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3 दिन का शोक, घुटनों के बल बैठे CM, अंतिम यात्रा में उमड़ पड़ा असम… कहानी उस ज़ुबीन गर्ग की जिन्होंने 38000+ गानों को दी आवाज, संगीत को बनाया जीवन

गुवाहाटी ने रविवार (21 सितम्बर 2025) को ऐसा दृश्य देखा, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। हजारों-लाखों लोग एयरपोर्ट से शहर तक सड़कों के दोनों ओर खड़े रहे, बस एक अंतिम झलक पाने के लिए। वह झलक उस शख़्स की, जिसकी आवाज ने असम के हर दिल की धड़कन को सुरों से सजाया था।

प्रसिद्ध गायक, संगीतकार, अभिनेता और सांस्कृतिक प्रतीक ज़ुबीन गर्ग अब इस दुनिया में नहीं रहे। उनकी पार्थिव शरीर जब गुवाहाटी पहुँचा, तो आम सी चलने वाली भीड़ एक जुलूस में बदल गई, मानो पूरा असम उनके साथ चल पड़ा हो।

52 साल के ज़ुबीन गर्ग का निधन शुक्रवार (19 सितम्बर 2025) को सिंगापुर में हुआ। वह नॉर्थ ईस्ट इंडिया फ़ेस्टिवल में भाग लेने वहाँ गए थे। शुक्रवार को यॉट पर सैर के दौरान उन्होंने पानी में तैरने के लिए लाइफ जैकेट उतारी, फिर पानी में उतरते ही उनकी तबियत बिगड़ गई और वह बेहोश हो गए। तुरंत उन्हें निकाला गया, सीपीआर दिया गया फिर अस्पताल ले जाया गया लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका।

असम का शोक और ठहराव

उनकी अचानक मौत की खबर ने पूरे असम को हिला दिया। अगले ही दिन पूरा राज्य मानो ठहर गया बाजार बंद हो गए, तीन दिन का राजकीय शोक घोषित हुआ, परीक्षाएँ स्थगित कर दी गईं और जगह-जगह लोग मोमबत्तियाँ जलाकर उन्हें श्रद्धांजलि देने लगे। हर गली-मोहल्ले में उनकी तस्वीर के सामने दीये जलते नजर आए। यह सिर्फ शोक नहीं था, बल्कि एक सांस्कृतिक व्यक्तित्व के प्रति गहरी आस्था और अपनापन था।

शनिवार (20 सितम्बर 2025) को सिंगापुर में पोस्टमार्टम के बाद उनके पार्थिव शरीर को उनके मित्रों को सौंप दिया गया। दिल्ली होते हुए जब पार्थिव शरीर गुवाहाटी पहुँचा, तो मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा खुद वहाँ मौजूद थे। वो जुबीन को श्रद्धांजलि देने के लिए उनके पार्थिव शरीर के सामने घुटनों के बल बैठ गए।

योजना थी कि सुबह उनके निवास पर लाने के बाद सरसजाई स्टेडियम में रखा जाएगा ताकि लोग सुबह 9 बजे से शाम 7 बजे तक उनका अंतिम दर्शन कर सकें। लेकिन जिस संख्या में लोग उमड़े, उसने पूरा कार्यक्रम बदल दिया। एयरपोर्ट से घर तक का सफर छह घंटे का हो गया।

भीड़ देखकर मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि लोग पूरी रात और अगले दिन भी स्टेडियम में उन्हें श्रद्धांजलि दे सकेंगे।

अंतिम संस्कार मंगलवार को होने की संभावना है और सरकार उनके लिए स्मारक स्थल तय कर रही है, जैसा कि डॉ भूपेन हजारिका के लिए किया गया था।

विनम्र शुरुआत से सांस्कृतिक शिखर तक

ज़ुबीन का जन्म 18 अप्रैल 1972 को मेघालय के तुरा में हुआ। उनका परिवार कला-संस्कृति से गहराई से जुड़ा था। उनकी माँ प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्यांगना और अभिनेत्री थीं, पिता कवि-गीतकार। बचपन से ही उन्हें संगीत की साधना मिली। तीन साल की उम्र से गाना शुरू किया, माँ पहली गुरु थीं। उन्होंने तबला से लेकर गिटार तक, एक दर्जन से अधिक वाद्ययंत्र बजाना सीखा।

जोरहाट में पले-बढ़े ज़ुबीन ने असमिया लोकगीत, बिहू और सत्रिया संगीत के साथ आधुनिक धुनों को आत्मसात किया। कॉलेज की पढ़ाई बीच में छोड़कर उन्होंने संगीत को ही अपना जीवन बना लिया। 1992 में उनका पहला एलबम अनामिका आया और छा गया।

ज़ुबीन का पहला एल्बम अनामिका, इसमें कविता कृष्णमूर्ति का एक गाना भी शामिल था

इसके बाद माया, आशा, रंग, मुक्ति, पाखी, शिशु, रूमाल जैसे एलबमों ने उन्हें असम का सबसे बड़ा सितारा बना दिया। उन्होंने 38 हजार से अधिक गीत गाए, असमिया, हिंदी, बांग्ला, मराठी, तमिल, तेलुगु, उड़िया, नेपाली और कई अन्य भाषाओं में।

ज़ुबीन गर्ग की लगभग पूरी डिस्कोग्राफी का एक प्रशंसक संग्रह (फोटो साभार : गुवाहाटी प्लस)

अकेले असमिया में पाँच हजार से ज्यादा गाने गाए और लिखे। उनकी आवाज असमिया सिनेमा से लेकर बॉलीवुड तक गूँजी। गैंगस्टर के गाने ‘या अली’ ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई। इसके अलावा राम रे (कांटे), दिल तू ही बता (कृष 3) जैसे गीत भी लोकप्रिय हुए। लेकिन उन्हें मुंबई की चमक-दमक रास नहीं आई और वह वापस असम लौट आए।

सिर्फ गायक नहीं, असम की आत्मा

ज़ुबीन सिर्फ गायक नहीं थे, बल्कि असम की आत्मा थे। उन्होंने लोकगीतों और आधुनिक संगीत का ऐसा संगम किया कि एक नई शैली ने ही जन्म ले लिया। उनके गीतों में ब्रह्मपुत्र की गूंज, चाय बागानों की खुशबू और असम की जिजीविषा झलकती थी।

उनके कंसर्ट्स में लाखों की भीड़ उमड़ती थी। लोग उन्हें ज़ुबीन दा कहते, क्योंकि वह सहज, सरल और हर किसी के अपने लगते थे। मंच पर भी वह किसी रस्मी औपचारिकता में बंधे नहीं रहते थे। कभी मजाक करते, कभी गुस्सा दिखाते, कभी खुलकर पीते लोगों को यह बेबाक़ी पसंद थी। उनकी आवाज विरोध का भी स्वर बनी।

2019-20 में CAA विरोध प्रदर्शनों में उन्होंने अपने गीतों से आंदोलन को धार दी। ‘मृत्यु एटिया होहोज’ जैसे गीत ने प्रदर्शनकारियों की आँखों में आँसू ला दिए। पर्यावरण संरक्षण हो, भाषा अधिकारों की लड़ाई हो या आपदा राहत हर जगह वह आगे रहते थे।

विवाद और आलोचना भी

जहाँ लाखों लोग उन्हें पूजते थे, वहीं आलोचना भी होती थी। मंच पर शराब पीकर प्रदर्शन करना, वादों को तोड़ना, कभी-कभी अपशब्द बोलना यह सब उनकी छवि का हिस्सा था। लेकिन यही उनकी खासियत भी बनी लोगों ने उन्हें वैसे ही स्वीकार किया, जैसे वह थे।

उनकी सेहत पिछले कुछ वर्षों से बिगड़ी हुई थी। कई बार दौरे और बेहोशी की घटनाओं के कारण अस्पताल में भर्ती हुए। डॉक्टरों की सलाह के बावजूद वह खुद पर सख़्त नियंत्रण नहीं रख पाए।

यही कारण है कि उनकी मौत के बाद उनके प्रबंधक सिद्धार्थ शर्मा और आयोजनकर्ता श्यामकानु महांता पर सवाल उठ रहे हैं। प्रशंसकों ने आरोप लगाया है कि उन्होंने बीमार ज़ुबीन को थकाऊ गतिविधियों से नहीं रोका। कई जगह FIR दर्ज हुई है और अब CID जाँच कर रही है।

एक युग का अंत, लेकिन धुनें अमर

असम के लिए ज़ुबीन गर्ग का जाना वैसा ही है जैसा किसी परिवार का सिर उठ जाना। लोग मानते हैं कि उन्होंने पिछले तीन दशकों में असम को एक नई सांस्कृतिक पहचान दी। गली-गली उनके गीत गाए जाते थे, हर त्योहार और हर आंदोलन में उनकी आवाज गूँजती थी।

उनके निधन पर मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार उनके लिए स्मारक बनाएगी। लेकिन असम के लोगों के लिए असली स्मारक वह जगह नहीं होगी जहाँ उन्हें दफनाया जाएगा, बल्कि वह हर गीत होगा जो उनके होंठों से निकला और हर दिल में बस गया।

ज़ुबीन गर्ग का यह अंतिम सफर दिखा गया कि वह सिर्फ एक गायक नहीं थे, वह असम की आत्मा थे। उनका जाना एक ऐसी खाली जगह छोड़ गया है जिसे कभी भरा नहीं जा सकेगा। लेकिन उनकी आवाज, उनकी धुनें और उनका बेबाक़ अंदाज हमेशा जिंदा रहेगा।

(मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में राजू दास ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है)

क्या है नव मध्यम वर्ग, कैसे मोदी राज में हुआ उदय, कैसे इनके दम से पूरा होगा भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का स्वप्न: जानिए India की ग्रोथ स्टोरी में इनका रोल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (21 सितंबर 2025) को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में नियो मिडिल क्लास (Neo Middle Class) या नव मध्यम वर्ग का जिक्र किया है। पीएम मोदी ने कहा, “पिछले 11 साल में देश में 25 करोड़ लोगों ने गरीबी को हराया है। गरीबी से बाहर निकलकर 25 करोड़ का समूह ‘Neo Middle Class’ के रूप में देश के अंदर एक बहुत बड़ी भूमिका अदा कर रहा है।”

क्या है Neo Middle Class?

इस वर्ग को मोटे तौर पर समझें तो Neo Middle Class ऐसा सामाजिक-आर्थिक वर्ग है, जो हाल ही में गरीबी से ऊपर उठ पाया है लेकिन अभी स्थिर और सुरक्षित मध्यमवर्ग की स्थिति तक नहीं पहुँच सका है।

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इस शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले पीएम मोदी ने 2012 में किया था। उस समय वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे और 3 दिसंबर 20212 को पार्टी का चुनावी घोषणा पत्र जारी करते हुए उन्होंने कहा था कि पार्टी का संकल्प पत्र इस नए वर्ग को ध्यान में रखकर ही तैयार किया गया है।

इसके बाद अगस्त 2024 में उद्योग जगत का कार्यक्रम हो या आज का संबोधन, पीएम मोदी ने लगातार इस शब्द का इस्तेमाल किया है। जो दिखाता है कि यह नया वर्ग उनके विकसित भारत के सपने के लिए कितना मायने रखता है।

नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) की रिपोर्ट बताती है कि नियो मिडिल क्लास में वे लोग शामिल हैं जो गरीबी रेखा से थोड़ा ऊपर कमाते हैं लेकिन स्थापित मिडिल क्लास जैसी आर्थिक सुरक्षा से अभी तक वंचित हैं।

1990 में भारत में आर्थिक सुधार हुए और उसके बाद से इस क्लास में विस्तार हुआ है। मोदी सरकार आने के बाद इस वर्ग में लोगों की संख्या तेजी से बढ़ी है। नीति आयोग के डिसक्सन पेपर ‘मल्‍टीडायमेंशनल पावर्टी इन इंडिया सिन्‍स 2005-06’ के मुताबिक, 2013-14 से 2022-23 के बीच 24.82 करोड़ लोग विविध प्रकार की (मल्‍टीडायमेंशनल) गरीबी से बाहर निकले हैं।

भारत का लक्ष्य 2030 से बहुआयामी गरीबी को आधा करना है और आने वाले दिनों में इस लक्ष्य के चलते इस क्लास के और बढ़ने की पूरी संभावना है।

मोदी सरकार में गरीबी कम करने को लेकर चली योजनाओं पर PIB ने लिखा है, “पोषण अभियान और एनीमिया मुक्त भारत जैसी उल्लेखनीय पहलों ने स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच में उल्लेखनीय वृद्धि की है, जिससे वंचित रहने में काफी कमी आई है।”

इसमें प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत मुफ्त खाद्यान्न वितरण, उज्ज्वला योजना के माध्यम से स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन वितरण, सौभाग्य के माध्यम से बिजली कवरेज में सुधार और स्वच्छ भारत मिशन और जल जीवन मिशन जैसे अभियानों का भी जिक्र किया गया है।

ग्रोथ स्टोरी में कितना अहम है Neo Middle Class?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2047 तक यानी आजादी के 100वें वर्ष में भारत को विकसित भारत बनाने का लक्ष्य रखा है। उनका मानना है कि यह Neo Middle Class इस सपने को पूरा करने में सबसे अहम भूमिका निभा सकता है।

ऐसा सोचना सही भी है, आसान भाषा में समझें तो, जब कोई परिवार गरीबी से निकलता है, उसकी कमाई बढ़ती है तो उसकी खपत की क्षमता भी बढ़ जाती है। यह खपत की बढ़ी हुई क्षमता बाजार को गति देने का काम करती है और नए रोजगार सृजन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

साथ ही, इस वर्ग के बढ़ने से सामाजिक स्थिरता भी बढ़ती है। गरीबी से बाहर निकले लोगों में नया आत्मविश्वास आता है और यही लोग फिर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करते हैं। इनकी आने वाली पीढ़ियों की भी बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं तक पहुँच बनती है। जिससे इस वर्ग में नया आत्मविश्वास पैदा होता है।

मोदी सरकार की योजनाएँ जैसे प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना और आयुष्मान भारत ने गरीबों को ऊपर उठाकर इस वर्ग तक पहुँचाने में मदद की है। आने वाले समय में यही वर्ग भारत को दुनिया के बड़े देशों से मुकाबले के लिए खड़ा करेगा।

विकसित देशों में मजबूत मिडिल क्लास ही रीढ़ बनता है। भारत में भी यह नियो मिडिल क्लास नई तकनीक को अपना रहा है, UPI का इस्तेमाल कर रहा है और स्टार्टअप इंडिया व मुद्रा लोन जैसी योजनाओं से कारोबार शुरू कर भारत को आर्थिक ताकत दे रहा है। यह वर्ग अगर आगे बढ़ता रहा तो भारत ना केवल घरेलू बाजार में बल्कि पूरी दुनिया में एक महत्वपूर्ण आर्थिक ताकत बन जाएगा।

‘BJP ने EVM हैक करने की बात स्वीकारी’: कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम ने रेखा गुप्ता का अधूरा Video वायरल कर फैलाया झूठ, जानें क्या है हकीकत

कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम ने दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का अधूरा वीडियो शेयर किया, जिसमें दावा किया गया कि बीजेपी ने खुलेआम EVM हैक करने की बात को स्वीकारा है। ये अधूरा वीडियो सीएम गुप्ता का NDTV को दिए गए इंटरव्यू से लिया गया है।

इस वीडियो को एडिट कर सिर्फ सीएम गुप्ता के जवाब का क्लिप वायरल किया जाता है। इस वीडियो क्लिप को इस तरह से पेश किया जाता है कि सीएम गुप्ता ने EVM में हुए हेरफेर के आरोपों को स्वीकार कर लिया है।

अधूरे वीडियो से लिया गया स्क्रीनशॉट

कॉन्ग्रेस के इस अधूरे वीडियो में इंटरव्यू कहती हैं, “ABVP और BJP केवल इसीलिए जीत रहे हैं क्योंकि वे EVM हैक कर रहे हैं और चुनाव आयोग उनका समर्थन कर रहा है।” इस पर रेखा गुप्ता जवाब देती हैं, “हाँ, जब वे 70 साल से ऐसा कर रहे थे तो किसी को कोई समस्या नहीं थी लेकिन जब हमने ऐसा किया तो अचानक यह गलत हो गया। यह सही है।”

इसके बाद वीडियो के इस कटे हुए भाग को खूब शेयर किया गया, जिसमें कैप्शन दिया गया कि BJP ने EVM हैक करने की बात स्वीकार कर ली है।

हालाँकि, ऑपइंडिया ने असली वीडियो खोज निकाला है और कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम के अधूरे वीडियो का फैक्ट-चेक कर दिया। पूरे वीडियो में इंटरव्यू ले रही एंकर सवाल पूछती हैं कि राहुल गाँधी ने दावा किया है कि BJP सिर्फ EVM हैक करने के बाद ही जीतती है।

इस सवाल क जवाब देते हुए रेखा गुप्ता ने कहा, “जब वो जीतते हैं तो ये जनता का जनादेश होता है। जब हम जीतते हैं तो ये अचानक EVM हैकिंग हो जाता है। कोई मुझे बताए कि ये फॉर्मूला किस किताब में लिखा है? राहुल गाँधी कहाँ से पढ़े हैं?” रेखा गुप्ता ने राहुल गाँधी पर गलत धारणाएँ बनाकर आम नागरिकों को गुमराह करने का आरोप लगाया।

इंटरव्यू में आगे बढ़ते हुए जब उनसे कहा गया कि GenZ भी BJP के खिलाफ उठ सकती है, इस पर रेखा गुप्ता ने जवाब दिया, “युवा और GenZ पहले ही अपनी बात कह चुके हैं। विश्वविद्यालयों में ABVP की जीत दर्शाती है कि हमें कितना समर्थन प्राप्त है।” उन्होंने अंत में कहा, “जनता का आशीर्वाद प्रधानमंत्री मोदी के साथ है और हमेशा रहेगा।”

अधूरे वीडियो और पूरे वीडियो के बीच अंतर से साफ समझ आता है कि कॉन्ग्रेस किस तरह भ्रामक कहानी फैलाने के लिए इस तरह की घिनौनी हरकत पर उतर सकती है और EVM हैकिंग से ‘वोट चोरी’ के अपने आरोपों को बढ़ावा दे सकती है।

वही सामान खरीदें जिसमें देश का पसीना हो: राष्ट्र के नाम संबोधन में बोले PM मोदी, कहा- 25 करोड़ लोगों ने गरीबी को हराया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (21 सितंबर 2025) को राष्ट्र के नाम अपना संबोधन दिया। इस दौरान उन्होंने कल से शुरू होने वाले नई पीढ़ी के GST सुधारों को लेकर चर्चा की और इसे बचत उत्सव का नाम दिया है।

‘GST बचत उत्सव होगा शुरू’

पीएम मोदी ने अपने संबोधन में कहा, “कल नवरात्रि के प्रथम दिवस 22 सिंतबर को सूर्योदय के साथ ही अगली पीढ़ी की GST सुधार लागू हो जाएँगे। कल से देश में ‘GST बचत उत्सव’ शुरू होने जा रहा है।”

उन्होंने कहा, “हमारे देश के गरीब, मध्यमवर्गीय लोग, युवा, किसान, महिलाएँ, दुकानदार, व्यापारी और उद्यमी सभी को बचत उत्सव का बहुत फायदा होगा। त्योहारों के इस मौसम में सबका मुँह मीठा होगा, देश के हर परिवार की खुशियाँ बढ़ेंगी। मैं देश के कोटि-कोटि लोगों को नई पीढ़ी की GST सुधार और इस बचत उत्सव की बहुत शुभकामनाएँ देता हूँ।”

पीएम मोदी ने कहा, “ये सुधार भारत की ग्रोथ स्टोरी को गति देंगे, कारोबार को और आसान बनाएँगे, निवेश को और आकर्षक बनाएँगे और हर राज्य को विकास की दौड़ में बराबरी का साथी बनाएँगे।”

‘देश दर्जनों टैक्स के जाल से मुक्त हुआ’

अपने संबोधन में पीएम मोदी ने कहा, “जब 2017 में भारत ने GST सुधार की तरफ कदम बढ़ाया था तो एक पुराना इतिहास बदलने और नया इतिहास रचने की शुरुआत हुई थी। दशकों तक हमारे देश की जनता, देश के व्यापारी अलग-अलग टैक्स के जाल में उलझे हुए थे। देश में दर्जनों टैक्स थे।”

उन्होंने कहा, “जब आपने हमे 2014 में अवसर दिया तो हमने जनहित में GST को अपनी प्राथमिकता बनाया, हमने हर शेयरधारक से चर्चा की, हर राज्यों की हर शंका का निवारण किया। हर सवाल का समाधान खोजा, सभी राज्यों को साथ लेकर आजाद भारत का इतना बड़ा टैक्स रिफॉर्म संभव हो पाया। यह केंद्र और राज्यों के प्रयासों का नतीजा था कि देश दर्जनों टैक्सों के जाल से मुक्त हुआ और पूरे देश के लिए एक जैसी व्यवस्था बनी। वन नेशन, वन टैक्स का सपना साकार हुआ।”

11 साल में देश में 25 करोड़ लोगों ने गरीबी को हराया: PM मोदी

पीएम मोदी ने कहा, “GST के नए स्वरूप में मुख्य रूप से 5% और 18% के टैक्स स्लैब बनेंगे। रोजमर्रा और खाने-पीने की चीजें और सस्ती हो जाएँगी। जिन सामानों पर पहले 12% टैक्स लगता था उनमें से 99% चीजें अब 5% टैक्स के दायरे में आ गई हैं।”

उन्होंने कहा, “पिछले 11 साल में देश में 25 करोड़ लोगों ने गरीबी को हराया है। गरीबी से बाहर निकलकर 25 करोड़ का एक बहुत बड़ा समूह ‘Neo Middle Class’ के रूप में देश के अंदर एक बहुत बड़ी भूमिका अदा कर रहा है। इस ‘Neo Middle Class’ के अपने सपने हैं।”

साथ ही, उन्होंने कहा, “इस साल सरकार ने 12 लाख रुपए तक की इनकम को टैक्स फ्री करके उपहार दिया। जब इनकम टैक्स में ऐसी राहत हो जाए, तो मध्यम वर्ग के जीवन में बदलाव आता है और सरलता-सुविधा हो जाती है।”

गरीबों और ‘Neo Middle Class’ और ‘Middle Class’ को Double Bonanza: पीएम मोदी

पीएम मोदी ने कहा कि अब गरीबों और ‘Neo Middle Class’ और ‘Middle Class’ को Double Bonanza मिल रहा है। उन्होंने कहा, “GST कम होने से अब देश के नागरिकों के लिए अपने सपने पूरे करना और आसान हो गया है। घर बनाना, टीवी-फ्रिज खरीदने की बात हो, स्कूटर-बाइकर-कार खरीदना हो, इन सब पर अब कम खर्च करना होगा।”

पीएम मोदी ने कहा, “हम नागरिक देवो भव: के जिस मंत्र के साथ आगे बढ़ रहे हैं। नए पीढ़ी के GST सुधारों में इसकी साफ झलक दिखाई पड़ती है। अगर हम आयकर में छूट और GST में छूट को जोड़ दे तो एक साल में जो निर्णय हुए हैं उससे देश के लोगों को 2.5 लाख करोड़ रुपए से अधिक की बचत होगी।”

वही खरीदें जिसमें देश का पसीना हो: PM मोदी

इस दौरान पीएम मोदी ने ‘Made In India’ का आग्रह किया है। उन्होंने कहा, ”हम वो सामान खरीदें जो मेड इन इंडिया हो,जिसमें हमारे देश के नौजवानों की मेहनत लगी हो और हमारे देश के बेटे बेटियों का पसीना हो।”

जस्टिस लोया की मौत पर फैलाए जा रहे झूठ सुन पूर्व CJI चंद्रचूड़ ने तोड़ी चुप्पी, जजों को घेरने वालों को दिया जवाब: पहले उमर खालिद केस में कपिल सिब्बल को कर चुके हैं एक्सपोज

पूर्व मुख्य जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने जज बीएच लोया की मौत पर उठ रहे सवालों को लेकर पहली बार खुलकर बात की। शनिवार (20 सितंबर 2025) को लल्लनटॉप को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि लोग किसी फैसले से असहमति रख सकते हैं। यही लोकतंत्र की खूबसूरती है। लेकिन जजों की नीयत पर सवाल उठाना गलत है।

उन्होंने यह भी कहा कि जब बहस सबूतों से हटकर सीधे जजों पर आरोप लगाने लगे, तो ये गलत है। उन्होंने कहा कि ये व्यवहार लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।

जज लोया की मौत की रात को याद करते हुए दिया जवाब

अपने एक साथी जज की शादी में शामिल होने के लिए जज लोया नवंबर 2014 में नागपुर गए थे। वे नागपुर के सरकारी गेस्ट हाउस ‘रवि भवन’ में कुछ अन्य जजों के साथ ठहरे हुए थे।

कुछ लोगों ने यह सवाल उठाया कि तीन जज एक ही कमरे में कैसे रह सकते हैं? इस पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने जवाब दिया,  “हमने सुनवाई के दौरान भी कोर्ट में कहा था कि आपको (वकील को संबोधित करते हुए) न्यायपालिका, देश और समाज के बारे में जानकारी नहीं है। जब हम किसी शादी में जाते हैं, तो कई बार 10-15 या 20-25 जज एक साथ रहते हैं। यह सामान्य बात है।”

उसी रात, करीब सुबह 4 बजे, जस्टिस लोया ने अपने दो साथी जजों को उठाया और कहा कि वे ठीक महसूस नहीं कर रहे हैं। उन दो जजों ने तुरंत उन्हें अस्पताल ले जाने का फैसला किया। जब सवाल पूछा गया कि उन्हें ऑटो में क्यों ले जाया गया, गाड़ी क्यों नहीं ली गई?

इस पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, “शायद उन्हें नहीं पता था कि गाड़ी कहाँ है। हर जज के पास अपनी गाड़ी और ड्राइवर नहीं होता। जब मैं भी सुप्रीम कोर्ट का जज था, तब भी मेरा ड्राइवर मेरे घर में नहीं रहता था। खासकर जिला न्यायपालिका में तो यह और आम बात है।”

जब जस्टिस लोया को पहली बार अस्पताल ले जाया गया, तो वह एक पास के ऑर्थोपेडिक अस्पताल था। वहाँ डॉक्टरों ने जाँच कर बताया कि यह हृदय से जुड़ी (कार्डियक) समस्या है, इसलिए उन्हें कार्डियक अस्पताल ले जाना होगा। इसके बाद दोनों जज उन्हें तुरंत कार्डियक अस्पताल ले गए। लेकिन तब तक उन्हें भारी हार्ट अटैक आ चुका था और वहीं उनकी मृत्यु हो गई।

इस पर भी सवाल उठा कि अगर हार्ट की समस्या थी, तो सीधे कार्डियक अस्पताल क्यों नहीं ले गए? इस पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, “जब हमारे घर में माता-पिता को कोई समस्या होती है, तो हम तुरंत जो सूझता है, वही करते हैं। उसी तरह इन जजों ने भी जो उन्हें तुरंत समझ आया, वही किया। क्या हम कह सकते हैं कि ये दो जज, जो लोया जी के साथ थे, उन्हें मारना चाहते थे? ऐसा सोचना बिल्कुल गलत है।”

अंत में चंद्रचूड़ ने यह भी कहा,  “मैं खुद भी CJI रहते हुए ड्राइवर या निजी गाड़ी लेकर नहीं चलता था। हर परिस्थिति में फैसले पर संदेह करना सही नहीं है। हाल ही में एक और जज की ट्रांजिट के दौरान हार्ट अटैक से मौत हुई, हालाँकि उन्हें तुरंत इलाज मिला। इससे साफ होता है कि मेडिकल इमरजेंसी में कुछ भी हो सकता है, भले ही तुरंत मदद मिले।”

जजों की मंशा पर सवाल उठाना गलत- पूर्व CJI

डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि किसी जज के फैसले पर असहमति जताना बिल्कुल ठीक है, लेकिन जज की नीयत पर शक करना या उन पर गलत इरादे का आरोप लगाना खतरनाक होता है। उन्होंने लोहिया केस का उदाहरण देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को तथ्यों के आधार पर पूरी तरह से जाँचा और सभी सवालों के जवाब दिए। लोग फैसले से सहमत हों, यह उनका अधिकार है, लेकिन जजों की व्यक्तिगत नीयत पर सवाल उठाना सही नहीं है।

चंद्रचूड़ ने यह भी चेतावनी दी कि अगर इस मामले में कोई नई जाँच होती है, तो उससे विवाद खत्म नहीं होगा। अगर जाँच में कुछ नहीं निकलता, तो लोग कहेंगे कि साजिश छिपाई जा रही है और अगर कुछ निकलता है, तो लोग कहेंगे कि पहले छुपाया गया था। उन्होंने कहा कि बार-बार जाँच की माँग करना, सिर्फ एक राजनीतिक कहानी को जिंदा रखने का तरीका बन गया है, जिससे लोगों का संस्थाओं पर भरोसा टूटता है।

उन्होंने यह भी कहा कि जब न्यायपालिका को बार-बार राजनीतिक लड़ाइयों में घसीटा जाता है, तो यह एक खतरनाक चलन बन जाता है। उन्होंने साफ कहा कि फैसलों की आलोचना हो सकती है, लेकिन उस आलोचना को इस हद तक ले जाना कि जजों की ईमानदारी पर सवाल उठाया जाए, यह समाज के न्याय तंत्र में भरोसे को नुकसान पहुँचाता है।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने यह कहते हुए अपनी बात समाप्त की, “लोगों को कोर्ट की जवाबदेही तय करने का अधिकार है, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया को राजनीतिक लड़ाई का मंच नहीं बनाना चाहिए। आलोचना लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन जजों को व्यक्तिगत रूप से बदनाम करना सही नहीं। जनता और वकीलों को न्यायपालिका की विश्वसनीयता की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि अगर लोगों का भरोसा टूटता है, तो कानून का पूरा ढाँचा खतरे में पड़ जाता है।”

उमर खालिद मामले पर डीवाई चंद्रचूड़

CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने एक इंटरव्यू में उमर खालिद की जमानत पर बड़ा बयान दिया। जब उनसे यह पूछा गया कि उमर खालिद को पाँच साल बाद भी जमानत क्यों नहीं मिली, तो उन्होंने कहा कि असली समस्या कुछ वकीलों और राजनीतिक समूहों की मानसिकता से है।

उन्होंने कहा, “आज हमारे सिस्टम के लिए सबसे बड़ा खतरा यह है कि कुछ लोग चाहते हैं कि उनके मामले सिर्फ उन्हीं जजों के सामने सुने जाएँ, जो उनके लिए अनुकूल हों। अगर ऐसा होने लगा तो पूरी न्याय व्यवस्था ढह जाएगी।” उन्होंने इस प्रवृत्ति की तुलना उस सोच से की जिसमें लोग ‘प्रो-इंडस्ट्री’ या ‘प्रो-लेबर’ जजों को चुनने की कोशिश करते हैं, जो काफी खतरनाक है।

फरवरी 2025 में बरखा दत्त को दिए गए एक इंटरव्यू में चंद्रचूड़ ने उमर खालिद की जमानत याचिका और उसमें वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल की भूमिका पर भी टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा कि केस की मेरिट पर तो कुछ नहीं कहेंगे, लेकिन बार-बार की गई तारीखों की माँग (adjournments) जमानत में देरी की बड़ी वजह बनी।

कोर्ट रिकॉर्ड के मुताबिक, खालिद की लीगल टीम (जिसका नेतृत्व सिब्बल कर रहे थे) ने कम से कम सात बार तारीख माँगी और आखिरकार फरवरी 2024 में जमानत याचिका वापस ले ली। तब उनकी ओर से कहा गया था, “जमानत याचिका वापस ले रहे हैं। परिस्थितियाँ बदल गई हैं, अब ट्रायल कोर्ट में कोशिश करेंगे।”

पूर्व CJI ने यह भी कहा कि मीडिया अक्सर इन पहलुओं को नजरअंदाज कर देता है और लोगों को लगता है कि गलती कोर्ट की है, जबकि हकीकत में बार-बार की देरी से बचाव पक्ष (defence) ही प्रक्रिया को कमजोर करता है।

जो उमर खालिद दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों का ‘मास्टरमाइंड’, उसे ‘राजनीतिक कैदी’ बता माहौल बना रहा The Guardian: सुप्रीम कोर्ट की कही बातों पर भी नहीं किया गौर

विदेशी मीडिया जब भी भारत की खबर लिखते हैं तो लगता है कि मानो यहाँ लोकतंत्र बचा ही नहीं है। भारत के विरोध में रहने वाले लोगों में पश्चिमी मीडिया का एक बड़ा वर्ग अपने ‘नायक’ खोजने की कोशिश करता है। ताजा उदाहरण द गार्जियन का है, जिसने दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों के ‘मास्टमाइंड’ उमर खालिद को ‘नायक’ के तौर पर दिखाया है।

वही उमर खालिद, जो JNU के दिनों से ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ गैंग का चमकता सितारा रहा है। वही उमर खालिद, जो साल 2020 में दिल्ली दंगों का मास्टरमाइंड है और UAPA में जेल में बंद है। लेकिन द गार्जियन के आर्टिकल से लगता है कि उमर खालिद कोई अपराधी नहीं बल्कि ‘राजनीतिक कैदी’ है।

ये द गार्जियन भारत में खुलकर उन लोगों का समर्थन करता है, जो देशद्रोह के मामले में जेल में बंद हैं।

पाँच साल से जेल में क्यों है ?

द गार्जियन का रोना यह है कि उमर खालिद ‘बिना दोषी’ करार जेल में बंद है, जिसकी वजह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ सरकार है, जो विरोध की आवाजों को कुचल रही है। तो यहाँ गार्जियन को यह जानने की जरूरत है कि नरेंद्र मोदी जेल में नहीं डालते हैं बल्कि कोर्ट भेजता है।

बात रही ‘बिना दोषी’ करार जेल में होने की तो उमर खालिद की जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने कोर्ट को बताया कि खालिद के वकील ही जानबूझकर देरी कर रहे हैं। विशेष लोक अभियोजक अमित प्रसाद ने कहा कि 2023 से 2024 के बीच कुल 14 तारीखों में से 7 बार सुनवाई खालिद के वकीलों ने ही टलवाई

दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में भी साफ लिखा है कि कैसे दंगों से पहले बैठकों की योजना बनी, कौन-कौन शामिल हुआ और किसने कब-कब उकसाने वाले भाषण दिए। इसके आधार पर उमर खालिद और उनके सहयोगी जेल में बंद हैं।

गार्जियन ने लिखा- ‘खालिद तो दिल्ली में थे ही नहीं।’ लेकिन सच ये है कि उसकी साजिश सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं थी। महाराष्ट्र से लेकर शाहीन बाग तक, सब जगह उनका नेटवर्क काम कर रहा था। पुलिस की रिपोर्ट में भी सामने आया कि महाराष्ट्र के अमरावली में 17 फरवरी 2020 को भड़काऊ भाषण दिया था, जिसे पुलिस ने दंगा भड़ाकने की योजना के रूप में मामले की जाँच में इस्तेमाल किया था।

‘राजनीतिक कैदी’ है उमर खालिद?

उमर खालिद को द गार्जियन लिखता है कि वो ‘राजनीतिक कैदी’ है। लेकिन यह शब्द असल में उन देशों के लिए इस्तेमाल होता है, जहाँ तानाशाही है और लोग सिर्फ सरकार की आलोचना करने पर जेल में डाल दिए जाते हैं।

अगर सचमुच ऐसा होता तो देश का पूरा विपक्ष आज सलाखों के पीछे होता और मीडिया, जो सरकार की नीतियों पर सवाल खड़ा करता है, वो भी अपना काम निष्पक्ष रूप से नहीं कर पाता। तो क्या आज सारा विपक्ष जेल में है या सारे पत्रकार जेल में है? तो फिर उमर खालिद को केस अलग क्यों है?

क्योंकि यह केस सिर्फ सरकार की आलोचना का नहीं है। यह मामला देश में साजिश रचने और दंगा भड़काने को लेकर है। ऐसे में द गार्जियन उमर खालिद जैसे लोग को राजनीतिक कैदी बताकर आतंकवादियों का गुणगान करने जैसा है।

अमनेस्टी इंटरनेशनल का उमर खालिद को सपोर्ट

द गार्जियन ने अमनेस्टी इंटरनेशनल और कुछ अन्य विदेशी संगठन के बयान का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि ‘उमर खालिद को तुरंत रिहा करो।’

ये वही अमनेस्टी है, जिसके भारत में फंडिंग पर ही सवाल उठे और भारत सरकार ने दुकान बंद कर दी क्योंकि इसका इस्तेमाल भारत-विरोधी प्रोपेगेंडा फैलाने में किया जा रहा था। तो साबित तो यही हो जाता है कि एक भारत-विरोधी संगठन तो एक देशद्रोही को नायक बनाएगा ही।

मोदी सरकार मुस्लिम-बुद्धिजीवी की आवाज दबा रहे हैं?

द गार्जियन ने उमर खालिद की पार्टनर बानोज्योत्सना लाहिरी के बयान भी छापे, जिसमें वो कह रही हैं कि मोदी सरकार मुस्लिम, बुद्धिजीवी और निर्भीक आवाजों से नफरत करती है।

यहाँ मोदी सरकार को मुस्लिम-विरोधी दर्शाया गया है फिर खुद ढींगरा फोड़ने आ जाते हैं कि सरकार मुस्लिम-विरोधी है। असल में सच यह है कि सरकार का मुद्दा न तो मुस्लिम है, न बुद्धिजीवी बल्कि असल परेशानी देश-विरोधी गतिविधियों से है।

यहाँ द गार्जियन देश तोड़ने की बात करने वाले उमर खालिद को बुद्धिजीवी बता रही है। और यह भी चाहती है कि सरकार उस पर कोई कार्रवाई भी न करे।

यहाँ उसकी पार्टनर लाहिरी ने बताया, जिसे द गार्जियन ने बड़े भावुक अंदाज में लिखा कि उमर खालिद हफ्ते में 30 मिनट परिवार से वीडियो कॉल करते हैं और वो जेल में अब तक 300 से ज्यादा किताबें पढ़ चुका है।

अब सवाल यह है कि आतंकियों को कहीं भी ये सारी सुविधाएँ दी जाती हैं। अगर भारत में लोकतंत्र न होता तो क्या खालिद जेल में किताबें पढ़ सकता और क्या हर हफ्तें अपने परिवार से वीडियो कॉल पर बात हो पाती। असलियत यह है कि भारत की जेलें अब भी उसके ‘मानवाधिकार’ का सम्मान कर रही हैं, बावजूद इसके कि उस पर देश को दंगों में झोंकने का आरोप है।

विदेशी मीडिया का दोगलापन

जब भी भारत में किसी मुस्लिम कानून के शिकंजे में आता है तो विदेशी मीडिया तुरंत एक्टिव हो जाता है और अपराधी को नायक के रूप में पेश करना चालू कर देता है।

यही वजह है कि द गार्जियन भी उमर खालिद की दंगे भड़काने की साजिश को शांतिप्रिय प्रदर्शन बता रही है और भारत में उसके खिलाफ मोदी सरकार का अत्याचार के रूप में पेश कर रही है।

द गार्जियन यह नहीं लिखता कि खालिद के भाषणों और गतिविधियों से पूरे देश में CAA-NRC विरोध के नाम पर हिंसा फैली थी। उत्तर प्रदेश, दिल्ली और बंगाल में पुलिसकर्मियों तक पर हमला हुआ। लेकिन गार्जियन की कलम से ये सब गायब हो जाता है। गार्जियन कभी यह नहीं लिखता कि दंगों में मारे गए ज्यादातर निर्दोष हिंदू थे और खालिद जैसे चेहरे इस षड्यंत्र को हवा दे रहे थे।

सच यह है कि द गार्जियन और एमनेस्टी जैसे विदेशी संगठन भारत की छवि खराब करने का एजेंडा चला रहे हैं। इन्हें लोकतंत्र, मानवाधिकार या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की चिंता नहीं है। इनका असली मकसद मोदी सरकार को बदनाम करना है और भारत को दमनकारी राष्ट्र के रूप में दिखाना है।

भारत की छवि खराब करने वाली Homebound को ऑस्कर में क्यों भेजा? फिल्म के चयन पर उठ रहे सवाल, जानिए कौन लेता है इस संबंध में फैसला

ऑस्कर अवार्ड्स 2026 में बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म कैटेगरी के लिए डायरेक्टर नीरज घायवान की ‘होमबाउंड’ का नाम भारत से जाने के बाद सोशल मीडिया पर इसे लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।

दरअसल फिल्म में ये दिखाया गया है कि हमारे देश में दलितों-मुस्लिमों के साथ भेदभाव होता है और उन्हें आसानी से कुछ नहीं मिलता। ऐसे में लोगों का यही पूछना है कि ऐसी फिल्म जो देश की छवि को धूमिल करे उसे नॉमिनेशन के लिए क्यों भेजा जा रहा है।

कुछ लोग इसे लेकर सरकार पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं लेकिन हकीकत तो ये है भारत से ऑस्कर अवार्ड्स में फिल्मों के नाम भेजने का काम फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया करती है, सरकार नहीं।

ऑस्कर के लिए FFI करता है चयन

फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया (FFI), जो कि एक स्वतंत्र संस्था है, हर साल यह जिम्मेदारी निभाती है। यह संस्था देशभर के 15-20 फिल्म समीक्षकों और जानकारों का पैनल बनाती है। यही पैनल तय करता है कि किस भारतीय फिल्म को उस साल ऑस्कर में आधिकारिक एंट्री दी जाएगी। इस प्रक्रिया में सरकार का कोई दखल नहीं होता। यह चयन संस्था स्वतंत्र रूप से करती है।

इस साल भी, पैनल ने कई भाषाओं और विधाओं की फिल्मों को देखने के बाद ‘होमबाउंड’ को चुना। उनके अनुसार उनका मकसद भारत की सबसे अच्छी सिनेमाई प्रस्तुति आगे बढ़ाना था। मगर, लोग इस फिल्म के प्लॉट पर नाराज हो गए। एक्स पर सक्रिय हैंडल्स का कहना है कि फिल्म से ऐसा लगता है कि भारत नागरिक अधिकारों का दमन करने वाला देश है।

चयन की प्रक्रिया कैसे होती है?

  1. फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया (FFI) हर साल एक पैनल बनाता है।
  2. इस पैनल में देशभर के फिल्म समीक्षक, लेखक, तकनीकी विशेषज्ञ और फिल्म उद्योग से जुड़े अनुभवी लोग शामिल होते हैं।
  3. अलग-अलग भाषाओं की फिल्मों की स्क्रीनिंग की जाती है।
  4. फिर बहुमत से तय होता है कि कौन सी फिल्म बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म कैटेगरी के लिए भारत की ओर से जाएगी।
  5. यह फिल्म फिर आधिकारिक तौर पर अमेरिका की एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेज (AMPAS) को भेजी जाती है।

जाति और समुदाय पर आधारित कहानी

होमबाउंड’ की कहानी में दो ग्रामीण लड़के हैं, जिनके किरदार ईशान खट्टर और विशाल जेठवा ने निभाए हैं। सरकारी नौकरी का सपना देखते हैं ताकि समाज में सम्मान पा सकें, लेकिन रास्ते में उन्हें दलित और मुस्लिम होने की वजह से भेद भाव का सामना करना पड़ता है।

फिल्म यह दिखाती है कि जाति और धर्म के आधार पर मिलने वाले भेदभाव आज भी युवाओं के सपनों को किस तरह प्रभावित करते हैं। फिल्म में जाह्नवी कपूर उनकी दोस्त की भूमिका में नजर आएंगी, जो उनकी संघर्ष यात्रा में साथ देती है।

कहानी को लेखक बशारत पीर की 2020 में न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित सच्ची घटना से प्रेरणा मिली है। उस लेख का शीर्षक था “A Friendship, a Pandemic and a Death Beside the Highway”।

भारत और ऑस्कर का रिश्ता

अब तक केवल तीन भारतीय फिल्मों को ऑस्कर में बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म कैटेगरी के लिए नामांकन मिला है। ये फिल्में हैं – मदर इंडिया (1957), सलाम बॉम्बे (1988) और लगान (2001)। पिछले साल यानि 2025 में लापता लेडिज भी ऑस्कर में सिलेक्शन हुआ था। हालांकि, कोई भी फिल्म यह अवॉर्ड जीत नहीं पाई।

भारत के हिस्से अब तक जो ऑस्कर आए हैं, वे सभी ओपन कैटेगरी में मिले हैं। हाल ही में 2023 में एस एस राजामौली की फिल्म ‘RRR’ ने दो ऑस्कर जीतकर भारत का नाम रोशन किया था।

तिरुपति मंदिर की दानपेटी से ₹100 करोड़ की चोरी, जगन मोहन रेड्डी के घर भी पहुँचा पैसा: TTD सदस्य भानु रेड्डी ने CCTV फुटेज जारी कर किया दावा

तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम यानी टीटीडी बोर्ड के सदस्य भानु प्रकाश रेड्डी ने पूर्व जगन मोहन रेड्डी सरकार पर बालाजी मंदिर से 100 करोड़ से ज्यादा के दान की लूट के आरोप लगाए हैं और सबूत के तौर पर सीसीटीवी फुटेज जारी किया है। उन्होंने दावा किया कि सीएम जगन मोहन रेड्डी के आवास तक ये लूट का पैसा पहुँचा।

भानु प्रकाश रेड्डी का कहना है कि वाईएस जगन मोहन रेड्डी के नेतृत्व वाली वाईएसआर कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान तिरुपति मंदिर के परकामनी (दानपेटी) से 100 करोड़ रुपए से ज्यादा की चोरी हुई थी। उनका दावा है कि मंदिर के कर्मचारी रविकुमार ने दानपेटी से नकदी चुराई। पिछली सरकार के अधिकारी इस चोरी में हिस्सा लेते थे। लेकिन मामला सामने आने के बाद अब रविकुमार की जान को वाईएसआरसीपी से खतरा है।

रेड्डी ने चोरी का सीसीटीवी फुटेज जारी किया, जिसे राज्य में मंत्री और टीडीपी नेता नारा लोकेश ने रिट्वीट किया है। टीडीपी एनडीए का घटक दल है। सीसीटीवी फुटेज और दूसरे सबूत से पता चला है कि रविकुमार अमेरिकी डॉलर छिपा रहा था। टीटीडी के सतर्कता और सुरक्षा अधिकारी सतीश कुमार ने 29 अप्रैल 2023 की शाम छिपाए गए नोट के साथ रंगे हाथों पकड़ा था। पुलिस में शिकायत दर्ज किए जाने के बावजूद, मामले को लोक अदालत में सुलझा लिया गया।

जाँच के दौरान आरोपित रवि कुमार की लेन-देन की जानकारी सामने आई है। उसमें कुमार दंपति की तिरुपति और चेन्नई में जमीन, घर और दूसरी अचल संपत्तियाँ थी। इन संपत्तियों के मालिकाना हक होने के बावजूद टीटीडी को दान कर दी गई थी। दान किए गए संपत्तियों की कीमत करोड़ों रुपए है।

रेड्डी ने ये दावा किया कि वाईएसआरसीपी शासन के दौरान जब श्रद्धालु दानपेटी में अपना चढ़ावा डालते थे। दरअसल उन्हें लूटा जाता था।

उच्च न्यायालय ने मामला 19 सितंबर 2025 को सीआईडी ​​को सौंप दिया है और एक महीने के भीतर जाँच करने और सीलबंद रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने सीआईडी से बोर्ड के फैसलों और संबंधित दस्तावेजों को भी जब्त करने का निर्देश दिया है।

यह मामला पहले लोक अदालत के माध्यम से सुलझाया गया था। उन्होंने दावा किया कि इसमें वाईएसआरसीपी के कई नेता और शीर्ष अधिकारी शामिल थे। रेड्डी के मुताबिक, एक आला पुलिस अधिकारी तिरुपति मंदिर की संपत्ति लूटने में मदद कर रहा था। अधिकारियों और नेताओं ने लूटे गए धन को आपस में बाँटा। उस वक्त भुमना करुणाकर रेड्डी टीटीडी के अध्यक्ष थे।

रेड्डी ने आरोप लगाया कि लूटी गई धनराशि का एक हिस्सा जगन रेड्डी के आवास, ताडेपल्ली पैलेस में भेज दिया गया और घोटाले के बाद महत्वपूर्ण सबूत नष्ट कर दिए गए।

रेड्डी ने आरोप लगाया कि लूट के पैसों का करोड़ों रुपए रियल एस्टेट में निवेश किए गए और कथित तौर पर अवैध धन जगन रेड्डी के घर, ताडेपल्ली पैलेस में पहुँचाया गया। उन्होंने यह भी दावा किया कि 100 करोड़ रुपए की यह चोरी 2019 से 2024 तक चले वाईएसआरसीपी शासन के तहत तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम के इतिहास में ‘सबसे बड़ी लूट’ थी। ये मामला अप्रैल 2023 का है।

तिरुपति लड्डू प्रसादम में कथित जानवर की चर्बी मिलाने का मामला अभी सुलझा भी नहीं है। उससे पहले मंदिर में चढ़ावे की लूट का ये मामला सामने आ गया है।

हाँ भाई मामला तो गड़बड़ है… शेखी बघारते-बघारते योगेंद्र यादव ने ‘वोट चोरी’ पर राहुल गाँधी को ही कर दिया बेनकाब, चलती रहेगी केवल गलथोथी

‘आंदोलनजीवी’ सलीम उर्फ योगेंद्र यादव ने शेखी बघारने के फेर में ‘वोट चोरी’ पर राहुल गाँधी को ही बेनकाब कर दिया है। ‘द वायर’ से बातचीत में उन्होंने जो कुछ कहा है उससे स्पष्ट है कि कॉन्ग्रेस नेता जो आरोप लगाए हैं, उसके समर्थन में उनके पास ठोस कुछ नहीं है। सारी बातें हवा-हवाई हैं।

यादव ने जो कुछ कहा है उससे यह भी पता चलता है कि राहुल गाँधी की यह गलथोथी आने वाले दिनों में और तेज हो सकती है। पर किसी भी स्थिति में इस मामले को लेकर वे न तो अदालत जाएँगे और न ही हलफनामा दायर करेंगे।

दरअसल, पिछले कुछ महीनों से राहुल गाँधी ने कथित ‘वोट चोरी’ के मुद्दे को उठाया हुआ है। राहुल इस मुद्दे को इतना क्रांतिकारी समझ रहे हैं कि इस मुद्दे की तुलना कभी बम तो कभी हाइड्रोजन बम से कर रह हैं।

राहुल गाँधी जब आरोप लगाते हैं तो चुनाव आयोग उनका जवाब दे देता है। कुछ मामलों में उनसे शपथ पत्र दाखिल करने को भी कहा, लोग उनसे इस मुद्दे को अदालत में ले जाने पर सवाल पूछते हैं तो वो कतराने लगते हैं। अभी तक उन्होंने शपथ पत्र तक नहीं दिया है।

आपको लगेगा कि होना तो यही चाहिए, अगर राहुल गाँधी को लगता है कि चुनाव आयोग उनकी बात नहीं सुन रहा है तो अदालत जाएँ। अब यही उनके लिए गड़बड़ शुरू होती है, अदालत तो सबूत और साक्ष्य माँगती हैं लेकिन उसके नाम पर हैं सिर्फ मनगढ़ंत कहानियाँ। तो अब सवाल उठता है कि इस पूरी कार्रवाई की मकसद क्या है?

यह मकसद समझने के लिए राहुल गाँधी के कथित सलाहकार योगेंद्र यादव का एक वायरल बयान देखते हैं। योगेंद्र ने ‘द वायर’ से बातचीत में वोट चोरी के मुद्दे पर कहा, “कोर्ट-कचहरी, यह कहना कि आप कोर्ट जाइए, हलफनामा दीजिए, इसका कोई मतलब नहीं है क्योंकि ऐसा कुछ होगा नहीं।”

वो आगे कहते हैं, “वोट चोरी की बात नीचे तक जा रही है। साधारण लोग कह रहे हैं कि हाँ भाई मामला तो गड़बड़ है…लोगों की राय इस मुद्दे के साथ जुड़ रही है। इस हद तक लोग अभी सफल हुए हैं।”

योगेंद्र के बयान से यह साफ हो जाता है कि राहुल गाँधी सच की कोई क्रांतिकारी लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं, बल्कि वो राजनीतिक हवा बाजी के जरिए लोगों को उकसाने की कोशिश कर रहे हैं। अपने आस-पास के देशों में जिस तरह के हालात पिछले कुछ वर्षों में बने हैं उससे भी भारत में उनका समर्थक करने वाला एक तबका खुश है।

उनका बयान दिखाता है कि राहुल गाँधी और उनकी टीम के पास इन आरोपों को साबित करने के लिए कोई ठोस तथ्य नहीं हैं। सारी कोशिश यही है कि वो बस किसी तरह वो हवा बना दें। राहुल गाँधी अपने ट्वीट्स में GenZ जैसे शब्दों का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं यह भी लोगों को स्पष्ट समझ आता है।

राहुल गाँधी ने कभी नोटबंदी को ‘आम जनता का विरोधी’ बताकर और कभी राफेल सौदे को ‘चौकीदार चोर है’ कहकर घोटाला साबित करने की कोशिश की है। असर के नाम पर ना तो नोटबंदी ने चुनावी नतीजों में मोदी सरकार को नुकसान पहुँचाया, ना राफेल ने कोई लहर बनाई। अब वही हाल ‘वोट चोरी’ का दिख रहा है।

जनता के बीच इस मुद्दे को लेकर कोई आंदोलन, धरना या गुस्सा नहीं है। जनता कहीं भी सड़कों पर नहीं है, बस यही हो रहा है कि कुछ कॉन्ग्रेस समर्थक सोशल मीडिया पर हैशटैग चला रहे हैं। ग्राउंड पर सन्नाटा है और यही सन्नाटा राहुल गाँधी के आरोपों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है।

राहुल गाँधी ने बार-बार यह निराधार आरोपों के जरिए पीएम मोदी की छवि को धूमिल करने का प्रयास किया है लेकिन इन सबमें राहुल की खुद की राजनीतिक विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होने लगे हैं।

लोगों को लगने लगा है कि राहुल गाँधी के मुद्दों में बस हवाई बातें रहती हैं कोई ठोस सबूत या तथ्य नहीं रहते। क्योंकि अगर जनता राहुल गाँधी की बातों को मानती, जनता को लगता कि वोट चोरी हो रही है तो क्या जनता चुप रहती? क्या चुनाव नतीजे इस तरह मोदी और बीजेपी के समर्थन में होते?

इस सब आरोपों के चलते नरेंद्र मोदी की राजनीतिक लोकप्रियता तो कम नहीं होती दिख रही इसके उल्ट राहुल गाँधी की अपनी साख पर सवालिया निशान खड़े होने लगे हैं।

पहले ट्रंप ने H-1B वीजा पर बनाई हवा, अब व्हाइट हाउस दे रहा स्पष्टीकरण: कहा- ₹88 लाख हर साल नहीं बस एक बार, वीजाधारकों को फिर से एंट्री पर नहीं चुकानी होगी बढ़ी फीस

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा H-1B वीजा की फीस एक लाख डॉलर (लगभग 88 लाख रुपए) तय किए जाने के बाद व्हाइट हाउस ने इसे लेकर कुछ स्पष्टीकरण जारी किए हैं। व्हाइट हाउस ने बताया है कि वीजा की यह फीस हर साल के लिए नहीं होगी बल्कि यह सिर्फ एक बार देनी होगी। इससे पहले दावा किया गया था कि यह फीस हर साल देनी होगी।

साथ ही, यह नियम केवल नए H-1B वीजा आवेदनों पर लागू होगा। अगर कोई H-1B वीजा धारक अभी अमेरिका से बाहर है लेकिन फिर से अमेरिका में काम करने के लिए नए H-1B वीजा के लिए आवेदन कर रहा है, तो उसे अब नई बढ़ी हुई फीस देनी होगी।

ये नई फीस खासकर उन पर लागू होगी जो पहली बार वीजा के लिए अप्लाई कर रहे हैं और अमेरिका में एंटर नहीं हुए हैं। लेकिन अगर कोई व्यक्ति पहले से ही H-1B वीजा पर अमेरिका में रहकर काम कर रहा है, तो उसे यह एक लाख डॉलर की अतिरिक्त फीस नहीं देनी होगी।

हालाँकि, अगर वही व्यक्ति अपने वीजा को रिन्यू करवाना चाहता है या किसी नई कंपनी के लिए H-1B ट्रांसफर करवाना चाहता है, तो उस स्थिति में भी कुछ फीस देनी पड़ेगी। यानी नई फीस का सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ेगा जो पहली बार अमेरिका में H-1B वीजा लेकर आना चाहते हैं।

वहीं, अमेरिकी नागरिकता और आव्रजन सेवा (USCIS) ने बताया है, “नई H-1B वीजा जरूरत केवल नए आवेदनों पर लागू होती है, जो अभी तक दायर नहीं किए गए हैं। 21 सितंबर 2025 से पहले दायर किए जा चुके आवेदनों पर इसका कोई असर नहीं होगा।”

कंपनियों और कर्मचारियों में क्यों मचा हड़कंप?

ट्रंप के फैसले के बाद बड़ी टेक कंपनियाँ जैसे माइक्रोसॉफ्ट, मेटा, अमेजन घबरा गईं हैं। इन कंपनियों ने अपने H-1B और H-4 वीजा वाले कर्मचारियों से कहा कि वे 21 सितंबर से पहले अमेरिका लौट आएँ, वरना वापस बुलाने में 88 लाख की फीस देनी पड़ सकती है।

इसी डर से कई लोगों ने अपनी छुट्टियाँ रद्द कर दीं, टिकट कैंसिल कर दिए और अमेरिका वापस लौटने की जल्दी की। इसके चलते दिल्ली एयरपोर्ट और अमेरिका के न्यूयॉर्क, वॉशिंगटन जैसे बड़े एयरपोर्ट्स पर भीड़ देखी गई। हालाँकि, अब खुद अमेरिकी सरकार ने इसे लेकर स्पष्टीकरण दे दिया है।

कौन-कौन होगा प्रभावित और क्यों हुआ बदलाव?

इससे भारत सबसे ज्यादा प्रभावित होगा, क्योंकि हर साल सबसे ज्यादा H-1B वीजा भारतीयों को ही मिलता है। 2023 में 1.91 लाख और 2024 में 2.07 लाख भारतीयों को यह वीजा मिला था। करीब 2 लाख से ज्यादा भारतीय प्रोफेशनल्स इस नियम से प्रभावित होंगे।

व्हाइट हाउस के अधिकारियों का कहना है कि H-1B वीजा का गलत इस्तेमाल हो रहा है। कंपनियाँ इसका इस्तेमाल अमेरिकियों की नौकरियाँ छीनने और कम वेतन पर विदेशी कर्मचारी लाने के लिए कर रही हैं। इसलिए अब सिर्फ हाईली स्किल्ड लोग ही अमेरिका आ सकेंगे। ये फीस यह तय करेगी कि जो लोग आएँ, वे असल में टैलेंटेड हों, जिन्हें अमेरिकी कामगार रिप्लेस नहीं कर सकते।

वहीं उनके अनुसार, इस फीस से मिली रकम का इस्तेमाल टैक्स कम करने और सरकारी कर्ज चुकाने में किया जाएगा। कंपनियों को लगता है कि 88 लाख फीस चुकाकर एंट्री-लेवल या मिड-लेवल कर्मचारियों को लाना नुकसान का सौदा होगा। इसलिए वे ऐसे काम भारत या अन्य देशों में आउटसोर्स कर सकती हैं। इससे अमेरिका में भारतीय प्रोफेशनल्स के मौके घटेंगे।

भारत सरकार की प्रतिक्रिया

भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि इस फैसले का मानवीय असर होगा क्योंकि इससे कई परिवार प्रभावित होंगे। साथ ही भारत ने उम्मीद जताई है कि अमेरिका इस पर पुनर्विचार करेगा। भारत के विदेश मंत्रालय के आधिकारिक प्रवक्ता रणधीर जायसवाल इसके संबंध में ‘X’ पर जानकारी साझा की है।

उन्होंने बताया कि सरकार ने अमेरिका में प्रस्तावित H1B वीजा कार्यक्रम पर प्रतिबंधों से जुड़ी रिपोर्टों को देखा है। इस प्रस्तावित कदम के सभी असर सरकार और भारतीय उद्योग जगत समेत सभी संबंधित पक्षों द्वारा गहराई से समझे जा रहे हैं। भारतीय उद्योग ने पहले ही कुछ गलत धारणाओं को स्पष्ट करते हुए एक प्रारंभिक विश्लेषण भी जारी किया है।

स्टेटमेंट में लिखा है कि भारत और अमेरिका दोनों के उद्योग जगत का नवाचार और रचनात्मकता में गहरा हित है और दोनों पक्ष मिलकर आगे का रास्ता तय करने पर विचार कर सकते हैं। कुशल पेशेवरों का आना-जाना और दोनों देशों के बीच प्रतिभा का आदान-प्रदान तकनीकी विकास, नवाचार, आर्थिक वृद्धि, प्रतिस्पर्धा और संपत्ति निर्माण में अहम भूमिका निभाते हैं।

नीति-निर्माता इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए हालिया कदमों का मूल्यांकन करेंगे, जिसमें दोनों देशों के बीच मज़बूत आपसी संबंध भी शामिल हैं। इस तरह के कदमों से मानवीय असर भी पड़ सकता है, जैसे परिवारों में बिछड़ाव और जीवन में अस्थिरता। सरकार को उम्मीद है कि अमेरिकी प्रशासन इन मामलों में उचित समाधान निकालेगा।

बता दें कि H-1B वीजा एक नॉन-इमिग्रेंट वीजा है। यह उन लोगों को मिलता है जो IT, इंजीनियरिंग, आर्किटेक्चर, हेल्थ जैसे तकनीकी और प्रोफेशनल क्षेत्रों में काम करते हैं। हर साल 85,000 वीजा जारी किए जाते हैं। ये वीजा लॉटरी सिस्टम से दिए जाते हैं, क्योंकि आवेदन करने वालों की संख्या बहुत ज्यादा होती है।

url – US President Donald Trump has fixed the application fee for H1B visa at one lakh dollars