पत्रकारों के संगठन प्रेस क्लब ऑफ इंडिया (PCI) का एक बार फिर प्रेस की आजादी को लेकर ‘रोना’ शुरू हो गया है। इस बार ये ‘रोना’ अडानी एंटरप्राइजेज के मानहानि मामले में सुनाए गए कोर्ट के एक आदेश को लेकर है। इस ex-parte (एकतरफा आदेश) आदेश को ‘बेहद चिंताजनक’ बताते हुए PCI ने कहा कि इससे कॉरपोरेट घरानों के हाथों में ही पूरी सेंसरशिप होगी।
दिल्ली की रोहिणी जिला अदालत का यह आदेश अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड बनाम परंजॉय गुहा ठाकुरता (Adani Enterprises Ltd. Vs Paranjoy Guha Thakurta) मामले में 06 सितंबर 2025 को दिया। इसमें साफ कहा गया है कि गौतम अडानी और अडानी एंटरप्राइजेज लिमिटेड के खिलाफ बिना सबूत वाले निराधार कंटेन्ट और आर्टिकल को तमाम प्लेटफॉर्म्स से हटाए जाए।
इस आदेश को लेकर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने कहा है कि इससे कॉरपोरेट घरानों के हाथों बिना रोक-टोक सेंसरशिप का हथियार मिल जाएगा। प्रेस क्लब कहता है कि यह शायद अब तक का सबसे बड़ा उदाहरण है कि कैसे SLAPP (Strategic Litigation Against Public Participation) केस का इस्तेमाल पत्रकारिता को चुप कराने के लिए हो रहा है।
The Press Club of India finds the ex-parte order passed by the Rohini District Court in the matter of Adani Enterprises Ltd. vs. Paranjoy Guha Thakurta & Ors extremely disturbing.
— Press Club of India (@PCITweets) September 18, 2025
In an act of egregious judicial overreach, the court has put its stamp on the power to impose… pic.twitter.com/cDyiFfyf7l
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने आरोप लगाया कि ex-parte आदेश में पत्रकारों को अपनी बात रखने का मौका नहीं मिला, जो कि प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के खिलाफ है। PCI ने कहा कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (I&B Ministry) ने सिर्फ कोर्ट के आदेश पर कार्रवाई करते हुए 138 यूट्यूबर लिंक और 83 इंस्टाग्राम पोस्ट हटाने का आदेश दे दिया। आरोप लगाया कि आदेश कानूनी चुनौती के दायरे में था, बावजूद सरकार ने इतनी जल्दी कार्रवाई की, जो और भी ‘चिंताजनक’ है।
एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने भी प्रेस क्लब की तरह ही अदालत के ex-parte आदेश पर रोना चालू रखा। संगठन ने भी आदेश को मीडिया संस्थान और पत्रकारों पर खतरा बताया है। सरकार की निराधार कंटेन्ट से जुड़ी सोशल मीडिया सामग्री हटाने की कार्रवाई को ‘अभिव्यक्ति के अधिकार’ (Freedom of Expression) और लोकतंत्र के खिलाफ बताते हुए सवाल उठाए हैं।
क्या सच में प्रेस की आजादी को खतरा ?
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया का बयान इस ex parte (एकतरफा आदेश) को बताता है कि इससे पत्रकारों की आवाज दबाई जा रही है। पहले बता दें कि ex-parte आदेश, वो आदेश जो अदालत तब पारित करती है जब कोर्ट में केवल एक पक्ष मौजूद है और दूसरा पक्ष (जिसे नोटिस भेजा गया हो या हाजिर न हुआ हो) अदालत में मौजूद नहीं होता। यह अंतरिम रूप से पारित किया जाता है।
इस मामले में भी यही हुआ। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कोर्ट में दूसरे पक्ष के सभी पत्रकार मौजूद नहीं हुए, जिसके कारण मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए उपलब्ध तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने अंतरिम आदेश पारित किया। लेकिन बाद में कोर्ट में पत्रकारों ने अपनी दलीलें पेश की और सुनवाई भी हुई। सच सामने है कि पत्रकारों की आवाज नहीं दबाई गई।
उधर, संगठन का दूसरा दावा कि अदालत के आदेश पर सरकार ने सोशल मीडिया से तत्काल प्रभाव से अडानी एंटरप्राइजेज से जुड़ी सामग्री हटाने से कॉरपोरेट मनमानी का खतरा है और सेंसरशिप उनके हाथों में चली जाएगी। तो हकीकत यह है कि आदेश में साफ कहा है कि सिर्फ झूठी, अप्रमाणित और मानहानिकारक सामग्री पर रोक है, सही और सबूत-आधारित रिपोर्टिंग पर कोई रोक नहीं है। यानी प्रेस की स्वतंत्रता को खत्म नहीं किया गया बल्कि सिर्फ मानहानि और अफवाह जैसी सामग्री को हटाने का निर्देश दिया गया।
इसीलिए अब प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया का ‘रोना’ बंद हो जाना चाहिए और तथ्यों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। क्योंकि कोर्ट का आदेश प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला नहीं है। असल में एक अंतरिम आदेश है ताकि केस की पूरी सुनवाई तक गलत और अप्रमाणति बातें सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों पर फैलकर किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान न पहुँचा सकें।


