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‘जिहाद का बचाव बर्दाश्त नहीं’: इमाम ने ईसाइयों और यहूदियों के खिलाफ उगला ज़हर तो फ्रांस ने मस्जिद पर ही जड़ दिया ताला

फ्रांस (France) के गृह मंत्री ने वहाँ के एक मस्जिद (Mosque) को 6 महीने के लिए बंद (Shut) रखने का ऐलान किया है। इसकी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। वहाँ की सरकार का कहना है कि इमाम द्वारा कट्टरपंथी मजहबी भाषण को रोकने के लिए ऐसा किया जा रहा है। ये मामला फ्रांस की राजधानी पेरिस से 100 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर में स्थित बिउवेस (Beauvais) शहर का है, जिसकी जनसंख्या 50,000 के करीब है। सरकार ने कहा कि वहाँ के मस्जिद का इमाम जिस प्रकार का भाषण (Islamic Sermon) दे रहा है, वो अस्वीकार्य है।

इमाम पर आरोप है कि वो अपने भाषणों में लगातार ईसाइयों और यहूदियों को निशान बनाता है। साथ ही वो समलैंगिक समुदाय के खिलाफ भी लोगों को भड़काता है। फ्रांस के जिस ओसे (Oise) क्षेत्र में ये शहर स्थित है, वहाँ के प्रशासन ने पहले ही घोषणा कर दी थी कि उक्त मस्जिद द्वारा जिस तरह से हिंसा और घृणा को बढ़ावा देने के साथ-साथ ‘जिहाद’ का बचाव करने वाले मजहबी भाषण दिए जा रहे हैं, उस कारण उसे बंद करने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है।

इस सम्बन्ध में दिसंबर 2021 की शुरुआत में ही पूरी योजना के साथ एक पात्र भेज दिया गया था। लेकिन, कार्रवाई करने से पहले वहाँ 10 दिनों की अवधि की अनिवार्यता है, जिस दौरान सूचनाएँ इकट्ठी की जाती हैं। उस मस्जिद का इमाम हाल ही में इस्लाम में धर्मांतरित हुआ है। मस्जिद प्रबंधन ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से कहा है कि मौलवी के बयान को सन्दर्भ से हट कर लिया गया। फ़िलहाल उस इमाम को निलंबित रखा गया है। फ्रांस में पिछले डेढ़ साल में कई मस्जिद और मदरसों पर कार्रवाई हुई है।

जिस तरह से वहाँ इस्लामी कट्टरता बढ़ रही है और शिक्षक सैमुअल पैटी की पैगम्बर मोहम्मद के अपमान के आरोप में गला रेत कर हत्या कर दी गई, उसके बाद से लगातार फ्रांस की सरकार इस्लामी कट्टरवाद को लेकर सख्त है। अक्टूबर 2020 की इस घटना के बाद जब फ्रांस ने कार्रवाई शुरू की, तभी से वो अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और इस्लामी मुल्कों की आलोचना का शिकार बना हुआ है। फ्रांस में भी मुस्लिम समुदाय सड़कों पर उतर कर समय-समय पर विरोध प्रदर्शन करता रहा है।

₹6000 करोड़ के ड्रग्स केस में बिक्रम सिंह मजीठिया के खिलाफ केंद्र का लुक आउट नोटिस, अकाली दल प्रमुख से है खास रिश्ता

पंजाब में लंबे समय से चल रहे ड्रग्स के मामले में शिरोमणि अकाली दल के नेता और एनडीपीएस के आरोपित बिक्रम सिंह मजीठिया को विदेश भागने से रोकने के लिए गृह मंत्रालय ने उनके खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया है। इस मामले में पंजाब पुलिस ने गृह मंत्रालय के इमिग्रेशन ब्यूरो से अनुरोध किया था।

दरअसल, मंगलवार (21 दिसंबर 2021) को पंजाब पुलिस ने ड्रग्स की तस्करी के मामले में नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सबस्टेंस एक्ट 1985 की धारा 25, 27 ए और 29 के तहत दर्ज केस दर्ज किया था। पुलिस ने मजीठिया के खिलाफ यह केस एसटीएफ की जाँच रिपोर्ट के आधार पर दर्ज किया है। बिक्रम मजीठिया शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल के साले हैं। इसी कारण से अब अकाली दल खुलकर उनके बचाव में उतर गया है।

शिअद के नेताओं प्रेम सिंह चंदूमाजरा, दलजीत सिंह चीमा व महेश इंदर ग्रेवाल ने चंडीगढ़ में इसको लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की। प्रकाश सिंह बादल ने पंजाब सरकार पर राजनीतिक बदले की भावना से कार्रवाई करने का आरोप लगाया।

इसके साथ ही इन नेताओं ने पंजाब सरकार को चेतावनी भी दे डाली कि वो बिक्रम मजीठिया को गिरफ्तार करके दिखाए। वहीं इस मामले में पंजाब बीजेपी के अध्यक्ष अश्विनी शर्मा ने नवजोत सिंह सिद्धू पर इशारों में निशाना साधा। उनका कहना है कि किसी व्यक्ति के (सिद्धू) राजनीतिक अंहकार को शांत करने के लिए राजनीति से प्रेरित राज्य दबाव में काम कर रही है। ज्ञात हो कि नवजोत सिंह सिद्धू लंबे समय से ड्रग्स के मुद्दे को उठा रहे हैं।

क्या है ये मामला

जिस ड्रग्स की तस्करी के मामले में मजीठिया के खिलाफ केस दर्ज किया गया है वो दरअसल साल 2012 का मामला है। बिक्रम मजीठिया के खिलाफ 6000 करोड़ रुपए के सिंथेटिक ड्रग्स के मामले में केस दर्ज किया गया है। इस केस में मजीठिया का नाम साल 2014 में सामने आया था। जब पंजाब पुलिस के बर्खास्त डीएसपी जगदीश भोला ने पूर्व राजस्व मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया का नाम लिया। उस दौरान पंजाब में बीजेपी और अकाली दल की गठबंधन की सरकार थी।

‘तबलीगी-देवबंदी पर लगे प्रतिबंध, नहीं तो अफगानिस्तान जैसे गृहयुद्ध के हालात बन जाएँगे’: पूर्व विहिप नेता तोगड़िया

अंतरराष्ट्रीय हिन्दू परिषद के अध्यक्ष डॉक्टर प्रवीण भाई तोगड़िया ने बुधवार (22 दिसंबर 2021) को हरिद्वार में केंद्र सरकार पर जमकर हमला बोला। उन्होंने विश्व हिंदू परिषद (विहिप) को छोड़ने के पीछे संघ के नेताओं का हाथ बताते हुए कहा, “राममंदिर तो बन गया है, लेकिन देश में रामराज्य लाने की कोशिश नहीं हो रही है। देश में तेजी से हिंदुओं की आबादी कम हो रही है। मुस्लिमों और ईसाइयों की आबादी लगातार बढ़ रही है। केंद्र सरकार को दो बच्चे का कानून सभी पर लागू करना चाहिए।”

इसके बाद तोगड़िया ने बीजेपी शासित राज्यों और केंद्र सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब दूसरे धर्मों के धार्मिक स्थलों का अधिग्रहण नहीं होता है तो हिंदुओं के मंदिरों का अधिग्रहण क्यों किया जाता है? उन्होंने कहा कि संघ नेताओं ने वर्ष 2017 में भोपाल में उनको राम मंदिर के मुद्दे पर बात करने से रोका था, यही कारण है कि उन्हें मजबूरी में विश्व हिंदू परिषद छोड़ना पड़ा।

तोगड़िया ने आगे कहा, “सरकार मठ, मंदिरों को कब्जे से मुक्त करे। दो हजार साल पहले दुनिया में ईसाई नहीं थे। दो हजार साल के अंदर भारत पर इतने आक्रमण हुए कि देश गुलाम हो गया। दुनिया भर में हिंदू समाप्त होने लगा। आज 44 मुस्लिम देश हैं, जहाँ लोकतंत्र नहीं है। 50 साल बाद देश में हिंदू 50 करोड़, मुस्लिम 60 करोड़ और क्रिश्चियन 20 करोड़ हो जाएँगे। इससे देश में हिंदू प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति नहीं बन पाएँगे। यह देश फिर से गुलामी की ओर बढ़ता जा रहा है।”

तोगड़िया ने देश में जल्द से जल्द जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाने की भी माँग की। उन्होंने बीजेपी और केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि अगर कानून नहीं बना सकते तो फिर अपने आपको हिन्दुत्ववादी कहना बंद करें। साथ ही उन्होंने कहा कि अगर सरकार जल्द ही तबलीग जमात और देवबंदी पर प्रतिबंध नहीं लगाती है तो भारत में भी अफगानिस्तान जैसे गृहयुद्ध के हालात बन सकते हैं।

भैंस के आगे बीन बजाए, भैंस खड़ी पगुराय… लेकिन हम राहुल गाँधी के लिए उम्मीद कर यह लेख प्रकाशित कर रहे

आजकल हिंदू और हिंदुत्व में अंतर की चर्चा जोरों पर है। पिछले दिनों एक बड़ी राजनीतिक पार्टी के बड़े नेता (कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी) ने राजस्थान की एक सभा में हिंदू और हिंदुत्व को लेकर जो ज्ञान दिया है, उसे सुनकर बड़े-बड़े विद्वान और भाषाविद् भी आश्चर्यचकित हैं क्योंकि इससे पहले इन शब्दों की ऐसी ज्ञानगर्भित व्याख्या कभी पढ़ने-सुनने में नहीं आई है। ऐसा लगता है कि हमारे विकासशील देश में राजनीति के साथ-साथ भाषा, साहित्य, इतिहास, दर्शन, विज्ञान, अर्थशास्त्र आदि सभी विषयों पर कुछ भी बोलने का एकाधिकार हमारे नेताओं ने अपने पक्ष में सुरक्षित कर लिया है। अब इन विषयों के विद्वानों की आवश्यकता नहीं रही। सारे विषय राजनीति के स्वार्थ सागर में समा गए हैं और अब जो राजनेता कहें वही अंतिम सत्य है।

आश्चर्य का विषय है कि व्यक्ति से उसके व्यक्तित्व को अलग बताया जा रहा है । व्यक्ति और व्यक्तित्व, दो अलग शब्द हैं, किंतु अर्थ की दृष्टि से वे परस्पर बहुत दूर नहीं हैं। व्यक्तित्व शब्द व्यक्ति से ही बना है। व्यक्ति पहले है और व्यक्तित्व बाद में। व्यक्ति की विशेषता ही उसका व्यक्तित्व है। यही बात हिंदू और हिंदुत्व शब्द में भी सही सिद्ध होती है। हिंदुत्व रहित हिंदू वैसा ही है जैसा व्यक्तित्व रहित व्यक्ति। समाज में, सार्वजनिक जीवन में व्यक्ति को नहीं व्यक्तित्व को प्रतिष्ठा मिलती है। व्यक्ति अपने विशिष्ट व्यक्तित्व के कारण ही महान कहलाता है, इतिहास में अमर होता है। व्यक्तित्व विहीन सामान्य जन तो सृष्टि के अन्य जीवों के समान ही जीवन से मृत्यु तक की महत्वहीन यात्रा करता रहता है। इस कारण व्यक्ति के लिए व्यक्तित्व का महत्व है और हिंदू के लिए हिंदुत्व महत्वपूर्ण है। इसी प्रकार इस्लाम और मुसलमान, ईसाइयत और ईसाई शब्द भी परस्पर भिन्न होकर भी अभिन्न हैं।

हिंदू और हिंदुत्व, दोनों संज्ञा शब्द हैं। ‘हिंदू’ जातिवाचक संज्ञा है जो एक जाति-धर्म विशेष में जन्म लेने वाले सभी मनुष्यों का बोध कराती है। यह संज्ञा हिंदू परिवार में जन्म होते ही व्यक्ति को स्वतः प्राप्त हो जाती है और तब तक बनी रहती है जब तक वह किसी विशेष कारणवश स्वयं इसका त्याग नहीं कर देता है। हिंदुत्व भाववाचक संज्ञा है और हिंदू धर्म में स्वीकृत मान्यताओं, परंपराओं, विश्वासों, पूजा-पद्धतियों, रीतियों एवं अन्य तत्संबंधित विशिष्ट विषयों-बिंदुओं के प्रति आस्थाजनित दृढ़ता का बोध कराती है।

हिंदुत्व समस्त हिंदू समाज के प्रति गहरी रागात्मकता का भाव-बोध है। जिसने हिंदू परिवार में जन्म लिया है किंतु हिंदुओं के पर्वों, त्योहारों एवं अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं में जिसकी निष्ठा नहीं, हिंदुओं के आदर्श महापुरुषों के प्रति जिसके मन में श्रद्धा नहीं, हिंदुओं की दुर्दशा के प्रति जिसके मन में पीड़ा नहीं, और हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों को पढ़-सुनकर, देखकर जिसके हृदय में क्षोभ, आक्रोश और क्रोध नहीं, वह हिंदुत्व विहीन हिंदू किस काम का…? पृथ्वीराज चौहान के समय से लेकर आज तक का हिंदू समाज जातिवाचक हिंदुओं की अधिसंख्यक स्थिति के बाद भी हिंदुत्व भावबोध की अल्पता के कारण सदा संकटग्रस्त रहा है।

हिंदुत्व पृथ्वीराज चौहान, राणा संग्राम सिंह, महाराणा प्रताप, दुर्गादास राठौर, छत्रपति शिवाजी, गुरु गोविंद सिंह, बंदा बैरागी, राजा रणजीत सिंह, महाराज छत्रसाल, नानासाहब पेशवा, रानी लक्ष्मीबाई, कुंवर सिंह, बाल गंगाधर तिलक, पंडित मदनमोहन मालवीय, विनायक दामोदर सावरकर, सुभाषचंद्र बोस, सरदार बल्लभभाई पटेल और श्यामाप्रसाद मुखर्जी की गौरवशाली बलिदानी परंपरा की ज्योति लिए आज भी संघर्षरत है। जबकि हिंदुत्व भाव शून्य हिंदू जयचंद, मानसिंह, जयसिंह की भाँति पहले मुगलों और अंग्रेजों की सेवा-सहायता करते हुए सत्ता सुख भोगते रहे और अब स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की बलिवेदी पर हिंदू हितों की बलि देते हुए हिंदुओं की जड़ें खोद रहे हैं। हिंदुत्व शब्द में ‘वादी‘ पद जोड़कर नया हिंदुत्ववादी शब्द गढ़कर उसे अलगाववादी, आतंकवादी की तरह बदनाम करने की साजिश रच रहे हैं। हिन्दुओं के विरुद्ध हिन्दुओं की ऐसी गतिविधियाँ हिन्दू समाज के लिए सदा दुर्भाग्यपूर्ण रहीं हैं और आज भी हैं।

हिंदू और हिंदुत्व में अलगाव की कुटिल कल्पना के अनुसार महात्मा गाँधी हिंदू हैं और नाथूराम गोडसे हिंदुत्ववादी। अब तक किसी भी शब्दकोश में ‘हिंदुत्ववादी‘ शब्द देखने को नहीं मिला है। ‘हिंदू‘ और ‘हिंदुत्व‘ शब्द शब्दकोशों में भी हैं और व्यवहार में भी प्रचलित हैं, किंतु ‘हिंदुत्ववादी‘ शब्द हिंदुओं के गौरव और हिंदू अस्मिता के लिए जूझने वालों को समाज में अलोकप्रिय बनाने के लिए गढ़ा गया है।

वास्तव में एक राजनीतिक शिविर से उभरा यह स्वर दूसरे राजनीतिक दल की बढ़ती शक्ति को क्षीण करने के लिए की जा रही असफल कोशिश है। प्रश्न यह भी है कि एक महात्मा गाँधी पर गोली दागने वाला गोडसे हिंदू नहीं है, हिंदुत्ववादी है तो पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद राजधानी दिल्ली सहित देश के अनेक भागों में सिखों की निर्मम हत्या करने वाले कौन थे? वे हिंदू थे अथवा हिंदुत्ववादी? निश्चय ही ये उसी शिविर के राजनीतिक नेतृत्व से प्रेरित लोग थे जो आज अपने प्रतिपक्षी दल के समर्थकों को हिंदुत्ववादी कहकर उन्हें आतंकवादियों की तरह कठघरे में खड़ा करना चाहते हैं।

महात्मा गाँधी के सत्याग्रह को लक्ष्य करके कहा जा रहा है कि हिंदू सत्य चाहता है और हिंदुत्ववादी सत्ता चाहता है। विचारणीय है कि तथाकथित हिन्दुत्ववादी गोडसे ने किस सत्ता की प्राप्ति के लिए गोली चलाई थी और इससे उसे कौन सी सत्ता की प्राप्ति हुई? प्रश्न यह भी है कि सत्य कौन नहीं चाहता? क्या हिंदुओं के अतिरिक्त अन्य सब धर्मावलंबी सत्य नहीं चाहते? वस्तुतः संसार का प्रत्येक सज्जन व्यक्ति चाहे वह किसी भी धर्म, जाति, देश का हो सत्य अनुरागी होता ही है। जहाँ तक सत्ता का सवाल है, सत्ता सबको चाहिए। सत्ता राणा प्रताप को भी चाहिए और सत्ता मान सिंह को भी चाहिए। किंतु दोनों के सत्ता प्राप्ति के लक्ष्य परस्पर भिन्न हैं। मान सिंह को सत्ता निजी सुखों के लिए, विलासिता के लिए चाहिए, जबकि राणा प्रताप को सत्ता अपने स्वाभिमान और मानवीय गौरव की सुरक्षा के लिए चाहिए। औरंगजेब को सत्ता इस्लाम के विस्तार के लिए चाहिए, मिर्जा राजा जयसिंह को अपने राजपद की सलामती के लिए चाहिए, डलहौजी को व्यक्तिगत ऐशोआराम और अपने देश इंग्लैंड की समृद्धि के लिए चाहिए, जबकि शिवाजी को सत्ता अपने अस्तित्व की सुरक्षा तथा भारतवर्ष की सांस्कृतिक अस्मिता के संरक्षण-संवर्धन के लिए चाहिए। देश के वर्तमान सत्ता-संघर्ष में भी उपर्युक्त प्रतीक पुरुषों के चोले में आज के नेतागण भी इन्हीं अलग-अलग उद्देश्यों की सिद्धि के लिए संघर्षरत हैं।

यह सही है कि प्रायः एक शब्द का एक अर्थ होता है, किंतु अनेक शब्द अनेकार्थी भी होते हैं। अतः यह नहीं कहा जा सकता कि जैसे एक शरीर में एक आत्मा निवास करती है, वैसे ही एक शब्द का एक ही अर्थ होता है। संस्कृत में ‘पत्र‘ का अर्थ पत्ता और पाती है, हिंदी में ‘अंक’ शब्द गोद, नाटक का एक भाग, परीक्षा में प्राप्त अंक आदि अनेक अर्थ व्यक्त करता है। अंग्रेजी का ‘लेटर‘ शब्द ‘अक्षर ‘और ‘पत्र‘ दो अर्थ प्रकट करता है। इससे सिद्ध है कि एक शरीर में दो आत्माएँ हों अथवा न हों किंतु बहुत से शब्द दो अर्थ अवश्य व्यक्त करते हैं। तर्क दिया जा रहा है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी दृष्टि से शब्द अर्थ की व्याख्या करने का अधिकार है। यह बात तब सही हो सकती है जब व्याख्या करने वाला उस विषय का ज्ञाता हो और तथ्य तथा तर्क के धरातल पर अपना मत व्यक्त करे। अनर्गल प्रलाप करते हुए अर्थ का अनर्थ करना किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसका कथन बहुत से लोगों को प्रभावित करता हो, शोभा नहीं देता। समाज में जिसका स्थान जितना बड़ा है उसका उत्तरदायित्व भी उतना ही अधिक है। समाज को भ्रमित करना, मनमाने अर्थ गढ़कर श्रोताओं को अपने पक्ष में करने के लिए भाषा संवेदना को विकृत करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता।

स्वतंत्र भारत में सत्ता मिलते ही जिन्होंने गंगा को सांस्कृतिक विरासत के स्थान पर भौतिक समृद्धि का प्राकृतिक संसाधन मात्र माना और तथाकथित विकास के नाम पर पवित्र गंगा जल प्रदूषित कर विषाक्त बना दिया। नगरों-महानगरों के कचरे के साथ-साथ सैकड़ों उद्योगों के विषैले रसायन गंगा में प्रवाहित करने की खुली छूट दी और आजादी के साठ साल में ही गंगा-यमुना जैसी पवित्र नदियाँ प्रदूषित कर दी, आज उनके झंडाबरदार गंगा की दुहाई देकर हिंदुओं के गंगास्नान की बात कर रहे हैं। उनके अनुसार हिन्दू गंगा में करोड़ों लोगों के साथ स्नान करता है, जबकि हिंदुत्ववादी अकेले स्नान करता है। यह बात समझ से परे है। जिन्हें हिंदुत्ववादी कहा जा रहा है उनके शासन में कुंभ स्नान की व्यवस्थाएँ पहले से अधिक बेहतर रहीं हैं। सब जानते हैं कि पर्वों पर विशेष सामूहिक स्नान की सांस्कृतिक परंपरा सहस्त्रों वर्षों से चली आ रही है, जबकि गंगा के निकटवर्ती क्षेत्रों में निवास करने वाले बहुत से हिन्दू श्रद्धा पूर्वक नित्य ही अकेले गंगा स्नान करते हैं। इसमें हिन्दू और हिंदुत्ववादी जैसे किसी अंतर के लिए कोई संभावना नहीं है। किन्तु अपने समर्थकों के बीच लोग कुछ भी कहने को स्वतंत्र हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ऐसा दुरुपयोग लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा है।

वस्तुतः हिंदू देह है और हिंदुत्व उसकी आत्मा है। जैसे आत्मा के बिना देह का कोई महत्व नहीं, वैसे ही हिंदुत्व रहित हिंदू का भी कोई अस्तित्व नहीं। आत्माविहीन देह जल्दी ही गल-सड़कर समाप्त हो जाती है। जिस प्रकार देह के अस्तित्व में रहने के लिए आत्मा आवश्यक है, उसी प्रकार हिन्दुओं की अस्मिता के लिए हिंदुत्व का भावबोध जागृत रहना भी आत्यंत आवश्यक है। हिंदुत्व के बिना हिंदू अस्मिता पर अस्तित्व का घोर संकट विगत एक हजार वर्ष से निरंतर छाया रहा है और आज भी है। अब भी यदि हिंदुत्व बोध सशक्त नहीं हुआ तो इस देश में भविष्य में उसकी भी वही स्थिति हो सकती है जो शताब्दियों पूर्व पारसियों और यहूदियों की हो चुकी है। अपनी अस्मिता एवं सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने के लिए हमारा जन्म से हिंदू होना ही पर्याप्त नहीं है, उसमें हिंदुत्व की शौर्य चेतना का दीप्त होना भी परमावश्यक है।

(लेखक डाॅ. कृष्णगोपाल मिश्र, शासकीय नर्मदा स्नातकोत्तर महाविद्यालय होशंगाबाद में हिन्दी विभागाध्यक्ष हैं)

केरल में BJP नेता रंजीत श्रीनिवासन की हत्या मामले में SDPI के 5 कार्यकर्ता गिरफ्तार

केरल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के ओबीसी मोर्चा की प्रदेश इकाई के सचिव रंजीत श्रीनिवासन की हत्या के मामले में सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के 5 कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है। अलप्पुझा जिले में 19 दिसंबर को श्रीनिवासन की हत्या कर दी गई थी। इस मामले की जाँच पुलिस की विशेष जाँच दल (SIT) कर रहा है। 

रंजीत श्रीनिवासन की हत्या के कुछ घंटे पहले ही SDPI के प्रदेश सचिव केएस शान पर जानलेवा हमला हुआ था, जिसके बाद अस्पताल में उसकी मौत हो गई थी। पुलिस के अनुसार, शान की मौत के कुछ घंटों बाद रविवार सुबह कुछ हमलावरों ने रंजीत श्रीनिवासन के घर में घुसकर उनकी हत्या कर दी थी। पुलिस ने संदेह जताई थी कि शान की हत्या का बदला लेने के लिए श्रीनिवासन पर घातक हमला किया गया। शान की हत्या के मामले में भी दो आरएसएस कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया जा चुका है।

एसआईटी का नेतृत्व कर रहे अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (ADGP) (कानून एवं व्यवस्था) विजय सखारे ने मंगलवार (21 दिसंबर 2021) को बताया था कि कानून-व्यवस्था को बरकरार रखने के लिए और इस प्रकार के अपराध भविष्य में होने से रोकने के लिए जिले में कई स्थानों पर छापे मारे गए हैं और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले कई लोगों को हिरासत में लिया गया है।

केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री वी मुरलीधरन ने बीजेपी नेता की हत्या को शर्मनाक करार देते हुए कहा था कि अगर एसडीपीआई नेता की हत्या के बाद पुलिस ने उचित कदम उठाए होते तो स्थिति वर्तमान स्तर तक नहीं जाती। उन्होंने कहा कि श्रीनिवास की हत्या एसडीपीआई नेता की हत्या के बाद राज्य सरकार और पुलिस द्वारा एहतियाती कदम उठाने में विफलता का परिणाम है। मुरलीधरन ने यह भी कहा था कि उन्हें मिली जानकारी के मुताबिक, बीजेपी नेता की हत्या के पीछे इस्लामी आतंकवादी समूह का हाथ है।

उन्होंने यह भी कहा था, “यह पहली घटना नहीं है। कुछ हफ्ते पहले भी एक भाजपा कार्यकर्ता की मौत हो गई थी। राज्य ने ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए आवश्यक कार्रवाई नहीं की थी। वे इस्लामी आतंकवादियों के साथ नरम रुख अपनाते रहे हैं जिससे उन्हें औऱ अधिक हिंसा करने के लिए प्रोत्साहन मिलता है।”

दोनों नेताओं की हत्या के बाद पुलिस ने केरल के तटीय अलप्पुझा जिले में धारा-144 लागू कर दी थी। केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने भी इन हत्याओं की निंदा की थी और कहा कि पुलिस दोषियों और घटना में शामिल लोगों को पकड़ने के लिए कदम उठाएगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि हिंसा के ऐसे जघन्य और अमानवीय कृत्य देश के लिए खतरनाक हैं और लोगों को ऐसे समूहों और उनकी घृणित गतिविधियों से दूर रहना चाहिए।

सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव, पत्नी डिंपल यादव और बेटी हुए कोरोना पॉजिटिव: कहा था – ‘BJP की वैक्सीन नहीं लगवाउँगा’

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव, उनकी पत्नी डिंपल यादव और बेटी कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। बुखार आने पर हुए था टेस्ट। तीनों ने फ़िलहाल खुद को घर में ही आइसोलेट कर लिया है। असल में उनकी बेटी को बुखार आया था, जिसके बाद मंगलवार (दिसंबर 21, 2021) को कोरोना टेस्ट कराया गया और तीनों की रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। 2022 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के मद्देनजर पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव लगातार रैलियों और चुनाव प्रचार बैठकों में व्यस्त थे।

याद दिलाते चलें कि कोरोना वैक्सीन को अखिलेश यादव ने सितम्बर 2021 में ‘भाजपा का टीका’ बताया था और कहा था कि वो वैक्सीन नहीं लगवाएँगे। उन्होंने कोरोना वैक्सीन सर्टिफिकेट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर को लेकर भी निशाना साधा था। हालाँकि, उससे पहले जुलाई 2021 में उन्होंने सपा कार्यकर्ताओं से वैक्सीन लगवाने की अपील करते हुए कहा था कि जनता को वैक्सीन लगवाने के बाद अंतिम वैक्सीन बचेगी तब सरकार उन्हें भी लगवा दे।

याद दिला दें कि कोरोना की दूसरी लहर के दौरान भी अखिलेश यादव की रिपोर्ट कोविड-19 पॉजिटिव आ गई थी, लेकिन कुछ दिनों बाद उनकी रिपोर्ट नेगेटिव आई थी और उन्हें उस दौरान एहतियात बरतने पड़े थे। डिम्पल यादव ने बताया कि उन्होंने खुद को सबसे अलग कर लिया है और घर पर ही उनका उपचार चल रहा है। उन्होंने पिछले दिनों अपने सम्पर्क में आए लोगों से भी कोरोना टेस्ट करवाने की अपील की। ओमीक्रॉन का खतरा फ़िलहाल पूरी दुनिया पर मँडरा रहा है।

‘भारत की अधिकतर जनसंख्या कोरोना वैक्सीनेटेड नहीं’ – राहुल गाँधी और NDTV की बात का फैक्ट चेक

कॉन्ग्रेस (Congress) के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी (Rahul Gandhi) ने भारत में कोरोना टीकाकरण (Coronavirus Vaccination) को लेकर झूठ फैलाया और डर का माहौल बनाने की कोशिश की है। उन्होंने दावा किया कि भारत की अधिकतर जनसंख्या अभी भी वैक्सीनेटेड नहीं है और साथ ही भारत सरकार से सवाल पूछा कि वो बूस्टर डोज देना कब शुरू करेगी? राहुल गाँधी ने ‘वैक्सीनेट इंडिया’ का टैग भी अपनी ट्वीट में लगाया। साथ ही उन्होंने कुछ आँकड़े भी साझा किए।

राहुल गाँधी ने दावा किया कि दिसंबर 2021 तक भारत की 60% जनसंख्या के कोरोना टीकाकरण का लक्ष्य था, लेकिन उस समय तक मात्र 42% लोगों को ही कोरोना का टीका मिल पाएगा। असल में राहुल गाँधी ने जो आँकड़ा साझा किया, वो वामपंथी मीडिया संस्थान NDTV का है। इसमें बताया गया है कि दिसंबर 2021 तक 60% लोगों के टीकाकरण के लिए रोज 6.1 करोड़ लोगों को वैक्सीन की खुराक देनी पड़ेगी। NDTV का कहना है कि इसके उलट फ़िलहाल प्रतिदिन मात्र 58 लाख लोग ही कोरोना वैक्सीन की डोज ले पा रहे हैं।

NDTV का कहना है कि भारत को लक्ष्य तक पहुँचने के लिए जो आँकड़ा चाहिए, उससे प्रतिदिन 5.53 करोड़ कम लोगों को ही वैक्सीन लगाई जा रही है। हालाँकि, भारत में कोरोना टीकाकरण के जो वास्तविक आँकड़े हैं, वो अलग ही कहानी कहते हैं। न तो NDTV और न ही राहुल गाँधी ने आँकड़ों का जल बुन कर लोगों को भ्रमित करने से पहले ये बताया कि फ़िलहाल 18 से कम उम्र वालों को कोरोना वैक्सीन नहीं लगाई जा रही है। अभी तक ऐसी किसी भी वैक्सीन को भारत सरकार की अनुमति ही नहीं मिली है।

इस तरह कोविड-19 टीकाकरण के लिए सिर्फ वही लोग पात्र हैं, जिनकी उम्र 18 से अधिक है, अर्थात जो वयस्क हैं। ‘भारतीय विशिष्‍ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI)’ के अनुसार, 2020 के डेटा के हिसाब से भारत की जनसंख्या 137.05 करोड़ है, लेकिन इनमें से 86.54 करोड़ ही वयस्क हैं। इसका अर्थ है कि कुल जनसंख्या का 63% ही कोरोना वैक्सीन लेने के लिए पात्रता रखता है। अगर हम मान लें कि 1 साल में ये जनसंख्या बढ़ कर 94 करोड़ हो गई है, फिर भी ये कुल जनसंख्या का 68% ही होगा।

केंद्रीय वित्त मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, अब तक कोरोना वैक्सीन की 138.95 करोड़ (1,38,95,90,670) खुराक दी जा चुकी है। साथ ही 55.96 करोड़ (55,96,27,015) लोग ऐसे हैं, जिन्होंने कोरोना वैक्सीन की दोनों ही डोज ले ली है। अगर हम 94 करोड़ की पात्र जनसंख्या भी मान कर चलें तो 59% लोग भारत में कोरोना की वैक्सीन ले चुके हैं। अभी 27.03 करोड़ (27,03,36,640) लोग ऐसे हैं जिन्होंने वैक्सीन की पहली डोज ले ली है और दूसरी डोज बाकी है।

अगर अगले एक महीने में भी इन सभी सिंगल डोज वालों को दूसरी खुराक दे दी जाती है तो भारत की 88% जनसंख्या, अर्थात 83 करोड़ की जनसंख्या कोरोना वैक्सीनेटेड हो जाएगी। जनवरी के अंत तक ये संभव हो सकता है। अभी तक के आँकड़ों की बात करें तो हमने अमेरिका (33 करोड़), रूस (14 करोड़) और यूके (6 करोड़) को मिला कर जितनी जनसंख्या है, उतने लोगों को हम पहले ही कोरोना वैक्सीन दे चुके हैं। बूस्टर शॉट को लेकर भी कई वैज्ञानिक अध्ययन चल रहे हैं और अगर इसके फायदे सामने आते हैं तो सरकार ज़रूर इसकी अनुमति देगी।

बॉडीगार्ड के साथ सेक्स, दुबई के किंग ने अपनी सबसे छोटी बीवी को दिया तलाक: 5500 करोड़ रुपए में सेटलमेंट

दुबई के किंग शेख मोहम्मद बिन राशिद अल-मकतूम (Sheikh Mohammed bin Rashid Al-Maktoum) और उनकी छठी एवं सबसे छोटी बेगम राजकुमारी बिंत अल हुसैन (Princess Haya Bint Al Hussein) के सबसे महँगे तलाक के चर्चे दुनिया भर में हो रहे हैं। ब्रिटेन की अदालत ने दुबई के किंग शेख मोहम्मद बिन राशिद अल-मकतूम को उनकी बेगम राजकुमारी हया और बच्चों को लगभग 550 मिलियन पाउंड (लगभग 730 मिलियन डॉलर) यानी 5,500 करोड़ रुपए को देने का आदेश दिया है।

न्यायाधीश फिलिप मूर (Philip Moor) ने कहा कि किंग को यह रकम डिवोर्स सेटलमेंट और बच्चों के सुरक्षित भविष्य के लिए देनी होगी। ब्रिटेन के ​इतिहास में यह सेटलमेंट सबसे बड़े सेटलमेंट में से एक है। राजकुमारी हया जॉर्डन के पूर्व बादशाह हुसैन की बेटी और जॉर्डन के राजा अब्दुल्ला द्वितीय की सौतेली बहन हैं।

फिलिप मूर ने अपने फैसले में यह भी कहा कि राजकुमारी हया और उनके बच्चों को आतंकवाद या फिर अपहरण जैसे खतरों से बचाने व सुरक्षा देने के लिए खास इंतजाम होने चाहिए। ब्रिटेन में उन्हें खास सुरक्षा की जरूरत होगी। रिपोर्टों के अनुसार, अदालत ने शेख मोहम्मद बिन राशिद अल-मकतूम को राजकुमारी हया को बैंक गारंटी के साथ तीन महीने के अंदर 251.5 मिलियन पाउंड की एकमुश्त राशि का भुगतान करने का आदेश दिया है। इसके अलावा बच्चों के भरण-पोषण और सुरक्षा को कवर करने के लिए 290 मिलियन पाउंड की राशि देने का आदेश दिया है।

इसके अलावा ब्रिटेन की कोर्ट ने 72 वर्षीय शेख को अपनी 47 वर्षीय बीवी और उसके वकील के फोन को हैक करने के लिए पेगासस जैसे स्पाईवेयर का इस्तेमाल करने का दोषी पाया है। इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल सिर्फ सरकारें ही करती हैं। जज ने कहा था कि शेख ने अपनी बीवी राजकुमारी हया को इंग्लैंड जाने से पहले और बाद में परेशान किया था और उसे धमकाया था। कोर्ट के फैसले में फिलिप मूर ने कहा था कि राजकुमारी हया और उनके बच्चों को मुख्य खतरा संयुक्त अरब अमीरात के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद बिन राशिद अल-मकतूम से है।

बताया जा रहा है कि शेख ने अपने दो बच्चों राजकुमारी लतीफा और राजकुमारी शमसा के अपहरण की योजना बनाई थी और उन्हें दुबई में रहने के लिए मजबूर किया था। लतीफा ने अपने अब्बा पर आरोप लगाया था कि उन्होंने उन्हें बंधक बना लिया था।

बता दें कि राजकुमारी हया अब अपने दो बच्चों के साथ लंदन (London) के पश्चिम में स्थित केंसिंग्टन पैलेस (Kensington Palace) के पास एक घर में रहती हैं, जो उन्हें जॉर्डन के दिवंगत राजा हुसैन से विरासत में मिला है। राजकुमारी हया ने वर्ष 2004 में शेख से निकाह किया था। यह उनका दूसरा निकाह था। अदालत के फैसले के अनुसार, शेख ने राजकुमारी हया को वर्ष 2019 में शरिया कानून (Sharia law) के तहत उनको तलाक दे दिया था।

तलाक की वह राजकुमारी हयाक का अवैध संबंध था। हया का अपने बॉडीगार्ड के साथ अवैध संबंध थे। उन्होंने बॉडीगार्ड का मुँह बंद रखने के लिए अपनी 10 वर्षीय बेटी के खाते से 7.5 मिलियन डॉलर रुपये उस बॉडीगार्ड (अंगरक्षक) को दिए थे। शेख मोहम्मद बिन राशिद अल-मकतूम ने अपनी पत्नी राजकुमारी हया के अवैध संबंध के बारे में पता चलने पर उन्हें तलाक दे दिया, जिस कारण मामला कोर्ट में गया। कोर्ट ने कहा कि राजकुमारी और उनके बच्चों की शेख से सुरक्षा जरूरी है क्योंकि, शेख बेवफाई को अपराध मानते हैं।

काशी कब चल रहे हो? महसूस कीजिए शताब्दियों की उपेक्षा, अनदेखी और लूट के बाद पैदा हुई इस नवीनता, उत्साह और आशा को

“काशी कब चल रहे हो?”

दूसरी ओर से फोन पर कपिल भाटी थे। मूलतः राजस्थान के रहने वाले कपिल भाटी एक अंतरराष्ट्रीय कंपनी के भारत में सीईओ हैं। अब परिवार सहित दिल्ली में रहते हैं। बड़े उत्साह से मुझे बता रहे थे कि काशी में क्या-क्या परिवर्तन हुए हैं।

केवल वही नहीं, पिछले तीन दिनों में मेरी तीन मित्रों से फोन पर बात हुई है। इन सबने बातों-बातों में काशी में जो हो रहा है उसका बखान किया। इनमें एक राजस्थान के हैं, दूसरे दक्षिण में आंध्र के और तीसरे गुजरात के। तीनों ने अलग-अलग तरह से एक ही बात कही कि अब तो काशी जाना है।

मेरे गुजराती मित्र तो ने तो काशी जाने का कार्यक्रम भी बना लिया है। यह लेख जब प्रकाशित हो रहा होगा तब वे वहीं होंगे। एक अन्य मित्र ने मुझसे वादा भी लिया है कि 2022 की पहली यात्रा मुझे उनके साथ काशी की ही करनी है। आखिर काशी में ऐसा क्या हो रहा है जो ये सब वहाँ जाने को इतना आतुर हैं?

असल में इनमें से कोई भी तीर्थ यात्री किस्म के लोग नहीं हैं जो आम तौर से धर्मस्थानों की यात्रा करते रहे हैं। ये सब अपेक्षाकृत शहरी, युवा और संपन्न हैं जो तीर्थ यात्रियों की आम श्रेणी में नहीं आते। काशी इन सबके लिए सिर्फ एक धर्मस्थली मात्र नहीं है। ये सब विश्व के प्राचीनतम शहर की काया पलट से अभिभूत हैं। वे अपनी आँखों से वहाँ हुए परिवर्तन को देखना चाहते हैं। ये उस भारत का प्रतिनिधित्व करते हैं जो अपने पुराने शहरों की गंदगी, अव्यवस्था और बेहाली से त्रस्त था और ये मान बैठा था कि वहाँ कुछ नहीं हो सकता। इस निराश भारत को काशी के कायापलट ने आशा की एक डोर थमाई है। उसे अब वो अपनी आँखों से देखना, समझना और आत्मसात करना चाहता है।

बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी को जो लोग सिर्फ एक धार्मिक स्थल के रूप में देखकर काशी कॉरिडोर की आलोचना कर रहे हैं, उन्हें आँखें होते हुए भी अँधा कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी। विश्व के सबसे प्राचीन जीवित और जिंदादिल शहर का जीर्णोंद्धार कब से लंबित था। गंगा अगर इसके प्राण हैं तो भोलेनाथ इसका हृदय। इस नगरी को सुंदर, साफ़ और भव्य बनाकर प्रधानमंत्री मोदी ने उस टीस को दूर किया है जो हर काशीवासी को ही नहीं, बल्कि हर भारतीय को सदियों से सालती रही है।

काशीवासियों के इस दर्द और तकलीफ का ज़िक्र कवि और साहित्यकार सदियों से करते आए हैं। काशी के प्रति शासकों की उदासीनता और उससे उत्पन्न पीड़ा को महान हिंदी साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने अपनी कविता ‘देखी तुमरी कासी, लोगों, देखी तुमरी कासी’ में खूब अच्छी तरह से व्यक्त किया था। इतना ही नहीं, गोस्वामी तुलसीदास की कविताओं में भी यहाँ की तकलीफों का सजीव चित्रण हैं। तो आज जो लोग काशी के पुनुरोद्धार तथा उसकी भव्यता को स्थापित करने के प्रयासों को ‘सांप्रदायिक’ और ‘चुनावी स्टंट’ बता रहे हैं, उन्हें इस साहित्य को पढ़ने की जरूरत है। चुनाव के समय कमीज के ऊपर जनेऊ पहनने वाले, रोज़ा इफ्तारों के ज़रिए वोट बटोरने वाले और मौलवियों को पेंशन देकर राजनीति साधने वालों को तो अपने गिरेबान में झाँकने की जरूरत है। उन्हें समझने की जरूरत है, काशी के चित्त को और उससे समस्त भारत में उत्पन्न होने वाले नाद को।

काशी एक शहर मात्र नहीं है। यह हमारी सभ्यता की जीवंतता और चिरंतनता का जीता-जागता प्रमाण है। जहाँ तुलसीदास ने रामचरितमानस का सृजन किया हो, जहाँ कबीर ने अपने शब्दों को धार दी हो, जिस माटी से भारतेन्दु हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रसाद और मुंशी प्रेमचंद्र सरीखे रचयिता जन्मे हों, जिसे उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई ने गुँजायमान किया हो तथा जहाँ महामना मालवीय ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना कर एक नया इतिहास रचा हो, उसे महज हिंदू-मुस्लिम के खाँचे में डालकर सांप्रदायिक नजरिए से देखना इस धरोहर का अपमान करना है।

विरोध की टिटहरी बजाने वालों से एक सवाल तो बनता है। काशी के आराध्य महादेव की पूजा और उनके मंदिर क्षेत्र के जीर्णोंद्धार में भी आखिर क्या गलत है? जहाँ लाखों श्रद्धालु हर साल आते हों और जो करोड़ों की श्रद्धा का केंद्र हो क्या उसे बदहाल स्थिति में ही रहना चाहिए? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तो वहाँ से सांसद है। उनका तो दायित्व ही है कि वे अपने क्षेत्र का विकास करें और यदि उन्होंने फिर चुनाव जीतने के लिए कॉरिडोर बनवाया है तो भी इसमें बुरा क्या है। यदि देश का हर सांसद और विधायक अपने-अपने क्षेत्र में ऐसा करे तो देश का ही कायापलट हो जाए। काश चुनाव जीतने के लिए हर नेता और दल ऐसा ही करे।

शताब्दियों की उपेक्षा, अनदेखी और लूट के बाद आज काशी के दिन फिरे हैं। सारे भारत में उसका शोर है। देश के अनेक पुराने शहरों और तीर्थस्थलों में रहने वालों की भी उम्मीद जगी है कि अब उनके भी दिन फिर सकते हैं। वे भी सोचने लगे हैं कि उनके तीर्थस्थलों की जन्मकुंडली सदा के लिए गंदगी, दीनता और अव्यवस्था में रहने के लिए अभिशप्त नहीं है। इस नूतन काशी, नए उत्साह से भारत में उत्पन्न नई आशा का तहेदिल से स्वागत और हार्दिक अभिनन्दन है। पूरा भारत ही अब काशी सा ही चलन चाहता है। इसीलिए तो अब तो काशी चलना ही है।

₹408 Cr के बोगस शेयर, ₹154 Cr का फर्जी लोन, ₹86 Cr की गुप्त आय, कई फर्जी कंपनियाँ: सपा नेताओं पर IT रेड का कच्चा चिट्ठा

आयकर विभाग ने पिछले दिनों समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) के नेताओं से जुड़े ठिकानों पर छापेमारी (IT Raid) की थी। इसमें 68 करोड़ रुपए की अवैध संपत्ति का खुलासा हुआ है। केंद्रीय वित्त मंत्रालय के राजस्व विभाग के अंतर्गत आने वाले ‘केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT)’ ने जानकारी दी है कि कंस्ट्रक्शन और रियल एस्टेट से जुड़े लोगों के ठिकानों पर 18 दिसंबर, 2021 को कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में छापेमारी की गई थी। इस दौरान कोलकाता के एक एंट्री ऑपरेटर के ठिकाने भी तलाशे गए थे।

इस दौरान उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ, पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता और कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु के अलावा मैनपुरी एवं मऊ जैसे यूपी के जिले में भी छापेमारी हुई। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के कुछ ठिकानों पर भी आईटी रेड पड़ी। इस दौरान बड़ी संख्या में डिजिटल और हार्ड कॉपी दस्तावेज बरामद किए गए, जो सबूत के रूप में कार्य करेंगे। डेटा के विश्लेषण से पता चला है कि ये लोग अपने कारोबार के जरिए करोड़ों रुपए के फर्जी खर्चे दिखा रहे थे।

बैंक बिल बुक्स, हस्ताक्षर किए गए चेकबुक्स, स्टैम्प्स और बोगस सप्लाइज को जब्त किया गया है। एक मामले में तो कंपनी के निदेशकों की 86 करोड़ रुपयों की गुप्त आय का पता चला। उनमें से एक व्यक्ति ने अपनी 68 करोड़ रुपयों की गुप्त आय की बात कबूल की और साथ ही इस पर टैक्स देने की भी पेशकश की। कंपनी का टर्नओवर पिछले कुछ सालों में कैसे 150 करोड़ रुपए चला गया, इसके पक्ष में वो कुछ नहीं बता सके। आय और निवेश को छिपाने के लिए कई अन्य फर्जी कंपनियों का इस्तेमाल किया गया।

ऐसे ही एक 12 करोड़ रुपयों के निवेश का पता चला, जिसके बारे में ये लोग कुछ नहीं बता सके। एक अन्य फर्जी कंपनी में 11 करोड़ के निवेश और 3.5 करोड़ रुपए की बेनामी संपत्ति का भी पता चला। कोलकाता का एंट्री ऑपरेटर इन सब को छिपाने में इन लोगों की मदद कर रहा था। इसके लिए उसने 408 करोड़ रुपए के बोगस शेयर कैपिटल और 154 करोड़ रुपए का लोन इन फर्जी कंपनियों के जरिए सिक्योर करा लिया। हवाला लेनदेन से जुड़े कई दस्तावेज भी जब्त किए गए हैं।

अब बात करते हैं बेंगलुरु के ट्रस्ट की, जिसके 80 लाख रुपए के ऐसे लेनदेन का पता चला है जिसे डोनेशन के नाम पर नॉन-ट्रस्ट संस्थाओं को भेजा गया। ये संस्थाएँ हैं ‘मरकजू सकाफति सुन्निया ट्रस्ट’ और ‘मरकज नॉलेज सिटी’। अरब मुल्कों से जुड़ी केरल की इन संस्थाओं को व्यक्तिगत हित के लिए ये रुपए भेजे गए। ट्रस्टियों की 4.8 करोड़ रुपए की आमदनी और 10 करोड़ रुपयों के कैश का भी पता चला। ‘विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA)’ के तहत भी जाँच की जा रही है।

बता दें कि छापेमारी में मैनपुरी के मनोज यादव और लखनऊ के जैनेन्द्र यादव जैसे सपा नेताओं के ठिकाने भी तलाशे गए थे। हालाँकि, पूर्व मुख्यमंत्री और सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव इसे सरकारी एजेंसियों का दुरुपयोग बता रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसकी ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ से तुलना की। बेंगलुरु में सपा के राष्ट्रीय सचिव सह प्रवक्ता राजीव राय का मेडिकल कॉलेज है। वहाँ और उनके मऊ स्थित आवास पर आयकर विभाग की छापेमारी को उन्होंने राजनीति से प्रेरित करार दिया था।