गणतंत्र दिवस (Republic Day) की पूर्व संध्या पर केंद्र की मोदी सरकार (Modi Government) ने उत्तर प्रदेश के वाराणसी के आध्यात्मिक संत शिवानंद बाबा (Shivanand Baba) को पद्मश्री (Padma Shri Award) पुरस्कार देने का ऐलान किया। 126 साल की उम्र के बताए जा रहे शिवानंद बाबा दुनिया की चमक-धमक से दूर एकांत में रहकर ईश्वर की भक्ति में लीन रहते हैं। उन्हें योग का अच्छा ज्ञान है।
रिपोर्ट के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के कबीरनगर इलाके के रहने वाले शिवानंद बाबा के बारे में कहा जाता है कि उनका जन्म 8 अगस्त 1896 को हुआ था। इस तरह से देखा जाए तो वह दुनिया के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति है। हालाँकि, गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में जापान के चित्तेसु वतनबे के नाम विश्व में सबसे अधिक समय तक जीवित रहने का रिकॉर्ड है। शिवानंद बाबा के बारे में दिलचस्प बात यह है कि अभी भी वो पूरी तरह से स्वस्थ हैं।
बाबा की दिनचर्या
शिवानंद बाबा की दिनचर्या को ही उनके स्वस्थ रहने का राज बताया जा रहा है। शिवानंद बाबा के करीबियों का कहना है कि वो फल या दूध तक नहीं खाते हैं। शिवानंद बाबा केवल उबला हुआ भोजन करते हैं, जिसमें नमक की मात्रा काफी कम हो। इसके अलावा बाबा प्रतिदिन 3 बजे ब्रह्म मुहूर्त में उठ जाते हैं और एक घंटे योग का अभ्यास करते हैं। इसके बाद पूजा-पाठ करने के बाद वो अपने दिन की शुरुआत करते हैं। बाबा माँ चंडी और श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करते हैं। वो अपने भोजन को लेकर कहते हैं कि शुद्ध और शाकाहारी भोजन करने के कारण ही वो पूरी तरह से निरोगी हैं।
मोदी सरकार का जताया आभार
126 साल की उम्र में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री सम्मान से नवाजे जाने पर शिवानंद बाबा ने अपनी प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने भारत सरकार के प्रति आभार व्यक्त किया। उनके वैद्य डॉ एसके अग्रवाल कहते हैं कि बाबा बहुत ही सात्विक भोजन करते हैं और अनुशासन का पालन करते हुए जीवन जीते हैं। वो केवल खाने में सेंधा नमक का इस्तेमाल करते हैं। उनके जीवन में योग सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।
गौरतलब है कि भले ही बाबा शिवानंद दुनिया की चकाचौंध से दूर रहते हैं, लेकिन इससे पहले बॉलीवुड अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी के कारण लाइमलाइट में आ गए थे। दरअसल, बाबा के योगाभ्यास से प्रभावित शिल्पा शेट्टी ने उनके वीडियो को शेयर किया था, जिसके बाद उनकी चारों ओर चर्चा हुई थी।
अक्सर एक सवाल उठता है कि देश का राष्ट्रगान (National Anthem) ‘जन गण मन’ सबसे पहले कब गाया गया? इसका जवाब यह है कि 11 सितंबर 1942 को ‘जन गण मन’ को पहली बार जर्मनी के हैम्बर्ग में होटल अटलांटिक में राष्ट्रगान के रूप में बजाया गया था।
राष्ट्रगान के जन्म को लेकर लेखक अनुज धर (Anuj Dhar) ने 942 में रिकॉर्ड की गई इसकी मूल रिकॉर्डिंग को साझा किया। उन्होंने लिखा, “1942 में जर्मनी के हैम्बर्ग में रेडियो सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा के द्वारा जन गण मन बजाई गई। यह हमारे राष्ट्रगान का जन्म था। #नेताजी को धन्यवाद।” बता दें कि अनुज धर वही लेखकर हैं, जिन्होंने Subhas Bose’s Life after Death किताब को लिखा है। उन्होंने नेताजी के जीवन पर काफी रिसर्च किया है।
जर्मनी में रहने वाले नेताजी के पोते सूर्य कुमार बोस (Surya Kumar bose) ने भी साल 2008 में राष्ट्रगान के इस मूल टेप को पत्रकारों के सामने बजाया था। उन्होंने कहा था, “बहुत से लोग नहीं जानते कि राष्ट्रगान का जन्म कैसे हुआ।” कहा जाता है कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस इंडो-जर्मन एसोसिएशन बनाना चाहते थे, जिसकी शुरुआत 11 सितंबर 1942 को हैम्बर्ग के होटल अटलांटिक में हुई थी। इस अवसर पर हैम्बर्ग के मेयर, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और जर्मन सरकार के प्रतिनिधि सहित तमाम लोग मौजूद थे। यहीं पर इसे पहली बार बजाया गया था।
उस मौके पर हैम्बर्ग के रेडियो सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा ने जर्मनी के राष्ट्रगान के साथ-साथ फ्री-इंडिया सेंटर के गान के रूप में राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ को बजाया था। फ्री-इंडिया सेंटर को जर्मनी और इटली जैसे देशों ने मान्यता दी थी। फ्री-इंडिया सेंटर 1943 में सिंगापुर में गठित आजाद हिंद फौज का पूर्ववर्ती संगठन था।
In 1947 we had no National Anthem. In January 1950, a delegation from India attended UN General Assembly in NYC. A member of the delegation carried a record of Jana Gana Mana, which was produced in Singapore by Azad Hind Govt. He handed over this record to the UN Orchestra.
फ्री-इंडिया सेंटर के सदस्य एनजी गणपुले ने ही राष्ट्रगान की धुन को सबसे पहले टेप में रिकॉर्ड किया था। गणपुले की मृत्यु के बाद टेप को ऑल इंडिया रेडियो को सौंप दिया गया था। इसे ऑल इंडिया रेडियो द्वारा 1980 में ‘निर्वासन में जन्मे राष्ट्रगान’ नामक कार्यक्रम में प्रसारित किया गया था।
उल्लेखनीय है कि 1947 में आजाद हुए भारत देश के पास उसका राष्ट्रगान नहीं था। जनवरी 1950 में भारत से एक डेलिगेशन अमेरिका के न्यूयॉर्क में हो रहे संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाग लेने के लिए गया था। उस दौरान आजाद हिंद सरकार द्वारा निर्मित जन गण मन की एक रिकॉर्डिंग एक प्रतिनिधिमंडल ने संयुक्त राष्ट्र को सौंपा था, जिसे बाद में बजाया गया।
On return to India, the delegation reported to Pt Nehru that Jana Gana Mana was played at the UN was highly appreciated by all those present. 26th January was approaching, and no alternative National Anthem had been found. This info is courtesy Netaji’s grandnephew Surya Bose.
भारत लौटने के बाद प्रतिनिधिमंडल ने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को को जानकारी दी कि जन गण मन की संयुक्त राष्ट्र में काफी सराहना की गई थी। बाद में 24 जनवरी 1950 को देश की संविधान सभा ने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा लिखे गए गीत ‘भरतो भाग्य बिधाता’ के पहले छंद को राष्ट्रगान के रूप में अपनाया। उल्लेखनीय है कि जनवरी 1950 तक देश के पास अपना राष्ट्रगान नहीं था, लेकिन इसे भारतीय संविधान सभा के सदस्यों द्वारा 14 अगस्त और 15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि में विधानसभा का पहला सत्र समाप्त होने के बाद सर्वसम्मति से गाया गया था।
महाराष्ट्र में मैसूर के क्रूर शासक टीपू सुल्तान पर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स का नाम रखे जाने को लेकर हिन्दू संगठन विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। मुंबई पुलिस ने ‘बजरंग दल’ के कई कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया है। हिन्दू संगठनों का कहना है कि महाराष्ट्र में कई बड़ी हस्तियाँ हुई हैं, ऐसे में हिन्दुओं का नरसंहार करने वाले कट्टर इस्लामी सुल्तान के नाम पर खेल के मैदान का नाम रखना उचित नहीं है। इस खेल मैदान को महाराष्ट्र की ‘महा विकास अघाड़ी (MVA)’ सरकार में मंत्री टेक्सटाइल मंत्री असलम शेख ने बनवाया है।
मंत्री असलम शेख ने कहा कि पिछले 70 वर्षों से टीपू सुल्तान के नाम को लेकर कोई विवाद नहीं था, लेकिन आज भाजपा ने अपने ‘गुंडों’ को भेज कर देश को ‘बदनाम करने’ का काम किया है। उन्होंने कहा, “भाजपा परियोजनाओं के नामों को लेकर बखेड़ा खड़ा कर के देश को विकास से वंचित रख रही है। हमें नामकरणों को लेकर किसी भी विवाद में नहीं पड़ना है।” बता दें कि स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स के बोर्ड और पोस्टरों में टीपू सुल्तान को ‘वीर’ कह कर भी सम्बोधित किया गया है।
There was no conflict on the name of Tipu Sultan in last 70 years, today BJP has sent its goons to defame the country & not let the country develop by creating ruckus over naming projects. We don't need to get into controversy over nomenclatures: Maharashtra Minister Aslam Shaikh pic.twitter.com/UZmCAYD0Qt
मलाड के मालवणी में पहले से ही मुंबई पुलिस ने बड़ी संख्या में अपने कर्मियों की तैनाती बढ़ा दी थी। साथ ही कहा गया था कि ‘माहौल को भंग करने’ वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। भाजपा कार्यकर्ता भी इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। भाजपा नेता प्रतीक कार्पे ने इसके पीछे शिवसेना की चुप्पी पर सवाल उठाए, जिसके मुखिया उद्धव ठाकरे फ़िलहाल महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री हैं। लोगों ने पूछा कि टीपू सुल्तान को कौन सा खेल आता था जो उसके नाम पर खेल मैदान बन रहा है?
जबकि मंत्री और कॉन्ग्रेस नेता असलम शेख का कहना है कि टीपू सुल्तान स्वतंत्रता से पहले का एकमात्र योद्धा था, जिसने अंग्रेजों से लड़ते हुए अपनी जान को ‘कुर्बान’ कर दिया। उन्होंने पूछा कि भाजपा नाम पर ध्यान केंद्रित क्यों रख रही है, बजाए जनता के लिए विकास की बात करने के? भाजपा विधायक राहुल नार्वेकर ने ीासे ‘छद्म सेक्युलरिज्म’ और ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ का एक उदाहरण बताते हुए कहा कि ये म्युनिसिपल गार्डन BMC (बृहन्मुम्बई महानगरपालिका) के अंतर्गत आता है, जिस पर शिवसेना की सत्ता है।
#LIVE | Another example of pseudo-secularism & appeasement; this municipal garden is under BMC which comes under Shiv Sena, they have to answer on this Congress decision to name a garden over Tipu Sultan: Rahul Narvekar, BJP MLAhttps://t.co/3AdouQWfxwpic.twitter.com/LEXXu5p6qm
कई शिवसेना कार्यकर्ताओं ने भी मुंबई में इस स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स को टीपू सुल्तान के नाम पर रखने के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। भाजपा नेता राम कदम ने कहा कि हिंदुत्व पर दूसरों को नसीहत देने वाले उद्धव ठाकरे अपने ही मंत्री के कृत्य पर चुप हैं। उन्होंने टीपू सुल्तान को हजारों हिन्दुओं का हत्यारा बताते हुए कहा कि महाराष्ट्र की भूमि पर उसके नाम पर लोकार्पण को सीएम बर्दाश्त करेंगे? BMC में चुनाव भी होना है। असलम शेख मालवणी से ही विधायक भी हैं।
बता दें कि 1799 में श्रीरंगपट्टम स्थित टीपू सुल्तान के हरम में 601 महिलाएँ थीं। ये महिलाएँ सिर्फ टीपू सुल्तान की ही नहीं, बल्कि उसके अब्बा हैदर अली की भी थीं। इनमें से 333 महिलाएँ टीपू सुल्तान की थीं और 268 महिलाएँ उसके अब्बा हैदर अली की। हैदर अली की मौत के बाद भी वो महिलाएँ उस हरम में थीं। ‘जनाना’ की रखवाली के लिए नपुंसकों/हिजड़ों (Eunuchus) को रखा गया था। इतिहास में इसका जिक्र है कि वो अपने राज्य की भी किसी भी लड़की को उठा कर वहाँ मँगवा लेता था, जिनमें से अधिकतर ब्राह्मणों की बेटियाँ थीं।
उत्तर प्रदेश चुनाव (Uttar Pradesh Assembly Polls) से पहले दल-बदल करते हुए भाजपा छोड़कर समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) में शामिल हुए स्वामी प्रसाद मौर्य (Swami Prasad Maurya) बुरे फँस गए हैं। उन्होंने स्वीकार कर लिया है कि जितना रोजगार (Jobs) पिछली सरकारों ने बीते 10 साल में नहीं दिया, उतना रोजगार योगी आदित्यनाथ (Yogi Aadityanath) की सरकार ने केवल पाँच साल में दिया है। उन्होंने बताया कि योगी सरकार के पाँच साल के कार्यकाल में श्रम मंत्री के रूप में निजी क्षेत्र में उन्होंने पाँच लाख लोगों को रोजगार दिया है।
सपा की साइकिल की सवारी कर रहे मौर्य टीवी चैनल आज तक के कार्यक्रम हल्ला बोल में बतौर अतिथि आए थे। सामने थीं एंकर अंजना ओम कश्यप। हाल ही में बीजेपी में शामिल हुए आरपीएन सिंह को लेकर डिबेट हो रही थी और स्वामी प्रसाद मौर्य आरपीएन सिंह (RPN Singh) पर निशाना साध रहे थे। मौर्य ये साबित करने की कोशिश कर रहे थे कि आरपीएन सिंह का सियासी कद उनके सामने छोटा है। इस पर एंकर ने सवाल किया कि योगी सरकार में पाँच साल तक श्रम मंत्री रहते हुए आपने कितने लोगों को रोजगार दिया था?
यही वो सवाल था, जिस पर स्वामी प्रसाद मौर्य फँस गए। उन्होंने एंकर के सवाल के जवाब में योगी सरकार के कार्यकाल की तारीफ कर दी। मौर्य ने कहा, “श्रमिकों के कल्याण के लिए 2009 में बोर्ड का गठन हुआ। 2009 से लेकर 2017 तक कुल मिलाकर सात लाख श्रमिक लाभार्थी थे। हमारे कार्यकाल में एक करोड़ लाभार्थी हुए। पूर्व की सरकारों के कार्यकाल में मात्र 34 लाख मजदूरों का रजिस्ट्रेशन हुआ था, लेकिन आज 1.30 करोड़ से अधिक श्रमिकों का रजिस्ट्रेशन हुआ है।”
स्वामी प्रसाद मौर्य ने चैनल पर यह भी दावा किया कि जितना रोजगार पिछली सरकारों के 10 सालों में नहीं दिया गया, उन्होंने श्रम मंत्री रहते हुए निजी क्षेत्रों में पाँच लाख से अधिक रोजगार दिए। स्वामी प्रसाद मौर्य के इस बयान के बाद बीजेपी ने उन पर कटाक्ष किया है। बीजेपी ने कहा कि अगर योगी सरकार ने इतना अच्छा काम किया है तो वो फिर बीजेपी छोड़कर सपा में क्यों चले गए?
गौरतलब है कि योगी सरकार में श्रम एवं रोजगार मंत्री रहे स्वामी प्रसाद मौर्य ने बीजेपी छोड़कर हाल ही में समाजवादी पार्टी थाम लिया था। उस दौरान कोविड प्रोटोकॉल का उल्लंघन करते हुए लखनऊ में हजारों की संख्या में भीड़ भी जुटाई गई थी। इसके बाद सपा के खिलाफ महामारी एक्ट के तहत केस दर्ज किया गया था।
गणतंत्र दिवस के मौके पर मध्य प्रदेश के जबलपुर-प्रयागराज नेशनल हाईवे यानी NH-30 पर स्थित एक ओवरब्रिज को टाइम बम से उड़ाने की कोशिश की गई। ये हाईवे कश्मीर और कन्याकुमारी को जोड़ता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बम को रीवा के मनगवां इलाके में ओवरब्रिज के नीचे लगाया गया था। पुलिस ने बताया कि टाइम बम को यदि सेट समय से 5 मिनट पहले BDS (बम निरोधक दस्ता) द्वारा डिफ्यूज नहीं किया जाता तो बड़ा हादसा हो सकता था।
पुलिस के मुताबिक, ब्रिज की दीवार पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम धमकी भरा पत्र भी मिला है। पत्र में लिखा है, “यूपी का सीएम योगी ये रोक सकता है। बाकी जानकारी 8/112022 बोतल बम के अंदर है प्रयागराज पुलिस, नहीं तो कार और बस जलेगा।”
उन्होंने बताया, आज सुबह 6 बजे पुलिस को NH-30 पर स्थित एक ओवरब्रिज पर टाइम बम लगे होने की जानकारी मिली। इसके बाद पुलिस 7 बजे वहाँ पहुँची। उन्होंने कहीं कोई बड़ा हादसा ना हो जाए, इस भय से हाईवे पर ट्रैफिक को रोक दिया और SP नवनीत भसीन को इसकी जानकारी दी।
इसके बाद करीब 9.30 बजे बम निरोधक दस्ते ने बम को डिफ्यूज कर दिया। हालाँकि, अभी तक बम किस तरह का था और उसकी क्षमता कितनी थी, इसका खुलासा नहीं हो पाया है। वहीं, ADGP केपी व्यंकटेश राव का कहना है कि UP चुनाव को लेकर किसी शरारती तत्व ने ये हरकत की है। हमने उत्तर प्रदेश के डीजीपी को इसकी सूचना दे दी है। जल्द ही सभी आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया जाएगा।
भारत के इतिहास में पहली बार 73वें गणतंत्र दिवस पर श्रीनगर के लाल चौक (क्लॉक टॉवर) में घंटा घर के ऊपर देश का तिरंगा झंडा फहराया गया। इस दौरान वहाँ पर सुरक्षा के भारी इंतजाम किए गए थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बुधवार (26 जनवरी 2022) को स्थानीय लोगों ने एनजीओ और प्रशासन के साथ मिलकर लाल चौक टॉवर के ऊपर झंडा फहराया। दो स्थानीय कार्यकर्ता साजिद यूसुफ शाह और साहिल बशीर को एक क्रेन द्वारा घंटाघर के ऊपर ले जाया गया, यहाँ उन्होंने झंडा फहराया।
झंडा फहराने के बाद कार्यकर्ता साहिल बशीर ने कहा, “आजादी के बाद से हमने यहाँ केवल पाकिस्तानी झंडे ही फहराए देखे हैं। वो पाकिस्तान प्रायोजित तत्व थे, जो घाटी में शांति भंग करना चाहते थे। अनुच्छेद-370 के निरस्त होने के बाद से हम यहाँ पर जमीनी तौर पर कई बड़े बदलाव देख सकते हैं।”
उन्होंने कहा कि लोग पूछ रहे थे कि ‘नया कश्मीर’ का मतलब क्या है? इस पर उन्होंने जवाब दिया, “आज घंटा घर के ऊपर राष्ट्रीय ध्वज फहराना ‘नया कश्मीर’ का प्रतीक है। जम्मू-कश्मीर के लोग भी यही चाहते हैं। हमें कोई पाकिस्तानी झंडा नहीं चाहिए, हम शांति और विकास चाहते हैं।”
श्रीनगर के लाल चौक का देश में ऐतिहासिक महत्व है। वहीं, कश्मीर की राजनीति में भी लाल चौक स्थित घंटा घर का हमेशा से ही बड़ा महत्व रहा है। देश और जम्मू-कश्मीर के तमाम बड़े नेता इससे पहले घंटा घर के ऊपर राष्ट्रीय ध्वज फहराने की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन वह इसमें कभी भी सफल नहीं हुए।
एक अन्य कार्यकर्ता साजिद यूसुफ ने कहा, “भारत की आजादी के बाद से यह एकमात्र स्थान था, जहाँ राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहरा गया था। हमने यहाँ तिरंगा झंडा फहराने का फैसला किया और इसे कर दिखाया। इससे पहले बहुत से लोगों ने ऐसा करने की कोशिश की, लेकिन वे इसमें कामयाब नहीं हो सके। एक भारतीय के रूप में हमने यहाँ झंडा फहराया है और ऐसा करके हमें बेहद खुशी हो रही है।” बता दें कि कश्मीर में गणतंत्र दिवस समारोहों को सुचारू रूप से संपन्न कराने के लिए एहतियात के तौर पर बुधवार को मोबाइल इंटरनेट सेवाएँ बंद कर दी गईं।
उत्तर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर की दीवानी अदालत की गेट पर शुक्रवार (21 जनवरी, 2022) की दोपहर को बलात्कार की शिकार हुई एक नाबालिग बच्ची के पिता ने जमानत पर बाहर घूम रहे दिलशाद हुसैन की गोली मारकर हत्या कर दी थी। इसके बाद वामपंथी मीडिया में ये चलाया जा रहा है कि दिलशाद ने हिन्दू धर्म अपना कर शादी की थी और ये दो ‘वयस्कों’ के बीच सहमति का मामला है। हालाँकि, बिहार के मुजफ्फपुर जिले के सकरा थाना क्षेत्र के विधिपुर के रहने वाले मृतक दिलशाद हुसैन की सच्चाई कुछ और ही है।
ऑपइंडिया ने इसकी तहकीकात करने के लिए हैदराबाद के उस आर्य समाज मंदिर से संपर्क किया, जहाँ दिलशाद ने लड़की के साथ शादी की थी। सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने इस शादी की तस्वीरें साझा करते हुए दावा किया था कि दिलशाद ने हिन्दू धर्म अपना कर हिन्दू रीति-रिवाज से सारी प्रक्रियाएँ पूरी की। ‘लल्लनटॉप’ और ‘जनज्वार’ जैसे मीडिया संस्थानों ने इस नैरेटिव को आगे बढ़ाया था। तो क्या दिलशाद ने इस्लाम छोड़ कर हिन्दू धर्म अपना लिया था? आइए, सच्चाई बताते हैं।
हैदराबाद के आर्य समाज मंदिर ने बताए दिलशाद के शादी-धर्मांतरण सम्बंधित विवरण
आर्य समाज के मंदिर ने ऑपइंडिया से बात करते हुए बताया कि उन्हें लड़की का ‘उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड’ का इंटरमेडिएट का प्रमाण-पत्र दिया गया था। उत्तर प्रदेश के जौनपुर स्थित ‘वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय’ का स्नातक प्रथम वर्ष (BA) का प्रमाण-पत्र सबमिट किया। उन्होंने ये भी जानकारी दी कि लड़की का जो आधार कार्ड पहचान पत्र के रूप में दिया गया, उसमें उसकी जन्मतिथि 5 दिसंबर, 1998 अंकित है। इस हिसाब से उन्हें बताया गया कि लड़की वयस्क है और 21 वर्ष की है।
वहीं दिलशाद ने शादी के लिए अपने पहचान के रूप में आधार कार्ड और पैन कार्ड सबमिट किए थे। हैदराबाद स्थित आर्य समाज मंदिर की तरफ से बताया गया कि पुलिसकर्मी तेलंगाना आए थे, जहाँ से लड़के और लड़की को लेकर चले गए थे। उन्होंने बताया कि बच्ची से मंदिर में प्यार और विवाह को लेकर प्रश्न किए गए थे (जैसे क्या माता-पिता तुम्हारे सहमत हैं, कैसे प्यार हुआ, तुम सब कहाँ-कैसे मिले) और इस संवाद का वीडियो मंदिर के पास अभी भी उपलब्ध है।
पंडित जी ने बताया कि पूरी पुष्टि करने के बाद ही आर्य समाज मंदिर में विवाह किया जाता है। हालाँकि, उन्होंने कहा कि दिलशाद की हत्या हो गई है और मामले अदालत में चल रहा है, इसीलिए इस वीडियो के वायरल होने के बाद उन्हें भी कानूनी दाँवपेंच का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने ये भी कहा कि अगर उन्हें समन आता है और पूछताछ की जाती है तो वो इसमें सहयोग के लिए तैयार हैं। उन्होंने बताया कि कुछ दिन पहले दिलशाद उनके पास आया भी था।
वहाँ उन्होंने उसे कहा कि तुमलोगों का विवाद हिन्दू रीति-रिवाजों से हो चुका है और लड़का-लड़की वयस्क होने के साथ-साथ सहमत भी हैं, तो न्यायालय को ये प्रमाण-पत्र दिए जाने चाहिए थे। दिलशाद का धर्मांतरण प्रमाण-पत्र भी बना था। वहीं उन्होंने बताया कि लड़की के पिता भागवत निषाद ने अपनी बेटी का जन्म प्रमाण पत्र सबमिट कर के पुलिस/न्यायालय को बताया कि वो नाबालिग है। उक्त आर्य समाज मंदिर हैदराबाद के ‘चेंगिचेरला’ क्षेत्र में स्थित है।
हैदराबाद के आर्य समाज मंदिर में दिलशाद हुसैन ने फरवरी 2019 में की थी शादी
मंदिर के पुजारी पंडित गणेश कुमार शास्त्री का कहना है कि दिलशाद का हिन्दू धर्म में धर्मांतरण करने के बाद ही शादी की अनुमति दी गई थी। उनका कहना है कि उन्हें जो दस्तावेज सौंपे गए, उसके हिसाब से लड़की बालिग़ है। उन्हें भी अख़बार से ही पता चला कि दिलशाद को भागवत निषाद ने गोली मारी। वो लगभग दो महीने पहले तस्वीरें लेने के लिए मंदिर आया हुआ था। धर्मांतरण वाले सर्टिफिकेट में 13 फरवरी, 2020 की तारीख़ लिखी है। धर्मांतरण के बाद उसका नाम बदल कर ‘दिलराज’ रखा गया था।
उसके पिता का नाम ताहिर हुसैन है। साथ ही उसकी जन्मतिथि 1 जनवरी, 1991 दी गई थी। इस हिसाब से उसकी उम्र 31 वर्ष हुई। इन बातों से साफ़ है कि दिलशाद ने अपना नाम धर्मांतरण के बाद हिन्दू बन कर ‘दिलराज’ रखा तो सही, लेकिन ये सब सिर्फ शादी के लिए किया गया था। क्योंकि, सोशल मीडिया पर उसने अपना नाम ‘दिलशाद हुसैन दिलराज’ रखा हुआ था। उसने अपनी मुस्लिम पहचान को अपने साथ कायम रखा था। आगे हम आपको इसके और भी सबूत दिखाएँगे।
शादी के लिए हिन्दू धर्मांतरण के बावजूद मुस्लिम ही बना हुआ था दिलशाद
गाँव विधिपुर में दिलशाद का अंतिम संस्कार इस्लामी रीति-रिवाज से हुआ था। उसे गाँव के लोगों ने इस बात की पुष्टि की है। सवाल ये है कि अगर वो हिन्दू बन गया था तो उसे जलाया जाता, जबकि ऐसा नहीं हुआ। हिन्दू धर्म में कब्रिस्तान में दफनाने का रिवाज तो है नहीं। अब सवाल उठता है कि क्या दिलशाद हुसैन ने आर्य समाज मंदिर के साथ धोखाधड़ी करते हुए उन्हें लड़की का फर्जी आधार कार्ड सौंपा था? क्योंकि ऑपइंडिया के पास जो आधार कार्ड आया है, उसमें स्पष्ट दिख रहा है कि उसकी जन्मतिथि 21 दिसंबर, 2002 है।
अर्थात, इस हिसाब से अभी उसकी उम्र 19 वर्ष हुई, जबकि शादी के समय उसकी उम्र (13 फरवरी 2020) मात्र 17 वर्ष रही होगी। उसके वयस्क होने में अभी 10 महीने बाकी थे। गोरखपुर केंट थाना के इंस्पेक्टर इस मामले के ‘इन्वेस्टीगेशन ऑफिसर (IO)’ भी हैं, उन्होंने बताया कि जब दिलशाद हुसैन लड़की को लेकर भागा था, तब वो नाबालिग थी। इस हत्याकांड के मामले में लड़की के पिता भागवत निषाद को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। लड़के के हिन्दू धर्मांतरण के सम्बन्ध में उस समय पुलिस को कोई जानकारी नहीं थी।
गोरखपुर की अदालत ‘बार एसोसिएशन’ के अध्यक्ष भानु प्रताप पांडेय और स्थानीय पत्रकार धर्मेंद्र मिश्रा का कहना है कि दिलशाद हुसैन ने सिर्फ हिन्दू बनने का दिखावा किया था। अर्थात, उनका मानना है कि असल में उसने धर्म-परिवर्तन नहीं किया था और वो मुस्लिम ही बना हुआ था। दिलशाद हुसैन पर ‘यौन अपराध से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO)’ के तहत कार्रवाई की जा रही थी। इसके बावजूद वो अदालत से जमानत लेने में कामयाब रहा था।
जमानत की गुहार लगाते हुए वकील (जिन्होंने उसकी तरफ से वकालतनामा पेश किया) अरविंद मिश्रा का कहना था कि उनका मुवक्किल निर्दोष है और उसे किसी अन्य मंशा से गलत तरीके से फँसाया गया है। साथ ही लड़की के बयान का जिक्र किया गया था कि उसने अपनी सहमति से दिलशाद हुसैन के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाए और वो वयस्क है। लड़की के हवाले से कहा गया था कि वो आरोपित के साथ रहना चाहती है और उसके खिलाफ उसने कोई काम बलपूर्वक नहीं किया है।
वकील ने दिलशाद हुसैन के खिलाफ कोई आपराधिक इतिहास न होने की दलील भी दी थी। जबकि गोरखपुर बार के अध्यक्ष का कहना है कि एक निषाद परिवार के दरवाजे पर ही वो अपनी पंक्चर की दुकान चलाता था और वो नाबालिग लड़की को भगा ले गया। उन्होंने बताया कि वो अपने फेसबुक हैंडल से उलटी-सीधी टिप्पणियाँ करता रहता था, जिससे उद्वेलित होकर लड़की के पिता ने उसकी हत्या की। वहीं ‘दैनिक जागरण’ के कानूनी मामलों के स्थानीय पत्रकार धर्मेंद्र मिश्रा ने बताया कि शादी के लिए ही उसने धर्मांतरण को माध्यम बताया और हिन्दू नाम कर लिया, लेकिन वो मुस्लिम था और उसने हिन्दू धर्म स्वीकार नहीं किया था।
उनका कहना है कि उसकी गतिविधियाँ कुल मिला कर मुस्लिम वाली ही थी। भागवत निषाद के बेटे दीपक ने भी बताया कि दिलशाद हुसैन अभी भी मुस्लिम ही था। साथ ही उन्होंने जानकारी दी वो उनके घर वालों को वो काफी परेशान भी कर रहा था। फोन कॉल कर के धमकियाँ देता था और उलटी-सीधी बातें किया करता था। वहीं दिलशाद हुसैन के वकील शंकर शरण शुक्ला ने कहा कि युवक के परिवार वालों ने बताया है कि उनके बीच चल रहा मुकदमा भी इस रंजिश का कारण है।
उन्होंने कहा कि दिलशाद हुसैन ने हिन्दू धर्म अपना लिया था और फिर शादी की थी, इस साक्ष्य को प्रथम दृष्टया सही मना जाए और उच्च-न्यायालय में अपील दायर करते हुए भी इसे पेश किया गया था। हालाँकि, मौत के बाद दिलशाद हुसैन को इस्लामी तौर-तरीके से ‘सुपुर्द-ए-ख़ाक’ किए जाने के सम्बन्ध में पूछे जाने पर उन्होंने कोई टिप्पणी नहीं की। लड़की के नाबालिग होने के सवाल पर उन्होंने कहा कि ये चीजें सभी पक्ष अपने-अपने हिसाब से बताते हैं और ऐसे मामलों में अभियोजन पक्ष नाबालिग बताता है और डिफेंस बालिग बताता है।
इस्लामी रीति-रिवाज से किया गया ‘सुपुर्द-ए-ख़ाक’: गाँव के लोगों और परिवार ने भी की पुष्टि
वहीं बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित विधिपुर में रहने वाले दिलशाद हुसैन के बचपन के दोस्त ऋतिक पटेल ने कहा कि उसे गाँव के कब्रिस्तान में ही दफनाया गया है। गाँव में ही मुस्लिमों का अलग से कब्रिस्तान भी है। उसे बताया कि हिन्दू होने का कारण हमलोग इस प्रक्रिया में नहीं गए। जबकि मृतक के पिता का कहना है कि उनके बेटे ने बालिग लड़की से शादी की थी, लेकिन उस रंजिश में उसकी हत्या कर दी गई। हत्या की FIR में उन्होंने यही लिखवाया है।
दिलशाद के गाँव की उप मुखिया के पति मोहम्मद रउफ ने भी इस बात की पुष्टि की कि उसे इस्लामी तौर-तरीके से ‘सुपुर्द-ए-ख़ाक’ किया गया है और पूरी प्रक्रिया में वो उसके परिजनों के साथ ही रहे हैं। पुश्तैनी कब्रिस्तान में फातिहा इत्यादि पढ़ कर ये प्रक्रिया पूरी की गई। मौत वाले दिन वो सुबह 7 बजे बाइक से निकला था। कुछ देर बाद उसके वकील ने फोन किया और यहाँ से वो भी परिवार के साथ निकले। उन्होंने आरोप लगाया कि गोरखपुर पुलिस लाश लेकर जल्दी वापस जाने का दबाव बना रही थी।
मोहम्मद रउफ का कहना है कि दोनों परिवारों के घर आमने-सामने थे और लड़का-लड़की बचपन से दोस्त थे, साथ पढ़ते थे। जबकि दिलशाद हुसैन के पिता ताहिर हुसैन का कहना है कि भागवत निषाद उनके बचपन के दोस्त थे और हत्या के बाद लॉकअप में बंद निषाद से उनकी बात भी हुई। उन्होंने बताया कि उन्होंने ही 30 वर्ष पहले पंक्चर की दुकान खोली थी, जिसे अब उनका बेटा दिलशाद चला रहा था। उन्होंने बताया कि गाँव के इमाम मोहम्मद ज़हूर आलम ने इस्लामी प्रक्रिया से उनके बेटे की अंतिम प्रक्रिया पूरी की और फातिहा पढ़ा।
दिलशाद हुसैन का विधिपुर स्थित घर, जहाँ लगी है मक्का-मदीना की तस्वीर
सवाल ये भी उठता है कि जो व्यक्ति पंक्चर की दुकान चलाता है, उसका हैदराबाद से लड़की को लेकर फ्लाइट से आना-जाना, सोशल मीडिया पर लक्जरी लाइफ जीने की तस्वीरें पोस्ट करना और इलाहाबाद उच्च-न्यायालय से एक गंभीर मामले में जमानत भी पा जाना – ये सब सवाल खड़ा करता है कि क्या उसके पीछे किसी का वित्तीय बैक-अप था? क्योंकि उसके अब्बा का कहना है कि वो बेरोजगार हैं और परिवार के पास खेती की जमीन तक नहीं है। उसके गाँव के घर पर अभी भी मक्का-मदीना और काबा की तस्वीर लगी हुई है। जमानत के बाद वो गाँव में ही रह रहा था।
दिलशाद हुसैन का एक भाई हैदराबाद में रहता था और वो वहाँ से उसे रुपए वगैरह भेजते थे। एक ने होटल मैनेजमेंट किया है, लेकिन दुर्घटना के बाद याददाश्त चले जाने के कारण वो घर पर ही रहता था। उसके परिजनों का कहना है कि गाँव में कभी वो लड़की को लेकर नहीं आया। उनका कहना है कि ताहिर हुसैन ने जब लॉकअप में बंद भागवत निषाद से पूछा कि ये तुमने क्या किया, तो उन्होंने जवाब दिया कि और मैं करता भी क्या? मोहम्मद रउफ का कहना है कि जेल से लौट कर आने के बाद उसने ईद की नमाज पढ़ी थी। इससे साफ़ है कि वो हिन्दू नहीं बना था और मुस्लिम ही था।
73 वें गणतंत्र दिवस के मौके पर गीता प्रेस के अध्यक्ष रहे ‘राधेश्याम खेमका (RadheyShyam Khemka)’ को पद्म पुरस्कार से सम्मानित किए जाने का ऐलान हुआ है। उन्हें ये अवार्ड मरणोपरांत साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए दिया गया है। खेमका ने अपना पूरा जीवन गीता प्रेस को समर्पित किया था और वह लंबे समय तक सनातन धर्म की पत्रिका ‘कल्याण’ के संपादन कार्य से जुड़े थे। वर्ष 2002 में उन्होंने काशी में वेद विद्यालय की स्थापना भी की थी।
राधेश्याम खेमका का जीवन
साल 2014 से अपने निधन तक गीता प्रेस ट्रस्ट बोर्ड के अध्यक्ष रहे राधेश्याम मूलत: मुंगेर के रहने वाले थे। उनका जन्म 12 दिसंबर 1935 को मुंगेर में ही हुआ था। लेकिन, बाद में पढ़ाई के साथ-साथ बनारस में उनका ज्यादातर समय बीता। उनके पिता मुंगेर जिले से यूपी के वाराणसी आए थे। वाराणसी में राधेश्याम ने अपना अधिक से अधिक समय संतों के बीच गुजारा और शंकराचार्य स्वामी स्वरुपानंद सरस्वती व पुरी के शंकराचार्य स्वामी निरंजन देव तीर्थ का सानिध्य पाकर अपना विकास किया। उनकी पढ़ाई बीएचयू से हुई थी।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय से उन्होंने एमए किया और बाद में गीताप्रेस की कल्याण पत्रिका के संपादक बने। इसके बाद उनका पूरा जीवन गीता प्रेस के लिए बीता। राधेश्याम खेमका ने गीताप्रेस से जुड़े रहते हुए ‘कल्याण’ के 38 वार्षिक विशेषाँक, 460 संपादित अंक प्रकाशित करवाए। रिपोर्ट्स के अनुसार, आँकड़े बताते हैं कि उनके संपादन काल के दौरान ‘कल्याण’ की 9 करोड़ 54 लाख 46 हजार प्रतियाँ प्रकाशित हुई थीं।
सात्विक प्रवृत्ति के राधेश्याम बेहद धार्मिक थे। उन्होंने आजीवन पत्तल में खाना खाया और कुल्हड़ में पानी पिया। पूरी जिंदगी चमड़े की वस्तुओं से परहेज करने वाले राधेश्याम उसूलों के इतने पक्के थे कि उन्होंने कभी चर्म वस्तुओं से बने जूते भी नहीं पहने। आज उन्हें पद्म विभूषण पुरस्कार मिलने की घोषणा पर गीताप्रेस खुशियाँ मना रहा है।
गीताप्रेस के ट्रस्टी देवीदयाल अग्रवाल व प्रबंधक लालमणि तिवारी ने खुशी जताते हुए कहा कि राधेश्याम खेमका ने गीता प्रेस के शताब्दी वर्ष की तैयारियों के क्रम में पिछले साल 7 मार्च को वाराणसी में गीताप्रेस प्रबंधन के साथ बैठक की थी। बता दें कि इस बैठक के 1 माह बाद ही अप्रैल 2021 में उनका निधन हो गया था। अपने जीते जी उन्होंने जिन संगठनों को सेवा दी उसमें मारवाड़ी सेवा संघ, मुमुक्षु भवन, श्रीराम लक्ष्मी मारवाड़ी अस्पताल गोदौलिया, बिड़ला अस्पताल मछोदरी, काशी गोशाला ट्रस्ट शामिल हैं।
गीता प्रेस से छपी 72 करोड़ से ज्यादा पुस्तकें
यहाँ मालूम हो कि गीताप्रेस में कर्मकांड व संस्कारों से संबंधित पुस्तकों का प्रकाशन राधेश्याम खेमका के सुझाव पर शुरू हुआ। जिस गीता प्रेस को जीवन समर्पित करने के बाद राधेश्याम को पद्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उसकी स्थापना के बाद से अब तक 72 करोड़ से ज्यादा सनातन से जुड़ी किताबें प्रकाशित की हैं।
एक जानकारी के मुताबिक गीता प्रेस से प्रकाशित 72 करोड़ से ज्यादा की पुस्तकों में सर्वाधिक संख्या 15 करोड़ 60 लाख श्रीमद्भगवत गीता की है। इसके अलावा रामचरित मानस, पुराण, हनुमान चालीसा, दुर्गा, सप्तशती, सुंदरकांड की संख्या भी करोड़ों में छपी है।
गीता प्रेस से प्रकाशित राम चरित मानस की संख्या 11 करोड़ 39 लाख है। पुराण, उपनिषद् आदि ग्रंथ 2 करोड़ 61 लाख है, महिला एवं बालकोपयोगी पुस्तकें 11 करोड़ 6 लाख, भक्त चरित्र एवं भजनमाला की किताबें मिलाकर 17 करोड़ 40 लाख प्रकाशित हुई हैं। अन्य प्रकाशन 12 करोड़ 73 लाख हैं। इस तरह अब तक गीता प्रेस से प्रकाशित होने वाली कुल किताबें 71 करोड़ 77 लाख है।
पद्म पुरस्कार 2022 का ऐलान
उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मंगलवार (25 जनवरी 2022) को पद्म पुरस्कारों की घोषणा की थी। सूची के अनुसार इस बार 4 हस्तियों को पद्म विभूषण, 17 को पद्म भूषण, 107 को पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। इस लिस्ट में यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह, सीडीएस बिपिन रावत, शास्त्रीय गायिका प्रभा अत्रे और राधेश्याक खेमका पद्म विभूषण से सम्मानित होने वाले नाम हैं।
आज (26 जनवरी 2022) देश भर में 73वाँ गणतंत्र दिवस धूमधाम से मनाया जा रहा है। इस खास मौके पर राजपथ पर भव्य परेड का आयोजन किया गया। आज पूरी दुनिया ने भारतीय सेना की ताकत देखी। इसके अलावा अलग-अलग राज्यों की खूबसूरत झांकियों ने भी लोगों को मंत्रमुग्ध किया। इस दौरान ‘बाज’ फॉर्मेशन का कॉकपिट व्यू का शानदार नजारा देखा गया। एक राफेल, दो जगुआर, दो मिग-29 यूपीजी, दो सुखोई-30 एमआई विमान सहित सात एयरक्राफ्ट ‘एरोहेड’ फॉर्मेशन में 300 मीटर एओएल पर उड़ान भरे।
गणतंत्र दिवस पूरी दुनिया ने भारतीय सेना की ताकत देखी। (फोटो साभार: ट्विटर)
गणतंत्र दिवस पर सीआरपीएफ ने खूबसूरत झांकियाँ भी निकाली (फोटो साभार: ट्विटर)
BSF के जवानों ने बर्फबारी में गणतंत्र दिवस धूमधाम से मनाया (फोटो साभार: ट्विटर)
हिमालय के पहरी ITBP के जवानों ने निकाली झांकियाँ (फोटो साभार: ट्विटर)
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ में फहराया तिरंगा (फोटो साभार: वीडियो का स्क्रीनशॉट)
गणतंत्र दिवस पर जवानों ने फहराया तिरंगा (फोटो साभार: ट्विटर)
राजपथ पर झांकियों में दिखी भारत की सांस्कृतिक झलक (फोटो साभार: ट्विटर)
गणतंत्र दिवस पर पूरी दुनिया ने देखा भारतीय संस्कृति का नजारा (फोटो साभार: ट्विटर)
गणतंत्र दिवस पर श्रीनगर के लाल चौक पर फहराया गया तिरंगा झंडा (फोटो साभार: ट्विटर)
गणतंत्र दिवस पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने किया ध्वजारोहण किया (फोटो साभार: ट्विटर)
बता दें कि आज 73वें गणतंत्र दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद मोदी ने दिल्ली के राजपथ पर राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर जाकर आजादी से लेकर अब तक वीरगति को प्राप्त हुए देश के सैनिकों को श्रद्धांजलि दी। पीएम मोदी ने इस दौरान वीरों की याद में दो मिनट का मौन भी रखा। इसके साथ ही, उन्होंने गणतंत्र दिवस के अवसर पर खास अंदाज में तिरंगे को सलामी (सैल्यूट) दी। उन्होंने जिस अंदाज में तिरंगे की सलामी की, वह नौसेना को समर्पित था। नौसेना में सलामी हमेशा दाहिने हाथ के पंजे को थोड़ा आगे की ओर झुकाकर दी जाती है।
कर्नाटक (Karnataka) के उडुपी जिले के प्री यूनिवर्सिटी कॉलेज की कुछ मुस्लिम छात्राओं के क्लास के अंदर भी हिजाब (Hijab) पहनने की माँग को लेकर जारी विवाद के मामले में उडुपी के विधायक के रघुपति भट (Raghupati Bhat) ने बयान दिया है। उन्होंने बुधवार (26 जवनवरी 2022) को कहा कि राज्य सरकार के आदेश के मुताबिक कॉलेज के अंदर हिजाब नहीं पहन सकते हैं। लेकिन इस विवाद के कारण शिक्षा प्रभावित न हो इसलिए इसके विकल्प के तौर पर ऐसी लड़कियाँ ऑनलाइन क्लास अटेंड कर सकती हैं। ताकि वो परीक्षा में शामिल हो सकें।
MLA भट ने कहा कि कर्नाटक सरकार उच्चाधिकार प्राप्त समिति के जरिए इस मामले का समाधान करने की कोशिश कर रही है। हालाँकि, जब तक समिति सरकार को अपनी रिपोर्ट पेश नहीं करती है तब तक सरकारी महिला पीयू कॉलेज में यथास्थिति बनाई रखी जाएगी। विधायक के मुताबिक, कॉलेज कैम्पस में साम्प्रादायिक सौहार्द को बिगाड़ने के लिए हिजाब के मुद्दे को जन्म दिया गया है। उन्होंने आगे कहा, ”सरकार द्वारा गठित उच्चाधिकार समिति ड्रेस कोड और यूनिफॉर्म के बारे में अतीत में अदालतों के विभिन्न आदेशों के संबंध में मौजूदा मानदंडों का अध्ययन करेगी। राज्य सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपने से पहले विभिन्न राज्यों में अपनाए जा रहे ड्रेस कोड के नियमों का भी अध्ययन किया जाएगा।” उल्लेखनीय है कि भट कॉलेज की विकास समिति की अध्यक्ष भी हैं।
बीजेपी विधायक ने अपने निर्वाचन क्षेत्र में दूसरे सरकारी और प्राइवेट इंस्टीट्यूट द्वारा ड्रेस कोड के पालन किए जाने का हवाला देते हुए कहा कि संबंधित कॉलेजों में विकास समितियाँ हिजाब या हेडस्कार्फ़ की अनुमति इसलिए नहीं देती हैं, क्योंकि ये ड्रेस कोड के खिलाफ होता है। भट के मुताबिक, पुलिस अधिकारी से कॉन्ग्रेस नेता बने जी ए बावा ने मुस्लिम यूनियनों के एक समूह को लीड करते हुए वास्तविक स्थिति से अवगत कराया है। उन्हें बताया गया कि हिजाब की इजाजत दी गई तो इससे कॉलेज परिसरों में साम्प्रदायिक तनाव पैदा हो सकते हैं।
हाल ही में इस मामले में हिजाब को मुस्लिम छात्राओं ने अपना मौलिक अधिकार बताया था। इसके बाद राज्य के प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा मंत्री बीसी नागेश (BC Nagesh) ने हिजाब के मुद्दे को पूरी तरह से राजनीतिक करार देते हुए छात्राओं से यूनीफॉर्म के संबंध में नियमों का पालन करने की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि वर्ष 1985 से इस नियम का पालन अनवरत रूप से किया जा रहा है। कॉलेज और स्कूल धर्म का पालन करने की जगह नहीं है। मंत्री ने ये भी कहा था कि सिर्फ मुस्लिमों को ही नहीं केसरिया शॉल भी कक्षा में प्रतिबंध है।
क्या है मामला
उडुपी जिले के पीयू कॉलेज का यह मामला सबसे पहले 2 जनवरी 2022 को सामने आया था, जब 6 मुस्लिम छात्राएँ क्लासरूम के भीतर हिजाब पहनने पर अड़ गई थीं। कॉलेज के प्रिंसिपल रूद्र गौड़ा ने कहा था कि छात्राएँ कॉलेज परिसर में हिजाब पहन सकती हैं, लेकिन क्लासरूम में इसकी इजाजत नहीं है। प्रिंसिपल के मुताबिक, कक्षा में एकरूपता बनाए रखने के लिए ऐसा किया गया है।
भले ही इस विरोध प्रदर्शन को ‘हिजाब’ के नाम पर किया जा रहा हो, लेकिन मुस्लिम छात्राओं को बुर्का में शैक्षणिक संस्थानों में घुसते हुए और प्रदर्शन करते हुए देखा जा सकता है। इससे साफ़ है कि ये सिर्फ गले और सिर को ढँकने वाले हिजाब नहीं, बल्कि पूरे शरीर में पहने जाने वाले बुर्का को लेकर है। हिजाब सिर ढँकने के लिए होता है, जबकि बुर्का सर से लेकर पाँव। कई इस्लामी मुल्कों में शरिया के हिसाब से बुर्का अनिवार्य है। कर्नाटक में चल रहे प्रदर्शन को मीडिया/एक्टिविस्ट्स भले इसे हिजाब से जोड़ें, ये बुर्का के लिए हो रहा है।