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अब सऊदी अरब के स्कूलों में भी बच्चों को सिखाया जाएगा योग, मक्का-मदीना में भी योग स्टूडियो: बनेगा पाठ्यक्रम का हिस्सा

इस्लामिक मुल्क सऊदी अरब में कुछ साल पहले तक योग अभ्यास को कुफ्र माना जाता था। यही नहीं सऊदी अरब में योग के बारे में सोचना भी अपराध था। लेकिन दुनिया भर में योग के बारे में दृष्टिकोण बदल रहा है। अब सऊदी अरब में भी सैकड़ों लोग योग सीख रहे हैं। इसे देखते हुए सऊदी अरब भी अपने स्कूलों में स्पोर्ट्स कैरिकुलम के रूप में योग को जगह देने जा रहा है। सऊदी योग कमिटी के अध्यक्ष नोउफ अल-मारवाई ने कहा कि 2017 में ही कॉमर्स मिनिस्ट्री ने इस कोर्स को मान्यता दे दी थी।

बता दें कि सऊदी अरब के व्यापार एवं उद्योग मंत्रालय ने नवंबर 2017 के योग को खेल गतिविधियों के रूप में मान्यता दी थी। साल 2017 के बाद ही वहाँ कोई योग सिखाना या इसे बढ़ावा देना चाहे, तो लाइसेंस लेकर अपना काम शुरू कर सकता है।

अब इस्लामी मुल्क में शिक्षा मंत्रालय के सहयोग के साथ यह सिलेबस शुरू किया जाएगा। नोउफ ने कहा कि इस कोर्स से बच्चों को स्वास्थ्य लाभ होगा। बीते दिनों योग के फायदे को लेकर सऊदी स्कूल स्पोर्ट्स फेडरेशन की बैठक भी थी। इस बैठक में स्कूलों के प्रधानाचार्यों ने हिस्सा लिया। अरब न्यूज के मुताबिक, सभी श्रेणी के स्कूलों के अधिकारियों ने अपनी राय रखी। योगा इंस्ट्रक्टर और आनंद योगा स्टूडियो के फाउंडर खालिद जमा अल जहरानी ने कहा कि स्कूल में हमें हमेशा ध्यान रखना होता है कि बच्चों का हर तरह से विकास हो। 

नोउफ अल-मारवाई ने योग के प्रति बढ़ाई जागरुकता

बता दें कि सऊदी अरब में महिलाओं के लिए योग स्टूडियो नोउफ अल-मारवाई की देन माना जाता है। मारवाई ने अपने प्रयास से सऊदी में सैकड़ों लोगों को योग सिखाया है। मारवाई की संस्था का नाम अरब योगा फाउंडेशन है। मारवाई कहती हैं कि योग को मान्यता मिलने के कुछ महीने में ही मक्का और मदीना सहित कई बड़े शहरों में योग स्टूडियो खुल गए। योग प्रशिक्षकों का नया उद्योग खड़ा हो गया।

मारवाई भारत को अपना दूसरा घर मानती हैं और योग को लेकर पूरे विश्व वो जागरूकता फैलाने के लिए वह भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आभारी हैं। मारवाई को राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया था। उन्होंने अरब न्यूज को दिए एक इंटरव्यू में भारत को अपना दूसरा घर मानने की वजह के बारे में बताते हुुए कहा कि उन्हें यहाँ के लोगों की दयालुता/ नेकी ने काफी प्रभावित किया। उन्हें यहाँ पर घर जैसा महसूस हुआ। यहीं पर उन्होंने अपनी बीमारी का इलाज करने के दौरान योगा सीखा, जिसका उन्हें काफी लाभ हुआ।

बता दें कि अरब में पहले योग को सिर्फ हिंदू धार्मिक परंपरा माना जाता था। योग करना गैर इस्लामिक माना जाता था। लेकिन अब सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने योग को खेल के रूप में मान्यता दी है। अब यह देश भर में लोकप्रिय हो रहा है।

इस्लामी मुल्क ने पाठ्यक्रम में शामिल किए रामायण-महाभारत

पिछले दिनों खबर आई थी कि सऊदी अरब ने नए पाठ्यक्रम में रामायण और महाभारत (Ramayana and Mahabharata) को शामिल किया है। सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (Prince Mohammed bin Salman) ने ‘विजन 2030’ के तहत शिक्षा क्षेत्र के लिए अन्य देशों के इतिहास और संस्कृति के अध्ययन को जरूरी बताया। देश में नई शिक्षा नीति की घोषणा करते हुए बताया गया कि अब छात्रों को रामायण और महाभारत भी पढ़ाया जाएगा।

कुवैत में योग शिविर बंद करने पर सड़क पर उतरी महिलाएँ

एक तरफ जहाँ सऊदी अरब में स्कूल में योग सिखाने की शुरुआत हो रही है तो वहीं दूसरी तरफ कुवैत में कुछ दिनों पहले इस पर रोक लगा दिया गया। इसको लेकर काफी हंगामा भी हुआ। दरअसल यहाँ एक योग शिक्षक ने महिलाओं के लिए योग से जुड़े एक कार्यक्रम का विज्ञापन दिया, जिसे यहाँ के मुल्ला-मौलवी इसे इस्लाम का अपमान बताया। इसके बाद सरकार ने इस ‘योग रिट्रीट’ को प्रतिबंधित कर डाला। जिसके बाद इस्लामी कट्टरपंथियों के खिलाफ बड़ी संख्या में महिलाएँ सड़क पर उतरी थी।

बता दें कि अब योग को पूरी दुनिया में महत्व दिया जा रहा है। 21 जून को दुनिया भर में योग दिवस मनाया जाता है। इस मौके पर देश-विदेश में बड़े-बड़े कार्यक्रमों का आयोजन होता है।

‘महिलाओं से सड़कों पर बलात्कार, बच्चों की आँखों में गोली मारी’: बोले ‘द कश्मीर फाइल्स’ के लेखक – रिसर्च में 3.5 साल, 700 पीड़ितों से मुलाकात

कश्मीर घाटी के हिंदुओं को नरसंहार पर बनी विवेक रंजन अग्निहोत्री की फिल्म The Kashmir Files रोज नए कीर्तिमान गढ़ रही है, साथ ही लोगों के अंदर गुस्सा और बेचैनी को भी बढ़ा रही है। वहीं, इस फिल्म के सह-लेखक सौरभ पांडेय ने कहा कि इसमें सिर्फ 5 प्रतिशत घटनाओं को ही दिखाया गया है। उन्होंने कहा कि बाकी की घटनाएँ ना दिखाई जा सकती हैं और ना ही देखा जा सकता है। उन्होंने बताया कि इस सच्चाई को पर्दे पर लाने में तीन साल की मेहनत और रिसर्च लगा है।

सौरभ पांडेय ने दैनिक भास्कर से बातचीत में कहा कि बचपन से सुना था कि कश्मीर स्वर्ग है, लेकिन वह नरक से गंदा है। उन्होंने कहा कि फिल्म में वहाँ की सारी घटनाएँ ना ही कही जा सकती है और ना ही दिखाई जा सकती है, क्योंकि उसे बोलने मे भी शर्म आएगी और सुनने में भी शर्म आएगी।

सौरभ ने कहा कि इस फिल्म के लिए लगभग 700 इंटरव्यू किए गए। जितनी किताबें मिलीं, उन्हें पढ़ा। उनकी गिनती नहीं की, लेकिन 15 से 20 किताबें जरूर पढ़ी होंगी। न्यूज और आर्टिकल निकालकर जानकारियाँ जुटाई गईं। कश्मीरी लोगों के साथ क्या हुआ था, इसकी जानकारी हासिल की गई। इसके बाद स्क्रिप्टिंग पर काम शुरू किया गया। कुल साढ़े तीन साल रिसर्च करने और स्क्रिप्ट लिखने में लगा।

सौरभ ने बताया कि टीम पीड़ितों, उनके परिजनों, पड़ोसियों और जो बातचीत के लिए तैयार थे, उनसे मिलने के लिए जम्मू, दिल्ली, मुंबई, कनाडा, अमेरिका, जर्मनी गए। उन्होंने कहा कि जहाँ-जहाँ कश्मीर से लोग गए हैं, वहाँ जाकर टीम ने उनका इंटरव्यू लिया और विस्तार से जाना कि उनके साथ दरअसल हुआ क्या था।

एक घटना को याद करते हुए सौरभ बताते हैं कि फिल्म में नाडरमर का एक एक्सीडेंट है, जिसे पढ़कर शॉक लगा था। जब उनका इंटरव्यू करने गए, तब वे अपने परिवार का इकलौता बच्चा थे और बच गए थे। घटना के दिन उनके दादाजी जम्मू जाने वाले थे, लेकिन दादाजी की जगह वह चले गए और बच गए। आज भी उन्हें देखकर लगता है कि वह कोमा से बाहर नहीं निकल पाए।

सौरभ ने बताया कि इस फिल्म का आइडिया विवेक अग्निहोत्री का था। विवेक अग्निहोत्री के साथ वह ताशकंद फाइल्स में भी काम कर चुके हैं। उसमें वह रिसर्चर और स्क्रिप्ट सुपरवाइजर का काम देखते थे। उनका काम देखकर उनसे कश्मीर फाइल्स पर काम करने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि कश्मीर में उस दौरान सड़कों पर महिलाओं से बलात्कार हुए और बच्चों की आँखों में गोली मारी गई।

बता दें कि फिल्म के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने कहा कि लोग इस फिल्म को कम आँक रहे थे। उन्होंने कहा कि वे जल्दी ही इसकी सीरीज बनाने का काम शुरू करेंगे।

IPL 2022: मुंबई में दिल्ली कैपिटल्स टीम की बस पर हमला और तोड़फोड़, राज ठाकरे की पार्टी के 4 नेता गिरफ्तार

आईपीएल के लिए मैदान सज चुके हैं। इसके शुरुआती तीन मैच मुंबई में होने हैं और इसके लिए टीमें भी वहाँ पहुँच गई हैं। इस बीच मंगलवार (15 मार्च 2021) को पार्किंग में खड़ी दिल्ली कैपिटल्स की बस में मनसे (MNS) कार्यकर्ताओं द्वारा तोड़फोड़ की गई। इसके बाद कार्रवाई करते हुए पुलिस ने पाँच आरोपितों के खिलाफ केस दर्ज किया है। इनमें से चार को गिरफ्तार भी कर लिया गया है।

ANI के मुताबिक, दिल्ली कैपिटल्स की खड़ी बस पर हमला करने के आरोप में 5-6 अज्ञात लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा 143, 147, 149, 427 के तहत एफआईआर दर्ज की गई है। बाद में इस मामले में एक्शन लेते हुए मुंबई की कोलाबा पुलिस ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की ट्रांसपोर्ट विंग के उपाध्यक्ष प्रशांत गाँधी समेत चार लोगों को पकड़ लिया। हालाँकि, अच्छी बात यह है कि इस हमले में किसी को किसी भी तरह की कोई चोट नहीं आई।

रिपोर्टों के अनुसार, बदमाशों की पहचान महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के सदस्यों के रूप में की गई है। समझा जाता है कि मनसे-वहाटुक सेना (ट्रांसपोर्ट विंग) के करीब आधा दर्जन कार्यकर्ता आधी रात से थोड़ा पहले बस के पास जमा हो गए और बस के आगे अपनी माँगों के पोस्टर चिपकाए और नारेबाजी करते नजर आए।

बस कॉन्ट्रैक्ट को लेकर बवाल

मनसे कार्यकर्ताओं के इस हमले के पीछे दिल्ली की एक कंपनी को आईपीएल की टीमों द्वारा कॉन्ट्रैक्ट दिए जाने को कारण बताया जा रहा है, जबकि मनसे की माँग थी कि ट्रांसपोर्ट का कॉन्ट्रैक्ट महाराष्ट्र की किसी भी कंपनी को दिया जाए। हालाँकि, जब ऐसा नहीं हुआ तो इससे नाराज मनसे के लोगों ने बस में तोड़फोड़ की। इन्होंने बस में अपनी माँगों के पोस्टर भी चिपकाए और नारेबाजी भी की।

उल्लेखनीय है कि आईपीएल में दिल्ली कैपिटल्स का पहला मुकाबला 27 मार्च को मुंबई इंडियंस के खिलाफ होगा। आईपीएल के कुल मैचों की बात की जाए तो इस सीजन में 65 से 70 मैच खेले जाएँगे। केवल मुंबई के ही अलग-अलग स्टेडियम में कुल 55 मैच खेले जाएँगे।

सपा गई हार तो देवेंद्र यादव ने सिर में गोली मार कर ली आत्महत्या, पत्नी और तीन बच्चों को छोड़ गया बेसहारा

हरदोई के बीलग्राम तहसील स्थित माधोगंज में देवेंद्र यादव बबलू नाम के समाजवादी पार्टी कार्यकर्ता ने उत्तर प्रदेश में अपनी पार्टी की हार के बाद आत्महत्या कर ली है। 40 वर्षीय सपा कार्यकर्ता ने मंगलवार (15 मार्च, 2022) को अपने सिर में गोली मार कर आत्महत्या कर ली। उनके परिवार का कहना है कि वो पार्टी की हार के बाद काफी परेशान चल रहे थे और स्थानीय लोगों ने उनका मज़ाक भी बनाया था। पुलिस ने शव का पोस्टमॉर्टम करने के बाद परिवार को सौंप दिया

हरदोई में समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष और पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता जीतेन्द्र वर्मा जीतू पटेल ने सोशल मीडिया पर इसकी जानकारी देते हुए लिखा, “समाजवादी पार्टी की हार से दुखी होकर माधोगंज निवासी देवेन्द्र सिंह यादव बबलू जी ने स्वयं को गोली मारकर आत्महत्या कर ली। समाजवादी पार्टी देवेन्द्र यादव जी के योगदान को हमेशा याद रखेगी। विनम्र श्रद्धांजलि।” लोगों ने उनसे पूछा कि क्या सपा का कोई बड़ा नेता परिवार से मिलने गया है?

बताया जा रहा है कि देवेंद्र यादव बबलू ने अपने गाँव में अपनी पार्टी के प्रत्याशी को सर्वाधिक वोट दिलाने की जिम्मेदारी ली थी, लेकिन वो ऐसा करने में सफल नहीं हो पाए थे। जब उन्होंने देशी पिस्तौल से आत्महत्या की, तब वो अपने घर की दूसरी मंजिल पर एक कमरे में अकेले थे। उनके परिवार में उनकी पत्नी संगीता के अलावा तीन बच्चे भी हैं। स्थानीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में उन्हें ले जाया गया था, जहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।

बता दें कि 10 मार्च, 2022 को उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के परिणाम आए थे। 7 चरणों में हुए चुनाव में भाजपा ने सर्वाधिक 255 सीटें अपने नाम की, जिसके बाद योगी आदित्यनाथ का फिर से मुख्यमंत्री बनना तय हो गया। भाजपा की सहयोगी ‘निषाद पार्टी’ को 6 और ‘अपना दल (सोनेलाल)’ को 12 सीटें प्राप्त हुईं। वहीं सपा मात्र 111 सीटों पर सिमट गई और उसकी सहयोगी ‘राष्ट्रीय लोकदल (RLD)’ को 8 और SBSP को 6 सीटें आईं।

66 साल के सर्वानंद कौल ‘कुरान’ साथ रखते थे फिर भी बेटे के साथ हत्या कर पेड़ से टाँग दिया, जहाँ लगाते थे तिलक वहाँ की चमड़ी छील दी

‘द कश्मीर फाइल्स’ ने उन तमाम भयावह कहानियों को एक बार फिर से स्वर दिया है, जिसे कश्मीर में हिंदुओं ने भोगा था। इनमें से एक कहानी सर्वानंद कौल ‘प्रेमी’ की भी है। 66 साल के कौल को इस्लामी आतंकियों ने उनके 27 साल के बेटे के साथ मार डाला था। पेड़ से टँगी लाश मिली थी। तिलक करने की जगह को छील कर चमड़ी हटा दी गई थी। पूरे शरीर पर सिगरेट से जलाने के निशान थे। हड्डियाँ तोड़ दी गई थी। पिता-पुत्र की आँखें निकाल ली गई थी। दोनों को फँदे से लटकाने के बाद मृत्यु सुनिश्चित करने के लिए गोली भी मारी गई थी। पिता-पुत्र की लाश 1 मई 1990 को मिली थी। अब कश्मीरी पंडित इस तारीख को ‘शहीदी दिवस’ या ‘शहादत दिवस’ के रूप में मनाते हैं।

कौन थे सर्वानंद कौल ‘प्रेमी’

सर्वानंद कौल उन कश्मीरी हिंदुओं में से थे, जिन्हें 19 जनवरी 1990 की तारीख भी नहीं डरा पाई थी। जब सब हिंदू जान बचाकर भाग रहे थे, तब उन्होंने कश्मीर में ही रहने का फैसला किया। उन्हें यकीन था कि उनकी समाज में जो ‘साख’ है, उसके कारण कोई भी उनके परिवार को नहीं छू सकता। वे कवि थे। अनुवादक थे। लेखक थे। इतने मशहूर थे कि कश्मीरी शायर महजूर ने उन्हें ‘प्रेमी’ उपनाम दिया था। दो दर्जन से अधिक किताबें लिखी थी। ‘भगवद गीता’, ‘रामायण’ और रवींद्रनाथ टैगोर की ‘गीतांजलि’ का कश्मीरी में अनुवाद किया था। बताते हैं कि संस्कृत, फ़ारसी, हिंदी, अंग्रेजी, कश्मीरी और उर्दू पर उनकी एक जैसी पकड़ थी। ‘सेकुलर’ इतने थे कि उनके पूजा घर में कुरान भी रखी हुई थी।

जब सर्वानंद कौल के घर पहुँचे ‘सेकुलर’ आतंकी

अप्रैल 1990 खत्म होने को था। एक रात तीन ‘सेकुलर’ आतंकियों ने कौल के दरवाजे पर दस्तक दी। परिवार को एक जगह बिठाया और कहा कि सारे गहने-जेवर एक खाली सूटकेस में रख दे। कौल से कहा कि वे सूटकेस लेकर उनके साथ आएँ। घरवाले जब रोने लगे तो उन्होंने कहा, “अरे! हम प्रेमी जी को कोई नुकसान नहीं पहुँचाएँगे। हम उन्हें वापस भेज देंगे।” 27 साल के बेटे वीरेन्द्र ने कहा कि पिता को अँधेरे में वापसी में समस्या होगी, तो वे साथ जाना चाहते हैं। आतंकियों ने कहा, “आ जाओ, अगर तुम्हारी भी यही इच्छा है तो!” दो दिन बाद दोनों की लाशें मिलीं थी। किस हालत में मिली थी, यह आप ऊपर पढ़ ही चुके हैं।

‘हमने कभी नहीं सोचा था कि हमें टारगेट किया जाएगा’

सालों बाद सर्वानन्द कौल के बड़े बेटे राजिंदर कौल ने उस घटना के बारे में इंडिया टुडे को बताया था। जिस रात आतंकी कौल और उनके बेटे को ले गए थे काफी बारिश हो रही थी। राजिंदर ने बताया था, “हमने कभी नहीं सोचा था कि हमें टारगेट किया जाएगा। उम्मीद की थी कि दोनों (पिता और भाई) जल्द ही लौट आएँगे। मगर उनके शव मिले थे। मेरा भाई केवल 27 वर्ष का था, हाल ही में उसकी शादी हुई थी और उसका एक छोटा बच्चा था।”

‘मुस्लिम खुद कहते थे- बाल-बाँका नहीं होने देंगे’

राजिंदर के अनुसार जिस दिन उनके पिता और भाई की लाश मिली थी, उस दिन विश्वास और भाईचारे के तमाम पुल बह गए थे। जो भी बचे हुए कश्मीरी पंडित थे उन्होंने भी घाटी छोड़ दिया। 5 मई को सर्वानंद कौल के परिवार में जो बच गए थे वे भी कश्मीर से निकल गए और फिर लौटकर भी वहाँ न गए। राजिंदर ने बताया था, “मेरे पिता और परिवार की क्षेत्र में बहुत ज्यादा इज्जत थी। स्थानीय मुस्लिम खुद कहते थे- वे हमारा बाल-बाँका नहीं होने देंगे।”

समलैंगिक Dating App से दोस्ती करते मेराज और जीशान, मिलने के बहाने लूट लेते: UP पुलिस से एनकाउंटर में एक को लगी गोली, दूसरा फरार

उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में पुलिस ने बुधवार (16 मार्च) को एक एनकाउंटर (Encounter) में शातिर अपराधी मेराज अहमद को गिरफ्तार कर लिया है। गोली मेराज के पैर में लगी और घायल होने के बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने उसके पास से मोटरसाइकिल और तमंचा भी बरामद किया है। मेराज समलैंगिक डेटिंग ऐप (Homosexual Dating App) के जरिए लड़कों के दोस्ती करता था और मिलने के बहाने बुलाकर उनसे लूटपाट करता था। इस दौरान उसका साथी अंधेरे का फायदा उठाकर भागने में सफल रहा।

आजमगढ़ जिले के महराजगंज थाना प्रभारी हिरेन्द्र प्रताप सिंह मंगलवार (15 मार्च) को रघुपुर बैरियर पर चेकिंग कर रहे थे। इसी रात करीब एक बजे बिलरियागंज की ओर से एक बाइक पर सवार होकर दो लोग आ रहे थे। जब पुलिस ने दोनों को रुकने का इशारा किया तो बाइक पर बैठा व्यक्ति पुलिस पर फायर कर भागने लगा।

इसके बाद थाना प्रभारी ने कंट्रोल रूम को जानकारी दी और परशुरामपुर नहर पुलिया के पास पुलिस ने दोनों को घेर लिया। इस दौरान जवाबी कार्रवाई में मेराज के पैर में गोली और वह बाइक से गिर गया। वहीं, उसका साथी जीशान अंधेरे का फायदा उठाकर भागने में सफल रहा। पुलिस ने मेराज के पास से लूट की मोटरसाइकिल, तमंचा एवं कारतूस और आठ मोबाइल बरामद किया गया है।

आजमगढ़ के SP अनुराग आर्य ने बताया कि पूछताछ के दौरान आरोपित ने बताया कि वह अपने गिरोह के सदस्यों के साथ रात में लूट-पाट की घटनाओं को अंजाम देता था। इसके लिए इसका गैंग समलैंगिक डेटिंग ऐप Blued App ब्लूड एप का इस्तेमाल करता था। इसके जरिए वे लोगों से संपर्क करते थे और मिलने के लिए सुनसान जगह पर बुलाते थे। उसके बाद उनका मोबाइल और पैसा छीन लेते थे।

SP आर्य ने आगे बताया कि आरोपितों ने स्वीकार किया कि वे नवंबर 2021 में दानिश के साथ मिलकर मऊ जिले में भी लूटपाट की थी। पिछले तीन महीने में इस गिरोह द्वारा लगभग दो दर्जन से अधिक लोगों को लूटा गया है। आरोपितों ने बताया कि पीड़ित व्यक्ति लाज के कारण पुलिस को इस बारे में जानकारी नहीं देता था।

पुलिस ने बताया कि इन लोगों की लूटपाट से जुड़ी एक सूचना 6 फरवरी को महराजगंज थाने को मिली थी। इसमें कहा गया था कि अज्ञात बदमाशों ने युवक से बाइक और उसका फोन लूट लिया है। इस मामले में मुकदमा दायर कर लिया गया था। मेराज ने पुलिस को बताया कि वह अब तक 25 लोगों के साथ लूट की घटना को अंजाम दे चुका है।

घायल मेराज को इलाज के लिए जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है। मेराज अहमद जमीलपुर का निवासी है और उसके अब्बा का मोहम्मद आजम है। उस पर चार मुकदमे दर्ज हैं। उसने पुलिस को बताया कि उसके गैंग में जमीलपुर के ही मोहम्मद दानिश व जीशान शामिल हैं। दानिश के अब्बा का नाम अब्दुल सलाम और जीशान के अब्बा का नाम इश्तियाक है।

‘फ्लैट बेचो, नहीं तो भुगतना होगा अंजाम’: मुस्लिमों की भीड़ ने सात्विक सोसाइटी में घुसकर हिन्दुओं को धमकाया, गुजरात के गृहमंत्री ने किया घटना से इनकार

भावनगर के मोखडजी सर्कल क्षेत्र में सात्विक हाउसिंग कॉम्प्लेक्स में रहने वाले लगभग 15 फ्लैट मालिकों को उनके घर बेचने की धमकी दी गई है। रिपोर्टों के अनुसार, पिछले हफ्ते, 100-150 मुस्लिमों की भीड़ ने सोसायटी में घुसकर और कुछ फ्लैट मालिकों को अपने फ्लैट बेचने के लिए मजबूर करने के लिए धमकी दी।

राजाराम अवेदा के सामने सात्विक कॉम्प्लेक्स के निवासियों ने आरोप लगाया है कि रात में 100-150 मुस्लिमों की भीड़ ने उन्हें अपने फ्लैट बेचने और यहाँ से न हटने पर परिणाम भुगतने की धमकी देने के लिए कॉम्प्लेक्स में घुस आई थी। भीड़ ने कथित तौर पर वहाँ के निवासियों को धमकी दी कि वे सभी के बारे में सब कुछ जानते हैं और अगर वे अपने घर बेचने के लिए तैयार नहीं हैं तो उन्हें इसकी कीमत चुकानी होगी। जैसा कि देशगुजरात द्वारा रिपोर्ट में बताया गया है।

कुछ के अनुसार, आसपास के एक आवासीय योजना जो निर्माणाधीन है, ने केवल मुस्लिम मालिकों से बुकिंग ली है। बल्कि योजना के लिए अनुमोदन भी इन निवासियों के अधीन ही है। कुछ निवासियों ने स्थानीय भाजपा नेता की मदद से अपने फ्लैट बेचने के लिए मालिकों के बीच मध्यस्थता करने की कोशिश करने का आरोप लगाया है। कथित तौर पर, उन्होंने कुछ निवासियों से कहा है कि यह एक बड़ा सौदा है और उन्हें उन फ्लैटों के लिए इतनी ऊँची कीमत कभी नहीं मिलेगी जो उन्हें दी जा रही हैं। उन्होंने निवासियों से कहा है कि सोसाइटी के बगल में आवासीय योजना में मुसलमानों के रहने के बाद उनका जीवन और कठिन हो जाएगा, जिसकाअभी निर्माण कार्य चल रहा है।

वहीं बार-बार मिल रही धमकियों के कारण सात्विक परिसर में फ्लैट मालिकों के लिए शांति से रहना मुश्किल हो गया है। कुछ संगठनों ने अधिकारियों से शहर में सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने के लिए अशांति अधिनियम को लागू करने की भी माँग की है।

भावनगर में अशांत क्षेत्र अधिनियम

दिव्य भास्कर की एक रिपोर्ट बताती है कि भावनगर में सांप्रदायिक सद्भाव और शांति बनाए रखने के लिए अशांत क्षेत्र अधिनियम के तहत कुछ क्षेत्रों को अधिसूचित करने का प्रस्ताव रखा गया था। हालाँकि, स्थानीय निवासियों का आरोप है कि स्थानीय भाजपा विधायक की निष्क्रियता के कारण उनकी फाइल अटकी हुई है।

विधायकों के सुझावों और टिप्पणियों के साथ एक फाइल जिला कलेक्टर को बहुत पहले भेज दी गई है। हालाँकि, कुछ लोगों का ऐसा भी कहना है कि विधायकों ने अभी तक फाइल को उच्च अधिकारियों को आगे नहीं भेजा है।

ऑपइंडिया ने पहले अशांत क्षेत्र अधिनियम पर एक बड़ी रिपोर्ट किया था और कुछ हिंदू बहुल क्षेत्रों के कुछ निवासियों को जनसांख्यिकी परिवर्तन के कारण अपना इलाका छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था जिससे उन्हें खतरा था।

क्या है अशांत क्षेत्र अधिनियम

गुजरात के कुछ रिहायशी इलाकों में सांप्रदायिक सद्भाव और शांति बनाए रखने और जनसांख्यिकी परिवर्तन के कारण समुदायों के ध्रुवीकरण को रोकने के लिए अशांत क्षेत्र अधिनियम लागू किया गया था। अशांत क्षेत्र अधिनियम लागू होने के बाद इन क्षेत्रों की भूमि और अन्य अचल संपत्तियों के मालिकों को अपनी संपत्ति को बेचने से पहले कलेक्टर की अनुमति लेना जरूरी है।

जिला प्रशासन सांप्रदायिक सद्भाव और शांति बनाए रखने के लिए एक निश्चित क्षेत्र को ‘अशांत क्षेत्र’ घोषित कर सकता है, जो जनसांख्यिकी परिवर्तन के प्रति अतिसंवेदनशील हैं। इन क्षेत्रों में अचल संपत्ति के हस्तांतरण के लिए एक विस्तृत प्रक्रिया की आवश्यकता होती है। विक्रेता को आवेदन में यह उल्लेख करना होगा कि वह अपनी मर्जी से संपत्ति बेच रहा है।

अशांत क्षेत्र अधिनियम एक विशेष थाना क्षेत्र में लागू किया जाता है। जिला कलेक्टर ने पुलिस आयुक्त से सांप्रदायिक सद्भाव और समुदायों के ध्रुवीकरण की कोई शिकायत होने पर पूछताछ करता है। इसके बाद पुलिस आयुक्त अपने अधिकार क्षेत्र के सभी पुलिस थानों से इस बारे में पूछताछ करेंगे। सूचना प्राप्त होने पर, वह जिला कलेक्टर को सूचित करता है, जो तब एक विशेष क्षेत्र (विशेष पुलिस स्टेशन के अधिकार क्षेत्र के तहत क्षेत्र) को पाँच साल की अवधि के लिए अशांत क्षेत्र घोषित करेगा जिसे बाद में आगे बढ़ाया जा सकता है।

अपडेट: गुजरात के गृह मंत्री हर्ष सांघवी ने ऐसी किसी भी घटना से इनकार किया है। मंत्री ने कहा है कि मुस्लिम भीड़ द्वारा हिंदुओं को क्षेत्र छोड़ने के लिए कहने का दावा झूठा है और ऐसी कोई घटना नहीं हुई है।

वो मराठा जो काशी के ज्ञानवापी मस्जिद को ध्वस्त कर बनाना चाहते थे शिव मंदिर, महिलाओं को दिए अधिकार: चरवाहा परिवार से मालवा के सूबेदार तक

साल था 1721 और ऋतु थी वसंत। पेशवा को खानदेश के सुल्तानपुर में तैनात स्थानीय सैन्य बटालियन के एक पैदल सैनिक का पत्र मिला। ये पत्र था मल्हार राव होल्कर का। वहाँ गणपति फ्रेस्को के पीछे की तरफ एक शानदार गद्दी पर 21 साल के बाजीराव बैठे थे, जो कि अपने दिवंगत पिता, प्रधानमंत्री या मराठा साम्राज्य के पेशवा के पद को भरने के लिए दावेदार थे। छत्रपति शिवाजी महाराज के पोते साहूजी के तीस साल के मराठा-मुगल युद्ध के बाद स्वराज्य को एक बार फिर से बहाल किया गया था, जिसके बाद वो सातारा की गद्दी पर बैठ के छत्रपति बने थे।

अपनी युवावस्था में ही पेशवा बाजीराव ने अपने उद्देश्यों को स्पष्ट कर दिया था, दिल्ली में अगर मुगल साम्राज्य का जड़ पर वार किया जाए तो उसकी शाखाएँ अपने हाथों में आ जाएँगी।” वो पत्र जब बाजीराव के पास पहुँचा तो उसे पढ़कर उन्हें एक दृढ़ निश्चयी कमांडर की याद आ गई, जो एक बैंड का नेतृत्व कर रहा था। उसका उन्होंने अपने खानदेश के ऑपरेशन के दौरान सामना किया था। वो जानते थे कि जिस युवा ‘मल्हारी’ ने अपनी सीमाएँ पार की हैं, उसे जीवन भर के लिए उनकी ताकत बनना था। उस दिन मल्हार राव होल्कर ने बाजीराव को अपनी बटालियन में नियुक्ति के लिए पत्र लिखकर हमेशा के लिए अपना भाग्य बदल दिया था।

मल्हार राव होल्कर का मूल पत्र जिसमें बाजीराव की सहायक अंबाजी पंत को घुड़सवार सेना में प्रवेश के लिए कहा गया था

दक्कन और मराठों के दिल्ली के जगमगाते सपनों के बीच मालवा का पठार विंध्य से चित्तौड़गढ़ और पश्चिम में भोपाल से गुजरात तक फैला हुआ था। इसके भूभाग और इसके जंगलों की एल्केमी व उफनती रेवा, नर्मदा और चंबल नदियों तक मराठा साम्राज्य का युद्धक्षेत्र फैला हुआ था। पेशवा बाजीराव प्रथम के नेतृत्व में उनकी सेना में रानोजी शिंदे, उदाजी पवार और मल्हार राव होल्कर जनरलों ने पहले ही मालवा क्षेत्र में अपने लिए एक मजबूत जमीन तैयार कर ली थी।

मल्हार राव होल्कर जैसे सेनापतियों के नेतृत्व में लगातार कई युद्धों के साथ ही 1729 का मानसून आते-आते मराठा साम्राज्य यमुना नदी के तट तक पहुँच गया था। जिन भी नए क्षेत्रों पर मराठा साम्राज्य का कब्जा हुआ, उसमें से मालवा का पश्चिमी भाग शासन करने के लिए मल्हार राव होल्कर को दे दिया गया। इसके लिए उन्हें हजारों की संख्या में घुड़सवार भी दिए गए। ये वो वक्त था, जब मल्हार राव ने गौतमबाई से शादी कर ली थी। इसके बाद उन्होंने इंदौर (मध्य प्रदेश) के एक छोटे से कस्बे को अपना अड्डा बनाया और वो बाद में होल्कर साम्राज्य का गढ़ बन गया।

1730 के दशक में मल्हार राव होल्कर द्वारा निर्मित रजवाड़ा या होल्करों का आधिकारिक निवास (1857 की चित्रकारी)

बता दें कि मालवा के नए प्रशासक बने मल्हार राव होल्कर ‘धनगढ़’ के चरवाहा परिवार से ताल्लुक रखते थे। ये पशु-पालन करने वाली जाति थी और इसमें एक परंपरा चलती थी कि धनगढ़ में परिवार की कुल संपत्ति का एक चौथाई हिस्सा महिलाओं को उनकी निजी संपत्ति के तौर पर दे दिया जाता था। मल्हार राव होल्कर मराठा सम्राज्य के सूबेदार थे और उन्होंने इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए जनवरी 1734 में पेशवाओं से मिले धन (सरंजम) को दो भागों में बाँटने का फैसला किया। इसमें से पहला हिस्सा दौलत (कमाई) औऱ दूसरा खज्जी (महिलाओं की निजी संपत्ति) थी। मल्हार राव होल्कर ने कुल संपत्ति का एक चौथाई हिस्सा अपनी तीनों पत्नियों गौतमबाई, द्वारकाबाई और बानाबाई को सम्मान स्वरूप दे दिया।

इस नेक परंपरा के तहत पेशवा ने गौतमबाई होल्कर को मालवा में महेश्वर, सांवेर और देपालपुर का क्षेत्र और महाराष्ट्र का चंदवाड़, अंबाद और कोरेगाँव के गाँवों को दिया। इन सभी क्षेत्रों से कुल मिलाकर 3 लाख रुपए का राजस्व प्राप्त होता था। देखा जा सकता था कि होल्कर महिलाओं ने इस आय का इस्तेमाल मंदिरों के बुनियादी ढाँचे, वाराणसी, सोमंत और रामेश्वरम तक घाटों का निर्माण करने के लिए किया। दरअसल, मल्हार राव अपनी पत्नियों को उनका अधिकार हर कीमत पर देना चाहते थे। इसी बीच मल्हार राव ने राजपूत वंश से ताल्लुक रखने वाली हरकू बाई से शादी की। ये उनकी चौथी पत्नी थीं। मल्हार राव ने उन्हें भी वो सभी अधिकार दिए जो बाकियों को दिए गए थे।

अहिल्याबाई का मार्गदर्शन

होल्कर वंश की सबसे अधिक प्रसिद्ध रानियों में अहिल्याबाई का नाम लिया जाता रहा है। उन्हें भारतीय इतिहास में उस पवित्र रानी के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने मंदिरों का संरक्षण और उनका जीर्णोद्धार किया। 1733 में वो मल्हारराव की पहली पत्नी गौतमबाई के बेटे खांडेराव की पत्नी बनीं। किवदंती है कि मल्हार राव जब पुणे के दौरे पर गए थे तो उसी दौरान उन्होंने 8 साल की अहिल्या को शिव मंदिर में पूजा करते देखा था। उसी दौरान उन्होंने अहिल्या को अपनी पुत्रवधू बनाने का फैसला किया था। बाद में जब अहिल्या की शादी खांडेराव से हुई तो मल्हार राव ने उन्हें शाही निवास में हो रहे कुछ प्रशासनिक कार्यों की देखरेख का जिम्मा दिया।

जल्द ही अहिल्याबाई ने पत्राचार के जरिए पारित किए जाने वाले पत्रों पर नजर रखनी शुरू की। एक साल के भीतर ही वो पति खांडेराव के साथ सामरिक क्षेत्रों में जाने लगीं और वहाँ उन्होंने युद्ध क्षेत्र में होने वाली घटनाओं को करीब से समझा। मल्हार राव की ही तरह उनकी सास गौतमबाई ने भी उन्हें उस वक्त की राजनीति का ज्ञान दिया। घर के मुखिया के नेतृत्व में अहिल्या दिन पर दिन बढ़ रही थीं, उन्हें उस वक्त की अलग-अलग योजनाओं के बारे में पता चला।

इस बीच 1754 में मराठा सेना ने कुम्भेरी में सूरजमल जाट के किले का घेराव किया। उसी दौरान तोप का एक गोला खांडेर राव के ऊपर गिरा और वो उनकी मृत्यु हो गई। पति की मृत्यु के बाद अहिल्या उनकी चिता में सती होने जा रही थीं, लेकिन ससुर मल्हार राव ने उनकी पीठ पर हाथ रखा और उन्हें ऐसा करने से रोका। उन्होंने अहिल्याबाई में कल की आशा को देखा। दरअसल, उन्होंने (अहिल्या बाई) अपनी सह-पत्नियों पार्वतीबाई और सूरतबाई को दो नर्तकियों और खांडेर राव की सात अन्य महिलाओं को शाम के समय चिता में सती होते देखा था।

उस दौरान अहिल्याबाई केवल 29 वर्ष की थीं। उनके पास राज्य के लोगों की देखभाल करने के लिए उनके ससुर थे। यही उनके लिए उपयुक्त समय था कि वो आगे आएँ। जब उनके ससुर मल्हार राव कर वसूलने के लिए ग्रामीण इलाकों में गए तो उन्होंने पड़ोसी राज्यों से भी मुलाकात की। ससुर की अनुपस्थिति में अहिल्याबाई राजधानी में सारे कामकाज देखती थीं। वित्तीय लेनदेन से जुड़े बही-खातों की जाँच करने, राजकीय पत्राचार और राजकाज से जुड़े अन्य मुद्दों का समाधान करने में सक्षम थीं।

आलमपुर में मल्हार राव होल्कर की समृति में अहिल्या बाई द्वारा बनवाई गई छतरी

मल्हार राव ने अहिल्याबाई को एक पत्र लिखा था, जो कि इस बात के प्रमाण हैं कि किस तरह से उन्होंने अहिल्या में एक बेटी, संरक्षक और अपनी विरासत को आगे बढ़ाने वाली के तौर पर देखा। 1766 में मल्हार राव की मृत्यु हो गई, जिसके बाद अहिल्याबाई ने उनकी स्मृति में आलमपुर में एक छतरी का निर्माण कराया। अहिल्याबाई को ये पता था कि मल्हार राव का नाम उनके कुल देवता मल्हारी मार्तंड या जेजुरी के खंडोबा के नाम पर रखा गया था, जिन्हें भगवान शिव का ही रूप माना जाता था। इसी को ध्यान में रखते हुए उन्होंने कई स्थानों पर मल्हारेश्वर और मार्तंडेश्वर नाम से कई शिव मंदिरों का निर्माण करवाया। यहीं नहीं, मल्हार राव की खज्जी परंपरा को देखते हुए अहिल्याबाई ने बाद में अपने निजी खर्च से मंदिरों, तीर्थ स्थलों, कुओं, घाटों और विश्राम गृहों के पुनर्निर्माण और संरक्षण किया।

मराठा साम्राज्य के प्रतीक

1740 में बाजीराव की मौत के बाद मल्हार राव ने अपने 17वीं सदी के 60 के दशक में मराठा राजनीति के साथ ही समूचे हिंदुस्तान में एक अनुभवी सेनापति का सम्मान हासिल किया। इसे इस तरह समझा जा सकता है कि राजपूताना राज्यों में उनकी पकड़ काफी मजबूत थी और उन्हें माधो सिंह और ईश्वरी सिंह के बीच विवाद सुलझाने के लिए अक्सर जयपुर बुलाया जाता था। 1757 में वो रघुनाथ राव के साथ अटक के अभियान पर गए और वहाँ दिल्ली को अपना बेस बनाकर उन्होंने 1758 में सरहिंद पर कब्जा कर लिया। पानीपत की तीसरी लड़ाई के दौरान मध्य भारत के राजाओं के साथ गठबंधन पर हस्ताक्षर करने में उनकी भूमिका कूटनीतिक इतिहास में दर्ज है।

18वीं शताब्दी में भारत में मराठा साम्राज्य

18 जून, 1751 का वो वक्त था, जब पेशवा नाना साहेब को एक पत्र मिलता है, उसमें वाराणसी स्थित ज्ञानवापी मस्जिद को हटाकर वहाँ पर पहले से स्थापित प्राचीन काशी विश्वनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए मल्हार राव के संकल्प का उल्लेख किया गया था। पत्र में लिखा था, “मल्हार राव ने दोआब क्षेत्र में अपना मानसून शिविर लगाया है और वो औरंगजेब द्वारा बनाई गई ज्ञानवापी मस्जिद को ढहाकर काशी विश्वेश्वर के मूल मंदिर का पुनर्निर्माण करना चाहते हैं।” पत्र को पढ़ने के बाद पेशवा नानासाहेब को ने इस बात को महसूस किया कि इस क्षेत्र में मराठों का प्रत्यक्ष नियंत्रण नहीं है, ऐसे में मस्जिद को ढहाने का अर्थ ये है कि अवध के नवाब हिन्दुओं को और प्रताड़ित करने लगेंगे। ऐसे में उन्होंने संयम बरतने का आदेश दिया। बाद में 1780 में अहिल्याबाई ने मस्जिद के किनारे पर नया काशी विश्वनाथ मंदिर बनवाया और वहाँ पर फिर भगवान शिव की पूजा शुरू की।

1780 में अहिल्याबाई होल्कर द्वारा काशी विश्वनाथ पुनर्निमाण कराया गया

मल्हार राव के लंबे शासन के कारण उन्हें मध्य भारत के वास्तुकार के तौर पर भी जाना जाता है। उन्होंने पेशवा बाजीराव के सपने और शिवाजी महाराज के स्वराज्य को एक साम्राज्य के तौर पर साकार करने में अहम भूमिका निभाई। मल्हार राव नारीवादी या पितृसत्तात्मक के तौर पर दो आधार पर मूल्यांकन से परे वो अपने पूरे जीवन में महिला सशक्तिकरण के प्रतीक बने रहे। यहीं नहीं उन्होंने अपनी अंतिम साँस तक पेशवाओं की सेवा की और मराठा साम्राज्य के दौरान बहुत प्रभाव छोड़ने वाले शासकों में अपना स्थान सुनिश्चित किया।

‘हम चेहरे पर भभूत नहीं मलते… मुमकिन है UP छोड़ भी दूँ’: मुनव्वर राना ने अपने घर रहने का न्योता देने वाले भोपाली को बताया ‘बेवकूफ’

पलटीबाज विवादित शायर मुनव्वर राना (Munawwar Rana) ने एक बार फिर कहा है कि वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Yogi Aditynath) की दोबारा जीत पर वह यूपी छोड़ भी सकते हैं और यह उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं है। राना ने कहा कि उन्हें भोपाल में बसने का ऑफर देने वाले शायर मंजर भोपाली बेवकूफ हैं और वह मशहूर होना चाहते हैं।

दैनिक भास्कर से बातचीत में राना ने कहा कि सीएम योगी के दोबारा जीतने पर यूपी छोड़ने की बात उन्होंने AIMIM के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के संदर्भ में कही थी। मुनव्वर ने कहा कि उन्होंने कहा था कि अगर ओवैसी की बेवकूफी के कारण यूपी में योगी सरकार की वापसी होती है तो वे यूपी छोड़ देंगे। उन्होंने आगे कहा, “मुमकिन है यूपी छोड़ भी दूँ। कोई मुश्किल नहीं है मेरे लिए।”

मुनव्वर यहीं नहीं रूके। उन्होंने अपने बेटे पर पुलिस कार्रवाई का एक बार फिर रोना रोया। मुनव्वर ने कहा, मेरे बेटे के खिलाफ एक FIR हुई। उसके बाद पुलिस का जो एटीट्यूड था, उससे हमारी छवि बना दी गई, जैसे कि हम काेई माफिया डॉन हों। 50-50 आदमी मेरे घर में रेड कर रहे हैं।” उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ भी FIR हुई तो वे बोले कि अब यहाँ से चले जाना चाहिए।

शायर मंजर भोपाली द्वारा यूपी छोड़ने के बाद भोपाल में बसने के निमंत्रण देने के सवाल पर मुनव्वर ने कहा कि भोपाली बेवकूफ हैं। उन्होंने कहा, “मंजर भोपाली मशहूर होने की कोशिश करते हैं, लेकिन वो मशहूर हो नहीं पाते। मामूली से शायर हैं। बड़े बनना चाहते हैं। बड़ा बनने के लिए आदमी को बेवकूफ नहीं होना चाहिए।”

सीएम योगी की दोबारा जीत पर बुझे दिल से मुबारकबाद देते हुए मुनव्वर ने कहा, “तुम जीत गए, हम हार गए। तुमने पाया, हमने खोया।। छोटी-छोटी बातों का हम कोई मलाल नहीं करते। हम जो कुछ हैं, जैसे हैं, वैसे ही दिखाई देते हैं।। चेहरे पर भभूत नहीं मलते। कभी काले बाल नहीं करते।।”

फरवरी में यूपी चुनावों के दौरान मुनव्वर ने विक्टिम कार्ड खेलते हुए खुद को निरीह दिखाने की कोशिश की थी। उन्होंने कहा था, “इस प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शेर हैं, वह दहाड़ रहे हैं। मैं तो एक कबूतर की तरह हूँ, मेरी कौन सुनेगा? हम जैसी चिड़ियों की आवाज कहाँ सुनाई देगी? जंगल में एक चिड़िया की हैसियत क्या है?”

चुनावों के दौरान मुनव्वर की बेटी उरूसा ने अपने अब्बा की तरह ही योगी सरकार के खिलाफ जहर उगला था। उत्तर प्रदेश की पुरुवा विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस प्रत्याशी उरुसा ने अपने अब्बा के यूपी छोड़ने के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था, “मेरे अब्बा नहीं, बल्कि योगी आदित्यनाथ लखनऊ छोड़कर गोरखपुर जाएँगे।”

बता दें कि तालिबान से हमदर्दी और भाजपा से दिल की अनंत गहराइयों से नफरत करने वाले मुनव्वर राना ने उत्तर प्रदेश विधानसभा (Uttar Pradesh Assembly Election) के लिए होने वाली वोटिंग से पहले एक बार फिर पलायन का राग अलापा था। उन्होंने कहा था कि अगर प्रदेश में फिर से योगी आदित्यनाथ की सरकार बन जाती है तो वे पलायन कर जाएँगे।

मुनव्वर ने कहा था, “मैं पहले ही कह चुका हूँ कि अगर योगी आएगा तो मैं पलायन कर दूँगा। इस बात को स्पष्ट तौर पर नोट कर लिया जाए।” उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के कारण मुस्लिमों में इतना खौफ है कि कोई बोल नहीं रहा है। उन्होंने कहा, “मुस्लिमों ने अपने घरों में छुरी रखना तक बंद कर दिया कि पता नहीं योगी उनको बंद करवा दे।”

‘लड़कियों को इम्प्रेस करने के लिए शुरू किया था क्रिकेट खेलना’: तन्मय भट्ट की ‘Pakistanis Are Savage’ में शोएब अख्तर

पाकिस्तान के पूर्व तेज गेंजबाज शोएब अख्तर ने हाल ही में कॉमेडियन और व्लॉगर तन्मय भट्ट के यूट्यूब सीरीज में ‘Pakistanis are savage’ हिस्सा लिया। इसमें उन्होंने क्रिकेट को लेकर कई सारी बातें कहीं। इसी दौरान शोएब ने खुलासा किया कि उन्होंने क्रिकेट लड़कियों को इम्प्रेस करने के लिए बॉलिंग करना शुरू किया था।

शो में मीम्स को लेकर बातें हो रही थी। इसी सिलसिले में जब भट्ट ने अख्तर से पूछा कि क्या उनकी स्कूल में पढ़ाई-लिखाई सही होती थी? इस पर उन्होंने कहा कि वो बहुत ही मेधावी छात्र थे। इसके साथ ही वह शरारती भी थे।

उन्होंने कहा, “मैंने लड़कियों के लिए क्रिकेट स्टार्ट की थी। हमारे यहाँ लड़कियों का ब्लॉक होता था। मैंने उनको इम्प्रेस करने के लिए बॉलिंग स्टार्ट की थी। वो खड़ी होकर देखती थी कि बहुत फास्ट बॉलिंग करता है। मैं लोकल स्टार बन गया था। लेकिन जब मैं मोटरसाइकल पर आने लगा तो मुझे अटेंशन नहीं मिला। इसके बाद मैंने महसूस किया कि मुझे इस खेल में आगे जाना चाहिए।” इस बातचीत को आप वीडियो में 7:35 से 8:30 के बीच सुन सकते हैं।

गौरतलब है कि पिछले दिनों विराट कोहली के भारतीय कप्तान पद से इस्तीफा देने के बाद शोएब अख्तर ने उन्हें लॉबी का शिकार बताया था। उन्होंने कहा था कि विराट ने कप्तानी खुद नहीं छोड़ी है, बल्कि उन्हें मजबूर किया गया। इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा कि कोहली ने जल्दी शादी कर ली। इसी का असर उनके परफॉर्मेंस पर पड़ा। आगे अख्तर ने आगामी टी20 विश्व कप 2022 में भारत-पाकिस्तान मैच को लेकर दावा किया था कि एक बार फिर पाकिस्तान की टीम भारत को हरा देगी। 

इससे पहले शोएब अख्तर पाकिस्तान टेलीविजन कॉरपोरेशन (PTV) से ऑन एयर इस्तीफा दे दिया था। जिसके बाद PTV ने उन्हें 100 मिलियन (10 करोड़ रुपए) का रिकवरी नोटिस भेजा था। इसके अलावा, तीन महीने की सैलरी के बराबर 33.33 लाख रुपए भी देने को कहा गया था। पीटीवी की तरफ से कहा गया कि इस्तीफा देने से न केवल दोनों के बीच हुए करार का उल्लंघन हुआ बल्कि पीटीवी को बड़ा नुकसान भी हुआ।