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नेपाल में सोशल मीडिया बैन तो एक बहाना, बांग्लादेश-श्रीलंका की तर्ज पर सत्ता परिवर्तन का मकसद था पूरा करना: जानें- GenZ की भीड़ को कौन कर रहा कंट्रोल

सड़कों पर युवा, संसद या राष्ट्रपति भवन में घुसने की कोशिश… इंटरनेट पर सरकार के भ्रष्टाचार के आरोप और फिर इंटरनेशनल मीडिया में खूब सारे आर्टिकल!! क्या नेपाल में बांग्लादेश और श्रीलंका वाली प्लेबुक अपनाई जा रही है?

नेपाल की राजधानी काठमांडू समेत तमाम शहरों में 8 सितंबर, 2025 को प्रदर्शनकारियों का हुजूम उमड़ पड़ा। मीडिया में चला कि ये लोग सोशल मीडिया पर बैन और भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदर्शन करने आए हैं। इस प्रदर्शन में लगभग 20+ लोग मारे भी गए

लेकिन जैसे ही थोड़ा सा इस प्रदर्शन को हमनें खुरचा तो पता चला कि कहानी यहाँ उतनी सीधी नहीं है जितनी दिखाई पड़ती है। दरअसल, इस पूरे प्रदर्शन को ऑर्गनाइज करवाने वाले ग्रुप का नाम है हामी नेपाल।

इस हामी नेपाल का मुखिया एक युवक है, जिसका नाम है सूदन गुरुंग। हामी नेपाल ने ही इस प्रोटेस्ट के बैनर पोस्टर बनवाए हैं, लोगों को इकट्ठा किया है। सोशल मीडिया से लेकर जमीन तक मोबीलाइजेशन भी इसी ग्रुप का है।

हामी नेपाल ने भीड़ इकट्ठा करने के लिए डिस्कोर्ड एप का इस्तेमाल किया जहाँ ग्रुप चैट में प्रदर्शन के इंस्ट्रक्शंस दिए जा रहे थे। हमने इन ग्रुप्स में छानबीन की तो यहाँ कोई बांग्लादेश जैसे सत्ता उखाड़ फेंकने की बात कर रहा है तो कोई कह रहा है कि हिंसा की ज्यादा से ज्यादा तस्वीरें इंटरनेशनल मीडिया को भेजो। ग्रुप में पेट्रोल बम बनाने के तरीके भी बताये जा रहे हैं। लोगों से अनुरोध किया जा रहा है कि वो हत्यारा सरकार लिखा हुआ डीपी लगाए। नेपाल पुलिस और सैन्य बल की तस्वीरों को शार्प शूटर बतलाते शेयर किया जा रहा है।

इस ग्रुप चैट में लगातार हिंसा और नरसंहार तक की बातें हुईं। कुछ कुछ वैसी ही जैसा बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना के तख्तापलट के समय देखा गया था। लेकिन इतना बड़ा प्रोटेस्ट कोई लड़कों का ग्रुप आयोजित करवा ले ये संभव नहीं है।

हामी नेपाल के बारे में थोड़ी छानबीन की तो पता चला कि इसे 2015 में बनाया गया था। ये नेपाल में समाजसेवा करने का दावा करता है। इसका असल मुखिया संदर्क रूइट नाम का एक आँख का सर्जन है। उसे हामी नेपाल ने अपना मेंटर बताया है। उसे रेमन मैग्सेसे अवॉर्ड भी मिल चुका है।

यह शख्स बारबरा फाउंडेशन नाम से NGO चलाता है। ये NGO एक अमेरिकी महिला का स्थापित किया हुआ है, वो काठमांडू में रहा करती थी। ये NGO नेपाल में जातिवाद जैसे कई मुद्दों पर काम करता है।

इतना ही नहीं बल्कि ये NGO पत्रकारों को अवॉर्ड भी देता है। नेपाल में हिंसक प्रदर्शन करवाने वाले हामी नेपाल को ऑफिस स्पेस भी इसी बारबरा फाउंडेशन ने दिया हुआ है।

हामी नेपाल का लिंक अल जजीरा के साथ ही कुछ ऐसे एनजीओ से भी है, जिनके तार ब्रिटेन की सरकार से जुड़ते हैं। नेपाल की इन घटनाओं पर रिपोर्ट करने में सबसे आगे अल जजीरा ही रहा है।

साथ ही साथ जैसे बांग्लादेश में हिंसा के बाद अमेरिकी और पश्चिमी देशों के दूतावास दंगाइयों के साथ खड़े हो गए थे, यहाँ भी कुछ वैसा ही हुआ है। अमेरिकी एंबेसी ने बाकी दूतावासों के साथ वही भाषा लिखी है, जो वह बांग्लादेश में तख्तापलट के समय लिखा करता था।

इसके साथ ही हिंसा के बाद UNHCR, UN, एमनेस्टी इंटरनेशनल दुनिया भर के रिजीम चेंज स्पेशलिस्ट NGO भी एक्टिव हो चुके हैं। सभी हिंसा की बात को दोहरा रहे हैं।

इन सब सूचनाओं के आधार पर अब तक आपने कुछ ना कुछ समानताएँ तो निकाल ही ली होंगी।

एक NGO, एक ऐसा चेहरा जिसका समाजसेवा में नाम हो, जिसके नाम पर नोबल या मैग्सेसे जैसा अवॉर्ड हो। उसके बाद भ्रष्टाचार का मुद्दा और आवारा युवाओं की भीड़?

दरअसल, ऐसे रेजीम चेंज ऑपरेशन्स में हिंसा को एंप्लीफाई करके दिखाना, चुनाव प्रक्रिया को गड़बड़ बताना, करप्शन जैसे मुद्दों को लीड बनाना और युवाओं को ढाल की तरह पेश करना, मोडस ऑपरेंडी होती ही है।

अब आने वाले कुछ दिन नेपाल की व्यवस्था के सबसे कठिन टेस्ट होने वाले हैं। जो नेपाल और दिशा तय करेंगी।

सवाल वही है, क्या भारतीय उपमहाद्वीप में एक और बांग्लादेश तैयार हो रहा है?

पीएम मोदी ने पंजाब में बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का किया दौरा, केंद्र की तरफ से ₹1600 करोड़ की सहायता का किया ऐलान: मृतकों के परिजनों को ₹2 लाख के मुआवजे की भी घोषणा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार (9 सितंबर 2025) को पंजाब में बाढ़ और भारी बारिश से प्रभावित इलाकों का दौरा किया। उन्होंने पहले हवाई सर्वेक्षण किया ताकि बाढ़ और भूस्खलन से हुए नुकसान का जायजा ले सकें। इसके बाद गुरदासपुर में एक बैठक में राहत और पुनर्वास कार्यों की समीक्षा की।

पीएम मोदी ने पंजाब के लिए 1600 करोड़ रुपए की आर्थिक सहायता की घोषणा की, जो राज्य के पास पहले से मौजूद 12,000 करोड़ रुपये के अतिरिक्त है। इसमें राज्य आपदा राहत कोष (SDRF) और पीएम किसान सम्मान निधि की दूसरी किश्त का अग्रिम भुगतान शामिल है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि प्रभावित क्षेत्रों को फिर से बसाने के लिए बहुआयामी रणनीति अपनाई जाएगी। इसमें पीएम आवास योजना के तहत घरों का पुनर्निर्माण, राष्ट्रीय राजमार्गों की मरम्मत, स्कूलों की बहाली, पीएमएनआरएफ के तहत राहत और पशुपालकों के लिए मिनी किट वितरण शामिल है। जिन किसानों के पास बिजली कनेक्शन नहीं है, उनके लिए विशेष सहायता दी जाएगी। जिन बोरवेल्स में मिट्टी भर गई या जो बह गए, उनके लिए राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत पुनर्वास सहायता दी जाएगी। डीजल से चलने वाले बोर पंपों के लिए MNRE के साथ मिलकर सौर पैनल और प्रति बूँद अधिक फसल योजना के तहत माइक्रो इरिगेशन की सुविधा दी जाएगी।

प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण के तहत पंजाब सरकार के विशेष प्रोजेक्ट के लिए बाढ़ से क्षतिग्रस्त ग्रामीण घरों के पुनर्निर्माण के लिए वित्तीय सहायता दी जाएगी। बाढ़ से प्रभावित सरकारी स्कूलों को समग्र शिक्षा अभियान के तहत मदद मिलेगी, बशर्ते राज्य सरकार जरूरी जानकारी दे। जल संचय जन भागीदारी कार्यक्रम के तहत पंजाब में पानी जमा करने वाली संरचनाओं का निर्माण और मरम्मत होगी, जिससे बारिश के पानी का संरक्षण और लंबे समय तक जल स्थिरता सुनिश्चित होगी।

केंद्र सरकार ने नुकसान का आकलन करने के लिए केंद्रीय दलों को पंजाब भेजा है, जिनकी रिपोर्ट के आधार पर और सहायता दी जाएगी। प्रधानमंत्री ने बाढ़ में जान गँवाने वालों के परिजनों से मुलाकात की और संवेदना व्यक्त की। उन्होंने मृतकों के परिवारों के लिए 2 लाख रुपये और गंभीर रूप से घायल लोगों के लिए 50,000 रुपये की अनुग्रह राशि की घोषणा की। बाढ़ और भूस्खलन से अनाथ हुए बच्चों के लिए पीएम केयर्स फॉर चिल्ड्रन योजना के तहत व्यापक सहायता दी जाएगी।

प्रधानमंत्री ने NDRF, SDRF, सेना और आपदा मित्र स्वयंसेवकों की तारीफ की, जिन्होंने राहत और बचाव में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार मिलकर इस मुश्किल समय में पंजाब के लोगों का साथ देंगे।

इससे पहले पीएम मोदी ने हिमाचल प्रदेश का दौरा किया था। उन्होंने हिमाचल प्रदेश के लिए केंद्र सरकार की तरफ से ₹1500 करोड़ के मदद की घोषणा की थी।

CSDS: भारतीय लोकतंत्र के खिलाफ साजिश और विदेशी फंडिंग का जाल – विस्तृत रिसर्च में खुलासा

यह रिसर्च सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज (CSDS: Centre for the Study of Developing Societies) के इतिहास, विचार, फंडिंग इकोसिस्टम और विदेशी संस्थाओं के साथ सहयोग की जाँच करता है। विश्लेषण की वजह ये है कि विदेशी फंडिंग वाले एनजीओ के साथ भारत के कथित थिंक टैंक और मीडिया के बीच सीएसडीएस एक गठजोड़ बनाता है, जो वैचारिक रूप से भारत, खासकर बहुसंख्यक हिंदुओं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली लोकतांत्रिक सरकार के खिलाफ है। इस रिसर्च में ऐसे कई रहस्योद्घाटन हुए हैं, जिससे पता चलता है कि भारत के राजनीतिक और सामाजिक विमर्श को प्रभावित करने, भारत के लोकतंत्र में विदेशी हस्तक्षेप को बढ़ावा देने और विदेशी शक्तियों के इशारे पर भारत की संप्रभुता को कमजोर करने की कोशिश की गई है। सीएसडीएस और उसके मददगारों ने कैसे दूसरे देशों की विदेश नीति के एजेंडे को आगे बढ़ाने की कोशिश की है, इसका भी पता चलता है।

CSDS की उत्पत्ति और विचार

सीएसडीएस की स्थापना 1963 में रजनी कोठारी ने की थी। कोठारी के क्रियाकलाप हिन्दू समाज को लेकर पूर्वाग्रह से ग्रसित थे। वह देश की धर्मनिरपेक्षता, जातिवाद और बहुसंख्यक विरोधी सोच का व्यक्ति रहा है। यह शोधपत्र सीएसडीएस की जड़ों को एशिया फाउंडेशन जैसी प्रायोजित विदेशी संस्थाओं से जोड़ता है, जो सीआईए का एक मुखौटा है। इससे साफ होता है कि संस्थान की स्थापना के पीछे ‘बाहरी प्रभाव’ था। सीएसडीएस के नेतृत्व में दशकों से ऐसे कार्यों को बढ़ावा मिला, जो भारत के बहुसंख्यक समुदाय को टारगेट करती है। अल्पसंख्यकों के झूठे उत्पीड़न की बात करती है और भारत की संप्रभुता और एकता को कमजोर करने वालों को ‘वैचारिक सोच’ प्रदान करती है।

विदेशी अनुदान का फैला जाल: नकदी, सामंजस्य और सोच

सीएसडीएस का परिचालन और अनुसंधान बजट न केवल भारत सरकार के अनुदानों (मुख्य रूप से इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च, ICSSR) के माध्यम से संचालित होता है, बल्कि विदेशी अनुदान पर इसकी निर्भरता भी लगातार बढ़ती जा रही है। 2016 से सीएसडीएस को FCRA के माध्यम से कम से कम ₹15.6 करोड़ प्राप्त हुए हैं। हालाँकि अधूरे खुलासों के कारण पूरी राशि का पता नहीं चल पाया है। अनुमान है कि ज्ञात स्रोतों से प्राप्त आमदनी से कहीं अधिक धनराशि इन्हें मिली है। सीएसडीएस की फंडिंग के मुख्य स्रोतों की बात करें तो वो निम्नलिखित हैं:

कोनराड एडेनॉयर स्टिफ्टंग (KAS: Konrad Adenauer Stiftung): जर्मन सरकार द्वारा फंडेड ये फाउंडेशन, सीधे तौर पर सत्तारूढ़ क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन (सीडीयू) से संबद्ध है। इस फाउंडेशन ने 2016 से 2.6 करोड़ रुपए से अधिक का दान दिया है। केएएस जर्मन विदेश नीति और पश्चिमी लोकतांत्रिक मूल्यों को आगे बढ़ाती है, जो अक्सर टारगेट वाले देशों की राजनीतिक को कमजोर करता है या इसे ‘सुधारने’ के नाम पर सत्ता परिवर्तन को हवा देता है।

अंतर्राष्ट्रीय विकास अनुसंधान केंद्र (IDRC: International Development Research Centre): आईडीआरसी कनाडा की एक क्राउन कॉपोरेशन है, जो पिछले 8 सालों से अपने थिंक टैंक के माध्यम से सीएसडीएस के सालाना बजट का एक तिहाई भाग प्रदान करता आ रहा है। आईडीआरसी कनाडाई विदेश नीति का एक हिस्सा है। ये अलगाववाद को बढ़ावा देता है। खालिस्तानी अलगाववादियों को कनाडा का खुला संरक्षण इसका उदाहरण है।

सीमेनपू फ़ाउंडेशन (Siemenpuu Foundation): फिनलैंड के विदेश मंत्रालय की आर्थिक मदद ये चल रहा यह फिनिश एनजीओ, सीएसडीएस और उसकी ब्रांचों (विशेषकर एसएडीईडी) को मदद करता है। सीमेनपू फाउंडेशन भारत में ‘आदिवासियों के समर्थन’ के आस-पास केंद्रित हैं, लेकिन उनके नेटवर्क और संवाद मंच नक्सल-समर्थित और हिंदू-विरोधी कथित बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं को ‘नजरिया’ प्रदान करते हैं। ये अक्सर भारत में उत्पीड़न और बेदखल जैसे मुद्दों को बढ़ावा देती है।

बर्गग्रुएन इंस्टीट्यूट (BI: Berggruen Institute): बीआई का भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी विचार इसकी पत्रिका “नोएमा” के माध्यम से प्रसारित होता है। इसमें भारत को सत्तावादी, सांप्रदायिक और पिछड़ा बताया जाता है और अक्सर अति-वैचारिक और तथ्यात्मक रूप से चुनिंदा लेखकों के लेख छापती है। इन लेखकों में भारत-विरोधी पश्चिमी लॉबी से जुड़े लेखक भी शामिल हैं।

फोर्ड फाउंडेशन, हेनरी लूस फाउंडेशन, ओमिडयार, ओपन सोसाइटी फाउंडेशन (Ford Foundation, Henry Luce Foundation, Omidyar, Open Society Foundations): ये अमेरिकी संस्थाएँ सत्ता परिवर्तन, समाज के कथित सशक्तिकरण और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान की राजनीति को बढ़ावा देने के लिए धन मुहैया कराती हैं। सीएसडीएस को सीधे या अपने सहयोगियों (जैसे “भारतीय मुस्लिम परियोजना”) के माध्यम से मदद करती है। ये लोग भारत और उसकी सरकार से पीड़ित होने के नेरेटिव को बढ़ावा देते हैं।

साइंसेज पीओ/एफएनएसपी (Sciences Po/FNSP): फ्रांस के प्रमुख राजनीति विज्ञान संस्थान ने, एफएनएसपी के माध्यम से, सीएसडीएस को पर्याप्त वित्तीय योगदान दिया है। इसकी फैकल्टी, खास कर क्रिस्टोफ़ जाफ़रलॉट, ने नियमित रूप से हिंदू विरोधी राजनीति और मोदी सरकार की आलोचना करते हुए शोध प्रकाशित किए हैं।

पश्चिमी मीडिया, ‘खोजी’ नेटवर्क और सत्ता-पलट तत्वों की मिलीभगत

शोध में विस्तार से बताया गया है कि कैसे सीएसडीएस और उसका शोध/पॉलिसी इकोसिस्टम—लोकनीति, एसएडीईडी और संबद्ध शिक्षाविद के साथ पश्चिमी मीडिया और ‘खोजी पत्रकारिता’ नेटवर्क (जैसे जीआईजेएन, ओसीसीआरपी, बेलिंगकैट, रिपोर्टर्स कलेक्टिव, आरएसएफ, और अन्य) जुड़े हुए हैं। ये गठजोड़ आकस्मिक नहीं है। नेटवर्क के इस जाल को अमेरिकी विदेश विभाग, एनईडी (सीआईए की सत्ता परिवर्तन कराने वाली कुख्यात शाखा), सोरोस की ओपन सोसाइटी और यूरोपीय सरकारी एजेंसियों का समर्थन है। इन चैनल्स के माध्यम से पश्चिमी खुफिया और राजनीतिक कर्ताधर्ता भारत की मीडिया और शोध विमर्श को तय करते हैं। साथ ही उन लोगों को आर्थिक मदद देते हैं, जो पश्चिमी नीतिगत प्राथमिकताओं और भारत की विफलता की बात करता है।

गठजोड़ बनाता फीडबैक लूप: विदेशी फंड पर निर्भर भारतीय शोधकर्ता भारत के लोकतंत्र, मीडिया और सांप्रदायिक स्थिति को लेकर खौफनाक रिपोर्ट तैयार करते हैं। फिर इन्हें वैश्विक स्तर पर मीडिया के माध्यम से फैलाया जाता है। इसको भारत में ‘कुछ लोग’ सही ठहराते हैं, जिनका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अर्बन नक्सल, अलगाववादियों और कट्टरपंथियों से संपर्क होता है।

बौद्धिक रणनीति: जातिगत सवाल, अल्पसंख्यक उत्पीड़न, हिंदू-विरोध और राष्ट्र-विरोध

सीएसडीएस के शोध, प्रकाशन और ‘सर्वेक्षण’ का उद्देश्य जाति, अल्पसंख्यक उत्पीड़न, हिंदू-विरोध और राष्ट्र-विरोध है। इसके इर्द-गिर्द इनकी रणनीतिक आगे बढ़ती है।

हिंदुओं का विभाजन: सीएसडीएस का शोध हिंदू विभाजन को और बढ़ाने की कोशिश करता है, खासकर दलितों, आदिवासियों और अन्य पिछड़े वर्गों को उनकी हिंदू पहचान से अलग करके, और राजनीतिक परिणामों को जातिगत उत्पीड़न और ‘बहुसंख्यक अत्याचार’ के चश्मे से देखकर। इस विभाजन को बनाए रखना और बढ़ाना ‘भारत-विरोधियों’ की रणनीति का अहम हिस्सा है।

दलित-मुस्लिम नरेटिव को प्रोत्साहित करना– सीएसडीएस बार-बार दलित और मुस्लिमों को एक साथ जोड़ने का प्रयास करता है। उसका दावा है कि दलित और मुस्लिम भारत और बहुसंख्यक हिंदुओं द्वारा पीड़ित हैं। इसलिए इनके बीच एकता ‘लोकतंत्र’ के लिए बेहद जरूरी है।

हिन्दुओं और भारत को विभत्स दिखाना- सीएसडीएस के कथित विद्वान, संबद्ध पत्रकार, आशीष नंदी- अनन्या वाजपेयी जैसे सहयोगी, साजिश के तहत हिंदुओं को फासीवादी, कट्टरपंथी और हिंसा फैलाने वाले के रूप में दिखाते हैं। ऐसा ये तब भी करते हैं, जब सबूत इन दावों के उलट होता है (उदाहरण के लिए, गोधरा 2002, दिल्ली हिंदू विरोधी दंगा 2020)। इनके शोध का इस्तेमाल भारतीय राष्ट्रवाद को अवैध ठहराने, बाहरी हस्तक्षेप को सही ठहराने और वैश्विक मीडिया में दुष्प्रचार के लिए किया जाता है।

भारतीय संप्रभुता को कमजोर करना: विदेशी फंडिंग वाला सीएसडीएस का शोध सत्ता विरोधी प्रदर्शन, आंदोलन और सोशल मीडिया पर ऐसे अभियानों का समर्थन करते हैं, जिससे देश की संप्रभुता और एकता कमजोर होती है। ये ऐसे तत्वों की बौद्धिक मदद भी करते हैं। देश में ऐसे बदलाव का समर्थन करते हैं, जिससे विदेशी हित साधा जा सके। ये बदलाव और नीतियाँ अक्सर लोकतांत्रिक निर्वाचित सरकार और बहुसंख्यक के खिलाफ होते हैं।

भारत विरोधी विदेशी संस्थानों के साथ गठजोड़

यह रिसर्च दर्शाता है कि सीएसडीएस का तंत्र न केवल वैचारिक रूप से भारत के खिलाफ है, बल्कि ऐसे संस्थाओं और व्यक्तियों को मदद करता है, जो इस विचार का समर्थन करते हैं और उसे संरक्षण देते हैं।

अमेरिकी डीप स्टेट के साथ जुड़ाव: सीएसडीएस के कई साझेदारों और आर्थिक मददगारों (एनईडी, आईडीआरसी, ओपन सोसाइटी, फोर्ड फाउंडेशन) की लैटिन अमेरिका, पूर्वी यूरोप और एशिया में सत्ता परिवर्तन अभियानों में सक्रिय रूप से जुड़े होने के प्रमाण मौजूद हैं।

खालिस्तान समर्थक, पाकिस्तान समर्थक, इस्लामवादी और वामपंथी समूहों से संबंध: आईडीआरसी से जुड़े लोग और मदद पाने वाले लोगों ने किसान विरोध प्रदर्शनों, सीएए, दिल्ली में हिन्दू विरोधी दंगों में हिस्सा लिया। सीएसडीएस या उसके सहयोगी गैर सरकारी संगठनों के अहम सदस्य नियमित रूप से अर्बन नक्सलियों, खालिस्तानी समर्थकों और भारत विरोधी लॉबी के साथ आंदोलनकारी समूहों में दिखाई देते रहे हैं।

चीन का प्रभाव: भारत विरोधी सक्रियता के लिए जाने जाने वाले कथित शिक्षाविदों और पत्रकारों (यहाँ तक ​​कि एक पूर्व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री) की मेजबानी, वित्त पोषण या उनके साथ संबद्धता के माध्यम से, न सिर्फ पश्चिमी देशों से बल्कि चीन से वित्त पोषण होने वाले चैनल (बर्गग्रुएन इंस्टीट्यूट के माध्यम से) से संबंध इनकी तटस्थता के किसी भी दिखावे को और अधिक कमजोर कर देते हैं।

एक जैसा पैटर्न और मोटिवेशन

एक व्यवस्थित पैटर्न उभरता है: विदेशी संस्थाएँ और सरकारें, कथित भारतीय थिंक टैंकों और कार्यकर्ताओं के साथ सहयोग करती हैं। ये मिलकर भारत की सरकार, बहुसंख्यक समुदाय और राष्ट्र-निर्माण परियोजनाओं की आलोचना करते हैं। ये लोग संयुक्त रूप से वैश्विक स्तर पर नकारात्मक नैरेटिव को बढ़ावा देते हैं, ताकि भारत की नीतिगत दबाव डाल सकें। इसके अलावा आंतरिक सामाजिक विभाजन और राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने का प्रयास करते हैं।

रिसर्च में कहा गया है कि इस समन्वित अभियान का उद्देश्य भारत की संप्रभुता को नुकसान पहुँचाना, वैश्विक स्थिति को कमज़ोर करना और बुद्धिजीवियों, मीडिया और अन्य लोगों के माध्यम से सत्ता को प्रभावित करना है।

इसके अलावा, हिंदू विरोधी हिंसा, धर्मांतरण और भारतीय हितों को वैश्विक स्तर पर निशाना बनाने पर इन संगठनों की चुप्पी, जबकि किसी भी कथित या मनगढ़ंत अल्पसंख्यक मुद्दे पर ओवर एक्टिव होना, इनके पूर्वाग्रह को उजागर करता है।

This is the full spider web, or the mindmap of the network around CSDS. You can download the high resolution picture (6 MB size) of this mindmap by clicking here.

सीएसडीएस के इर्द-गिर्द फैले नेटवर्क का पूरा मकड़-जाल या माइंडमैप ऊपर दिया गया है। आप इस माइंडमैप का हाई रेजोल्यूशन चित्र (6 MB की फाइल है) यहाँ क्लिक करके डाउनलोड कर सकते हैं।

सीएसडीएस और इसके सहयोगी गैर-सरकारी संगठनों, मीडिया प्लेटफॉर्म और वित्तपोषकों का गठजोड़ भारत की संप्रभुता, सांस्कृतिक अखंडता और लोकतांत्रिक वैधता के लिए एक समन्वित वैचारिक चुनौती के रूप में काम करता है। विदेशी फंड व्यवस्थित रूप से अपने शोध, आउटरीच और सक्रियता को सरकारों और वैश्विक व्यवस्था परिवर्तन तथा सामाजिक इंजीनियरिंग में निवेश करने वाले अरबपति फाउंडेशनों से संचालित होते हैं। सीएसडीएस का केस स्टडी यह उजागर करता है कि कैसे “नागरिक समाज” और “शैक्षणिक” संस्थानों को लोकतांत्रिक राज्यों के खिलाफ नैरेटिव युद्ध के औजारों में बदला जा सकता है। भारत को अपनी स्वायत्तता और राष्ट्रीय स्थिरता बनाए रखने के लिए, ऐसे संगठनों के एजेंडे, वित्तीय स्रोतों और संबंधों की कड़ी जाँच, नियामक निगरानी और सार्वजनिक जवाबदेही के अधीन होना चाहिए।

रिसर्च टीम:

प्रमुख शोधकर्ता: नूपुर जे शर्मा

शोधकर्ता: आशीष नौटियाल, दिव्यांश तिवारी, प्रारब्ध राय, ध्रुव मिश्रा, रोहित कुमार पांडे, चंदन कुमार

ग्राफिक्स: प्रशांत वशिष्ठ, रोहित आर्य, रितिका चंदोला

पूरा शोध पत्र यहाँ डाउनलोड करें:

(पूरा पेपर डाउनलोड करने के लिए ऊपर के बटन पर क्लिक करें, पढ़ने के लिए नीचे का बटन दबाएँ)

डोनाल्ड ट्रंप ने जिस सेक्स ऑफेंडर जेफरी एप्सटीन को पहचानने से किया इनकार, उसे लिखा पत्र आया सामने: डेमोक्रेट्स ने किया एक्सपोज, जानें- उस पत्र में आखिर है क्या

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एक के बाद एक बेइज्जती हो रही है। भारत के खिलाफ उनके बिना सोचे-समझे टैरिफ वाले बयान पर अभी बवाल थमा भी नहीं है कि हाउस ओवरसाइट कमेटी ने 2003 में ट्रंप द्वारा जेफरी एप्सटीन को लिखा गया एक कथित अश्लील पत्र सबके सामने ला दिया।

सोमवार (9 सितंबर) को कमेटी के लोगों ने बताया कि उन्हें एक बर्थडे बुक मिली, जिसमें ट्रंप के हस्ताक्षर वाला पत्र है। इसमें एक और पत्र भी था, जिसमें एप्सटीन के किसी दोस्त ने एक औरत के बारे में भद्दा मजाक किया था, जिसमें ट्रंप का नाम था।

डेमोक्रेट्स ने X पर ट्रंप का वो पत्र शेयर किया और कहा, “हमें ट्रंप का वो बर्थडे नोट मिला, जिसके बारे में वो कहते थे कि वो है ही नहीं। ट्रंप इसमें एक ‘शानदार रहस्य’ की बात करते हैं, जो उन्होंने एप्सटीन के साथ बाँटा था। वो क्या छिपा रहे हैं? फाइलें बाहर लाओ!”

इस साल जुलाई में वॉल स्ट्रीट जर्नल ने इस बर्थडे बुक और पत्र के बारे में बताया था। पत्र में टाइप किया हुआ टेक्स्ट था, जो एक नंगी औरत की लाइनिंग वाली आर्ट से घिरा था। पत्र में लिखा था, “हैप्पी बर्थडे, और हर दिन एक नया शानदार रहस्य हो।” हस्ताक्षर में ‘डोनाल्ड’ लिखा था, जो कमर के नीचे था और ऐसा लगता था जैसे प्यूबिक हेयर की नकल हो।

ट्रंप ने कहा कि उन्होंने न तो ये पत्र लिखा और न ही उसमें कोई औरत की आकृति बनाई। इतना ही नहीं, उन्होंने वॉल स्ट्रीट जर्नल और उन पत्रकारों के खिलाफ मानहानि का मुकदमा ठोक दिया, जिन्होंने 2003 में एप्सटीन के 50वें जन्मदिन के लिए दी गई चिट्ठियों की कहानी लिखी थी, जिसमें ट्रंप का पत्र भी था। इस मुकदमे में कम से कम 20 बिलियन डॉलर माँगे गए। ट्रंप ने इस पत्र को ‘जाली’ बताया।

ट्रुथ सोशल पर ट्रंप ने पोस्ट किया कि उन्होंने वॉल स्ट्रीट जर्नल के खिलाफ बड़ा मुकदमा दायर किया है। “ब्रेकिंग न्यूज: हमने उन सबके खिलाफ बड़ा मुकदमा ठोका है, जो उस झूठी, गंदी, बदनाम करने वाली, फेक न्यूज को छापने में शामिल थे, जो उस बेकार अखबार में छपी, जिसे वॉल स्ट्रीट जर्नल कहते हैं। ये बड़ा कानूनी कदम उन तथाकथित लेखकों, अब पूरी तरह बदनाम हो चुके WSJ, और इसके मालिकों और सहयोगियों के खिलाफ है, जिसमें रूपर्ट मर्डोक और रॉबर्ट थॉमसन सबसे ऊपर हैं…”

वहीं, व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने सोमवार को कहा कि ये बर्थडे कार्ड की कहानी ‘झूठी’ है और ये ‘फेक न्यूज’ डेमोक्रेट्स के ‘एप्सटीन धोखे’ को बढ़ाने के लिए है।

उन्होंने X पर लिखा, “वॉल स्ट्रीट जर्नल का ताजा लेख दिखाता है कि ये पूरी ‘बर्थडे कार्ड’ कहानी झूठी है। जैसा मैं कहती आई हूँ, साफ है कि ट्रंप ने ये चित्र नहीं बनाया और न ही इस पर हस्ताक्षर किए। ट्रंप की कानूनी टीम जोर-शोर से मुकदमा लड़ेगी। और ये ‘रिपोर्टर’ @joe_palazzolo ने जिसने ये गंदी कहानी लिखी, उसने टिप्पणी के लिए उसी वक्त संपर्क किया जब उसने अपनी कहानी छापी, हमें जवाब देने का समय ही नहीं दिया। ये डेमोक्रेट्स के एप्सटीन धोखे को बढ़ाने के लिए फेक न्यूज है!”

खास बात ये है कि एप्सटीन की फाइलें, जो उसकी गलत हरकतों की जाँच से जुड़े सीलबंद दस्तावेज हैं, उसने ट्रंप के समर्थकों समेत पूरे अमेरिका का ध्यान खींचा है।

इस साल जनवरी में ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद, अटॉर्नी जनरल बॉन्डी ने कहा था कि एप्सटीन के सारे दस्तावेज, जिनमें कई लोग एक ‘क्लाइंट लिस्ट’ मानते थे, जिसमें एप्सटीन के यौन तस्करी के रैकेट के बड़े लोग शामिल थे, सबके सामने लाए जाएँगे। लेकिन जनवरी में पद संभालने के बाद ट्रंप ने पलटी मार ली और अब एप्सटीन फाइलों और इन मामलों की जाँच को डेमोक्रेट्स का फैलाया धोखा बताते हैं।

जेफरी एप्सटीन कौन था?

जेफरी एप्सटीन एक अमेरिकी फाइनेंसर था, जिसे फ्लोरिडा की अदालत ने नाबालिग को वेश्यावृत्ति के लिए उकसाने और वेश्या माँगने के लिए दोषी ठहराया था। उसने 13 महीने जेल में बिताए और जुलाई 2019 में फ्लोरिडा और न्यूयॉर्क में नाबालिगों की यौन तस्करी के आरोप में फिर से पकड़ा गया। एक महीने बाद अगस्त में मुकदमे के दौरान उसकी मौत हो गई।

एप्सटीन फाइलें जाँच के दस्तावेज हैं, जिनमें एप्सटीन की गलत हरकतों की जाँच के दौरान फेडरल एजेंसियों ने फाइलें, रिकॉर्ड, वीडियो और संपर्क जमा किए थे। इनमें एप्सटीन के प्राइवेट प्लेन के फ्लाइट लॉग, कॉन्टैक्ट लिस्ट, हिसाब-किताब के रिकॉर्ड और यहाँ तक कि गलत व्यवहार के वीडियो सबूत भी होने की बात कही जाती है।

PhD कर स्कॉलर बन गई IIT गाँधीनगर की फैकल्टी, फिर अपने शिक्षक से ही कर ली शादी: एक अन्य शिक्षक की कोरियाई पत्नी बन गई असिस्टेंट प्रोफेसर, संस्थान की नियुक्तियों पर उठे सवाल

IIT गाँधीनगर एक बार फिर से विवादों में आ गया है। इस बार सवाल वहाँ पर शिक्षकों की नियुक्तियों को लेकर उठे हैं। ‘कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ यानी हितों के टकराव के आरोपों के साथ संस्थान से जवाब माँगा जा रहा है। हालाँकि अब तक संस्थान की ओर से अब तक इस पर किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं आई है।

जानकारी के अनुसार, संस्थान में 14 उन दंपतियों के बारे में पता चला है जो अलग-अलग और ऊँचे पदों पर कार्यरत हैं। कुछ शिक्षक और कर्मचारी ऐसे भी हैं जो पिता और पुत्री दोनों ही IIT गाँधीनगर में कार्यरत हैं। इसके अलावा इंटरनल कंप्लेंट कमिटी जैसे कुछ अहम पदों पर भी परिवार के ही सदस्य पदस्थ हैं।

ताजा मामला संस्थान के एक लेक्चरर से जुड़ा है। शिक्षक ने अपनी PhD छात्रा को ही संस्थान में नौकरी दिलाई और बाद में उससे शादी भी की। अब इसे लेकर सवाल उठ रहे हैं। शिकायत में पूछा गया है कि किस आधार पर स्कॉलर की नियुक्ति हुई है? साथ ही यदि संस्थान को इस तरह की नियुक्ति की जानकारी थी तो इसे रोका क्यों नहीं गया?

एक अन्य मामले में IIT गाँधीनगर के एक अन्य वरिष्ठ शिक्षक की कोरियाई पत्नी पहले संस्थान में विजिटिंग फैकल्टी थीं। अब उन्हें असिस्टेंट टीचिंग प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति मिल गई है।

इन दोनों मामलों के बाहर आने के बाद संस्थान में नियुक्तियों को लेकर तरह तरह के सवाल उठ रहे हैं।

लोगों के सवाल हैं कि ‘कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ और ‘नेपोटिज्म’ यानी भाई-भतीजावाद जैसी स्थितियों से बचने के लिए संस्थान में क्या कोई नीति बनाई गई है? क्या नियुक्ति से पहले कोई जाँच की जाती है जिससे ऐसी समस्याएँ न उत्पन्न हों?

सवाल यह भी है कि यदि इंटरनल कंप्लेंट कमिटी में कोई शिक्षक हो और उसके पति-पत्नी के खिलाफ कोई शिकायत आए तो वह निष्पक्ष कैसे रह सकता है? और क्या टैक्सपेयर्स के पैसों से चलने वाला संस्थान ऐसी व्यवस्था को उचित ठहरा सकता है?

ऑपइंडिया से बातचीत में लेखक और कॉलमिस्ट हर्षिल मेहता कहते हैं, “संस्थान में लगभग 14 दंपति अलग-अलग पदों पर काम करते हैं। मुझे ऐसी कोई नीति नहीं दिखती जिसमें इसे लेकर कोई स्पष्टता नियम हों। अगर ‘कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट’ की कोई नीति है तो IIT गाँधीनगर को उसे सार्वजनिक करना चाहिए। सवाल यह भी है कि क्या IIT गाँधीनगर कोई फैमिली रीयूनियन प्रोग्राम चला रहा है? अगर ऐसा है तो उसे आधिकारिक नीति के रूप में घोषित कर देना चाहिए।”

वे कहते हैं, “संस्थान में शिक्षक प्राची थारेजा इंटरनल कंप्लेंट कमिटी में हैं। क्या संस्थान को पता है कि उनके पति भी वहीं नौकरी करते हैं? अगर उनके पति के खिलाफ कोई शिकायत आती है तो उस मामले में प्राची हितों के टकराव के साथ कैसे निर्णय लेंगी? बड़ी-बड़ी कंपनियों में भी हितों के टकराव से बचने के लिए नीतियाँ होती हैं। IIT गांधीनगर में ऐसी नीति कहाँ है?”

हर्षिल ने आगे कहा, “अगर ऐसा नहीं है तो फिर ऐसी गतिविधियों को रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं, यह शिक्षण संस्थान को स्पष्ट करना चाहिए।”

उन्होंने संस्थान के डायरेक्टर और पूर्व डायरेक्टर सुधीर जैन, जिनके कार्यकाल में ये नियुक्तियाँ हुईं, साथ ही अन्य अधिकारियों पर भी सवाल उठाए और सरकार और केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय से हस्तक्षेप की माँग की है। अब देखना यह है कि आगे क्या कदम उठाए जाते हैं।

बाढ़ से जूझ रहे पंजाब, हिमाचल और उत्तराखंड को UP की मदद, भेजी 48 ट्रक राहत सामग्री: CM योगी बोले- संकट की घड़ी में साथ खड़े हैं

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बाढ़ प्रभावित उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और पंजाब में 48 ट्रकों से भरे राहत सामान को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। ट्रक में बाढ़ पीड़ितों के लिए 19 हजार किट भरकर भेजे गए। इसके साथ सीएम ने हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड को 5-5 करोड़ रुपए की आर्थिक मदद की भी घोषणा की।

दरअसल, सोमवार (08 सितंबर 2025) को सीएम योगी आदित्यनाथ सहारनपुर पहुँचे। यहाँ तीनों राज्यों के लिए राहत सामग्री से भरे 48 ट्रक रवाना किए। इस दौरान सीएम ने कहा कि पड़ोसी राज्यों की मदद के लिए यूपी सरकार हर समय तैयार है। सीएम ने श्रेष्ठ भारत को बढ़ावा देते हुए कहा कि यूपी के 25 करोड़ जनता की तरफ से बाढ़ पीड़ित भाई-बहनों के लिए भेजी गई सामग्री मानवीय संवेदना की कड़ी है।

मुख्यमंत्री ने कहा, “उत्तर प्रदेश में बाढ़ सबसे बड़ी पीड़ा रही है लेकिन इस बार निचले स्तर पर ही जलभराव हुआ है। वो भी सिर्फ सहारनपुर, बागपत, गौतमबुद्धनगर या उन जिलों में जहाँ से यमुना जा रही है। गंगा जी के मुहाने पर बिजनौर से लेकर बलिया तक हर जिले में पुख्ता व्यवस्था की गई है। बाणगंगा और हिंडन नदियों में ओवरफ्लो होने के कारण हुई हानि के बाद सरकार ने तुरंत राहत सामग्री पहुँचाने का काम किया।”

इसके साथ CM योगी ने आपदा राहत उपाय पर बात करते हुए कहा, “यूपी में जिन किसानों की फसल बाढ़ की चपेट में आई है, उनका सर्वे शुरू कर दिया गया है। जल्द ही सर्वे की रिपोर्ट मिल जाएगी और पीड़ित किसानों को मुआवजा राशि दी जाएगी। बारिश के मौसम में जानवर या सांप के काटने से सदस्यों को खोने वाले परिवारों को ₹4 लाख मुआवजा दिया जाएगा।”

CM योगी ने बताया, “आपदा से नष्ट हुए घरों के पुनर्निर्माण के लिए धनराशि उपलब्ध कराई जाती है और नदी कटाव से प्रभावित परिवारों को नए घर बनाने के लिए जमीन के पट्टे और वित्तीय सहायता दी जाती है। बाढ़ प्रभावित गाँवों में भोजन, बच्चों के लिए दूध, पशुओं के लिए चारा और राहत शिविरों तक सुरक्षित परिवहन की व्यवस्था की जाती है।”

इसके अलावा CM योगी आदित्यनाथ ने प्राकृतिक आपदा के दौरान जनता से सतर्क रहने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि घर के आसपास इकट्ठे हुए पानी से डायरिया समेत अन्य बीमारियों हो सकती है और कहा कि पीने के लिए केवल उबला हुआ पानी ही इस्तेमाल करें।

PM मोदी ने हिमाचल में बाढ़ प्रभावित इलाकों का किया हवाई दौरा, ₹1500 करोड़ देने का ऐलान: मृतकों के परिजनों को केंद्र सरकार देगी 2-2 लाख रुपए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार (9 सितंबर 2025) को हिमाचल प्रदेश में बाढ़ और भारी बारिश से प्रभावित इलाकों का दौरा किया। उन्होंने सबसे पहले हवाई सर्वेक्षण किया ताकि बाढ़ और भूस्खलन से हुए नुकसान का जायजा ले सकें। इसके बाद काँगड़ा में एक बैठक में राहत और पुनर्वास के कामों की समीक्षा की।

इस दौरान पीएम मोदी ने हिमाचल के लिए 1500 करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता की घोषणा की। इस राशि में राज्य आपदा राहत कोष (SDRF) और पीएम किसान सम्मान निधि की दूसरी किश्त का अग्रिम भुगतान शामिल है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि प्रभावित इलाकों को फिर से बसाने के लिए हरसंभव मदद की जाएगी। उन्होंने पीएम आवास योजना के तहत घरों के पुनर्निर्माण, राष्ट्रीय राजमार्गों की मरम्मत, स्कूलों की बहाली और पशुपालकों के लिए मिनी किट जैसी योजनाओं पर जोर दिया। जिन किसानों के पास बिजली कनेक्शन नहीं है, उनके लिए विशेष मदद का ऐलान भी किया गया।

पीएम मोदी ने कहा कि बाढ़ से क्षतिग्रस्त घरों की सही जानकारी के लिए जियोटैगिंग की जाएगी, ताकि सहायता जल्दी और सही लोगों तक पहुँचे। स्कूलों में पढ़ाई सुचारू रखने के लिए समग्र शिक्षा अभियान के तहत क्षति की जानकारी जियोटैगिंग से ली जाएगी। इसके अलावा, भूजल स्तर बढ़ाने और पानी के बेहतर प्रबंधन के लिए रिचार्ज संरचनाओं का निर्माण होगा, जिससे बारिश का पानी जमा किया जा सके।

प्रधानमंत्री ने प्रभावित परिवारों से मुलाकात की और मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त की। उन्होंने मृतकों के परिवारों के लिए 2 लाख रुपए और गंभीर रूप से घायल लोगों के लिए 50,000 रुपए की अनुग्रह राशि की घोषणा की। केंद्र सरकार ने नुकसान का जायजा लेने के लिए केंद्रीय दलों को भेजा है, जिनकी रिपोर्ट के आधार पर आगे की सहायता दी जाएगी।

प्रधानमंत्री ने NDRF, SDRF, सेना और आपदा मित्र स्वयंसेवकों की तारीफ की, जिन्होंने राहत और बचाव कार्य में दिन-रात मेहनत की। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार मिलकर इस मुश्किल समय में हिमाचल के लोगों का साथ देंगे। केंद्र सरकार ने आपदा प्रबंधन नियमों के तहत सभी तरह की सहायता देने का वादा किया है।

प्रधानमंत्री ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए आश्वासन दिया कि केंद्र सरकार हर कदम पर हिमाचल की मदद करेगी। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार की माँगों और केंद्रीय दलों की रिपोर्ट के आधार पर और मदद दी जाएगी।

14 बार जेल जाने वाले ‘ब्लैक’ ने ट्रेन में ली ‘व्हाइट गर्ल’ की जान, US मीडिया की चुप्पी पर भड़के लोग: लगाया ‘नस्लवाद’ का आरोप

युद्ध से बचकर शांति की तलाश में अमेरिका आईं 23 साल की यूक्रेनी लड़की इरीना ज़ारुत्स्का की हत्या कर दी गई है। यह घटना 22 अगस्त 2025 को अमेरिका के नॉर्थ कैरोलिना में एक ट्रेन स्टेशन पर हुई। पुलिस ने बताया कि 34 वर्षीय डिकार्लोस ब्राउन जूनियर नाम के एक शख्स ने चाकू से कई बार हमला कर इरीना को मार डाला।

यह घटना सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई, लेकिन अमेरिकी मीडिया ने इस पर कोई खास कवरेज नहीं दी, जिससे लोगों में नाराजगी है। ऐसा लगा जैसे यह खबर उनके लिए सामान्य थी। शार्लेट-मेक्लेनबर्ग पुलिस विभाग के मुताबिक, इरीना की मौत ईस्ट/वेस्ट बुलेवार्ड लाइट रेल स्टेशन पर हुई।

14 बार जा चुका जेल अपराधी

हिंसक वारदातों में शामिल डिकार्लोस ब्राउन को इरीना की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। 34 साल के डिकार्लोस पर पहले भी कई आपराधिक आरोप लग चुके हैं। वह 2011 से अब तक चौदह बार गिरफ्तार हो चुका है। उस पर चोरी, लूटपाट और धमकी देने जैसे आरोप हैं। एक मामले में तो उसे पाँच साल की जेल भी हुई थी।

डिकार्लोस ब्राउन पर 911 इमरजेंसी नंबर का गलत इस्तेमाल करने का भी आरोप है। एक बार उसने पुलिस को फोन करके कहा था कि उसके अंदर ‘कुछ इंसानों द्वारा बनाया हुआ सामान’ है, जिसकी जाँच होनी चाहिए। पुलिस ने बताया कि उसे एक मेडिकल समस्या है और वे उसकी मदद नहीं कर सकते। उस पर लगे कई पुराने आरोप कोर्ट ने हटा दिए थे।

लोगों ने मेनस्ट्रीम मीडिया की चुप्पी पर उठाए सवाल

इरीना की हत्या का वीडियो ऑनलाइन वायरल होने के बाद, लोगों ने आरोपित के पुराने आपराधिक रिकॉर्ड को ढूँढ निकाला। इस घटना पर, आरोपित के खिलाफ पुराने मामले हटाए जाने और अमेरिकी मीडिया की चुप्पी को लेकर सोशल मीडिया पर काफी गुस्सा है।

एक्स (पहले ट्विटर) पर एक यूजर ने लिखा, “इरीना ज़ारुत्स्का की हत्या पर मीडिया की चुप्पी झूठ का सबसे घिनौना रूप है, जिसे मैंने पहले भी देखा है। ये वही लोग है जिन्होंने डैनियल पेनी को लेकर लगातार नकारात्मक कवरेज किया था और वे ही इस मामले में चुप हैं। यह भी सच है कि आप मीडिया से उतनी नफरत नहीं करते जितनी करनी चाहिए।”

एक और यूजर ने लिखा, “अगर एक्स नहीं होता, तो मैं कभी इरीना ज़ारुत्स्का के बारे में नहीं जान पाती। ये पुराने मीडिया चैनल बेकार हैं।”

‘एंड वोकेनेस’ नाम के एक और यूज़र ने अमेरिका के बड़े मीडिया संस्थानों का नाम लेते हुए बताया कि किसी ने भी इस क्रूर हत्या को नहीं दिखाया। उन्होंने लिखा, “AP, पीबीएस, न्यूयॉर्क टाइम्स, एनपीआर, वाल स्ट्रीट जर्नल, BBC, सीएनएन, वाशिंगटन पोस्ट, रॉयटर्स और एमसएनबीसी में से किसी ने भी इस हमले पर एक भी खबर नहीं दी।”

टेस्ला और एक्स के मालिक एलन मस्क ने भी इस मामले में अपनी बात रखी। उन्होंने उन जजों की आलोचना की जिन्होंने पहले आरोपित डिकार्लोस पर लगे आरोप हटा दिए थे। मस्क ने कहा, “आइए कानून बदलें। तब तक उन जजों और वकीलों को शर्मिंदा करें जो हत्या, बलात्कार और डकैती को बढ़ावा देते हैं। और खासकर उन लोगों को शर्मिंदा करें जिन्होंने उनके चुनाव अभियानों को पैसा दिया। इससे सबसे बड़ा फर्क पड़ेगा।”

एक और पोस्ट में मस्क ने अमेरिकी मीडिया पर इरीना की हत्या को नहीं दिखाने के लिए निशाना साधा। उन्होंने एक पोस्ट को शेयर किया जिसमें बताया गया था कि किसी भी बड़े मीडिया संस्थान ने इस पर कोई खबर नहीं लिखी। उन्होंने बस ‘जीरो’ (शून्य) लिखकर अपनी राय दी। यह साफ नहीं है कि अमेरिकी मीडिया ने इस खबर को क्यों नहीं दिखाया, जबकि विदेशी मीडिया ने इसे कवर किया। कुछ लोगों का मानना है कि यह इसलिए हुआ क्योंकि आरोपित एक काला बेघर व्यक्ति था और पीड़ित एक व्हाइट शरणार्थी थी।

इस बीच, शार्लेट शहर की मेयर, वी लाइल्स ने एक एक्स पोस्ट में मीडिया संस्थानों को धन्यवाद दिया कि उन्होंने इरीना की हत्या का वीडियो नहीं दिखाया। इस पर लोगों ने मेयर की आलोचना की। उनका कहना था कि मेयर को वीडियो के वायरल होने की चिंता है, न कि आरोपित और उन जजों पर कार्रवाई करने की जिन्होंने उसे कई आपराधिक आरोपों के बावजूद सड़कों पर रहने दिया।

कई लोग इस तरह की घटनाओं में एक जैसा पैटर्न देख रहे हैं। हाल ही में जर्मनी के फ्रीडलैंड शहर में एक यूक्रेनी लड़की को ट्रेन के आगे धक्का दिया गया था। यूक्रेन के द कीव इंडिपेंडेंट के मुताबिक, एक 31 साल के इराकी नागरिक ने 16 साल की यूक्रेनी शरणार्थी लड़की को ट्रेन की पटरी पर धकेल दिया, जिससे वह 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आ रही ट्रेन से टकरा गई। रिपोर्ट में बताया गया है कि आरोपित को सिज़ोफ्रेनिया नाम की मानसिक बीमारी है।

क्या अपराध की गंभीरता से ज्यादा, पीड़िता और अपराधी की नस्ल ज्यादा मायने रखती है?

कुछ लोगों का मानना ​​है कि अमेरिका के बड़े मीडिया संस्थान किसी भी अपराध को दिखाने से पहले अपराधी और पीड़ित की नस्ल देखते हैं। शायद उन्हें डर था कि अगर वे इस खबर को दिखाते तो लोग आरोपित की नस्ल, उसके पुराने अपराधों, पीड़ित के व्हाइट होने और शरणार्थी होने की बात पर जोर देते। ऐसा लगता है कि उनके लिए अपराध की खबर दिखाने से ज़्यादा उनका अपना ‘प्रगतिशील एजेंडा’ ज्यादा महत्वपूर्ण है।

अगर अपराधी गोरा होता और पीड़ित काली, तो ये मीडिया संस्थान अब तक हंगामा मचा चुके होते। वे ‘गोरे वर्चस्व’ और नफरत पर लेख लिखते। जैसा कि ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ आंदोलन के दौरान हुआ था, ठीक उसी तरह सड़कों पर प्रदर्शन होने लगते और मीडिया इसे दिन-रात दिखाता।

पीएम ओली के घर चली गोली, फूँका गया नेपाल कॉन्ग्रेस का मुख्यालय: प्रदर्शनकारियों ने सेना को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा, 5 मंत्रियों समेत 21 सांसदों का इस्तीफा

नेपाल में हालात लगातार बिगड़ रहे हैं। भ्रष्टाचार और सरकार की नीतियों के खिलाफ शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों ने अब हिंसक रूप ले लिया है। प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल के निजी आवास पर कब्जा कर तोड़फोड़ की और आग लगा दी है। इसके अलावा प्रधानमंत्री केपी ओली के घर पर भी गोली चली है, जिसमें 2 लोग घायल हुए है। इस बीच नेपाल-काठमांडू इंटरनेशनल एयरपोर्ट बंद किए और उड़ाने रद्द कर दी है।

इस बढ़ती हिंसा के बीच पीएम केपी शर्मा ओली पर दबाव बढ़ गया है और वे इलाज के लिए दुबई जाने की तैयारी कर रहे हैं। पीएम केपी शर्मा ओली ने उपप्रधानमंत्री को कार्यवाहक जिम्मेदारी सौंप दी है। अब तक पाँच मंत्रियों समेत 21 सांसदों ने इस्तीफा दे दिया है।

पाँच मंत्रियों ने दिया इस्तीफा, सांसदों ने भी छोड़ा साथ

इस राजनीतिक संकट के बीच अब तक पाँच मंत्री अपने पद से इस्तीफा दे चुके हैं, जिसमें गृह मंत्री रमेश लेखक और जल आपूर्ति मंत्री प्रदीप यादव भी शामिल हैं। मंत्री प्रदीप यादव ने कहा कि युवाओं की मौत के बाद सरकार में बने रहना उनके लिए सही नहीं है।

इसके अलावा, रवि लामिछाने के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के 21 सांसदों ने भी सामूहिक इस्तीफा देने का फैसला किया है। उनका मानना है कि मौजूदा संसद को भंग कर नए चुनाव कराए जाने चाहिए ताकि जनता को सही विकल्प मिल सके।

पीएम ओली ने बुलाई सर्वदलीय बैठक

बेकाबू होते हालात को देखते हुए प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने मंगलवार (9 सितंबर 2025) शाम 6 बजे एक सर्वदलीय बैठक बुलाई है। उन्होंने जनता से शांति बनाए रखने की अपील की है, लेकिन राजधानी काठमांडू सहित कई शहरों में कर्फ्यू और सुरक्षा के सख्त इंतजामों के बावजूद प्रदर्शनों का दायरा लगातार बढ़ रहा है।

प्रदर्शनकारी सड़कों पर सेना को भी दौड़ा-दौड़ाकर मार रहे हैं और उन पर पथराव कर रहे हैं। इस माहौल में पीएम ओली के घर के पास भी गोली चलने की घटना सामने आई है, जिसमें दो लोग घायल हुए हैं, जिससे स्थिति और भी तनावपूर्ण हो गई है।

नेपाल में प्रदर्शनकारियों ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष शेर बहादुर देउबा के घर पर हमला कर दिया है। उन्होंने घर पर कब्जा कर आगजनी की और करीब छह गाड़ियों में आग लगा दी। इस घटना के बाद, पुलिस और सुरक्षा बल मौके पर पहुँच गए हैं। राजधानी काठमांडू में हालात अभी भी तनावपूर्ण बने हुए हैं।

‘चारा घोटाले’ के दोषी से की मुलाकात, विपक्ष के VP पद के उम्मीदवार पर पूर्व जजों ने उठाए सवाल: सुदर्शन रेड्डी बोले- लालू यादव कोई आम आदमी नहीं

उपराष्ट्रपति पद के लिए INDI गठबंधन के उम्मीदवार और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज बी. सुदर्शन रेड्डी ने आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव से मुलाकात की थी जिसे लेकर लगातार हंगामा मचा हुआ है। इस बीच अलग-अलग हाई कोर्ट्स के 8 पूर्व जजों ने सामूहिक रूप से खुला पत्र लिखकर रेड्डी की इस मुलाकात पर कड़ी आपत्ति जताई है।

पूर्व जजों ने अपने पत्र में क्या कहा?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन पूर्व न्यायधीशों ने अपने पत्र में लिखा, “यह चिंता की बात है कि रेड्डी ने लालू प्रसाद यादव से निजी मुलाकात की। लालू यादव चारा घोटाले में दोषी करार दिए जा चुके हैं, जिसमें लगभग 940 करोड़ रुपए बिहार से गबन किए गए थे।”

उन्होंने आगे लिखा, “इस मुलाकात को चुनावी मजबूरी बताकर सही नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि लालू यादव न तो सांसद हैं और न ही उपराष्ट्रपति चुनाव के निर्वाचक मंडल में वोट डालने के योग्य हैं।”

पत्र में आगे कहा गया, “सुप्रीम कोर्ट के जज रहे रेड्डी जैसे शख्स का इस तरह संदिग्ध मुलाकात करना उनके निर्णय पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। न्यायिक पृष्ठभूमि रखने के बावजूद उन्होंने खुद को ऐसे व्यक्ति से जोड़ा, जिनके आपराधिक कृत्यों की पुष्टि भारतीय न्यायालयों द्वारा की गई है।”

उन्होंने लिखा, “इसमें कुछ गुटों की चुप्पी भी चौंकाने वाली है, वे सामान्य परिस्थितियों में छोटी-सी बात पर भी शोर मचाते हैं, इस मामले पर चुप्पी साधे बैठे हैं। यह साबित करता है कि संवैधानिक नैतिकता की दुहाई देने वाले ये तथाकथित संरक्षक दरअसल स्वार्थ और राजनीतिक सुविधा के लिए गंभीर खामियों को नजरअंदाज कर देते हैं।”

किन-किन जजों ने लिखा पत्र

जिन जजों ने यह पत्र लिखा है उसमें बॉम्बे हाई कार्ट के पूर्व जज जस्टिस एस एम खांडेपारकर और जस्टिस अंबादास जोशी, झारखंड हाई कार्ट के पूर्व जज जस्टिस आर के मार्थिया, इलाहाबाद हाई कार्ट के पूर्व जज जस्टिस देवेंद्र कुमार आहूजा, दिल्ली हाई कार्ट के पूर्व जज जस्टिस एस एन ढींगरा, पंजाब एवं हरियाणा हाई कार्ट के के पूर्व जज जस्टिस करम चंद पुरी, केरल हाई कार्ट के के पूर्व जज जस्टिस पी एन रवींद्रन, राजस्थान हाई कार्ट के पूर्व जज जस्टिस आर एस राठौर शामिल हैं।

मुलाकात पर रेड्डी ने क्या कहा?

बीजेपी के कई नेताओं ने भी इस पर सवाल उठाए हैं। लालू से मुलाकात को लेकर जब रेड्डी से सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि ऐसी चीजों पर वह कोई कमेंट नहीं करते हैं। उन्होंने आगे कहा, “लालू कोई आम आदमी हैं क्या?”