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भव्य राम मंदिर का 30% निर्माण कार्य पूरा, एक साथ 2 लाख भक्त कर सकेंगे दर्शन: 70 एकड़ में सांस्कृतिक उप-नगरी भी

अयोध्या में रामजन्मभूमि पर निर्माणाधीन मंदिर की निर्माण तेजी से हो रहा है। मंगलवार से शुरू हुए राम मंदिर निर्माण समिति की बैठक में मंदिर निर्माण की समीक्षा के साथ दर्शनार्थियों की अनुमानित वृद्धि और उनकी जरूरतों पर भी विचार-विमर्श किया गया।

आज राम मंदिर निर्माण समिति के चेयरमैन नृपेंद्र मिश्र के नेतृत्व में दूसरे दिन की बैठक सम्प्पन्न हुई और आखिरी दिन ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने मीडिया को बताया कि राम मंदिर का निर्माण कार्य लगभग 30% पूरा हो चुका है।

चंपत राय ने जानकारी देते हुए बताया कि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट दीर्घकालिक योजना पर काम कर रहा है। इसके तहत राम मंदिर परिसर में अगर 2 लाख श्रद्धालु भी एक साथ दर्शन के लिए पहुँचते हैं तो उनको किसी प्रकार की दिक्कत नहीं होगी।

इसके साथ ही परिसर में 50 हजार श्रद्धालुओं के सामान रखने की भी सुविधा दी जाएगी, ताकि श्रद्धालु अपने सामानों को वहाँ पर रखकर रामलला का दर्शन पूजन कर सकें।

इसके साथ ही मंदिर परिसर में इतनी बड़ी संख्या में दर्शनार्थियों के लिए प्रसाधन और उनके लिए विश्रामालय भी निर्मित किया जाएगा। उनके अनुसार बैठक में आपातकालीन परिस्थितियों में फायर ब्रिगेड की गाड़ियाँ आसानी से परिसर के विभिन्न हिस्सों में पहुँच सकें और आग पर काबू के लिए समुचित पानी का प्रबंध हो, इस विषय पर भी विचार किया गया।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, दो दिनों की समीक्षा बैठक में राम मंदिर के अलावा शेष 70 एकड़ के परिसर में सांस्कृतिक उप नगरी विकसित किए जाने की कार्ययोजना पर भी विचार किया गया।

बैठक में चंपतराय सहित राम मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्र, रामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंददेव गिरि, सदस्य एवं अयोध्या राज परिवार के मुखिया बिमलेंद्र मोहन मिश्र, महंत दिनेंद्रदास, कामेश्वर चौपाल सहित मंदिर के मुख्य शिल्पी सीके सोमपुरा के पुत्र एवं प्रतिनिधि आशीष सोमपुरा, कार्यदायी संस्था एलएंडटी एवं टाटा कंसल्टेंसी इंजीनियर्स के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

फारूक ने जगमोहन पर मढ़ा दोष तो महबूबा बोलीं- दर्द को हथियार बना रहा केंद्र: कश्मीरी पंडित नरसंहार की सच्चाई सामने आने से घबराए कश्मीरी नेता

वास्तविक घटना पर आधारित फिल्म द कश्मीर फाइल्स (The Kashmir Files) को अपार सफलता और मिल रही प्रतिक्रियाओं से कश्मीर में हिंदुओं के नरसंहार और पलायन पर चुप्पी साधने लोगों के बीच खलबली मच गई है। जहाँ बॉलीवुड गैंग खामोश और अचंभित है, वहीं कश्मीर के राजनेता परेशान हो उठे हैं। जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्लाह (Farooq Abdullah) और महबूबा मुफ्ती (Mahbooba Mufti) ने फिल्म को लेकर केंद्र की भाजपा सरकार पर निशाना साधा है।

कश्मीर फाइल्स को लेकर पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (PDP) की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने बुधवार (16 मार्च) को ट्वीट कर अपनी गलतियों के लिए शर्मिंदा होने के बजाय हिंदुओं की भावनाओं के साथ खेलने का आरोप लगा दिया। महबूबा ने लिखा, “भारत सरकार जिस तरह कश्मीर फाइल्स को आक्रामक रूप से बढ़ावा दे रही है और कश्मीरी पंडितों के दर्द को हथियार बना रही है, उससे उनकी मंशा साफ हो जाती है। पुराने घावों को भरने और दो समुदायों के बीच अनुकूल माहौल बनाने के बजाय जानबूझकर खाई पैदा कर रही है।”

वहीं, जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे फारूक अब्दुल्लाह ने कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार और पलायन के लिए तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन (Jagmohan) को ही जिम्मेदार ठहरा दिया। उन्होंने कहा कि जगमोहन आज इस दुनिया में नहीं हैं, अन्यथा वह हकीकत बताते। फारूक ने कहा कि हर फिल्म में अपनी-अपनी कहानी होती है और हर फिल्म सच्ची हो, यह जरूरी नहीं है।

उन्होंने कहा, “मैं आज इस पूरे प्रकरण की जाँच की माँग करता हूँ। पता चलना चाहिए कि कश्मीरी पंडितों का पलायन कैसे हुआ? उनकी हत्याएँ क्यों हुई? यह किसकी साजिश थी? इसके लिए एक निष्पक्ष जाँच जरुरी है।” फारूक ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जज से इसकी जाँच कराई जानी चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने जगमोहन की फाइल खोलने की भी माँग की। केंद्र सरकार को कश्मीरी पंडितों की कश्मीर में सम्मानजनक और सुरक्षित वापसी के लिए तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए।

बता दें कि 1989 में जब जम्मू-कश्मीर में इस्लामिक जेहाद और आतंकवाद अपने चरम पर पहुँच गया था, तब राज्य के मुख्यमंत्री अब्दुल्लाह ही थे। केंद्र में गृहमंत्री महबूबा के पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद थे। इसी दौरान महबूबा की छोटी बहन रुबिया सईद का अपहरण हुआ था।

CBI ने जामिया के प्रोफेसर मोहम्मद खालिद मोईन को दो सहयोगियों समेत गिरफ्तार किया, बड़ी साजिश में थे शामिल

CBI (केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो) ने बड़ी कार्रवाई करते हुए बुधवार (16 मार्च, 2022) को जामिया मिल्लिया इस्लामिया के प्रोफेसर मोहम्मद खालिद मोईन को गिरफ्तार कर लिया है। वो जामिया के सिविल इंजीनियरिंग विभाग में बतौर प्रोफेसर तैनात थे। उन्हें 1 लाख रुपए की घूसखोरी के मामले में गिरफ्तार किया गया। उनके साथ-साथ उनके दो सहयोगियों आबिद खान और प्रखर पवार को भी CBI गिरफ्तार के के ले गई।

ये दोनों राजधानी दिल्ली के ओखला स्थिति किसी प्राइवेट कंपनी से जुड़े हुए हैं। इस मामले में पहले ही केस दर्ज किया गया था। आरोप है कि प्रोफेसर मोहम्मद खालिद मोईन कई प्राइवेट बिल्डर्स, आर्किटेक्ट और दलालों के साथ मिल कर विभिन्न प्रकार की फर्जी गतिविधियों में लगा हुआ था। घूस लेकर विभिन्न कंस्ट्रक्शन परियोजनाओं को ‘स्ट्रक्चरल स्टेबिलिटी सर्टिफिकेट’ दिए जा रहे थे। CBI ने जाल बिछाया और प्रोफेसर को उनके सहयोगियों के साथ घूस लेते हुए रेंज हाथों धर दबोचा

आरोपितों के अन्य ठिकानों पर भी छापेमारी की जा रही है। आरोपितों को नई दिल्ली की अदालत में पेश किया जाएगा। बता दें कि इमारतों को बनाने से पहले उसके लिए प्रमाण पत्र लेना होता है और जाँच की जाती है कि वो कितना सुरक्षित होगा, लेकिन रिश्वत लेकर प्रमाण पत्र दे दिए जा रहे थे। प्रखर पवार एक प्राइवेट कंपनी में आर्किटेक्ट है, जबकि आबिद खान उसी कंपनी का कर्मचारी है। सीबीआई के प्रवक्ता आरसी जोशी ने गिरफ़्तारी की जानकारी दी।

अब उन तीनों को सीबीआई की विशेष अदालत में पेश किया जाएगा। ओखला के फेज-3 में स्थित उस कंपनी के साथ मिल कर ये लोग इमारतों को फर्जी प्रमाण पत्र दे रहे थे और बदले में शुल्क वसूलते थे। सरकारी संस्थाएँ ढाँचों पर सवाल खड़ा न करे, इसीलिए ये खेल किया जा रहा था। सीबीआई अब पता लगा रही है कि इन्होंने अब तक कितनी ऐसी इमारतों को इस तरीके से सर्टिफिकेट दिए हैं। गुरुग्राम के सेक्टर-109 में पिछले दिनों एक इमारत का फ्लोर गिर गया था। उस इमारत के लिए भी सर्टिफिकेट इसी प्रोफेसर ने जारी किया था। इसकी भी जाँच हो रही है।

‘स्क्रिप्ट पढ़ कर हैरान था, विवेक अग्निहोत्री ने बताया – ये तो जो हुआ उसका सिर्फ 35% है’: बोले The Kashmir Files वाले ‘फारूक बिट्टा’

बॉक्स ऑफिस पर सारे रिकॉर्ड तोड़ रही ‘द कश्मीर फाइल्स (The Kashmir Files)’ में आतंकियों का कमांडर फारूक मलिक डार उर्फ बिट्टा कराटे (Farooq Malik Dar alias Bitta Karate) का दमदार किरदार चिन्मय मंडेलकर ने निभाया है। मराठी फिल्मों के प्रसिद्ध अभिनेता मंडलेकर के अभिनय की खूब चर्चा हो रही है। मंडलेकर इस रोल को लेकर सिहर उठते हैं।

फिल्म में बिट्टा की भूमिका को लेकर मंडलेकर ने न्यूज18 से कहा, जब मैंने पहली बार स्क्रिप्ट पढ़ी तो मैं चौंक गया था। द कश्मीर फाइल्स को देखने के बाद लोग अब जो महसूस कर रहे हैं, वही मैंने स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद अनुभव किया। मैंने विवेक से पूछा, ‘क्या यह सब सच है? क्या वास्तव में ऐसा हुआ है?’ उन्होंने बहुत ही शांत स्वर में मुझसे कहा, ‘स्क्रिप्ट में जो कुछ भी लिखा गया है वह वास्तव में जो हुआ है उसका सिर्फ 35 प्रतिशत है’, क्योंकि वास्तव में जो हुआ है वह कहीं अधिक क्रूर है।”

फिल्म में खून से लथपथ चावल खिलाने की सीन को याद पर मंडलेकर ने कहा कि वे बेहद परेशान करने वाले दृश्य थे। उन्होंने कहा, “जब मैं स्क्रिप्ट पढ़ रहा था तो मैं एक खास तरह के भावनात्मक उथल-पुथल से गुजरा था। मैं बिल्कुल चौंक गया था। फिर इस घटना का मैंने वास्तविक संदर्भ पढ़ा तो पता चला कि उस आदमी को वास्तव में उसी तरह मारा गया था और उसका खून से लथपथ चावल उसकी पत्नी को खिलाया गया था। यह बहुत बेचैन करने वाला था।”

इस रोल के मिलने के बारे में मंडलेकर ने कहा कि द कश्मीर फाइल्स की निर्माता पल्लवी जोशी के साथ साल 2007 में उन्होंने एक टीवी शो में काम किया था। विवेक अग्निहोत्री को बिट्टा की भूमिका के लिए एक अभिनेता की तलाश थी। बहुत से उत्तर भारतीय अभिनेताओं का ऑडिशन लिया गया था, लेकिन कोई परफेक्ट मैच नहीं मिला। तब पल्लवी ने ही उनका नाम सुझाया था।

कौन है बिट्टा कराटे?

बिट्टा काराटे का असली नाम फारूक अहमद डार है और बिट्टा कराटे के नाम से कुख्यात है। 1990 में घाटी में कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार के वक्त दौरान उसने 20 हत्याओं की बता कबूल की थी। जम्मू-कश्मीर के पब्लिक सेफ्टी एक्‍ट के तहत उसे गिरफ्तार किया था और 16 साल जेल में रहने के बाद साल 2006 में जम्‍मू की टाडा कोर्ट से जमानत पर रिहा हो गया था। उसके खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिला था।

एक इंटरव्यू में बिट्टा कराटे ने स्‍वीकार किया था कि जब वह 20 साल का था, तब स्थानीय प्रशासन से परेशान होकर वह आतंकी बना था। आतंकवाद की ट्रेनिंग लेने के लिए वह पाकिस्‍तान (Pakistan) भी गया। उसने कहा था कि ऊपर (पाकिस्तान/ISIS या आतंकी कमांडर) से ऑर्डर मिलता था तो वह किसी तो मार देता था। जिन बीस लोगों की उसने हत्‍या की थी, उनमें आरएसएस के नेता सतीश कुमार टिक्‍कू भी शामिल थे।

जेल से छूटने के बाद बिट्टा जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) में शामिल हो गया। वह आज भी जम्मू-कश्मीर (Jammu-Kashmir) में ही है। पुलवामा हमले के बाद बिट्टा को आतंकवाद विरोधी कानूनों के तहत एक कार्रवाई में टेरर फंडिंग के आरोप में साल 2019 में एनआईए (NIA) ने गिरफ्तार किया था। 

‘पंडित तो 399 ही मरे, मुस्लिम 15,000 मारे गए’: केरल कॉन्ग्रेस के झूठ के बीच CM भूपेश बघेल सभी विधायकों के साथ आज रात देखेंगे ‘The Kashmir Files’

90 के दशक में कश्मीरी पंडितों के पलायन और नरसंहार जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बनी फिल्म द कश्मीर फाइल्स (The Kashmir Files) को देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ रही है। आम आदमी से लेकर राजनेता भी इसे देखने जा रहे हैं। एक तरफ बीजेपी इस फिल्म का समर्थन कर रही है तो वहीं कॉन्ग्रेस इसे चुनावी प्रमोशन बता रही है। 

इसी बीच कॉन्ग्रेस शासित प्रदेश छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल (CM Bhupesh Baghel) भी इस फिल्म को देखने के लिए जा रहे हैं। इतना ही नहीं उन्होंने अपने सभी विधायकों और मंत्रियों से मूवी को देखने की अपील की है। इसके लिए पूरा सिनेमा हॉल बुक कर दिया है।

दरअसल, सीएम भूपेश बघेल बुधवार (16 मार्च 2022) को रात 8 बजे राजधानी रायपुर के मैग्नेटो मॉल के पीवीआर में ‘द कश्मीर फाइल्स’ देखने सिनेमा हॉल जाएँगे। उन्होंने अपने साथ विधानसभा के सभी सम्मानित सदस्यों (पक्ष-विपक्ष सहित) को आमंत्रित किया है। बघेल ने ट्वीट करते हुुए लिखा, “आज विधानसभा के सभी सम्मानित सदस्यों (पक्ष-विपक्ष सहित) को एक साथ ‘कश्मीर फ़ाइल्स’ फिल्म देखने के लिए आमंत्रित किया है। आज रात 8 बजे राजधानी के एक सिनेमा हॉल में हम सभी विधायक/आमंत्रित नागरिक एक साथ फिल्म देखेंगे।”

एक और ट्वीट करते हुए उन्होंने लिखा, “भाजपा के विधायकगणों ने माँग की है कि ‘कश्मीर फ़ाइल्स’ को टैक्स फ़्री कर दिया जाए। मैं माननीय प्रधानमंत्री से अनुरोध करता हूँ कि वे इस फ़िल्म से केंद्रीय जीएसटी हटाने की घोषणा करें। पूरे देश में फ़िल्म टैक्स फ़्री हो जाएगी।”

इसको लेकर सियासत का बाजार गर्म है। कॉन्ग्रेस के कई नेता जिस तरह से फिल्म को लेकर तरह-तरह के बयान दे रहे हैं, उस हिसाब से छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का फिल्म को देखने जाना कई तरह के सवाल खड़े करता है।

केरल कॉन्ग्रेस ने किए कई विवादित ट्वीट

इसकी वजह है केरल कॉन्ग्रेस का फिल्म को लेकर ट्वीट करना। द कश्मीर फाइल्स की अपार सफलता के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी ने इस्लामी कट्टरपंथियों के बचाव में धड़ाधड़ ट्वीट करके ये साबित करने की कोशिश की कि 1990 में जो कुछ भी कश्मीर में हुआ उसके पीछे इस्लामी कट्टरपंथी नहीं बल्कि आरएसएस से जुड़े राज्यपाल जगमोहन और भाजपा जिम्मेदार थी। पार्टी ने ‘कश्मीर फाइल्स बनाम सच’ हैशटैग के साथ 9 ट्वीट किए और दावा किया कि जो वो बता रहे हैं वहीं कश्मीरी पंडितों के मामले के तथ्य हैं।

केरल कॉन्ग्रेस द्वारा किए गए ट्वीट में कश्मीरी पंडितों के नरसंहार को मुस्लिमों की हत्या से जोड़ा गया। पहले ट्वीट में कॉन्ग्रेस ने ये दिखाया है कि भले ही 1990 से 2007 के बीच आतंकियों ने 399 कश्मीरी पंडितों को मारा लेकिन इतने ही अंतराल में 15000 मुस्लिम भी आतंकियों द्वारा मारे गए।

अगले ट्वीट में कश्मीरी हिंदुओं के उस पलायन पर सफाई दी गई जिसमें लाखों कश्मीरी इसलिए घाटी से निकले थे क्योंकि रातों-रात मस्जिद से ऐलान हुए थे कि सभी कश्मीरी पंडित घाटी छोड़कर निकल जाएँ, वरना मारे जाएँगे। ऐसे दर्दनाक पलायन पर कॉन्ग्रेस ने सफाई दी कि वो सब तो आरएसएस से जुड़े तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन की वजह से हुआ था जबकि सच ये है कि जगमोहन को राज्यपाल की कुर्सी 19 जनवरी 1990 को मिली और वे 21 जनवरी 1990 को श्रीनगर पहुँचे थे। इस बीच घाटी में कट्टरपंथियों का आतंक शुरू हो गया था।

बैकफुट पर आई केरल कॉन्ग्रेस

इसी तरह से कई और विवादित ट्वीट किए गए। हालाँकि विवाद बढ़ने पर पार्टी ने उसे डिलीट कर दिया। वहीं बैकफुट पर आने के बाद केरल विधानसभा में विपक्ष के नेता और कॉन्ग्रेस नेता वीडी सतीसन ने सोमवार (14 मार्च 2022) को कहा कि फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ को लेकर किए गए ट्वीट के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है।

1990 के दशक में लाखों कश्मीरी पंडितों का विस्थापन

बताते चलें कि वर्ष 1990 में कश्मीर घाटी से रातोंरात लाखों कश्मीरी हिंदुओं को अपना घर-बार छोड़कर भागना पड़ा था। जिहादी आतंकियों की ओर से उन्हें दो विकल्प दिए गए थे। पहला विकल्प वे कश्मीर छोड़कर भाग जाएँ। दूसरा, इस्लाम धर्म कबूल कर लें। कश्मीरी हिंदुओं को धमकी दी गई थी कि दोनों में से कोई भी विकल्प न चुनने वालों को मार डाला जाएगा।

इस्लामी आतंकियों ने जमकर किया कत्लेआम

उनकी धमकी से डरकर कई परिवार कश्मीर (Kashmir) छोड़कर चले गए। जो वहाँ से निकलने को तैयार नहीं हुए, जिहादियों ने एक-एक करके उन्हें गोलियों से भूनना शुरू किया। कश्मीर की सड़कों पर हर रोज कश्मीरी पंडितों (Kashmiri Pandit) की लाशें मिलने लगी। फिर एक शाम कश्मीर की तमाम मस्जिदों से कश्मीरी पंडितों के घाटी छोड़ने या मरने के लिए तैयार रहने की धमकी दी। इन धमकियों से डरे लाखों हिंदू परिवार, हर संभव साधनों के जरिए रातों-रात कश्मीर से निकल आए और अपने ही देश में हमेशा के लिए शरणार्थी बनकर रह गए।

60 घंटे भी नहीं टिकी ₹60 लाख में बनी सड़क, राजस्थान के PWD मंत्री का ही है इलाका: उधर चुनाव के लिए उपलब्धियाँ गिना रही गहलोत सरकार

कॉन्ग्रेस शाषित राज्यों में विकास तो नहीं लेकिन भ्रष्टाचार के मामले सामने आते रहते हैं। अब ऐसा ही एक मामला आया है राजस्थान से है जहाँ गहलोत सरकार के पीडब्ल्यूडी मंत्री भजन लाल जाटव के गृह जिले में नवनिर्मित सड़क ही गायब हो गई है। यहाँ दो दिन पहले ₹60 लाख की लागत से मंत्रीजी के पीडब्ल्यूडी विभाग ने एक सड़क बनाई लेकिन ग्रामीणों ने ही कॉन्ग्रेस के भ्रष्टाचार की पोल खोल दी।

यह सड़क 60 घंटे भी नहीं चल सकी। उधर सड़क टूटने के बाद स्थानीय लोग मंत्री सहित स्थानीय विधायक पर भ्रष्टाचार का गंभीर आरोप लगा रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, भरतपुर नगर विधानसभा क्षेत्र में गुलपाड़ा से काबान का वास तक पीडब्ल्यूडी विभाग द्वारा 2 दिन पहले एक सड़क का निर्माण कराया था। मगर दूसरे दिन ही इस सड़क का डामर उखलने लगा और यह सड़क चलने लायक भी नहीं बची।

ऐसे में लोगों ने यहाँ के स्थानीय विधायक वाजिब अली, पीडब्ल्यूडी विभाग के अधिकारियों और पीडब्ल्यूडी मंत्री भजन लाल जाटव के खिलाफ अपने गुस्से का इजहार करते हुए कॉन्ग्रेस के भ्रष्टाचार की तस्वीरों को सोशल मीडिया पर शेयर किया।

कहा जा रहा है कि अब वहाँ सड़क नाम की कोई चीज नहीं है। वहीं लोगों ने इतनी जल्दी सड़क टूटने की शिकायत पीडब्ल्यूडी विभाग के अधिकारियों से भी की है और ग्रामीण सड़क निर्माण में हुए भ्रष्टाचार की जाँच की माँग कर रहे हैं।

गौरतलब है कि राजस्थान में कॉन्ग्रेस की सरकार को 3 वर्ष से ज़्यादा हो चुके हैं मगर सड़कों के गहरे गड्ढे खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे हैं । भरतपुर जिले में अधिकतर जगह सड़कें टूटी पड़ी हैं, जिनमें गहरे गड्ढे हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि गृह जिला होने के बावजूद पीडब्ल्यूडी मंत्री अपने इलाके का ध्यान नहीं रखते हैं और भ्रष्टाचार में लिप्त हैं।

‘35% अल्पसंख्यक नहीं’: असम के कश्मीर बनने के सवाल पर बोले CM हिमंता – ‘ये मुस्लिमों का कर्तव्य कि वो दूसरे समुदायों का डर दूर करे’

असम एक ऐसा राज्य है, जहाँ मुस्लिमों की बड़ी आबादी निवास करती है। लेकिन फिर भी मुस्लिमों को अल्पसंख्यक कहा जाता रहा है। अब राज्य के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा है कि मुस्लिम अल्पसंख्यक नहीं हो सकते। राज्य में उनकी आबादी 35 प्रतिशत है। उन्होंने कहा कि हालात ये हैं कि आज इस समुदाय के लोग न केवल विपक्ष में हैं, बल्कि उनके पास समान मौके हैं।

राज्य विधानसभा में एक सवाल के जबाव में सीएम सरमा ने कहा कि असम के आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करना हमारा कर्तव्य है, ताकि उनकी जमीनों पर पर अतिक्रमण न हो। सीएम सरमा ने कहा, ‘छठी अनुसूची के तहत आने वाले आदिवासियों की जमीन पर कब्जा नहीं कर सकते हैं। अगर बोरा और कलिता उन जमीनों पर नहीं बस रहे हैं तो इस्लाम और रहमान को भी वहाँ बसने से बचना चाहिए।”

उन्होंने कहा कि सत्ता के साथ कुछ जिम्मेदारियाँ भी आती हैं। असम में मुस्लिमों की आबादी 35 प्रतिशत है तो राज्य के अल्पसंख्यकों की रक्षा करना उनका कर्तव्य है। राज्य के लोग डरे हुए हैं। उन्हें इस बात का डर सता रहा है कि क्या वो अपनी सभ्यता और संस्कृति को बचा पाएँगे। सीएम सरमा कहते हैं कि सद्भाव दोनों तरफ से होता है। मुस्लिम संकरी संस्कृति को बचा रहे हैं, लेकिन सत्रीय संस्कृति में ही सद्भाव होगा। 10 साल पहले तक हम अल्पसंख्यक नहीं थे, लेकिन अब हैं।

सरमा ने आगे कहा, “लोग पूछ रहे हैं कि क्या असम के लोगों का भी कश्मीरी पंडितों जैसा हाल होगा। दस साल बाद असम ऐसा होगा, जैसा फिल्म द कश्मीर फाइल्स में दिखाया गया है। ये मुस्लिमों की जिम्मेदारी है कि वे हमारे डर को दूर करें और हमें आश्वस्त करें कि यहाँ कश्मीर जैसा नहीं होगा।” अपने स्वदेशी मुस्लिम तक आपसे (मुस्लिमों) डरते हैं। राज्य में 4 प्रतिशत स्वदेशी असमिया मुस्लिम हैं। बाकी अधिकतर बंगाली भाषी मुस्लिम हैं।

जमीन बेदखली को बताया सही

मुख्यमंत्री ने गोरुखुटी, लुमडिंग और लाहौरीजन में जमीन से बेदखल किए जाने को सही बताया और कहा, “हम 1000 लोगों को 10,000 बीघा जमीन पर कब्जा करने की अनुमति नहीं दे सकते। हम कुछ व्यापारियों के निजी लाभ के लिए वन भूमि को नष्ट नहीं होने दे सकते।” आपराधिक तत्वों पर कार्रवाई धर्म निरपेक्ष है औऱ इसका धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। असम सौर से 1000 मेगावाट बिजली चाहता है, उन्होंने सुझाव दिया कि यह असम में संभव नहीं हो सकता है, राज्य को कोशिश करनी चाहिए और इसे बालमारे में स्थापित करना चाहिए।”

उल्लेखनीय है कि असम सरकार ने विवेक अग्निहोत्री की फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स‘ देखने के लिए राज्य सरकार के कर्मचारियों को हाफ डे देने का ऐलान किया है।

‘2014 के बाद शुरू हुआ भारत का भाग्य उदय, मोदी मेरे नायक’: बोले ‘तेरी मिट्टी’ वाले मनोज मुंतशिर – पहले इतना खौफ कि चीखना भी मना था

प्रसिद्ध गीतकार और शायर मनोज मुंतशिर ने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना नायक माना है। ‘औरत पर हाथ डालने वाले का हाथ नहीं काटना चाहिए, काटना चाहिए उसका गला’ जैसे फेमस डॉयलॉग के रचनाकार मुंतशिर कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समाज के सबसे निचले तबके से आते हैं और देश के सबसे ऊँचे पद पर पहुँचते हैं। वो वहाँ पर बार-बार अपनी उपयोगिता को भी साबित करते हैं। वो कहते हैं कि 2014 से पहले तक लोग इंडिया में रहते थे, लेकिन अब वो भारत में रहते हैं। उन्होंने कहा कि यही है बदलाव।

दैनिक भास्कर को दिए एक्सक्लसिव इंटरव्यू में मनोज मुंतशिर ने कई ज्वलंत मुद्दों पर बात की। वो अकबर, हुमायूँ, बाबर, जहाँगीर और औरंगजेब को ग्लोरिफाइड डकैत बताते हैं। वो बड़ी ही शिद्दत से ये मानते हैं कि 2014 के बाद से ही भारत के भाग्य का उदय शुरू हुआ।

बातचीत के दौरान मुंतशिर कहते हैं कि कवि, गीतकार, शायर जन्मजात होतें हैं, लेकिन फिर भी इसके लिए एक ट्रिगर की जरूरत होती है। जब पहली बार मोहब्बत में दिल टूटता है, तो आप दर्द महसूस करते हैं। दर्द का गहरा रिश्ता कविता के साथ होता है।

वहीं इतिहास की जमीन पर लौटने सवाल पर मनोज मुंतशिर कहते हैं, “गीतकार को ही बदलना होगा। जो लिख, पढ़ और बोल सकते हैं वही चुप रह गए तो क्या होगा। मैं इसलिए जिंदा हूँ क्योंकि मैं बोल रहा हूँ, दुनिया किसी गूँगे की कहानी नहीं सुनती। पाठ्यपुस्तकों में जो भी पढ़ाय़ा गया वो एजेंडे के तहत था। मैंने इतिहास को बदलना नहीं चाहा, उसका दूसरा प्वाइंट सामने रखा है। मैं जिस चीज को बड़े ही गर्व से सीने से लगाकर घूमता था कि मैं सेक्युलर हूँ। बहुत दिनों के बाद पता चला कि मेरे साथ स्कैम हो गया है। सेक्युलर होना नागरिक का नहीं सरकार का काम है।”

देश की कड़वी सच्चाई रखी सामने

मनोज मुंतशिर ने देश की कड़वी सच्चाई को सामने रखा और कहा कि इस देश में अगर कोई हिंदू धर्मांतरण कर मुस्लिम या ईसाई हो जाए तो सब ठीक है, लेकिन एक हिंदू, हिंदू हो जाए तो बवाल खड़ा हो जाता है। उन्होंने समाज के दोगलेपन पर अपने तर्कों से कुठाराघात किया कि भगत सिंह खुद को नास्तिक कहते थे, लेकिन पगड़ी के साथ उन्हें सभी स्वीकार करते हैं तो फिर जनेऊ के साथ चंद्रशेखर आजाद को क्यों नहीं? इससे कौन से एजेंडे को चोट पहुँचती है। उन्होंने कहा, “लगता है चाय से अधिक गर्म केतली है।”

द कश्मीर फाइल्स और लिबरलरिज्म पर बड़ा बयान

मनोज मुंतशिर ने कहा, “लोग डरे हुए थे, सभी ओर डर का माहौल था। 2014 के पहले हम इंडिया में जी रहे थे, लेकिन उसके बाद हम भारत में रह रहे हैं। वो कहते हैं कि 2014 के पहले फिल्म इंडस्ट्री लिबरलिज्म के सबसे घटिया स्वरूप में था। गीतकार मानते हैं कि जिसके घर में कोई न मरा हो वहीं लिबरल हो सकता है। संवेदन शून्य होना ही लिबरल होना है। पहले लोग इतने खौफजदा थे कि वो चीखते तक नहीं थे, लेकिन अब जब चीख रहे हैं तो उन्हें असहिष्णु कहा जा रहा है।” वहीं फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ बनाने के लिए मनोज मुंतशिर ने निर्देशक विवेक रंजन अग्निहोत्री को बहादुर करार दिया। उनके मुताबिक, विवेक अग्निहोत्री इस फिल्म को बनाने की कीमत चुका रहे हैं। फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें इसकी भरपाई करनी पड़ेगी।

अमेठी से चुनाव लड़ने के सवाल पर उन्होंने सीधा जबाव तो नहीं दिया, लेकिन कहा कि मैं अमेठी का रहने वाला हूँ औऱ जब भी अमेठी बुलाएगी, जरूर आऊँगा।

बुर्के पर 17 मार्च को कर्नाटक बंद करने का फतवा, कक्षाओं का बहिष्कार: होली बाद हिजाब पर सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 16 मार्च, 2022 को हिजाब मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दाखिल अपील पर जल्द सुनवाई से इनकार कर दिया। कहा कि वह होली की छुट्टी के बाद कर्नाटक हिजाब प्रतिबंध के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करेगा। याचिका अधिवक्ता संजय हेगड़े और देवदत्त कामत के माध्यम से दायर की गई है। इससे पहले हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि हिजाब इस्लाम का अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है और स्कूल व कॉलेज में हिजाब पहनने पर प्रतिबंध के राज्य सरकार के निर्णय को बरकरार रखा था।

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील संजय हेगडे ने चीफ जस्टिस एनवी रमण की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष इस याचिका का उल्लेख करते हुए जल्द सुनवाई की गुहार लगाई। हेगड़े ने कहा, “अत्यावश्यक यह है कि कई लड़कियाँ हैं जिन्हें कॉलेजों में जाना है। कृपया मामले की सुनवाई सोमवार 21 मार्च को करें।”

चीफ जस्टिस रमण ने कहा, “दूसरों ने भी इस मामले का उल्लेख किया है। हम होली की छुट्टियों के बाद मामले को सूचीबद्ध करने पर विचार करेंगे।” हालाँकि, चीफ जस्टिस ने सुनवाई के लिए कोई तारीख निर्धारित नहीं की है।

कर्नाटक में बंद का फ़तवा

वहीं दूसरी ओर अमीर-ए-शरीयत कर्नाटक, मौलाना सगीर अहमद खान रशदी ने हिजाब से संबंधित उच्च न्यायालय के फैसले पर दुख व्यक्त करते हुए गुरुवार (17 मार्च, 2022) को राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया है।

एक वीडियो संदेश में, रशदी ने कहा, “मैं सभी मुसलमानों से अनुरोध करता हूँ कि वे यहाँ पढ़े गए फतवे को ध्यान से सुनें और इसे सख्ती से लागू करें। हिजाब को लेकर कर्नाटक हाईकोर्ट के दुखद आदेश के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर करते हुए कल 17 मार्च को पूरे कर्नाटक राज्य में पूरे दिन के लिए पूर्ण बंद रहेगा। उन्होंने मुस्लिम समुदाय के हर वर्ग से बंद में भाग लेने की अपील की।”

“इसे सफल बनाएँ और शासकों को बताएँ कि धार्मिक प्रथाओं का पालन करते हुए शिक्षा प्राप्त करना संभव है। हम न्यायप्रिय लोगों और मिल्लत-ए-इस्लामिया से भी बंद का पालन करने का अनुरोध करते हैं।”

उडुपी एवं शिवमोगा में कक्षाओं का बहिष्कार

वहीं एक दूसरे मामले में उडुपी में गवर्नमेंट प्री यूनिवर्सिटी गर्ल्स कॉलेज की छह मुस्लिम छात्राओं ने कक्षाओं के अंदर हिजाब पहनने की अनुमति माँगने वाली उनकी याचिका को कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा खारिज किए जाने के एक दिन बाद बुधवार को भी कक्षाओं में नहीं आईं। छात्राएँ अपने स्टैंड पर अड़ी रहीं कि वे बिना स्कार्फ के कॉलेज में प्रवेश नहीं करेंगी और कानूनी रूप से केस लड़ेंगी।

जब दूसरी प्री-यूनिवर्सिटी कक्षाओं की प्रारंभिक परीक्षा चल रही थी, तब वे अनुपस्थित थे।

शिवमोग्गा के कमला नेहरू कॉलेज में, जहाँ सबसे पहले भी हिजाब को लेकर हंगामा हो चुका है, वहाँ 15 लड़कियाँ यह कहकर घर लौट आईं कि वे बिना हिजाब पहने कॉलेज में प्रवेश नहीं करेंगी। बता दें कि जिला मुख्यालय का यह वही शहर है जहाँ हाल ही में बजरंग दल के एक कार्यकर्ता की हत्या कर दी गई थी, जिससे तनाव पैदा हो गया था।

यहाँ 15 लड़कियाँ बुर्का और हिजाब के साथ क्लास करने पहुँची थीं लेकिन कॉलेज प्रबंधन ने प्रवेश पर रोक लगा दी और उन्होंने भी बहिष्कार करते हुए कक्षाओं में नहीं जाने का फैसला किया। उनमें से एक ने कहा कि हिजाब उनका मजहबी अधिकार और पहचान है और वे इसके बिना कॉलेज में प्रवेश नहीं कर सकतीं।

गौरतलब है कि कर्नाटक उच्च न्यायालय ने मंगलवार को अपने 129-पृष्ठ के आदेश में कहा कि हिजाब एक आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं है और राज्य सरकार के 5 फरवरी के आदेश को बरकरार रखा है जो परिसर में किसी भी कपड़े के उपयोग पर प्रतिबंध लगाता है जो शांति, सद्भाव और सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाड़ सकता है।

बता दें कि मुख्य न्यायाधीश रितु राज अवस्थी, न्यायमूर्ति कृष्णा एस दीक्षित और न्यायमूर्ति जे एम खाजी की पूर्ण पीठ का गठन तब किया गया जब तटीय जिला मुख्यालय शहर उडुपी के कुछ छात्राओं ने कर्नाटक हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और शैक्षणिक संस्थानों की कक्षाओं के अंदर हिजाब पहनने की अनुमति माँगी थी।

‘अल जजीरा’ से लेकर ‘वायर’ तक फेसबुक पर फैला रहे मोदी विरोधी प्रोपेगेंडा और रो रहे कि BJP के रंग में रंगा है सोशल मीडिया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी (BJP) से जुड़ी खबरों में वामपंथी एंगल घुसेड़े बिना प्रकाशित करने को लेकर लिबरल मीडिया गिरोह NewJ वेबसाइट के पीछे पड़ा है। हाल में अलजजीरा, द वायर, न्यूज क्लिक जैसी वामपंथी साइट्स पर NewJ को टारगेट करते हुए एक आर्टिकल प्रकाशित किया गया। इसका शीर्षक है- रिलायंस पोषित कंपनी भाजपा के अभियान को फेसबुक पर कैसे कर रही है बूस्ट (How A Reliance Funded firm boosts BJP’s campaign on Facebook)। इसके बाद आर्टिकल के अंदर ‘न्यूजे’ साइट के कुछ स्क्रीनशॉट लगाकर ये साबित करने की कोशिश की गई है कि ये साइट बीजेपी का प्रचार कर रही है।

इस आर्टिकल के शीर्षक को सार्थक बनाने के लिए केवल भाजपा संबंधी विज्ञापनों की चर्चा की गई है, जिससे ऐसा लगे कि केवल बीजेपी ही अपनी छवि बनाने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करती है। इन लेखों में खास बात ये है कि भाजपा और विज्ञापन दिखाने वाली साइट पर सवाल उठाते हुए ये अन्य राजनैतिक पार्टियों के विज्ञापनों की बातें नहीं करते। भारत में 2017 से 2020 के बीच विशुद्ध रूप से राजनीतिक विज्ञापनों का विश्लेषण करते हुए वेबसाइट पर जो डेटा मिलता है, उससे पता चलता है कि वास्तव में भाजपा (2808) की तुलना में कॉन्ग्रेस (3744) के विज्ञापन अधिक हैं। वैसे ये आँकड़े सत्यापित नहीं हैं, लेकिन इनसे यह तो स्पष्ट है कि कॉन्ग्रेस के विज्ञापन बीजेपी से करीब 35 फीसद ज्यादा हैं।

भाजपा के प्रचार पर आपत्ति, कॉन्ग्रेस के विज्ञापनों पर बात तक नहीं

आप इन साइट्स की निष्पक्षता का अंदाजा इस बात से भी लगा सकते हैं कि भाजपा संबंधी विज्ञापनों पर शोर मचाने वाली इन वामपंथी साइट्स ने कहीं भी उन वेबसाइटों का जिक्र नहीं किया है जो कॉन्ग्रेस या अन्य पार्टियों के ऐड चलाती हैं। इसके अलावा इन्होंने उन सामग्रियों पर भी पर्दा गिराए रखा जो मोदी विरोधी हैं और न्यूजे वेबसाइट द्वारा ही चलाई जा रही थी। ये बात भी ध्यान देने वाली है कि खुद जिन साइट्स ने ये आर्टिकल लिखे हैं वो मोदी विरोधी कंटेंट का प्रचार-प्रसार करती हैं।

अलजजीरा का प्रोपेगेंडा

कुछ ऐड देखिए जिसमें प्रधानमंत्री पर कोरोना के दौरान कुप्रबंधन के आरोप लगाने के लिए इन साइट्स ने मेहनत की और फिर उन्हें फेकबुक पर प्रमोट कराया। एक वीडियो में यहाँ वामपंथी लेखिका अरुंधति रॉय का साक्षात्कार है। इसमें रॉय बता रही हैं कि कैसे नफरत और साम्प्रदायिकता का प्रचार हुआ और कैसे इसी को फैलाने के लिए लॉकडाउन का इस्तेमाल भी हुआ। दिलचस्प बात ये है कि इन विज्ञापनों को जहाँ प्रमोट किया गया उन जगहों में महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और बंगाल हैं। अगर याद हो तो लॉकडाउन के समय यहीं के प्रवासी मजदूरों की चर्चा ज्यादा थी।

पीएम मोदी विरोधी प्रोपेगेंडा फैलाने में सिर्फ अलजजीरा ही सक्रिय नहीं है। नजर मारेंगे तो स्क्रॉल, द वायर, द प्रिंट, न्यूज क्लिक, न्यूज लॉन्ड्री हर वामपंथी साइट आपको पीएम मोदी विरोधी कंटेट परोसता नजर आएगा और फिर इनकी शिकायतें ये भी होंगी कि कोई साइट पीएम मोदी के प्रचार वाली खबर को कैसे प्रमोट कर सकती है।

दिलचस्प बात ये है कि इन साइट्स पर साल 2019 के समय तमाम भाजपा विरोधी विज्ञापन चलाए गए थे वो भी उस समय जब लोकसभा चुनाव थे। राहुल गाँधी के एक इंटरव्यू वाला कंटेंट प्रमोट किया गया था, जिसमें वह जनता को ये बता हे थे कि भाजपा को जनता वापस नहीं चाहती।

द वायर का कंटेंट

ये अकेला उदाहरण नहीं है जो आपको ये बताने के लिए दिया जा रहा है कि आखिर पीएम मोदी के विज्ञापन वाली खबरों को प्रमोट होता देख तिलमिलाई साइट्स का अपना खुद का रुख क्या है।

2019 में चुनावों के समय ऐसे तमाम आर्टिकल देखे गए जिन्हें साइट्स ने प्रमोशन पर लगाया था। जैसे एक में द वायर ने सवाल किया था कि ये पीएम मोदी की लहर है या फिर पैसों की लहर। एक वीडियो बनाई गई जिसमें भाजपा की आमदमी कितनी थी बस यही समझाया गया।

द वायर का कंटेंट

Newclick और NewsLaundary का प्रोपेगेंडा

इसी प्रकार न्यूजक्लिक और न्यूज लॉन्ड्री भी पीछे नहीं है। इनका पक्षपात भी आप इनकी साइट पर मौजूद खबरों और उसके प्रमोशन को देख कर लगा सकते है। इन्होंने भी कोविड दौर में मोदी सरकार की छवि धूमिल करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी और ये समझाया कि कैसे यूएसए और ब्राजील की तरह भारत का नेतृत्व भी एक ऐसा नेता कर रहा है जिसे अपनी छवि ज्यादा प्रिय है। पड़ताल में ये पता चलता है कि ये ऐड जून-जुलाई 2020 में चलाए गए थे जब बिहार के चुनाव आसपास थे। स्क्रीनशॉट में देख सकते हैं कि साइट ने इस कंटेंट को प्रमोट करते हुए टारगेट ऑडियंस में बिहार भी चुना था जो कि दूसरे नंबर पर हैं।

न्यूजक्लिक का कंटेंट

कुल मिलाकर यदि निष्कर्षों पर बात की जाए तो स्पष्ट बात ये है कि हर साइट अपनी राजनैतिक विचारधाराओं के अनुरूप उन पर ऐड चलाता और चलवाता है। फिर भी अगर ये लोग निष्पक्षता का मुद्दा उठाकर किसी साइट को घेरते हैं, तो ये बात भी साफ हो कि जो मीडिया संस्थान भाजपा विरोधी और मोदी विरोधी कंटेंट का प्रचार करती हैं, उन्हें लेकर कहीं से कहीं ये सबूत नहीं मिलते हैं कि वो अपनी खबरों में पीएम मोदी के, भाजपा के या भारत सरकार के अच्छे कामों को निष्पक्ष तौर से अपने पाठकों के सामने रखती हों।

NewJ के तरह-तरह के कंटेंट

रही बात न्यूजे की तो ये बात मालूम हो कि जिस साइट का कनेक्शन सिर्फ रिलायंस के साथ देखकर इतनी रिसर्च की गई वो न्यूज साइट और उसके कंटेंट देखने पर पता चलता है कि ये लोग कॉन्ग्रेसी नेता, आप नेता, शिवसेना नेता, यहाँ तक कि AIMIM नेता से जुड़े कंटेंट का भी प्रचार कर चुके हैं। नीचे स्क्रीनशॉट प्रमाण के तौर पर पेश हैं। जिन्हें न्यूजे के संस्थापक शलभ उपाध्याय ने भी उजागर किया है।

AIMIM से जुड़े कंटेंट का प्रमोशन

मनोरंजन और राजनीति से जुड़ा कंटेंट
कॉन्ग्रेस की महासचिव प्रियंका गाँधी का प्रमोशन

इसके अलावा जो आरोप उन पर पीएम मोदी से जुड़ी खबरों का प्रचार करने के लगे हैं उनकी सच्चाई आप फिर कुछ स्क्रीनशॉट्स में देखिए जो बताते हैं कि ये साइट वो कंटेंट भी डालती है जो न पीएम मोदी के पक्ष में होती है और न ही भाजपा के। एक रिपोर्ट में काशी में गंगा नदी के पानी को लेकर सवाल खड़े किए गए हैं जिसका रंग हरा है और ये पीएम मोदी का संसदीय क्षेत्र है। इसी तरह यूक्रेन से जुड़ी रिपोर्ट जिसमें वहाँ फँसे भारतीय बच्चे मदद माँग रहे हैं।

पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र को लेकर की गई रिपोर्ट
यूक्रेनी छात्रों की पीड़ा दिखाने वाली रिपोर्ट

तो, इसलिए ये बात साफ है कि NEWJ ने एक निष्पक्ष रवैया अपनाते हुए खबरें लिखी हैं। हर मीडिया और न्यूज कंपनी चाहती है कि वो ज्यादा से ज्यादा लोगों के पास अपने कंटेंट के बूते पहुँचे फिर चाहे वो भाजपा से जुड़ा कंटेंट हो, कॉन्ग्रेस से जुड़ा या सामाजिक मुद्दों से जुड़ा। वे उसे प्रमोट करते ही हैं । मगर, अलजजीरा, स्क्रॉल, द प्रिंट, द वायर खुलकर एक निश्चित पार्टी का विरोध करते हैं और फिर दूसरी साइट्स के विरोध में इसलिए आर्टिकल भी लिख देते हैं कि उन्होंने उस पार्टी, उस नेता से जुड़ी सकारात्मक खबर कैसे दिखाई जिसके विरोध में वो पूरा गुट इकट्ठा होकर नकारात्मक माहौल बना रहा है और उसी से अपना ट्रैफिक भी जुटा रहा है।