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एक नहीं, कई डेटिंग एप्स के जरिए लड़कियों को फाँसता था आफताब: हत्या के 10 दिन पहले ऋषिकेश में गंगा किनारे सिगरेट पी रही थी श्रद्धा

श्रद्धा वाकर हत्या मामले में आफताब अमीन पूनावाल को लेकर जो बातें सामने आ रही हैं, उससे स्पष्ट है कि उसका कई लड़कियों के साथ संबंध था। पुलिस फिलहाल यही पता लगाने की कोशिश कर रही है कि आफताब की दोस्ती और किन लड़कियों के साथ थी। लड़कियों से संपर्क करने के लिए आफताब डेटिंग एप्स का सहारा लेता था। इस मामले में एक डेटिंग ऐप बंबल (Bumble) का नाम सामने आया था। पुलिस की मानें तो श्रद्धा और आफताब की मुलाकात भी ‘बंबल’ डेटिंग ऐप पर हुई थी।

श्रद्धा से रिलेशनशिप में रहने के बाद भी वह न सिर्फ बंबल बल्कि कई और डेटिंग एप्स पर एक्टिव था। दिल्ली पुलिस को शक है कि श्रद्धा वाकर की हत्या के वक्त भी आफताब दूसरी लड़कियों के संपर्क में आया था। ‘टीवी 9 भारतवर्ष’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, श्रद्धा वाकर हत्याकांड का आरोपित आफताब पूनावाला एक बार फिर से डेटिंग ऐप पर सक्रिय हो गया था। इसी एप के जरिए वह एक और लड़की के संपर्क में था। बताया जा रहा है कि इस लड़की को भी आफताब अपने घर बुलाने ही वाला था कि पहली गर्लफ्रेंड की हत्या का खुलासा हो गया।

इससे आरोपित को अपना नया शिकार हाथ में आते-आते रह गया। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, आरोपित करीब 5 साल से इस डेटिंग एप्लिकेशन का इस्तेमाल कर रहा था। पुलिस अब डेटिंग एप और आफताब के व्हाट्सएप्प को खंगाल रही है।

चूँकि आफताब बार-बार पुलिस को गुमराह करने की कोशिश कर रहा है, इसलिए उसकी सभी बातों पर यकीन कर पाना पुलिस के लिए भी मुश्किल हो रहा है। पुलिस श्रद्धा हत्या मामले में केस को मजबूत बनाने के लिए कत्ल के वजह की तलाश कर रही है, ताकि आरोपित को कठोर दंड मिल सके। पुलिस कड़ी दर कड़ी जोड़कर सबूत जुटा रही है, कत्ल के मोटिव का पता लगा रही है। इसके लिए पुलिस मनोचिकित्सक की भी मदद ले रही है।

पुलिस की जाँच में अब तक यह साफ नहीं हो सका है कि आफताब और श्रद्धा के बीच लड़ाई के मुख्य कारण क्या थे। दिल्ली पुलिस यह भी पता करने की कोशिश कर रही है कि श्रद्धा की मौत के बाद आफताब किन लड़कियों से मिला और कौन-कौन उसके फ्लैट पर आया था।

पुलिस से पूछताछ में आफताब ने कत्ल की वजह झगड़े को बताया है। आफताब ने दिल्ली पुलिस से कहा कि 18 मई की रात उसके और श्रद्धा के बीच झगड़ा हुआ था। बात इतनी बढ़ गई कि दोनों के बीच हाथापाई भी हुई। जिसके बाद उसने गला दबाकर श्रद्धा की हत्या कर दी। दूसरी तरफ आफताब ने यह भी बताया कि 18 मई से एक हफ्ता पहले ही उसने श्रद्धा को मारने की प्लानिंग कर ली थी। उस दिन भी दोनों का झगड़ा हुआ था।

झगड़े के बाद श्रद्धा भावुक हो गई और रोने लगी थी। इसलिए, उसने उस दिन श्रद्धा की हत्या नहीं की। पुलिस को आशंका है कि आफताब अब भी सारी सच्चाई नहीं बता रहा है।

आफताब की सच्चाई जानने लगी थी श्रद्धा

दूसरी तरफ श्रद्धा इन सब बातों से अनजान थी। श्रद्धा ने उसकी नृशंस हत्या किए जाने से एक सप्ताह पहले ही खुद की एक तस्वीर पोस्ट की थी। आफताब ने श्रद्धा को मारने की प्लानिंग भी एक हफ्ते पहले की थी। श्रद्धा इस पोस्ट में हिमाचल प्रदेश के किसी इलाके में एक किताब पढ़ती दिखाई दे रही थी। इंस्टाग्राम पर यही पोस्ट श्रद्धा की आखिरी पोस्ट थी।

हत्या से 10 दिन पहले, श्रद्धा ने एक इंस्टाग्राम रील भी पोस्ट की थी, जिसमें वह ऋषिकेश में गंगा किनारे बैठी नज़र आ रही थी। इस वीडियो में वो सिगरेट पीती हुई भी दिख रही है।

मुंबई से दिल्ली आने के बाद श्रद्धा के इंस्टाग्राम अकाउंट से यही 2 पोस्ट हुए हैं। ज़ाहिर सी बात है कि श्रद्धा ने जिसके लिए घर-बार और अपनों को छोड़ दिया था, वह लगातार श्रद्धा को धोखा दे रहा था। इसकी भनक शायद श्रद्धा को लग चुकी थी। दोनों के बीच झगड़े की वजह भी आफताब का दूसरे लड़कियों से संबंध हो सकता है। बहरहाल पुलिस की जाँच जारी है और हर रोज़ कत्ल से जुड़ी चौंकाने वाली बातें सामने आ रही हैं।

42 साल के हजरत अली ने किया बच्ची के बलात्कार का प्रयास, चिल्लाने लगी तो गला दबा कर मार डाला: फंदे से झूलता मिला शव

असम के सोनितपुर जिले के ढेकियाजुली इलाके से एक दर्दनाक खबर सामने आई है। यहाँ रहने वाले 42 वर्षीय हजरत अली ने 14 साल की नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार करने की कोशिश की और जब वह नहीं मानी तो निर्ममता से उसकी हत्या कर दी। 

हालाँकि, पुलिस ने घटना के संबंध में आरोप‍ित हजरत अली को बुधवार (16 नवंबर, 2022) को गिरफ्तार कर लिया है। अली ढेकियाजुली इलाके के भाकुमारी क्षेत्र का रहने वाला है। वह मृतका का पड़ोसी था। वहीं ‘नॉर्थ ईस्ट लाइव’ के वीडियो के माध्यम से जानकारी सामने आई है कि असम के ढेकियाजुली में रेप और मर्डर का मामला सामने आया है। पुलिस की पूछताछ में आरोपित हजरत अली ने अपना गुनाह कबूल किया है। बता दें कि मंगलवार को फंदे से झूलते हुए एक किशोरी का शव बरामद किया गया था।

‘नॉर्थ ईस्ट लाइव’ ने बताया कि मंगलवार (15 नवंबर, 2022) को लड़की को फंदे से झूलते हुए पाया गया। स्थानीय लोग शुरुआत से ही इसे अस्वाभाविक मौत का मामला मान रहे थे। वहीं ग्रामीणों ने हजरत के घर पर तोड़फोड़ भी की।

एक स्‍थानीय वेबसाइट से बात करते हुए ढेकियाजुली पुलिस स्टेशन के ऑफिसर इन चार्ज ने बताया, “लड़की अपने घर में सो रही थी। हजरत अली परिवार के अन्य सदस्यों की अनुपस्थिति का फायदा उठाकर उसके घर घुस गया और रेप करने का प्रयास किया। लेकिन, जब वह हजरत के हरकतों के बाद जाग गई और चिल्लाने लगी तो उसने उसकी गला दबाकर हत्या कर दी।”

पुलिस ने पहले अप्राकृतिक मौत का मामला दर्ज कर किया। पुलिस को हजरत पर शक हुआ और उसे पूछताछ के लिए अपने साथ ले गई। हजरत ने बाद में अपना गुनाह कबूल कर ल‍िया। इसके बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया।  

जनजातीय समाज के साथ लव-लैंड का धोखा रोक पाएगा शिवराज का PESA Act?, छत्तीसगढ़-झारखंड में हालात और खराब, PFI जैसे संगठनों का बन रहे ‘पनाहगाह’

मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान (Shivraj Singh Chauhan) ने जनजातीय गौरव दिवस के अवसर पर मंगलवार (15 नवंबर 2022) को अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत विस्तार अधिनियम (PESA Act) लागू कर दिया है। इस कानून के तहत जनजातीय क्षेत्र की ग्राम सभाओं को अधिक शक्ति दिया गया है, ताकि जनजातीय लोगों की जमीन पर कब्जा करने के उद्देश्य से जनजातीय महिलाओं से विवाह एवं धर्मांतरण पर रोक लगाई जा सके।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू (President Draupadi Murmu) की उपस्थिति में मुख्यमंत्री चौहान ने शहडोल जिले के लालपुर गाँव में आयोजित कार्यक्रम में इस कानून को लागू करने की घोषणा की। इस कानून के तहत राज्य के 89 जनजातीय ब्लॉकों के अंतर्गत आने वाले 5,212 पंचायतों के 2,350 गाँवों की ग्राम सभाओं को स्व-शासन की अनुमति दिया गया है।

मुख्यमंत्री चौहान ने कहा, “कई बार धोखे से, छल-कपट से, हमारी जनजातीय बहनों-बेटियों को लालच देकर विवाह कर लिया जाता है, उनके नाम पर जमीन दे दी जाती है और वह जनजातीय भूमि कहलाती है। कभी-कभी धर्मांतरण का भी उपयोग किया जाता है। अब हम मध्य प्रदेश में ऐसा नहीं दिया जाएगा।”

PESA Act ग्राम पंचायतों को इन अनुसूचित क्षेत्रों में बंधुआ मजदूरी पर अंकुश लगाने के लिए सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन और प्रवासी मजदूरों के रिकॉर्ड रखने का काम करेगी। इसके साथ लघु वनोपज, भूमि और छोटे जल निकायों से संबंधित मामलों को तय करेगी। अधिसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा की अनुशंसा के बिना खनिज के सर्वे, पट्टा देने या नीलामी की कार्यवाही नहीं हो सकेगी।

निशाने पर जनजातीय महिलाएँ

मध्य प्रदेश PESA Act लागू करने वाला देश का सातवाँ राज्य बन चुका है। इसके पहले 6 राज्य- हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र पेसा कानून बना चुके हैं। हालाँकि, सबसे अधिक प्रभावित झारखंड में इसको लेकर किसी तरह की चर्चा नहीं है।

पेसा कानून की सबसे बड़ी जरूरत राज्य में इस्लामी और मिशनरियों द्वारा जनजातीय महिलाओं से विवाह के नाम पर उनकी जमीनों पर किए जाने वाले कब्जे को रोकना है। PESA कानून के तहत ग्राम सभाएँ अगर किसी जनजातीय महिला को बहला-फुसलाकर शादी कर जमीन पर गलत तरीके से कब्जा या खरीदने की कोशिश करें तो ग्राम सभा इसमें अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगी। ग्राम सभा उस जमीन को कब्जा से मुक्त कराके उसे फिर से जनजातीय लोगों को दिलवाएगी।

जनजाति बहुल इलाकों में इस्लामी और मिशनरी संस्थाएँ अपने उद्देश्यों को अंजाम देने के लिए ना सिर्फ धर्मांतरण का खेल खेल रही हैं, बल्कि शादी के नाम पर उनकी जमीनों पर भी अवैध कब्जा कर रही हैं। वैसे तो ये सारा काम पूरे देश में अबाध गति से चल रहा है, लेकिन मध्य प्रदेश और झारखंड इनके लिए खुला मैदान बना हुआ था, जहाँ वे अपने कार्यों को मजबूती के साथ अंजाम देते आते रहे हैं।

PFI के डॉक्युमेंट में जनजातीय लोगों से नजदीकी का जिक्र

प्रतिबंधित संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) ने भारत को साल 2047 तक इस्लामी राष्ट्र बनाने के अपने ‘विजन डॉक्युमेंट’ में इस साजिश का उल्लेख किया है। छापेमारी में जब्त किए गए दस्तावेज में कहा गया है,  “पार्टी को ‘राष्ट्रीय ध्वज’, ‘संविधान’ और ‘अंबेडकर’ जैसी अवधारणाओं का उपयोग इस्लामी शासन स्थापित करने के वास्तविक इरादे को ढालने के रूप में और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/ओबीसी तक पहुँचने के लिए करना चाहिए।

PFI ने अपने विजन डॉक्यूमेंट आगे लिखा था, “इस चरण में पीएफआई का कहना है कि पार्टी (PFI) को एससी/एसटी/ओबीसी समुदाय के साथ घनिष्ठ गठबंधन बनाना चाहिए और चुनाव में कम-से-कम कुछ सीटें जीतनी चाहिए। PFI जो गठबंधन बनाना चाहता है, उसमें 50% मुस्लिमों की हिस्सेदारी और 10% एससी/एसटी/ओबीसी की हिस्सेदारी होगी। हमें यह दिखाकर आरएसएस और एससी/एसटी/ओबीसी के बीच एक विभाजन पैदा करने की जरूरत है कि आरएसएस केवल उच्च जाति के हिंदुओं के हित की बात करने वाला संगठन है।”

धर्मांतरण के जरिए जनसंख्या बढ़ाने के साथ-साथ जनजातीय इलाकों में जमीनों की क्यों जरूरत है, इसका खुलासा भी PFI के डॉक्युमेंट में किया गया है। इसमें लिखा है, “हमारे पास एडवांस PE पाठ्यक्रम संचालित करने के लिए अभी तक उचित एवं एकांत प्रशिक्षण केंद्र/स्थान नहीं हैं। चुनौती का सामना करने के लिए इकाइयों को मुस्लिम बहुल इलाकों या दूरदराज के स्थानों में भूखंडों का अधिग्रहण करना चाहिए, ताकि हथियारों और विस्फोटकों के भंडार के लिए उचित प्रशिक्षण सुविधाएँ और डिपो स्थापित किए जा सकें।”

जनजाति महिलाओं के नाम पर जमीनों की खरीद और चुनावों में उम्मीदवारी

झारखंड और मध्य प्रदेश के कई इलाके में मुस्लिम जनजातीय महिलाओं से शादी कर उन्हें दूसरी-तीसरी बीवी का दर्जा देकर अपना मतलब साध रहे हैं। कोई पंचायत चुनाव में क्षेत्र को अनुसूचित घोषित होने पर जनजातीय महिला से शादी कर उसे उम्मीदवार बनाकर अपना काम साध रहा है तो कोई जनजातीय महिला से शादी करके उसके नाम पर जनजातीय लोगों की जमीनों की खरीद कर रहा है। ऐसे तमाम उदाहरण हैं और मीडिया में खबरें भी आती रही हैं।

दैनिक भास्कर ने अपनी ग्राउंड रिपोर्ट में इस लैंड जिहाद का खुलासा किया है। ग्वालियर-चंबल संभाग के श्योपुर में कई ऐसे मुस्लिम हैं, जिन्होंने यही काम किया है। काली तराई गाँव का सलीम गुड्डी नाम की सहरिया जनजातीय महिला गुड्डी को अपने साथ रखता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सलीम उसके नाम पर जनजातीय लोगों की जमीनें खरीदता है। गुड्डी एक मोहरे के रूप में इस्तेमाल हो रही है। लोगों का कहना है कि सलीम ने गुड्डी से निकाह किया है या नहीं, यह पता नहीं है लेकिन वह उसे अपने साथ रखता है।

इसी तरह दांतरधा पंचायत में पप्पू पठान ने जनजातीय महिला फूला बाई को अपनी दूसरी पत्नी बनाकर रखा है। पप्पू ने फूला बाई को जिला पंचायत का चुनाव में उम्मीदवार बनाया था, लेकिन वह जीत नहीं पाई। हालाँकि, फूला बाई के भाई राजाराम पंचायत के सरपंच चुने गए हैं। राजाराम का कहना है कि पप्पू पठान ने ही उन्हें सरपंच बनाया है और उनका सारा काम पप्पू पठान ही देखता है। इसी तरह कनापुर गाँव का शहाबुद्दीन वहाँ की पूर्व सरपंच गुड्डी बाई को अपनी दूसरी बीवी बना लिया।

दरअसल, मुस्लिम जनजातीय की जमीन पर कब्जा करने के लिए उनकी बहन-बेटियों से से जान-पहचान बढ़ाते हैं और फिर अपनापन दिखाकर दूसरी या तीसरी शादी कर लेते हैं। इसके बाद निकाह के नाम पर धर्मांतरण करते हैं और इनकी जमीनों को औन-पौने दामों में खरीद लेते हैं। आज स्थिति ऐसी है कि जनजातीय इलाके में मुस्लिमों का प्रभाव और दबदबा तेजी से बढ़ रहा है। इतना ही नहीं, PFI जैसे चरमपंथी संगठनों का भी इन क्षेत्रों में तेजी से फैलाव भी होता है।

जनजातीय इलाकों में PFI जैसे चरमपंथी संगठनों की पैठ

PFI के खिलाफ की गई कार्रवाई में श्योपुर से भी कई संदिग्धों को गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तार किए गए PFI के संदिग्धों ने पूछताछ में खुलासा किया था कि श्योपुर में भी संगठन के कार्यकर्ता सक्रिय हैं। PFI के संदिग्धों का यहाँ आना-जाना लगा रहता है। इतना ही नहीं, श्योपुर के पास राजस्थान के कोटा में उनकी ट्रेनिंग कैंप का भी पता चला था। इन इलाकों में जमातों का आयोजन होते रहता है और विदेशी भी आते रहते हैं। कोरोना काल में लॉकडाउन के दौरान यहाँ से 12 बांग्लादेशियों को गिरफ्तार किया गया था। 

कानून के मुताबिक, यदि जनजातीय महिला किसी मुस्लिम, ईसाई या गैर-जनजातीय से शादी करती है और उस महिला की मौत हो जाती है तो उसकी प्रॉपर्टी के अधिकार हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत तय होते हैं। इस तरह उसके नाम पर चल या अचल संपत्ति उसके पति या बच्चों के होते हैं। हालाँकि, इसके लिए जिलाधिकारी की अनुमति जरूरी होती है, लेकिन कई बार भ्रष्टाचार या जानकारी के अभाव में इसे हस्तांतरित कर दिया जाता है। 

झारखंड में तो हालात तो और बदतर हैं। वहाँ जमीनों को मुस्लिमों द्वारा खरीदने और अवैध बसावट के कारण कई जिलों में जनसांख्यिकीय बदलाव हो गया है। इसका परिणाम भी जनजातीय लोगों पर देखने को मिल रहा है। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता रघुवर दास ने भी कहा था कि प्रदेश के भोले-भाले जनजातीय महिलाओं को लव जिहाद में फँसाया जा रहा है और उनकी जमीनों पर अवैध कब्जा किया जा रहा है।

कुछ महीने पहले जनजातीय बहुल राज्य के पलामू जिले के पांडू थाना के अंतर्गत आने वाले मारुमातू गाँव में मुस्लिमों ने महादलित मुसहर जाति के लोगों पर हमला कर उनके कच्चे घरों और झोपड़ियों को गिरा दिया था। मुस्लिमों ने उनकी जमीनों पर कब्जा कर लिया था और उन्हें ट्रकों में भर कर छतरपुर के लोटो गाँव के पास जंगल में फेंक दिया था। झारखंड के कई इलाकों से भी PFI के सदस्यों की गिरफ्तारी हुई है।

25 KM तक चलती ट्रक से फेंकते रहे ज़िंदा गायें, गोरक्षकों पर फेंके कांच के टुकड़े और की पत्थरबाजी: मेवात के महबूब, साद और सलीम को किया गया पुलिस के हवाले

हरियाणा के गुरुग्राम में गो-तस्करों और गोरक्षकों के बीच भिड़ंत हुई है। भाग रहे तस्करों ने पीछा कर रहे गोरक्षकों पर कंचे फेंके और पथराव किया। इस दौरान 2 गोरक्षक घायल हो गए। उनके वाहनों को भी नुकसान पहुँचा है। इस दौरान चलते वाहनों से सड़क पर रुकावट डालने के लिए जीवित गायों को भी फेंका गया। लम्बे समय तक चले चोर-पुलिस जैसे खेल के बाद आखिरकार 3 गो-तस्करों को पकड़ लिया गया है। इनके नाम सलीम, साद और महबूब हैं। घटना बुधवार (16 नवम्बर, 2022) की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 3 गोतस्कर भागने में कामयाब रहे। बताया जा रहा है कि इन सभी आरोपितों ने गुरुग्राम के सेक्टर 37 से गायें चुराई थीं। इसकी जानकारी मिलते ही गोरक्षकों ने सोहना रोड पर भोंसड़ी के पास बैरियर लगा दिया था। गोतस्करों के वाहन को रुकने का भी इशारा किया गया, लेकिन उन्होंने बैरियर को तोड़ दिया। इस दौरान उन्होंने गाड़ी की स्पीड बढ़ा ली जिसका पीछा गोरक्षकों ने शुरू कर दिया।

इस घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वीडियो में तेज गति से ट्रक से भाग रहे तस्करों को देखा जा सकता है। वीडियो को पीछा कर रहे गोरक्षकों द्वारा बनाया गया है।

पीछा करने के दौरान पहले तो गो-तस्करो ने भागने की कोशिश की, लेकिन उन्हें 25 किलोमीटर तक खदेड़ा जाता रहा। इस दौरान आरोपितों ने पीछा कर रहे लोगों पर काँच, पत्थर और जिन्दा गायों को फेंका लेकिन फिर भी उन्हें पलवल इलाके में पकड़ ही लिया गया। इस दौरान आरोपितों के वाहन का टायर भी निकल गया। खुद को घिरा देख कर 3 गो-तस्कर भाग निकले जबकि साद, महबूब और सलीम को दबोच लिया गया।

तीनों मेवात के नूँह इलाके के रहने वाले हैं। इस बीच गुरुग्राम और पलवल पुलिस घटनास्थल पर पहुँच गई। बाद में तीनों आरोपितों को पलवल पुलिस ने अपनी कस्टडी में ले लिया। तीनों की तलाशी के बाद इनके वाहन से पत्थर, कंचे और गोलियाँ बरामद हुईं हैं।

’50 वर्षों में एक बार आती है कांतारा जैसी फ़िल्में’: गदगद सुपरस्टार रजनीकांत ने ऋषभ शेट्टी को भेंट की सोने की चेन, ₹360 करोड़ कमा चुकी है फिल्म

महज 16 करोड़ रुपए की लागत में बनी और वर्ल्डवाइड 360 रुपए से अधिक की कमाई करने वाली फिल्म ‘कांतारा’ अब भी दर्शकों का दिल जीत रही है। फिल्म 30 सितंबर को सिनेमाघरों में आई और छा गई। फिल्म ने कन्नड़ भाषा के साथ हिंदी, तेलुगू और मलयालम में अपना जादू चलाया है। 

फिल्म और इसके कलाकार व निर्देशक ऋषभ शेट्टी एक बार फिर से चर्चा में है। वजह हैं सुपरस्टार रजनीकांत। रजनीकांत ने फिल्म की सराहना की है और अभिनेता को एक सोने की चेन भेंट की। हालाँकि, इससे भी महत्वपूर्ण रजनीकांत की इस फिल्म को लेकर राय है। उन्होंने कहा है कि ऐसी फिल्में 50 साल में एक बार बनती हैं।

उन्होंने ट्विटर पर भी इस फिल्म की तारीफ़ की थी। हालाँकि, अब यह जानकारी सामने आई है कि ‘थलाईवा’ ने ऋषभ शेट्टी को एक महँगी सोने की चेन उपहार में दी है और एक शानदार फिल्म देने के लिए बधाई दी है।

‘कांतारा’ के अभिनेता ने रजनीकांत के साथ उनके आवास पर मुलाकात की थी। उन्होंने बताया था, ”मैं उनसे मिला और उनके साथ लगभग एक घंटा बिताया। वो मेरे लिए बहुत बड़ा फैनबॉय मोमेंट था। हमने हर सीन के बारे में बात की, मैंने इसे कैसे किया, मैंने इसे कैसे अंजाम दिया और उनकी आध्यात्मिक यात्रा के बारे में भी। वो एक अद्भुत क्षण था।”

रजनीकांत ने इससे पहले ट्वीटर पर भी फिल्म की तारीफ़ की थी और इसे शानदार बताया था। वहीं ऋषभ शेट्टी ने उनसे आवास पर मुलाकात की तस्वीर भी साझा की थी। एक तस्वीर में वो वरिष्ठ अभिनेता के पाँव छूते नज़र आ रहे हैं और सुपरस्टार उन्हें आशीर्वाद दे रहे हैं, जबकि एक अन्य तस्वीर में रजनीकांत उन्हें अंगवस्त्र ओढ़ा कर सम्मानित कर रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भी साउथ स्टार और निर्देशक ऋषभ शेट्टी की फिल्म ‘कांतारा’ की तारीफ की थी। उन्होंने 2 नवंबर, 2022 को बेंगलुरु में हुई ग्लोबल इन्वेस्टर्स मीट (जीआईएम) में उद्योगपतियों और निवेशकों को ‘कांतारा’ की सफलता की कहानी का हवाला दिया था।

केंद्रीय मंत्री ने कहा था, ”कांतारा 16 करोड़ रुपए के मामूली बजट में बनी फिल्म है। इसमें कर्नाटक की कला और संस्कृति को बेहद खूबसूरती के साथ दिखाया गया है। इस फिल्म ने 300 करोड़ रुपए का बिजनेस किया है।” इसके बाद उन्होंने कहा, “मुझे यकीन है कि ‘कांतारा’ की सफलता ने यहाँ कई कंपनियों के नेतृत्वकर्ताओं का ध्यान आकर्षित किया है कि रिटर्न कैसे प्राप्त करें।”

ऋषभ शेट्टी के निर्देशन में बनने वाली कन्नड़ फिल्म ‘कांतारा’ को दर्शकों और समीक्षकों का बढ़िया रेस्पॉन्स मिल रहा है। फिल्म एक एक्शन थ्रिलर है जो ‘भूत कोला’ की परंपरा इर्द-गिर्द घूमती है। फिल्म के कलाकारों में किशोर, अच्युत कुमार, सप्तमी गौड़ा और प्रमोद शेट्टी प्रमुख भूमिकाओं में हैं। इसका निर्माण ‘केजीएफ’ फ्रैंचाइजी के बैनर ‘होमबेल फिल्म्स’ के तहत विजय किरगंदूर द्वारा किया गया है। ऋषभ शेट्टी ने कुछ समय पहले संकेत दिया था कि फिल्म का सीक्वल या प्रीक्वल भी बनाया जा सकता है।

जाँच को भटकाने की कोशिश कर रहा है आफताब, अब होगा नार्को टेस्ट: किचन से मिले खून के धब्बे, शॉवर चालू कर श्रद्धा के शरीर के करता था टुकड़े

श्रद्धा मर्डर केस में भले ही कई चौंका देने वाली सच्चाई सामने आई हो, लेकिन अब भी कई राज़ हैं जो सामने आने बाकी है। श्रद्धा के कातिल आफताब की गिरफ्तारी के बाद भी अब तक पूरा सच सामने नहीं आ सका है। दिल्ली पुलिस की मानें तो आफताब जाँच और पूछताछ में सहयोग नहीं कर रहा है। वह लगातार पुलिस को भटकाने की कोशिश कर रहा है। जाँच में सहयोग न मिल पाने की वजह से पुलिस ने दिल्ली के साकेत कोर्ट से आरोपी आफताब के नार्को टेस्ट की इजाजत माँगी थी।

मिली जानकारी के अनुसार, कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आफताब के नार्को टेस्ट को मंजूरी दे दी है। कहा जा रहा है कि नार्को टेस्ट के बाद कई राज खुल सकते हैं।

आफताब के किचन से मिले खून के धब्बे, शॉवर चालू कर शव के किए टुकड़े

मामले में जाँच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, चौंकाने वाले खुलासे होते जा रहे हैं। अब आफताब के किचन से पुलिस को खून के धब्बे मिले हैं। न्यूज एजेंसी ANI के मुताबिक, पुलिस सोमवार (14 नवंबर, 2022) को क्राइम सीन रीक्रिएशन के लिए आफताब को उसके उसी फ्लैट पर ले गई थी, जहाँ श्रद्धा की हत्या कर उसके शरीर के 35 टुकड़े किए गए थे। इसी दौरान पुलिस की टीम को किचन में खून के धब्बे दिखाई दिए।

खून के नमूनों की जाँच की जा रही है। अगर यह खून इंसान का होता है, तो पुलिस DNA मिलान कराने के लिए श्रद्धा के पिता को दिल्ली बुला सकती है।

हालाँकि, पूछताछ के दौरान आफताब ने यह जरूर बताया था कि उसने फ्लैट के बाथरूम में श्रद्धा के शव के 35 टुकड़े किए थे। इस दौरान वह शॉवर चालू रखता था, ताकि शरीर से निकला खून सीवेज में बह जाए। इतना ही नहीं, आफताब ने फ्रिज को केमिकल से साफ किया था, ताकि खून के धब्बे नज़र न आ सकें और सबूत मिटाए जा सकें।

जब श्रद्धा के घरवालों और दोस्तों को उसके गायब होने पर शक हुआ, तभी से आफताब उनके शक के घेरे में था। पहले दिन से ही आफताब ने पेशेवर अपराधी की तरह झूठ और फरेब का जाल बुनना शुरू किया। श्रद्धा के गायब होने के बाद जब मुंबई पुलिस ने आफताब से श्रद्धा के बारे में पूछा तो इसके लिए उसने दो बार बयानों को बदला। दिल्ली पुलिस के जाँच अधिकारियों ने पूछा, तब भी आफताब लगातार बयान बदलता रहा।

पुलिस के एक अधिकारी की मानें तो पहले तो आफताब कहता रहा कि श्रद्धा दिल्ली छोड़कर चली गई है, लेकिन वह दिल्ली पुलिस की रडार पर था। कहते हैं न कि कातिल कितना भी शातिर हो, कोई एक चूक जरूर करता है और उसकी एक चूक ही उसे कानून के शिकंजे में ले आती है। आफताब के साथ भी वही हुआ। आफताब जाँच के दायरे में तो था ही, जाँच के दौरान यह बात सामने आई कि उसकी लोकेशन रोज रात 2 बजे महरौली के जंगलों में मिलती है।

इससे दिल्ली पुलिस का शक यकीन में बदलने लगा और खुद को शातिर समझने वाला दरिंदा पुलिस की गिरफ्त में आ ही गया।

अब भी बहुत कुछ छिपा रहा है आफताब

साकेत कोर्ट में पुलिस ने बताया कि आफताब मामले की जाँच में सहयोग नहीं कर रहा है। इस पर अदालत ने कातिल आफताब के नार्को टेस्ट की इजाजत दे दी है। दिल्ली पुलिस की ओर से यह भी दावा किया गया है कि श्रद्धा का मोबाइल फोन अब तक रिकवर नहीं हो पाया है। शरीर के कई पार्ट्स भी नहीं मिल पाए हैं। इसके अलावा श्रद्धा की हत्या में इस्तेमाल की गई आरी रिकवर नहीं हो पाई है। आफताब श्रद्धा के मोबाइल फोन के बारे में भी सही जानकारी नहीं दे रहा है।

जाँच को भटकाने के लिए कभी दिल्ली तो कभी महाराष्ट्र में फोन फेंकने की बात कर रहा है। आफताब इस हत्याकांड को लेकर अब भी बहुत कुछ छिपा रहा है। पकड़े जाने और लाश के 35 टुकड़े करने वाली बात के सामने आने के बाद भी आफताब क्या और क्यों छिपाने की कोशिश कर रहा है – यह समझ के परे है। शरीर के बाकी अंगो का क्या हुआ? आफताब क्यों नहीं चाहता कि पुलिस के हाथ श्रद्धा का फोन लगे? क्या श्रद्धा के साथ और अधिक जघन्यता हुई है, जो आफताब छिपाने की कोशिश कर रहा है?

ऐसे कई सवाल हैं जिसका खुलासा आफताब के नार्को टेस्ट के बाद हो सकता है और इस हत्याकांड को लेकर कई सच सामने आ सकते हैं।

आज भी कबीलों के दखल से चलती है खाड़ी मुल्कों की सरकारें, शासक देते हैं सब्सिडी: अरब में लोकतंत्र कभी नहीं रहा समाज का हिस्सा, लोगों को अधिकारों में कटौती मंजूर

बहुत सारे विद्वानों की माने तो अरबी प्रायद्वीप का समाज प्राथमिक रूप से ‘क़बीला’ से बना हुआ समाज है। आज भी खाड़ी देशों में ये कबीले राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। हम देखेंगे कि कैसे इन खाड़ी देशों में राजनीतिक जीवन अविकसित रही है और इसमें कबीलों की क्या भूमिका रही है। राज्य-निर्माण और राष्ट्रीय पहचान विकसित करने में इन कबीलों की पहचान और क़बीलावाद की भूमिका अद्वितीय और महत्वपूर्ण रही है।

इराक़, लीबिया, और यमन जैसे देशों में, आधुनिक राज्य गृहयुद्ध और अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेपों से असफल रहें हैं। वहाँ इस राजनीतिक शून्य को इन कबीलों ने बहुत तेज़ी से कब्जाया है। राज्य के पतन के समय क़बीलों का फिर से उभरना खाड़ी देशों में इनके महत्व को बखूबी दर्शाता है। चौदहवीं शताब्दी के अरब मुस्लिम इतिहासकार, इब्न खलदुन को कबीलों और राज्य के बीच संबंधों के पहले विस्तृत विवरण के लिए जाना जाता है।

वो लिखते है कि ‘असबिय्या’ माने एक तरह का ‘समूह एकजुटता’ जो केवल साझा पारिवारिक पृष्ठभूमि और रक्त के महत्व को ही प्रदर्शित नहीं करता, बल्कि आपसी समाजीकरण का भी महत्व रखता है। वो आगे कहते है कि सामान्य वंश के आधार पर ‘असबिय्या’ एक स्थिर और सुरक्षित शासन को मजबूत करने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने अरबी क्षेत्रों में मजहब और सगोत्रता (Kinship) से मिश्रित सरकार सबसे ज़्यादा मजबूत सरकार मानी है।

इसलिए, लोकतांत्रिक मूल्य या लोकतांत्रिक सरकार यहाँ की राजनीतिक संस्कृति (Political Culture) का कभी हिस्सा ही नहीं रही। ऐसे में इन देशों में लोकतंत्र का आना बहुत कठिन हो जाता है। एक तरीक़े से देखें तो क़बीला और राज्य वैचारिक तौर पर एक दूसरे से विपरीत हैं। पहचान, राजनीतिक निष्ठा और व्यवहार के आधार के रूप में, क़बीला सगोत्रता (Kinship) और पितृवंशीय वंश के संबंधों को प्रमुखता देती है, जबकि राज्य सभी व्यक्तियों की एक केंद्रीय सत्ता के प्रति वफादारी पर जोर देता है, चाहे उनका एक-दूसरे से कोई संबंध क्यों न हो।

क़बीला व्यक्तिगत, नैतिक और अनुवांशिक कारकों पर जोर देती है, वहीं राज्य अवैयक्तिक है, और उपलब्धि को मान्यता देता है। क़बीला सामाजिक रूप से सजातीय, समतावादी और खंडीय है, वहीं राज्य विजातीय और श्रेणीबद्ध है। जनजाति व्यक्ति के भीतर की भावना है; राज्य बाहरी है। ऐसे में अरबी समाज की राजनीति समझना थोड़ा कठिन हो जाता है क्योंकि यहाँ क़बीला और राज्य एक दूसरे पर आश्रित है। भले ही इन क़बीलों की वास्तविक संरचना पहले जैसी नहीं हो, लेकिन वो अभी भी अपने सामाजिक और राजनीतिक भूमिका को बना कर रखते हैं।

क़बीलों का प्रभाव इन देशों के राजनीतिक तंत्र (Political System) में साफ़ देखने को मिलता है। ऐसे में अरबी समाज में लोकतांत्रिक मूल्यों का आना कठिन हो जाता है। अरबी क्षेत्र में तेल मिलने के बाद से बड़ा बदलाव आया है। तेल से आने वाले राजस्व (Revenues) सरकार को पर्याप्त धन प्रदान करती है। अरब प्रायद्वीप के शासक परिवार अपने प्रति वफादारी बनाए रखने के लिए शक्तिशाली क़बीलों को लंबे समय से सब्सिडी देते रहे हैं।

खाड़ी मुल्क अपनी जनता को बहुत सारी सामाजिक कल्याणकारी नीतियों द्वारा सहायता करते हैं। इनमें विधवा, गरीब, अनाथ और दिव्यंगों के लिए पेंशन और आर्थिक सहायता भी शामिल है। ऐसे में सरकार सामाजिक समूहों के गठन जो राजनीतिक अधिकारों की माँग करने की कोशिश करती है, उन्हें दबा देती है। आर्थिक अधिकारों का पूरा होना और क़बीले या ‘सामूहिक भावना’ के कारण अपने राजनीतिक अधिकारों में कमी बर्दाश्त कर लेना, लोकतांत्रिक मूल्यों को इन देशों में आने से रोक देता है।

इन देशों के जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा प्रवासी लोगों का है। वो वहाँ अच्छी नौकरी के अवसर में जाते हैं। उनमें कुछ वही बस जाते हैं और कुछ काम कर के अपने देश लौट जाते हैं। ज़्यादातर प्रवासी मज़दूर इन देशों में निचले स्तर के काम जैसे, ड्राइवरी, घरेलू कामकाज, पेट्रोल पम्प पर तेल बेचना, साफ़-सफ़ाई इत्यादि करते है। इसके कारण इन देशों में स्थानीय लोग लोअर क्लास में नहीं आते और ये प्रवसी मज़दूर इनका जगह ले लेते है।

ऐसे में यहाँ की स्थानीय जनता सुखी और संपन्न रूप से अपना जीवन यापन करती है। बुनियादी ज़रूरत और आर्थिक स्वतंत्रता पूरा होने के कारण यहाँ के लोग अपने राजनीतिक अधिकारों में कटौती स्वीकार कर लेते है।

अपने जिस प्रत्याशी के अपहरण का AAP ने लगाया आरोप, उसने चुनाव कार्यालय पहुँच वापस लिया नामांकन: पार्टी ने कहा था – BJP उन्हें परिवार सहित उठा कर ले गई

गुजरात में विधानसभा चुनाव से पहले सियासी उठापटक तेज हो गई है। ‘आम आदमी पार्टी (AAP)’ ने 15 नवंबर, 2022 को भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर उसके उम्मीदवार कंचन जरीवाला के अपहरण का आरोप लगाया था। फिर 16 नवंबर, 2022 को जरीवाला अपना नामांकन वापस लेने के लिए पुलिस सुरक्षा के बीच चुनाव अधिकारी के कार्यालय पहुँच गए। AAP ने सूरत पूर्व विधानसभा क्षेत्र से जरीवाला को टिकट दिया था। हालाँकि अब कंचन जरीवाला ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली है।

आम आदमी पार्टी ने दावा किया था कि कंचन जरीवाला अचानक लापता हो गए थे। इस बीच, गुजरात में आम आदमी पार्टी के सीएम उम्मीदवार इसुदान गढ़वी ने भाजपा पर कंचन जरीवाला के लापता होने में शामिल होने का आरोप लगाया। इसुदान गढ़वी के मुताबिक, कंचन जरीवाला और उनका पूरा परिवार लापता था।

इसुदान गढ़वी ने 15 नवंबर को अपने ट्वीट में लिखा था, “भाजपा ‘आप’ से इतनी डरी हुई है की वो गुंडागर्दी पर आ गई है। सूरत ईस्ट से चुनाव लड़ रहे हमारे कंचन जरीवाला के पीछे भाजपा वाले कुछ दिनों से पीछे पड़े हुए थे और आज वो ग़ायब है। माना जा रहा है की भाजपा के गुंडे उन्हें उठा ले गए है। उनका परिवार भी ग़ायब है। भाजपा कितनी गिरेगी?”

अरविंद केजरीवाल ने भी 16 नवंबर, 2022 को इस बारे में ट्वीट भी किया। उन्होंने लिखा, “सूरत (पूर्व) से हमारे प्रत्याशी कंचन जरीवाला और उनका परिवार कल से लापता है। पहले भाजपा ने उनका नामांकन रद्द कराने की कोशिश की। लेकिन, उनका नामांकन स्वीकार कर लिया गया। बाद में उन पर नामांकन वापस लेने का दबाव बनाया गया। क्या उनका अपहरण कर लिया गया है?”

अरविंद केजरीवाल के इस ट्वीट के एक घंटे के भीतर ही कंचन जरीवाला अपना नामांकन वापस लेने चुनाव अधिकारी के कार्यालय पहुँच गए।

जरीवाला का नामांकन वापस लेने के मामले में दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री और आप नेता मनीष सिसोदिया चुनाव आयोग पहुँचे। उन्होंने कहा, “मुझे दोपहर 2 बजे चुनाव आयोग जाना था, लेकिन अब आपातकाल की स्थिति है। इसलिए मुझे जल्द से जल्द इस मामले पर बात करनी होगी।”

आप नेता राघव चड्ढा ने बुधवार सुबह प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा, “सूरत पूर्व से AAP उम्मीदवार कंचन जरीवाला का भाजपा के गुंडों ने अपहरण कर लिया है। AAP प्रत्याशी मंगलवार (15 नवंबर, 2022) सुबह से ही भाजपा की गिरफ्त में है। भाजपा इतनी घबराई हुई है कि वह आप उम्मीदवार का अपहरण कर रही है। यह लोकतंत्र की हत्या है।”

आम आदमी पार्टी द्वारा शुरू किए गए इन राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद सोशल मीडिया यूजर्स भी आप व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का खूब मजाक बना रहे हैं।

एक ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि आखिर भाजपा आम आदमी पार्टी से इतना डरी हुई क्यों है।

एक यूजर विजय पटेल ने कहा, “यह फेक न्यूज है। आप में मेरे सूत्र कह रहे हैं कि आप ने उन्हें ऐसा करने का निर्देश दिया है। वह अगले एक से दो दिनों में बीजेपी को दोष देने के लिए मीडिया के सामने आएँगे, लेकिन हमेशा की तरह बिना किसी सबूत के!”

भाजपा 1998 से गुजरात में सत्ता में है। परंपरागत रूप से यहाँ अब तक दो ही पार्टियाँ सत्ता पर काबिज होती आई हैं। दूसरी पार्टी कॉन्‍ग्रेस है। गुजरात में इस साल 1 और 5 दिसंबर को दो चरणों में चुनाव होने हैं। परिणाम 8 दिसंबर 2022 को घोषित किए जाएँगे।

श्रद्धा मर्डर केस: दिल्ली पुलिस का असली टास्क शेष, आफताब के कबूलनामे-नार्को टेस्ट से ही नहीं बनेगी बात; इन पर करना होगा काम

27 साल की श्रद्धा वाकर (Shraddha walker) की निर्मम हत्या से पूरा देश सन्न है। उसके शव के टुकड़े-टुकड़े करने वाला 27 साल का आफताब अमीन पूनावाला (Aftab Amin Poonawalla) दिल्ली पुलिस की गिरफ्त में है। उसका नार्को टेस्ट करवाने की इजाजत अदालत ने दे दी है। आफताब का कबूलनामा पहले से मौजूद है, जिससे करीब 6 महीने पहले की गई इस हत्या को लेकर चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। बावजूद इसके दिल्ली पुलिस का काम पूरा नहीं हुआ है। असली चुनौती अब उसके सामने हैं। यह चुनौती है अदालत में आफताब के अपराधों को साबित करने योग्य सबूत जुटाना, क्योंकि अदालत सबूत माँगता है। उसके आधार पर ही फैसला सुनाता है।

सबूत जुटाने के क्रम में ही दिल्ली पुलिस 15 नवंबर 2022 को आफताब को लेकर महरौली के जंगलों में गई थी। पूछताछ में उसने बताया है कि 18 मई 2022 को श्रद्धा की हत्या करने के बाद उसने शव के 35 टुकड़े किए थे। इन टुकड़ों को वह एक-एक कर करीब 18 दिनों तक महरौली के जंगलों में फेंकता रहा। इस जंगल से करीब 10 बॉडी पॉर्ट्स बरामद होने की बात भी सामने आई है। लेकिन ये श्रद्धा के ही हैं, इसकी पुष्टि फोरेंसिक और डीएनए जाँच के बाद ही हो पाएगी।

हम जानते हैं कि कई बार जब खबरें सुर्खियों से गायब हो जाती है तो लोगों को पता भी नहीं चलता कि जिस घटना ने उन्हें झकझोर दिया था, उसके आरोपित अदालत से राहत पाने में कामयाब रहे। इसकी सबसे बड़ी वजह पुलिसिया जाँच में कमी होती है। पर्याप्त सबूतों का अभाव होता है। इसका फायदा उठाकर आरोपित अदालत से राहत पा जाते हैं। ऐसे में हमने पुलिस के कुछ पूर्व अधिकरियों और वकीलों से बात कर यह समझने की कोशिश की कि श्रद्धा मर्डर केस में दिल्ली पुलिस के सामने किस तरह की चुनौतियाँ हैं।

नार्को टेस्ट प्रमाणिक नहीं

सुप्रीम कोर्ट के वकील अजय गौतम ने ऑपइंडिया को बताया कि नार्को टेस्ट कोर्ट में बहुत ज्यादा मायने नहीं रखता। उनके मुताबिक कई बार अपराधी अपनी शारीरिक क्षमता से नार्को और लाई डिक्टेटर जैसे टेस्ट में बच निकलते हैं। लेकिन वे सजा से नहीं बच पाते। जैसे निठारी केस। उनके अनुसार इसी तरह यदि आफताब नार्को टेस्ट में बच निकलता है तो भी इसकी गारंटी नहीं है कि कोर्ट भी उसे निर्दोष मान लेगा।

इलेक्ट्रिक और मौके पर मिले सबूत अहम

दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड ACP वेद भूषण ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा कि श्रद्धा की मौत के बाद भी आफताब उसके सोशल मीडिया को चला रहा था। यह भी एक सबूत है। शव के अवशेषों का DNA टेस्ट होगा। इनका मिलान श्रद्धा के पिता के डीएनए से होने पर यह महत्वपूर्ण साक्ष्य साबित हो सकता है। उनके मुताबिक आफताब के घर से मिले साक्ष्यों के अलावा उसकी फोन कॉल डिटेल भी इस केस में अहम होगी। उन्होंने बताया कि CCTV फुटेज के अतिरिक्त जहाँ से फ्रिज, आरी आदि उसने खरीदे थे, उन जगहों से भी सबूत जुटाए जा सकते हैं।

बाल भी मिला तो सजा लगभग तय

वहीं अजय गौतम का कहना है कि श्रद्धा का एक बाल तक बरामद होने पर आफताब की सजा लगभग तय है। वे कहते हैं भले आफताब ने सारे साक्ष्यों को सफाई से मिटाने दिए हों, बावजूद घटनास्थल से श्रद्धा का कुछ न कुछ अंश जाँच में जरूर मिला होगा। डीएनए टेस्ट को गौतम ने भी इस केस में काफी अहम बताया है।

रेयरेस्ट ऑफ रेयर केस

पूर्व ACP वेद भूषण के अनुसार यह रेयरेस्ट ऑफ रेयर केस है। जैसे नैना साहनी तंदूर केस, निठारी केस, शीना बोरा जैसे मामले थे। गौतम का भी कहना है कि यह यह आम केस जैसा नहीं है। सुनवाई के दौरान यह भी एक पहलू रहेगा।

हथियार न मिले तो क्या होगा

एडवोकेट अजय गौतम की माने तो श्रद्धा के शव के टुकड़े जिस आरी से किया गया, उसे पुलिस नहीं भी बरामद कर पाई तो इस मामले में कोई फर्क न पड़ेगा। वे कहते हैं सजा देने से पहले कोर्ट कातिल के ‘मकसद’ पर गौर करती है। श्रद्धा से आए दिन झगड़ा होना, उसे पीटना, अन्य लड़कियों से संबंध होना, ऐसे पहलू हैं जो आफताब के क्राइम करने के मोटिव को बताते हैं। साथ ही श्रद्धा के सोशल मीडिया हैंडल, बैंक खातों का इस्तेमाल भी उसे दोषी साबित करने में मददगार रहेंगे।

उत्तर प्रदेश पुलिस के रिटायर्ड डिप्टी SP विवेकानंद तिवारी ने ऑपइंडिया को बताया कि जब अपराध में प्रयुक्त हथियार बरामद न हो तो कोर्ट में पुलिस को इसका मजबूत और संतोषजनक कारण बताना होता है।

चश्मदीद गवाह न होने की दलीलें

जय गौतम का कहना है कि कोर्ट में आफताब का पक्ष चश्मदीद गवाह न होने की दलीलें दे सकता है। लेकिन रेप केसों का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि इससे उसे शायद ही राहत मिले, क्योंकि रेप केस की तरह ही इस मामले में भी टेक्निकल साक्ष्य अहम हैं।

चश्मदीद से ज्यादा मान्य परिस्थितिजन्य सबूत

उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व DSP अविनाश गौतम ने ऑपइंडिया से बातचीत के दौरान कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य, चश्मदीद गवाह से कहीं ज्यादा कारगर होते हैं। पूर्व DSP के अनुसार श्रद्धा के मोबाइल का लोकेशन आफताब के फ्लैट में होना, दोनों के बीच संपर्क होने और साथ रहने को साबित करने के लिए काफी है।

90 दिनों की बाध्यता

UP पुलिस के पूर्व DSP विवेकानंद तिवारी ने बताया कि इस तरह के मामलों में 90 दिनों के अंदर चार्जशीट फाइल करना अनिवार्य होता है। ऐसा नहीं होने पर इसे पुलिस का बड़ा फेल्योर माना जाता है। इसके कारण कई बार आरोपित मुचलके पर छूट भी जाते हैं।

राजस्थान में खुलेआम बिक रहा विस्फोटक, जिस रेलवे ट्रैक को उड़ाने की हुई कोशिश वहाँ से 70 Km दूर मिला 186Kg डेटोनेटर: रिपोर्ट

राजस्थान में उदयपुर-अहमदाबाद रेलवे लाइन (Udaipur-Ahmedabad Railway Line Blast) रेलवे ट्रैक और पुल को 12 नवंबर 2022 की रात बारूद और डेटोनेटर से उड़ाने की आतंकी कोशिश की गई थी। इस जगह से 70 किलोमीटर दूर आसपुर में करीब 186 किलोग्राम जिलेटिन मिले हैं। राजस्थान में डेटेनेटर और बारूद आसान से खरीदा जा सकता है।

सात बोरियों में भरे जिलेटिन के छड़ डूंगरपुर जिले के गडा नाथजी के पास सोम नदी पर बने भबराना पुल के नीचे से बरामद किए गए हैं। इसे भबराना गाँव के लोगों ने देखा और इसकी जानकारी प्रशासन को दी। इसके पैकेट पर राजस्थान का पता लिखा हुआ है। हालाँकि, गीला होने के पैकेट का कागज गल गया है, जिससे लिखा हुआ स्पष्ट नहीं दिख रहा है।

पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इन्हें कहाँ से लाया गया था। इसे किसी साजिश को अंजाम देने के लिए यहाँ छिपाकर रखा गया था या यहाँ फेंक दिया गया था, इसकी भी पुलिस जानकारी जुटा रही है। इन सब के पीछे कौन लोग शामिल हैं और वे किससे जुड़े हैं, इसकी जानकारी अभी तक पुलिस के पास नहीं है।

आसपुर एसएचओ सवाई सिंह सोढ़ा के अनुसार, बड़ी मात्रा में जिलेटिन की छड़ें मिली हैं। इन्हें जब्त कर लिया गया है। इसकी हर एंगल से जाँच की जा रही है। इस मामले में अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है।

बता दें कि उदयपुर-अहमदाबाद रेलवे लाइन ट्रैक को उड़ाने की कोशिश की गई थी। इस हमले में रेलवे पटरियों में दरार और पुल को नुकसान पहुँचा है। इस जगह से सुपर पावर 90 डेटोनेटर बरामद किए गए थे। इसके बाद इसकी जाँच आतंकी एंगल से की जा रही है। इस रैलवे ट्रैक का उद्घाटन घटना से 13 दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, राजस्थान में डेटेनेटर और बारूद खरीदना आसान है। अगर कोई इन्हें लेकर एक जगह से दूसरी जगह जाता है तो उससे पूछने वाला भी कोई नहीं है। भास्कर की टीम ने डेटोनेटर खरीदने का प्रयास किया और यह बहुत आसानी से मिल गया। इसे राजसमंद से उदयपुर तक लाने में किसी ने रोक-टोक तक नहीं की।

3,500 रुपए में 25 किलोग्राम डेटोनेटर राजसमंद में आसानी से उपलब्ध है। उदयपुर जिले के ओड़ा, सिंघटवाड़ा, केवड़ा, रेला, पलोदड़ा, देवाला और एकलिंगपुरा जैसी जगहों पर 25 किलोग्राम की पेटी 3,500 से 6,000 रुपए में मिल रहे हैं। डेटोनेटर के सप्लायर जितनी मर्जी उतनी आपूर्ति देने को तैयार थे।

बता दें कि डेटोनेटर को लाइसेंस होने पर ही खरीदा जा सकता है। इसे खनन करने वाली कंपनियाँ आमतौर पर इस्तेमाल करती हैं। केंद्र और राज्य सरकार के सख्त निर्देश हैं कि इनकी खरीद-बिक्री का रिकॉर्ड ऑनलाइन दर्ज करना जरूरी होता है। हालाँकि, राजस्थान के अधिकांश जिलों में डेटोनेटर अवैध रूप से बिक रहे हैं और इसकी जानकारी छिपा ली जाती है।