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सिखों का अपमान करने वाली 3 किताबें पंजाब बोर्ड ने की बैन: जिसने भी दी थी अनुमति, उस पर होगी कड़ी कार्रवाई

पंजाब में स्कूल शिक्षा बोर्ड ने सिखों का गलत इतिहास बताने के आरोप 3 किताबों को बैन कर दिया है। इन किताबों पर प्रतिबंध एक जाँच कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद लगाया गया है। इस मामले में शिकायतकर्ता एक किसान नेता बलदेव सिंह सिरसा थे। इस बात की जानकारी रविवार (1 मई 2022) को दी गई है।

जिन पुस्तकों पर बैन लगाया गया है उनमें पहला नाम ‘मॉडर्न ABC ऑफ़ हिस्ट्री ऑफ़ पंजाब’ है जिसे मंजीत सिंह सोढ़ी ने लिखा है। दूसरी और तीसरी किताब का नाम ‘हिस्ट्री ऑफ़ पंजाब’ है। इन्हें क्रमशः महिंदरपाल कौर और एम एस मान ने लिखी हैं। ये तीनों किताबें क्लास 12 की पढ़ाई में प्रयोग होती थीं। इन तीनों पुस्तकों का प्रकाशन जालंधर के एक प्रकाशक द्वारा किया जाता था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक शिकायतकर्ता बलदेव सिंह सिरसा के मुताबिक इन किताबों के कुछ अंश सिखों के सच्चे इतिहास से मेल नहीं खाते। आरोप लगाया गया है कि इन पुस्तकों में न सिर्फ स्वाधीनता संग्राम में सिखों के बारे में गलत जानकारी दी गई है बल्कि गुरबाणी में भी शब्दों की गलतियाँ हुई हैं। तीनों पुस्तकों पर लगे प्रतिबंध की पुष्टि PSEB के चेयरमैन जोगराज सिंह ने की है। स्कूल शिक्षा विभाग ने जाँच रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि इन किताबों को बिक्री के साथ स्कूलों में पढ़ाने से भी रोक दिया गया है।

जोगराज सिंह के मुताबिक, “इतनी गलतियों के बाद इस इन किताबों को बोर्ड द्वारा पढ़ाने की अनुमति कैसे मिली थी। हम इसकी गहराई से जाँच करवाएँगे। इसमें जो भी अधिकारी या कोई अन्य दोषी पाया जाता है, उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी। इन तीनों किताबों के साथ एक ए सी अरोड़ा द्वारा लिखी एक अन्य किताब भी उन्हीं शब्दों के साथ लिखी गई है जिसे बिना बोर्ड के एप्रूवल के बेचा जा रहा था। इस मामले में जाँच करवाई जा रही है। हमें कार्रवाई के लिए अंतिम निष्कर्ष की प्रतीक्षा है।”

पुस्तक को बोर्ड द्वारा पढ़ाने प्रतिबंध के आदेशों की जानकारी SCERT (स्टेट कौंसिल ऑफ़ एजुकेशनल रिसर्च एन्ड ट्रेनिंग) के साथ सभी जिलों के शिक्षा अधिकारियों को भेज दी गई है। उन्हें इस आदेश पर तत्काल अमल करने के भी निर्देश दिए गए हैं। बताया जा रहा है कि ये तीनों किताबें स्कूलों में दशकों से पढ़ाई जा रही थीं। जब आम आदमी पार्टी विपक्ष में थी तब उसने इन किताबों को बैन करने का मुद्दा उठाया था। इन किताबों पर बैन करने की माँग के साथ एक जुलूस भी निकाला गया था जिसमें पंजाब विधानसभा के वर्तमान में स्पीकर कुलतार सिंह भी शामिल हुए थे।

देश में पहली बार MBBS छात्रों ने ली ‘महर्षि चरक शपथ’ : बौखलाई TN सरकार ने मदुरै कॉलेज के डीन को हटाया, विदेशी ओथ के लिए जारी होगा सर्कुलर

तमिलनाडु के राजकीय मदुरै मेडिकल कॉलेज (Madurai Medical College) के एमबीबीएस (MBBS) प्रथम वर्ष के छात्रों ने शनिवार (30 अप्रैल 2022) को दीक्षा सत्रारंभ समारोह यानी इंडक्शन ओरिएंटेशन सेरेमनी (Induction Ceremony) के दौरान हिप्पोक्रेटिक शपथ की जगह ‘महर्षि चरक शपथ‘ ली। ऐसा देश में पहली बार हुआ है, जब मेडिकल छात्रों ने हिप्पोक्रेटिक की बजाय महर्षि चरक शपथ ली हो। इस बदलाव को लेकर तमिलनाडु की एम के स्टालिन सरकार ने अप्रत्यक्ष तौर पर नाराजगी जाहिर की है। बताया जा रहा है कि जब छात्र दीक्षा सत्रारंभ समारोह में ‘महर्षि चरक शपथ’ ले रहे थे, उस वक्त तमिलनाडु के वित्त मंत्री पीटीआर पलानीवेल थियागा राजन और राजस्व मंत्री पी मूर्ति भी मौजूद थे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ‘महर्षि चरक शपथ’ दिलाने के मामले में राज्य सरकार ने त्वरित कार्रवाई करते हुए कॉलेज के डीन डॉ ए रथिनवेल (Dr A Rathinavel) को उनके पद से हटा दिया है। तमिलनाडु सरकार ने डीन का ट्रांसफर करते हुए उन्हें वेटिंग लिस्ट में डाल दिया है। एक प्रेस नोट में तमिलनाडु सरकार ने कहा, “सभी मेडिकल कॉलेज लंबे समय से मेडिकल छात्रों को हिप्पोक्रेटिक ओथ दिला रहे हैं। ऐसे में हिप्पोक्रेटिक ओथ के स्थान पर महर्षि चरक शपथ कराना निंदनीय है। कॉलेज के डीन को उनके पद से हटा दिया गया है और उन्हें वेटिंग लिस्ट में डाल दिया है।”

तमिलनाडु के स्वास्थ्य मंत्री मा सुब्रमण्यम ने चिकित्सा विभाग के निदेशक डॉ. नारायण बाबू को नियमों का उल्लंघन करने के मामले में जाँच करने का निर्देश दिया है। राज्य सरकार ने कहा कि वह सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों के प्रमुख को एक सर्कुलर के माध्यम से छात्रों को हमेशा हिप्पोक्रेटिक ओथ दिलाने के लिए कहेंगी।

मालूम हो कि हाल ही में चिकित्सा शिक्षा नियामक राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) ने एमबीबीएस के नए पाठ्यक्रमों में और देश में इसकी पढ़ाई कर रहे छात्रों के लिए ‘हिप्पोक्रेटिक ओथ’ की जगह ‘महर्षि चरक शपथ’ दिलाने की सिफारिश की गई थी। नए दिशा निर्देशों के अनुसार, “किसी अभ्यर्थी के चिकित्सा शिक्षा में दाखिला लेने पर संशोधित ‘महर्षि चरक शपथ’ दिलाए जाने की सिफारिश की जाती है।” बीते दिनों केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया ने भी संसद में कहा था कि ‘महर्षि चरक शपथ’ वैकल्पिक होगी और मेडिकल के छात्र इस शपथ को लेने के लिए बाध्य नहीं होंगे।

हिप्पोक्रेटिक ओथ और महर्षि चरक शपथ में अंतर

अभी के समय में जो शपथ की पद्धति है वो हिप्पोक्रेटिक यानि कि ग्रीक दार्शनिक और चिकित्सक हिप्पोक्रेट्स के नाम पर ली जाती है। उन्हें फादर ऑफ मेडिसिन भी कहा जाता है। इस शपथ को व्हाइट कोट सेरेमनी के दौरान लिया जाता है। सालों से दुनिया भर के डॉक्टर यही शपथ लेते रहे हैं। अब जिस शपथ की सिफारिश की गई है, वो महर्षि चरक के नाम पर है। महर्षि चरक भारतीय थे और आयुर्वेद के जनक माने जाते हैं। उन्होंने ही यह शपथ लिखी थी, जो आयुर्वेद का संस्कृत पाठ है। दोनों शपथ का मतलब लगभग एक जैसा ही है, लेकिन भाषा और उसके रचियता अलग-अलग हैं।

पुजा का सामान खरीद रहे पुजारी को बदमाशों ने मारी गोली, बिहार के आरा अस्पताल में भर्ती

बिहार के भोजपुर (Bhojpur, Bihar) जिले के आरा से सटे एक गाँव में हथियारबंद बदमाशों ने शनिवार (30 अप्रैल 2022) की शाम को 62 वर्षीय एक पुजारी को गोली मार दी। हालाँकि, इस हमले में पुजारी राम तवक्या सिंह उर्फ साधुजी बाल-बाल बच गए, लेकिन गोली उनकी केहुनी में जा लगी और वह घायल हो गए। घायल अवस्था में उन्हें आरा के सदर अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया है।

पुजारी चाँदी थाना क्षेत्र के सलेमपुर गाँव के निवासी हैं और स्व. बालखीरा सिंह के पुत्र हैं। वह गाँव के ही सूर्य मंदिर में पूजा-पाठ करवाते हैं। पुजारी ने पुलिस को बताया कि उनके बेटे ने एक पिकअप लिया था, जिसको लेकर दो दिन पूर्व बदमाशों द्वारा पैसे माँगा जा रहा था। जब उनके बेटे ने पैसे देने से मना किया तो बदमाशों ने उसकी पिटाई कर दी थी। यह बात वहीं खत्म हो गई थी।

उन्होंने बताया कि शनिवार की देर शाम वह सलेमपुर गाँव स्थित किराना दुकान पर पूजा का सामान खरीद रहे थे। उसी दौरान आठ-दस की संख्या में बदमाश वहाँ पहुँचे और उनसे पैसे माँगने लगे। जब उन्होंने इसका विरोध किया तो एक बदमाश ने उनके सीने पर फायर दिया। हालाँकि गोली उनके हाथ में लगी। इस मामले में पुलिस की ओर से जाँच की जा रही है। हालाँकि, अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई है।

बता दें कि सितंबर 2021 में आरा से सटे पीरो में एक पुजारी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। पीरो के हसन बाजार ओपी थाना क्षेत्र के जमुनीपुर गाँव में हुई घटना में मृतक 65 वर्षीय पुजारी रामचंद्र सिंह मूल रूप से रोहतास जिला के बिक्रमगंज थाना के मुंजी गाँव के रहने वाले थे। वह 25 सालों से जमुनीपुर गाँव स्थित अपने ससुराल में रह रहे थे।

पुजारी रामचंद्र सिंह घर के बाहर दालान में बने कुटिया में सो रहे थे। इसी दौरान कुछ बदमाश आए और उनके सीने में गोली मारकर भाग गए। उनके बेटे ने बताया था कि उनके पिता की हत्या किसने और क्यों की, यह उन्हें नहीं मालूम। उनके पिता की किसी से दुश्मनी भी नहीं थी।

8 बच्चों की अम्मी का दिल आया 4 बच्चों के अब्बा पर, घर-बार छोड़ भागी: शौहर का आरोप- ताबीज देकर बीवी को पटाया गया

राजस्थान (Rajasthan) के भरतपुर से हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। यहाँ 8 बच्चों की माँ, जिसके पोते-पोतियों का भी निकाह हो चुका है, वह अपने प्रेमी संग फरार हो गई। कैथवाड़ा थानाधिकारी राम नरेश मीणा ने बताया कि 24 अप्रैल को कैथवाड़ा थाने में नीमला गाँव के रहने वाले एक व्यक्ति ने 57 वर्षीय शख्स पर अपनी बीवी के अपहरण का आरोप लगाते हुए मामला दर्ज कराया था।

मीणा ने बताया कि महिला के शौहर ने यह आरोप भी लगाया है, “उस व्यक्ति ने मेरी बीवी को नक्कास ताबीज देकर उसे अपने प्रेम जाल में फँसाया है। इन दोनों का पिछले 6 सालों से अफेयर चल रहा है। इस कारण वह अपने 8 मासूम बच्चों को छोड़कर उसके साथ भागने को राजी हो गई।”

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस ने साहुनी और उसके प्रेमी साहुन को पकड़कर कोर्ट में पेश किया। इस दौरान महिला का शौहर अपने 8 बच्चों, बहनों और माँ को लेकर कोर्ट पहुँचा। वहाँ महिला ने बताया कि उसका अपहरण नहीं किया गया है, बल्कि वह अपनी मर्जी से अपने प्रेमी के साथ गई है। बैंच के पीछे खड़े आठों बच्चे इस पूरे घटनाक्रम को देख रहे थे। अदालत ने जब महिला से उसकी मर्जी पूछी, तो उसने कहा कि वह साहुन के साथ ही रहना चाहती है। कोर्ट के दोबारा पूछने पर भी उसने यही जवाब दिया। जिसके बाद कोर्ट ने महिला को उसके प्रेमी साहुन के साथ जाने की अनुमति दे दी।

बताया जा रहा है कि साहुनी और उसके शौहर फकरू के कुल 14 बच्चे हुए थे। 6 बच्चों की मौत के बाद अब दोनों के 8 बच्चे बचे हैं, जिनमें से 3 का निकाह हो चुका है और उनके भी बच्चे हैं। दूसरी ओर साहुन के 4 बच्चे हैं। उसके पोते-पोतियों का निकाह हो चुका है। हैरानी की बात तो यह है कि साहुन की बीवी उसके साथ ही रहती है, लेकिन उसको अपने शौहर के प्रेम से कोई एतराज नहीं है।

भारत में बढ़ती गर्मी और कोयले की माँग: राज्यों की डिमांड के बीच जानिए क्या है इसकी सच्चाई

भारत में अप्रैल के महीने में रिकॉर्ड गर्मी पड़ी और अब मई के लिए की जा रही भविष्यवाणी से पता चलता है कि देश में हीटवेव में कोई कमी नहीं होगी। देश भर में बढ़ते तापमान के साथ, देश के कई हिस्सों में कोयले से चलने वाले विद्युत् संयंत्रों से बिजली आपूर्ति भी प्रभावित हुई है।

इस भीषण गर्मी के दौरान, देश भर के कई शहरों में घंटों बिजली गुल हो रही है। ऐसे में कई राजनेताओं ने देश में कोयले की कथित कमी के लिए केंद्र को दोष देना शुरू कर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप दावा किया जा रहा है कि बिजली कटौती हो रही है। इन कोयले की कमी की अफवाहों के बीच, सरकार समर्थित कोयला खनन कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड ने पिछले साल के इसी महीने की तुलना में अप्रैल 2022 में कोयला उत्पादन में 27.2% और कोयला प्रेषण (एक जगह से दूसरे जगह भेजने में) 5.8% की वृद्धि दर्ज की है।

कोयला मंत्रालय ने अपने बयान में कहा, “कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) द्वारा कोयला उत्पादन में अप्रैल 2022 में 27.2% की वृद्धि हुई, जबकि 2021 में इसी अवधि की तुलना में और कोयला प्रेषण में 5.8% की वृद्धि हुई। सीआईएल में कोयला स्टॉक 56.7 मिलियन टन (MT) और एससीसीएल में 4.3 MT है। इस प्रकार, कोयला कंपनियों के पास पर्याप्त कोयला स्टॉक उपलब्ध है।

मंत्रालय ने कहा कि राज्यों द्वारा आपूर्ति संकट का हवाला देने के बावजूद पर्याप्त कोयला उपलब्ध है। आधिकारिक आँकड़ों का हवाला देते हुए सूत्रों के अनुसार, अप्रैल 2022 में पीक बिजली की खपत लगभग 207.11 GW है, जो अप्रैल 2021 में 182 GW और अप्रैल 2020 में 133 GW थी। बिजली मंत्रालय के एक अलग बयान के अनुसार, भारत में बिजली की खपत भी चार साल के उच्चतम स्तर पर पहुँच गई है।

बिजली मंत्रालय ने शुक्रवार को एक ट्वीट में कहा, “एक दिन में सबसे अधिक आपूर्ति शुक्रवार 29 अप्रैल को 207.11 गीगावॉट के अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुँच गई।”

मंत्रालय ने आगे कहा, “गुड शेड साइडिंग, वाशरी साइडिंग और बंदरगाह पर कोयले का स्टॉक लगभग 4.7 MT है और इसे तुरंत बिजली संयंत्रों में ले जाने के लिए तैयार है। इसके अलावा, सीआईएल साइडिंग पर लगभग 2 MT कोयला स्टॉक भी उपलब्ध है।

“भारतीय रेलवे इस स्टॉक को देश भर में बिजली कंपनियों (उत्पादन कंपनियों) को स्थानांतरित करने के लिए पूरी तरह से तैयार है। सीआईएल ने राज्य/केंद्रीय जेनकोस को 5.75 मिलियन टन (MT) कोयले की पेशकश की और इस कोयले के 5.3 मिलियन टन (MT) को जेनको द्वारा बुक करने के लिए सहमति व्यक्त की गई। इससे टीपीपी में कोल स्टॉक बिल्डअप में मदद मिलेगी।

रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष वीके त्रिपाठी ने कहा कि कोयले की माँग और खपत पिछले साल की तुलना में काफी बढ़ गई है और भारतीय रेलवे सर्वोच्च प्राथमिकता पर अतिरिक्त कोयला रैक संचालित कर रहा है।

इसके अलावा, 1 अप्रैल को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, कोल इंडिया लिमिटेड ने वित्त वर्ष 2021-2022 में 622.6 मिलियन टन (MT) का रिकॉर्ड कोयला उत्पादन दर्ज किया, जो साल दर साल 4.4% की वृद्धि दर्शाता है।

2020-21 में कोयले का उत्पादन 595.2 मिलियन टन (MT) था। बिजली उत्पादन कंपनियों को कोयला शिपमेंट वित्त वर्ष 2012 में 540.4 एमटी के नए उच्च स्तर पर पहुँच गया, जो वित्त वर्ष 2011 में 445 एमटी से 21.4 प्रतिशत अधिक है।

हनुमान चालीसा का पाठ करके लौट रहे बजरंग दल कार्यकर्ताओं पर जानलेवा हमला: धारदार हथियार के साथ आई भीड़, नाबालिग की गर्दन बाल-बाल बची

उत्तराखंड के हल्द्वानी में हनुमान चालीसा का पाठ कर के लौट रहे बजरंग दल के लोगों पर हमले की खबर है। हमलावरों की संख्या 50-60 बताई जा रही है। इस दौरान पथराव भी किए जाने की सूचना है। हमले में बजरंग दल के तीन कार्यकर्ताओं को चोट आना बताया जा रहा है। घटना शनिवार (30 अप्रैल 2022) की है। अब तक 11 आरोपितों को गिरफ्तार किए जाने की जानकारी मिल रही है।

नैनीताल पुलिस के मुताबिक, “CCTV फुटेज के आधार पर हमलावरों की पहचान की जा रही है। सभी आरोपितों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। इस मामले में धारा 147 ,149 153 A 323, 504 506, 296 IPC के तहत कार्रवाई की गई है। घटना में संलिप्त अधिकतर अभियुक्तों को गिरफ्तार कर लिया गया है।” पुलिस ने किसी भी प्रकार की भ्रामक सूचना फैलाने पर कार्रवाई की भी चेतावनी दी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक घटना काठगोदाम थानाक्षेत्र के शीशमहल की है। यहाँ बजरंग दल कार्यकर्ता रक्षित, देव और मानस हनुमान चालीसा का पाठ थाने के पास स्थित हनुमान गढ़ी मंदिर में करने गए थे। लौटते हुए शाम लगभग 8 बजे तीनों रुक कर एक दुकान पर जूस पीने लगे। इस दौरान बाईक सवार लगभग 4-5 हमलावर आए। उन्होंने जूस पी रहे तीनों लोगों पर हमला कर दिया। आरोप है कि हमले से पहले गले में भगवा गमछा देख कर उनसे बजरंग दल का होने की जानकारी ली गई थी।

हमले के बाद स्थानीय लोगों ने सभी हमलावरों को पकड़ लिया। पकड़े गए हमलावरों में से 3 लोग वहाँ से भागने में सफल रहे। वो वहाँ पर अपने साथियों को बुला कर लाए। उनके बुलाने पर 50-60 लोगों की एक भीड़ ने धावा बोल दिया और पथराव कर के बाकी हमलावरों को भी छुड़ा ले गई। आरोप है कि हमलावर भीड़ के पास धारदार हथियार, तमंचे और लाठी – डंडे थे। इस घटना की शिकायत पीड़ितों ने थाने में दी। कुछ ही देर में खबर फ़ैल जाने के बड़ा लोग आक्रोशित हो गए।

नाराज लोगों की भीड़ थाने में जमा हो गई और पुलिस से कठोर कार्रवाई की माँग करने लगी। इसी दौरान आरोप है कि हमलावरों में शामिल एक व्यक्ति थाने में हालत का जायजा लेने आ गया। पीड़ितों ने उसे पहचान लिया और नाराज भीड़ ने आरोपित की थाने में ही पिटाई कर दी। इस दौरान शहर के मेयर डॉ.जोगेंद्र सिंह रौतेला भी थाने पहुँच गए। लगभग 3 घंटे अथक प्रयास के बाद पुलिस आक्रोशित लोगों को शाँत करवा पाई।

ऑपइंडिया ने हल्द्वानी बजरंग दल के जिला संयोजक जोगेंद्र राणा से घटना की जानकारी ली। जोगेंद्र ने बताया, “हमला भगवा गमछा देख कर किया गया। बजरंग दल वाला बोल कर धारदार हथियार से एक नाबालिग बच्चे को मारा गया। अगर वो पीछे न हटता तो शायद उसकी गर्दन कट जाती। गली नंबर 8 और 17 इन्हीं (विपक्षियों) का बहुल इलाका है। साथ ही जवाहर नगर भी। 1 आरोपित को हमने खुद पकड़ कर पुलिस को दिया। 10 और आरोपित पकड़ने की बात कही जा रही है। हमने पुलिस को 2 दिन की समय सीमा दी थी आरोपितों को पकड़ने के लिए। अगर इसमें देर लगी तो बजरंग दल मीटिंग के बाद अपना निर्णय लेगा।”

जननी जन्मभूमि भारत-माता ही आराध्य देवी… जब स्वामी विवेकानंद ने अन्य देवी-देवताओं को भूलने का किया था आह्वान

12 जनवरी 1863 को बंगाल के कलकत्ता में माता भुवनेश्वरी देवी और पिता विश्वनाथ दत्त के घर जन्में नरेंद्रनाथ दत्त, जो बाद में स्वामी विवेकानंद के नाम से जाने गए, मात्र 39 वर्ष 5 महीने और 24 दिन के जीवन में अगर उन्हीं के शब्दों में कहूँ तो 1500 वर्ष का कार्य कर गए। स्वामी विवेकानंद 25 साल की उम्र में ही परिव्राजक संन्यासी के रूप में भारत भ्रमण पर निकल गए थे।

भारत उस समय पराधीन था। हम पर अंग्रेज़ों का शासन था। अपने लगभग साढ़े चार वर्ष के भ्रमण के दौरान उन्होंने देखा कि वर्षों की गुलामी के कारण हर एक भारतीय के अंदर आत्मविश्वास, आत्म-सम्मान,आत्म-गौरव और स्वावलम्बन पूर्णतः समाप्त हो गया है। स्वामी विवेकानंद को अपना कार्य स्पष्ट हो गया था। वो राजनीति से दूर रह कर हर भारतवासी में आत्मविश्वास जगाने का कार्य करने वाले थे।

स्वामी विवेकानंद ने यह आत्मविश्वास जगाने का, चरित्र-निर्माण का और मनुष्य-निर्माण का कार्य पूरे जीवन भर अनेकों कष्ट, कठिनायों को सहते हुए भी किया क्योंकि इसके बिना आत्मविश्वास जागृत नहीं होता और बिना आत्मविश्वास के आत्मनिर्भर बनना संभव नहीं है, जो स्वाधीनता के लिए अत्यावश्यक है।

इस कार्य को गति देने के लिए ही स्वामी विवेकानंद 11 सितम्बर, 1893 को अमेरिका के शहर शिकागो में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भाग लेने गए थे। जहाँ उनके व्यक्तित्व और चरित्र का लोहा भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व ने माना।

जब स्वामी विवेकानंद स्वागत का उत्तर देने के लिए खड़े होते हैं और अपने मात्र पाँच शब्दों, “अमेरिकावासी बहनों तथा भाइयों” से भारत को विश्व विजयी बना देते हैं। सामने बैठे विश्व भर से आए हुए लगभग 7000 लोग दो मिनट से ज्यादा समय तक तालियाँ बजाते रहते हैं और यह 19वीं शताब्दी की एक प्रमुख घटना बन गई। इस घटना ने भारत की ध्वनि को विश्व भर में गुंजायमान कर दिया था।

विश्व धर्म महासभा में दुनिया भर के 10 प्रमुख धर्मों के अनेक प्रतिनिधि आए हुए थे। इसमें यहूदी, हिन्दू, इस्लाम, बौद्ध, ताओ, कनफयूशियम, शिन्तो, पारसी, कैथोलिक तथा प्रोटेस्टेंट इत्यादि शामिल थे। लेकिन स्वामी विवेकानंद का वक्तव्य सबसे अधिक सफल हुआ था, जो हमें धर्म महासभा के सामान्य समिति के अध्यक्ष डॉक्टर जेएच बैरोज के शब्दों से पता लगता है। उन्होंने कहा था, “स्वामी विवेकानंद ने अपने श्रोताओं पर अद्भुत प्रभाव डाला।”

मरविन–मेरी स्नेल जो महासभा की विज्ञान सभा के अध्यक्ष थे, वो लिखते हैं:

“निःसंदेह स्वामी विवेकानन्द धर्म महासभा के सर्वाधिक लोकप्रिय एवं प्रभावशाली व्यक्ति थे। कट्टर से कट्टर ईसाई भी उनके बारे में कहते हैं कि वे मनुष्य में महाराज हैं।”

भारत के किसी हिन्दू संन्यासी ने अमेरिका में आयोजित किसी भव्य कार्यक्रम में भारत और हिन्दू समाज का प्रतिनिधित्व किया है और उनको वहाँ सफलता मिली है, ऐसी सूचना भारत के हर भाग में पहुँच गई थी। स्वामी विवेकानंद ऐसा करिश्मा करने वाले पहले भारतीय संन्यासी थे। इस घटना से लाखों भारतीयों और खास तौर पर नवयुवकों में जोश और आत्मविश्वास बढ़ गया।

भारत जो उस समय गुलाम था, जिसको साँप और सपेरों का देश माना जाता था, उसके पास दुनिया को देने के लिए आध्यात्म का सन्देश है, यह विदेशियों को पहली बार पता चला था। यह स्वामी विवेकानंद का प्रभाव ही था, जिसके कारण उनके अनेकों अनुयायी और शिष्य भारत आए थे। इनमें पुनरुथान के कार्य के लिए जिसमें मार्गरेट नोबल (जिनको बाद में भगिनी निवेदिता के नाम से जाना गया), श्रीमान एवं श्रीमती कैप्टन सेविएर, जोसेफ़ाइन मैक्लिओड और सारा ओले बुल शामिल थे। भगिनी निवेदिता ने तो स्वामी विवेकानंद के स्वर्गवास के बाद सीधे तौर पर भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी।

15 जनवरी 1897 को स्वामी विवेकानंद भारत वापस आए तो वह सबसे पहले श्रीलंका के कोलम्बो उतरे थे और वहाँ हिन्दू समाज ने उनका बड़ा शानदार स्वागत किया था। वो युवाओं के बीच में इतने प्रसिद्ध हो गए थे कि उनसे मिलने के लिए युवा रेल गाड़ी तक रुकवा देते थे। उन्होंने पूरे भारतवर्ष में अपने व्याख्यानों और संगठन कार्य से एक नवीन ऊर्जा भर दी थी। उनके भारत में दिए हुए व्याख्यानों ने यहाँ के युवाओं में अद्भुत आत्मविश्वास भर दिया था, जिसमें से मुख्य है – वेदांत का उद्देश्य, हमारा प्रस्तुत कार्य, भारत का भविष्य, हिन्दू धर्म के सामान्य आधार, भारत के महापुरुष, मेरी क्रन्तिकारी योजना।

स्वामी विवेकानंद के व्याख्यान सुनने के लिए बड़ी संख्या में युवा भी आते थे, जो भाषण के बाद राष्ट्र प्रेम से ओत-प्रोत हो जाते थे। जिसके कारण अंग्रेज़ी सरकार उनको संदिग्ध व्यक्ति के तौर पर देखती थी और उनकी जासूसी करवाने पर आमादा हो गई थी।

प्रो. शैलेन्द्रनाथ धर द्वारा लिखी “स्वामी विवेकानंद समग्र जीवन दर्शन” के अनुसार वर्ष 1898 में जब स्वामी विवेकानंद अल्मोड़ा यात्रा पर थे, उन दिनों अंग्रेज़ उनकी निगरानी करते थे। जब यह सूचना स्वामीजी को पता लगी तो उन्होंने यह बात हँसी में उड़ा दी थी! लेकिन भगिनी निवेदिता और अन्य सहयात्रियों ने इस विषय को गंभीरता से लिया था। स्वामी विवेकानंद के द्वारा सम्प्रेषित पत्र डाकघरों में पढ़े जाते थे, यह तथ्य भी सामने आता है! अंग्रेजी सरकार द्वारा करवाई गई जासूसी हो या अन्य ऐसी किसी भी चुनौतियों से ना तो स्वामी विवेकानंद डरे और ना रुके… वह निरंतर अपना कार्य करते रहे।

फरवरी 1897 को मद्रास (आज का चेन्नई) में हज़ारों लोगों को सम्बोधित करते हुए अपने भाषण ”भारत का भविष्य” में स्वामी विवेकानंद संगठित होने का महत्व बताते हैं। वह चार करोड़ अंग्रेज़ों द्वारा तीस करोड़ भारतवासियों के ऊपर शासन करने का सबसे बड़ा कारण उनका संगठित होना और भारतवासियों का बिखराव मानते थे। उनका सन्देश बिलकुल स्पष्ट था। वो मानते थे कि यदि भारत का भविष्य उज्जवल, भारत को महान बनाना और स्वाधीनता के साथ जीना है, तो संगठित होना अतिआवश्यक है जो एक संगठन द्वारा होगा। ताकि सभी बिखरी हुई शक्तियाँ एकत्रित की जा सकें, जिससे शक्ति-संग्रह होगी।

स्वामी विवेकानंद आगे आह्वान करते हैं – “गुलाम बनना छोड़ो। आगामी पचास वर्ष के लिए यह जननी जन्मभूमि भारतमाता ही मानो आराध्य देवी बन जाए। तब तक के लिए हमारे मस्तिष्क से व्यर्थ के देवी-देवताओं के हट जाने में कुछ भी हानि नहीं है। अपना सारा ध्यान इसी एक ईश्वर पर लगाओ, हमारा देश ही हमारा जाग्रत देवता है।” 1897 को दिए गए इस भाषण के ठीक पचास वर्ष बाद 1947 में भारत स्वतन्त्र हो जाता है।

स्वामी विवेकानंद ने मात्र अपने जीते जी ही नहीं बल्कि अपने स्वर्गवास के उपरांत भी लाखों युवाओं और वरिष्ठ क्रांतिकारियों का मार्गदर्शन किया, जिन्होंने उनके विचारों से प्रभावित होकर अपना जीवन भारत को स्वतन्त्रता दिलवाने के लिए न्योछावर कर दिया। उनकी प्रेरणा, प्रोत्साहन और मार्गदर्शन पाने वाले महानुभावों में बाल गंगाधर तिलक, श्री अरविन्द, महात्मा गाँधी, आचार्य विनोबा भावे, सुभाष चन्द्र बोस, भगिनी निवेदिता, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, जवारलाल नेहरू, बाबा साहब आम्बेडकर भी थे। भारतवर्ष को अंग्रेजी राज से स्वतंत्र करवाने की मुहीम में मात्र 18 वर्ष 5 महीने और 11 दिन की उम्र में ही फाँसी पर चढ़ने वाले खुदीराम बोस, ढाका मुक्ति संघ के संस्थापक हेमचंद्र घोष, क्रांतिकारी लेखक ब्रह्मबांधव उपाध्याय, अनेकों रियासतों के राजा (जैसे खेतड़ी के राजा अजीत सिंह) आदि भी स्वामी विवेकानंद से प्रभावित रहे थे।

खरगोन हिंसा के दंगाइयों से होगी पाई-पाई की वसूली: हर छोटे-बड़े नुकसान का बाजार दर से होगा मूल्यांकन, ट्रिब्यून करेगा फैसला, DM की जवाबदेही

मध्य प्रदेश में रामनवमी (10 अप्रैल 2022) की दिन शोभायात्रा पर हमले और आगजनी की घटना के बाद हिंदुओं के घरों में की गई तोड़फोड़ के मामले में आरोपितों से नुकसान की भरपाई कराई जाएगी। सरकारी और निजी संपत्तियों में की गई तोड़फोड़ और आगजनी को लेकर भरपाई के नियम तय कर दिए गए हैं। नुकसान हुई संपत्तियों का मूल्यांकन वर्तमान बाजार दर पर तय किया जाएगा।

तय किए गए नियमों के तहत, दंगों के दौरान अगर किसी के घर, दुकान, ऑफिस सहित विभिन्न छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी संपत्तियों का मूल्यांकन किया जाएगा। इन संपत्तियों में मेटल्स से लेकर टाइल्स तक के नुकसान की भरपाई की जाएगी। यह अधिकार क्लेम ट्रिब्यूनल को दे दिए गए हैं। सरकार ने खरगोन दंगों के बाद यह निर्णय लिया है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, पीड़ित पक्ष के हुए नुकसान की जानकारी के लिए एक ट्रिब्यूनल उनके आवेदन जमा कर रहा है। मध्य प्रदेश लोक एवं निजी संपत्ति नुकसान निवारण एवं वसूली नियम 2022 में इस अधिकार को स्पष्ट कर दिया गया है। इसमें आवेदन के आधार पर कई ट्रिब्यूनल बनाए जा सकते हैं। हर ट्रिब्यूनल में कई सदस्य होंगे।

ट्रिब्यूनल के फैसले के बाद अगर नुकसान पहुँचाने वाला संपत्ति की भरपाई नहीं करता है तो इसकी जवाबदेही जिला अधिकारी (DM) को तय की गई है। हर्जाने की राशि समय पर दिलवाना उसकी जिम्मेवारी होगी। वहीं, सरकारी संपत्ति की के मामले में राजपत्रित अधिकार नुकसान का मूल्यांकन करेगा। ट्रिब्यून के फैसले को 90 दिन के अंदर हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।

इस नियम के तहत व्यवस्था की गई है कि कोई भी दावेदार चाहे तो ट्रिब्यूनल में अपना दावा खुद पेश कर सकता है अथवा इसके लिए कोई वकील रख सकता है। अगर किसी दावेदार का दावा खारिज किया जाता है तो यह क्लेम कमिश्नर को बताना पड़ेगा कि उसने दावा किस आधार पर खारिज किया है। वहीं, मामले की सुनवाई सार्वजनिक की जाएगी, लेकिन अगर दोनों पक्ष चाहेंगे को यह बंद कमरे में भी होगी।

बंगाल हिंसा के 1 साल बाद भी ‘TMC गुंडे’ देते हैं ‘खेला होबे’ की धमकी: पीड़ित डर से जंगल में रहने को मजबूर

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव 2021 के (Post Poll Violence West Bengal) नतीजे घोषित होने के बाद से बड़े पैमाने पर राजनीतिक हिंसा हुई। पिछले साल 2 मई को चुनाव के नतीजे घोषित होते ही टीएमसी के गुंडों ने राज्य के अलग-अलग इलाके में हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़ की। यही नहीं टीएमसी के कार्यकर्ताओं ने बीजेपी और उनके समर्थकों पर हमले किए और उनकी हत्याएँ कीं। इसके डर से कई लोग अपनी जान बचाने के लिए प्रदेश छोड़कर चले गए, जो इस हिंसा के एक साल बाद भी अपने घरों को नहीं लौट पाए। तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) के गुंडों पर जीत का नशा इस कदर छाया हुआ था कि उनमें लेशमात्र भी कानून का खौफ नहीं दिखा। उन्होंंने सबसे अधिक भाजपा समर्थकों और कार्यकर्ताओं को अपना निशाना बनाया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, विधानसभा चुनावों में टीएमसी (TMC) की जीत के बाद हुई हिंसा में लगभग एक दर्जन से अधिक भाजपा कार्यकर्ताओं ने अपनी जान गँवाई थी।

ऑपइंडिया ने एक साल बाद हिंसा में मारे गए लोगों के परिवार वालों से यह जानने के लिए संपर्क किया कि अब वे किन परिस्थितियों में हैं और राज्य में हिंसा के बाद कोई बदलाव आया है या नहीं। पीड़ितों ने हमसे अपने कड़वे अनुभव साझा किए हैं। उनका दावा है कि पश्चिम बंगाल में चुनाव बाद हुई हिंसा राजनीति से प्रेरित थी। लोगों और उनके परिवारों की आप बीती सुनकर यह साफ हो गया है कि इन लोगों ने पश्चिम बंगाल में कितनी पीड़ा झेली है और वर्तमान में भी वह जिल्लत भरी जिंदगी जीने को मजबूर हैं। आज हम आपको कुछ ऐसे ही पीड़ितों बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्होंने हमसे अपनी पीड़ा व्यक्त की है।

जॉय प्रकाश यादव की पत्नी संगीता यादव

ऑपइंडिया की टीम जॉय प्रकाश यादव की पत्नी संगीता यादव से मिली, जिनकी 6 जून, 2021 को टीएमसी के गुडों ने एक क्रूड बम से हत्या कर दी थी। परिवार ने इसके लिए राज्य की सत्ताधारी पार्टी TMC को जिम्मेदार ठहराया है। 28 वर्षीय जॉय प्रकाश यादव भाजपा समर्थक थे। उनकी पत्नी संगीता ने हमसे बताया, “घटना के वक्त मैं घर पर नहीं थी, क्योंकि चुनाव के बाद जारी राजनीतिक हिंसा से वह (पति) काफी डर गए थे, जिसके चलते उन्होंने मुझे और बच्चों को मेरे मायके में छोड़ दिया था।” उन्होंने बताया कि बंगाल में भाजपा कार्यकर्ताओं के खिलाफ हो रही हिंसा को लेकर हम कई दिनों तक डरे सहमे हुए थे।

जॉय प्रकाश यादव 

संगीता के अनुसार, उन्होंने (टीएमसी के गुड़ों) उसके पति के चेहरे पर बम फेंका। जिसकी वजह से उनके पति की मौके पर ही मौत हो गई थी। उस वक्त उनका बेटा भी वही मौजूद था। इस हमले में उनकी सास को भी चोटें आई थीं।

संगीता यादव अपनी बेटी के साथ।

संगीता ने यह भी कहा कि उन्हें अभी भी जान से मारने की धमकी मिलती है। कहा जाता है- “तुम इस केस को छोड़ दो, नहीं तो तुम्हारे परिवार वालों को मार दिया जाएगा।” मुख्य आरोपित चंदन सिंह और लल्लन सिंह को अभी तक गिरफ्तार नहीं किया गया है। उन्होंने कहा, “हमें उम्मीद है कि यह मामला केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) को सौंपे जाने के बाद हमें न्याय मिलेगा।”

कुश खेत्रपाल के भाई श्रीकांत खेत्रपाल

श्रीकांत खेत्रपाल कुश खेत्रपाल के भाई हैं। पश्चिम बंगाल में टीएमसी के गुंडों ने कुश खेत्रपाल को भी मार डाला था। कुश 5 मई 2021 को लापता हो गया था, जिसके कुछ दिनों बाद उसका शव मिला था। श्रीकांत ने बताया कि कैसे उनके 26 वर्षीय भाई कुश खेत्रपाल को बीजेपी से जुड़े होने की वजह से टीएमसी के गुंडों ने उनकी हत्या कर दी थी।

श्रीकांत खेत्रपाल

श्रीकांत ने कहा, “कुश एक होटल में काम करता था। कानन खेत्रपाल, सुकुमार खेत्रपाल और दिलीप खेत्रपा, जो टीएमसी के लोग थे, वे उससे अक्सर संपर्क करते थे। उन्होंने कई बार मेरे भाई को टीएमसी के लिए काम करने को कहा था। उन्होंने कुश को टीएमसी में शामिल नहीं होने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी भी दी थी। चुनाव में टीएमसी की जीत के बाद 6 मई को उनके भाई को वे लोग जबरन अपने साथ ले गए थे। कुश का शव दो दिन बाद यानी 8 मई 2021 को शाम 5 बजे बैष्टम तालाब के पास मिला था। शरीर पर चोट के निशान भी थे और उसके सिर को धारदार ​हथियार से चीरा हुआ था।”

अभिजीत सरकार के भाई बिस्वजीत सरकार

ऑपइंडिया ने अभिजीत सरकार के भाई बिस्वजीत सरकार का इंटरव्यू लिया, जिनकी 2 मई, 2021 को टीएमसी के सैकड़ों गुंडों ने मिलकर हत्या कर दी थी। भाजपा कार्यकर्ता अभिजीत सरकार ने 2 मई को फेसबुक लाइव के माध्यम से TMC के गुंडों की हरकतों के बारे में बताया था। उसके कुछ ही देर बाद ही उनकी हत्या कर दी गई थी।

अभिजीत सरकार का एनजीओ।

बिस्वजीत ने बताया, “2 मई की सुबह टीएमसी कार्यकर्ता हमारे कार्यालय पहुँचे। उन्होंने हमारे कार्यालय, एनजीओ और मंदिर को चारों तरफ से घेर लिया और उस पर बम फेंकना शुरू कर दिया। उन्होंने मंदिर का मुख्य द्वार भी तोड़ दिया और दान पेटी भी लूट ली। इसके अलावा उन्होंने आसपास के सभी सीसीटीवी कैमरों को तोड़ दिया और जैसे ही हम भागने के लिए दौड़े, उन्होंने मुझे और मेरी माँ को घसीटा।” उन्होंने आगे कहा कि उनमें से कुछ गुंडे उन्हें और उनकी माँ को मार रहे थे। कुछ उनके भाई को पीट रहे थे, तभी एक गुंडे ने बड़े पत्थर सा लेकर उनके भाई का सिर कुचल दिया, जिससे उनकी आँखों के सामने ही अभिजीत की मृत्यु हो गई।

बिस्वजीत सरकार

बिस्वजीत ने यह भी बताया, “वे लोग अभी भी मुझे जान से मारने की धमकी दे रहे हैं। जब भी मैं अपने भाई की हत्या के बारे में बोलता हूँ, वे मेरी माँ को यह कहते हुए धमकाते हैं कि मेरे साथ भी ‘खेला होबे’ होगा। वे ​कहते हैं कि हम किसी से नहीं डरते।” बिस्वजीत ने गुस्से से कहा, “ममता बनर्जी ने मेरे भाई को मार डाला। सब कुछ उसके कहने पर हो रहा था।”

चंदना हलदर के पति गौतम हलदर

गौतम हलदर चंदना हलदर के पति हैं, जिन्हें पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले में 2 जुलाई को टीएमसी के गुंडों ने पीट-पीट कर मार डाला था। ऑपइंडिया से बात करते हुए गौतम ने कहा कि वह और उनकी पत्नी के भाई भाजपा कार्यकर्ता थे। गौतम ने बताया कि 2 जुलाई को, जब उनके चचेरे भाई स्वरूप हलदर घर वापस आ रहे थे, टीएमसी के गुंडों ने उन पर हमला किया और उन्हें तब तक पीटा जब तक कि वह बेहोश नहीं हो गए।

उन्होंने बताया, “अपने चचेरे भाई की पिटाई की खबर मिलते ही मैं और मेरी पत्नी उसे देखने के लिए अस्पताल पहुँचे, लेकिन जैसे ही हम वहाँ पहुँचे गुंडों ने वापस आकर हम पर हमला कर दिया। उन लोगों ने हमें बेरहमी से पीटा। मैं और मेरी पत्नी भागने लगे तो गुंडों ने हमारा पीछा किया और रास्ते में उन्हें जो सामान मिलता उसे फेंककर हमें मारा। हमें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। गुंडों के जाने के बाद मैं अपनी घायल पत्नी को पास के अस्पताल में ले गया जहाँ उसे मृत घोषित कर दिया गया।”

रामप्रसाद बरई के बेटे रंजीत बरई

70 साल से ज्यादा उम्र के रामप्रसाद बरई की जनवरी 2021 में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। रामप्रसाद के चार बेटों में से एक रंजीत बरई ने हमें बताया कि वे पश्चिम बंगाल के कूचबिहार जिले के दिनहाटा सब डिवीजन के निवासी हैं। रंजीत ने कहा, “हमारे बीमार पिता को पुलिस 13 दिसंबर, 2020 की रात गैरकानूनी तरीके से अपने साथ ले गई थी। उन पर कोई मामला भी दर्ज नहीं था। पुलिस ने हमें उनसे मिलने तक नहीं दिया। हमें कई दिनों तक यह भी पता नहीं चला कि वह किस हालत में हैं।” उन्होंने बताया कि पुलिस 12 जनवरी, 2021 को उन्हें (रामप्रसाद) को जबरदस्ती अस्पताल ले गई और अगले दिन यानी 13 जनवरी को फोन करके हमें बताया कि रामप्रसाद की मृत्यु हो गई है। उसका शव लेने के लिए आ जाओ। रंजीत ने गुस्से में कहा, “हमें तो यह भी नहीं पता कि उनके साथ क्या हुआ था। मेरे पिता शिव भक्त थे। उन्होंने कहा कि कूचबिहार जिले की हालत बहुत खराब है।

रामप्रसाद बरई

रंजीत ने आरोप लगाया कि उनके पिता की मौत के पीछे सीताई विधानसभा के विधायक जगदीश चंद्र बर्मा का हाथ है। उन्होंने कहा, “विधायक ने हमें पुलिस के पास नहीं जाने की धमकी दी थी। पुलिस और विधायक एक दूसरे से मिले हुए थे। हमें अभी भी उनसे जान से मारने की धमकी मिलती है।”

रामप्रसाद बरई के चार पुत्र।

रंजीत ने भयभीत होते हुए कहा कि वह टीएमसी के गुंडों और पुलिस के डर से जंगल में सोते हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि ये लोग उनकी भी हत्या कर देंगे।

रामचंद्र बरई की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में टीएमसी के गुंडों द्वारा राजनीतिक हिंसा कोई नई बात नहीं है। टीएमसी के गुंडों ने न केवल 2021 के विधानसभा चुनाव के परिणाम के बाद, बल्कि 2019 के आम चुनाव से पहले और उसके दौरान भी भाजपा कार्यकर्ताओं और नेताओं पर हमला किया था। टीएमसी के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल में पेट्रोल बम फेंकना, लोगों पर हमला करना और यहाँ तक कि हत्याएँ करना भी आम बात हो गई है। चुनाव के बाद की हिंसा के एक साल बाद भी कई भाजपा कार्यकर्ता और उनके परिवार वाले अपने घरों में सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं।

कहीं लगाया कर्फ्यू, तो कहीं जागरण-DJ बैन: ईद से पहले कई राज्यों में पुलिस अलर्ट, सोशल मीडिया पर भी होगी कड़ी नजर

रामनवमी (Ram Navami) और हनुमान जयंती (Hanuman Jayanti) पर उपद्रव के बाद त्योहारों को लेकर सरकारें सजग हो गईं हैं। इसी क्रम 2 और 3 मई को लेकर उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सहित कई सरकारों ने एतिहायाती कदम उठाए हैं। रामनवमी की हिंसा को देखते हुए मध्य प्रदेश के इंदौर शहर के खरगोन में कर्फ्यू लगा दिया गया है। वहीं, यूपी के मेरठ में जागरण पर रोक लगा दी गई है। इसके अलावा राजधानी लखनऊ में सुरक्षा व्यवस्था को बढ़ा दिया गया है।

दरअसल, मुस्लिमों का रमजान समाप्ति की ओर है और ईद-उल-फितर (Eid) का त्योहार आने वाला है। चाँद दिखने के आधार पर ईद 2 मई या 3 मई को मनाया जाएगा। वहीं, हिंदुओं का पवित्र त्योहार अक्षय तृतीया 3 मई को है। ऐसे में एक ही दिन पड़ने वाले त्योहारों को लेकर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। उत्तर प्रदेश, झारखंड, जम्मू-कश्मीर और मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों ने प्रतिबंधों का ऐलान किया है।

यूपी में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम

कोरोना महामारी में प्रतिबंध के बाद दो साल बाद ईद मनाई जाएगी। ऐसे में ईद की नमाज को लेकर राजधानी लखनऊ में सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद किया गया है। पिछले शुक्रवार को संपन्न हुई अलविदा की नमाज के दौरान भी पुलिस सतर्क रही।

वहीं, मेरठ में हिंदू संगठनों को जागरण करने अनुमति नहीं दी गई है। ईद की पूर्व संध्या पर मुस्लिम बहुल इलाके हाशिमपुरा में जागरण आयोजित करने की योजना बना रहे संगठनों को एसपी सिटी ने अनुमति नहीं दी है।

बता दें कि उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने 30 अप्रैल को राज्य में लाउडस्पीकरों को लेकर अभियान खत्म किया है। धार्मिक स्थलों से लगभग 54,000 लाउड स्पीकर हटा दिए गए हैं. उत्तर प्रदेश में जिला प्रशासन ने भी 60,295 लाउडस्पीकरों की आवाज़ कम कर दी है।

मध्य प्रदेश के खरगोन में कर्फ्यू

मध्य प्रदेश के खरगोन में 2 और 3 मई को भी कर्फ्यू लगा रहेगा। इस कारण ईद की नमाज भी घर में पढ़ी जाएगी। खरगोन के अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट सुमेर सिंह मुजालदा ने कहा कि अक्षय तृतीया और परशुराम जयंती पर जिले में किसी भी कार्यक्रम के आयोजन की अनुमति नहीं दी जाएगी। बता दें कि 10 अप्रैल को रामनवमी की शोभायात्रा पर हमले और दंगों के बाद से खरगोन में कर्फ्यू लगा हुआ है।

पुणे में डीजे नहीं

ईद को देखते हुए महाराष्ट्र के पुणे में डीजे और संगीत नहीं बजाने के फैसला मस्जिद कमेटियों ने ली है। पुणे में पाँच मस्जिदों के अधिकारियों और अन्य मुस्लिम समुदाय के सदस्यों ने ईद समारोह के दौरान डीजे पर संगीत को बंद रखने का फैसला लिया है।

झारखंड में भी सतर्कता

झारखंड के विभिन्न जिलों में ईद को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था की स्थिति की समीक्षा की गई। बोकारो में जिलाधिकारी और एसपी ने सभी बीडीओ और सीओ के साथ मीटिंग की और हर जगह पीस कमिटी गठित करने के लिए कहा है।

वहीं, जमशेदपुर में पुलिस ने असामाजिक तत्वों को चेतावनी जारी की है। पुलिस ने कहा कि इस दौरान अगर किसी ने अफवाह फैलाने वाली या आपत्तिजनक पोस्ट किए तो उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।