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मकान के अंदर चल रहा था 100 से ज्यादा लोगों के धर्मांतरण का खेल: VHP ने की शिकायत, UP पुलिस ने रेड में 3 आरोपितों को पकड़ा, 1 नाबालिग

उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में बड़ी तादाद में महिलाओं और पुरुषों का धर्म परिवर्तन कराए जाने के आरोप में पुलिस ने तीन लोगों को हिरासत में लिया है। पुलिस ने ये कार्रवाई विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं से शिकायत मिलने के बाद की।

जानकारी के मुताबिक, आजमगढ़ शहर के कोतवाली हरवंशपुर इलाके में धर्मांतरण का ये काम एक मकान के भीतर अंजाम दिया जा रहा था। यहाँ बड़ी तादाद में पुरुष और महिला इकट्ठा प्रार्थना सभा के लिए थे। इन सबको ईसाई धर्म का पाठ पढ़ाया जा रहा था। विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने जब ये सूचना पुलिस को दी तो पुलिस मकान में रेड मारने गई। वहाँ देखा गया कि 100 से ज्यादा लोग ईसाई पाठ में लगे थे। सबके हाथ में धार्मिक पुस्तकें थीं।

पुलिस ने फौरन अपनी कार्रवाई करते हुए तीन लोगों को हिरासत में लिया। अब आगे इनसे बाकी की पूछताछ होगी। बताया जा रहा है कि पकड़े गए तीन आरोपितों में से एक नाबालिग था, इसलिए पुलिस ने उसे छोड़ दिया। जो गिरफ्तार हुए उनके नाम रौसी सुख और विजय कुमार हैं। एसपी शैलेंद्र ने कहा है कि आरोपितों से पूछताछ के बाद कार्रवाई होगी।

विश्व हिंदू परिषद के आजमगढ़ के महामंत्री गौरव रघुवंशी ने बताया, “हमारे पास धर्म परिवर्तन से जुड़ी शिकायतें काफी लंबे समय से आ रही थी जो कि पूरी तरह गैर कानूनी है। मासूम जनता को तरह-तरह के लालच देकर धर्म परिवर्तन करवाया जा रहा है। ऐसी चीजें बर्दाश्त नहीं की जाएँगी। हम माँग करते हैं कि इन लोगों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई हो और भविष्य में इस काम को न दोहराया जाए।”

इस पूरे मामले में स्थानीय लोगों ने भी धर्म परिवर्तन के खेल की पोल पट्टी खोली है। उन्होंने कहा कि मकान में लोगों को जुटाकर ऐसे आयोजन होते रहते हैं, इसलिए उन्हीं लोगों ने ये शिकायत हिंदू संगठनों को दी थी। उनकी शिकायत के बाद पुलिस ने इस कार्यक्रम में रुकवाया।

उल्लेखनीय है कि यूपी में पहले भी धर्म परिवर्तन कराने की बहुत सी शिकायतें आती रही हैं। पिछले साल जामिया नगर से दो आरोपित पकड़े गए थे जिन्होंने मूक-बधिर बच्चों का धर्म परिवर्तन करवा दिया था। आरोप था कि ये गिरोह सालाना 200-300 लोगों का धर्म परिवर्तन करवाता था।

उसने मेरे पति को कट-टॉप पहन कर फँसाया… यूक्रेन की शरणार्थी पर ब्रिटिश महिला का आरोप, पति ने अलग होकर कहा- ‘मैं अब उसी से प्यार करने लगा हूँ’

ये कहानी ब्रिटेन की रहने वाली एक महिला लोर्ना गार्नेट की है, जिसने युद्धग्रस्त यूक्रेन से आई एक शरणार्थी सोफिया कार्कादिम को अपने घर में शरण दी लेकिन 22 साल की सोफिया उसके ही पति के साथ भाग गई। लोर्ना तीन बच्चों की माँ है। बावजूद इसके उसका पति सोफिया के साथ चला गया।

द सन को दिए इंटरव्यू में 28 वर्षीय लोर्ना गार्नेट कहती हैं, “युद्धग्रस्त यूक्रेन से आने के बाद मैंने एक अजनबी को अपने घर में शरण देने का कड़ा निर्णय लिया था। लेकिन उसकी नजर मेरे पति पर थी और इसलिए 10 दिन बाद ही उसे घर से निकालना पड़ा।” लोर्ना के मुताबिक, जब वो घर से जाने लगी तो उसके साथ उसके पार्टनर टोनी गार्नेट (29) ने भी जाने का फैसला कर लिया। टोनी ने कहा कि उसे सोफिया पसंद आ गई है और वो उससे प्यार करने लगा है। इसलिए बाकी की जिंदगी उसी के साथ बिताना चाहता है। ऐसा कहकर वो उसके साथ चला गया। इस घटना ने लोर्ना को अंदर से तोड़ दिया।

ब्रिटेन के वेस्ट यॉर्कशायर के ब्रैडफोर्ड में रहने वाला टोनी पेशे से एक सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करता था। जबकि, सोफिया यूक्रेन के लवीव शहर की रहने वाली थी, जो कि अब एक शरणार्थी है। लोर्ना के मुताबिक, वो शुरू से उसके पति पर नजर बनाए हुई थी। लेकिन, फिर भी जो वो चाहती थी, वो उसे ले गई। लोर्ना बताती हैं कि यूक्रेन की हालत देख वो किसी की मदद करना चाहती थीं और इसीलिए सोफिया को रहने के लिए एक छत दे दी। अब उसे घर में जगह देने की कीमत चुकानी पड़ी।

फेसबुक से माँगी थी मदद

टोनी के मुताबिक, वो कुछ अच्छा करना चाहता था और सोफिया ने उससे फेसबुक के जरिए कॉन्टैक्ट किया। उसने टोनी से सरकार की योजना के तहत एक शरणार्थी के तौर पर घर में जगह देने की माँग की थी। सोफिया यूक्रेन में पेशे से एक आईटी मैनेजर थी। टोनी के मुताबिक, वो और सोफिया बहुत जल्द करीब आ गए थे। सोफिया को उसकी 10 साल की साथी (लोर्ना) पसंद नहीं करती थी।

लोर्ना को धीरे-धीरे उससे जलन होने लगी थी। वो टोनी से अक्सर पूछती थी कि आखिर वो उसके पीछे-पीछे क्यों लगी रहती है। लोर्ना कहती हैं कि टोनी के बाहर से आने से पहले सोफिया पूरी तरह से मेक अप करके तैयार हो जाती थी और लो-कट टॉप पहन लेती थी। दोनों के रिश्तों को लेकर लोर्ना को उसके पड़ोसी ने चेताया था। अंतत: टोनी सोफिया को लेकर अपने माता-पिता के घर चला गया। हालाँकि, उसका कहना था कि वो लोर्ना को चोट नहीं पहुँचाना चाहता था।

सपा की मीटिंग में नहीं आए आजम खान, सांसद शफीकुर्रहमान बोले- ज्ञानवापी में कोई शिवलिंग नहीं

उत्तर प्रदेश में 18वीं विधानसभा का सत्र सोमवार (23 मई 2022) से शुरू होगा। इससे पहले विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) ने रविवार (22 मई 2022) को विधायक दल की बैठक बुलाई। इस बैठक में सपा प्रमुख अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) के चाचा शिवपाल यादव (Shivpal Yadav) और पार्टी के मुख्य मुस्लिम चेहरा आजम खान (Azam Khan) शामिल नहीं हुए। वहीं, सपा सांसद बर्क ने विवादित बयान दिया है।

प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के मुखिया और इटावा के जसवंतपुर से सपा विधायक शिवपाल यादव लखनऊ में थे, लेकिन विधायक दल शामिल नहीं हुए। वहीं, जमानत पर जेल से बाहर निकले रामपुर से सपा विधायक आजम अपने गृह नगर में थे। आजम खान को लेकर कहा गया कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए वे बैठक में शामिल नहीं हुए। आजम के बेटे अब्दुल्ला भी बैठक से नदारद रहे।

सपा के वरिष्ठ नेता रविदास मेहरोत्रा ने शिवपाल यादव की गैर-मौजूदगी को लेकर कहा कि उन्होंने सपा के चुनाव चिह्न पर विधानसभा चुनाव जीता है, लेकिन वह एक पार्टी के मुखिया भी हैं। मेहरोत्रा ने कहा कि वह पहले भी पार्टी की बैठकों में शामिल नहीं हुए थे। 

राजनीति के गलियारों में शिवपाल यादव और आजम खान के बीच कुछ पकने की बात कही जा रही है। जब आजम खान सीतापुर जेल से अंतरिम जमानत पर बाहर आए तो शिवपाल यादव उनके कंधे पर हाथ रखे देखे गए थे। वहीं, आजम ने कहा था कि उनकी तबाही में अपनों का ही हाथ है।

उधर, अखिलेश यादव से मिलने पहुँचे संभल से सपा (SP) सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने कहा कि इतिहास को गहराई से देखें तो वाराणसी की ज्ञानवापी विवादित ढाँचे में कोई ‘शिवलिंग’ नहीं था। यह सब गलत था। उन्होंने कहा कि ये परिस्थितियाँ 2024 के लोकसभा चुनावों को देखते हुए तैयार की जा रही हैं।

इतना ही नहीं, बर्क ने यहाँ तक कह दिया कि आज अयोध्या में भले श्रीराम मंदिर का निर्माण किया जा रहा है, लेकिन वहाँ एक मस्जिद है। बर्क ने कहा, “मैं अब भी कहता हूँ कि वहाँ मस्जिद है। राम मंदिर ताकत के बलबूते बनाया जा रहा है।” उन्होंने कहा कि इस्लाम में मूर्तिपूजा हराम है और किसी की जमीन पर कब्जा करके मस्जिद बनाने की इजाजत नहीं है।

ज्ञानवापी में सिर्फ शिवलिंग ही नहीं, हनुमान जी की भी मूर्ति: अमेरिका के म्यूजियम में 154 साल पुरानी तस्वीर, नंदी भी विराजमान

वाराणसी स्थित ज्ञानवापी विवादित ढाँचे का सर्वे शुरू होने के बाद से नित नया खुलासा हो रहा है। अब तक ढाँचे के अंदर से शिवलिंग समेत कई अन्य प्रकार की कलाकृतियों के सबूत मिल चुके हैं। ताजा मामले में खुलासा हुआ है कि विवादित ढाँचे के अंदर से हनुमान जी की भी मूर्ति होने के सबूत मिले हैं। करीब 154 साल पुरानी तस्वीर से ये खुलासा हुआ है।

जी न्यूज की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 1868 में ब्रिटिश फोटोग्राफर सैमुअल बॉर्न ली ने ये फोटो खींची थी। जिस ज्ञानवापी विवादित ढाँचे को मुस्लिम पक्ष मस्जिद बताकर उस पर अपना दावा करते हैं, ये रिपोर्ट उन दावों की पोल खोल देती है।

1868 में ली गई तस्वीर, फोटो साभार: getty.edu

दरअसल, 154 साल पहले ली गई इस तस्वीर को ध्यान से देखने पर इसमें भगवान शिव के 11वें रूद्र अवतार हनुमान जी की मूर्ति के साथ ही घंटा टंगा दिखता है। इसके अलावा वहीं पर नंदी भी विराजमान दिखाए दे रहे हैं। तस्वीर में तीन खंबे भी दिख रहे हैं, जिनमें प्राचीन भारतीय शिल्पकला उकेरी दिख रही है।

ऊपर दिख रही तस्वीर को और भी बड़ा/भव्य/क्लियर देखना चाहते हैं तो इस लिंक पर क्लिक कर देख सकते हैं।

ज्ञानवापी की यह फोटो अब कहाँ?

गौरतलब है कि इस तस्वीर को ब्रिटिश फोटोग्राफर ने खींचा था। मौजूदा वक्त में यह अमेरिका के ह्यूस्टन स्थित ‘द म्यूजियम ऑफ फाइन आर्ट्स में संभाल कर रखी गई है। इस तस्वीर के सामने आने के बाद से विवादित ढाँचे पर हिन्दू पक्ष का दावा और अधिक मजबूत हो गया है।

ज्ञानवापी विवाद कब से?

वैसे तो ज्ञानवापी और काशी विश्वनाथ मंदिर विवाद काफी लंबे वक्त से चला आ रहा है, लेकिन ताजा मामले में इसकी शुरुआत पाँच महिलाओं की याचिका से होती है। ये याचिका लक्ष्मी देवी, सीता साहू, मंजू व्यास और रेखा पाठक राखी सिंह ने दायर की थी।

पाँचों महिलाओं ने ज्ञानवापी के अंदर श्रृंगार गौरी की पूजा करने की इजाजत माँगी थी। इसी को लेकर वाराणसी कोर्ट ने विवादित ढाँचे के सर्वे का आदेश दिया। इस आदेश के बाद शुरू हुए सर्वे से एक-एक कर चौंकाने वाली सच्चाई सामने आने लगी है।

जिस नाबालिग को भगाने पर पहले हुई जेल, उसे 2 साल बाद ‘निकाह’ के लिए फिर भगा रहा था जफर खान: हिंदू संगठनों ने बीच रास्ते में पकड़ कर धुना

मध्य प्रदेश के उज्जैन में हिन्दू समुदाय की युवती को निकाह के लिए कोर्ट ले जा रहे आरोपित की पिटाई की खबर है। बताया जा रहा है कि लड़की के परिजनों ने आरोपित जफर खान को हिन्दू संगठन के सदस्यों के साथ पकड़ लिया। बाद में पिटाई के बाद दोनों को पुलिस के हवाले कर दिया गया। घटना शुक्रवार (20 मई 2022) की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अपनी बहन के जफर के साथ कोर्ट में निकाह की संभवना की जानकारी होते ही लड़की के भाई ने हिन्दू संगठनों की मदद ली। लड़की के भाई ने बताया कि जफर उन्हेल का रहने वाला है। जानकारी मिलने पर हिन्दू संगठन लड़की के परिवार वालों के साथ खोजबीन करने लगे। इसी दौरान उन्हें उज्जैन पब्लिक स्कूल के सामने जफर लड़की के साथ मिल गया।

बताया जा रहा है कि इस दौरान लड़की के परिजनों ने जफर और लड़की की पिटाई की। बाद में दोनों को माधव नगर थाने ले जाया गया। वहाँ जानकारी हुई कि जफर और महिला दोनों ही पहले से शादीशुदा हैं। जफर मजदूरी करता है। वो अपने मामा के यहाँ उन्हेल क्षेत्र के करनावट इलाके के गाँव चिक्ली में रहता है। जफर और लड़की दोनों में काफी पहले से प्रेम संबंध बताया जा रहा है।

कहा जा रहा है कि 2 साल पहले जब लड़की नाबालिग थी तब जफर उसे बहला-फुसला कर ले गया था। इस केस में जफर पर पॉस्को एक्ट लगा था और वो जेल भी गया था। बाद में लड़की की शादी उसके घर वालों ने कहीं और कर दी। जेल से निकलने के बाद जफर ने फिर से उस लड़की का पीछा किया। इसके बाद एक बार फिर से वो उसी लड़की को अपने साथ ले भागा। हालाँकि जफर को फिर पकड़ लिया गया।

उज्जैन के हिन्दू जागरण मंच महामंत्री अमित शर्मा ने बताया, “जफर अब बालिग हो चुकी लड़की से अब निकाह इसलिए करना चाहता है जिस से वो अपने पुराने चल रहे केस में बरी हो जाए। तब उसको 6 माह की जेल काटनी पड़ी थी। ये लोग आजाद नगर चौराहे तक भागे हैं। इन्हे दौड़ा कर पकड़ा गया। पुराने केस में इसको सजा मिलनी तय है।”

एक स्थानीय न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक थाने पर काफी देर तक हंगामा चला। हिन्दू संगठन के पदाधिकारी जफर पर लव जिहाद का आरोप लगा कर कड़ी कार्रवाई की माँग कर रहे थे। वहीं माधव नगर के थाना प्रभारी मनीष के मुताबिक मामले की जाँच पहले से ही इंगोलिया थाना पुलिस कर रही है। उन्हें पूरे मामले से अवगत करवा दिया गया है। आगे की कार्रवाई इंगोलिया पुलिस द्वारा ही की जाएगी।

ज्ञानवापी हिंदुओं को लौटा दो: रुबिना खानुम के बयान से बिदकी सपा, छीना महिला विंग की ‘अध्यक्ष’ का पद, जवाब में बोलीं- ‘जब बहू अपर्णा का सम्मान नहीं हुआ, तो मेरा क्या होगा’

ज्ञानवापी सर्वे के दौरान विवादित ढाँचे में शिवलिंग मिलने पर परिसर को हिन्दुओं को सौंप देने की अपील करने वाली समाजवादी पार्टी की महिला नेता रुबीना खानुम पर गाज गिरी है। सपा ने रुबीना खान को उनके पद से हटा दिया है। इस कार्रवाई से पहले रुबीना अलीगढ़ महानगर की महिला विंग की अध्यक्षा थीं। रुबीना ने इस कार्रवाई को समाजवादी पार्टी का असली चेहरा बताया है। इसी के साथ रुबीना ने समाजवादी पार्टी से इस्तीफा भी दे दिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक खुद को हटाए जाने पर रुबीना ने नाराजगी जताई। उन्होंने सपा प्रमुख अखिलेश यादव को निशाने पर लिया। उन्होंने कहा, “मैं अनुशासनहीन इसलिए हो गई क्योंकि मैं समाजवादी पार्टी के हिसाब से नहीं बोली। मुझे सपा ने पद से इसलिए हटा दिया क्योंकि मैंने राष्ट्रवाद और सभी धर्मों के सम्मान की बात कह दी। यही सपा का असली चेहरा है।”

रुबीना ने कहा, “जिस पार्टी में मैं सच भी नहीं बोल सकती और देश की बात भी नहीं कर सकती उसमें मैं नहीं रहना चाहती। मेरे पास आए लेटर में मुझे अनुशासनहीन बताया गया है। मतलब मुसलमानों के साथ हिन्दुओं की भी बात करना अनुशासनहीनता कैसे हो गया ? अगर ये अनुशासनहीनता है तो मैं इसे बार-बार करूँगी। आज पद से निकाला है कल पार्टी से निकाल देंगे। ऐसी पार्टी में मैं खुद नहीं रह सकती।”

रुबीना के मुताबिक, “जिस पार्टी में बहू अपर्णा यादव का सम्मान नहीं हुआ वहाँ मेरा सम्मान कैसे होता ? ये सच है कि मैं पहले तुष्टिकरण की राजनीति करती थी। लेकिन बाद में मुझे मेरी आत्मा ने झकझोर दिया। तब मुझे आत्मज्ञान हुआ। तब से मैंने पूरे देश की बात करनी शुरू कर दी।”

क्या कहा था रुबीना ने

इससे पहले ज्ञानवापी सर्वे पर बोलते हुए रुबीना खानुम का वीडियो सोशल मीडिया पर काफी वायरल हुआ था। तब उन्होंने कहा था, “अगर ये साबित हो जाता है कि किसी शासन ने जबरन ताकत के दम पर मस्जिद बनाई गई थी। तब हमारे धर्म गुरुओं को समझना चाहिए कि वहाँ नमाज़ पढ़ना हराम है। साथ ही तब हमारा मुस्लिम समाज और उलेमा उस जमीन को हिन्दू पक्ष को लौटा दें।”

पहले कर चुकी हैं कई विवादित बयानबाजी

गौरतलब है कि रुबीना खानुम पहले कई विवादित बयानबाजी कर चुकी हैं। हिजाब विवाद में रुबीना ने हिजाब पर हाथ डालने वालों के हाथ काट देने का एलान किया था। वहीं लाऊडस्पीकर विवाद में भी उन्होंने मंदिरों के आगे लाऊडस्पीकर पर कुरान का पाठ करने की धमकी दी थी।

चीन से पीछा छुड़ाकर Apple भारत में जमा सकता है कारोबार: कंपनी कम्युनिस्ट सरकार की दमनकारी नीतियों से हुई तंग, उत्पादन भी प्रभावित

चीन की कठोर नीतियों से परेशान होकर आईफोन (iPhone) निर्माता कंपनी एप्पल (Apple) भारत शिफ्ट होने की तैयारी कर रही है। एप्पल ने अपने कई कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चर्स (Contract Manufacturers) से भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के वियतनाम में अपने उत्पादन को बढ़ाने की बात कही है। चीन की एंटी कोविड पॉलिसी (Anti Covid Policy) के कारण एप्पल के उत्पादों पर गहरा असर पड़ा है। इसको लेकर एप्पल ने चीन के इस कठोर नीति की आलोचना भी की है।

अमेरिकी अखबार ‘वॉल स्ट्रीट जर्नल’ के अनुसार, कंपनी के सूत्रों ने चीन के विकल्प के रूप में भारत और वियतनाम को चुना है। उन्होंने बताया कि इन दो देशों में फिलहाल एप्पल के वैश्विक उत्पादन का छोटा हिस्सा ही है, लेकिन इन्हें चीन के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। फिलहाल iPhone, iPad और MacBook जैसे एप्पल के 90 प्रतिशत से अधिक उत्पाद चीन में इंडिपेंडेंट कॉन्ट्रैक्टर्स बनाते हैं।

कठोर कोविड नीति के कारण चीन में यात्रा पर जारी प्रतिबंधों के कारण पिछले दो वर्षों से एप्पल के अधिकारी और इंजीनियर उत्पादन स्थलों पर नहीं जा सके हैं। इसके अलावा, पिछले साल लगातार बिजली की कटौती ने वैश्विक विनिर्माण पावरहाउस के रूप में चीन की छवि को और भी खराब कर दिया। कहा जा रहा है कि एप्पल चीन से पहले ही निकलना चाहता था, लेकिन कोविड नीति लागू होने के बाद ऐसा करना संभव नहीं हो सका।

विश्लेषकों का कहना है कि कम्युनिस्ट शासन में चीन की दमनकारी नीतियों और अमेरिका के साथ संघर्षों के चलते एप्पल चीन पर अपनी निर्भरता को कम से कम करना चाहता है। दूसरी तरफ भारत एक लोकतांत्रिक देश, जहाँ निवेशकों को कई तरह के प्रोत्साहन दिया जा रहा है। ऐसे में कंपनी के मैन्युफैक्चरिंग योजना से जुड़े लोगों का कहना है कि विशाल जनसंख्या और कम लागत के चलते कंपनी भारत को चीन के विकल्प के रूप में देख रही है।

ताइवान की एसेंबलिंग करने वाली कंपनी Foxconn और Wistron कंपनियों ने पहले ही भारत में उत्पादन संयंत्र स्थापित कर लिए हैं। भारत के विशाल बाजार और यहाँ के लोगों के बीच एप्पल के उत्पादों के प्रति उत्साह को देखते हुए कंपनी यहाँ अपने विस्तार को एक और महत्वपूर्ण कारण मान रही है। कंपनी ने निर्यात सहित भारत में मौजूदा उत्पादन का विस्तार करने के लिए अपने कुछ आपूर्तिकर्ताओं के साथ बातचीत शुरू कर चुकी है। वहीं, चीन के आपूर्तिकर्ता कंपनी को भारत के बजाय वियतनाम में विस्तार के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं।

बाजार पूँजीकरण के हिसाब अमेरिका की सबसे बड़ी कंपनी एप्पल अगर भारत में अपने उत्पादन का विस्तार करती है तो यह अन्य विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भी प्रोत्साहित करने वाला कदम होगा। इससे भारत को कई तरह के लाभ होंगे। निवेश के साथ भारत में रोजगार के अवसर पैदा होंगे।

मातोश्री कोई मस्जिद है क्या: राज ठाकरे ने उद्धव सरकार पर फिर साधा निशाना, केंद्र को कहा- ‘UCC लाएँ, औरंगाबाद का भी बदला जाए नाम’

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के प्रमुख राज ठाकरे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड’ और ‘जनसंख्या नियंत्रण कानून’ जल्द से जल्द लाने की माँग की है। इसी के साथ उन्होंने औरंगाबाद का नाम बदलकर संभाजीनगर किए जाने की भी आवाज उठाई है। राज ठाकरे ने यह बयान अपनी पुणे यात्रा के दौरान 22 मई 2022 (रविवार) को दिया है।

राज ठाकरे ने कहा, “हमारे कार्यकर्ताओं ने हनुमान चालीसा पढ़ी तो उन पर कार्रवाई हुई। मातोश्री के आगे राणा दम्पति ने हनुमान चालीसा पढ़ी तो उन्हें गिरफ्तार करवा दिया गया। मातोश्री मस्जिद है क्या? क्या शिवसैनिकों ने इसी दिन के लिए वोट दिया था ?”

राज ठाकरे ने शरद पवार पर आरोप हुए कहा कि वो औरंगजेब को संत मानते हैं। महाराष्ट्र में हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण करने के लिए AIMIM का उपयोग किया जा रहा। जो छत्रपति शिवाजी के शत्रु औरंगजेब की कब्र पर फूल चढ़ा रहे हैं उन्हें शर्म नहीं आ रही है। किसी के कुछ कहने और करने से इतिहास नहीं बदलने वाला है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक राज ठाकरे ने यह बयान पुणे के गणेश कला केंद्र में आयोजित के रैली में दिया। इस रैली में उन्होंने अपनी प्रस्तावित अयोध्या रैली की भी चर्चा की। उन्होने कहा, “मैंने अपनी अयोध्या यात्रा के निरस्त होने का ट्वीट 2 दिन पहले किया था। अयोध्या यात्रा का बयान मैंने जानबूझ कर दिया था। इस यात्रा पर मैं लोगों का रिएक्शन देखना चाहता था। कुछ लोग मेरी अयोध्या यात्रा के खिलाफ हैं। वो अपने जाल में फँसाना चाहते थे। लेकिन मैंने किसी को भी विवाद खड़ा करने का मौक़ा नहीं देना चाहता।”

राज ठाकरे ने आगे कहा, “मैं अपने फैसले पर किसी भी आलोचना को झेलने के लिए खुद को तैयार किया हूँ। लेकिन मैं अपने कार्यकर्ताओं को किसी संकट में नहीं डालना चाहता। शायद मेरी यात्रा के दौरान उत्तर प्रदेश में कोई अनहोनी हो जाए और उसमें UP का प्रशासन मेरे कार्यकर्ताओं को जेलों में डाल दे।”

नौगाँव थाने में आग लगाने वाले 5 आरोपितों के घरों पर चला असम सरकार का बुलडोजर: शराबी शफीकुल की मौत पर 2000 कट्टरपंथियों ने की थी हिंसा

असम (Assam) के नौगाँव जिले के बटाद्रवा पुलिस स्टेशन में कथित तौर पर एक मुस्लिम व्यक्ति शफीकुल इस्लाम (Shafiqul Islam) की मौत के बाद कट्टरपंथियों की करीब 2,000 की भीड़ ने थाने पर हमला कर उसे आगे के हवाले कर दिया था। अब इस मामले में जिला प्रशासन ने रविवार (22 मई 2022) को आरोपित 5 परिवारों के घरों पर बुलडोजर चलाकर पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया। इस मामले में तीन को गिरफ्तार भी किया गया है।

घटना को लेकर असम के डीजीपी भास्कर ज्योति महंत ने कहा कि पुलिस मौत के मामले को गंभीरता से ले रही है और इसकी जाँच जारी है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि थाने में आग लगाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इस हमले में शामिल रहे तीन आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया है और बाकियों की तलाश की जा रही है। डीजीपी ने रविवार को एक बयान जारी कर कहा कि शफीकुल इस्लाम (39) की मौत के मामले में बटाद्रबा थाने के प्रभारी को निलंबित कर दिया गया है। बाकियों पर भी कार्रवाई की गई है।

डीजीपी ने आगे कहा, “20 मई 2022 की रात लगभग 9.30 बजे पुलिस को सड़क पर एक व्यक्ति के शराब पीकर लेटे होने की सूचना मिली थी। इस पर शफीकुल इस्लाम को बटाद्रवा थाने लाया गया था। उसे मेडिकल चेकअप के लिए भेजा गया। अगले दिन उसे उसकी पत्नी को सौंप दिया गया। शफीकुल की पत्नी ने उसे खाना और पानी दिया। बाद में शफीकुल ने अपनी तबियत खराब होना बताया, जिसके बाद उसे अस्पताल ले जाया गया। दुर्भाग्य से वहाँ उसकी मौत हो गई।”

इसके अगले दिन कुछ असामाजिक तत्वों ने कानून को अपने हाथों में लिया और थाने को जला दिया। डीजीपी के अनुसार, इन असामाजिक तत्वों में युवा, महिला, पुरुष और वृद्ध भी शामिल थे। इनके द्वारा पुलिस पर सामूहिक हमला किया गया।

उल्लेखनीय है कि शफीकुल सलोनाबोरी गाँव का रहने वाला था। उसके परिजनों का आरोप है कि पुलिस ने उसे रिहा करने के लिए 10,000 रुपए और एक बतख के घूस की माँग की थी। गाँववालों का कहना है कि उसकी बीवी सुबह बतख और 10,000 रुपए लेकर जब थाने पहुँची।

थाने पहुँचने पर उसे पता चला कि उसके शौहर की तबीयत बिगड़ने से उसे नौगाँव सिविल अस्पताल ले गए हैं। इसके बाद जब वो अस्पताल पहुँची तो पता चला कि शफीकुल की मौत हो चुकी है। इस मामले में ग्रामीणों ने पुलिसकर्मियों पर टॉर्चर करने का आरोप लगाते हुए थाने का घेराव कर लिया था।

राजीव गाँधी के ‘हत्यारे’ को जेल से बाहर देख खुशी से फूले तमिलनाडु CM, लगाया गले: कॉन्ग्रेस ने बेल का विरोध भी नहीं किया

हाल ही में जेल से छूटे पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की हत्या के दोषियों में से एक एजी पेरारिवलन से तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने 18 मई 2022 को मुलाकात की। इस दौरान स्टालिन पेरारिवलन को गले लगाते दिख रहे हैं। इसका वीडियो भी उन्होंने शेयर किया है। उनकी पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) लंबे समय से पूर्व पीएम के हत्यारे की रिहाई की माँग कर रही थी।

इसको लेकर स्टालिन ने एक ट्वीट भी किया था, जिसमें वो पेरारिवलन को ‘भाई’ बताते हुए अपनी माँ के साथ उसके बेहतर भविष्य की कामना करते दिखे। इससे पहले सीएम स्टालिन ने तमिल में चार पन्नों जितनी लंबी प्रेस रिलीज को शेयर किया, जिसमें उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ‘इतिहास, कानून, राजनीति और प्रशासनिक इतिहास’ के योग्य बताया था।

सर्वोच्च अदालत में पेरारिवलन की तरफ से पैरवी कर रही तमिलनाडु सरकार ने तर्क दिया था कि धारा 302 राज्य सरकार के पब्लिक ऑर्डर के अंतर्गत आता है और ऐसे में राज्यपाल को सरकार द्वारा लिए गए फैसलों को मंजूरी देनी थी। सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशों का कहना था कि राज्यपाल राज्य सरकार के फैसलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकते।

कैसे जेल से छूटे पेरारिवलन

गौरतलब है कि 2014 में अन्नाद्रमुक की जे जयललिता की सरकार में सीआरपीसी की धारा 432 के तहत राज्य की शक्तियों का प्रयोग करते हुए पेरारिवलन समेत पूर्व पीएम राजीव गाँधी की हत्या के सभी दोषियों को मुक्त करने के लिए केंद्र को एक सिफारिश भेजी। उस दौरान स्टालिन ने विपक्ष में रहते हुए भी राज्य सरकार उस फैसले का समर्थन किया था। अब जब पेरारिवलन जेल से बाहर आ चुका है तो अन्नाद्रमुक भी इसका श्रेय लेने की होड़ में है।

दरअसल, 2018 में सत्ता में आने के बाद DMK के सत्ता में आने के बाद तमिलनाडु कैबिनेट ने अनुच्छेद 161 के तहत एक प्रस्ताव पारित किया ताकि राजीव गाँधी के हत्या के दोषियों को रिहा किया जा सके। इसके प्रस्ताव को राज्यपाल के अनुमोदन के लिए भी भेजा गया था, जहाँ वो प्रस्ताव लटका दिया गया। अपनी हालिया प्रेस रिलीज में स्टालिन ने खुलासा किया है कि वो साल 2020 में इस मामले को लेकर दोबारा से राज्यपाल से मिले थे, तब राज्यपाल ने इस पर विचार करने की बात कही थी। हालाँकि, बाद में इसी प्रस्ताव को राष्ट्रपति के पास भेजा गया।

जब ये मामला सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुँचा तो शीर्ष अदालत ने पेरारिवलन को मार्च 2022 में जमानत दे दी और मई 2022 में वो जेल से बाहर आ गया। हालाँकि, अभी तक सुप्रीम कोर्ट ने पेरारिवलन को दोषमुक्त नहीं किया है। उसे केवल इस आधार पर जमानत दी गई है कि राज्यपाल के पास ये मामला लंबे वक्त से लंबित है।

पेरारीवलन की रिहाई पर कॉन्ग्रेस का मौन प्रदर्शन

तमिलनाडु में कॉन्ग्रेस और डीएमके का गठबंधन है। ऐसे में 19 मई को तमिलनाडु कॉन्ग्रेस कमेटी (TMCC) ने पेरारिवलन की रिहाई के खिलाफ मौन विरोध प्रदर्शन किया। लेकिन इस बीच ये भी साफ कर दिया कि उसका पेरारिवलन की रिहाई से गठबंधन पर कोई असर नहीं होगा।

पेरारिवलन की रिहाई पर सबसे खास बात ये है कि गाँधी परिवार ने राजीव गाँधी की हत्या के दोषियों की रिहाई का विरोध तक नहीं किया। इस मामले में राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी दोनों ही चुप रहे। इस मामले में पूर्व केंद्रीय मंत्री एस. तिरुवनवकारसु ने तो यहाँ तक कहा कि राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी ने कभी नहीं कहा कि उन्हें (दोषियों को) रिहा नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने ये भी कहा, “राहुल और सोनिया दोनों को पेरारिवलन की रिहाई पर कोई पछतावा नहीं होगा।”

बीजेपी ने किया विरोध

हालाँकि, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) शुरू से ही राजीव गाँधी की हत्या के दोषियों की रिहाई का विरोध करती रही है। बीजेपी का कहना है कि एक पूर्व प्रधानमंत्री की जिस धमाके में जान गई, उसमें कई लोगों की भी मौतें हुई थीं। भाजपा नेता और प्रदेश अध्यक्ष के अन्नामलाई के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने पेरारिवलन समेत चार दोषियों की मौत की सजा की पुष्टि की है। बीजेपी नेता ने कहा कि इस विशेष मामले में सुप्रीम कोर्ट ने असाधारण निर्णय दिया है।

भाजपा पार्टी ने कहा कि वो सुप्रीम कोर्ट के फैसले का ,सम्मान करती है, लेकिन ये भी सत्य है कि सातों दोषी गंभीर अपराधी हैं। इस हमले में पूर्व पीएम राजीव गाँधी समेत 17 लोगों की मौत हो गई थी, जिसमें 8 पुलिसकर्मी भी शामिल थे।

इस मामले में तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन पर निशाना साधते हुए अन्नमलाई कहते हैं कि ये ऐसा व्यक्ति नहीं है, जिसका महिमामंडन किया जाए। तमिलनाडु में ऐसे हजारों व्यक्ति हैं, जिनका महिमामंडन किया जा सकता है। ऐसे में सीएम स्टालिन ने पेरारीवलन का असाधारण तरीके से स्वागत कर गलत उदाहरण पेश किया है। उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए।

इसके साथ ही उन्होंने कॉन्ग्रेस पर दोहरा चरित्र अपनाने का आरोप लगाया। बीजेपी नेता ने कहा कि जनता इस मामले को करीब से देख रही है।

दोषियों की रिहाई से आहत पीड़ितों के परिजन

तमिलनाडु में राजीव गाँधी की हत्या के दोषियों की रिहाई से अन्य पीड़त काफी आहत हैं। राजीव गाँधी हत्याकांड के अन्य पीड़ित रिहाई से खुश नहीं हैं। इंडिया टुडे ने राजीव गाँधी हत्याकांड के पीड़ितों में से एक एस समाधानी बेगम के बेटे के हवाले से उस घटना को याद किया। अब्बास ने उस दौर को याद करते हुए बताया कि 1991 में वो केवल 10 साल के थे, जब दक्षिण महिला कॉन्ग्रेस की नेता का 1991 में विस्फोट में मौत हो गई थी। इससे पहले अब्बास के पिता की मौत 1988 में हुई थी।

अब्बास ने कहा, “कल्पना कीजिए कि 10 साल के उस बच्चे की क्या हालत रही होगी, जिसनें अपने माँ-बाप दोनों को ही खो दिया हो। मैंने और पीड़ितों के 16 परिवारों ने भी अपने जीवन में सब कुछ खो दिया है। दोषी को रिहा कर दिया गया है। ये कैसा न्याय है? वह इस मामले में दोषी है और हम पीड़ित हैं। आप किस मानवीय आधार पर देख रहे हैं? 31 साल हो गए हैं, उन्हें रिहा कर दिया गया, लेकिन क्या वे मेरी माँ को वापस कर सकते हैं?”

सीएम को पेरारिवलन को गले लगाने से निराश अब्बास का कहना है, “हम पीड़ित हैं, वह नहीं। यह सब राजनीतिक लाभ के लिए है कि ये पार्टियाँ पेरारिवलन का समर्थन करती हैं। इन्हें हमसे मिलकर ये देखना चाहिए कि कैसे हमारा जीवन बिखर गया।”

इसी तरह से एक अन्य पीड़ित के भाई जॉन जोसेफ ने भी अपना गुस्सा जाहिर किया। दरअसल, जॉन का भाई एडवर्ड सीआई़डी का इंस्पेक्टर था और उस दिन वो पूर्व पीएम राजीव गाँधी की सुरक्षा में तैनात था। 67 साल के जॉन बताते हैं कि उनकी भाई उस दौरान केवल 39 साल का था। उसकी मौत के बाद पूरा परिवार गम के साए में डूब गया। माँ दिन की कॉर्डिएक अरेस्ट (हार्ट अटैक) से मौत हो गई। मेरी भाभी एक बच्चे के साथ विधवा हो गई।

जॉन बताते हैं कि उन्होंने ही अपने भाई के शव की पहचान की थी। उनका कहना है कि उन्होंने इंसाफ के लिए हर चौखट पर दस्तक दी, लेकिन पेरारिवलमन की रिहाई ने उनके साथ अन्याय किया है। अब वो भगवान की अदालत में इसका हिसाब चुकता करेगा।

क्या था पूरा मामला

गौरतलब है कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की 21 मई 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में एक सुसाइड अटैक में मौत हो गई थी। उस दौरान उनके साथ-साथ 13 अन्य की भी मौत हो गई थी। बाद में पेरारिवलन को 19 साल की उम्र में ही इस हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। 1999 में पेरारिवलन को मौत की सजा सुनाई गई। आरोप ये था कि पेरारिवलन ने पूर्व पीएम की हत्या में इस्तेमाल होने वाली बेल्ट के लिए 8 वोल्ट की बैट्री खरीदा था।

इन लोगों ने राष्ट्रपति के पास दया याचिका भी दायर की थी, जो लंबे वक्त से लंबित थी, जिसके कारण उनके दो अन्य मित्र मुरुगन और संथान (दोनों श्रीलंकाई) की सजा को 2014 में आजीवन कारावास में बदल दिया गया। इसके तुरंत बाद तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक सरकार ने सभी सातों को रिहा करने का आदेश दिया था।

इस मामले में कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने अपने पति के हत्या के दोषियों को माफ करने का फैसला किया। उन्होंने कहा था कि उन्हें इनकी रिहाई से कोई समस्या नहीं है। हालाँकि, बाकी के पीड़ितों को ये अच्छा नहीं लगा।