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जाँच को भटकाने की कोशिश कर रहा है आफताब, अब होगा नार्को टेस्ट: किचन से मिले खून के धब्बे, शॉवर चालू कर श्रद्धा के शरीर के करता था टुकड़े

श्रद्धा मर्डर केस में भले ही कई चौंका देने वाली सच्चाई सामने आई हो, लेकिन अब भी कई राज़ हैं जो सामने आने बाकी है। श्रद्धा के कातिल आफताब की गिरफ्तारी के बाद भी अब तक पूरा सच सामने नहीं आ सका है। दिल्ली पुलिस की मानें तो आफताब जाँच और पूछताछ में सहयोग नहीं कर रहा है। वह लगातार पुलिस को भटकाने की कोशिश कर रहा है। जाँच में सहयोग न मिल पाने की वजह से पुलिस ने दिल्ली के साकेत कोर्ट से आरोपी आफताब के नार्को टेस्ट की इजाजत माँगी थी।

मिली जानकारी के अनुसार, कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आफताब के नार्को टेस्ट को मंजूरी दे दी है। कहा जा रहा है कि नार्को टेस्ट के बाद कई राज खुल सकते हैं।

आफताब के किचन से मिले खून के धब्बे, शॉवर चालू कर शव के किए टुकड़े

मामले में जाँच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, चौंकाने वाले खुलासे होते जा रहे हैं। अब आफताब के किचन से पुलिस को खून के धब्बे मिले हैं। न्यूज एजेंसी ANI के मुताबिक, पुलिस सोमवार (14 नवंबर, 2022) को क्राइम सीन रीक्रिएशन के लिए आफताब को उसके उसी फ्लैट पर ले गई थी, जहाँ श्रद्धा की हत्या कर उसके शरीर के 35 टुकड़े किए गए थे। इसी दौरान पुलिस की टीम को किचन में खून के धब्बे दिखाई दिए।

खून के नमूनों की जाँच की जा रही है। अगर यह खून इंसान का होता है, तो पुलिस DNA मिलान कराने के लिए श्रद्धा के पिता को दिल्ली बुला सकती है।

हालाँकि, पूछताछ के दौरान आफताब ने यह जरूर बताया था कि उसने फ्लैट के बाथरूम में श्रद्धा के शव के 35 टुकड़े किए थे। इस दौरान वह शॉवर चालू रखता था, ताकि शरीर से निकला खून सीवेज में बह जाए। इतना ही नहीं, आफताब ने फ्रिज को केमिकल से साफ किया था, ताकि खून के धब्बे नज़र न आ सकें और सबूत मिटाए जा सकें।

जब श्रद्धा के घरवालों और दोस्तों को उसके गायब होने पर शक हुआ, तभी से आफताब उनके शक के घेरे में था। पहले दिन से ही आफताब ने पेशेवर अपराधी की तरह झूठ और फरेब का जाल बुनना शुरू किया। श्रद्धा के गायब होने के बाद जब मुंबई पुलिस ने आफताब से श्रद्धा के बारे में पूछा तो इसके लिए उसने दो बार बयानों को बदला। दिल्ली पुलिस के जाँच अधिकारियों ने पूछा, तब भी आफताब लगातार बयान बदलता रहा।

पुलिस के एक अधिकारी की मानें तो पहले तो आफताब कहता रहा कि श्रद्धा दिल्ली छोड़कर चली गई है, लेकिन वह दिल्ली पुलिस की रडार पर था। कहते हैं न कि कातिल कितना भी शातिर हो, कोई एक चूक जरूर करता है और उसकी एक चूक ही उसे कानून के शिकंजे में ले आती है। आफताब के साथ भी वही हुआ। आफताब जाँच के दायरे में तो था ही, जाँच के दौरान यह बात सामने आई कि उसकी लोकेशन रोज रात 2 बजे महरौली के जंगलों में मिलती है।

इससे दिल्ली पुलिस का शक यकीन में बदलने लगा और खुद को शातिर समझने वाला दरिंदा पुलिस की गिरफ्त में आ ही गया।

अब भी बहुत कुछ छिपा रहा है आफताब

साकेत कोर्ट में पुलिस ने बताया कि आफताब मामले की जाँच में सहयोग नहीं कर रहा है। इस पर अदालत ने कातिल आफताब के नार्को टेस्ट की इजाजत दे दी है। दिल्ली पुलिस की ओर से यह भी दावा किया गया है कि श्रद्धा का मोबाइल फोन अब तक रिकवर नहीं हो पाया है। शरीर के कई पार्ट्स भी नहीं मिल पाए हैं। इसके अलावा श्रद्धा की हत्या में इस्तेमाल की गई आरी रिकवर नहीं हो पाई है। आफताब श्रद्धा के मोबाइल फोन के बारे में भी सही जानकारी नहीं दे रहा है।

जाँच को भटकाने के लिए कभी दिल्ली तो कभी महाराष्ट्र में फोन फेंकने की बात कर रहा है। आफताब इस हत्याकांड को लेकर अब भी बहुत कुछ छिपा रहा है। पकड़े जाने और लाश के 35 टुकड़े करने वाली बात के सामने आने के बाद भी आफताब क्या और क्यों छिपाने की कोशिश कर रहा है – यह समझ के परे है। शरीर के बाकी अंगो का क्या हुआ? आफताब क्यों नहीं चाहता कि पुलिस के हाथ श्रद्धा का फोन लगे? क्या श्रद्धा के साथ और अधिक जघन्यता हुई है, जो आफताब छिपाने की कोशिश कर रहा है?

ऐसे कई सवाल हैं जिसका खुलासा आफताब के नार्को टेस्ट के बाद हो सकता है और इस हत्याकांड को लेकर कई सच सामने आ सकते हैं।

आज भी कबीलों के दखल से चलती है खाड़ी मुल्कों की सरकारें, शासक देते हैं सब्सिडी: अरब में लोकतंत्र कभी नहीं रहा समाज का हिस्सा, लोगों को अधिकारों में कटौती मंजूर

बहुत सारे विद्वानों की माने तो अरबी प्रायद्वीप का समाज प्राथमिक रूप से ‘क़बीला’ से बना हुआ समाज है। आज भी खाड़ी देशों में ये कबीले राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। हम देखेंगे कि कैसे इन खाड़ी देशों में राजनीतिक जीवन अविकसित रही है और इसमें कबीलों की क्या भूमिका रही है। राज्य-निर्माण और राष्ट्रीय पहचान विकसित करने में इन कबीलों की पहचान और क़बीलावाद की भूमिका अद्वितीय और महत्वपूर्ण रही है।

इराक़, लीबिया, और यमन जैसे देशों में, आधुनिक राज्य गृहयुद्ध और अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेपों से असफल रहें हैं। वहाँ इस राजनीतिक शून्य को इन कबीलों ने बहुत तेज़ी से कब्जाया है। राज्य के पतन के समय क़बीलों का फिर से उभरना खाड़ी देशों में इनके महत्व को बखूबी दर्शाता है। चौदहवीं शताब्दी के अरब मुस्लिम इतिहासकार, इब्न खलदुन को कबीलों और राज्य के बीच संबंधों के पहले विस्तृत विवरण के लिए जाना जाता है।

वो लिखते है कि ‘असबिय्या’ माने एक तरह का ‘समूह एकजुटता’ जो केवल साझा पारिवारिक पृष्ठभूमि और रक्त के महत्व को ही प्रदर्शित नहीं करता, बल्कि आपसी समाजीकरण का भी महत्व रखता है। वो आगे कहते है कि सामान्य वंश के आधार पर ‘असबिय्या’ एक स्थिर और सुरक्षित शासन को मजबूत करने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने अरबी क्षेत्रों में मजहब और सगोत्रता (Kinship) से मिश्रित सरकार सबसे ज़्यादा मजबूत सरकार मानी है।

इसलिए, लोकतांत्रिक मूल्य या लोकतांत्रिक सरकार यहाँ की राजनीतिक संस्कृति (Political Culture) का कभी हिस्सा ही नहीं रही। ऐसे में इन देशों में लोकतंत्र का आना बहुत कठिन हो जाता है। एक तरीक़े से देखें तो क़बीला और राज्य वैचारिक तौर पर एक दूसरे से विपरीत हैं। पहचान, राजनीतिक निष्ठा और व्यवहार के आधार के रूप में, क़बीला सगोत्रता (Kinship) और पितृवंशीय वंश के संबंधों को प्रमुखता देती है, जबकि राज्य सभी व्यक्तियों की एक केंद्रीय सत्ता के प्रति वफादारी पर जोर देता है, चाहे उनका एक-दूसरे से कोई संबंध क्यों न हो।

क़बीला व्यक्तिगत, नैतिक और अनुवांशिक कारकों पर जोर देती है, वहीं राज्य अवैयक्तिक है, और उपलब्धि को मान्यता देता है। क़बीला सामाजिक रूप से सजातीय, समतावादी और खंडीय है, वहीं राज्य विजातीय और श्रेणीबद्ध है। जनजाति व्यक्ति के भीतर की भावना है; राज्य बाहरी है। ऐसे में अरबी समाज की राजनीति समझना थोड़ा कठिन हो जाता है क्योंकि यहाँ क़बीला और राज्य एक दूसरे पर आश्रित है। भले ही इन क़बीलों की वास्तविक संरचना पहले जैसी नहीं हो, लेकिन वो अभी भी अपने सामाजिक और राजनीतिक भूमिका को बना कर रखते हैं।

क़बीलों का प्रभाव इन देशों के राजनीतिक तंत्र (Political System) में साफ़ देखने को मिलता है। ऐसे में अरबी समाज में लोकतांत्रिक मूल्यों का आना कठिन हो जाता है। अरबी क्षेत्र में तेल मिलने के बाद से बड़ा बदलाव आया है। तेल से आने वाले राजस्व (Revenues) सरकार को पर्याप्त धन प्रदान करती है। अरब प्रायद्वीप के शासक परिवार अपने प्रति वफादारी बनाए रखने के लिए शक्तिशाली क़बीलों को लंबे समय से सब्सिडी देते रहे हैं।

खाड़ी मुल्क अपनी जनता को बहुत सारी सामाजिक कल्याणकारी नीतियों द्वारा सहायता करते हैं। इनमें विधवा, गरीब, अनाथ और दिव्यंगों के लिए पेंशन और आर्थिक सहायता भी शामिल है। ऐसे में सरकार सामाजिक समूहों के गठन जो राजनीतिक अधिकारों की माँग करने की कोशिश करती है, उन्हें दबा देती है। आर्थिक अधिकारों का पूरा होना और क़बीले या ‘सामूहिक भावना’ के कारण अपने राजनीतिक अधिकारों में कमी बर्दाश्त कर लेना, लोकतांत्रिक मूल्यों को इन देशों में आने से रोक देता है।

इन देशों के जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा प्रवासी लोगों का है। वो वहाँ अच्छी नौकरी के अवसर में जाते हैं। उनमें कुछ वही बस जाते हैं और कुछ काम कर के अपने देश लौट जाते हैं। ज़्यादातर प्रवासी मज़दूर इन देशों में निचले स्तर के काम जैसे, ड्राइवरी, घरेलू कामकाज, पेट्रोल पम्प पर तेल बेचना, साफ़-सफ़ाई इत्यादि करते है। इसके कारण इन देशों में स्थानीय लोग लोअर क्लास में नहीं आते और ये प्रवसी मज़दूर इनका जगह ले लेते है।

ऐसे में यहाँ की स्थानीय जनता सुखी और संपन्न रूप से अपना जीवन यापन करती है। बुनियादी ज़रूरत और आर्थिक स्वतंत्रता पूरा होने के कारण यहाँ के लोग अपने राजनीतिक अधिकारों में कटौती स्वीकार कर लेते है।

अपने जिस प्रत्याशी के अपहरण का AAP ने लगाया आरोप, उसने चुनाव कार्यालय पहुँच वापस लिया नामांकन: पार्टी ने कहा था – BJP उन्हें परिवार सहित उठा कर ले गई

गुजरात में विधानसभा चुनाव से पहले सियासी उठापटक तेज हो गई है। ‘आम आदमी पार्टी (AAP)’ ने 15 नवंबर, 2022 को भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर उसके उम्मीदवार कंचन जरीवाला के अपहरण का आरोप लगाया था। फिर 16 नवंबर, 2022 को जरीवाला अपना नामांकन वापस लेने के लिए पुलिस सुरक्षा के बीच चुनाव अधिकारी के कार्यालय पहुँच गए। AAP ने सूरत पूर्व विधानसभा क्षेत्र से जरीवाला को टिकट दिया था। हालाँकि अब कंचन जरीवाला ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली है।

आम आदमी पार्टी ने दावा किया था कि कंचन जरीवाला अचानक लापता हो गए थे। इस बीच, गुजरात में आम आदमी पार्टी के सीएम उम्मीदवार इसुदान गढ़वी ने भाजपा पर कंचन जरीवाला के लापता होने में शामिल होने का आरोप लगाया। इसुदान गढ़वी के मुताबिक, कंचन जरीवाला और उनका पूरा परिवार लापता था।

इसुदान गढ़वी ने 15 नवंबर को अपने ट्वीट में लिखा था, “भाजपा ‘आप’ से इतनी डरी हुई है की वो गुंडागर्दी पर आ गई है। सूरत ईस्ट से चुनाव लड़ रहे हमारे कंचन जरीवाला के पीछे भाजपा वाले कुछ दिनों से पीछे पड़े हुए थे और आज वो ग़ायब है। माना जा रहा है की भाजपा के गुंडे उन्हें उठा ले गए है। उनका परिवार भी ग़ायब है। भाजपा कितनी गिरेगी?”

अरविंद केजरीवाल ने भी 16 नवंबर, 2022 को इस बारे में ट्वीट भी किया। उन्होंने लिखा, “सूरत (पूर्व) से हमारे प्रत्याशी कंचन जरीवाला और उनका परिवार कल से लापता है। पहले भाजपा ने उनका नामांकन रद्द कराने की कोशिश की। लेकिन, उनका नामांकन स्वीकार कर लिया गया। बाद में उन पर नामांकन वापस लेने का दबाव बनाया गया। क्या उनका अपहरण कर लिया गया है?”

अरविंद केजरीवाल के इस ट्वीट के एक घंटे के भीतर ही कंचन जरीवाला अपना नामांकन वापस लेने चुनाव अधिकारी के कार्यालय पहुँच गए।

जरीवाला का नामांकन वापस लेने के मामले में दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री और आप नेता मनीष सिसोदिया चुनाव आयोग पहुँचे। उन्होंने कहा, “मुझे दोपहर 2 बजे चुनाव आयोग जाना था, लेकिन अब आपातकाल की स्थिति है। इसलिए मुझे जल्द से जल्द इस मामले पर बात करनी होगी।”

आप नेता राघव चड्ढा ने बुधवार सुबह प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा, “सूरत पूर्व से AAP उम्मीदवार कंचन जरीवाला का भाजपा के गुंडों ने अपहरण कर लिया है। AAP प्रत्याशी मंगलवार (15 नवंबर, 2022) सुबह से ही भाजपा की गिरफ्त में है। भाजपा इतनी घबराई हुई है कि वह आप उम्मीदवार का अपहरण कर रही है। यह लोकतंत्र की हत्या है।”

आम आदमी पार्टी द्वारा शुरू किए गए इन राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद सोशल मीडिया यूजर्स भी आप व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का खूब मजाक बना रहे हैं।

एक ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि आखिर भाजपा आम आदमी पार्टी से इतना डरी हुई क्यों है।

एक यूजर विजय पटेल ने कहा, “यह फेक न्यूज है। आप में मेरे सूत्र कह रहे हैं कि आप ने उन्हें ऐसा करने का निर्देश दिया है। वह अगले एक से दो दिनों में बीजेपी को दोष देने के लिए मीडिया के सामने आएँगे, लेकिन हमेशा की तरह बिना किसी सबूत के!”

भाजपा 1998 से गुजरात में सत्ता में है। परंपरागत रूप से यहाँ अब तक दो ही पार्टियाँ सत्ता पर काबिज होती आई हैं। दूसरी पार्टी कॉन्‍ग्रेस है। गुजरात में इस साल 1 और 5 दिसंबर को दो चरणों में चुनाव होने हैं। परिणाम 8 दिसंबर 2022 को घोषित किए जाएँगे।

श्रद्धा मर्डर केस: दिल्ली पुलिस का असली टास्क शेष, आफताब के कबूलनामे-नार्को टेस्ट से ही नहीं बनेगी बात; इन पर करना होगा काम

27 साल की श्रद्धा वाकर (Shraddha walker) की निर्मम हत्या से पूरा देश सन्न है। उसके शव के टुकड़े-टुकड़े करने वाला 27 साल का आफताब अमीन पूनावाला (Aftab Amin Poonawalla) दिल्ली पुलिस की गिरफ्त में है। उसका नार्को टेस्ट करवाने की इजाजत अदालत ने दे दी है। आफताब का कबूलनामा पहले से मौजूद है, जिससे करीब 6 महीने पहले की गई इस हत्या को लेकर चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। बावजूद इसके दिल्ली पुलिस का काम पूरा नहीं हुआ है। असली चुनौती अब उसके सामने हैं। यह चुनौती है अदालत में आफताब के अपराधों को साबित करने योग्य सबूत जुटाना, क्योंकि अदालत सबूत माँगता है। उसके आधार पर ही फैसला सुनाता है।

सबूत जुटाने के क्रम में ही दिल्ली पुलिस 15 नवंबर 2022 को आफताब को लेकर महरौली के जंगलों में गई थी। पूछताछ में उसने बताया है कि 18 मई 2022 को श्रद्धा की हत्या करने के बाद उसने शव के 35 टुकड़े किए थे। इन टुकड़ों को वह एक-एक कर करीब 18 दिनों तक महरौली के जंगलों में फेंकता रहा। इस जंगल से करीब 10 बॉडी पॉर्ट्स बरामद होने की बात भी सामने आई है। लेकिन ये श्रद्धा के ही हैं, इसकी पुष्टि फोरेंसिक और डीएनए जाँच के बाद ही हो पाएगी।

हम जानते हैं कि कई बार जब खबरें सुर्खियों से गायब हो जाती है तो लोगों को पता भी नहीं चलता कि जिस घटना ने उन्हें झकझोर दिया था, उसके आरोपित अदालत से राहत पाने में कामयाब रहे। इसकी सबसे बड़ी वजह पुलिसिया जाँच में कमी होती है। पर्याप्त सबूतों का अभाव होता है। इसका फायदा उठाकर आरोपित अदालत से राहत पा जाते हैं। ऐसे में हमने पुलिस के कुछ पूर्व अधिकरियों और वकीलों से बात कर यह समझने की कोशिश की कि श्रद्धा मर्डर केस में दिल्ली पुलिस के सामने किस तरह की चुनौतियाँ हैं।

नार्को टेस्ट प्रमाणिक नहीं

सुप्रीम कोर्ट के वकील अजय गौतम ने ऑपइंडिया को बताया कि नार्को टेस्ट कोर्ट में बहुत ज्यादा मायने नहीं रखता। उनके मुताबिक कई बार अपराधी अपनी शारीरिक क्षमता से नार्को और लाई डिक्टेटर जैसे टेस्ट में बच निकलते हैं। लेकिन वे सजा से नहीं बच पाते। जैसे निठारी केस। उनके अनुसार इसी तरह यदि आफताब नार्को टेस्ट में बच निकलता है तो भी इसकी गारंटी नहीं है कि कोर्ट भी उसे निर्दोष मान लेगा।

इलेक्ट्रिक और मौके पर मिले सबूत अहम

दिल्ली पुलिस के रिटायर्ड ACP वेद भूषण ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा कि श्रद्धा की मौत के बाद भी आफताब उसके सोशल मीडिया को चला रहा था। यह भी एक सबूत है। शव के अवशेषों का DNA टेस्ट होगा। इनका मिलान श्रद्धा के पिता के डीएनए से होने पर यह महत्वपूर्ण साक्ष्य साबित हो सकता है। उनके मुताबिक आफताब के घर से मिले साक्ष्यों के अलावा उसकी फोन कॉल डिटेल भी इस केस में अहम होगी। उन्होंने बताया कि CCTV फुटेज के अतिरिक्त जहाँ से फ्रिज, आरी आदि उसने खरीदे थे, उन जगहों से भी सबूत जुटाए जा सकते हैं।

बाल भी मिला तो सजा लगभग तय

वहीं अजय गौतम का कहना है कि श्रद्धा का एक बाल तक बरामद होने पर आफताब की सजा लगभग तय है। वे कहते हैं भले आफताब ने सारे साक्ष्यों को सफाई से मिटाने दिए हों, बावजूद घटनास्थल से श्रद्धा का कुछ न कुछ अंश जाँच में जरूर मिला होगा। डीएनए टेस्ट को गौतम ने भी इस केस में काफी अहम बताया है।

रेयरेस्ट ऑफ रेयर केस

पूर्व ACP वेद भूषण के अनुसार यह रेयरेस्ट ऑफ रेयर केस है। जैसे नैना साहनी तंदूर केस, निठारी केस, शीना बोरा जैसे मामले थे। गौतम का भी कहना है कि यह यह आम केस जैसा नहीं है। सुनवाई के दौरान यह भी एक पहलू रहेगा।

हथियार न मिले तो क्या होगा

एडवोकेट अजय गौतम की माने तो श्रद्धा के शव के टुकड़े जिस आरी से किया गया, उसे पुलिस नहीं भी बरामद कर पाई तो इस मामले में कोई फर्क न पड़ेगा। वे कहते हैं सजा देने से पहले कोर्ट कातिल के ‘मकसद’ पर गौर करती है। श्रद्धा से आए दिन झगड़ा होना, उसे पीटना, अन्य लड़कियों से संबंध होना, ऐसे पहलू हैं जो आफताब के क्राइम करने के मोटिव को बताते हैं। साथ ही श्रद्धा के सोशल मीडिया हैंडल, बैंक खातों का इस्तेमाल भी उसे दोषी साबित करने में मददगार रहेंगे।

उत्तर प्रदेश पुलिस के रिटायर्ड डिप्टी SP विवेकानंद तिवारी ने ऑपइंडिया को बताया कि जब अपराध में प्रयुक्त हथियार बरामद न हो तो कोर्ट में पुलिस को इसका मजबूत और संतोषजनक कारण बताना होता है।

चश्मदीद गवाह न होने की दलीलें

जय गौतम का कहना है कि कोर्ट में आफताब का पक्ष चश्मदीद गवाह न होने की दलीलें दे सकता है। लेकिन रेप केसों का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि इससे उसे शायद ही राहत मिले, क्योंकि रेप केस की तरह ही इस मामले में भी टेक्निकल साक्ष्य अहम हैं।

चश्मदीद से ज्यादा मान्य परिस्थितिजन्य सबूत

उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व DSP अविनाश गौतम ने ऑपइंडिया से बातचीत के दौरान कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य, चश्मदीद गवाह से कहीं ज्यादा कारगर होते हैं। पूर्व DSP के अनुसार श्रद्धा के मोबाइल का लोकेशन आफताब के फ्लैट में होना, दोनों के बीच संपर्क होने और साथ रहने को साबित करने के लिए काफी है।

90 दिनों की बाध्यता

UP पुलिस के पूर्व DSP विवेकानंद तिवारी ने बताया कि इस तरह के मामलों में 90 दिनों के अंदर चार्जशीट फाइल करना अनिवार्य होता है। ऐसा नहीं होने पर इसे पुलिस का बड़ा फेल्योर माना जाता है। इसके कारण कई बार आरोपित मुचलके पर छूट भी जाते हैं।

राजस्थान में खुलेआम बिक रहा विस्फोटक, जिस रेलवे ट्रैक को उड़ाने की हुई कोशिश वहाँ से 70 Km दूर मिला 186Kg डेटोनेटर: रिपोर्ट

राजस्थान में उदयपुर-अहमदाबाद रेलवे लाइन (Udaipur-Ahmedabad Railway Line Blast) रेलवे ट्रैक और पुल को 12 नवंबर 2022 की रात बारूद और डेटोनेटर से उड़ाने की आतंकी कोशिश की गई थी। इस जगह से 70 किलोमीटर दूर आसपुर में करीब 186 किलोग्राम जिलेटिन मिले हैं। राजस्थान में डेटेनेटर और बारूद आसान से खरीदा जा सकता है।

सात बोरियों में भरे जिलेटिन के छड़ डूंगरपुर जिले के गडा नाथजी के पास सोम नदी पर बने भबराना पुल के नीचे से बरामद किए गए हैं। इसे भबराना गाँव के लोगों ने देखा और इसकी जानकारी प्रशासन को दी। इसके पैकेट पर राजस्थान का पता लिखा हुआ है। हालाँकि, गीला होने के पैकेट का कागज गल गया है, जिससे लिखा हुआ स्पष्ट नहीं दिख रहा है।

पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इन्हें कहाँ से लाया गया था। इसे किसी साजिश को अंजाम देने के लिए यहाँ छिपाकर रखा गया था या यहाँ फेंक दिया गया था, इसकी भी पुलिस जानकारी जुटा रही है। इन सब के पीछे कौन लोग शामिल हैं और वे किससे जुड़े हैं, इसकी जानकारी अभी तक पुलिस के पास नहीं है।

आसपुर एसएचओ सवाई सिंह सोढ़ा के अनुसार, बड़ी मात्रा में जिलेटिन की छड़ें मिली हैं। इन्हें जब्त कर लिया गया है। इसकी हर एंगल से जाँच की जा रही है। इस मामले में अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है।

बता दें कि उदयपुर-अहमदाबाद रेलवे लाइन ट्रैक को उड़ाने की कोशिश की गई थी। इस हमले में रेलवे पटरियों में दरार और पुल को नुकसान पहुँचा है। इस जगह से सुपर पावर 90 डेटोनेटर बरामद किए गए थे। इसके बाद इसकी जाँच आतंकी एंगल से की जा रही है। इस रैलवे ट्रैक का उद्घाटन घटना से 13 दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, राजस्थान में डेटेनेटर और बारूद खरीदना आसान है। अगर कोई इन्हें लेकर एक जगह से दूसरी जगह जाता है तो उससे पूछने वाला भी कोई नहीं है। भास्कर की टीम ने डेटोनेटर खरीदने का प्रयास किया और यह बहुत आसानी से मिल गया। इसे राजसमंद से उदयपुर तक लाने में किसी ने रोक-टोक तक नहीं की।

3,500 रुपए में 25 किलोग्राम डेटोनेटर राजसमंद में आसानी से उपलब्ध है। उदयपुर जिले के ओड़ा, सिंघटवाड़ा, केवड़ा, रेला, पलोदड़ा, देवाला और एकलिंगपुरा जैसी जगहों पर 25 किलोग्राम की पेटी 3,500 से 6,000 रुपए में मिल रहे हैं। डेटोनेटर के सप्लायर जितनी मर्जी उतनी आपूर्ति देने को तैयार थे।

बता दें कि डेटोनेटर को लाइसेंस होने पर ही खरीदा जा सकता है। इसे खनन करने वाली कंपनियाँ आमतौर पर इस्तेमाल करती हैं। केंद्र और राज्य सरकार के सख्त निर्देश हैं कि इनकी खरीद-बिक्री का रिकॉर्ड ऑनलाइन दर्ज करना जरूरी होता है। हालाँकि, राजस्थान के अधिकांश जिलों में डेटोनेटर अवैध रूप से बिक रहे हैं और इसकी जानकारी छिपा ली जाती है।

सबसे आखिर में आया था श्रद्धा के सिर का नंबर, कटे सिर को थप्पड़ मारता था आफताब: हत्या के बाद खाते से पैसे भी किए ट्रांसफर

आफताब अमीन पूनावाला (Aftab Amin Poonawalla) ने श्रद्धा के सिर को सबसे आखिर में ठिकाने लगाया था। उसने सिर के टुकड़े नहीं किए थे। श्रद्धा (Shraddha walker) के बॉडी पार्ट्स की तलाश में लगी पुलिस को यदि यह सिर मिल जाता है तो आफताब को अदालत से मौत की सजा दिलाने में यह काफी मददगार साबित होगी।

हिंदुस्तान ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि शव के टुकड़ों के साथ सिर को भी आफताब ने फ्रिज में रख रखा था। वह इसे रोज देखता था। कभी कटे सिर को जोर-जोर से थप्पड़ मारता था। कभी उसका मेअकप करता था। कभी उससे बातें भी करता था।

यह बात भी सामने आई है कि हत्या करने के बाद आफताब ने श्रद्धा के अकाउंट से पैसे भी ट्रांसफर किए थे। शुरुआत में बरगलाने के लिए वह कह रहा था कि 22 मई 2022 से वह श्रद्धा के संपर्क नहीं है। लेकिन अब यह बात सामने आई है कि 26 मई को उसने श्रद्धा के अकाउंट से अपने अकाउंट में 54 हजार रुपए ट्रांसफर किए थे।

श्रद्धा की हत्या आफताब ने 18 मई 2022 को कर दी थी। इसके बाद उसने उसके शव के 35 टुकड़े किए थे। कई दिनों तक वह शव के टुकड़े दिल्ली के महरौली के जंगलों में फेंकता रहा था। 15 नवंबर को शवों के अवशेष की बरामदगी के लिए पुलिस आफताब के लेकर जंगल में गई थी। 10 बॉडी पार्ट्स मिलने की बात कही जा रही है। हालाँकि ये श्रद्धा के ही हैं, इसकी पुष्टि फोरेंसिक और डीएनए जाँच के बाद ही हो पाएगी।

एक रिपोर्ट के मुताबिक श्रद्धा की लाश के साथ आफ़ताब कुल 22 दिनों तक रहा था। सबसे पहले उसने श्रद्धा के हाथों को काटा था, फिर पैरों को। इसके बाद उसने बाकी अंग काटे। कटे हुए अंगों को वो फ्रिज में रखने से पहले बोरिक एसिड से धो दिया था। जिस फ्रिज के एक हिस्से में उसने श्रद्धा की लाश रखी थी, उसी फ्रिज के दूसरे हिस्से में वह बिस्किट, दूध, मक्खन और कोल्डड्रिंक आदि रखता था। सबसे पहले आफताब ने आंतों को फेंका था। शव के टुकड़े करने के लिए उसने एक फुट लंबी आरी का इस्तेमाल किया था।

न्यूज 18 की रिपोर्ट के अनुसार श्रद्धा की हत्या के बाद भी आफताब सामान्य जीवन जी रहा था। उसने कई महिलाओं से शारीरिक संबंध बनाए। इस हत्या के बाद डेटिंग एप के जरिए संपर्क में आई एक लड़की को भी वह दिल्ली के महरौली की उस फ्लैट में लेकर आया था, जिसमें श्रद्धा के शव के कटे हुए टुकड़े रखे थे।

लापरवाही तमिलनाडु के सरकारी हॉस्पिटल की, मर गई 17 साल की फुटबॉलर: कराने गई थी घुटने की सर्जरी, हो गए ऑर्गेन फेल

चेन्नई में डॉक्टरों की लापरवाही के कारण 18 साल की फुटबॉल खिलाड़ी प्रिया आर की मृत्यु हो गई। प्रिया ने पेरियार नगर स्थित सरकारी परिधीय अस्पताल में अपने घुटने का ऑपरेशन कराया था, जिसके बाद उसके घुटने की हालत और खराब हो गई। प्रिया को लिगामेंट इंजरी थी। इसकी वजह से उसे चेन्नई के पेरियार नगर के सरकारी पेरिफेरल अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने उसके घुटनों की सर्जरी की, जिसके बाद उसके पैर ठीक होने की बजाए और सूजने लगे।

बाद में जब हालत बिगड़ने लगी तो प्रिया को राजीव गाँधी सरकारी अस्पताल में रेफर कर दिया गया। जहां प्रिया को पहले हार्ट और किडनी संबंधित दिक्कतें आईं और फिर मल्टी ऑर्गेन फेल होने के बाद अस्पताल में उसकी मौत हो गई।

ऑपरेशन करने वाले डॉक्टर निलंबित

प्रिया की मौत के बाद उसके परिजनों ने अस्पताल परिसर में विरोध प्रदर्शन किया। मामले को बढ़ता देख आनन-फानन में पेरियार नगर स्थित सरकारी परिधीय अस्पताल के दो डॉक्टरों को निलंबित कर दिया गया है। तमिलनाडु के चिकित्सा एवं परिवार कल्याण मंत्री एमए सुब्रमण्यन ने प्रिया के परिजनों को कानूनी कार्रवाई का आश्वासन दिया है। मंत्री एमए सुब्रमण्यन ने किशोरी की मौत को लेकर दुख जताया और कहा कि ऑपरेशन में शामिल दोनों डॉक्टरों को निलंबन के साथ साथ विभागीय कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।

मंत्री एमए सुब्रमण्यन ने राज्य सरकार की तरफ से परिवार को 10 लाख रुपए का मुआवजा देने और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का ऐलान किया है।

भाजपा प्रमुख ने सरकार पर उठाए सवाल

तमिलनाडु भाजपा के प्रमुख के अन्नामलाई ने डीएमके सरकार से पीडि़त परिवार के सदस्य के लिए सरकारी नौकरी और दो करोड़ रुपए का मुआवजा देने की माँग की। उन्होंने ट्वीट किया,

“चेन्नई के राजीव गाँधी सरकारी अस्पताल में कॉलेज छात्रा, फुटबॉल खिलाड़ी बहन प्रिया की सर्जरी के दौरान सरकारी डॉक्टरों द्वारा गलत इलाज की वजह से मौत की खबर चौंकाने वाली है। उन्होंने कहा, डीएमके शासन में हर विभाग बदहाल है अब चिकित्सा विभाग भी उसमें शामिल हो गया।”

के अन्नामलाई का ट्वीट

के अन्नामलाई ने अपने एक बयान में तमिलनाडु के अस्पतालों की स्थिति पर सवाल उठाए। उन्होंने पूछा, “क्या अस्पताल में सर्जरी की सभी सुविधाएँ हैं? क्या अस्पताल में आवश्यक दवाएँ हैं? यदि मुख्यमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र के अस्पतालों की स्थिति ऐसी है, तो तमिलनाडु के अन्य गाँवों में चिकित्सिय सुविधाओं का क्या हाल है? इन सभी सवालों का जवाब तमिलनाडु सरकार को देना होगा।” बता दें कि प्रिया स्टेट वेल की फुटबॉलर खिलाड़ी थी और चेन्नई के क्वीन मैरी कॉलेज से फिजिकल एजुकेशन की पढ़ाई कर रही थी।

हिजाब के बाद अब कर्नाटक के स्कूल में अजान घुसा: उडुपी में छात्रों से दिलवाई, विरोध के बाद निजी स्कूल ने माँगी माफी

कर्नाटक (Karnataka) में हिजाब विवाद के बाद एक बार फिर माहौल को गर्माता दिख रहा है। यहाँ के एक निजी स्कूल के एक कार्यक्रम के दौरान ‘अजान’ में गाए जाने वाले गीत को गाने का मामला सामने आया है। इसके बाद हिंदू संगठनों ने विरोध किया तो स्कूल प्रशासन ने माफी माँग ली।

मामला कर्नाटक के उडुपी जिले के एक निजी स्कूल मदर टेरेसा मेमोरियल स्कूल का है। स्कूल में वार्षिक खेल दिवस समारोह का आयोजन किया गया था। इस दौरान आयोजित कार्यक्रम में छात्र स्वागत गीत प्रस्तुत कर रहे थे। छात्रों ने तीनों धर्मों के गीतों की प्रस्तुति दी।

इस दौरान मुस्लिम छात्रों ने अजान वाली गीत को गया। मामला जैसे ही हिंदूवादी संगठनों को पता चला तो उन्होंने इसका विरोध किया और स्कूल प्रशासन से माफी की माँग की। इसके बाद स्कूल प्रशासन ने लिखित में माफी माँग ली और कहा कि वह इस मुद्दे को भड़काना नहीं चाहता है।

बता दें कि कर्नाटक में पिछले कुछ महीनों में मुस्लिम लड़कियों द्वारा हिजाब पहनकर स्कूल जाने पर बवाल हो गया था। मामला स्थानीय प्रशासन से होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया। इतना ही नहीं, यह राष्ट्रीय स्तर पर भी बहस का कारण बन गया और कई बार देश विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने का माध्यम भी।

हालाँकि, राज्य की कठोर निर्णय के तहत राज्य के सभी सरकारी और अनुदानित स्कूल कॉलेजों में हिजाब पहनकर जाने पर रोक लगा दी गई। इस्लामी संगठनों ने इसे अपना मौलिक अधिकार बताते हुए इसका विरोध किया, लेकिन मामला सुप्रीम कोर्ट के दायरे में चला गया।

दरअसल, कर्नाटक में हिजाब विवाद की शुरुआत इस साल के जनवरी महीने में उडुपी जिले से हुई थी। यहाँ सरकारी पीयू कॉलेज में 6 मुस्लिम छात्राओं को हिजाब पहनकर कक्षा में प्रवेश नहीं दिया गया था। स्कूल प्रशासन का कहना था कि छात्राएँ पहले हिजाब पहनकर नहीं आती थी, स्कूल में समान ड्रेस के कारण के कारण यह कदम लिया गया था।

इसके बाद छात्राओं ने कर्नाटक हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। धीरे-धीरे यह विवाद पूरे राज्य में फैल गया था और इस कारण कई दिनों तक स्कूलों को भी बंद करना पड़ा था। हिजाब के पक्ष में कई मुस्लिम संगठन आ गए थे।

जहाँ दुनिया में सबसे ज्यादा मुस्लिम, उसने गरुड़ आरूढ़ विष्णु को बना दिया G-20 की पहचान: इंडोनेशिया को सनातन पर गर्व, यहाँ कॉन्ग्रेस को कमल के फूल से नफरत

इंडोनेशिया के बाली में एक मंदिर है – जहाँ स्थित हैं ‘गरुड़ विष्णु कंचन’ (GWK) की प्रतिमा। 122 मीटर लंबी ये मूर्ति इसी के नाम पर स्थापित एक संस्कृति पार्क का हिस्सा है। सितंबर 2018 में इसका उद्घाटन हुआ था। 400 फ़ीट की ये मूर्ति इंडोनेशिया में सबसे लंबी है। गरुड़ कैसे अमृत की खोज के लिए निकले थे, इसमें ये दर्शाया गया है। राष्ट्रपति जोको विडोडो ने इस कल्चरल पार्क का उद्घाटन किया था। साथ ही अब G-20 से भी इसका रिश्ता जुड़ गया है।

GWK के ही ‘Lotus Pond Area (कमल के तालाब वाला क्षेत्र)’ को G-20 देशों के नेताओं के रात के भोजन के लिए स्थान के रूप में चुना गया था। इससे इस पार्क की परंपरागत सुंदरता को दुनिया तक पहुँचाने में इंडोनेशिया को मदद मिली। इसके लिए पिछले कुछ महीनों में पार्क की रूपरेखा बदल कर इसे और भव्य बनाने के प्रयास जारी थे। लोटस पॉन्ड एरिया 7500 लोगों की मजहबी की क्षमता रखता है। 400 मुख्य अतिथियों के अलावा अन्य प्रतिनिधियों के लिए जेंडेला बाली रेस्टॉरेंट में डिनर की व्यवस्था की गई थी।

गरुड़, भगवान विष्णु, कमल… मोदी सरकार ने नहीं, इंडोनेशिया ने G-20 को दी सनातन पहचान

इस क्षेत्र में छूने के पत्थर से कलाकारी की गई है। इसके अंत में पक्षीराज गरुड़ की प्रतिमा है, जिसमें वो भगवान विष्णु को अपनी पीठ पर बिठाए दिख रहे हैं। ‘तीर्थ अगुंग’ के पवित्र तालाब भी यहीं पर हैं। भगवान विष्णु के हाथ में कमल का फूल भी है, जिसे सौंदर्य, समृद्धि और उर्वरता का प्रतीक माना जाता है। कमल के फूल कीचड़ में खिलते हैं। जहाँ इसकी जड़ें अंदर रहती हैं, सुंदर फूल ऊपर आते हैं। ये मानवता के विकास का भी प्रतीक है।

पहले फ्लोर से लेकर 23वें तक, दुनिया भर से आए मेहमानों के स्वागत और उन्हें घुमाने-फिराने की पूरी व्यवस्था की गई थी। इंडोनेशिया, जहाँ मुस्लिमों की जनसंख्या दुनिया में किसी भी देश से ज्यादा है, वहाँ की सरकार को पता है कि उनकी संस्कृति सनातन धर्म में निहित है और इसलिए वो चाहते हैं कि ये स्थल दुनिया भर में पर्यटन और तीर्थाटन का बड़ा केंद्र बने। 80 के दशक में ही मूर्तिकार न्यूमैन नुआर्ता ने इस प्रतिमा को डिजाइन किया था।

1997 में 60 हेक्टेयर के इस पार्क का निर्माण शुरू हुआ। प्रतिमा को तांबा, स्टील और पीतल से बनाया गया है। इस प्रतिमा में इंडोनेशिया की संस्कृति की झलक भी देखी जा सकती है। ‘Badong’, जो बाली का परंपरागत गहना है, उसे प्रतिमा के मुकुट पर लगाया गया है। 12-15 नवंबर तक इस पार्क को बंद रखा गया, ताकि दुनिया भर से आए वीवीआईपी मेहमानों का स्वागत किया जा सके। ये संस्कृति पार्क, भगवान विष्णु-गरुड़-कमल वाली प्रतिमा और तीर्थ स्थल – ये सब इंडोनेशिया ने चुना है G-20 के प्रतिनिधित्व के लिए, भारत ने नहीं।

ये बताना इसीलिए भी आवश्यक है, क्योंकि भारत में भगवान श्रीराम का अस्तित्व नकारने वाली कॉन्ग्रेस ने G-20 के नए लोगो के रूप में कमल के फूल को चुने जाने का विरोध करने वाले कॉन्ग्रेस बैठी हुई है। ये वही कॉन्ग्रेस पार्टी है, जिसने भगवान श्रीराम के अस्तित्व को नकार दिया था, जो रामसेतु को नुकसान पहुँचाने की तैयारी में थी। कॉन्ग्रेस पार्टी ने कमल के फूल को चिह्न बनाए जाने का विरोध किया और कह दिया कि ये तो भाजपा का चुनाव चिह्न है।

इसका जवाब कुछ इस तरह से दिया जा सकता है कि क्या जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रैलियों में हाथ हिला कर जनता का अभिवादन करते हैं तो वो कॉन्ग्रेस का प्रचार कर रहे होते हैं? क्योंकि, कॉन्ग्रेस पार्टी का चुनाव चिह्न पंजा ही है। तो क्या सारे भाजपा वाले अपना हाथ काट लें? कमल का फूल तब भी पवित्र था, जब भाजपा-कॉन्ग्रेस नहीं थी। सनातन सतत है। कमल के फूल को भगवान विष्णु की नाभि से प्रकट हुआ माना जाता है, जिस पर ब्रह्मा जी विराजमान रहते हैं।

गरुड़ कैसे बने भगवान विष्णु के वाहन, पौराणिक कहानी संक्षेप में

कथा कुछ यूँ है कि ऋषि कश्यप की 2 पत्नियाँ थीं – कद्रू और विनता। कद्रू ने ऋषि से 100 पुत्र का वरदान माँगा था, जबकि विनता ने उन सभी से शक्तिशाली 2 पुत्रों का। एक बार आकाश में उच्चैः श्रवा घोड़े को देख कर दोनों सौतनों में बाजी लग गई कि उसकी पूँछ काली है व सफ़ेद। जिस हारती, उसे दूसरे की दासी बनना था। कद्रू ने अपने पुत्रों (जो कि सर्प थे) से पूँछ ढँक देने को कहा। उनमें सिर्फ एक ही तैयार हुआ, तो धर्म की दुहाई देकर धोखे का काम न करने वाले बाकियों को कद्रू ने सर्प यज्ञ में मारे जाने का श्राप दे दिया।

विकता की हार हुई और उन्हें दासी बनना पड़ा। ये अलग कथा है कि कैसे हस्तिनापुर के राजा जन्मेजय ने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए एक-एक कर सभी साँपों को मारने के लिए यज्ञ का आयोजन किया था। विनता ने हड़बड़ी में एक पुत्र को जन्म दिया, जो अरुण कहलाया। अर्ध विकसित पाँव होने के कारण वो भगवान सूर्य का सारथि बन गया, क्योंकि इस कार्य में चलने-फिरने की ज़रूरत नहीं थी। उसने अपनी माता से कहा कि वो रोज सुबह-शाम सूर्य की लाली के रूप में दिखेगा।

दूसरा पुत्र गरुड़ हुआ। शर्त थी कि कद्रू को अगर अमृत मिलेगा, तभी विनता दासता से मुक्त होगी। गरुड़ ने इंद्र से कलश माँगा और न मिलने पर युद्ध किया। वज्र प्रहार से उसका एक पंख जाता रहा। इंद्र भी युद्ध में नहीं टिके और कलश भगवान विष्णु को दे दिया। गरुड़ ने उन पर भी हमला बोल दिया। अंत में संधि हुई और कलश कद्रू के पास पहुँचा। इंद्र ने छल से उसे वापस भी ले लिया। विनता दस्ता से मुक्त हो गई। गरुड़, विष्णु के वाहन बने। गरुड़ के ऊपर लगे ध्वज में उनकी ही तस्वीर रहती है, जो श्रीहरि के आगमन का सूचक होता है।

सनातन संस्कृति से कॉन्ग्रेस के नफरत का कारण क्या?

इसे आप क्या कहेंगे कि जहाँ दुनिया की सबसे ज्यादा मुस्लिम जनसंख्या देश अपनी सनातन जड़ों को मजबूत कर रहा है और इसे दुनिया भर तक पहुँचा रहा है, वहीं सनातन की धर्मभूमि भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी इसी संस्कृति को मिटाने पर तुली हुई है। पार्टी ने राम मंदिर के निर्माण में रोड़ा अटकाए रखा। मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री रहते देश की संपत्ति पर पहला हक़ मुस्लिमों का बताया। 26/11 मुंबई हमले को इस पार्टी ने RSS की साजिश करार दिया था, जबकि इसे पाकिस्तान ने अंजाम दिया था।

ये वही दल है, जिसके शासनकाल में केंद्रीय गृह मंत्री रहते शिवराज पाटिल ने ‘भगवा आतंकवाद’ की मनगढंत थ्योरी को आगे बढ़ाया। आज वही शिवराज पाटिल कहते हैं कि श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने जिहाद की शिक्षा दी है। कर्नाटक में पार्टी के कोई नेता हिन्दू शब्द को विदेशी बताता है तो दिल्ली में बैठे उसके ‘दलित नेता’ दिन-रात हिन्दू धर्म व ब्राह्मणों को अपशब्द कहते हैं। अतः, गरुड़-कमल-विष्णु – इन पार्टी को नफरत होना आश्चर्य की बात नहीं।

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 2024 में फिर लड़ेंगे राष्ट्रपति चुनाव, कहा- प्रेसीडेंट होता तो रूस-यूक्रेन युद्ध कभी नहीं होता

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प (USA Ex-President Donald Trump) ने साल 2024 में होने वाले राष्ट्रपति चुनावों के लिए अपनी उम्मीदवारी की घोषणा कर दी है। इसके लिए उन्होंने दस्तावेज भी दाखिल कर दिए हैं। ये दावेदारी उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी (Republican Party) की ओर से की है।

ट्रंप ने बुधवार (16 नवंबर 2022) को यह घोषणा अमेरिका में मध्यावधि चुनाव होने के बाद की है। ट्रंप मध्यावधि चुनाव में जीत के बाद अपनी उम्मीदवारी की घोषणा करना चाहते थे। हालाँकि, चुनाव में ट्रंप समर्थित उम्मीदवारों की हार हुई है, इसके बावजूद उन्होंने चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया है।

ट्रम्प ने जैसे ही 2024 के व्हाइट हाउस की दौड़ के लिए कागजी कार्रवाई पूरी की, वह आधिकारिक तौर पर राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी की घोषणा करने वाले रिपब्लिकन या डेमोक्रेट पक्ष से पहले उम्मीदवार बन गए। ट्रंप ने कहा कि अगर वे राष्ट्रपति होते तो यूक्रेन-रूस का युद्ध नहीं होता। ये बात डेमोक्रेट्स भी मानते हैं।

पूर्व राष्ट्रपति ने अपने फ़्लोरिडा के मार-ए-लागो एस्टेट में समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा, “अमेरिका की वापसी अभी से शुरू होती है।” अमेरिका के इतिहास में केवल एक ही ऐसे राष्ट्रपति ग्रोवर क्लीवलैंड थे, जिन्होंने राष्ट्रपति पद से हटने के बाद 1884 और 1892 में दोबारा राष्ट्रपति का पद ग्रहण किया था। 

ट्रंप ने अमेरिकी चुनाव प्राधिकरण के साथ 2024 के लिए अपने आधिकारिक कागजी कार्रवाई को पूरा करने से कुछ मिनट पहले कहा, ”अमेरिका को फिर से महान और गौरवशाली बनाने के लिए मैं आज रात संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति पद के लिए अपनी उम्मीदवारी की घोषणा कर रहा हूँ।”

राष्ट्रपति पद की दौड़ के लिए ट्रम्प की शुरुआती घोषणा को पार्टी का प्रतिनिधित्व करने वाले अन्य रिपब्लिकनों पर समर्थन हासिल करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। हाल के महीनों में ट्रंप राष्ट्रपति पद के लिए अपनी उम्मीदवारी का संकेत दे रहे थे। आयोवा में एक रैली को संबोधित करते हुए ट्रंप ने कहा था, ”मैं बहुत, बहुत संभव है कि दोबारा ऐसा (राष्ट्रपति पद का चुनाव) करूँगा।”

दो रिपब्लिकन गवर्नर फ्लोरिडा के रॉन डेसांटिस और वर्जीनिया के ग्लेन यंगकिन निकट भविष्य में पार्टी उम्मीदवार के रूप में उनकी स्थिति को चुनौती दे सकते हैं। अन्य संभावित रिपब्लिकन राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों में टेक्सास के गवर्नर ग्रेग एबॉट, दक्षिण कैरोलिना के पूर्व गवर्नर निक्की हेली और पूर्व विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ शामिल हैं।

बता दें कि ट्रंप 20 जनवरी 2017 से 20 जनवरी 2021 तक राष्ट्रपति थे। साल 2020 में उन्होंने राष्ट्रपति का चुनाव लड़ा था, लेकिन उन्हें जो बाइडन के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। ट्रंप के लिए ये चुनाव बेहद मुश्किल साबित हो सकता है कि क्योंकि बतौर राष्ट्रपति उन पर दो बार महाभियोग चल चुका है।