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उज्जैन की मस्जिद के नीचे शिव मंदिर और गणेश प्रतिमा? संत ने कहा – राजा भोज की थी राजधानी, प्रशासन एक्शन ले वरना कोर्ट जाएँगे

मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित बिना नींव वाली मस्जिद को लेकर बड़ा दावा किया गया है। महामंडलेश्वर अतुलेशानंद जी महाराजने कहा है कि उज्जैन की मस्जिद के नीचे भगवान शिव का मंदिर और गणेश की प्रतिमाएँ हैं। महामंडलेश्वर अतुलेशानंद जी महाराज ‘अखंड हिन्दू सेना’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। उन्होंने कहा कि मस्जिद के नीच अति प्राचीन हिन्दू प्रतिमाएँ हैं। उन्होंने पुलिस-प्रशासन के अधिकारियों से इस पर कार्यवाही करने की माँग की है।

उनका कहना है कि मस्जिद में सर्वे, फोटोग्राफी और वीडियोग्राफ़ी कराई जाए, ताकि सब कुछ साफ़ हो जाए। उन्होंने चेताया कि अगर पुलिस-प्रशासन हरकत में नहीं आता है तो वो अदालत का दरवाजा खटखटाएँगे। ‘आवाहन अखाड़े’ के महामंडलेश्वर ने कहा कि उन्होंने खुद 2007 में मस्जिद के भीतर जाकर ये चीजें देखी थीं। उन्होंने बताया कि परमार कालीन राजा रोज के चित्र के अलावा शिव और गणेश की प्रतिमाएँ अंदर हैं।

उन्होंने कहा कि सर्वे, फोटोग्राफी और वीडियोग्राफ़ी होने तक उन चीजों से कोई भी छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए। साथ ही उन्होंने मस्जिद के अंदर हाथी, घोड़े और पत्थरों पर विशाल पहरेदार सैनिकों की मूर्तियाँ होने का भी दावा किया। संत ने कहा कि ग्वालियर से इस मस्जिद से जुड़े दस्तावेज मँगवाए जाएँगे, जिसके बाद सब साफ़ हो जाएगा। उन्होंने हिन्दुओं की संपत्ति हिन्दुओं को ही सौंपने की माँग की। उन्होंने इतिहास बताया कि क्षिप्रा नदी के किनारे स्थित उज्जैन राजा भोज की राजधानी रही है, जहाँ 1600 ईस्वी में मुगलों ने तोड़फोड़ मचा कर कब्ज़ा किया था।

वाराणसी के काशी विश्वनाथ परिसर में स्थित ज्ञानवापी मस्जिद में सर्वे-वीडियोग्राफ़ी के लिए अदालत ने एडवोकेट कमिश्नर की नियुक्ति की है और ये प्रक्रिया चालू भी है। शुरू में मुस्लिमों ने जाम लगा कर कार्य को रोक दिया था। इसी तर्ज पर मथुरा के शाही ईदगाह मस्जिद में भी सर्वे-वीडियोग्राफ़ी की माँग की गई है। उधर दिल्ली में क़ुतुब मीनार का नाम ‘विष्णु स्तंभ’ रखने की माँग की गई है। आगरा में ताजमहल के 22 बंद कमरों को खोलने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका गई है, क्योंकि वहाँ हिन्दू प्रतीक चिह्न और साहित्य होने के दावे हैं।

दिल्ली में बदले जाएँगे तुग़लक, अकबर, हुमायूँ और औरंगजेब रोड समेत 6 सड़कों के नाम, बीजेपी ने NDMC को लिखा पत्र

दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष आदेश गुप्ता ने मंगलवार (10 मई 2022) को नई दिल्ली नगर पालिका परिषद (NDMC) को पत्र लिखकर लुटियंस दिल्ली में अकबर रोड, हुमायूँ रोड जैसे मुगल शासकों के नाम वाली 6 सड़कों का नाम बदलने की माँग की। आदेश गुप्ता ने ट्वीट कर इसकी जानकारी भी दी है। उन्होंने लिखा, “आज नई दिल्ली नगर निगम के चेयरमैन को पत्र लिखकर मुगल काल से गुलामी के प्रतीक मार्गों के नाम जल्द से जल्द बदलने की माँग की है।”

इसमें तुगलक रोड का नाम गुरु गोविन्द सिंह मार्ग, अकबर रोड का नाम महाराणा प्रताप रोड, औरंगजेब रोड़ का अब्दुल कलाम लेन, हुमायूँ रोड का महर्षि वाल्मीकि रोड और शाहजहाँ रोड का नाम जनरल बिपिन सिंह रावत रोड पर रखने की माँग की है।

आदेश गुप्ता ने अपने पत्र में सभी सड़कों के नाम के इतिहास के बारे में बात की। उन्होंने लिखा कि हिंदुओं के गौरव, मेवाड़ की आन, बान, शान, जिन्होंने जमकर व डटकर मुगलों का मुकाबला किया। ऐसे वीर योद्धा महाराणा प्रताप की 482वीं जयंती के उपलक्ष्य में ये सुझाव है कि अकबर रोड का नाम बदलकर महाराणा प्रताप मार्ग किया जाए। नई दिल्ली स्थित तुगलक रोड, जो मुगल काल की गुलामी का प्रतीक है, उसका नाम बदलकर श्री गुरु गोविंद सिंह मार्ग के नाम पर किया जाए।

उन्होंने कहा कि औरंगजेब लेन का नाम बदलकर भारत के पूर्व राष्ट्रपति एवं महान वैज्ञानिक मिसाइल मैन के नाम से प्रसिद्ध रहे डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम लेन किया जाए। बाबर लेन का नाम बदलकर देश के लिए मात्र 18 साल की उम्र में फाँसी पर चढ़ने वाले युवा क्रांतिकारी खुदीराम बोस के नाम पर किया जाए।

इसी प्रकार हुमायूँ रोड का नाम बदलकर महाकाव्य रामायण रचयिता प्रसिद्ध महर्षि वाल्मीकि रोड के नाम पर किया जाए। वहीं, शाहजहाँ रोड का नाम बदलकर भारत के प्रथम चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ रहे जनरल बिपिन रावत के नाम पर किया जाए।

‘बंगाल हिंसा में 4 लाख विस्थापित, विदेश से लाकर बसाए जा रहे रोहिंग्या’: MP लॉकेट चटर्जी ने बताया – BJP में शामिल होने पर फिल्म इंडस्ट्री ने किया बॉयकॉट

पश्चिम बंगाल के हुगली से भाजपा की सांसद लॉकेट चटर्जी राज्य में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के गुंडों द्वारा की जाने वाली हिंसा को लेकर मुखर रहती हैं। 2019 में सांसद बनने से पहले वो बंगाली सिनेमा में भी सक्रिय थीं। उन्होंने कई नृत्य शैलियों में भी दक्षता हासिल है। फ़िलहाल बंगाल भाजपा के महासचिव के पद पर सेवा दे रहीं लॉकेट चटर्जी राज्य में पार्टी की महिला प्रकोष्ठ की कमान भी सँभाल चुकी हैं। ऑपइंडिया से बात करते हुए उन्होंने राज्य के ताज़ा हालात और वहाँ चुनाव बाद हुई हिंसा को लेकर अपनी राय रखी।

सवाल: पश्चिम बंगाल में 2021 में हुए विधानसभा चुनाव से पहले हिंसा की कई खबरें आती थीं और भाजपा कार्यकर्ताओं की लाशें मिलती थीं। लेकिन, क्या पार्टी को इसका अंदाज़ा था कि चुनाव परिणाम सामने आने के बाद भी इसी तरह हिंसा का दौर कायम रहेगा?

जवाब: चुनाव में जीत-हार तो होते ही रहते हैं। ऐसा नहीं है कि हम लोग 3 सीटों से शून्य पर आ गए। हमारी सीटें 3 से 77 पर पहुँच गईं। ये हमारे लिए एक बड़ी उपलब्धि थी और हम एक बड़ी पार्टी बन कर राज्य में उभरे। इसके बाद पूरा परिदृश्य ऐसे दिखाया गया जैसे TMC की एकतरफा जीत हुई है। चुनाव के बाद जो हिंसा हुई राज्य भर में, उसके कारण 4 लाख लोगों को विस्थापित होना पड़ा। असम और ओडिशा से लेकर दिल्ली तक लोगों को भागना पड़ा। वो डर से वापस नहीं लौट रहे हैं, क्योंकि उन पर इतने मामले दर्ज कर दिए गए हैं कि लौटने पर उन्हें जेल में डाल दिया जाएगा। आखिर उनके भी परिवार है, बाल-बच्चे हैं। पढ़ाई-लिखाई करना है उनके बच्चों को, लेकिन वो परीक्षाएँ तक नहीं दे सकते हैं। महिलाओं को अपने बर्तन-रुपए, जो भी पास में थे सब लेकर बच्चों के साथ भागना पड़ा। कुछ महिलाएँ तो ऐसी थीं, जो गर्भवती थीं। ऐसी स्थिति में उन्हें बाहर जाना पड़ा। हमारे कैम्प में उन्हें रखा गया। महीनों बाद इनमें से कुछ महिलाएँ घर वापस आईं। एक महिला मुख्यमंत्री के शासनकाल में महिलाओं की इस तरह की दुर्दशा दुर्भाग्यपूर्ण है।

सवाल: बीरभूम के रामपुरहाट में 8 लोगों को ज़िंदा जला कर मार डाला गया। वामपंथियों के शासनकाल में भी इस तरह की घटनाएँ हो चुकी हैं। तब भी भिक्षुओं को ज़िंदा जला दिया गया था। आप CPM और TMC के शासनकाल में क्या अंतर देखती हैं?
जवाब: ममता बनर्जी की सरकार हिंसा के मामले में कम्युनिस्टों से कई गुना आगे निकल गई हैं। दोनों समान ही हैं। CPM ने तीन दशक से भी अधिक समय तक शासन किया, उसके बाद एक दशक ममता बनर्जी के भी पूरे हो चुके हैं। अभी जो CPM के समय में होता था, उससे 3-4 गुना अत्याचार हो रहा है। उस जमाने में जो भी लोग सत्ता में हुआ करते थे, वही लोग अब TMC में शामिल हो गए हैं। हिंसा करने वाले वही लोग हैं।

सवाल: आजकल डेमोग्राफी चेन्ज की बात हो रही है। उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में ऐसी घटनाएँ सामने आई हैं, जहाँ अवैध घुसपैठियों को जानबूझ कर बसाए जाने के आरोप लगे हैं। इसी तरह पश्चिम बंगाल में भी मुर्शिदाबाद जैसे इलाकों में हिन्दू घृणा बढ़ने की खबरें आती हैं। इसके पीछे आपको क्या कारण लगता है?
जवाब: हमने तो देखा है कि छोटे-छोटे पॉकेट में वो लोग रहते थे, लेकिन अब उन्हें उठा कर हर जगह स्थापित किया जा रहा है। म्यांमार से लेकर बांग्लादेश तक से लाकर उन्हें बसाया जा रहा है। रोहिंग्या मुस्लिमों को आधार कार्ड तक दे दिए गए हैं। उन्हें सिर्फ वोटर आईडी कार्ड से जैसे सरकारी दस्तावेज ही नहीं, बल्कि घर भी दिए जा रहे हैं। सीमा पार करा-करा कर ऐसे लोगों को लाया जा रहा है। कारण है – वोट बैंक की राजनीति। हिन्दुओं पर वो भरोसा नहीं सकते हैं, इसीलिए वो तुष्टिकरण की राजनीति करते हैं। उनका भरोसा मुस्लिम वोटरों पर है, इसीलिए बाहर से लेकर उन्हें बसाया जाता है। ऐसे लोग यहाँ अपराध कर-कर के वापस बांग्लादेश भाग जाते हैं। ये सब गौ-तस्करी और बालू-तस्करी में लिप्त हैं। नेपाल, बांग्लादेश और भूटान तक ये फैले हुए हैं। वहीं, हिन्दुओं पर अत्याचार हो रहे हैं। रामनवमी पर भी हिन्दुओं पर हमला हुआ। बाँकुड़ा में ऐसी ही घटना हुई।

सवाल: हावड़ा में हिन्दुओं के जुलूस पर हमला कर दिया गया। इसी तरह बाँकुड़ा में हिन्दुओं की सिर्फ इतनी गलती थी कि वो मस्जिद के सामने से निकल रहे थे। इस पर 17-18 हिन्दुओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इसमें आप पुलिस-प्रशासन को कहाँ खड़ी देखती हैं?
जवाब: जब मस्जिद के सामने से मुहर्रम का जुलूस निकलता है, तब क्या मुस्लिमों को गिरफ्तार करने की हिम्मत होगी इनकी? इनकी हिम्मत ही नहीं होगी। पश्चिम बंगाल में तुष्टिकरण का ऐसा चक्र चल रहा है कि मुस्लिमों को सारी सुविधाएँ मिल रही हैं, अपराध करने पर गिरफ़्तारी तो दूर की बात है।

सवाल: पश्चिम बंगाल उपचुनाव से पहले ख़बरें फैलाई जा रही थीं कि लॉकेट चटर्जी और भाजपा में अनबन चल रही है। आपको चुनाव प्रचार करने वालों की सूची में नहीं डाला गया, ऐसा भी कहा जा रहा था। इस पर आप चीजें स्पष्ट कर दीजिए।
जवाब
: ये सभी चीजें फेक हैं। ये लोग जानते हैं कि भाजपा एक परिवार है और सबसे बड़ा परिवार हमलोगों का है। मुझे जो काम दिया गया है, वो मैं कर रही हूँ। मैं इस परिवार की एक सदस्य हूँ। भवानीपुर उपचुनाव में जब ममता बनर्जी लड़ी थी और बाबुल सुप्रियो भाजपा छोड़ कर गए थे, तब भी ऐसी बातें की गई थीं। हमारे यहाँ पार्टी जो काम देती है, वो करना पड़ता है। मैंने 6 महीने उत्तराखंड में काम किया, क्योंकि मुझे वहाँ की जिम्मेदारी दी गई थी। हमें ऐसी ही शिक्षा दी गई है। ये TMC की रणनीति है कि वोट लेने के लिए वो लोग ऐसा बोलते हैं। हमलोग अपने मिशन की तरफ चलते हैं और कौन क्या बोलता है, इसे हम नज़रअंदाज़ ही करते हैं।

सवाल: आपके राजनीतिक करियर के अलावा फिल्मों में भी आपका अच्छा करियर रहा है। दक्षिण की फ़िल्में आजकल हजारों करोड़ रुपए कमा रही हैं। ‘RRR’ में राष्ट्रवाद दिखाया गया था। इसी तरह पश्चिम बंगाल का भी अपना स्थानीय सिनेमा है। वहाँ जो हिंसा हुई है, उस पर वहाँ की मनोरंजन इंडस्ट्री से किसी ने कोई आवाज़ नहीं उठाई, अगर हम भाजपा में आए मिथुन चक्रवर्ती और यश दासगुप्ता को छोड़ दें तो। ऐसा क्यों?
जवाब: पश्चिम बंगाल की फिल्म इंडस्ट्री पूरी तरह तृणमूल कॉन्ग्रेस के नियंत्रण में है। मैं भी इसका हिस्सा हुआ करती थी। मेरा करियर जब पीक पर था, तब मैंने राजनीति में एंट्री ली थी। तब मुझे इसका बिलकुल भी अंदाज़ा नहीं था कि मेरा काम चला जाएगा। मेरा भी एक परिवार है, सबको परिवार की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है। उस समय सबने सब कुछ जीरो कर दिया। जो भाजपा में शामिल हो गया, उसे पेट से मारने की कोशिश होती है, ताकि वो पार्टी छोड़ दे। 4-5 वर्षों तक मेरा बॉयकॉट कर दिया गया। अभी भी मुझे काम नहीं मिलता। खैर, मेरे पास अब समय ही नहीं है। एकदम ममता बनर्जी की सरकार का कंट्रोल है वहाँ। कोई सरकार की तारीफ करेगा, तो उसे काम मिलेगा। विरोधियों को हटा दिया जाता है। इसीलिए, बंगाली फिल्म इंडस्ट्री आगे नहीं बढ़ रही है। जब लोकतांत्रिक अधिकार ही नहीं रहेंगे, तक कैसे अच्छी फ़िल्में बनेंगी? बंगाल में हिंसा हो रही है और ये दिखाएँगे कि ऐसा कुछ नहीं है, फिर उस फिल्म को कौन देखेगा?

सवाल: उत्तर प्रदेश में किसी एक जिले में छोटी सी भी घटना हो जाए तो मीडिया में खूब हो-हल्ला मचाया जाता है। भाजपा शासित राज्यों में राहुल गाँधी पहुँच जाते हैं। जबकि पश्चिम बंगाल में इतनी हिंसा होने के बावजूद राष्ट्रीय मीडिया में उस स्तर की कवरेज देखने को नहीं मिलती। ऐसा क्यों?
जवाब: हमलोग हमेशा पश्चिम बंगाल में हिंसा के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाते रहते हैं। संसद में भी हमने आवाज़ उठाया है। वहाँ भी TMC के सांसद हमारी आवाज़ दबाने की कोशिश करते हैं। वहाँ से राष्ट्रीय मीडिया में चीजें आती हैं। लेकिन, और भी आनी चाहिए। पश्चिम बंगाल में एक के बाद एक घटनाएँ हो रही हैं, लेकिन इसे छिपाने और दबाने के लिए लगातार काम किया जाता रहा है। यही कारण है कि राष्ट्रीय मीडिया में ये चीजें नहीं आती हैं।

सवाल: जब आप अपने क्षेत्र की जनता से मिलती हैं तो वो क्या कहते हैं?
जवाब: जनता बदलाव चाहती है, लेकिन डर के कारण आम लोग सार्वजनिक रूप से ये बात नहीं कह पाते। भाजपा के कार्यकर्ता भी डरे हुए हैं, क्योंकि उन्हें झूठे केस में फँसा दिया जाता है। उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है। यहाँ तक कि भाजपा समर्थकों के लिए केंद्रीय योजनाओं (जैसे, प्रधानमंत्री आवास योजना) का लाभ भी रोक दिया जाता है और TMC वालों को सारे फायदे दे दिए जाते हैं। उन्हें कई-कई योजनाओं का लाभ एक साथ मिल जाता है। लोगों का अपना परिवार हैं, उन्हें उनकी भी देखभाल करनी है। लेकिन, 2024 में वो दिखाएँगे कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बंगाल को आगे बढ़ना है।

सवाल: पश्चिम बंगाल के हिंसा पीड़ितों और विस्थापितों के लिए भाजपा एक संगठन के रूप में क्या-क्या कर रही है?
जवाब: हम उनके लिए काफी कुछ कर रहे हैं। जिनके घरों को तोड़फोड़ डाला गया, उन्हें पार्टी की तरफ से मदद दी जा रही है। काफी सारे ऐसे लोग हैं, जिन्हें असम में वहाँ की भाजपा सरकार और कार्यकर्ताओं ने शरण दी। उनकी कानूनी लड़ाई में भी हम मदद कर रहे हैं।

सवाल: कम्युनिस्टों में भी कई ऐसे हैं, जिन्हें TMC ने अपनी हिंसा का निशाना बनाया। कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता भी पीड़ित हैं। लेकिन, प्रकाश करात या राहुल गाँधी जैसे बड़े नेता अपनी ही पार्टी के पीड़ित कार्यकर्ताओं के लिए आवाज़ नहीं उठा रहे। इसके पीछे आप क्या कारण देखती हैं?
जवाब: कॉन्ग्रेस और CPM वाले TMC के साथ एक प्लेटफॉर्म पर हैं। पश्चिम बंगाल में भी ये सब के सब एक साथ हैं। इनकी एक ही मंशा है – मोदी को हटाओ। जो लोग अच्छे कार्य करते हैं और आगे बढ़ते हैं, सब उनके पीछे पड़ जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। कॉन्ग्रेस के काफी सरे घोटाले हुए थे, उन्हें सामने लाने के लिए नरेंद्र मोदी ही लड़े थे। उन्होंने नोटबंदी किया, जिससे कालाधन पर लगाम लगा। इन्हीं फैसलों के कारण उनके पीछे ये नेता पड़े हुए हैं। पीएम मोदी देश को आगे ले जा रहे हैं।

हिंदू परंपराओं का मजाक उड़ाने वाले बॉलीवुड कलाकार पैसों के लिए कुछ भी कर सकते हैं, फैन्स की जान और सेहत से उनका कुछ लेना देना नहीं

बॉलीवुड में काम करने वाले सेलेब्रिटीज एक फिल्म के लिए करोड़ों रुपए फीस वसूलते हैं। यही नहीं फिल्मों के अलावा ये कलाकार विज्ञापनों से भी मोटा पैसा कमाते हैं। पैसा कमाने और एक दूसरे से अमीर बनने की होड़ में ये बॉलीवुड कलाकार हानिकारक उत्पादों के विज्ञापन करने से भी बाज नहीं आ रहे हैं।

बीते दिनों अजय देवगन, शाहरुख खान और अक्षय कुमार के गुटखा, पान मसाले वाले विज्ञापन पर उनके फैंन्स ने आपत्ति जताई थी। इसके बावजूद ऐसे उत्पादों के विज्ञापनों पर रोक नहीं लगाई जा रही है, जो हमारी युवा पीढ़ी के लिए ना केवल हानिकारक है, बल्कि इससे उनकी जान को खतरा भी है। इसी बीच हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाली, उनकी परंपराओं का मजाक उड़ाने वाली आलिया भट्ट (Alia Bhatt) का शुगर ड्रिंक्स वाला एक विज्ञापन काफी सुर्खियाँ बटोर रहा है। यह विज्ञापन फ्रूटी का है, जिसके लिए उन्हें सोशल मीडिया पर काफी खरी खोटी भी सुनाई गई है।

सार्वजनिक तौर पर कॉमेडियन कपिल शर्मा के शो में शुगर को सेहत के लिए हानिकारक बताने वाली आलिया ने यह विज्ञापन करके साबित कर दिया है कि वह पैसों के लिए कुछ भी कर सकती हैं। हालाँकि, यह उनके लिए कोई नई बात नहीं है। इससे पहले भी वह पैसों के लिए अपनी शादी में हिंदुओं की परंपराओं का मजाक उड़ा चुकी हैं, ताकि सोशल मीडिया पर अपनी फोटो, वीडियो शेयर कर वह करोड़ों रुपए कमा सकें।

5 सालों से रिलेशन में रहने वाले आलिया भट्ट और रणबीर कपूर (Alia Bhatt & Ranbir Kapoor Wedding) ने पिछले महीने हिंदू-पंजाबी रीति रिवाज से शादी रचाई। इसके बाद उन्होंने कपूर हाउस में जमकर पार्टी की। दूल्हा-दुल्हन ने केक काटकर और बाहों में बाहें डालकर वाइन भी पी। सालों तक अपने रिश्ते को छिपाकर रखने वाले और पैसों को ही अपना सब कुछ समझने वाले कपल की फोटो एकाएक सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगती है, क्योंकि उन्होंने अपने हर एक कार्यक्रम जैसे हल्दी, संगीत और शादी की फोटो, वीडियो इंस्टाग्राम और ट्विटर पर शेयर कर दी होती है। इसे उन्होंने छिपाकर नहीं रखा अपने रिश्ते की तरह, क्योंकि इसमें उनका करोड़ों रुपए का नुकसान हो रहा था। आप इसी से अंदाजा लगा सकते हैं कि रिश्त्तों से बढ़कर इनके लिए पैसा है।

वहीं, दूसरी ओर दक्षिण भारतीय कलाकार पैसों से ज्यादा अपने फैंस और उनकी भावनाओं को महत्व देते हैं और उनसे दिल से जुड़े होते हैं। उनके लिए करोड़ों रुपए से ज्यादा उनके फैंस महत्व रखते हैं। पिछले दिनों कई दक्षिण भारतीय कलाकारों ने तंबाकू, पान मसाला के विज्ञापनों को करने से इनकार कर दिया, जबकि फिल्मों से ज्यादा वह विज्ञापनों से करोड़ों की कमाई करते हैं। उन्हें 3 घंटे की एक फिल्म के लिए उतना पैसा नहीं मिलता है, जितना कुछ सेकंड के विज्ञापन के लिए मिलता है।

14 अप्रैल को सिनेमाघरों में रिलीज हुई ‘केजीएफ चैप्टर-2’ के अभिनेता यश ने हाल ही में करोड़ों रुपए के विज्ञापन को अपने फैंस के लिए ठुकरा दिया था। करोड़ों रुपए का ऑफर मिलने के बाद भी यश ने पान मसाला और इलायची ब्रांड वाला विज्ञापन करने से मना कर दिया था। यश के लिए एंडोर्समेंट डील्स संभालने वाली एजेंसी Exceed Entertainment ने इस खबर की पुष्टि करते हुए कहा था, “इन चीजों के इस्तेमाल से लोगों की जिंदगी खतरे में पड़ सकती है। यश ने यह फैसला बहुत सोच समझकर लिया है। उन्होंने अपने फॉलोअर्स, फैंस और अन्य चीजों को ध्यान में रखते हुए पान मसाला और इलायची ब्रांड के लिए करोड़ों रुपए के एंडोर्समेंट सौदे से इनकार किया है।”

उनसे पहले सुपरहिट फिल्म ‘पुष्पा’ के ​अभिनेता अल्लू अर्जुन ने एक तंबाकू ब्रांड का टीवी प्रचार करने से इनकार कर दिया था, जबकि इसके लिए उन्हें तंबाकू कंपनी ने भारी-भरकम फीस ऑफर की थी, लेकिन एक्टर ने कहा कि इससे लोगों में गलत संदेश जाएगा। दक्षिण भारतीय अभिनेताओं के साथ-साथ वहाँ की अभिनेत्री साई पल्लवी ने भी साल 2019 में एक फेयरनेस कंपनी के विज्ञापन को यह कहकर ठुकरा दिया था कि वो भारतीय हैं और उनका रंग सही है। उस विज्ञापन के लिए साई पल्लवी को 2 करोड़ रुपए ऑफर किए गए थे। इसके उलट हम कई वर्षों तक टीवी पर फेयर एंड लवली की एड में बॉलीवुड अभिनेत्री यामी गौतम को देखते आ रहे है।

बहरहाल, इसे उनके (दक्षिण भारतीय कलाकार) अच्छे संस्कार कहें, तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। दक्षिण भारत में फैन्स अपने हीरो को इसीलिए इतना ऊँचा दर्जा देते हैं, क्योंकि उनके हीरो की छवि सिर्फ एक किरदार में नहीं बंधी हुई नहीं होती, जो 3 घंटे की फिल्म में दिखाई देती है। वो असल जिंदगी में भी अपने सामाजिक कार्यों की बदौलत समाज के बीच एक नायक की तरह ही रहते हैं।

यही कारण है कि उनके फैंस उन्हें भगवान की तरह पूजते हैं, उन पर दूध चढ़ाते हैं और उन्हें माला पहनाते हैं। यह फैंस का कलाकारों के प्रति स्नेह और सम्मान ही होता है, जिसे बॉलीवुड वाले चाहकर भी नहीं प्राप्त कर पाते हैं, क्योंकि उनके लिए तो ‘ना बाप बड़ा ना भैया सबसे बड़ा रुपैया’ ही मायने रखता है। उनका स्वार्थ और पैसों के प्रति उनकी भूख ही उन्हें फैंस की नजरों में गिरा देती है। इस सोच को बदलना होगा कि पैसा ही सब कुछ होता है, क्योंकि यह हमारे देश के युवाओं और संस्कृति के लिए बेहद घातक साबित हो सकती है।

शादी समारोह में रोटी पर थूकने का वीडियो वायरल, आरोपित फिरोज को मेरठ पुलिस ने किया गिरफ्तार, रासुका लगाने की माँग

मेरठ के अतरौली गाँव में सोमवार (9 मई, 2022) को एक विवाह समारोह में थूककर नान रोटी बनाने का मामला सामने आया है। पुलिस ने फिलहाल आरोपित फिरोज को गिरफ्तार कर लिया है। वहीं कहा जा रहा है कि शिकायत के आधार पर पुलिस ने गिरफ़्तारी के बाद उससे पूछताछ भी की है।

बता दें कि मेरठ और आसपास के जिलों में इससे पहले भी कई बार शादी समारोहों में रोटी या नान पर थूक लगाने के मामले सामने आ चुके हैं। वहीं पुलिस ने इस मामले में भी त्वरित एक्शन लिया है। खरखौदा पुलिस के अनुसार, मामला मेरठ के अतरौली गाँव निवासी नरेश कुमार की बेटी की शादी थी। शादी में उन्होंने नान रोटी बनाने का काम हापुड़ के फिरोज पुत्र वाजिद को दे रखा था। जिसका थूककर रोटी बनाने का वीडियो वायरल हुआ है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, रोटी बनाते हुए थूकते हुए फिरोज का वीडियो वायरल हुआ था। वीडियो के आधार पर नरेश कुमार ने पुलिस को सूचना देकर आरोपित फिरोज के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था। जिस पर पुलिस ने कार्रवाई करते हुए उसे गिरफ्तार कर लिया है।

वहीं थाना प्रभारी जितेंद्र कुमार दुबे ने मामले में जानकारी देते हुए बताया कि मुकदमा दर्ज कर लिया गया है। आगे मामले में जाँच कर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी। इस बीच रोटी पर थूक के मामले में भाजपा कार्यकर्ताओं ने आरोपित पर रासुका के तहत कार्रवाई की माँग की है।

पंजाब में आतंक के लिए Pak ने बनाया ‘लश्कर-ए-खालसा’, शुरू हो गई है ट्रेनिंग: मोहाली बम ब्लास्ट का ‘पिज्जा कनेक्शन’ भी आया सामने

पंजाब के मोहाली में इंटेलिजेंस हेडक्वार्टर पर सोमवार (9 मई 2022) को हुए हमले को लेकर नई-नई जानकारी सामने आ रही है। बताया जा रहा है कि मामले में पहले क्लू के रूप में संदिग्ध मारुति स्विफ्ट में सवार दो लोगों पर शक है। वहीं पंजाब को दहलाने के लिए नए नाम से आतंकी गुट बनाने की भी खबर है।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब इंटेलिजेंस का एक कर्मचारी पिज्जा डिलीवरी को रिसीव करने के लिए दफ्तर से बाहर आया हुआ था। इस दौरान उसने दफ्तर के बाहर एक सफ़ेद रंग की मारुति स्विफ्ट को खड़े हुए देखा, जो कि संदिग्ध नजर आ रही थी। जैसे ही इंटेलिजेंस कर्मचारी अपना पिज्जा का ऑर्डर लेकर अंदर जाने लगा, संदिग्धों ने कार से इंटेलिजेंस बिल्डिंग की तरफ एक ग्रेनेड दाग दिया और मौके से फरार हो गए। अब इस जानकारी के मिलने के बाद इलाके के सभी सीसीटीवी को खँगाला जा रहा है, ताकि संदिग्धों की पहचान की जा सके। 

वहीं खबर आ रही है कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI ने पंजाब में आतंकवादी घटनाओं के लिए एक नए नाम से आतंकी गुट बनाया है। जानकारी के मुताबिक इस आतंकी गुट का नाम है – ‘लश्कर-ए-खालसा’। इस आतंकी गुट में शामिल दहशतगर्तों को अफगानिस्तान के लड़ाकू ट्रेनिंग दे रहे हैं। मीडिया रिपोट्स के अनुसार लश्कर-ए-खालसा में शामिल करने के लिए पंजाब और हरियाणा के स्थानीय गैंगस्टर और बदमाशों से संपर्क साधा जा रहा है। इसके लिए ड्रग्स के धंधे को भी जरिया बनाया जा रहा है। बता दें कि इन दोनों राज्यों में ड्रग्स का धंधा बड़े पैमाने पर होता है। यह धंधा लाखों-करोड़ों में हो रहा है। जिसपर लगाम की तमाम कोशिशें अभी तक नाकाम साबित हुई है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार लश्कर-ए-खालसा के जरिए जम्मू-कश्मीर सहित अन्य क्षेत्रों में हमले की साजिश रची जा रही है। बता दें कि लश्कर-ए-खालसा ग्रुप को ट्रेनिंग देने वाले अफगानी लड़ाकू के पास अत्याधुनिक हथियारों को चलाने का अनुभव है। पहले अफगानी लड़ाकू को आरपीजी जैसे आधुनिक हथियार के साथ देखा गया है। जिसके बाद सुरक्षाबल अलर्ट पर है।

उल्लेखनीय है कि मोहाली में पुलिस इंटेलिजेंस हेडक्वार्टर की बिल्डिंग के पास धमाका हुआ है। जिसके बाद से पूरे पंजाब को अलर्ट किया गया है। इस धमाके में अब जो बात सामने आ रही है उसके अनुसार कार से दो संदिग्ध आए और उन्होंने करीब 80 मीटर दूर से रॉकेट ग्रेनेड को दागा था। आधिकारिक तौर पर अभी तक इस हमले को आतंकी हमला नहीं बताया गया है। लेकिन पुलिस इंटेलिजेंस हेडक्वार्टर जैसे अतिसुरक्षित स्थल पर गैनेड हमला होना अपने आप में बड़ी बात होती है।

88 में से 87 मामलों में सपा सांसद आज़म खान को मिली जमानत, नए केस पर 19 मई को सुनवाई: अखिलेश यादव से चल रही तनातनी

समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) के नेता और सांसद आजम खान (Azam Khan) को इलाहाबाद हाई कोर्ट (Allahabad High court) ने मंगलवार (10 मई, 2022) को बड़ी राहत देते हुए उन्हें जमानत दे दी। सपा नेता को उनके खिलाफ चल रहे कुल 88 मामलों में से 87 केस में जमानत मिल गई है। सपा नेता की जमानत पर फैसला इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस राहुल चतुर्वेदी की सिंगल बेंच ने सुनाया। हालाँकि, एक अन्य मामले में उनकी जमानत नहीं हो सकी है।

मंगलवार को उन्हें राजस्व रिकॉर्ड में वक्फ की संपत्तियों को अपने स्वामित्व वाले विश्वविद्यालय के तौर पर दिखाने के मामले में कोर्ट ने जमानत दे दी। इस मामले में उनके खिलाफ साल 2019 में लखनऊ की पत्रकार अल्लामा जमीर नकवी ने केस दर्ज कराया था। बाद में इसे रामपुर स्थानांतरित कर कर दिया गया। वो पिछले दो साल से सीतापुर जेल में बंद हैं। उल्लेखनीय है कि हाल ही में बीजेपी के नेता आकाश सक्सेना ने उनके खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई थी।

उन पर ये आरोप था कि आजम खान ने रामपुर पब्लिक स्कूल की बिल्डिंग के फर्जी सर्टिफिकेट बनवाकर मान्यता हासिल की थी। ये इकलौता केस है, जिस पर अभी तक कोर्ट ने सुनवाई नहीं की है। ऐसे में आजम खान का बहर आना भी मुश्किल है।

उल्लेखनीय है कि आजम खान पर चल रहे नए केस में 19 मई, 2022 को रामपुर कोर्ट में सुनवाई प्रस्तावित है। हालाँकि, जमानत मिलेगी या वो जेल ही हवा खाएँगें ये वक्त ही बताएगा। लेकिन अखिलेश और आजम खान के बीच की दूरियाँ जरूर जाहिर हो रही हैं। उनके मीडिया सलाहकार फसाहत अली का आरोप है कि अखिलेश यादव खुद ही नहीं चाहते कि आजम खान जेल से बाहर न आने पाएँ।

वो (आजम खान) फरवरी 2020 से जेल में बंद हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट में उनकी जमानत याचिका करीब 5 महीने से लंबित थी, जिसको लेकर पिछले दिनों सर्वोच्च अदालत ने नाराजगी जाहिर की थी।

शिकायत करने आई लड़की पर भड़के CM बघेल, आम लोगों को भी लगे डाँटने: वीडियो वायरल हुआ तो बोले – मुझे इसका दुःख

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री के ‘भेंट मुलाकात’ कार्यक्रम का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इस कार्यक्रम के दौरान एक युवती को कड़े शब्दों में टोकने और नेतागिरी नहीं करने की सलाह देने पर सोशल मीडिया पर आलोचना हो रही है। 

वीडियो में मुख्यमंत्री भीड़ में से एक लड़की की तरफ इशारा करते हुए कह रहे हैं, इस लड़की को दे दो। इसके बाद युवती नमस्कार बोलकर पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अपनी शिकायत बोलना शुरू करती है। इसी समय एक पुलिस अधिकारी मुख्यमंत्री के कान में कुछ कहते हैं। इसके बाद युवती जैसे ही बोलना शुरू करती है, मुख्यमंत्री से टोक कर उसका नाम पूछते हैं। सवाल-जवाब के इसी दौर में भीड़ शोर मचाती है और वह नाराज होकर कहने लगते हैं- ये क्या तमाशा है? क्या हो गया?…इसके बाद वह युवती को डाँटते हुए कहते हैं कि वह नेतागिरी न करे।

इस वीडियो के वायरल होने के बाद राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह ने वीडियो के इस हिस्से को ट्वीट कर इस व्यवहार की आलोचना की है। उन्होंने लिखा, “यह भेंट मुलाकात है या बदतमीजी और डाँट है! एक महिला की शिकायत का निराकरण करने की बजाय उससे इस तरह अभद्रता से बात करना कहाँ तक जायज़ है? भूपेश बघेल जी जिस जनता पर आप झल्ला रहे हैं, चिल्ला रहे हैं, उसी ने आपको मुख्यमंत्री बनाया है, भूलिए मत। याद रखना! यह अहंकार जल्द टूटेगा।”

नेटिजन्स ने भी इस वीडियो पर आपत्ति जताई और सवाल उठाए। मुकेश पाठक ने लिखा, “यदि भारतीय जनता पार्टी के किसी नेता ने इस तरह का अपमानजनक व्यवहार किया होता तो लोग आसमान सर पर उठा लेते।”

राजेश गौर ने लिखा, “वोट लेने के वक्त जनता भगवान और मुख्यमंत्री बनने के बाद ये भगवान।”

शिवाजी सिंह नाम के यूजर ने लिखा, “तख्तेताऊत पर बैठे मुगलिया सल्तनत के सुल्तान एक फरियादी औरत को इंसाफ देते हुए। इतनी अकड़ औरंगज़ेब में भी नही रही होगी।”

विरेंद्र सिंह राणा ने लिखा, “ये जनता से लगाव का झूठा दिखावा करते है और सबके सामने जनता को फटकारते है।”

छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी के प्रभारी और दिल्ली के विधायक संजीव झा ने भी इस व्यवहार की आलोचना की है। संजीव झा ने अपने ट्वीट में लिखा, “एक मुख्यमंत्री और जनता के जनप्रतिनिधि का एक शिकायतकर्ता के प्रति यह भाषा बहुत अशोभनीय है। सामाजिक जीवन में यह भाषा कहीं भी उचित नहीं है। याद रखिए भूपेश बघेल जी इसी जनता ने आप को वोट देकर मुख्यमंत्री बनाया और यही जनता आपको अर्श से फर्श तक लाने में तनिक भी देर नही करेगी।”

चौतरफा आलोचना होने पर सीएम भूपेश बघेल ने भी इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा, “वह महिला अपनी बात कर रही थी, वो दुःखी थी अपनी पीड़ा बता रही थी। मुझे उस वक्त डाँटना नहीं चाहिए था, मुझे इस बात का दुख है। BJP इस तरह की वीडियो प्रचार कर निम्न स्तर की राजनीति कर रही है।”

उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल इन दिनों 90 विधानसभा के दौरे पर है और वे जनता से सीधे रूबरू हो रहे हैं। जनता की समस्या सुन रहे हैं और अधिकारियों को निराकरण के आदेश दे रहे हैं। इसके साथ ही मुख्यमंत्री भूपेश बघेल छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा चलाए जा रही योजनाओं के बारे में लोगों को बता रहे हैं और उसका लाभ जनता तक पहुँच रहा है कि नहीं इसका जायजा भी ले रहे हैं।

कोरोना के दौरान जलती चिताओं की तस्वीरें क्लिक करने वाले दानिश सिद्दीकी को फिर मिला पुलित्जर प्राइज, तालिबान की गोलीबारी में गँवाई थी जान

अफगानिस्तान में मारे गए दिवंगत फोटो पत्रकार दानिश सिद्दीकी समेत चार भारतीयों को फीचर फोटोग्राफी श्रेणी में प्रतिष्ठित पुलित्जर पुरस्कार 2022 से सम्मानित किया गया है। रॉयटर्स समाचार एजेंसी के फोटो पत्रकार दानिश सिद्दीकी को उनके सहयोगियों अदनान आबिदी, सना इरशाद मट्टू और अमित दवे के साथ भारत में कोरोना के कारण हुई मौतों की तस्वीरें खींचने के लिए सम्मानित किया गया है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के सबसे प्रतिष्ठित पुरष्कारों में से एक पुलित्जर पुरस्कार 2022 के विजेताओं की घोषणा सोमवार (9 मई, 2022) को देर शाम की गई। न्यायाधीशों ने दानिश सिद्दीकी के काम को ब्रेकिंग फोटोग्राफी कैटेगरी से हटा दिया था। समिति ने लिखा कि उनका काम लोगों में गहरा सेंस पैदा करता है। हालाँकि, दानिश सिद्दीकी को यह पुरस्कार दूसरी बार मिला है। इससे पहले 2018 में रोहिंग्या पर फोटोग्राफी के लिए उन्हें पुलित्जर पुरस्कार से नवाजा गया था।

बता दें कि 38 वर्षीय दानिश सिद्दीकी की पिछले साल जुलाई में कंधार शहर के स्पिन बोल्डक जिले में अफगान सैनिकों और तालिबान के बीच हुई झड़पों को कवर करने के दौरान बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। इससे पहले भी दानिश सिद्दीकी ने पुलित्जर पुरस्कार जीता है। रोहिंग्या संकट के कवरेज के लिए रॉयटर्स टीम के हिस्से के रूप में उन्हें 2018 में इस प्रतिष्ठित पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इन तस्वीरों में सिद्दीकी ने म्यामांर के रोहिंग्या शरणार्थियों की समस्या को दिखाया था।

गौरतलब है कि दानिश सिद्दीकी ने दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया से अर्थशास्त्र में स्नातक किया था। इसके बाद उन्होंने जामिया के ही एजेके मास कम्यूनिकेशन रिसर्च सेंटर से 2007 से डिग्री ली थी। हालाँकि, उन्होंने अपना करियर टेलीविजन न्यूज के संवाददाता के रूप में शुरू किया था, बाद में वह फोटो पत्रकारिता की ओर मुड़ गए और 2010 में उन्होंने इंटर्न के रूप में रॉयटर्स ज्वाइन किया था।

बता दें कि इस बार का पुलित्ज़र पुरष्कार जहाँ भारत में कोरोना के दौरान हुई मौतों और जलती चिताओं को दिखाने के कारण रॉयटर्स के फोटो पत्रकार दानिश सिद्दीकी और उनकी टीम को मिला है। वहीं यदि मौतों की बात करें तो अमेरिका में कोरोना से भारतकी तुलना में कहीं ज़्यादा मौतें हुई हैं। लेकिन अमेरिका में वहाँ के पत्रकारों को दूसरी श्रेणी में पुलित्ज़र पुरष्कारों से नवाजा गया है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, वाशिंगटन पोस्ट ने सार्वजनिक सेवा पत्रकारिता में पुलित्जर पुरस्कार जीता है, जिसने यूएस कैपिटल में 6 जनवरी 2021 के विद्रोह को कवर किया था। वहीं मियामी हेराल्ड को सर्फसाइड कोंडो के ढहने पर ब्रेकिंग न्यूज रिपोर्टिंग के लिए पुलित्जर अवार्ड से सम्मानित किया गया, जबकि न्यूयार्क टाइम्स ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्टिंग दोनों में ही पुरस्कार जीता है।

रिपोर्ट के अनुसार, न्यूयार्क टाइम्स ने सीरिया, इराक और अफगानिस्तान में अमेरिकी हवाई हमलों से नागरिकों की मौत की रिपोर्टिंग के लिए अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्टिंग श्रेणी में पुलित्ज़र पुरष्कार हासिल किया है।

बता दें कि पुलित्जर पुरस्कार पत्रकारिता के क्षेत्र का अमेरिका का सर्वोच्च पुरस्कार है, जिसकी शुरुआत 1917 में हुई थी। जोसेफ पुलित्‍जर ने अपनी वसीयत में इस पुरस्‍कार को शुरू करने की बात कही थी। जानकारी के लिए बता दें कि पुलित्‍जर पुरस्‍कार को 21 कैटेगरी में दिया जाता है। जिसमें पत्रकारिता, रिपोर्टिंग, फोटोग्राफी सहित कई अन्य विधाएँ भी शामिल होती हैं।

इसमें 15 पत्रकारिता श्रेणियाँ और सात कला श्रेणियाँ हैं। इसके साथ ही पुलित्जर पुरस्कार जीतने वाले को 15,000 अमेरिकी डालर दिए जाते हैं।‌ वहीं पुलित्जर की पब्लिक सर्विस कैटेगरी के विजेता को गोल्‍ड मेडल से नवाजा जाता है।

2015 के बाद महिला शिक्षा का सुधरा स्तर, मुस्लिम महिलाएँ अब भी बच्चा करने में आगे : NFHS की रिपोर्ट ने बताया- 32% शादीशुदा औरतों पर होता है अत्याचार

समाज में महिलाओं की स्थिति और उनके विकास का आँकलन हमेशा से तरह-तरह के सर्वेक्षणों से होता आया है। सरकार अपनी ओर से तमाम योजनाएँ लागू करके स्थिति सुधारने के प्रयास करती है, मगर उनसे जमीनी बदलाव कितना आता है ये जब आँकड़े दिखते हैं तभी पता चलता है। जाहिर है ये निष्कर्ष सटीक नहीं होते। मगर इनके तुलनात्मक अध्य्यन से ये अंदाजा जरूर लग जाता है कि हमारा समाज और हमारे समाज की महिलाएँ किस गति से आगे बढ़ने या पिछड़ने की कगार पर हैं। 

हाल में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS 5) द्वारा जारी रिपोर्ट ने भी एक ऐसी तस्वीर दिखाई है। रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे महिलाओं की लिटरेसी रेट, फर्टिलिटी रेट में तो पिछले कुछ सालों में बदलाव आया है, मगर आज भी उनके खिलाफ होने वाली हिंसा थमी नहीं है। घर-परिवार में उसका शोषण जारी है और सबसे ज्यादा महिलाओं का शोषण करने वाला कोई बाहर का नहीं, बल्कि अपना पति है।

आइए इन सभी बिंदुओं पर चर्चा करें और रिपोर्ट में दिए आँकड़ों से समझें समाज में महिलाओं की हालत…

सबसे पहले बात शिक्षा पर। एक तरह से देखा जाए तो समाज हित में महिला शिक्षा को बढ़ावा देने का काम हमेशा से होता आया। मगर इसे लेकर जागरूकता उतनी सक्रियता से नहीं फैलाई गई जितनी जरूरत थी। इसकी महत्वता से जन-जन को अवगत कराने के लिए साल 2015 में मोदी सरकार ने बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना, एक अभियान की तरह चलाई और नतीजा क्या रहा ये एनएफएचएस के आँकड़ों में नजर आता है। 

NFHS की इस हालिया रिपोर्ट के अनुसार, साल 2015-16 के बाद पुरुषों के साथ-साथ 15-49 उम्र वाली उन महिलाओं की संख्या में औचक वृद्धि हुई जिन्होंने अपनी स्कूल की शिक्षा पूरी की और उस शिक्षा क्षेत्र में अपने दर को ऊपर बढ़ाया। इन वर्षों में स्कूल न जाने वाली महिलाएँ 5 फीसद घटीं जबकि विद्यालय न जाने वाले पुरुषों की गिनती केवल 2 फीसद घट पाई। इतना ही नहीं 12 साल तक स्कूली शिक्षा लेने वाली महिलाएँ भी इस अंतराल में 4 फीसद बढ़ीं और पुरुषों में 3 फीसद सुधार आया। 

इसी तरह शहरी और ग्रामीण महिलाओं की शिक्षा को अगर देखें तो अब भी वहाँ 27 फीसद महिलाएँ ऐसी बची हैं जिन्होंने कभी स्कूल का चेहरा नहीं देखा जबकि शहर में ये संख्या 13 फीसद की है। आँकड़े बताते हैं कि गाँव की भी 20 फीसद महिलाएँ अब ऐसी हो चुकी है जो 12वीं तक शिक्षा पूरी कर रही हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं के शिक्षा दर में सुधार होने का परिणाम रोजगार स्तर पर भी देखने को मिलता है। साल 2015-16 के बाद महिलाओं में रोजगार करने का आँकड़ा 24 फीसद बढ़ा जो 2019-21 की रिपोर्ट के मुताबिक भी 25 फीसद तक है।

कुल भारत की बात करें तो महिलाओं की शिक्षा का दर 71.5 फीसद है। 26.9% ऐसी महिलाएँ हैं जिन्होंने 12 साल शिक्षा को पूरे दिए। 15.2% ऐसी महिलाएँ हैं जो 10-11 साल पढ़ सकीं। 8-9 साल पढ़ने वाली महिलाएँ 17.8% हैं, 5-7 वर्ष पढ़ने वाली औरतों का प्रतिशत 13.4 है और स्कूल कभी न जाने वाली अब भी 22.6% महिलाएँ है।

फर्टिलिटी रेट (बच्चे को जन्म देने की दर)

बता दें कि जिस प्रकार देशहित के लिए महिलाओं की शिक्षा का ग्राफ लगातार ऊपर उठना महत्वपूर्ण है उसी प्रकार बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित करना भी समय की माँग है। सरकार कई प्रयास करके इसकी जरूरत जन-जन समझा रही है। ऐसे में महिलाओं का फर्टिलिटी रेट ये बताता है हम इस राह पर आगे बढ़ने को कितने प्रतिबद्ध है।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, महिलाओं का फर्टिलिटी रेट समय के साथ कम हुआ है। जो दर 1992-93 में 3.7 फीसद था वो अब 2019-21 में 2.1 रह गया है। ग्रामीण महिलाएँ भले ही अब भी शहरी महिलाओं के मुकाबले ज्यादा बच्चों को जन्म देती हैं मगर पहले के मुकाबले यहाँ भी फर्टिलिटी रेट घटा है। 1992-1993 में ये 2.7 फीसद था जो अब 1.6 रह गया है।

आपको बता दें कि NFHS की ये रिपोर्ट आने के बाद मीडिया में ये चर्चा और भी गर्म है कि कैसे कुछ सालों में मुस्लिम महिलाओं का फर्टिलिटी रेट घट गया है जबकि ओरिजनल रिपोर्ट देखें तो पता चलता है कि ये तुलना वर्गों को लेकर नहीं बल्कि मुस्लिम महिलाओं से जुड़े पहले के आँकड़ों पर है। वर्तमान के नंबर तो यही बताते हैं कि अब भी मुस्लिम महिलाएँ अन्य वर्ग की महिलाओं के मुकाबले सबसे ज्यादा बच्चों को जन्म देती हैं। लेकिन हाँ! उन्हें लेकर जो दर 2015-16 में 2.62 थी वो अब 2.36 रह गई है। रिपोर्ट के अनुसार अपेक्षित दर का आँकड़ा कोई भी समुदाय की महिलाएँ नहीं छू पाई हैं। हिंदुओं और ईसाइयों में ये दर 1.9 है, मुस्लिमों में 2.4, सिखों में 1.6, बौद्धों में 1.4, जैनों में 1.6 है और अन्य में फर्टिलिटी रेट 2.1 है।

मुस्लिम महिलाएँ (64%) अब भी सबसे कम हैं जो चाहती हैं कि वो दोबारा बच्चा न पैदा करें जबकि अधिकांश सिख (72%) और हिंदू महिलाएँ (71%) अधिक बच्चों के खिलाफ हैं। रिपोर्ट ये भी दिखाती है कि शिक्षा के बढ़ते ग्राफ के कारण फर्टिलिटी रेट में पहले से कम हुआ है। स्कूल न जाने वाली महिलाओं में जहाँ बच्चे को जन्म देने की दर 2.2 पाई गई है। वहीं 12 वर्ष शिक्षा पाने वाली महिलाएँ में ये दर 1.6 की है।

महिला विरोधी हिंसा

उल्लेखनीय है कि देश में महिलाओं को सशक्त बनाने के क्रम में उन्हें शिक्षित करने के पुरजोर प्रयास हो रहे हैं। उन्हें तकनीक से जोड़ने की अपार कोशिशें की जा रही हैं। उनके कौशल को बाहर लाने के लिए सरकारी योजनाएँ चल रही हैं। स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों से छुटकारा दिलाने के लिए अभियान चला चला कर जागरूकता फैलाई जा रही है लेकिन इन सबके बीच समाज की कड़वी सच्चाई ये है कि घरेलू स्तर पर महिलाएँ अब भी हाशिए पर हैं। उनके खिलाफ होने वाली हिंसा जारी है। सर्वे के अनुसार 18 से 49 साल की उम्र वाली शादीशुदा महिलाओं में 32 फीसदी फिजिकली, सेक्सुअली और इमोशनली पार्टनर की हिंसा का शिकार होती हैं। इसमें सबसे ज्यादा फिजिकल वायलेंस होता है। इस हिंसा में धक्का-मुक्की, सामान फेंकना, कलाई मरोड़ना, झापड़ मारना, किसी चीज से हमला करना, मुक्के मारना, खींचतान, गला दबाना, जलाने की कोशिश करना, चाकू-बंदूक जैसे जानलेवा हथियारों से हमला करना, बिन मर्जी के सेक्स करना, सेक्स के दौरान ऐसी गतिविधियाँ करवाना जो महिला की इच्छा के विरुद्ध हो, सेक्स के दौरान उसे बाँधना, मारना आदि शामिल है।

एनएफएचएस की रिपोर्ट बताती है कि फिजिकल वायलेंस का सबसे ज्यादा शिकार ग्रामीण महिलाएँ होती हैं वो भी उस श्रेणी की महिलाएँ जो शिक्षा से अछूती रहती हैं। सर्वे दर्शाता है कि महिलाओं पर हाथ अब भी ज्यादातर मामलों में पति द्वारा ही उठाया जाता है। बस शिक्षा के हिसाब से इनके आँकड़े ऊपर नीचे होते हैं। जैसे जिन्होंने स्कूल जाकर 12 साल शिक्षा ली है उनमें से 21% पुरुष ऐसी हिंसा करते हैं जबकि स्कूल नहीं गए 43% अपनी पत्नियों पर हाथ उठाते हैं। सर्वे ये भी बताता है 70% महिलाएँ हैं जिनके पति शराब पीते हैं और उन्हें शारीरिक या यौन हिंसा का शिकार होना पड़ता है जबकि 23 % वो महिलाएँ भी हैं जिनके पति नशा नहीं करते मगर फिर भी हिंसक हैं।