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पाकिस्तानी TikTok स्टार हरीम शाह ने शेयर किया ‘लिप जॉब’ वाला वीडियो: FIA के कारण हुआ ये हाल, सूजे हुए होंठ बने चर्चा का विषय

पाकिस्तानी टिकटॉकर हरीम शाह (Hareem Shah) ने खुद को मुसीबत में डाल लिया है। एक वीडियो में जिसे उसने कथित तौर पर यूके में रहने के दौरान शूट किया था। उसमें हरीम के होंठ सूजे हुए नजर आ रहे हैं। दरअसल उसमें उन्होंने अधूरा लिप जॉब दिखाया। अपने ऊपरी होंठ के आधे हिस्से में ही फिलर्स के साथ, हरीम शाह ने खुलासा किया कि उसके होंठ एकतरफा फूले हुए क्यों थे?

हरीम ने कहा कि वह हमेशा से लिप फिलर करवाना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने अपॉइंटमेंट लिया था। और जैसे ही डॉक्टर ने उसके ऊपरी होंठ के आधे हिस्से में फिलर का इंजेक्शन लगाना पूरा किया, उसे पाकिस्तान से फोन आया। पाकिस्तान से फोन करने वाले ने कहा कि संघीय जाँच एजेंसी (एफआईए) ने उसके बैंक खाते को फ्रीज कर दिया है।

हरीम के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का मामला शुरू करने के बाद एफआईए ने उनका अकाउंट फ्रीज कर दिया था।

वीडियो में, हरीम कहती है कि जब उसे पता चला कि उसका खाता फ्रीज कर दिया गया है, तो उन्होंने अपॉइंटमेंट को बीच में ही छोड़ दिया, जबकि अभी केवल उनके होंठ के 1/4 हिस्से में ही भराव का इंजेक्शन लगाया गया था क्योंकि उसे एहसास हुआ कि उसके पास डॉ को देने के लिए भी पैसे नहीं होंगे।

हरीम शाह ने अपने वीडियो को इंस्टाग्राम पर शेयर किया था और वहीं से कई पाकिस्तानी यूजर्स ने ट्विटर पर भी शेयर कर दिया था। तभी से सोशल मीडिया पर तरह-तरह की चर्चाएँ चल रही हैं।

पाकिस्तान एफआईए ने हरीम शाह के खिलाफ क्यों शुरू की जाँच

इससे पहले जनवरी में, हरीम शाह ने एक वीडियो पोस्ट करते हुए कहा था कि उन्होंने एक बड़े अमाउंट के साथ पाकिस्तान से ब्रिटेन की यात्रा की थी। वीडियो में वह ब्रिटिश पाउंड के ढेर पर बैठी हुई दिखाई दे रही है और कह रही है कि यह पहली बार है जब वह इतनी मोटी रकम लेकर पाकिस्तान से ब्रिटेन की यात्रा कर रही है। एफआईए के नियमों के अनुसार, कोई भी बिना किसी झंझट के 10,000 पाउंड के साथ यात्रा कर सकता है। हालाँकि, शाह ने जितनी रकम के साथ यात्रा की थी, वह उससे अधिक थी। जाँच शुरू करते हुए, एफआईए ने कहा था कि उसके यात्रा दस्तावेज, पासपोर्ट आदि सभी की जाँच की जाएगी।

2019 में भी हरीम पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय में बेवजह घूमने के लिए मुसीबत में पड़ गई थीं। तब वह हिंदी और उर्दू गानों के साथ कॉन्फ्रेंस रूम में घूमती नजर आईं।

अविवाहित रिपोर्टर गई अफगानिस्तान, हो गई गर्भवती: महिला पत्रकार को एंट्री देने से न्यूजीलैंड का इनकार, अब तालिबान से मदद माँगने को मजबूर

न्यूजीलैंड (New Zealand) की पत्रकार शार्लोट बेलिस (Charlotte Bellis) अफगानिस्तान में फँस गई हैं। वह गर्भवती हैं, इसके बावजूद न्यूजीलैंड सरकार ने कोरोनो महामारी प्रतिबंधों का हवाला देते हुए उनकी वापसी का आपातकालीन आवेदन खारिज कर दिया है।

गर्भवती पत्रकार ने बताया कि उसके देश ने वापसी का आवेदन ठुकरा दिया है। इसकी वजह से उन्हें तालिबान (Taliban) से मदद माँगने को मजबूर होना पड़ा। बेलिस ने ‘द न्यूजीलैंड हेराल्ड’ (The New Zealand Herald) में एक कॉलम लिखकर सबको अपनी आपबी​ती बताई। शनिवार (29 जनवरी 2022) को प्रकाशित कॉलम में उन्होंने लिखा, “अजीब विडंबना है कि पहले मैंने महिलाओं के प्रति बर्बरता दिखाने को लेकर तालिबान से सवाल पूछा था, लेकिन अब मैं यही सवाल अपनी सरकार से पूछ रही हूँ।”

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बेलिस अल-जज़ीरा में बतौर संवाददाता काम करती थीं, जो कतर में स्थित है। बेलिस पिछले साल अल जजीरा के लिए काम करते हुए उन्हें अफगानिस्तान से तालिबान और अमेरिकी सैनिकों की वापसी से जुड़ी खबरों को दे रही थीं। अपने कॉलम में बेलिस ने कहा कि वह सितंबर में कतर लौटीं तो उन्हें पता चला कि वह अपने साथी और फ्रीलांस फोटोग्राफर जिम ह्यूलेब्रोक के साथ रहते हुए गर्भवती हो गई थीं।

जिम ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ के लिए काम कर रहे थे। बेलिस मई में एक बच्ची को जन्म देने वाली हैं। चूँकि, कतर में विवाहेतर यौन संबंध अवैध हैं, इससे बेलिस को लगा कि कतर छोड़ने में ही उनकी भलाई है। इसके बाद उन्होंने नागरिकों की वापसी से जुड़ी लॉटरी-शैली प्रणाली के जरिए बार-बार न्यूजीलैंड वापस जाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली।

इसके बाद बेलिस ने नवंबर 2021 में अल जजीरा से इस्तीफा दे दिया और युगल ह्यूलेब्रोक के मूल देश बेल्जियम चली गईं, लेकिन वह वहाँ ज्यादा समय तक नहीं रह सकीं, क्योंकि वह वहाँ की निवासी नहीं थी। इस जोड़े के पास रहने के लिए सिर्फ अफगानिस्तान का वीजा था। इसके बाद बेलिस ने तालिबान के वरिष्ठ लोगों से बात की तो उन्होंने बताया कि अगर वह अफगानिस्तान लौटती हैं, तो वह ठीक रहेंगी।

CM रहते मायावती ने अपनी ही मूर्तियों पर लुटा दिए थे ₹2600 Cr, हाथी की भी कई मूर्तियाँ: सुप्रीम कोर्ट ने कहा था – करदाताओं के पैसे लौटाओ

उत्तर प्रदेश की एक बहुत बड़ी पार्टी है ‘बहुजन समाज पार्टी (BSP)’, जिसकी मुखिया मायावती 2007-2012 की अवधि में उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रही थीं। हाँ, उस दौरान समाजवादी पार्टी का समर्थन करने वाले कुछ माफियाओं को ज़रूर जेल भेजा गया, लेकिन जो बसपा में थे या आ गए – उन्हें राज्य सरकार का पूरा समर्थन प्राप्त रहा। मायावती ने इस दौरान दलितों का कितना विकास किया ये तो नहीं पता, लेकिन हाँ, उन्होंने पूरे राज्य को अपनी मूर्तियों से ज़रूर पाट दिया।

2012 के विधानसभा चुनाव में EC ने दिया था इन मूर्तियों को ढकने का आदेश

2012 के विधानसभा चुनाव में भी ये मुद्दा उठा था, क्योंकि विपक्षी दलों ने स्पष्ट कह दिया था कि विभिन्न पार्कों और चौराहों पर मायावती की मूर्तियाँ होने का मतलब है कि अचार संहिता का उल्लंघन हो रहा है। चुनाव आयोग ने इन मूर्तियों को ढकने के आदेश तो दे दिए, लेकिन ऐसा करने में अधिकारियों के पसीने छूट गए। इनमें से कई बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ थीं, ऐसे में उन्हें ढकना आसान काम नहीं था। उन्हें ढकने के लिए कई ट्रकों में भर कर प्लास्टिक शीट्स और कपड़े लाए गए थे।

मायावती ने न सिर्फ अपनी, बल्कि अपने राजनीतिक गुरु और बसपा के संस्थापक कांशीराम की कई मूर्तियाँ भी बनवाई थीं। उनका कहना था कि दलित चेहरों को सम्मान देने के लिए ऐसा किया जा रहा है। केवल उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और ‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR)’ का हिस्सा नोएडा में ही मायावती की एक दर्जन मूर्तियाँ बनवाई गई थीं। इसके अलावा इन दो शहरों में हाथियों की ही करीब 75 मूर्तियाँ थीं। बता दें कि बसपा का चुनाव चिह्न हाथी ही है।

इससे मतदाताओं के प्रभावित होने की आशंका थी, इसीलिए मायावती सरकार को चुनाव आयोग ने आदेश दिया कि इन मूर्तियों को ढँक दिया जाए। सरकारी दफ्तरों से लेकर सड़कों तक पर मायावती की मूर्तियाँ/तस्वीरें थीं, जिन्हें चुनाव के दौरान हटाया या ढँका गया। इनमें से कुछ मूर्तियाँ तो 15 फ़ीट (4.6 मीटर) की भी थीं। एक सरकारी अधिकारी ने तब कहा था कि इन मूर्तियों को हटाना उतना ही दुष्कर कार्य है, जितना कि हाथी का आकार होता है।

जब इन मूर्तियों को ढँका जाने लगा था, तब नोएडा में अधिकारियों को 1500 मीटर अतिरिक्त प्लास्टिक शीट्स मँगानी पड़ गई थी। चुनाव आयोग ने डेडलाइन भी दे दिया था। हालाँकि, बसपा ने तब इसे ‘प्राकृतिक न्याय’ के खिलाफ और एकपक्षीय बताया था। मायावती पर आरोप लगे थे कि उन्होंने सरकारी खजाने में से एक बड़ी रकम अपने महिमामंडन पर ही खर्च कर डाला। जबकि मायावती इन आरोपों को ‘दलित कार्ड’ खेलते हुए अपने खिलाफ हुई साजिश बताती थीं।

एक लीक हुए अमेरिकी कूटनीतिक केबल से यहाँ तक पता चला था कि मायावती ने एक खाली प्राइवेट जेट मुंबई भेज कर अपने लिए एक जोड़ी सैंडल मँगाए थे। हालाँकि, इन आरोपों को वो नकारती रही हैं। तब उत्तर प्रदेश की ऐसा नहीं था, जैसा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के 5 वर्ष पूरे होने पर दिख रहा है। तब राज्य विकास से महरूम था और स्वास्थ्य क्षेत्र में खासा फिसड्डी। साथ ही अपराध तो इतना था कि इसे माफियाओं और तथाकथित बाहुबलियों के लिए जाना जाने लगा था।

सुप्रीम कोर्ट में मायावती ने किया था अपने कदम का बचाव

भारत में मृत व्यक्ति की प्रतिमा लगवाने की परंपरा तो रही है, लेकिन मायावती इसे पुरानी परंपरा बताती थीं। अर्थात, आधुनिक होने का मतलब उनकी नजर में था – खुद की मूर्तियाँ लगवाना। ये मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुँचा था और मायावती ने अप्रैल 2019 में अपने इस कदम का सर्वोच्च न्यायालय में बचाव भी किया था। उन्होंने यहाँ तक कह दिया था कि ये मूर्तियाँ ‘लोगों की इच्छाओं का प्रतिनिधित्व’ करती हैं। सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने एक एफिडेविट दायर किया था।

उस एफिडेविट में उन्होंने कहा था, “सरकारी रुपए को अस्पतालों पर खर्च किया जाए या शिक्षा पर, ये सवाल चर्चा के लायक ज़रूर है लेकिन इसका फैसला अदालत नहीं सुना सकता।” 2009 में ही दायर की गई याचिका पर तब सुनवाई चल रही थी। इन मूर्तियों के लिए ब्रोंज, सीमेंट और मार्बल का इस्तेमाल किया गया था। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने यहाँ तक कहा था कि उनके विचार से मायावती को करदाताओं के बर्बाद किए गए रुपए वापस लौटाने चाहिए।

जब उन्होंने इस सम्बन्ध में आदेश न देते हुए मायावती को अपनी बात रखने का मौका दिया, तब बसपा सुप्रीमो ने इसे ‘एक दलित महिला का सम्मान’ बता कर बचाव किया था। उनका कहना था कि जब जनता और राज्य की विधानसभा ही चाहती है कि उनकी मूर्तियाँ बनें, तो वो इसके विरुद्ध कैसे जा सकती हैं। उन्होंने बताया था कि यूपी के बजट से इन मूर्तियों के लिए वित्त के प्रावधान किए गए थे, ताकि इन्हें देख कर लोग प्रेरणा लें। उन्होंने पूछा था कि कॉन्ग्रेस और भाजपा द्वारा बनाई गई प्रतिमाओं की बजाए एक ‘दलित महिला’ की मूर्तियों पर ही सवाल क्यों खड़े किए जा रहे हैं?

उन्होंने भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी, प्रथम उप-प्रधानमंत्री एवं गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल, पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी, मशहूर तेलुगु अभिनेता और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे TDP संस्थापक एनटी रामाराव और तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं जयललिता की मूर्तियों पर भी सवाल खड़े किए थे। बता दें कि मायावती ने जिन भी नेताओं का नाम लिया, वो भी दिवंगत हो चुके थे। हाथी की मूर्तियों को लेकर अदालत में मायावती का कहना था कि ये तो बस कुछेक कलाकृतियाँ हैं, उनकी पार्टी का चुनाव चिह्न नहीं।

अधिवक्ता रविकांत ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली थी। मूर्तियाँ और पार्क्स बनवाने को लेकर कई पर्यावरण सम्बंधित चिंताओं को भी नज़रअंदाज़ किया गया था। बताया जाता है कि मेमोरियल, पार्क और इन मूर्तियों को बनवाने के लिए सरकारी खजाने से 2600 करोड़ रुपए लुटाए गए थे। इन्हें बनवाने में 111 करोड़ रुपए की गड़बड़ी व अनियमितता का मामला भी सामने आया था, जो ‘प्रवर्तन निदेशालय (ED)’ की चौखट तक भी पहुँचा था। ये सारे गड़बड़झाले 2007-12 के दौरान ही हुए, जब मायावती मुख्यमंत्री हुआ करती थीं और

मायावती द्वारा बनवाई गई उन मूर्तियों की तस्वीरों को आप यहाँ देख सकते हैं। मायावती ने बाबसाहब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर की मूर्तियाँ भी बनवाई थीं, लेकिन अधिकतर मूर्तियों का आधार हाथी हुआ करता था। लखनऊ में गोमती नदी के किनारे एक ऐसे ही पार्क की स्थापना की गई। मायावती इन्हें ‘प्रेरणा स्थल’ नाम देती थीं। उस पार्क में हाथी की 64 मूर्तियाँ थीं। मायावती हाथी को ‘बहुजन समाज’ का प्रतीक बताती थीं। हालाँकि, योगी सरकार में अब ऐसी चीजें नहीं होती हैं।

‘पिछले 7 सालों में देश की नीतियाँ महिलाओं को लेकर और अधिक संवेदनशील हुईं’: पीएम मोदी ने राष्ट्रीय महिला आयोग के 30 वर्ष पूरे होने पर दी बधाई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार (31 जनवरी 2022) को राष्ट्रीय महिला आयोग के 30वें स्थापना दिवस के मौके पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से उन्हें बधाई दी। उन्होंने एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा, “30 वर्ष का पड़ाव, चाहे किसी व्यक्ति के जीवन का हो या फिर किसी संस्था का हो, ये बहुत अहम होता है। ये समय नई जिम्मेदारियों का होता है, नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ने का होता है। मुझे विश्वास है, अपनी स्थापना के 30वें वर्ष को राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा भी इसी रूप में देखा जा रहा होगा।”

पीएम मोदी ने कहा, “सदियों से भारत की ताकत हमारे छोटे स्थानीय उद्योग रहे हैं, जिन्हें आज हम MSME कहते हैं। इन उद्योगों में जितनी भूमिका पुरुषों की होती हैं, उतनी ही महिलाओं की भी होती हैं। आजकल महिलाएँ लोगों को रोजगार दे रही हैं। सरकार प्रधानमंत्री मुद्रा योजना जैसी विभिन्न योजनाओं के माध्यम से महिलाओं की सहायता कर रही है।”

प्रधानमंत्री ने आगे कहा, “भारत के लिंग अनुपात में भी वर्षों बाद काफी सुधार हुआ है। स्कूलों से लड़कियों की ड्रॉपआउट दर कम हुई है। ऐसा इसलिए हुआ है, क्योंकि महिलाएँ बेटी बचाओ, बेटी पढाओ अभियान से खुद जुड़ गई हैं। आज जिन 9 करोड़ महिलाओं को पहली बार गैस कनेक्शन मिला है, वे महिला सशक्तिकरण की प्रतिमूर्ति हैं। आज जिन करोड़ों महिलाओं ने शौचालय बनवाया है, वे महिला सशक्तिकरण की प्रतिमूर्ति हैं।”

उन्होंने यह भी कहा कि पिछले 7 सालों में देश की नीतियाँ महिलाओं को लेकर और अधिक संवेदनशील हुई हैं। आज भारत उन देशों में है, जो अपने यहाँ सबसे अधिक मातृत्व अवकाश देता है। कम उम्र में शादी बेटियों की पढ़ाई और करियर में बाधा न बने, इसलिए बेटियों की शादी की उम्र 21 साल करने का प्रयास है।

ओमप्रकाश राजभर के बेटे ने पत्रकार अशोक श्रीवास्तव को दी थी धमकी, शिकायत दर्ज, कहा- ‘सपा सहयोगी राजभर के मुख्तार अंसारी से सम्बन्ध’

दूरदर्शन के वरिष्ठ पत्रकार अशोक श्रीवास्तव (Ashok Srivastava) ने सुहेलदेव भारतीय समाज (सुभासपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर के बेटे अरुण राजभर के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। हाल ही में अशोक श्रीवास्तव ने समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) के मुखिया अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) के गार्ड द्वारा पत्रकार की पिटाई का विरोध किया था। इसी पर अरुण ने अशोक को भी धमकी दे डाली। अशोक श्रीवास्तव ने मामले की शिकायत चुनाव आयोग और यूपी पुलिस से की है।

उन्होंने खुद ट्वीट करते हुए इसकी जानकारी दी है। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा, “सुभासपा के महासचिव अरुण राजभर ने कल मुझे पीटने की धमकी दी थी l जब हम ऐसी धमकियों को नज़रंदाज़ करते हैं तो ऐसी ताकतों का हौसला बढ़ता हैl फिर यूपी के चुनावों में पत्रकारों को कुछ ज्यादा ही निशाना बनाया जा रहा है। इसलिए यूपी पुलिस, गाजियाबाद पुलिस को रिपोर्ट दर्ज करा दी है l” ट्वीट में उन्होंने शिकायत की कॉपी के साथ ही अरुण राजभर के धमकी वाले ट्वीट का स्क्रीनशॉट भी शेयर किया है।

यूपी पुलिस के समक्ष दर्ज कराई गई शिकायत में अशोक श्रीवास्तव ने लिखा है, “शनिवार 29 जनवरी को गाजियाबाद में पत्रकार खालिद चौधरी के साथ श्री अखिलेश यादव के सुरक्षाकर्मियों द्वारा मारपीट किए जाने के विरोध में मैंने एक ट्वीट किया। मेरे इस ट्वीट पर प्रतिक्रिया देते हुए श्री अरुण राजभर, महासचिव सुभासपा (पुत्र श्री ओमप्रकाश राजभर, अध्यक्ष सुभासपा) ने मुझे ट्विटर पर पीटने की धमकी दी और अपशब्दों का प्रयोग किया। हालाँकि बाद में उन्होंने ये ट्वीट जिलीट कर दिया। लेकिन राजभर के संबंध मुख्तार अंसारी जैसे अपराधी-माफियाओं से हैं, इसलिए उनकी धमकी को गंभीरता से लेने की जरूरत है। कृपया इस संबंध में मेरी रिपोर्ट लिख कर उचित कार्रवाई करें।”

उन्होंने आगे इसमें अपने साथ 2012 में घटी घटना का भी जिक्र किया है, जब 2012 में यूपी चुनावों से पहले गाजियाबाद के कौशाम्बी से उन्हें 3 बंदूकधारियों ने किडनैप किया था और 6 घंटे बाद रिहा किया गया था। उनका कहना है कि ये मामला अभी तक सुलझा नहीं है। इसलिए उन्हें अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा की चिंता है।

गौरतलब है कि अखिलेश यादव के सामने पत्रकार के साथ हुई बदसलूकी मामले में अशोक श्रीवास्तव ने लिखा था, “जब सपा सरकार थी तब पत्रकार जगेंद्र को एक मंत्री के खिलाफ लिखने पर ज़िंदा जला दिया था। आज गाजियाबाद में अखिलेश यादव के सामने उनके बॉडीगार्ड्स ने पत्रकार खालिद चौधरी की पिटाई की। नई सपा या वही सपा?”

इस ट्वीट के बाद अरुण राजभर ने वरिष्ठ पत्रकार को लिखा, “आपकी पिटाई भी होनी चाहिए। दलाली करने का अवार्ड आप जैसे पत्तलकारों को मिलना चाहिए।” उल्लेखनीय है कि समाजवादी पार्टी की प्रेसवार्ता में पत्रकार से हुई बदसलूकी पर अरुण राजभर क्यों भड़के, इसके लिए जानना जरूरी है कि इस बार प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के ख़िलाफ़ समाजवादी पार्टी के साथ उनकी पार्टी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का गठबंधन है। पार्टी के महासचिव अरुण राजभर ने पिछले साल अक्टूबर में इसकी जानकारी खुद दी थी।

‘सुपरमार्केट और किराना की दुकानों में शराब बिक्री का फैसला दुर्भाग्‍यपूर्ण’: अन्ना हजारे ने ठाकरे सरकार को आड़े हाथों लिया

सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे (Anna Hazare) ने सोमवार (31 जनवरी 2022) को महाराष्ट्र सरकार को आड़े हाथों लेते हुए उनके सुपरमार्केट और किराना की दुकानों में शराब बिक्री के (Maharashtra Government) फैसले को दुर्भाग्‍यपूर्ण बताया। हजारे ने उद्धव ठाकरे सरकार का विरोध करते हुए कहा, “नशामुक्ति की दिशा में काम करना सरकार का कर्तव्य है, लेकिन मुझे यह देखकर दुख होता है कि वित्तीय लाभ के लिए सरकार ऐसे निर्णय ले रही है, जिसके परिणामस्‍वरूप लोगों को शराब की लत लगेगी।”

उन्होंने आगे कहा कि राज्य के लोग जहाँ सरकार के फैसले का विरोध कर रहे हैं, वहीं सरकार के लोग इसका समर्थन कर रहे हैं। यह राज्य के लोगों के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है कि महाराष्ट्र की सरकार ने केवल राजस्व के लिए शराब की बिक्री को इस तरह से प्राथमिकता दी है।

बता दें कि महाराष्ट्र सरकार ने 27 जनवरी को कैबिनेट की बैठक में किराना दुकानों और सुपर मार्केट में शराब की बिक्री का निर्णय लिया था। उन्होंने यह फैसला शराब की बिक्री से होने वाले राजस्व को बढ़ाने के लिए लिया है, जिसका भाजपा पुरजोर विरोध कर रही है।

इसके लिए राज्‍य सरकार 1000 वर्ग फुट से अधिक के सुपरमार्केट और किराना दुकानों में अलग काउंटर बनाकर शराब की बिक्री की अनुमति देगी। राकांपा प्रवक्ता और राज्य सरकार में मंत्री नवाब मलिक ने इस फैसले पर सहमति जताते हुए कहा था कि राज्य में शराब बनाने की कई फैक्ट्रियाँ हैं। यह फैसला शराब उत्पादकों की मदद के लिए ही लिया है।

वहीं, विपक्ष के नेता देवेंद्र फडणवीस ने विरोध जताते हुए कहा था कि राज्‍य की महाविकास अघाड़ी सरकार ने कोरोना काल में किसानों, गरीब और छोटे व्यापारियों के हित में एक भी फैसला नहीं लिया है। सरकार की प्राथमिकता तो सिर्फ शराब है। सत्ता के नशे में चूर सरकार को भी गरीबों की थोड़ी मदद करनी चाहिए।

‘धार्मिक भावनाएँ भड़का कर दंगे करवाना चाहते हैं ओवैसी, हिन्दुओं को नाहिद हसन जैसे लोग दे रहे हैं धमकियाँ’: करणी सेना ने दर्ज करवाई शिकायत

असदुद्दीन ओवैसी पर हिन्दुओं को अपमानित करके सांप्रदायिक दंगे भड़काने के मामले में करणी सेना ने उनके खिलाफ गाजियाबाद पुलिस में शिकायत की है। यह शिकायत गाज़ियाबाद के सिहानी गेट थाने में की गई है। शिकायत में AIMIM के राष्ट्रीय अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी पर हिंदुओं के खिलाफ अमर्यादित, जातिगत व आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग करने का आरोप लगाते हुए सिहानी गेट कोतवाली में शिकायत दी है। इस मामले में अभी तक ओवैसी पर मुकदमा दर्ज नहीं हुआ है। बता दें कि ओवैसी चुनाव प्रचार के सिलसिले में रविवार (30 जनवरी) को गाजियाबाद में थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक शिकायत में लिखा गया है, “पिछले कई दिनों से UP और पंजाब में चुनाव प्रचार में असदुद्दीन ओवैसी और सपा नेता नाहिद हसन ने हिन्दुओं को जान से मारने की धमकी दी है। ओवैसी के कार्यक्रमों में कोविड प्रोटोकॉल की धज्जियाँ उड़ रही हैं। वो हिंदुओं की विरुद्ध धार्मिक भावनाएँ भड़काकर साम्प्रदायिक दंगे करवाने की फिराक में हैं।”

एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक करणी सेना की शिकायत में पंजाब के पूर्व डीजीपी मोहम्मद मुस्तफा, सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य और आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद उर्फ़ रावण का भी नाम है। इन सभी पर जातिगत जहर घोलने और लोगों को भड़काने की कोशिश करने का आरोप है।

ओवैसी के खिलाफ गाजियाबाद के पुलिस प्रशासन को शिकायत देते करणी सेना के सदस्य

जानकारी के मुताबिक ओवैसी के दोनों प्रत्याशियों पर कोविड प्रोटोकॉल का पालन न करने पर महामारी एक्ट के तहत केस दर्ज किया गया है। यह केस लोनी और साहिबाबाद कोतवाली में दर्ज हुए हैं। इसमें दोनों प्रत्याशियों के अलावा भीड़ की शक्ल में मौजूद कुछ अन्य अज्ञात लोगों को भी आरोपित बनाया गया है।

गौरतलब है कि सहिबाबाद विधानसभा क्षेत्र में एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी ने रविवार (30 जनवरी, 2022) को अपनी पार्टी के प्रत्याशी मनमोहन झा गामा के लिए वोट माँगे। दोपहर डेढ़ बजे शहीद नगर पहुँचे असदुद्दीन ओवैसी का लोगों ने अपने घर और मस्जिद के बाहर माला और छतों से पुष्प वर्षा कर स्वागत किया।

‘आजम खान के बेटे ने चलाई थी मुझपर गोली, उसको नहीं मुझे है जान का खतरा’ : अपना दल प्रत्याशी हैदर अली खान का आरोप

भारतीय जनता पार्टी की गठबंधन पार्टी ‘अपना दल’ के स्वार उम्मीदवार हैदर अली खान ने चुनावों से पहले समाजवादी पार्टी पर बड़ा आरोप मढ़ा है। हैदर खान का कहना है अब्दुल्ला आजम खान और सपा के गुंडे उनकी हत्या करवा सकते हैं। हैदर अली खान ने बताया कि 30 साल पहले उनके दादा मिक्की मियां की भी सड़क हादसे में मौत हो गई थी और अब उन्हें शक है कि उनकी हत्या भी करवाई जा सकती है।

गौरतलब है कि हैदर अली खान का नाम पिछले कुछ दिनों से मीडिया में चर्चा में बना हुआ है। 2014 के बाद से वह एनडीए के पहले मुस्लिम प्रत्याशी हैं। बीजेपी की अगुवाई वाली नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस (NDA) में शामिल अपना दल ने उन्हें रामपुर की स्वार सीट से अपना प्रत्याशी बनाया है। हैदर खान नवाब खानदान से ताल्लुक रखते हैं और इस बार उनका मुकाबला आजम खान के बेटे अब्दुल्ला आजम खान से होगा। उनका कहना है कि उनके ऊपर दो बार गोली चल चुकी है। अच्छे नसीब के कारण वह बच गए। वह दावा करते हैं कि उन्हें 14 फरवरी से पहले मारने की साजिश रची जा रही है।

हैदर अली खान का आरोप

यहाँ मालूम हो कि हैदर से पहले अब्दुल्ला आजम खान ने सोमवार को एक प्रेसवार्ता की थी। इसी मीटिंग में उन्होंने बीजेपी पर हत्या की साजिश रचे जाने का आरोप लगाया था। इस प्रेस वार्ता के बाद ही हैदर ने आज मीडिया से बात की। मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा, “अब्दुल्ला की नहीं, बल्कि मेरी जान को खतरा है। मेरे दादा मिक्की मियाँ की भी सड़क हादसे में मौत हुई थी और जिस ट्रक से पूरा हादसा हुआ था, वह चोरी का था। इस घटना से आजम खान को सीधा फायदा हुआ था। हमें लगता है कि उनकी हत्या कराई गई। इस मामले में सीबीआई जाँच होनी चाहिए।”

जी न्यूज के अनुसार, हैदर ने अब्दुल्ला पर आरोप लगाते हुए कहा, “2014 में मुझे भगाने के लिए गोली चलाई गई थी। इस हमले में मैं बच गया। फिर, 2017 में अब्दुल्ला ने खुद मेरे ऊपर गोली चलाई, जिसमें दो एसओजी वाले इनके साथ मौजूद थे। गोली मेरे कॉलर से लगकर ऊपर गई। मेरी किस्मत हर बार इतनी तो अच्छी नहीं हो सकती कि मैं हर बार बच जाऊँ।”

वह आरोप लगाते हैं कि रामपुर में अधिकारियों पर सपा के गुंडे दबाव बना रहे हैं। उनका कहना है कि स्वार सीट के आरओ बने उप जिलाधिकारी ने दबाव में आकर नामांकन पत्र स्वीकार करने की रिपोर्ट टाइम से पहले ही दे दी थी। हैदर ने दावा किया कि तीन बजे तक उनको आपत्ति दाखिल करनी थी, लेकिन उन्होंने 11:30 बजे ही नामांकन पत्र सही होने की रिपोर्ट दे दी। वह कहते हैं कि उन्होंने इस संबंध में शिकायत भी की है।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, हैदर खान ने कहा, “सपा शासनकाल में रामपुर के लोगों पर बहुत जुल्म हुए। बेकसूर लोगों को जेल भेजा गया। एनकाउंटर के नाम पर लोगों को मारा गया। इन सब मामलों की सीबीआई जाँच होनी चाहिए । रामपुर में निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए अर्धसैनिक बलों की तैनाती की जानी चाहिए। ऐसे स्पेशल अधिकारियों को लगाया जाए जो उत्तर प्रदेश से बाहर के हों।”

अब्दुल्ला आजम खान का डर

उल्लेखनीय है कि हैदर से पहले आजम खान ने अपना डर जाहिर करते हुए कहा था कि उन्हें अपनी सुरक्षा में तैनात पुलिस अधिकारियों पर भी भरोसा नहीं है। उन्हें नहीं मालूम कि कब कौन उन्हें गोली मार दे। अब्दुल्ला ने बीजेपी पर हत्या की साजिश रचने का भी आरोप मढ़ा था। उनका कहना था कि उनकी रेकी की जा रही है। उनका पीछा हो रहा है। उन्हें खबर मिली है कि चुनाव से पहले उन्हें सड़क हादसे में मारने की कोशिश हो सकती है या फिर उन्हें फर्जी केस में जेल भेजा जा सकता है।

‘हमलोग उनके बंधुआ मजदूर नहीं हैं’: CM ममता बनर्जी ने राज्यपाल जगदीप धनखड़ को ही किया ब्लॉक, राष्ट्रपति से भी की शिकायत

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्यपाल के बीच तनातनी एक बार फिर सामने आई है। 31 जनवरी, 2022 को एक बैठक के दौरान ममता बनर्जी ने कहा कि उन्होंने ट्विटर पर पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ को ब्लॉक कर दिया है।

इसका ठीकरा भी राज्यपाल पर फोड़ते हुए उन्होंने कहा, “वह हर सुबह शाम हम पर आरोप लगाते और हमला करते हुए ट्वीट करते हैं। मानो वही सर्वोच्च हैं और हम बंधुआ मजदूर हैं। मैं यह सब और नहीं झेल सकती। मैंने आज उन्हें Twitter पर ब्लॉक कर दिया है।”

TMC सांसद ने की राष्ट्रपति से राज्यपाल की शिकायत

तृणमूल कॉन्ग्रेस के सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय ने सोमवार को कहा है कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से राज्यपाल धनखड़ को राज्य से हटाने का अनुरोध किया गया था। उन्होंने कहा कि जब अनुरोध किया गया था, तब उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू भी मौजूद थे।

उल्लेखनीय है कि हाल के महीनों में कई मुद्दों पर राज्यपाल और राज्य सरकार आमने-सामने आ गई है, खासकर राज्य चुनावों के बाद पश्चिम बंगाल में भाजपा कार्यकर्ताओं के खिलाफ भड़की हिंसा के बाद।

रविवार (30 जनवरी, 2022) को, महात्मा गाँधी को उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि देते हुए, राज्यपाल ने कहा था कि उन पर लक्षित अपमान उन्हें अपने कर्तव्यों का पालन करने से नहीं रोक सकते। उन्होंने कहा कि हिंसा और लोकतंत्र एक साथ नहीं चल सकता।

पानी में जहर, खाना बंद… जब 40000 हिंदुओं को घेरकर की फायरिंग: दलितों की लाश से बंगाल के बाघ बन गए आदमखोर

तारीख थी 31 जनवरी 1969। पश्चिम बंगाल के सुंदरबन में एक द्वीप पर बसे हिंदू शरणार्थियों पर पुलिस ने फायरिंग की। इस घटना को हम मरीचझापी नरसंहार (Marichjhapi Massacre) के नाम से जानते हैं। आजाद भारत के इस सबसे भीषण नरसंहार में मार डाले गए हिंदू शरणार्थियों की संख्या को लेकर यकीनी तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता। इस नरसंहार की याद में बंगाल बीजेपी की ओर से मार्च किया गया है। मकसद उन असहाय शरणार्थियों को याद करना है जो वामपंथी शासनकाल में मार डाले गए।

मरीचझापी में मार डाले गए हिंदू शरणार्थियों की संख्या सरकारी फाइलों में 10 बताई जाती है। अलग-अलग आकलनों में यह संख्या 10 हजार तक पहुँचती है। जो मारे गए उनमें ज्यादातर दलित (नामशूद्र) थे। जिनकी शह पर नरसंहार हुआ, वह दलितों के वोट से बंगाल में दशकों तक राज करने वाले वामपंथी थे। नरसंहार और उसे इतिहास के पन्नों से मिटा देने की साजिश को जिसकी मौन सहमति हासिल थी, वह कॉन्ग्रेस थी।

बंगाल में अपने तीन दशक के शासनकाल में वामपंथियों ने जो खूनी खौफ कायम किया था, उसका ही असर है कि करीब चार दशक पुरानी इस घटना का ज्यादा ब्यौरा नहीं मिलता। अमिताव घोष की किताब ‘द हंग्री टाइड्स’ की पृष्ठभूमि यही नरसंहार है। इसके अलावा आनंद बाजार पत्रिका और स्टेट्समैन जैसे उस समय के अखबारों में इस घटना का एकाध विवरण मिलता है। इसका सबसे खौफनाक और प्रमाणिक विवरण पत्रकार दीप हालदार की किताब ‘ब्लड आइलैंड (Blood Island: An Oral History of the Marichjhapi Massacre)’ में है। दीप ने इस नरसंहार में जीवित बच गए लोगों और इससे जुड़े अन्य किरदारों के मार्फत उस खौफनाक घटना का विवरण पेश किया है।

आप जानकर हैरत में रह जाएँगे कि वाम मोर्चे की सरकार ने जिनलोगों की हत्याएँ की उन्हें यहाँ बसने के लिए भी उसने ही प्रोत्साहित किया था। यह तब की बात है जब वामपंथी सत्ता में नहीं आए थे और हिंदू नामशूद्र शरणार्थी उन्हें अपना शुभेच्छु मानते थे। वामदलों की शह पर खासकर, राम चटर्जी जैसे नेताओं के कहने पर ये नामशूद्र शरणार्थी दंडकारण्य से आकर दलदली सुंदरबन डेल्टा के मरीचझापी द्वीप पर बसे। अपने पुरुषार्थ के बल पर बिना किसी सरकारी मदद के इस निर्जन द्वीप को रहने लायक बनाया। खेती शुरू की। मछली पकड़ने लगे। स्कूल, क्लीनिक तक खोल लिए।

नामशूद्र दलित हिंदुओं का यह समूह उस पलायन का एक छोटा सा हिस्सा था, जो बांग्लादेश में प्रताड़ित होने के बाद भारत के अलग-अलग हिस्सों में बसे। लेकिन, सत्ता में लौटने के बाद वामपंथियों को ये बोझ लगने लगे। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी 1979 में मरीचझापी द्वीप पर बांग्लादेश से आए करीब 40,000 शरणार्थी थे। वन्य कानूनों का हवाला दे वामपंथी सरकार ने उन्हें खदेड़ने का कुचक्र रचा। 26 जनवरी को मरीचझापी में धारा 144 लागू कर दी गई। टापू को 100 मोटर बोटों ने घेर लिया। दवाई, खाद्यान्न सहित सभी वस्तुओं की आपूर्ति रोक दी गई। पीने के पानी के एकमात्र स्रोत में जहर मिला दिया गया। पाँच दिन बाद 31 जनवरी 1979 को पुलिस फायरिंग में शरणार्थियों का बेरहमी से नरसंहार हुआ। प्रत्यक्षदर्शियों का अनुमान है कि इस दौरान 1000 से ज्यादा लोग मारे गए। लेकिन, सरकारी फाइल में केवल दो मौत दर्ज की गई।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार उच्च न्यायालय के आदेश पर 15 दिन बाद रसद आपूर्ति की अनुमति लेकर एक टीम यहाँ गई थी। इसमें जाने-माने कवि ज्योतिर्मय दत्त भी थे। दत्त के अनुसार उन्होंने भूख से मरे 17 व्यक्तियों की लाशें देखीं। 31 जनवरी की फायरिंग के बाद भी करीब 30,000 शरणार्थी मरीचझापी में बचे हुए थे। मई 1979 में इन्हें खदेड़ने पुलिस के साथ वामपंथी कैडर भी पहुॅंचे। 14-16 मई के बीच जनवरी से भी भीषण कत्लेआम का दौर चला। ‘ब्लड आइलैंड’ में इस घटना का बेहद दर्दनाक विवरण दिया गया है। मकान और दुकानें जलाई गईं, महिलाओं के बलात्कार हुए, सैंकड़ों हत्याएँ कर लाशों को पानी में फेंक दिया गया। जो बच गए उन्हें ट्रकों में जबरन भर दुधकुंडी कैम्प में भेज दिया गया।

साभार: दीप हालदार की किताब ‘ब्लड आइलैंड’

किताब में एक प्रत्यक्षदर्शी के हवाले से कहा गया है, “14-16 मई 1979 के बीच आजाद भारत में मानवाधिकारों का सबसे खौफनाक उल्लंघन किया गया। पश्चिम बंगाल की सरकार ने जबरन 10 हजार से ज्यादा लोगों को द्वीप से खदेड़ दिया। बलात्कार, हत्याएँ और यहाँ तक की जहर देकर लोगों को मारा गया। समंदर में लाशें दफन कर दी गईं। कम से कम 7000 हजार मर्द, महिलाएँ और बच्चे मारे गए।” इस किताब में मनोरंजन व्यापारी के हवाले से बताया गया है कि लाशें जंगल के भीतरी इलाकों में भी फेंके गए और सुंदरबन के बाघों को इंसानी गोश्त की लत गई। दलित लेखक व्यापारी फिलहाल उस तृणमूल कॉन्ग्रेस से विधायक हैं, जिसके समर्थकों पर बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद विरोधियों खासकर बीजेपी समर्थकों को निशाना बनाने के आरोप हैं।