‘द कश्मीर फाइल्स’ (The Kashmir Files) ने कश्मीर में हिंदुओं के नरसंहार की कई दबी कहानियों को स्वर देने का काम किया है। विवेक अग्निहोत्री की इस फिल्म के रिलीज होने के बाद लोग खुद सामने आकर दुनिया के साथ आपबीती साझा कर रहे हैं। इस बीच अग्निहोत्री ने एक लेटर ट्विटर पर शेयर किया है। इसके जरिए उन्होंने यह बताने की कोशिश है कि उस वक्त कश्मीर के हिंदुओं को किस तरह धमकाया जा रहा था।
विवेक अग्निहोत्री द्वारा सोशल मीडिया पर शेयर किए गए पत्र में लिखा है, “तुम आईबी हो। तुम्हारी पत्नी आईबी है। हम सभी को मार डालेंगे। तुम्हारे 3 बेटे, 2 बहू और उनके बच्चे। श्रीनगर आओ, तुम्हारी हत्या कर दी जाएगी। सावधान रहो, तुम दुश्मन हो।” बता दें कि ये पत्र उस वक्त का है जब कश्मीर में पंडितों पर अत्याचार हो रहा था। लोगों को सरेआम धमकियाँ दी जा रही थी। उन्हें भारत सरकार का जासूस बताया जा रहा था।
Thank you @PMOIndia@narendramodi ji for reminding everyone about India’s greatest value – The Truth. This is the TRUTH of Kashmir. If someone disputes this, I can present 1000s of original documents like this. सत्यमेव जयते। pic.twitter.com/amjHw78FJh
— Vivek Ranjan Agnihotri (@vivekagnihotri) March 15, 2022
इस लेटर को शेयर करते हुए अग्निहोत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी आभार जताया है। उन्होंने लिखा है, “शुक्रिया पीएमओ इंडिया, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी भारत के सबसे बड़े मूल्य– सत्य के बारे में सभी को याद दिलाने के लिए। यही कश्मीर की सच्चाई है। अगर कोई इस पर विवाद करता है, तो मैं इस तरह के हजारों मूल दस्तावेज पेश कर सकता हूँ। सत्यमेव जयते।”
बता दें कि खुद पीएम मोदी भी इस फिल्म की तारीफ कर चुके हैं। उन्होंने कहा था कि ऐसी फिल्में कई बार बनाई जानी चाहिए। बीजेपी संसदीय दल की बैठक में पीएम मोदी ने ‘द कश्मीर फाइल्स’ का जिक्र करते हुए इसके डायरेक्टर को निडर भी बताया था। पीएम ने कहा था कि जो लोग हमेशा फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन के झंडे लेकर घूमते हैं, वह पूरी जमात बौखला गई है। इस फिल्म की तथ्यों और आर्ट के आधार पर विवेचना करने के बजाय उसको हतोत्साहित करने की मुहिम पूरे इको-सिस्टम ने चला रखी है।
गौरतलब है कि द कश्मीर फाइल्स में आतंकी कमांडर फारूक मलिक डार उर्फ बिट्टा कराटे की भूमिका निभाने वाले चिन्मय मंडेलकर ने कहा था, “जब मैंने पहली बार स्क्रिप्ट पढ़ी तो चौंक गया था। द कश्मीर फाइल्स को देखने के बाद लोग अब जो महसूस कर रहे हैं, वही मैंने स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद अनुभव किया। मैंने विवेक से पूछा- क्या यह सब सच है? क्या वास्तव में ऐसा हुआ है? उन्होंने बहुत ही शांत स्वर में मुझसे कहा- स्क्रिप्ट में जो कुछ भी लिखा गया है वह वास्तव में जो हुआ है उसका सिर्फ 35 प्रतिशत है, क्योंकि वास्तव में जो हुआ है वह कहीं अधिक क्रूर है।”
सोशल मीडिया पर बुधवार (16 मार्च) को एक खबर वायरल हुई कि इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट IC-814 का दूसरा अपहरणकर्ता ज़फरुल्लाह जमाली भी पाकिस्तान में मारा गया। कराची में अज्ञात हमलावरों ने गोलियाँ मारकर उसकी हत्या कर दी।
#Breaking: Another IC814 Hijacker Zafarullah Jamali, who was the hijacker of the Indian plane IC814 on December 24, 1999, is killed by unknown person in Karachi. This is second assassination of IC814 Hijackers after another Hijacker Zahoor Mistry was killed on March 1st.#ISIpic.twitter.com/uRz2mbixUk
रिपोर्ट के मुताबिक, मोटरसाइकिल सवार अज्ञात हमलावरों ने पिछले सप्ताह कराची में हरकत उल मुजाहिदीन के आतंकी ज़फरुल्लाह जमाली की हत्या कर दी थी। जफरुल्लाह जमाली ने दिसम्बर 1999 में IC-814 विमान का अपहरण किया और दुबई में विमान उतरवा कर एक यात्री रूपिन कात्याल की हत्या कर दी थी। सोशल मीडिया यूजर्स सहित सुरक्षा विशेषज्ञों का दावा है कि जहूर मिस्त्री के बाद जमील दूसरा अपहरणकर्ता है, जो मारा गया।
प्राथमिक तौर पर सोशल मीडिया पर किए जा रहे दावों के उलट ज़फरुल्लाह जमाली IC-814 का दूसरा अपहरणकर्ता प्रतीत नहीं हो रहा है। कहा जा रहा है कि IC-814 हाईजैक की पुरानी रिपोर्ट में भी ज़फरुल्लाह जमाली नाम का कोई अपहरणकर्ता नहीं है। इस हिसाब से यह प्रतीत होता है कि कोई दूसरा आतंकी नहीं, बल्कि यह ज़हूर मिस्त्री ही है जो पाकिस्तान में मारा गया था। द न्यू इंडियन के जर्नलिस्ट प्रमोद कुमार सिंह के मुताबिक, ज़हूर मिस्त्री का ही उपनाम जमाली था और उसकी मौत की पुष्टि 7 मार्च को हुई थी।
Zahoor Mistry alias Jamali is the correct name..he was killed sometime back & it was confirmed on March 7th.
ज़हूर मिस्त्री की मौत की खबर मार्च के पहले सप्ताह में तब आई थी, जब कराची की अख्तर कॉलोनी में उसे 2 अज्ञात बाईक सवारों ने गोलियों से भून दिया था। लगभग 2 दशक बीत जाने के बाद अभी तक ये खुलासा नहीं हो पाया है कि क्या ज़फरुल्लाह जमाली नाम का भी कोई आतंकी IC-814 के अपहरण में शामिल था। हरकत-उल-मुजाहिदीन के 5 आतंकियों ने 24 दिसंबर 1999 को विमान को नेपाल से अपहरण कर अमृतसर में कुछ देर रोकने के बाद अफगानिस्तान के कंधार ले गए थे। अपहरणकर्ताओं में जैश-ए-मोहम्मद के मुखिया मसूद अज़हर का भाई इब्राहिम अज़हर, रऊफ असगर, ज़हूर मिस्त्री, शाहिद अख्तर और एक अन्य आतंकी जो 2001 के संसद भवन हमले में मारा गया, शामिल थे।
आतंकवाद विरोधी एक्सपर्ट के मुताबिक, इब्राहिम अज़हर और शाहिद अख़बार सईद ही पाकिस्तान में जीवित बचे हैं। ये सभी कराची से पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा इलाके में शरण ले लिए हैं। माना जाता है कि रऊफ असगर की मौत प्राकृतिक कारणों से हुई। हरकत उल मुजाहिदीन के एक अन्य आतंकी को भारतीय सुरक्षा बलों ने भारतीय संसद पर हमले के दौरान 13 दिसम्बर 2001 को मार गिराया था।
इनमें से पाँचवे आतंकी ज़हूर मिस्त्री को कराची में अज्ञात हमलावरों ने मार्च 2022 के पहले सप्ताह में मार दिया था। ऐसे में यह लग रहा है कि दूसरे आतंकी ज़फरुल्लाह जमाली के मारे जाने की खबर संदिग्ध है। ज़फरुल्लाह का कोई रिकॉर्ड या कहीं भी उपस्थिति पहले से दर्ज नहीं है। इसी के साथ अज्ञात हमलावरों द्वारा मारे गए ज़हूर मिस्त्री की तस्वीरें सोशल मीडिया पर दूसरे अपहरणकर्ता ज़फरुल्लाह के मारे जाने की बताकर वायरल हो रहीं हैं।
ज़हूर मिस्त्री पर हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट
हिंदुस्तान टाइम्स के 8 मार्च 2022 की रिपोर्ट में ज़हूर मिस्त्री की पहचान जमाली के रूप में की गई है। उस रिपोर्ट में मारे गए आतंकी ज़हूर की फोटो वायरल ज़फरुल्लाह जमाली की फोटो से काफी मिलती है। इस मामले में और अधिक भ्रम इसलिए भी फ़ैल रहा है, क्योंकि मारे गए हरकत उल मुजाहिद्दीन आतंकी ज़फरुल्लाह जमाली की शक्ल पाकिस्तान के 15वें प्रधानमंत्री ज़फरुल्लाह जमाली से भी मेल खा रही है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री जमाली की मौत 2 दिसम्बर 2020 में हुई थी। अफवाह ये भी उड़ रही है कि आतंकी के शक में कराची में पकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या कर दी गई है। आधिकारिक रूप से इस बात के कोई प्रमाण नहीं है कि पूर्व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री किसी भी आतंकी हरकत में शामिल रहे हैं।
IC 814 विमान अपहरण कांड
24 दिसम्बर 1999 को भारत के विमान IC-814 को हरकत उल मुजाहिदीन के आतंकियों ने नेपाल से अपहरण कर लिया था। इस विमान को दिल्ली आना था, लेकिन इसे अपहरण कर के लाहौर, अमृतसर और दुबई ले जाया गया। अंत में इसे अफगानिस्तान के कंधार में रोका गया। तब भी अफगानिस्तान तालिबान के कब्ज़े में था। विमान में कुल 178 यात्री और 11 स्टाफ सवार थे, जिन्हें कब्ज़े में ले लिया गया था। इन सभी के बदले जेल में बंद जैश ए मोहम्मद के आतंकी मसूद अज़हर, उमर सईद शेख और मुश्ताक अहमद जरगर की रिहाई हुई थी। आतंकियों ने 15 आतंकियों को छोड़ने और 200 मिलियन अमेरिकी डॉलर (1,517 करोड़ रुपए) की फिरौती माँगी थी। यह मामला 31 दिसम्बर 1999 को खत्म हुआ था। आतंकियों से बातचीत करने वाले दल में अजीत डोभाल भी शामिल थे।
पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव में मिली शर्मनाक हार के बाद कॉन्ग्रेस (Congress) में खींचतान तेज हो गई है। पार्टी का असंतुष्ट गुट G-23 एक बार फिर एक्टिव हो गया है। बुधवार (16 मार्च 2022) को G-23 ने दिल्ली में गुलाम नबी आजाद (Ghulam Nabi Azad) के घर एक बैठक की।
इस बैठक में कपिल सिब्बल, आनंद शर्मा, मनीष तिवारी, शशि थरूर और कई अन्य नेता शामिल हुए। इस बैठक के बाद नेताओं की ओर से संयुक्त बयान जारी किया गया। इस बयान में कॉन्ग्रेस आलाकमान से अपील की गई कि वह समान विचारों वाले दलों से बात करें ताकि भाजपा के विरोध में एक विकल्प तैयार हो सके।
बयान में कहा गया, “भाजपा का विरोध करने के लिए कॉन्ग्रेस पार्टी को मजबूत करना जरूरी है। हम कॉन्ग्रेस पार्टी से 2024 के लिए एक विश्वसनीय विकल्प का मार्ग प्रशस्त करने के लिए एक मंच बनाने के लिए अन्य समान विचारधारा वाली ताकतों के साथ बातचीत शुरू करने की माँग करते हैं।” बयान में यह भी कहा गया कि इस संबंध में आगे के कदमों की जल्द जानकारी दी जाएगी।
In order to oppose BJP, it is necessary to strengthen the Congress party. We demand the Congress party to initiate dialogue with other likeminded forces to create a platform to pave way for a credible alternative for 2024: Joint statement of Congress’ G 23 leaders pic.twitter.com/AsVO1Hm5II
G-23 के प्रमुख सदस्य एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा था कि गाँधी परिवार को कॉन्ग्रेस का नेतृत्व छोड़ देना चाहिए और किसी अन्य को मौका देना चाहिए। उनके इस बयान को लेकर कॉन्ग्रेस की चाँदनी चौक जिला इकाई ने बुधवार को एक प्रस्ताव पारित करके पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी से पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के लिए सिब्बल के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अनुरोध किया है। सिब्बल चाँदनी चौक निर्वाचन क्षेत्र से सांसद रह चुके हैं।
‘G-23’ समूह पर पार्टी तोड़ने का आरोप
कॉन्ग्रेस के भीतर बदलाव की माँग कर रहे इस समूह पर गाँधी परिवार के नेताओं ने भी हमले तेज कर दिए हैं। कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने बुधवार को आरोप लगाया कि कॉन्ग्रेस कार्य समिति (CWC) की बैठक के बाद भी ‘जी 23’ समूह के नेता बार-बार बैठकें करके पार्टी को तोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि पूरी कॉन्ग्रेस में कोई भी पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी को कमजोर नहीं कर सकता और पार्टी के सभी लोग उनके साथ हैं। वहीं, कॉन्ग्रेस सांसद रवनीत बिट्टू ने सिब्बल के खिलाफ कार्रवाई की माँग की है। बता दें कि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर विधानसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस की करारी हार हुई है।
हिजाब (Hijab) पर कर्नाटक हाईकोर्ट (Karnataka High Court) के फैसले के खिलाफ राज्य में जगह-जगह विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। इस मामले में कर्नाटक पुलिस (Karnataka Police) ने जबरन दुकानें बंद करवाने के आरोप में एक वकील समेत पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) के कार्यकर्ताओं के खिलाफ बुधवार (16 मार्च 2022) को FIR दर्ज की है।
पुलिस के अनुसार, भटकल थाने में अजीम अहमद, मोहिद्दीन अबीर, शारिक और वकील तैमूर हुसैन गवई के खिलाफ मामले दर्ज किए गए हैं। पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 143, 147 और 290 के तहत FIR दर्ज की है।
जानकारी के मुताबिक हिजाब विवाद पर कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ आरोपितों ने मंगलवार (15 मार्च 2022) को जबरन दुकानें और व्यावसायिक प्रतिष्ठान बंद करा दिए थे। तटीय शहर भटकल को सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। यह उडुपी से 90 किलोमीटर दूर है, जहाँ से हिजाब विवाद शुरू हुआ था। इसे देखते हुए पुलिस ने इलाके में सुरक्षा बढ़ा दी है।
भटकल में ‘तंजीम’ संगठन ने कस्बे में बंद का आह्वान किया था और कई व्यापारियों ने स्वेच्छा से अपनी दुकानें बंद कर दी थीं। सत्तारूढ़ बीजेपी और हिंदूवादी संगठनों ने आरोप लगाया है कि राज्य में हिजाब विवाद को बढ़ाने के पीछे पीएफआई, सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDFI) और कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (CFI) हैं।
वहीं, मुस्लिम संगठनों ने गुरुवार (17 मार्च 2022) को कर्नाटक बंद का ऐलान किया है। इसके लिए फतवा जारी किया गया। कर्नाटक के अमीर-ए-शरीयत मौलाना सगीर अहमद खान रश्दी ने कोर्ट के फैसले पर दुख जताया और इसके विरोध में तमाम मुस्लिम संगठनों से कर्नाटक बंद के लिए अपील की। उन्होंने एक वीडियो संदेश जारी कर फतवे को ध्यान से पढ़ने और बंद में भागीदार बनने की अपील की। उल्लेखनीय है कि सगीर ने कर्नाटक बंद का ऐलान ऐसे समय में किया है, जब हिजाब विवाद के चलते पूरे राज्य में 21 मार्च तक धारा 144 लागू है।
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने मंगलवार (15 मार्च 2022) को अपने 129-पृष्ठ के आदेश में कहा कि हिजाब एक आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं है। कोर्ट ने राज्य सरकार के 5 फरवरी के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसके तहत स्कूल/कॉलेज परिसर में ऐसे किसी भी धार्मिक कपड़े के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया गया था, जिससे शांति, सद्भाव और सार्वजनिक व्यवस्था के बिगड़ने का खतरा हो।
बता दें कि मुख्य न्यायाधीश रितु राज अवस्थी, न्यायमूर्ति कृष्णा एस दीक्षित और न्यायमूर्ति जे एम खाजी की पूर्ण पीठ का गठन तब किया गया जब उडुपी के एक कॉलेज की कुछ छात्राओं ने कर्नाटक हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और शैक्षणिक संस्थानों की कक्षाओं के अंदर हिजाब पहनने की अनुमति माँगी थी।
त्रिपुरा के धलाई जिले में 5 साल की बच्ची से रेप के एक आरोपित को पीट-पीटकर मार डालने की खबर आई है। बताया जा रहा है कि महिलाओं के एक समूह ने आरोपित को पेड़ से बाँध कर तब तक मारा जब तक वो मर नहीं गया। मृतक हत्या के एक मामले में हाल ही में 8 साल की सजा काट जेल से बाहर निकला था। घटना 15 मार्च 2022 (मंगलवार) की बताई जा रही है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मृतक की उम्र 46 वर्ष है। उस पर 5 साल की बच्ची को जंगल में ले जाकर रेप का आरोप था। बच्ची अपनी माँ के साथ एक धार्मिक कार्यक्रम में रात को गई थी। वहाँ से कथित तौर पर आरोपित उसे उठा कर जंगल ले गया और रेप किया। बच्ची की चीखें सुन कर स्थानीय लोग मौके पर पहुँचे। उन्होंने बच्ची को अस्पताल में भर्ती करवाया। बच्ची को अंतिम बार मृतक के साथ देखा गया था। कहा जा रहा है कि बाद में बच्ची ने उसका नाम भी बताया था।
पीड़ित परिवार ने रेप के आरोपित की गिरफ्तारी की माँग को ले कर गंडाचेरा-अमरपुर हाइवे को जाम कर दिया था। इसके बाद रेप आरोपित को स्थानीय महिलाओं ने पास के एक गाँव में पकड़ लिया। उसे पेड़ में बाँध कर मारा। घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है। पिटाई के बाद उसे सड़क किनारे ही छोड़ दिया गया था। एक रिपोर्ट के मुताबिक पिटाई करने के मामले में अब तक 3 लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया गया है। पुलिस ने मुताबिक जाँच की जा रही है।
विवेक अग्निहोत्री की फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ की सफलता आलोचकों को पच नहीं रही। उनका आरोप है कि सरकार इस फिल्म को प्रमोट कर रही है। वे गुजरात, मध्य प्रदेश, हरियाणा जैसे बीजेपी शासित राज्यों में इस फिल्म को टैक्स फ्री करने पर भी सवाल उठा रहे हैं। एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार श्रीनिवासन जैन ने भी कश्मीरी पंडितों के नरसंहार को दर्शाने वाली इस फिल्म को मिल रही प्रशंसा के लिए बीजेपी की सरकार पर सवाल उठाया है। उन्होंने ट्वीट करते हुए पूछा है कि क्या कोई बता सकता है कि अपने राजनीतिक विरोधियों को टारगेट करने के लिए भारत सरकार ने एक व्यवसायिक फिल्म को प्रमोट करने के लिए पिछली बार अपना पूरा दमखम कब लगाया था?
जैन के इस ट्वीट के बाद यह बात सामने आई है कि इंदिरा गाँधी की सरकार ने ब्रिटिश फिल्मकार रिचर्ड एटनबरो को फिल्म ‘गाँधी’ बनाने के लिए $10 मिलियन (लगभग ₹75,98,00,000) दिए थे। इसका मकसद था कि ‘गाँधी’ की आड़ लेकर जनता के बीच कॉन्ग्रेस का प्रचार करना।
Genuine q: can anyone recall the last time the Indian state threw its entire weight in promoting a privately produced movie while using it to target its political opponents?
फिल्म ‘गाँधी’ से जुड़े इस तथ्य से जैन को पॉपुलर ट्विटर यूजर विक्रांत ने अवगत कराया है। उन्होंने लिखा है, ” सन 1980 में तत्कालीन प्रधामंत्री इंदिरा गाँधी ने फिल्म गाँधी बनाने के लिए रिचर्ड एटनबरो को $7 मिलियन का फण्ड मुहैया करवाया था। इस फिल्म की स्क्रिप्ट विशेष तौर पर सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा परखी गई थी। इस फिल्म का उद्देश्य गाँधीवाद और आज़ादी की लड़ाई में कॉन्ग्रेस के योगदान का महिमामंडन करना था।”
1980 – PM Indira Gandhi financed ($7 Million) to Richard Attenborough for making the Movie Gandhi
The Script was especially vetted by I&B ministry
The idea was to capture Indian mind with Gandhism & glorify the role of Congress in freedom struggle
विक्रांत द्वारा किए गए दावे के मुताबिक गाँधी फिल्म को प्रोड्यूस करने वाली संस्थाओं में नेशनल फिल्म डेवलोपमेन्ट कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया (NFDC) भी शामिल था। केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्रालय के अधीनस्थ आने वाली यह संस्था सन 1975 से भारतीय सिनेमा को प्रचारित कर रही है। सन 1982 में NFDC के अध्यक्ष DVS राजू थे। फिल्म ‘गाँधी’ की प्रोडक्शन कंपनियों में से एक NFDC थी। सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, फिल्म की सह-निर्माता रानी दूबे ने प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को भारतीय राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम से 10 मिलियन डॉलर देने के लिए राजी किया था।
एटनबरो द्वारा निर्मित और निर्देशित यह फिल्म भारत में 30 नवंबर 1982 को रिलीज हुई थी। इस फिल्म में अंतिम ब्रिटिश वायसराय लार्ड लुईस माउंटबेटन और लंदन में भारत के उच्चायुक्त रहे मोतीलाल कोठारी को भी श्रद्धांजलि दी गई है। मोतीलाल कोठारी गाँधी और नेहरू के प्रबल समर्थक भी थे।
रिपोर्ट्स के मुताबिक फिल्म ‘गाँधी’ को बनाने के 2 प्रयास पहले भी हो चुके थे। यह डायरेक्टर एटनबरो का ड्रीम प्रोजेक्ट भी था। हंगरी के फिल्म प्रोड्यूसर गाब्रिएल पास्कल ने इससे पहले 1952 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से गाँधी पर फिल्म बनाने की इच्छा जताई थी। साल 1954 में पास्कल की मृत्यु हो जाने के चलते यह फिल्म नहीं बन पाई। बाद में लुईस माउंटबेटन के माध्यम से रिचर्ड एटनबरो भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उनकी बेटी इंदिरा गाँधी से साल 1962 में मिले। तब नेहरू ने एटनबरो को फिल्म बनाने की अनुमति और इसके लिए धन जुटाने का भी भरोसा दिलाया था। साल 1964 में नेहरू की मृत्यु हो जाने के बाद एक बार फिर से यह फिल्म नहीं बन पाई थी।
लेकिन एटनबरो ने हार नहीं मानी। साल 1976 में उन्होंने इस प्रोजेक्ट को वार्नर ब्रदर्स के साथ पूरा करने का मन बनाया। उसी समय इंदिरा गाँधी ने भारत में आपातकाल घोषित कर दिया। इस तरह से एक बार फिर से यह फिल्म नहीं बन पाई। आखिरकार 20 साल बाद इंदिरा गाँधी ने न सिर्फ यह फिल्म बनाने की अनुमति दी, बल्कि इसके लिए पैसे की भी व्यवस्था की। इंदिरा गाँधी से $10 मिलियन कम पड़ने की बात कह कर रानी दुबे ने माँगे थे।
विवेक अग्निहोत्री की फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ को लेकर कई तरह के दुष्प्रचार किए जा रहे हैं। इसमें से एक आरोप इस्लामोफोबिया को बढ़ावा देना भी है। लेकिन, इसी बीच कश्मीर से एक ऐसी आवाज उठी है जिसमें कहा गया है कि मुस्लिमों को नरसंहार के लिए कश्मीरी पंडितों से हाथ जोड़कर सार्वजनिक तौर पर माफी माँगनी चाहिए। ये आवाज है जावेद बेग की। उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि उनके अब्बा की पीढ़ियों ने गलती की थी।
जावेद बेग ने एक ट्वीट में गिरिजा टिक्कू की विचलित कर देने वाली तस्वीर साझा की है। साथ ही लिखा है, “मैं एक कश्मीरी मुस्लिम हूँ। हमारी पंडित बहन गिरिजा टिक्कू को कश्मीरी मुस्लिम परिवारों के आतंकियों ने टुकड़ों में काट डाला था, जबकि वह जिंदा थीं। इन आतंकियों के हाथों में ‘आजादी’ के नाम पर पाकिस्तानी बंदूकें थीं। यह कोई प्रोपेगेंडा नहीं, बल्कि हकीकत है। मैं हाथ जोड़कर पंडित बिरादरी से उस अत्याचार के लिए माफी माँगता हूँ।”
I am Kashmiri Muslim.Our Pundit sister Girja Tikoo was cut into pieces, while she was alive by militants from Kashmiri Muslim families who had guns from Pakistan in their hands, all in name of “Azadi”.This is FACT & not propaganda.I fold my hands and apologize to Pundit biradari pic.twitter.com/3muXcIzVCh
उन्होंने इसको लेकर न्यूज चैनल Ann News Kashmir के साथ अपनी बातचीत का एक वीडियो भी शेयर किया है। इसमें उन्होंने कहा है, “जिनलोगों ने उनको मारा, वे कहाँ के थे? वे बरमूला के नहीं थे, हमारे ही घरों के लोग थे। कश्मीरी पंडित कोई गैर नहीं हैं। ये हमारी कौम है, हमारा खून है, हमारी नस्ल है। यहाँ तो जानवर भी अपनी नस्ल के जानवर को भी नहीं मारते हैं। शेर कभी शेर का शिकार नहीं करता है। कुत्ते कभी कुत्ते को नहीं काटते हैं। कम से कम आज तो हमें गैरत होना चाहिए।”
Dear Friends I am sharing video of my opinion that I expressed in Hindi on @AnnNewsKashmir on #TheKashmirFiles movie, brutal murder of our Kashmiri Pundit sister Girija Tikoo & unfortunate tragedy of forced exodus of our Kashmiri Pundit biradari. Sangrampora Beerwah Massacre ? pic.twitter.com/LKcw8yXemz
वह आगे कहते हैं, “मैं खुद एक हत्याकांड का चश्मदीद हूँ। बीरवा के जिस इलाके से मैं ताल्लुक रखता हूँ, 1997 के 21 मार्च को पहली सामूहिक हत्या हुई थी, वो बीरवा में ही हुई थी। इसमें दर्जनों कश्मीरी पंडितों को मारा गया। मैंने देखा है। उसमें मारे जाने वाले लोग न तो किसी की ‘आजादी’ रोक रहे थे और न ही किसी कश्मीरी मुसलमान को मार रहे थे। निहत्थे लोग थे। उसमें इलाके के एक इज्जतदार हेडमास्टर और मेरे जैसा एक नौजवान था। वह हत्याकांड नहीं है तो क्या है?”
उन्होंने आगे कहा, “जो गलतियाँ हमारे वालिद की पीढ़ियों ने किया है, उसे एक पढ़े-लिखे युवक के तौर पर मुझे कबूल करना है कि वो गलतियाँ हुई हैं। वो गुनाह हुए हैं और उसके लिए हमें हाथ जोड़कर सार्वजनिक तौर पर सामूहिक रूप से कश्मीरी पंडितों से माफी माँगनी चाहिए। इसके लिए मूवी की जरूरत नहीं है।”
Kashmiri Muslim activist @Javedbeigh says Kashmiri Muslims should confess to their crime of genocide of Kashmiri Pandits and publicly apologise. Javed is witness to 1997 massacre of Kashmiri Hindus. Collective apology for crimes against humanity need of the hour. #TheKashmirFilespic.twitter.com/5fX30idD2e
उनके इस ट्वीट को रीट्वीट करते हुए कश्मीरी पंडित पत्रकार आदित्य राज कौल ने लिखा, “कश्मीरी मुस्लिम कार्यकर्ता जावेद बेग का कहना है कि कश्मीरी मुस्लिमों को कश्मीरी पंडितों के नरसंहार के अपने अपराध को कबूल करना चाहिए और सार्वजनिक रूप से माफी माँगनी चाहिए। जावेद 1997 में कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार के गवाह हैं। मानवता के खिलाफ अपराधों के लिए सामूहिक माफी समय की जरूरत है।”
Truth remains truth even if nobody speaking it . A lie is always a lie even if everybody speaking it. I am witness to Kashmiri’s first Massacre of KP’s which was unfortunately carried out at Sangrampora Beerwah, my Hometown in 21st March,1997 ( Nourooz Day ) I feel sad n sorry ? https://t.co/AAX3i9wFlH
इसका जवाब देते हुए जावेद ने लिखा, “सच हमेशा सच ही रहता है, भले ही कोई उसे न बोले। झूठ हमेशा झूठ ही होता है, भले ही हर कोई इसे बोल रहा हो। मैं कश्मीरी पंडित के नरसंहार का गवाह हूँ जो दुर्भाग्य से 21 मार्च, 1997 (नौरोज़ दिवस) में मेरे गृहनगर संग्रामपोरा बीरवा में किया गया था। मुझे इसके लिए दुख और खेद है।” बेग के ट्विटर हैंडल के मुताबिक वह पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट (PDF) के महासचिव हैं। वह कश्मीरी लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं।
देश में इन दिनों होली (Holi) की धूम है। जहाँ काशी सहित देश के कई राज्यों में इस साल होलिका (Holika) दहन- गुरुवार, 17 मार्च, 2022 को मनाई जा रही है। वहीं 18 मार्च, शुक्रवार के दिन रंग-गुलाल के साथ जमकर होली खेली जाएगी तो कुछ जगहों पर इस बार होली 19 मार्च को भी मनाई जा रही है। ऐसा तिथियों में हेर-फेर के कारण है।
यूपी और बिहार में तो खासतौर से इस बार ‘कपड़ा-फाड़’ होली होने वाली है। क्योंकि पिछले दो साल से कोरोना की वजह से लोग ऐतिहात के साथ होली खेल रहे थे। वहीं कृष्ण की नगरी मथुरा, वृन्दावन, गोकुल, नंदगाँव और राधा के बरसाने में होली कई दिन पहले से ही खेली जाती है। तो बनारस में होली रंगभरी एकादशी से शुरू होकर बुढ़वा मंगल तक चलती है।
पर्व-त्योहारों की इस कड़ी में आज होलिका दहन है। इसकी कहानी, धार्मिक और आध्यात्मिक पक्ष पर हम आगे चर्चा करेंगे। उससे पहले आपको बता दें कि होलिका दहन फाल्गुन माह की पूर्णिमा के दिन रंगों की होली से एक दिन पहले किया जाता है। इस त्यौहार का सम्बन्ध भी बुराई पर अच्छाई की जीत से है।
होलिका के पास वरदान होने के बावजूद भी उसका अग्नि में जल जाना इस बात का प्रमाण है कि बुराई चाहे कितनी भी कोशिश कर ले पर उसका अंत निश्चित है।
कब है होली और होलिका दहन का शुभ मुहूर्त
BHU के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान के छात्र ज्योतिषाचार्य पंडित प्रकाश शास्त्री बताते है कि फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा 17 मार्च को दोपहर 1:03 बजे लग रही है, जो 18 मार्च को दोपहर 12:52 बजे तक है। चूँकि, तिथि प्रारंभ होने के साथ ही भद्रा काल भी प्रारंभ हो रही है जो रात्रि 12:57 तक रहेगी। ऐसे में भद्रा समाप्ति के पश्चात् ही होलिका दहन करना शुभ है। विधान के अनुसार, होलिका दहन के बाद सूर्योदय व्यापिनी चैत्र प्रतिपदा में ही रंगोत्सव मनाना चाहिए। इस बार प्रतिपदा 18 मार्च को 12:53 बजे लग रही है जो 19 मार्च को 12:15 तक है।
होली के रंगो से सराबोर (तस्वीर-मनोज कर)
इस वर्ष लोगों में प्रश्न यह उठ रहा है कि काशी में 18 मार्च को होली और देश के कई दूसरे जगह 19 को क्यों? तो जानकारी के लिए बता दें कि काशी की रंग-गुलाल वाली होली चतु:षष्ठी यात्रा से जुड़ी है। जो प्राचीन काल से ही होलिका दहन की अगली सुबह होती आ रही है। इसलिए प्राचीन परंपरा होने के कारण काशी के लिए होली, होलिका दहन के अगले दिन ही उपयुक्त किया गया है। अतः काशी एवं कई जगहों पर 18 मार्च को एवं काशी से अलग कई दूसरे स्थानों पर शास्त्रीय विधान के अनुसार 19 मार्च को उदया तिथि में चैत्र कृष्ण प्रतिपदा मिलने पर रंगोत्सव का त्यौहार होली मनाया जाएगा।
भारतीय संस्कृति में घुले हैं जीवन के हर रंग
विविधताओं से भरी भारतीय जीवन शैली अपने आप में इतना समृद्ध है कि उसमें जीवन का हर रंग समाहित है। बात जीवन के रंगों की हो, उत्सव की हो, आनंद की हो तो होली से ख़ास क्या होगा? होली कितनी प्राचीन है आज इसके इतिहास में भी उतरेंगे, तलाशेंगे उसमें जीवन के विविध रंग, इसकी पौराणिक मान्यताएँ और सबसे बड़ी बात कितनी गहराई से गुथी है जीवन के उस दर्शन से जो युगों से मानवमात्र को आनंदमय जीवन जीने की प्रेरणा दे रही है।
वृन्दावन और बरसाना की लट्ठमार होली (तस्वीर-आनंद निकेतन)
भारत में लोग आपसी वैरभाव, मतभेद भुलाकर लोग होली खेलते हैं। रंगों का उत्सव होली, शरद ऋतु के समापन और वसंत ऋतु के आगमन का भी संकेत है। ब्रजभूमि मथुरा, वृंदावन, नंदगाँव, गोकुल और बरसाना के साथ ही काशी में होली का हुड़दंग हो, रंगभरी एकादशी या चिता-भस्म की होली केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनियाभर में मशहूर है।
होली एक, नाम अनेक
अब होली पर बात करते हुए कुछ गहरे आयाम पर भी ले चलता हूँ, अब यह तो आपको पता ही है कि होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है- लेकिन इसके और भी कई नाम है यह नाम ही अपने आप में भारतीय सनातन संस्कृति की तमाम विविधताओं को समेटे हुए हैं। जैसे होली, होलिका या होलाका नाम से वसंत ऋतु में हर्षोल्लास के साथ मनाए जाने के कारण इसे वसंतोत्सव और काम-महोत्सव के नाम से भी जाना जाता है।
प्रेम, ताजगी, ऊर्जा के साथ ही रंगों का त्यौहार कहा जाने वाला यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन मनाया जाता है। पहले दिन होलिका जलाई जाती है। दूसरे दिन, जिसे प्रमुखतः धुलेंडी व धुरड्डी, धुरखेल या धूलिवंदन इसके अन्य नाम हैं, लोग एक दूसरे को रंग, अबीर-गुलाल से सराबोर कर देते हैं।
ढोलक और अन्य वाद्य यंत्रों की ताल पर होली के गीत, कबीरा या जोगीरा गाए जाते हैं और घर-घर जा कर लोगों को रंग लगाने के साथ ही होली के दिन लोग पुरानी कटुता को भुला कर प्यार से गले मिल जाते हैं- वो कहते हैं ना- ‘होली के दिन दिल खिल जाते हैं, दुश्मन भी गले मिल जाते हैं।’ कहने का मतलब यह है कि यह समरसता, सौहार्द और भाई-चारे का प्रतीक भी है।
कुछ खास है यूपी-बिहार की होली में
बात होली की हो और उसमें भी यूपी की न हो यह कैसे हो सकता है। यूपी-बिहार में होली अलग ही लेवल पर होती है लेकिन बाकी राज्य भी कम नहीं है, उनका भी होली मनाने का अपना अलहदा अंदाज है। यह बात आप जानते हैं फिर भी मैं होली में आपको बनारस ले चलता हूँ क्योंकि मेरी होली में बनारस केंद्र में है आप अपने राज्य में मनाए जाने वाले होली के विशेष अंदाज के बारे में भी चर्चा कर सकते हैं।
बनारस की होली- चिताभस्म और रंगो की होली (तस्वीर-मनोज कर)
खैर, बनारस में होली की शुरूआत रंगभरी एकादशी से ही हो जाती है। रंगभरी एकादशी पर भूतभावन बाबा भोलेनाथ के गौना के दूसरे दिन काशी में उनके गणों के द्वारा चिताभस्म की होली खेली जाती है। रंगभरी एकादशी के मौके पर गौरा को विदा कराकर कैलाश ले जाने के साथ ही भगवान भोलेनाथ काशी में अपने भक्तों को होली खेलने और हुडदंग की अनुमति प्रदान करते हैं। इसके बाद ही काशी होलियाने मूड में आती है। फिर तो अस्सी से लेकर राजघाट तक, क्या गली-क्या घाट चारो तरफ बस बनारसी मस्ती छा जाती है।
कितनी ऐतिहासिक है होली
राग-रंग का यह लोकप्रिय पर्व वसंत का संदेशवाहक भी है। राग अर्थात संगीत और रंग तो इसके प्रमुख अंग हैं ही पर इनको उत्कर्ष तक पहुँचाने वाली प्रकृति भी इस समय रंग-बिरंगे यौवन के साथ अपनी चरम अवस्था पर होती है। फाल्गुन माह में मनाए जाने के कारण इसे फाल्गुनी भी कहते हैं। वैसे भारत में कई जगहों पर होली का त्यौहार वसंत पंचमी से ही आरंभ हो जाता है। उसी दिन पहली बार गुलाल उड़ाया जाता है। प्राचीन काल में इसी दिन से फाग और धमार का गाना प्रारंभ हो जाता है। खेतों में सरसों खिल उठती है। बाग-बगीचों में फूलों की आकर्षक छटा नजर आने लगती है। पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और मनुष्य सब उल्लास से भर जाते हैं।
होली के पर्व की तरह इसकी परंपराएँ भी अत्यंत प्राचीन हैं। हालाँकि, इसका स्वरूप और उद्देश्य समय के साथ बदलता रहा है। प्राचीन काल में यह विवाहित महिलाओं द्वारा परिवार की सुख समृद्धि के लिए मनाया जाता था और पूर्णिमा के दिन मनाए जाने के कारण पूर्ण चंद्र की पूजा करने की परंपरा थी।
वैदिक काल में इस पर्व को ‘नवात्रैष्टि यज्ञ’ कहा जाता था। उस समय खेत के अधपके अन्न को यज्ञ में दान करके प्रसाद लेने का विधान समाज में था। अन्न को होला कहते हैं, इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा।
भारतीय ज्योतिष के अनुसार चैत्र शुदी प्रतिपदा के दिन से नववर्ष का भी आरंभ माना जाता है। इस उत्सव के बाद ही चैत्र महीने का आरंभ होता है। अतः यह पर्व नवसंवत का आरंभ तथा वसंतागमन का प्रतीक भी है। कहते हैं, इसी दिन प्रथम पुरुष मनु का जन्म हुआ था, इस कारण इसे ‘मन्वादितिथि’ कहते हैं।
होली और होलिका से जुड़ी पौराणिक कथाएँ
होली के पर्व से अनेक कहानियाँ जुड़ी हुई हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी है प्रह्लाद की। भागवत पुराण के अनुसार- प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था। जो आज के मुल्तान (पाकिस्तान) पर शासन करता था। ब्रह्मा ने उसकी कई वर्षों की तपस्या से प्रसन्न होकर उसे ऐसा वरदान दिया था जिसने उसे एक प्रकार से अमर बना दिया था। अपने बल के घमंड में मदमस्त वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था।
होलिका की पौराणिक कथा
यहाँ तक कि उसने अपने राज्य में भगवान विष्णु का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी। हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद नारायण भक्त था। प्रह्लाद की विष्णु भक्ति से क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने नारायण की भक्ति का मार्ग न छोड़ा। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती।
हिरण्यकश्यप ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया। ऐसे में भक्त प्रह्लाद की याद में इस दिन होलिका जलाई जाती है। इस कथा से लगभग सभी परिचित होंगे। लेकिन यहाँ इस कथा का मेरे जिक्र करने का उद्देश्य इसमें छिपी एक गूढ़ बात को समझाना भी है।
क्या है प्रह्लाद की कथा का गूढ़ अर्थ
सनातन परंपरा में ऐसी कहानियों का बहुत गूढ़ अर्थ है। प्रतीक रूप से ऐसा माना जाता है कि प्रह्लाद का अर्थ ‘आनन्द’ होता है। वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका (जलाने की लकड़ी) जलती है और प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रह्लाद (आनंद) अक्षुण्ण रहता है।
होली से जुड़ी है राक्षसी ढूँढ़ी, राधा-कृष्ण का रास और कामदेव का पुनर्जन्म
प्रह्लाद की कथा के अतिरिक्त होली का यह पर्व राक्षसी ढूँढ़ी, राधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जुड़ा हुआ है। कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं। वहीं कुछ का यह भी मानना है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था। इसी खु़शी में गोपियों और ग्वालों ने रासलीला की और रंग खेला था।
होलिका दहन के साथ ही शुरू होता है होली का हुड़दंग
होलिका दहन का पहला काम झंडा या डंडा (रेड़ का पेड़) गाड़ना होता है। पर्व का पहला दिन होलिका-दहन का दिन कहलाता है। इस दिन चौराहों पर व जहाँ कहीं अग्नि के लिए लकड़ी एकत्र की गई होती है, वहाँ होलिका जलाई जाती है। इसमें लकड़ियाँ और उपले प्रमुख रूप से होते हैं। कई स्थलों पर होलिका में भरभोलिए जलाने की भी परंपरा है। भरभोलिए गाय के गोबर से बने ऐसे उपले होते हैं जिनके बीच में छेद होता है। इस छेद में मूँज की रस्सी डाल कर माला बनाई जाती है। एक माला में सात भरभोलिए होते हैं।
होलिका में भरभोलिया जलाती महिलाएँ एवं होलिका दहन
होली में आग लगाने से पहले इस माला को भाइयों के सिर के ऊपर से सात बार घूमा कर फेंक दिया जाता है। रात को होलिका दहन के समय यह माला होलिका के साथ जला दी जाती है। इसका यह आशय है कि होली के साथ भाइयों पर लगी बुरी नज़र भी जल जाए।
लकड़ियों व उपलों से बनी इस होलिका का दोपहर से ही विधिवत पूजन आरंभ हो जाता है। घरों में बने पकवानों का यहाँ भोग लगाया जाता है। दिन ढलने पर ज्योतिषियों द्वारा निकाले मुहूर्त पर होलिका का दहन किया जाता है। इस आग में नई फसल की गेहूँ की बालियों और चने के होले को भी भूना जाता है।
“होलिका का दहन समाज की समस्त बुराइयों के अंत का प्रतीक है। यह बुराइयों पर अच्छाइयों की विजय का सूचक है। गाँवों में लोग देर रात तक होली के गीत गाते हैं तथा संगीत की लय में नृत्य में डूब जाते हैं।”
होलिका दहन का मतलब अपने जीवन की सभी गैरजरूरी चीजों को जला देना भी है। इस दिन लोग सभी पुराने कपड़े और आस-पड़ोस के बच्चों के खिलौने और जिन चीजों की जरूरत न हो, उन्हें इकट्ठा करके सड़क पर ढेर लगाते हैं और उसे जलाते हैं। वहीं अब चलन के रूप में होलिका दहन के लिए होलिका और प्रह्लाद की मूर्ति भी आने लगी है। जिसे कस्बाई या शहरी इलाकों में देखा जा सकता है।
आध्यात्मिक पक्ष
आध्यात्मिक रूप से होलिका दहन का मकसद पुराने कपड़ों या वस्तुओं को जलाना ही नहीं है, बल्कि पिछले एक साल की यादों को जलाना है ताकि आज से आप एक नए और आनंदमय जीवन की शुरुआत कर सकें।
होली: रंग बरसे, उमंग बरसे
बुराई पर अच्छाई के जीत का प्रतीक होलिका दहन का अगला दिन प्रेम और सौहार्द का प्रतीक होली के रूप में मनाई जाती है। यह कुछ जगहों पर धूलिवंदन भी कहलाता है। इस दिन लोग रंगों से खेलते हैं। सुबह होते ही सब अपने मित्रों और रिश्तेदारों से मिलने निकल पड़ते हैं। गुलाल और रंगों से सबका स्वागत किया जाता है। लोग अपनी ईर्ष्या-द्वेष की भावना भुलाकर प्रेमपूर्वक गले मिलते हैं तथा एक-दूसरे को रंग लगाते हैं। इस दिन जगह-जगह टोलियाँ रंग-बिरंगे कपड़े पहने नाचती-गाती दिखाई पड़ती हैं। बच्चे पिचकारियों से रंग छोड़कर अपना मनोरंजन करते हैं।
बुढ़वा मंगल
होली बनारस और बिहार के गया में बुढ़वा मंगल तक चलता है। होली के बाद आने वाले मंगलवार को काशीवासी बुढ़वा मंगल या वृद्ध अंगारक पर्व भी कहते हैं।
बनारस में तुलसीघाट पर बुढ़वा मंगल मनाते काशीवासी
होली युवाओं के जोश का त्यौहार है लेकिन बुढ़वा मंगल में बुजुर्गों का उत्साह भी दिखाई पड़ता है। बनारस में बुढ़वा मंगल के अवसर पर गीत-संगीत की महफ़िलों के साथ मेला भी लगता है।
कश्मीर में 90 के दशक में नरसंहार को अपनी आँखों से देखने वाले और पलायन के भुक्तभोगी विनीत कौल आज भी घटना को याद कर रुआँसे हो जाते हैं। उनका कहना है कि उनके मुस्लिम पड़ोसी मौके देखकर उनकी संपत्ति पर कब्जा करना चाह रहे थे। अगर तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन उस वक्त नहीं होते थे तो न जाने क्या होता।
अमर उजाला के अनुसार, 19 जनवरी 1990 की रात को विनीत कौल अपने परिवार के साथ श्रीनगर के रैनावारी स्थित अपना चार मंजिला मकान और संपत्ति को छोड़कर अपने माता-पिता और दो बहनों के साथ एक अटैची में कपड़े लेकर वहाँ से निकल गए। तब उनकी उम्र 24 साल थी। कौल के पिता कश्मीर विश्वविद्यालय के निदेशक और इतिहासकार थे।
घटना को याद करते हुए उन्होंने कहा कि उस रात लाखों कश्मीरी पंडितों ने अपने पूर्वजों के घर और जमीनों को छोड़ अपनी जिंदगी और आबरू बचाने के लिए छुपते-छुपाते हुए घाटी से निकल गए थे। जम्मू में आकर ये लोग सड़कों पर टेंट में रहने लगे और कुछ लोगों ने कैंपों में शरण ली थी।
घाटी के अपनी संपत्ति छोड़कर लौटने के दौरान की घटना को याद करते हुए विनीत कहते हैं कि उस दौरान उनके पड़ोसी मुस्लिम परिवार ने मदद की पेशकश की थी। जब मदद के नाम पर उन्होंने 50 हजार रुपए देकर जमीन के कागजात वहीं छोड़कर जाने की बात कही तो उन्हें असलियत का पता चला कि वास्तव में वे कुछ पैसे देकर उनकी संपत्ति पर कब्जा करना चाहते थे। उन्होंने बताया कि उस दौरान कश्मीरी हिंदुओं के मकानों, स्कूलों पर संपत्तियों पर कब्जे कर लिए गए।
विनीत कौल ने कहा कि 1990 में 16 से 18 जनवरी कश्मीर की मस्जिदों से कश्मीरी पंडितों को चेतावनी दी गई। उनसे कहा गया था कि या तो कश्मीर छोड़कर भाग जाओ या इस्लाम अपनाकर मुस्लिम बन जाओ। मस्जिदों से यहाँ तक कहा गया था कि कश्मीर छोड़ने वाला परिवार अपने घर की महिलाओं को कश्मीर में ही छोड़ दें।
उन्होंने बताया कि साल 1986 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए क्रिकेट मैच से कश्मीर के हालात बदलने लगे थे। 1989 में कश्मीर में निजाम-ए-मुस्तफा (इस्लामिक शासन) की बातें होने लगीं। आतंकी कश्मीरी हिंदुओं को प्रताड़ित करने लगे थे। उसके बाद हिंदू नेताओं की हत्या और हिंदू महिलाओं से दुष्कर्म की घटनाएँ शुरू हो गईं।
कश्मीर के तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन को याद करते हुए विनीत कहते हैं कि उनकी वजह से ही कश्मीरी पंडितों को आज रोटी मिल रहा है। उन्होंने बताया कि कश्मीर में 5-6 प्रतिशत हिंदू थे और उनमें 95 प्रतिशत कश्मीरी हिंदू सर्विस करते थे। जब कश्मीर हिंदुओं का पलायन हुआ तो उन्होंने सर्विस क्लास के लिए स्पेशल छुट्टी ऑर्डर की। इसके कारण उनकी नौकरी बची रही और कर्मचारी आज भी अपनी रोटी का जुगाड़ कर पा रहे हैं।
जहाँ एक तरफ कश्मीरी पंडितों के नरसंहार पर बनी फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स (The Kashmir Files)’ ने मात्र 5 दिनों में दुनिया भर में 67 करोड़ रुपए का कारोबार कर लिया है, वहीं दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर लोग मार्च 1982 में आई अमिताभ बच्चन की फिल्म ‘बेमिसाल’ के एक दृश्य को शेयर करते हुए बता रहे हैं कि किस तरह अब तक बॉलीवुड इस्लामी आक्रांताओं का गुणगान करता रहा है और भारत में हर अच्छी चीज का श्रेय उन्हें ही देता रहा है।
आइए, हम आपको बताते हैं कि अमिताभ बच्चन, विनोद मेहरा और राखी के मुख्य किरदारों वाली इस फिल्म के उस दृश्य में क्या है। ये दृश्य फिल्म में तब आता है, जब तीनों ही मुख्य किरदार पहलगाम घूमने के लिए निकलते हैं। पहाड़ी हरियाली से भरा पहलगाम जम्मू कश्मीर के अनंतनाग जिले में पड़ता है, जहाँ से हर वर्ष अमरनाथ धाम की यात्रा भी शुरू होती है। दृश्य कुछ ऐसा है कि दोनों अभिनेता राखी से मिलते हैं और एक होटल में चाय पर बातें कर रहे होते हैं।
इस दौरान बातों-बातों में अमिताभ बच्चन पूछते हैं कि क्या एक बात आपलोगों को मालूम है? इसके बाद वो बताते हैं, “भारत में जितने भी हिल स्टेशंस हैं, सब के सब अंग्रेजों ने डिस्कवर किए। एक कश्मीर ही है, जिसे मुगलों ने डिस्कवर किया।” इस पर प्रतिक्रिया देते हुए राखी कहती हैं, “मुगलों का तो जवाब ही नहीं। उनका म्यूजिक देखिए, पेंटिंग देखिए, आर्किटेक्चर देखिए।” इस पर अमिताभ बच्चन टिप्पणी करते हैं कि मुगलों के असली योगदान का तो उन्होंने नाम ही नहीं लिया।
जब राखी पूछती हैं कि वो क्या है, तो इस पर अमिताभ बच्चन कहते हैं, “अरे मुगलई खाना।” इसके बाद वो ठहाके लगाने लगते हैं। लोग इस दृश्य को शेयर करते हुए सवाल उठा रहे हैं कि अमिताभ बच्चन ने अब तक ‘द कश्मीर फाइल्स’ को लेकर कोई बयान क्यों नहीं दिया है? साथ ही वो कह रहे हैं कि बॉलीवुड ने अब तक इसीलिए कश्मीर में आतंकवाद और पंडितों के नरसंहार पर कोई फिल्म नहीं बनाई। बता दें कि ‘बेमिसाल’ के डायलॉग्स राही मासूम रज़ा ने लिखे हैं।
अगर आप इस फिल्म को देखेंगे तो पहले 11 मिनट के बाद ही ये दृश्य आ जाता है। इस फिल्म को हृषिकेश मुखर्जी ने बनाया था। लोग कह रहे हैं बॉलीवुड का पूरा इकोसिस्टम ही जिहादी था और उसने अपने हिसाब से नैरेटिव तय किए। एक ने ‘द कश्मीर फाइल्स’ का डायलॉग शेयर कर के बताया कि सच्चाई क्या है। उस डायलॉग में अनुपम खेर कश्मीर को ऋषि कश्यप, शिव, सरस्वती और पंचतंत्र की भूमि बताते हैं। नीचे हम कुछ ट्वीट्स संलग्न कर रहे हैं, जिनमें यूजर्स ने इस दृश्य को लेकर आपत्ति जताई है और इस पर सवाल खड़े किए हैं:
The way the jihadi Bollywood ecosystem built narrative vs the raw truth coming out today!
वहीं ‘द कश्मीर फाइल्स’ में ये बताया गया है कि कैसे शम्सुद्दीन ऐराकी नाम के आक्रांता ने यहाँ आकर हिन्दुओं का जबरन धर्मांतरण किया, मंदिर तोड़े और इतिहास में उसे ‘सूफी संत’ के रूप में प्रचारित किया गया। इसी तरह इसे ऋषियों की भूमि बताते हुए कहा गया है कि वर्षों तक उन्होंने यहाँ तपस्या की थी। राजा ललितादित्य के बारे में बताया गया है। ये फिल्म इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा कश्मीरी हिन्दुओं के बर्बर नरसंहार पर बनी है।
हाल ही में निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने भी कश्मीर पर बनी फिल्मों में इस समस्या के गौण रहने की बात करते हुए कहा था कि ‘रोजा (1992)’ उनकी फेवरिट फिल्म है और उन्हें लगता है कि भारत में इतनी अच्छी फिल्म बनी ही नहीं। उन्होंने सवाल उठाया कि उसी पीरियड में सेट होने के बावजूद उसमें कहीं भी हिन्दू नरसंहार का कोई जिक्र तक नहीं है। इसी तरह उन्होंने ‘फ़िज़ा (2000)’, ‘मिशन कश्मीर (2000)’ और ‘फना (2006)’ की भी बात की। हालाँकि, विधु विनोद चोपड़ा की ‘शिकारा (2020)’ की याद दिलाए जाने पर उन्होंने कहा कि वो ‘फिल्मों’ की बात कर रहे हैं। ‘हैदर (2014)’ फिल्म के कारण प्राचीन मार्तंड सूर्य मंदिर का नाम वहाँ ‘शैतान की गुफा’ हो गया है।