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10-11 साल की काफिर लड़कियाँ मांस का टुकड़ा, सेक्स-रेप कर वेश्या बना दो: 200 का लव जिहाद-1000 शिकार, रेप हाउस भी बना रखा था

इंग्लैंड के टेलफोर्ड शहर में दशकों से हो रहे हजारों बच्चों के यौन शोषण का खुलासा हुआ है। पड़ताल में सामने आया है कि यहाँ पीड़िताओं से गैंगरेप, उनके कम उम्र में प्रेगनेंट होने के केस और धमकी दिए जाने के कई मामले मिले हैं।

मिरर की रिपोर्ट बताती है कि पड़ताल के दौरान एक ‘रेप हाउस’ के बारे में भी पता चला है जिसे सालों से चलाया जा रहा था। यहाँ पीड़िताओं के साथ वेश्याओं जैसा बर्ताव होता था।

जाँचकर्ता टॉम क्राउथर ने शहर में चल रहे ऐसे घृणित अपराध के लिए पुलिस के रवैये और निगम अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि शहर में बच्चों के खिलाफ चल रही यौन हिंसा को नकारा गया और आरोपितों को सजा देने की बजाए बच्चों को दोषी बताया गया।

बता दें कि टेलफोर्ड में चल रहे स्कैंडल का खुलासा सबसे पहल संडे मिरर ने किया था। साल 2018 में उन्होंने 18 महीने की पड़ताल के बाद यह दावा किया था कि 1980 के दौर से शहर में बच्चियों का शोषण हो रहा है।

इस पड़ताल के नतीजों पर संज्ञान लेते हुए टेलफोर्ड और रेकिन काउंसिल ने जाँच करवाई, जिसका जिम्मा टॉम क्राउथर को दिया गया। उन्होंने जाँच में पाया कि वाकई सालों से शहर में बच्चों पर अत्याचार हो रहे है। हर पीड़ित का यही कहना है कि जब वो बच्चे थे तो उम्र में बड़े पुरुषों ने पहले उनका विश्वास जीता और फिर उसे तार-तार किया। पीड़िताओं के अनुसार, वह पुरुष उन्हें एक सेक्स वस्तु से ज्यादा कुछ नहीं मानते थे। 11-12 साल की बच्चियों से गन प्वाइंट पर रेप होते थे, उन्हें पीटा जाता था, बेचा जाता था।

क्राउथर कहते हैं कि शहर में सालों स अनगिनत बच्चों को सताया गया, उनका रेप हुआ, उन्हें अपमानित किया गया, दूसरों के साथ उन्हें बाँटा गया और उनकी तस्करी तक हुई। लेकिन पुलिस ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की। इसके उलट जिन लोगों ने इस मुद्दे को उठाना चाहा उन्हें बुरी तरह दबा दिया गया और पीड़िताओं को और उनके परिजनों को धमकाया जाता रहा।

जाँच के दौरान कई पीड़िताओं को सुना गया जिनमें कुछ ने बताया कि 1970 के दौर में भी उन्हें निशाना बनाया गया था। इसके अलावा पुराने अखबार खंगाले गए। इनसे पता चला कि ये बच्चों के विरुद्ध होने वाली हिंसा आज की बात नहीं है।

सालों से बच्चों को वेश्यावृत्ति में ढकेला जाता रहा जिस पर 90 के दौर में चिंता जताई गई। हालाँकि अधिकारियों ने मामले पर संज्ञान नहीं लिया। एक अखबार की कटिंग का हवाला देकर कहा गया कि उस समय में टेलीफोन बॉक्स का इस्तेमाल बच्चियों को उठाने का पिक-अप प्वॉइंट हुआ करता था। फिर भी इस पर कोई कार्रवाई नहीं थी।

थोड़े बहुत जो हालात बदले वो 2000 के बाद बदले। 2010 में ऑपरेशन चालिस हुआ और 100 पीड़ित चिह्नित किए गए और 200 आरोपित ढूँढे गए। हालाँकि इनमें से जो जेल गए वो सिर्फ 7 थे। इनमें से एक पर आरोप था कि उसने एक लाचार लड़की को मांस के टुकड़े की तरह बाँटा, और सेक्स के लिए बेचता रहा, उसका रेप करवाता रहा। अब इस मामले में वेस्ट मरसिया की पुलिस और टेलफोर्ड काउंसिल ने इस तरह के स्कैंडल के लिए पीड़ितों से माफी माँगी है।

पीड़िताओं को उतरा गया मौत के घाट

बता दें कि 4 साल पहले संडे मिरर ने अपनी रिपोर्ट में यह भी बताया था कि 40 साल पुराने इस स्कैंडल की पीड़िताओं की किस तरह मौतें हुईं। 16 साल की लूसी लो को 2000 में उनकी माँ-बहन के साथ अजहर अली द्वारा जिंदा जला कर मार दिया गया। लूसी वो पीड़िता थी जिसे कैबी महमूद ने 1997 में अपना शिकार बनाया था और मात्र 14 साल की उम्र में उसने एक बेटी को जन्म दिया था।

इसके बाद बेकी वॉटसन की भी मौत 2003 में एक कार एक्सिडेंट में हुई थी। अजीब बात यह थी कि बेकी का भी 2 साल पहले से शोषण हो रहा था, उस समय वह केवल 11 की थी। बेकी की तरह ही उसके दोस्त विकी को भी इसी गैंग ने अपना निशाना बनाया था। विकी की जब मौत हुई तब वह मात्र 20 साल की थीं। उनके परिजनों का मानना था कि अगर विकी को इतने बुरे ढंग से कभी न सताया गया होता तो शायद वो अब तक सबके साथ होंती।

गौरतलब है कि ग्रूमिंग गैंग द्वारा ब्रिटेन में छोटे बच्चों के खिलाफ किए जाने वाले कोई नई बात नहीं है। एक रिपोर्ट के अनुसार,  पिछले 40 वर्षों में अकेले ब्रिटेन में करीब 5 लाख लड़कियों का बलात्कार किया गया, उनमें से अधिकतर गोरे हैं और उन्हें शिकार बनाने वाले मुख्य रूप से एशियाई मुस्लिम हैं, जो बलात्कार के दौरान गोरों को गंदी गाली देते हैं और उन्हें वेश्या कहकर भी बुलाते हैं।

ग्रूमिंग गैंग के हैवानों की गिरफ्तारी

अधिकारियों का ग्रूमिंग गैंग की जाँच पर मानना है कि देश भर में 200 लोग हैं जो इन सबसे जुड़े हैं लेकिन गिरफ्तार 7 हुए हैं। इनमें एहदल अली जो इस गैंग का सरगना माना जाता है उसको 2019 में 26 साल सजा हुई है जबकि मुबारक अली को 22 साल। इनके अलावा मोहम्मद अली सुलतान, तनवीर अहमद, इस्लाम चौधरी, महरूफ खान, मो युनूस आदि भी पकड़े गए हैं।

गुजरात दंगों में पूर्व IPS संजीव भट्ट गिरफ्तार, जेल से अहमदाबाद लेकर आई क्राइम ब्रांच: तीस्ता सीतलवाड़ और बी श्रीकुमार की पहले ही हो चुकी है गिरफ्तारी

गुजरात दंगों के मामले में कथित सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ (Teesta Setalvad) और आरबी श्रीकुमार (RB Sreekumar) के बाद पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट (Sanjiv Bhatt) को गिरफ्तार किया गया है। अहमदाबाद क्राइम ब्रांच की टीम ने लंबे समय से पालनपुर जेल में बंद संजीव भट्ट को मंगलवार (12 जुलाई 2022) को धन के गबन और जाली दस्तावेजों के आरोप में गिरफ्तार किया। संजीव भट्ट बनासकांठा जिले के पालनपुर जेल में हिरासत में मौत के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे हैं। अहमदाबाद पुलिस की क्राइम ब्रांच ने आरबी श्रीकुमार, संजीव भट्ट और तीस्ता सीतलवाड़ के खिलाफ विभिन्न धाराओं में एफआईआर दर्ज की थी।

2002 में हुए गुजरात दंगों के मामले में सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी के बाद 25 जून 2022 को आतंक निरोधी दस्ते (एटीएस) ने तीस्ता सीतलवाड़ को मुंबई के जुहू स्थित उनके घर से गिरफ्तार कर लिया था। इसके बाद इस मामले में पूर्व IPS अधिकारी आरबी श्रीकुमार (RB Sreekumar) को अहमदाबाद क्राइम ब्रांच ने गिरफ्तार किया था। इनके ऊपर दंगों के दौरान गुजरात की छवि खराब करने का आरोप है।

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दिए जाने की SIT रिपोर्ट को चुनौती देने वाली जाकिया जाफरी की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा था कि तीस्ता सीतलवाड़ अपने स्वार्थ सिद्ध करने में जुटी रहीं। उनकी भूमिका पर और छानबीन की जरूरत है। अदालत ने संजीव भट्ट और आरबी श्रीकुमार की ओर से झूठा हलफनामा दायर किए जाने का भी जिक्र किया था। वहीं, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने भी ए​क इंटरव्यू में कहा था कि तीस्ता सीतलवाड़ की एनजीओ ने गुजरात दंगों में फर्जी जानकारी फैलाने का काम किया था।

बता दें कि गुजरात दंगों में मारे गए सांसद एहसान जाफरी की बीवी जाकिया जाफरी को चेहरा बनाकर एक पूरा का पूरा गिरोह पिछले 2 दशक से इस मामले को हवा देने में लगा हुआ था। मुद्दे को गर्म रखने के लिए इन लोगों ने जान-बूझकर कुटिल चाल चली, जिससे इनकी मंशा पर सवाल खड़े होते हैं, ऐसा कहते हुए सर्वोच्च न्यायलय ने ऐसा करने वाले लोगों को जाँच के बाद न्याय के दायरे में लाने की सलाह दी थी।

गौरतलब है कि गुजरात दंगों को लेकर अफवाह फैलाने और झूठे खुलासे करने वाले इन तीनों के खिलाफ IPC की धारा-478, 471 (लोगों को भड़काने के लिए इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेजों का कपटपूर्ण इस्तेमाल), 194 (किसी को दोषी साबित करने के लिए झूठे साक्ष्य गढ़ना), 211 (किसी निर्दोष व्यक्ति को नुकसान पहुँचाने की मंशा से झूठे आरोप लगाना), 218 (लोक सेवकों द्वारा रिकार्ड्स को गलत तरीके से फ्रेम करना) और 120B के तहत मामला दर्ज किया गया है।

कश्मीर में हुआ हिन्दुओं का नरसंहार, श्रद्धांजलि दंगाइयों को: इतिहासकारों ने ऐसे बदल दी 13 जुलाई, 1931 की सच्चाई, ‘काफिर राजा’ के खिलाफ उतरी थी मुस्लिम भीड़

जम्मू कश्मीर के इतिहास में एक तारीख़ आई – 13 जुलाई, 1931, जिसके बारे में इतिहास में जो बताया गया वो वैसा नहीं था। अगर आप विकिपीडिया पर जाएँगे और इसके बारे में पढ़ेंगे तो आपको मिलेगा कि जम्मू कश्मीर के राजा हरि सिंह की सेना से लड़ते हुए 21 ‘मुस्लिम प्रदर्शनकारी’ मारे गए, इसीलिए इस दिन को ‘कश्मीरी शहीद दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा। इसे आधिकारिक छुट्टी का दर्जा भी दिया गया। हालाँकि, इस घटना की सच्चाई कुछ और है।

सामान्य इतिहास तो ये कहता है कि अब्दुल क़दीर नामक ‘एक्टिविस्ट’ को श्रीनगर सेंट्रल जेल में रखा गया था और बाहर प्रदर्शन कर रहे मुस्लिमों पर डोगरा सेना ने गोलियाँ चलाईं। उन्हें जहाँ दफनाया गया, ख्वाजा बहावुद्दीन नक्शबंदी के मजार के बगल में स्थित उस कब्रिस्तान को ‘मजार-ए-शुहदा’ के रूप में भी जाना गया। हालाँकि, दिसंबर 2019 में भारत सरकार ने इसे सरकारी छुट्टियों की सूची से हटा दिया। हाँ, पाकिस्तान में ज़रूर इसे छुट्टी के रूप में मनाया जाता है।

लेकिन, ये सोचने वाली बात है कि जहाँ से लाखों कश्मीरी पंडितों को भगा दिया गया, उनकी महिलाओं के बलात्कार हुए, निर्मम नरसंहार हुआ – वहाँ एक दिन को ‘शहीद दिवस’ घोषित कर दिया गया क्योंकि उस दिन कुछ ‘मुस्लिम प्रदर्शनकारियों’ की हत्या का दावा किया गया। कश्मीरी पंडितों का नरसंहार तो उस समय भी हो रहा था, लेकिन वो एक चरणबद्ध ढंग से शुरू हुआ। मुगलों के समय भी ऐसा होता था, इसीलिए ये नहीं कहा जा सकता कि कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार उस समय शुरू हुआ।

इस सम्बन्ध में कश्मीरी पंडित एक्टिविस्ट सुशील पंडित ने एक लेख में काफी अच्छे से समझाया था। वो मानते हैं कि आधुनिक कश्मीर का पहला नरसंहार तभी हुआ था, वो भी पूरी साजिश के साथ। सैकड़ों लोगों की हत्या कर दी गई, ज़िंदा जला दिया गया, विकलांग बना दिया गया और नदी में फेंक दिया गया। महिलाओं का यौन शोषण और बलात्कार हुआ। कइयों के घर लूट लिए गए तो कइयों को इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर किया गया।

उन्होंने बताया है कि कैसे जब पुलिस ने दंगाइयों पर कार्रवाई की तो उनमें से कुछ की मौत हो गई, जिसके बाद उनके गिरोह द्वारा उन्हें ‘शहीद’ बता दिया गया और स्वतंत्र भारत में जम्मू कश्मीर की नई सरकार ने उन आतंकियों के कृत्यों को ‘पवित्र’ बनाने के लिए नायकों की तरह उनका सम्मान करते हुए 13 जुलाई को उन्हें याद किया जाने लगा। आइए, अब जानते हैं कि असल में उस दिन हुआ क्या था। उस समय जम्मू कश्मीर के स्वायत्त राजा थे हरि सिंह।

तब जम्मू कश्मीर के साथ-साथ लद्दाख, गिलगिट-बाल्टिस्तान, मुजफ्फराबाद-मीरपुर और अक्साई चीन के अलावा शक्सगाम घाटी के इलाके भी उनके क्षेत्र का हिस्सा हुआ करते थे। लेकिन, अंग्रेज उनसे कुछ इलाके छीनना चाहते थे। महाराजा हरि सिंह उन दुर्लभ राजाओं में से एक थे, जिनका शासन मुस्लिम बहुल इलाके में था। इसीलिए, अंग्रेजों ने एक साजिश के तहत पेशवर के एक अहमदी अब्दुल क़दीर को खानसामा के वेश में श्रीनगर में स्थापित कर दिया।

इसके बाद ‘अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU)’ के शेख मोहम्मद अब्दुल्लाह को भी लाया गया। वो एक राजनीतिक महत्वाकांक्षा वाला व्यक्ति हुआ करता था, जिसकी पुश्तें आज भी जम्मू कश्मीर को अपनी बपौती समझती हैं। ख़ानक़ाह मोहल्ला स्थित ‘शाह-ए-हमदान’ में एक सार्वजनिक सभा हुई, जहाँ अब्दुल क़दीर ने एक भड़काऊ भाषण दिया। महाराजा के विरुद्ध जंग के लिए कुरान का हवाला दिया गया। उसने भड़काया कि एक ‘काफिर’ कैसे मुस्लिमों के ऊपर राज कर सकता है, इसकी इस्लाम में सख्त मनाही है।

कानून के अनुसार जिस गोहत्या पर प्रतिबंध था, उसके लिए उसने मुस्लिमों को खुल कर उकसाया। उसे जब राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया तो दंगे भड़क गए। कानूनी प्रक्रिया में बाधा डालने की कोशिशें हुईं। मज़बूरी में जेल परिसर में ही सुनवाई होती थी। 13 जुलाई को भी एक ऐसी ही सुनवाई थी। लेकिन, भीड़ ने वहाँ हमला कर दिया और जज के चैंबर में घुसने की कोशिश करने लगे। भीड़ ने पुलिस पर हमला बोल दिया और आगजनी शुरू कर दी।

जैसा कि आज भी होता है, जम कर मुस्लिम भीड़ ने पत्थरबाजी भी शुरू कर दी। जेल के कैदियों ने भी वहाँ से भागने का प्रयास शुरू कर दिया। पुलिस बल ने सारे पैंतरे आजमा लिए, लेकिन मुस्लिम भीड़ तितर-बितर नहीं हुई। कुछ कैदियों को भगा भी दिया गया। इसके बाद स्थानीय DM ने गोली चलाने के आदेश दिए। हरि पर्वत किले की तरफ भी भीड़ चल पड़ी थी। लाठीचार्ज का कोई असर नहीं हो रहा था। महराजगंज तब व्यापारियों का अड्डा हुआ करता था, जहाँ जम कर लूटपाट मचाई गई।

सुशील पंडित लिखते हैं कि इसके बाद भोरी कदल से लेकर आईकदल तक एक लंबी दूरी में हिन्दुओं की दुकानों को तहस-नहस कर दिया गया और चीजें लूट ली गईं। सफाकदल, गंजी, खुद और नवाकदल जैसे इलाकों में भी जम कर लूटपाट हुई। बाजार में बही-खातों को जला दिया गया और हिन्दू दुकानदारों में भगदड़ मच गई। लाखों के सामान लूट लिए गए, ये सड़कों पर तहस-नहस कर के फेंक दिए गए। हालाँकि, इस दौरान किसी मुस्लिम के दुकान में घुस कर लूटपाट की कोई खबर नहीं आई।

श्रीनगर के विचारनाग में मुस्लिम भीड़ अलग से जुटी हुई थी। वहाँ समृद्ध हिन्दुओं के साथ अत्याचार किया गया और उनकी महिलाओं का यौन शोषण हुआ। जब तक सेना आई, तब तक मुस्लिम भीड़ ने हिन्दुओं का बड़ा नुकसान कर दिया था। इसके बाद ‘बुद्धिजीवी’ गिरोह काम पर लगा और उसने इसे ‘सामंती सत्ता के विरुद्ध लोकतांत्रिक विद्रोह’ नाम दे दिया। याद कीजिए, मोपला मुस्लिमों द्वारा केरल में किए गए बड़े स्तर के नरसंहार को भी ‘जमींदारों के खिलाफ किसानों का विद्रोह’ कह दिया गया था।

जबकि, असल में कश्मीर में 13 जुलाई, 1931 को जो भी हुआ, वो एक हिन्दू राजा के विरुद्ध इस्लामी जंग था। शेख मोहम्मद अब्दुल्लाह का भी इन दंगों को भड़काने में बड़ा हाथ था। उसे गिरफ्तार कर जेल भी भेजा गया। हालाँकि, अगले ही साल महाराजा ने उसे माफ़ी दे दी और उसने ‘ऑल जम्मू एंड कश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस’ का गठन कर के लोगों को भड़काना शुरू कर दिया। मीरपुर में हिन्दुओं ने भाग कर जान बचाने की कोशिश की। बाद में उनमें से सैकड़ों को शरणार्थी बन कर रहना पड़ा।

उस समय इस घटना को देखने वाले बुजुर्गों ने बताया था कि कैसे कइयों को बेरहमी से मार डाला गया और इस्लाम अपनाने को भी कइयों को मजबूर किया गया। मंदिरों और गुरुद्वारों पर हमले की कई घटनाएँ सामने आईं। गुरुग्रंथ साहिब सहित कई पवित्र सनातनी पुस्तकों को जला दिया गया और देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को खंडित किया गया। इसे ’88 ना शौरांश’ कहते हैं, अर्थात 88 का नरसंहार। विक्रम संवत के हिसाब से तब 1988 चल रहा था।

उस घटना के बाद के सैकड़ों परिवार और उनकी पुश्तें दशकों तक पुनर्वास के लिए संघर्ष करती रहीं। खुद अंग्रेजी रिकार्ड्स की मानें तो 31 मंदिरों-गुरुद्वारों को पूरी तरह तबाह कर दिया गया। 600 के आसपास जबरन इस्लामी धर्मांतरण के मामले सामने आए। सुक्खचैनपुर और संवल (मीरपुर) के हिन्दुओं को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ। अंग्रेज लिखते हैं कि जहाँ भी दंगाई पहुँचे, स्थानीय मुस्लिम जनसंख्या ने उनका साथ दिया।

कुछ हिन्दुओं के गाँवों को तो एकदम से वीरान ही बना दिया गया, ऐसी लूटपाट और तबाही मचाई गई। इसके बाद 18 जनवरी, 1932 को भी हिन्दुओं के 50 गाँवों पर हमला हुआ और 300 घरों को लूटा गया। इनमें से 40 को आग के हवाले कर दिया गया। इतना ही नहीं, 40 हिन्दुओं को जबरन मुस्लिम बनाया गया। थन्ना गाँव में 20 जनवरी, 1932 को फिर से 36 घरों में लूटपाट हुई और 8 को फूँक दिया गया। सोहाना गाँव में 84 घरों में लूटपाट हुई और एक अन्य गाँव में 28 जनवरी को लूटपाट हुई।

जिस कश्मीर को महाराजा रणजीत सिंह ने अफगानों के चंगुल से छुड़ाया था और फिर डोगरा राजाओं ने हिन्दू शासन की स्थापना की, वहाँ के गैर-मुस्लिमों को सदियों के अत्याचार से राहत मिली। लेकिन, इस घटना के बाद से पुनः कश्मीर में पंडितों का नरसंहार शुरू हो गया। वहाँ भारत का संविधान स्वतंत्रता के बाद भी लागू नहीं हो पाया और मुट्ठी भर अलगाववादियों के अलावा अब्दुल्लाह-मुफ़्ती मिल कर यहाँ इस्लामी शासन चलाते रहे।

जुलाई 2020 में ऐसा पहली बार हुआ, जब कश्मीर में दंगाइयों को श्रद्धांजलि नहीं दी गई। मोदी सरकार के कारण ये संभव हो पाया। आधुनिक कश्मीर में हिन्दुओं को संगठित तरीके से खदेड़ना के कार्य तभी शुरू हुआ था। अंग्रेजों के षड्यंत्र और इस्लामी भीड़ की हिंसा ने एक हिन्दू सत्ता को उखाड़ने के लिए हिन्दुओं का नरसंहार किया और बाद में ‘बुद्धिजीवियों’ ने इसे एक अलग रंग दिया। महाराजा हरि सिंह ने इन घटनाओं की जाँच के लिए हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बरजोर दलाल की अध्यक्षता वाली एक समिति को दी।

महाराजा हरि सिंह ने लंदन के गोलमेज सम्मेलन में भारतीय एकता की बात की थी, उसी के बाद अंग्रेज सेनाधिकारी मेजर बोट ने अब्दुल कदीर नाम के पठान को वहाँ लाकर बसाया। ये सब एक साजिश का हिस्सा था। ब्रिटिश ने सत्ता सँभालने के बाद अब्दुल कदीर को 1.5 साल में ही रिहा कर दिया, जबकि उसे 5 साल की जेल हुई थी। कादियाँ नगर के अहमदिया समुदाय ने इस पूरे मामले में अंग्रेजो की खासी मदद की। इस रिपोर्ट में पता चला कि अंग्रेज अधिकारी वेकफील्ड जानबूझ कर उस दिन जेल के पास स्थिति को काबू करने नहीं गया, जबकि सुरक्षा का नियंत्रण उसके पास ही था।

4 जुलाई, 1931 को कुरान की बेअदबी की खबर सामने आई, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था। लेकिन, वेकफील्ड ने जाँच के बाद कुरान के तौहीन की बात प्रचारित की और मुस्लिमों को भड़काया। श्रीनगर में महाराजा हरि सिंह के खिलाफ भड़काऊ सामग्रियाँ भेजी गईं। वेकफील्ड की जगह प्रधानमंत्री बनाए गए हरि कृष्ण कौल ने मुस्लिम दंगाइयों से राज्य का समझौता कराया, लेकिन दंगे नहीं रुके। देश के कई हिस्सों में इस्लामी दंगों का पैटर्न यही रहा है, आज भी यही है।

आकाशगंगा के बीच में हुई जीवन की शुरुआत? वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष में खोजा RNA, पृथ्वी पर जीवन के विकास को लेकर खुलेगा रहस्य

डिऑक्सीराइबो न्यूक्लिक एसिड (DNA) की तरह ही जीवन के निर्माण में महती भूमिका राईबो न्यूक्लिक एसिड (RNA) का है। ये शरीर की संरचना को बनाने वाले कोशिकाओं के नाभि में पाया जाता है। अब वैज्ञानिकों के पाया है कि RNA का निर्माण करने वाले अणु अंतरिक्ष में आकाशगंगाओं को ढँके रखने वाले घने आणविक बादलों में पाए गए हैं।

इन बादलों में विभिन्न प्रकार के नाइट्रल्स (Nitriles) या यौगिक मिश्रण की एक बड़ी श्रृंखला है। ये कार्बन वाले अणु अकेले में बेहद जहरीले होते हैं, लेकिन जैसे ही उपयुक्त वातावरण में आते हैं, ये जीवन की उत्पत्ति करने वाले अणुओं के निर्माण में सहायक हो जाते हैं। यानी एक जहरीला अणु वातावरण के बदलाव के साथ ही जीवन निर्माण की प्रक्रिया का अंग बन जाता है।

आकाशगंगा के केंद्र में पहचाने गए प्रीबायोटिक अणुओं (जीवन के उद्भव में शामिल अणु) वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद करेगा कि इस धरती पर जीवन का विकास कैसे हुआ और उसमें ब्रह्मांड की इन शक्तियों या कहें अणुओं ने किसी रूप में भूमिका निभाई।

स्पैनिश नेशनल रिसर्च काउंसिल और नेशनल इंस्टीट्यूट के एस्ट्रोबायोलॉजिस्ट विक्टर रिविला का कहना है कि ब्रह्मांड में ये कार्बन वाले अणु आपस में मिलकर कई तरह की रासायनिक क्रिया करते हैं और यौगिक मिश्रण का निर्माण करते हैं। इस तरह ये आरएनए की दुनिया (RNA World) की संरचना करते हैं।

इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि संभवत: यहीं से जीवन की शुरुआत हुई और पृथ्वी पर आई। हालाँकि, जीवन की उत्पति आज भी वैज्ञानिकों के लिए एक बड़ा रहस्य है, लेकिन आकाशगंगा में RNA World की पहचान के साथ ही वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि अब इस रहस्य को इससे समझने में मदद मिलेगी।

एक धारणा यह भी है कि RNA सबसे पहले मेटाफोरिकल स्राव के रूप में आया, उसके बाद खुद में बदलाव करते हुए विभिन्न रूपों में परिवर्तित हुआ। इसे आरएनए वर्ल्ड हाइपोथिसिस (RNA World Hypothesis) कहा जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी से इसके प्रमाण मिलने की संभावना कम है, लेकिन RNA के प्रारंभिक अणु यहाँ तारों से आए, शुद्रग्रहों से आए या उल्कापिंडों से आए, इसकी जानकारी हासिल करना महत्वपूर्ण है।

रविला का कहना है कि सौर मंडल का जन्म बादल से लंबे समय से चला आ रहा है, लेकिन आकाशगंगा का केंद्र घने आणविक बादलों से बना है। इसे सेंट्रल मॉलिक्यूलर ज़ोन कहा जाता है और वैज्ञानिकों को वहाँ प्रीबायोटिक अणुओं का एक गुच्छा लटका हुआ मिला है।

इनमें G+0.693-0.027 नाम का एक विशेष बादल है। वहाँ अभी तक तारे के बनने का कोई प्रमाण नहीं है, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि भविष्य में वहाँ एक तारे का निर्माण होगा। रिविला ने कहा, “जी+0.693-0.027 की रासायनिक सामग्री हमारी आकाशगंगा में अन्य क्षेत्रों में तारों या धूमकेतु का निर्माण करने वाली सामग्री के समान है।” रिविला का मानना है कि इसके अध्ययन से नेबुला में उपलब्ध रासायनिक अवयवों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है, जो ग्रह प्रणाली को जन्म देते हैं।

G+0.693-0.027 से उत्सर्जन विशेषताओं का सावधानीपूर्वक अध्ययन और विश्लेषण करने के बाद रिविला और उनके सहयोगियों ने पाया कि वहाँ सायनिक एसिड, सायनोएलीन, प्रोपरगिल साइनाइड और सायनोप्रोपीन सहित नाइट्राइल की एक श्रृंखला की पहचान की। पिछले अवलोकनों में सायनोफॉर्मलडिहाइड और ग्लाइकोलोनिट्राइल की उपस्थिति का पता चला।

इससे पता चलता है कि आकाशगंगा में नाइट्राइल सबसे प्रचुर मात्रा में पाए जाने वाले रासायनिक परिवारों में से है और यह आरएनए के लिए सबसे बुनियादी बिल्डिंग ब्लॉक बादलों में पाए जाते हैं, जो तारों और ग्रहों के निर्माण में सहायक होते हैं।

वहीं, स्पैनिश नेशनल रिसर्च काउंसिल और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी के एस्ट्रोबायोलॉजिस्ट इजास्कुन जिमेनेज-सेरा का मानना है कि इतना पता लगाने के बाद भी अभी महत्वपूर्ण अणु लापता हैं और संभवत: उनका पता लगाना मुश्किल है।

उन्होंने कहा कि पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के लिए शायद लिपिड जैसे अन्य अणुओं की भी आवश्यकता होती है, जो पहली कोशिकाओं के गठन के लिए जिम्मेदार होते हैं। इसलिए यह समझना आवश्यक है कि तारों के बीच उपलब्ध सरल एवं महत्वपूर्ण अणुओं से लिपिड कैसे बन सकते हैं।

क्या है RNA

RNA जीवों के शरीर की कोशिका के कोशिका द्रव्य में पाया जाता है। हालाँकि, उसकी नाभिक के अंदर बहुत कम पाया जाता है। इसका उपयोग आनुवंशिक कोड को न्यूक्लियस से रैबोसोम में प्रोटीन बनाने के लिए और डीएनए ब्ल्यूप्रिंट के दिशानिर्देशों को ले जाने में किया जाता है।

सरल भाषा में कहें तो RNA एक प्रकार का न्यूक्लिक एसिड होता है, जो कोशिकाद्रव्य में पाया जाता है। यह यह शर्करा, नाइट्रोजन क्षार और फॉस्फेट ग्रुप से बना होता है। इसका प्रमुख काम प्रोटीन निर्माण में सहायता करना है। धन्या देने वाली बात ये है कि DNA एक आनुवांशिक पदार्थ है, वहीं RNA गैर-आनुवांशिक है। एक पीढ़ी के लक्षणों को दूसरी पीढ़ी में ले जाने में इसका कोई रोल नहीं होता है।

जानें अंजुमन तालीमुल इस्लाम के बारे में: इसके सदर-सेक्रेटरी समेत आधा दर्जन NIA की हिरासत में, कन्हैया लाल की हत्या से जुड़े हैं तार

नेशनल इन्वेस्टिंग एजेंसी (NIA) की टीम ने मंगलवार (12 जुलाई, 2022) को अंजुमन तालीमुल इस्लाम के सदर मुजीब सिद्दिकी और सेक्रेट्री फारुक सहित करीब आधा दर्जन आरोपितों को उदयपुर में हिरासत में लिया है। सभी आरोपितों को जयपुर ले जाया गया और उनसे कन्हैयालाल की गर्दन काटकर जघन्य हत्या के मामले में पूछताछ की जा रही है। माना जा रहा है कि एनआईए की टीम इन सभी को कभी भी गिरफ्तार कर सकती है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, हिरासत में लिए जाने से पहले, पिछली रात को ही उदयपुर के मुखर्जी चौक स्थित अंजुमन तालीमुल इस्लाम के सदर मुजीब सिद्दीकी के घर पर एनआईए ने तलाशी ली। इसी तरह, पूर्व सदर खलील अहमद सहित कुछ अन्य संदिग्धों को भी एनआईए ने हिरासत में लिया है। इनमें दो एडवोकेट और एक मौलाना भी बताए जा रहे हैं। वहीं आरोपितों के घर से हथियार बरामद होने की खबर भी सामने आई है।

क्या है अंजुमन तालीमुल इस्लाम और कैसे जुड़ी है इस मामले से

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अंजुमन तालीमुल इस्लाम उदयपुर के मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व करने वाला प्रमुख संगठन है। इस संगठन का गठन 116 साल पहले हुआ था। यहीं से जारी फतवों का पालन उदयपुर के सभी मुस्लिम करते हैं। इसी संस्था के बैनर तले नूपुर शर्मा के बयान के बाद विरोध में उदयपुर में हिंसक विरोध प्रदर्शन भी किए गए। संस्था ने तब कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर नूपुर शर्मा के खिलाफ त्वरित कार्रवाई की माँग की थी।

ज्ञापन में कहा गया था कि नूपुर शर्मा के बयान से मुस्लिम समुदाय आहत हुआ है। भारत का संविधान किसी भी अन्य धर्म पर अशोभनीय टिप्पणी करने का किसी को अधिकार नहीं देता है। लेकिन, मुंबई (Mumbai) में रजा एकेडमी द्वारा FIR दर्ज कराने के बावजूद नूपुर के खिलाफ न तो कानूनी कार्रवाई हुई है और न ही उसे गिरफ्तार किया गया है। इस पूरे विरोध प्रदर्शन में मुस्लिमों को भड़काने का मामला सामने आया था।

वहीं जब कन्हैयालाल की गौस मुहम्मद और रियाज अत्तारी द्वारा सर तन से जुदा की तर्ज पर हत्या कर दी गई तो यही संस्था अंजुमन तालीमुल इस्लाम आमजन से शांति एवं सौहार्द की अपील करती नजर आई। जबकि मुस्लिमों को उकसाने में इसका भी हाथ था।

वैसे यदि अंजुमन तालीमुल इस्लाम संस्था के औपचारिक कार्यों की बात की जाए तो इस संस्था द्वारा ही मुस्लिमों के ईद आदि त्योहारों की तिथि की घोषणा की जाती है। यह संगठन मुस्लिम समाज के बच्चों की तालीम यानी शिक्षा, रमजान के समय चाँद दिखने के विवाद का निपटारा करने, मदरसों को बढ़ाने, राज्य की मुस्लिम संस्थाओं को अंजुमन से जोड़ने के अलावा समाज के यतीम और गरीबों की आर्थिक रूप से मदद करने का काम करता है।

‘पिताजी को अस्पताल में गीता पढ़ने से रोक दिया’: तेज प्रताप का आरोप; उधर पर्ची देख कर भी ठीक से भाषण नहीं पढ़ पाए तेजस्वी यादव, देखें वीडियो

आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) इन दिनों दिल्ली एम्स में भर्ती हैं, लेकिन उनके नाम पर बिहार में सियासी पारा हाई है। लालू के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव (Tej Pratap Yadav) ने पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर हमला बोला है। तेज प्रताप ने ऐसे नेताओं पर जल्द कार्रवाई कर पार्टी से बाहर निकालने की धमकी भी दी है।

बिहार के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री तेज प्रताप यादव ने मंगलवार (12 जुलाई 2022) को अपने ट्वीट में कहा कि कुछ लोग उनके पापा की सेवा में कम और चापलूसी में ज्यादा लगे हुए हैं। ऐसे लोगों को जल्द ही पार्टी से बाहर निकाला जाएगा। लालू के बेटे ने लिखा, “पापा को परिवार और बिहार की जनता की जरूरत है ना कि चापलूसों की…..कुछ बाहरवाले लोग खुद को मुँह मिया मिठ्ठू बता रहे है, भोला भाला बन पिताजी की सेवा का दिखावा कर रहा..ऐसे कपटी और पाखंडी को जल्द बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा।”

इससे पहले तेज प्रताप ने एक और ट्वीट किया था, “पिताजी को अस्पताल में श्रीमद भगवत गीता का पाठ करने एवं सुनने से रोक दिया गया, जबकि पिताजी को गीता पाठ पढ़ना एवं सुनना काफी पसंद है……गीता पाठ से रोकने वाले वाले उस अज्ञानी को ये नहीं पता कि इस महापाप की कीमत उसे इसी जन्म में चुकानी होगी।”

सोशल मीडिया पर तेजस्वी यादव का मजाक उड़ाया जा रहा

इन सबके बीच सोशल मीडिया पर लालू के छोटे बेटे तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) का ठीक से हिंदी नहीं पढ़ने के कारण मजाक उड़ाया जा रहा है। वह अपने भाषण में लोकतंत्र, समक्ष जैसे आसान शब्दों को देखकर भी ठीक से नहीं पढ़ पा रहे हैं। इसको लेकर दिव्य कुमार सोटी ने लिखा, “लिखी हुई हिंदी भी नहीं पढ़ सकते। धन्य है देश की जनता जो जातिवाद के नाम पर इन जैसों को सांसद-विधायक चुनती है।”

इसके जवाब में एक अन्य यूजर ने लिखा, “जब तक सूरज चाँद रहेगा लालू का बेटा मेरा नाम रहेगा।”

एक और यूजर ने लिखा, “ये राहुल गाँधी के साथ ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी भी गया था।”

गौरतलब है कि 3 जुलाई की शाम को लालू प्रसाद यादव राबड़ी आवास में सीढ़ी से उतरने के दौरान गिर गए थे। गिरने की वजह से लालू यादव के दाएँ कंधे में माइनर फ्रैक्चर आ गया था। इसके बाद 4 जुलाई की सुबह उन्हें पटना के पारस अस्पताल में भर्ती करवाया गया था।

‘पहले हर काम पूछ कर करती थी, अब पैर पकड़ रहा फिर भी नहीं मान रही’: फहीम के लिए सबके सामने पिता से भिड़ गई 10वीं की लड़की

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के चौधरी चरण सिंह एयरपोर्ट पर मंगलवार (12 जुलाई, 2022) को बाराबंकी से भागे एक कपल को पकड़ा गया। इनका नाम संगीता और फहीम बताया जा रहा है। लड़की के पिता ने फहीम पर लव जिहाद का आरोप लगाया है। उन्होंने बीते दिनों जैदपुर थाने में उसके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराई थी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुंबई एयरपोर्ट से आए लड़का और लड़की को चौधरी चरण सिंह एयरपोर्ट पर परिजनों ने देखा। इस दौरान लड़की अपने पिता से भिड़ गई और उनके साथ जाने से मना कर दिया। इसके बाद जमकर मारपीट शुरू हो गई। सूचना पाकर मौके पर पहुँची सरोजनी नगर पुलिस ने दोनों को हिरासत में लेकर पूछताछ की तो लड़के ने अपना नाम फहीम व लड़की ने अपना नाम संगीता बताया।

सरोजनी नगर इंस्पेक्टर ने बताया कि बाराबंकी से भागे हुए एक लड़का और लड़की को एयरपोर्ट पर पकड़ा गया है। इंस्पेक्टर ने बताया कि लड़का मुस्लिम और लड़की हिंदू है, जिसके बाद बाराबंकी की जैदपुर पुलिस को सूचना दी गई। दोनों को पुलिस पकड़कर ले आई, क्योंकि वहीं पर लड़की के पिता ने एफआईआर दर्ज कराई थी।

बताया जा रहा है कि फहीम का संगीता के साथ काफी समय से प्रेम प्रसंग चल रहा था। वहीं पिता का कहना है कि उनकी बेटी नाबालिग है, जबकि लड़की खुद को 19 साल की बता रही है। पिता ने कहा कि वह 10वीं क्लास में पढ़ती है। अगर उसका मेडिकल करवाया जाए। तो साफ हो जाएगा कि वह नाबालिग है। इसके साथ ही उन्होंने आरोप लगाया कि फहीम ने उसकी बेटी को बातों में फँसाकर उससे निकाह कर लिया है, जो बेटी बिना पूछे कोई काम नहीं करती थी, वो आज पैर पड़ने के बाद भी उनके साथ नहीं जाना चाहती है।

बता दें कि पुलिस लड़की की सुपुर्दगी के लिए उसकी उम्र का पता लगाने में जुट गई है। अगर वह नाबालिग पाई जाती है, तो उसे उसके पिता को सौंप दिया जाएगा।

‘तब के विदेशी मंत्री सलमान खुर्शीद ने दिलवाया था वीजा’: जामा मस्जिद इमाम से भी मिला था हामिद अंसारी का ‘ISI वाला मेहमान’, भारत में ‘जासूसी’

पाकिस्तान के कॉलमनिस्ट नुसरत मिर्जा ने हाल ही में खुलासा किया कि कैसे वो उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी का मेहमान बन कर भारत आया था और उसने यहाँ पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी ISI के लिए सूचनाएँ इकट्ठी की। अब वो तस्वीरें सामने आई हैं, जिनमें वो कई कार्यक्रमों में भाग लेते हुए दिखाई दे रहा है। उसने ये भी खुलासा किया कि तत्कालीन केंद्रीय विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने उसे वीजा दिलवाया था। उस समय केंद्र में यूपीए की सरकार थी और कॉन्ग्रेस नेता मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री हुआ करते थे।

2007 और 2010 के बीच उसने अलीगढ़ और दिल्ली में आयोजित कार्यक्रमों में भाग लिया था। दिल्ली के ओबेरॉय इंटरनेशनल होटल में उसने आतंकवाद के खिलाफ आयोजित एक सम्मेलन में भाषण भी दिया था। ये कार्यक्रम 27 अक्टूबर, 2009 को हुआ था। इससे एक साल पहले मुंबई में ताज होटल सहित कई इलाकों में पाकिस्तानी आतंकियों ने कहर बरपाया था। एक तस्वीर सामने आई है, जिसमें जामा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुखारी झुक कर इस पत्रकार का अभिवादन कर रहे हैं।

‘आज तक’ ने इन तस्वीरों को लेकर अपनी रिपोर्ट में कई खुलासे किए हैं। याह्या बुखारी भी इस दौरान उसके साथ दिख रहे हैं। इस कार्यक्रम को ‘जामा मस्जिद यूनाइटेड फोरम’ ने आयोजित किया था, जिसमें तत्कालीन उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी के अलावा दिग्गज कॉन्ग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद भी मौजूद थे। नुसरत मिर्जा ने 2007 और 2010 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के कैनेडी ऑडिटोरियम में ‘स्टूडेंट सेमिनार’ में भी बतौर गेस्ट एक लेक्चर दिया था।

‘मिर्जा फाउंडेशन’ की वेबसाइट पर भी ये तस्वीरें उपलब्ध हैं। नुसरत मिर्जा ने बताया कि आम तौर पर वीजा के लिए अप्लाई करने पर तीन शहरों में ही जाने की इजाजत मिलती थी, लेकिन सलमान खुर्शीद कसूरी की मदद से उसने 7 जगहों का दौरा किया। उस दौरान वो भारत के विदेश मंत्री हुआ करते थे। 2010 में वो जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में एक कार्यक्रम में भी आया था। 2011 में वो ‘मिली गैजेट’ के जफरुल इस्लाम से मिला था, जिसे अरविंद केजरीवाल ने बतौर दिल्ली का मुख्यमंत्री दिल्ली में बड़ा पद दिया था।

हामिद अंसारी को लकेर नुसरत मिर्जा ने यूट्यूब पर किए थे खुलासे

पाकिस्तानी पत्रकार और YouTuber शकील चौधरी को रविवार (10 जुलाई, 2022) को दिए इंटरव्यू में नुरसत मिर्जा ने दावा किया कि उन्होंने 2005 से 2011 के बीच भारत दौरे के दौरान पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) के लिए कई जानकारियाँ एकत्र की थीं। उन्हें पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी और ‘मिल्‍ली गैजेट’ अखबार के मालिक जफरुल इस्लाम खान ने भारत में आमंत्रित किया था। सोशल मीडिया में उनका ये इंटरव्यू खूब वायरल हो रहा है।

इंटरव्यू के दौरान उन्होंने बताया, “मैंने पाँच बार भारत की यात्रा की। 2005 में चंडीगढ़ का दौरा किया और 2006 में हैदराबाद, बेंगलुरु और चेन्नई का दौरा किया। इसके बाद मैंने कोलकाता, पटना और अन्य स्थानों का दौरा किया।” उनके शब्दों में, “2010 में मुझे पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने आतंकवाद पर हुए एक सेमिनार में आमंत्रित किया था। हालाँकि मैं मानता हूँ कि हम भी बहुत बड़े एक्सपर्ट नहीं हैं, लेकिन हम मुगल हैं। हमने सदियों तक भारत पर राज किया है। मैं उनकी संस्कृति को समझता हूँ। हम वहाँ के हालात से अच्छी तरह वाकिफ हैं।”

उसने आगे कहा था, “हम उनकी कमजोरियों के बारे में भी जानते हैं, लेकिन मसला ये है कि मैंने भारत के बारे में जो भी जानकारी इकट्ठा की थीं, उसका इस्तेमाल पाकिस्तान में अच्छे नेतृत्व की कमी के कारण नहीं हो रहा है। पाकिस्तान में ऐसा कोई शख्स नहीं है, जो मेरे तर्जुबे से इत्‍तेफाक रखे। क्या आप जानते हैं कि पाकिस्तान में क्या समस्या है? जब कोई नया चीफ आता है, तो वह पिछले चीफ द्वारा किए गए सभी कार्यों को दरकिनार कर नए सिरे से कार्य शुरू करता है।”

कश्मीर के लाल बाजार इलाके में पुलिस नाके पर आतंकियों ने की फायरिंग: हमले में एक जवान बलिदान, दो गंभीर रूप से घायल

जम्मू-कश्मीर (Jammu-Kashmir) की राजधानी श्रीनगर (Srinagar) में इस्लामिक आतंकियों ने मंगलवार (12 जुलाई 2022) की शाम को हमला कर दिया, जिसमें एक जवान वीरगति को प्राप्त हो गए। वहीं, इस आतंकी हमले में दो जवान घायल बताए जा रहे हैं।

मृतक जवान की पहचान जम्मू-कश्मीर पुलिस के दारोगा (ASI) मुश्ताक अहमद के रूप में है। वहीं, घायल जवानों को नजदीकी अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया है। घायल जवानों में एक हेड कॉन्स्टेबल और एक एसपीओ अबु बकर बताए जा रहे हैं।

पुलिस ने बताया कि श्रीनगर के लाल बाजार इलाके में एक स्कूल के पास पुलिस की एक नाका पार्टी पर आतंकियों ने फायरिंग की। इस फायरिंग में पुलिस के तीन जवान घायल हो गए और उन्हें उपचार के लिए अस्पताल ले जाया गया। उपचार के दौरान ASI मुश्ताक अहमद ने दम तोड़ दिया। आतंकियों की तलाश में पुलिस, सेना और CRPF की संयुक्त टीम ऑपरेशन कर रही है।

इससे पहले सोमवार (11 जुलाई 2022) को पुलवामा में जवानों ने दो आतंकियों को ढेर कर दिया था। इनमें से एक जैश-ए-मोहम्मद का शीर्ष आतंकी कैसर कोका (Kaisar Koka) शामिल था। दरअसल, अवंतीपोरा में सुरक्षाबलों ने घेराबंदी की थी। इस दौरान पुलिस को अमेरिका निर्मित एक राइफल, एक पिस्तौल और गोला-बारूद बरामद हुआ था।

राजनाथ सिंह ने उद्धव ठाकरे को बोला ‘अस्सलामु अलैकुम’ तो भड़क गए शिवसेना प्रमुख, जानें क्या है मामला: रिपोर्ट

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने उस समय अपना आपा खो दिया जब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ‘अस्सलामु अलैकुम’ के साथ उनका अभिवादन किया। महाराष्ट्र टाइम्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि राजनाथ सिंह ने ऐसा तब किया जब वे जब एनडीए के राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू के लिए समर्थन माँगने के लिए उन्हें फोन किया था।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, उद्धव ठाकरे ने मातोश्री स्थित अपने आवास पर शिवसेना के शेष विधायकों के साथ बैठक के दौरान इस घटना के बारे में बात की। उद्धव ने बैठक में राजनाथ सिंह के साथ अपने फोन कॉल को याद करते हुए कहा, “हम महा विकास अघाड़ी गठबंधन का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन हमने हिंदुत्व को नहीं छोड़ा है।”

बता दें कि उद्धव ठाकरे ने मंगलवार (12 जुलाई, 2022) को शिवसेना के उन विधायकों के साथ अपने आवास मातोश्री में एक बैठक बुलाई थी जो अभी भी उनके प्रति वफादार हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि बैठक में 30 से 35 सदस्यों ने भाग लिया, हालाँकि इसमें ठाकरे आवास पर बैठक में मौजूद सदस्यों के नामों का खुलासा नहीं किया गया है। बैठक के दौरान, उद्धव ने कहा कि उन्हें केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह का फोन आया, जिन्हें एनडीए के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए विपक्षी दलों के बीच आम सहमति बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

हालाँकि, राजनाथ सिंह के अभिवादन ‘अस्सलामु अलैकुम’ ने महाराष्ट्र के पूर्व सीएम का पारा हाई कर दिया, जो कथित तौर पर केंद्रीय मंत्री द्वारा उन्हें बधाई देने के लिए अरबी अभिवादन के इस्तेमाल से भौचक रह गए थे।

बता दें कि ‘अस्सलामु अलैकुम’ अरबी शब्द हैं जिसका इस्तेमाल मुस्लिम एक-दूसरे को दुआ-सलाम करने के लिए करते हैं। वहीं केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह की बातें सुनकर, उद्धव ठाकरे का गुस्सा भड़क गया और उन्होंने कथित तौर पर कहा, “भले ही हम महा विकास अघाड़ी गठबंधन का हिस्सा थे, पर हमने हिंदुत्व को नहीं छोड़ा है। आपको इसे ध्यान में रखना चाहिए।”

रिपोर्ट के अनुसार, ठाकरे की अस्वीकृति के बाद, राजनाथ सिंह ने उन्हें “जय श्री राम” के साथ शुभकामनाएँ दी।

उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना पर हिंदुत्व को धोखा देने का आरोप

गौरतलब है कि 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद जब से शिवसेना ने उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों कॉन्ग्रेस और एनसीपी के साथ सरकार बनाने के लिए गठबंधन किया है, तभी से मुख्यमंत्री पद की खातिर हिंदुत्व का त्याग करने का आरोप लगता रहा है।

वहीं शिवसेना के हिंदुत्व के मुद्दे को छोड़ने का पहला संकेत तब सामने आया जब महा विकास अघाड़ी सरकार के सहयोगियों के बीच एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम (सीएमपी) तैयार किया गया था। उसको देखकर ऐसा लगा था कि सत्ता की भूख में शिवसेना ने हिंदुत्व का त्याग कर दिया था। दरअसल, ऐसी अटकलें थीं कि कॉन्ग्रेस और एनसीपी शिवसेना से आश्वासन चाहते थे कि सरकार बनने के बाद उनका हिंदुत्व का एजेंडा पीछे रहने वाला है।

गौरतलब है कि एनसीपी और कॉन्ग्रेस के साथ सरकार बनाने के बाद, शिवसेना ने हिंदुत्व के विचारक और स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के लिए भारत रत्न की अपनी माँग को पीछे छोड़ दिया था। यह दर्शाता है कि शिवसेना अब हिंदुत्व को उतनी तीव्रता से आगे नहीं बढ़ाएगी, जितनी पहले कभी किया करती थी। महाराष्ट्र में मुस्लिमों के लिए 5 प्रतिशत तक का आरक्षण एक और ऐसी घटना थी जिसने यह और साफ़ कर दिया था कि शिवसेना ने हिंदुत्व के अपने अजेंडे को छोड़ दिया है।

वहीं हाल ही में, महाराष्ट्र में सरकार चलाने के ढाई साल बाद, शिवसेना के वरिष्ठ नेता एकनाथ शिंदे नेतृत्व में पार्टी के कई विधायकों ने हिंदुत्व के साथ विश्वासघात का ही हवाला देते हुए उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत कर दी थी। इस विद्रोह के परिणामस्वरूप ही महा विकास अघाड़ी सरकार का पतन हुआ, जिसके बाद एकनाथ शिंदे भाजपा के समर्थन से महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने।