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रेवड़ी बाँटने वालों के पास शिक्षकों को वेतन देने के लिए पैसे नहीं, DUTA अध्यक्ष ने बताया- AAP सरकार ने प्रोफेसरों से लेकर कर्मचारियों तक की रोकी सैलरी

दिल्ली और पंजाब में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी की सरकारें अपने प्रचार पर करोड़ों रुपए खर्च करती हैं, लेकिन जब कर्मचारियों को वेतन देने की बात आती है तो हाथ खड़े कर देती है। दिल्ली सरकार द्वारा वित्त पोषित कॉलेजों के पास अपने कर्मचारियों को देने के लिए पैसे नहीं है। वहीं, पंजाब में AAP सरकार ने कर्मचारियों को अगस्त माह का वेतन एक सप्ताह देर से दिया।

दिल्ली विश्वविद्यालय के अंतर्गत आने वाले दीन दयाल उपाध्याय कॉलेज (DDU) आम आदमी पार्टी सरकार द्वारा फंडेड है। इस कॉलेज की हालत ये है कि इसके पास अपने शिक्षण कर्मचारियों का भुगतान करने के लिए बहुत कम पैसे बचे हैं। इस कारण से कर्मचारियों के वेतन के कुछ हिस्से को रोक लिया है।

इन कर्मचारियों को नोटिस देकर कॉलेज को कहना पड़ा कि वह सहायक प्रोफेसरों की नेट सैलेरी या टेक-होम राशि से 30,000 रुपए और एसोसिएट प्रोफेसरों एवं प्रोफेसरों की नेट सैलेरी से 50,000 रुपए रोक रहा है।

दीन दयाल उपाध्याय कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध एक कॉलेज है, जिसे 1990 में स्थापित किया गया था। इस कॉलेज की शत-प्रतिशत फंडिंग दिल्ली सरकार द्वारा की जाती है। हालाँकि, आम आदमी पार्टी की सरकार में अब इस कॉलेज को फंड की कमी से जूझना पड़ रहा है।

दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (DUTA) के अध्यक्ष प्रोफेसर अजय कुमार भागी ने ऑपइंडिया को बताया, “यह मामला सिर्फ दीन दयाल उपाध्याय कॉलेज का नहीं है। दिल्ली सरकार के अंतर्गत आने वाले 12 कॉलेजों को पिछले 5 सालों से ग्रांट देर से दी जारी है। अब पिछले 2 सालों से इनके ग्रांट में कटौती की जा रही है।”

प्रोफेसर भागी ने कहा कि मामला वेतन में ही नहीं, स्टाफ के पुराने एरियर, एलटीसी, मेडिकल, चाइल्स एजुकेशन आदि भी बकाया है और इनका भुगतान नहीं किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि फंड की कमी के कारण कॉलेजों की प्रशासनिक और भवनों के रख-रखाव पर भी असर पड़ रहा है।

उन्होंने बताया कि दिल्ली देहात के दो महत्वपूर्ण महिला कॉलेजों- अदिति महाविद्यालय और भगिनी निवेदिता कॉलेज की बिल्डिंग जर्जर हो चुकी है और वो गिरने की कगार पर पहुँच चुकी है। उन्होंने बताया कि फंड की कमी के कारण इन कॉलेजों में मूलभूत सुविधाओं का तक अभाव हो गया है।

प्रोफेसर भागी ने बताया कि इस संबंध में वे पुराने उप-राज्यपाल से लेकर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल तक मिल चुके हैं, धरना-प्रदर्शन कर चुके हैं, लेकिन कोई रिस्पॉन्स नहीं दे रहा है। उन्होंने बताया कि इस मामले को लेकर नए उप-राज्यपाल वीके सक्सेना से मुलाकात कर चुके हैं और उन्होंने दिल्ली सरकार से इस पर जवाब माँगा है।

प्रोफेसर भागी का कहना है कि दिल्ली सरकार फंड की कटौती कर इन कॉलेजों को Self Financing Model पर ले जा रही है और उन्हें विवश किया जा रहा है कि छात्रों की फीस में बढ़ोत्तरी कर कॉलेज के लिए फंड जुटाए।

प्रोफेसर भागी का कहना है कि दिल्ली सरकार के अंतर्गत आने वाले हायर एजुकेशन संस्थानों में ऐसा किया जा चुका है और अब कॉलेजों को इस दिशा में धकेला जा रहा है। उन्होंने कहा कि इससे आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों पर दबाव बढ़ेगा।

दिल्ली सरकार अक्सर दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था में सुधार की बात करती है, लेकिन हकीकत कुछ और है। यही हालात धीरे-धीरे पंजाब में होती जा रही है। पंजाब की आम आदमी पार्टी की सरकार ने अपने कर्मचारियों का वेतन देने में विलंब करने लगी है।

पंजाब सरकार ने बुधवार (7 सितंबर 2022) को अपने कर्मचारियों के अगस्त महीने का वेतन देने के लिए 3,400 करोड़ रुपए जारी किया। वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कहा कि सरकार ने 9,000 संविदा और तदर्थ कर्मचारियों को नियमित किया, इसलिए फंड जारी करने में देर हुई।

भाजपा नेता पूनावाला ने इसको लेकर ट्वीट किया, “आप सरकार के पास विज्ञापनों के लिए पैसा है, लेकिन पैसा नहीं है तो 1) पंजाब सरकार के पास कर्मचारियों का वेतन देने के लिए, 2) पंजाब में गरीबों का मुफ्त इलाज देने वाले अस्पतालों का पैसा रिमबर्स करने के लिए, 3) दिल्ली के डीडीयू कॉलेज के शिक्षकों के वेतन देने के लिए, 4) पदक जीतने वाले और भारत को गौरवान्वित करने वाले एथलीटों के लिए।”

‘कमजोर कहानी, घटिया स्क्रिप्ट’: ‘ब्रह्मास्त्र’ को समीक्षकों के साथ-साथ दर्शकों ने भी नकारा, कहा – ये ‘Big Beef Guy’ की डिजास्टर मूवी

बॉलीवुड अभिनेता रणबीर कपूर (Ranbir Kapoor) और आलिया भट्ट (Alia Bhatt) की फिल्म ब्रह्मास्त्र (Brahmastra) शुक्रवार (9 सितंबर, 2022) को सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। इस फिल्म को समीक्षकों के साथ-साथ दर्शकों से भी नकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है। ट्रेंड एनालिस्ट तरण आदर्श ने ट्वीट कर फिल्म को 5 में से 2 स्टार देते हुए निराशाजनक बताया है। उन्होंने लिखा, “ब्रह्मास्त्र ने निराश किया है। वीएफएक्स का ज्यादा प्रयोग और कमजोर कहानी फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुई। फिल्म में कोई नयापन नहीं दिखा।”

इसके अलावा सोशल मीडिया पर भी लोगों ने इस फिल्म का जमकर मजाक उड़ाया है। उन्होंने बॉलीवुड की तुलना साउथ सिनेमा से करते हुए उनके कंटेंट और कलाकारों पर सवाल उठाया है। एक यूजर ने लिखा, “साउथ सिनेमा हमेशा इंटरेस्टिंग कॉन्सेप्ट चुनता है और फिल्म की कहानी लिखने में कड़ी मेहनत करता है। वहीं बॉलीवुड में अच्छी स्क्रिप्ट और मेहनत की कमी दिखती है। उन्हें इसकी कोई परवाह नहीं है। वह केवल अपने स्टारकास्ट और उनके प्रमोशन पर निर्भर रहता है। इसी कारण ये लोग असफल हो रहे हैं, जो बेहद निराश करता है।”

उमर संधु नाम के एक यूजर ने फिल्म का मजाक उड़ाते हुए इसे 5 में से 2.5 स्टार दिया है। उन्होंने लिखा, “ब्रह्मास्त्र सितारों से लेकर बजट, हर लिहाज से एक बड़ी फिल्म थी। बड़े सितारे, बड़े कैनवास, विज्ञापनों और एसएफएक्स पर बड़ा खर्च करने के बाद फिल्म से बड़ी उम्मीदें थीं। अफसोस कि यह उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई।”

फिल्म क्रिटिक सुमित कादेल ने इस फिल्म के स्क्रीनप्ले को 5 में मात्र 2.5 रेटिंग दी। वहीं, एक यूजर ने फिल्म, स्टार कास्ट और निर्देशक का मजाक उड़ाते हुए लिखा, “ऐसा तब होता है जब आप ‘ये जवानी है दीवानी’ के निर्देशक, लेखक, डायलॉग राइटर, अभिनेता को पुराणों और सनातन धर्म पर आधारित फिल्म बनाने के लिए चुनते हैं। ‘बिग बीफ लवर’ आदमी का ‘बदतमीज दिल’ यहाँ काम नहीं करेगा। डिजास्टर। अब कम से कम अपना दिमाग तो बचाइए और इससे दूर रहिए।”

बता दें कि अयान मुखर्जी के निर्देशन में बनने वाली फिल्म में अमिताभ बच्चन, नागार्जुन और मौनी राय भी मुख्य भूमिका में हैं।

₹14 लाख नकद, 32 महँगी घड़ी, 9 लक्जरी कार: अरबपति पादरी PC सिंह के घर पर छापा, करोड़ों की गड़बड़ी का आरोप, बच्चों की स्कूल फीस से मिशनरी गतिविधि

मध्य प्रदेश के जबलपुर में एक ईसाई पादरी के घर पर ‘आर्थिक अपराध शाखा (EOW)’ ने छापेमारी की है। बिशप का नाम पीसी सिंह है। बताया जा रहा है कि इस दौरान तमाम नामी और बेनामी संपत्ति का खुलासा है। जानकारी के मुताबिक, कुछ ही समय पहले धर्म परिवर्तन करने वाला बिशप पीसी सिंह बेहद कम समय में अरबपति बन गया था। छापेमारी गुरुवार (8 सितम्बर, 2022) को हुई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बिशप पर बच्चों की स्कूल की फीस धार्मिक संस्थाओं पर खर्च करने का आरोप है। इसी के साथ बिशप लक्जरी लाइफ का शौक़ीन बताया जा रहा है। बताया जा रहा है कि पीसी सिंह के यहाँ से 18 हजार डॉलर, 32 महँगी घड़ियाँ, 9 लक्जरी कारें, मूलयवान कपड़े, सोने के जेवर और कैश बरामद हुआ है। छापेमारी के दौरान बिशप EOW टीम को नहीं मिला। परिजनों ने उसके जर्मनी में होने की जानकारी दी। पी सी सिंह ‘द बोर्ड ऑफ एजुकेशन चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया’ का चेयरमैन भी है।

इस छापेमारी की जानकारी देते हुए EOW के SP देवेंद्र प्रताप सिंह ने बताया कि उन्हें ‘द बोर्ड ऑफ एजुकेशन चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया’ में होने वाली वित्तीय अनियमितता की शिकायत साल 2015 में ही मिली थी। देवेंद्र प्रताप के मुताबिक, इस शिकायत की जाँच DSP मंजीत सिंह से करवाई गई तो पाया गया कि साल 2003 से 2011 तक 2 करोड़ 70 लाख रुपए ट्रांसफर हुए हैं। SP ने बताया कि इस मामले में FIR दर्ज की गई है। इसी के साथ देवेंद्र सिंह ने यह भी कहा कि कुछ अन्य थानों में आरोपित के खिलाफ केस दर्ज मिले हैं।

छापेमारी के वायरल हो रहे विजुअल में नोट गिनने वाली मशीनें दिखाई दे रहीं हैं। इसी के साथ आर्थिक अपराध शाखा के अधिकारी भी मौके पर दिख रहे हैं। मिली जानकारी के मुताबिक, पीसी सिंह के 2 स्कूल और अलग-अलग जगहों पर 3 मकान हैं। बिशप का बेटा पियूष पॉल क्राइस्ट चर्च बॉयज स्कूल का प्रिंसिपल है। बिशप पी सी सिंह क्लास 12 के बाद धर्मांतरित हुआ था। उसकी मज़हबी शिक्षा दिल्ली में हुई थी।

दिल्ली से लौट कर उसने लगभग 5 वर्षों तक जबलपुर के एक चर्च में बतौर पादरी काम किया। इसके बाद उसे बिशप की पदवी दे दी गई। आरोप है कि बिशप बन जाने के बाद उनकी संपत्ति में तेजी से इजाफा हुआ।

पैगंबर मुहम्मद की वंशज थीं महारानी एलिजाबेथ, निधन के बाद वायरल है पोस्ट: मीडिया में छपी खबर का जानें पूरा सच

ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय (Queen Elizabeth II) का गुरुवार (8 सितंबर, 2022) को 96 साल की उम्र में निधन हो गया। इसी बीच एक ट्वीट खूब वायरल हो रहा है। इसमें दावा किया जा रहा गया है कि एलिजाबेथ द्वितीय इस्लाम के संस्थापक मोहम्मद पैगंबर (Prophet Muhammad) की वंशज हैं।

यह हालाँकि पहली बार नहीं है, जब इस तरह के दावे किए जा रहे हों। साल 2018 में भी इस तरह का दावा करते हुए एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई थी। ब्रिटिश पत्रकार एरॉन मेरेट के ट्वीट में शामिल ग्राफिक को पहले ब्रिटेन के अखबार द टाइम्स ने 2018 में छापा था। इसके बाद उसी साल टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने भी इसी तरह की एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी।

एलिजाबेथ पैगंबर मुहम्मद की वंशज: दावे और रिपोर्ट

मार्च 2018 में मोरक्कन अखबार अल-ओस्बो (Al-Ousboue) में यह दावा किया गया था कि महारानी के मुहम्मद की बेटी फातिमा से सम्बंध हैं और वह पैगंबर की 43वीं वंशज हैं। TOI ने भी मोरक्को की रिपोर्ट का हवाला देते हुए लिखा था कि ब्रिटेन की महारानी पैगंबर की 43वीं वंशज हैं।

दरअसल, साल 1986 में शाही वंश पर अध्ययन करने वाली संस्था बर्क्स पीरगे के पब्लिशिंग डायरेक्टर हैरल्ड बी ब्रूक्स बेकर ने यह दावा किया था। इसके बाद मोरक्को के एक अखबार ने अपने आर्टिकल में ऐसा ही दावा किया था।

दावा किया जा रहा है कि एलिजाबेथ द्वितीय की ब्‍लडलाइन 14वीं सदी के अर्ल ऑफ कैंब्रिज से है और यह मध्‍यकालीन इस्लामी स्‍पेन से लेकर पैगंबर मोहम्मद की बेटी फातिमा तक जाती है। फातिमा हजरत मोहम्मद की बेटी थीं और उनके वंशज स्पेन के राजा थे, जिनसे महारानी का संबंध बताया जा रहा है। इसी वजह से, महारानी को मोहम्मद का वंशज कहा जा रहा है।

एलिजाबेथ और पैगंबर मुहम्मद के रिश्ते का फैक्ट चेक

दावों और रिपोर्टों से परे है सच्चाई। कैसे? 2018 में इस विषय पर द टाइम्स से बात करते हुए अंग्रेजी इतिहासकार और टेलीविजन पर्सनेल्टी डेविड स्टार्की ने कहा था कि एलिजाबेथ को पैगंबर मुहम्मद के वंश से जोड़ा गया। हालाँकि, इसे इतिहासकारों द्वारा सत्यापित नहीं किया गया था और न ही पूरी तरह से स्वीकार किया गया था।

तत्कालीन ब्रिटिश प्रधान मंत्री मार्गरेट थैचर को लिखे एक पत्र में, ब्रूक्स बेकर ने दावा किया था कि पैगंबर मुहम्मद का खून महारानी एलिजाबेथ द्वितीय की रगो में बहता है। उनके अनुसार महारानी मुस्लिम राजकुमारी जैदा के परिवार से हैं।

आपको बता दें कि कथित तौर पर, अबू अल-कासिम मुहम्मद इब्न अब्बाद, पैगंबर मुहम्मद के वंशज सेविले की जैदा के परदादा थे। अलमोराविद्स ने जब अब्बासी सल्तनत पर हमला किया तो जैदा अपनी जान बचाने के लिए स्पेन के राजा किंग अल्फोंसो छठे के दरबार में पहुँच गई थीं। वहाँ उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया और राजा से शादी करके अपना नाम इसाबेला रख लिया। राजा से उनको एक लड़का पैदा हुआ जिनका नाम सांचा था। थर्ड अर्ल ऑफ कैंब्रिज रिचर्ड ऑफ कौन्सबर्ग सांचा के वंशज थे, जो इंग्लैंड के किंग एडवर्ड तृतीय के पोते थे। बाद में उन्होंने यॉर्क के ड्यूक रिचर्ड प्लांटैजेनेट को जन्म दिया, जिन्हें आमतौर पर रानी का पूर्वज माना जाता है।

सबसे बड़ी बात – इन दावों को लेकर बकिंघम पैलेस ने कभी भी कोई जवाब नहीं दिया है।

बाबू खान ने किया दलित नाबालिग का अपहरण और बलात्कार, आरोप – पुलिस ने पीड़िता और परिजनों को लात-घूँसों से पता: 3 निलंबित

मध्य प्रदेश के छतरपुर में 13 साल की नाबालिग दलित लड़की से हुए रेप के मामले में कार्रवाई में लापरवाही बरतने के आरोप में 3 पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर दिया गया है। इन पुलिस वालों पर पीड़िता के ऊपर आरोपित से समझौते का दबाव बनाने का आरोप है। नाबालिग दलित लड़की से रेप के आरोपित का नाम बाबू खान है जिसे गिरफ्तार कर लिया गया है। बाबू खान पर 27 अगस्त को पीड़िता के अपहरण का आरोप लगा था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 27 अगस्त को पीड़िता दोपहर लगभग 1 बजे अपने घर से लापता हो गई थी। लड़की के परिजनों को इस कृत्य के पीछे पास के ही रहने वाले बाबू खान के होने की जानकारी मिली। आरोप है कि जब अगले दिन 28 अगस्त, 2022 को जब पीड़िता के घर वाले पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाने पहुँचे तो कि उनकी शिकायत में जबरन लड़की की उम्र 18 साल लिखवाई गई। पीड़िता 30 अगस्त को बरामद कर ली गई। लड़की ने भी अपने बयान में बाबू खान पर खुद के अपहरण और रेप का आरोप लगाया।

पीड़िता के परिजनों के मुताबिक, बेटी की गुमशुदगी के दौरान 2 महिला पुलिसकर्मियों ने उन लोगों पर बयान बदलने का दबाव बनाया। दावा किया गया है कि जब पीड़ित के घर वालों ने ऐसा करने से मना कर दिया तो उन्हें थप्पड़ों से मारा गया। बताया ये भी जा रहा है कि बयान बदलने का दबाव डालने के लिए खुद रेप पीड़िता को लात-घूँसों और बेल्टों से मारा गया। आरोप है कि जब पुलिसकर्मी पीड़िता और उसके घर वालों को समझौते के लिए नहीं तैयार कर पाए तब उन्होंने कार्रवाई न करने की बात कह कर पीड़ितों को थाने से भगा दिया।

पीड़ित दलित परिवार ने यह भी आरोप लगाया है कि पुलिस ने FIR में अपहरण की धाराएँ नहीं लगाई हैं। इस मामले की जानकारी होते ही CWC (बाल कल्याण समिति) ने प्रशासन से आरोपितों की जाँच और उन पर कड़ी कार्रवाई की माँग की। जिले के SP सचिन शर्मा ने बताया कि पीड़िता के साथ किसी भी प्रकार की मारपीट नहीं हुई है। कोतवाली प्रभारी के मुताबिक आरोपित पर पॉक्सो एक्ट और SC/ST एक्ट के तहत कार्रवाई की गई है।

कहीं महावीरी शोभा यात्रा पर पत्थरबाजी, कहीं मस्जिद से निकली भीड़ ने पुलिस को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा: बिहार के ‘सुशासन’ का कुछ ऐसा है हाल

बिहार के सीवान जिले में महावीरी अखाड़ा की शोभायात्रा में चल रहे श्रद्धालुओं पर पथराव किया गया है। इस घटना के बाद इलाके में तनाव फ़ैल गया। हालात सँभालने पहुँचे पुलिस बल पर भी पथराव की सूचना है। इस झड़प के चलते दोनों पक्षों के एक दर्जन लोग घायल हो गए हैं, जिनका इलाज चल रहा है। घटना में आधे दर्जन पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं। पुलिस द्वारा अब तक कुल 10 आरोपितों को हिरासत में लेने की सूचना है। घटना गुरुवार (8 सितम्बर, 2022) की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मामला बड़हरिया थानाक्षेत्र का है। घटना के दिन यहाँ पुरानी बाजार इलाके में महावीरी शोभा यात्रा निकली थी। जब यह यात्रा मस्जिद के सामने से गुजरी तब किसी बात को ले कर मुस्लिम पक्ष से शोभा यात्रा में शामिल लोगों का विवाद हो गया। आरोप है कि इसके बाद कुछ लोग मस्जिद पर चढ़ कर पत्थरबाजी करने लगे। इस पथराव से अफरातरफी मच गई और कुछ लोग घायल हो गए। इस हमले के वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं।

बताया जा रहा है कि हमले के जवाब में शोभायात्रा में शामिल लोगों ने भी खुद का बचाव करने के लिए पत्थर फेंके। इसी बीच पान की एक गुमटी को आग के हवाले कर दिया गया। मौके पर मौजूद पुलिस बल ने हालात काबू करने की कोशिश की तो उपद्रवियों ने उन पर भी पत्थर फेंके। इस पत्थरबाजी के चलते 2 पुलिसकर्मियों के सिर फट गए। अब तक पुलिस द्वारा दोनों पक्षों के कुल 10 आरोपित हिरासत में लेने की सूचना है जिनसे पूछताछ की जा रही है।

बड़हरिया थाने के प्रभारी प्रभाकर के मुताबिक, पथराव और आगजनी की घटना में शामिल लोगों की शिनाख्त करवाई जा रही है। उन्होंने कहा कि हमले के दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

पटना में भी पुलिस पर हमला

वहीं एक अन्य घटनाक्रम में बिहार की राजधानी पटना में पुलिस पर हमले की खबर है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस हमले में पुलिस वालों को भागना पड़ा लेकिन हमलावरों ने उनका पीछा कर के पिटाई की। मामला पीर बहोर थानाक्षेत्र का है। यहाँ शिया मस्जिद के पास हथियारों से लैस 4 संदिग्धों की सूचना पर पुलिस ने दबिश दी थी। आरोपितों की तलाशी के दौरान आस-पास की भीड़ ने पुलिस पर हमला बोल कर संदिग्धों को छुड़ा लिया।

बाद में भीड़ ने थाने पर पहुँच कर हंगामा भी किया। इस मामले में पुलिस ने अज्ञात आरोपितों पर FIR दर्ज की है, जिसमें पुलिस पर हमले और सरकारी कार्यों में बाधा डालने की धाराएँ लगाई गईं है। थाना प्रभारी के मुताबिक घायल कांस्टेबल सुभाष का इलाज करवाया जा रहा है। आरोपितों की पहचान वीडियो और CCTV फुटेज के आधार पर करवाई जा रही है।

क्वीन एलिजाबेथ की शादी में आड़बंद (लंगोट) पर ‘जय हिंद’ लिख कर दिया था मोहनदास करमचंद गाँधी ने… वो भी खुद से बुन कर?

ब्रिटेन की क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय (Queen Elizabeth II) अब इस दुनिया में नहीं रहीं। 8 सितंबर 2022 को उन्होंने 96 साल की उम्र में अंतिम सांस ली। क्वीन एलिजाबेथ के निधन के बाद दुनिया भर के नेताओं ने उन्हें याद किया, श्रद्धांजलि दी। भारत की ओर से राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, पीएम मोदी से लेकर राहुल गाँधी जैसे नेताओं ने भी उन्हें याद किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय (Queen Elizabeth II) को याद करते हुए ट्वीट किया। इस ट्वीट में फोटो के तौर पर कुछ यादें थीं और एक रुमाल का जिक्र किया गया है। रुमाल जो क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय को उनकी शादी पर मोहनदास करमचंद गाँधी ने गिफ्ट के तौर पर दिया था।

रुमाल या आड़बंद (लंगोट)

पीएम मोदी ने जिस रुमाल का जिक्र किया है, उसको लेकर कुछ विवाद है। विवाद इसलिए क्योंकि क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय (Queen Elizabeth II) ने भले ही उसे रुमाल बोल कर या मोहनदास करमचंद गाँधी से नाम जोड़ कर उसका जिक्र किया हो लेकिन वास्तव में उनकी शादी के समय क्या हुआ था, प्रेस में क्या छपा था… यह उनके दावे को नकारता है।

The Telegraph में एक खबर छपी थी – 2007 में। शीर्षक था – The missing pearls and Gandhi’s loincloth (गायब हुए मोती और गाँधी की लंगोट)। लिखने वाली का नाम था – Lady Pamela Hicks.

पामेला हिक्स कोई साधारण महिला नहीं थी। वो भारत के अंतिम वायसराय और पहले गवर्नर जेनरल लुइस माउंटबेटन और एडविना माउंटबेटन की बेटी थी। एक तरह से पामेला हिक्स ने क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय (Queen Elizabeth II) की शादी की आत्मकथा लिखी थी। उन्होंने ही इस लेख के माध्यम से खुलासा किया गाँधी का दिया हुआ रुमाल दरअसल लंगोट समझा गया था।

क्वीन एलिजाबेथ की शादी, गाँधी का गिफ्ट और अंग्रेजी मानसिकता

मोहनदास करमचंद गाँधी ने जितनी आत्मीयता से खुद अपने चरखे पर बुन कर जो कपड़ा गिफ्ट में दिया था, उसे loincloth समझा गया, सबसे ज्यादा असभ्य समझा गया। एक रिपोर्ट में तो यहाँ तक लिखा गया है कि उस गिफ्ट को अश्लील तक समझा गया था। मतलब उस समय भले हम आजाद हो गए थे लेकिन अंग्रेजों की मानसिकता हमें गुलाम समझने भर से अधिक की नहीं थी… बावजूद हम उनकी शादी में गिफ्ट दिए जाने के लिए बिछे जा रहे थे!

JAI HIND लिखा वो कपड़ा, जिसे समझा गया लंगोट (साभार: GETTY)

आखिर मतलब क्या होता है loincloth का? डिक्शनरी जो कहती है, उसे देखते हैं:

A loincloth is a one-piece garment, either wrapped around itself or kept in place by a belt. It covers the genitals and, at least partially, the buttocks.

हिंदी में इसे मोटा-मोटी आप लंगोट कह सकते हैं। कुछ जगहों पर इसे लंगोटी, लंगोटा और कटि-वस्त्र से लेकर आड़बंद, आड़बन तक कहते हैं। इस विवाद से हटते हैं और वर्तमान में आते हैं। 8 सितंबर 2022 को जब क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय (Queen Elizabeth II) अंतिम सांस ले रही थीं, उसी समय राजपथ (Kingsway) वाली गुलामी की मानसिकता को हम अपने देश से मिटा रहे थे।

गणपति की मूर्ति का विसर्जन संजय गाँधी नेशनल पार्क में नहीं किया जाए: बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा – उल्लंघन करने वालों पर हो उचित कार्रवाई

बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) ने महाराष्ट्र सरकार के वन विभाग को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि संजय गाँधी नेशनल पार्क (SGNP, एसजीएनपी) में गणपति की मूर्ति का विसर्जन नहीं किया जाए। इस मामले में गुरुवार (8 सितंबर 2022) को बॉम्बे हाई कोर्ट में जस्टिस पीबी वराले और जस्टिस एसएम मोदक की पीठ ने सुनवाई की।

गणपति की मूर्ति का विसर्जन मामले को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि वन विभाग के अधिकारी उन लोगों के खिलाफ कानून के तहत उचित कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र हैं, जो मूर्तियों का विसर्जन करने के लिए नियमों का उल्लंघन करते हैं और संजय गाँधी नेशनल पार्क में प्रवेश करने की कोशिश करते हैं।

बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले के अनुसार, यदि वन विभाग इस मसले पर अतिरिक्त पुलिस बल की सहायता या पुलिस बल की तैनाती के लिए अनुरोध करता है तो पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी अनुरोध पर विचार करें और स्वयं उचित निर्णय लें।

संजय गाँधी नेशनल पार्क में गणपति विसर्जन का मामला

एक याचिकाकर्ता ने कुछ समाचारों के आधार पर अदालत का दरवाजा खटखटाया था, जिसमें दावा किया गया था कि मूर्तियों को संजय गाँधी नेशनल पार्क (एसजीएनपी) में विसर्जित किया जा सकता है। इसके साथ ही याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि इन लेखों को पढ़ने से आम आदमी को यही लगेगा कि वन अधिकारियों ने एसजीएनपी के अंदर स्थित जल निकायों में मूर्तियों को विसर्जित करने की अनुमति दी है।

याचिका में लोगों को संजय गाँधी नेशनल पार्क के भीतर स्थित जलाशयों में गणेश प्रतिमाओं को विसर्जित करने से रोकने का निर्देश देने की माँग की गई थी।

इस मामले पर महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश सरकारी वकील पूर्णिमा कंथारिया ने कहा कि याचिका यह साबित करने में विफल रही कि अनुमति दी गई थी। उन्होंने कहा कि पारिस्थितिकी और वन्य जीवों को नुकसान पहुँचाने वाली किसी भी गतिविधि को रोकने के लिए वन विभाग के अधिकारी काफी सतर्क हैं।

इस पर जस्टिस वराले ने कहा:

“अगर आप कह रहे हैं कि अनुमति नहीं दी है और किसी ने खुद ही ऐसा कहा है तो आप बयान देते कि अनुमति नहीं है। समाचारों से तो पता चलता है कि अनुमति दी गई है। एक आम आदमी को क्या जानना चाहिए? यह एक सीधा संकेत है कि अनुमति माँगी गई थी और इसे नेशनल पार्क में मूर्ति विसर्जन की अनुमति दे दी गई है।”

बॉम्बे हाई कोर्ट (Bombay High Court) ने सरकारी वकील कंथारिया को स्पष्ट रूप से बयान देने के लिए कहा कि विसर्जन के लिए ना तो लिखित अनुमति दी गई और ना ही मौखिक आश्वासन दिया गया। इसलिए वह एक आदेश जारी करेंगे कि समाचारों को अनुमति के रूप में नहीं माना जाए।

कोर्ट ने महाराष्ट्र राज्य सरकार को निर्देश दिया कि नेशनल पार्क के प्रवेश द्वार के पास एक कृत्रिम तालाब स्थापित किया जाए और राज्य सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों का पालन करने के लिए वन विभाग हर संभव कदम उठाए। बॉम्बे हाई कोर्ट की पीठ ने यह स्पष्ट किया कि समाचारों के कारण भ्रम पैदा हुआ है, जिसके कारण बड़ी संख्या में लोग मूर्ति विसर्जन के लिए आ सकते हैं। इसलिए, वन्यजीवों को नुकसान से बचाने के लिए राज्य को अतिरिक्त पुलिस बल तैनात करने की अनुमति दी गई है।

बॉम्बे हाई कोर्ट की पीठ ने साथ ही यह भी कहा, “यदि कुछ गलत बयान देकर जनता को गुमराह करने का कोई प्रयास किया जाता है तो राज्य सरकार कानून के प्रावधानों के तहत इस तरह की शरारत को रोकने के लिए उचित कदम उठा सकती है।” बता दें कि याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्रीनिवास पटवर्धन, एसआर नारगोलकर, केतन जोशी, अर्जुन कदम और सुदमन नारगोलकर पेश हुए थे।

मुहर्रम पर जो हिन्दू बाँटते थे मिठाई, एक दिन मुस्लिम भीड़ ने उनका नामोनिशान ही मिटा दिया: खिलाफत से उपजा कोहट का दंगा, फूँक डाले थे एक-एक हिन्दू-सिख के घर

भारतीय उपमहाद्वीप में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान जैसे इस्लामी मुल्क कभी हिन्दुओं के लिए स्वर्ग से भी बढ़ कर हुआ करते थे, लेकिन आज यही मुल्क हिन्दुओं-सिखों के लिए नर्क से भी बदतर हैं। आज हम चर्चा करने वाले हैं पकिस्तान के प्रांत खैबर पख्तूनख्वा में स्थित कोहट की, जहाँ सितंबर 1924 में हुए दंगों में हिन्दुओं को पूरी तरह से निकाल बाहर किया गया। कट्टर मुस्लिम भीड़ ने इस इलाके का इस्लामीकरण कर दिया।

जिसे आज कहते हैं खैबर पख्तूनख्वा, उसका अलग ही है इतिहास

खैबर पख्तूनख्वा के बारे में बता दें कि आज भले ही ये पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम इलाके में स्थित एक प्रांत हो, लेकिन कभी ये चन्द्रगुप्त मौर्य के साम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था। उससे पहले इसने सिकंदर के हमले को देखा था। भौगोलिक रूप से पाकिस्तान का ये सबसे छोटा प्रांत अफगानिस्तान से लगती उसकी सीमा पर स्थित है, जिसकी राजधानी पेशावर है। 1001 ईस्वी में महमूद गजनी का हाथों राजा जयपाल की हार के साथ ही इलाके में तुर्कों का अतिक्रमण शुरू हो गया था।

जयपाल ने खिन्न होकर आत्महत्या कर ली, लेकिन उसके बेटे आनंदपाल ने भी कई वर्षों तक इस्लामी फ़ौज को सिंधु पार करने से रोके रखा। 2017 की जनगणना में सामने आया था कि इस राज्य में हिन्दुओं की जनसंख्या मात्र 5392 है, जो राज्य की कुल जनसंख्या का मात्र 0.015% है। हालाँकि, पाकिस्तान के हिन्दू संगठनों की मानें तो इससे 4 गुना अधिक हिन्दू यहाँ रहते हैं। इस आँकड़े को ले लें फिर भी ये जनसंख्या नगण्य ही कहलाएगी।

कभी सिंधु घाटी सभ्यता के लिए कारोबार का रूट रहा खैबर पख्तूनख्वा महाभारत काल में गांधार साम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था। आज जो पेशावर है, वो तब पुरुषपुर हुआ करता था। ये क्षेत्र तब पुष्कलावती का हिस्सा हुआ करता था। विद्या अर्जन के लिए इस क्षेत्र का एक अलग ही महत्व था। ऋग्वेद के दशराज युद्ध में यहाँ की पख्त जनजाति राजा सुदास के साथ लड़ी थी। इस्लामीकरण का प्रभाव देखिए, आज वहाँ पख्त नहीं, पख्तून हैं और वो मुस्लिम हैं।

इस तरह हमने देखा कि वहाँ हिन्दुओं का दमन तुर्की आक्रमणों के साथ ही शुरू हो गया था। अंग्रेजों के समय में भारत में जिन्नावादी विचारधारा ने जब जोर पकड़ना शुरू किया तो जगह-जगह देंगे होने लगे। खलीफा से भारत का कुछ लेनादेना नहीं था, लेकिन खिलाफत आंदोलन को महात्मा गाँधी ने समर्थन दिया और जगह-जगह दंगे हुए। आज़ादी के समय तो बंगाल और पंजाब के दंगों में तो लाखों मौतें हुईं और इससे कई गुना अधिक लोगों को पलायन करना पड़ा।

कोहट दंगा: जानिए किसने इसके बारे में क्या लिखा है

ऐसा ही एक दंगा 9 सितंबर, 1924 को हुआ था, जिसमें हिन्दुओं को इस इलाके से पलायन के लिए मजबूर कर दिया गया। इन दंगों में हिन्दुओं और सिखों की हत्याएँ हुईं, उनके घर लूट लिए गए और कइयों का जबरन इस्लामी धर्मांतरण करा दिया गया। ऊपर से 1924 में ‘मुस्लिम लीग’ के बॉम्बे सत्र में मौलाना मोहम्मद अली जौहर (जो 1923 में कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष थे) एक प्रस्ताव लेकर आए कि हिंसा हिन्दुओं ने शुरू की थी और उन्होंने मुस्लिमों को भड़काया।

बाबासाहब भीमराव आंबेडकर ने भी लिखा है कि एक कविता को इस्लाम विरोधी बताते हुए मुस्लिम भीड़ ने कहर बरपाया और कोहट की पूरी की पूरी हिन्दू सिख जनसंख्या को ये जगह छोड़नी पड़ी। उन्होंने मृतकों और घायलों का आँकड़ा 155 दिया है। 9-11 सितंबर तक 3 दिन लगातार ये दंगा चला था। इतिहासकार आरसी मजूमदार ने भी लिखा है कि मुस्लिम बहुल इलाके में हिन्दुओं की सारी दुकानों को लूट कर जला दिया गया।

इसके बाद पूरे शहर में मुस्लिम भीड़ ने कहर बरपाना शुरू कर दिया और हिन्दुओं के घरों को चुन-चुन कर आग के हवाले किया जाने लगा। कुछ हिन्दुओं ने आत्मरक्षा में फायरिंग की, लेकिन इसे भी भड़काऊ मान कर तबाही मचाना जारी रखा गया। 9 तारीख़ को सुबह से ही ये सब शुरू हुआ और दोपहर तक हिन्दुओं के घर और दुकानें धू-धू कर जल रहे थे। अंग्रेज अधिकारी भी मुस्लिम भीड़ को रोकने में नाकाम हुए। हिन्दुओं को वहाँ से हटाया जाने लगा।

महात्मा गाँधी ने इस घटना की जाँच के लिए शौकत अली के नेतृत्व में जो समिति बनाई थी, उसने भी लिखा है कि कैसे मुस्लिमों को कुछ नहीं सूझ रहा था और हिन्दुओं को बचा कर कैंटोनमेंट में नहीं लाया जाता तो कोई ज़िंदा नहीं बचता। जिन लोगों को खिलाफत आंदोलन के लिए नियुक्त किया गया था, उन्होंने भी मुस्लिम भीड़ के साथ हिन्दुओं पर क्रूरता में कोई कसर नहीं छोड़ी। कोहट में आसपास के इलाकों से भी हजारों की मुस्लिम भीड़ कहर बरपाने के लिए जमा हुई थी।

1921 की जनगणना की बात करें तो कोहट में मुस्लिमों की जनसंख्या 12,000 थी, वहीं इलाके में हिन्दू आधे से भी कम, 5000 थे। कारोबारों में हिन्दुओं का प्रभाव था और वो समृद्ध थे। इनमें से कई ‘आर्य समाज’ और ‘सनातन धर्म सभा’ के अनुयायी थे। एक तालाब को लेकर झगड़े को हिन्दू-मुस्लिम एंगल दिया गया। एक सरदार और एक मुस्लिम लड़की प्रेम में पड़ने के बाद साथ भाग गए, जिसके बाद मुस्लिम नेताओं ने भड़काऊ भाषण दिए। इस तरह हर घटना को सांप्रदायिक रंग देकर हिन्दुओं को वहाँ से भगाने की साजिश लंबे समय से चल रही थी।

मुस्लिम पत्रिका में गीता जलाने की बातें, हिन्दुओं ने जवाब दिया तो हुए दंगे

ये सारा मामला शुरू हुआ एक इस्लामी पत्रिका ‘लाहौल’ द्वारा छपी गई एक कविता से, जिसमें श्रीमद्भगवद्गीता को जलाने और भगवान श्रीकृष्ण की बाँसुरी को तोड़ डालने की बात की गई थी। इसमें मुस्लिमों को भड़काया गया था कि वो तलवार उठा कर हिन्दुओं पर टूट पड़ें और उनके अस्तित्व को मिटा कर उनकी देवियों को जला डालें। इसका जवाब देते हुए ‘सनातन धर्म सभा’ के जीवन दास ने ‘कृष्ण सन्देश’ नामक एक पत्र छपवाया, जिसमें काबा की जगह विष्णु मंदिर बनवाने की बात की गई थी और मुस्लिमों को अपना नमाज वाला चादर लेकर अरब वापस जाने की सलाह दी गई थी।

ध्यान दीजिए, मुस्लिमों ने हिन्दुओं और हिन्दू देवी-देवताओं को लेकर जो भड़काऊ बातें की थी और नरसंहार के लिए उकसाया था, उसके जवाब में ये तो कुछ भी नहीं था। ऐसे 1000 पैंपलेट बाँटे गए, जिसके बाद मुल्ला-मौलवी उन पर कार्रवाई के लिए अंग्रेज अधिकारियों से मिले। जीवन दास को गिरफ्तार किया गया, लेकिन फिर उन्हें जमानत पर छोड़ दिया गया। हिन्दू समाज ने अपनी गलती मानी और माफ़ी भी माँग ली, लेकिन मुस्लिम समाज की माँग के हिसाब से उन्होंने पैंप्लेट्स को जलाया नहीं क्योंकि उन पर भगवान श्रीकृष्ण की तस्वीर थी।

मुस्लिमों की कविता और हिन्दू संगठन का जवाब, जिस पर भड़क गए कट्टरपंथी

इसके बाद मुल्ले-मौलवियों ने मस्जिदों का इस्तेमाल कर मुस्लिमों को भड़काना शुरू किया और उन्हें शरीयत का हवाला दिया। हाजी बहादुर मस्जिदों में मुस्लिमों ने खास खाई कि अपने मजहब को नहीं बचा सके तो अपनी बीवियों को तलाक दे देंगे। 8 सितंबर की रात से ही मुस्लिम भीड़ हथियारों के साथ सड़कों पर उतर आई थी। पहले मुस्लिम युवकों ने पत्थरबाजी शुरू की और सरदार माकन सिंह का घर जला डाला, जिनके बेटे के साथ मुस्लिम लड़की भागी थी।

आत्मरक्षा में हिंदुओं की तरफ से गोली चली, जिसमें एक पत्थरबाज की मौत के बाद तो जैसे मुस्लिम भीड़ को हिन्दुओं को निशाना बनाने का बहाना मिल गया। उस दिन रात को पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर कर दिया, लेकिन अगले दिन 4000 की संख्या में मुस्लिम जुटे और पूरे हिन्दू मोहल्ले में आग लगा दी। एक सप्ताह तक उस आग को ठंडा होने में लग गए। 12 हिन्दू मार डाले गए और 13 गायब थे, जिनकी हत्या ही की गई थी।

महात्मा गाँधी ने उपवास कर के कर ली इतिश्री, मुहर्रम पर मिठाई बाँटते थे हिन्दू

अंग्रेजों को ऐसी घटनाओं से लाभ ही होता था और वो मुस्लिमों को अपनी तरफ ही मानते थे। इधर महात्मा गाँधी हमेशा की तरह उपवास पर बैठ गए और 21 दिन उपवास पर रहे, लेकिन उनके मन में भी ये बात थी कि वो हिन्दू-मुस्लिम एकता की लाख बातें कर के और खिलाफत का समर्थन कर के भी मुस्लिमों में सहिष्णुता नहीं पैदा कर पाए। कई मंदिरों को भी तोड़ा गया था और मूर्तियों को खंडित कर दिया गया था। दिसंबर 1924 में रावलपिंडी में गाँधी कोहट के हिन्दुओं से मिले और कहा कि जब तक मुस्लिम उन्हें ससम्मान वापस नहीं ले जाते, वो न लौटें। वहीं मुस्लिमों ने शौकत अली से मिलने से इनकार कर दिया।

ये दंगा उस इलाके में हुआ, जहाँ कभी मुहर्रम जैसे त्योहारों पर हिन्दू लोग मुस्लिमों के बीच मिठाई तक बाँटा करते थे। लेकिन, खिलाफत आंदोलन के कारण उलेमा-मौलवी मजबूत हो रहे थे और हिन्दुओं के बीच भी उनके प्रतिकार के लिए राष्ट्रवाद की भावना जागृत हो रही थी। मुस्लिम त्योहार बारावफात और सनातन त्योहार होली एक साथ पड़ने पर भी 1909 में भी कोहट में दंगे हुए थे। इस तरह सितंबर 1924 की पटकथा पहले से ही लिखी जा रही थी। इस्लाम में धर्मांतरण बढ़ता जा रहा था, इसीलिए हिन्दुओं में आक्रोश भी था।

कोहट दंगे का परिणाम ये हुआ कि बचने के लिए 3000 हिन्दुओं को एक बड़े मंदिर परिसर में शरण लेनी पड़ी। पुलिस आत्मरक्षा कर रहे हिन्दुओं से निपटने में ज्यादा सक्रिय थी, मुस्लिम भीड़ को लेकर कम। जिन हिन्दुओं ने घर छोड़ने से इनकार कर दिया, उन्हें मार डाला गया। जनवरी 1925 के बाद से सरकार के काफी प्रयासों के बाद एकाध हिन्दू वापस लौटने शुरू हुए। हिन्दू और मुस्लिम नेताओं के बीच एक समझौता हुआ, लेकिन अब इसका क्या फायदा था जब हिन्दुओं को निकाल बाहर ही किया गया था।

निहंगों ने तलवार से हमला कर युवक को मार डाला, देखती रही आसपास खड़ी भीड़: स्वर्ण मंदिर के पास तंबाकू चबाने का आरोप

पंजाब के अमृतसर से हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। यहाँ के एक व्यक्ति को बस इसलिए काट दिया गया, क्योंकि उसने एक निहंग की पगड़ी पर हाथ डाला था। युवक का नाम हरमनजीत सिंह बताया जा रहा है। बताया जा रहा है कि वो शराब के नशे में था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमृतसर में बुधवार (7 सितंबर, 2022) की रात गोल्डन टेंपल की तरफ जाने वाले रास्ते में हरमनजीत सिंह का दो निहंगों के साथ झगड़ा हो गया। झगड़े में एक निहंग सिख की पगड़ी (दस्तार) उतर गई और गुस्से में दो निहंगों और एक सिख युवक ने मिलकर युवक पर तलवार से हमला कर दिया। घटना में बुरी तरह घायल हरमनजीत की मौत हो गई।

दोनों निहंग सिखों का नाम चरणजीत सिंह और तरुणदीप सिंह बताया जा रहा है। वहीं इस पूरे घटनाक्रम में हमला करने वाले निहंगों के साथ में एक अन्य तीसरा व्यक्ति भी था। पुलिस ने उस तीसरे युवक को गिरफ्तार भी कर लिया है। गौर करने वाली बात यह भी है कि जब ये तीनों लोग युवक पर धारदार हथियार से हमला कर रहे थे, तब आस-पास खड़ी भीड़ में से किसी ने भी रोकने का प्रयास तक नहीं किया।

मृतक तरनतारन रोड हरमनजीत सिंह चाटीविंड निवासी था। इस मामले में पुलिस में जानकारी दी है कि सीसीटीवी फुटेज को कब्जे में ले लिया गया है। पुलिस का कहना है कि निहंगों की पहचान की जा रही है और जल्द ही आरोपितों को पकड़ लिया जाएगा। पुलिस के अनुसार, निहंगों का यह कहना है कि वह व्यक्ति नशे की हालत गली में घूम रहा था और उसने इस पवित्र जगह पर तंबाकू चबाने का अपराध किया।

निहंगों के मुताबिक, इसी बात पर उन्हें गुस्सा आया। मृतक के परिजनों का कहना है कि शाम के समय किसी का फोन आने के बाद वह घर से निकला था, मगर लौटा नहीं। बता दें घटना की जानकारी पुलिस को लगने के जब पुलिस मौके पर पहुँची तो हमलावर घटनास्थल से फरार हो गए थे। पुलिस कमिश्नर अरुणपाल सिंह ने बताया कि घटना के बाद एक युवक को गिरफ्तार किया है। युवक की पहचान रमनदीप सिंह के रूप में हुई है।