Home Blog Page 2566

फिल्म निर्देशक अविनाश दास को गुजरात पुलिस ने दबोचा: शेयर की थी तिरंगे के साथ महिला की अश्लील तस्वीर, अमित शाह को लेकर फैलाया झूठ

फिल्म निर्देशक अविनाश दास को गुजरात पुलिस ने हिरासत में ले लिया है। उन्हें अहमदाबाद की DCB (डिटेक्शन ऑफ क्राइम ब्रांच) ने मंगलवार (19 जुलाई, 2022) की दोपहर को उनके मुंबई स्थित आवास से उठाया। उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की एक तस्वीर शेयर की थी और उन्हें झारखंड की IAS अधिकारी पूजा सिंघल के साथ दिखाया था। बता दें कि मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में पूजा सिंघल ED द्वारा गिरफ्तार की जा चुकी हैं।

इस सम्बन्ध में 13 मई, 2022 को अहमदाबाद के DCB पुलिस स्टेशन में अविनाश दास के विरुद्ध FIR दर्ज की गई थी। साथ ही उन पर राष्ट्रीय ध्वज के अपमान का भी आरोप है। अपने फेसबुक हैंडल पर शेयर की गई एक तस्वीर में उन्होंने एक महिला को तिरंगा झंडा पहने हुए दिखाया था। अविनाश दास पर IPC की धारा-469 (जालसाजी) के साथ-साथ IT एक्ट की धारा–67 और ‘राष्ट्रीय गौरव का अपमान निवारण अधिनियम, 1971’ के तहत भी बुक किया गया है।

46 वर्षीय अविनाश दास ‘अनारकली ऑफ आरा (2017)’ फिल्म बना चुके हैं, जिसमें स्वरा भास्कर और संजय मिश्रा मुख्य किरदारों में थे। पिछले साल उनके द्वारा निर्देशित ‘रात बाकी है’ रिलीज हुई थी, जिसमें अनूप सोनी और राहुल देव दिखे थे। साथ ही ‘MX Player’ पर ‘रनवे लुगाई’ नामक 10 एपिसोड वाली सीरीज का उन्होंने निर्देशन किया था। उन्होंने ‘द बैटल ऑफ बनारस’ नामक एक डॉक्यूमेंट्री बनाई और आमिर खान के टीवी चैट शो ‘सत्यमेव जयते’ से भी जुड़े रहे।

हाल ही में इसी मामले में जमानत के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट पहुँचे थे, लेकिन सफल नहीं हुए। पिछले एक सप्ताह से DCB की टीम उन्हें दबोचने के लिए मुंबई में थी। जब उन्हें गिरफ्तार किया गया, तब वो आवास से दफ्तर के लिए निकले थे। उन्हें अहमदाबाद ले जाया जा रहा है। प्रोपेगंडा फैलाने में भी अविनाश दास का कोई सानी नहीं है। उन्होंने अमित शाह और पूजा सिंघल की जो तस्वीर शेयर की, वो 2017 की थी। उन पर जनता को गुमराह करने और मानहानि के आरोप हैं।

अविनाश दास की कारस्तानियाँ तिरंगे के साथ महिला की अश्लील तस्वीर शेयर करने और अमित शाह की पुरानी तस्वीर शेयर कर उन्हें बदनाम करने की कोशिश करने तक ही नहीं हैं। पत्रकार उत्पन्ना चक्रवर्ती द्वारा साझा किए गए चैट्स में अविनाश ने उन्हें लिखा था कि तुम कुछ ज्यादा ही सख्त हो और मुझे पसंद हो। उन्होंने उनके खाने-पीने और खर्चा उठाने तक की बातें की थीं। उत्पन्ना ने पूछा था कि परेशानी से घिरी नौकरी चाहने वाली एक लड़की से इस तरह बात करने के पीछे क्या मंशा है?

मदर-फादर, ब्रदर-सिस्टर… सारे शब्द बैन: ‘वोक कल्चर’ में डूबा मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी, छात्रों को रोबोट बनाने की तैयारी

ब्रिटेन की जानी-मानी मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी (Manchester University) के कुछ वोक लोगों ने भाषा को समावेशी बनाने के नाम पर गिने-चुने शब्दों को ‘अपमानजनक’ करार देते हुए उन पर प्रतिबंध लगाया है। इन अपमानजनक शब्दों की लिस्ट में उन्होंने भाई-बहन, मम्मी-पापा और पति-पत्नी को भी जोड़ा है।

वोक यूनिवर्सिटी का कहना है कि अगर अगर छात्र-छात्राओं को ये शब्द इस्तेमाल करने ही हैं तो वो भाई-बहन (ब्रदर-सिस्टर) की जगह सिबलिंग (SIBLING) बोलें। मम्मी-पापा की जगह ‘पेरेंट्स या गार्जियन (Parents or Guardian)’ बोलें। पति-पत्नी की जगह ‘पार्टनर (Partners)’ शब्द का प्रयोग किया जाए।

इसके अलावा यूनिवर्सिटी में Elderly शब्द भी बैन हो गया है और इसके पीछे वजह दी गई है कि ये सब बुजुर्ग लोगों के हित में किया गया है।

द सन की रिपोर्ट के अनुसार, स्टाफ और छात्रों के लिए यूनिवर्सिटी द्वारा निकाली गई ‘इन्क्लूसिव लैंगुएज गाइड’ में कहा गया है कि यूनिवर्सिटी अंतर और विभिन्नताओं का सम्मान करती है और ऐसे माहौल को बनाना चाहती है जहाँ हर कोई अपनी पूरी काबिलियत का इस्तेमाल करने में सक्षम हो।

शब्दों पर लगाए गए प्रतिबंध को लेकर गाइड के बारे में कहा गया है कि, “हम जिस ढंग से लोगों के बारे में लिखते हैं वह समानता, विभिन्नता और समावेश को बढ़ावा देता है।”

बता दें कि यूनिवर्सिटी द्वारा लिए गए इस फैसले को सांसद निगल मिल्स ने हैरान करने वाला कहा और बोले कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी ख्यला किया जाना चाहिए। वहीं सोशल मीडिया पर लोगों ने इस तरह की खबर को पढ़कर कहना शुरू कर दिया है कि किसी को अपने बच्चों को इस यूनिवर्सिटी में नहीं भेजना चाहिए। ऐसी यूनिवर्सिटी सिर्फ बच्चों के करियर को बर्बाद करती हैं।

मालूम हो कि मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी से पहले ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी ने ‘मैनिंग’ शब्द पर प्रतिबंध लगाया था और ‘नॉन-डिसेबल’ शब्द को able-bodied किया गया था। इसके अलावा मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी में ही पिछले साल मदर-फादर शब्द को हटाए जाने पर पहले भी बवाल हो चुका है।

लोगों ने सवाल किया था कि क्या ये सोचा जा सकता है कि बच्चे अपने माता-पिता को घर में पेरेंट बोल रहे हैं। इस नई गाइड पर आपत्ति इसलिए भी थी क्योंकि इसका अनुसरण करके कोई व्यक्ति किसी रोबोट की तरह लगता जिसे भावनाओं की कदर न होकर बस शब्द रटा दिए गए हैं। लोगों ने पूछा था कि जितना दर्द माँ को बच्चा पैदा करने में होता है क्या उतना ही दर्द पेरेंट होता है।

पुलिस को ‘सांप्रदायिक एंगल’ नकारने की इतनी जल्दी क्यों? पुराना पड़ा ये फॉर्मूला, ‘आपसी विवाद’ की आड़ में नहीं हो सकती जिहादी सोच वाली घटनाएँ?

भारत में हर राज्य की पुलिस को एक बीमारी है, खासकर गैर-भाजपा शासित राज्यों में ये ज्यादा देखने को मिलती है। जब भी कोई ऐसी घटना होती है तो उसमें सबसे पहले बयान दिया जाता है कि कोई कम्युनल एंगल नहीं है, इसके बाद जाँच होती है और आगे की पृष्ठभूमि तैयार की जाती है। जब बाकी बातें जाँच के बाद पता चलती हैं तो संप्रदायिक एंगल को नकारने की ऐसी कौन सी हड़बड़ी होती है, ये कौन सा कीड़ा पुलिस को काटे रहता है?

आइए, एकाध उदाहरण देखते हैं। जैसे, आप खुद देखिए। राजस्थान में कन्हैया लाल की हत्या से पहले करौली से लेकर जोधपुर तक में दंगे हुए, लेकिन राजस्थान पुलिस कम्युनल एंगल को नकारने में ही लगी रही। जोधपुर में दो समूहों के बीच पत्थरबाजी और हिंसा होती है, लेकिन पुलिस कहती है कोई सांप्रदायिक एंगल नहीं है। इस तरह की हर एक घटना में कम्युनल एंगल को नकार देने से क्या एक स्थायी शांति आ जाती है या फिर जिहादी फिर से सक्रिय नहीं होते?

ताज़ा मामला देखिए। बिहार के सीतामढ़ी में अंकित झा नाम के एक युवक को बीच बाजार दौड़ा-दौड़ा कर कुछ लोगों ने चाकू मार दिया। आरोप है कि नूपुर शर्मा का वीडियो देखने के कारण उस पर हमला हुआ। बिहार पुलिस इससे इनकार करते हुए इसे आपसी विवाद बता रही है। यहाँ ये सवाल भी जायज हो जाता है कि क्या आपसी विवाद और सांप्रदायिक हिंसा एक साथ नहीं हो सकती? आपसी विवाद सांप्रदायिक सोच के कारण और नहीं भड़क सकती?

फिर पुलिस कैसे कह सकती है कि आपसी विवाद है तो सांप्रदायिक जंगल होगा ही नहीं। जिहादी तो आपसी विवाद की आड़ में भी हिंसा कर सकते हैं और जिहाद के तहत हत्या जैसी घटनाओं को अंजाम दे सकते हैं। जब दंगे होते हैं तो वो भी तो आपसी विवाद को लेकर शुरू होता है। हिन्दू त्योहारों के जुलूस पर हमले, DJ पर आपत्ति जता कर पत्थरबाजी और छेड़खानी का विरोध करने पर हिंसा – इन सबकी शुरुआत आपसी विवाद से ही होती है लेकिन घटना सांप्रदायिक हो जाता है।

नूपुर शर्मा के समर्थन को लेकर अमरावती में केमिस्ट उमेश कोल्हे का गला रेते जाने की घटना को ही ले लीजिए। उनकी हत्या के बाद भी पुलिस मामले को रफा-दफा करने को लगी रही। लेकिन, महाराष्ट्र में सरकार बदलते ही सब दूध का दूध और पानी का पानी हो गया। एक पूरे गिरोह का पर्दाफाश हुआ। कोल्हे के करीबियों ने ही उन्हें मरवा दिया, क्योंकि वो नूपुर शर्मा के समर्थन पर गुस्सा थे। पुलिस ‘सारे एंगल की जाँच करने’ की बात कहते हुए पहले टाल रही थी।

हो सकता है कि पुलिस को ऐसा लगता हो कि अगर किसी घटना के सम्बन्ध में पहले ही सांप्रदायिक कोण को नकार दिया जाए तो इससे विभिन्न समूहों में हिंसा की संभावना घटेगी और क्रिया की प्रतिक्रिया नहीं होगी। पुलिस को लगता है कि कम्युनल एंगल वाली बात खोल देने पर शायद हिंसा और बढ़ जाए और उसकी चुनौतियाँ भी बढ़ जाएँ। शायद इसीलिए, शांति बनाए रखने के लिए वो कम्युनल एंगल को नकारने का फॉर्मूला अपनाती है, और कारण के रूप में अन्य चीजों को गिनाया जाता है।

ये अन्य फैक्टर्स भी कारण हो सकते हैं। ऐसा नहीं है कि कम्युनल एंगल आ गया तो बाकी सारे एंगल झूठे हो जाते हैं। लेकिन, जिहादी सोच के साथ की गई हत्या में प्रमुखतः जो मुख्य कारण होता है उसे उठाया जाना चाहिए। जहाँ हिन्दू पीड़ित होते हैं, वहाँ खासकर पुलिस का रवैया इसी तरह का होता है। उनके लिए तो मीडिया तक आवाज़ नहीं उठाती। क्या कम्युनल अपराध को कम्युनल अपराध कहना इतना खतरनाक है कि इस पर पुलिस आपको गिरफ्तार भी कर लेगी?

वहीं मुस्लिमों के मामले में क्या होता है? साधारण अपराध की घटनाओं को भी ‘कम्युनल एंगल’ देकर हिन्दुओं को अत्याचारी बताया जाता है। उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में एक ट्रेन डकैती की घटना को मीडिया ने कम्युनल बताते हुए लिखा कि मुस्लिम परिवार को लूटा गया। दिल्ली के मंगोलपुरी में रिंकू शर्मा की हत्या के मामले में पुलिस ने जाँच में कम्युनल एंगल पाया तो मीडिया ही इसे नकारने लगी। जबरन ‘जय श्री राम’ बुलवाने और दाढ़ी नोचने के कई झूठे मामले पकड़ में आ ही चुके हैं। फिर हिन्दू-मुस्लिम के मामले में ये दोहरा रवैया क्यों?

आजकल के माहौल में जब हजारों की मुस्लिम भीड़ कई शहरों में बाहर निकल कर ‘सिर तन से जुदा’ के नारे लगाती हो, वहाँ किसी हिन्दू का सिर कलम किए जाने के बाद इसे सांप्रदायिक हत्याकांड ही कहा जाएगा, चाहे मुस्लिम अपराधी के साथ उसकी दोस्ती रही हो, दुश्मनी रही हो या कोई आपसी विवाद। जिहादियों में कई खुलेआम हत्याएँ कर के वीडियो बनाते हैं, जैसा कन्हैया लाल के मामले में हुआ। तो कई अन्य विवाद की आड़ में इस्लाम के लिए जिहाद करते हैं।

कहने को तो पश्चिम बंगाल में हिन्दू पर्व-त्योहारों पर उनके जुलूस पर होने वले हमलों से लेकर चुनाव नतीजों के बाद ‘राजनीतिक हिंसा’ की आड़ में हिन्दुओं पर अत्याचार की घटनाएँ भी आधिकारिक रूप से सांप्रदायिक नहीं है, लेकिन क्या कई मामलों में सांप्रदायिक सोच वाले कट्टर मुस्लिमों ने इसकी आड़ में हिन्दुओं के प्रति अपना गुस्सा नहीं निकाला? चूँकि उस समय वो हिन्दू नहीं ‘भाजपा कार्यकर्ता’ थे, इसीलिए ये सांप्रदायिक एंगल नहीं हुआ।

अक्टूबर 2021 में सीलमपुर में भारत-पाकिस्तान मैच के दौरान इस्लामी जिहादियों ने एक 2 माह के बच्चे और उसके परिवार पर हमला बोल दिया। पुलिस ने मामले दर्ज करने से पहले ही कम्युनल एंगल को नकार दिया। इस घटना के बाद बिना पीड़ितों की बात सुने अपने हिसाब से FIR लिख दी गई, पीड़ितों ने ऐसे आरोप लगाए। उसी साल अक्टूबर में रघुबीर नगर में डब्लू सिंह को मार डाला गया। मृतक की माँ कहती रहीं कि बेटे ने इस्लामी धर्मांतरण न करने की कीमत चुकाई है और दिल्ली पुलिस कम्युनल एंगल नकारती रही।

अब समय आ गया है जब पुलिस को हड़बड़ी में किसी भी घटना में ‘आपसी विवाद’ या अन्य कारण साबित करने के लिए तुरंत कम्युनल एंगल को नकारने से बचना चाहिए। किसी जिहादी का अपने हिन्दू पड़ोसी से जमीन का विवाद हो और वो उस ‘काफिर’ को मार डाले, फिर आधिकारिक रूप से तो ये ‘संपत्ति विवाद में हत्या’ हो गई, लेकिन क्या इसके पीछे उसकी जिहादी सोच ढक दी जाएगी? कम्युनल एंगल के पीछे कई अन्य कारण भी हो सकते हैं।

केरल में RSS कार्यकर्ताओं को निशाना बनाए जाने की घटनाएँ हों या पश्चिम बंगाल में BJP कार्यकर्ताओं को, राजनीतिक लड़ाई की इस आड़ में सांप्रदायिक रोटी भी सेंकी जा रही है। ‘लोन वुल्फ’ हमले हों या फिर ‘लव जिहाद’ के मामले, इन सबके पीछे एक ही जिहादी सोच काम करती है। पुलिस का ये फॉर्मूला अब पुराना हो चुका है और इससे जिहादियों का मनोबल बढ़ ही रहा है। जहाँ तक हिन्दुओं की बात है, वो घटना में आरोपितों के नाम देख कर ही मामला समझने लगे हैं।

अवैध खनन रोकने गए DSP सुरेंद्र सिंह पर माफियाओं ने चढ़ाया डम्पर, मौके पर मौत: रोहिंग्या बस्तियों के लिए कुख्यात नूँह की घटना

हरियाणा स्थित मेवात के नूँह में DSP सुरेंदर सिंह बिश्नोई पर अवैध खनन माफियाओं ने पत्थर से लदे डम्पर चढ़ा दिया, जिससे उनकी मौत हो गई है। ये घटना उस वक्त हुई, जब पुलिस नूँह के पचगाँव की पहाड़ियों में अवैध खनन माफियाओं को पकड़ने गई थी। घटना के दौरान कुचले जाने से डीएसपी बिश्नोई की मौके पर ही मौत हो गई। वह इसी साल रिटायर होने वाले थे। यह वारदात आज मंगलवार (19 जुलाई, 2022) दोपहर सवा 12 बजे की बताई जा रही है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, डिप्टी एसपी को आज सुबह करीब 11 बजे इस बात की सूचना मिली थी कि इस जगह पर खनन किया जा रहा है। इसके बाद वह साढ़े 11 बजे अपने स्टाफ के साथ मौके पर पहुँचे। ऐसा बताया जा रहा है कि पुलिस को देखकर अवैध खनन माफिया भागने की कोशिश करने लगे और इसी दौरान वे डीएसपी को रौंदते हुए आगे बढ़ गए और डीएसपी की मौके पर ही मौत हो गई।

इसे जिले की खनन माफियाओं की हिस्ट्री में अब तक कि सबसे बड़ी घटना माना जा रहा है। वहीं डिप्टी एसपी की हत्या की खबर से पूरे पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया है। हालाँकि, वारदात के बाद पूरे क्षेत्र में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।

वहीं मौके पर पहुँचे नूह एसपी और आईजी ने आरोपित खनन माफियाओं को पकड़ने के लिए सर्च ऑपरेशन शुरू कर दिया है। जगह-जगह दबिश दी जा रही है।

बता दें कि इस मामले में हरियाणा की नूँह पुलिस का बयान भी सामने आया है। पुलिस ने भी अपने बयान में घटना की पुष्टि करते हुए कहा, “तावडू (मेवात) के DSP सुरेंदर सिंह बिश्नोई नूँह में अवैध खनन की घटना की जाँच के लिए गए थे। यहाँ पर डम्पर चालक ने कुचलकर उनकी हत्या कर दी। आरोपित की गिरफ्तारी के लिए तलाशी अभियान जारी है।”

हरियाणा पुलिस ने उनके परिवार के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की है। साथ ही कहा है कि अपराधियों को न्याय के कटघरे में लाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।

गौरतलब है कि हरियाणा में पहले भी इस तरह के मामले सामने आए हैं। इससे पहले सोनीपत में अवैध खनन करने वाले माफिया गिरोह ने स्पेशल इन्फोर्समेन्ट टीम पर हमला किया था। इस घटना में एक ASI की वर्दी फाड़ दी गई थी और सिपाही को पीटा गया था।

नूपुर शर्मा को सुप्रीम कोर्ट से मिली अंतरिम राहत, पैगंबर मामले में किसी भी कड़ी कार्रवाई पर रोक: 10 अगस्त को अगली सुनवाई

नूपुर शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में दोबारा याचिका डाल कर अपने खिलाफ दर्ज सभी FIR को किसी एक जगह हस्तानांतरित करने और गिरफ़्तारी से अंतरिम राहत की गुहार लगाई है। एक बार फिर से जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच ने इस पर सुनवाई की। नूपुर शर्मा ने याचिका में कहा कि जजों की टिप्पणी के बाद उन्हें और उनके परिवार को लगातार बलात्कार और हत्या की धमकियाँ मिल रही हैं। पिछली बार इन दोनों जजों ने उन पर तल्ख़ टिप्पणी की थी।

नूपुर शर्मा के वकील मनिंदर सिंह ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि कैसे पाकिस्तान से कुछ लोगों द्वारा नूपुर शर्मा की हत्या की साजिश रचने की खबर आई है और पटना में पकड़ाए आतंकियों के भी उनकी हत्या की साजिश रचने की बात पता चली है। इस पर जस्टिस सूर्यकान्त ने कहा कि एक मिश्रित तरह का एप्लीकेशन दायर करने के बाद वो इन घटनाओं का जिक्र कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि 3-4 अन्य FIR भी दर्ज कर लिए गए हैं।

जस्टिस सूर्यकान्त ने इस पर जोर दिया कि वो कम से कम किसी एक जगह, दिल्ली हाईकोर्ट तो जा सकती हैं, अगर जीवन पर खतरे को लेकर अलग-अलग जगह की यात्रा में सक्षम नहीं हैं तो? वकील ने बार-बार कहा कि एक ही आरोप के लिए कई FIR दर्ज कर लिए गए हैं, ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी राहत प्रदान किया है। सुप्रीम कोर्ट को दी गई दलील में नूपुर शर्मा की तरफ से बताया गया कि जान पर खतरा होने के कारण वो अन्य विकल्पों का इस्तेमाल करने में सक्षम नहीं हो पा रही हैं और सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद-21 का संरक्षक है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “अनुच्छेद-21 के तहत ये समय की आवश्यकता है कि हम उनके जीवन और लिबर्टी की रक्षा करें।” नूपुर शर्मा ने अजमेर शरीफ दरगाह का खादिम सलमान चिश्ती द्वारा नूपुर शर्मा की हत्या की घोषणा करते हुए वीडियो जारी करने वाली घटना का भी जिक्र किया। कोलकाता पुलिस ने लुकआउट नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने कहा कि पहली प्राथमिकता ये है कि नूपुर शर्मा को वैकल्पिक व्यवस्थाओं तक पहुँच सुनिश्चित की जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने इसके साथ ही रेस्पोंडेंट्स को नोटिस जारी करने का आदेश दिया। साथ ही अगली सुनवाई के लिए 10 अगस्त, 2022 की तारीख़ तय की। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि अगली सुनवाई तक नूपुर शर्मा के विरुद्ध दर्ज सारे FIR के मामले में कोई कड़ी कार्रवाई न की जाए। इसके साथ ही नूपुर शर्मा को सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम राहत प्रदान किया। अगली सुनवाई में मामला दिल्ली हाईकोर्ट में भी ट्रांसफर किया जा सकता है।

इसके बाद 1 जुलाई, 2022 को उन्होंने अपनी इस याचिका को वापस ले लिया था। वैकेशन बेंच ने उनके बयान को पूरे देश में आग लगाने के लिए जिम्मेदार बताते हुए उन्हें राहत देने से इनकार कर दिया था, जिसे न्यायिक विशेषज्ञों ने न्यायपालिका के इतिहास पर एक काला धब्बा करार दिया था। नूपुर शर्मा पर 7 राज्यों में 9 FIR दर्ज हैं, जिन्हें वो दिल्ली ट्रांसफर करने की माँग कर रही हैं। लेकिन, पिछली बार दोनों जजों ने कह दिया था कि देश में जो कुछ भी हो रहा है, उसके लिए ‘सिर्फ और सिर्फ’ नूपुर शर्मा ही जिम्मेदार हैं। उनके बयान को गैर-जिम्मेदाराना और उन्हें दंभी बता दिया गया।

कोरोना, मंकीपॉक्स और अब मारबर्ग… दुनिया को नए वायरस ने डराया: जानिए कितना घातक, क्या हैं लक्षण

कोरना वायरस के संक्रमण से अभी तक दुनिया पूरी तरह उबर नहीं पाई है। मंकीपॉक्स का खतरा भी बढ़ रहा है। इसी बीच घातक मारबर्ग वायरस (Marburg Virus) ने चिंता बढ़ा दी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 17 जुलाई 2022 को एक बयान में कहा है कि पश्चिमी अफ्रीकी देश घाना में अत्यधिक संक्रामक मारबर्ग वायरस के दो मामलों की पुष्टि हुई है।

सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, मारबर्ग वायरस के कारण घाना के दक्षिणी अशांति क्षेत्र में पिछले महीने 2 लोगों की मौत हुई थी। डब्ल्यूएचओ ने कहा है कि इन दोनों मरीजों में दस्त, बुखार, मितली और उल्टी के लक्षण दिखे थे। इनके संपर्क में करीब 90 लोग आए हैं, जिनकी निगरानी की जा रही है।

घाना के स्वास्थ्य अधिकारी वहाँ के लोगों को गुफाओं से दूर रहने और सभी मीट प्रोडक्ट्स को खाने से पहले अच्छी तरह से पकाने की चेतावनी दे रहे हैं। घाना के स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि 98 लोगों को संक्रमितों के संपर्क में आने के कारण क्वारंटाइन किया गया है। हालाँकि, उनमें से किसी में अभी संक्रमण की पुष्टि नहीं हुई है। मारबर्ग वायरस की अब तक कोई भी दवा या वैक्सीन नहीं है। यह इबोला की तरह ही जानलेवा और खतरनाक है। मारबर्ग का संक्रमण चमगादड़ों से ही फैला है।

जानकारों के मुताबिक, इस वायरस के कारण मारबर्ग वायरस डिजीज (MVD) का खतरा होता है और इसकी मृत्युदर 88 फीसदी से अधिक हो सकती है। बताया जा रहा है कि ये वायरस भी इबोला परिवार का ही सदस्य है। लेकिन इबोला से ज्यादा तेजी से संक्रमण फैलाता है। इसमें अचानक तबीयत खराब हो जाती है। यह बीमारी तेज बुखार, सिरदर्द के साथ शुरू होती है। साल 1967 में जर्मनी के मारबर्ग और फ्रैंकफर्ट में और सर्बिया के बेलग्रेड में सबसे पहले इस वायरस का प्रकोप देखा गया था।

मारबर्ग वायरस के लक्षण

विशेषज्ञों के मुताबिक, किसी इंसान में मारबर्ग वायरस के लक्षण दिखने में 2 से 21 दिन का समय लगता है। इस वायरस के लक्षणों में सिरदर्द, बुखार, मांसपेशियों में दर्द, खून की उल्टी और खून का बहना शामिल है। समय पर इलाज नहीं मिलने पर यह जानलेवा साबित हो सकता है।

ऐसे फैलता है संक्रमण

मारबर्ग वायरस से संक्रमित व्यक्ति के खून, लार, पसीना, मल, उल्टी, आदि के संपर्क में आने से संक्रमण दूसरे लोगों में फैल सकता है। यही नहीं संक्रमित व्यक्ति के कपड़े और बिस्तर के इस्तेमाल से भी संक्रमण फैलने का खतरा बना रहता है।

कोई वैक्सीन नहीं

डब्ल्यूएचओ ने कहा है कि इसकी रोकथाम के उपाय किए जा रहे हैं। मारबर्ग वायरस के लिए न तो कोई एंटीवायरल उपचार मौजूद है और न ही कोई टीका। हालाँकि, डिहाइड्रेशन और विशिष्ट लक्षणों के उपचार सहित देखभाल की मदद से इस वायरस से मरीजों को बचाया जा सकता है।

बता दें कि अफ्रीका के अन्य हिस्सों युगांडा, केन्या, अंगोला, दक्षिण अफ्रीका और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य में भी मारबर्ग वायरस कहर बरपा चुका है। 2005 में अंगोला में मारबर्ग वायरस ने 200 से अधिक लोगों की जान ले ली थी, जिसके बाद डब्लूएचओ ने इसे मारबर्ग वायरस का सबसे घातक प्रकोप करार दिया था।

मथुरा में कचरा गाड़ी में मिली PM मोदी और CM योगी की तस्वीरें: वीडियो पर बवाल, सफाईकर्मी फिर से बहाल

उत्तर प्रदेश के मथुरा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तस्वीर कूड़ा गाड़ी में मिलने का एक वीडियो वायरल हो रहा है। मामला मथुरा-वृंदावन नगर निगम कार्यालय के समीप सुभाष इंटर कॉलेज के पास का है। बताया जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी की तस्वीरें कूड़े में फेंकी हुई थीं। जिसे एक संविदा सफाईकर्मी कूड़े वाली ट्रॉली में डालकर ले जा रहा था तभी किसी ने उसका वीडियो बनाकर वायरल कर दिया। वहीं सफाई कर्मी को इस मामले में बर्खास्त कर दिया गया था जिसे बाद में पुनः जॉब पर वापस ले लिया गया है।

ट्विटर पर, रविवार 17 जुलाई, 2022 को 1 मिनट 5 सेकेंड का वीडियो सामने आया है। जिसमें एक सफाई कर्मचारी एक कूड़ा गाड़ी लेकर जा रहा है। जैसे ही व्यक्ति की नजर उसके कूड़े गाड़ी पर पड़ती है वह व्यक्ति आवाज देकर सफाईकर्मी से तस्वीर को लेकर पूछताछ करने लगता है। दरअसल, कचरा गाड़ी में कुछ फ्रेम्ड तस्वीरें दिख रही हैं। कूड़ा गाड़ी में चारों तरफ से कुछ कार्ड बोर्ड पर मढ़ी कुछ तस्वीरें के सहारे बीच में कूड़ा भरा गया था। जिसमें मुख्यमंत्री योगी की तस्वीर बाहर से ही दिखाई दे रही है। जिसे लेकर वह व्यक्ति सफाई कर्मी से कहने लगा- मथुरा में मुख्यमंत्री का फोटो डस्टबिन में। ये देखिए आप…भाई, ये फोटो निकालो, ये किनका है? आपके सीएम का फोटो है…ये देखिए सीएम का फोटो है। पीएम नरेंद्र मोदी का फोटो भी है। साथ ही कोई कलाम की फोटो की बात भी वीडियो में कर रहा है।

वहीं जब वीडियो बना रहे व्यक्ति ने सफाई कर्मचारी का नाम पूछा, तो उसने नाम न बताकर जवाब दिया कि यह तस्वीरें उसे कूड़े में पड़ी मिली थीं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, उस संविदा सफाई कर्मी का नाम बॉबी बताया जा रहा है।

जहाँ यह वीडियो वायरल होने के बाद एक तरफ उस संविदा सफाई कर्मी की लापरवाही की निंदा हो रही है वहीं सबसे गैरजिम्मेदार उस व्यक्ति को बताया जा रहा है जिसने उन्हें कूड़े में फेंकी। हालाँकि, वहाँ से गुजर रहे राजस्थान के अलवर के रहने वाले एक दर्शनार्थी पंकज गुप्ता नामक व्यक्ति ने इन तस्वीरों को कचरा गाड़ी से निकाला और उन्हें साफ़ पानी से धोकर साफ़ किया। ऐसा बताया जा रहा है कि वह उन तस्वीरों को अपने साथ ले गए। उन्होंने कहा, “जिसने भी इन तस्वीरों के साथ ऐसा किया, वह गलत किया है।”

बता दें कि वीडियो वायरल होने के बाद नगर निगम मथुरा-वृंदावन के अतिरिक्त नगर आयुक्त सत्येंद्र कुमार तिवारी ने बताया कि संविदा कर्मचारी ने गलती से मोदी और योगी की तस्वीरें कूडागाड़ी में डाल दी थीं। तिवारी ने ये भी जानकारी दी कि कॉन्ट्रैक्ट वर्कर बॉबी पर तुरंत एक्शन लेते हुए उसका कॉन्ट्रैक्ट समाप्त कर दिया गया है। जिसे अब लोगों की आलोचना के बाद पुनः बहाल कर दिया गया है।

सत्येंद्र कुमार तिवारी ने इस मामले में अपने बयान में कहा, “मीडिया के माध्यम से पता चला कि निगम का संविदा कर्मचारी अपने हाथ ठेला गाड़ी में पीएम और सीएम का फोटो लेकर जा रहा था। सुभाष इंटर कॉलेज के पास भूलवश उसे वे फोटो मिलीं। स्थानीय लोगों ने टोका तो पता चला कि उसके पास किसकी तस्वीरें हैं। तत्काल फोटो कूड़े से हटा दिए गए। मामले में सफाई कर्मचारी की लापरवाही मालूम पड़ती है। सफाई कर्मचारी पर कार्रवाई करते हुए उनकी सेवाएँ समाप्त कर दी गई हैं। हम इस लापरवाही की कड़ी निंदा करते हैं।”

गौरतलब है कि इस मामले में मथुरा के मेयर मुकेश आर्य बंधु ने इस मामले पर बोलते हुए कहा कि वह अनपढ़ सफाईकर्मी है। पढ़ा लिखा नहीं है लेकिन जिसने उन तस्वीरों को कूड़े में फेंका, वह सभ्य कॉलोनी है। पढ़े-लिखे लोग है फिर भी लोगबाग ऐसी गलती कैसे कर देते हैं। वहीं जब उनसे पूछा गया कि सफाई कर्मी बॉबी का अनुबंध क्यों समाप्त किया गया? तो इसे उन्होंने एक बड़ी गलती बताई। उन्होंने कहा कि अगर कोई आदमी खाना खाता है, तो वह कम से कम जानता है कि यह हमारे पीएम नरेंद्र मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ की तस्वीर है। उसने कचरा गाड़ी में तस्वीरें डालकर गलती की।

वहीं संविदा सफाईकर्मी पर एक्शन के बाद अब सफाई कर्मचारियों के संघ ने उसे वापस न लिए जाने पर पूरे प्रदेश में आंदोलन करने की भी धमकी दी है। उन्होंने इस बाबत म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन आगरा को एक मेमोरेंडम भी सौंपा।

वहीं अब सफाई कर्मी पर हुए एक्शन पर लोगों की आलोचना के बाद इस मामले में खबर आ रही है कि बॉबी को पुनः अपने काम पर वापस ले लिया गया है। साथ ही उन्हें आगे सावधानी से काम करने की बात भी कही गई है। जिस पर संविदाकर्मी बॉबी ने ख़ुशी जाहिर की है।

दिल्ली की हिंदू लड़की को फँसाने के लिए मोनू गुप्ता बन गया कासगंज का प्रिंस कुरैशी: शादी का झाँसा दे UP बुलाया, फिर किया रेप

उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के कासगंज जिले (kasganj) से लव जिहाद का मामला सामने आया है। यहाँ के प्रिंस कुरैशी ने मोनू गुप्ता बनकर दिल्ली की एक हिंदू लड़की से फेसबुक पर दोस्ती की। फिर शादी का झाँसा देकर उसे कासगंज बुलाया। यहाँ उसने युवती को नशीला कोल्डड्रिंक पिलाकर कार में उसके साथ दुष्कर्म किया।

कुरैशी की हकीकत सामने आई तो युवती ने उसका विरोध किया, जिसको लेकर उसके साथ मारपीट की गई। पहले तो पुलिस ने युवती की शिकायत दर्ज नहीं की, लेकिन हिंदूवादी संगठनों के हस्तक्षेप के बाद एसपी बीबीजीटीएस मूर्ति के आदेश पर पुलिस ने प्रिंस कुरैशी समेत दो लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, लड़की की शिकायत पर रिपोर्ट दर्ज कर पुलिस प्रिंस कुरैशी की तलाश में जुट गई है। दिल्ली के मयूर विहार की रहने वाली युवती का आरोप है कि कासगंज कस्बे के मुहल्ला आबाजी निवासी प्रिंस कुरैशी सोशल मीडिया के जरिए उसके संपर्क में आया था। उसने उसे अपना नाम मोनू गुप्ता बताया था। 15 जुलाई को युवक ने शादी का झाँसा देकर उसे कासगंज के गंजडुंडवारा बुलाया। सुबह सात बजे वह गंजडुंडवारा पहुँच गई।

पीड़िता ने अपनी शिकायत में बताया है कि वह लाल रंग की कार लेकर गंजडुंडवारा पहुँचा था। प्रिंस की सच्चाई उस वक्त सामने आई, जब उसकी माँ ने उसे ये पूछने के लिए फोन किया कि वह कहाँ है। इस पर उसने कहा कि अम्मी काम से हूँ। यह सुनते ही उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। इसके बाद लड़की ने उसका विरोध किया और कार से उतरने की कोशिश की। लेकिन कुरैशी ने जबरन उसे कार में डाल लिया और कोल्ड ड्रिंक में नशीला पदार्थ पिलाकर उसके साथ दुष्कर्म किया।

पीड़िता के मुताबिक, जब वह इसकी शिकायत लेकर गंजडुंडवारा थाने पहुँची तो पुलिस ने उसकी नहीं सुनी। मामले की जानकारी जब हिंदूवादी संगठनों को हुई तो वे थाने पहुँचे। इसके बाद एसपी मूर्ति के आदेश पर प्रिंस कुरैशी और उसके एक अन्य साथी के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। हिंदूवादी नेता ठाकुर मनजीत सिंह ने बताया कि पीड़िता को समुदाय विशेष के युवक ने नाम बदलकर बहला-फुसलाकर कर बुलाया था।

हमेशा सेक्स के मूड में रहता था पति, पत्नी ने गिफ्ट कर दी अपनी शक्ल वाली सेक्स डॉल: ₹1 लाख कीमत, बिस्तर पर दोनों उसके साथ करते हैं मजे

कुछ साल पहले खबरों से जब सेक्स डॉल के अविष्कार का पता दुनिया को चला तो लोगों को हैरानी हुई कि आखिर एक डॉल किसी की शारीरिक जरूरतों को पूरा करने में कैसे सक्षम होगी। हालाँकि आज हाल ये है कि कुछ समय पहले एक पत्नी ने अपने पति की तीव्र यौन इच्छाओं को पूरा करने किए एक सेक्स डॉल का सहारा लिया और अब वह खुद उसकी आदि हो गई हैं। वह गुड़िया के साथ बिस्तर पर प्रयोग भी करती हैं।

अमेरिका की शैर ग्रे नाम की 23 वर्षीय महिला बताती हैं कि उन्होंने अपने पति की तीव्र यौन इच्छाओं को शांत करने के लिए 1800 डॉलर (143903 रुपए) में एक सेक्स डॉल खरीदी थी, ताकि जब भी वह मूड में न हों तो उन्हें अपने ऊपर दबाव न झेलना पड़े। शैर कहती हैं कि उनका पति उस गुड़िया के लिए फीलिंग ला पाए, इसलिए उन लोगों ने उसका नाम डी रख दिया है।

तस्वीर साभा: द न्यूयॉर्क टाइम्स

साउथ वेस्ट न्यूज सर्विस से बात करते हुए शैर ने कहा, “डी सिर्फ एक गुड़िया नहीं है। हम उससे जुड़े हुए हैं। उसने हमारे रिश्ते को मजबूत बनाया है और अब हमारी सेक्स लाइफ में आग लगा रही है।”

शैर कहती हैं कि उनका पति कैलम हमेशा सिर्फ सेक्स मूड में रहता था और वह उनकी इच्छा को पूरा करने की जद्दोजहद में जुटी रहती थीं। कैलम की सेक्स इच्छाएँ इतनी ज्यादा थीं कि उन्होंने कई बार बिस्तर पर पति-पत्नी के अलावा एक और महिला को लाने की इच्छा जताई यानी थ्रीसम सेक्स करने की इच्छा। 

शैर से ये बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होंने सोचा कि किसी सच की औरत से अच्छा है कि वो सेक्स डॉल ले आएँ। शैर बताती हैं कि उन्होंने बहुत सारी गुड़िया खोजीं लेकिन फिर उन्हें डी मिली जो बिलकुल उनके जैसी दिखती है। उन्होंने ये गुड़िया जून 2021 में खरीदी थीं और 13 महीनों से वह लोग इसका इस्तेमाल कर रहे हैं।

दंपत्ति का मानना है कि उन्होंने अपनी सेक्स लाइफ को बेहतर बनाने लिए ये सबसे अच्छा फैसला लिया। अब यदि कभी कैलम की इच्छा होती है और शैर मूड में नहीं रहतीं, तो वह डी के पास चले जाते हैं।

शैर ये भी कहती हैं कि सिर्फ उनका पति ही अपनी यौन इच्छा उस गुड़िया से नहीं मिटाता, वह खुद भी गुड़िया के साथ एक्सपेरिमेंट करती हैं। इसके अलावा ये दंपत्ति इस गुड़िया को शैर जैसे कपड़े पहनाकर बाहर घुमाने भी ले जाते हैं।

बता दें कि शैर और कैलम ओनली फैन्स के स्टार हैं। ये लोग महीने 80 हजार डॉलर तक कमाते हैं। इन लोगों ने डी को भी कैमरे पर दिखाया हुआ है। हालाँकि हर बार वह साथ में नहीं होती। ये लोग उसे अलमारी में बंद रखते हैं और मानते हैं कि इसकी वजह से वह लोग और नजदीक आए।

भोजन और दवाओं के लिए सेक्स वर्कर बनने को मजबूर हुईं श्रीलंका की महिलाएँ, कई अस्थायी वेश्यालय खुले: पुलिस के साथ सोने पर मिलती है सुरक्षा

श्रीलंका में चल रहे विरोध प्रदर्शन के कारण वहाँ के राष्ट्रपति गोटाभाया राजपक्षे देश छोड़ कर भाग खड़े हुए और अपना इस्तीफा दे दिया। डलास अल्लाहपेरुमा के समर्थन में मुख्य विपक्षी नेता सजीत प्रेमदासा ने राष्ट्रपति की उम्मीदवारी से खुद का नाम वापस ले लिया है। राजनीतिक संकट के कारण अस्थिर द्वीपीय देश में जनता का हाल बुरा है। वेश्यावृत्ति चरम पर है, क्योंकि कई महिलाएँ भोजन और दवा सम्बन्धी जरूरतें पूरी करने के लिए सेक्स बेच रही हैं।

जहाँ श्रीलंका की अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है, वहीं वहाँ पर कई अस्थायी वेश्यालय बना दिए गए हैं, जहाँ ‘आयुर्वेदिक स्पा’ और मसाज के नाम पर सेक्स बेचने का काम किया जा रहा है। खासकर वहाँ की टेक्सटाइल इंडस्ट्री में सक्रिय महिलाएँ वेश्यावृत्ति का रुख कर रही हैं, ऐसा श्रीलंकाई अख़बार ‘The Morning’ ने पाया है। आर्थिक बर्बादी की सबसे ज्यादा मार टेक्सटाइल सेक्टर पर ही पड़ी है, ऐसे में कइयों की नौकरियाँ चली गईं, कइयों की असुरक्षित हैं और कोई दूसरी नौकरी का विकल्प भी नहीं बचा है।

ऐसी ही एक सेक्स वर्कर ने श्रीलंकाई अख़बार को बताया, “हमें पता चला कि देश में आर्थिक संकट के कारण हम अपनी नौकरी गँवा सकते हैं। इस समय हम इसका एक ही सर्वश्रेष्ठ समाधान देख पा रहे हैं और वो है सेक्स वर्क। हमारा मासिक वेतन 28,000 श्रीलंकाई रुपए (6233 भारतीय रुपए) है, और हम 35,000 (7792 भारतीय रुपए) तक कमा लेती थीं। लेकिन, सेक्स वाले काम से हम प्रतिदिन 15,000 (3339 भारतीय रुपए) कमा ले रही हैं।”

उक्त महिला ने कहा कि कई लोग भले उससे सहमत न हों, लेकिन सच्चाई यही है। भारत और बांग्लादेश द्वारा श्रीलंकाई कपड़ों की खरीददारी में 10-20% की गिरावट आई है, जिसके लिए वहाँ की संस्था ने राजनीतिक संकट के कारण खरीददारों के विश्वास में गिरावट आने को कारण बताया है। श्रीलंका की कई महिलाएँ राजधानी कोलम्बो का रुख कर रही हैं और जनवरी से लेकर अब तक वेश्यावृत्ति में 30% महिलाओं की बढ़ोतरी हुई है।

इन महिलाओं में से अधिकतर को अपने बच्चों का पालन-पोषण करना है और अपने माता-पिता की देखरेख करनी है। कइयों पर अपने भाई-बहनों की भी जिम्मेदारी है। इसीलिए, जल्दी अधिक रुपए के लिए वो सेक्स वर्क का रुख कर रही हैं। महँगाई आसमान छू रही है और लोगों को वेतन नहीं मिल रहे हैं। ईंधन, भोजन और दवाओं की भारी कमी है। कहा जा रहा है कि कोलम्बो के इंडस्ट्रियल क्षेत्रों के आसपास ये वेश्यालय फल-फूल रहे हैं।

इन महिलाओं को पुलिस के साथ सोना होता है, बदले में उन्हें और उनके काम को सुरक्षा मिलती है। ये ये महिलाएँ कृषि का रुख करने से भी हिचक रही हैं, क्योंकि फसलों के उत्पादन में पिछले साल के मुकाबले 50% की भारी कमी आई है। मई 2021 में राजपक्षे सरकार ने केमिकल फर्टिलाइजर्स पर बैन लगा दिया था। इनके साथ सोने के लिए माफिया से लेकर कई अमीर लोग पहुँचते हैं। इनमें से कई क्लाइंट्स के हाथों इन्हें प्रताड़ना और हिंसा का भी सामना करना पड़ता है।