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लोगों के विरोध के बाद बदला गया फिल्म ‘सत्यनारायण की कथा’ का नाम, नए पोस्टर में दिखा नया नाम, साजिद नाडियावाला हैं निर्माता

कार्तिक आर्यन और कियारा आडवाणी की आने वाली फिल्म को लेकर मेकर्स डरे हुए हैं, क्योंकि फिल्म के नाम को लेकर हिन्दू समुदाय ने अपत्ति जताई थी। नाम पर बवाल को देखते हुए मेकर्स ने पहले ही फिल्म का नाम ‘सत्यनारायण की कथा’ से बदलकर ‘सत्यप्रेम की कथा’ कर दिया है। इस बात की जानकारी फिल्म के हीरो कार्तिक आर्यन ने खुद सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए शेयर दी है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, रविवार (31 जुलाई, 2022) को फिल्म की अभिनेत्री कियारा आडवाणी का जन्मदिन था। इस मौके पर कार्तिक आर्यन ने अपनी एक्ट्रेस को जन्मदिन की शुभकामना देते हुए एक बर्थडे पोस्ट शेयर किया। इसके साथ ही फिल्म का फर्स्ट लुक भी जारी कर दिया गया, जिसके कैप्शन में उन्होंने फिल्म के नए नाम की घोषणा की। फिल्म में कार्तिक के किरदार का नाम सत्यप्रेम तो कियारा का नाम कथा है।

वहीं यदि फिल्म के फर्स्ट लुक की बात करें तो मोशन पोस्टर में कार्तिक आर्यन और कियारा आडवाणी एक दूसरे को गले लगाते हुए नजर आ रहे हैं। वहीं बैकग्राउंड में मीठी सी धुन सुनाई दे रही है। पोस्ट को शेयर करते हुए कैप्शन में कार्तिक ने लिखा, “हैप्पी बर्थडे कथा । तुम्हारा सत्यप्रेम। सत्यप्रेम की कथा।”

जबकि कार्तिक की पोस्ट पर कियारा आडवाणी ने कमेंट करते हुए लिखा, “सेट पर मिलते हैं सत्तू।” वहीं, फिल्म के डायरेक्टर समीर विद्वांस ने कमेंट किया, “मेरे सत्यप्रेम और कथा।”

बता दें कि जब पहली बार फिल्म के नाम को लेकर प्रतिक्रिया आई तो तभी निर्देशक समीर विद्वांस ने एक बयान जारी कर कहा था कि उन्होंने फिल्म का शीर्षक बदलने का फैसला किया है। उन्होंने नाम बदलने का बचाव करते हुए कहा कि किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाने से बचने के लिए ऐसा किया गया है।

उन्होंने बयान में कहा था, “फिल्म का शीर्षक कुछ ऐसा है जो रचनात्मक प्रक्रिया के माध्यम से व्यवस्थित रूप से उभर कर आता है। हमने लोगों की भावनाओं को आहत करने से बचने के लिए अपनी हाल ही में घोषित फिल्म सत्यनारायण की कथा के शीर्षक को बदलने का निर्णय लिया है, भले ही वह पूरी तरह से अनजाने में ही क्यों न हुआ हो। फिल्म के निर्माता और रचनात्मक टीम भी इस निर्णय के पूर्ण समर्थन में हैं।”

गौरतलब है कि कार्तिक आर्यन और कियारा आडवाणी की फिल्म ‘सत्यप्रेम की कथा’ को नमः पिक्चर्स के साथ साजिद नाडियाडवाला प्रोड्यूस करेंगे। कार्तिक आर्यन और कियारा आडवाणी दूसरी बार स्क्रीन स्पेस शेयर करने जा रहे हैं। इससे पहले दोनों की फिल्म ‘भूल भुलैया 2’ इस साल मई में रिलीज हुई थी और करीब 185 करोड़ रुपये का बिजनेस किया था।

अस्पताल में शॉर्ट सर्किट से बड़ा हादसा, 10 लोगों की झुलस कर मौत: जो गए मरीजों को निकालने, वो भी नहीं आ सके बाहर

मध्य प्रदेश के जबलपुर में दमोहनाका स्थित न्यू लाइफ मेडिसिटी मल्टी स्पेशलिटी अस्पताल में सोमवार (1 अगस्त, 2022) दोपहर करीब पौने तीन बजे शॉर्ट सर्किट से आग लग गई, जिसमें 10 लोगों की मौत हो गई। मरने वालों में अस्‍पताल स्‍टाफ के तीन लोग भी शामिल हैं। अचानक भड़की आग में दर्जन भर से अधिक मरीज झुलस गए हैं। आग इतनी विकराल थी कि झुलसे लोगों की पहचान तक नहीं हो पा रही।

सीएम शि‍वराज सिंह चौहान ने मृतकों के परिजनों को 5-5 लाख रुपए और गंभीर रूप से घायलों को 50-50 हजार रुपए की सहायता प्रदान करने की घोषणा की है।

आग की वजह से हॉस्पिटल में अफरा-तफरी का माहौल हो गया। रिपोर्ट के मुताबिक, आग ग्राउंट फ्लोर पर शॉट सर्किट की वजह से लगी। जबलपुर के जिला कलेक्टर अल्लैया राजा के हवाले से ‘इंडिया टुडे’ ने बताया कि अब तक 10 लोगों के मौत की पुष्टि हुई है।

बताया जा रहा है कि दूसरे फ्लोर पर सबसे अधिक लोगों की मौत हुई है। घायलों को दूसरे अस्पताल में शिफ्ट किया गया है। आग लगने के बाद मरीजों को बचाने के दौरान कुछ लोग अंदर गए, जो बाहर नहीं निकल सके। लपटें इतनी तेज थी कि कमरे में फँसे लोगों को बाहर निकालना बेहद मुश्किल हो गया। कुछ लोगों को खिड़की और दरवाजे तोड़कर बाहर निकाला गया। इसको लेकर अभी तक अस्पताल प्रबंधन की तरफ से कोई सामने नहीं आया है।

बता दें कि आग लगने का कारण शॉर्ट सर्किट बताया जा रहा है। शार्ट सर्किट से लगी आग सीढ़ियों के पास रखे जनरेटर में भड़की, जिसके बाद आग ने विकराल रूप धारण कर लिया। लोग बचने के लिए इधर-उधर भागने लगे। निकलने के लिए एक ही गेट था। कुछ लोग सीढ़ियों में फँस गए। आग भड़कती गई और सीढ़ियों तक पहुँच गई, जिससे कुछ ही देर में तीन मंजिला बिल्डिंग जलकर पूरी तरह खाक हो गई।

जिले का DM कौन हो/न हो … मुस्लिम भीड़ कर रही तय: केरल में IAS श्रीराम वेंकटरमण की पोस्टिंग के खिलाफ हजारों मुस्लिम सड़क पर

केरल में एक आईएएस ऑफिसर की नियुक्ति के विरोध में हजारों मुस्लिमों ने मार्च निकालते हुए नियुक्ति रद्द करने की माँग की। यह प्रदर्शन सुन्नी समूह से जुड़े कई मुस्लिम संगठनों ने आयोजित किया था। दरअसल, ये लोग केएम बशीर नाम के पत्रकार की मौत के आरोपित श्रीराम वेंकटरमण की अलाप्पुझा जिला कलेक्टर के रूप में नियुक्ति के खिलाफ शनिवार, 30 जुलाई, 2022 को तिरुवनंतपुरम में राज्य सचिवालय और सभी जिला कलेक्ट्रेट के सामने विरोध मार्च निकाला।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रदर्शन में सुन्नी युवजन संघम और सुन्नी स्टूडेंट्स फेडरेशन ने केरल मुस्लिम जमात द्वारा आयोजित विरोध प्रदर्शन में भाग लिया। उन्होंने माँग की है कि श्रीराम की नियुक्ति रद्द की जाए।

वहीं यह भी कहा जा रहा है कि मुस्लिम समूह ब्राह्मण आईएएस के नियुक्ति का विरोध कर रहे हैं। वीडियो में मुस्लिमों की एक बड़ी भीड़ को नारे लगते और प्रदर्शन करते देखा जा सकता है।

इस मामले में जहाँ माकपा के नेतृत्व वाली वाम लोकतांत्रिक मोर्चे की सरकार के फैसले के मुस्लिम संगठन खिलाफ हैं। वहीं मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने आईएएस ऑफिसर की नियुक्ति का बचाव किया है। आईएएस ऑफिसर श्रीराम वेंकटरमन की अलाप्पुझा जिला कलेक्टर के रूप में नियुक्ति को सही ठहराते हुए बचाव किया।

वहीं महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल सहित कॉन्ग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने भी श्रीराम वेंकटरमन को अलाप्पुझा जिला कलेक्टर नियुक्त करने के केरल सरकार के फैसले की निंदा की है। अलाप्पुझा की जिला कॉन्ग्रेस कमिटी ने भी सोमवार 25 जुलाई को जिला कलेक्ट्रेट में विरोध प्रदर्शन किया।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, कॉन्ग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने कहा कि कलेक्टर को लोगों के साथ खड़ा होना चाहिए और यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि गंभीर आरोपों का सामना कर रहे वेंकटरमण जैसे व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त किया गया। उन्होंने कहा, “सरकार को एक ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति करनी चाहिए थी जो अलाप्पुझा में गरीबों की समस्याओं को समझ सके।” उन्होंने कहा कि एक दुर्घटना में एक निर्दोष व्यक्ति की मौत के आरोपित व्यक्ति को यह पद दिया गया है।

केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट्स (KUWJ) ने भी सोमवार को राज्य सरकार से इस फैसले को वापस लेने की माँग करते हुए विरोध प्रदर्शन किया था। बता दें कि सरकार द्वारा अलाप्पुझा में उनके स्थानांतरण का आदेश देने से पहले वेंकटरमन केरल चिकित्सा सेवा निगम के प्रबंध निदेशक के रूप में कार्यरत थे।

गौरतलब है कि 3 अगस्त, 2019 को तिरुवनंतपुरम में पत्रकार के एम बशीर की मौत के मामले में वेंकटरमण पहला आरोपित हैं। घटना के समय बशीर तिरुवनंतपुरम में सिराज दैनिक का कर्मचारी था।

नाचो-गाओ, देह दिखाओ… सब मजहब को कबूल; लेकिन मंदिर जाना-फरमानी नाज का ‘हर-हर शंभू’ गाना गैर मजहबी: एक इस्लाम के दो पैमाने क्यों

सावन के महीने में शिव शंभू का गाना गाकर यूट्यूब से लेकर हर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर फिर से छा जाने वाली फरमानी नाज को कट्टरपंथियों की नफरत झेलनी पड़ रही है। गंदी-गंदी गालियों के अलावा उन्हें इस्लाम का ज्ञान दिया जा रहा है। मजहबी उलेमा उन्हें ये बता रहे हैं कि कैसे उनका ‘हर हर शंभू’ गाना इस्लाम के खिलाफ है।

हैरानी इस बात की है कि फरमानी नाज देवी-देवताओं के भजन आदि इससे पहले भी गाती थीं मगर तब किसी को कोई आपत्ति नहीं थी, या कह सकते हैं कि उस समय उनके श्रोता केवल हिंदू होते थे, जिन्हें इससे कोई दिक्कत नहीं थी कि उनके भगवान के भजन सुनाने वाला किस जाति/मजहब का है। मगर, इस बार फरमानी ने गाना सावन के महीने में गाया और वीडियो वायरल होने के कारण कट्टरपंथियों के निशाने पर आ गईं। 

ध्यान दें अगर तो सावन की शुरुआत से माहौल बिगाड़ने का प्रयास कट्टरपंथी करते रहे। कभी शिवलिंग पर अभद्र टिप्पणी हुई तो शिवभक्ति में डूबे काँवड़ियों पर माँस, थूक आदि फेंके गए। ऐसे समय में जब एक पूरा धड़ा ऐसी गिरी हरकतों पर चुप बैठ उनका समर्थन कर रहा था उस समय फरमानी का गाना आया और हिंदुओं ने जमकर इसकी तारीफ की।

बय यही चीजें कट्टरपंथियों को बर्दाश्त नहीं हो पाई और उन्होंने फरमानी को गाली देना शुरू कर दिया। देवबंद के मौलाना मुफ्ती असद काजिमी ने तो यहाँ तक कहा, “गाना और नाचना इस्लाम में किसी भी रूप में जायज नहीं है। यह सब इस्लाम में वर्जित है। मुस्लिमों को ऐसी चीजों से बचना चाहिए। महिला ने जो गाया वो किसी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है। उसे इससे बचना चाहिए।

कट्टरपंथियों की हिपोक्रेसी

अब दिलचस्प बात ये है कि जिस इस्लाम मजहब में नाचना-गाना प्रतिबंधित बताया जा रहा है, उसी मजहब के हीरो-हिरोइन बॉलीवुड में भरे पड़े हैं। एक समय तो ऐसा भी था कि जब पूरे बॉलीवुड को ‘तीन खान’ के नाम पर जाना जाता था और ‘जीनत अमान’ जैसी मुस्लिम हिरोइनों को बोल्डनेस का पर्याय कहा जाता था।

ये नाचना-गाना-शरीर दिखाना हीरो-हिरोइनों के लिए कोई नया नहीं हैं और न ही ये सब मजहबी उलेमाओं के लिए देखना नया है। पर, ये जानते हैं कि अगर इन्होंने उर्फी जावेद जैसी अभिनेत्रियों पर उंगली उठाई तो इन्हें करारा जवाब मिलेगा। ये जानते हैं नोरा फतेही के स्टेप्स पर कमेंट किया तो इन्हें कुछ हासिल नहीं होगा। 

इनका कट्टरपंथ का जहर सिर्फ फरमानी जैसी महिलाओं के लिए उगला जाता है जिन्होंने मजहब को बेड़ी बनाए बिना फर्श से अर्श तक का सफर खुद से तय किया हो। या फिर सारा अली खान जैसी मुस्लिम एक्ट्रेस पर जिन्होंने मुस्लिम होने के बावजूद हिंदू धर्म में अपनी आस्था को बरकरार रखा और मंदिर जाती रहीं। 

ये जानते हैं कि अगर सारा के मंदिर जाने पर इन्होंने अपनी प्रतिक्रिया दी तो आधे से ज्यादा समुदाय के लोग उन्हें समर्थन देंगे। ये जानते हैं कि अगर इन्होंने फरमानी के ‘हर-हर शंभू’ गाने पर आपत्ति जताई तो आधी आबादी कहेगी कि यही सही बात तो है।

फरमारी के साथ तब क्यों नहीं थे मजहबी उलेमा?

आज जो लोग फरमानी को मजहब का ज्ञान देकर समझा रहे हैं कि इस्लाम में क्या प्रतिबंधित है क्या और क्या नहीं। क्या उन लोगों को इस बात का इल्म है कि फरमानी ने अपनी बीते कल में क्या-क्या झेला है।

क्या वे जानते हैं कि कैसे उनके शौहर ने उन्हें इसलिए छोड़ा क्योंकि उनकी कोख से जन्मा बेटा बीमार था, उसके गले में छेद था और फरमानी ने सिर्फ पाउडर वाला दूध माँगा था, जिसके बदले में उन्हें कहा गया कि वह अपने घर से लड़के के ईलाज का खर्च और दूध का पैसा लाएँ।

फरमानी ने अपने जीवन में तमाम कठिनाइयाँ झेलने के बाद इस मुकाम को हासिल किया। उन्होंने गाने को तब अपना करियर बनाया जब उनके पास कोई और विकल्प नहीं था। उस समय उनके दिमाग में अगर मजहबी बातें होतीं तो क्या वो गाने गा पातीं और अपने बच्चे को सही परवरिश दे पातीं? फरमानी मजबूरी में गाना शुरू किया जो धीरे-धीरे उनका पैशन बना। आज उन्हें उसी पैशन के बदले पैसा मिलता है। अगर इसी पैशन और प्रोफेशन के रास्ते पर उन्होंने शिव-शंभू गा दिया तो ये इस्लाम के खिलाफ कैसे हो गया?

आप यूट्यूब पर फरमानी की वीडियोज में देखेंगे तो पाएँगे कि गाने के कारण उनके जीवन में कितना बदलाव आया। उनके पहनावे से लेकर रहने की जगह तक बदल गई। क्या ये सारी चीजें मजहबी ज्ञान देने वाले उन्हें दे सकते थे। क्या इन लोगों का फर्ज तब नहीं था जब फरमानी अपने बच्चे के भविष्य की चिंता में परेशान थीं, उनके शौहर ने उन्हें और बीमार बेटे को अकेले छोड़ दिया था।

आज जब उनके जीवन में सब सही है। वह मजहबी कट्टरपंथ के रास्ते पर चले बिना एक नामी हस्ती हैं तो यही उलेमा उन्हें ज्ञान दे रहे हैं। क्या ज्ञान केवल तभी निकलता है जब कोई सारा जैसी मुस्लिम हीरोइन मंदिर चली जाए या नुसरत जैसी अभिनेत्री हिंदू त्योहार की शुभकामना दे दे या फिर कोई फरमानी भगवान का भजन गा ले? ये ज्ञान तब क्यों नहीं बाहर आता जब सलमान पूरी फिल्म में शर्ट उतार देते हैं? शाहरुख किसिंग सीन दे देते हैं। 

आपको याद नहीं होगा, लेकिन म्यूजिक इंडस्ट्री में तमाम मुस्लिम नाम भरे हैं जो समय-समय पर ऐसे गीत गाते आए हैं। इंडियन आयडल जैसा मंच तो वो जगह हैं जहाँ जानकर देवी-देवताओं के गाने दिए जाते हैं और उनकी तारीफ भी होती है। दानिश द्वारा गाया ‘माँ शेरावालिए’ अब भी सबके जहन में रहता है। पर बावजूद इन तमाम उदाहरणों के कट्टरपंथियों के निशाने पर फरमानी और फरमानी जैसी महिलाएँ हैं ताकि मजहब का नाम लेकर औरत पर उनका दबदबा हमेशा कायम रहे और सही-गलत की परिभाषा उनके कहे अनुसार तय हो।

श्रीकृष्ण के परपोते का बनाया केशवदेव मंदिर, जिसे खंडहर में तब्दील कर औरंगजेब ने पढ़ी नमाज: अकबर ने तोड़ने के लिए भेजा, मानसिंह ने करा दिया भव्य निर्माण

अयोध्या और मथुरा को भारत की सांस्कृतिक राजधानी कहा जाता है। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि ये भारत की आत्मा में रचे-बसे दो अवतारों के जन्मस्थान हैं। अयोध्या मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की जन्मस्थली है तो मथुरा योगेश्वर कृष्ण की जन्मभूमि है। ये दोनों ही स्थान कालांतर में मुस्लिम आक्रमणकारियों के निशाना बने।

मथुरा का केशवदेव मंदिर अति प्राचीन मंदिर है, लगभग पाँच हजार वर्ष पुराना। कहा जाता है कि जिस जगह पर कंस के कारागार में देवकी के गर्भ से भगवान विष्णु के परमावतार श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था, कालांतर में वहीं केशवदेव मंदिर का निर्माण हुआ था।

हालाँकि, आज इस स्थान पर शाही ईदगाह मस्जिद स्थित है, जो केशवदेव मंदिर को तोड़कर बनाया गया है। मुगल आक्रांता औरंगजेब के विध्वंस के बाद मंदिर के गर्भगृह पर बने इस मस्जिद को लेकर न्यायालय में मुकदमे चल रहे हैं। हालाँकि, इस आलेख का विषय मंदिर और उसके इतिहास से जुड़ा है और आज हम उसी की बात करेंगे।

भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र ने कराया था केशवदेव मंदिर का निर्माण

केशवदेव मंदिर का इतिहास द्वापर युग से जुड़ा है, जो पाँच हजार साल पुराना है। कुछ इतिहासकार कहते हैं कि इस मंदिर का सर्वप्रथम निर्माण भगवान कृष्ण के प्रपौत्र व्रजनाभ ने छठी शताब्दी ईसा पूर्व में कराया था। वज्रनाम के पिता का नाम अनिरुद्ध था। अनिरुद्ध भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के बेटे थे।

महाभारत के युद्ध में हस्तिनापुर नरेश धृतराष्ट्र और महारानी गांधारी का वंश खत्म हो गया। गांधारी ने वियोग में श्रीकृष्ण को शाप दिया था कि जिस तरह से उनके कारण कौरव वंश का नाश हुआ, उसी तरह से उनके भी कुल यदुवंश का नाश हो जाएगा।

कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध की समाप्ति के 36 वर्ष के प्रारंभ में श्रीकृष्ण और जाम्बवंती के पुत्र जाम्ब के कारण द्वारिका में यदुवंशी क्षत्रियों के बीच मूसल युद्ध प्रारंभ हुआ। इसमें यदुवंशी क्षत्रियों का नाश हो गया। उसके बाद बलराम ने समुद्र में समाधि ले ली और श्रीकृष्ण एक वृक्ष के नीचे लेट गए, जहाँ एक भील ने हिरण समझकर उन्हें तीर मार दिया। इसके बाद वे अपने लोक चले गए।

लेकिन, इस युद्ध में श्रीकृष्ण के प्रपौत्र व्रज और व्रजनाभ बच गए। श्रीकृष्ण के पृथ्वी छोड़ने के बाद द्वारिका समुद्र में डूब गया। दोनों भाई बचे हुए यदुवंशी क्षत्रियों के साथ हस्तिनापुर चले आए। यहाँ आकर उन्होंने हस्तिनापुर के राजा और अभिमन्यु (अर्जुन और उत्तरा के पुत्र थे अभिमन्यु) के पुत्र महाराजा परीक्षित के सहयोग से व्रजक्षेत्र का निर्माण किया। उनके ही नाम पर इसे व्रजमंडल कहा जाता है।

यहाँ दोनों भाइयों ने कई मंदिरों, तालाबों एवं अन्य लोकोपयोगी संरचनाओं का निर्माण कराया। व्रजनाभ ने जिन मंदिरों का निर्माण कराया था, उनमें भगवान श्रीकृष्ण का केशवदेव मंदिर भी शामिल था।

कालांतर में होता रहा पुनर्निर्माण

कालांतर में इस मंदिर का जीर्णोद्धार विभिन्न राजाओं द्वारा किया जाता रहा। इतिहासकारों के अनुसार, ईसा पूर्व 85-57 में श्रीकृष्ण मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया था। महाक्षत्रप सौदास के काल में ब्राह्मी लिपि में लिखे शिलालेखों से पता चलता है कि वसु नामक व्यक्ति ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराया था।

कहा जाता है कि समय बीतने के साथ ही मंदिर पुराना पड़ने लगा और इसकी हालत जर्जर हो गई। उसके बाद 5वीं शताब्दी में इस मंदिर का दूसरी बार जीर्णोद्धार हुआ। गुप्त वंश के सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने इसका जीर्णोद्धार कराया था। इस बात का जिक्र सम्राट के दरबार में आए चीनी यात्री फाह्यान ने किया है। फाह्यान 399 ईस्वी से 414 ईस्वी तक भारत भ्रमण पर था।

मुस्लिम आक्रांताओं का सिलसिला शुरू: पहला आक्रमण महमूद गजनवी का

सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के जीर्णोद्धार के बाद मथुरा का केशवदेव मंदिर लगभग 500 वर्षों तक अडिग खड़ा रहा, लेकिन हालात पहले की तरह नहीं रह गए थे। अब भारत पर इस्लाम के मजहबी आक्रमणकारियों की नजर पड़ गई थी। ग्रंथों में इन्हें ‘म्लेच्छ’ कहा गया है।

केशवदेव मंदिर पर पहला हमला अफगानिस्तान का शासक महमूद गजनवी ने सन 1017-1018 में किया था। वह मंदिरों के वैभव और यहाँ की अतुल संपदा को देखकर हतप्रभ था। मुस्लिम आक्रमण के बाद रेगिस्तान में परिवर्तित हो चुके अफगानिस्तान और उसके आसपास के निर्माणों में ऐसी भव्यता कहाँ थी।

महमूद के हमले के समय उसका दरबारी इतिहासकार अल उत्बी भी उसके साथ था। उत्बी ने अपनी किताब ‘तारीख-ए-यामिनी’ में लिखा है, “हैरान महमूद ने मंदिर की भव्यता देखकर कहा कि अगर कोई इसकी जैसी इमारत बनाना चाहे तो उसे 100 करोड़ दीनार खर्च करने पड़ेंगे। माहिर कारीगरों को भी इसे बनाने में कम-से-कम 200 साल लगेंगे।”

मंदिर की भव्यता देख चिढ़े महमूद ने केशवदेव मंदिर को तुड़वा दिया। इतना ही नहीं, उसने मथुरा शहर के सारे मंदिरों को तुड़वा दिया और इनमें स्थापित सोने-चाँदी की मूर्तियों को लूट लिया और पूरे शहर को तहस-नहस कर दिया।

अल उत्बी ने लिखा है कि केशवदेव मंदिर में सोने की पाँच मूर्तियाँ थीं। इन मूर्तियों की आँखों में माणिक्य जड़े थे। मंदिर में इतना सोना मिला था कि उसे ले जाना संभव नहीं था। इसलिए उसने काफी सोना गला दिया था। कहा जाता है कि सोने को ले जाने के लिए महमूद गजनवी ने कई ऊँटों का इस्तेमाल किया था। 

सन 1860-90 तक मथुरा के अंग्रेज कलेक्टर रहे एफएस ग्रौसे ने ‘मथुरा-वृंदावन: द मिस्टिकल लैंड ऑफ लॉर्ड कृष्णा’ नामक पुस्तक में लिखा है कि महमूद गजनवी ने श्रीकृष्ण मंदिर के साथ-साथ शहर के सैकड़ों मंदिरों को तुड़वा दिया था। मंदिरों को लूटने के साथ ही उसने शहर में भी जमकर उत्पाद मचाया था।

मंदिर पुनर्निर्माण और दूसरा हमला सिकंदर लोदी का

महमूद गजनवी के आक्रमण के बाद मथुरा तहस-नहस होकर गया था, लेकिन सनातन धर्मांवलंबियों की जिजीविषा और उनकी आस्था ने उन्हें दोबारा उठ खड़े होने के लिए प्रेरित किया। गजनवी के आक्रमण के बाद साल सन 1150 में जज्ज नाम के एक जागीरदार ने यहाँ एक भव्य विष्णु मंदिर बनवाया।

इस बात का उल्लेख श्रीकृष्ण जन्मभूमि स्थान से मिले संस्कृत के एक शिलालेख से पता चलता है। माना जाता है कि जज्ज कन्नौज के गढ़वाल राजवंश के अधीन एक जागीरदार थे। वहीं, कुछ इतिहासकारों का मानना है कि वे मथुरा के राजा विजयपाल देव से संबंधित हैं।

समय के साथ दिल्ली के तख्त पर मुस्लिमों का अधिकार हो गया। गुलाम वंश, खिलजी वंश, तुगलक वंश और सैय्यद वंश गद्दी पर बैठा। सैय्यद को हराकर बहलोल लोदी गद्दी पर बैठा और लोदी वंश की नींव डाली। बहलोल लोदी की मौत के बाद उसका बेटा निजाम खान सिकंदर लोदी के नाम से सन 1489 में दिल्ली की तख्त पर बैठा और सन 1517 तक शासन किया।

सिकंदर लोदी कट्टर सोच का शासक था। जब मथुरा के केशवदेव मंदिर की प्रसिद्धि उस तक पहुँची तो उसने मंदिर पर हमला कर इसे नष्ट कर दिया। इतना ही नहीं, उसने हिंदुओं पर फिर से जजिया कर लगा दिया।

अंग्रेज कलेक्टर एफएस ग्रौस ने जहाँगीर के शासनकाल के इतिहासकार अब्दुल्ला की किताब ‘तारिख-ए-दाउदी’ के हवाले से लिखा है कि सिकंदर लोदी ने हिंदुओं के नदी में स्नान करने और उसके किनारे मुंडन कराने पर भी प्रतिबंध लगा दिया था।

अकबर ने तोड़ने के लिए सेना भेजी, मानसिंह ने मंदिर बनवा दिया

समय के साथ दिल्ली के तख्त से लोदी वंश का अंत हो गया। सन 1526 ईस्वी में बाबर दिल्ली की गद्दी पर बैठा और मुगल वंश को स्थापित किया। इसी मुगल वंश में आगे चलकर अकबर हुआ, जिसे भारत का इतिहास ‘अकबर महान’ बताता है। अकबर मुगल वंश के संस्थापक बाबर का पौत्र और हुमायूँ का बेटा था।

अकबर ने दिल्ली की गद्दी पर सन 1556 ईस्वी से 1605 ईस्वी तक शासन किया। अकबर के दरबार में नौ रत्न थे, जिनमें तानसेन, राजा बीरबल, राजा मानसिंह, राजा भारमल, अब्दुर्रहीम आदि प्रमुख थे। इस वजह से अकबर को धर्मनिरपेक्ष बताने की कोशिश की जाती है, लेकिन स्वभाव में वह ऐसा नहीं था।

अकबर ना सिर्फ मेवाड़ में जौहर और शाका के लिए जिम्मेदार था, बल्कि उसने मथुरा के केशवदेव मंदिर के चबूतरे को भी तोड़ने का प्रयास किया था। सिकंदर लोदी के विध्वंस के बाद मथुरा मंदिर विहीन हो गया था और मुस्लिम शासन में कोई मंदिर निर्माण का साहस नहीं कर पा रहा था।

जिस जगह मंदिर का गर्भगृह था, उसके बगल में ही चौबे नाम के एक व्यक्ति ने चबूतरा बनवा दिया। बीतते समय के साथ हिंदू उस चबूतरे को पूजने लगे और उसका परिक्रमा करने लगे। यह बात शहर के काजी (इस्लामी धर्मगुरु और जज) शेख अब्दुल नबी को नागवार गुजरी। उसने हिंदुओं को ऐसा करने से रोका, लेकिन हिंदू नहीं माने। मथुरा राजा मानसिंह की जागीर थी, इसलिए वहाँ उनके हिंदू सैनिक तैनात थे। इस बात ने भी हिंदुओं को आत्मबल दिया।

जिस बंगाल को बाबर, हुमायूँ और अकबर नहीं जीत सके, उसे जीतकर राजा मानसिंह लौटे तो अकबर ने उनका खूब स्वागत किया और बंगाल (आज का बिहार, बंगाल और ओडिशा) को की जागीर दे दी। राजा मानसिंह ने मथुरा भी माँग लिया और अकबर ने दे भी दिया। बंगाल की देखभाल राजा मानसिंह बिहार के रोहतासगढ़ किले से करते थे और यही रहते थे। उस दौरान इस इलाके (बिहार, बंगाल, उड़ीसा) का नाम भी बदलकर वीर मानसिंह भूमि कर दिया गया था। इस तरह हिंदुओं पर उनका प्रबल प्रभाव था।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा वाराणसी में हनुमान मंदिर बनवाने के बाद अकबर ने उसे तोड़ने का आदेश दिया था, लेकिन राजा मानसिंह के हस्तक्षेप के बाद अकबर ऐसा नहीं कर सका। यह बात भी मथुरा के हिंदुओं को पता थी। मानसिंह के व्यक्तित्व के बारे में काजी और कोतवाल भी अवगत थे और हिंदू भी। इस कारण भी वहाँ के हिंदू काजी की बात को अनसुना कर दे रहे थे

अपनी अवहेलना से चिढ़कर शहर काजी अपनी शिकायत लेकर सीधे अकबर के दरबार में पहुँच गया और उसने हिंदुओं के पूजा-पाठ की शिकायत की। हालाँकि, काजी की बात सुनकर भी अकबर राजा मानसिंह से सीधे दुश्मनी मोल लेना नहीं चाहता था। हल्दीघाटी युद्ध में राजा मानसिंह ने महाराणा प्रताप को जाने देकर जिस प्रकार सहायता दिया था, उससे अकबर वाकिफ था।

उस दौरान भी अकबर अपने प्रबल शत्रु का पीछा नहीं करने के कारण राजा मानसिंह को कुछ नहीं कह पाया था। अकबर नाराज हुआ था और मानसिंह से बातचीत करना बंद कर दिया। इसके साथ ही उसने मानसिंह को संदेश भेजवाया था कि दरबार में आने की आवश्यकता नहीं है। सो मानसिंह भी मुगल दरबार नहीं जाते थे।

इस तरह अकबर दुविधा में पड़कर अकबर ने काजी शेख अब्दुल नबी को बोला की काजी होने के कारण जो आप फैसला लेना चाहें लें। इसके बाद काजी अपने साथ दो हजार मुगल सैनिक, जिनमें सारे मुस्लिम थे, लेकर मथुरा गया और चबूतरे को तोड़ने का आदेश दिया। इस खबर को सुनते ही मथुरा के आसपास के हिंदू क्रोधित हो उठे।

मुगल सैनिकों को मथुरा भेजने की बात जब राजा मानसिंह को पता चली तो उन्होंने अपने कच्छवाहा क्षत्रिय सैनिकों के सेनापति से मुगल सैनिकों को वापस भेजने के लिए कहा। कच्छवाहा सेनापति ने मुगल सेना की टुकड़ी के सरदार से कहा, “अगर यहाँ के एक भी हिंदू को हाथ लगाया गया तो मुगल सैनिकों को कब्रों में दफना दिया जाएगा।” इसके बाद मजबूर होकर मुगल सेनापति वापस दिल्ली लौट गया।

आगे चलकर चौबे ने उस स्थान चबूतरे पर भगवान का विग्रह रखकर प्राण-प्रतिष्ठा करा दिए और विधिवत पूजा होने लगी। अंग्रेज कलेक्टर एफएस ग्रौसे ने अपनी किताब में लिखा है कि सन 1590 ईस्वी में राजा मानसिंह ने मथुरा में भगवान श्रीकृष्ण के मूल स्थान पर भव्य मंदिर बनवा दिया। इस दौरान अकबर चाहकर भी कुछ नहीं कर पाया।

ओरछा के राजा वीर सिंह ने मंदिर को और भव्य बनवाया

समय बीतने के साथ अकबर के बेटे और मुगल बादशाह जहाँगीर का शासनकाल आया और 1618 ईस्वी में ओरछा के राजा वीर सिंह देव बुंदेला ने इस मंदिर को और भव्य बनवाया। राजा वीर सिंह उस दौरान मंदिर पर 33 लाख रुपए खर्च किए। कहा जाता है कि यह मंदिर इतना ऊँचा था कि उसकी रोशनी दिल्ली और आगरा से दिखाई देती थी। इस मंदिर के शीर्ष पर सोने की छतरी लगी थी।

सन 1650 में मथुरा आने वाले फ्रांसीसी यात्री टैवर्नियर और मुगल दरबार में आए इटली के यात्री निकोलाओ मानुची ने इस मंदिर का जिक्र अपने-अपने संस्मरणों में किया है। टैवर्नियर ने लिखा है कि बनारस के बाद भारत का सबसे प्रसिद्ध मंदिर मथुरा में है। वहीं, मानुची ने लिखा कि मंदिर के शीर्ष पर लगी सोने की छतरी को आगरा से भी देखा जा सकता था।

क्रूर औरंगजेब का हमला और मंदिर का तीसरी बार विध्वंस

मुगल शासन की बागडोर अब जहाँगीर के पौत्र और शाहजहाँ के बेटे औरंगजेब के हाथों में आ गई थी। औरंगजेब सबसे क्रूर, कट्टर और जेहादी विचारधारा का शासक था। उसे हिंदुओं और मंदिरों से विशेष तौर पर घृणा थी। हर मुगल शासक के शासनकाल की तरह औरंगजेब के शासन में भी मंदिरों को तोड़ने की अनुमति थी, लेकिन बनाने की नहीं।

कहा जाता है कि एक बार औरंगजेब आगरा से दिल्ली लौट रहा था। उसने आसमान में रौशनी देखी तो उसने अपने सिपहसलारों से इसके बारे में पूछा। उसके लोगों ने बताया कि यह केशवदेव मंदिर की रौशनी है। इसके बाद उसने मथुरा के इस मंदिर को तोड़ने का निश्चय किया।

साकी मुस्तद खान ने अपनी किताब ‘मासिर-ए-आलमगिरी’ में लिखा है कि औरंगजेब ने सन 1669 में मथुरा पर हमले और कृष्ण मंदिर को नष्ट करने के लिए सेना भेजी थी। अंग्रेज कलेक्टर एफएस ग्रौसे ने अपनी किताब में लिखा है कि औरंगजेब मंदिर की भव्यता से चिढ़ गया था। उसने मंदिर को गिराकर कर उसके खंडहर पर मस्जिद बनवाई थी।

भारतीय स्थापत्य कला और इतिहास में रुचि रखने वाले स्कॉटिश इतिहासकार जेम्स फर्गुसन ने अपनी किताब ‘हिस्ट्री ऑफ इंडियन एंड ईस्टर्न आर्किटेक्टर’ में लिखा है कि मंदिर की चार मंजिला इमारत की ऊपरी दो मंजिलों को काटकर गिरा दिया गया था। इस पर औरंगजेब ने मेहराब बनवाया था, ताकि मथुरा की यात्रा के दौरान वहाँ नमाज पढ़ सके। सन 1670 में औरंगजेब मथुरा गया और मंदिर के खंडहर पर बने ईदगाह मस्जिद में नमाज भी पढ़ी।

वर्तमान में शाही ईदगाह मस्जिद श्रीकृष्ण जन्मभूमि के गर्भगृह पर स्थित है। मस्जिद के दक्षिण में स्थित वर्तमान केशवदेव मंदिर को रामकृष्ण डालमिया ने बनवाया था। इसका उद्घाटन सितंबर 1958 में हुआ था। ब्रिटिश शासनकाल में एक नीलामी के दौरान बनारस के राजा पटनीमल ने मस्जिद की पीछे वाली जगह को खरीदा था। सन 1943 में उस जमीन को राजा के उत्तराधिकारियों से उद्योगपति जुगलकिशोर बिड़ला ने खरीद लिया।

मंदिर से केशवदेव के मूल विग्रह को हटा दिया गया

औरंगजेब के हमले की जानकारी जैसे ही मथुरा के स्थानीय हिंदुओं और पुजारियों को लगी, उन्होंने भगवान केशवदेव के मूल विग्रह को हटा दिया और उसे छुपाते रहे। इस बात का पता जब औरंगजेब को चला तो उसने घोषणा कि जो भी उस मूर्ति को स्थापित करने के लिए भूमि और पुजारियों को आश्रय देगा, उस राज्य का विध्वंस कर दिया जाएगा।

औरंगजेब की क्रूरता से सब वाकिफ थे। कोई भी राजा नहीं चाहता था कि एक प्रतिमा के लिए उसके राज्य पर मुगलों का आक्रमण हो और उनकी जनता के साथ लूटपाट, बलात्कार और हत्या हो। इसलिए किसी राजा ने शरण नहीं दी। लेकिन, पृथ्वी वीरों से खाली नहीं रही कभी।

उस दौरान एक राजा ने सबसे क्रूर मुगल शासक औरंगजेब को चुनौती दी और ना सिर्फ भगवान का विग्रह लेकर घुम रहे पुजारियों को आश्रय दिया, बल्कि प्रतिमा को स्थापित करवाते हुए भव्य मंदिर भी बनवाया। हम अपने अगले लेख में इस कहानी का विस्तार से चर्चा करेंगे।

लाल सिंह चड्ढा के बॉयकॉट पर करीना कपूर ने दिखाई अकड़, कहा- मैं इसे गंभीरता से नहीं लेती, फिल्म अच्छी हो तो चलेगी ही: आमिर खान लगा रहे गुहार

आमिर खान और करीना कपूर अपनी आगामी फिल्म ‘लाल सिंह चड्ढा’ के प्रमोशन में जुटे हुए हैं, जबकि सोशल मीडिया में लोग इसके बहिष्कार के लिए अभियान चला रहे हैं। वो 2 साल बाद बड़े पर्दे पर वापसी कर रही हैं, वहीं एक दशक बाद आमिर खान के साथ उनकी कोई फिल्म आ रही है। दोनों की पिछली फिल्म ‘तलाश’ नवंबर 2012 में रिलीज हुई थी। बीच में वो गर्भावस्था पर अपनी किताब और हिंदी दर्शकों पर अपने बेरुखी भरे बयान के कारण सुर्ख़ियों में रही थीं।

अब उन्होंने बॉलीवुड के बॉयकॉट को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी है। जब करीना कपूर से पूछा गया कि क्या बॉलीवुड में ‘Ageism’ है और एक उम्र के बाद अभिनेत्रियों को फ़िल्में नहीं मिलतीं, तो उन्होंने कहा कि ये सब सिर्फ सोशल मीडिया में है, वास्तविक जीवन में नहीं। उन्होंने कहा कि अगर आप प्रतिभावान हैं तो आपको काम मिलता रहेगा। करीना कपूर खान ने कहा कि आज लोग अलग-अलग उम्र में अपने हिसाब से किरदार अदा कर रहे हैं।

उन्होंने कहा कि वो गर्भावस्था के दौरान भी काम करती रहीं और जिन्हें इससे समस्या है, उन्हें न लें। उन्होंने बताया कि साढ़े 5 महीने की गर्भवती होने के बावजूद उन्होंने आमिर खान के साथ दृश्य फिल्माए। उन्होंने आलिया भट्ट का भी उदाहरण दिया, जो गर्भवती होने के बावजूद फिल्मों की शूटिंग कर रही हैं। उन्होंने बॉयकॉट की अपील को ‘कैंसल कल्चर’ बताते हुए कहा कि आज लोगों की विभिन्न प्लेटफॉर्म्स तक पहुँच है, इसीलिए वो हर चीज पर राय दे रहे हैं। पहले करीना कपूर ने कहा था कि लोग फिल्म न देखें, उनसे किसी ने जबरदस्ती थोड़े की है।

‘इंडिया टुडे’ से करीना कपूर खान ने कहा, “हर कोई आजकल अपने विचार रखना चाहता है। आजकल अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स हैं और हर कोई के पास कोई न कोई राय है। इसीलिए, अगर आज आपको रहना है तो कुछ चीजों को नजरअंदाज करना सीखना होगा। नहीं तो आपका जीवन जीना कठिन हो जाएगा। इसीलिए, मैं इन चीजों को गंभीरता से नहीं लेती। मुझे जो पसंद आता है, मैं पोस्ट करती हूँ। मुझे पता है कि फिल्म रिलीज होगी तो इसके बारे में सबकी कुछ न कुछ राय होगी। बस यही बात है।”

करीना कपूर खान ने कहा कि अगर फिल्म अच्छी होगी तो इसे अच्छी प्रतिक्रिया मिलेगी और ये सभी उम्मीदों के पार चली जाएगी। उन्होंने कहा कि फिल्म अच्छी हो तो इन चीजों का उस पर असर नहीं होता। वहीं दूसरी तरफ आमिर खान लोगों से अपील कर रहे हैं कि वो ‘लाल सिंह चड्ढा’ का बॉयकॉट न करें और इसे थिएटर में जाकर देखें। आमिर खान ने कहा कि कुछ लोगों को लगता है कि उन्हें देश से प्यार नहीं, लेकिन वो गलत हैं। एक अन्य इंटरव्यू में करीना कपूर खान ने कहा कि वो विवादों पर सफाई देना ज़रूरी नहीं समझतीं।

अर्पिता मुखर्जी ही नहीं, कई महिलाओं पर मेहरबान थे पार्थ चटर्जी: रिपोर्ट में दावा- मोनालिसा दास से भी रिश्ते, पसीना पोछने के लिए भी लड़कियाँ

पश्चिम बंगाल शिक्षक भर्ती घोटाले में गिरफ्तार ममता बनर्जी की सरकार में मंत्री रहे पार्थ चटर्जी (Partha Chatterjee) की केवल अर्पिता मुखर्जी से ही करीबी नहीं है। टीएमसी की एक पूर्व नेत्री की माने तो मोनालिसा दास के साथ भी उनके रिश्ते थे। कथित तौर पर चार-पाँच लड़कियाँ पार्थ चटर्जी के आसपास हमेशा मँडराती रहतीं थी, जो उनका पसीना तक पोछती थीं।

यह दावा तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की नेता रहीं बैसाखी बनर्जी (Baisakhi Banerjee) ने किया है। वे पश्चिम बंगाल कॉलेज-यूनिवर्सिटीज प्रोफेसर एसोसिएशन (WBCUPA) की जनरल सेक्रेटरी भी रह चुकीं हैं। उन्होंने दैनिक भास्कर को एक इंटरव्यू दिया है। इसमें पार्थ चटर्जी के बारे में विस्तार से बताया है।

कभी पार्थ चटर्जी की बेहद करीबी रहीं बैसाखी का कहना है, “मैं पार्थ चटर्जी को 2016 से जानती हूँ। उनके बार-बार जिद करने पर ही WBCUPA की जनरल सेक्रेटरी बनी थी। उन्होंने मुझे कभी ऐसी निगाहों से नहीं देखा कि शर्मिंदा होना पड़े या मैं असहज महसूस करूँ। पार्थ चटर्जी जब शिक्षा मंत्री थे, तब बहुत बड़ी संख्या में अंडर क्वालीफाइड लड़कियों को रिक्रूट किया गया था। मैं खुद मिली अल-अमीन कॉलेज की प्रिंसिपल थी, इसलिए मुझे सब पता था। उन्होंने मंत्री होते हुए भी ये सब रोकने की कोई कोशिश नहीं की।”

ईडी के छापे के दौरान यह सामने आया है कि पार्थ चटर्जी के पास बड़ी संख्या में फ्लैट हैं, जिनमें से कई उन्होंने अर्पिता मुखर्जी और मोनालिसा दास सहित अपने ‘करीबी सहयोगियों’ को गिफ्ट में दिए हैं। अर्पिता चटर्जी ने ईडी को बताया है कि पार्थ चटर्जी उनके फ्लैट का इस्तेमाल ‘मिनी बैंक’ के तौर पर करते थे। ऐसे में माना जा रहा है कि मोनालिसा दास को गिफ्ट किए गए फ्लैट्स का इस्तेमाल भी इसी मकसद से किया गया था।

मोनालिसा के नाम पर कथित तौर पर 10 फ्लैट का पता चला है। कुछ मीडिया रिपोर्ट में यह भी कहा जा रहा है कि इनमें से 7 घर पार्थ चटर्जी के हैं और ये बीरभूम जिले के शांतिनिकेतन के फुलडांगा इलाके में हैं। मोनालिसा दास बांग्लादेश से भी जुड़ी हुई हैं। वह पहले आसनसोल में एसबी गोराई रोड पर विवेकानंद पल्ली में किराए के एक मकान में रहती थीं। मोनालिसा इस इलाके में लगभग पाँच साल तक किराए पर अकेली रहती थीं। मोनालिसा दास आसनसोल में काजी नजरूल विश्वविद्यालय में बंगाली भाषा की प्रोफेसर भी हैं।

बैसाखी के मुताबिक, “मैंने पार्थ के साथ कई लड़कियों को देखा है। लड़कियाँ उनका पसीना तक पोछा करती थीं। वो महीने में एक-दो बार ही ऑफिस आते थे। बाकी समय कहाँ रहते थे, ये कोई नहीं जानता। अब मीडिया से पता चला रहा है कि वो विदेश घूमने जाया करते थे।” बनर्जी के मुताबिक, “मोनालिसा दास पार्थ की गर्लफ्रेंड रह चुकी हैं। मोनालिसा जिस कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर थीं, वहाँ के वाइस चांसलर की वाइफ ने मोनालिसा की शिकायत मुझसे की थी। उन्होंने मुझसे कहा था कि पार्थ चटर्जी की गर्लफ्रेंड मोनालिसा का मेरे पति के साथ अफेयर चल रहा है। मेरा घर बर्बाद हो रहा है। आप उन्हें जानती हैं, कुछ कीजिए। इस पर मैंने कहा था कि आप इतना बड़ा आरोप लगा रही हैं, आपके पास क्या प्रूफ है कि मोनालिसा पार्थ की गर्लफ्रेंड हैं।”

तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की पूर्व नेता के अनुसार, “उन्होंने सबूत के तौर पर मुझे पार्थ और मोनालिसा के बीच की कुछ चैट भेजी थीं। इनसे यह साफ हो गया था कि दोनों एक-दूसरे के बेहद नजदीक हैं। यह चैट मेरे पास अब भी है। लेकिन यह उनका निजी मामला है, इसलिए मैं किसी से शेयर नहीं करूँगी। हालाँकि मैं उस महिला की शिकायत लेकर पार्थ चटर्जी के पास गई थीं, लेकिन उन्होंने मुझे नजरअंदाज करते हुए कहा कि मैं TMC में नंबर-2 हूँ। मेरा कोई कुछ नहीं कर सकता। इसके बाद उस महिला ने यह पूरा मामला लिखकर CM ममता बनर्जी के पास भेज दिया था।”

उन्होंने बातचीत में कहा, “CM को शिकायत करने के बाद भी कुछ नहीं हुआ, क्योंकि वो लेटर पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी को ही भेज दिया गया। पार्थ ने शिकायत करने वाली महिला को बुलाकर उसकी बात सुनी और उससे कहा कि आप घर जाओ, सब ठीक हो जाएगा। लेकिन अगले दिन उन्होंने उसके पति को बुलाकर कहा कि अपनी पत्नी को समझाओ। वो CM तक पहुँच गई है। यदि वो चुप नहीं हो रही तो उसे पागल करार दे दो। जब उस महिला ने ये बातें मुझे बताईं तो मैं सुनकर हैरान रह गई। पार्थ चटर्जी के दो चेहरे हैं। एक जो मेरे सामने था और दूसरा जो बाकी लोगों के जरिए मुझे पता चल रहा था। बाद में उस महिला को नौकरी से हटा दिया गया। उसे CM के पास जाने से भी कुछ मदद नहीं मिल पाई थी।”

गौरतलब है कि बीते कुछ दिनों से बंगाल के पूर्व मंत्री पार्थ चटर्जी और उनकी करीबी दोस्त अर्पिता मुखर्जी करोड़ों रुपए के एसएससी भर्ती घोटाले को लेकर चर्चा में हैं। प्रवर्तन निदेशालय अर्पिता मुखर्जी के घरों पर छापेमारी कर अब तक 50 करोड़ रुपए से ज्यादा कैश और 5 किलो सोना बरामद कर चुका है। फिलहाल दोनों ईडी की हिरासत में हैं।

4 अगस्त तक ED की कस्टडी में भेजे गए संजय राउत, घर का खाना खाने की अनुमति: कोर्ट ने कहा – हृदय रोग है, पूछताछ में ध्यान रखे जाँच एजेंसी

अदालत ने पात्रा चॉल घोटाले में शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत को 4 अगस्त तक रिमांड पर भेज दिया है इस दौरान वो ED की कस्टडी में रहेंगे। प्रवर्तन निदेशालय ने उन्हें एक दिन पहले गिरफ्तार किया था। भांडूप स्थित उनके आवास पर चली 9 घंटे की छापेमारी और पूछताछ के बाद एजेंसी ने ये कार्रवाई की थी। इसके बाद उनकी 8 दिन की कस्टडी के लिए अदालत में पेश किया गया था। हालाँकि, स्पेशल जज एमजी देशपांडे ने कहा कि 8 दिन की कस्टडी की ज़रूरत नहीं है।

जज ने कहा कि सभी विवरणों को दस्तावेज के रूप में संकलित किया जा चुका है और संजय राउत व उनकी पति के वित्तीय लेनदेन को भी आसानी से जुटाया जा सकता है, ऐसे में इतनी लंबी कस्टडी की आवश्यकता नहीं है। साथ ही संजय राउत के स्यास्थ्य को देखते हुए उन्हें घर का खाना खिलाने की अनुमति भी दे दी गई। उन्हें कानूनी सलाह लेने की छूट के साथ-साथ दवाएँ वगैरह लेने की अपील को भी कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।

अदालत ने कहा कि चूँकि आरोपित हृदय रोग से पीड़ित है, इसीलिए ज़रूरत पड़ने पर ED को उसे अस्पताल में भर्ती कराने पर विचार करना चाहिए और पूछताछ के समय को इसे ध्यान में रखते हुए ही तय किया जाना चाहिए। मनी लॉन्ड्रिंग कानून (PMLA) के तहत इस मामले की जाँच की जा रही है। ‘गुरु आशीष कंस्ट्रक्शंस प्राइवेट लिमिटेड’ ने पात्रा चॉल के पुनर्विकास का ठेका लिया था, जो ‘हाउसिंग डेवलपमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (HDIL)’ का ही एक हिस्सा है। ये मामला इसी से जुड़ा हुआ है।

इससे पहले ED ने संजय राउत के एक करीबी प्रवीण राउत को गिरफ्तार किया था। संजय राउत की पत्नी की कुछ संपत्तियाँ भी जब्त की गई हैं। उक्त कंपनी ने ‘महाराष्ट्र गृहनिर्माण व क्षेत्रविकास प्राधिकरण (MHADA)’ के साथ करार के तहत पात्रा चॉल के लोगों के लिए 672 फ्लैट्स बनाने का करार किया था। बाकी बचे क्षेत्र को प्राइवेट डेवेलपर्स को बेचने की सहमति बनी थी। प्रवीण राउत ने 901 करोड़ रुपए में फ्लोर स्पेस इंडेक्स (FSE) को 9 कंपनियों को बेचा।

किसी के लिए फ्लैट नहीं बनाया गया। ED का कहना है कि प्रवीण ने HDIL से मिली 100 करोड़ रुपए की दलाली को कई जगह भेजा, जिसमें संजय राउत का परिवार भी शामिल है। 1 जुलाई, 2022 को संजय राउत से ED ने 10 घंटे पूछताछ की थी। हालाँकि, इसके बाद उन्होंने समन पर एजेंसी के समक्ष उपस्थित होने की जहमत नहीं उठाई और संसद सत्र का बहाना बनाया। अब हजार करोड़ रुपए के इस घोटाले में वो ED की कस्टडी में रिमांड पर हैं।

जन्मदिन की पार्टी के बहाने ईसाई धर्मांतरण का खेल, भूत प्रेत बाधा दूर करने और पैसों का लालच, आजमगढ़ पुलिस ने 6 महिलाओं को गिरफ्तार कर भेजा जेल

उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ की दलित बस्ती में भूत-प्रेत बाधा व पैसों का लालच देकर ईसाई धर्मान्तरण का मामला सामने आया है। ताजा मामला आजमगढ़ जिले के महराजगंज कस्बे के विष्णु नगर वार्ड का है, जहाँ जन्मदिन पार्टी के बहाने धर्मांतरण की कोशिश की जा रही थी। हालाँकि, पुलिस की मुस्तैदी ने इस प्रयास को नाकाम कर दिया। यहाँ धर्मांतरण करवाने वालों में लगभग सभी महिलाएँ ही थीं। वहीं बजरंग दल की सूचना पर पुलिस ने मौके से सभी 6 आरोपित महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, महराजगंज कस्बे के विष्णु नगर वार्ड की अनुसूचित जाति बस्ती में किराए के मकान में रहने वाली कप्तानगंज के पिपरी गाँव की इंद्रकला ने अपने बेटे के जन्मदिन पर 30 जुलाई को एक पार्टी का आयोजन किया था, जिसमें आसपास के गाँवों के 100 से ज्यादा लोगों को बुलाया गया था। आरोप है कि आयोजक की रजामंदी से पहले यहाँ के लोगों में मिठाई बाँटी गई और फिर खाने से पहले एक किताब पढ़ने को दिया गया। यहाँ भूत-प्रेत बाधा को दूर करने व पैसों का लालच भी दिया गया। इस बीच किसी ने पुलिस को सूचित किया कि इस कार्यक्रम में ईसाई धर्मांतरण के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

वहीं कहा जा रहा है कि बजरंग दल की सूचना पर मौके पर पहुँची पुलिस ने ईसाई धर्मांतरण के इस खेल का भंडाफोड़ कर दिया। जहाँ पुलिस को देखते ही कुछ लोग वहाँ से भाग खड़े हुए। वहीं तलाशी के दौरान पुलिस ने उन लोगों के पास से कुछ धार्मिक पुस्तकें और रफ कापियाँ बरामद की। जिन पर मज़हबी बातें लिखी हुई हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, पूरे मामले को लेकर पुलिस अधीक्षक सिद्धार्थ कुमार ने कहा, “महराजगंज थाने में तैनात उप निरीक्षक कमलेश यादव स्टाफ के साथ क्षेत्र में थे, उसी दौरान उन्हें सूचना मिली कि कुछ महिलाओं द्वारा धर्म परिवर्तन के लिए गरीब लोगों को उकसाया जा रहा है और स्थानीय लोगों के विरोध करने पर उन्हें धमकी दी जा रही है। सूचना पाकर पुलिस महराजगंज नगर पंचायत के वार्ड संख्या-1 की दलित बस्ती में पहुँची, जहाँ जन्मदिन पार्टी के बहाने लोगों को धर्मांतरण के लिए प्रलोभन दिया जा रहा था। फिलहाल मौके से 6 महिलाओं को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। पूरे मामले में अग्रिम विधिक कर्रवाई की जा रही है।”

गौरतलब है कि यहाँ धर्म परिवर्तन का खेल खेल रहे लोगों ने ऐसी साजिश रची कि किसी को शक न हो और उनका मकसद भी पूरा हो जाए। इसके लिए बर्थडे पार्टी को आयोजन का जरिया बनाया गया। और इसकी कमान 6 महिलाओं को सौंपी गई थी। इन आरोपितों में इन्द्रकला, सुभागी देवी, साधना, समता, अनीता, सुनीता को धर्मान्तरण के मामले में संलिप्त पाया, जिसके बाद सभी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।

संस्कृत श्लोक में कॉन्ग्रेस ने खोजी अश्लीलता, मोदी विरोध के चक्कर में हिन्दू घृणा: वीडियो के जरिए धर्म का अपमान कर रही कॉन्ग्रेस, यहाँ समझिए भावार्थ

कॉन्ग्रेस पार्टी अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपनी घृणा में संस्कृत भाषा और हिन्दू धर्म को लेकर अश्लीलता फैलाने में लग गई है। पीएम मोदी ने दिल्ली में ‘ऑल इंडिया डिस्ट्रिक्ट लीगल सर्विसेज ऑथोरिटीज’ की पहली बैठक को दिल्ली में शनिवार (30 जुलाई, 2022) को सम्बोधित किया, जिसमें उन्होंने एक संस्कृत श्लोक पढ़ा। बस फिर क्या था, कॉन्ग्रेस ने इस श्लोक के एक शब्द को पकड़ कर अश्लील बताना शुरू कर दिया।

अब कॉन्ग्रेस के इस कृत्य में वामपंथी और लिबरल गिरोह साथ न दे, ऐसा हो ही नहीं सकता है। हिन्दू धर्म को बदनाम करने के लिए सोशल मीडिया पर ‘अश्लील नरेंद्र’ ट्रेंड कराया जाने लगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस श्लोक के जरिए न्यायपालिका का महत्व को समझा रहे थे, लेकिन विरोधियों को इन सबसे कोई मतलब नहीं। इस दौरान उन्होंने बताया कि इस सम्बन्ध में भारतीय इतिहास में क्या कहा गया है। कॉन्ग्रेस नेता गौरव पांधी ने इस वीडियो को शेयर करते हुए लिखा, “सॉरी, क्या कहा?”

आइए, हम आपको बताते हैं कि वो श्लोक कौन सा है। पीएम मोदी ने जिस संस्कृत श्लोक का जिक्र किया, वो है – “अंगेना गात्रम नयनेन वक्रतम न्यानेन राज्यम लवनेन भोज्यम। धर्मेना हीनं खालू जीवितं चा न राजते चंद्रमासा बिना निशा।।” इस श्लोक का अर्थ है कि बिना किसी अंग के मानव शरीर, आँखों के बिना चेहरा, एक प्रभावी और शक्तिशाली न्यायपालिका के बिना एक राष्ट्र, बिना नमक के पका हुआ भोजन, धर्म के बिना मानव जीवन और धर्म का पालन करना, वास्तव में आकाश में चंद्रमा एक अंधेरी रात की तरह अलंकृत या दैदीप्यमान नहीं कहा जाता है।

इस श्लोक में जिक्र है कि न्यायपालिका के बिना देश को प्रकाश विहीन समझा जाए, यही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समझाना चाह रहे थे। कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना और केंद्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू सहित कई गणमान्य उपस्थित थे। अब भारत के अलग-अलग हिस्सों के लोगों के उच्चारण अलग-अलग हैं, क्योंकि यहाँ कुछ ही किलोमीटर पर बोली और भाषाएँ बदल जाती हैं। इसी ही मुद्दा बना कर कॉन्ग्रेस हंगामा कर रही है।

हालाँकि, इस दौरान कई लोगों ने जवाहर लाल नेहरू की तस्वीरें शेयर कर के कॉन्ग्रेस को बताया कि असली अश्लील कौन है। कुछ ने दिग्विजय सिंह की तस्वीरें भी डालीं। शशि थरूर के भी जिक्र आए। लोगों का कहना है कि संस्कृत को बदनाम कर के कॉन्ग्रेस पार्टी ने हिन्दू धर्म के प्रति अपनी घृणा दिखाई है, पीएम मोदी के विरोध के चक्कर में। कॉन्ग्रेस का हिन्दू विरोध का इतिहास पुराना रहा है। ये कोई पहली बार पार्टी के नेता इस तरह की हरकत नहीं कर रहे हैं।