियादी ढाँचा और समुद्री सुरक्षा शामिल हैं। इन क्षेत्रों में भारत का समय पर दिया गया समर्थन मॉरीशसवासियों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने में ठोस बदलाव ला रहा है।”

कहाँ-कहाँ जाएँगे पीएम रामगोपाल

मॉरीशस के प्रधानमंत्री 10 सितंबर 2025 को वाराणसी पहुँचे हैं। वह 16 सितंबर तक भारत में रहेंगे। इस दौरान अयोध्या में रामलला के दर्शन करेंगे। वे तिरुपति बालाजी भी जाएँगे। डॉ रामगोपाल 2014 में भारत आए थे। उस वक्त पीएम मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में मंत्रीपरिषद के साथ वे मौजूद थे। वे एकमात्र गैरसार्क देशों के राष्ट्राध्यक्ष थे, जिन्हें कार्यक्रम में बुलाया गया था।

पीएम मोदी का भव्य स्वागत

वाराणसी पहुँचने के बाद पीएम मोदी ने 3 किलोमीटर का रोड शो किया। इस दौरान लोग सड़कों के दोनों ओर खड़े थे। ये लोग पीएम मोदी पर फूलों की बारिश कर रहे थे। होटल ताजमहल पहुँचने तक प्रधानमंत्री के काफिले पर फूल बरसाये गए। कई महिला कार्यकर्ताओं को ‘प्रधानमंत्री जिंदाबाद’ के नारे लगाते भी देखा गया। प्रधानमंत्री मोदी के स्वागत में वाराणसी की सड़कों पर बीजेपी कार्यकर्ताओं ने जगह-जगह पोस्टर लगाए।

कॉन्ग्रेस- एसपी के मंसूबे नाकाम

विदेशी मेहमान के सामने पीएम मोदी का विरोध करने की योजना बना रहे कॉन्ग्रेस-समाजवादी पार्टी के नेताओं के मंसूबे को पुलिस ने नाकाम कर दिया। कॉन्ग्रेस के जिलाध्यक्ष राजेश्वर सिंह पटेल और समाजवादी पार्टी जिलाध्यक्ष सुजीत यादव लक्कड़ को हाउस अरेस्ट कर लिया गया। इन्हें हर हाल में घर से नहीं निकलने की हिदायत दी गई। एसपी नेता अमन यादव को हिरासत में ले लिया गया और दूसरे कई नेताओं को 10 सितंबर की रात को ही हाउस अरेस्ट कर दिया गया।

कॉन्ग्रेस ने पीएम मोदी के विरोध की घोषणा पहले ही कर दी थी, इसलिए पुलिस ने एहतियान ये कदम उठाए थे। कॉन्ग्रेस ने कहा था कि वे मॉरीशस के पीएम रामगुलाम का विरोध नहीं कर रहे हैं, बल्कि पीएम मोदी का विरोध कर रहे हैं।

‘अपने देश की समस्याओं पर दो ध्यान’ : स्विट्जरलैंड को भारतीय राजनयिक ने लगाई लताड़, UNHRC के मंच पर भारत को ‘अल्पसंख्यकों’ पर दे रहा था ज्ञान

जिनेवा में चल रहे संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के 60वें सत्र में भारत ने स्विट्जरलैंड को कड़ा जवाब दिया। स्विट्जरलैंड ने भारत में अल्पसंख्यकों के अधिकार और मीडिया की आजादी को लेकर सवाल उठाए थे।

इसके जवाब में भारत ने न सिर्फ इन टिप्पणियों को गलत और भ्रामक बताया, बल्कि स्विट्जरलैंड को अपने देश में नस्लवाद और भेदभाव जैसे मुद्दों पर ध्यान देने की सलाह दी। साथ ही भारत ने इन समस्याओं से निपटने में स्विट्जरलैंड की मदद करने की पेशकश भी की।

मंगलवार (9 सितंबर 2025) को जिनेवा में UNHRC की बैठक में स्विट्जरलैंड ने भारत से अल्पसंख्यकों के अधिकारों और मीडिया की आजादी को लेकर सवाल उठाए। उसने कहा, “हम भारत में सरकार से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए प्रभावी कदम उठाने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ मीडिया की स्वतंत्रता के अधिकारों को बनाए रखने की अपील करते हैं।” यह बयान ऐसे समय आया है जब परिषद में वैश्विक मानवाधिकारों पर चर्चा हो रही थी और स्विट्जरलैंड UNHRC की अध्यक्षता कर रहा है।

इस पर बुधवार (10 सितंबर 2025) को भारत के राजनयिक क्षितिज त्यागी ने सख्त प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “हम अपने घनिष्ठ मित्र और साझेदार स्विटजरलैंड की ओर से की गई आश्चर्यजनक और गलत जानकारी पर आधारित टिप्पणियों पर भी प्रतिक्रिया देना चाहेंगे। क्योंकि स्विटजरलैंड UNHRC का अध्यक्ष है, इसलिए उसके लिए यह और भी महत्वपूर्ण है कि वह परिषद का समय ऐसी बातों पर बर्बाद करने से बचे जो सरासर झूठी हैं और भारत की वास्तविकता के साथ न्याय नहीं करतीं।”

UNHRC की पाँचवीं बैठक में बोलते हुए त्यागी ने कहा कि स्विट्जरलैंड को एक अध्यक्ष होने के नाते, झूठे और भ्रामक बयानों से बचना चाहिए। उन्होंने स्विट्जरलैंड में मौजूद नस्लवाद, भेदभाव और जेनोफोबिया (विदेशियों के प्रति डर या नफरत) जैसे मुद्दों की ओर इशारा करते हुए कहा कि उसे पहले अपने आंतरिक हालात पर ध्यान देना चाहिए।

भारत की स्थिति को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा, सबसे विविध और जीवंत लोकतंत्र है और भारत की सभ्यता में बहुलता (pluralism) को हमेशा सम्मान मिला है।

उन्होंने आगे कहा, “स्विट्जरलैंड भारत का करीबी मित्र है, लेकिन उसके हालिया बयान गलत और भ्रामक हैं। उसे परिषद का समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। बेहतर होगा कि वह अपने देश में मौजूद नस्लवाद, व्यवस्थित भेदभाव और जेनोफोबिया जैसे मुद्दों पर ध्यान दे। भारत, जो विविधता और लोकतंत्र में विश्वास रखता है, ऐसे मुद्दों से निपटने में स्विट्जरलैंड की मदद करने को तैयार है।”

संयुक्त राष्ट्र के मंच से आतंकवाद को लेकर भारत ने पाकिस्तान को भी जमकर सुनाया। राजनियक क्षितिज त्यागी ने कहा, “हम फिर उस देश के उकसावे का जवाब देने को मजबूर हैं, जिसके अपने नेताओं ने हाल ही में उसकी तुलना ‘डंप ट्रक’ से की थी। शायद उस देश के लिए यही सही उदाहरण है, जो जो इस प्रतिष्ठित परिषद के सामने बार-बार झूठ और घिसे-पिटे दुष्प्रचार को दोहराता रहता है।”

इस दौरान उन्होंने 9/11 हमले से पुलवामा, उरी, पठानकोट, मुंबई और पहलगाम आतंकी हमलों का भी जिक्र किया और कहा कि यहाँ पाकिस्तान नैतिकता का ढोंग करता है। असल में वो ही उन नेटवर्क को पनाह और फंडिंग देता है, जो वैश्विक सुरक्षा को खतरे में डालते हैं।

नेपाल में लाखों भारतीय, सीमा पर सैंकड़ों ट्रक: GenZ प्रदर्शन में आगजनी-हिंसा देख सब घबराए, जानें मदद के लिए मोदी सरकार कैसे कर रही काम

नेपाल में हिंसा के बाद काठमांडू एयरपोर्ट बंद कर दिया गया था। इसकी वजह से बड़ी संख्या में भारतीय फँसे हुए हैं। यहाँ करीब 7 लाख भारतीय रहते हैं। इसके अलावा घूमने-फिरने आने वाले भारतीयों की संख्या भी काफी है। सिर्फ काठमांडू एयरपोर्ट पर 400 लोगों के फँसे होने की जानकारी मिली है। इनलोगों को वापस लाने के लिए नेपाली सेना से भारत लगातार संपर्क में है। इसके अलावा लोगों को दूतावास से संपर्क करने के लिए कहा गया है।

भारत सरकार ने इमरजेंसी हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए हैं। भारतीय दूतावास वहाँ मौजूद लोगों से संपर्क कर रहा है। भारतीय नागरिक +977-9808602881 और +977-9810326134 पर कॉल कर मदद की गुहार लगा सकते हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने ये जानकारी दी है। नेपाल से सटे उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल समेत सभी राज्यों की सीमाओं पर चौकसी बढ़ा दी गई है। सीमा के अंदर सिर्फ भारतीयों को आने की अनुमति दी जा रही है।

भारत-नेपाल सीमा पर 3000 से ज्यादा ट्रक फँसे हुए हैं। ट्रक चालकों ने हालात की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि घंटों से बॉर्डर पर फँसे हुए हैं। कई ट्रकों पर पेट्रोल-डीजल लदे हुए हैं। बॉर्डर पर ऐसे कई लोग भी फँसे हुए हैं, जो दिन में कामकाज के लिए भारत आते हैं और शाम को वापस चले जाते हैं।

भारतीय महिला ने की थी बचाने की अपील

एक भारतीय महिला ने जनरेशन-जी के विरोध प्रदर्शनों के बीच मदद और बचाव की तत्काल अपील थी। महिला का नाम उपासना गिल है, जो एक वॉलीबॉल टूर्नामेंट के लिए नेपाल गई थी। उपासना ने बताया कि उनके होटल को भीड़ ने आग लगा दी, जिससे उन्हें अपना सामान छोड़कर भागना पड़ा। उन्होंने कहा कि वह बड़ी मुश्किल से उस भीड़ से बच पाईं जो बड़े-बड़े डंडे लेकर उनका पीछा कर रही थी।

नेपाल में मौजूदा संकट की शुरुआत 4 सितंबर 2025 को सोशल मीडिया पर बैन के बाद शुरू हुआ। ‘जेन जी’ युवाओं ने सड़क पर उतरकर हिंसा, आगजनी और विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन तेजी से सरकार के भ्रष्टाचार और जवाबदेही की कमी के खिलाफ व्यापक आंदोलन में बदल गया। इसके बाद राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री समेत कई मंत्रियों ने इस्तीफा दिया।

अंतरिम सरकार के गठन के प्रयास तेज

यूट्यूब, व्हाट्सएप, फेसबुक समेत सभी सोशल मीडिया पर बैन खत्म कर दिया गया है, लेकिन युवाओं का गुस्सा खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। नेपाली सेना ने पूरे हालात को संभाला है। अंतरिम सरकार बनाने के लिए ऑनलाइन वोटिंग के जरिए रायशुमारी की जा रही है। जेन जी के युवाओं ने बढ़चढ़कर इसमें हिस्सा लिया है। पूर्व जज सुशीला कार्की और पूर्व मेयर बालेन शाह का नाम सबसे ऊपर है।

भारत ने भी नेपाल की स्थिति पर गंभीर चिंता जताई है। वहाँ मौजूद भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर कई कदम उठाए गए हैं। विदेश मंत्रालय ने एडवाइजरी जारी कर नागरिकों को दूतावास के संपर्क में रहने के लिए कहा है।

नेपाल में जेन जी के हिंसक प्रदर्शनों में तीन सुरक्षाकर्मियों समेत अब तक 30 लोगों के मारे जाने की खबर है। जेन जी के इस आंदोलन को करीब 3 करोड़ लोगों का समर्थन मिला। काठमांडू समेत कई जगहों पर फिलहाल शांति है। लेकिन दूर-दराज के इलाकों में छिटपुट हिंसा हो रही है।

‘वसुधैव कुटुंबकम’ से हुए प्रेरित, माँ भारती को किया जीवन समर्पित: PM मोदी ने RSS प्रमुख को दी 75वें जन्मदिन पर बधाई, बताया ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ का प्रबल समर्थक

आज 11 सितंबर है। यह दिन अलग-अलग स्मृतियों से जुड़ा है। एक स्मृति 1893 की है, जब स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में विश्वबंधुत्व का संदेश दिया और दूसरी स्मृति है 9/11 का आतंकी हमला, जब विश्व बंधुत्व को सबसे बड़ी चोट पहुँचाई गई। आज के दिन की एक और विशेष बात है। आज एक ऐसे व्यक्तित्व का 75वाँ जन्मदिवस है जिन्होंने वसुधैव कुटुंबकम के मंत्र पर चलते हुए समाज को संगठित करने, समता-समरसता और बंधुत्व की भावना को सशक्त करने में अपना पूरा जीवन समर्पित किया है।

संघ परिवार में जिन्हें परम पूजनीय सरसंघचालक के रूप में श्रद्धाभाव से संबोधित किया जाता है, ऐसे आदरणीय मोहन भागवत जी का आज जन्मदिन है। यह एक सुखद संयोग है कि इसी साल संघ भी अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है। मैं भागवत जी को हार्दिक शुभकामनाएँ देता हूँ और प्रार्थना करता हूँ कि ईश्वर उन्हें दीर्घायु और उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करें।

मेरा मोहन भागवत जी के परिवार से बहुत गहरा संबंध रहा है। मुझे उनके पिता, स्वर्गीय मधुकरराव भागवत जी के साथ निकटता से काम करने का सौभाग्य मिला था। मैंने अपनी पुस्तक ज्योतिपुंज में मधुकरराव जी के बारे में विस्तार से लिखा भी है। वकालत के साथ-साथ मधुकरराव जी जीवनभर राष्ट्र निर्माण के कार्य में समर्पित रहे। अपनी युवावस्था में उन्होंने लंबा समय गुजरात में बिताया और संघ कार्य की मजबूत नींव रखी।

मधुकरराव जी का राष्ट्र निर्माण के प्रति झुकाव इतना प्रबल था कि अपने पुत्र मोहनराव को भी इस महान कार्य के लिए निरंतर गढ़ते रहे। एक पारसमणि मधुकरराव ने मोहनराव के रूप में एक और पारसमणि तैयार कर दी।

भागवत जी का पूरा जीवन सतत प्रेरणा देने वाला रहा है। वे 1970 के दशक के मध्य में प्रचारक बने। सामान्य जीवन में प्रचारक शब्द सुनकर ये भ्रम हो जाता है कि कोई प्रचार करने वाला व्यक्ति होगा, लेकिन जो संघ को जानते हैं उनको पता है कि प्रचारक परंपरा संघ कार्य की विशेषता है। गत 100 वर्षों में देशभक्ति की प्रेरणा से भरे हजारों युवक-युवतियों ने अपना घर-परिवार त्याग करके पूरा जीवन संघ परिवार के माध्यम से राष्ट्र को समर्पित किया है। भागवत जी भी उस महान परंपरा की मजबूत धुरी हैं।

भागवत जी ने उस समय प्रचारक का दायित्व संभाला, जब तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने देश पर इमरजेंसी थोप दी थी। उस दौर में प्रचारक के रूप में भागवत जी ने आपातकाल-विरोधी आंदोलन को निरंतर मजबूती दी। उन्होंने कई वर्षों तक महाराष्ट्र के ग्रामीण और पिछड़े इलाकों, विशेषकर विदर्भ में काम किया। 1990 के दशक में अखिल भारतीय शारीरिक प्रमुख के रूप में मोहन भागवत जी के कार्यों को आज भी कई स्वयंसेवक स्नेहपूर्वक याद करते हैं। इसी कालखंड में मोहन भागवत जी ने बिहार के गाँवों में अपने जीवन के अमूल्य वर्ष बिताए और समाज को सशक्त करने के कार्य में समर्पित रहे।

वर्ष 2000 में वे सरकार्यवाह बने और यहाँ भी भागवत जी ने अपनी अनोखी कार्यशैली से हर कठिन परिस्थिति को सहजता और सटीकता से संभाला।

2009 में वे सरसंघचालक बने और आज भी अत्यंत ऊर्जा के साथ कार्य कर रहे हैं। भागवत जी ने राष्ट्र प्रथम की मूल विचारधारा को हमेशा सर्वोपरि रखा।

सरसंघचालक होना मात्र एक संगठनात्मक जिम्मेदारी नहीं है। यह एक पवित्र विश्वास है, जिसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी दूरदर्शी व्यक्तित्वों ने आगे बढ़ाया है और इस राष्ट्र के नैतिक और सांस्कृतिक पथ को दिशा दी है। असाधारण व्यक्तियों ने इस भूमिका को व्यक्तिगत त्याग, उद्देश्य की स्पष्टता और माँ भारती के प्रति अटूट समर्पण के साथ निभाया है। यह गर्व की बात है कि मोहन भागवत जी ने न केवल इस विशाल जिम्मेदारी के साथ पूर्ण न्याय किया है, बल्कि इसमें अपनी व्यक्तिगत शक्ति, बौद्धिक गहराई और सहृदय नेतृत्व भी जोड़ा है।

भागवत जी का युवाओं से सहज जुड़ाव है और इसलिए उन्होंने अधिक से अधिक युवाओं को संघ कार्य के लिए प्रेरित किया है। वे लोगों से प्रत्यक्ष संपर्क में रहते हैं, और संवाद करते रहते हैं। श्रेष्ठ कार्य पद्धति को अपनाने की इच्छा और बदलते समय के प्रति खुला मन रखना, ये मोहनजी की बहुत बड़ी विशेषता रही है। अगर हम व्यापक संदर्भ में देखते हैं तो संघ की 100 साल की यात्रा में भागवत जी का कार्यकाल संघ में सर्वाधिक परिवर्तन का कालखंड माना जाएगा। चाहे वो गणवेश परिवर्तन हो, संघ शिक्षा वर्गों में बदलाव हो, ऐसे अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन उनके निर्देशन में संपन्न हुए।

कोरोना काल में मोहन भागवत जी के प्रयास विशेष रूप से याद आते है। उस कठिन समय में उन्होंने स्वयंसेवकों को सुरक्षित रहते हुए समाजसेवा करने की दिशा दी और टेक्नोलॉजी का उपयोग बढ़ाने पर बल दिया। उनके मार्गदर्शन में स्वयंसेवकों ने जरूरतमंदों तक हरसंभव सहायता पहुँचाई, जगह-जगह मेडिकल कैंप लगाए। उन्होंने वैश्विक चुनौतियों और वैश्विक विचार को प्राथमिकता देते हुए व्यवस्थाओं को विकसित किया। हमें कई स्वयंसेवकों को खोना भी पड़ा, लेकिन भागवत जी की प्रेरणा ऐसी थी कि अन्य स्वयंसेवकों की दृढ़ इच्छाशक्ति कमजोर नहीं पड़ी।

इस वर्ष की शुरुआत में, मैंने नागपुर में उनके साथ माधव नेत्र चिकित्सालय के उद्घाटन के दौरान मैंने कहा था कि संघ अक्षयवट की तरह है, जो राष्ट्रीय संस्कृति और चेतना को ऊर्जा देता है। इस अक्षयवट वृक्ष की जड़ें इसके मूल्यों की वजह से बहुत गहरी और मजबूत हैं। इन मूल्यों को आगे बढ़ाने में जिस समर्पण से मोहन भागवत जी जुटे हुए हैं, वो हर किसी को प्रेरणा देता है।

समाज कल्याण के लिए संघ की शक्ति के निरंतर उपयोग पर मोहन भागवत जी का विशेष बल रहा है। इसके लिए उन्होंने पंच परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया है। इसमें स्व बोध, सामाजिक समरसता, नागरिक शिष्टाचार, कुटुम्ब प्रबोधन और पर्यावरण के सूत्रों पर चलते हुए राष्ट्र निर्माण को प्राथमिकता दी गई है। देश और समाज के लिए सोचने वाले हर भारतवासी को पंच परिवर्तन के इन सूत्रों से अवश्य प्रेरणा मिलेगी।

संघ का हर कार्यकर्ता वैभव संपन्न भारत माता का सपना साकार होते देखना चाहता है। इस सपने को पूरा करने के लिए जिस स्पष्ट विज़न और ठोस एक्शन की जरूरत होती है, मोहन जी इन दोनों गुणों से परिपूर्ण हैं।

मोहन जी के स्वभाव की एक और बड़ी विशेषता ये है कि वो मृदुभाषी हैं। उनमें सुनने की भी अद्भुत क्षमता है। यह विशेषता न केवल उनके दृष्टिकोण को गहराई देती है, बल्कि उनके व्यक्तित्व और नेतृत्व में संवेदनशीलता और गरिमा भी लाती है

मोहन जी, हमेशा ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ के प्रबल पक्षधर रहे हैं। भारत की विविधता और भारत भूमि की शोभा बढ़ा रही अनेक संस्कृतियों और परंपराओं के उत्सव में भागवत जी पूरे उत्साह से शामिल होते हैं। वैसे बहुत कम लोगों को ये पता है कि मोहन भागवत जी अपनी व्यस्तता के बीच संगीत और गायन में भी रुचि रखते है। वे विभिन्न भारतीय वाद्ययंत्रों में भी निपुण हैं। पठन-पाठन में उनकी रुचि, उनके अनेक भाषणों और संवादों में साफ दिखाई देती है।

पिछले दिनों देश में जितने सफल जन-आंदोलन हुए चाहे स्वच्छ भारत मिशन हो या बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, मोहन भागवत जी ने पूरे संघ परिवार को इन आंदोलनों में ऊर्जा भरने के लिए प्रेरित किया। मैं पर्यावरण से जुड़े प्रयासों और सस्टेनेबल लाइफस्टाइल को आगे बढ़ाने के प्रति उनके समर्पण को जानता हूँ। मोहन जी का बहुत जोर आत्मनिर्भर भारत पर भी है।

कुछ ही दिनों में विजयादशमी पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 100 वर्ष का हो जाएगा। यह भी सुखद संयोग है कि विजयादशमी का पर्व, गाँधी जयंती, लाल बहादुर शास्त्री की जयंती और संघ का शताब्दी वर्ष एक ही दिन आ रहे हैं।

यह भारत और विश्वभर के लाखों स्वयंसेवकों के लिए एक ऐतिहासिक अवसर है। हम स्वयंसेवकों का सौभाग्य है कि हमारे पास मोहन भागवत जी जैसे दूरदर्शी और परिश्रमी सरसंघचालक हैं, जो ऐसे समय में संगठन का नेतृत्व कर रहे हैं। एक युवा स्वयंसेवक से लेकर सरसंघचालक तक की उनकी जीवन यात्रा उनकी निष्ठा और वैचारिक दृढ़ता को दर्शाती है। विचार के प्रति पूर्ण समर्पण और व्यवस्थाओं में समयानुकूल परिवर्तन करते हुए उनके नेतृत्व में संघ कार्य का निरंतर विस्तार हो रहा है।

मैं माँ भारती की सेवा में समर्पित मोहन भागवत जी के दीर्घ और स्वस्थ जीवन की पुनः कामना करता हूँ। उन्हें जन्मदिवस पर अनेकानेक शुभकामनाएँ।

300 गिरफ्तारी, 2 लाख प्रदर्शनकारी और 80 हजार पुलिसकर्मी: नेपाल के बाद फ्रांस में हिंसा, जानें ‘ब्लॉक एवरीथिंग’ के नाम पर पेरिस की सड़कों पर हो रहा क्या-कुछ

नेपाल के बाद अब फ्रांस में राष्ट्रपति मैक्रों के खिलाफ जबरदस्त प्रदर्शन हुआ है। राष्ट्रपति की नीतियों का विरोध हो रहा है। इस प्रदर्शन को ‘Block Everything’ का नाम दिया गया है। ये प्रदर्शन दो दिन पहले प्रधानमंत्री बने सेबेस्टियन लेकोर्नू के लिए भी बड़ी चुनौती है। प्रदर्शनकारी लगातार बदल रहे प्रधानमंत्री और बजट कटौती का विरोध कर रहे हैं।

प्रदर्शन के दौरान बुधवार (10 सितंबर 2025) को पूरे फ्रांस में सड़कें धुओं से भर गया। जगह जगह लगे बैरिकेड्स में आग लगा दी गई। प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए आँसू गैस के गोले छोड़े गए और सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। करीब 80,000 सुरक्षाकर्मी प्रदर्शनकारियों को कंट्रोल करने की कोशिश कर रहे हैं।

क्या है ‘Block Everything’ प्रदर्शन

Block Everything प्रदर्शन का नेतृत्व विपक्षी लेफ्ट ग्रुप के नेता कर रहे हैं। राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के लिए एक बड़ी चुनौती पेश की और प्रधानमंत्री के रूप में सेबेस्टियन लेकोर्नू के पहले दिन को अग्नि परीक्षा में बदल दिया। लेकोर्नू राष्ट्रपति मैक्रों के करीबी हैं और रक्षा मंत्री के तौर पर 3 साल से काम कर रहे हैं।

‘ब्लोक्वोंस टाउट’ या ‘ ब्लॉक एवरीथिंग’ विरोध प्रदर्शन के जरिए स्कूल से ऑफिस तक में हड़ताल जैसे माहौल बना दिए गए हैं। पब्लिक ट्रांसपोर्ट से लेकर अस्पताल तक प्रभावित हुए हैं। यानी सबकुछ रोकने की कोशिश है।

प्रदर्शनकारियों के ‘ब्लॉक एवरीथिंग’ वाले अभियान के दौरान सड़कों पर ट्रैफिक जाम लग गया। हर तरफ आगजनी और अफरा तफरी का माहौल है। कई जगहों पर बस में भी आग लगा दी गई। दक्षिण-पश्चिम फ्रांस में बिजली के तार टूटने की वजह से ट्रेन सेवाएँ ठप हो गईं और यातायात बाधित हो गया।

फ्रांस के मंत्री ब्रूनो रिटेलेउ ने कहा कि देश भर में लगभग 200,000 लोग सड़कों पर उतर आए हैं, जबकि फ्रांस के सबसे बड़े श्रमिक संघों में से एक, सीजीटी यूनियन ने दावा किया कि लगभग 250,000 लोग सड़कों पर उतरे हैं।

क्यों लोग उतरे सड़कों पर?

फ्रांस में जनता की बुनियादी सुविधाओं में कटौती हो रही थी। सेवानिवृति की उम्र बढ़ाकर 62 साल से 64 साल कर दिया गया । मजदूर संगठनों का मानना है कि ये मजदूरों के साथ अन्याय है। इसलिए ये संगठन सरकार के खिलाफ हैं।

वहीं युवा रोजगार के अवसर में कमी आने, विश्वविद्यालयों की फीस में बढ़ोतरी से गुस्साए हुए हैं। यहाँ आए दिन हो रही नस्लीय हिंसा भी उनके गुस्से को बढ़ा रहा है।

फ्रांस में जीवन जीना अब उतना आसान नहीं रह गया है। यहाँ Cost of Living बढ़ी है। छोटे शहरों के लोगों को लगता है कि सरकार उनके लिए नहीं सोच रही है। प्रवासियों की समस्या भी विरोध का बड़ा कारण है। सामाजिक समानता और धर्मनिरपेक्षता को मानने वाले फ्रांस में घुसपैठिए बड़ी संख्या में आ गए हैं। महँगाई, पेंशन सुधार, बेरोजगारी और सामाजिक असमानता विरोध प्रदर्शन के केन्द्र में है।

लगातार हो रहा राजनीतिक बदलाव

राष्ट्रपति मैक्रों ने फ्रांस्वा बायरू के इस्तीफा देने के बाद लेकोर्नु को प्रधानमंत्री नियुक्त किया। बायरू संसद का विश्वास खो चुके थे। लेकोर्नु ने 10 सितंबर को आधिकारिक तौर पर पदभार संभाला। इसके बाद बवाल शुरू हो गया। गृहमंत्री ब्रूनो रिटेलो के मुताबिक करीब 50 नकाबपोश लोगों ने आगजनी शुरू की थी। पेरिस में 75 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। लेकिन गिरफ्तारियाँ क्यों हुईं, इसकी जानकारी नहीं दी गई थी। इसके बाद ज्यादा बवाल मचा।

‘गन वायलेंस’ पर बोलते समय डोनाल्ड ट्रंप के करीबी नेता चार्ली किर्क की हत्या, जश्न मनाने लगा लेफ्ट-लिबरल गैंग: हमास को मानते थे गाजा में मौतों का जिम्मेदार

डोनाल्ड ट्रंप के करीबी माने जाने वाले अमेरिकी नेता चार्ली किर्क की गले पर गोली मारकर हत्या कर दी गई है। चार्ली कर्क गुरुवार (11 सितंबर 2025) को यूटा में एक कॉलेज इवेंट के दौरान एक डिबेट में गन वायलेंस पर सवालों का जवाब दे रहे थे, जब यह घटना घटी। वीडियो में देखा गया कि गोली लगते ही खून बहने लगा और अफरा-तफरी मच गई।

डोनाल्ड ट्रंप ने इसे ‘रेडिकल लेफ्ट की करतूत’ बताया और कहा कि वामपंथियों को ‘बख्शेंगे नहीं’। हत्या को लेकर देश हिस्सों में बँट गया है। एक तरफ इस घटना को लेकर दक्षिणपंथी शोक में हैं और दूसरी तरफ लिबरल विचारधारा के लोग सोशल मीडिया पर चार्ली किर्क की मौत का मज़ाक उड़ा रहे हैं और खुशी मना रहे हैं।

हत्या कैसे हुई: गोलियों में तब्दील हुआ डिबेट

जानकारी के अनुसार, चार्ली किर्क महज 31 साल के थे और वे यूटा वैली यूनिवर्सिटी में ‘द अमेरिकन कमबैक’ और ‘प्रूव मी रॉन्ग’ के तहत बोल रहे थे। चार्ली किर्क एक सफेद टेंट के नीचे, माइक हाथ में लिए और दर्शकों से सवाल-जवाब कर रहे थे। ‘गन वायलेंस’ पर बात हो रही थी। तभी एक सवाल आया, जिसका चार्ली किर्क जवाब देने ही लगे, कि अचानक गोली चलने की आवाज आई।

चार्ली किर्क के गले में गोली लगी और वे अपने गर्दन को पकड़कर पीछे की ओर झुक गए। खून बहने लगा और चारों ओर अफरा-तफरी मच गई। दर्शक चीखने लगे और घबराहट में वहाँ से भागने लगे।

चार्ली किर्क ने गाजा को लेकर एक बयान दिया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि गाजा में महिलाओं और बच्चों की मौत के लिए इजरायल नहीं, बल्कि हमास जिम्मेदार है। इस तरह के बयानों के कारण वह अक्सर वामपंथियों और लिबरल लोगों के निशाने पर रहते थे।

चार्ली किर्क ने गाजा में महिलाओं और बच्चों की मौत के लिए इजरायल नहीं, बल्कि हमास को जिम्मेदार था।
चार्ली किर्क का गाजा-हमास पर ट्विट (फोटो साभार : X_@thatdayin1992)

दक्षिणपंथी और लिबरल लोगों की प्रतिक्रिया

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चार्ली किर्क की मौत पर बहुत दुख जताया है। ट्रंप ने चार्ली किर्क को ‘महान’ और ‘दिग्गज’ कहा। ट्रंप ने आरोप लगाया कि इस हत्या के पीछे वामपंथी हैं और उन्होंने कसम खाई कि दोषियों को छोड़ा नहीं जाएगा। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा कि चार्ली किर्क का युवाओं से खास रिश्ता था। सम्मान के तौर पर, ट्रंप ने रविवार (14 सितंबर 2025) शाम तक अमेरिकी झंडों को आधा झुकाने का आदेश भी दिया।

वहीं दूसरी ओर, वामपंथी और लिबरल लोग सोशल मीडिया पर चार्ली किर्क की मौत का जश्न मना रहे हैं। कई लोगों ने इसे ‘अच्छी खबर’ बताया और खुशी जताई। एक लड़की जो वहाँ मौजूद थी, उसने बताया कि उसने लिबरल लोगों को खुश होते हुए देखा। उसने कहा कि ऐसे लोगों को सीधे नर्क में जाना चाहिए।

एक ओर अमेरिकी नागरिक का रोते हुए पोस्ट सामने आया, जिसमें उन्होंने कहा वामपंथी और लिबरल्स अब चार्ली किर्क की हत्या का जश्न मना रहे हैं। अब हम सब चार्ली किर्क हैं…

हमलावर और जाँच

घटना के बाद एक व्यक्ति को पुलिस ने हिरासत में लिया, पर बाद में छोड़ दिया। FBI प्रमुख कश पटेल ने कहा: “व्यक्ति को पूछताछ के बाद रिहा कर दिया गया है, जाँच जारी है।” फिलहाल, यह स्पष्ट नहीं है कि हमलावर कौन था और वह कहाँ है। अधिकारी अभी भी हमलावर की तलाश कर रहे हैं। यूटा के गवर्नर स्पेंसर कॉक्स ने कहा कि अधिकारियों का मानना ​​है कि गोलीबारी में केवल एक ही व्यक्ति शामिल था।

इस हत्या ने अमेरिका में बढ़ती राजनीतिक हिंसा के बारे में गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं। यह घटना बताती है कि देश में राजनीतिक मतभेद अब बहस और संवाद से आगे बढ़कर हिंसक रूप ले रहे हैं।

एक तरफ ट्रंप की दोस्ती की गुहार, दूसरी तरफ नवारो की भड़काऊ बयानबाजी: जानिए – व्यापार वार्ता और टैरिफ के साथ भारत ने कैसे बनाया संतुलन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 9 सितंबर को एक-दूसरे को संदेश भेजे, जो बाहर से देखने में पुरानी दोस्ती को फिर से ताजा करने जैसे लगे। पीएम मोदी ने भारत और अमेरिका को ‘गहरे दोस्त और स्वाभाविक साझेदार’ बताया और कहा कि व्यापार वार्ता से इस साझेदारी में ‘असीमित संभावनाएँ’ खुल सकती हैं।

उनका ये संदेश ट्रम्प के ट्रुथ सोशल पोस्ट के जवाब में था, जिसमें ट्रम्प ने कहा कि वो व्यापार बाधाओं को हल करने की बातचीत से ‘खुश’ हैं और पीएम मोदी को अपना ‘बहुत अच्छा दोस्त’ बताया। ट्रम्प ने ये भी भविष्यवाणी की कि बातचीत को सफलतापूर्वक पूरा करने में ‘कोई दिक्कत’ नहीं होगी।

डोनाल्ड ट्रम्प की ये दोस्ती भरी बातें तब आईं, जब वॉशिंगटन ने भारतीय सामान पर टैरिफ को दोगुना कर दिया और आगे और बढ़ाने की धमकी दी। मजेदार बात ये है कि ट्रम्प ने नई दिल्ली को लुभाने की कोशिश में संदेश पोस्ट किए, लेकिन खबरों के मुताबिक उन्होंने यूरोपीय संघ को भी भारत और चीन से आयात पर 100% तक टैरिफ लगाने के लिए उकसाया, ये कहते हुए कि इससे रूस कमजोर होगा। तो एक तरफ ट्रम्प दोस्ती की बात करते हैं, लेकिन उनकी नीतियाँ कुछ और ही कहानी कहती हैं।

नवारो की सोशल मीडिया पर निकल रही भड़ास

ट्रम्प के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने अपने सोशल मीडिया को भारत के खिलाफ भड़काऊ बातों का अड्डा बना लिया है। उन्होंने हाल ही में भारत को ‘टैरिफ का महाराजा’ कहा। उन्होंने भारत पर रूस के युद्ध को बढ़ावा देने का आरोप लगाया, क्योंकि भारत सस्ता रूसी तेल खरीद रहा है। उन्होंने भारतीय छात्रों पर अमेरिकी स्कूलों को ‘भरने’ का तंज कसा और दावा किया कि भारतीय यूजर्स X के कम्युनिटी नोट्स फीचर को हाइजैक कर रहे हैं ताकि तथ्यों को दबाया जा सके, जो कि बिना किसी सबूत के एक साजिश की थ्योरी है।

नवारो के हमले सिर्फ अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं हैं। उनकी बातों में वही तेवर दिखता है, जो भारत के कुछ विपक्षी दलों की बयानबाजी में दिखता है। नवारो ने तो जाति की सियासत में भी हाथ आजमाया और ब्राह्मणों के मुनाफा कमाने जैसे पुराने जुमलों को दोहराया, जो व्यापार नीति से कम और नाराजगी से ज्यादा जुड़ा है। संक्षेप में, ट्रम्प जहाँ दोस्ती का हाथ बढ़ा रहे हैं, वहीं नवारो भारत पर हमला बोल रहा है, जो नीति से ज्यादा प्रचार जैसा लगता है।

भारत ने मुख्य मुद्दों पर झुकने से इनकार किया

ये गुस्सा क्यों? जवाब है नई दिल्ली का उन मुद्दों पर समझौता न करना, जो सबसे ज्यादा मायने रखते हैं। भारत ने साफ कर दिया है कि उसकी ऊर्जा सुरक्षा को वॉशिंगटन के प्रतिबंधों से नहीं चलाया जा सकता। 2021 से रूसी कच्चे तेल का आयात बढ़ा है और 2024 में ये 67 अरब डॉलर से ज्यादा हो गया, जिसमें करीब 53 अरब डॉलर तेल का है। नवारो इसे मुनाफाखोरी का सबूत मानते हैं। लेकिन भारत बार-बार कहता रहा है कि पश्चिमी देश खुद रूस के साथ व्यापार कर रहे हैं और भारत से ये उम्मीद नहीं की जा सकती कि वो किसी और के युद्ध की वजह से अपनी विकास की राह छोड़ दे।

टैरिफ पर भी यही सिद्धांत लागू होता है। भारत हमेशा कहता रहा है कि व्यापार संतुलित होना चाहिए, एकतरफा नहीं। कृषि आयात, डेयरी और डिजिटल सर्विस टैक्स को अमेरिकी दबाव में छोड़ने की चीजें नहीं हैं। नई दिल्ली ने अपनी घरेलू इंडस्ट्री को बचाने पर जोर दिया है, जिसे वॉशिंगटन ने संरक्षणवाद कहा। लेकिन भारत इसे सामान्य समझदारी मानता है। और ये सामान्य समझदारी इतनी सामान्य नहीं है, जो पिछले कुछ महीनों में वॉशिंगटन की भारत के प्रति नाराजगी में दिखती है।

अमेरिकी नेतृत्व की दोहरी बातें

फर्क साफ है। ट्रम्प की दोस्ती भरी पोस्ट दोस्ती और बेहतर भविष्य की बात करती हैं, लेकिन उनकी सरकार की कार्रवाइयाँ और नवारो की भड़काऊ बातें धमकी, दबाव और तिरस्कार की कहानी कहती हैं। साफ है कि अमेरिका चाहता है कि भारत टैरिफ कम करे और अपने बाजार को और खोले, लेकिन साथ ही वो खुद दंडात्मक टैरिफ लगाता है।

वो चाहता है कि भारत रूसी तेल का आयात कम करे, लेकिन उसके यूरोपीय सहयोगी चुपके से रूसी ऊर्जा खरीदते रहते हैं। वो व्यापार घाटे की शिकायत करता है, लेकिन अमेरिका में भारतीय छात्रों और पर्यटकों से हर साल कमाए अरबों डॉलर को नजरअंदाज करता है। वो चाहता है कि भारत ब्रिक्स छोड़ दे, ये कहकर कि ये अमेरिका विरोधी है, लेकिन भारत ने इसे साफ तौर पर ठुकरा दिया।

ये कूटनीति नहीं, दोहरी बातें हैं। एक तरफ ट्रम्प राजनेता बनकर व्यापार विवादों को दोस्ताना तरीके से सुलझाने की कोशिश करते दिखना चाहते हैं। दूसरी तरफ, उनके सहयोगी और नीतिगत ऐलान दबाव बनाए रखते हैं, ये उम्मीद करते हुए कि भारत पहले झुकेगा, जो ट्रम्प प्रशासन के भारी दबाव के बावजूद नहीं हुआ।

भारत की जवाबी रणनीति

अमेरिका भारत को झुकाने में नाकाम रहा। इसके बजाय, भारत ने निर्यातकों को राहत पैकेज देने, जीएसटी दरों को समायोजित कर माँग बढ़ाने और यूरोप, लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ मुक्त व्यापार समझौतों की बातचीत को तेज करने जैसे कदम उठाए। संदेश साफ है कि भारत दबाव में नहीं आएगा और किसी एक साझेदार पर निर्भरता कम करने के लिए अपने बाजारों का विविधीकरण जारी रखेगा।

बाजारों को अल्पकालिक नुकसान हो सकता है, खासकर कपड़ा और कृषि जैसे क्षेत्रों को अमेरिकी टैरिफ से सबसे ज्यादा चोट पहुँची है, लेकिन भारत की रणनीति लंबे समय की है। रूसी आयात से ऊर्जा स्थिरता बनाए रखकर और नए व्यापार गलियारे बनाकर, भारत अमेरिकी दुश्मनी के बावजूद अपनी मजबूती सुनिश्चित कर रहा है।

टैरिफ और घाटे का जुनून

नवारो बार-बार टैरिफ से अमेरिकी नौकरियों को नुकसान और घाटे से अमेरिकी उद्योगों को खोखला होने की बात करते हैं, लेकिन एक साफ हकीकत को नजरअंदाज करते हैं। व्यापार घाटा शोषण का सबूत नहीं है। ये वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा है, जिसमें उपभोक्ताओं को कम कीमत और व्यवसायों को विस्तारित बाजारों से फायदा होता है। फिर भी नवारो इसे इस तरह पेश करते हैं जैसे भारत का हर कमाया डॉलर अमेरिकी मजदूरों से चुराया गया हो। ये ऐसी बातें हैं जो सूचित करने के लिए नहीं, बल्कि भड़काने के लिए बनाई गई हैं।

उनके हमले और भी खोखले हो जाते हैं, क्योंकि ट्रम्प खुद कह चुके हैं कि भारत एक ‘कड़ा सौदेबाज’ है, भले ही दोस्त हो। अगर सौदेबाजी में कड़ाई अपराध है, तो हर वो देश दोषी है जो अपने हितों की रक्षा करता है।

रूस, टैरिफ और असली चिढ़

वॉशिंगटन को सबसे ज्यादा गुस्सा टैरिफ से नहीं, बल्कि भारत की स्वतंत्रता से है। नई दिल्ली ने साफ कर दिया है कि वो न तो किसी गुट में खींचा जाएगा और न ही उसकी विदेश नीति को निर्देशित किया जाएगा। भारत ने रूस पर पश्चिमी रुख का पालन करने से इनकार किया और अपनी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के हिसाब से व्यापार नीति बनाने का अधिकार जताया। ऐसा करके भारत ने साफ संदेश दिया है कि वो साझेदार है, न कि कोई गुलाम देश।

यही बात नवारो को हजम नहीं होती और ट्रम्प इसे मीठी बातों से ढकने की कोशिश करते हैं। ये तथ्य कि दोस्ती और गुस्से के संदेश एक साथ दिए जा रहे हैं, ये दिखाता है कि अमेरिकी नेतृत्व भारत की अहमियत को मानने और उसकी स्वायत्तता से चिढ़ने के बीच फँसा है।

आज जो दिख रहा है, वो है अमेरिका का उलझा हुआ रवैया। एक हाथ दोस्ती का जैतून का पत्ता बढ़ाता है, दूसरा टैरिफ की छड़ी लहराता है। एक आवाज दोस्ती की बात करती है, दूसरी भारत की मुनाफाखोरी पर भड़कती है। इन सबके बीच भारत ने अपनी बात पर डटे रहना चुना अपनी संप्रभुता की रक्षा को, ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित करने को और डर से नहीं, ताकत से बातचीत करने।

वॉशिंगटन के लिए ये दोहरापन शायद अल्पकालिक सियासी फायदे दे, लेकिन भारत के लिए ये सिर्फ सिद्धांतों पर टिके रहने की अहमियत को और मजबूत करता है। अमेरिका घाटे और टैरिफ पर भड़क सकता है, लेकिन नई दिल्ली अपनी स्वायत्तता को सौदेबाजी में नहीं देगा। ट्रम्प की दोस्ती भरी बातें माहौल को नरम कर सकती हैं, नवारो की भड़काऊ बातें इसे तीखा कर सकती हैं, लेकिन ये साधारण हकीकत नहीं बदलती कि भारत अपनी राह खुद बनाएगा, अपने तरीके से, चाहे अमेरिका का संदेश कितना भी उलझन भरा हो।

यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

भारत में पढ़ाई, नेपाल की पहली महिला चीफ जस्टिस: जानिए- PM मोदी से प्रभावित सुशीला कार्की को, जिसे GenZ बनाना चाहती है नेपाल का प्रधानमंत्री

नेपाल में GenZ प्रदर्शन ने देश की सरकार को गिरा दिया है। अब देश में अंतरिम सरकार की चर्चा तेज हो गई है। इस बीच नेपाल की पहली महिला पूर्व चीफ जस्टिस सुशीला कार्की का नाम सामने आ रहा है। बुधवार (10 सितंबर 2025) को हुई वर्चुअल वोटिंग में GenZ ने सुशीला कार्की को समर्थन दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नेपाल में तख्तापलट के बाद कमान संभाल रही सेना को सुशीला कार्की ने अंतरिम प्रधानमंत्री बनने की सहमति फोन कॉल पर दे दी है। इसके बाद अब GenZ सेना से मीटिंग कर अंतरिम सरकार के प्रमुख पर फैसला करेंगे। अगर मीटिंग में सब सही रहता है तो सुशीला कार्की नेपाल की अगली अंतरिम प्रधानमंत्री हो सकती हैं।

सुशीला कार्की को महाभियोग लाकर चीफ जस्टिस पद से हटाया

सुशीला कार्की नेपाल की पहली महिला चीफ जस्टिस के रूप में जानी जाती हैं। लेकिन चीफ जस्टिस के रूप में कार्यकाल काफी छोटा रहा। कार्की 11 जुलाई 2016 से 06 जून 2017 तक नेपाल की सुप्रीम कोर्ट की चीफ जस्टिस रहीं।

सुशीला कार्की को उनके पक्षपातपूर्ण फैसले देने के आरोप में चीफ जस्टिस पद से हटा दिया गया था। उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। यह प्रस्ताव उनकी अदालत द्वारा सरकार के फैसले को पलटने के फैसले के बाद लाया गया था।

जाँच में कार्की के खिलाफ आरोप साबित भी हुए और 2017 में रिटायरमेंट से पहले ही उन्हें सस्पेंड कर दिया गया। हालाँकि, अपने चीफ जस्टिस के कार्यकाल के दौरान सुशीला कार्की ने नेपाल में ट्रांजिशनल जस्टिस और चुनावी विवादों से जुड़े अहम फैसले सुनाए।

सुशीला कार्की के चीफ जस्टिस के रूप में ऐतिहासिक फैसले सुनाने के चलते ही उन्हें नेपाल में भ्रष्टाचार के विरुद्ध योद्धा के रूप में देखा जाता है। इसीलिए शायद भ्रष्टाचार के खिलाफ सड़कों पर उतरे GenZ ने अपने नेता के रूप में उन्हें चुना है।

सुशीला कार्की का भारत कनेक्शन

सुशीला कार्की का का भारत कनेक्शन भी सामने आया है। 7 जून 1952 को नेपाल के विराटनगर में जन्मी सुशीला ने भारत से स्नातक की पढ़ाई पूरी की है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से सुशीला कार्की ने राजनीति शास्त्र में परा-स्नातक डिग्री हासिल की है।

एक इंटरव्यू में सुशीला कार्की ने कहा कि वो भारतीय नेताओं से प्रभावित हैं, भारतीय उन्हें बहन मानते हैं। कार्की ने कहा, “मैं मोदी जी को नमस्कार करती हूँ। मेरे लिए मोदी जी काफी प्रभावशाली नेता हैं।” BHU में पढ़ाई के दिनों को याद करते हुए कहा, “मैंने BHU में पढ़ाई की है… भारत में मेरे कई दोस्त हैं। मुझे आज भी BHU के अपने शिक्षक याद हैं। भारत के साथ हमारे रिश्ते बहुत अच्छे हैं और ये रिश्ते कई सालों से हैं। भारत ने नेपाल की बहुत मदद की है। भारतीय हमेशा नेपाल का भला चाहते हैं।”

BHU की पूर्व छात्र के तौर पर सुशीला कार्की की पहचान निश्चित ही भारत और नेपाल के संबंधों में काफी गति देगी।

मोदी सरकार ने बिहार को दी सौगात, मोकामा-मुंगेर हाईवे और भागलपुर-दुमका-रामपुरहाट रेलवे के दोहरीकरण को मंजूरी: राज्य में सड़क और रेल कनेक्टिविटी में होगा सुधार

बिहार को केंद्रीय सरकार ने दो बड़ी परियोजनाओं की सौगात दी है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मोकामा-मुंगेर 4-लेन ग्रीनफील्ड एक्सेस कंट्रोल्ड हाईवे और भागलपुर-दुमका-रामपुरहाट रेलवे लाइन को मंजूरी दी है। इन परियोजनाओं से राज्य की कनेक्टिविटी में बड़ा सुधार होगा और लाखों लोगों की सुविधा होगी।

पहली परियोजना के तहत 82.4 किलोमीटर लंबे मोकामा-मुंगेर सेक्शन का निर्माण किया जाएगा। यह हाई-स्पीड बक्सर-भागलपुर कॉरिडोर का अहम हिस्सा होगा। इस एक्सप्रेसवे के निर्माण पर लगभग ₹4,447.38 करोड़ खर्च किए जाएँगे और इसे हाइब्रिड एन्‍युटी मॉडल के तहत बनाया जाएगा।

इस सड़क के तैयार होने से दक्षिणी बिहार के लोगों की कनेक्टिविटी बेहतर होगी और यात्रा समय में लगभग डेढ़ घंटे की बचत होगी। साफ है कि इस प्रोजेक्ट से लोगों की आवाजाही आसान होगी और क्षेत्र के आर्थिक और सामाजिक विकास को गति मिलेगी।

दूसरी बड़ी परियोजना रेलवे से जुड़ी है। मंत्रिमंडल ने भागलपुर-दुमका-रामपुरहाट रेलवे लाइन के दोहरीकरण को मंजूरी दी है। फिलहाल यह 177 किलोमीटर लंबी लाइन सिंगल ट्रैक पर चल रही है। अब इस पर करीब ₹3,169 करोड़ की लागत से डबल लाइन बिछाई जाएगी। इस परियोजना से बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल तीनों राज्यों को फायदा पहुँचेगा।

इस रेलवे प्रोजेक्ट के पूरे होने पर लगभग 441 गाँव और करीब 28.72 लाख लोग बेहतर रेल सुविधा से जुड़ जाएँगे। खास बात यह है कि बांका, गोड्डा और दुमका जैसे आकांक्षी जिलों के लोगों को भी इससे बड़ा लाभ होगा। दोहरीकरण से रेल खंड पर भीड़भाड़ कम होगी और ट्रेन संचालन आसान और तेज हो जाएगा।

इसके अलावा यह रेलवे लाइन धार्मिक और पर्यटन दृष्टि से भी अहम साबित होगी। देवघर का बाबा बैद्यनाथ धाम और पश्चिम बंगाल का तारापीठ जैसे प्रसिद्ध धार्मिक स्थल इस रूट से जुड़ेंगे, जिससे श्रद्धालुओं और पर्यटकों की यात्रा सुविधाजनक हो जाएगी।

कुल मिलाकर, मोकामा-मुंगेर हाईवे और भागलपुर-दुमका-रामपुरहाट रेल लाइन का दोहरीकरण, दोनों ही परियोजनाएँ बिहार और आसपास के राज्यों की तस्वीर बदलने की क्षमता रखती हैं। इनसे न सिर्फ यात्रा समय और सुविधा बढ़ेगी बल्कि रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बड़ा सहारा मिलेगा।